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Family Story in Hindi : आधारशिला

Family Story in Hindi : चिकित्सा महाविद्यालय के दीक्षांत समारोह में एमबीबीएस की डिगरी और 2 विषयों में स्वर्णपदक लेती हुई श्वेता को देख कर खुशी से मेरी आंखें भर आईं. वह कितनी सुंदर लग रही थी. गोरा रंग, मोहक नैननक्श. उस पर आत्मविश्वास और बुद्धिमत्ता के तेज ने उस के चेहरे को हजारों में एक बना दिया था.

मैं उस की मां हूं, क्या इसीलिए अपनी बेटी में इतना सौंदर्य देख पाती हूं? मैं ने एक निगाह अपने इर्दगिर्द बैठी भीड़ पर डाली तो पाया कई जोड़ी आंखें श्वेता को एकटक निहार रही हैं.

श्वेता की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. अपना लक्ष्य उस ने पा लिया था. मेरा मन गर्व से भर उठा. साथ ही एक चिंता ने हृदय के किसी कोने से हलके से सिर उठाया कि अब हमें उस के लिए वर की तलाश करनी होगी. सही समय पर सही काम होना ही चाहिए, यही सफल व्यक्ति की निशानी है.

बरसों पहले की बात याद आई. नन्ही श्वेता को पैरों पर झुलाते हुए मैं उसे रटाया करती, ‘वर्क व्हाइल यू वर्क, प्ले व्हाइल यू प्ले…’

श्वेता ने यह कविता अच्छी तरह रट ली थी. जब वह अपनी तोतली आवाज में इसे सुनाती तो मैं भावविभोर हो जाती. मगर क्या इस का सही अर्थ वह समझ पाई थी.

10वीं कक्षा में पहुंचते ही वह पढ़ाई और कैरियर की नींव बनाने की उम्र में राह भटक गई थी. अनजाने प्रदेश की ओर बढ़ते हुए उस के क्रमश: दूर जाते हुए कदमों की पद्चाप को मैं मां हो कर भी पहचान नहीं पाई थी. यदि वह नेक व्यक्ति मुझे उस बात की सूचना न देता तो न जाने श्वेता का क्या होता, क्या होता हम सब का, यदि उस की जगह कोई और होता तो…

मुझे वह दिन याद आया, जब दोपहर की डाक से वह पत्र मिला था :

मीनाजी,

जितनी जल्दी संभव हो, स्कूल आ कर मुझ से मिल लें. कृपया इस बात को गुप्त रखें. श्वेता को भी इस बारे में कुछ न बताएं.

वह नाम मेरे लिए कतई अपरिचित नहीं था. 3-4 महीनों से श्वेता के मुख से वह नाम सुनतेसुनते हमें ही नहीं, शायद पड़ोसियों को भी रट गया था. मगर मैं सोचने लगी कि यह पत्र… इस का मजमून ऐसी कौन सी बात की ओर इशारा कर रहा है, जोकि बेहद गोपनीय है, और शायद गंभीर भी. मेरा हृदय कांप उठा.

‘जैसेतैसे साड़ी लपेट कर मैं ने बालों को ढीलेढाले जूड़े की शक्ल में बांध लिया. श्वेता को उस दिन बुखार था, इसलिए वह स्कूल नहीं जा पाई थी. यह बात मेरे पक्ष में थी. उसे बता कर कि आवश्यक काम से बाहर जा रही हूं, मैं निकल पड़ी.

श्वेता के स्कूल की छुट्टी 4 बजे होती थी. मैं साढ़े 3 बजे ही स्कूल पहुंच चुकी थी. अभी मुझे आधा घंटा इंतजार करना था. मैं प्रवेशद्वार के समीप ही बैंच पर बैठ गई. इस तरह चोरीछिपे इंतजार करना मुझे बड़ा अजीब लग रहा था, मगर करती भी क्या? बात कुछ समझ में नहीं आ रही थी. यदि वह श्वेता की पढ़ाई के संबंध में थी तो उस में गोपनीयता की क्या बात थी?

मासिक टैस्ट में उसे कैमेस्ट्री में अच्छे अंक मिलने लगे थे. हालांकि अन्य विषयों में वह कमजोर ही थी. 1-2 बार मैं ने इस बात के लिए उसे टोका भी था, मगर जोर दे कर कुछ नहीं कहा था. क्योंकि कैमेस्ट्री में उसे इंट्रैस्ट नहीं था, लेकिन अचानक इस वर्ष उस का इंट्रैस्ट देख कर मुझे मन ही मन बड़ा भला लगा था.

मेरी नींद पिछले महीने के टैस्ट के परिणाम के बाद भी नहीं खुली थी, अब अंगरेजी और फिजिक्स में उसे बहुत कम अंक मिले थे. उस समय भी मैं ने श्वेता को संबंधित विषयों में ध्यान देने की बस मामूली सी हिदायत ही दी थी.

हालांकि कुशाग्रबुद्धि श्वेता का अन्य विषयों में इतने कम अंक प्राप्त करना चिंता का विषय होना चाहिए था, परंतु मैं ने सोचा कि साल की शुरुआत ही है, धीरेधीरे वह सभी विषयों को गंभीरता से पढ़ने लगेगी. मैं सोचने लगी, क्या इन विषयों में कम अंक आने के कारण ही पुनीत ने मुझे बुलाया है? लेकिन भला उन्हें अन्य विषयों से क्या लेना? उन के विषय कैमेस्ट्री में तो श्वेता के बराबर ही अच्छे अंक आ रहे हैं.

‘विचारों के भंवर में मैं इस कदर डूब गई थी कि छुट्टी होने की घंटी भी मुझे सुनाई नहीं दी. जब क्लास से लड़कियों के झुंड बाहर निकलने लगे, तब मैं चौंकी. उसी समय देखा, सामने से एक युवक मेरी ओर चला आ रहा है.

‘क्या आप मीनाजी हैं?’ उस ने नम्रता से पूछा.

मेरे हां कहने पर उस ने अपना परिचय दिया, ‘मैं, पुनीत हूं. आइए, हम पास वाले कौफीहाउस में कुछ देर बैठें. दरअसल, बात जरा नाजुक है, इस तरह सड़क पर बताना ठीक नहीं होगा.’

‘ठीक है,’ कहती हुई मैं उन के साथ चल दी. इस तरह अनजान व्यक्ति के साथ आना मुझे कुछ अजीब जरूर लग रहा था, पर गए बिना चारा भी नहीं था.

‘बगल में चलते हुए मैं ने पुनीत पर एक निगाह डाली. 6 फुट लंबा कद, गोरा रंग और आंखों पर चढ़ा चश्मा, जो उन के व्यक्तित्व को और भी अधिक प्रभावशाली बना रहा था. उन की आवाज धीर गंभीर थी.

शीघ्र ही हम कौफीहाउस पहुंच गए. कौफी का और्डर दे कर वे कुछ क्षणों के लिए चुप हो गए. चारों ओर नजर दौड़ा कर उन्होंने कमीज की जेब से एक कागज का टुकड़ा निकाल कर मेरी ओर बढ़ाया, ‘पत्र है, श्वेता का, मेरे नाम.’

मैं ने थरथराते हाथों से पत्र ले कर पढ़ा. क्या नहीं था उस में, जन्मजन्मांतर का अटूट संबंध, रातरात भर जागते रहने का इजहार, याद, इंतजार, आरजू और न जाने कैसेकैसे शब्दों से भरा हुआ था वह पत्र.

पत्र पढ़तेपढ़ते मेरे आंसू निकल आए. ऐसा लगा, श्वेता की उच्चशिक्षा संबंधी सारी महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो गया. मेरी स्थिति को पुनीत भांप गए थे. वे कहने लगे, ‘यदि आप होश खो बैठेंगी तो श्वेता का क्या होगा.’

मैं ने उन की ओर देखा कि कहीं उन के इस वाक्य में मेरे प्रति उपहास तो नहीं, लेकिन नहीं, इस वाक्य का सहीसही अर्थ ही उन के चेहरे पर लिखा हुआ था. वे आगे बोले, ‘इस उम्र में अकसर ऐसा हो जाता है. दरअसल, श्रद्धा और प्रेम का अंतर हमें इस उम्र में समझ में नहीं आता. इसलिए आप इसे गंभीर अपराध के रूप में न लें. इसीलिए मैं ने आप से ही इस बारे में बात करना ठीक समझा. आप उस की मां हैं, उस के हृदय को समझ सकती हैं.’

‘परंतु ऐसा पत्र, जी चाहता है, उसे जान से मार डालूं.’

‘नहीं, आप इस बात को श्वेता को महसूस भी न होने दें कि आप को इस पत्र के बारे में सबकुछ मालूम है. हम इस समस्या को शांति से सुलझाएंगे. आप तो जानती ही हैं कि यदि अनुकूल परिस्थितियों में यह उम्र हवा का शीतल झोंका होती है तो प्रतिकूल परिस्थितियों में गरजता हुआ तूफान बन जाती है.’

‘आप कह तो ठीक ही रहे हैं,’ मैं ने मन ही मन उन के मस्तिष्क की परिपक्वता की सराहना की.

पुनीत से की गई 15-20 मिनट की बातचीत ने मेरे मन के बोझ को आंशिक रूप से ही सही, पर कुछ कम अवश्य किया था.

‘क्या आप ने मनोविज्ञान पढ़ा है?’ मैं ने पूछा तो वे हंस पड़े, ‘जी, बाकायदा तो नहीं, परंतु हजारों मजबूरियों से घिरा हुआ मध्यवर्गीय घर है हमारा. मैं 5 भाईबहनों में सब से बड़ा हूं. सब की अपनीअपनी समस्याएं, उन के सुखदुख का मैं गवाह बना. उन का राजदार, मार्गदर्शक, सभी कुछ. मातापिता ने परिस्थितियों से शांतिपूर्वक जूझने के संस्कार दिए और इस तरह मेरा घर ही मेरे लिए अनुभवों की पाठशाला बन गया.’

उन के गजब के संतुलित स्वर ने मेरे उबलते हुए मन को मानो ठंडक प्रदान की.

‘तो योजना के मुताबिक, आप कल हमारे घर आ रहे हैं?’ मैं ने कहा और उन से विदा ली.

मैं ने औटोरिकशा के बजाय बस से ही जाना ठीक समझा. एकांत से मुझे डर लग रहा था. बस  की भीड़ में शायद मेरा दुख अधिक तीव्रता धारण न कर पाए. मगर मेरा सोचना गलत था. भीड़भरी बस में भी मैं बिलकुल अकेली थी. मेरा दुख मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चल रहा था.

‘बसस्टौप से धीरेधीरे कदम बढ़ाते हुए मैं घर पहुंची. मुझे देखते ही श्वेता दौड़ कर आई और मेरे गले लिपट गई, ‘ओह मां, कितनी देर लगा दी. मैं अकेली बैठी कब से बोर हो रही हूं.’

‘श्वेता, छोड़ो यह बचपना,’ मैं ने अपने गले से उस की बांहें हटाते हुए कहा.

मैं ने बेरुखी से उस के हाथ झटक तो दिए थे, पर तभी पुनीत की वह बात याद आई, ‘आप अपने व्यवहार से उसे किसी तरह का आभास न होने दें कि आप उस के बारे में सबकुछ जान चुकी हूं,’ सो, मैं ने सहज स्वर में कहा, ‘बेटे, जल्दी जा कर लेट जाओ, तुम्हें अभी भी बुखार है. थोड़ी देर में अंकित भी आता होगा, वह तुम्हें जरा भी आराम नहीं करने देगा.’

श्वेता अपने कमरे में जा कर लेट गई. मैं एक पत्रिका ले कर पढ़ने बैठ गई, पर ध्यान पढ़ने में कहां था. मेरा मन तो किसी खुफिया अधिकारी की तरह श्वेता के पिछले व्यवहार की छानबीन करने लगा. वह अकसर पुनीत की प्रशंसा किया करती थी. सो, हम भी उन की योग्यता के कायल हो चुके थे, क्योंकि पिछले साल की अपेक्षा इस साल श्वेता को कैमेस्ट्री में काफी अच्छे अंक मिले थे.

जब पढ़ाने की तारीफ से आगे बढ़ कर उस ने उन के व्यक्तित्व की तारीफ शुरू की, तब भी मुझे कुछ अजीब नहीं लगा था. मैं सोचती, 14-15 वर्ष की उम्र यों भी सिर्फ योग्यता तोलने की नहीं होती. यदि वह उन्हें स्मार्ट कहा करती है  तो यह गलत नहीं. ऐसे ही शब्द तो इस उम्र में किसी के व्यक्तित्व को नापने का पैमाना होते हैं.

जब मैं उम्र के इस दौर से गुजर रही थी, मुझे भी अपनी शिक्षिका देविका कोई आसमानी परी मालूम होती थीं. मेरी मां और बाबूजी अकसर कहा करते थे, ‘इसे हमारी कोई बात समझ में ही नहीं आती, लेकिन वही बात अगर देविका कह दें तो तुरंत मान लेगी.’

यह तो बहुत बाद में समझ आया कि देविका भी औरों की तरह साधारण सी महिला थीं. मुझे महसूस होने वाला उन का पढ़ाने का जादुई ढंग उन के अपने बच्चों पर बेअसर रहा था. उन के दोनों बेटे क्लास में मुश्किल से ही पास होते थे.

बस, इसी तरह श्वेता का भी पुनीत का अतिरिक्त गुणगान करना मुझे जरा भी संदेहजनक नहीं लगा था.

दरवाजे की डोरबैल जोर से बज रही थी. शायद अंकित आ गया था. मैं ने भाग कर दरवाजा खोला.

अंकित को दूध का गिलास पकड़ा कर मैं रात के खाने की तैयारी में लग गई. श्वेता की समस्या ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया था, मगर फिर भी सोच लिया था कि जैसे भी हो, यह बात मैं इन के कानों में नहीं पड़ने दूंगी. इन का प्यार भी असीम था और गुस्सा भी. इन्हें यदि इस पत्र के बारे में पता चल जाता, तो शायद श्वेता को सूली पर चढ़ा देते.

शाम को ये लगभग 8 बजे घर पहुंचे. श्वेता और अंकित में किसी बात पर झगड़ा हो रहा था. टीवी जोरजोर से चल रहा था. इन्होंने आते ही पहले टीवी औफ किया, फिर बच्चों को जोरदार आवाज में डांटा. जब कोलाहल बंद हुआ तब मुझे खयाल आया कि मैं अपने विचारों में किस कदर खोई हुईर् थी.

‘क्या बात है, कुछ परेशान सी लग रही हो, बच्चों को इन की शैतानियों के लिए डांट नहीं रही हो?’ इन्होंने पास आ कर पूछा.

‘लीजिए, अब डांटना ही हमारे स्वस्थ होने का परिचायक हो गया. क्या मैं चुपचाप बैठी आप को अच्छी नहीं लग रही?’ मैं ने शरारत से पूछा.

‘नहीं, बिलकुल अच्छी नहीं लग रही हो. बच्चों की आवाजें, टीवी का शोर और इन सब से ऊपर तुम्हारी आवाज हो, तभी मुझे लगता है कि मैं अपने घर आया हूं’, इन्होंने नहले पे दहला मारा.

खाना खाते समय श्वेता खामोश ही रही. उस के पास सुनाने के लिए कुछ नहीं था, क्योंकि वह स्कूल जो नहीं गई थी. फिर भी एकाध बार पुनीत की तारीफ करना नहीं भूली.

योजना के मुताबिक अगले दिन पुनीत हमारे घर आए. श्वेता उन्हें देख कर आश्चर्यचकित रह गई, ‘सर, आप? यहां कैसे? आप को कैसे पता चला कि मैं यहां रहती हूं? मैं बीमार थी, क्या इसीलिए मुझे देखने आए हैं?’ उस ने सवालों की झड़ी लगा दी.

पुनीत मुसकराते हुए बोले, ‘हां भई, मैं इस तरफ किसी काम से आया था, सोचा, तुम से भी मिलता चलूं. पता तो तुम ने ही मुझे दिया था.’

‘ओह, हां. मुझे तो याद ही नहीं रहा.’ श्वेता के चेहरे पर खुशी झलक रही थी. टीवी पर फिल्म चल रही थी. श्वेता फिल्म देखते हुए हमेशा अपनेआप को भी भूल जाती थी, मगर अब उसे फिल्म से भी कोई मतलब नहीं था. उस की दुनिया तो जैसे पुनीत में ही सिमट आई थी.

‘सर, आप क्या खाएंगे?’ श्वेता इठला कर पूछ रही थी. ‘जो आप बना लाएं,’ उन्होंने शरारती स्वर में कहा.

‘जी, मैं तो सिर्फ चाय बना सकती हूं.’ ‘जी हां, मैं तो भूल ही गया था, आप तो छोटी सी बच्ची हैं, आप को भला क्या बनाना आता होगा.’

श्वेता को हंसते देख उसे गुस्सा आ रहा था.

मैं रसोई में जा कर नमकीन, मठरी और गुलाबजामुन ले आई.

‘अरे, आप तो बहुत कुछ ले आईं,’ पुनीत शिष्टता से बोले. ‘कहां बहुत कुछ है सर, आप यह लीजिए. मैं आप के लिए पकौडि़यां तल कर लाती हूं.’

‘ नहीं भई, इतना काफी है,’ कहते हुए पुनीत अपने बारे में बताने लगे कि वे एक गरीब परिवार से हैं. पिता रिटायर्ड हैं, 2 छोटी बहनें और 1 भाई अभी पढ़ रहे हैं, जिन की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है.

हमारी योजना के मुताबिक ही वे अपने परिवार के हालात के बारे में जानबूझ कर बता रहे थे. यह वास्तविकता भी थी और कुछ बढ़ाचढ़ा कर भी बताई जा रही थी, ताकि इस कठोर धरातल की ओर बढ़ते हुए श्वेता के नाजुक पांव अपनेआप कांप उठें.

इस घटना के 2-3 दिनों बाद मैं पुनीत से मिलने स्कूल गई. इस बार हम ने स्कूल के बाहर एक स्थान और समय निश्चित कर लिया था. वे आए और मेरे हाथ में एक कागज का टुकड़ा पकड़ा कर चले गए. डर था कि कहीं श्वेता हमें न देख ले. पत्र कुछ इस प्रकार था :

आदरणीय सर,

आप मेरे पत्रों के उत्तर क्यों नहीं देते? क्या मैं आप को सुंदर नहीं लगती या अपनी गरीबी की वजह से ही आप आगे बढ़ने में डर रहे हैं? सर, जब से मुझे आप की आर्थिक स्थिति का पता चला है, आप की कर्तव्यभावना देख कर मेरे मन में आप के प्रति सम्मान और अधिक बढ़ गया है. कृपया मुझे अपना लें. मैं आप का पूरापूरा साथ दूंगी. नमक के साथ सूखी रोटी खा कर भी दिन गुजार लूंगी. आप का परिवार मेरा परिवार है. हम मिलजुल कर यह जिम्मेदारी उठाएंगे.

आप की,

श्वेता.

पत्र पढ़ कर मैं ने सिर पीट लिया कि सारी योजना बेकार चली गई. नमक के साथ रोटी वाली बात पढ़ कर तो बेहद हंसी आई. खाने में पचासों नुक्स निकालने वाली श्वेता को मैं कल्पना में भी सूखी रोटी खाते हुए नहीं देख सकती थी. गरीबी उस के लिए सिर्फ फिल्मी अनुभव के समान थी. गरीबी का फिल्मीरूप जितना लुभावना होता है, असलियत उतनी ही जानलेवा. काश, श्वेता यह सब जान पाती.

2-3 दिन श्वेता अनमनी सी रही, फिर कुछ सहज हो गई. 10-15 दिनों से पुनीत का भी कोई फोन नहीं आया था. हम ने तय कर लिया था कि श्वेता यदि उन्हें कोई पत्र लिखती है तो वे पहले मुझे फोन से खबर देंगे. मुझे लगने लगा कि पुनीत की बेरुखी या गरीबी की वजह से श्वेता अपनेआप ही संभल गई है.

उस रात मैं कई दिनों बाद निश्चिंत हो कर सोई. सुबह उठी तो सब से पहले श्वेता के कमरे की ओर गई. श्वेता गहरी नींद में थी, लेकिन उस के गोरे गालों पर आंसुओं के निशान थे. लगता था, जैसे वह देररात तक रोती रही थी. मेज पर कैमेस्ट्री की कौपी रखी थी. मैं ने खोल कर देखा तो उस में से एक पत्र गिरा. सलीमअनारकली, हीररांझा आदि के उदाहरण सहित उस में अनेक फिल्मी बातें लिखी हुई थीं.

लेकिन उस पत्र की अंतिम पंक्ति मुझे धराशायी कर देने के लिए काफी थी. ‘सर, यदि आप ने मेरा प्यार स्वीकार न किया तो मैं आत्महत्या कर लूंगी.’

मैं भाग कर श्वेता के निकट पहुंची. उस की लयबद्ध सांसों ने मुझे आश्वस्त किया. फिर मैं ने उस की अलमारी की एकएक चीज की छानबीन की कि कहीं कोई जहर की शीशी तो उस ने छिपा कर नहीं रखी है, लेकिन ऐसी कोई चीज वहां नहीं मिली. मेरा धड़धड़ धड़कता हुआ कलेजा कुछ शांत हुआ. लेकिन चिंता अब भी थी.

मेरी नजरों के सामने अखबारी खबरें घूम गईं. एकतरफा प्रेम के कारण या प्रेम सफल न होने के कारण आत्महत्या की कितनी ही खबरें मैं ने तटस्थ मन से पढ़ी, सुनी थीं. लेकिन अब जब अपने ऊपर बीत रही थी, तभी उन खबरों का मर्मभेदी दुख अनुभव कर पा रही थी.

मुझे बरसों पहले की वह घटना याद आई जब कमरे में घुस आई एक नन्ही चिडि़या को उड़ाने के प्रयत्न में मैं पंखा बंद करना भूल गई थी. चिडि़या पंखे से टकरा कर मर गईर् थी. उस की क्षतविक्षत देह और कमरे में चारों ओर बिखरे कोमल पंख मुझे अकसर अतीत के गलियारों में खींच ले जाते, और तब मन में एक टीस पैदा होती.

श्वेता के संदर्भ में उस चिडि़या का याद आना मुझे बड़ा अजीब लगा. मैं ने स्कूल में पुनीत को फोन किया. मेरी कंपकंपाहटभरी आवाज सुन कर शायद वे मेरी दुश्चिंता भांप गए और बोले, ‘धीरज रखिए, मैं आधे दिन की छुट्टी ले कर आप के घर आऊंगा.’

निश्चित समय पर पुनीत आए. मैं जितनी बेचैन थी, वे उतने ही शांत लग रहे थे.

मैं ने कहा, ‘आप को सुन कर अवश्य आश्चर्य होगा, पर मैं आज कुछ अलग ही तरह की बात कहने जा रही हूं,’ मैं ने अपनेआप को स्थिर कर के कहा, ‘आप श्वेता से शादी कर लीजिए, कहीं वह प्रेम में पागल हो कर आत्महत्या न कर ले.’ यह कहतेकहते फफकफफक कर रो पड़ी.

‘अपनेआप को संभालिए. श्वेता अभी बच्ची है मेरी छोटी बहन के समान. उस की उम्र अभी शादी की नहीं, सुनहरे भविष्य के निर्माण की है, जिस की आधारशिला हमें अपने हाथों से रखनी होगी.’

‘वह तो ठीक है, लेकिन आज उस ने पत्र लिखा है, जिस में…’

‘वह पत्र उस ने मुझे दिया है, आप घबराएं नहीं. जब तक मैं उसे नकारात्मक उत्तर नहीं दूंगा, तब तक कुछ नहीं होगा. अभी तक मैं ने उस के प्रेम को स्वीकारा नहीं है, तो नकारा भी नहीं है.’

‘लेकिन यह स्थिति कब तक कायम रहेगी?’ मैं ने पूछा.

‘अधिक दिन नहीं,’ वे बोले, ‘यह तो हम जान ही चुके हैं कि श्वेता का ऐसी हरकतें करना कुछ तो उस की किशोर उम्र का परिणाम है और कुछ फिल्मों का मायावी संसार उसे यह सबकुछ करने को उकसाता रहा है, क्योंकि वह फिल्में देखने की बहुत शौकीन है.’

‘जी हां, मगर फिल्म और वास्तविकता के बीच का फर्क उसे समझाएं तो कैसे. और समझ में आने पर भी क्या प्यार का भूत उस के सिर से उतर जाएगा?’

पुनीत कहीं और देख रहे थे, जैसे उन्होंने मेरा प्रश्न सुना ही न हो, फिर एकाएक बोल पड़े, ‘अब आप निश्चिंत रहिए. उस का यह फिल्मी तिलिस्म फिल्मी ढंग से ही टूटेगा.’ और वे चले गए.

मेरे मन में आया कि पति से इतनी गंभीर बात छिपा कर मैं कहीं गलती तो नहीं कर रही हूं. मगर जब औफिस से लौटने पर इन का थकाहारा चेहरा देखती तो बस, यही लगता कि इन के सामने ऐसी गंभीर समस्या न ही रखूं. यदि मैं अपने स्तर पर यह समस्या सुलझा सकूं तो बहुत अच्छा होगा और फिर पुनीत का पूरा साथ है ही. दूसरी बात, इन के गुस्से का भी क्या ठिकाना. यदि गुस्से में आ कर इन्होंने कोई कठोर कदम उठाया तो श्वेता न जाने क्या कर बैठे.

गनीमत यही थी कि पुनीत बहुत चरित्रवान थे. यदि वे छिछोरे युवकों जैसे होते तो हम कहीं के न रहते.

अगले दिन पुनीत हमारे घर फिर आए. श्वेता हमेशा की तरह बेहद खुश हुई. अब वे अकसर ही हमारे घर आने लगे. शायद श्वेता को इस बात से विश्वास हो चला था कि वे भी उसे चाहते हैं.

जब भी वे आते, अपने बारे में कुछ न कुछ ऊलजलूल बोलते चले जाते.

श्वेता कहती, ‘सर, यह चश्मा आप पर बहुत फबता है,’ तो कहते, ‘जानती हो, इस का नंबर है माइनस फाइव. 35 की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते मैं अंधा हो जाऊंगा.’

श्वेता भी उन की बातों से कुछ ऊबती हुईर् नजर आती.

एक रोज वे घर पर आए. ठीक उसी वक्त फ्यूज उड़ जाने से बिजली चली गई. श्वेता उन से बोली, ‘मैं फ्यूज वायर ला देती हूं, आप जोड़ दीजिए.’

‘मैं और फ्यूज?’ वे इस तरह घबराए, जैसे कोई अनोखी बात सुन ली हो, ‘श्वेता, फ्यूज तो दूर, मैं बिजली का मामूली से मामूली काम भी नहीं जानता. करंट लगने से मैं बेहद डरता हूं.’

श्वेता ने उन की ओर आश्चर्य से देखा, ‘सर, फ्यूज तो मैं भी जोड़ लेती हूं. बस, मीटर बोर्ड कुछ ऊंचा होने के कारण आप से कह रही हूं.’

श्वेता ने मेज पर स्टूल रखा और फ्यूज ठीक कर दिया. पुनीत यह सब खामोशी से देख रहे थे.

रात को खाना खाते समय श्वेता हंसतेहंसते यह घटना अपने पिताजी को सुना रही थी. इतना लंबाचौड़ा युवक और फ्यूज सुधारने जैसा साधारण काम नहीं कर सकता. उस की हीरो वाली छवि को इस घटना से बड़ा धक्का लगा था.

पर उस रोज मैं न हंस पाई. मैं जानती थी कि पुनीत ने जानबूझ कर ऐसी हरकत की थी.

एक रोज उन्होंने एक और मनगढ़ंत घटना सुनाई कि जब वे कालेज में पढ़ते थे, एक चोर घर के अंदर घुस आया. वे चुपचाप सांस रोके लेटे रहे. चोर अलमारी में रखे 5-7 सौ रुपए ले कर भाग गया.

श्वेता उन की ओर अविश्वास से ताकती रही, फिर बोली, ‘कुछ भी हो, आप को उसे पकड़ने की कोशिश तो करनी ही चाहिए थी. आप के साथसाथ समाज का भी कुछ भला हो जाता.’

‘समाज के लिए मरमिटूं, मैं ऐसा बेवकूफ नहीं हूं,’ वे बोले. फिर कुछ क्षण ठहर कर कहने लगे, ‘समाज हमारे लिए क्या करता है? यों तो लोग दहेज विरोधी बातें भी खूब करते हैं, पर मैं क्यों न लूं दहेज? क्या समाज मेरी बहनों की मुफ्त में शादी करवा देगा?’

श्वेता कुछ नहीं बोली, अपने सपनों के राजकुमार की खंडित प्रतिमा को वह किसी तरह जोड़ नहीं पा रही थी.

उस के कुछ दिन बड़ी मानसिक ऊहापोह में गुजरे. फिर एक रोज उस ने शायद अपने कमजोर मन पर विजय पा ही ली.

एक दिन वह बोली, ‘मां, कुछ लोग ऐसे क्यों होते हैं?’

‘कैसे?’ मैं उस के प्रश्न का रुख समझ रही थी, फिर भी पूछ लिया.

‘देखने में बड़े आदर्शवादी, समाज सुधारक और बड़ीबड़ी बातें करने वाले और अंदर से धोखेबाज, मक्कार और झूठे हैं. जैसे, जैसे पुनीत सर.’ आंसू छिपाती हुई वह अपने कमरे में चली गई. मुझे उस के दिए हुए ये विशेषण बिलकुल अच्छे नहीं लगे. मैं सोच रही थी कि मेरी बेटी को सही राह पर लाने वाला व्यक्ति सिर्फ महान, समझदार और व्यवहारकुशल हो सकता है और कुछ नहीं.

मैं ने उसे समझाया, ‘बेटी, दुनिया में कई तरह के लोग होते हैं. सभी हमारी आकांक्षाओं के अनुरूप  नहीं होते. वे जैसे भी होते हैं, अपनी जगह पर सही होते हैं. इसलिए उन्हें बुराभला कहना ठीक नहीं.’

श्वेता ने मुझ से बहस नहीं की, पर धीरेधीरे उस का पुराना रूप लौटने लगा. मैं खुश थी.

एक दिन पुनीत का फोन आया कि श्वेता अब उन्हें पत्र नहीं लिखती, उन से दूसरी छात्राओं की तरह  ही पेश आती है. तब मैं ने उन्हें दिल से धन्यवाद दिया.

जिस तरह नाजुक हाथों से उलझे हुए रेशम को सुलझाया जाता है, उसी तरह नफासत से उन्होंने श्वेता के दिल की गुत्थी को सुलझाया था.

उस वर्ष वह जैसेतैसे द्वितीय श्रेणी ही पा सकी, जोकि स्वाभाविक ही था. लगभग पूरा वर्ष उस ने प्रेमवर्ष के रूप में ही तो मनाया था. पर उस के बाद वह पूरी तरह पढ़ाई में जुट गई. और अब उस का सपना भी पूरा हो गया. Family Story in Hindi

Hindi Social Story : जीत गया जंगवीर

Hindi Social Story. ‘‘खत आया है…खत आया है,’’ पिंजरे में बैठी सारिका शोर मचाए जा रही थी. दोपहर के भोजन के बाद तनिक लेटी ही थी कि सारिका ने चीखना शुरू कर दिया तो जेठ की दोपहरी में कमरे की ठंडक छोड़ मुख्यद्वार तक जाना पड़ा.

देखा, छोटी भाभी का पत्र था और सब बातें छोड़ एक ही पंक्ति आंखों से दिल में खंजर सी उतर गई, ‘दीदी आप की सखी जगवीरी का इंतकाल हो गया. सुना है, बड़ा कष्ट पाया बेचारी ने.’ पढ़ते ही आंखें बरसने लगीं. पत्र के अक्षर आंसुओं से धुल गए. पत्र एक ओर रख कर मन के सैलाब को आंखों से बाहर निकलने की छूट दे कर 25 वर्ष पहले के वक्त के गलियारे में खो गई मैं.

जगवीरी मेरी सखी ही नहीं बल्कि सच्ची शुभचिंतक, बहन और संरक्षिका भी थी. जब से मिली थी संरक्षण ही तो किया था मेरा. जयपुर मेडिकल कालेज का वह पहला दिन था. सीनियर लड़केलड़कियों का दल रैगिंग के लिए सामने खड़ा था. मैं नए छात्रछात्राओं के पीछे दुबकी खड़ी थी. औरों की दुर्गति देख कर पसीने से तरबतर सोच रही थी कि अभी घर भाग जाऊं.

वैसे भी मैं देहातनुमा कसबे की लड़की, सब से अलग दिखाई दे रही थी. मेरा नंबर भी आना ही था. मुझे देखते ही एक बोला, ‘अरे, यह तो बहनजी हैं.’ ‘नहीं, यार, माताजी हैं.’ ऐसी ही तरहतरह की आवाजें सुन कर मेरे पैर कांपे और मैं धड़ाम से गिरी. एक लड़का मेरी ओर लपका, तभी एक कड़कती आवाज आई, ‘इसे छोड़ो. कोई इस की रैगिंग नहीं करेगा.’

‘क्यों, तेरी कुछ लगती है यह?’ एक फैशनेबल तितली ने मुंह बना कर पूछा तो तड़ाक से एक चांटा उस के गाल पर पड़ा. ‘चलो भाई, इस के कौन मुंह लगे,’ कहते हुए सब वहां से चले गए. मैं ने अपनी त्राणकर्ता को देखा. लड़कों जैसा डीलडौल, पर लंबी वेणी बता रही थी कि वह लड़की है. उस ने प्यार से मुझे उठाया, परिचय पूछा, फिर बोली, ‘मेरा नाम जगवीरी है. सब लोग मुझे जंगवीर कहते हैं. तुम चिंता मत करो. अब तुम्हें कोई कुछ भी नहीं कहेगा और कोई काम या परेशानी हो तो मुझे बताना.’

सचमुच उस के बाद मुझे किसी ने परेशान नहीं किया. होस्टल में जगवीरी ने सीनियर विंग में अपने कमरे के पास ही मुझे कमरा दिलवा दिया. मुझे दूसरे जूनियर्स की तरह अपना कमरा किसी से शेयर भी नहीं करना पड़ा. मेस में भी अच्छाखासा ध्यान रखा जाता. लड़कियां मुझ से खिंचीखिंची रहतीं. कभीकभी फुसफुसाहट भी सुनाई पड़ती, ‘जगवीरी की नई ‘वो’ आ रही है.’ लड़के मुझे देख कर कन्नी काटते. इन सब बातों को दरकिनार कर मैं ने स्वयं को पढ़ाई में डुबो दिया. थोड़े दिनों में ही मेरी गिनती कुशाग्र छात्रछात्राओं में होने लगी और सभी प्रोफेसर मुझे पहचानने तथा महत्त्व भी देने लगे.

जगवीरी कालेज में कभीकभी ही दिखाई पड़ती. 4-5 लड़कियां हमेशा उस के आगेपीछे होतीं.

एक बार जगवीरी मुझे कैंटीन खींच ले गई. वहां बैठे सभी लड़केलड़कियों ने उस के सामने अपनी फरमाइशें ऐसे रखनी शुरू कर दीं जैसे वह सब की अम्मां हो. उस ने भी उदारता से कैंटीन वाले को फरमान सुना दिया, ‘भाई, जो कुछ भी ये बच्चे मांगें, खिलापिला दे.’

मैं समझ गई कि जगवीरी किसी धनी परिवार की लाड़ली है. वह कई बार मेरे कमरे में आ बैठती. सिर पर हाथ फेरती. हाथों को सहलाती, मेरा चेहरा हथेलियों में ले मुझे एकटक निहारती, किसी रोमांटिक सिनेमा के दृश्य की सी उस की ये हरकतें मुझे विचित्र लगतीं. उस से इन हरकतों को अच्छी अथवा बुरी की परिसीमा में न बांध पाने पर भी मैं सिहर जाती. मैं कहती, ‘प्लीज हमें पढ़ने दीजिए.’ तो वह कहती, ‘मुनिया, जयपुर आई है तो शहर भी तो देख, मौजमस्ती भी कर. हर समय पढ़ेगी तो दिमाग चल जाएगा.’

वह कई बार मुझे गुलाबी शहर के सुंदर बाजार घुमाने ले गई. छोटीबड़ी चौपड़, जौहरी बाजार, एम.आई. रोड ले जाती और मेरे मना करतेकरते भी वह कुछ कपड़े खरीद ही देती मेरे लिए. यह सब अच्छा भी लगता और डर भी लगा रहता.

एक बार 3 दिन की छुट्टियां पड़ीं तो आसपास की सभी लड़कियां घर चली गईं. जगवीरी मुझे राजमंदिर में पिक्चर दिखाने ले गई. उमराव जान लगी हुई थी. मैं उस के दृश्यों में खोई हुई थी कि मुझे अपने चेहरे पर गरम सांसों का एहसास हुआ. जगवीरी के हाथ मेरी गरदन से नीचे की ओर फिसल रहे थे. मुझे लगने लगा जैसे कोई सांप मेरे सीने पर रेंग रहा है. जिस बात की आशंका उस की हरकतों से होती थी, वह सामने थी. मैं उस का हाथ झटक अंधेरे में ही गिरतीपड़ती बाहर भागी. आज फिर मन हो रहा था कि घर लौट जाऊं.

मैं रो कर मन का गुबार निकाल भी न पाई थी कि जगवीरी आ धमकी. मुझे एक गुडि़या की तरह जबरदस्ती गोद में बिठा कर बोली, ‘क्यों रो रही हो मुनिया? पिक्चर छोड़ कर भाग आईं.’

‘हमें यह सब अच्छा नहीं लगता, दीदी. हमारे मम्मीपापा बहुत गरीब हैं. यदि हम डाक्टर नहीं बन पाए या हमारे विषय में उन्होंने कुछ ऐसावैसा सुना तो…’ मैं ने सुबकते हुए कह ही दिया.

‘अच्छा, चल चुप हो जा. अब कभी ऐसा नहीं होगा. तुम हमें बहुत प्यारी लगती हो, गुडि़या सी. आज से तुम हमारी छोटी बहन, असल में हमारे 5 भाई हैं. पांचों हम से बड़े, हमें प्यार बहुत मिलता है पर हम किसे लाड़लड़ाएं,’ कह कर उस ने मेरा माथा चूम लिया. सचमुच उस चुंबन में मां की महक थी.

जगवीरी से हर प्रकार का संरक्षण और लाड़प्यार पाते कब 5 साल बीत गए पता ही न चला. प्रशिक्षण पूरा होने को था तभी बूआ की लड़की के विवाह में मुझे दिल्ली जाना पड़ा. वहां कुणाल ने, जो दिल्ली में डाक्टर थे, मुझे पसंद कर उसी मंडप में ब्याह रचा लिया. मेरी शादी में शामिल न हो पाने के कारण जगवीरी पहले तो रूठी फिर कुणाल और मुझ को महंगेमहंगे उपहारों से लाद दिया.

मैं दिल्ली आ गई. जगवीरी 7 साल में भी डाक्टर न बन पाई, तब उस के भाई उसे हठ कर के घर ले गए और उस का विवाह तय कर दिया. उस के विवाह के निमंत्रणपत्र के साथ जगवीरी का स्नेह, अनुरोध भरा लंबा सा पत्र भी था. मैं ने कुणाल को बता रखा था कि यदि जगवीरी न होती तो पहले दिन ही मैं कालेज से भाग आई होती. मुझे डाक्टर बनाने का श्रेय मातापिता के साथसाथ जगवीरी को भी है.

जयपुर से लगभग 58 किलोमीटर दूर के एक गांव में थी जगवीरी के पिता की शानदार हवेली. पूरे गांव में सफाई और सजावट हो रही थी. मुझे और पति को बेटीदामाद सा सम्मानसत्कार मिला. जगवीरी का पति बहुत ही सुंदर, सजीला युवक था. बातचीत में बहुत विनम्र और कुशल. पता चला सूरत और अहमदाबाद में उस की कपड़े की मिलें हैं.

सोचा था जगवीरी सुंदर और संपन्न ससुराल में रचबस जाएगी, पर कहां? हर हफ्ते उस का लंबाचौड़ा पत्र आ जाता, जिस में ससुराल की उबाऊ व्यस्तताओं और मारवाड़ी रिवाजों के बंधनों का रोना होता. सुहाग, सुख या उत्साह का कोई रंग उस में ढूंढ़े न मिलता. गृहस्थसुख विधाता शायद जगवीरी की कुंडली में लिखना ही भूल गया था. तभी तो साल भी न बीता कि उस का पति उसे छोड़ गया. पता चला कि शरीर से तंदुरुस्त दिखाई देने वाला उस का पति गजराज ब्लडकैंसर से पीडि़त था. हर साल छह महीने बाद चिकित्सा के लिए वह अमेरिका जाता था. अब भी वह विशेष वायुयान से पत्नी और डाक्टर के साथ अमेरिका जा रहा था. रास्ते में ही उसे काल ने घेर लिया. सारा व्यापार जेठ संभालता था, मिलों और संपत्ति में हिस्सा देने के लिए वह जगवीरी से जो चाहता था वह तो शायद जगवीरी ने गजराज को भी नहीं दिया था. वह उस के लिए बनी ही कहां थी.

एक दिन जगवीरी दिल्ली आ पहुंची. वही पुराना मर्दाना लिबास. अब बाल भी लड़कों की तरह रख लिए थे. उस के व्यवहार में वैधव्य की कोई वेदना, उदासी या चिंता नहीं दिखी. मेरी बेटी मान्या साल भर की भी न थी. उस के लिए हम ने आया रखी हुई थी.

जगवीरी जब आती तो 10-15 दिन से पहले न जाती. मेरे या कुणाल के ड्यूटी से लौटने तक वह आया को अपने पास उलझाए रखती. मान्या की इस उपेक्षा से कुणाल को बहुत क्रोध आता. बुरा तो मुझे भी बहुत लगता था पर जगवीरी के उपकार याद कर चुप रह जाती. धीरेधीरे जगवीरी का दिल्ली आगमन और प्रवास बढ़ता जा रहा था और कुणाल का गुस्सा भी. सब से अधिक तनाव तो इस कारण होता था कि जगवीरी आते ही हमारे डबल बैड पर जम जाती और कहती, ‘यार, कुणाल, तुम तो सदा ही कनक के पास रहते हो, इस पर हमारा भी हक है. दोचार दिन ड्राइंगरूम में ही सो जाओ.’

कुणाल उस के पागलपन से चिढ़ते ही थे, उस का नाम भी उन्होंने डाक्टर पगलानंद रख रखा था. परंतु उस की ऐसी हरकतों से तो कुणाल को संदेह हो गया. मैं ने लाख समझाया कि वह मुझे छोटी बहन मानती है पर शक का जहर कुणाल के दिलोदिमाग में बढ़ता ही चला गया और एक दिन उन्होंने कह ही दिया, ‘कनक, तुम्हें मुझ में और जगवीरी में से एक को चुनना होगा. यदि तुम मुझे चाहती हो तो उस से स्पष्ट कह दो कि तुम से कोई संबंध न रखे और यहां कभी न आए, अन्यथा मैं यहां से चला जाऊंगा.’

यह तो अच्छा हुआ कि जगवीरी से कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी. उस के भाइयों के प्रयास से उसे ससुराल की संपत्ति में से अच्छीखासी रकम मिल गई. वह नेपाल चली गई. वहां उस ने एक बहुत बड़ा नर्सिंगहोम बना लिया. 10-15 दिन में वहां से उस के 3-4 पत्र आ गए, जिन में हम दोनों को यहां से दोगुने वेतन पर नेपाल आ जाने का आग्रह था.

मुझे पता था कि जगवीरी एक स्थान पर टिक कर रहने वाली नहीं है. वह भारत आते ही मेरे पास आ धमकेगी. फिर वही क्लेश और तनाव होगा और दांव पर लग जाएगी मेरी गृहस्थी. हम ने मकान बदला, संयोग से एक नए अस्पताल में मुझे और कुणाल को नियुक्ति भी मिल गई. मेरा अनुमान ठीक था. रमता जोगी जैसी जगवीरी नेपाल में 4 साल भी न टिकी. दिल्ली में हमें ढूंढ़ने में असफल रही तो मेरे मायके जा पहुंची. मैं ने भाईभाभियों को कुणाल की नापसंदगी और नाराजगी बता कर जगवीरी को हमारा पता एवं फोन नंबर देने के लिए कतई मना किया हुआ था.

जगवीरी ने मेरे मायके के बहुत चक्कर लगाए, चीखी, चिल्लाई, पागलों जैसी चेष्टाएं कीं परंतु हमारा पता न पा सकी. तब हार कर उस ने वहीं नर्सिंगहोम खोल लिया. शायद इस आशा से कि कभी तो वह मुझ से वहां मिल सकेगी. मैं इतनी भयभीत हो गई, उस पागल के प्रेम से कि वारत्योहार पर भी मायके जाना छूट सा गया. हां, भाभियों के फोन तथा यदाकदा आने वाले पत्रों से अपनी अनोखी सखी के समाचार अवश्य मिल जाते थे जो मन को विषाद से भर जाते.

उस के नर्सिंगहोम में मुफ्तखोर ही अधिक आते थे. जगवीरी की दयालुता का लाभ उठा कर इलाज कराते और पीठ पीछे उस का उपहास करते. कुछ आदतें तो जगवीरी की ऐसी थीं ही कि कोई लेडी डाक्टर, सुंदर नर्स वहां टिक न पाती. सुना था किसी शांति नाम की नर्स को पूरा नर्सिंगहोम, रुपएपैसे उस ने सौंप दिए. वे दोनों पतिपत्नी की तरह खुल्लमखुल्ला रहते हैं. बहुत बदनामी हो रही है जगवीरी की. भाभी कहतीं कि हमें तो यह सोच कर ही शर्म आती है कि वह तुम्हारी सखी है. सुनसुन कर बहुत दुख होता, परंतु अभी तो बहुत कुछ सुनना शेष था. एक दिन पता चला कि शांति ने जगवीरी का नर्सिंगहोम, कोठी, कुल संपत्ति अपने नाम करा कर उसे पागल करार दे दिया. पागलखाने में यातनाएं झेलते हुए उस ने मुझे बहुत याद किया. उस के भाइयों को जब इस स्थिति का पता किसी प्रकार चला तो वे अपनी नाजों पली बहन को लेने पहुंचे. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी, अनंत यात्रा पर निकल चुकी थी जगवीरी.

मैं सोच रही थी कि एक ममत्व भरे हृदय की नारी सामान्य स्त्री का, गृहिणी का, मां का जीवन किस कारण नहीं जी सकी. उस के अंतस में छिपे जंगवीर ने उसे कहीं का न छोड़ा. तभी मेरी आंख लग गई और मैं ने देखा जगवीरी कई पैकेटों से लदीफंदी मेरे सिरहाने आ बैठी, ‘जाओ, मैं नहीं बोलती, इतने दिन बाद आई हो,’ मैं ने कहा. वह बोली, ‘तुम ने ही तो मना किया था. अब आ गई हूं, न जाऊंगी कहीं.’

तभी मुझे मान्या की आवाज सुनाई दी, ‘‘मम्मा, किस से बात कर रही हो?’’ आंखें खोल कर देखा शाम हो गई थी. Hindi Social Story

Story in Hindi : भीगा मन – वक्त की कीमत

Story in Hindi. कबीर बारबार घड़ी की ओर देख रहा था. अभी तक उस का ड्राइवर नहीं आया था.

जब ड्राइवर आया तो कबीर उस पर बरस पड़ा, ‘‘तुम लोगों को वक्त की कोई कीमत ही नहीं है. कहां रह गए थे?’’

‘‘साहब, घर में पानी भर गया था, वही निकालने में देर हो गई.’’

‘‘अरे यार, तुम लोगों की यही मुसीबत है. चार बूंदें गिरती नहीं हैं कि तुम्हारा रोना शुरू हो जाता है… पानी… पानी… अब चलो,’’ कार में बैठते हुए कबीर ने कहा.

बरसात के महीने में मुंबई यों बेबस हो जाती है, जैसे कोई गरीब औरत भीगी फटी धोती में खुद को बारिश से बचाने की कोशिश कर रही हो. भरसक कोशिश, मगर सब बेकार… थक कर खड़ी हो जाती है एक जगह और इंतजार करती है बारिश के थमने का.

कार ने रफ्तार पकड़ी और दिनभर का थकामांदा कबीर सीट पर सिरटिका कर बैठ गया. हलकीहलकी बारिश हो रही थी और सड़क पर लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जूझ रहे थे. अनगिनत छाते, पर बचाने में नाकाम. हवा के झोंकों से पानी सब को भिगो गया था.

कबीर ने घड़ी की ओर देखा. 6 बजे थे. सड़क पर भीड़ बढ़ती जा रही थी. ट्रैफिक धीमा पड़ गया था. लोग बेवजह हौर्न बजा रहे थे मानो हौर्न बजाने से ट्रैफिक हट जाएगा. पर वे हौर्न बजा कर अपने बेबस होने की खीज निकाल लेते थे.

ड्राइवर ने कबीर से पूछा, ‘‘रेडियो चला दूं साहब?’’ ‘‘क्या… हां, चला दो. लगता है कि आज घर पहुंचने में काफी देर हो जाएगी,’’ कबीर ने कहा. ‘‘हां साहब… बहुत दूर तक जाम लगा है.’’

‘‘तुम्हारा घर कहां है?’’ ‘‘साहब, मैं अंधेरी में रहता हूं.’’ ‘‘अच्छा… अच्छा…’’ कबीर ने सिर हिलाते हुए कहा.

रेडियो पर गाना बज उठा, ‘रिमझिम गिरे सावन…’

बारिश तेज हो गई थी और सड़क पर पानी भरने लगा था. हर आदमी जल्दी घर पहुंचना चाहता था. गाना बंद हुआ तो रेडियो पर लोगों को घर से न निकलने की हिदायत दी गई.

कबीर ने घड़ी देखी. 7 बजे थे. घर अभी भी 15-20 किलोमीटर दूर था. ट्रैफिक धीरेधीरे सरकने लगा तो कबीर ने राहत की सांस ली. मिनरल वाटर की बोतल खोली और दो घूंट पानी पीया.

धीरेधीरे 20 मिनट बीत गए. बारिश अब बहुत तेज हो गई थी. बौछार के तेज थपेड़े कार की खिड़की से टकराने लगे थे. सड़क पर पानी का लैवल बढ़ता ही जा रहा था. बाहर सब धुंधला हो गया था. सामने विंड शील्ड पर जब वाइपर गुजरता तो थोड़ाबहुत दिखाई देता. हाहाकार सा मचा हुआ था. सड़क ने जैसे नदी का रूप ले लिया था.

‘‘साहब, पानी बहुत बढ़ गया है. हमें कार से बाहर निकल जाना चाहिए.’’ ‘‘क्या बात कर रहे हो… बाहर हालत देखी है…’’

‘‘हां साहब, पर अब पानी कार के अंदर आने लगा है.’’  कबीर ने नीचे देखा तो उस के जूते पानी में डूबे हुए थे. उस ने इधरउधर देखा. कोई चारा न था. वह फिर भी कुछ देर बैठा रहा.

‘‘साहब चलिए, वरना दरवाजा खुलना भी मुश्किल हो जाएगा.’’ ‘‘हां, चलो.’’

कबीर ने दरवाजा खोला ही था कि तेज बारिश के थपेड़े मुंह पर लगे. उस की बेशकीमती घड़ी और सूट तरबतर हो गए. उस ने चश्मा निकाल कर सिर झटका और चश्मा पोंछा.

‘‘साहब, छाता ले लीजिए,’’ ड्राइवर ने कहा.

‘‘नहीं, रहने दो,’’ कहते हुए कबीर ने चारों ओर देखा. सारा शहर पानी में डूबा हुआ था. कचरा चारों ओर तैर रहा था. इस रास्ते से गुजरते हुए उस ने न जाने कितने लोगों को शौच करते देखा था और आज वह उसी पानी में खड़ा है. उसे उबकाई सी आने लगी थी. इसी सोच में डूबा कबीर जैसे कदम बढ़ाना ही भूल गया था.

‘‘साहब चलिए…’’ ड्राइवर ने कहा.

कबीर ने कभी ऐसे हालात का सामना नहीं किया था. उस के बंगले की खिड़की से तो बारिश हमेशा खूबसूरत ही लगी थी.

कबीर धीरेधीरे पानी को चीरता हुआ आगे बढ़ने लगा. कदम बहुत भारी लग रहे थे. चारों ओर लोग ही लोग… घबराए हुए, अपना घर बचाते, सामान उठाए.

एक मां चीखचीख कर बिफरी सी हालत में इधरउधर भाग रही थी. उस का बच्चा कहीं खो गया था. उसे अब न बारिश की परवाह थी, न अपनी जान की.

कबीर ने ड्राइवर की तरफ देखा.  ‘‘साहब, हर साल यही होता है. किसी का बच्चा… किसी की मां ले जाती है यह बारिश… ये खुले नाले… मेनहोल…’’

‘‘क्या करें…’’ कह कर कबीर ने कदम आगे बढ़ाया तो मानो पैर के नीचे जमीन ही न थी और जब पैर जमीन पर पड़ा तो उस की चीख निकल गई.

‘‘साहब…’’ ड्राइवर भी चीख उठा और कबीर का हाथ थाम लिया.

कबीर का पैर गहरे गड्ढे में गिरा था और कहीं लोहे के पाइपों के बीच फंस गया था.

ड्राइवर ने पैर निकालने की कोशिश की तो कबीर की चीख निकल गई. शायद हड्डी टूट गई थी.

‘‘साहब, आप घबराइए मत…’’ ड्राइवर ने हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘मेरा घर नजदीक ही है. मैं अभी किसी को ले कर आता हूं.’’

कबीर बहुत ज्यादा तकलीफ में उसी गंदे पानी में गरदन तक डूबा बैठा रहा. कुछ देर बाद उसे दूर से ड्राइवर भाग कर आता दिखाई दिया. कबीर को बेहोशी सी आने लगी थी और उस ने आंखें बंद कर लीं.

होश आया तो कबीर एक छोटे से कमरे में था जो घुटनों तक पानी से भरा था. एक मचान बना कर बिस्तर लगाया हुआ था जिस पर वह लेटा हुआ था. ड्राइवर की पत्नी चाय का गिलास लिए खड़ी थी.

‘‘साहब, चाय पी लीजिए. जैसे ही पानी कुछ कम होगा, हम आप को अस्पताल ले जाएंगे,’’ ड्राइवर ने कहा.

चाय तिपाई पर रख कर वे दोनों रात के खाने का इंतजाम करने चले गए. कबीर कमरे में अकेला पड़ा सोच रहा था, ‘कुदरत का बरताव सब के साथ समान है… क्या अमीर, क्या गरीब, सब को एक जगह ला कर खड़ा कर देती है… और ये लोग… कितनी जद्दोजेहद भरी है इन की जिंदगी. दिनरात इन्हीं मुसीबतों से जूझते रहते हैं. आलीशान बंगलों में रहने वालों को इस से कोई सरोकार नहीं होता. कैसे हो? कभी इस जद्दोजेहद को अनुभव ही नहीं किया…’

कबीर आत्मग्लानि से भर उठा था. यह उस की जिंदगी का वह पल था जब उस ने जाना कि सबकुछ क्षणिक है. इनसानियत ही सब से बड़ी दौलत है. बारिश ने उस के तन को ही नहीं, बल्कि मन को भी भिगो दिया था.

कबीर फूटफूट कर रो रहा था. उस के मन से अमीरीगरीबी का फर्क जो मिट गया था. Story in Hindi

Story in Hindi : अपने पराए, पराए अपने

Story in Hindi . पार्किंग में कार खड़ी कर के मैं दफ्तर की ओर बढ़ ही रहा था कि इतने में तेजी से चलते हुए वह आई और ‘भाई साहब’ कहते हुए मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो गई. उस की गोद में दोढ़ाई साल की एक बच्ची भी थी. एक पल को तो मैं सकपका गया कि कौन है यह? यहां तो दूरदराज के रिश्ते की भी मेरी कोई बहन नहीं रहती. मैं अपने दिमाग पर जोर डालने लगा.

मुझे उलझन में देख कर वह बोली, ‘‘क्या आप मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं? मैं लाजवंती हूं. आप की बहन लाजो. मैं तो आप को देखते ही पहचान गई थी.’’ मैं ने खुशी के मारे उस औरत की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘अरी, तू है चुड़ैल.’’

मैं बचपन में उसे लाड़ से इसी नाम से पुकारता था. सो बोला, ‘‘भला पहचानूंगा कैसे? कहां तू बित्ती भर की थी, फ्रौक पहनती थी और अब तो तू एक बेटी की मां बन गई है.’’

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मेरी बातों से उस की आंखें भर आईं. मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी, इस के बावजूद मैं ने उसे घर ले चलना ही ठीक समझा. वह कार में मेरी साथ वाली सीट पर आ बैठी. रास्ते में मैं ने गौर किया कि वह साधारण थी. सूती साड़ी पहने हुए थी. मामूली से गहने भी उस के शरीर पर नहीं थे. सैंडल भी कई जगह से मरम्मत किए हुए थे.

बातचीत का सिलसिला जारी रखने के लिए मैं सब का हालचाल पूछता रहा, मगर उस के पति और ससुराल के बारे में कुछ न पूछ सका. लाजवंती को मैं बचपन से जानता था. वह मेरे पिताजी के एक खास दोस्त की सब से छोटी बेटी थी. दोनों परिवारों में बहुत मेलजोल था.

हम सब भाईबहन उस के पिताजी को चाचाजी कहते थे और वे सब मेरे पिताजी को ताऊजी. अम्मां व चाची में खूब बनती थी. दोनों घरों के मर्द जब दफ्तर चले जाते तब अम्मां व चाची अपनी सिलाईबुनाई ले कर बैठ जातीं और घंटों बतियाती रहतीं.

हम बच्चों के लिए कोई बंधन नहीं था. हम सब बेरोकटोक एकदूसरे के घरों में धमाचौकड़ी मचाते हुए खोतेपीते रहते. पिताजी ने हाई ब्लडप्रैशर की वजह से मांस खाना व शराब पीना बिलकुल छोड़ दिया था. वैसे भी वे इन चीजों के ज्यादा शौकीन नहीं थे, लेकिन चाचाजी खानेपीने के बेहद शौकीन थे.

अकसर उन की फरमाइश पर हमारे यहां दावत हुआ करती. इस पर अम्मां कभीकभी पिताजी पर झल्ला भी जाती थीं कि जब खुद नहीं खाते तो दूसरों के लिए क्यों इतना झंझट कराते हो. तब पिताजी उन्हें समझा देते, ‘क्या करें बेचारे पंडित हैं न. अपने घर में तो दाल गलती नहीं, हमारे यहां ही खा लेते हैं. तुम्हें भी तो वे अपनी सगी भाभी की तरह ही मानते हैं.’

मेरे पिताजी ऐक्साइज इंस्पैक्टर थे और चाचाजी ऐजूकेशन इंस्पैक्टर. चाचाजी मजाक में पिताजी से कहते, ‘यार, कैसे कायस्थ हो तुम… अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो पानी की जगह शराब ही पीता.’ तब पिताजी हंसते हुए जवाब देते, ‘लेकिन गंजे को खुदा नाखून देता ही कहां है…’

इसी तरह दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे कि अचानक न जाने क्या हुआ कि चाचाजी नौकरी से सस्पैंड हो गए. कई महीनों तक जांच होती रही. उन पर बेईमानी करने का आरोप लगा था. एक दिन वे बरखास्त कर दिए गए. बेचारी चाची पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा. 2 बड़ी लड़कियों की तो शादी हो चुकी थी, पर 3 बच्चे अभी भी छोटे थे. सुरेंद्र 8वीं, वीरेंद्र 5वीं व लाजो चौथी जमात में पढ़ रही थी.

चाचाजी ने जोकुछ कमाया था, वह जी खोल कर मौजमस्ती में खर्च कर दिया था. आड़े समय के लिए चाचाजी ने कुछ भी नहीं जोड़ा था. चाचाजी को बहुत मुश्किल से नगरनिगम में एक छोटी सी नौकरी मिली. जैसेतैसे पेट भरने का जुगाड़ तो हुआ, लेकिन दिन मुश्किल से बीत रहे थे. वे लोग बढि़या क्वार्टर के बजाय अब छोटे से किराए के मकान में रहने लगे. चाची को चौकाबरतन से ले कर घर का सारा काम करना पड़ता था.

लाड़प्यार में पले हुए बच्चे अब जराजरा सी चीजों के लिए तरसते थे. दोस्ती के नाते पिताजी उस परिवार की ज्यादा से ज्यादा माली मदद करते रहते थे.

समय बीतता गया. चाचाजी के दोनों लड़के पढ़ने में तेज थे. बड़े लड़के को बीए करने के बाद बैंक में नौकरी मिल गई और छोटे बेटे का मैडिकल कालेज में दाखिला हो गया. मगर लाजो का मन पढ़ाई में नहीं लगा. वह अकसर बीमार रहती थी. वह बेहद चिड़चिड़ी और जिद्दी भी हो गई थी और मुश्किल से 8वीं जमात ही पास कर पाई.

फिर पिताजी का तबादला बिलासपुर हो गया. मैं भी फोरैस्ट अफसर की ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया. कुछ अरसे के लिए हमारा उन से संपर्क टूट सा गया. फिर न पिताजी रहे और न चाचाजी. हम लोग अपनीअपनी दुनिया में मशगूल हो गए. कई सालों के बाद ही इंदौर वापस आना हुआ था.

शाम को जब मैं दफ्तर से घर पहुंचा तो देखा कि लाजो सब से घुलमिल चुकी थी. मेरे दोनों बच्चे ‘बूआबूआ’ कह कर उसे घेरे बैठे थे और उस की बेटी को गोद में लेने के लिए उन में होड़ मची थी. मेरी एकलौती बहन 2 साल पहले एक हादसे में मर गई थी, इसलिए मेरी बीवी उमा भी ननद पा कर खुश हुई.

खाना खाने के बाद हम लोग उसे छोड़ने गए. नंदानगर में एक चालनुमा मकान के आगे उस ने कार रुकवाई. मैं ने चाचीजी के पैर छुए, पर वे मुझे पहचान न पाईं. तब लाजो ने मुझे ढूंढ़ निकालने की कहानी बड़े जोश से सुनाई. चाचीजी मुझे छाती से लगा कर खुश हो गईं और रुंधे गले से बोलीं, ‘‘अच्छा हुआ बेटा, जो तुम मिल गए. मुझे तो रातदिन लाजो की फिक्र खाए जाती है. दामाद नालायक निकला वरना इस की यह हालत क्यों होती.

क सहन करते बना, यह वहीं रही. फिर यहां चली आई. दोनों भाइयों को तो यह फूटी आंख नहीं सुहाती. अब मैं करूं तो क्या करूं? जवान लड़की को बेसहारा छोड़ते भी तो नहीं बनता. ‘‘बेटा, इसे कहीं नौकरी पर लगवा दो तो मुझे चैन मिले.’’

सुरेंद्र भी इसी शहर में रहता था. अब वह बैंक मैनेजर था. एक दिन मैं उस के घर गया. उस ने मेरी बहुत खातिरदारी की, लेकिन वह लाजो की मदद के नाम पर टस से मस नहीं हुआ. लाजवंती का जिक्र आते ही वह बोला, ‘‘उस का नाम मत लीजिए भाई साहब. वह बहुत तेज जबान की है. वह अपने पति को छोड़ आई है.

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Sarita

‘‘हम ने तो सबकुछ देख कर ही उस की शादी की थी. उस में ससुराल वालों के साथ निभाने का ढंग नहीं है. माना कि दामाद को शराब पीने की लत है, पर घर में और लोग भी तो हैं. उन के सहारे भी तो रह सकती थी वह… घर छोड़ने की क्या जरूरत थी?’’ सुरेंद्र की बातें सुन कर मैं अपना सा मुंह ले कर लौट आया.

मैं बड़ी मुश्किल से लाजो को एक गांव में ग्रामसेविका की नौकरी दिला सका था. चाचीजी कुछ दिन उस के पास रह कर वापस आ गईं और अपने बेटों के साथ रहने लगीं.

मेरा जगहजगह तबादला होता रहा और तकरीबन 15 साल बाद ही अपने शहर वापस आना हुआ. एक दिन रास्ते में लाजो के छोटे भाई वीरेंद्र ने मुझे पहचान लिया. वह जोर दे कर मुझे अपने घर ले गया. उस ने शहर में क्लिनिक खोल लिया था और उस की प्रैक्टिस भी अच्छी चल रही थी.

लाजो का जिक्र आने पर उस ने बताया कि उस की तो काफी पहले मौत हो गई. यह सुनते ही मुझे धक्का लगा. उस का बचपन और पिछली घटनाएं मेरे दिमाग में घूमने लगीं. लेकिन एक बात बड़ी अजीब लग रही थी कि मौत की खबर सुनाते हुए वीरेंद्र के चेहरे पर गम का कहीं कोई निशान नहीं था. मैं चाचीजी से मिलने के लिए बेताब हो उठा. वे एक कमरे में मैलेकुचैले बिस्तर पर पड़ी हुई थीं. अब वे बहुत कमजोर हो गई थीं और मुश्किल से ही उठ पाती थीं. आंखों की रोशनी भी तकरीबन खत्म हो चुकी थी.

मैं ने अपना नाम बताया तभी वे पहचान सकीं. मैं लाजो की मौत पर दुख जाहिर करने के लिए कुछ बोलने ही वाला था कि उन्होंने हाथ पकड़ कर मुझे अपने नजदीक बैठा लिया. वे मेरे कान में मुंह लगा कर धीरे से बोलीं, ‘‘लाजो मरी नहीं है बेटा. वह तो इसी शहर में है. ये लोग उस के मरने की झूठी खबर फैला रहे हैं. तुम ने जिस गांव में उस की नौकरी लगवा दी थी, वहीं एक ठाकुर साहब भी रहते थे. उन की बीवी 2 छोटेछोटे बच्चे छोड़ कर मर गई. गांव वालों ने लाजो की शादी उन से करा दी.

‘‘लाजो के अब 2 बेटे भी हैं. वैसे, अब वह बहुत सुखी है, लेकिन एक बार उसे अपनी आंखों से देख लेती तो चैन से मरती. ‘‘एक दिन लाजो आई थी तो वीरेंद्र की बीवी ने उसे घर में घुसने तक नहीं दिया. वह दरवाजे पर खड़ी रोती रही. जातेजाते वीरेंद्र से बोली थी कि भैया, मुझे अम्मां से तो मिल लेने दो. लेकिन ये लोग बिलकुल नहीं माने.’’

लाजो की यादों में डूब कर चाचीजी की आंखों से आंसू बहने लगे थे. वे रोतेरोते आगे बोलीं, ‘‘बताओ बेटा, उस ने क्या गलत किया? उसे भी तो कोई सहारा चाहिए था. सगे भाई हो कर इन दोनों ने उस की कोई मदद नहीं की बल्कि दरदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया. तुम्हीं ने उस की नौकरी लगवाई थी…’’

तभी मैं ने महसूस किया कि सब की नजरें हम पर लगी हुई हैं. मैं उस जगह से फौरन हट जाना चाहता था, जहां अपने भी परायों से बदतर हो गए थे. मैं ने मन ही मन तय कर लिया था कि लाजो को ढूंढ़ निकालना है और उसे एक भाई जरूर देना है. Story in Hindi

Romantic Story : अनकहा प्यार- बिनब्याहे मिली सासूमां

Romantic Story. कालेकाले बादलों ने आसमान में डेरा डाल दिया था. मुक्ता सूखे कपड़े उतारने के लिए तेजी से आंगन की तरफ दौड़ी. बूंदों ने झमाझम बरसना शुरू कर दिया था.

कपड़े उतारतेउतारते मुक्ता काफी भीग चुकी थी. अंदर आते ही उस ने छींकना शुरू कर दिया.

मां बड़बड़ाते हुए बोलीं, ‘‘मुक्ता, मैं ने तुझ से कितनी बार कहा है कि भीगा मत कर, लेकिन तू मानती ही नहीं. मुझे आवाज दे देती, तो मैं उतार लाती कपड़े.’’

मुक्ता ने शांत भाव से कहा, ‘‘मां, आप सो रही थीं, इसलिए मैं खुद ही चली गई. अगर आप जातीं, तो आप भी तो भीग जातीं न.’’

मां उसे दुलारते हुए बोलीं, ‘‘मेरी बेटी अपनी मां को इतना प्यार करती है…’’

‘‘हां,’’ मुक्ता ने सिर हिलाते हुए कहा और मां के कांधे से लिपट गई.

‘‘तू पूरी तरह से भीग गई है… जा, जा कर पहले तौलिए से बाल सुखा ले और कपड़े बदल ले. मैं तेरे लिए तुलसीअदरक वाली चाय बना कर लाती हूं,’’ कहतेकहते मां चाय बनाने चली गईं.

मुक्ता कपड़े बदल कर सिर पर तौलिया लपेटे हुए सोफे पर आ कर बैठ गई.

‘‘ले, गरमागरम चाय पी ले और चाय पी कर आराम कर,’’ मां चाय दे कर दूसरे काम के लिए किचन में चली गईं.

मुक्ता खिड़की से बारिश की बूंदों को गिरते हुए देख रही थी और देखतेदेखते पुरानी यादों में खो गई.

औफिस जाने के लिए मुक्ता बस स्टौप पर खड़ी बस का इंतजार कर रही थी कि तभी एक नौजवान उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया. सुंदर कदकाठी का महत्त्व नाम का वह नौजवान औफिस के लिए लेट हो रहा था. आज उस की बाइक खराब हो गई थी.

महत्त्व रहरह कर कभी अपने हाथ की घड़ी, तो कभी बस को देख रहा था. तभी एक बस आ कर खड़ी हो गई. सब लोग उस बस में जल्दीजल्दी चढ़ने लगे. मुक्ता और महत्त्व ने भी बस में चढ़ने के लिए बस के दरवाजे को पकड़ा. गलती से महत्त्व का हाथ मुक्ता के हाथ पर रखा गया. वह सहम गई और बस से दूर जा कर खड़ी हो गई.

महत्त्व जल्दी से बस में चढ़ गया. पर जब बस में चारों तरफ नजरें दौड़ाने पर उसे मुक्ता नहीं दिखाई दी, तो वह बस से उतर गया और बस स्टौप की तरफ चलने लगा. मुक्ता वहीं पर खड़ी दूसरी बस का इंतजार कर रही थी.

महत्त्व ने पास आ कर मुक्ता से पूछा, ‘‘आप बस में क्यों नहीं चढ़ीं?’’ ‘‘जी, बस यों ही… भीड़ बहुत ज्यादा थी, इसलिए…’’

तभी दूसरी बस आ कर खड़ी हो गई. मुक्ता बस में चढ़ गई. महत्त्व भी बस में चढ़ गया. थोड़ी देर में मुक्ता का औफिस आ गया… वह बस से उतर गई. कुछ देर बाद महत्त्व का भी औफिस आ गया था.

शाम को औफिस छूटने के बाद दोनों इत्तिफाक से एक ही बस में चढ़े और दोनों ने एकदूसरे को हलकी सी स्माइल दी.

अब दोनों का एक ही बस से आनाजाना शुरू हो गया. ये मुलाकातें एकदूसरे से बोले बिना ही कब प्यार में बदल गईं, पता ही नहीं चला.

एक दिन वे दोनों बस स्टौप पर खड़े थे. काले बादलों ने घुमड़घुमड़ कर शोर मचाना शुरू कर दिया. महत्त्व ने मुक्ता से कहा, ‘‘मौसम कितना सुहाना है… क्यों न कहीं घूमने चलें?’’

मुक्ता ने धीरे से कहा, ‘‘लेकिन, औफिस भी तो जाना है…’’

‘‘आज औफिस को गोली मारो… मैं बाइक ले कर आता हूं… बाइक से घूमने चलेंगे. तुम मेरा यहीं इंतजार करना… मैं बस 2 मिनट में आया,’’ कह कर महत्त्व बाइक लेने चला गया.

थोड़ी देर में महत्त्व बाइक ले कर आ गया. उस ने अपना हाथ मुक्ता की तरफ बढ़ाया. मुक्ता ने अपना हाथ महत्त्व के हाथ पर रख दिया और बाइक पर बैठ गई. दोनों घूमतेघूमते बहुत दूर निकल गए.

जब बहुत देर हो गई, तब मुक्ता ने कहा, ‘‘काले बादल घने होते जा रहे हैं और अंधेरा भी बढ़ रहा है. अब हमें चलना चाहिए. बारिश कभी भी शुरू हो सकती है.’’

महत्त्व ने बाइक स्टार्ट की. मुक्ता पीछे बैठ गई. दोनों चहकते हुए चले जा रहे थे. काले बादलों ने झमाझम बरसना शुरू कर दिया. मुक्ता ने दोनों हाथों से महत्व को कस के पकड़ लिया. महत्त्व भी प्यार की मीठी धुन में गुनगुनाता हुआ बाइक चला रहा था.

आगे गड्ढा था, जिस में पानी भरा हुआ था. महत्त्व ने ध्यान नहीं दिया. बाइक गड्ढे में जा गिरी, जिस से महत्त्व और मुक्ता बुरी तरह जख्मी हो गए. कुछ लोग उन्हें अस्पताल ले कर पहुंचे.

महत्त्व की अस्पताल पहुंचते ही मौत हो गई. उस की मौत से मुक्ता अंदर से टूट गई और सोचने लगी, ‘अनकहा प्यार अनकहा ही रह गया…’

अपनी यादों में खोई मुक्ता की आंखों से आंसू गिरने लगे.

‘‘मुक्ता… ओ मुक्ता, किन यादों में खो गई… देख, तेरी चाय ठंडी हो गई. चल छोड़, मैं दूसरी बना कर लाती हूं. मां और मुक्ता दोनों साथ चाय पीते हैं.’’

चाय पीते हुए मां ने मुक्ता से पूछा, ‘‘महत्त्व को याद कर रही थी?’’

मुक्ता लंबी गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘हां, मां… मां, बस आप ही समझ सकती हो कि महत्त्व का मेरी जिंदगी में क्या महत्त्व था. मम्मीपापा के चले जाने के बाद मैं बिलकुल अकेली हो गई थी. फिर महत्त्व मेरी जिंदगी में आया और मेरी दुनिया ही बदल गई. लेकिन, वह भी मुझे छोड़ कर चला गया. मैं बिलकुल टूट कर बिखर गई.

‘‘महत्त्व के चले जाने के बाद आप ने मुझे संभाला. आप सिर्फ महत्त्व की ही मां नहीं हो… आप मेरी भी मां हो. अब आप मेरी जिम्मेदारी हो. मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’Romantic Story

Romantic Story in Hindi: उसका घर- खामोश और वीरान क्यों थी प्रेरणा की जिंदगी

Romantic Story in Hindi : बहुत अजीब थी वह सुबह. आवाजरहित सुबह. सबकुछ खामोश. भयानक सन्नाटा. किसी तरह ही आवाज का नामोनिशान न था. उस ने हथेलियां रगड़ीं, सर्दी के लिए नहीं, सरसराहट की आवाज के लिए. खिड़की खोली, सोचा, हवा के झोंके से ही कोई आवाज हो सकती है. लकड़ी के फर्श पर भी थपथपाया कि आवाज तो हो. कुछ भी, कहीं से सुनाई तो पड़े. पेड़ भी सुन्न खड़े थे, आवाजरहित. उस ने अपनी घंटी बजाई, थोड़ी आवाज हुई…आवाज होती थी, मर जाती थी, कोई अनुगूंज नहीं बचती थी. ये कैसे पेड़ थे. कैसी हवा थी, हरकतरहित जिस में न सुर, न ताल. उस ने खांस कर देखा. खांसी भी मर गई थी जैसे प्रेरणा, उस की दोस्त…अब उस की कभी आवाज नहीं आएगी. वह क्या गई, मानो सबकुछ अचानक मर गया हो. यह सोच कर उस के हाथपैर ठंडे पड़ने लगे. शायद वह प्रेरणा की मौत की खबर को सहन नहीं कर पा रहा था. पिछले सप्ताह ही तो मिली थी उसे वह.

अब तक तो अंतिम संस्कार भी हो गया होगा. हैरान था वह खुद पर. अब तक हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाया उस के घर जाने की. शायद लोगों को उस की मौत का मातम मनाते देख नहीं सकता था, या फिर प्रेरणा की छवि जो उस के जेहन में थी उसे संजो कर रखना चाहता था. अंतिम संस्कार हुए 4 दिन हो चुके थे. तैयार हो कर उस ने गैराज से कार निकाली और भारी मन से चल दिया. रास्तेभर यही सोचता रहा, वहां जा कर क्या कहेगा. आज तक वह किसी शोकाकुल माहौल में गया नहीं. वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या कहना चाहिए, क्या करना चाहिए. यही सोचतेसोचते प्रेरणा के घर की सड़क भी आ गई.

उस का दिल धड़कने लगा. दोनों ओर कतारों में पेड़ थे. उस का मन तो धुंधला था ही, धुंध ने वातावरण को भी धुंधला कर दिया था. उस ने अपना चश्मा साफ किया, बड़ी मुश्किल से उस के घर का नंबर दिखाई दिया. घर बहुत अंदर की तरफ था. उस ने कार बाहर ही पार्क कर दी. कार से पांव बाहर रखते ही उस के पांव साथ देने से इनकार करने लगे. बाहर लगे लोहे के गेट की कुंडी हटाते ही, लोहे के टकराव से, कुछ क्षणों के लिए वातावरण में एक आवाज गूंजी. वह भी धीरेधीरे मरती गई. पलभर को उसे लगा, मानो प्रेरणा सिसकियां भर रही हो…

वहां 3 कारें खड़ी थीं. घर के चारों ओर इतने पेड़ लगे थे कि उस के मन के अंधेरे और बढ़ने लगे. एक भयानक नीरवता चारों ओर घिरी थी. लगता था हमेशा की तरह ब्रिटेन की मरियल धूप कहीं दुबक कर बैठ गई थी. बादल बरसने को तैयार थे. मन के भंवर में धंसताधंसता न जाने कब और कैसे उस के दरवाजे पर पहुंचा. दिल की धड़कन बढ़ने लगी. एक पायदान दरवाजे के बाहर पड़ा था. उस ने जूते साफ किए और गहरी सांस ली. उस ने घंटी बजाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि दरवाजा खुला. शायद लोहे के गेट की गुंजन ने इत्तला दे दी होगी. प्रेरणा के पति ने उस के आगे बढ़े हाथ को अनदेखा कर, रूखेपन से कहा, ‘‘अंदर आओ.’’

उस ने अपना हाथ पीछे करते कहा, ‘‘आई एम राहुल. प्रेरणा और मैं एक ही कंपनी में काम करते थे.’’ ‘‘आई एम सुरेश, बैठो,’’ उस ने सोफे की ओर इशारा करते कहा.

सोफे पर बैठने से पहले राहुल ने नजरें इधरउधर दौड़ाईं और कुछ बिखरी चीजें सोफे से हटा कर बैठ गया. राहुल को विश्वास नहीं हुआ, हैरान था वह, क्या सचमुच यह प्रेरणा का घर है. यहां तो उस के व्यक्तित्व से कुछ भी तालमेल नहीं खाता. दीवारें भी सूनीसहमी खड़ी थीं. उन पर न कोई पेंटिंग, न ही कोई तसवीर. अखबारों के पन्ने, कुशन यहांवहां बिखरे पड़े थे. टैलीविजन व फर्नीचर पर धूल चमक रही थी. बीच की मेज पर पड़े चाय के खाली प्यालों में से चाय के सूखे दाग झांकझांक कर अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे. हर तरफ वीरानगी थी. लगता था मानो घर की दीवारें तक मातम मना रही हों. दिलों के विभाजन की गंध सारे घर में फैली थी. अचानक उस की नजर एक कोने में बैठे 2 उदास कुत्तों पर पड़ी जो सिर झुकाए बैठे थे. शायद वे भी प्रेरणा की मौत का मातम मना रहे थे.

‘‘राहुल, चाय?’’ ‘‘नहींनहीं, चाय की आवश्यकता नहीं, आ तो मैं पहले ही जाता, सोचा, अंतिम संस्कार के बाद ही जाऊंगा, तब तक लोगों का आनाजाना कुछ कम हो जाएगा.

‘‘वैसे, प्रेरणा ने आप का जिक्र तो कभी किया नहीं. हां, अगर आप पहले आ जाते तो अच्छा ही रहता, आप का नाम भी उस के चाहने वालों की सूची में आ जाता. सच पूछो तो मैं नहीं जानता था कि हिंदी में कविता और कहानियों की इतनी मांग है. क्या आज के युग में भी सभ्य इंसान हिंदी बोलता या पढ़ता है?’’ प्रेरणा के पति ने बड़े पस्त और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा. ‘‘प्रेरणा तो बहुत अच्छा लिखती थी. उस की एकएक कविता मन को छू लेने वाली है. व्यक्तिगत दुखसुख व प्रेम के रंगों की सुगंध है. ऐसी संवदेनाएं हैं जो पाठकों व श्रोताओं को आपबीती लगती हैं. आप ने तो पढ़ी होंगी,’’ राहुल ने कहा.

इतना सुनते ही एक कुटिल छिपी मुसकराहट उस के चेहरे पर फैल गई. उस ने राहुल की बात को तूल न देते हुए संदर्भ बदल कर कहना शुरू किया, ‘‘अच्छा हुआ, आप वहां नहीं थे. कैसे बेवकूफ बना गई वह मुझे, मैं जान ही नहीं पाया कि मेरी पार्टनर कितनी फ्लर्ट थी. कितने दोस्त आए थे अंतिम संस्कार के मौके पर. उस वक्त हमारे परिवार का समाज के सामने नजरें उठाना दूभर हो गया था. उम्रभर मना करता रहा, ऐसी प्रेमभरी कविताएं मत लिखो, बदनामी होगी, लोग क्या कहेंगे. वही हुआ जिस का डर था. लोग कानाफूसी कर रहे थे, बुदबुदा रहे थे, ‘पति हैं, बच्चे हैं…’ किस के लिए लिखती थी?’’ इतना कह कर कुछ क्षण वह चुप रहा, फिर बिफरता सा बोला, ‘‘राहुल, कहीं वह तुम्हारे लिए तो…’’ उस की जबान बेलगाम चलती रही.

राहुल हैरान था, क्या यह वही दरिंदा है जिस से वह एक बार कंपनी के सालाना डिनर पर मिला था. राहुल कसमसाता रहा, तय नहीं कर पा रहा था कि उस की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए. पलभर को उस का मन किया कि उठ कर चला जाए, फिर मन को समझाते बुदबुदाया, ‘मैं उस के स्तर पर नहीं गिर सकता.’ वक्त की नजाकत को देखते वह गुस्से को पी गया. मन में तो उस के आया कि इस पत्थरदिल से साफसाफ कह दे, हां, हां, था रिश्ता. मानवता के रिश्ते को जो नाम देना चाहो, दे दो. जीवन का सच तो यह है कि प्रेरणा मेरे जीवन में रोशनी बन कर आई थी और आंसू बन कर चली गई.

वहां बैठेबैठे राहुल को एक घंटा हो चुका था. अभी तक घर में अक्षुब्ध शांति थी. चुप्पी को भंग करते राहुल ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, बच्चे दिखाई नहीं दे रहे?’’ ‘‘श्रुति तो कालेज गई है, रुचि सहेलियों के साथ बाहर गई है. सारा दिन घर में बैठ कर करेगी भी क्या. मैं उस की मां की मौत को बड़ा मुद्दा बना कर उन की पढ़ाई में विघ्न नहीं डालना चाहता. घर को बिखरते नहीं देख सकता. मेरा घर मेरे लिए सबकुछ है, इसे बनाने में मैं ने बहुत पैसा और जान लगाई है. प्रेरणा ने तो पीछा छुड़ा लिया है सभी जिम्मेदारियों से. बच्चों की पढ़ाई, विवाह, घर का लोन सब मुझे ही तो चुकाना है. इस के लिए पैसा भी तो चाहिए,’’ वह भावहीन बोलता गया.

राहुल ने सबकुछ जानते हुए भी विरोध का नहीं, मौन के हथियार को अपनाना सही समझा. सोचने लगा, जो तुम नहीं जानते, मैं वह जानता हूं. मैं ने ही तो करवाया था प्रेरणा के मकान के लिए इतना बड़ा लोन सैंक्शन. फिर लोन का इंश्योरैंस कराने के लिए उसे बाध्य भी किया. इस सुरेश पाखंडी ने प्रेरणा को बदले में क्या दिया? आंसू, यातनाएं, उम्रभर आजादी से कलम न उठा पाने की बंदिशें? एक मैं ही था जिसे वह पति के नुकीले शब्दों के कंकड़ों से पड़े दाग दिखा सकती थी. उस की हंसी तक खोखली हो चुकी थी. अकसर वह कहती थी कि उसे अपना घर कभी अपना नहीं लगा.

वह सीखती रही अशांति में भी शांति से जीने की कला. वह खुद पर मुखौटा चढ़ा कर उम्रभर खुद को धोखा देती रही. राहुल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह प्रेरणा की लिखनेपढ़ने की जगह देखने को उतावला हो रहा था. अभी तक उसे कोई सुराग नहीं मिला था. कभी बाथरूम इस्तेमाल करने का बहाना कर के दूसरे कमरों में झांक कर देखा, कहीं भी स्टडी टेबल दिखाई नहीं दी. राहुल टटोलता रहा. चाय पीतेपीते जब राहुल से रहा नहीं गया, तो हिम्मत बटोर कर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, क्या मैं प्रेरणा का अध्ययन करने का स्थान देख सकता हूं. आई मीन, जहां बैठ कर वह पढ़ालिखा करती थी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ वह व्यंग्यात्मक लहजे में बोला, ‘‘आओ मेरे साथ, वह देखो, सामने,’’ उस ने गार्डन में एक खोके की ओर इशारा किया और फिर बोला, ‘‘वह जो आखिर में कमरा है वही था उस का स्टडीरूम.’’ राहुल भलीभांति जानता था कि जिसे वह कमरा कह रहा है वह कमरा नहीं, 5×8 फुट का लकड़ी का शैड है. मुरगीखाने से भी छोटा. शैड को खोलते ही राहुल का दिमाग चकरी की तरह घूमने लगा. शैड के चारों और मकड़ी के जाले लगे थे. सीलन की गंध पसरी थी. शैड फालतू सामान से भरा था. उस की दीवारों पर फावड़ा, खुरपी, कैंची, फौर्क वगैरह टंगे थे.

एकदो पुराने सूटकेस और पेंट के खाली डब्बे पड़े थे. आधा हिस्सा तो घास काटने वाली मशीन ने ले लिया था, बाकी थोड़ी सी जगह में पुराना लोहे का बुकशैल्फ था, जिस पर शायद प्रेरणा किताबें, पैन, पेपर रखती रही होगी. कुछ मोमबत्तियां और बैट्री वाली हैलोजन की बत्तियां पड़ी थीं. दीवार से टिकी 2 फुट की फोल्डिंग मेज और फोल्डिंग गार्डनकुरसी पड़ी थीं.

एक छोटा सा पोर्टेबल हीटर भी पड़ा था. फर्श पर चूहे व कीड़ेमकोडे़ दौड़ रहे थे. बिजली का वहां कोई प्रबंध नहीं था. हां, एक छोटी सी प्लास्टिक की खिड़की जरूर थी जहां से दिन की रोशनी झांक रही थी. अविश्वसनीय था कि कैसे एक इंसान दूसरे से किस हद तक क्रूर हो सकता है. डरतेडरते राहुल ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘भला बिना बिजली के कैसे लिखती होगी? डर भी तो लगता होगा?’’

‘‘डर, वह सामने 2 कुत्ते देख रहे हो, प्रेरणा के वफादार कुत्ते. उस की किसी चीज को हाथ लगा कर तो देखो, खाने को दौड़ पड़ेंगे.

‘‘प्रेरणा के अंगरक्षक या बौडीगार्ड, जो चाहे कह लो. यह कहावत तो सुनी होगी तुम ने, ‘जहां चाह वहां राह? मेरे सामने उसे लिखने की इजाजत ही कहां थी. मुझे तो बच्चों की मां और मेरी पत्नी चाहिए थी, लेखिका नहीं. मैं नहीं चाहता था मेरे घर में कविताओं के माध्यम से प्रेम का इजहार हो. देखो न, अब बेकार हैं उस की सब किताबें. कौन पढ़ना चाहेगा इन्हें? बच्चे तो पढ़ेंगे नहीं. नौकर से कह कर बक्से में रखना ही है. तुम चाहो तो ले जा सकते हो वरना रद्दी वाला ले जाएगा या फिर मैं गार्डन में लोहड़ी जला दूंगा,’’ उस ने क्रूरता से कहा.

राहुल को लगा उस के कानों में किसी ने किरचियां डाल दी हों. राहुल उसे कह भी क्या सकता था, वह प्रेरणा का पति था. बस, बड़बड़ाता रहा, ‘जा, थोड़ा सा दिल खरीद कर ला, कैसा मर्द है समानता का दर्जा तो क्या, उसे उस के हिसाब से जीने का हक तक न दे सका. तुम क्या जानो कुबेर का खजाना. लेखन का भी एक अनूठा नशा होता है. पत्रिका या किताबों पर अपना नाम देख कर अपने लिखे शब्दों को देख कर जो शब्द धुएं की तरह मन में उठते हैं और हमेशा के लिए कागज पर अंकित हो जाते हैं, दुनिया में कोई और चीज उन से अधिक स्थायी नहीं हो सकती.’

‘‘सर, कुछ किताबें तो रख लेते यादगार के लिए.’’ ‘‘यादगार, बेकार की बातें क्यों करते हो. औरत भी कोई याद रखने की चीज है क्या. हां, प्रेरणा ने 2 बच्चियां जरूर दी हैं, उन के लिए मैं आभारी हूं. जानवर भी घर में रहता है तो उस से मोह हो ही जाता है.’’

राहुल अब वहां पलभर भी रुकना नहीं चाहता था. सोचने लगा, इतनी तौहीन, कठोर शब्दों के बाण. शाबाशी है प्रेरणा को, जो ऐसी बंदिशों व घुटनभरी जिंदगी की रेलपेल से पिस्तेपिस्ते भी अपना काम करती रही. भारी मन से गार्डन से अंदर आतेआते राहुल का पांव हाल में पड़े एक खुले गत्ते के डब्बे से टकराया, जिस में से प्रेरणा का सभी सामान और ट्रौफियां उचकउचक कर झांक रहे थे.

‘‘लगी तो नहीं तुम्हें? मैं तो इन्हें देख कर आपे से बाहर हो जाता हूं. नौकर से कह कर इन्हें बक्से में रखवा दिया है. इन्हें कबाड़ी वाले को धातु के भाव दे दूंगा.’’ उस की हृदयहीन बातें राहुल के हृदय को बींधती रहीं. कितनी आसानी से समेट लिया था सुरेश ने सबकुछ. प्रेरणा की 25 वर्षों की मेहनत के अध्याय को चार दिन में अपने जीवन से निकाल कर फेंक दिया था उस ने. अभी तो उस की राख भी ठंडी नहीं हुई थी, उस का तो नामोनिशान तक मिटा दिया इस बेदर्द ने.

इतनी नफरत, आखिर क्यों? फिर वह मन ही मन ही बड़बड़ाने लगा, ‘हो सकता है प्रेरणा की तरक्की से जलता हो. इस का क्या गया, खोया तो मैं ने है अपना सोलमेट. अब किस से करूंगा मन की बातें. कौन सुनेगा एकदूसरे की कविताएं,’ बहुत रोकतेरोकते भी राहुल की आंखें भर्रा गईं. राहुल की भराई आंखें देख कर सुरेश का चेहरा तमतमा उठा, भौंहों पर बल पड़ गए, माथे की रेखाएं गहरा गईं. उस के स्वर में कसैलापन झलका, वह बोला, ‘‘आई सी, राहुल, कहीं तुम वह तो नहीं हो जिस के साथ वह रात को देरदेर तक बातें करती रहती थी, आई मीन उस के बौयफ्रैंड?’’

इतना सुनते ही राहुल की सांस रुक गई. निगाह ठहर गई. उसे लगा जैसे किसी ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया हो या फिर पंजा डाल कर उस का दिल चाकचाक कर दिया हो. प्रेरणा तो उस की दोस्त थी, केवल दोस्त जिस में न कोई शर्त, न आडंबर, खालिस अपनेपन की गहनता. प्रेरणा के पास नई राह पर चलने का हौसला नहीं था. उस की खामोशी शब्दों में परिभाषित रहती थी. ऐसी थी वह.

राहुल वहां से भाग जाना चाहता था. वह अपनी खामोश गीली आंखों में चुपचाप प्रेरणा की असहनीय पीड़ा को गले लगाए, उस की कुर्बानियों पर कुर्बान महसूस करता अपने घर को निकलने की तैयारी करने लगा. उसे संतुष्टि थी कि अब प्रेरणा आजाद है. उसे याद आया प्रेरणा अकसर कहा करती थी, ‘भविष्य क्या है, मैं नहीं जानती. इतना जरूर जानती हूं कि सीतासावित्री का जीवन भी इस देश में गायभैंस के जीवन जैसा है, जिन के गले की रस्सी पर उस का कोई अधिकार नहीं.’’ जैसे ही राहुल अपना पैर चौखट के बाहर रखने लगा, उस ने दोनों बक्सों की ओर देखा और सोचा, ‘प्रेरणा की 25 वर्षों की अमूल्य कमाई मैं इस विषैले वातावरण में दोबारा मरने के लिए नहीं छोड़ सकता.’’

राहुल ने प्रेरणा के पति की ओर देखते इशारे से पूछा, ‘‘सर, क्या मैं इन्हें ले जा सकता हूं?’’ ‘‘शौक से, लेकिन इन कुत्तों से इजाजत ले लेना?’’

राहुल ने दोनों बक्सों को छूते हुए, कुत्तों की ओर देखा. कुत्ते पूंछ हिला रहे थे. उस ने बक्से कार में रखे. कुत्ते उस के पीछेपीछे कार तक गए, मानो, कह रहे हों प्रेरणा का घर तो कभी उस का था ही नहीं.

Hindi Humor Story : महाभोज

Hindi Humor Story. सुबह उठते ही गरमागरम चाय का अभी पहला घूंट ही गटका था कि अंदर काफरमान कानों के रास्ते अंदर उतर गया, ‘‘आज नाश्ता तभी बनेगा जब बाजार से सब्जी आ जाएगी.’’

हुआ यह था कि पिछले एक सप्ताह से दफ्तर के कामों में इतना उलझा रहा कि लौटते समय बाजार बंद हो जाता था और सब्जी का थैला बैग में पड़ा रह जाता. इन दिनों में पत्नी ने छोले व राजमा के साथ बेसन का कई तरह से इस्तेमाल कर एक तो अपनी पाक कला ज्ञान का भरपूर परिचय कराया, दूसरे, सब्जी की कमी को पूरा कर हमारी इज्जत ढकी थी.

पत्नी के आदेश को सिरमाथे मान कर मैं शार्टकट के रास्ते तेज कदमों से सब्जी बाजार की ओर जा रहा था. अभी थोड़ी दूर ही पहुंचा था कि नाक में तेज बदबू ने प्रवेश किया. मैं ने अपनी उल्लू जैसी आंखों को मटका कर चारों ओर देखा पर कुछ दिखलाई नहीं दिया. अभी वहां से कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि फिर जोरदार बदबू का झोंका आया. अब की बार मैं ने कुत्ते जैसी नाक से मजबूरी में बदबू को सूंघा और उस जगह पर नजर डाली जहां से वातावरण प्रदूषित हो रहा था. देखा, एक मरा हुआ ढोर नगरनिगम के कचरे के डब्बे में पड़ा था और कौए उस को नोंचनोंच कर खा रहे थे.

नाक पर रूमाल रखा और स्कूली दिनों को याद कर 100 मीटर की फर्राटा दौड़ लगा दी. सामने से तिवारीजी आते दिखाई दिए और मुझे इस तरह इतना फर्राटे से भागते देखा तो रोक कर पूछने लगे, ‘‘क्यों भाई, सब ठीकठाक तो है?’’

मैं ने अपनी सांसों को नियंत्रित किया और तिवारीजी के चेहरे को देखा तो वह किसी हौरर फिल्म के डे्रकुला जैसे लग रहे थे. बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे हुए बाल, नंगे पांव, गंदे से कपड़े. ‘‘बात क्या है, तिवारीजी, आप ठीकठाक तो हैं न?’’

‘‘क्यों, मुझे क्या हुआ?’’

‘‘अरे भाई, ये बढ़ी हुई दाढ़ी, नंगे पांव, बिखरे हुए बेतरतीब केश, और ये बढ़े हुए नाखून…आखिर माजरा क्या है?’’

तिवारीजी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से घूरा और बोले, ‘‘तुम्हें नहीं मालूम?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं मालूम.’’

‘‘यार, तुम कैसे हिंदू हो?’’

‘‘क्या मतलब? आप की दाढ़ीनाखून बढ़ने से मेरे हिंदू होने का क्या संबंध है?’’ मैं ने प्रश्न किया.

‘‘यार, हिंदू होने के नाते तुम्हें इतना तो पता होना ही चाहिए कि इन दिनों पितृपक्ष (श्राद्ध) के दिन चल रहे हैं और इन दिनों में न तो कोई शुभ काम किया जाता है और न ही दाढ़ीनाखून कटवाते हैं.’’

‘‘लेकिन तिवारीजी, हिंदू धर्म में इस तरह का कोई नियम है, ऐसा कुछ मैं ने आज तक किसी भी हिंदू धार्मिक पुस्तक में नहीं पढ़ा.’’

‘‘यार, वेदपुराणों में लिखा है, ऐसा हमें हमारे बापदादा ने बताया था.’’

‘‘आप ने पढ़ा है?’’ मैं ने नास्तिकों की तरह पूछा.

‘‘इस में पढ़ना क्या है? बुजुर्गों ने कहा है सो है, यही तो हमारी हिंदू संस्कृति, धर्म और सभ्यता है.’’

‘‘जहां पर प्रश्न करने की, शक करने की कोई गुंजाइश नहीं होती,’’ मैं ने कहा.

‘‘चुप रहो यार, ऐसा कर के पुरखों की आत्मा को शांति मिलती है.’’

‘‘क्या तुम्हारे पूर्वज तुम्हें ऐसा गंदा देख कर खुश हो रहे होंगे,’’ मैं ने उन का मजाक बनाते हुए कहा, ‘‘अजीब तुम्हारे पुरखे हैं.’’

‘‘लगता है, तुम पर किसी अधर्मी की छाया पड़ गई है.’’

‘‘बिलकुल नहीं मित्र, जो धर्म में है ही नहीं उसे प्रचारित करने वालों के खिलाफ मैं बोल रहा हूं. इसी कारण आज हिंदू धर्म मजाक बन गया है,’’ मैं ने एक संक्षिप्त सा भाषण ही दे डाला.

‘‘देखो यार, तुम्हारे भाषण देने से मुझ पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा क्योंकि मैं भगवाधारी कट्टर पार्टी से हूं और पार्टी का आदेश सिरमाथे पर,’’ तिवारीजी बोले, ‘‘पुरखे ऐसा करने से खुश होते हैं तो मैं ने ऐसा कर दिया. मैं तो वही करूंगा जो पार्टी के लोग चाहते हैं. फिर मुझे अपनी जाति से बाहर तो कोई नहीं करेगा,’’ ऐसा कह कर तिवारीजी हीही कर के हंस पड़े.

मैं ने तिवारीजी से कहा, ‘‘गजब का स्टेमना है आप का.’’

प्रशंसा सुन कर वह खुश हो गए और कहने लगे, ‘‘क्या बताएं यार, अकेले मैं ने नहीं मेरे पूरे परिवार ने आज अभी तक भोजन ग्रहण नहीं किया है.’’

‘‘क्यों? क्या मिला नहीं?’’

‘‘कैसी बातें करते हो तुम, सातों पकवान बना कर रख छोड़े हैं लेकिन खा नहीं सकते.’’

‘‘क्यों, क्या बात हो गई?’’

‘‘यार, सुबह से हम पूर्वजों को यानी कि कौओं को खाने का निमंत्रण दे रहे हैं लेकिन अभी तक वह नहीं पहुंचे. लगता है यह प्रजाति भी लुप्त हो रही है,’’ कह कर उन्होंने अपनी काली गरदन के पास उंगली रगड़ कर मैल की गोली बनाई और क्रिकेटर की तरह निशाना साध कर फेंक दी और उदास हो गए.

उन की उदासी मुझ से देखी नहीं गई. पूरे परिवार को भूख से परेशान होने की बात सुन कर मेरा मन द्रवित हो उठा. मैं ने कहा, ‘‘यार, तिवारीजी, मैं कुछ कहूं?’’

मरी हुई आवाज उन के मुंह से निकली, ‘‘बोलो.’’

‘‘मुझे नहीं लगता कि कौए तुम्हारे यहां लंच लेने आएंगे.’’

‘‘क्यों?’’ हैरत से मेरी ओर देखते हुए उन्होंने पूछा.

‘‘यार, जिन्हें तुम न्योता दे रहे हो वे सब तो महाभोज करने में लगे हैं.’’

‘‘कौए, महाभोज, क्या मतलब?’’ तिवारीजी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘यार, अभी जिस रास्ते से मैं भागता हुआ  आ रहा था उस पर एक मरे हुए जानवर को कौए खा रहे थे, तुम ही कहो, आज के दिन इतनी अच्छी नानवेज डिश छोड़ कर वह घासफूस खाने तुम्हारे घर की छत पर क्यों आएंगे?’’

‘‘इस का अर्थ तो यह हुआ कि आज मेरा पूरा परिवार भूखा ही रहेगा.’’

‘‘शायद,’’ मैं ने भी गंभीरता से कहा.

‘‘फिर क्या उपाय हो सकता है?’’ तिवारीजी ने किसी क्लाइंट की तरह मुझ से सलाह मांगी.

‘‘एक उपाय है.’’

‘‘कहो दोस्त, जल्दी कहो, पूरे परिवार को जोरों से भूख लगी है.’’

मैं ने पहले तो अपने दाएंबाएं देखा ताकि मौका मिले तो भाग सकूं. फिर कहा, ‘‘यार, एक भोजन की थाली परोस कर उस मरे हुए जानवर के पास रख आओ. हो सकता है टेस्ट चेंज करने के लिए कौए कुछ खा लें.’’

‘‘आइडिया तो बहुत बढि़या है,’’ कह कर तिवारीजी ने मुझे अपने गले से चिपटा लिया और अपने घर की ओर तेज कदमों से चल दिए ताकि जल्दी से थाली परोस कर मरे ढोर के पास रख सकें, जहां उन के पुरखे उसे ग्रहण कर सकें. Hindi Humor Story

Short Story : बीवी या बौस

Short Story. मैंने अपनी जिद पर लव मैरिज की थी, इसीलिए विदाई के वक्त ससुरजी ने कहा था, ‘‘जमाई बाबू, अभी तो मैं अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन आप के प्यार के आगे मुझे झुकना पड़ा. खैर, बेटी को मैं ने अच्छे संस्कार दिए हैं, इसलिए आप की जिंदगी की बगिया हमेशा गुलजार रहेगी.’’

मैं ने ससुरजी के चरण छू कर कहा था, ‘‘जब तक मेरी इन बाजुओं में दम है, आप की बेटी राज करेगी.’’

और इस तरह बिना एक फूटी कौड़ी दिए ससुर साहब ने अपनी सुपुत्री मुझे सौंप दी और मैं अपनी बीवी को ले कर दिल्ली की एक बस्ती में आ गया.

जब मेरी मासूम सी बीवी ने मेरे घर में पहला कदम रखा था, तो मैं बहुत खुश हुआ था. सोचा था कि अब मुझे कष्ट नहीं होगा. समय पर नाश्ताखाना मिलेगा. जब दफ्तर से लौट कर आऊंगा तो बीवी मुझे प्यार करेगी. लेकिन मेरे सपने धरे के धरे रह गए.

एक दिन मैं ने दफ्तर से लौटते समय अपनी बीवी को फोन किया, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘कुछ नहीं, लेकिन आप कब आ रहे हैं?’ उधर से आवाज आई.

मुझे बहुत भूख लगी थी. मैं ने सोचा कि वह खाना बना कर रखेगी, इसीलिए मेरे आने के बारे में पूछ रही है. मैं ने कहा, ‘‘प्रिये, कुछ लजीज खाना बनाओ. मैं दफ्तर से निकल रहा हूं. एक घंटे में पहुंच जाऊंगा.’’

‘ठीक है,’ वह बोली.

मैं रास्तेभर गाना गुनगुनाते हुए घर पहुंचा. मैं खुश था कि घर पहुंचते ही गरमागरम लजीज खाना मिलेगा. मैं ने घंटी बजा दी लेकिन दरवाजा नहीं खुला. फिर 1-2 बार बजा कर इंतजार किया. फिर भी दरवाजा नहीं खुला तो कई बार घंटी बजाई. तब जा कर दरवाजा खुला.

‘‘क्यों, क्या हो गया? देर क्यों हुई दरवाजा खोलने में,’’ मैं ने पूछा.

वह अपने चेहरे पर लटक रहे बालों को समटते हुए बोली, ‘‘कुछ नहीं, जरा आंख लग गई थी.’’

घर का सामान सुबह जिस हालत में था वैसे ही अभी भी पड़ा था. सुबह जिस प्लेट में मैं ने नाश्ता किया था वह वैसे ही जूठी डाइनिंग टेबल पर पड़ी थी. धोने के लिए गंदे कपड़ों का ढेर एक कोने में मुंह चिढ़ा रहा था. फर्श पर धूल की परत थी. रसोईघर में जूठे बरतनों का ढेर लगा था.

लजीज खाना खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया था. वह मासूमियत से हुस्न के हथियार के साथ अनमने ढंग से मुझे देख रही थी. मैं खून का घूंट पी कर रह गया.

कुछ दिनों के बाद एक सुबह मैं दफ्तर के लिए निकल रहा था, तो वह बोली, ‘‘सुनिएजी, मेरे मोबाइल फोन में बैलेंस खत्म हो गया है. बैलेंस डलवा दीजिएगा.’’

मैं ने चौंक कर कहा, ‘‘बैलेंस कैसे खत्म हो गया… कल ही तो 2 सौ रुपए का रीचार्ज कराया था?’’

‘‘कल मैं ने मम्मीपापा से बात की थी और बूआ से भी बात की थी…

2-3 सहेलियों से भी बात की थी…’’ वह थोड़ा अटकते हुए बोली.

‘‘तो इतनी ज्यादा बात करने की क्या जरूरत थी? सिर्फ हालचाल पूछ लेती और बात खत्म कर देती,’’ मैं ने कहा.

‘‘हालचाल ही तो पूछा था,’’ वह बोली.

मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘अच्छा, ठीक है, बैलेंस डलवा दूंगा,’’ कह कर मैं घर से निकल गया. मेरे सपनों का महल टूटता जा रहा था.

इसी बीच उसे एक नया शौक सूझा. अब वह टैलीविजन का रिमोट हाथ में लिए सीरियल देखती रहती थी. कुछ कहता तो भी सीरियल में ही खोई रहती. जोर से बोलने पर वह मेरी तरफ देख कर पूछती, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘दफ्तर से थकाहारा आया हूं. पानी और नाश्ते के लिए भी नहीं पूछती और कहती हो कि क्या हुआ…’’

‘‘अच्छा, अभी 5 मिनट में लाती हूं. सीरियल अब खत्म होने ही वाला है,’’ टैलीविजन पर से आंखें हटाए बिना वह जवाब देती.

उस के वे 5 मिनट कभी खत्म नहीं होते. मजबूरन मैं खुद ही रसोईघर में जा कर कुछ खाने को ले आता. खुद भी खाता और अपनी बीवी को भी खिलाता.

महीनों सीरियल प्रेम दिखाने के बाद मेरी बीवी का पासपड़ोस की औरतों के घरों में आनेजाने और गपबाजी का दौर शुरू हुआ.

मैं दफ्तर से आ कर दरवाजे की घंटी बजाता रहता लेकिन दरवाजा नहीं खुलता. जब फोन करता तो पता चलता कि वह किसी पड़ोसन के घर बैठी है.

जल्द ही मेरी बीवी का पड़ोसन के घरों में जाने का साइड इफैक्ट भी शुरू हो गया. दूसरों के घरों में कुछ नई और अच्छी चीजें देख कर आती और मुझे भी वे चीजें लाने को कहती. कुछ तो अपनी जरूरत और पैसे की सीमा को देखते हुए मैं ले भी आया लेकिन अकसर ऐसी डिमांड होने लगी.

कुछ मेरी चादर से बाहर होता तो मैं मना कर देता. वह मुंह फुला कर बैठ जाती. खाना जैसेतैसे बना कर लाती, जो खाया न जाता.

एक दिन मैं ने उसे समझाया, ‘‘प्रिये, सब की जरूरत और औकात अलग होती है और उसी के मुताबिक सब काम करते हैं. दूसरों को देख कर हमें परेशान नहीं होना चाहिए.’’

‘‘हां, मेरी किस्मत ही खराब है, तभी तो सारी अच्छी चीजें दूसरों के घर देखती हूं. अपने घर में नसीब कहां?’’ वह बुझी आवाज में बोली.

‘‘निराश क्यों होती हो? समय आने पर हमारे यहां भी सबकुछ हो जाएगा. सब एक दिन में तो अमीर नहीं हो जाते. इस में समय लगता है,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं बोझ हो गई थी, इसीलिए मेरे मम्मीपापा ने जल्दी मेरी शादी करा दी,’’ यह कहते ही उस की आंखों से आंसू टपकने लगे.

‘‘लेकिन यह शादी तो हम दोनों के बीच प्यार होने के चलते हुई थी.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं नादान थी, लेकिन मेरे मम्मीपापा को तो अक्ल थी. मुझे बोझ समझ कर उन्होंने मेरा निबटारा कर दिया.’’

‘‘खैर, देर से शादी होती तो क्या कोई टाटा, बिरला या मुकेश अंबानी का बेटा आ जाता रिश्ता ले कर?’’ गुस्से में मेरे मुंह से निकला.

‘‘कोई भी आता लेकिन आप से अच्छा आता,’’ उस ने जवाब दिया.

मैं ने चुप रह जाना ही ठीक समझा.

रविवार का दिन था. मैं ने सोचा कि आज आराम करूंगा. रोज अपने दफ्तर में बौस की और्डरबाजी से परेशान रहता हूं. कम से कम आज तो आराम कर लूं.

मैं ने बीवी से कहा, ‘‘जानेमन, आज कुछ अच्छा खाना बनाओ ताकि खा कर मजा आ जाए. मैं आज टैलीविजन पर फिल्म देखूंगा और आराम करूंगा.’’

लेकिन मेरी बीवी का खयाल कुछ और ही था. वह बोली, ‘‘चलिए न आज कहीं बाहर घूमने चलते हैं और होटल में खाना खाते हैं.’’

मैं ने घबरा कर कहा, ‘‘कहां घूमने चलेंगे? कोई अच्छी जगह नहीं है. भीड़भाड़ और गाडि़यों के जाम में ही फंसे रहे जाते हैं और होटल का खाना तो ऐसा होता है कि खाने के बाद पछतावा होने लगता है कि क्यों खाया.

‘‘खाने का कोई स्वाद नहीं होता. सिर्फ ज्यादा पैसे और टिप दो. शाम को हैरानपरेशान हो कर घर लौटो.’’

‘‘आप तो हमेशा ऐसे ही बोलते हैं. शादी के बाद हनीमून पर भी बाहर नहीं ले गए,’’ वह बिस्तर पर लेट कर आंसू बहाने लगी.

छुट्टी का मजा खराब हो चुका था. मैं खुद रसोईघर में जा कर कुछ स्वादिष्ठ खाना बनाने की कोशिश करने लगा.

एक बार पड़ोस में शादी थी. मुझे भी सपरिवार न्योता मिला था. दफ्तर से आ कर मैं ने अपनी बीवी से कहा, ‘‘जल्दी तैयार हो जाओ. सब इंतजार कर रहे होंगे.’’

लेकिन बहुत देर बाद भी वह अपने कमरे से बाहर न निकली. मैं कमरे में गया तो देखा कि वह तकिए में मुंह छिपा कर रो रही थी.

‘‘अरे, क्या बात हो गई… रो क्यों रही हो?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

वह कुछ न बोली. मैं ने जबरदस्ती उसे खींच कर बैठाया और फिर वजह पूछी.

‘‘न्योते में जाने लायक मेरे पास कपड़े नहीं हैं. मैं क्या पहन कर जाऊंगी?’’ वह सुबकते हुए बोली.

मैं हैरान रह गया. मैं रोज दफ्तर आताजाता हूं. लेकिन मेरे पास सिर्फ 2 जोड़ी ढंग के कपड़े थे, जबकि मेरी बीवी के पास कई जोड़ी कपड़े थे. 2 महीने पहले भी उस ने एक सूट खरीदा था, फिर भी वह रो रही थी.

मैं ने अलमारी में से उस के कई कपड़े निकाले और उस के आगे फैलाते हुए कहा, ‘‘ये सारे तो नए सूट हैं, फिर क्यों रो रही हो?’’

‘‘ये सब तो मैं पहले पहन चुकी हूं,’’ वह मुंह फेर कर बोली.

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो? जो कपड़ा एक बार पहन लिया, वह पुराना हो गया क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘ये कपड़े पहने हुए मुझे सब औरतें देख चुकी हैं.’’

‘‘मतलब, हर मौके लिए तुम्हें नए कपड़े चाहिए?’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘कोई कपड़े से बड़ा या छोटा नहीं होता. देखो तो, यह सूट कितना अच्छा है. तुम पहन कर तो देखो. जो इस सूट में तुम्हें देखेगा, तारीफ करेगा,’’ मैं ने पुचकारते हुए कहा.

उस दिन मैं बड़ी मुश्किल से अपनी बीवी को मना पाया था.

लेकिन अब मेरी सीधीशांत दिखने वाली बीवी बातबात पर गुस्सा करने लगी थी. सीरियल देखने से मना करता तो रिमोट पटक देती. पासपड़ोस में ज्यादा जाने से मना करता तो गुस्से में अपने को कमरे बंद कर लेती.

फोन पर ज्यादा बात करने से मना करता तो कई दिन तक मोबाइल फोन नहीं छूती. इतना ही नहीं, अगर मैं उस के बने खाने की शिकायत करता तो मुझे पर ही चीखने लगती और खाना बनाना छोड़ देती.

मैं तंग आ गया था. सोचता कि शादी से पहले कितनी सीधी और प्यारी थी मेरी बीवी, पर अब तो ज्वालामुखी बन गई है और गुस्सा तो जैसे इस की नाक पर बैठा रहता है.

दफ्तर में मेरा बौस काम में कमी निकाल कर मुझ पर बातबात पर गुस्सा करता था. लेकिन नौकरी तो करनी ही थी, उसी से घर का गुजारा चलता था, इसीलिए बौस का गुस्सा सहना पड़ता था.

घर आता तो बीवी भी मुझ पर ही बातबात पर गुस्सा करती. समझ में नहीं आता कि वह मेरी बीवी है या बौस.

मेरी बीवी और मेरे बौस ने मेरी जिंदगी दूभर कर दी थी. पता नहीं, इन दोनों के चक्रव्यूह से मैं कभी निकल पाऊंगा भी या नहीं.

Office Humor Story: काश, मेरा भी बौस होता

Office Humor Story. आज फिर अनीता छुट्टी पर है. इस का अंदाज मैं ने इसी से लगा लिया कि वह अभी तक तैयार नहीं हुई. लगता है कल फिर वह बौस को अदा से देख कर मुसकराई होगी. तभी तो आज दिनभर उसे मुसकराते रहने के लिए छुट्टी मिल गई है.

मेरे दिल पर सांप लोटने लगा. काश, मेरा भी बौस होता…बौसी नहीं…तो मैं भी अपनी अदाओं के जलवे बिखेरती, मुसकराती, इठलाती हुई छुट्टी पर छुट्टी करती चली जाती और आफिस में बैठा मेरा बौस मेरी अटेंडेंस भरता होता…पर मैं क्या करूं, मेरा तो बौस नहीं बौसी है.

बौस शब्द कितना अच्छा लगता है. एक ऐसा पुरुष जो है तो बांस की तरह सीधा तना हुआ. हम से ऊंचा और अकड़ा हुआ भी पर जब उस में फूंक भरो तो… आहा हा हा. क्या मधुर तान निकलती है. वही बांस, बांसुरी बन जाता है.

‘‘सर, एक बात कहें, आप नाराज तो नहीं होंगे. आप को यह सूट बहुत ही सूट करता है, आप बड़े स्मार्ट लगते हैं,’’ मैं ऐसा कहती तो बौस के चेहरे पर 200 वाट की रोशनी फैल जाती है.

‘‘ही ही ही…थैंक्स. अच्छा, ‘थामसन एंड कंपनी’ के बिल चेक कर लिए हैं.’’

‘‘सर, आधे घंटे में ले कर आती हूं.’’

‘‘ओ के, जल्दी लाना,’’ और बौस मुसकराते हुए केबिन में चला जाता. वह यह कभी नहीं सोचता कि फाइल लाने में आधा घंटा क्यों लगेगा.

पर मेरी तो बौसी है जो आफिस में घुसते ही नाक ऊंची कर लेती है. धड़मधड़म कर के दरवाजा खोलेगी और घर्रर्रर्रर्र से घंटी बजा देगी, ‘‘पाल संस की फाइल लाना.’’

‘‘मेम, आज आप की साड़ी बहुत सुंदर लग रही है.’’

वह एक नजर मेरी आंखों में ऐसे घूरती है जैसे मैं ने उस की साड़ी का रेट कम बता दिया हो.

‘‘काम पूरा नहीं किया क्या?’’ ठां… उस ने गरम गोला दाग दिया. थोड़ी सी हवा में ठंडक थी, वह भी गायब हो गई, ‘‘फाइल लाओ.’’

दिल करता है फाइल उस के सिर पर दे मारूं.

‘‘सर, आज मैं बहुत थक गई हूं, रात को मेहमान भी आए थे, काफी देर हो गई थी सोने में. मैं जल्दी चली जाऊं?’’ मैं अपनी आवाज में थकावट ला कर ऐसी मरी हुई आवाज में बोलती जैसी मरी हुई भैंस मिमियाती है तो बौस मुझे देखते ही तरस खा जाता.

‘‘हां हां, क्यों नहीं. पर कल समय से आने की कोशिश करना,’’ यह बौस का जवाब होता.

लेकिन मेरे मिमियाने पर बौसी का जवाब होता है, ‘‘तो…? तो क्या मैं तुम्हारे पांव दबाऊं? नखरे किसी और को दिखाना, आफिस टाइम पूरा कर के जाना.’’

मन करता है इस का टाइम जल्दी आ जाए तो मैं ही इस का गला दबा दूं.

‘‘सर, मेरे ससुराल वाले आ रहे हैं, मैं 2 घंटे के लिए बाहर चली जाऊं,’’ मैं आंखें घुमा कर कहती तो बौस भी घूम जाता, ‘‘अच्छा, क्या खरीदने जा रही हो?’’ बस, मिल जाती परमिशन. पर यह बौसी, ‘‘ससुराल वालों से कह दिया करो कि नौकरी करने देनी है कि नहीं,’’ ऐसा जवाब सुन कर मन से बददुआ निकलने लगती है. काश, तुम्हारी कुरसी मुझे मिल जाती तो…लो इसी बात में मेरी बौसी महारानी पानी भरती दिखाई देती.

उस दिन पति से लड़ाई हो गई तो रोतेरोते ही आफिस पहुंची थी. मेरे आंसू देखते ही बौसी बोली, ‘‘टसुए घर छोड़ कर आया करो.’’ लेकिन अगर मेरा बौस होता तो मेरे आंसू सीधे उस के (बौस के) दिल पर छनछन कर के गरम तवे पर ठंडी बूंदों की तरह गिरते और सूख जाते. वह मुझ से पूछता, ‘क्या हुआ है? किस से झगड़ा हुआ.’ तब मैं अपने पति को झगड़ालू और अकड़ू बता कर अपने बौस की तारीफ में पुल बांधती तो वह कितना खुश हो जाता और मेरी अगले दिन की एक और छुट्टी पक्की हो जाती.

कोई भी अच्छी ड्रेस पहनूं या मेकअप करूं तो डर लगने लगता है. बौसी कहने लगती है, ‘‘आफिस में सज कर किस को दिखाने आई हो?’’ अगर बौस होता तो ऐसे वाहियात सवाल थोड़े ही करता? वह तो समझदार है, उसे पता है कि मैं उस के दिल के कोमल तारों को छेड़ने और फुसलाने के लिए ही तो ऐसा कर रही हूं. वह यह सब जान कर भी फिसलता ही जाएगा. फिसलता ही जाएगा और उस की इसी फिसलन में उस की बंद आंखों में मैं अपने घर के हजारों काम निबटा देती.

पर मेरी किस्मत में बौस के बजाय बौसी है, बासी रोटी और बासी फूल सी मुरझाई हुई. उस के होेते हुए न तो मैं आफिस टाइम पर शौपिंग कर पाती हूं, न ही ससुराल वालों को अटेंड कर पाती हूं, न ही घर जा कर सो पाती हूं, न ही अपने पति की चुगली उस से कर के उसे खुश कर पाती हूं और न ही उस के रूप और कपड़ों की बेवजह तारीफ कर के, अपने न किए हुए कामों को अनदेखा करवा सकती हूं.

अगर मेरा बौस होता तो मैं आफिस आती और आफिस आफिस खेलती, पर काम नहीं करती. पर क्या करूं मैं, मेरी तो बौसी है. इस के होने से मुझे अपनी सुंदरता पर भी शक होने लगा है. मेरा इठलाना, मेरा रोना, मेरा आंसू बहाना, मेरा सजना, मेरे जलवे, मेरे नखरे किसी काम के नहीं रहे.

इसीलिए मुझे कभीकभी अपने नारी होने पर भी संदेह होने लगा है. काश, कोई मेरी बौसी को हटा कर मुझे बौस दिला दे.  Office Humor Story

Romantic story in Hindi: लौट आई सुनीता -अपहरण की शिकार एक लड़की

Romantic story in Hindi. कमिल बहुत देर तक उसे देखता रहा. अस्पताल के बिस्तर नंबर 8 पर पड़ी लड़की सुनीता ही थी. वह भूल भी कैसे सकता था उसे.

‘‘मैं कल पूरी तरह तैयार हो कर कोर्ट पहुंच जाऊंगी. आप भी जल्दी से आ जाना कमिल… इंतजार मत कराना. कुछ हो न जाए…’’ सुनीता ने थोड़ा उतावलेपन में कहा था.

जाने से पहले सुनीता अपने कमिल के सीने से लग गई थी. उस ने तो कोर्ट मैरिज के लिए पहले ही रजिस्ट्रेशन करा रखा था, जब सुनीता ने उस से बोला था, ‘‘कमिल, मैं तुम से जल्द से जल्द शादी करना चाहती हूं.’’

कमिल को इस जल्दी के बारे में तो पता नहीं था, पर इतना वह समझ गया था कि सुनीता अब उस की होने वाली है. रजिस्ट्रेशन के बाद उस ने सुनीता को बता दिया था कि कल कोर्ट में उन्हें शादी के लिए बुलाया गया है. यह सुन कर सुनीता खुश हो गई थी.

कमिल समय से पहले ही कोर्ट पहुंच गया था. उस ने नया कुरतापाजामा पहना था और सुनीता के लिए भी वह एक नई साड़ी लाया था. चमचमाते गुलाब की फूलमाला का पैकेट भी उस के हाथों में था.

सारी तैयारी कर के सुनीता का इंतजार करता रहा कमिल. वकील साहब ने भी बता दिया था कि जज साहब ने जो समय दिया है, उस समय तक दोनों को कोर्ट में दाखिल हो जाना होगा.

कमिल ने बड़े यकीन के साथ वकील साहब से कहा था, ‘‘जी जरूर. आप निश्चिंत रहें. मुझ से ज्यादा जल्दी तो उसे है. आप तैयारी पूरी रखें.’’

समय निकलता जा रहा था. कमिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह बारबार घड़ी देख रहा था.

वह कई बार घड़ी को हिला कर देख चुका था कि कहीं वह बंद तो नहीं हो गई, पर उस के कांटे तो बराबर खिसक रहे थे. वकील साहब भी परेशान थे. वे भी बारबार अपनी घड़ी देख रहे थे.

‘‘देखो भाई, कोर्ट का समय निकला जा रहा है. बाद में मजिस्ट्रेट साहब शादी नहीं कराएंगे. या तो वे इस अर्जी को खारिज कर देंगे या दूसरी तारीख देंगे, जो कम से कम एक महीने के बाद की होगी,’’ यह कहते हुए वकील साहब के चेहरे पर भी तनाव फैलता जा रहा था.

कोर्ट का समय निकले भी 2 घंटे से ज्यादा हो चुका था. कोर्ट बंद हो चुका था, पर कमिल बैठा अपनी सुनीता का इंतजार कर रहा था. उसे भरोसा था कि सुनीता जरूर आएगी, पर वह नहीं आई. रात का अंधेरा फैलने के बाद वह उदास कदमों से घर लौट आया था.

अब से कई साल पहले ट्रेन में सफर करने के दौरान कमिल की सुनीता से मुलाकात हुई थी. दोनों आमनेसामने की सीट पर बैठे थे.

‘‘क्या आप आलूबड़ा खाएंगी? यहां के आलूबड़े बहुत मशहूर हैं…’’ कहतेकहते कमिल ने एक आलूबड़ा सुनीता की ओर बढ़ा दिया था.

सुनीता ने हिकारत से कमिल को घूरा और बोली, ‘‘जी नहीं. मैं बाहर की चीज नहीं खाती,’’ और उस ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था.

कमिल को भी अपनी गलती का अंदाजा हो चुका था. जब वे एकदूसरे को जानतेपहचानते ही नहीं हैं, तो उसे उस लड़की के सामने आलूबड़ा खाने का प्रस्ताव रखना ही नहीं चाहिए था.

‘सौरी’ कह कर कमिल चुपचाप आलूबड़ा खाने लगा. आलूबड़ा बहुत तीखा था. वह पूरा आलूबड़ा खाता, इस के पहले ही होंठों से ‘सी… सी…’ की आवाज निकलनी शुरू हो गई थी. उसे पानी की सख्त जरूरत थी, जो उस के पास नहीं था.

सुनीता के पास पानी की बोतल नजर आ रही थी, पर कमिल की हिम्मत नहीं हो रही थी उस से मांगने की. वह पानी को यहांवहां तलाशता रहा. सुनीता ने शायद उस की ‘सी… सी…’ की आवाज सुन ली थी.

‘‘यह लीजिए… पानी पी लीजिए… इसी वजह से मैं बाहर की चीज नहीं खाती,’’ कहते हुए सुनीता ने पानी की बोतल कमिल की ओर बढ़ा दी.

पहले तो कमिल का मन हुआ कि वह भी कह दे कि मैं किसी अजनबी के हाथ का पानी नहीं पीता, पर इस समय उसे पानी की बहुत जरूरत थी, सो उस के हाथ से पानी की बोतल ले कर वह गटागट पी गया.

‘‘थैंक्स. आज तो मेरे प्राण ही निकल जाते,’’ कमिल ने कहा.

सुनीता मुसकरा दी थी. स्टेशन आने पर दोनों साथसाथ ही प्लेटफार्म पर उतरे थे.

‘‘अच्छा… आप भी यहीं रहती हैं या पहली बार आना हुआ है?’’ कमिल ने सुनीता से पूछा.

‘‘जी, मैं यहीं रहती हूं,’’ सुनीता ने छोटा सा जवाब दिया था.

‘‘वाह… अब अगर मैं पूछ लूंगा कि आप यहां कहां रहती हैं, तो आप को बुरा लगेगा,’’ यह कहते हुए कमिल के चेहरे पर सवालिया निशान उभर आया था.

‘‘जगदीश वार्ड में… वह पुरानी गल्ला मंडी है न, उस के पीछे है,’’ सुनीता बोली.

‘‘अच्छा, वह जगह तो मैं जानता हूं. मैं भी इसी शहर का रहने वाला हूं. सारी उम्र यहीं गुजर गई है.’’

‘‘ओह… वैसे, आप की उम्र 100 के आसपास होगी…’’ सुनीता ने कमिल को छेड़ा था. फिर वे दोनों अपनेअपने घर चले गए थे.

कमिल और सुनीता की बहुत दिन बाद शादी की एक रिसैप्शन में दोबारा मुलाकात हुई थी. वैसे तो कमिल का इरादा सुनीता को घूरने का बिलकुल भी नहीं था, पर वह इतनी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी कि वह अपनी पलकें तक भी नहीं झपका पा रहा था.

सुनीता गोरे रंग की पतली लड़की थी. लेकिन इस के बावजूद उस की देह में गजब की कसावट थी. सांचे में ढला बदन किसी को भी अपना दीवाना बना सकता था.

रिसैप्शन में सुनीता ने पीले रंग का सलवारसूट पहना था. चेहरे पर लाल रंगत थे. उस ने खुले बालों में पीले रंग का बड़ा क्लिप लगा रखा था.

‘‘ओ जनाब, लड़कियों को ऐसे नहीं घूरते,’’ कह कर सुनीता हंस पड़ी. उस की हंसी गूंज गई थी सारे वातावरण में. कुछ चेहरे घूम गए उन दोनों की ओर. कमिल झोंप सा गया.

‘सौरी’ कहते हुए कमिल ने न चाहते हुए भी अपनी नजरें हटा लीं.

‘‘वैसे, अगर आप का कोई नाम हो बता ही दें, क्योंकि आप मुझे यों ही बारबार मिलते रहेंगे, तो मुझे भी तो आप के बारे में पता होना चाहिए न.’’

‘‘जी, कमिल शर्मा,’’ अब कमिल सुनीता की ओर नजर भी नहीं डाल पा रहा था. इस वजह से वह दूसरी ओर देखते हुए बोला.

‘‘मुझे सुनीता कहते हैं. मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी है. नौकरी की तलाश कर रही हूं… वैसे, आप ने खाना खाया?’’

‘‘नहीं. मैं ऐसे कार्यक्रमों में खाना नहीं खाता.’’

‘‘तभी तो इतनी हैंडसम पर्सनैलिटी हैं,’’ कहते हुए सुनीता ने कमिल को ऊपर से नीचे तक देखा.

‘‘अच्छा, चलती हूं. फिर मिलूंगी कमिल…’’ कहते हुए सुनीता के चेहरे पर मुसकान बिखरी नजर आ रही थी.

एक दिन सुनीता अपनी मां के साथ बाजार में कमिल से मिली. उस ने कमिल का परिचय अपनी मां से कराया.

बातोंबातों में सुनीता ने कहा, ‘‘10 तारीख को मुझे भोपाल जाना है… एक  इंटरव्यू है…’’

‘‘अच्छा… बधाई…’’

‘‘अगर ज्यादा बिजी न हो तो चलो तुम भी… शाम को लौट आएंगे…’’ सुनीता ने कहा.

कमिल को अच्छा लगा था. इस बहाने सुनीता से और मेलजोल बढ़ जाएगा और अकेली लड़की को सहारा मिल जाएगा. कमिल ने हामी भर दी.

भोपाल से लौटने के बाद सुनीता और कमिल काफी नजदीक आ चुके थे. आनेजाने के समय बहुत सारी बातें हुईं, एकदूसरे की पसंद को समझ और पहचाना.

लेकिन पिछले कुछ दिनों से सुनीता कुछ अनमनी सी लग रही थी. एक दिन उस ने बोला था, ‘‘कमिल, मैं तुम से शादी करना चाहती हूं… बहुत जल्दी…’’ उस के चेहरे पर तनाव दिखाई दे रहा था.

‘‘देखो, ऐसे फैसले जल्दी में नहीं लिए जाते…’’

‘‘वह मैं नहीं जानती. कमिल, हम जल्दी ही शादी करेंगे. मंदिर में… नहीं… कोर्ट में… तुम अर्जी दे दो, मैं दस्तखत कर देती हूं… तुम न मत कहना प्लीज…’’

कमिल हालात की गंभीरता को जानते हुए भी सहमत हो गया था और उस ने कोर्ट में अर्जी दे दी थी. कोर्ट ने आज की ही तारीख दी थी, पर सुनीता आई ही नहीं.

सुनीता से अचानक बिछड़ने के बाद कमिल का सैलेक्शन सबइंस्पैक्टर के पद पर हो गया था. ट्रेनिंग के बाद वह दूसरे शहर में चला गया था.

उस दिन की घटना से कमिल बहुत मुश्किलों के बाद उबर पाया था. एक ही बात उस के दिमाग में बारबार घूम जाती थी कि सुनीता आखिर आई क्यों नहीं? उस ने खुद ही शादी के लिए जिद की थी, तो उस ने धोखा क्यों दिया? नहीं आ पा रही थी, तो खबर भी दे सकती थी… इस तरह की बातें सोचतेसोचते कमिल की नाराजगी हद से ज्यादा बढ़ जाती थी.

आज सुबह ही कमिल को सूचना मिली थी कि एक लड़की बेहोशी की हालत में रेलवे प्लेटफार्म से कुछ ही दूरी पर पड़ी हुई है. वह दलबल के साथ घटनास्थल पर पहुंचा था. सुनीता को पहचानने में उसे जरा भी मुश्किल नहीं हुई थी.

कमिल ने जल्दीजल्दी कागजी खानापूरी कर के सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया था. वह खुद उस की देखभाल कर रहा था.

जब सुनीता को होश आया, तो उस ने अपने सामने कमिल को खड़ा पाया. वह चौंक गई. उस की आंखों में आंसू आ गए थे. कमिल ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया था.

‘‘अपनेआप को संभालो सुनीता…’’

पर सुनीता रोती रही. जब वह सामान्य हुई, तो उस ने अपनी आपबीती बतानी शुरू कर दी. यह सच है कि सुनीता को नौकरी के लिए इतनी जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं थी, पर जोशजोश में वह एक कंपनी की सेल्सगर्ल बन गई थी. वह सामान की डिलीवरी करती थी, बदले में उसे मोटी तनख्वाह दिए जाने की बात की गई थी. डिलीवरी किस चीज की हो रही है, यह सुनीता ने जानने की कोशिश की, पर उसे नहीं बताया गया.

पर एक दिन सुनीता जान ही गई थी कि वह नशीली दवाओं की डिलीवरी करने के लिए रखी गई है. जब उसे हकीकत का पता चला तो उस ने काम करने से साफ इनकार कर दिया, इस के बाद ही उसे धमकियां मिलने लगी थीं.

सुनीता ने शादी के लिए जो जल्दबाजी दिखाई थी, उस के पीछे भी यही वजह थी. उस दिन वह कोर्ट के लिए समय से पहले ही निकल गई थी. पर कोर्ट पहुंचने से पहले ही उस का अपहरण कर लिया गया था.

चूंकि सुनीता ने घर में एक खत छोड़ दिया था कि वह अपनी मरजी से शादी कर रही है, उसे खोजने की कोशिश न करें, इस नाराजगी में घर के लोगों ने भी उसे खोजने की कोशिश नहीं की.

सुनीता के साथ बहुत जुल्म किए गए थे. कई जगहों पर बंदी बना कर रखा गया था और अब अपहरण करने वाले उसे इस शहर में ले आए थे. पर जब कमिल ने अपने इलाके के अपराधियों पर अंकुश लगाना शुरू किया, तो वे लोग डर के मारे सुनीता को बेहोशी की हालत में छोड़ कर भाग गए.

सुनीता की मदद से कमिल को आरोपियों को खोजने में ज्यादा परेशानी भी नहीं हुई थी. अस्पताल से वह सुनीता को अपने घर ले कर आ गया था.

‘‘आप ने अभी तक शादी नहीं की है शायद…’’ सुनीता ने सवालिया निगाहों से कमिल की ओर देखा.

‘‘उस दिन जब तुम कोर्ट में नहीं आई, तभी मैं ने तय कर लिया था कि अब मैं कभी शादी नहीं करूंगा…’’ कमिल ने बताया. सुनीता खामोश रही.

‘‘मुझ अब समझ आ गया कि तुम ने मुझे धोखा नहीं दिया था.’’

सुनीता ने केवल नजरें उठा कर कमिल की ओर देखा.

‘‘क्या तुम मुझ से शादी करोगी… उस दिन वाले वादे के मुताबिक?’’ कमिल ने पूछा.

सुनीता के चेहरे पर मुसकान खिल गई और वह कमिल के गले से लग गई.

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