कहते हैं इश्क पर किसी का जोर नहीं चलता. चाहे कोई कितना भी इस के बहाव को रोकने की कोशिश करे, रोका नहीं जा सकता है. ऐसा ही कुछ पाकिस्तान में रावलपिंडी की 18 वर्षीया आशिया के साथ हुआ. उस का दिल 61 साल के शमशाद पर आ गया था. इस के बाद जो हुआ…
आशिया कुछ हफ्ते बाद ही 18 ही होने वाली थी. अम्मीअब्बू उस की शादी को ले कर चिंतित थे.
वे उस के लिए अच्छा सा रिश्ता ढूंढ रहे थे. मनपसंद रिश्ता नहीं मिल पा रहा था. उन्हें शमशाद के आने का इंतजार था. वह महीनों से आए नहीं थे.
उन के बारे में आशिया की अम्मी हफ्ते भर से बातें कर रही थीं कि वह आएंगे तब उन की मुश्किल दूर हो जाएगी. बेटी का रिश्ता तय हो जाएगा. वह कई बार अपने शौहर से बोल चुकी थीं कि किसी से शमशाद के बारे में मालूम करें कि वह महीनों से क्यों नहीं आ रहे हैं.
शमशाद के बारे में अम्मी और अब्बू से बातें सुनसुन कर आशिया के मन में उन्हें देखने की इच्छा मचलने लगी थी. उस के दिल में निकाह को ले कर गुदगुदी होने लगी थी. उसे लगा जैसे उस की पसंद का दूल्हा चल कर उस के घर आने वाला हो. वह चुपके से रसोई में अम्मी से पूछ बैठी, ‘‘अम्मी शमशाद कौन है?’’
‘‘क्यों? क्या करना है उन के बारे में तुझे जान कर?’’ अम्मी झिड़कते हुए बोलीं.
‘‘मेरी अच्छी अम्मी, प्यारी अम्मी बताओ न, कौन हैं शमशाद? तुम अब्बू से उन के बारे में बातें करती रहती हो.’’ आशिया ठुनकते हुए बोली.
‘‘आएंगे, तब मिल लेना. और हां, जो कुछ तुम से पूछें, उस का सहीसही जवाब देना.’’ अम्मी प्यार से उस के गाल पर एक चपत लगाती हुई बोलीं.
अम्मी का जवाब आशिया को बेहद ही प्यारा लगा. उस के मन की बेचैनी और बढ़ गई. उस की अल्हड़ उम्र सपने बुनने लगी.
वह दिन भी आ गया, जब घर पर शमशाद आए. उन्हें अम्मी और अब्बू ने बैठकखाने में बिठाया था. आशिया ने कमरे के दरवाजे के परदे से झांक कर
देखा. उसे शमशाद की पीठ नजर आई. केश पीछे से आधे सफेद दिखे. वह चौंक गई, खुद से सवाल कर बैठी, ‘‘अरे
यह कौन है? यह तो कोई बुजुर्ग दिखता है.’’
‘‘आशिया… आशिया… रसोई में आना बेटा. शमशाद के लिए चायनाश्ता ले कर चलना है.’’ अम्मी की आवाज आई. आशिया चुपचाप रसोई में चली गई. अम्मी से कुछ पूछे बगैर चायनाश्ते की ट्रे उठा ली और अम्मी के पीछेपीछे बैठक
में आ गई. वहां पहले से ही अब्बू भी बैठे थे.
उन के सामने वही इंसान बैठा था, जिस के बारे में घर में कई दिनों से बातें हो रही थीं. उन्हीं के आने का अम्मीअब्बू को इंतजार था. लेकिन वह आशिया के सपनों का शहजादा नहीं था. वह तो कोई 60 साल का लग रहा था. हां, पहनावे से अच्छा जरूर दिख रहा था.
वह भागती हुई रसोई में आ गई. अम्मी भी तुरंत आ गईं और पूछा, ‘‘तुम इतनी जल्दी क्यों आ गई? जाओ वहां, उन्हें तुम से कुछ सवाल पूछने हैं.’’
आशिया ने हिम्मत कर पूछा, ‘‘क्या इन्हीं से हमारा निकाह…’’
अम्मी बीच में ही हंसती हुई बोल पड़ीं, ‘‘अरे धत पगली! वह तो निकाह करवाने वाला है, लड़के और लड़कियों के लिए रिश्ते ले कर आते हैं. तेरे लिए एक
रिश्ता ले कर आए हैं. जा, जा कर अपने होने वाले दूल्हे के बारे में जो पूछना है पूछ ले.’’
‘‘मेरा जिस से निकाह होना है वह कोई और है? मैं तो उन्हीं को अपना दूल्हा समझ रही थी.’’ बोलते हुए आशिया बैठकखाने में चली गई. उस के जाने पर अब्बू वहां से चले गए.
शमशाद ने एक नजर आशिया पर डाली. बैठने का इशारा किया. आशिया उस के सामने की कुरसी पर बैठ गई और उस के सवालों का इंतजार करने लगी. कुछ समय तक चुप्पी छाई रही. वहां उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था. शमशाद ने सीधा सा सवाल किया, ‘‘तुम्हारी उम्र कितनी है?’’
‘‘जी, 17 साल 10 महीने.’’ आशिया बोली.
‘‘सहीसही बताओ, 18 साल पूरे होने में कितने दिन बचे हैं?’’ शमशाद बोले.
‘‘जन्म की तारीख के हिसाब से कुल 42 दिन बचे हुए हैं.’’
‘‘तुम्हारी माहवारी की तारीख क्या है?’’ शमशाद ने पूछा.
आशिया को बड़ा अटपटा लगा यह सवाल सुन कर. वह चुप रही. शमशाद ने दोबारा पूछा, ‘‘कहां तक पढ़ी हो? उस की तारीख याद रखनी चाहिए तुम्हें.’’
‘‘जी…जी, पता है. महीने की 22-23 तारीख.’’ आशिया बोली.
‘‘शाबाश! इस तरीख को खुद याद रखना और होने वाले शौहर को याद रखना जरूरी है.’’ शमशाद बोले.
‘‘क्यों, शौहर को क्यों?’’ आशिया ने जिज्ञासा जताई.
‘‘बहुत खूब पूछा तुम ने. वह इसलिए ताकि उस दौरान होने वाली तुम्हारी तकलीफों और नासाज सेहत को शौहर भी समझ सके. वैसे तुम हो हिम्मती.’’
‘‘जी!’’ आशिया बोली.
‘‘ठीक है, अब तुम जाओ,’’ शमशाद बोले.
‘‘सिर्फ यही पूछना था?’’ आशिया बोली.
‘‘हां, बाकी सवाल अम्मीअब्बू से बात करने के बाद पूछूंगा.’’ शमशाद बोले.
‘‘मैं आप से एक सवाल पूछूं?’’
‘‘हां हां, पूछो.’’
‘‘आप अपनी बीवी की माहवारी के बारे में जानते हैं?’’ आशिया तपाक से पूछ बैठी.
‘‘यही तो मुझ से गलती हो गई. मैं उस बारे में कभी नहीं पूछ पाया. उस का खयाल नहीं रख पाया. वही उस की बीमारी का कारण भी बना और कई दिनों तक खून बहता रहा. उस ने जब इस बारे में बताया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. एक दिन वह मुझे छोड़ कर दूसरी दुनिया में चली गई.’’ शमशाद मायूसी से बोल कर ऊपर की ओर देखने लगा.
आशिया को लगा जैसे उस ने शमशाद की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. वह सहम गई और सौरी बोल कर वहां से अपने कमरे में चली आई.
शमशाद के साथ अम्मी और अब्बू की करीब आधे घंटे तक बाचचीत होती रही. उन के बीच क्या बातें हो रही थीं, इस पर आशिया ने ध्यान नहीं दिया. उस के दिमाग में एक ही बात कौंध रही थी कि अच्छा शौहर वही होता है, जो उस की सेहत का खयाल रखता है.
एक हफ्ते बाद ही शमशाद फिर आए. अब्बू काम के सिलसिले में बाहर निकले हुए थे. अम्मी बाजार गई हुई थीं. घर पर केवल आशिया ही अकेली थी.
उस ने शमशाद को बैठकखाने में बिठाया और खातिरदारी में लग गई. रसोई में चाय बनाते वक्त आशिया की बातें एक बार फिर घूमने लगीं. कुछ समय में ही वह चाय और नाश्ता ले कर बैठकखाने में आ गई.
शमशाद ने पूछा, ‘‘कैसी हो आशिया?’’
‘‘जी, बहुत अच्छी हूं.’’ आशिया चहकते हुए बोली.
‘‘बहुत खुश नजर आ रही हो,’’ शमशाद बोले.
‘‘आप आए न इसलिए.’’ आशिया बोली.
‘‘अच्छा, तो मेरी बातें तुम्हें अच्छी लगीं… बहुत सी लड़कियों को मेरे सवाल अच्छे नहीं लगते हैं. मेरा सवाल सुनते ही मुंह बिचका लेती हैं. मुझे गलत समझ बैठती हैं. वे दोबारा मुझ से बात तक नहीं करतीं.’’
‘‘मैं तो कहती हूं कि आप बहुत अच्छा पूछते हैं,’’ आशिया बोली.
‘‘तुम बहुत सुंदर हो, तुम्हें देख कर तो मोहल्ले के लड़के आहें भरते होंगे.’’ शमशाद तारीफ में बोले.
‘‘भरा करें आहें मेरी बला से. मैं उन के पीछे नहीं भागती. सारे के सारे निखट्टू हैं.’’ आशिया ने ताने मारे.
‘‘तुम्हें कैसा लड़का पसंद है?’’ शमशाद ने पूछा.
‘‘आप जैसा?’’ अचानक आशिया के मुंह से निकल गया.
‘‘मुझ जैसा या मैं?’’ शमशाद भी अचानक बोल पड़े.
‘‘धत तेरे की!’’ आशिया जाने लगे.
‘‘यहीं बैठो न, तुम से बातें कर के बहुत अच्छा लग रहा है.’’ शमशाद ने उस का हाथ पकड़ कर वहीं बिठा लिया. आशिया वहीं स्टूल पर बैठ गई. बैठते ही पूछ बैठी, ‘‘तुम सिर्फ निकाह करवाने का काम करते हो? अब तक कितने जोड़ों के निकाह करवा चुके हो?’’
‘‘अरे नहीं, मैं निकाह नहीं करवाता वह तो काजी करवाता है. मैं तो उस के लिए जोड़े मिलवाने का काम करता हूं. बड़ी मुश्किल से रिश्ते बनते हैं,’’ शमशाद बोले.
‘‘मेरे लिए कैसा रिश्ता ढूंढा है?’’ आशिया ने जिज्ञासा से पूछा.
‘‘जो ढूंढा था, लगता है तुम्हारे लायक सही नहीं होगा. किसी और की तलाश करनी होगी,’’ शमशाद बोले.
‘‘उस में कमी है क्या?’’
‘‘नहीं, कमी उस में नहीं वह बराबरी का नहीं है. मुझे लगता है वह तुम्हारी तरह खुले विचारों का नहीं है,’’ शमशाद बोले.
‘‘सही फरमाया आप ने, मुझे एकदम से खुले विचारों वाला ही चाहिए, जैसे कि आप हैं. आप से बातें कर लगता है कि मैं बराबर की उम्र के किसी लड़के के साथ बात कर रही हूं.’’
उस रोज आशिया और शमशाद की काफी बातें हुईं. उन्होंने परिवार, शादी और समाज से ले कर दुनियाजहान की भी बातें कीं. कम उम्र वाली लड़की से शादी करने पर भी बातें हुईं.
दोनों ने उसे गलत नहीं कहा. उन्होंने इमरान खान की शादी के हवाले से उस की प्रधानमंत्री बनने की उपलब्धि तक गिनवा दी.
दोनों बातें करने में इतने मशगूल हो गए कि उन्हें समय का पता ही नहीं चला. बातोंबातों में आशिया ने शमशाद से उन के खानदान और परिवार के बारे में भी मालूम कर लिया.
पता चला कि शमशाद अपनी अकेली जिंदगी गुजारने पर मजबूर हैं. गुजारे के लिए मकान के बाहर 5 दुकानें हैं. उस से उन्हें किराया मिलता है. मकान की ऊपरी मंजिल पर 2 परिवार किराए पर रहते हैं. वही लोग घर की देखभाल भी कर देते हैं.
आशिया की अम्मी आईं और देरी का कारण बताया. आशिया से शमशाद की खातिरदारी के बारे में पूछा. शमशाद ने ही बताया कि उन की बेटी ने उन की बड़ी अच्छी मेहमाननवाजी की है. उसे 2 बार चाय नाश्ता करवाया है. यह भी कहा कि आशिया एक नेकदिल इंसान है. जितनी सुंदर दिखती है उस से भी अधिक सुंदर उस का मन है.
शमशाद जाने को तैयार हो गए. इस पर आशिया बोली, ‘‘थोड़ी देर और
ठहर जाइए न, खाना खा कर जाइएगा.’’
‘‘कोई लड़का तुम्हें पसंद आया?’’ अम्मी ने आशिया से पूछा.
‘‘हां अम्मी, आया न!’’ कहती हुई आशिया शरमाती हुई अंदर चली गई. शमशाद भी अगले हफ्ते आने को बोल कर चले गए.
आशिया अम्मी के साथ रात का खाना पकाने की तैयारी कर रही थी. आशिया ने कहा, ‘‘अम्मी, शमशाद बहुत अच्छे हैं.’’
‘‘अच्छे हैं तभी तो तुम्हारे लिए रिश्ता ढूंढने के लिए उन्हें कहा है.’’ अम्मी बोली.
‘‘लेकिन अम्मी, मुझे तो शमशाद ही पसंद हैं.’’ आशिया बोली.
‘‘क्या बकती हो तुम? कहां तुम्हारी कमसिन उम्र और कहां शमशाद की उम्र! हाय तौबा, क्या हो गया है तुम्हें.’’ अम्मी चौंकती हुई बोलीं.
‘‘कुछ नहीं अम्मी, मेरा उन पर दिल आ गया है. वह मुझे बहुत अच्छे लगे.’’
‘‘बहुत अच्छे लगने से क्या होता है. पूरी जिंदगी गुजारनी है उन के साथ. वह तुम से 40 साल से अधिक बड़े हैं.’’
‘‘बड़े हैं तो क्या हुआ. वह नेक इंसान हैं. नेक काम करते हैं. अच्छी आमदनी है. और क्या चाहिए. मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि वह मुझे बहुत खुश रखेंगे.’’ आशिया बोलती चली गई.
‘‘यह बात दोबारा मत बोलियो. अब्बू सुनेंगे तो गजब हो जाएगा. …और हां रिश्तेदार क्या कहेंगे हमारे बारे में.’’ अम्मी बिफरती हुई बोलीं.
2 हफ्ते तक शमशाद नहीं आए. आशिया चिंतित हो गई. उस से अधिक चिंता उस के अम्मीअब्बू को होने लगी. विवाह के नए कानून की वजह से उन की चिंता और बढ़ गई.
दरअसल, पाकिस्तान सरकार ने विवाह का नया कानून बनाया है. उस के मुताबिक लड़की की 18 की उम्र होते ही उस का निकाह करना जरूरी होगा.
ऐसा नहीं करने पर इस का जुरमाना उस के मातापिता या अभिभावक को भरना पड़ेगा.
कानून के मुताबिक मुसलिम पुरुषों और महिलाओं को 18 साल की उम्र के बाद शादी का अधिकार दिया गया है. इसे पूरा करना उन के अभिभावकों, विशेषकर उन के मातापिता की जिम्मेदारी है.
पाकिस्तान में यह कानून सिंध प्रांतीय विधानसभा के एक विधायक की पहल पर बनाया गया है. इस कानून से सरकार का मकसद सामाजिक बुराइयों, बच्चियों से बलात्कार और अनैतिक गतिविधियों को काबू में करना है. इस के अंतर्गत 18 साल की उम्र होने पर लोगों की शादी को अनिवार्य बनाने के प्रावधान किए गए हैं.
‘सिंध अनिवार्य विवाह अधिनियम, 2021’ में कहा गया है कि ऐसे वयस्कों के अभिभावकों जिन की 18 साल की उम्र के बाद भी शादी नहीं हुई हो, उन्हें जिले के उपायुक्त के समक्ष इस की देरी के उचित कारण के साथ एक शपथपत्र प्रस्तुत करना होगा. शपथपत्र प्रस्तुत करने में विफल रहने वाले अभिभावकों को 500 रुपए का जुरमाना देना होगा.
आशिया की उम्र 18 साल हो गई थी और उस के लिए कोई रिश्ता तय नहीं हो पाया था. जबकि आशिया रिश्ता तय करवाने वाले से ही निकाह की जिद लगाए बैठी थी.
आखिरकार उस के मातापिता को जिद माननी पड़ी. उन्होंने शमशाद को बुलवाया. शमशाद के आने पर उन से आशिया की बात बताई. शमशाद को भी आशिया पसंद थी. इसलिए उन्होंने देरी किए बगैर हामी भर दी. जल्द ही उन के निकाह की तारीख मुकर्रर कर दी गई. उस परिवार में ही नहीं, उन के इलाके में यह खबर आग की तरह फैल गई कि 18 साल की लड़की 61 साल के बुजुर्ग से शादी करने वाली है.
सभी मीडिया वाले सक्रिय हो गए. उन्होंने अपनेअपने स्तर से उन की शादी का कवरेज किया. निकाह के अगले रोज आशिया और शमशाद के इंटरव्यू के साथ खबर अखबारों और चैनलों में आ गई.
आशिया ने इंटरव्यू में कहा कि शमशाद इलाके में गरीब लड़कियों की शादी करवाते थे, मुझे यही आदत अच्छी लगी. दूसरी बात वह लड़की के हक की बात खुल कर करते हैं. एक यूट्यूबर ने उन की शादी पर अनोखा विवाह बना कर वीडियो अपलोड कर दिया.
शमशाद ने कहा कि वह खुद को काफी खुशनसीब मानते हैं कि इस उम्र में लाइफ पार्टनर मिला. वह बोले, आशिया मेरा बहुत ध्यान रखती हैं. आशिया ने कहा, शमशाद भी उन का खूब ध्यान रखते हैं. आशिया ने बताया, ‘उन्हें जिस चीज की भी जरूरत होती है, वह ला देते हैं. मेरे परिवार की भी मदद करते हैं.’
शमशाद बताते हैं कि वे इस बात के लिए शुक्रगुजार हैं कि उन्हें इस उम्र में 18 साल की आशिया से शादी करने का मौका मिला. उन्होंने बताया कि उन की शादी की बात सुन कर कई रिश्तेदारों ने मुंह बनाए. लोग वैसे भी जीने नहीं देते हैं. कोई न कोई रुकावट पैदा करने की कोशिश करते हैं. लोग उम्र के अंतर को ले कर असहज थे.
जब आशिया से इस इंटरव्यू के दौरान पूछा गया कि इतनी कम उम्र में बड़ी उम्र के शख्स से शादी करने की क्या जरूरत थी तो आशिया ने कहा, ‘‘रिश्तेदार तो अब भी कहते रहते हैं. लोग वैसे भी बात करने से पीछे नहीं हटते हैं. मैं जब भी मोहल्ले में जाती हूं तो लोग कहते हैं कि तुम ने उस में क्या देखा?’’
आशिया ने कहा कि वह लोगों को नहीं समझा सकती हैं. उन्हें इन बातों से फर्क नहीं पडता है. इस शादी से आशिया और शमशाद भले ही खुश हों, लेकिन हर लव स्टोरी की तरह समाज इस में भी दुश्मन बना हुआ है, जो उन्हें उम्र के फासले को ले कर ताने मारता रहता है लेकिन इश्क के इन परिंदों को इस की कोई परवाह नहीं है.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के आईटी चौराहे पर रैड सिग्नल होने से ट्रैफिक रुक गया. हमारी बाइक यानी मोटरसाइकिल के ठीक बगल में एक दूसरी बाइक आ कर रुकती है. नए जमाने के स्टाइल वाली बाइक पर एक लड़का अपने पीछे एक लड़की को बैठाए है. दोनों आपस में बात करते हैं. लड़का सम झाते हुए कहता है कि यह आईटी चौराहा है. दाहिनी तरफ आईटी कालेज है. लड़का आईटी चौराहे से कपूरथला की तरफ जाने वाला था. वहां कई रैस्तरां हैं. लड़की को ले कर उसे वहां जाना रहा होगा. यह अंदाजा लड़की को लग जाता है. शायद वह पहले कभी उधर गई होगी. वह लड़के के कान में कहती है, ‘उधर आज नहीं जाना. वहां भीड़ बहुत होती है. भीड़भाड़ वाली जगह हमें पसंद नहीं आती.’ वह कहता है, ‘कोई नहीं, आज सीतापुर रोड की तरफ चलते हैं. वहां अच्छी जगहें हैं.’
इसी बीच चौराहे का ट्रैफिक सिगनल ग्रीन हो जाता है. लड़का अपनी बाइक सीतापुर रोड की तरफ मोड़ देता है. दोनों को देख कर यह लग रहा था कि वे एकांत में कुछ समय गुजारना चाहते थे. ऐसे लोगों को प्यार करने वाला कपल कहा जाता है. जब प्यार की बात होती है तो ऐसे ही कपल की चर्चा सब से ज्यादा होती है. इन की दोस्ती, इन का प्यार छोटीछोटी वजहों से टूट जाता है. हर दोस्ती को प्यार की नजर से नहीं देखना चाहिए. हर कपल को प्यार करने वाला कपल नहीं माना जा सकता. यह जरूर है कि दोस्ती में सैक्स और प्यार दोनों आगे बढ़ जाते हैं. प्यार और सैक्स के बीच दूरी बनाए रखना जरूरी है. जहां यह दूरी नहीं होती वहां प्यार बदनाम हो जाता है. प्यार के ऐसे ही रास्ते से घर, परिवार और समाज को डर लगता है. यही डर पाबंदी का भी रूप ले लेता है.
प्यार के अलग फलसफे प्यार को ले कर दिल और समाज में अलगअलग फलसफे हैं. कहीं कहा जाता है कि ‘प्यार ही जिंदगी है’ तो कहीं कहा जाता है कि ‘प्यार सबकुछ नहीं जिंदगी के लिए.’ यह सच है कि प्यार से खूबसूरत चीज दूसरी दुनिया में नहीं है. प्यार उम्र, जाति और दूरी के बंधन को भी नहीं मानता है. आज जिस प्यार की बात हम करने जा रहे हैं वह ‘टीनएज लव’ या ‘युवावस्था में होने वाला प्यार’ है. यह प्यार उम्र के उस दौर में होता है जब सब से अधिक जरूरत युवाओं को अपने कैरियर पर ध्यान देने की होती है. ऐसे युवाओं को ही सम झाने के लिए कहा जाता है, ‘प्यार से भी जरूरी कई काम हैं, प्यार सबकुछ नहीं जिंदगी के लिए’. क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘किशोरावस्था में शरीर में हारमोनल चेंज आते हैं. ऐसे में लड़के और लड़कियों के बीच आपस में एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ता है. यह आकर्षण पहले दोस्ती, फिर प्यार, फिर शादी तक भी पहुंच जाता है.
समाज की नजरों से देखें तो इस को सफल प्यार कहा जाता है. जो प्यार शादी तक नहीं पहुंच पाता उस को असफल प्यार की श्रेणी में रख दिया जाता है. प्यार की कुछ कहानियां पहले आकर्षण के बाद खत्म हो जाती हैं. कुछ एकतरफा हो कर ही रह जाती हैं, कुछ दोस्ती से आगे नहीं बढ़ पातीं और कुछ तो शादी के बाद भी टूट जाती हैं.’’ अलगअलग है प्यार और सैक्स प्यार के अलगअलग दौर होते हैं. हर दौर की अपनी मुश्किलें होती हैं. प्यार का सब से अलग दौर वह होता है जब उस में सैक्स की चाहत पनप जाती है. असल में लड़कालड़की के बीच जो आकर्षण प्यार की तरह से दिखता है उस में सैक्स का अहम रोल होता है. प्यार और सैक्स के बीच में एक बहुत ही पतली विभाजन रेखा होती है. यह इतनी पतली होती है कि इस में अंतर कर पाना समाज और देखने वालों के लिए मुश्किल होता है.
समाज का एक बड़ा वर्ग प्यार को सैक्स का आकर्षण सम झता है. सैक्स को ले कर लड़कियों के व्यवहार के प्रति समाज का नजरिया बेहद संकीर्ण होता है. इस की वजह यह है कि समाज उन लड़कियों को सही नहीं मानता जो शादी से पहले सैक्स कर लेती हैं. शादी के पहले सैक्स के प्रति इसी सोच के कारण मातापिता और समाज प्यार करने वालों को सही नहीं मानते. उन के बीच दूरियां डालने का काम करते हैं. प्यार और सैक्स में घट रही दूरियों के कारण ही प्यार की चुनौतियां बढ़ रही हैं. समाज और परिवार का मानना होता है कि किशोरावस्था से ले कर युवावस्था तक का समय कैरियर बनाने व अपने भविष्य की मजबूत नींव रखने के लिए होता है. ऐसे में प्यार का होना उन को रास्ते से भटकाने का काम करता है, जिस से प्यार के चक्कर में पड़ कर लड़के हों या लड़कियां, अपने भविष्य से खिलवाड़ करते हैं. यहीं पर यह धारणा जन्म लेती है कि प्यार सबकुछ नहीं जिंदगी के लिए.
प्यार में नासम झी खतरनाक हमारे समाज में सब से गलत धारणा यह है कि प्यार पहली नजर में हो जाता है. प्यार अंधा होता है, प्यार सोचसम झ कर नहीं किया जाता और प्यार में अमीरीगरीबी नहीं देखी जाती. ये बातें किताबी होती हैं. प्यार जब वास्तविकता के धरातल पर उतरता है तो ये सारी बातें बेमानी हो जाती हैं. और तब जातिधर्म, अमीरीगरीबी, रूपरंग सभी कुछ माने रखने लगते हैं. पहली नजर के आकर्षण में होने वाले प्यार के समय मानसिक स्तर के तालमेल को भी महत्त्व नहीं दिया जाता है. जबकि, सचाई यह होती है कि जिन लोगों के विचार आपस में नहीं मिलते उन के बीच दूरियां बनी रहती हैं. वे प्यार, मोहब्बत और शादी के बंधन में भी तालमेल नहीं बना पाते हैं. जो युवा प्यार में नासम झी करते हैं वे कभी प्यार में सफल नहीं हो सकते. लखनऊ में घर से भाग कर शादी करने वाले लड़केलड़कियों के जिन मामलों में पुलिस में रिपोर्टें दर्ज हुईं, पुलिस ने कुछ लड़केलड़कियों को पकड़ कर कोर्ट में पेश किया, तो ज्यादातर लड़कियां कम उम्र की थीं. वे अपने पिता के घर जाने को तैयार नहीं थीं.
ऐसे में उन को ‘बालिका गृह’ भेजा गया. वहां जांच में पता चला कि आधे से अधिक लड़कियां गर्भवती निकलीं. प्यार में घर से विद्रोह कर लड़के के साथ भाग जाना और फिर गर्भवती होना प्यार के लिए बेहद खतरनाक हो जाता है. ऐसे मामलों में ही घरपरिवार और समाज का डर भी पैदा हो जाता है जो आपराधिक गतिविधियों को जन्म दे देता है. इस वजह से ऐसे कपल कई बार आत्महत्या करने जैसे आत्मघाती कदम उठा लेते हैं. कई बार समाज इन के प्रति हिंसक हो जाता है. प्यार में नासम झी भारी पड़ती है. सम झदारी और सू झबू झ से सफल होता है प्यार समाज में तमाम ऐसे उदाहरण भी हैं जो जातिधर्म या दूसरे बंधनों से अलग हो कर भी प्यार, शादी, परिवार और समाज के लिए उदाहरण या रोल मौडल माने जाते हैं. ऐसे लोगों के गुणों को देखें तो पता चलता है कि ये प्यार और सैक्स के बीच दूरी को बना कर रखने वाले थे. इन्होंने अपने कैरियर को प्राथमिकता दी.
जब आत्मनिर्भर हो गए तब शादी व सैक्स के फैसले किए. जिस के बाद इन के प्यार पर किसी भी तरह की उंगली न उठी. ऐसे ही प्यार में शादी करने वाली शबाना खंडेलवाल ने गैरधर्म में शादी की थी. शबाना कहती हैं, ‘‘हमारा प्यार जब आगे बढ़ा तब हम ने यह फैसला किया था कि जब हम अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे तभी शादी का फैसला लेंगे. यही हुआ. हम ने अलग रहने का फैसला भले ही लिया पर एकदूसरे के परिवार के सुखदुख में हिस्सा लेते रहे. दोनों ही परिवारों ने हमें स्वीकार किया.’’
शबाना आगे कहती हैं, ‘‘अगर हम ने केवल प्यार के युवा आकर्षण में पड़ कर ऐसा कदम उठाया होता तो हम सफल नहीं होते. प्यार का विरोध करने वाले यह सोचते हैं कि केवल आकर्षण में ऐसे कदम उठाने वालों में जिम्मेदारी का भाव नहीं होता है. इस कारण वे प्यार का विरोध करते हैं. जिन लोगों में जहां प्यार का आकर्षण और जिम्मेदारी का भाव दोनों होता है वहां पर प्यार के सफल होने के अवसर बढ़ जाते हैं. समाज ऐसे लोगों को स्वीकार कर लेता है.’’ डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘रिश्तों की सफलता व असफलता की तमाम वजहें होती हैं. ऐसे में प्यार में टूटने वालों को अपने जीवन से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए. जिंदगी की जो तमाम वजहें होती हैं, प्यार उन में से एक है.
प्यार सबकुछ नहीं जिंदगी के लिए, ऐसे में एक वजह के लिए पूरी जिंदगी को दांव पर लगाना उचित नहीं होता.’’ युवाओं से केवल घर व परिवार को ही नहीं, देश व समाज को भी उम्मीदें होती हैं. युवाशक्ति देश के विकास में अहम रोल अदा करती है. प्यार के लिए जिंदगी को दांव पर लगाना ठीक नहीं है. प्यार से भी जरूरी कई काम हैं.
कविता रुपए जोड़ती और वकील को भेज देती थी. आखिर पूरे 22 महीने बाद वकील ने कहा, ‘जमानतदार ले आओ, साहब ने जमानत के और्डर कर दिए हैं.’
फिर एक परेशानी. जमानतदार को खोजा, उसे रुपए दिए और जमानत करवाई, तो शाम हो गई. जेलर ने छोड़ने से मना कर दिया.
कविता सास के भरोसे बेटियां घर पर छोड़ आई थी, इसलिए लौट गई और राकेश से कहा कि वह आ जाए. सौ रुपए भी दे दिए थे.
रात कितनी लंबी है, सुबह नहीं हुई. सीताजी ने क्यों आत्महत्या की? वे क्यों जमीन में समा गईं? सीताजी की याद आई और फिर कविता न जाने क्याक्या सोचने लगी.
सुबह देर से नींद खुली. उठ कर जल्दी से तैयार हुई. बच्चियों को भी बता दिया था कि उन का बाप आने वाला है. राकेश की पसंद का खाना पकाने के लिए मैं जब बाजार गई, तो बाबाजी का भाषण चल रहा था. कानों में वही पुरानी कहानी सुनाई दे रही थी. उस ने कुछ पकवान लिए और टोले पर लौट आई.
दोपहर तक खाना तैयार कर लिया और कानों में आवाज आई, ‘राकेश आ गया.’
कविता दौड़ते हुए राकेश से मिलने पहुंची. दोनों बेटियों को उस ने गोद में उठा लिया और अपने घर आने के बजाय वह उस के भाई और अम्मां के घर की ओर मुड़ गया.
कविता तो हैरान सी खड़ी रह गई, आखिर इसे हो क्या गया है? पूरे
22 महीने बाद आया और घर छोड़ कर अपनी अम्मां के पास चला गया.
कविता भी वहां चली गई, तो उस की सास ने कुछ नाराजगी से कहा, ‘‘तू कैसे आई? तेरा मरद तेरी परीक्षा लेगा. ऐसा वह कह रहा है, सास ने कहा, तो कविता को लगा कि पूरी धरती, आसमान घूम रहा है. उस ने अपने पति राकेश पर नजर डाली, तो उस ने कहा, ‘‘तू पवित्तर है न, तो क्या सोच रही है?’’
‘‘तू ऐसा क्यों बोल रहा है…’’ कविता ने कहा. उस ने बेशर्मी से हंसते हुए कहा, ‘‘पूरे 22 महीने बाद मैं आया हूं, तू बराबर रुपए ले कर वकील को, पुलिस को देती रही, इतना रुपया लाई कहां से?’’
कविता के दिल ने चाहा कि एक पत्थर उठा कर उस के मुंह पर मार दे. कैसे भूखेप्यासे रह कर बच्चियों को जिंदा रखा, खर्चा दिया और यह उस से परीक्षा लेने की बात कह रहा है.
उस समाज में परीक्षा के लिए नहाधो कर आधा किलो की लोहे की कुल्हाड़ी को लाल गरम कर के पीपल के सात पत्तों पर रख कर 11 कदम चलना होता है.
अगर हाथ में छाले आ गए, तो समझो कि औरत ने गलत काम किया था, उस का दंड भुगतना होगा और अगर कुछ नहीं हुआ, तो वह पवित्तर है. उस का घरवाला उसे भोग सकता है और बच्चे पैदा कर सकता है.
राकेश के सवाल पर कि वह इतना रुपया कहां से
लाई, उसे सबकुछ बताया. अम्मांबापू ने दिया, उधार लिया, खिलौने बेचे, लेकिन वह तो सुन कर भी टस से मस नहीं हुआ.
‘‘तू जब गलत नहीं है, तो तुझे क्या परेशानी है? इस के बाप ने मेरी 5 बार परीक्षा ली थी. जब यह पेट में था, तब भी,’’ सास ने कहा.
कविता उदास मन लिए अपने झोंपड़े में आ गई. खाना पड़ा रह गया. भूख बिलकुल मर गई.
दोपहर उतरतेउतरते कविता ने खबर भिजवा दी कि वह परीक्षा देने को तैयार है. शाम को नहाधो कर पिप्पली देवी की पूजा हुई. टोले वाले इकट्ठा हो गए. कुल्हाड़ी को उपलों में गरम किया जाने लगा.
शाम हो रही थी. आसमान नारंगी हो रहा था. राकेश अपनी अम्मां के साथ बैठा था. मुखियाजी आ गए और औरतें भी जमा हो गईं.
हाथ पर पीपल के पत्ते को कच्चे सूत के साथ बांधा और संड़ासी से पकड़ कर कुल्हाड़ी को उठा कर कविता के हाथों पर रख दिया. पीपल के नरम पत्ते चर्रचर्र कर उठे. औरतों ने देवी गीत गाने शुरू कर दिए और वह गिन कर 11 कदम चली और एक सूखे घास के ढेर पर उस कुल्हाड़ी को फेंक दिया. एकदम आग लग गई.
मुखियाजी ने कच्चे सूत को पत्तों से हटाया और दोनों हथेलियों को देखा. वे एकदम सामान्य थीं. हलकी सी जलन भर पड़ रही थी.
मुखियाजी ने घोषणा कर दी कि यह पवित्र है. औरतों ने मंगलगीत गाए और राकेश कविता के साथ झोंपड़े में चला आया. रात हो चुकी थी. कविता ने बिछौना बिछाया और तकिया लगाया, तो उसे न जाने क्यों ऐसा लगा कि बरसों से जो मन में सवाल उमड़ रहा था कि सीताजी जमीन में क्यों समा गईं, उस का जवाब मिल गया हो. सीताजी ने जमीन में समाने को केवल इसलिए चुना था कि वे अपने घरवाले राम का आत्मग्लानि से भरा चेहरा नहीं देखना चाहती होंगी.
राकेश जमीन पर बिछाए बिछौने पर लेट गया. पास में दीया जल रहा था. कविता जानती थी कि 22 महीनों के बाद आया मर्द घरवाली से क्या चाहता होगा?
राकेश पास आया और फूंक मार कर दीपक बुझाने लगा. अचानक ही कविता ने कहा, ‘‘दीया मत बुझाओ.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘मैं तेरा चेहरा देखना चाहती हूं.’’
‘‘क्यों? क्या मैं बहुत अच्छा लग रहा हूं?’’
‘‘नहीं.’’
‘‘तो फिर?’’
‘‘तुझे जो बिरादरी में नीचा देखना पड़ा, तू जो हार गया, वह चेहरा देखना चाहती हूं. मैं सीताजी नहीं हूं, लेकिन तेरा घमंड से टूटा चेहरा देखने की बड़ी इच्छा है.’’
उस की बात सुन कर राकेश भौंचक्का रह गया. कविता ने खुद को संभाला और दोबारा कहा, ‘‘शुक्र मना कि मैं ने बिरादरी में तेरी परीक्षा लेने की बात नहीं कही, लेकिन सुन ले कि अब तू कल परीक्षा देगा, तब मैं तेरे साथ सोऊंगी, समझा,’’ उस ने बहुत ही गुस्से में कहा.
‘‘क्या बक रही है?’’
‘‘सच कह रही हूं. नए जमाने में सब बदल गया है. पूरे 22 महीनों तक मैं ईमानदारी से परेशान हुई थी, इंतजार किया था.’’
राकेश फटी आंखों से उसे देख रहा था, क्योंकि उन की बिरादरी में मर्द की भी परीक्षा लेने का नियम था और वह अपने पति का मलिन, घबराया, पीड़ा से भरा चेहरा देख कर खुश थी, बहुत खुश. आज शायद सीता जीत गई थी.
फिर अपने स्वर को धीमा करते हुए वह बोलीं, ‘‘आनंदजी आए थे और 90 हजार रुपए दे गए हैं. मैं ने उन्हें तेरी अलमारी में रख दिया है.’’
बेटे से बात करते समय सावित्री को लगा कि ड्राइंगरूम का फोन किसी ने उठा रखा है. उन्होंने खिड़की के परदे से झांक कर देखा तो उन का शक सही निकला. फोन आशा ने उठा रखा था और इशारे से वह अवतारी को कुछ कह रही थी. सावित्री देवी तब और स्तब्ध रह गईं. जब उन्होंने अवतारी के पास मोबाइल फोन देखा, जिस से वह किसी को कुछ कह रही थी.
एसी से ठंडे हुए कमरे में भी सावित्री को पसीने आ गए. उन्होंने जल्दीजल्दी बेटे को दोबारा फोन मिलाया. उधर से हैलो की आवाज सुनते ही वह कुछ बोलतीं, इस से पहले ही अपनी कनपटी पर लगी पिस्तौल का एहसास उन की रूह कंपा गया. आशा ने लपक कर फोन काट दिया था.
दुर्गा मां का अवतार लगने वाली अवतारी अब सावित्री को साक्षात यमराज की दूत दिखाई दे रही थी.
‘‘बुढि़या, ज्यादा होशियारी दिखाई तो पिस्तौल की सारी गोलियां तेरे सिर में उतार दूंगी. चल, अपने बेटे को वापस फोन लगा कर बोल कि तू किसी और को फोन कर रही थी, गलती से उस का नंबर लग गया वरना उस का फोन आ जाएगा.’’
सावित्री कुछ कहतीं इस से पहले ही बेटे का फोन आ गया.
‘‘क्या बात है, अम्मां? फोन कैसे किया था?’’
‘‘काट क्यों दिया…’’ सावित्री देवी मिमियाईं, ‘‘मैं तुम्हारी नीरजा बूआ से बात करना चाह रही थी लेकिन गलती से तेरा नंबर मिल गया.’’
‘‘मुझे तो चिंता हो गई थी. सब ठीक तो है न?’’
‘‘हांहां, सब ठीक है,’’ कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया.
अवतारी गुर्राई, ‘‘बुढि़या, झटपट सभी अलमारियों की चाबी पकड़ा दे. जेवर व कैश कहांकहां रखा है बता दे. मैं ने कई खून किए हैं. तुझे भी तेरी दुर्गा मां के पास पहुंचाते हुए मुझे देर नहीं लगेगी.’’
उसी समय उन के 2 साथी युवक भी आ धमके. सावित्री को उन लड़कों की शक्ल कुछ जानीपहचानी लगी.
तभी एक युवक गुर्राकर बोला, ‘‘ए… घूरघूर कर क्या देख रही है बुढि़या? तेरे चक्कर में मैं ने भी तेरी देवी मां के मंदिर में खूब चक्कर लगाए. तू जो अपनी नौकरानी के साथ घंटों मंदिर में बैठ कर बतियाती रहती थी तब तेरे बारे में जानकारी हासिल करने के लिए हम दोनों भी वहीं तेरे आसपास मंडराते रहते थे. तेरी बड़ी गाड़ी देख कर ही हम समझ गए थे कि तू हमारे काम की मोटी आसामी है और हमारे इस विश्वास को तू ने मंदिर के बाहर हट्टेकट्टे भिखारियों को भीख में हर रोज सैकड़ों रुपए दान दे कर और भी पुख्ता कर दिया.’’
सावित्री के बताने पर आननफानन में उन्होंने घर में रखे सारे जेवरात व नकदी समेट लिए. तभी अवतारी जोर से खिलखिलाई, ‘‘बुढि़या, मैं आज तक किसी मंदिर में नहीं गई फिर भी तेरी देवी मां ने तेरी जगह मुझ पर कृपा कर दी. तेरी नौकरानी रमिया के बारे में पता चला कि वह तेरे यहां 20 साल से काम कर रही है. बड़ी नमकहलाल औरत है. उस को भरोसे में ले कर तो तुझे लूट नहीं सकते थे. इसीलिए तुम्हारी धार्मिक अंधता को भुनाने की सोची.
‘‘सच कहती हूं तुम्हारे जैसी धर्म में डूबी भारतीय नारियों की वजह से ही हम जैसे लोगों का धंधा जिंदा है. रमिया के बेटेबहू को भी पिस्तौल की नोक पर मेरे ही साथियों ने कई बार धमकाया था और रमिया समझी कि मां की कृपा से उस के बेटेबहू सुधर गए. कल रात को रास्ते में मैं ने रमिया को जमालघोटा डला प्रसाद दिया था ताकि वह आज काम पर न आ सके.’’
‘‘फालतू समय खराब मत करो,’’ एक युवक चिल्लाया, ‘‘अब इस बुढि़या का काम तमाम कर दो.’’
घबराहट से सावित्री के सीने में जोर का दर्द उठा और वह अपनी छाती पकड़ कर जमीन पर लुढ़क गईं.
पसीने से तरबतर सावित्री को देख अवतारी चहकी, ‘‘इसे मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी. लगता है इसे दिल का दौरा पड़ा है. तुरंत भाग चलो.’’
उधर फैक्टरी में अपनी आवश्यक मीटिंग खत्म होने के बाद मनोज ने दोबारा घर फोन किया.
फोन की घंटी लगातार बज रही थी. जवाब न मिलने पर चिंतित मनोज ने पड़ोसी शर्माजी के घर फोन कर के अम्मां के बारे में पता करने को कहा.
पड़ोसिन अपनी बेटी के साथ जब उन के घर पहुंची तो घर के दरवाजे खुले थे और अम्मांजी जमीन पर बेसुध गिरी पड़ी थीं. यह देख कर वह घबरा गई. डरतेडरते वह अम्मांजी के पास पहुंची और देखा तो उन की सांस धीमेधीमे चल रही थी. उन्होंने तुरंत मनोज को फोन किया.
सावित्री को जबरदस्त हृदयाघात हुआ था. उन्हें आई.सी.यू. में भरती कराया गया. गैराज में खड़ी दूसरी गाड़ी गायब थी. 2 दिन बाद उन को होश आया. बेटे को देखते ही उन की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी. बेटे ने उन के सिर पर तसल्ली भरा हाथ रखा. सावित्री को पेसमेकर लगाया गया था. धीरेधीरे उन की हालत में सुधार हो रहा था.
रमिया व उन के बयान से पता चला कि लुटेरों के गिरोह ने योजना बना कर कई दिन तक सारी बातें मालूम कर के ही उन की धार्मिकता को भुनाते हुए अपनी लूट की योजना को अंजाम दिया और लाखों रुपए के जेवरात व नकदी लूट ले गए.
उन की कार शहर के एक चौराहे पर लावारिस खड़ी मिली थी लेकिन लुटेरों का कहीं पता न चला.
दहशत व ग्लानि से भरी सावित्री को आज अपने पति की रहरह कर याद आ रही थी जो हरदम उन्हें तथाकथित साधुओं और उन के चमत्कारों से सावधान रहने को कहते थे. वह सोच रही थीं, ‘सच ही तो कहते थे मनोज के पिताजी कि अंधभक्ति का यह चक्कर किसी दिन उन की जान को सांसत में डाल देगा. अगर पड़ोसिन समय पर आ कर उन की जान न बचाती तो…और अगर वे लुटेरे उन्हें गोली मार देते तो?’
दहशत से उन के सारे शरीर में झुरझुरी आ गई. आगे से वह न तो किसी मंदिर में जाएंगी और न ही किसी देवी मां का पूजापाठ करेंगी.
29 साला छाया पिछले कुछ दिनों से अपने पति के बरताव में आए बदलाव को देख कर बहुत फिक्रमंद थी. गौरव देर रात घर लौटने लगा था और कभीकभी तो सुबह हो जाती थी.
पूछने पर गौरव बहाना बना कर टाल जाता था कि दोस्तों के संग गप मार रहा था. कमानेखाने की कोई खास चिंता उसे थी नहीं, क्योंकि घर में 8 भैंसें बंधी थीं, जिन के दूध से अच्छीखासी आमदनी हो जाती थी. 5 बीघा पुश्तैनी जमीन से भी ठीकठाक पैसा आ जाता था.
पिछले साल ससुर की मौत के बाद से गौरव घर से बाहर ज्यादा रहने लगा था, लेकिन छाया की असल चिंता की वजह यह थी कि गौरव कुछ दिनों से सैक्स में नईनई पोजीशन ट्राई करने लगा था, जबकि इस से पहले सैक्स का उस का अपना रूटीन था, जिस में प्रयोग न के बराबर होते थे. छाया को संतुष्टि मिली या नहीं, इस से उसे कोई सरोकार नहीं रहता था. अपना काम होते ही वह सो जाता था, जिस से छाया को कोफ्त होती थी.
पर, अब गौरव को सैक्स का इतना ज्यादा सरोकार रहने लगा था कि वह बारबार छाया से पूछता था कि कैसा लग रहा है? मजा आया या नहीं? ऐसा करने में ज्यादा मजा आता है या वैसा करने में. तू हमबिस्तरी के दौरान चुप क्यों रहती है? कितनी देर और टिकेगी या अभी क्या पोजीशन है, बताती क्यों नहीं? ऐसी बातें उस ने शादी के 5 साल बाद कभी नहीं की थीं.
हद तो उस दिन हो गई, जब गौरव ने थोड़ी देर के फोरप्ले के बाद छाया से कहा, ‘‘चल, आज ओरल सैक्स करते हैं.’’
इस के पहले भी गौरव कई दफा अपने मोबाइल फोन पर ओरल सैक्स वाली पोर्न फिल्में छाया को दिखा चुका था, जिन में थोड़ी देर तो उसे मजा आता था, लेकिन फिर उबकाई सी आने लगती थी कि भला यह भी कोई तरीका है मजा लेने का.
हमेशा की तरह छाया ने आज भी ओरल सैक्स करने से इनकार कर दिया, तो गौरव को थोड़ा गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘तू कौन से जमाने की औरत है… यह देख…’’ कहते हुए उस ने एक और ब्लू फिल्म उसे दिखाई, जिस में दूसरे तरीकों से वही सबकुछ था, जो पहले ही कई फिल्मों में वह देख चुकी थी या गौरव उसे जबरन दिखा चुका था.
कोई असर न होता न देख गौरव बोला, ‘‘प्लीज कर के तो देख. बहुत मजा आता है इस में.’’
इस पर छाया हमेशा की तरह खामोश रही, तो थोड़े ताव में आ कर गौरव बोला, ‘‘तू क्या जाने अदरक का स्वाद… तू न दे, लेकिन आज मैं तुझे वह मजा देता हूं, जिस के लिए तू मुझे शादी के बाद से ही तरसा रही है…’’
यह कहते हुए गौरव ने अपना सिर छाया की जांघों में घुसा दिया. यह छाया के लिए नया अनुभव था, जिस में उसे सचमुच मजा आ रहा था.
कुछ देर बाद गौरव बोला, ‘‘चल, अब तू भी कर…’’
पर छाया की हिम्मत नहीं पड़ी, क्योंकि उस के हिसाब से यह गंदा काम था, लिहाजा उस ने मना कर दिया.
इस बार गौरव आपा खो बैठा और बोला, ‘‘तो ठीक है, मैं चला…’’
इस के बाद उसी गुस्से में गौरव कपड़े पहन कर जो गया तो दूसरे दिन दोपहर को ही लौटा. सुबह उठ कर छाया उसे फोन लगाती रही, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच औफ ही मिला.
‘‘कहां गए थे? रातभर फोन भी बंद था,’’ जैसे ही छाया ने यह पूछा, तो गुस्से से फटते हुए गौरव ने जवाब दिया, ‘‘गया था नजमा के पास, जो बिलकुल नखरे नहीं करती और 500 रुपए में वह सब कर देती है, जिस के लिए तुम्हें नखरे आते हैं…’’
इतना सुनना था कि छाया के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई और फिर उसे समझ आया कि सैक्स की यह तालीम नजमा उसे दे रही थी, जिसे वह उस पर आजमा रहा था.
क्यों जाते हैं धंधे वाली के पास
छाया के जी में तो आया कि गौरव को सबक सिखाने के लिए वह कुछ दिन मायके चली जाए, लेकिन फिर यह सोच कर रुक गई कि ऐसे तो गौरव के हौसले और बुलंद होंगे और कहीं वह लोकलाज छोड़ कर उस कलमुंही नजमा को घर ही न ले आए.
छाया, गौरव और नजमा की इस सच्ची कहानी, जिस में तीनों के नाम बदल दिए गए हैं, के आखिर में क्या हुआ, उस के पहले यह जानना जरूरी है कि गौरव जैसे मर्द धंधे वालियों के यहां किन वजहों से जाते हैं.
गौरव के मुताबिक, ‘‘मुझ जैसे पति नजमा जैसियों के पास इसलिए जाते हैं कि पत्नी मनमाफिक तरीकों से सैक्स करने के लिए राजी नहीं होती और न ही साथ देती, जिस से सैक्स लाइफ मुरदा होती जाती है.
‘‘और भी जो लोग नजमा जैसियों के पास जाते हैं, उन में से किसी की अपनी बीवी से पटरी नहीं बैठ रही होती है, तो किसी की बीवी का चक्कर कहीं और चल रहा होता है या कोई दिनरात कलह ही करती रहती है.
‘‘इस तरह के गम भुलाने के लिए धंधे वालियां मुफीद हैं, जो न केवल मनचाहे ढंग से जिस्मानी सुख देती हैं, बल्कि प्यार से तरहतरह की बातें करते हुए यह समझाती भी हैं कि ‘हम तो पैदा इसी नरक में हुई हैं, जो तुम्हें 2-4 घंटे के लिए जन्नत लगता है. यहां चंद नोटों का पैकेज ले कर मनमुताबिक मौज करो और घर वापस चले जाओ, क्योंकि वही तुम्हारा असल ठिकाना और सहारा है.
‘‘एक रात की दुलहन जिंदगीभर की बीवी कभी नहीं बन सकती. नशे में हर ग्राहक हमें बीवी बनाने की बात करता है, लेकिन जब सुबह नशा उतरता है और सैक्स से जी भर चुका होता है, तब कपड़े लपेट कर सीधे बीवी के पल्लू में छिपने के लिए चला जाता है, जो उस का लाइफटाइम सहारा होती है.’’
छाया की मानें तो, ‘‘इन धंधे वालियों का तो कोई घर या ईमानधरम होता नहीं, बस हमारे सीधेसादे मर्दों को फांस कर ये अपना उल्लू सीधा करती हैं और जब वे जेब और सेहत से खोखले हो जाते हैं, तो तीमारदारी और मरने के लिए हमारे पल्ले छोड़ देती हैं. एड्स और दूसरी जानलेवा बीमारियां फैलाने वाली इस गंदगी को दूर करने के लिए सरकार भी कुछ नहीं कर पाती है.
‘‘ये क्या जानें कि सुहाग, घरगृहस्थी और बच्चे समेत नातेरिश्तेदारी की अहमियत क्या होती है. मर्द की तो फितरत ही सांड़ जैसी होती है कि जहां हरा चारा दिखेगा, वहां मुंह जरूर मारेगा और इन लोगों का तो कारोबार ही मुंह से चलता है, जिस के लिए मर्द बेचैन रहते हैं.
‘‘इन्होंने मर्द की कमजोर नस होंठों में दबा रखी है. उस से और ज्यादा पैसा बने, इस के लिए ये किसी का बसाबसाया घर उजाड़ने में भी रहम नहीं खाती हैं, उलटे मर्दों को हमारे खिलाफ भड़काती हैं, उन्हें और बिगाड़ती हैं, शराब पिलाती हैं, दूसरी तरह का तमाम नशा भी मुहैया कराती हैं. इन में तो कीड़े पड़ेंगे कीड़े.’’
नजमा कुछ और ही कहती है, ‘‘हम तो सदियों और पीढि़यों से देह बेचते हुए यही इलजाम झेल रहे हैं, लेकिन कोई हमारे पास आता है तो उसे एक सुख चाहिए रहता है, जो कीमत अदा कर के वह लेता है और चलता बनता है. अच्छा लगता है, तो वह कई बार भी आता है. इस में हमारा क्या कुसूर? क्या हम अपना पेट भी न भरें?
‘‘कुछ दिनों पहले ठाकुर बिरादरी का एक खूबसूरत नौजवान आया था.
रात गुजारी तो लगा कि शादीशुदा होते हुए भी इसे सैक्स का रत्तीभर भी अनुभव नहीं है.
‘‘इस बाबत पूछा, तो उस का गला रुंध गया, आंखें भर आईं. उस की कहानी वाकई दिल को छू लेने वाली थी कि बाप ने तगड़े दहेज के लालच में शादी ऐसी लड़की से करवा दी थी,
जो दरअसल में न लड़की थी और न ही लड़का.
‘‘घर और रसूखदार ससुराल की इज्जत और डर के चलते वह नौजवान चुप रहा. एकाध बार उस ने खुदकुशी करने की भी कोशिश की, लेकिन बच गया. फिर एक दिन उस का एक दोस्त सैक्स सुख के लिए मेरे पास छोड़ गया.
‘‘एक रात का सौदा 5,000 रुपए में तय हुआ, जो मेरी हफ्तेभर की कमाई के बराबर था. वह वापस गया तो बहुत खुश था. अब जब भी वह यहां आता है, तो महंगे तोहफे भी लाता है. कहता है कि उस ने बीवी को बता दिया है, जिसे इस पर कोई एतराज नहीं.
‘‘मैं ने क्या गुनाह किया… गौरव जैसे चाहता था, वैसे उसे सैक्स सुख दिया. अगर पत्नी उसे सैक्स सुख नहीं देती तो इस में मेरा क्या कुसूर. हम कोई पीले चावल ले कर नहीं गए थे उसे बुलाने के लिए.
‘‘छाया जैसी औरतों को देख कर तो हमें अपनी मौसी की यह नसीहत याद आ जाती है कि बीवी को बिस्तर में वेश्या होना चाहिए. पति जैसे चाहे वैसे सैक्स करे. इस से न केवल गृहस्थी बची रहेगी, बल्कि दोनों के बीच प्यार भी बढ़ेगा.
‘‘पत्नियों को चाहिए कि वे पति से लड़ाईझगड़ा और कलह न करें, नहीं तो वे हमारे पास भागेंगे ही, क्योंकि हमारे पास बनावटी और दिखावटी ही सही, प्यार तो है. उन के पास तो यह भी नहीं रहता.
‘‘कई लोग इसलिए हम धंधे वालियों के पास आते हैं, क्योंकि उन की पत्नी का कोई पहले का या शादी के बाद का प्रेमी लाइफ में ऐंट्री मार चुका होता है और पत्नी इन्हें हाथ नहीं रखने देती. हमें ऐसे लोगों से हमदर्दी तो रहती है, लेकिन यह समस्या हम हल नहीं कर सकते, बस सलाह दे सकते हैं कि जब बरदाश्त की हदें टूट जाएं, तो तलाक के लिए कोर्ट चले जाओ.
‘‘अगर तलाक हो जाए, तो कोई अच्छी सी लड़की देख कर दूसरी शादी कर लो, जब तक हमारे तमाम दरवाजे खुले हैं तुम्हारे लिए.
‘‘रही बात गौरव की, तो उसी ने बताया कि छाया अब उस की पसंद का सैक्स करने के लिए राजी हो गई है. हालांकि एक रैगुलर ग्राहक के जाने का दुख जरूर हुआ, लेकिन अच्छा भी लगा कि दोनों अलग होने से बच गए.’’
नजमा धंधे वाली ही सही, लेकिन कह तुक की बातें रही है कि पति के मुताबिक सैक्स करो तो वे क्यों उन के पास जाएंगे, जहां सुख तो केवल एक है, लेकिन खतरे कई हैं. मसलन, पुलिस और गुंडों का, कंडोम न लगाओ तो बीमारियों का और पैसों का, जो यहां नहीं लुटाए जाते, तो घरगृहस्थी के काम आते.
अब चंद्रवती अपना ज्यादा समय लखनऊ में ही बिताने लगी थी. उसे लल्लू की अब कोई चिंता नहीं थी. लल्लू भी इस बात को अच्छी तरह से समझ चुका था कि चिडि़या अब उस के हाथ से निकल चुकी है.
भूरेलाल राजनीति का तो मंजा हुआ खिलाड़ी था ही, इश्कमिजाजी का भी वह शौकीन था. वह जानता था कि चंद्रवती उस के जाल में फंस चुकी है. उस ने खादी के विदेशों में प्रचारप्रसार के लिए यूरोपीय देशों का 20 दिन का टूर बनाया और चंद्रवती का नाम भी टूर में जाने वाले लोगों की लिस्ट में शामिल था. लल्लू के विरोध के बावजूद चंद्रवती भूरेलाल के साथ टूर पर गई.
चंद्रवती को लगता था कि भूरेलाल ही वह सहारा और सीढ़ी है, जो उसे उस की मंजिल तक पहुंचाएगा. यूरोप के 20 दिन के टूर में चंद्रवती ने अपना सबकुछ भूरेलाल को सौंप दिया.इधर लल्लू इतना दुखी हो चुका था कि चंद्रवती से तलाक लेने के अलावा उसे और कोई रास्ता न सूझता था. उस ने तलाकनामा के लिए वकील से कागजात तैयार करा लिए. चंद्रवती इस के लिए खुशी से तैयार थी. न अब उसे गांव पसंद था और न लल्लू ही.
चंद्रवती भूरेलाल के जरीए और मंत्रियों से मिली. अब उस की पौबाहर थी. सुबह से शाम तक न जाने कितने लोग उसे सैल्यूट मारते. एक फोन पर वह मंत्रियों और अफसरों से लोगों के काम करवाती. ऐसा लगता, जैसे चंद्रवती प्रदेश में अलग सरकार चला रही हो.
लेकिन राजनीति में किस का सूरज कब उग जाए और कब डूब जाए, कौन कह सकता है. चंद्रवती की हनक देख कई लोग उस के विरोधी हो गए. वे चंद्रवती को फंसाने की ताक में लग गए. मीडिया भी उस की हनक से हैरान था.
एक दिन चंद्रवती और भूरेलाल की जरा सी लापरवाही से उन के अंतरंग संबंधों की तसवीरें विरोधियों के हाथ पड़ गईं. फिर मीडिया तक जाने में इसे कितनी देर लगती.
अगले ही दिन 2 काम हो गए. खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष पद से चंद्रवती को बरखास्त कर दिया गया. कहां तो वह विधायक बनने का सपना देख रही थी, प्रदेश अध्यक्ष ने उस की पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ही रद्द कर दी. मंत्रियों, नेताओं और अफसरों ने उस का मोबाइल नंबर तक अपने मोबाइलों से निकाल दिया.
भूरेलाल के मंत्री पद पर बन आई, तो उस ने चंद्रवती से अपने संबंधों को विरोधियों की साजिश और मीडिया के गंदे मन की उपज बताया. उस ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया कि वह चंद्रवती को केवल एक पार्टी कार्यकर्ता के रूप में जानता है, उस से ज्यादा उस का चंद्रवती से कोई लेनादेना नहीं है.
चंद्रवती ने इतने दिनों में जो बेनामी दौलत कमाई थी, उस से उस ने लखनऊ में एक बंगला तो खरीद ही लिया था. लेकिन राजनीतिक रुतबा खत्म होते ही उस की सारी शानोशौकत पर रोक लग गई. अब उस का दरबार सूना हो चुका था.
जल्दी ही चंद्रवती को अर्श से फर्श पर गिरने का एहसास हो गया. इस बेकद्री और अकेलेपन के चलते वह तनाव की शिकार हो गई. नींद की गोलियां उस का सहारा बनीं.
भूरेलाल उस के फोन को उठाता तक न था. तब एक दिन उस से मिलने वह उस के दफ्तर पहुंच गई. अर्दली ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन वह ‘मैडम’ ही कहता रह गया और वह उस के दफ्तर में पहुंच गई. उस के वहां पहुंचते ही भूरेलाल उस पर बिफर पड़ा, ‘‘तेरी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?’’
‘‘भूरेलाल, मैं ने तुझ पर अपना सबकुछ लुटा दिया और अब कहता है कि मेरी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?’’
‘‘बकवास बंद कर. जो औरत अपने आदमी को छोड़ कर दूसरों के साथ हमबिस्तर हो, वह किसी की नहीं होती.’’
‘‘और जो मर्द अपनी औरत को छोड़ दूसरी औरतों के साथ गुलछर्रे उड़ाए, वह किस का होता है?’’
‘‘दो कौड़ी की औरत… जबान लड़ाती है… गार्ड, बाहर निकालो इसे.’’
इस से पहले कि गार्ड चंद्रवती को बाहर निकालता, चंद्रवती ने पैर में से चप्पल निकाली और भूरेलाल के सिर पर दे मारी.भूरेलाल के गाल पर इतनी चप्पलें पड़ीं कि उस का चेहरा लाल हो गया. उस का कान और होंठ फट गया. नाक से भी खून बहने लगा. जब तक गार्ड और दूसरे लोग चंद्रवती को रोकते, भूरेलाल की काफी फजीहत हो चुकी थी.
भूरेलाल ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की ऐयाशी का नतीजा इतना खतरनाक होगा. मामले को दबाए रखने के लिए पुलिस को कोई सूचना नहीं दी गई.
कुछ दिन बाद खबर आई कि चंद्रवती की उस के घर पर ही मौत हो गई. पोस्टमार्टम के लिए लाश भेजी गई, लेकिन उस की मौत में नींद की दवाओं का ज्यादा सेवन करना बताया गया.
जब चंद्रवती का दाह संस्कार किया जा रहा था, तब लल्लू को उस की लाश से अरमानों का धुआं उड़ता नजर आ रहा था.
चंद्रवती पढ़ीलिखी थी, अफसरों से बात करना ठीक से जानती थी, ग्राम प्रधान के अपने हकों को भी वह अच्छी तरह समझती थी. धीरेधीरे ग्राम प्रधानी का कामकाज उस के हाथों में आने लगा और लल्लू किनारे लगने लगा.
अब चंद्रवती पराए मर्दों से शरमाती न थी. उसे कहीं अकेले जाना पड़ता, तो वह लल्लू की बाट न जोहती थी. किसी को चंद्रवती से मिलना होता, तो वह उस से सीधा मिलता. लल्लू सिर्फ दरबारी बन कर रह गया था, सिंहासन पर चंद्रवती बैठी थी.
प्रधानों के संघ में चंद्रवती जितनी खूबसूरत और पढ़ीलिखी कम ही औरतें थीं, इसलिए प्रधान संघ का सचिव पद पाने में वह कामयाब हो गई. चंद्रवती के अरमान अब आसमान छूने लगे थे. वह मर्दों को दुनिया में मुकाम हासिल करने के गुर सीखने लगी. लंगोट के कच्चे मर्द को एक ही मुसकान से कैसे पस्त किया जा सकता है, यह वह अच्छी तरह जान गई थी.
अब चंद्रवती हमेशा बड़े नेताओं और अफसरों से मेलजोल बढ़ाने के मौके तलाशने लगी. यह वह सीढ़ी थी, जिस पर चढ़ कर वह अपनी इच्छाओं के आसमान पर पहुंच सकती थी.
एक बार प्रदेश सरकार का मंत्री भूरेलाल जिले के दौरे पर आया, तो उस की पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उस का दौरा मालिनपुर में ही लगा दिया.चंद्रवती अपने दबदबे से मालिनपुर में तरक्की के अनेक काम करवा चुकी थी. जिसे देखने के लिए मंत्री को ग्राम प्रधान से मिलने की इच्छा और बढ़ गई.
चंद्रवती ने पहले से ही मंत्री के लिए नाश्ते का इंतजाम घर पर ही कर रखा था. भूरेलाल का स्वागत करने के लिए चंद्रवती सजीधजी दरवाजे पर ही खड़ी थी. वह खूबसूरती के भूखे इन मर्दों को अच्छी तरह से जानती थी.
चंद्रवती के रूप को देख कर भूरेलाल की आंखें चौंधिया गईं. चंद्रवती ने बैठक को भी ऐसा सजाया था कि भूरेलाल देखता ही रह गया. जब चंद्रवती भूरेलाल के सामने बैठी, तो वह गांव की तरक्की के काम की बात भूल कर उस की खूबसूरती को देखने में मगन हो गया.
जब चंद्रवती ने अपने सुकोमल हाथों और एक मोहन मुसकान से उसे चाय की प्याली पकड़ाई, तब जा कर भूरेलाल की नींद टूटी.
भूरेलाल गांव का दौरा कर के चला तो गया, पर उस का दिल मालिनपुर में ही अटक कर रह गया. शाम को ही मंत्री भूरेलाल ने फोन कर के चंद्रवती को उस की ‘अच्छी चाय’ के लिए धन्यवाद दिया.
चंद्रवती जान गई थी कि तीर निशाने पर लगा है. उस ने योजनाएं बनानी शुरू कर दीं कि मंत्री भूरेलाल से क्याक्या काम करवाने हैं और आगे बढ़ने के लिए इस सीढ़ी का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है.
अब मालिनपुर गांव में तरक्की का जो भी छोटाबड़ा काम होता, उस का उद्घाटन भूरेलाल के ही हाथों होता. भूरेलाल चंद्रवती को पार्टी के कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए बुलाने लगा.
जल्दी ही भूरेलाल ने चंद्रवती की ताजपोशी खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष पद पर करवा दी. फिर तो चंद्रवती को नीली बत्ती की गाड़ी मिल गई.
ओहदा बढ़ते ही चंद्रवती आजाद पंक्षी हो गई. लल्लू पहलवान ने उसे घोंसले में ही कैद रखने के लिए उस के पर कतरने की काफी कोशिश की, लेकिन चंद्रवती के सामने उस की अब बिसात ही क्या थी.
एक दिन भूरेलाल ने मौका देख कर कहा, ‘‘चंद्रवतीजी, आप खूबसूरत होने के साथसाथ काबिल भी हो. कोशिश करो, तो विधायक भी बन सकती हो.’’
चंद्रवती ने इतराते हुए कहा, ‘‘मंत्रीजी, ऐसे दिन हमारे कहां?’’
‘‘हम तुम्हारे साथ हैं न. बस, तुम्हें साथ देने की जरूरत है,’’ भूरेलाल ने आखिरी शब्द चंद्रवती के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा. चंद्रवती मंत्री भूरेलाल के एहसानों से इतना दब चुकी थी कि वह कोई विरोध न कर सकी, सिर्फ अपना हाथ पीछे खींच लिया.
भूरेलाल ने सकपकाते हुए कहा, ‘‘चंद्रवती, देखो राजनीति करने के लिए बहुतकुछ कुरबान करना पड़ता है. अब देखो विधायक का टिकट पाना है, तो अनेक नेताओं से मिलना ही पड़ेगा. अब मैं तुम्हें प्रदेश अध्यक्ष से मिलवाना चाहता हूं, उस के लिए तुम्हें लखनऊ तो चलना ही पड़ेगा. घर जा कर सोचना और ‘हां’ और ‘न’ में जवाब देना. वैसे तो तुम समझदार हो ही.’’
चंद्रवती इस ‘हां’ और ‘न’ का मतलब अच्छी तरह समझती थी. घर पहुंचने पर वह कुछ दुविधा में थी. लल्लू से जब उस ने लखनऊ जा कर प्रदेश अध्यक्ष से मिलने की बात कही, तो उस ने कहा, ‘‘चंद्रवती, धीरेधीरे चलो, तुम उड़ रही हो. हम जितना ऊंचे उड़ते हैं, उतना नीचे भी गिरते हैं.’’
लेकिन चंद्रवती को लल्लू की बात समझ में नहीं आई. उसे लगा कि पहलवानी करतेकरते लल्लू का दिमाग भी छोटा हो गया है. विधायक बनना है, तो कुछ कुरबानी तो देनी ही पड़ेगी.
चंद्रवती प्रदेश अध्यक्ष से मिलने के लिए लखनऊ जाने की तैयारी करने लगी. बुझे मन से लल्लू भी उस के साथ लखनऊ गया.भूरेलाल ने उन के ठहरने का इंतजाम पहले से ही एक होटल में कर दिया था.
अगले दिन भूरेलाल चंद्रवती को लेने होटल गया. चंद्रवती उस के साथ कार में बैठ कर प्रदेश अध्यक्ष से मिलने चली गई. लल्लू को यह बात नागवार गुजरी.
प्रदेश अध्यक्ष भी चंद्रवती की खूबसूरती को निहारता रह गया. मंत्री भूरेलाल ने चंद्रवती की तारीफ के पुल बांध दिए. प्रदेश अध्यक्ष ने चंद्रवती को विधायक का टिकट देने के लिए विचार करने का आश्वासन दिया. चंद्रवती को लगा, जैसे उसे विधायकी का टिकट मिल ही गया.
इस के बाद तो चंद्रवती पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के घर और दफ्तर के चक्कर काटने में ही मशगूल हो गई. मंत्री भूरेलाल ने उसे बता दिया था कि जितने नेता और मंत्री उस के टिकट की सिफारिश कर देंगे, उस का टिकट उतना ही पक्का.