एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 1

नीलेश शहर के उस प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में अपनी पत्नी नेहा के साथ अपने विवाह की दूसरी सालगिरह मनाने आया था. वह आर्डर देने ही वाला था कि सामने से एक युगल आता दिखा. लड़की पर नजर टिकी तो पाया वह उस के प्रिय दोस्त मनीष की पत्नी सुलेखा है. उस के साथ वाले युवक को उस ने पहले कभी नहीं देखा था.

मनीष के सभी मित्रों और रिश्तेदारों से नीलेश परिचित था. पड़ोसी होने के कारण वे बचपन से एकसाथ खेलेकूदे और पढ़े थे. यह भी एक संयोग ही था कि उन्हें नौकरी भी एक ही शहर में मिली. कार्यक्षेत्र अलग होने के बावजूद उन्हें जब भी मौका मिलता वे अपने परिवार के साथ कभी डिनर पर चले जाते तो कभी किसी छुट्टी के दिन पिकनिक पर. उन के कारण उन दोनों की पत्नियां भी अच्छी मित्र बन गई थीं.

मनीष का टूरिंग जाब था. वह अपने काम के सिलसिले में महीने में लगभग 10-12 दिन टूर पर रहा करता था. इस बार भी उसे गए लगभग 10 दिन हो गए थे. यद्यपि उस ने फोन द्वारा शादी की सालगिरह पर उन्हें शुभकामनाएं दे दी थीं किंतु फिर भी आज उसे उस की कमी बेहद खल रही थी. दरअसल, मनीष को ऐसे आयोजनों में भाग लेना न केवल पसंद था बल्कि समय पूर्व ही योजना बना कर वह छोटे अवसरों को भी विशेष बना दिया करता था.

मनीष के न रहने पर नीलेश का मन कोई खास आयोजन करने का नहीं था किंतु जब नेहा ने रात का खाना बाहर खाने का आग्रह किया तो वह मना नहीं कर पाया. कार्यक्रम बनते ही नेहा ने सुलेखा को आमंत्रित किया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है पर उसे इस समय देख कर तो ऐसा नहीं लग रहा है कि उस की तबीयत खराब है. वह उस युवक के साथ खूब खुश नजर आ रही है.

नीलेश को सोच में पड़ा देख नेहा ने पूछा तो उस ने सुलेखा और उस युवक की तरफ इशारा करते हुए अपने मन का संशय उगल दिया.

‘‘तुम पुरुष भी…किसी औरत को किसी मर्द के साथ देखा नहीं कि मन में शक का कीड़ा कुलबुला उठा…होगा कोई उस का रिश्तेदार या सगा संबंधी या फिर कोई मित्र. आखिर इतनेइतने दिन अकेली रहती है, हमेशा घर में बंद हो कर तो रहा नहीं जा सकता, कभी न कभी तो उसे किसी के साथ की, सहयोग की जरूरत पड़ेगी ही,’’ वह प्रतिरोध करते हुए बोली, ‘‘न जाने क्यों मुझे पुरुषों की यही मानसिकता बेहद बुरी लगती है. विवाह हुआ नहीं कि वे स्त्री को अपनी जागीर समझने लगते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है नेहा, तुम ही तो कह रही थीं कि जब तुम ने डिनर का निमंत्रण दिया था तब सुलेखा ने कह दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है और अब वह इस के साथ यहां…यही बात मन में संदेह पैदा कर रही है…और तुम ने देखा नहीं, वह कैसे उस के हाथ में हाथ डाल कर अंदर आई है तथा उस से हंसहंस कर बातें कर रही है,’’ मन का संदेह चेहरे पर झलक ही आया.

‘‘वह समझदार है, हो सकता है वह दालभात में मूसलचंद न बनना चाहती हो, इसलिए झूठ बोल दिया हो. वैसे भी किसी स्त्री का किसी पुरुष का हाथ पकड़ना या किसी से हंस कर बात करना सदा संदेहास्पद क्यों हो जाता है? फिर भी अगर तुम्हारे मन में संशय है तो चलो उन्हें भी अपने साथ डिनर में शामिल होने का फिर से निमंत्रण दे देते हैं…दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’

नेहा ने नीलेश का मूड खराब होने के डर से बीच का मार्ग अपना लेना ही श्रेयस्कर समझा.

‘‘हां, यही ठीक रहेगा,’’ किसी के अंदरूनी मामले में दखल न देने के अपने सिद्धांत के विपरीत नीलेश, नेहा की बात से सहमत हो गया. दरअसल, वह उस उलझन से मुक्ति पाना चाहता था जो उस के दिल और दिमाग को मथ रही थी. वैसे भी सुलेखा कोई गैर नहीं, उस के अभिन्न मित्र की पत्नी है.

वे दोनों उठ कर उन के पास गए. उन्हें इस तरह अपने सामने पा कर सुलेखा चौंक गई, मानो वह समझ नहीं पा रही हो कि क्या कहे.

‘‘दरअसल सुलेखा, हम लोग यहां डिनर के लिए आए हैं. वैसे मैं ने सुबह तुम से कहा भी था पर उस समय तुम ने कह दिया कि तबीयत ठीक नहीं है पर अब जब तुम यहां आ ही गई हो तो हम चाहेंगे कि तुम हमारे साथ ही डिनर कर लो. इस से हमें बेहद प्रसन्नता होगी,’’ नेहा उसे अपनी ओर आश्चर्य से देखते हुए भी सहजता से बोली.

‘‘पर…’’ सुलेखा ने झिझकते हुए कुछ कहना चाहा.

‘‘पर वर कुछ नहीं, सुलेखाजी, मनीष नहीं है तो क्या हुआ, आप को हमेंकंपनी देनी ही होगी…आप भी चलिए मि…आप शायद सुलेखाजी के मित्र हैं,’’ नीलेश ने उस अजनबी की ओर देखते हुए कहा.

‘‘यह मेरा ममेरा भाई सुयश है,’’ एकाएक सुलेखा बोली.

‘‘वेरी ग्लैड टू मीट यू सुयश, मैं नीलेश, मनीष का लंगोटिया यार, पर भाभी, आप ने कभी इन के बारे में नहीं बताया,’’ कहते हुए नीलेश ने बडे़ गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

‘‘यह अभी कुछ दिन पूर्व ही यहां आए हैं,’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ओह, तभी हम अभी तक नहीं मिले हैं, पर कोई बात नहीं, अब तो अकसर ही मुलाकात होती रहेगी,’’ नीलेश ने कहा.

अजीब पसोपेश की स्थिति में सुलेखा साथ आ तो गई पर थोड़ी देर पहले चहकने वाली उस सुलेखा तथा इस सुलेखा में जमीनआसमान का अंतर लग रहा था…जितनी देर भी साथ रही चुप ही रही, बस जो पूछते उस का जवाब दे देती. अंत में नेहा ने कह भी दिया, ‘‘लगता है, तुम को हमारा साथ पसंद नहीं आया.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. दरअसल, तबीयत अभी भी ठीक नहीं लग रही है,’’ झिझकते हुए सुलेखा ने कहा.

बात आईगई हो गई. एक दिन नीलेश शौपिंग मौल के सामने गाड़ी पार्क कर रहा था कि वे दोनों फिर दिखे. उन के हाथ में कुछ पैकेट थे. शायद शौपिंग करने आए थे. आजकल तो मनीष भी यही हैं, फिर वे दोनों अकेले क्यों आए…मन में फिर संदेह उपजा, फिर यह सोच कर उसे दबा दिया कि वह उस का ममेरा भाई है, भला उस के साथ घूमने में क्या बुराई है.

मनीष के घर आने पर एक दिन बातोंबातों में नीलेश ने कहा, ‘‘भई, तुम्हारा ममेरा साला आया है तो क्यों न इस संडे को कहीं पिकनिक का प्रोग्राम बना लें. बहुत दिनों से दोनों परिवार मिल कर कहीं बाहर गए भी नहीं हैं.’’

‘‘ममेरा साला, सुलेखा का तो कोई ममेरा भाई नहीं है,’’ चौंक कर मनीष ने कहा.

‘‘पर सुलेखा भाभी ने तो उस युवक को अपना ममेरा भाई बता कर ही हम से परिचय करवाया था, उसे सुलेखा भाभी के साथ मैं ने अभी पिछले हफ्ते भी शौपिंग मौल से खरीदारी कर के निकलते हुए देखा था. क्या नाम बताया था उन्होंने…हां सुयश,’’ नीलेश ने दिमाग पर जोर डालते हुए उस का नाम बताते हुए पिछली सारी बातें भी उसे बता दीं.

‘‘हो सकता है, कोई कजिन हो,’’ कहते हुए मनीष ने बात संभालने की कोशिश की.

‘‘हां, हो सकता है पर पिकनिक के बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ नीलेश ने फिर पूछा.

‘‘मैं बाद में बताऊंगा…शायद मुझे फिर बाहर जाना पडे़,’’ मनीष ने कहा.

नीलेश भी चुप लगा गया. वैसे नीलेश की पारखी नजरों से यह बात छिप नहीं पाई कि उस की बात सुन कर मनीष परेशान हो गया है. ज्यादा कुछ न कह कर मनीष कुछ काम है, कह कर उस के पास से हट गया. उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि दोस्ती चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्ति किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहता.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 3

मैं छाया के पास आ गई. मेरे कंधे पर सिर रख कर वह सिसकने लगी. उस का हाथ अपने हाथ में ले कर मैं ने कहा, ‘‘पढ़ेलिखे मातापिता ऐसे कैसे हो सकते हैं?’’

उस ने जो कहा वह बहुत सही बात थी. वह बोली, ‘‘बच्चे को पालने के लिए दिल में प्रेम चाहिए, दिमाग के किताबी ज्ञान से कुछ नहीं होता है.’’

‘‘छाया, खुद को इतना परेशान मत कर. सुबह तरुण आ रहे हैं. तुम मुझ से एक वादा करो, वीकैंड में तुम मेरे साथ बैडमिंटन जरूर खेलोगी.’’ उस की आंखों ने मुझ से वादा किया और अगले दिन वह अपने घर चली गई.

जब साहिल को मैं ने उस के बारे में बताया तो साहिल बोले, ‘‘शैली, तुम छाया से कुछ मत पूछना. वह आज भी सदमे में है जिस दिन वह खुद बात करे उस दिन उसे समझाना.’’

रविवार की शाम छाया क्लब आई तो बोली, ‘‘आज खेलना नहीं है. चलो न, बातें करते हैं.’’

हम वहीं सीढि़यों पर बैठ गए. छाया ने सीधे ही मुझ से सवाल किया, ‘‘क्या साहिल यह सब जानते हैं? तुम ने उन्हें यह सब कब बताया?’’

‘‘शादी से पहले यह सब साहिल को मां ने बताया था. साहिल ने मुझे हमारे किसी रिश्तेदार के घर देखा था. जब साहिल अपने मातापिता के साथ आए तो उन की मां ने कहा, ‘हमें तो शैली पसंद है. आप चाहें, तो हम अभी बात पक्की कर लेते हैं.’’’

‘‘मां तैयार थीं इस के लिए. मां ने कहा, ‘पहले मैं साहिल से अकेले में बात करना चाहती हूं.’

‘‘मां साहिल को अपनेसाथ अंदर कमरे में ले गईं और उन्होंने मेरे साथ जो हुआ उन्हें सब बताया. फिर बोलीं, ‘बेटा, शादी करो या न करो पर यह बात अपने तक ही रखना. वरना हमारी बेटी की शादी होनी मुश्किल हो जाएगी.’

‘‘उस दिन साहिल ने मां के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, ‘मां, मेरी शिक्षा बेकार है, यदि मैं उस दर्द को नहीं समझ पाया. मुझे शैली से ही शादी करनी है. यह बात मेरे अलावा किसी और तक कभी नहीं जाएगी.’

‘‘साहिल मुझ से मिलने कमरे में आए. कमरे का माहौल बहुत गमगीन हो गया था. वे, बस, इतना ही कह पाए, ‘शैली, मेरा हाथ थाम कर आज से जिंदगी शुरू करना, पीछे कुछ था ही नहीं. इसलिए कभी मुड़ कर मत देखना.’’’

मेरी बात पूरी हुई और छाया बोल पड़ी, ‘‘यही तो बात है, तरुण कुछ नहीं जानते हैं. उन से सबकुछ छिपा कर शादी तो करनी पड़ी पर मेरा अपराधबोध मुझे कचोटता है.’’

‘‘पर अब देर हो चुकी है, छाया.’’ यदि तरुण ने साथ रहने से मना कर दिया तो?’’

‘‘कोई बात नहीं, अपनी रिसर्च के लिए, एक जिंदगी भी कम है. मैं फिर से उसी में जुट जाऊंगी. शैली, आज बताती हूं उस दिन क्या हुआ था.’’

उस ने बहुत सहजता से कहना शुरू किया, ‘‘मैं बौटनी में रिसर्चस्कौलर थी. सब से ज्यादा फैलोशिप भी मुझे ही मिलती थी. विपिन राय, जो नंबर दो पर था, मुझ से बहुत चिढ़ता था. वह शादीशुदा था.

‘‘मुझ से पीछे रहने के अपमान का बदला उस ने मुझे चोट पहुंचा कर लिया. एक दिन उस ने मुझे फोन किया, ‘कुछ जरूरी काम है.’

‘‘छुट्टी का दिन था. वह अकेला मेरा इंतजार कर रहा था. जब मैं वहां पहुंची तो अकेलेपन का फायदा उठा कर उस ने मुझे बहुत मारा, गालियां दीं और कहा, ‘आज के बाद तू उस लैब में नहीं आ पाएगी. यहां आने की सोच भी तेरे ख्वाब में नहीं आएगी. मेरे खिलाफ पुलिस केस करने की गलती मत करना. 10 साल कोर्ट के चक्कर लगाएगी, फिर भी हो सकता है मैं यह साबित कर दूं कि तूने मेरा बलात्कार किया है.’

‘‘वह दरिंदा जीत गया. मेरे परिवार की नजर में मेरी इज्जत चली गई थी.

2 महीने के अंदर तरुण से मेरी शादी हो गई.

‘‘वह दिन, पिता की नफरत, मां का मुझ से ज्यादा समाज और छोटी बहन की चिंता करना मुझे आज तक रुलाता है. घाव पर मरहम लगाने वाला कोई तो चाहिए. यहां तो घाव नासूर बन गया जो आज तक…’’

आज हम दोनों की आंखों में आंसू नहीं थे. शैली उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘चलो, घर चलते हैं, तरुण को आज सबकुछ बताना है.’’

मुझे छाया की चिंता हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘तरुण का जवाब जो भी हो, मैं और साहिल अब तुम्हारा परिवार हैं. तुम तरुण को अपनी बात बताने से पहले मेरे और साहिल के बारे में बता देना. तुम चाहो तो साहिल भी…’’

‘‘तू चिंता मत कर. जो भी होगा उस का सामना करने की हिम्मत है मुझ में.’’

मैं घर तो आ गई पर मेरा मन बहुत बेचैन था. सुबह भी उस का फोन नहीं आया. साहिल काम पर चला गया. मैं घर में अकेली बैठी छाया के फोन का इंतजार करने लगी.

दीवाली के अगले दिन शुरू हुआ दोस्ती का यह सफर 5 महीने का रास्ता तय कर चुका था. क्या होगा? कहीं मेरे कारण छाया हमेशा के लिए अकेली न हो जाए. वह चाहे जो कहे, अब तनहा जीना आसान नहीं होगा. उसे भी तरुण के साथ की आदत पड़ चुकी थी.

शाम के 5 बज गए. फोन की घंटी बजी. देखा, तरुण का फोन है. मैं ने डरते हुए फोन उठाया. उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो, शैली, तुम्हारा बहुतबहुत शुक्रिया.’’ उस के बाद छाया से जो बात हुई उस का एक शब्द भी याद नहीं. वैसे भी, अब शब्दों का कोई महत्त्व नहीं था. एक खुशी का एहसास. लगा मेरा पूरा शरीर रोशनी से भर गया हो.

मेरे कमजोर पलों में मेरा साथ मेरे परिवार व साहिल ने दिया था. आज किसी को मैं ने हिम्मत दी और वह भी जिंदगी की दौड़ में जीत गया. छाया की जीत का एहसास मेरे लिए कुछ ऐसा था जैसे मां को अपने बच्चे की जीत के लिए होता है.

अगले दिन छाया और तरुण 2 दिनों के लिए सिंगापुर जा रहे हैं. जाते समय तरुण ने साहिल से कहा, ‘‘साहिल, मंगलवार को होली की पार्टी का इंतजाम कर लेना, पार्टी हमारे घर पर होगी.’’

साहिल ने कहा, ‘‘तुम थके हुए आओगे, पार्टी हमारे घर पर रख लेते हैं. मैं और शैली सारा इंतजाम कर लेंगे.’’

छाया ने कहा, ‘‘नहीं साहिल, इस बार पार्टी हमारे घर होने दो. दीपक की रोशनी से उस रात तुम्हारा घर जगमगाया था, इस बार रंगों को हमारे घरआंगन में छिटकने दो.’’

होली की पार्टी से घर लौटते समय मेरे और साहिल के मोबाइल पर एक संदेश आया, ‘शैली, तुम्हारे मातापिता जैसा साहस और प्रेम हर मातापिता में हो तो तुम जैसी बेटियां न जाने कितनी छाया को अंधेरों से खींच लाएंगी. और हर दर्दभरे दिल को अपना साहिल मिल ही जाएगा…’

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 2

फिल्म खत्म होने के बाद रेस्तरां में खाना खाते समय तरुण बोले, ‘‘साहिल, औफिस के बाहर, सर और आप कुछ नहीं चलेगा. यहां हम भी दोस्त हैं छाया और शैली की तरह.’’

खाना खा कर हम बाहर निकले. एकदूसरे से विदा ली. हम चारों खुश थे. हां, सब की खुशी के कारण अलगअलग थे. अब मैं और छाया एकदो दिनों में हलकीफुलकी बातें कर लिया करते थे.

तरुण ने आज एकसाथ 2 अच्छी खबरें दीं. पहली, मुझे एक क्लब की सदस्यता तरुण ने दिलवा दी जहां मेरे दोनों शौक पूरे हो जाएंगे. दूसरी, तो इस से भी बड़ी थी, तरुण 2 दिनों के लिए सिंगापुर जा रहे हैं तो छाया हमारे साथ रहना चाहती है.

अगले दिन, तरुण को साहिल ने एयरपोर्ट छोड़ा और छाया हमारे साथ घर आ गई.

घर आते ही मैं ने छाया से पूछा, ‘‘कौफी के साथ पौपकौर्न लोगी या भेल?’’

उस ने बच्चों की तरह कहा, ‘‘दोनों.’’ उस का ऐसे बोलना मुझे बहुत अच्छा लगा. वह बोली, ‘‘रुको, मैं भी आती हूं, मिल कर बनाएंगे.’’

साहिल अपने औफिस के काम में व्यस्त थे. वे जानते थे स्वयं को हमें व्यस्त दिखाना ही सही होगा.

छाया और मेरे हाथ में कौफी थी. मैं ने टीवी चला दिया. पर मैं जानती थी यहां चलना तो कुछ और ही है.

बात मैं ने शुरू की, ‘‘क्या हुआ था?’’

‘‘पहले तुम बोलो, शैली, मुझ में बोलने की हिम्मत शायद तुम्हारे बाद ही आ पाए.’’

अपनी दोस्त को उस अंधेरे से बाहर निकालने के लिए मुझे उस गहरी खाई में फिर से जाना पड़ेगा. मन पक्का किया और मैं ने बताना शुरू किया, ‘‘उस शाम मैं हमेशा की तरह बैडमिंटन खेल कर ड्रैसिंगरूम में गई. वहां से मुझे पूल में जाना था. सबकुछ शायद पहले से ही सैट था. 2 लड़के बाहर घूम रहे थे, जिन को देख कर मैं ने अनदेखा कर दिया.

मैं रुक कर आगे बोली, ‘‘अंदर एक लड़का था जिसे ड्रैसिंगरूम में देख कर मैं चौंक गई. ‘महिलाओं के चेंजिंगरूम में लड़का कैसे?’ यह खयाल आया. मुझे देखते ही उस ने मेरे पास आ कर मुझे छूना चाहा. मैं बहुत घबरा गई, जोर से चिल्लाई और बाहर निकलने के लिए मुड़ी. उस जानवर ने मेरे मुंह में कपड़ा डाल दिया. बहुत छीनाझपटी हुई.

‘‘मैं घसीटतेघसीटते दरवाजे तक आ भी गई. काश, उस दिन दरवाजा खुल गया होता, जो बाहर से बंद था. एक को मारपीट कर मैं शायद भाग जाती मगर वक्त और इंसानियत सब शायद दरवाजे के बाहर ही छूट गए थे. बाहर वाले भी बारीबारी से अंदर आए. मेरे शरीर में संघर्ष की ताकत व होश सबकुछ खत्म हो गया था. उसी बेहोशी की हालत और रात के अंधेरे में वे मुझे मेरे घर के बाहर फेंक गए.

‘‘उन दर्दनाक पलों को मैं फिर से भुगत रही हूं किसी को जीना सिखाने के लिए. मम्मीपापा रात तक मेरे घर न आने पर और फोन बंद होने पर बहुत परेशान थे. वे दोनों मुझे ढूंढ़ने बाहर निकले तो देखा घर के दरवाजे पर मैं बेहोश पड़ी थी.

‘‘मुझे देख कर मां भी बेहोश हो गईं. 3 दिनों तक डाक्टर आंटी हमारे घर में रहीं.’’

वे 3 जानवर जिन को मैं जानती ही नहीं थी, उन्हें ढूंढ़ना, मीडिया को मसाले के साथ सबकुछ परोसना मेरे भविष्य को बरबाद करने जैसा ही था. मम्मीपापा और आंटी ने निर्णय लिया कि सबकुछ भुला कर जीना ही बेहतर है.

‘‘मगर इतना सब होने के बाद जीना इतना आसान भी नहीं, उन दर्दनाक यादों से खुद को अलग करना बहुत मुश्किल है, पर नामुमकिन नहीं.’’ कहते हुए मैं ने अपने आंसू पोंछे. छाया भी आंसुओं से भीग चुकी थी.

सामने देखा दरवाजे पर साहिल खड़े थे. हमें देखते हुए बोले, ‘‘अब सो जाओ, रात के 3 बज रहे हैं. सुबह काम पर जाना है.’’

उन्होंने कमरे की लाइट व टीवी बंद कर दिया.

सोतेसोते छाया बोली, ‘‘इतना समझदार पति, शैली, तुम्हारे पति की जितनी तारीफ की जाए, कम है.’’

‘‘छाया, तरुण भी बहुत अच्छे हैं. बस, इतना याद रखना कि यदि तुम उस सब से बाहर नहीं निकली तो जिंदगी का अतीत वर्तमान को भी काला कर देगा. तरुण महीने में 10 दिन बाहर रहते हैं. बहुत लोगों से मिलते भी होंगे. दोस्ती और प्रेम के बीच एक महीन सी दीवार ही होती है. पता नहीं कब वह दीवार टूट जाए, उस से पहले अपनी पीठ से अतीत की लाश को फेंक देना.’’

सुबह नींद खुली 9 बजे किचन की खटपट की आवाज से. छाया, हम तीनों के लिए नाश्ता बना रही थी और साहिल वहीं बैठे उस से बातें कर रहे थे.

छाया मुझे सहज और खुश लगी. हम तीनों अपने काम पर चले गए. रात का खाना हम दोनों ने मिल कर बनाया. खाना खा कर कमरे में आते ही छाया बोली, ‘‘इस सब के बाद तुम्हारे मातापिता ने क्या कहा?’’

‘‘मैं ने बोला तो था मां बेहोश हो गई थीं. एक दिन मैं पलंग पर सो रही थी, पापा भी मेरे पास बैठे थे. मां कुरसी पर बैठी मेरे बाल सहला रही थीं कि अचानक मैं रोने लगी और मेरे मुंह से निकला, ‘मैं मैली हो गई, सचमुच मेरी इज्जत चली गई.’

‘‘सुन कर मां को जैसे करंट लगा, ‘शरीर को अपमानित करने के लिए किसी ने तुम पर जुल्म और ज्यादती की, उस को तुम अपना गुनाह कैसे मान सकती हो? तुम पर जुल्म हुआ वह भी अनजाने में, धोखे से. औरत के मन और शरीर को तारतार करने वाले किस जालिम ने अपने गुनाह को औरत की इज्जत से जोड़ा? हम आज भी इन शब्दों को अपने पैरों की बेडि़यां बना कर जी रहे हैं.’ मां बोलतेबोलते खड़ी हो गईं. वे गुस्से से कांप रही थीं और रो रही थीं.

‘‘पापा की आंखों में भी आंसू थे. वे बोले, ‘बेटा, तुम हमारी बहादुर बेटी हो, शरीर के घाव तो भर जाएंगे पर उन को अपने मन में जगह मत देना. हम दोनों की जिंदगी और खुशी तेरे ही दिल में रहती है.’’’

कहतेकहते मेरी आंखों में भी आंसू आ गए. न जाने कितनी बार हम तीनों साथसाथ रोए थे. मैं ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘2 महीने के लिए मैं मौसी के पास गई थी. जब वापस आई तो पापा के साथ खेलने भी जाती थी. धीरेधीरे सब सामान्य हो गया.’’

गुस्से और नफरत से छाया बोली, ‘‘मेरी तो मां ने ही कहा था, यह क्या कर आई? खानदान के नाम पर कलंक. खुद की नहीं, छोटी की भी सोचो. यह रोनाधोना बंद करो. चुपचाप काम पर जाना शुरू करो. किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है. तब से आज तक मेरे घाव खुले ही हैं और टीसते हैं. उन्हें भरने वाला कोई नहीं मिला. तरुण से भी यह सब छिपा कर शादी हुई जो मुझे बहुत ग्लानि से भर देती है. क्या करती, मां के आगे कुछ नहीं बोल पाई.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे पिता तो कालेज में प्रोफैसर हैं. उन की प्रतिक्रिया कैसी थी?’’

‘‘‘यह अपवित्र हो गई है,’ पापा ने मेरे सामने मां को डांटते हुए कहा, ‘इस से कह देना, आज के बाद मंदिर में हाथ न लगाए.’’’

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 1

हम दोनों चेन्नई में 2 महीने पहले ही आए थे. मेरे पति साहिल का यहां ट्रांसफर हुआ था. मेरे पास एमबीए की डिगरी थी. सो, मुझे भी नौकरी मिलने में ज्यादा दिक्कत न आई. हमारे दोस्त अभी कम थे. यही सोच कर दीवाली के दूसरे दिन घर में ही पार्टी रख ली. अपने और साहिल के औफिस के कुछ दोस्तों को घर पर बुलाया था. दीवाली के अगले दिन जब मैं शाम को दिये और फूलों से घर सजा रही थी तो साहिल बोले, ‘‘शैली, कितने दिये लगाओगी? घर सुंदर लग रहा है. तुम सुबह से काम कर रही हो, थक जाओगी. अभी तुम्हें तैयार भी तो होना है.’’

मैं ने साहिल की तरफ  प्यार से देखते हुए कहा, ‘‘मैं क्यों, तुम भी तो मेरे साथ बराबरी से काम कर रहे हो. बस, 10 मिनट और, फिर तैयार होते हैं.’’

हम तैयार हुए कि दोस्तों का आना शुरू हो गया. पहली बार घर में इतनी चहलपहल अच्छी लग रही थी. जब टेबल पर सूप, समोसे, पकौड़े रखे तो सब खुश हो कर बोले, ‘‘वाह, चेन्नई में ये सब खाने को मिल जाए तो बहुत मजा आ जाता है.’’

फिर दौर चला बातों का, मिठाइयों का और नाचगाने का. सब ने पार्टी को खूब एंजौय किया.

पार्टी में हमारे साथ थे साहिल के बौस और उन की पत्नी छाया. रात के 2 बजे पार्टी खत्म हुई. सभी दोस्तों ने हमें इस पार्टी के लिए धन्यवाद दिया.

दिनभर की थकान के बाद भी आंखों में नींद नहीं थी. मैं और साहिल बालकनी में बैठ गए बातें करने के लिए. खामोश रात और रंगीन जुगनुओं की चमक से चमकता शहर बहुत सुंदर लग रहा था.

‘‘साहिल, एक बात गौर की तुम ने कि तुम्हारे बौस की बीवी कितनी चुप थीं. न तो वे खाना खाते समय कुछ बोलीं और न खेलते समय. ऐसा लग रहा था जैसे एक मशीन की तरह सबकुछ कर रही हैं. वे सुंदर तो थीं पर खुश नहीं लग रही थीं.’’

‘‘तुम भी न शैली, यार वे बौस की बीवी हैं. इतनी उछलकूद नहीं मचाएंगी. बड़े लोग जूनियर सहकर्मियों से एक दूरी बना कर चलते हैं.’’

‘‘तुम्हारे बौस तो बड़े जिंदादिल हैं. तुम ने देखा नहीं, वे डांस के समय अपनी बीवी को बड़े प्यार से देख रहे थे. पर मैडम का ध्यान उन की तरफ नहीं था.’’

साहिल ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा, तो तुम मेरे साथ डांस कर रही थीं पर तुम्हारी नजर…तुम उन को इतने गौर से क्यों देख रही थीं?’’

साहिल के मजाक से अनजान मैं ने कहा, ‘‘साहिल, मुझे कुछ टूटा सा लग रहा है.’’

‘‘छोड़ो शैली, यदि तुम सही हो, तो भी हमें क्या करना?’’

अपनी धुन में मैं कह गई, ‘‘नहीं साहिल, इसे नहीं छोड़ पाऊंगी. अब मुझे याद आया, छाया कालेज में मेरे साथ थी. वह मुझे बहुत पहचानी सी लग रही थी.’’

साहिल को मनाते हुए मैं ने आगे कहा, ‘‘मुझे छाया से दोस्ती करनी है.’’

‘‘यार, बौस से दोस्ती बढ़ाने का एक ही मतलब होता है, चमचागीरी. छोड़ दो उस गुमसुम सी छाया को.’’

‘‘प्लीज, बस एक बार मिलवा दो. मैं वादा करती हूं, अगली बार छाया खुद मुझ से मिलना चाहेगी.’’

‘‘तुम अपनी बात मनवाना जानती हो. चलो, देखते हैं. सुबह के 4 बज गए हैं. उठो, सुबह औफिस भी जाना है.’’

अगले शनिवार जब साहिल औफिस से आया तो बोला, ‘‘मैडम, आप का काम हो गया. बौस तैयार हो गए हैं. रविवार को पहले फिल्म और फिर डिनर, ठीक है.’’ ‘‘ठीक नहीं, सुपर प्लान है. साहिल तुम बहुत अच्छे हो.’’

साहिल ने मुसकरा कर मेरा हाथ थाम लिया, बोला, ‘‘मैं जानता हूं असली खिलाड़ी कभी हारते नहीं.’’

दुख का एक पल मेरे अंदर आया, पर मैं ने उसे झटक कर दूर किया और साहिल के लिए चाय बनाने चली गई. मैं शादी से पहले हमेशा बैडमिंटन खेलने की शौकीन रही हूं. खेल के बाद तैराकी मुझे बहुत सुकून देती है. सूरत में तो वीकैंड में क्लब में जाती थी. यहां चेन्नई में ऐसी जगह अभी तक मिल नहीं पाई. अधिकतर क्लबों की मैंबरशिप बहुत महंगी है. अभी तो मुझे रविवार का इंतजार था.

रविवार की शाम हम चारों मिले. आज मैं ने मिलते ही सब से पहले छाया को याद दिलाया, ‘‘आप को याद नहीं, हम एक ही कालेज में पढ़े हैं. उस दिन मुझे आप का चेहरा बहुत पहचाना सा लग रहा था. फिर बाद में याद आया.’’

छाया ने खुश होते हुए कहा, ‘‘जब पुराने दोस्त मिल गए हैं तो ‘आप’ नहीं शैली, ‘तुम’ ही अच्छा लगेगा.’’

हम साथ में हंस दिए. जब तरुण ने ये सब सुना तो बोले, ‘‘शैली, आप छाया से दोस्ती कर ही लो. उस का भी मन लग जाएगा यहां.’’

साहिल मेरी ओर देख कर मुसकरा पड़े, उन की निगाहों ने कहा, ‘जीत गई न तुम.’

सिनेमाहौल में मैं और छाया पासपास बैठे थे. एक समय आया जब स्क्रीन पर बलात्कार का सीन चल रहा था. नायिका चीखचिल्ला रही थी, रो रही थी, भाग रही थी, उस जगह से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ़ रही थी. उस सीन ने मुझे दहला दिया. साहिल ने मेरे हाथ को अपने दोनों हाथों से थाम लिया था. अचानक मेरी निगाह छाया की तरफ गई, उस ने कस कर आंखें बंद की हुई थीं.

बस, यही बात थी जो मुझे छाया के करीब लाई थी. इसीलिए मैं उस से दोस्ती करना चाहती थी.

फिल्म के मध्यांतर में खाने के लिए स्नैक्स ‘हम दोनों ही लाएंगे’ कह कर मैं छाया को अपने साथ बाहर ले आई.

एक कोने में जा कर हम खड़े हुए, मैं ने उस से कहा, ‘‘जिस सीन को देख कर तुम ने आंखें बंद की थीं, उस काले, घिनौने वक्त से मैं भी गुजर चुकी हूं. बस, फर्क इतना है तुम उस वक्त अकेली थी और साहिल ने अपने दोनों हाथों से मेरा हाथ थामा था. मैं ने उस के कंधे पर अपना सिर टिका दिया था.’’

छाया की आंखें भय से फैल गईं. वह बोली, ‘‘क्या बोल रही हो? तुम्हें देख कर तो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता है कि तुम दर्द के उस दरिया से निकल कर आई हो.’’

‘‘दर्द के दरिया को पार कर मैं भी आई हूं, छाया. पर उस के पानी से मेरे कपड़े आज भीगे नहीं हैं. तुम आज भी भीगी हो और कांप रही हो.’’

हम दोनों भूल चुके थे कि हम कहां खड़े हैं और क्या लेने आए हैं. हमारे सामने साहिल खड़ा था. हाथ में स्नैक्स की ट्रे लिए. वह जानता था उस समय यहां क्या बात हो रही है. वह सिर्फ इतना बोला, ‘‘चलो, फिल्म शुरू हो गई है.’’

तांकझांक तो बुरी आदत है पर क्या करूं, आज तो मैं ने भी वही किया. देख कर अच्छा लगा, छाया तरुण का हाथ थामें बैठी थी. इस से ज्यादा ध्यान देना तो ठीक नहीं था. मैं ने अपना ध्यान फिल्म में लगा दिया.

गुप्त रोग: रूबी और अजय के नजायज संबंधों का कैसे हुआ पर्दाफाश – भाग 1

‘अब छोड़ो भी, जाने दो मुझे. मेरे पति रणबीर का फोन आता ही होगा,” रूबी ने अजय सिंह की बांहों में कसमसाते हुए कहा.

”अच्छा… तो अपने पति के वापस आते ही मुझ से नखरे दिखाने लगी हो तुम,” अजय सिंह ने रूबी के सीने पर हाथ का दबाव बढ़ाते हुए कहा.

“क्या बताऊं, जब से मेरा मरद गुजरात से कमाई कर के लौटा है, तब से वह सैक्स का भूखा भेड़िया बन गया है. रात में भी मुझे सोने नहीं देता,” रूबी ने एक मादक अंगड़ाई लेते हुए कहा.

“तो तुम भी सैक्स के मजे लो, इस में परेशानी की क्या बात है भला?” एक भद्दी सी मुसकराहट के साथ अजय सिंह ने कहा.

”रात में उस का बिस्तर गरम करूं और दिन में तुम्हारे जोश को ठंडा करूं, अरे, मैं एक औरत हूं, कोई ‘सैक्स डौल’ नहीं, और फिर मैं प्यार तो तुम से करती हूं न, मेरा वह तोंद वाला मोटा पति मुझे कतई पसंद नहीं,” यह कह कर रूबी ने अजय सिंह को अपनी बांहों में भर लिया.

तीखे नैननक्श और भरे बदन वाली रूबी पर महल्ले के मनचलों की नजर रहती थी. जब रूबी नाभि प्रदर्शना ढंग से साड़ी पहन कर बाहर निकलती तो लोग फटी आंखों से उसे घूरते रह जाते. अपनी इस खूबसूरती का अच्छी तरह एहसास भी था रूबी को और मौका पड़ने पर वह इस का फायदा उठाने से भी नहीं चूकती थी.

रूबी इस मकान में अकेली रहती थी, जबकि उस के पति को गुजरात में काम के सिलसिले में कई महीनों तक बाहर रुकना पड़ जाता था.

रूबी को अपने पति के मोटे होने से चिढ़ थी, इसलिए उस ने कई बार रणबीर से खुल कर कहा भी, पर उस के पति को पैसे से इतना प्यार था कि वह अपने शरीर पर बिलकुल ध्यान नहीं देता था.

अपने पति की गैरमौजूदगी में जब भी रूबी की तबीयत कुछ खराब होती तो  वह  महल्ले के नुक्कड़ पर बने अस्पताल में दवा लेने चली जाती थी.

तनहाई की मारी हुई जवान और खूबसूरत रूबी की जानपहचान जल्दी ही उस अस्पताल में काम करने वाले कंपाउंडर अजय सिंह से हो गई.

रूबी और अजय सिंह एकदूसरे से प्यार करने लगे. रूबी को एक आदमी का सहारा मिला, तो वह और भी निखर गई.

अजय सिंह का डाक्टर जब कभी भी अस्पताल से बाहर कहीं जाता, तो अजय सिंह रूबी को फोन कर के अस्पताल में बुला लेता. दोनों साथ में ही खातेपीते और अस्पताल में ही जिस्मानी सुख का मजा भी लेते.

दोनों की जिंदगी मजे से गुजर रही थी, पर इसी बीच रूबी के पति रणबीर के गुजरात से वापस लौट आने से उस की आजादी पर ब्रेक सा लग गया था.

अगले दिन रूबी ने भरे गले से अजय सिंह को फोन कर के बताया कि वह अब उस से मिलने नहीं आ पाएगी, क्योंकि उस का पति रणबीर उसे ले कर हमेशा ही बिस्तर पर पड़ा रहता है और पोर्न फिल्में दिखा कर अपनी ‘सैक्स फैंटेसी’ पूरी करने के लिए उस पर दबाव डालता रहता है.

रूबी को उस का पति परेशान कर रहा था, यह बात अजय सिंह को अच्छी नहीं लग रही थी. रूबी का पति उसे एक दुश्मन की तरह लग रहा था.

एक तो रूबी से दूरी अजय सिंह को सहन नहीं हो रही थी, ऊपर से ये बातें सुन कर अजय सिंह को गुस्सा आ रहा था, इसलिए मन ही मन अजय सिंह रूबी के पति को उस से दूर रखने के लिए कुछ ऐसा प्लान सोचने लगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

फिर एक दिन अजय सिंह ने रूबी को अस्पताल में बुलाया. अस्पताल आते ही रूबी ने कहा, ”बड़ी मुश्किल से आ पाई हूं, जल्दी से बताओ कि क्या बात है?”

”यह लो, यह एक किस्म का तेल है, जिस में मैं ने कई तरह की दवाएं मिला रखी हैं… इस तेल को तुम्हें अपने पति के प्राइवेट पार्ट यानी अंग पर मलना है,” अजय सिंह ने एक छोटी सी शीशी रूबी की ओर बढ़ाते हुए कहा.

अजय सिंह की बातें सुन कर रूबी चौंक पड़ी थी.

”पर, इस से भला क्या होगा?” रूबी ने पूछा.

”मैं ने इस तेल में कुछ ऐसे कैमिकल मिलाए हैं, जिन का पीएच मान बहुत कम होता है और यदि कम पीएच मान वाली चीजों को चमड़ी पर 2-4 दिन तक लगाया जाए, तो चमड़े पर हलका घाव या इंफैक्शन हो सकता है,” अपनी आंखों को शरारती अंदाज में दबाते हुए अजय सिंह ने कहा.

”ओह, इस का मतलब है कि इसे लगाते ही रणबीर को इंफैक्शन हो जाएगा और फिर वह मुझे सैक्स के लिए तंग नहीं करेगा. पर, फिर यह तेल मेरे हाथ पर भी घाव बना सकता है न,” रूबी ने अपनी घबराहट दिखाई.

”वैरी स्मार्ट, यह काम तुम दस्ताने पहन कर करोगी, ये लो ग्लव्स.”

”पर, इस तरह से तो रणबीर को मुझ पर शक हो जाएगा,” रूबी ने शक जाहिर करते हुए पूछा, तो अजय सिंह खीज उठा, “उफ्फ, बहुत ही नासमझ हो. तुम्हें मोटे पति के साथ न सोना पड़े, इस का एकमात्र यही रास्ता था… अब आगे का सफर कैसे तय करना है, वह सब तुम्हें सोचना है.”

”ठीक है बाबा… मैं ही कुछ सोचती हूं,” कहते हुए रूबी ने तेल की शीशी अपने बैग में रख ली.

रोज रात की तरह रणबीर फिर से रूमानी होने लगा, तो रूबी ने महीना होने का झूठ बोला. इस पर रणबीर ने बुरा सा मुंह बना लिया.

”अरे, अब तुम नाराज मत हो, मेरे पास तुम्हें खुश करने के और भी बहुत से तरीके हैं, मैं तुम्हारे पैरों में तेल से मसाज कर देती हूं, तुम्हें अच्छी नींद आ जाएगी,” कह कर रूबी ने रणबीर की आंखों पर एक दुपट्टा बांध दिया.

रणबीर मन ही मन कल्पना के गोते लगाने लगा कि न जाने उस की पत्नी उस के साथ क्या करने जा रही है. इस समय वह अपनेआप को किसी इंगलिश फिल्म का हीरो समझ रहा था.

रणबीर को लिटा कर रूबी ने हाथों में ग्लव्स पहन लिए और उस की टांगों पर चढ़ कर बैठ गई. रणबीर के पैरों और घुटनों में सादा यानी बिना मिलावट वाला तेल लगाया, जबकि अजय सिंह के द्वारा दिए गए तेल को रणबीर के प्राइवेट अंग में लगा कर धीरधीरे मालिश करने लगी.

रणबीर आंखें बंद कर के आनंद के सागर में गोते लगा रहा था, क्योंकि इस मसाज से एक अजीब सा असर हो रहा था उसे.

”रूबी, तुम ने कल जिस तेल से मसाज की थी… मुझे बहुत अच्छी लगी. तुम आज भी ठीक वैसी ही मसाज देना,” रणबीर ने सुबह उठते ही कहा, जिस पर रूबी मुसकरा कर रह गई.

रणबीर ने 3-4 दिन ये मसाज करवा कर मजा लिया, पर उस बेचारे को क्या पता था कि उस के साथ क्या होने

वाला है.

एक दिन सुबह जब रणबीर सो कर उठा, तो उस के अंग में हलकी सी जलन हो रही थी. उस ने ध्यान दिया कि अंग पर लाललाल दाने हैं, जिस में खुजली भी हो रही थी. दानों को खुजला भी दिया था रणबीर ने, जिस के चलते ऊपर की चमड़ी से हलका सा खून निकलने लगा था.

”रूबी, जब से तुम ने मेरे अंग पर मसाज की है, तब से वहां एलर्जी सी हो गई है, देखो तो क्या हाल हो गया है मेरा,” रणबीर ने शिकायती लहजे में रूबी से कहा.

”देखिए, इस में मेरी कोई गलती नहीं है, आप महीनों घर से बाहर रहते हैं. पत्नी का साथ आप को नसीब नहीं होता. ऐसे में धंधेबाज औरतों से संबंध भी आप जरूर ही बनाते होंगे, आप को किसी भी तरह का गुप्त रोग होना तो लाजिमी ही है,” रूबी ने नाकभौं सिकोड़ते हुए उपेक्षित लहजे में कहा.

अपनी पत्नी से रणबीर को हमदर्दी की उम्मीद थी, पर उसे तो नफरत मिल रही थी.

बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा

Story in Hindi

तेजतर्रार तिजोरी : रघुवीर ने अपनी बेटी का नाम तिजोरी क्यों रखा – भाग 4

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था : तिजोरी एक तेजतर्रार और होशियार लड़की थी. वह अपने पिता के काम में हाथ बंटाती और भाई के साथ गुल्लीडंडा खेलती. गांव में बिजली महकमे का काम चल रहा था. कौंट्रैक्टर सुनील को तिजोरी भा गई और वह उस के साथ नजदीकियां बढ़ाने लगा. उस के इर्दगिर्द रहने लगा. अब पढि़ए आगे…

पानी की बोतलें ले कर तिजोरी के बारे में ही सोचते हुए जब सुनील श्रीकांत के पास पहुंचा, तब तक हाथों में डंडा लिए और गुल्ली  को रखते हुए तिजोरी भी वहां पहुंच गई. वहां एक के ऊपर एक 9 खंभों की ऊंचाई की कुल 19 लाइनें थीं.

हाथ में लिए डंडे से तिजोरी ने ऊंचाई पर रखे खंभों को गिना, फिर चौड़ाई की लाइनों को गिन कर मन ही मन 19 को 9 से गुणा कर के बता दिया… कुल खंभे 171 हैं.

सुनील ने रजिस्टर से मिलान किया. स्टौक रजिस्टर भी अब तक आए खंभों की तादाद इतनी ही दिखा रहा था.

सुनील और श्रीकांत हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकने लगे, तभी तिजोरी सुनील से बोली, ‘‘चल रहे हो गुल्लीडंडा खेलने?’’

अपने भरोसेमंद शादीशुदा असिस्टैंट श्रीकांत को जरूरी निर्देश दे कर सुनील तिजोरी के पीछेपीछे उस खाली खेत तक आ गया, जहां महेश बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था.

सुनील को देख कर महेश भी पहचान गया. महेश के पास पहुंच कर तिजोरी बोली, ‘‘तुझे अगर प्यास लगी है, तो यह ले चाबी और गोदाम का शटर खोल कर पानी पी कर आ जा, फिर हम तीनों गुल्लीडंडा खेलेंगे.’’

‘‘नहीं, मुझे अभी प्यास नहीं लगी है. चलो, खेलते हैं. मैं ने यह छोटा सा गड्ढा खोद कर अंडाकार गुच्ची बना दी है, लेकिन पहला नंबर मेरा रहेगा.’’

‘‘ठीक है, तू ही शुरू कर,’’ तिजोरी बोली. फिर उस ने गुच्ची से कोई  5 मीटर की दूरी पर खड़े हो कर सुनील को समझाया, ‘‘महेश उस गुच्ची के ऊपर गुल्ली रख कर फिर उस के नीचे डंडा फंसा कर हमारी तरफ उछालेगा.

‘‘उस की कोशिश यही रहेगी कि हम से ज्यादा से ज्यादा दूर तक गुल्ली जाए और उसे कैच कर के भी न पकड़ा जा सके. तुम एक बार ट्रायल देख लो. महेश गुल्ली उछालेगा और मैं उसे कैच करने की कोशिश करूंगी.’’

फिर तिजोरी महेश के सामने 5 मीटर की दूरी पर खड़ी हो गई. महेश ने गुच्ची के ऊपर रखी गुल्ली तिजोरी के सिर के ऊपर से उछाल कर दूर फेंकना चाही, पर कैच पकड़ने में माहिर तिजोरी ने अपनी जगह पर खड़ेखड़े अपने सिर के ऊपर से जाती हुई गुल्ली को उछल कर ऐसा कैच पकड़ा, जो उतना आसान नहीं था.

कैच पकड़ने के साथ ही तिजोरी चिल्लाई, ‘‘आउट…’’

लेकिन साइड में खड़े सुनील की नजरें तो तिजोरी के उछलने, फिर नीचे जमीन तक पहुंचने के बीच फ्रौक के घेर के हवा द्वारा ऊपर उठ जाने के चलते नीचे पहनी कच्छी की तरफ चली गई थी. साथ ही, उस के उभारों के उछाल ने भी सुनील को पागल कर दिया.

लेकिन तिजोरी इन सब बातों से अनजान सुनील से बोली, ‘‘अब खेल शुरू. इस बार मेरी जगह पर खड़े हो कर तुम्हें गुल्ली को अपने से दूर जाने से बचाना है. मैं तुम से एक मीटर पीछे खड़ी होऊंगी, ताकि तुम से गुल्ली न पकड़ी जा सके तो मैं पकड़ कर महेश को आउट कर सकूं और तुम्हारा नंबर आ जाए… ठीक?’’

सुनील अपनी सांसों और तेजी से धड़कने लग गए दिल को काबू करता हुआ सामने खड़ा हो गया. उस की नजरों से तिजोरी के हवा में उछलने वाला सीन हट नहीं पा रहा था. उस पर अजीब सी हवस सवार होने लगी थी.

तभी तिजोरी पीछे से चिल्लाई, ‘‘स्टार्ट.’’

आवाज सुनते ही महेश ने गुल्ली उछाली और चूंकि सुनील का ध्यान कहीं और था, इसलिए अपनी तरफ उछल कर आती गुल्ली से जब तक वह खुद को बचाता, गुल्ली आ कर सीधी उस की दाईं आंख पर जोर से टकराई.

सुनील उस आंख पर हाथ रखता हुआ जोर से चिल्लाया, ‘‘हाय, मेरी आंख गई,’’ कह कर वह खेत की मिट्टी में गिरने लगा, तो पीछे खड़ी तिजोरी ने उसे अपनी बांहों में संभाल लिया और उस का सिर अपनी गोद में ले कर वहीं खेत में बैठ गई.

तिजोरी ने गौर किया कि सुनील की आंख के पास से खून तेजी से बह रहा है. आसपास काम करते मजदूर भी वहां आ गए. उन में से एक मजदूर बोल पड़ा, ‘‘कहीं आंख की पुतली में तो चोट नहीं लगी है? तिजोरी बिटिया, इसे तुरंत आंखों के अस्पताल ले जाओ.’’

सुनील की आंखों से खून लगातार बह रहा था. कुछ देर चीखने के बाद सुनील एकदम सा निढ़ाल हो गया. उसे यह सुकून था कि इस समय उस का सिर तिजोरी की गोद में था और उस की एक हथेली उस के बालों को सहला रही थी.

तिजोरी ने महेश को श्रीकांत के पास यह सूचना देने के लिए भेजा और एक ट्रैक्टर चलाने वाले मजदूर को आदेश दे कर खेत में खड़े ट्रैक्टर में ट्रौली लगवा कर उस में पुआल का गद्दा बिछवा कर सुनील को ले कर अस्पताल आ गई.

यह अच्छी बात थी कि उस गांव में आंखों का अस्पताल था, जिस में एक अनुभवी डाक्टर तैनात था. तिजोरी की मां के मोतियाबिंद का आपरेशन उसी डाक्टर ने किया था.

तिजोरी ने सुनील को वहां दाखिल कराया और डाक्टर से आंख में चोट लगने की वजह बताते हुए बोली, ‘‘डाक्टर साहब, इस की आंख को कुछ हो गया, तो मैं अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘तू चिंता न कर. मुझे चैक तो करने दे,’’ कह कर डाक्टर ने स्टै्रचर पर लेटे सुनील को अपने जांच कमरे में ले कर नर्स से दरवाजा बंद करने को कह दिया.

तिजोरी घबरा तो नहीं रही थी, पर लगातार वह अपने दिल में सुनील की आंख में गंभीर चोट न निकलने की दुआ कर रही थी. महेश के साथ श्रीकांत भी वहां पहुंच गया था.

अस्पताल के गलियारे में इधर से उधर टहलते हुए तिजोरी लगातार वहां लगी बड़े अक्षरों वाली घड़ी को देखे जा रही थी. तकरीबन 50 मिनट के बाद डाक्टर ने बाहर आ कर बताया, ‘‘बेटी, बड़ी गनीमत रही कि गुल्ली भोंहों के ऊपर लगी. थोड़ी सी भी नीचे लगी होती, तो आंख की रोशनी जा सकती थी.’’

पीछा करता डर : पीठ में छुरा भाग-4

नंदन का हाथ फिर भी आगे नहीं बढ़ा तो भानु अपना गिलास मेज पर रखते हुए बोला, ‘‘यकीन मानो, तुम्हें डिस्टर्ब करने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ये सब तो मजाक था. फोटो डिलीट कर दूंगा. लेकिन जब तक मैं हूं, मेरे साथ इंजौय करो. मैं 2 पैग पी कर चला जाऊंगा. लेकिन ये 2 पैग मैं ने तुम दोनों के साथ पीने का वादा किया है.’’

नंदन समझ गए, भानु यूं मानने वाला नहीं है. मजबूरी थी, सो उन्होंने गिलास उठा लिया. युवती और नंदन दोनों ही आधे घंटे से भयानक तनाव में थे. उन्होंने गिलास हाथ में उठाए तो खाली होते देर न लगी. एक पैग ह्विस्की गले से नीचे उतरी, तो उन के चेहरों पर तनाव की रेखाएं कुछ कम हुईं.

उन दोनों के गिलास खाली देख भानु ने भी अपना गिलास खाली किया और तीनों के लिए एकएक पैग और बनाया. नंदन और उस युवती ने यह सोच कर दूसरे पैग भी जल्दी ही खाली कर दिए कि उन की देखादेखी वह भी जल्दी से गिलास खाली कर के चला जाएगा. लेकिन भानु ने दूसरा पैग पीने में कोई जल्दी नहीं की. वह चिकन खाते हुए आराम से सिप करता रहा.

खानेपीने के इस दौर में उन तीनों के बीच कोई बात नहीं हो रही थी. बीच में कुछ बोलता भी था, तो केवल भानु. नंदन और युवती के गिलास खाली देख भानु ने उन के गिलासों में ह्विस्की डालनी शुरू की, तो नंदन ने चौंकते हुए कहा, ‘‘ये क्या कर रहे हो भानु?’’

‘‘पैग बना रहा हूं. अपने लिए नहीं, तुम दोनों के लिए,’’ भानु मुस्कराते हुए बोला, ‘‘तुम्हें मेरा साथ देना है न…मेरे दो पैग तक. यही तो तय हुआ है.’’

नंदन भानु की चालाकी समझ गए. गलती उन की ही थी, जो उसे जल्दी भगाने के चक्कर में जल्दी से दोनों पैग चढ़ा गए. उन्होंने मन ही मन फैसला किया कि अब धीरेधीरे सिप करेेंगे. उन्होंने ही नहीं, युवती ने भी इस पर अमल किया. लेकिन भानु के बारबार अनुरोध पर जब उन दोनों ने गिलास हाथों में उठाए तो भानु ने गजब की फुर्ती से मोबाइल निकाला और वे लोग कुछ समझ पाते, इस से पहले ही दोनों का साथसाथ पीते हुए एक स्नैप ले लिया.

उस वक्त तक नंदन पर नशा हावी हो चुका था. वह गिलास मेज पर रख कर खड़े होते हुए गुस्से में बोले, ‘‘भानु, मैं मार डालूंगा तुम्हें. तुम ब्लैकमेल करना चाहते हो मुझे.’’

भानु ने भी अपना गिलास मेज पर रख दिया और मोबाइल जेब में डाल कर खड़े होते हुए शांत स्वर में बोला, ‘‘बात दोस्ती की चल रही थी और तुम दुश्मनी पर उतरने लगे. क्या इस के पहले तुम ने मेरे साथ कभी शराब नहीं पी? हर दूसरे तीसरे दिन तो… और हां, हिम्मत है, मुझे मार डालने की? जो आदमी अपनी प्रेयसी के साथ अपने शहर, अपने घर में ऐश करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता, वह किसी को क्या मारेगा.

‘‘तुम में अगर गैरत होती, तो इस खूबसूरत छलावे की जगह अपनी पत्नी और बच्चें के बीच होते. हिम्मत होती तो इसे ले कर अपने शहर से अस्सी किलोमीटर दूर यहां न आए होते. बहुत हो चुका. चुपचाप बैठो और अपना गिलास खाली करो.’’

नंदन को गुस्सा आया जरूर था, पर अपनी स्थिति का खयाल आते ही काफूर हो गया. वह हारे जुआरी की तरह बैठ गए और एक ही बार में गिलास खाली कर दिया. उन के खाली गिलास में ह्विस्की डालते हुए भानु युवती की ओर देख कर बोला, ‘‘तुम लोग मुझे बिल्कुल गलत समझ रहे हो. मैं पहले ही बता चुका हूं कि मैं तुम्हें ब्लैकमेल नहीं करूंगा, बल्कि तुम लोगों के साथ एंजौय करना चाहता हूं. वह भी सिर्फ दो पैग तक.’’

‘‘तो फिर ये फोटोबाजी की क्या जरूरत है? ’’ नंदन ने तुनक कर पूछा, तो भानु उन की आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘मैं ने कह तो दिया, जाने से पहले फोटो डिलीट कर दूंगा. लेकिन बात वही है कि जिसे अपने आप पर भरोसा न हो, वह दूसरों पर क्या भरोसा करेगा.’’

भानु ने नंदन के गिलास में थोड़ा पानी डाला, थोड़ा सोड़ा. इस के बाद उस ने एक ही झटके में अपना गिलास खाली किया और एक पैग ह्विस्की डाल कर उस में भी थोड़ा सोड़ा और पानी डाल लिया. वह उस का तीसरा पैग था, जो उस ने एक ही बार में खाली कर दिया.

भानु का गिलास खाली होते ही, नंदन माथुर शांत भाव से बोले, ‘‘भानु, तुम 2 नहीं, 3 पैग ह्विस्की पी चुके हो. वादा पूरा हो चुका. अब तुम अपने कमरे में जाओ. बाकी जो बात करनी हो, सुबह कर लेना.’’

‘‘बिल्कुल ठीक कहा तुम ने दोस्त,’’ भानु ने जान बूझ कर शराबियों वाले अंदाज में कहा, ‘‘वाकई अब मुझे जाना चाहिए. नशा भी काफी हो चुका है. लेकिन एक समस्या है. बातोंबातों में मैं दो की जगह 3 पैग पी गया और 3 सैद्धांतिक रूप से ठीक नहीं होते. देखो न, हम 3 हैं, इसलिए बीचबीच में तनाव और लड़ाईझगड़े की स्थिति बन जाती है. 2 या 4 होते, तो ऐसा कतई नहीं होता. मैं नहीं चाहता कि तुम लोगों के साथ बिताया डेढ़ घंटे का समय कोई गंभीर स्थिति पैदा कर दे, इसलिए मेरा एक पैग और पीना जरूरी है.’’

भानु की इस बात के जवाब में न नंदन कुछ बोले, न युवती. भानु ने नंदन की ओर देख कर कहा, ‘‘सवा दस बजे हैं. ऐसा करो, रूम सर्विस को खाने के लिए बोल दो. साढ़े दस के बाद खाना नहीं मिलेगा. तुम लोगों के साथ 2 चपाती खा कर अपने कमरे में चला जाऊंगा.’’

भानु ने नंदन के कमरे में बैठ कर अपने दिमाग से जिस तरह जाल बुना था, उस में वह पूरी तरह फंस चुके थे. वह जानते थे कि भानु इतनी आसानी से नहीं टलेगा. अत: उन्होंने रूम सर्विस को फोन कर के खाने का आर्डर दे दिया.

पौने ग्यारह बजे जब वेटर खाना ले कर आया तो भानु, नंदन और युवती तीनों ही अपनेअपने गिलास खाली कर चुके थे. डोरबेल की आवज सुनते ही युवती अपना गिलास मेज के नीचे रख कर बेड पर जा लेटी.

नंदन और भानु के गिलास अभी भी मेज के ऊपर ही रखे थे. नंदन की जगह भानु ने ही दरवाजा खोला. वेटर ने अंदर आ कर मेज से खाली गिलास और प्लेटें हटाईं और मेज की साफसफाई कर के खाना लगा दिया.

जब वेटर अपना काम कर चुका तो भानु ने अपने कोट की अंदरवाली जेब में हाथ डाल कर 100 रुपए का नोट निकाला और वेटर को थमाते हुए बोला, ‘‘थैंक्यू फौर गुड सर्विस. खाना खा कर हम अपने कमरे में चले जाएंगे. साहब को डिस्टर्ब नहीं करना, बर्तन सुबह उठा लेना.’’

‘‘यस सर.’’ कहते हुए वेटर चला गया. वेटर के जाते ही भानु ने स्वयं उठ कर दरवाजा बंद कर दिया. दरवाजा बंद करने के बाद भानु बेड पर लेटी लड़की के पास पहुंचा और उस की बांह पकड़ कर उठाते हुए बोला,

‘‘उठो डियर जान के जंजाल. अभी एक

पैग भी पीना है और खाना भी खाना है.’’

‘‘मुझे सोने दो, नींद आ रही है.’’ युवती ने भानु का हाथ झटकते हुए कहा, तो भानु हलके से उस की बांह मरोड़ते हुए बोला, ‘‘बनो मत, मैं सब जानता हूं, तुम कितने नशे में हो. मैं ने तुम्हारे गिलास में जान बूझ कर चारचार बूंद ह्विस्की डाली थी. इतनी ह्विस्की से तुम जैसी लड़की को कभी नशा नहीं हो सकता.’’

युवती कुनमुनाते हुए उठी और मेज पर आ कर बैठ गई. नशे में धुत नंदन माथुर चुपचाप बैठे थे. भानु ने युवती के लिए बड़ा सा एक पैग बनाया और उस के हाथ में थमाते हुए बोला, ‘‘ये पियो और खाना खा कर सो जाओ. इस के बाद मैं भी अपने कमरे में चला जाऊंगा.’’

बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा – भाग 3

अब इंसपेक्टर शर्मा को गार्ड से उस की शिनाख्त करानी थी. वह गार्ड को अपनी कार में बैठा कर उसी जगह खड़े हो गए, जहां एक दिन पहले ऐश्वर्या कार पर सवार हुई थी. थोड़ी देर में वह कार आई तो गार्ड ने सलीम की पहचान कर दी. अगले दिन इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के फ्लैट पर पहुंचे. जब उन्होंने उस से सलीम के बारे में पूछा तो वह सकते में आ गई. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘सलीम मेरा भाई है.’’

‘‘कहां रहता है?’’

‘‘भदोही में.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

ऐश्वर्या इस बात की सूचना सलीम को दे सकती थी, इसलिए इंसपेक्टर शर्मा ने पहले ही अपनी एक टीम वहां भेज दी थी. वह ऐश्वर्या के घर से सीधे निकले और सलीम के घर की ओर चल पड़े. पता उन के पास था ही. भदोही पहुंच कर उस की आलीशान कोठी देख कर वह दंग रह गए. उन्होंने गार्ड से सलीम के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह तो औफिस में है. पता ले कर इंसपेक्टर औफिस पहुंचे तो वहां वह मिल गया. उन्होंने सीधे पूछा, ‘‘रुखसाना उर्फ ऐश्वर्या से आप का क्या संबंध है?’’

‘‘रुखसाना मेरे यहां रिसैप्शनिस्ट थी. 2 साल मेरे यहां काम करने के बाद उस ने किसी नरेश नाम के व्यक्ति से कोर्टमैरिज कर ली थी.’’

‘‘शादी के बाद वह कहां गई?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘थोड़ा कोशिश कीजिए, शायद याद आ जाए.’’

‘‘वह मेरे लिए एक कर्मचारी से ज्यादा कुछ नहीं थी, इसलिए मैं उस के बारे में पता कर के क्या करूंगा?’’ कह कर सलीम ने पल्ला झाड़ना चाहा. तभी एक कर्मचारी ने अंदर आ कर उस के सामने एक पर्ची रख दी. पर्ची पढ़ कर सलीम ने कहा, ‘‘माफ कीजिए इंसपेक्टर साहब, एक जरूरी काम आ गया है, मैं अभी आता हूं.’’

कर्मचारी से चाय लाने को कह कर सलीम बाहर आया. इंसपेक्टर ने उस कंप्यूटर की स्क्रीन अपनी ओर मोड़ ली, जो सीसीटीवी कैमरे से जुड़ा था. स्क्रीन पर ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना का चेहरा दिख रहा था. हालांकि वह बुरके में थी, लेकिन अंदर आ कर उस ने चेहरा खोल लिया था. उसे देख कर इंसपेक्टर शर्मा हैरान रह गए. उन्हें पक्का यकीन हो गया कि नरेश की हत्या के पीछे इन्हीं दोनों का हाथ है.

ऐश्वर्या ने पूछा, ‘‘इंसपेक्टर तो नहीं आया था?’’

‘‘वह अंदर बैठा है.’’ सलीम ने कहा, ‘‘उसे यहां का पता कैसे मिला?’’

‘‘मैं ने बताया है. उस से तुम्हें अपना भाई बताया है.’’

‘‘बेवकूफ, तुम ने तो सारा खेल बिगाड़ दिया.’’ सलीम फुसफुसाते हुए चीखा.

‘‘मैं ने कैसे खेल बिगाड़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह कहने की क्या जरूरत थी कि मैं तुम्हारा भाई हूं.’’

‘‘और क्या कहती?’’

‘‘मैं ने उसे सचसच बता दिया है कि तुम मेरे यहां रिसैप्शनिस्ट थी.’’

‘‘अब क्या होगा?’’ ऐश्वर्या बेचैनी से बोली.

‘‘अब जो भी होगा, हम दोनों झेलेंगे. फिलहाल तुम जिस तरह आई हो, वैसे ही लौट जाओ.’’ सलीम ने कहा और औफिस में आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही इंसपेक्टर शर्मा ने कहा, ‘‘आप रुखसाना को पहचान तो सकते हैं? इस के लिए आप को मेरे साथ वाराणसी चलना होगा.’’

‘‘मेरे पास समय नहीं है.’’

‘‘समय निकालना होगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने घुड़का तो वह साथ चल पड़ा. पहले तो वह कहता रहा कि वह रुखसाना के बारे में कुछ नहीं जानता. लेकिन जब इंसपेक्टर शर्मा ने कहा कि उन के पास इस बात के सबूत हैं कि उस का रुखसाना उर्फ ऐश्वर्या से अवैध संबंध था तो वह सन्न रह गया.

थाने पहुंच कर इंसपेक्टर शर्मा ने ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना, सलीम और गार्ड को आमनेसामने किया तो सारा रहस्य उजागर हो गया. गार्ड ने सलीम की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘यही साहब अकसर ऐश्वर्या मैडम से मिलने देर शाम को आया करते थे.’’

अब सिवाय अपना अपराध स्वीकार करने के उन दोनों के पास कोई उपाय नहीं बचा था. सलीम और ऐश्वर्या फंस चुके थे. अब इंसपेक्टर शर्मा यह जानना चाहते थे कि ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना ने सलीम के साथ मिल कर नरेश की हत्या क्यों की थी?

पूछताछ शुरू हुई तो रुखसाना ने सिसकते हुए कहा, ‘‘सलीम के यहां नौकरी करते हुए उन से मेरे नाजायज संबंध बन गए थे. मैं इन से निकाह करना चाहती थी, लेकिन इन्होंने मना कर दिया. यह मुझे बीवी नहीं, रखैल बना कर रखना चाहते थे, जो मुझे मंजूर नहीं था. इन की बेवफाई से मैं हताश हो उठी. तभी नरेश से मेरी मुलाकात हुई. फिर मैं ने उन्हें पाने में देर नहीं की.’’

‘‘आप ने नरेश को धोखा क्यों दिया, जबकि उस ने तुम्हारे लिए अपने खून के रिश्ते तक को छोड़ दिया था?’’

‘‘वह सुबह निकलते थे तो देर रात को ही घर आते थे. उन पर काम का बोझ इतना अधिक था कि आते ही खापी कर सो जाते थे. जबकि मैं चाहती थी कि वह मुझे समय दें, मुझ से बातें करें, घुमानेफिराने ले जाएं. लेकिन उन्हें अपने काम के अलावा कुछ सूझता ही नहीं था, जिस से मैं चिढ़ जाती थी.’’

‘‘वह तुम्हारी हर सुखसुविधा का खयाल रखते थे, क्या यह कम था?’’

‘‘एक औरत को सिर्फ सुखसुविधा ही नहीं चाहिए. उस की और भी ख्वाहिशें होती हैं. अगर उन के पास मेरे लिए समय नहीं था तो वह मुझ से शादी ही न करते.’’ सिसकते हुए ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘इस का मतलब यह तो नहीं कि किसी और से संबंध बना लिया जाए.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने कहा, ‘‘चलो संबंध बना लिया, ठीक था, लेकिन नरेश को मार क्यों दिया?’’

‘‘नरेश की बेरुखी की वजह से मैं ने सलीम से दोबारा जुड़ने का मन बनाया. इत्तफाक से उसी बीच एक मौल में मेरी मुलाकात सलीम से हो गई. यह खरीदारी करने आए थे. इन्होंने मुझ से फोन नंबर मांगा तो मैं ने दे दिया. उस के बाद बातचीत तो होने ही लगी, मिलनाजुलना भी शुरू हो गया. सलीम मेरी हर ख्वाहिश पूरी करते थे. यह अकसर देर शाम को मेरे घर आते और सुबह जल्दी चले जाते.’’

‘‘तुम्हारे पति ऐतराज नहीं करते थे?’’

‘‘मैं उन्हें रात की कौफी में ज्यादा मात्रा में नींद की गोलियां मिला कर दे देती थी, जिस से वह गहरी नींद सो जाते थे. एक रात उन की नींद खुल गई. मुझे अपने पास न पा कर जब वह उठे तो दूसरे कमरे में लाइट जलती देख कर वहां आ गए. सलीम को मेरे साथ देख कर वह कुछ पूछते, उस के पहले ही हम दोनों ने उन्हें कस कर पकड़ लिया. सलीम ने उन के हाथ पकड़ लिए तो मैं ने उन के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. इस के बाद जमीन पर गिरा कर सलीम तब तक उन का गला दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. उस के बाद रात में लाश को ले जा कर कुएं में डाल दिया.’’

पूछताछ के बाद इंसपेक्टर शर्मा ने ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना और सलीम को वाराणसी की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. इन दोनों का क्या होगा, यह तो समय बताएगा, पर नरेश को तो ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना की खूबसूरती पर मरमिटने की सजा मिल गई. आज की नई पीढ़ी सीरत पर नहीं, सूरत पर मर रही है, जिस का वह खामियाजा भी भुगत रही है.

सम्मान की जीत- भाग 3

लिहाजा रूबी को पंचायत की बात माननी पड़ी. उस ने खेत में पड़ा गेहूं बोरियों में भरना शुरू किया और बोरी को लादलाद कर प्रधान के घर में रखना शुरू कर दिया, सूरज ऊपर तप रहा था, रूबी की आंखों में आंसू थे, पर वह अपने को किसी जाल में फंसा हुआ महसूस कर रही थी.

वह अभी कुछ ही बोरे रख पाई थी कि उस के पैर कांपने लगे. उस की जांघें छलनी हो गई थीं. उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह और नहीं सह सकी और वहीं बेहोश हो गई.

रूबी की आंख जब खुली, तो उस ने अपने आसपास सभी साथियों को पाया, जो समाजसेवा के काम में रूबी के साथ ईरिकशे पर बैठ कर जाती थीं, उन लोगों ने ही रूबी को अस्पताल में भरती कराया और उस से बिलकुल भी चिंता न करने की सलाह दी.

जब अस्पताल से रूबी को छुट्टी मिली, तो वह वहां से अपनी साथियों की मदद से महिला आयोग पहुंची, जहां उस ने अपने ऊपर हुए जुल्म की दास्तां बताई और यह भी बताया कि किस तरह से उस का पति एक दूसरी औरत के साथ जिस्मानी संबंध रखे हुए है, जबकि उन दोनों ने आपसी सहमति से प्रेम विवाह किया था.

महिला आयोग ने रूबी से हमदर्दी तो दिखाई, पर यह भी कहा कि आप पढ़ीलिखी लगती हैं… और जब तक आप के पास अपने पति के खिलाफ दूसरी महिला के साथ संबंध होने का कोई सुबूत नहीं होगा. तब तक हम

चाह कर भी आप की कोई मदद नहीं कर पाएंगे.

रूबी निराश हो कर वहां से लौट आई और यह सोचने लगी कि सुबूत कैसे जुटाया जाए.

फिर कुछ दिन बीतने के बाद रूबी एक दिन दोपहर में चोरीछुपे अपने गांव के घर में पहुंची और दरवाजा खटखटाया.

दरवाजा करन ने खोला और रूबी को देखते ही बिफर गया, ‘‘तू फिर यहां आ गई अपनी शक्ल दिखाने के लिए.’’

‘‘करन… एक मिनट मेरी बात तो सुनो… हम ने तो प्रेम विवाह किया था, फिर मुझ से इतनी नफरत क्यों?’’ रूबी ने पूछा.

‘‘प्रेम विवाह… हुंह… क्या तुम नहीं जानती कि हम दोनों अलगअलग जाति से संबंध रखते हैं… और हमारे गांव में किसी भी छोटी जाति वाली लड़की से शादी करने वाले को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता… पूरे गांव ने मेरा बहिष्कार कर दिया… मैं अब और नहीं सह सकता… और फिर तुम्हारे अंदर भी मैं ने एक कमाऊ औरत होने का अहंकार देखा… तुम काम से आ कर मुझ पर अहसान दिखाती थी और अकसर ही मेरा बिस्तर बिना गरम किए ही सो जाती थी. और मैं रातभर करवट बदलता रहता था… और फिर तुम्हारे भी तो बाहर और भी कई मर्दों के साथ संबंध हैं, इसीलिए मैं ने भी इस औरत के साथ संबंध बना लिया है और आगे भी मैं इसी के साथ रहूंगा,’’ करन ने सब स्वीकार कर लिया.

‘‘पर, मैं ने तुम से प्रेम…’’ रूबी का स्वर बीच में ही रुक गया.

‘‘हट साली… गड़रिया की जाति… चली है एक ब्राह्मण से इश्क लड़ाने… भाग जा यहां से और दोबारा इस दरवाजे पर मत आना,’’ दहाड़ उठा था करन.

रूबी पीछे चल दी, आगे चल कर उस ने अपने हैंडबैग में छुपा खुफिया कैमरा निकाला और उस में होने वाली रिकौर्डिंग बंद की और अब उस के चेहरे पर विजयी मुसकान थी.

ये वीडियो रिकौर्डिंग उस ने कोर्ट में पेश की, जहां पर करन को अपने पत्नी को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने के लिए और दूसरी महिला से संबंध रखने के आरोप में सजा सुनाई गई.

यही नहीं, पंचायत द्वारा एक स्त्री पर अमानवीय व्यवहार करने के जुर्म में पंचायत के सभी सदस्यों को भी सजा दी गई और प्रधान को तत्काल प्रभाव से उस के पद से भी हटा दिया गया.

ये एक औरत की जीत थी, उस के सम्मान की जीत…

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें