अब पता चलेगा – भाग 1 : क्या कभी रुक पाया राधा और विकास का झगड़ा

28दुबई से संदली उत्साह से भरे स्वर में अपने पापा विकास और मम्मी राधा को बता रही थी,”पापा, मैं आप को जल्दी ही आर्यन से मिलवाउंगी. बहुत अच्छा लड़का है. मेरे साथ उस का एमबीए भी पूरा हो रहा है. हम दोनों ही इंडिया आ कर आगे का प्रोग्राम बनाएंगे.”

विकास सुन कर खुश हुए, कहा,”अच्छा है,जल्दी आओ, हम भी मिलते हैं आर्यन से. वैसे कहां का है वह?”

”पापा, पानीपत का.”

”अरे वाह, इंडियन लड़का ही ढूंढ़ा तुम ने अपने लिए. तुम्हारी मम्मी को तो लगता था कि तुम कोई अंगरेज पसंद करोगी.‘’

संदली जोर से हंसी और कहा,”मम्मी को जो लगता है, वह कभी सच होता है क्या? फोन स्पीकर पर है पर मम्मी कुछ क्यों नहीं बोल रही हैं?”

”शायद उसे शौक लगा है आर्यन के बारे में जान कर.”

राधा का मूड बहुत खराब हो चुका था. वह सचमुच जानबूझ कर कुछ नहीं बोलीं.

जब विकास ने फोन रख दिया तो फट पड़ीं,”मुझे तो पता ही था कि यह लड़की पढ़ने के बहाने से ऐयाशियां करेगी. अब पता चलेगा पढ़ने भेजा था या लड़का ढूंढ़ने.”

”क्या बात कर रही हो, जौब भी मिल ही जाएगा. अब अपनी पसंद से लड़का ढूंढ़ लिया तो क्या गलत किया? संदली समझदार है, जो फैसला करेगी, अच्छा ही होगा.”

“अब पता चलेगा कि इस लड़की की किसी से निभ नहीं सकती, न किसी काम की अकल है, न कोई तमीज.और जो यह लोन ले रखा है, शादी कर के बैठ जाएगी तो कौन उतारेगा लोन? मुझे पता ही था कि यह लड़की कभी किसी को चैन से नहीं रहने दे सकती,” राधा जीभर कर संदली को कोसती रहीं.

विकास को उन पर गुस्सा आ गया, बोले,”तुम्हें तो सब पता रहता है. बहुत अंतरयामी समझती हो खुद को.पता नहीं कैसे इतना ज्ञानी समझती हो खुद को.

“आसपड़ोस की अपनी जैसी हर समय कुड़कुड़ करने वाली लेडीज की बातों के अलावा कुछ भी पता है कि क्या हो रहा है दुनिया में?”

हर बार की तरह दोनों का गुस्स्सा रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था.

विकास ने जूते पहनते हुए कहा, “मैं ही जा रहा हूं थोड़ी देर बाहर, अकेली बोलती रहो.”

यह कोई पहली बार तो हुआ नहीं था. बातबेबात किचकिच करने वाली राधा का तकियाकलाम था,’अब पता चलेगा.’

बड़ी बेटी प्रिया कनाडा में अपनी फैमिली के साथ रहती थी, संदली फिलहाल दुबई में थी. कोई भी कैसी भी बात करता, राधा हमेशा यही कहतीं कि उन्हें सब पता था. उन का कहना था कि उन्होंने इतनी दुनिया देखी है, उन्हें हर बात का इतना ज्ञान है कि कोई भी बात उन से छिपी नहीं रहती, फिर चाहे कुकिंग की बात हो या फैशन की.

यहां तक कि राजनीति की हलचल पर भी कोई बात होती तो उन का कहना होता कि उन्हें तो पता ही था कि फलां पार्टी यह करेगी. 1-2 दिन पहले वे किसी से कह रहीं थीं कि उन्हें तो पता ही था कि अब किसान आंदोलन होगा.

उन की बात सुनते हुए विकास ने बाद में टोका था,”ऐसी हरकतें क्यों करती हो, राधा? किसान आंदोलन होगा, यह भी तुम्हें पता था, कुछ तो सोच कर बोला करो.”

”अरे,मुझे पता था कि कुछ ऐसा होगा.”

विकास चुप हो गए, पता नहीं कौन सी ग्रंथि है राधा के मन में जो वह हर बात में घर में किसी न किसी बात में हावी होने की कोशिश करती थी. कई बार विकास अपने रिश्तेदारों के सामने राधा की बातों से शर्मिंदा भी हो जाते थे. बेटियां भी इस बात से हमेशा बचती रहीं कि राधा के सामने उन की फ्रैंड्स आएं.

विकास अंधेरी में एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थे. आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी पर राधा कंजूस भी थी और बहुत तेज भी, साथ ही उन्हें अपने उस ज्ञान पर भी बहुत घमंड था जो ज्ञान दूसरों की नजर में मूर्खता में बदल चुका था. अजीब सी आत्ममुग्ध इंसान थीं.

घर में उन के व्यवहार से सब हमेशा दुखी रहते. राधा ने संदली को अगले दिन फोन किया और सीधे पूछा,”अभी शादी कर लोगी तो तुम्हारा लोन कौन चुकाएगा?”

”मैं इंडिया आ कर जौब करूंगी, लोन उतार दूंगी. अभी हम दोनों सीधे मुंबई ही आ रहे हैं, आर्यन को आप लोगों से मिलवा दूं?”

राधा ने कोई उत्साह नहीं दिखाया. संदली ने उदास हो कर फोन रख दिया. संदली और आर्यन को एअरपोर्ट से लेने विकास खुद जा रहे थे.

प्रोग्राम यह तय हुआ कि विकास औफिस से सीधे एअरपोर्ट चले जाएंगे. देर रात सब घर पहुंचे तो राधा ने सब के लिए डिनर तैयार कर रखा था. आर्यन उन्हें पहली नजर में ही बहुत अच्छा लगा पर बेटी से मन ही मन नाराज थीं कि पढ़ने भेजा था, लड़का पसंद कर के घर ले आई है.

उन्हें विकास पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था कि अभी से कैसे आर्यन को दामाद समझ रहे हैं. संदली फोन पर पहले ही बता चुकी थी कि पानीपत में आर्यन के पिता का बहुत लंबाचौड़ा बिजनैस है. बहुत धनी, आधुनिक परिवार है. 2 ही भाई हैं, आर्यन बड़ा है, छोटा भाई अभय अभी पढ़ रहा है.

आर्यन से मिलने, उस से बातें करने के बाद कोई कारण ही नहीं था कि राधा कुछ कमी निकालती पर यह बात हजम ही नहीं हो रही थी कि बेटी ने अपने लिए लड़का खुद पसंद कर लिया है.

विकास को भी आर्यन बहुत पसंद आया था. वह ऐसे घुलमिल गया था कि जैसे कब से इस परिवार का ही सदस्य है.

डिनर करते हुए संदली ने कहा,”मम्मी, हम दोनों अब कल ही दिल्ली जा रहे हैं. वहां आर्यन के पेरैंट्स हमें एअरपोर्ट पर लेने आ जाएंगे. मुझे भी उन से मिलना है. मैं जल्दी ही वापस आ जाउंगी.”

राधा ने कहा,”मुझे तो पता ही था कि तुम हम से पूछोगी भी नहीं, खुद ही होने वाले ससुराल पहुंच जाओगी.अब पता चलेगा.’’

विकास ने आर्यन की उपस्थिति को देखते हुए मुसकरा कर बात संभाली,”यह तो अच्छा ही है न कि तुम अपनी बेटी को जानती हो, तुम्हें पता था, अच्छा है.”

संदली ने मां की बात पर ध्यान ही नहीं दिया. युवा मन अपने सपनों में खोया था, प्यार से बीचबीच में एकदूसरे को देखते संदली और आर्यन विकास को बड़े अच्छे लगे.

गुलदारनी – भाग 1: चालाक शिकारी की कहानी

इलाके में मादा गुलदार ताबड़तोड़ शिकार कर रही थी. न वह इनसानों को छोड़ रही थी, न जानवरों को. वह छोटेबड़े का शिकार करते समय कोई लिहाज नहीं करती थी.

वह अपने शिकार को बुरी तरह घसीटघसीट कर, तड़पातड़पा कर मारती थी.

जंगल महकमे के माहिरों के भी मादा गुलदार को पकड़ने की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं. वह इतनी चालाक शिकारी थी कि पिंजरे में फंसना तो दूर, वह पिंजरे को ही पलट कर भाग जाती थी. उसे ढूंढ़ने के लिए अनेक ड्रोन उड़ाए गए, लेकिन शिकार कर के वह कहां गुम हो जाती थी, किसी को पता ही नहीं चलता.

मादा गुलदार की चालाकी के किस्से इलाके में मशहूर हो गए. आसपास के गांव के लोग उसे ‘गुलदारनी’ कह कर पुकारने लगे.

जटपुर की रहने वाली स्वाति भी किसी ‘गुलदारनी’ से कम नहीं थी. वह कुछ साल पहले ही इस गांव में ब्याह कर आई थी. 6 महीने में ही उस ने अपने पति नरदेव समेत पूरे परिवार का मानो शिकार कर लिया था. नरदेव उस के आगेपीछे दुम हिलाए घूमता था.

सासससुर अपनी बहू स्वाति की अक्लमंदी के इतने मुरीद हो गए थे कि उन को लगता था कि पूरी दुनिया में ऐसी कोई दूसरी बहू नहीं. ननद तो अपनी भाभी की दीवानी हो गई थी. घर में स्वाति के और्डर के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था.

घर फतेह करने के बाद स्वाति ने धीरेधीरे बाहर भी अपने पैर पसारने शुरू कर दिए. गांव में चौधरी राम सिंह की बड़ी धाक थी. इज्जत के मामले में कोई उन से बढ़ कर नहीं था. हर कोई सलाहमशवरा लेने के लिए उन की चौखट पर जाता. लंगोट के ऐसे पक्के कि किरदार पर एक भी दाग नहीं

एक दिन नरदेव और स्वाति शहर से खरीदारी कर के मोटरसाइकिल से लौट रहे थे. नरदेव ने रास्ते में चौधरी राम सिंह को पैदल जाते देखा, तो नमस्ते करने के लिए मोटरसाइकिल रोक ली.

स्वाति ने चौधरी राम सिंह का नाम तो खूब सुना था, पर वह उन्हें पहचानती नहीं थी.

नरदेव ने स्वाति से राम सिंह का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘आप हमारे गांव के चौधरी राम सिंह हैं. रिश्ते में ये मेरे चाचा लगते हैं.’’

स्वाति के लिए इतना परिचय काफी था. उस की आंखों का आकर्षण किसी को भी बींध देने के लिए काफी था.

स्वाति बिना हिचकिचाए बोली, ‘‘चौधरी साहब, आप को मेरी नमस्ते.’’

‘‘नमस्ते बहू, नमस्ते,’’ चौधरी राम सिंह ने दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहा.

तब तक स्वाति मोटरसाइकिल से उतर कर चौधरी राम सिंह के सामने खड़ी हो गई. अपनी लटों को ठीक करते हुए वह बोली, ‘‘चौधरी साहब, केवल ‘नमस्ते’ से ही काम नहीं चलेगा, कभी घर आइएगा चाय पर. हमारे हाथ की चाय नहीं पी, तो फिर कैसी ‘नमस्ते’.’’

इतना सुन कर चौधरी राम सिंह की केवल ‘हूं’, निकली.

स्वाति अपने पल्लू को संभालते हुए मोटरसाइकिल पर सवार हो गई. चौधरी राम सिंह उन्हें दूर तक जाते देखते रह गए. उन पर एक बावलापन सवार हो गया. वे रास्तेभर ‘चाय पीने’ का मतलब निकालते रहे.

चौधरी राम सिंह रातभर यों ही करवटें बदलते रहे और स्वाति के बारे में सोचते रहे. वे किसी तरह रात कटने का इंतजार कर रहे थे.

उधर घर पहुंच कर नरदेव ने स्वाति से पूछा, ‘‘तुम ने चौधरी को चाय पीने का न्योता क्यों दिया?’’

‘‘तुम भी निरे बुद्धू हो. गांव में चौधरी की कितनी हैसियत है. ऐसे आदमी को पटा कर रखना चाहिए, न जाने कब काम आ जाए.’’

स्वाति का जवाब सुन कर नरदेव लाजवाब हो गया. उसे स्वाति हमेशा अपने से ज्यादा समझदार लगती थी. वह फिर अपने कामधाम में लग गया.

चौधरी राम सिंह को जैसे दिन निकलने का ही इंतजार था.

सुबह होते ही वे नरदेव के चबूतरे पर पहुंच गए. उन्होंने नरदेव के पिता मनुदेव को देखा, तो ‘नमस्ते’ कहते हुए चारपाई पर ऐसे बैठे, जिस से निगाहें घर की चौखट पर रहें.

नरदेव ने खिड़की से झांक कर चौधरी राम सिंह को देखा तो तुरंत स्वाति के पास जा कर बोला, ‘‘लो स्वाति, और दो चौधरी को चाय पीने का न्योता, सुबह होते ही चतूबरे पर आ बैठा.’’

‘‘तो खड़ेखड़े क्या देख रहे हो? उन्हें चाय के लिए अंदर ले आओ.’’

‘‘लेकिन स्वाति, चाय तो चबूतरे पर भी जा सकती है, घर के अंदर तो खास लोगों को ही बुलाया जाता है.’’

‘‘तुम भी न अक्ल के अंधे हो. तुम्हें तो पता ही नहीं, लोगों को कैसे अपना बनाया जाता है.’’

नरदेव के पास स्वाति के हुक्म का पालन करने के सिवा कोई और रास्ता न था. वह बाहर जा कर चबूतरे पर बैठे चौधरी राम सिंह से बोला, ‘‘चाचा, अंदर आ जाइए. यहां लोग आतेजाते रहते हैं. अंदर आराम से बैठ कर चाय पिएंगे.’’

चौधरी राम सिंह को स्वाति के दर पर इतनी इज्जत की उम्मीद न थी. नरदेव ने उन्हें अंदर वाले कमरे में बिठा दिया. नरदेव भी पास में ही रखी दूसरी कुरसी पर बैठ कर उन से बतियाने लगा.

कुछ ही देर में स्वाति एक ट्रे में चाय, नमकीन, बिसकुट ले कर आ गई. नरदेव को चाय देने के बाद वह चौधरी राम सिंह को चाय पकड़ाते हुए बोली, ‘‘चौधरी साहब, आप के लिए खास चाय बनाई है, पी कर बताना कि कैसी बनी है.’’

स्वाति के इस मनमोहक अंदाज पर चौधरी राम सिंह खुश हो गए. स्वाति चाय का प्याला ले कर मेज के दूसरी तरफ खाट पर बैठ गई. फिर स्वाति ने एक चम्मच में नमकीन ले कर चौधरी राम सिंह की ओर बढ़ाई तो चौधरी राम सिंह ऐसे निहाल हो गए, जैसे मैना को देख कर तोता.

चाय पीतेपीते लंगोट के पक्के चौधरी राम सिंह अपना दिल हार गए. जातेजाते चाय की तारीफ में कितने कसीदे उन्होंने पढ़े, यह खुद उन को भी पता नहीं.

फिर तो आएदिन चौधरी राम सिंह चाय पीने के लिए आने लगे. स्वाति भी खूब मन से उन के लिए खास चाय बनाती.

अब चौधरी राम सिंह को गांव में कहीं भी जाना होता, उन के सब रास्ते स्वाति के घर के सामने से ही गुजरते. उन के मन में यह एहसास घर कर गया कि स्वाति पूरे गांव में बस उन्हीं को चाहती है.

कुछ ही दिनों बाद राम सिंह ने देखा कि गांव में बढ़ती उम्र के कुछ लड़के स्वाति के घर के सामने खेलने के लिए जुटने लगे हैं. लड़कों को वहां खेलते देख कर चौधरी राम सिंह बडे़ परेशान हुए.

एक दिन उन्होंने लड़कों से पूछा, ‘‘अरे, तुम्हें खेलने के लिए कोई और जगह नहीं मिली? यहां गांव के बीच में क्यों खेल रहे हो?’’

‘‘ताऊजी, हम से तो स्वाति भाभी ने कहा है कि हम चाहें तो यहां खेल सकते हैं. आप को तो कोई परेशानी नहीं है न ताऊजी?’’

‘‘न…न… मुझे क्या परेशानी होगी? खूब खेलो, मजे से खेलो.’’

चौधरी राम सिंह लड़कों पर क्या शक करते? लेकिन, उन का मन बेहद परेशान था. हालत यह हो गई थी कि उन्हें किसी का भी स्वाति के पास आना पसंद नहीं था.

एक दिन चौधरी राम सिंह ने देखा कि स्वाति उन लड़कों के साथ खड़ी हो कर बड़ी अदा के साथ सैल्फी ले रही थी. सभी लड़के ‘भाभीभाभी’ चिल्ला कर स्वाति के साथ फोटो खिंचवाने के लिए कतार में लगे थे.

उस रात चौधरी राम सिंह को नींद नहीं आई. उन्हें लगा कि स्वाति ने उन का ही शिकार नहीं किया है, बल्कि गांव के जवान होते हुए लड़के भी उस के शिकार बन गए हैं.

चौधरी राम सिंह को रहरह कर जंगल की ‘गुलदारनी’ याद आ रही थी, जो लगातार अपने शिकार के मिशन पर निकली हुई थी.

एक दिन गांव में होहल्ला मच गया. बाबूराम की बेटी ने नरदेव पर छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया. शुरू में गांव में किसी को इस बात पर यकीन न हुआ. सब का यही सोचना था कि इतनी पढ़ीलिखी, खूबसूरत और कमसिन बीवी का पति ऐसी छिछोरी हरकत कैसे कर सकता है. लेकिन कुछ गांव वालों का कहना था, ‘भैया, बिना आग के कहीं धुआं उठता है क्या?’

अभी गांव में खुसुरफुसुर का दौर जारी ही था कि शाम को बाबूराम ने दारू चढ़ा कर हंगामा बरपा दिया. उस ने नशे की झोंक में सरेआम नरदेव को देख लेने और जेल भिजवाने की धमकी दे डाली.

जब स्वाति को इस बात का पता चला तो उस ने नरदेव को बचाने के लिए मोरचा संभाल लिया. चौधरी राम सिंह को तुरंत बुलावा भेजा गया.

स्वाति का संदेशा पाते ही वे हाजिरी लगाने पहुंच गए. चाय पीतेपीते उन्होंने कहा, ‘‘स्वाति, जब तक मैं हूं, तुम चिंता क्यों करती हो. अपना अपनों के काम नहीं आएगा, तो किस के काम आएगा.’’

चौधरी राम सिंह के मुंह से यह बात सुन कर स्वाति हौले से मुसकराई और बोली, ‘‘चौधरी साहब, हम भी तो सब से ज्यादा आप पर ही भरोसा करते हैं, तभी तो सब से पहले आप को याद किया.’’

चौधरी राम सिंह तो पहले से ही बावले हुए पड़े थे, यह सुन कर और बावले हो गए. उन्हें लगा कि स्वाति का दिल जीतने का उन के पास यह सुनहरा मौका है. उन्होंने यह मामला निबटाने के लिए पूरी ताकत लगा दी.

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मेरे अपने – भाग 3 : क्यों परिवार से दूर हो गई थी सुरभि

उधर से गुजरती एक नर्स की दृष्टि उस पर पड़ी तो वह पास आ कर सुरभि को सांत्वना देने लगी. जब उस ने देखा कि बिना पूरे गरम कपड़ों के वह ठंड से कांप रही है तो उस ने तुरंत वार्ड बौय को आवाज लगाई और एक कंबल मंगवाया. उस के लिए एक कप कौफी मंगवा कर जबरदस्ती पिलाई. फिर धीरे से बोली, ‘‘मैडम, सर ठीक हो जाएंगे. आप चिंता मत करो. मैं देख रही हूं कि आप कब से अकेले ही भागदौड़ कर रही हैं. आप अपने बच्चों और रिश्तेदारों को फोन कर दो. फोन है न आप के पास. नहीं तो मैं दूं.’’

नर्स द्वारा पहुंचाई गई बाह्य उपकरणों की गरमी और उस की स्नेहमयी सांत्वना की गरमाई ने पत्थर बनी सुरभि को पिघला दिया. उस की आंखों में आंसू आ गए. कानपुर में होते तो एक फोन करने की देर थी, सारा शहर एकत्र हो जाता पर मास्टरजी के इस ‘अपने’ अनजान शहर में उसे एक भी व्यक्ति याद न आया जिस को संकट की इस घड़ी में वह सहायतार्थ बुला सके. 8 महीने हो गए थे यहां आए. पर अड़ोसपड़ोस से सामान्य परिचय से अधिक संबंध बनाने का अवसर ही न मिला था. बस्ती के कई व्यक्तियों, मीडिया व नाट्य अकादमी के कई छात्रों के फोन नंबर थे उस के पास. पर वह निश्चय न कर पा रही थी कि क्या कार्य संबंधी कुछ मुलाकातों में उन लोगों से इतना रिश्ता जुड़ गया है कि अपनी निजी आवश्यकताओं के समय उन्हें सहायता के लिए बुलाया जा सके.

सुरभि को एक बार फिर से उन अपनों की कमी खलने लगी थी जिन का अस्तित्व कभी था ही नहीं. मास्टरजी के मातापिता उन्हें किशोरावस्था में ही अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले गए थे. मास्टरजी अपने मातापिता के इकलौते पुत्र थे. मातृपितृविहीन बालक से धीरेधीरे सभी सगेसंबंधियों ने दूरी बना ली थी. सभी को डर था

कि कहीं अनाथ हो गए बालक का उत्तरदायित्व उन पर न आ पड़े. दूसरी ओर सुरभि ने अपने मातापिता को कभी देखा

ही न था. उस का पालनपोषण उस के चाचाचाची ने किया था. मास्टरजी के साथ ब्याह कर उन्होंने फिर कभी उन की ओर पलट कर भी न देखा था. इन दोनों ने विवाह के बाद जब अपना छोटा सा नीड़ बसाया तो उसे प्रेम, मधुरता, स्नेह और आपसी समर्पण से ऐसे सजाया कि किसी अन्य रिश्ते के अभाव की ओर उन का ध्यान ही न गया. 10 साल यों ही बीत गए थे. फिर धीरेधीरे उन्हें अपने आंगन में किलकारियों की कमी सताने लगी.

शादी के इतने बरस बाद भी वे इस सुख से वंचित थे. सारे चिकित्सकीय प्रयास भी जब निष्फल रहे तो सुरभि ने मास्टरजी के विरोध और अपनी स्वयं की अवधारणाओं के विपरीत जा कर पूजापाठ, व्रत, मन्नत, पंडित, मौलवी कुछ भी न छोड़ा लेकिन सब व्यर्थ के पाखंड सिद्ध हुए. धीरेधीरे सुरभि की मां बनने की संभावना क्षीण होती जा रही थी. अब वह बच्चा गोद लेने का मन बना रही थी पर मास्टरजी के आदर्श कुछ और ही थे. उन के अनुसार, एक बच्चे को गोद ले कर उसे अपना वारिस बनाने से उत्तम है उस हर बच्चे में प्रेम बांटना, जो उन के पास पढ़ने आता है. एक बालक को अपना नाम देने से बेहतर है सब को ज्ञान देना. एक को ‘मेरा’ कहने से बेहतर है सब को अपना कहना. सुरभि ने सदा की भांति इस विषय में भी मास्टरजी का विरोध न किया था और अपने मातृत्व की धारा को उसी ओर मोड़ दिया था जिस ओर मास्टरजी चाहते थे. पर आज… आज कहां हैं वे सब अपने? कहां हैं वे?

अचानक रिसैप्शन की ओर कुछ हलचल सी हुई. 15-20 लोग हड़बड़ाए हुए तेजी से भीतर घुसे और रिसैप्शन को घेर कर कुछ पूछताछ करने लगे. रिसैप्शनिस्ट ने उन्हें इशारे से कुछ बताया और भीड़ तेजी से औपरेशन थिएटर की ओर लपक पड़ी. कुछ पास आने पर सुरभि ने देखा कि भीड़ में सब से आगे मीडिया केंद्र के कुछ लड़केलड़कियां थे. कुछ लोग नाट्य अकादमी के थे. उन के साथ पड़ोस में रहने वाले राजीवजी और उन की पत्नी थीं. कुछ और लोग भी थे जिन्हें सुरभि ने अकसर बस्ती में नुक्कड़ पर अड्डेबाजी करते देखा था.

‘‘अम्मा…’’ कहते हुए वृंदा दौड़ कर सुरभि के पास पहुंची और उस से लिपट गई. वे लोग पता नहीं क्याक्या कहनेपूछने लगे. सुरभि को बस एक ही आवाज सुनाई दे रही थी. क्या कहा था उस लड़की ने, ‘अम्मा…’

सुरभि को अम्मा कहा था उस लड़की ने.

ये सब विद्यार्थी अकसर उस के घर आते थे. कभीकभी किचन में भी घुस जाते थे चायकौफी या नाश्ता बनाने. मास्टरजी स्वयं बच्चों के साथ बच्चा हो जाते थे. पर सुरभि के साथ वे सब कभी अनौपचारिक न हो पाए थे. उस के गुरुगंभीर चेहरे को और भी गुरुता प्रदान करती बालों में

चांदी की चंद तारें और आंखों पर चढ़ा मोटे शीशों वाला चश्मा, कलफ लगी सिलवटविहीन सूती साड़ी और सदा कसे रहने वाले होंठों के कोर, ये सबकुछ मिला कर उस का व्यक्तित्व जैसे एक अदृश्य प्रभामंडल से घिरा रहता था जिस पर मानो प्रवेश निषेध की तख्ती लगी रहती थी. इन सब के साथ सुरभि की आत्मीयता थी, पर वह उद्दंड बरसाती झरने सी न हो कर शांत गंभीर मानसरोवर सी थी.

ऐसे में वह आदर और सम्मान की औपचारिकता में बंधे विद्यार्थियों व अन्य बस्ती वालों के लिए ‘मैम’ ही थी. पर आज यह क्या हुआ. शुष्क वर्जनाओं को ध्वस्त करता यह कौन सा झोंका था जो सुरभि को विभोर कर गया या वह स्वयं ही कोई और थी इस समय. बीती रात्रि का एकएक पल उस के चेहरे पर चिंता की झुर्रियां बन कर बिछा हुआ था. झुकी कमर और दुख से कातर आंखों में न जाने वह कौन सा खिंचाव था जो वृंदा उस के गले आ लगी थी. विकास, तरुण, तारा, सुबोध, रुचि सब ने उसे घेर लिया.

‘‘अम्मा, आप ने हमें फोन क्यों नहीं किया?’’ अरुण बोला.

‘‘वह तो अच्छा हुआ कि भूरा चाचा को मेज पर रखा मास्टरजी का फोन मिल गया. आप दरवाजे जो खुले छोड़ आई थीं. तब भूरा चाचा ने हमें ढूंढ़ कर सबकुछ बताया,’’ रुचि बोलतेबोलते रोंआसी हो आई थी.

उस के बाद किसी ने डाक्टरों और नर्सों से मास्टरजी के औपरेशन के विषय में जानकारी लेनी आरंभ कर दी, तो कोई नर्स द्वारा थमाया गया दवाओं का परचा ले कर कैमिस्ट की दुकान की ओर भागा. रुचि ने उस की पीठ के पीछे एक तकिया लगाया और उस के पांव बैंच के ऊपर कर दिए. फिर ठीक से कंबल ओढ़ा दिया. मालती शर्मा ने तुरंत थर्मस में से चाय निकाल कर उन्हें स्नेहपगी जिद के साथ पिलाई. अधिक खून की आवश्यकता न पड़ जाए, इसलिए सब बच्चों ने तुरंत अपने खून के सैंपल दिए जांच के लिए. बस्ती के टैक्सी ड्राइवर ने अपनी गाड़ी अस्पताल के बाहर ही खड़ी कर दी थी कि कहीं भागदौड़ की आवश्यकता न पड़ जाए. भूरा ने बताया कि वह दुलारी और अपनी घरवाली को मास्टरजी के घर बिठा कर आया है, इसलिए सुरभि को घर की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.

सुरभि भौचक्की सी कभी एक की सूरत देखती कभी दूसरे की. कितने प्यारे, कितने अपने लग रहे थे आज ये सब. सुरभि ने पहली बार अपने भीतर मातृत्व को अंगड़ाई लेते महसूस किया था. उस ने बांहें फैला कर बच्चों को सीने से लगा लिया.

मेरे अपने – भाग 2 : क्यों परिवार से दूर हो गई थी सुरभि

बिजली के नियमित कनैक्शन न होने के कारण मेन सड़क पर से गुजरते हाईटैंशन तार से बिजली चुराई जाती थी. मोबाइल फोन तो खैर हर छोटेबड़े के हाथ में था ही. प्रगति के नाम पर क्या ये कम था, चाहे जगहजगह कचरे के ढेर और कच्ची गलियों में जमा कीचड़ व मच्छरों की भरमार क्यों न हो. खुली नालियों में शौच करते बच्चों पर भी किसी को एतराज न था. सामुदायिक नल के काई जमे चबूतरे पर पानी भरने के इंतजार में लड़तीझगड़ती औरतों के पास फुरसत ही कहां थी वहां की गंदगी साफ करने की. मर्द चाहे निठल्ले हों या कामगार, शाम होते ही दारू के अड्डे पर जमा हो कर पीनापिलाना, औरतों पर फिकरे कसना और मारकुटाई, गालीगलौज करना उन का प्रिय टाइमपास था. बचीखुची मर्दानगी घर पहुंच कर औरतों को पीटने में खर्च होती. बच्चों को इन लोगों ने सरकारी स्कूलों में तो डाल रखा था पर उस का कारण शिक्षा के प्रति जागरूकता कतई न था. सरकार की ओर से हर विद्यार्थी को छात्रवृत्ति मिलती थी और किताबें मुफ्त बांटी जाती थीं. स्कूल में मिलने वाला भोजन भी बच्चों को वहां भेजने के मुख्य कारणों में से एक था.

जितना बुरा हाल उस बस्ती का था, उतनी ही दृढ़ता से सुरभि ने निश्चय कर लिया उसे सुधारने का. मास्टरजी का उसे पूरा सहयोग मिला. सब से पहले दोनों कई संबंधित अधिकारियों से मिले. कई दफ्तरों के चक्कर काटे. इलाके के विधायक से भी मिले. सब को उन्होंने बस्ती की दुर्दशा और अपने प्रोजैक्ट के विषय में बताया. सर्वोदय विद्यालय के प्रधानाध्यापक से भी मिले और वहां रात्रिकालीन प्रौढ़ शिक्षा केंद्र शुरू करने का प्रबंध किया. लोगों को केंद्र पर आने के लिए आकर्षित करने के लिए सुरभि ने एक अनूठा कार्यक्रम बनाया. वह यूनिवर्सिटी के टैली कम्यूनिकेशन ऐंड मल्टीमीडिया विभाग के डीन से मिली और उन्हें अपना प्रोजैक्ट समझा कर उन से सहायता मांगी.

वह चाहती थी कि छात्र सामाजिक जागरूकता व महिला कल्याण जैसे विषयों पर कुछ ऐसी रोचक व विचारोत्तेजक फीचर और ऐनिमेशन फिल्मों का निर्माण करें जो नीरस डाक्युमैंट्री फिल्मों जैसी न हों. मनोरंजन के साथसाथ वे फिल्में उन के दिलोदिमाग को झकझोर कर सोचने पर मजबूर कर दें. छात्रों ने उन को भरपूर सहयोग दिया और ऐसी कई टैलीफिल्मों का निर्माण किया जिन का प्रदर्शन हर रविवार को केंद्र पर किया जाने लगा. इस के साथ ही सुरभि ने इंदौर युवा नाट्य कला केंद्र के नुक्कड़ नाटक करने वाले कलाकारों को भी अपने अभियान में शामिल कर लिया. ये लोग हफ्ते में 1 दिन वहां सामाजिक जागरूकता संबंधित नाटक खेलते. बड़ी भीड़ जुट जाती थी. कुछ लोग केवल फिल्में और नाटक देखने आते और कुछ केंद्र द्वारा परोसी गई चाय पीने. कुछ भी हो, चिंगारी लग चुकी थी.

बस्ती के जिन लोगों ने इन दोनों पतिपत्नी को पागल की संज्ञा दी थी वही अब उन के अथक परिश्रम और लगन से विस्मित थे. लोग हैरान थे, कुछ तो बात है इन में. जो कुछ भी ये लोग कर रहे हैं शायद सच में ही उस से हमारा भला होगा और धीरेधीरे बात बन गई. स्कूल चल निकला. सुरभि और मास्टरजी के चेहरों पर थकान तो थी पर सफलता की रौनक का तेज भी था.

सुरभि ने जो कार्य अपने खाली समय के सदुपयोग के लिए शुरू  किया था वह अब एक लक्ष्य बन गया था. सारी उम्र एक नियमित जीवन जीने वाले व्यक्तियों की दिनचर्या अब इस उम्र में आ कर अस्तव्यस्त हो रही थी. देर रात तक काम करने की वजह से अकसर सुबह की सैर छूट जाती.

नाश्ते के समय कभी नुक्कड़ नाटक वाले तो कभी मल्टीमीडिया के विद्यार्थी आ जुटते नएनए विषयों पर विचारविमर्श करने. कभी बस्ती के निवासी ही आ जाते अपनी समस्याओं के निवारणार्थ. कोई अपने घरेलू झगड़ों का निबटारा मैडमजी से करवाना चाहता तो कोई किसी सरकारी दफ्तर में फंसी अपनी किसी समस्या के निराकरण का रास्ता पूछने आता था.

कभी कुछ लोग एकत्र हो कर आते और अपनी नईनई आवश्यकताओं की सूची मास्टरजी को पकड़ा देते. खुली नालियां ढकवानी हों या बहते सीवरों की सफाई, मच्छर मारने की दवा छिड़कवानी हो या जमा हुए पानी में लाल दवाई, लोग अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काट कर सीधे मास्टरजी के पास ही आते थे. सुरभि और मास्टरजी जैसे उन की हर समस्या की ‘मास्टर की’ बन गए थे.

सारी उम्र मास्टरजी ने एक जगह बैठ कर मात्र अध्यापन कार्य ही किया था. इस तरह की भागदौड़ उन के स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही थी. उत्तरदायित्वों को अपने आराम के लिए बीच में ही अधूरा छोड़ देना उन्होंने न तो स्वयं सीखा था न अपने विद्यार्थियों को सिखाया था. सुरभि कभी आराम करने या समय पर खानेपीने को टोकती भी तो वे नजरअंदाज कर जाते. काम के जनून में वे अब अकसर अपनी छोटीमोटी शारीरिक परेशानियों और थकावट को सुरभि से छिपा जाते थे. उसी का नतीजा आज सामने था.

रात को सोते समय दी गई डायजीन की गोलियां कुछ काम न आई थीं. अपनी बेचैनी को वे भरसक दबा रहे थे. उधर, सुरभि रजाई में घुसते ही सो गई थी. मास्टरजी कुछ देर तक यों ही बेचैनी में करवटें बदलते रहे. फिर धीरे से उठ कर कमरे में ही टहलने लगे. उन्हें पसीना आने लगा. अचानक सीने में और बाएं बाजू में उन्हें तेज दर्द महसूस हुआ. आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. सीने में एक बार फिर तेज दर्द की लहर उठी और वे कराह कर बिस्तर पर लुढ़क गए.

सुरभि की नींद टूट गई. वह घबरा कर उठी और मास्टरजी को अर्धबेहोशी में पसीने से भीगा व दर्द से कराहते देख कर उस की चीख निकल गई. सारे संकेत हार्ट अटैक की ओर इशारा कर रहे थे. उस ने दौड़ कर दवाओं का डब्बा उठाया और एक एस्प्रिन टैबलेट पानी में घोल कर मास्टरजी को पिला दी. फिर उन्हें शाल ओढ़ाई और भाग कर गाड़ी की चाबी उठाई. दरवाजा खोल कर चौकीदार को बुलाया और उस की सहायता से मास्टरजी को गाड़ी में लिटाया. फिर घर के दरवाजे तक बंद करने की चिंता किए बिना तूफानी गति से गाड़ी दौड़ाती वह अस्पताल पहुंच गई.

आपातकालीन विभाग में तुरंत उन्हें डाक्टरों ने घेर लिया. आवश्यक टैस्ट किए गए. यह एक मेजर हार्ट अटैक था. मास्टरजी को आननफानन औपरेशन थिएटर में शिफ्ट कर दिया गया. सुरभि को रिसैप्शन पर जा कर औपरेशन संबंधी आवश्यक कार्यवाही पूरी करने को कहा गया. खून का प्रबंध भी करना था. सुरभि जैसे सम्मोहन अवस्था में थी. वह यंत्रवत भागभाग कर सारी व्यवस्था करने लगी. औपरेशन शुरू हो गया था. सुबह के 6 बजे थे. औपरेशन थिएटर के बाहर सूने गलियारे में सुरभि 2 घंटे से मूर्तिवत जड़ बैठी थी.

मोह का जाल: क्यों लड़खड़ाने लगा तनु के पैर

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ले बाबुल घर आपनो…- भाग 3 : सीमा ने क्या चुना पिता का प्यार या स्वाभिमान

कुछ दिन तक तो वे समय पर घर पहुंचते रहे थे. लेकिन क्रम टूटते ही घर में तूफान आ जाता था. एक बार तो सीमा ने हद कर दी थी. महाराज के बारबार खाने के लिए बुलाने पर उस ने खाने की मेज ही उलट कर रख दी थी, और चिल्ला कर कहा था,

‘मैं शीला चाची के यहां जा रही हूं. डाक्टर साहब के साथ शतरंज खेलूंगी. पिताजी से कह देना, जिस समय मेरा मन होगा, मैं वापस आऊंगी. मुझे वहां लेने आने की कोई जरूरत नहीं.’ और वह दनदनाती हुई चली गई थी.

जब शंभुजी को पता चला तो वे चाह कर भी उसे लेने नहीं जा सके थे. उन्हें डर था, ‘जिद्दी लड़की है, वहीं कोई नाटक न शुरू कर दे.’

12 बजे के करीब डाक्टर साहब का बेटा दीपक उसे छोड़ने आया था तो वह बिना उन्हें देखे अपने कमरे में चली गई थी. पीछेपीछे भारी कदमों से उन्हें उस के कमरे में जाना पड़ा था, ‘खाना नहीं खाओगी, बेटी?’

‘मैं ने खा लिया है,’ वह लापरवाही से बोली थी.

‘तुम डाक्टर साहब के यहां रात को क्यों गई थी?’ उन्होंने सख्ती से पूछा था.

‘आप भी तो वहां जाते हैं. वे भी हमारे घर आते हैं,’ वह भी सख्त हो गई थी.

‘वे मेरे मित्र हैं, बेटी. तुम समझती क्यों नहीं? तुम अब बड़ी हो गई हो. रात को अकेले तुम्हें…’ आगे वे बात पूरी नहीं कर सके थे.

‘मैं वहां जरूर जाऊंगी. दीपक मुझे घुमाने ले जाता है. मेरा खयाल रखता है. वह भी मेरा दोस्त है. जब आप को फुरसत नहीं मिलती तो मैं अकेली क्या करूं?’इतना सुनते ही उन का सिर चकराने लग गया था. इन बातों का तो उन्हें पता ही नहीं था. वे तो अपने काम में ही इतने व्यस्त रहते थे कि बाहर क्या हो रहा है, कुछ जानते ही न थे. डाक्टर साहब जरूर उन्हें कभीकभी खींच कर पार्टियों में या क्लब में ले जाते थे.

फिर उन्हें यह भी जानकारी मिली कि, सीमा दीपक के साथ फिल्म देखने भी जाती है तो वे बड़े परेशान हो गए थे. पहले तो उन्हें सीमा पर गुस्सा आया था कि कभी मुझ से पूछती तक नहीं, लेकिन फिर वे स्वयं पर भी नाराज हो उठे थे, उन्होंने ही बेटी से कब, कुछ जानना चाहा था.

सीमा कुछ और सयानी हो गई थी. उन्होंने भी सोचा था, ‘दीपक अच्छा लड़का है. अगर सीमा उसे पसंद करती है तो वे उस की इस खुशी को जरूर पूरा करेंगे. सीमा के सिवा उन का है ही कौन? यह घर, यह कारोबार किसी को तो संभालना ही है. फिर दीपक तो बड़ा ही प्यारा लड़का है.’ और वे निश्ंिचत हो गए थे.

अब वे सीमा से हमेशा दीपक के बारे में पूछा करते थे. वे यह भी देख रहे थे, सीमा धीरेधीरे गंभीर होती जा रही है.

एक दिन बातोंबातों में सीमा ने कहा था, ‘पिताजी, आप क्यों नहीं किसी को अपने विश्वास में ले लेते? उसे सारा काम समझा दीजिए, तो आप का कुछ बोझ तो हलका हो ही जाएगा. आप को कितना काम करना पड़ता है.’

‘हां, बेटा, मैं भी कई दिनों से यही सोच रहा था. पहले तुम्हारे हाथ पीले कर दूं, फिर कारोबार का बोझ भी अपने ऊपर से उतार फेंकूं. अब मैं भी बहुत थक गया हूं, बेटी.’

‘आप एक चैरिटेबल ट्रस्ट क्यों नहीं बना देते? उस से जितना भी लाभ हो, गरीबों की सहायता में लगा दिया जाए. गरीबों के लिए एक अस्पताल बनवा दीजिए. एक स्कूल खुलवा दीजिए. इतने पैसों का आप क्या करेंगे?’

‘बेटी, अपना हक यों बांट देना चाहती हो,’ वे हैरानी से बोले थे.

‘मैं भी इतना पैसा क्या करूंगी. आदमी की जरूरतें तो सीमित होती हैं, और उसी में उसे खुशी होती है. इतना पैसा किस काम का जो किसी दूसरे के काम न आ सके, बैकों में पड़ापड़ा सड़ता रहे. सब बांट दीजिए, पापा.’

‘कैसी बातें करती हो, मैं ने सारी जिंदगी क्या इसी लिए खूनपसीना एक किया है कि मैं कमा कर लोगों में बांटता फिरूं. तुम नहीं जानतीं. मैं ने इसी व्यापार को बढ़ाने की खातिर क्या कुछ खोया है?’

‘मुझे सब पता है, पापा. इसी लिए तो कहती हूं, आप समेटतेसमेटते फिर कुछ न खो बैठें. एक बार बांट कर तो देखिए, आप को कितना सुख मिलता है. जो खुशी दूसरों के लिए कुछ कर के हासिल होती है, वह खुद के लिए समेट कर नहीं होती.’

‘यह तुम क्या कह रही हो?’

‘डाक्टर चाचा भी तो यही कहते हैं, पापा, देखिए न, वे गरीबों का मुफ्त इलाज करते हैं. वे हमेशा यही कहते हैं, बस, जितने की मुझे जरूरत होती है, मैं रख लेता हूं, बाकी दूसरों को दे देता हूं, ताकि मेरे साथसाथ दूसरों का भी काम चलता रहे.’

वे बेटी का मुंह देखते रह गए थे. अच्छा हुआ सीमा ने बात खोल दी, नहीं तो वे कितनी बड़ी गलती कर बैठते. नहीं, नहीं, उन्हें तो ऐसा लड़का चाहिए जो व्यापार को संभाल सके. वे इस तरह अपनी दौलत को कभी नहीं लुटाएंगे. और उन्होंने निश्चय किया था, वे अपनी तरफ से तलाश शुरू कर देंगे. यह काम जल्दी ही करना होगा.

जल्दी काम करने का नतीजा भी सीमा की नजरों से छिपा नहीं रहा. शंभुजी के औफिस की टेबल पर उस ने जब कई लड़कों के फोटो देखे तो वह सबकुछ समझ गई थी. उसी दिन वे कोलकाता जाने वाले थे. सीमा ने सबकुछ देखने के बाद केवल इतना ही कहा था, ‘पापा, आप इतनी जल्दी न करें, तो अच्छा है.’

‘तुम्हें मेरे फैसले पर कोई आपत्ति है.’

‘मेरा अपना भी तो कोई फैसला हो सकता है,’ उस ने दृढ़ता से कहा था.

‘मुझे तुम्हारे फैसले पर आपत्ति नहीं, बेटी. दीपक मुझे भी पसंद है. लेकिन मेरी भी तो कुछ खुशियां हैं, कुछ इच्छाएं हैं. तुम जानती हो, दीपक को शादी के बाद…’

‘आप पहले कोलकाता हो आइए. इस बारे में हम फिर बात करेंगे,’ उस ने उन की बात काट दी थी.

वे निश्ंिचत हो कर चले गए थे, और आज वापस आए थे. लेकिन दरवाजे पर इंतजार करती सीमा कहीं नजर नहीं आ रही थी.

वे तेजी से उस के कमरे में गए, शायद उस ने कोई मैसेज छोड़ा हो लेकिन कहीं कुछ भी नहीं था. सबकुछ व्यवस्थित था. तभी नौकर ने आ कर धीरे से कहा, ‘‘सीमा बिटिया आ गई है.’’

सीमा जब उन के सामने आ कर खड़ी हुई थी तो वे उसे अपलक देखते रह गए थे. इन 6 दिनों में सीमा को क्या हो गया है. लगता है, जैसे इतने दिनों तक सोई ही न हो, ‘‘कहां गई थी, बेटी?’’

‘‘रमेशजी के यहां, मां की तबीयत ठीक नहीं थी. उन्होंने बुलवा भेजा था.’’

‘‘मां…कौन मां?’’ वे हैरान थे.

‘‘रेखा चाची, यानी शरदजी की मां. शरदजी की भी तबीयत ठीक नहीं है. मैं यही बताने आई थी, कहीं आप चिंता न करने लगें. मुझे अभी फिर वापस जाना है. उन की देखभाल करने वाला कोई नहीं. दोनों बीमार हैं. शायद मुझे रात को भी वहीं रहना पड़े.’’

‘‘उन का नौकर उन की…’’ वे बात पूरी नहीं कर सके थे.

‘‘जितनी सेवा कोई अपना कर सकता है, उतनी सेवा क्या नौकर करेगा? मेरा मतलब तो आप समझ गए न, मैं ने कहा था न, पिताजी मेरा भी कोई फैसला हो सकता है.’’

‘‘और डाक्टर का बेटा दीपक?’’ वे हैरान थे.

‘‘वह तो बचपन की पगडंडियों पर लुकाछिपी खेलने वाला दोस्त था, जो जवानी के मोड़ पर आ कर आप की दौलत से भी आंखमिचौली खेलना चाहता था. मुझे जीवनसाथी की जरूरत है, पापा, दौलत पर पहरा देने वाले पहरेदार की नहीं. मैं जानती हूं, आप को मेरी बातों से दुख हो रहा है. लेकिन यह भी तो सोचिए, लड़की के जीवन में एक वह भी समय आता है जब वह बाबुल का घर छोड़ कर पति के घर जाने के लिए आतुर हो जाती है. इसी में उसे जिंदगी का सुख मिलता है. मांबाप की भी तो यही खुशी होती है कि लड़की अपने घर में सुखी रहे. आप शरद को भी बचपन से जानते हैं, आप भी अपना फैसला बदल डालिए, इसी में मेरी खुशी है और आप का सुख,’’ और वह जाने को तैयार हो गई.

‘‘रुक जाओ, बेटी, मुझे तुम्हारा फैसला मंजूर है. तुम ने तो एकसाथ मेरे दोदो बोझ हलके कर दिए हैं. बेटी का बोझ और धन का बोझ. इसे भी अपनी मरजी से ठिकाने लगा देना, बेटी, जिस से कइयों को खुशियां मिलती रहें,’’ कहतेकहते उन की आंखें नम हो गई थीं.

‘‘पापा,’’ वह भाग कर मुद्दत से प्यासे पापा के हृदय से लग कर रो पड़ी थी.

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