मैली लाल डोरी – भाग 3 : दास्तान अपर्णा की

‘‘आज आप के तथाकथित गुरुजी कहां गए. आप की देखभाल करने क्यों नहीं आए वे. जिन के कारण आप ने अपनी बसीबसाई गृहस्थी में आग लगा दी. आज उन्होंने अपनी करामात क्यों नहीं दिखाई? मुझ से क्या चाहते हैं आप. क्यों मुझे फोन किया गया था?’’ अपर्णा आवेश से भरे स्वर में बोली. तभी देवर अरुण आ गया. उस ने जो बताया, उसे सुन कर अपर्णा दंग रह गई.

‘‘आप के जाने के बाद भैया एकदम निरंकुश हो गए. गुरुजी के आश्रम में कईकई दिन पड़े रहते. घर पर ताला रहता और भैया गुरुजी के आश्रम में. गुरुजी के साथ ही दौरों पर जाते. गुरुजी के आश्रम में सेविकाएं

भी आती थीं. गुरुजी सेविकाओं से हर प्रकार की सेवा करवाते थे. कई बार गुरुजी के कहने पर भैया ने भी अपनी सेवा करवाई. बस, उसी समय कोई इन्हें तोहफे में एड्स दे गई. गुरुजी और उन के आश्रम के लोगों को जैसे ही भैया की बीमारी के बारे में पता चला, उन्होंने इन्हें आश्रम से बाहर कर दिया. और आज 3 साल से कोई खैरखबर भी नहीं ली है.’’

अपर्णा मुंह खोले सब सुन रही थी. उस ने नितिन की ओर देखा तो उस ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए मानो अब तक की सारी काली करतूतों को एक माफी में धो देना चाहता हो.

अपर्णा कुछ देर सोचती रही, फिर नितिन की ओर घूम कर बोली, ‘‘नितिन, मेरातुम्हारा संबंध कागजी तौर पर भले ही न खत्म हुआ हो पर दिल के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता. जब मेरे दिल में ही तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है, तो कागज क्या करेगा? जहां तक माफी का सवाल है, माफी तो उस से मांगी जाती है जिस ने कोई गुनाह किया हो. तुम ने आज तक जो कुछ भी मेरे साथ किया, उसे भुलाना तो मुश्किल है, पर हां, माफ करने की कोशिश करूंगी. पर अब तुम मुझ से कोई उम्मीद मत रखना.

मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती. हां, इंसानियत के नाते तुम्हारी बीमारी के इलाज में जो पैसा लगेगा, मैं देने को तैयार हूं. बस, अब और मुझे कुछ नहीं कहना. मैं तुम्हें सारे बंधनों से मुक्त कर के जा रही हूं,’’ यह कह कर मैं ने पर्स में से एक छोटा पैकेट, वह मैली लाल डोरी निकाल कर नितिन के तकिए पर रख दी, ‘‘लो अपनी अमानत, अपने पास रखो.’’

यह कह कर अपर्णा तेजी से कमरे से बाहर निकल गई. नितिन टकटकी लगाए उसे जाते देखता रहा.

 

दिल्लगी बन गई दिल की लगी : भाग 3

सैलरी मिलने पर मैं ने कुछ नए कपड़े खरीदे. उन्हें सिलवाने के लिए मैं साफिया खाला के घर गई. क्योंकि मैं उन्हीं से कपड़े सिलवाती थी. जब मैं उन के घर गई तो खाला पड़ोस में गई थीं.

मंसूर ने मुझे बिठा लिया और कोल्डड्रिंक पेश करते हुए बोला, ‘‘अच्छा हुआ तुम आ गई. मैं तुम्हारे इंस्टीट्यूट के चक्कर काटकाट कर परेशान हो गया. तुम से एक जरूरी बात करनी थी.’’

‘‘कैसी जरूरी बात?’’ मैं चौंकते हुए बोली, ‘‘मैं ने फराज के यहां जौब कर ली है.’’

‘‘दरअसल, बात यह है कि अम्मी मेरी शादी करना चाह रही हैं. उन्होंने मुझ से मेरी पसंद पूछी है. तुम से पूछे बगैर भला मैं उन्हें तुम्हारा नाम कैसे बता देता.’’ वह बोला, ‘‘क्या तुम मुझ से शादी करोगी? तुम कहो तो, मैं अम्मी को तुम्हारे घर भेजूं?’’

उस की यह बात सुनते ही मैं एकदम घबरा गई. मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘ये तुम क्या कह रहे हो मंसूर? मैं ने कभी तुम्हें इस नजर से देखा ही नहीं.’’

‘‘फिर वह सब क्या था? वह लगावट और प्यार, मीठे अंदाज में बातें करना, मुझ से चूडि़यां मंगवाना, पहनना, मेरे साथ चलना?’’ वह चौंकते हुए बोला, ‘‘क्या तुम मुझे बेवकूफ बना रही थी?’’

‘‘माफ करना मंसूर, मैं ने तुम्हें बेवकूफ नहीं बनाया, मैं तुम्हें केवल अपना दोस्त समझती हूं.’’

‘‘दोस्ती का नाम ले कर तुम मुझ से आसानी से दामन नहीं छुड़ा सकतीं. तुम्हारे रवैये से साफ जाहिर था कि तुम मुझे पसंद करती हो. अगर ऐसा न था तो तुम मुझे पहले ही दिन रोक देती. बात इतनी आगे न बढ़ती?’’

‘‘हां, ये मुझ से गलती हो गई, मुझे माफ कर दो. मेरे दिल में तुम्हारे लिए ऐसा कोई जज्बा नहीं है. अब इस बात को यहीं खत्म कर दो. तुम भी कोई अच्छी सी लड़की देख कर उस से शादी कर लो. थोड़े दिनों में सब भूल जाओगे.’’ मेरी बात सुन कर उस का चेहरा धुआंधुआं हो गया.

वह मुरझाए लहजे में बोला, ‘‘यह तुम्हारे लिए एक खेल हो सकता है पर मेरे लिए जिंदगी और मौत का सवाल है. तुम्हें भूलना मेरे लिए नामुमकिन है.’’

उसी समय साफिया खाला भी आ गईं. मुझे देख कर वह बहुत खुश हुईं. उन्होंने मुझे नौकरी की मुबारकबाद दी, उन्होंने खुशीखुशी सीने के लिए मेरे कपड़े ले लिए और फिर मैं घर आ गई.

मंसूर की बातें सुन कर मैं परेशान हो गई. मैं ने सोचा भी न था कि मेरा मजाक, एक छोटी सी शरारत किसी की जिंदगी का रोग बन जाएगी. मैं ने अपने जेहन में जिस जीवन साथी की तसवीर बनाई थी, मंसूर उस में फिट नहीं बैठता था. मेरा आइडियल एक खूबसूरत, हैंडसम व अमीर शख्स था, जिस के साथ मैं ऐशभरी जिंदगी गुजार सकूं. अचानक जेहन की स्क्रीन पर एक नाम चमका फराज. हां, वह मेरा मनपसंद साथी हो सकता है.

दूसरे दिन से ही मैं ने अपने मंसूबे पर काम करना शुरू कर दिया. खूबसूरत तो मैं थी ही अब मैं ने बन संवर कर औफिस जाना शुरू कर दिया था. उस दिन मैं हलका गुलाबी सूट और मैचिंग की चूडि़यां और ज्वैलरी पहन कर औफिस गई. फराज मुझे एक लम्हा देखता रहा फिर पूछा, ‘‘क्या आज कोई खास बात है?’’

मैं ने अदा से सिर झटकते हुए कहा, ‘‘हां, मुझे अपनी सहेली की बर्थडे पार्टी में जाना है.’’

उस ने मुझे देखते हुए कहा, ‘‘अच्छी लग रही हो. ऐसे ही रहा करो.’’ फिर मुझे कुछ लेटर टाइप करने को दे दिए. उस दिन जब मैं दोबारा उस के केबिन में गई तो उस ने साथ बिठा कर चाय पिलवाई. मैं धीरे से मुसकुरा दी, किरन ने मुझे फराज के बारे में बताया था कि वह इंतहाई मजबूत कैरेक्टर का बंदा है. कई लड़कियां उस पर मरती थीं, पर उस ने किसी को लिफ्ट नहीं दी. पर मेरा प्लान कामयाबी की मंजिल तय करने लगा था.

कुछ दिनों बाद किरन खास तौर पर मुझ से मिलने घर आई. वह बहाने से मुझे फराज के घर ले गई. उस की महल जैसी कोठी देख कर मैं दंग रह गई. उस के अम्मीअब्बा बहुत प्यार से मिले.

किरन मुझे घर छोड़ने आई तो बोली, ‘‘शीना, तुम ने फराज पर क्या जादू कर दिया? जो बंदा अभी शादी नहीं करना चाहता था, अब वह जल्दी शादी करना चाहता है और पता है तुम उस की पसंद हो. क्या तुम भी उसे पसंद करती हो? बता दो मैं उस की वालिदा के साथ तुम्हारा रिश्ता मांगने तुम्हारे घर आ जाऊं.’’

मैं सिर नीचा कर के धीरे से मुसकरा दी. किरन ने खुश हो कर मुझे गले लगा लिया. 2-3 दिन बाद साफिया खाला हमारे घर आईं. बेहद परेशान थीं.

पूछने पर कहने लगीं, ‘‘क्या बताऊं बेटा मैं मंसूर की वजह से बहुत दुखी हूं. उस ने अजीब हाल बना लिया है. न ढंग से खातपीता है और न किसी से मिलताजुलता है. हंसी तो जैसे उस से रुठ गई है. चुपचाप कमरे में पड़ा रहता है. न जाने क्या रोग लग गया है, उसे तुम जरा उस से पूछो तो कि बात क्या है.’’

मैं उन्हें क्या कहती कि परेशानी की वजह मैं ही हूं. दूसरे दिन किरन और फराज के अम्मीअब्बा रिश्ता ले कर घर आए. फराज के बारे में सारी जानकारी दी. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि मेरा ख्वाब इतनी जल्दी पूरा हो जाएगा. मेरे अब्बा फराज के वालिद को अच्छी तरह जानते थे उन्होंने रिश्ता कुबूल कर लिया. फिर सारे मामलात तेजी से तय हो गए. उन्होंने खबर दी कि अगले इतवार को वह लोग तारीख तय करने आएंगे, साथ ही अंगूठी भी पहना देंगे.

इतवार को किरन, फराज के अम्मीअब्बा आए. अम्मी ने शानदार इंतेजाम किया था. अपनी मदद के लिए साफिया खाला को उन्होंने बुला लिया था. खाने के बाद फराज की अम्मी ने हीरे की बहुत खूबसूरत अंगूठी पहनाई. उस वक्त साफिया खाला भी हौल में आ गईं.

साफिया खाला की नजर ज्यों ही फराज के वालिद पर पड़ी, वह पत्थर के बुत की तरह खड़ी रह गईं. फराज के वालिद का भी यही हाल था. हमें समझ न आया कि माजरा क्या है. जो दोनों इस तरह हैरान व परेशान हैं? साफिया खाला फौरन किचन में चली गईं. फराज के वालिद परवेज खान भी जल्दी ही उठे और वो सब निकल गए.

यहां कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जिस ने मुझे हिला कर रख दिया. दरअसल साफिया खाला फराज के वालिद परवेज खान की पहली बीवी थीं. जब शादी हुई परवेज खान लाहौर में थे और एक फर्म में अच्छी पोस्ट पर काम करते थे. शुरू के चंद साल बड़े अच्छे गुजरे. मंसूर की पैदाइश के कुछ अरसे बाद फर्म बंद हो गई और परवेज खान की नौकरी चली गई. इस के बाद वह काफी अरसे तक रोजगार ढूंढते रहे.

उन्हें कोई जौब नहीं मिली, इस बीच सारी जमापूंजी भी खत्म हो गई. पेट का दोजख भरने को एक प्राइवेट फर्म में क्लर्क की नौकरी कर ली. इतनी कम तनख्वाह में गुजारा मुश्किल था. साफिया बेगम इस गरीबी की आदी न थीं. वह दौलतमंद बाप की बेटी थीं. शौहर की गरीबी की हालत में वह अपने बाप के घर चली गईं. परवेज खां रोकते रह गए पर वह नहीं मानीं. परवेज खान को भी गुस्सा आ गया उन्होंने तय कर लिया कि जब तक अच्छा कमाएंगे नहीं बीवी को नहीं लाएंगे.

कुंआरी ख्वाहिशें-भाग 3 : हवस के चक्रव्यूह में फंसी गीता

इधर गीता भी असलियत जान चुकी थी. अब वह सागर से छुटकारा पाना चाहती थी. सागर सुबह काम पर जाता तो बाहर से ताला लगा कर जाता. इधर गीता का परिवार उसे ढूंढ़ कर थक चुका था. इश्तिहार छपवा दिए गए, ताकि गीता का कहीं से कोई तो सुराग मिले.

एक दिन सागर तैयार हो रहा था कि औफिस से फोन आया कि अभी पहुंचो. वह जल्दी में ताला लगाना भूल गया. गीता के लिए यह अच्छा मौका था. वह भाग निकली और जा पहुंची अपने घर. उस ने अपने किए की माफी मांगी.

घर वालों से तो गीता को माफी मिल गई, पर आसपड़ोस के लोगों ने उस का जीना मुहाल कर दिया था.

गीता के पापा ने यह घर बेच कर रोहिणी में जा कर नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत की, मगर वहां भी वे जिल्लत की जिंदगी जिए. न कहीं गीता का रिश्ता तय होता था और न ही कहीं बंटी का.

साल बीतते गए. पहले तो पापा इस सदमे से बीमार हो गए और फिर उन की मौत हो गई. मां दिनरात चिंता में घुलती रहती थीं. घरबार सब बिक गया, इज्जत चली गई.

गीता के एक मामा करनाल में रहते थे. एक दिन वे बोले, ‘‘दीदी, करनाल तो मैं आप को लाऊंगा नहीं, मेरी भी यहां इज्जत खराब होगी, पर आप कुरुक्षेत्र में शिफ्ट हो जाओ, कम से कम दिल्ली जितना महंगा तो नहीं है.’’

वे सब कुरुक्षेत्र में शिफ्ट हो गए. वहां मामा ने जैसेतैसे छोटीमोटी नौकरी का इंतजाम करवा दिया था. इस से किसी तरह गुजारा चल निकला.

गीता अब 35 साल की और बंटी

40 साल का हो गया. गीता का रिश्ता तो न हुआ. अलबत्ता, बंटी का रिश्ता वहां किसी जानकार ने करा दिया.

अब बंटी की तो शादी हो गई. क्या करता, कब तक गीता के लिए इसे

भी कुंआरा रखते, आगे परिवार भी तो बढ़ाना था.

गीता का रिश्ता न होने की वजह एक और भी थी कि उसे शराब पीने की लत लग गई थी. टैंशन में होती और औफिस के स्टाफ के साथ पीने लग जाती और पी कर फिर होश कहां रहता. कभीकभी तन की आग भी सताती और कोई न कोई अपनी भी आग इस से बुझा लेता.

लेकिन ऐसा भी कब तक चलता. भाई के बच्चे भी हो गए हैं, सब समझने लगे हैं. भाभी को भी अब बुरा लगता है कि कब तक शराबी बहन उन के सिर पर मंडराएगी. उम्र भी तो कम नहीं, 45 साल की हो गई.

आखिरकार एक रिश्ता मिला शाहबाद में. लड़का क्या आदमी था, अधेड़ था. सूरज विधुर था, मगर कोई बच्चा नहीं, इसलिए सोचा कि दूसरी शादी कर के वंश आगे बढ़ाया जाए. बात बन गई तो शादी कर दी.

गीता ने भी सोचा कि अब

एक अच्छी बीवी बन कर दिखाऊंगी. शराब की लत छोड़ दी धीरेधीरे. तकरीबन 6 महीने सब सही रहा.

इसी बीच पड़ोसी की बेटी रीमा दुबई से आई. 2-3 महीने यहां रही. दोनों परिवारों में अच्छाखासा लगाव भी था. रीमा जितने समय तक शाहबाद में रही, गीता संग अच्छी दोस्ती रही. वह सारा दिन ‘भाभीभाभी’ करती रहती.

जातेजाते रीमा गीता को बोल गई, ‘‘भाभी, मैं आप दोनों को दुबई बुला लूंगी. वहां की लाइफ यहां से अच्छी है. वहां सैट करूंगी आप को.’’

गीता और सूरज भी खुश थे कि वे दोनों दुबई में सैट होंगे. वैसे भी आगेपीछे कोई नहीं, दोनों ही तो हैं, तो कहीं भी रहें.

2 महीने बाद रीमा का फोन आया, ‘‘भाभी, यहां के नियम बहुत सख्त हैं, इसलिए हमें यहां के नियम से चलना होगा. मैं ने आप के पेपर सब तैयार कर दिए हैं. मैं आप को अपने बच्चे की नैनी यानी आया के रूप में बुलाऊंगी, फिर आप यहां सैट हो कर सूरज भैया को बुला लेना.’’

कुछ समय बाद गीता खुशीखुशी दुबई चली गई, लेकिन वहां के तो रंग ही कुछ और थे. सुबह 5 बजे से रात के

12 बजे तक सारे घर का काम करे, उस पर बच्चा इतना बिगड़ा हुआ था कि कभी उसे गाली दे, कभी चप्पल उठा कर मारे, खाना भी ढंग से न दे, बस जो बचाखुचा वही दे दे, चाहे उस से पेट भरे या न भरे.

गीता न तो बच्चे को डांट सके, न ही कहीं जा सके और न कोई पैसा उस के पास. खून के आंसू रोए बेचारी.

4 साल तक न तो परिवार वालों से कोई बातचीत, न ही सुख की सांस ली.

आखिरकार गीता ने एक दिन हिम्मत की, जब रीमा और उस का पति औफिस गए हुए थे. वह चुपचाप एक खिड़की

से भाग निकली और पहुंची सीधा पुलिस के पास और सबकुछ बताया. पुलिस जा पहुंची रीमा के घर.

हां, गीता भागी जरूर, पुलिस में उस के खिलाफ शिकायत भी की, मगर उस ने धोखा नहीं दिया रीमा को, जिस तरह रीमा ने उसे दिया था. वह तब भागी, जब रीमा के आने का समय हो चला था, ताकि रीमा का बेटा ज्यादा समय अकेला न रहे. पूरे घर का काम कर के तब.

जब पुलिस रीमा के घर आई, तब भी उस ने यह कहा कि उसे रीमा से अपने पासपोर्ट और पेपर वगैरह दिलवा दें और उसे वर्क परमिट मिल जाए… और उसे कुछ नहीं चाहिए, गीता अपने पति को बुलाना चाहती है.

रीमा ने उस के सब पेपर उसे सौंप दिए. गीता ने रीमा पर कोई केस नहीं किया. गीता अब दुबई में अलग काम करती है, अलग घर में शांति से रहती  है.

गीता इस समय सूरज के कागजात तैयार करवा रही है, ताकि सूरज को वहां बुला ले.

गीता सारी उम्र एक गलती की सजा भुगतती रही, वह सच्चे प्यार के लिए तरसती रही. एक छोटी सी गलती ने पूरा परिवार बिखेर दिया, लेकिन अब बुढ़ापे में कोई न कोई तो सहारा चाहिए हर एक को. कम से कम सूरज और गीता एकदूसरे का सहारा तो बनेंगे. कुंआरी ख्वाहिशें झुलस कर दम तोड़ चुकी थीं.

लेकिन गीता एक अच्छा काम

और कर रही थी कि कोई भी लड़की अगर इस तरह की भूल करती, तो

वह उसे समझाबुझा कर उस के घर पहुंचा आती.

 

कायर – भाग 3 : क्या घना को मिल पाया श्यामा का प्यार

श्यामा सोचने लगी, ‘इसे अगर मैं आज ठुकरा दूं, तो हो सकता है कि यह सचमुच भिलंगना नदी में छलांग मार दे. जो शख्स इस बर्फीली रात में घने जंगल से हो कर मेरे घर आने की हिम्मत कर सकता है, वह खुदकुशी कर ले, तो इस में क्या हैरानी है. और खुदकुशी क्या, इसे तो कोई जंगली जानवर रास्ते में ही अपना निवाला बना सकता है. तब शायद किसी को कुछ पता न चले, पर मैं तो सबकुछ जानती हूं. तब मैं क्या खुद को कभी माफ कर पाऊंगी?

‘नहीं, मैं जिंदगीभर अपने को अपराधी सम?ाती रहूंगी और यह तो मु?ा से प्यार करता है और शादी भी करने को तैयार है. क्या हमारा समाज यह सब होने देगा? नहीं, समाज तो ऐसा कभी नहीं होने देगा. पर हम कहीं दूर दिल्लीमुंबई चले जाएंगे. वहां हमारी जातपांत से किसी को क्या मतलब होगा?’

श्यामा बहुत दूर की बात सोचने लग गई थी.

‘‘श्यामा, तुम डरो मत. मैं तुम्हारा कोई नुकसान करने नहीं आया हूं. मैं तो केवल तुम्हें अपने मन की बात बताने आया था, तुम पर खुद को थोपने नहीं. तुम चिंता मत करो. अब मु?ो जाना ही चाहिए,’’ इतना कह कर घना दोबारा उठ कर जाने लगा.

‘‘रुको…’’ श्यामा ने कहा. घना जैसा था, वैसे ही बैठ गया.

‘‘अच्छा सुनो, आप ने कहा कि आप मु?ा से बहुत प्यार करते हो. क्या आप मु?ा से शादी कर के समाज का सामना कर पाओगे?’’

‘‘हां, जरूर करूंगा. मैं जानता हूं कि यह समाज ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा, पर हम यहां से कहीं दूर अपनी दुनिया बसाएंगे.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘एक साल बाद मैं कालेज पास कर लूंगा, फिर देखना मु?ो कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल ही जाएगी और फिर हम किसी मंदिर में शादी कर लेंगे.’’

‘‘ठीक है, जब आप इतना खतरा मोल ले कर इस बर्फीली रात में मेरे

घर तक आए हो, तब मैं आप पर पूरा

भरोसा करती हूं कि आप अपने वचनों को जरूर निभाओगे…’’ फिर कुछ सोच कर श्यामा ने पूछा, ‘‘आप ने कुछ खाया तो होगा नहीं?’’

‘‘नहीं, कुछ भी नहीं खाया. सुबह कालेज जाते समय खाया था, उस के बाद मुरली की दुकान पर एक कप चाय पी थी. मु?ो बहुत भूख लगी है,’’ भूख और ठंड का असर घना के चेहरे से साफ ?ालक रहा था.

‘‘क्या करूं? रोटी और आलू की सब्जी बची हुई है, पर मैं आप को खाने को दे भी नहीं सकती.’’

‘‘अरे, लाओ न फिर.’’

‘‘यह ठीक नहीं होगा. एक अछूत के घर में ब्राह्मण भोजन करेगा, यह नामुमकिन है. ऐसा नहीं हो सकता.’’

‘‘मैं तो भूख से मरा जा रहा हूं और तुम्हें छुआछूत की पड़ी है.’’

‘‘तुम्हारा धर्म बिगड़ जाएगा. अगर ब्राह्मणों को पता चल गया, तो गजब हो जाएगा.’’

‘‘तुम्हारे साथ जीनेमरने के लिए मैं ने आज इतना बड़ा जोखिम उठाया है. अब जबकि तुम्हारे हाथ का बनाया ही जिंदगीभर खाना है, तब आज की रात परहेज क्यों? और तुम तो जानती हो कि मैं जातपांत, छुआछूत में जरा भी यकीन नहीं करता हूं.’’

‘‘खाओगे?’’ श्यामा ने डरे मन

से पूछा.

‘‘हां, जरूर खाऊंगा. तुम लाओ तो सही.’’

‘‘चलो फिर, रसोईघर में चलो, वहीं गरमागरम खिलाऊंगी…’’ फिर कुछ सोच कर वह बोली, ‘‘अच्छा, मैं यहीं पर लाती हूं. बाहर बहुत ठंड है.’’

श्यामा रसोईघर से खाना लाने चली गई. घना भविष्य के तानेबाने बुनने में खो गया. श्यामा थोड़ी ही देर में सब्जीरोटी ले कर आ गई. घना रोटी खाने लगा.

श्यामा को घना की इस हालत पर तरस आ रहा था. वह घना को देख रही थी और सोच रही थी, ‘यह मु?ो कितना चाहता है? एक ब्राह्मण का बेटा हो कर किस तरह अपने पुरखों के बनाए उसूलों को ताक पर रख कर एक अछूत के घर पर अपने पेट की भूख मिटा रहा है. इस बर्फीली रात में किस तरह भयानक जंगल से हो कर मेरे दरवाजे पर प्यार की भीख मांगने आया है,’ उस का सहज और सरल मन पिघल गया.

सुबह होने से पहले ही घना श्यामा के घर से निकल गया था. लेकिन अब उस के मन में एक उमंग थी, एक जोश था. वह सोचने लगा, ‘घर में कोई भी बहाना बना दूंगा.’

गांव के बीचोंबीच एक छोटी नदी बहती थी. घना ने उस नदी में हाथमुंह धोए और अपने घर की ओर चल पड़ा.

अब घना अकसर रात में बहुत ही सावधानी के साथ श्यामा के घर जाने लगा. दोनों अपनी भावी जिंदगी के बारे में खूब बातें करते, योजनाएं बनाते. इस बीच जब रिजल्ट निकला, तो घना फर्स्ट डिविजन के साथ अपने कालेज में अव्वल आया था. श्यामा की भी फर्स्ट डिविजन आई थी. दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था.

अपने मामा की सलाह पर घना ने दिल्ली में एक साल के कंप्यूटर कोर्स में दाखिला ले लिया. इस बीच घना जब भी गांव आता, दोनों सावधानी से मिलते रहे.

श्यामा ने एमए का पहला साल भी अच्छे नंबरों से पास कर लिया. घना का कंप्यूटर का कोर्स भी पूरा हो गया था. एक कंपनी में उसे अच्छी नौकरी मिल गई. नईनई नौकरी थी, इसलिए वह दिल्ली में बहुत मसरूफ हो गया.

श्यामा ने अब की बार भी बहुत मेहनत की थी, इसलिए उस ने एमए भी फर्स्ट डिविजन से पास किया थी.

श्यामा को लगा कि अब उस के सपने सच होने वाले हैं. वह बहुत

खुश थी. उस के पिता उस के लिए लड़का ढूंढ़ने के लिए जल्दबाजी करने लगे, जबकि श्यामा इस बात से बहुत बेचैन थी.

काफला गांव का शिवप्रसाद उर्फ शिबी घना का दोस्त था. वह श्यामा और घना की प्रेम कहानी का एकमात्र गवाह भी था.

शिबी कई बार घना और श्यामा का संदेशवाहक भी रह चुका था, इसलिए श्यामा ने शिबी से अपनी चिंता घना तक पहुंचाने को कहा और घना को तुरंत गांव आने के लिए कहलवाया.

सुबह का भूला – भाग 3 : आखिर क्यों घर से दूर होना चाहते थे मोहन और रोली

लिहाजा, अब मोहन ने अपने गांव जाना ही छोड़ दिया था, ताकि लोगों को उसे जवाब न देना पड़े. लेकिन अभी भी उसे एक उम्मीद थी कि उस की रोली उस के पास जरूर आएगी, क्योंकि वह उस से प्यार जो बहुत करता था.

मगर एहसानफरामोश रोली ने तो रितेश की दी गई सुखसुविधा में मोहन को ही भुला दिया. वह मजे से रितेश के साथ उस के बढि़या से 2 कमरे के घर में रहने लगी, जहां पलंग, सोफा, बड़ा सा टैलीविजन और क्याक्या नहीं था.

एक बार रितेश उसे हवाईजहाज से मुंबई भी घुमाने ले गया था, जहां हीरोहीरोइन के बड़ेबड़े घर देख कर रोली की आंखें चौंधिया गई थीं. उस के शरीर के बदले रितेश उसे काफीकुछ दे भी रहा था.

मगर जब रितेश रोली की छोटी जाति को ले कर तंज कसता तो रोली का दिमाग गरम हो जाता था. एक बार तो अपने एक दोस्त के सामने ही रितेश ने बोल दिया कि यह तो छोटी जाति की औरत है, फिर दोनों ठहाके लगा कर हंस पड़े थे.

उस दिन रोली का दिमाग ऐसा गरमाया कि मन किया कि उन दोनों के मुंह पर गरम चाय फेंक दे और कहा कि फिर क्यों आते हो मेरे पास अपनी भूख शांत करने? जाओ न कोई ऊंची जाति की औरत के पास? लेकिन वह चुप रही.

एक दिन जब शराब के नशे में रितेश रोली के करीब आया तो वह उसे परे धकेलते हुए बोली, ‘‘आज मेरा मन नहीं है.’’

‘‘मन नहीं है… साड़ी, कपड़ा और पैसे लेते समय तो नहीं कहती कि मन नहीं है…’’ उसे अपनी तरफ खींचते हुए रितेश बोला.

 

‘‘देखो, मुझे छोड़ दो, नहीं तो मैं चिल्लाऊंगी और कहूंगी कि तुम मेरा रेप करने की कोशिश कर रहे हो,’’ अपना आंचल रितेश की पकड़ से छुड़ाते हुए रोली बोली.

‘‘चिल्लाएगी? तो चिल्ला. देखता हूं कि कौन सुनता है तुम्हारी बात…’’ शराब की पूरी बोतल एक बार में ही गटकते हुए रितेश रोली पर झपटा, लेकिन वह पीछे खिसक गई, तो वह नीचे गिर पड़ा.

अब रोली से रितेश के ताने बरदाश्त के बाहर थे और सच बात तो यह थी कि उस ने इस हैवान को पहचानने में ही गलती कर दी थी. जरा से सुख की खातिर वह एक सच्चेसरल इनसान को धोखा दे कर इस राक्षस के पास रहने आ गई.

लेकिन अब नहीं. ताकत बटोर कर रितेश फिर उठा ही था कि रोली ने उस के मुंह में शराब से भरी बोतल घुसेड़ दी और तब तक पिलाती रही, जब तक कि उस की सांस नहीं रुक गई. फिर उसे घसीटते हुए ले जा कर एक नाले में फेंक आई.

पुलिस और लोग तो यही समझेंगे न कि ज्यादा शराब पीने से मर गया डूब कर. वैसे भी लोग शराब पीपी कर मर रहे हैं, अंधे हो रहे हैं, तो एक यह भी सही. चलो, जान तो छूटी रोली की इस से.लेकिन अब वह जाएगी कहां? कौन है यहां अब उस का सिवा मोहन के. लेकिन क्या वह अब उसे अपनाएगा? माफ करेगा उसे? उसे तो अपने रंगरूप का इतना घमंड था कि कभी उस ने मोहन को अपने आगे कुछ समझा ही नहीं. अपने मन में ही सोचतेसोचते रोली वहीं पहुंच गई जहां वह अपने मोहन के साथ रहती थी.

कुछ पल तक रोली वहीं दरवाजे के बाहर ही खड़ी रही. उस के मन में डर और हलचल मची थी कि पता नहीं मोहन उसे देख कर क्या कहेगा? कहीं वह उसे धक्के मार कर बाहर न निकाल दे? फिर कहां जाएगी वह?

‘नहींनहीं, मैं उस के पैरों में गिर पड़ूंगी. रोऊंगी, गिड़गिड़ऊंगी, कहूंगी

कि मारेपीटे जो करे, लेकिन मुझे एक कोना दे दे रहने के लिए अपने घर में. लेकिन अगर फिर भी उस का दिल नहीं पसीजा तो…’

एक मन कहता रोली का कि मोहन कभी भी उसे माफ नहीं करेगा और दूसरा मन कहता, ‘क्यों नहीं माफ करेगा? वह अपनी रोली को अब भी बहुत प्यार करता है. सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते. और रोली तो अब भी मोहन की ब्याहता है, तो हक है उस का इस घर पर…’

आखिरकार रोली दरवाजा ठेल कर घर के अंदर चली गई. लेकिन मोहन घर पर नहीं था. आज उस ने अपने मोहन की दी गुलाबी साड़ी पर वही मैचिंग गुलाबी मोतियों की माला पहन रखी थी. सजसंवर कर वह दरवाजे पर खड़ी अपने मोहन का इंतजार कर रही थी.

घर लौटे मोहन ने अपने सामने जब रोली को देखा तो पहले तो उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ, लेकिन फिर यह कह कर उस ने अपना मुंह फेर लिया कि अब क्यों आई है यहां?

लेकिन रोली आंसुओं का सैलाब बहाते हुए उस के कदमों पर गिर पड़ी और कहने लगी, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बड़ी भूल गई. उस इनसान ने मुझे बरगला दिया था. तुम्हारे खिलाफ भड़का दिया था. लेकिन अब मुझे अपनी भूल का एहसास हो चुका है.

‘‘मेरा अपराध माफी के लायक नहीं है, इसलिए अब मेरा मर जाना ही बेहतर है,’’ कह कर वह जाने ही लगी थी कि मोहन ने उसे रोक लिया और उसे अपने सीने से लगा कर बिलख पड़ा.

रोली भी मोहन के सीने से लग कर फफक पड़ी. आज सच में उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था और मोहन ने भी दिल से उसे माफ कर दिया था.

नजरिया- भाग 3: आखिर निखिल की मां अपनी बहू से क्या चाहती थी

अगले दिन जब निखिल दफ्तर गया तो उस की मां आशी को कोसने लगीं, ‘‘मेरा बेटा कल तक मेरी सारी बातें मानता था… अब तुम ने न जाने क्या पट्टी पढ़ा दी कि मेरी सुनता ही नहीं.’’

अब घर में ये कलह बढ़ती ही जा रही थी. आज आशी और निखिल दोनों ही मां से परेशान हो कर मेरे घर आए. मैं ने जब उन की सारी बातें सुन लीं तो कहा, ‘‘एक समस्या सुलझती नहीं की दूसरी आ जाती है. पर समाधान तो हर समस्या का होता है.’’

अब मां का क्या करें? रोज घर में क्लेश होगा तो आशी के होने वाले बच्चे पर भी तो उस का बुरा प्रभाव पड़ेगा,’’ निखिल बोला.

मैं ने उन के जाने के बाद अपनी मां से आशी व निखिल की मजबूरी बताते हुए कहा, ‘‘मां, क्या आप आशी की डिलिवरी नहीं करवा सकतीं? बच्चा होने तक आशी तुम्हारे पास रह ले तो ठीक रहेगा.’’

मां कहने लगीं, ‘‘बेटी, इस से तो नेक कोई काम हो ही नहीं सकता. यह तो सब से बड़ा मानवता का काम है. मेरे लिए तो जैसे तुम वैसे ही आशी, पर क्या उस के पति मानेंगे?’’

‘‘पूछती हूं मां,’’ कह मैं ने फोन काट दिया.

अब मैं ने निखिल के सामने सारी स्थिति रख दी कि वह आशी को मेरी मां के घर छोड़ दे.

मेरी बात सुन कर निखिल को हिचकिचाहट हुई.

तब मैं ने कहा, ‘‘निखिल आप भी तो मेरे पति जब यहां नहीं होते हैं तो हर संभव मदद करते हैं. क्या मुझे मेरा फर्ज निभाने का मौका नहीं देंगे?’’

मेरी बात सुन कर निखिल मुसकरा दिया, बोला, ‘‘जैसा आप ठीक समझें.’’

‘‘और आशी जब तुम स्वस्थ हो जाओ तो तुम भी मेरी कोई मदद कर देना,’’ मैं ने कहा. यदि हम एकदूसरे के सुखदुख में काम न आएं तो सहेली का रिश्ता कैसा?

मेरी बात सुन आशी ने भी मुसकरा कर हामी भर दी. फिर क्या था. निखिल आशी की जरूरत का सारा सामान पैक कर आशी को मेरी मां के पास छोड़ आ गया.

वक्त बीता. 9 माह पूरे हुए. आशी ने एक सुंदर बेटी को जन्म दिया, जिस की शक्ल हूबहू आशी की सास व पति से मिलती थी.

उस के पति निखिल ने जब अपनी बेटी को देखा तो फूला न समाया. वह आशी को अपने घर चलने को कहने लगा, लेकिन मेरी मां ने कहा कि बेटी थोड़ी बड़ी हो जाए तब ले जाना ताकि आशी स्वयं भी अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सके.

इधर आशी की मां निखिल से रोज पूछतीं, ‘‘निखिल बेटा, आशी को क्या हुआ बेटा या बेटी?’’

‘‘मां, बेटी हुई है पर जाने दो मां तुम्हें तो पोता चाहिए था न.’’

मां जब पूछतीं कि किस जैसी है बेटी तेरे जैसी या आशी जैसी. तो वह कहता कि मां क्या फर्क पड़ता है, है तो लड़की ही न.

अब आशी की सास से रहा नहीं जा

रहा था. अत: एक दिन बोलीं, ‘‘आशी को कब लाएगा?’’

‘‘मां अभी बच्ची छोटी है. थोड़ी बड़ी हो जाने दो फिर लाऊंगा. यहां 3 बच्चों को अकेली कैसे पालेगी?’’

यह सुन आशी की सास कहने लगीं, ‘‘और कितना सताएगा निखिल… क्या तेरी बच्ची पर हमारा कोई हक नहीं? माना कि मैं पोता चाहती थी पर यह बच्ची भी तो हमारी ही है. हम इसे फेंक तो न देंगे? अब तू मुझे आशी और मेरी पोती से कब मिलवाएगा यह बता?’’

निखिल ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अगले संडे को मां.’’

अगले रविवार ही निखिल अपनी मां को मेरी मां के घर ले गया. निखिल की मां आशी की बच्ची को देखने को बहुत उत्सुक थीं. उसे देखते ही लगीं शक्ल मिलाने. बोलीं, ‘‘अरे, इस की नाक तो बिलकुल आशी जैसी है और चेहरा निखिल तुम्हारे जैसा… रंग तो देखो कितना निखरा हुआ है,’’ वे अपनी पोती की नाजुक उंगलियों को छू कर देख रही थीं और उस के चेहरे को निहारे जा रही थीं.

तभी आशी ने कहा, ‘‘मां, अभी तो यह सोई है, जागेगी तब देखिएगा आंखें बिलकुल आप के जैसी हैं नीलीनीली… आप की पोती बिलकुल आप पर गई है मां.’’

यह सुन आशी की सास खुश हो उठीं और फिर मेरी मां को धन्यवाद देते हुए बोलीं, ‘‘आप ने बहुत नेक काम किया है बहनजी, जो आशी की इतनी संभाल की… मैं किन शब्दों में आप का शुक्रिया अदा करूं… अब आप इजाजत दें तो मैं आशी को अपने साथ ले जाऊं.’’

‘‘आप ही की बेटी है बेशक ले जाएं… बस इस का सामान समेट देती हूं.’’

‘‘अरे, आप परेशान न हों. सामान तो निखिल समेट लेगा और अगले रविवार को वह आशी को ले जाएगा. अभी जल्दबाजी न करें. तब तक मैं आशी के स्वागत की तैयारियां भी कर लेती हूं.’’

अगले रविवार को निखिल आशी व उस की बेटी को ले कर अपने घर आ गया. उस की मां ने घर को ऐसे सजाया था मानो दीवाली हो. आशी का कमरा खूब सारे खिलौनों से सजा था. आशी की सास उस की बेटी के लिए ढेर सारे कपड़े लाई थीं.

जब आशी घर पहुंची तो निखिल की मां दरवाजे पर खड़ी थीं. उन्होंने झट से अपनी पोती को गोद में ले कर कहा, ‘‘आशी, मुझे माफ कर दो. मैं अज्ञान थी या यों कहो कि पोते की चाह में अंधी हो गई थी और सोचनेसमझने की क्षमता खत्म हो गई थी. लेकिन बहू तुम बहुत समझदार हो. तुम ने मेरी आंखें खोल दीं… मुझे व हमारे पूरे घर को एक घोर अपराध करने से बचा लिया. अब सारा घर खुशियों से भर गया है. फिर वे अपनी बेटी व अन्य रिश्तेदारों को समझाने लगीं कि कन्या भू्रण हत्या अपराध है… उन्हें भी बेटेबेटी में फर्क नहीं करना चाहिए. बेटियां भी वंश बढ़ा सकती हैं, जमीनजायदाद संभाल सकती हैं. जरूरत है तो सिर्फ हमें अपना नजरिया बदलने की.’’

इंग्लिश रोज- भाग 2 : क्या सच्चा था विधि के लिए जौन का प्यार

मैं ने आप के प्रस्ताव पर विचार किया. कोई भी नया रिश्ता जोड़ने से पहले एकदूसरे के बीते जीवन के बारे में जानना बहुत जरूरी है. ऐसी मेरी सोच है. 10 वर्ष पहले मेरा विवाह एक बहुत रईस घर में संपन्न हुआ. मेरी ससुराल का मेरे रहनसहन, सोचविचार और संस्कारों से कोई मेल नहीं था. वहां के तौरतरीकों के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी. वहां मुझे लगा कि मैं चूहेदानी में फंस गई हूं. मेरे पति शराब और ऐयाशी में डूबे रहते थे. शराब पी कर वे बेलगाम घुड़साल के घोड़े की तरह हो जाते थे, जिस का मकसद सवार को चोट पहुंचाना था. ऐसा हर रोज का सिलसिला था. हर रात अलगअलग औरतों से रंगरेलियां मनाते थे.

धीरेधीरे बात यहां तक पहुंच गई कि वे ग्रुपसैक्स की क्रियाओं में भाग लेने लगे. जबरदस्ती मुझ से भी औरों के साथ हमबिस्तर होने की अपेक्षा करने लगे. उन के अनुकूल उन की बात मानते जाओ तो ठीक था वरना कहते, ‘हम मर्द अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे औरतों को अपने हिसाब से रखा जाए.’ ‘‘एक साधारण सी लड़की के लिए कितना कठिन था यह. एक दिन जब मैं ने किसी और के साथ हमबिस्तर होने से इनकार किया तो मुझे घसीट कर सामने बिठा कर सबकुछ देखने को मजबूर कर दिया. उस दिन मैं ने बरदाश्त की सभी सीमाएं लांघ कर उन के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया और सामान उठा कर भाई के घर चली आई. पैसे और मनगढ़ंत कहानियों के बल पर मेरा बेटा उन्होंने अपने पास रख लिया. उस दिन के बाद आज तक मैं अपने बेटे को देख नहीं पाई. अब सबकुछ जानते हुए भी आप तैयार हैं तो आप मेरे बड़े भाईसाहब अजय से बात करें.’’

‘‘आप की विधि’’

विधि का ईमेल पढ़ कर जौन नाचने लगा. तुरंत ही उस ने उत्तर दिया,

‘‘मेरी प्यारी विधि,

बस, इतनी सी बात से परेशान हो. जीवन में हादसे सभी के साथ होते हैं. मैं ने तो तुम से पूछा तक नहीं. तुम ने बता दिया तो मेरे मन में तुम्हारे लिए इज्जत और बढ़ गई. मेरी जान, मैं ने तुम्हें चाहा है. मैं स्त्री और पुरुष की समानता में विश्वास रखता हूं. तुम मेरी जीवनसाथी ही नहीं, पगसाथी भी होगी. जिन खुशियों से तुम वंचित रही हो, मैं उन की भरपाई की पूरी कोशिश करूंगा. मैं अगली फ्लाइट से दिल्ली पहुंच रहा हूं.

‘‘प्यार सहित

‘‘तुम्हारा जौन.’’

वह दिल्ली आ पहुंचा. होटल में विधि के बड़े भाईसाहब को बुला कर ईमेल दिखाते हुए उन से विधि का हाथ मांगा. भाईसाहब ने कहा, ‘‘शाम को तुम घर आ जाना.’’ पूरा परिवार बैठक में उस की प्रतीक्षा कर रहा था. जौन का प्रस्ताव सामने रखा गया. सभी हैरान थे. सन्नी तैश में आ कर बोला, ‘‘इतने बूढ़े से…? दिमाग खराब हो गया है क्या. जाहिर है विधि की उम्र के उस के बच्चे होंगे. अंगरेजों का कोई भरोसा नहीं.’’ बाकी बहनभाई भी सन्नी की बात से सहमत थे.

‘‘तुम ने क्या सोचा?’’ बड़े भाई अजय ने विधि से पूछा.

‘‘मुझे कोई एतराज नहीं,’’ उस ने कहा.

‘‘दीदी, होश में तो हो, क्या सचमुच सठियाए से शादी…?’’ विधि के हां करते ही अजय ने जौन को बुला कर कहा, ‘‘शादी तय करने से पहले हमारी कुछ शर्तें हैं. शादी हिंदू रीतिरिवाजों से होगी. उस के लिए तुम्हें हिंदू बनना होगा. हिंदू नाम रखना होगा. विवाह के बाद विधि को लंदन ले जाना होगा.’’ जौन को सब शर्तें मंजूर थीं. वह उत्तेजना से ‘आई विल, आई विल’ कहता नाचने लगा. पुरुष चहेती स्त्री को पाने का हर संभव प्रयास करता है. उस में साम, दाम, दंड, भेद सभी भाव जायज हैं. अच्छा सा मुहूर्त देख कर उन का विवाह संपन्न हआ. जौन लंदन से इमीग्रेशन के लिए जरूरी कागजात ले कर आया था. विधि का पासपोर्ट तैयार ही हो रहा था कि अचानक जौन के बेटे मार्क का ऐक्सिडैंट होने के कारण, जौन को विधि के बिना ही लंदन जाना पड़ा. जौन तो चला गया. विधि का मन बेईमान होने लगा. उसे घबराहट होने लगी. मन में अनेक प्रश्न उठने लगे. किसी से शिकायत भी तो नहीं कर सकती थी. 6 महीने से ऊपर हो गए. उधर जौन बहुत बेचैन था, चिंतित था. वह बारबार रेणु को ईमेल कर के पूछता. एक दिन हार कर रेणु विधि के घर आ ही पहुंची और उसे बहुत डांटा, ‘‘विधि, क्या मजाक बना रखा है, क्यों उस बेचारे को परेशान कर रही हो? तुम्हें पता भी है कितनी मेल डाल चुका है. कहतेकहते थक गया है कि आप विधि को समझाएं और कहें ‘डर की कोई बात नहीं है. मैं उसे पलकों पर बिठा कर रखूंगा.’ ‘‘अब गुमसुम क्यों बैठी हो. कुछ तो बोलो. यह तुम्हारा ही फैसला था. अब तुम्हीं बताओ, क्या जवाब दूं उसे?’’

‘‘मैं बहुत उलझन में हूं. परेशान हूं. खानापीना, उठनाबैठना बिलकुल अलग होगा. फिर उस के बच्चे…? क्या वे स्वीकार करेंगे मुझे…?’’

‘‘विधि, तुम बेकार में भावनाओं के द्वंद्व में डूबतीउतरती रहती हो. यह तो तुम्हें वहीं जा कर पता लगेगा. हम सब जानते हैं, तुम हर स्थिति को आसानी से हैंडल कर सकती हो. ऐसा भी होता है  कभीकभी सबकुछ सही होते हुए भी, लगता है कुछ गलत है. तू बिना कोशिश किए पीछे नहीं मुड़ सकती. चिंता मत कर. अभी जौन को मेल करती हूं कि तुझे आ कर ले जाए.’’ जौन को मेल करते ही एक हफ्ते में वह दिल्ली आ पहुंचा. 2 हफ्ते में विधि को लंदन भी ले गया. लंदन में घर पहुंचते ही जौन ने अंगरेजी रिवाजों के अनुसार विधि को गोद में उठा कर घर की दहलीज पार की. अंदर पहुंचते ही वह हतप्रभ रह गई. अकेले होते हुए भी जौन ने घर बहुत तरतीब और सलीके से रखा था. सुरुचिपूर्ण सजाया था. घर में सभी सुविधाएं थीं, जैसे कपड़े धोने की मशीन, ड्रायर, स्टोव, डिशवाशर और औवन…काटेज के पीछे एक छोटा सा गार्डन था जो जौन का प्राइड ऐंड जौय था. पहली ही रात को जौन ने विधि को एक अनमोल उपहार देते हुए कहा, ‘‘विधि, मैं तुम्हें क्रूर संसार की कोलाहल से दूर, दुनिया के कटाक्षों से हटा कर अपने हृदय में रखने के लिए लाया हूं. तुम से मिलने के बाद तुम्हारी मुसकान और चिरपरिचित अदा ही तो मुझे चुंबक की तरह बारबार खींचती रही है और मरते दम तक खींचती रहेगी. मैं तुम्हें इतना प्यार दूंगा कि तुम अपने अतीत को भूल जाओगी. मैं तुम्हारा तुम्हारे घर में स्वागत करता हूं.’’ इतना कह कर जौन ने उसे सीने से लगा लिया और यह सब सुन कर विधि की आंखों में खुशी के आंसू छलकने लगे.

ऐसे प्रेम का एहसास उसे पहली बार हुआ था. धीरेधीरे वह जान पाई कि जौन केवल गोराचिट्टा, ऊंचे कद का ही नहीं, वह रोमांटिक, सलोना, जिंदादिल, शरारती और मस्त इंसान है जो बातबात में किसी को भी अपना बनाने का हुनर जानता है. उस का हृदय जीवन की आकांक्षाओं से धड़क उठा. जौन ने उसे इतना प्यार दिया कि जल्दी ही उस की सब शंकाएं दूर हो गईं. विधि उसे मन से चाहने लगी थी. दोनों बेहद खुश थे. वीकेंड में जौन के तीनों बच्चों ने खुली बांहों से विधि का स्वागत किया और अपने पिता के विवाह पर एक भव्य पार्टी दी. विधि अपने फैसले पर प्रसन्न थी. अब उस का अपना घर था. अलग परिवार था. असीम प्यार देने वाला पति. जौन ने घर की बागडोर उसी के हाथ में थमा दी थी. उसे प्यार करना सिखाया, उस का आत्मविश्वास जगाया यहां तक कि उसे पोस्टग्रेजुएशन भी करवा दिया. क्योंकि भीतर से वह जानता था कि उस के जाने के बाद विधि अपने समय का सदुपयोग कर सकेगी.

किसकी मां, किसका बाप- भाग 2 :ससुराल में कैसे हुआ वरुण का स्वागत ?

निशा की मादक मुसकराहट और भोलेपन के कारण वरुण को उस की सचाई अच्छी लगी. हंस कर फिर से दोहराया, ‘‘मां सच ही बड़ी समझदार हैं.’’

निशा ने उठने का प्रयत्न करते हुए पूछा, ‘‘आप क्या लेंगे, चाय या कौफी?’’

वरुण ने शरारत से पूछा, ‘‘चाय या कौफी कौन बनाएगा, मां?’’

निशा मुसकराई,  ‘‘आप कहेंगे तो मैं बना दूंगी.’’

‘‘पर उस के लिए तुम्हें उठ कर जाना होगा,’’ वरुण ने कहा.

‘‘सो तो है,’’ निशा का उत्तर था.

‘‘फिर बैठी रहो,’’ वरुण ने फुसफसा कर कहा, ‘‘आज बहुत सारी बातें

करने को जी कर रहा है. चलो, कहीं चलते हैं.’’

निशा ने मुंह पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘ना बाबा ना, मां जाने नहीं देंगी.’’

‘‘मां से पूछ लेते हैं,’’ वरुण ने बहादुरी से कहा.

‘‘मां ने पहले ही कह दिया है कि अगर आप बाहर जाने को कहें तो सख्ती से मना कर देना,’’ निशा ने नाखूनों पर अंगूठा फिराते हुए कहा.

‘‘मां तो बहुत समझदार हैं,’’ इस बार वरुण के स्वर में व्यंग्य का अनुपात अधिक था.

‘‘सो तो है,’’ निशा ने स्वीकार किया.

‘‘कौफी हाजिर है,’’ शिवानी ट्रे में

2 कप कौफी ले कर खड़ी थी, ‘‘रुकावट के लिए खेद है.’’

प्यालों से ऊपर उठते सफेद झाग की ओर प्रशंसा से देखते हुए वरुण ने कहा, ‘‘कौफी तो लगता है तुम्हारी तरह स्वादिष्ठ और लाजवाब है.’’

शिवानी ने चट से कहा, ‘‘बिना चखे कैसे कह सकते हैं.’’

वरुण ने शरारत से कहा, ‘‘अगर तुम्हारी दीदी की अनुमति हुई तो वह भी कर  सकता हूं.’’

‘‘धत् जीजाजी,’’ कह कर शिवानी ने ट्रे मेज पर रखी और भाग गई.

‘‘आप बहुत गंदे हैं,’’ निशा ने मुसकरा कर कहा.

‘‘यह तो पहला प्रमाणपत्र है तुम्हारा. अभी तो आगे बहुत से मिलेंगे,’’ वरुण ने कौफी पीते हुए कहा.

वरुण के जाने के बाद मांबाप का बहुत झगड़ा हुआ. मां ने दुनियादारी की दुहाई दी और पिता ने ‘जमाना बदल गया’ का तर्क पेश किया. निर्णय तो कु़छ नहीं हुआ, पर कुछ समय पहले के खुशी के वातावरण में मनहूसियत फैल गई.

पति से बदला लेने के लिए मां बेटी पर बरस पड़ी, ‘‘तुझ से किस ने कहा था कि अपने घर की सारी बातें बता दे?’’

‘‘मैं ने क्या कहा?’’ निशा ने तीव्र स्वर में पूछा. मां की बेरुखी पर वह पहले से ही दुखी थी.

‘‘क्या नहीं कहा?’’

मां ने नकल करते हुए कहा, ‘‘दहीबड़े सख्त बने थे, सो नौकरानी को दे दिए. सारे व्यंजन बाजार से आए थे. ये सब किस ने कहा?’’

‘तो मां कान लगा कर सुन रही थीं,’ निशा को कोई उत्तर नहीं सूझा तो वह रोने लगी ओर रोतेरोते अपने कमरे में चली गई.

पिता ने क्रोध में कहा, ‘‘रुला दिया न गुड्डी को? कौन सा झूठ कह रही थी? और फिर तुम्हारी तरह से झूठ बोलने में माहिर भी तो नहीं है. तुम्हारी तरह मंजने में समय तो लगेगा ही.’’

वरुण ने झिझकते हुए निशा को बाहर ले जाने की आज्ञा मांगी थी पर मां ने बड़ी होशियारी से टाल दिया.

वरुण को निराशा तो हुई ही, क्रोध भी बहुत आया. सारे रोमानी सपनों पर पानी फिर गया. उस ने अब कभी भी ससुराल न जाने का निश्चय कर लिया. सास के लिए जो श्रद्धा होनी चाहिए, वह लगभग लुप्त हो गई. एक बार शादी हो जाने दो, उस के मन में जो विचार उठ रहे थे, वे बड़े खतरनाक थे.

मुंह लटका देख कर बहन ने हंसी से ताना दिया, ‘‘मुंह ऐसे लटका है जैसे किसी गोदाम के दरवाजे पर बड़ा सा ताला. लगता है खातिर नहीं हुई. इस बार मुझे साथ ले चलना. फिर देख लूंगी सब को.’’

मां ने हंस कर पूछा, ‘‘सब ठीक है न?’’

पिता को अच्छा नहीं लगा, ‘‘कोई गड़बड़ हो तो बता दो. रिश्ता अभी भी टूट सकता है.’’ बात इतनी गंभीर हो जाएगी, वरुण ने सोचा न था. मुसकरा कर कहा, ‘‘कुछ नहीं. मैं तो नाटक कर रहा था.’’ जब वरुण ने 3 सप्ताह तक कोई बात नहीं की तो निशा को चिंता होने लगी और मां के दिल में भी अशांति ने जन्म लिया. निशा ने बहन को उकसाया. शिवानी ने मां से कहा और फिर मां ने पति से कहा कि वरुण को फोन करें और बाइज्जत निमंत्रण दें. फोन पर ससुर का स्वर सुनते ही वरुण की 3 सप्ताह की भड़ास काफूर हो गई और बड़े उत्साह से वहां पहुंच गया. इस का लाभ यह हुआ कि जब वरुण ने निशा को बाहर ले जाने का प्रस्ताव रखा तो कोई आपत्ति किसी ने नहीं उठाई. थोड़ाबहुत खा कर बेसब्री से बाहर निकल पड़ा. निशा साथ थी तो मन कर रहा था कि दुनियाभर उसे देखे और जले.

‘‘किस हौल में चलना है?’’ वरुण ने पूछा.

‘‘तो क्या आप ने टिकट नहीं खरीदे हैं?’’ निशा ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘कैसे खरीदता?’’ वरुण ने कटुता से कहा, ‘‘कहीं पिछली बार की तरह फिर मां मेरा टिकट काट देतीं?’’

मीठी हंसी बिखेरती हुई निशा बोली, ‘‘तो अभी तक नाराज हो? क्या इसीलिए इतने दिनों तक आप ने फोन नहीं किया? और न ही कोई संदेश?’’

‘‘हां, जी तो कर रहा था कि आज भी न आऊं,’’ वरुण मुसकराया.

‘‘तो फिर क्यों आ गए?’’ निशा ने सरलता से पूछा.

‘‘कशिश, मैडम, कशिश,’’ वरुण ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘शुद्ध, शतप्रतिशत शुद्ध कशिश.’’

‘‘ओह,’’ निशा ने आंखें मटका कर पूछा, ‘‘तो क्या कशिश का भी कोई अनुपात होता है?’’

‘‘होता है,’’ वरुण ने दिल पर हाथ रख कर कहा, ‘‘शादी के बाद पूरी तफसील के साथ बताऊंगा. अभी तो यह बताओ, कौन सी फिल्म देखनी है?’’

‘‘जिस में भी टिकट मिल जाए.’’ निशा ने उत्तर दिया.

‘‘अब दिल्ली में इतने सारे सिनेमाघर हैं, कहांकहां देखेंगे?’’ वरुण ने पूछा, ‘‘क्या अंगरेजी सिनेमा देखती हो?’’

‘‘कभीकभी,’’ निशा ने कहा, ‘‘वैसे मुझे शौक नहीं है.’’

‘‘अंगरेजी फिल्म के टिकट तो जरूर मिल जाएंगे,’’ वरुण ने उत्साह से पूछा, ‘‘तुम ने ‘बेसिक इंस्ंिटक्ट’ और ‘इन्डीसैंट प्रपोजल’ देखी है?’’

‘‘नहीं,’’ निशा ने सिहर कर कहा, ‘‘ये तो नाम से ही गंदी फिल्में लगती

हैं. क्या आप ऐसी फिल्में देखना पसंद करते हैं?’’

‘‘अरे, जैसा नाम वैसी फिल्में नहीं हैं,’’ वरुण ने निराशा से कहा, ‘‘देखोगी तो अच्छी लगेंगी.’’

‘‘ना बाबा ना,’’ निशा ने मुंह पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘मां को पता लग गया तो खा जाएंगी.’’

चिढ़ कर वरुण ने कहा, ‘‘तुम्हारी मां तो मुझे नरभक्षी लगती हैं. क्या तुम्हें थोड़ाथोड़ा रोज खाती हैं? कैसी मां हैं तुम्हारी?’’ निशा को मां की बुराई अच्छी नहीं लगी, पर इस पर लड़ाई करना भी ठीक नहीं था. आखिर मां का नाम भी तो उसी ने ले लिया था.

‘‘मां बहुत अच्छी हैं,’’ निशा ने गंभीरता से कहा, ‘‘सही मार्गदर्शन करती हैं. मेरी मां तो एक संपूर्ण स्कूल हैं.’’

व्यग्ंय से वरुण ने कहा, ‘‘वह तो सामने आ रहा है. वैसे हम फिल्म की बात कर रहे थे.’’

निशा ने सोच कर कहा, ‘‘चलो ‘बेबीज डे आउट’ देखते हैं. सुना है बहुत अच्छी है. उस डायरैक्टर की मैं ने ‘होम अलोन’ देखी थी, बहुत मजेदार थी.’’

वरुण समझ गया कि अंगरेजी फिल्मों के बारे में निशा से टक्कर नहीं ले सकेगा. वैसे अच्छा भी लगा. कुछ गर्व भी हुआ. पत्नी अच्छी अंगरेजी बोलती हो, अंगरेजी सिनेमा भी देखती हो और पाश्चात्य संगीत में रुचि रखती हो तो पति का स्तर बढ़़ जाता है.

‘‘चलो छोड़ो फिल्मविल्म,’’ वरुण ने कहा, ‘‘थोड़ा घूमते हैं और फिर बैठेंगे किसी रेस्तरां में. क्या कहती हो?’’

‘‘जैसी आप की मरजी,’’ निशा ने मासूमियत से कहा, ‘‘मां ने कहा था कि धूप में ज्यादा मत घूमना.’’

‘‘रंग काला पड़ जाएगा,’’ वरुण ने चिढ़ कर कहा, ‘‘मां की सारी हिदायतें क्या टेप में भर ली हैं?’’

निशा हंस पड़ी, ‘‘ऐसा ही समझ लो.’’

‘‘तो अगली बार मां को साथ मत लाना. शादी तुम से कर रहा हूं, तुम्हारी मां से नहीं,’’ वरुण ने क्रोध से कहा. निशा को अच्छा नहीं लगा लेकिन अपने ऊपर नियंत्रण कर के बोली,‘‘आप को मेरी मां के लिए ऐसा नहीं कहना चाहिए. आखिर वे आप की सास हैं. मां के बराबर हैं.’’ वरुण को भी एहसास हुआ कि शायद उस के स्वर में कुछ अधिक तीखापन था. बोला, ‘‘मुझे खेद है. क्षमा कर दो.’  निशा की मुसकराहट में क्षमा छिपी थी. यही इस का उत्तर था. अपराधभावना से ग्रस्त वरुण ने सोचा कोई निदान करना चाहिए. अगर निशा को कोई भेंट दे तो वह खुश हो जाएगी. भुने चनों की पुडि़या हाथों में ले कर घूमते हुए वरुण एक दुकान के सामने रुक गया. बड़ा सुंदर सलवारसूट एक डमी मौडल, आतेजाते सब का ध्यान आकर्षित कर रही थी.

‘‘यह सूट तुम्हारे ऊपर बहुत अच्छा लगेगा,’’ वरुण ने पूछा, ‘‘क्या खयाल है?’’

‘‘खयाल तो अच्छा है,’’ निशा की आंखोें में चमक आई पर लुप्त हो गई,  ‘‘पर…’’

‘‘पर क्या?’’ वरुण ने आश्चर्य में पूछा और शौर्य प्रदर्शन करते हुए कहा, ‘‘दाम की तरफ मत देखो.’’

निशा ने अब देखा. मूल्य था 1,750 रुपए.

‘‘दाम तो ज्यादा है ही,’’ निशा ने झिझकते हुए कहा, ‘‘पर इस का गला ठीक नहीं है.’’

अब वरुण ने देखा, कुरते का गला आगे से नीचे कटा हुआ था.

‘‘तो क्या हुआ,’’ वरुण ने बहादुरी से कहा, ‘‘मेरी पसंद है, तुम मेरे लिए पहनोगी.’’

‘‘नहीं,’’ निशा ने दृढ़ता से कहा, ‘‘मां पहनने नहीं देंगी. इस मामले में बहुत सख्त हैं.’’

मैली लाल डोरी – भाग 2 : दास्तान अपर्णा की

‘तुम क्या जानो इन बाबाओं की करामात? और जगदगुरु तो पहुंचे हुए हैं. तुम्हें पता है, शहर के बड़ेबड़े पैसे वाले लोग इन के शिष्य बनना चाहते हैं परंतु ये घास नहीं डालते. अपना तो समय खुल गया है जो गुरुजी ने स्वयं ही घर पधारने की बात कही. तुम्हारी गलती भी नहीं है. तुम्हारे घर में कोई भी बाबाओं के प्रताप में विश्वास नहीं करता. तो तुम कैसे करोगी? व्यंग्यपूर्वक कह कर नितिन वहां से चला गया. शाम को फिर आया और कहने लगा, ‘देखो, यह लाल डोरी. इसे सदा हाथ में बांधे रखना, कभी उतराना नहीं, गुरुजी ने दी है. सब ठीक होगा.’

कलह और असंतोष के मध्य जिंदगी किसी तरह कट रही थी. बिना किसी काम के व्यक्ति की मानसिकता भी बेकार हो जाती है. उसी बेकारी का प्रभाव नितिन के मनमस्तिष्क पर भी दिखने लगा था. अब उस के स्वभाव में हिंसा भी शामिल हो गई थी. बातबात पर अपर्णा व बच्चों पर हाथ उठा देना उस के लिए आम बात थी. घर का वातावरण पूरे समय अशांत और तनावग्रस्त रहता. लगातार चलते तनाव के कारण अपर्णा को बीपी, शुगर जैसी कई बीमारियों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया.

एक दिन घर पर नितिन से मिलने कोई व्यक्ति आया. कुछ देर की बातचीत

के बाद अचानक दोनों में हाथापाई होने लगी और वह आदमी जोरजोर से चीखनेचिल्लाने लगा. कालोनी के कुछ लोग गेट पर जमा हो गए और कुछ अपने घरों में से झांकने लगे. किसी तरह मामला शांत कर के नितिन आया तो अपर्णा ने कहा, ‘यह सब क्या है? क्यों चिल्ला रहा था यह आदमी?’

‘शांत रहो, ज्यादा जबान और दिमाग चलाने की जरूरत नहीं है,’ बेशर्मी से नितिन ने कहा.

‘इस तरह कालोनी में इज्जत का फालूदा निकालते तुम्हें शर्म नहीं आती?’

‘बोला न, दिमाग मत चलाओ. इतनी देर से कह रहा हूं, चुप रह. सुनाई नहीं पड़ता,’ कह कर नितिन ने एक स्केल उठा कर अपर्णा के सिर पर दे मारा.

अपर्णा के सिर से खून बहने लगा. अगले दिन जब वह स्कूल पहुंची तो उस के सिर पर लगी बैंडएड देख कर पिं्रसिपल ऊषा बोली, ‘यह क्या हो गया, चोट कैसे लगी?’

उन के इतना कहते ही अपर्णा की आंखों से जारजार आंसू बहने लगे. ऊषा मैडम उम्रदराज और अनुभवी थीं. उन की पारखी नजरों ने सब भांप लिया. सो, उन्होंने सर्वप्रथम अपने कक्ष का दरवाजा अंदर से बंद किया और अपर्णा के कंधे पर प्यार से हाथ रख कर बोलीं, ‘क्या हुआ बेटा, कोई परेशानी है, तो बताओ.’

कहते हैं प्रेम पत्थर को भी पिघला देता है, सो ऊषा मैडम के प्यार का संपर्क पाते ही अपर्णा फट पड़ी और रोतेरोते उस ने सारी दास्तान कह सुनाई.

‘मैडम, आज शादी के 20 साल बाद भी मेरे घर में मेरी कोई कद्र नहीं है. पूरा पैसा उन तथाकथित बाबाजी की सेवा में लगाया जा रहा है. बाबाजी की सेवा के चलते कभी आश्रम के लिए सीमेंट, कभी गरीबों के लिए कंबल, और कभी अपना घर लुटा कर गरीबों को खाना खिलाया जा रहा है. यदि एक भी प्रश्न पूछ लिया तो मेरी पिटाई जानवरों की तरह की जाती है. सुबह से शाम तक स्कूल में खटने के बाद जब घर पहुंचती हूं तो हर दिन एक नया तमाशा मेरा इंतजार कर रहा होता है. मैं थक गई हूं इस जिंदगी से,’ कह कर अपर्णा फूटफूट कर रोने लगी.

ऊषा मैडम अपनी कुरसी से उठीं और अपर्णा के आगे पानी का गिलास रखते हुए बोलीं, ‘बेटा, एक बात सदा ध्यान रखना कि अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला अधिक दोषी होता है. सब से बड़ी गलती तेरी यह है कि तू पिछले

20 सालों से अन्याय को सह रही है. जिस दिन तेरे ऊपर उस का पहला हाथ उठा था, वहीं रोक देना था. सामने वाला आप के साथ अन्याय तभी तक करता है जब तक आप सहते हो. जिस दिन आप प्रतिकार करने लगते हो, उस का मनोबल समाप्त हो जाता है. आत्मनिर्भर और पूर्णतया शिक्षित होने के बावजूद तू इतनी कमजोर और मजबूर कैसे हो गई? जिस दिन पहली बार हाथ उठाया था, तुम ने क्यों नहीं मातापिता और परिवार वालों को बताया ताकि उसे रोका जा सकता. क्यों सह रही हो इतने सालों से अन्याय? छोड़ दो उसे उस के हाल पर.’

‘मैं हर दिन यही सोचती थी कि शायद सब ठीक हो जाएगा. मातापिता की इज्जत और लोकलाज के डर से मैं कभी किसी से कुछ नहीं कह पाई. लगा था कि मैं सब ठीक कर लूंगी. पर मैं गलत थी. स्थितियां बद से बदतर होती चली गईं.’ अपर्णा ने रोते हुए कहा.

अब ऊषा मैडम बोलीं, ‘जो आज गलत है, वह कल कैसे सही हो जाएगा. जिस इंसान के गुस्से से तुम प्रथम रात्रि को ही डर जाती हो और जिस इंसान को अपनी पत्नी पर हाथ उठाने में लज्जा नहीं आती. जो बाबाओं की करामात पर भरोसा कर के खुद बेरोजगार हो कर पत्नी का पैसा पानी की तरह उड़ा रहा है, वह विवेकहीन इंसान है. ऐसे इंसान से तुम सुधार की उम्मीद लगा बैठी हो? क्यों सह रही हो? तोड़ दो सारे बंधनों को अब. निर्णय तुम्हें लेना है,’ कह कर मैडम ने दरवाजा खोल दिया था.

बाहर निकल कर उस ने भी अब और न सहने का निर्णय लिया और अगले ही दिन अपने तबादले के लिए आवेदन कर दिया. 6 माह बाद अपर्णा का तबादला दूसरे शहर में हो गया.

नितिन को जब तबादले के बारे में पता चला, तो क्रोध से चीखते हुए बोला, ‘यह क्या मजाक है मुझ से बिना पूछे ट्रांसफर किस ने करवाया?’

‘मैं ने करवाया. मैं अब और तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. तुम्हारे उन तथाकथित गुरुजी ने तुम्हारी बसीबसाई गृहस्थी में आग लगा दी. आज और अभी से ही तुम्हारी यह दुनिया तुम्हें मुबारक. अब और अधिक सहने की क्षमता मुझ में नहीं है.’

‘हांहां, जाओ, रोकना भी कौन चाहता है तुम्हें? वैसे भी कल गुरुजी आ रहे हैं. तुम्हारी तरफ देखना भी कौन चाहता है. मैं तो यों भी गुरुजी की सेवा में ही अपना जीवन लगा देना चाहता हूं,’ कह कर भड़ाक से दरवाजा बंद कर के नितिन बाहर चला गया.

बस, उस के बाद से दोनों के रास्ते अलगअलग हो गए थे. बेटे नवीन ने पुणे में जौब जौइन कर ली थी. परंतु आज आए इस एक फोन ने उस के ठहरे हुए जीवन में फिर से तूफान ला दिया था. तभी अचानक उस ने मां का स्पर्श कंधे पर महसूस किया.

‘‘क्या सोच रही है, बेटा.’’

‘‘मां, कुछ नहीं समझ आ रहा? क्या करूं?’’

‘‘बेटा, पत्नी के नाते नहीं, केवल इंसानियत के नाते ही चली जा, बल्कि नवीन को भी बुला ले. कल को कुछ हो गया, तो मन में हमेशा के लिए अपराधबोध रह जाएगा. आखिर, नवीन का पिता तो नितिन ही है न,’’ अपर्णा की मां ने उसे समझाते हुए कहा.

अगले दिन वह नवीन के साथ दिल्ली के सरकारी अस्पताल के बैड नंबर 401 पर पहुंची. बैड पर लेटे नितिन को देख कर वह चौंक गई. बिखरे बाल, जर्जर शरीर और गड्ढे में धंसी आंखें. शरीर में कई नलियां लगी हुई थीं. मुंह से खून की उलटियां हो रही थीं. पूछने पर पता चला कि नितिन को कोई खतरनाक बीमारी है. उसे आया देख कर नितिन के चेहरे पर चमक आ गई.

वह अपनी कांपती आवाज में बोला, ‘‘तुम आ गईं. मुझे पता था कि तुम जरूर आओगी. अब मैं ठीक हो जाऊंगा,’’ तभी डाक्टर सिंह ने कमरे में प्रवेश किया. नवीन की तरफ मुखातिब हो कर वे बोले, ‘‘इन्हें एड्स हुआ है. अंतिम स्टेज में है. हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं.’’

कायर – भाग 2 : क्या घना को मिल पाया श्यामा का प्यार

घना सोचने लगा कि श्यामा का गांव यहां से थोड़ी ही दूर पर है. क्यों न एक बार फिर कोशिश की जाए. आज उसे किसी बात का डर नहीं था. न मरने का डर, न जंगली जानवरों का डर. लिहाजा, वह श्यामा के घर की तरफ चल पड़ा.

घना मास्टर बिछन दास के घर के सामने रुक गया.

खड़कोट गांव के एक हिस्से में ब्राह्मण और एक हिस्से में दलित रहते हैं. इसी गांव के दलित टोले के बिछन दास मास्टर की बेटी श्यामा सेंदुल कालेज में बीए के आखिरी साल में पढ़ रही थी.

मास्टर बिछन दास नजदीक के ही एक गांव में मिडिल स्कूल के हैडमास्टर थे. खेतीबारी ज्यादा नहीं थी, इसलिए पत्नी भी अकसर उन के साथ ही

रहती थी.

बिछन दास का स्कूल बहुत ज्यादा दूर न होने के चलते वे हर 15 दिन बाद घर आ जाते थे. श्यामा अपनी बूढ़ी दादी मां के साथ गांव में रहती थी.

करीब के गांव का होने की वजह से और श्यामा में घना की खास दिलचस्पी होने के चलते उसे श्यामा और उस के घर के बारे में बहुतकुछ पता था.

घना जानता था कि श्यामा की मां अकसर उस के पिता के साथ ही रहती हैं. घर में उस की बूढ़ी दादी मां न साफ देखती हैं और न साफ सुनती हैं. उसे यह भी पता था कि श्यामा घर की अलग कोठरी में पढ़ाई करती है. हो सकता है कि वह अभी भी पढ़ रही हो.

घना जब श्यामा के घर के चौक में पहुंचा, तब उस ने देखा कि ऊपरी मंजिल की एक कोठरी में अभी भी रोशनी थी. वह जानता था कि श्यामा इसी कोठरी में पढ़ रही होगी.

घना ने दरवाजा खटखटाया. कमरे में कोई भी हलचल नहीं हुई. उस ने फिर दरवाजा खटखटाया.

‘‘कौन है?’’ कोठरी से श्यामा की आवाज आई.

‘‘मैं… घना.’’

‘‘घना?’’

‘‘हां, घना.’’

‘‘इतनी रात में…’’

‘‘हां, दरवाजा खोल दो. अपनी बात कर के मैं यहां से चला जाऊंगा.’’

श्यामा ने घड़ी की ओर देखा. रात के 2 बज रहे थे. वह सोचने लगी, ‘क्या करूं? दरवाजा खोलूं, तो कहीं यह कोई ?ां?ाट न खड़ा कर दे. अपनी बात कहने के अलावा यह और क्या कर सकता है? यह मेरा घर है. एक दलित लड़की के घर में इतनी रात को… इसे भी तो अपनी इज्जत का खयाल होगा.’

श्यामा ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजे पर घना खड़ा था. कपड़े फटे हुए, चेहरे पर खरोंचों के निशान, जिन से खून निकल रहा था.

श्यामा को उस पर तरस आ गया. उस ने उसे अंदर आने दिया. वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था. उस के चेहरे पर पीड़ा साफ ?ालक रही थी.

‘‘यह सब क्या है?’’ श्यामा ने हैरान होते हुए पूछा.

घना ने श्यामा के साथ कालेज से घर आते समय रास्ते में जो बातचीत हुई थी, उस के बाद की सारी घटना बता दी.

‘‘मैं क्या करूं श्यामा? मैं अपने को संभाल नहीं पा रहा हूं. तुम्हारे बिना मैं अब जी नहीं सकूंगा.’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? यह तो जबरदस्ती है. मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती. ऐसा कभी नहीं हो सकता. मैं ने आप से पहले भी कहा था.’’

‘‘ठीक है, तब फिर चलता हूं. मैं तुम्हारा नुकसान नहीं करना चाहता. ज्यादा क्या कहूं… शायद यह मेरी जिंदगी की आखिरी रात है,’’ कह कर घना उठने को हुआ.

‘‘इतनी रात को तुम कहां जाओगे?’’ श्यामा ने डर कर पूछा.

‘‘कहां जाऊंगा? जहां एक दिन सभी को जाना है. क्यों न मैं आज ही भिलंगना नदी में डूब जाऊं. मैं जी कर क्या करूंगा, खुद भी नहीं जानता. पर मैं तुम से माफी मांगता हूं. मैं ने तुम्हें बहुत तकलीफ दी है, मु?ो माफ कर देना.’’

घना ने दरवाजे की तरफ कदम रखा ही था कि श्यामा ने उस की बांह थाम कर उसे कुरसी पर बैठा दिया.

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