बीती ताहि बिसार दे – भाग 1 : देवेश के दिल की

‘‘भैयाये आप की किताबें… शानिका ने दी हैं,’’ रागिनी किताबें मेज पर रखती हुई बोली.

अपने स्टडीरूम में बुकशेल्फ पर किताबों को ठीक करते हुए देवेश ने पलट कर एक नजर मेज पर रखी गई किताबों पर डाली. फिर पूछा, ‘‘क्या शानिका आई थी आज यहां?’’

देवेश की आंखों की चमक रागिनी की नजरों से छिपी न रह सकी.

बोली, ‘‘भैया, कालेज में दी थीं.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर देवेश फिर किताबों में उलझ गया.

रागिनी पल भर खड़ी रह पलट कर जाने लगी तो एकाएक देवेश बोल पड़ा, ‘‘आजकल तेरी सहेलियां घर नहीं आती हैं… तू बुलाती नहीं है क्या अपनी सहेलियों को?’’

रागिनी पल भर के लिए देवेश का चेहरा पढ़ती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘सहेलियां या फिर सिर्फ शानिका?’’

‘‘मैं ने ऐसा तो नहीं कहा…’’

‘‘कुछ भी न कहा हो भैया पर क्या मैं समझती नहीं कि शानिका का नाम ही आप की आंखों को चमक से भर देता है… चेहरे पर इंद्रधनुषी नूर बिखर जाता है.’’

देवेश ने कोई जवाब नहीं दिया. किताबों को ठीक करने में लगा रहा.

‘‘भैया,’’ कह रागिनी देवेश के पास जा कर खड़ी हो गई, ‘‘बहुत पसंद करते हो न शानिका को?’’

‘‘नहीं तो… मैं ने ऐसा कब कहा,’’ देवेश हकलाती सी आवाज में बोला.

‘‘भैया खुद को संभाल लो ताकि बाद में धक्का न लगे… उस राह पर कदम न बढ़ाओ. आप तो जानते हो शानिका मेरी क्लास में पढ़ती है. अभी सिर्फ 19 साल की है. 3 भाइयों की छोटी बहन है… उस की शादी की तो अभी दूरदूर तक कोई बात नहीं है और आप… शानिका को मैं जानती हूं. वह आप को पसंद भी करे, तब भी वह इतनी सीधी लड़की है कि अपने पिता व भाइयों के खिलाफ कभी नहीं जाएगी. ऐसा उस का स्वभाव ही नहीं… उस के पिता एक विवाहित और 4 साल के बच्चे के पिता के हाथ में अपनी बेटी का हाथ कभी नहीं देंगे.’’

‘‘रागिनी,’’ देवेश लगभग चीख पड़ा. वह हताश सा कुरसी पर बैठ गया. बोला, ‘‘क्यों याद दिलाती हो तू और मां मुझे वे सब कुछ… मेरा विवाह नहीं, बल्कि मेरे जीवन का एक भयानक हादसा था वह… शनी मेरा बेटा नहीं, एक बहुत बड़ी दुर्घटना है मेरे जीवन की जो पिताजी की जिद्द और मेरी मजबूरियों की वजह से मेरे जीवन में घटित हो गई. मैं तो बस इतना जानता हूं कि मेरी उम्र अभी 28 साल है और मेरे अधिकतर दोस्तों की अभी शादियां तक नहीं हुई हैं.’’

‘‘मैं सब कुछ जानती हूं भैया और आप के दिल को भी समझती हूं. काश, आप को खुशी देना मेरे हाथ में होता तो खींच लाती शानिका को अपने भैया की जिंदगी में या फिर वे सब आप के जीवन में न घटा होता तो मेरे इस खूबसूरत और योग्य भाई की बात गर्व से करती शानिका से… कोई भी लड़की खुद पर इतराती आप को जीवनसाथी के रूप में पा कर.’’

थोड़ी देर चुप रहने के बाद रागिनी देवेश के बालों में स्नेह से हाथ फेरते हुए फिर बोली, ‘‘पर मैं नहीं चाहती कि दोबारा कोई धक्का लगे आप को… जो आप चाहते हैं वह नामुमकिन है. आप खुद ही सोचिए भैया, क्या आप मेरी शादी कर दोगे किसी ऐसे लड़के से? मां के पास कई रिश्ते आए हैं. उन में से कोई लड़की पसंद कर गृहस्थी बसा लो अपनी. तब शानिका की तरफ से भी धीरेधीरे दिलदिमाग हट जाएगा.’’

मुझे नहीं करनी है शादीवादी, ‘‘देवेश थके स्वर में बोला,’’ जा तू सो जा… जाते समय दरवाजा बंद कर देना… मैं कुछ देर पढ़ना चाहता हूं.’’

रागिनी थोड़ी देर खड़ी रही, फिर दरवाजा बंद कर बाहर निकल गई.

देवेश मेज पर सिर रख कर फूटफूट कर रो पड़ा. जो बातें, जो विचार उस के दिमाग में आ कर उथलपुथल मचाने लगते थे पर दिल था कि उन से अनजान ही रहना चाहता था. उन्हीं बातों को, उन्हीं विचारों को रागिनी के शब्दों ने जैसे आकार दे दिया था और वे उस के दिमाग में आ कर हथौड़ा मारने लगे थे.

रात का नीरव अंधकार था. कोई संगी नहीं, कोई साथी नहीं, जो उस की भावनाओं को समझ सके. रागिनी छोटी बहन थी, एक हद तक उसे समझती थी. पर कुछ करने में असमर्थ थी. लगभग हर वक्त दुखी रहने वाली मां से वह अपना दुखदर्द बांट नहीं सकता था. बीती बातों को भूलना चाहता था पर शनी के रूप में उस का विगत अतीत बारबार उस के सामने आ कर खड़ा हो जाता. वह चाहते हुए भी भूल नहीं पाता. शनी जैसेजैसे बड़ा हो रहा था, उस का अतीत भी जैसे आकार में बड़ा हो कर उसे अपने होने का एहसास दिला रहा था.

बीती ताहि बिसार दे – भाग 4 : देवेश के दिल की

शानिका उस से थोड़ी देर बातें करती रही. उसे पता नहीं था कि देवेश की मुग्ध निगाहें उस के चेहरे को सहला रही हैं. एकाएक शानिका ने नजरें उठाईं तो निगाहें देवेश की निगाहों से जा टकराईं. देवेश अचकचा कर निगाहें फेर उठ खड़ा हुआ और अपने स्टडीरूम में चला गया.

रागिनी ने सब कुछ ताड़ लिया. समझ गई, भोलीभाली शानिका पितापुत्र दोनों के मन में बिंध गई.

सभी लड़कियां उठ कर ड्राइंगरूम में बैठ कर गपशप करने लगीं. तभी रागिनी शानिका से बोली, ‘‘तुझे किताबें चाहिए, तो भैया से ले ले. फिर वे औफिस के लिए निकल जाएंगे.’’

‘‘तू ले आ न,’’ शानिका उस से अनुनय करती हुई बोली.

‘‘अरे मुझे क्या पता तुझे कौनकौन सी किताब चाहिए. फिर मुझे तो मना भी कर सकते पर तुझे औपचारिकतावश नहीं कर पाएंगे.’’ शानिका दुविधा में खड़ी रही.

‘‘जा न. भैया इस समय स्टडीरूम में ही हैं. 10-15 मिनट में चले जाएंगे…’’

रागिनी के जोर देने पर शानिका स्टडीरूम में चली गई. देवेश आरामकुरसी पर अधलेटा सा आंखें मूंदे बैठा था. उसे ऐसे देख कर शानिका वापस मुड़ गई.

तभी आहट सुन कर देवेश ने आंखें खोल दीं. बोला, ‘‘अरे आप, कुछ काम था मुझ से,’’ वह बोला.

आप के पास बहुत अच्छी किताबें हैं…मुझे कुछ किताबें चाहिए थीं, पढ़ने के लिए. पढ़ कर लौटा दूंगी.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं. जोजो चाहिए ले लीजिए,’’ देवेश बोला.

शानिका शेल्फ खोल कर अपनी पसंद की किताबें निकालने लगी.

‘‘बहुत शौक है आप को पढ़ने का?’’ देवेश ने पूछा.

‘‘जी.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा शौक है, पर कालेज की पढ़ाई के साथ कैसे कर लेती हैं ये सब?’’

‘‘बस शौक होता है तो हो जाता है. ये किताबें ले जा रही हूं. जल्दी पढ़ कर लौटा दूंगी.’’

‘‘हांहां, जब पढ़ लें तब दे दीजिएगा… जो भी किताब पढ़ना चाहें बेझिझक ले जाया करें,’’ वह प्यार भरी नजर उस पर डालते हुए बोला.

‘‘जी, थैंकयू,’’ कह कर शानिका स्टडीरूम से बाहर निकल गई. बाहर आ कर रागिनी से बोली, ‘‘तेरे भैया तो बहुत ही अच्छे हैं बात करने में. तू तो बेकार डरती है उन से. उन्होंने कहा है कि मैं जब भी किताब ले जाना चाहूं, ले जा सकती हूं.’’

रागिनी जानती थी कि इस बात से बिलकुल अनभिज्ञ है कि वह उस के भैया के दिल में कहां तक उतर गई है.

अब शानिका अकसर आती. कभी देवेश की मौजूदगी में तो कभी गैरमौजूदगी में.

कभी किताबें रख जाती कभी ले जाती. उसे पढ़ते देख देवेश भी नित नएनए लेखकों की किताबें लाता रहता. शानिका जब भी उस की मौजूदगी में आती, देवेश की मुग्ध निगाहों का घेरा उसे अपने आगोश में ले लेता. शनी तो उस से इतना घुलमिल गया था कि उसे 1 मिनट भी नहीं छोड़ता था. जब वह जाने लगती तो रोरो कर आसमान सिर पर उठा लेता. उस के साथ जाने की जिद्द करने लगता.

रागिनी सब कुछ समझ रही थी. शानिका की मौजूदगी ने देवेश को मुसकराना सिखा दिया था. उस की खोईखोई निगाहों में उसे शानिका की तसवीर दिखती. उसे लगता कि शानिका भी देवेश को पसंद करती है, पर कितना पसंद करती है, यह वह समझ नहीं पाती.

मियांबीवी राजी : क्यों करें रिश्तेदार दखलअंदाजी – भाग 1

‘‘दादू …’’ लगभग चीखती हुई झूमुर अपने दादू से लिपट गई.

‘‘अरेअरे, हौले से भाई,’’ दादू बैठे हुए भी झूमुर के हमले से डगमगा गए, ‘‘कब बड़ी होगी मेरी बिटिया?’’

‘‘और कितना बड़ी होऊं? कालेज भी पास कर लिया, अब तो नौकरी भी लग गई है मुंबई में,’’ झूमुर की अपने दादू से बहुत अच्छी घुटती थी. अब भी वह मातापिता व अपने छोटे भाई के साथ सपरिवार उन से मिलने अपने ताऊजी के घर आती, झूमुर बस दादू से ही चिपकी रहती. ‘‘अब की बार मुझे बीकानेर भी दिल्ली जितना गरम लग रहा है वरना यहां की रात दिल्ली की रात से ठंडी हुआ करती है.’’

‘‘चलो आओ, खाना लग गया है. आप भी आ जाएं बाबूजी,’’ ताईजी की पुकार पर सब खाने की मेज पर एकत्रित हो गए. मेज पर शांति से सब ने भोजन किया. अकसर परिवारों में जब सब भाईबहन इकट्ठा होते हैं तो खूब धमाचौकड़ी मचती है. लेकिन यहां हर ओर शांति थी. यहां तक कि पापड़ खाने में भी आवाज नहीं आ रही थी. ऐसा रोब था राधेश्याम यानी सब से बड़े ताऊजी का. यों देखने में उन्हें कोई इतना सख्त नहीं मान सकता था- साधारण कदकाठी, पतली काया. किंतु रोब सामने वाले के व्यक्तित्व में होता है, शरीर में नहीं. राधेश्याम का रोब पूरे परिवार में प्रसिद्घ था. न कोई उन से बहस कर सकता था और न ही कोई उन के विरुद्घ जा सकता था. कम बोलने वाले मगर अमिताभ बच्चन की स्टाइल में जो बोल दिया, सो बोल दिया.

हर साल एक बार सभी ताऊ, चाचा व बूआ अपनेअपने परिवार सहित बीकानेर में एकत्रित हुआ करते थे. पूरे परिवार को एकजुट रखने में इस एक हफ्ते की छुट्टियों का बड़ा योगदान था. चूंकि दादाजी यहीं रहते थे राधेश्याम के परिवार के साथ, इसलिए यही घर सब का हैड औफिस जैसा था.

राधेश्याम के फैक्टरी जाते ही सब भाईबहन अपने असली रंग में आ गए. शाम तक खूब मस्ती होती रही. सारी महिलाएं कामकाज निबटाने के साथ ढेर सारी गपें भी निबटाती रहीं. झूमुर के पापा व चाचा अखबार की सुर्खियां चाट कर, थोड़ी देर सुस्ता लिए.  इसी बीच झूमुर फिर अपने दादू के पास हो ली,  ‘‘कुछ बढि़या से किस्से सुनाओ न दादू.’’ बुजुर्गों को और क्या चाहिए भला. पोतेपोतियां उन के जमाने के किस्से सुनना चाहें तो बुजुर्गों में एक नूतन उमंग भर जाती है.

‘‘बात 1950 की है जब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था. हमारे एक मास्साब थे, मतलब टीचर हरगोविंद सर. एक बार…,’’ इस से पहले कि दादू आगे किस्सा सुनाते, झूमुर बीच में ही कूद पड़ी, ‘‘स्कूल का नहीं दादू, कोई और किस्सा. अच्छा यह बताइए, आप दादी से कैसे मिले थे. आप ठहरे राजस्थानी और दादी तो बंगाल से थीं. तो आप दोनों की शादी कैसे हुई?’’

‘‘अच्छा, तो आज दादूदादी की प्रेमकहानी सुननी है?’’ कह दादू हंसे. दादी को इस जग से गए काफी समय बीत चुका था. कई वर्षों से वे अकेले थे, बिना जीवनसाथी के. अब केवल दादी की यादें ही उन का साथ देती थीं. पूर्ण प्रसन्नता से उन्होंने अपनी कहानी आरंभ की, ‘‘बात 1957 की है. मैं ने अपना नयानया कारोबार शुरू किया था. बाजार से ब्याज पर 3,500 रुपए उठा कर मैं ने यहीं बीकानेर में बंधेज के कपड़ों का कारखाना शुरू किया था. लेकिन राजस्थान का काम राजस्थान में कितना बिकता और मैं कितना  मुनाफा कमा लेता? फिर मुझे बाजार से उठाया असल और सूद भी लौटाना था, और अपने पैरों पर खड़ा भी होना था…’’

‘‘ओहो दादू, आप तो अपने कारोबार के किस्सों में उलझ गए. असली मुद्दे पर आओ न,’’ झूमुर खीझ कर बोली.

‘‘थोड़ा धीरज रख, उसी पर आ रहा हूं. कारोबार को आगे बढ़ाने हेतु मैं कोलकाता पहुंचा. वहां तुम्हारी दादी के पिताजी की अपनी बहुत बड़ी दुकान थी कपड़ों की, लाल बाजार में. उन से मुलाकात हुई. मैं ने अपना काम दिखाया, बंधेज की साडि़यों व चुन्नियों के कुछ सैंपल उन के पास छोड़े. कुछ महीनों में वहां भी मेरा काम चल निकला.’’

‘‘और दादी? वे तो अभी तक पिक्चर में नहीं आईं,’’ झूमुर एक बार फिर उतावली हो उठी.

‘‘तेरा नाम शांति रखना चाहिए था. जरा भी धैर्य नहीं. आगे सुन, दादी के पिताजी ने ही हमारी शादी की बात चलाई. मेरे पिताजी को रिश्ता भा गया और हमारी शादी हो गई.’’

खुल गई आंखें : रवि के सामने आई कैसी हकीकत- भाग 1

दफ्तर से अपने बड़े सरकारी बंगले पर जाते हुए उस दिन अचानक एक ट्रक ने रवि की कार को जोरदार टक्कर मार दी थी. कार का अगला हिस्सा बुरी तरह से टूटफूट गया था.

खून से लथपथ रवि कार के अंदर ही फंसा रह गया था. वह काफी समय तक बेहोशी की हालत में कार के अंदर ही रहा, पर उस की जान बचाने वाला कोई भी नहीं था.

हां, उस के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जरूर लग गई थी. सभी एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे, पर किसी में उसे अस्पताल ले जाने या पुलिस को बुलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

भला हो रवि के दफ्तर के चपरासी रामदीन का, जो भीड़ को देख कर उसे चीरता हुआ रवि के पास तक पहुंच गया था. बाद में उसी ने पास के एसटीडी बूथ से 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुला लिया था.

जब तक पुलिस रवि को ले कर पास के नर्सिंगहोम में पहुंची तब तक उस के शरीर से काफी खून बह चुका था. रामदीन काफी समय तक अस्पताल में ही रहा था. उस ने फोन कर के दफ्तर से सुपरिंटैंडैंट राकेश को भी बुला लिया था जो वहीं पास में रहते थे.

रवि के एक रिश्तेदार भी सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए थे. गांव दूर होने व बूढ़े मांबाप की हालत को ध्यान में रखते हुए किसी ने उस के घर सूचना भेजना उचित नहीं समझा था. वैसे भी उस के गांव में संचार का कोई खास साधन नहीं था. इमर्जैंसी में तार भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं होता था.

रवि की पत्नी गुंजा अपने सासससुर व देवर रघु के साथ गांव में ही रहती थी. वह 2 साल पहले ही गौना करा कर अपनी ससुराल आई थी. रवि के साथ उस की शादी बचपन में तभी हो गई थी, जब वे दोनों 10 साल की उम्र भी पार नहीं कर पाए थे.

गांव में रहने के चलते गुंजा की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद ही छूट गई थी पर रवि 5वीं जमात पास कर के अपने चाचा के पास शहर में ही पढ़ने आ गया था. उस ने अच्छीखासी पढ़ाई कर ली थी. शहर में पढ़ाई करने के चलते उस का मन चंचल हो गया था. वैसे भी वह गुंजा से हर मामले में बेहतर था.

शादी के समय तो रवि को कोई समझ नहीं थी, पर जब गौने के बाद विदा हो कर गुंजा उस के घर आई थी और पहली बार जवान और भरपूर नजरों से उस ने उसे देखा था तभी से उस का मन उस से उचट गया था.

गुंजा कामकाज में भी उतनी माहिर नहीं थी जितनी रवि ने अपनी पत्नी से उम्मीद की थी. यहां तक कि सुहागरात के दिन भी वह गुंजा से दूर ही रहा था.

गुंजा गांव की पलीबढ़ी लड़की थी. शक्लसूरत और पढ़ाईलिखाई में कम होने के बावजूद मांबाप से उसे अच्छे संस्कार मिले थे. उस ने रवि की अनदेखी के बावजूद उस के बूढ़े मांबाप और रवि के छोटे भाई रघु का साथ कभी नहीं छोड़ा.

मांबाप के लाख कहने के बावजूद रवि जब उसे अपने साथ शहर ले जाने को राजी नहीं हुआ तब भी उस ने उस से कोई खास जिद नहीं की, न ही अकेले शहर जाने का उस ने कोई विरोध किया.

शहर में आ कर रवि अपने दफ्तर और रोजमर्रा के कामों में ऐसा बिजी हुआ कि गांव जाना ही भूल गया. उसे अपने मांबाप से भी कुछ खास लगाव नहीं रह गया था क्योंकि वह अपनी बेढंगी शादी के लिए काफी हद तक उन्हीं को कुसूरवार मानता था.

तनख्वाह मिलने पर घर पर पैसा भेजने के अलावा रवि कभीकभार चिट्ठी लिख कर मांबाप व भाई का हालचाल जरूर पूछ लेता था, पर इस से ज्यादा वह अपने घर वालों के लिए कुछ भी नहीं कर पाता था.

3-4 दिन आईसीयू में रहने के बाद अब रवि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया था. दफ्तर के अनेक साथी तन, मन और धन से उस की सेवा में लगे हुए थे. बड़े साहब भी लगातार उस की सेहत पर नजर रखे हुए थे.

नर्सिंगहोम में जहां सीनियर सर्जन डाक्टर अशोक लाल उस के इलाज पर ध्यान दे रहे थे, वहीं वह वहां की सब से काबिल नर्स सुधा चौहान की चौबीसों घंटे की निगरानी में था.

सुधा चौहान जितना नर्सिंगहोम के कामों में माहिर थी, उतना ही सरल उस का स्वभाव भी था. शक्लसूरत से भी वह किसी फिल्मी नर्स से कम नहीं थी. उस की रातदिन की सेवा और बेहतर इलाज के चलते रवि को जल्दी ही होश आ गया था.

उस समय सुधा ही उस के पास थी. उसे बेचैन देख कर सुधा ने सहारा दिया और उस के सिरहाने तकिया रख दिया. अगले ही पल नर्स सुधा ने शीशी से एक चम्मच दवा निकाल कर आहिस्ता से उस के मुंह में डाल दी

रवि कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहता था, पर पूरे चेहरे पर पट्टी बंधी होने के चलते वह कुछ भी कह पाने में नाकाम था. सुधा ने हलकी मुसकान के साथ उसे इशारेइशारे में चुप रहने को कहा.

सुधा की निजी जिंदगी भी बहुत खुशहाल नहीं थी. उस का पति मनीष इस दुनिया में नहीं था. उस की रिया नाम की 5 साल की एक बेटी थी जो उस के साथ ही रहती थी.

बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा – भाग 1

नरेश की लाश 2 दिनों बाद एक कुएं से बरामद हुई थी. दुर्गंध फैली थी, तब लोगों को पता चला था कि कुएं में लाश पड़ी है. उस के बाद पुलिस को सूचना दी गई थी. नरेश की पत्नी ऐश्वर्या ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा रखी थी. नरेश शहर का जानामाना व्यवसायी था. पिता की मौत के बाद सारा कारोबार वही संभाल रहा था, जिस की वजह से वह काफी व्यस्त रहता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे से पहले लौट नहीं पाता था.

नरेश की पत्नी ऐश्वर्या को परिवार वालों ने स्वीकार नहीं किया था, इसलिए वह उसे ले कर शहर के सब से महंगे इलाके में फ्लैट ले कर अलग रह रहा था. ऐश्वर्या बेहद खूबसूरत थी. शादी के अभी एक साल ही बीते थे कि यह हादसा हो गया था. लाश बरामद होने के बाद पुलिस ऐश्वर्या से पूछताछ करने पहुंची तो पहला सवाल यही किया, ‘‘आप को किसी पर शक है?’’

‘‘नहीं.’’ सुबकते हुए ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘याद कीजिए, आप के पति का कभी किसी से लेनदेन को ले कर विवाद तो नहीं हुआ था, जिस का उन्होंने आप से जिक्र किया हो?’’

‘‘वह व्यवसाय की बातें घर पर बिलकुल नहीं करते थे.’’

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में ऐश्वर्या ने जो बताया था, उस के अनुसार, नरेश का बनारसी साडि़यों का काफी बड़ा कारोबार था. काम की अधिकता की वजह से उन का लोगों से मिलनाजुलना कम ही हो पाता था. क्योंकि उन के पास समय ही नहीं होता था. इस फ्लैट में आए उन्हें ज्यादा दिन नहीं हुए थे. गार्ड के अनुसार, वह ठीकठाक आदमी था. नरेश के बारे में गार्ड इस से ज्यादा कुछ नहीं बता सका था. नरेश बड़ा कारोबारी था, इसलिए शहर के व्यापारी उस के कातिलों को पकड़ने के लिए पुलिस पर काफी दबाव बनाए हुए थे. बारबार आंदोलन की धमकी दे रहे थे. कातिलों तक पहुंचने के लिए पुलिस पूरा जोर लगाए हुए थी. नरेश की किसी व्यापारी से दुश्मनी तो नहीं थी, इस के लिए उस के कर्मचारियों से पूछताछ की गई. उन सब का कहना था कि रुपयोंपैसों के लिए उन्होंने अपने मालिक को कभी किसी से लड़तेझगड़ते नहीं देखा था. पुलिस के लिए हैरानी वाली बात यह थी कि घर वाले कुछ बोलने को तैयार नहीं थे. इस की वजह शायद नरेश से घर वालों की नाराजगी थी.

पुलिस ने नाराजगी की वजह पूछी तो लोगों ने बताया कि नरेश ने प्रेम विवाह किया था, इसलिए घर वाले नाराज थे. पुलिस को लगा कि इतनी सी बात के लिए कोई अपने खून का कत्ल नहीं कर सकता. इस के अलावा नरेश ऐसी बिरादरी से थे, जो शुद्ध व्यवसायी होती है. ऐसे लोगों के बारे में कत्ल की बात सोचना भी ठीक नहीं था.

पुलिस ने नरेश के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. उन में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला. घूमफिर कर शक की सुई ऐश्वर्या पर आ टिकी. इस प्रेम विवाह से नरेश के घर का कोई भी सदस्य खुश नहीं था. इस के बावजूद नरेश भाइयों के साथ ही व्यवसाय कर रहा था. सभी पहले की ही तरह मिलजुल कर व्यवसाय करते थे. नरेश अपनी मां से मिलने घर भी जाया करता था.

फ्लैटों में रहने वालों को वैसे भी एकदूसरे के बारे में कम ही पता होता है. अगर इलाका पौश हो तो ऐसे मामले में लोग चुप्पी साधे रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं. फ्लैट बने ऐसे होते हैं कि अंदर क्या हो रहा है, बगल वाले को भी पता नहीं चलता. लेदे कर एक गार्ड ही बचता था, जिसे पता होता था कि इमारत में कौन कब आताजाता है. इसलिए पुलिस गार्ड के पास पहुंची.

मामले की जांच कर रहे इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा, ‘‘तुम हर आनेजाने वाले का रिकौर्ड रखते हो?’’

‘‘नहीं साहब, यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. आने वाले से सिर्फ पूछ लेते हैं कि किस से मिलना है?’’ गार्ड ने सहज भाव से कहा.

‘‘पूछने के बाद उसे जाने देते हो?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘नहीं, पहले उस फ्लैट वाले से फोन पर पूछते हैं, जिस में उसे जाना होता है. उधर से भेजने के लिए कहा जाता है, तभी अंदर जाने देते हैं.’’

‘‘क्या, ऐश्वर्या मैडम से भी कोई मिलने आता था?’’

‘‘साहब, यहां कोई न कोई किसी न किसी से मिलने आता ही रहता है. मैं किसकिस के बारे में बता सकता हूं.’’

‘‘अगर एक से ज्यादा बार कोई मिलने आया हो, तब तो पहचान सकते हो?’’

‘‘क्यों नहीं साहब,’’ गार्ड ने कहा.

इस के बाद इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के फ्लैट पर पुन: लौट आए. उस से एक बार फिर पूछा, ‘‘मैडम, फिर याद कीजिए, कोई तो होगा, जिस से आप के पति की दुश्मनी रही होगी?’’

‘‘एक ही बात आप लोग कितनी बार पूछेंगे. मैं ने बताया तो कि मुझे कुछ नहीं पता.’’ ऐश्वर्या थोड़ा झल्ला कर बोली. इंसपेक्टर शर्मा ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘आप यहां अकेली ही रहती हैं?’’

‘‘क्यों?’’ ऐश्वर्या ने थोड़ा विचलित हो कर पूछा.

‘‘मेरे कहने का मतलब यह है कि संकट की इस घड़ी में कोई तो आप का करीबी होना चाहिए.’’

‘‘मेरी अम्मी आई हैं.’’

‘‘अम्मी?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं उन्हें अम्मी ही कहती हूं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

इस बीच इंसपेक्टर शर्मा उस के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को पढ़ते रहे. उन्होंने अगला सवाल किया, ‘‘क्या मैं उन से मिल सकता हूं?’’

‘‘इस समय वह घर में नहीं हैं.’’

‘‘कहां गई हैं?’’

‘‘बाजार से कुछ जरूरी सामान लेने गई हैं.’’

‘‘कब तक लौटेंगी?’’

‘‘डेढ़-दो घंटे लग सकते हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, मैं फिर आऊंगा तो उन से मिल लूंगा. आप जांच में सहयोग करती रहें, निश्चय ही एक न एक दिन कातिल पकड़ा जाएगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने उठते हुए कहा. जैसे ही वह दरवाजे पर पहुंचे, अंदर से किसी महिला के खांसने की आवाज आई. उन्होंने पलट कर कहा, ‘‘आप तो कह रही थीं कि अंदर कोई नहीं है, फिर यह खांसा कौन?’’

‘‘मैं ने कब कहा कि अंदर कोई नहीं है. मेरी सास भी आई हुई हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

कुछ कहे बगैर इंसपेक्टर शर्मा बाहर आ गए. जीना उतरते हुए वह यही सोच रहे थे कि पिछली बार जब वह यहां आए थे, तब नरेश के घर वालों ने कहा था कि नरेश से सिवाय व्यवसाय के उन का कोई और संबंध नहीं है. फिर जख्म पर मरहम लगाने उस की मां यहां कैसे आ गई?

इंसपेक्टर शर्मा थाने आ कर इसी मामले पर गहराई से विचार करने लगे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐश्वर्या ने अपनी मां को अम्मी क्यों कहा? कहीं वह मुसलिम तो नहीं है? अब इस का पता कैसे चले? क्यों न नरेश के घर वालों से पूछा जाए? हो सकता है, इसी वजह से नरेश के घर वाले ऐश्वर्या को नापसंद करते रहे हों?

इस बारे में घर वालों से पूछने का निर्णय ले कर वह अन्य काम में लग गए. अगले दिन सुबहसुबह ही ऐश्वर्या का फोन आया. वह थोड़ी घबराई हुई थी. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, जल्दी आइए. मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहती हूं.’’

इंसपेक्टर शर्मा तुरंत ऐश्वर्या के घर पहुंच गए. उन्हें कागज का टुकड़ा देते हुए उस ने कहा, ‘‘यह देखिए, इस में क्या लिखा है?’’

इंसपेक्टर शर्मा ने उसे खोल कर देखा. उस में लिखा था, ‘10 लाख रुपए 26 फरवरी तक पहुंचा देना, वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहना.’

‘‘यह आप को कहां मिला?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘गद्दे के नीचे रखा था.’’

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