पराकाष्ठा- भाग 2: एक विज्ञापन ने कैसे बदली साक्षी की जिंदगी

पति को बस में करने के नएनए तरीके आजमाने की जब उस ने कोशिश की तो सुदीप का माथा ठनका. इस तरह शर्तों पर तो जिंदगी नहीं जी जा सकती. आपस में विश्वास, समझ, प्रेम व सामंजस्य की भावना ही न हो तो संबंधों में प्रगाढ़ता कहां से आएगी? रिश्तों की मधुरता के लिए दोनों को प्रयास करने पड़ते हैं और साक्षी केवल उस पर हावी होने, अपनी जिद मनवाने तथा स्वयं को सही ठहराने के ही प्रयास कर रही है. यह सब कब तक चल पाएगा. इन्हीं विचारों के झंझावात में वह कुछ दिन उलझा रहा.

एक दिन अचानक खुशी की लहर उस के शरीर को रोमांचित कर गई जब साक्षी ने उसे बताया कि वह मां बनने वाली है. पल भर के लिए उस के प्रति सभी गिलेशिकवे वह भूल गया. साक्षी के प्रति अथाह प्रेम उस के मन में उमड़ पड़ा. उस के माथे पर प्रेम की मोहर अंकित करते हुए वह बोला, ‘थैंक्यू, साक्षी, मैं तुम्हारा आभारी हूं, तुम ने मुझे पिता बनने का गौरव दिलाया है. मैं आज बहुत खुश हूं. चलो, बाहर चलते हैं. लेट अस सेलीब्रेट.’

मां को जब यह खुशखबरी सुदीप ने सुनाई तो वह दौड़ी चली आईं. अपने अनुभवों की पोटली भी वह खोलती जा रही थीं, ‘साक्षी, वजन मत उठाना, भागदौड़ मत करना, ज्यादा मिर्चमसाले, गरम चीजें मत लेना…’ कह कर मां चली गईं.

एकांत के क्षणों में सुदीप सोचता, बच्चा होने के बाद साक्षी में सुधार आ जाएगा. बच्चे की सारसंभाल में वह व्यस्त हो जाएगी, सहेलियों के जमघट से भी छुटकारा मिल जाएगा.

प्रसवकाल नजदीक आने पर मां ने आग्रह किया कि साक्षी उन के पास रहे मगर साक्षी ने दोटूक जवाब दिया, ‘मुझे यहां नहीं रहना, मां के पास जाना है. मेरी मम्मी, मेरी व बच्चे की ज्यादा अच्छी देखभाल कर सकती हैं.’

हार कर उसे मां के घर भेजना ही पड़ा था सुदीप को.

3 माह के बेटे को ले कर साक्षी जब घर लौटी तो सब से पहले उस ने आया का इंतजाम किया. चूंकि उस का वजन भी काफी बढ़ गया था इसलिए हेल्थ सेंटर जाना भी शुरू कर दिया. उसे बच्चे को संभालने में खासी मशक्कत करनी पड़ती. दिन भर तो आया ही उस की जिम्मेदारी उठाती थी. कई दफा मुन्ना रोता रहता और वह बेफिक्र सोई रहती. एक दिन बातों ही बातों में सुदीप ने जब इस बारे में शिकायत कर दी तो साक्षी भड़क उठी, ‘हां, मुझ से नहीं संभलता बच्चा. शादी से पहले मैं कितनी आजाद थी, अपनी मर्जी से जीती थी. अब तो अपना होश ही नहीं है. कभी घर, कभी बच्चा, बंध गई  हूं मैं…’

सुदीप के पैरों तले जमीन खिसक गई, ‘साक्षी, यह क्या कह रही हो तुम? अरे, बच्चे के बिना तो नारी जीवन ही अधूरा है. यह तो तुम्हारे लिए बड़ी खुशी की बात है कि तुम्हें मां का गौरवशाली, ममता से भरा रूप प्राप्त हुआ है. हम खुशकिस्मत हैं वरना कई लोग तो औलाद के लिए सारी उम्र तरसते रह जाते हैं,’ सुदीप ने समझाने की गरज से कहा.

‘तुम आज भी उन्हीं दकियानूसी विचारों से भरे हो. दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है. अभी भी तुम कुएं के मेढक बने हुए हो. घर, परिवार, बच्चे, बस इस के आगे कुछ नहीं.’

साक्षी के कटाक्ष से सुदीप भीतर तक आहत हो उठा, ‘साक्षी, जबान को लगाम दो. तुम हद से बढ़ती जा रही हो.’

‘मुझे भी तुम्हारी रोजरोज की झिकझिक में कोई दिलचस्पी नहीं. मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना, तलाक चाहिए मुझे…’

साक्षी के इतना कहते ही सुदीप की आंखों के आगे अंधेरा छा गया, ‘क्या कहा तुम ने, तलाक चाहिए? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?’

‘बिलकुल ठीक है. मैं अपने मम्मीपापा के पास रहूंगी. वे मुझे किसी काम के लिए नहीं टोकते. मुझे अपने ढंग से जीने देते हैं. मेरी खुशी में ही वे खुश रहते हैं…’

उन के संबंधों में दरार आ चुकी थी. मुन्ने के माध्यम से यह दरार कभी कम अवश्य हो जाती लेकिन पहले की तरह प्रेम, ऊष्मा, आकर्षण नहीं रहा.

तनावों के बीच साल भर का समय बीत गया. इस बीच साक्षी 2-3 बार तलाक की धमकी दे चुकी थी. सुदीप तनमन से थकने लगा था. आफिस में काम करते वक्त भी वह तनावग्रस्त रहने लगा.

मुन्ना रोए जा रहा था और साक्षी फोन पर गपशप में लगी थी. सुदीप से रहा नहीं गया. उस का आक्रोश फट पड़ा, ‘तुम से एक बच्चा भी नहीं संभलता? सारा दिन घर रहती हो, काम के लिए नौकर लगे हैं. आखिर तुम चाहती क्या हो?’

‘तुम से छुटकारा…’ साक्षी चीखी तो सुदीप भी आवेश में हो कर बोला, ‘ठीक है, जाओ, शौक से रह लो अपने मांबाप के घर.’

साक्षी ने फौरन अटैची में अपने और मुन्ने के कपड़े डाले.

मुंहबोली बहनें- भाग 3 : रोहन ने अपनी पत्नी को क्यों दे डाली धमकी

‘‘मेरे और अनाइका के बीच कुछ चल रहा है, यह बात अनाइका ने मुझे क्यों नहीं बताई? इतनी बड़ी बात मुझ से छिपा कर रखी? मुझे भी बता देती तो मैं थोड़ा अपने पर इतरा लेता,’’ रोहन भैया ने चिंतित मुद्रा में मुंह बना कर कहा, ‘‘सोनाली, कमी मुझ में नहीं उन लड़कियों की सोच में है. किसी से दो बातें कर लो तो सीधा ‘चक्कर चलना’ ही मान बैठती हैं.’’ रोहन भैया मेरी किसी बात को गंभीरता से लेने को तैयार ही नहीं थे. मैं झक मार कर वहां से उठ ही गई, ‘‘ठीक है रोहन भैया, आप के लिए तो हर बात बस, मजाक ही होती है, पर कालेज में होने वाली बातों का मुझ पर असर पड़ता है. कोई मेरे भाई के बारे में अनापशनाप कहे तो मैं बरदाश्त नहीं कर पाती हूं. अगले साल मैं अपना कालेज ही बदल लूंगी. न आप के कालेज में रहूंगी, न आप के बारे में कुछ सुनूंगी और न ही मेरा दिमाग खराब होगा,’’ कह कर मैं अपना बैग उठा कर वहां से निकल पड़ी.

‘‘ओए मधुमक्खी, कालेज बदलना तो अकेली ही जाना, अपनी सहेलियों को मत ले जाना वरना मेरे कालेज में तो पतझड़ आ जाएगा,’’ कह कर रोहन भैया फिर होहो कर के हंसने लगे. मुझे पता था कि रोहन भैया चिकने घड़े हैं. मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. फिर भी हर 10-15 दिन में मैं उन से इस बात को ले कर बहस कर ही बैठती थी.

12वीं के बाद बीकौम में जब मुझे दीनदयाल डिग्री कालेज में ऐडमिशन मिला था तो मैं फूली नहीं समाई थी. नामीगिरामी कालेज में ऐडमिशन पाने की खुशी के साथसाथ एक सुकून का एहसास यह सोचसोच कर भी हो रहा था कि रोहन भैया के होते हुए मुझे किसी काम के लिए भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी. मेरा सारा काम बैठेबिठाए हो जाएगा. रोहन भैया उसी कालेज से एमकौम कर रहे थे और कालेज में उन के रोब के किस्से उन के मुंह से सालों से सुनती चली आ रही थी.

कालेज पहुंची तो सचमुच रोहन भैया की कालेज में पहचान देख कर मैं दंग रह गई. छात्रसंघ के सक्रिय सदस्य होने के कारण सारे प्रोफैसर और विद्यार्थी न केवल उन्हें अच्छी तरह जानते थे बल्कि वाक्पटुता और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण उन्हें पसंद भी बहुत करते थे. युवतियों के तो वे खासकर सर्वप्रिय नेता माने जाते थे. उन में वे किशन कन्हैया के नाम से मशहूर थे. लड़कियां उन के इर्दगिर्द मंडराने के अवसर तलाशती रहती थीं.

कालेज में उन के जलवे देख कर मैं भी अपना सिक्का जमाने के लिए सभी के सामने रोब जमाते हुए यह कहने लगी कि रोहन मेरे भैया हैं और मुझे बहुत प्यार करते हैं, लेकिन उस के बाद से ही मेरी मुसीबतों का सिलसिला शुरू हो गया. रोज कोई न कोई युवती अपना कोई न कोई काम ले कर मेरे पास

सिया के आंसू : भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा  

22 साल की एक पढ़ीलिखी लड़की थी, जो बीटैक कर रही थी. वह एक कामयाब यूट्यूबर थी, जो अपनी कार खुद चलाना पसंद करती थी और देश के ज्वलंत मुद्दों पर भी अपनी राय बड़ी बेबाकी से सब के सामने रखती थी, पर किसी इनसान में इतनी अच्छाइयों का होना यह नहीं साबित करता है कि वह अंधविश्वासी नहीं होगा.

 

सिया के मन पर भी उस के बचपन से ही बताए गए रीतिरिवाजों और धर्मांधता का पूरा असर था. हां, पर जो उस का इन अंधविश्वासों में साथ नहीं देता था, वह था सिया के बचपन का दोस्त वीरेन. वीरेन से सिया की सगाई भी हो चुकी थी और शादी की तारीख भी दिसंबर महीने की थी, पर उस से पहले वीरेन और सिया अपने दोस्तों नताशा और तान्या के साथ एक धार्मिक जगह सिद्धनाथ के दर्शन करने जाना चाहते थे.

बाकी के दिन तो सफर की तैयारियों में कब निकल गए, सिया को पता ही नहीं चला और फिर वह दिन भी आ गया, जब वे चारों सफर पर निकल पड़े और रास्ते की सारी दिक्कतों को झेलते हुए वे सिद्धनाथ पहुंच गए. अभी उन लोगों की गाड़ी पूरी तरह से रुक भी नहीं पाई थी कि उन की गाड़ी के चारों तरफ अनजान लड़कों और आदमियों की भीड़ जमा हो गई.

‘‘हां जी मैडम… रुकने के लिए कमरा चाहिए… बहुत सस्ते में दिला देंगे… एसी वाला रूम… कम कीमत में…’’ उन में से कुछ लड़के साधुसंतों जैसे लग रहे थे. ‘‘बहनजी… हमारी धर्मशाला में कमरा ले लो… एकदम मुफ्त मिलेगा… और वह भी सारी सुविधाओं के साथ…’’ उन में से एक बोला.

‘‘मुफ्त… तुम लोग मुफ्त में कमरा क्यों दे रहे हो भाई?’’ वीरेन ने पूछा. ‘‘अरे भाई… यह सब तो धर्म को बढ़ावा देने के लिए है… हम आप को कमरा देते हैं और बदले में आप हमारे दानपात्र में कुछ पैसे डाल देना… मंदिर जाने के लिए प्रसाद हमारे यहां से ही लेना…’’ दूसरा लड़का बोला.

पता नहीं क्यों जहां पर भी धर्म और दानपात्र दोनों एकसाथ आते हैं, वहां पर वीरेन को एक अलग ही गंध आने लगती है, पर साधुसंतों द्वारा चलाई जा रही धर्मशाला में कमरा ले कर रहने में धर्म की सेवा होगी, ऐसा सोच कर सिया मचलने लगी, ‘‘वीरेन, सही तो कह रहे हैं ये लोग… आखिर धर्मशाला में कमरा ले कर रहने में बुराई ही क्या है?’’

‘‘हां, ठीक है, पर अगर कमरे हमारे रहने लायक नहीं होंगे, तो हम फिर किसी और होटल में चलेंगे,’’ वीरेन ने फैसला सुनाया और सिर हिला कर नताशा और तान्या ने उस पर अपनी मुहर लगा दी. आगेआगे वे लड़के चल रहे थे और पीछेपीछे ये चारों. कुछ देर पैदल चलने के बाद ही वे उस धर्मशाला के सामने खड़े थे, जिस में उन्हें रहना था. बाहर से तो एक एकदम साधारण सी बिल्डिंग लग रही थी, पर अंदर कदम रखते ही उन चारों की समझ में आ गया कि यह धर्मशाला किसी होटल से कम नहीं है.

उस धर्मशाला के एक तरफ जगमग करता हुआ मंदिर बना था और दूसरी तरफ कमरे बने हुए थे. मतलब साफ था कि वे लोग धर्मशाला का टैग लगा कर एक होटल चला रहे थे. चारों तरफ एक अलग सी सुगंध फैली हुई थी. सिया ने अपने लिए गए फैसले पर इठलाते हुए उन तीनों की तरफ देखा मानो यह कहना चाह रही हो कि देखा मेरा फैसला कितना सही था.

वीरेन अकेला एक कमरे में ठहर गया, जबकि बाकी तीनों लड़कियां दूसरे कमरे में. आज रातभर उन को आराम कर के कल सुबह ही उन लोगों को सिद्धनाथ बाबा के मंदिर के लिए निकलना था. अगली सुबह वे सभी जल्दी ही जाग गए और मंदिर दर्शन की तैयारी करने लगे. नताशा बाथरूम में नहाने गई थी, पर कुछ देर बाद ही वह बाथरूम से हड़बड़ाती हुई निकली और बाहर की ओर भागी. उसे इस तरह भागता देख कर कोई कुछ भी समझ नहीं पाया.

 

‘‘क्या हुआ नताशा…? तू इतनी परेशान क्यों है?’’ पीछे से आते हुए तान्या ने पूछा.‘‘पता है, जब मैं बाथरूम में नहा रही थी, तभी खिड़की से कोई मोबाइल के कैमरे से मेरी वीडियो शूट कर रहा था. मैं ने उसे देख कर जल्दी से कपड़े पहने  और पकड़ने के लिए बाहर लपकी, पर वहां पर कोई नहीं था. मैं इस बात की शिकायत यहां के मैनेजर से करने जा रही हूं,’’ कहने के साथ ही नताशा सीधे मैनेजर के पास पहुंची, जहां पर एक गंजा साधु बैठा हुआ था.

‘‘देखिए, यह एक तीर्थस्थल है… यहां आ कर तो सभी के मन का मैल अपनेआप धुल जाता है और फिर हमारे यहां ऐसा काम कौन करेगा भला… देखो बेटी, तुम से कोई भूल हुई है, फिर भी आप लोगों को कोई असुविधा हुई है, तो मैं आप लोगों का कमरा बदलवा देता हूं,’’ उस साधु ने कहा.

 

वह साधु मैनेजर ये बातें कहते हुए बारबार मंदिर की ओर देख कर हाथ जोड़ता और एक छोटी सी माला को हाथ में घुमा रहा था.

 

मुंहबोली बहनें- भाग 4 : रोहन ने अपनी पत्नी को क्यों दे डाली धमकी

भाभी सुंदर और समझदार थीं. शादी के बाद रोहन भैया के स्वभाव में भी बहुत परिवर्तन आ गया. अब वे काफी शांत और गंभीर रहने लगे थे. कालेज के समय वाली उच्छृंखलता अब कहीं उन के स्वभाव में नहीं दिखती थी. साल भर तक तो उन का दांपत्य जीवन बहुत अच्छी तरह चला पर अचानक न जाने क्या हुआ कि भैयाभाभी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. उन के बीच अकसर बहस होने लगी. ताईजी के लाख पूछने पर भी दोनों में से कोई भी कुछ बताने को तैयार नहीं होता. उसी दौरान मैं मायके गई थी तो ताईजी के यहां भी सब से मिलने चली गई. ताईजी ने उन लोगों के बिगड़ते रिश्ते के बारे में बताते हुए मुझे भाभी से बात कर के कारण जानने को कहा. पहले तो भाभी ने बात को टालना चाहा किंतु मेरे हठ पकड़ लेने पर उन्होंने जो कहा उस पर यकीन करना मुश्किल था.

भाभी ने कहा, ‘‘रोहन का शक्की स्वभाव उन के वैवाहिक जीवन पर ग्रहण लगा रहा है. मेरे एक मुंहबोले भाई को ले कर इन के मन में शक का कीड़ा कुलबुला रहा है. मैं उन्हें हर तरह से समझा चुकी हूं कि उस के साथ मेरा भाईबहन के अलावा और किसी तरह का कोई संबंध नहीं है पर इन्हें मेरी किसी बात पर यकीन ही नहीं है. मेरी हर बात के जवाब में बस यही कहते हैं, ‘ये मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता क्या होता है मुझे न समझाओ. किसी अमर्यादित रिश्ते पर परदा डालने के लिए मुंहबोला भाई और मुंहबोली बहन का जन्म होता है.’ इन का कहना है कि या तो अपने मुंहबोले भाई से ही रिश्ता रख लो या मुझ से. अब तुम ही बताओ इतने सालों का रिश्ता क्या कह कर खत्म करूं? कितने अपमान की बात है मेरे लिए इतना बड़ा आरोप सहना.’’

मैं ने भाभी को आश्वस्त करते हुए कहा कि आप चिंता न करें मैं भैया से बात करती हूं. मैं जब रोहन भैया से इस बारे में बात करने गई तो बात शुरू करने से पहले ही उन्होंने मेरा मुंह यह कह कर बंद कर दिया, ‘‘सोनाली, अगर तुम मुझे कुछ समझाने आई हो तो बेहतर होगा कि वापस चली जाओ.’’ रोहन भैया के रूखे व्यवहार के आगे तो मेरी बात शुरू करने की हिम्मत ही नहीं हुई. बातबात पर उन से झगड़ने और बहस कर बैठने वाली मुझ सोनाली की बोलती ही बंद हो गई. पर बात चूंकि उन के वैवाहिक रिश्ते को बचाने की थी इसलिए हिम्मत कर के मैं उन के पास बैठ गई.

‘‘रोहन भैया, बात इतनी बड़ी नहीं है कि आप ने अपना और भाभी का रिश्ता दावं पर लगा दिया है. भाभी कह रही हैं कि उन का मुंहबोला भाई है तो उन की बात का आप यकीन क्यों नहीं करते? आखिर कालेज में आप की भी तो कई मुंहबोली बहनें थीं फिर…’’ मैं आगे कुछ और बोलूं उस से पहले ही रोहन भैया वहां से उठ खड़े हुए, ‘‘हां, सोनाली, मेरी कई मुंहबोली बहनें थीं और मैं कइयों का मुंहबोला भाई था इसीलिए इस रिश्ते की हकीकत मुझ से ज्यादा कोई नहीं जानता. कह दो अपनी भाभी से या तो मैं या वह मुंहबोला भाई, जिसे चुनना है चुन ले.’’ मैं अवाक सी भैया का मुंह देखती रह गई. कालेज वाले भैया तो वे थे ही नहीं जिन से मैं कुछ बहस कर सकती. ‘रोहन भैया, रोहन भैया’ कहने वाली कालेज की बहनों का उन्हें देख कर आहें भरना मैं भी कहां भूल पाई थी कि किसी तरह का तर्क दे कर उन की सोच को झुठलाने की कोशिश करने की हिम्मत जुटा पाती.

मेरे पास भाभी को समझाने के अलावा और कोई रास्ता शेष नहीं बचा था. रोहन भैया का शक उन के अपने अनुभव पर आधारित था. न जाने मुंहबोले भाईबहन के रिश्तों को उन्होंने किस तरह जिया था. दुनिया को तो वे अपने ही अनुभव के आधार पर देखेंगे. ‘‘रिश्ता बचाना है तो आप के सामने रोहन भैया की शर्त मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है भाभी, क्योंकि उन का शक उन के अनुभव पर आधारित है और अपने ही अनुभव को भला वे कैसे नकार सकते हैं. रिश्ता बचाने के लिए त्याग आप को ही करना पड़ेगा,’’ भारी मन से भाभी से यह सब कह कर मैं चुपचाप अपने घर की ओर चल दी.

 

कामिनी आंटी: आखिर क्या थी विभा के पति की सच्चाई

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सिया के आंसू : भाग 2

नताशा के पास और कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि वह साधु मैनेजर यह मानने को तैयार ही नहीं था कि ऐसी कोई घटना उस की धर्मशाला में हो भी सकती है. उस की बातों से नताशा को लगा कि हो सकता है, उसे कोई गलतफहमी हो गई हो, क्योंकि आजकल ट्रायल रूम में कैमरा छिपे होने और कपड़े बदलती लड़कियों के वीडियो बना कर उन्हें बेचने और इंटरनैट पर अपलोड कर लड़कियों को ब्लैकमेल करने संबंधी जैसे कई केस सामने आ चुके थे.

 

वीरेन काफी गुस्से में था और पुलिस में रिपोर्ट करना चाह रहा था, पर यहां भी सिया ने उसे ऐसा करने से रोक लिया और बोली, ‘‘देखो, अब कुछ देर में ही हमें यहां से मंदिर के लिए निकलना है… प्लीज, कोई बखेड़ा मत खड़ा करो.’’वीरेन खून के कड़वे घूंट पी कर रह गया था, पर उस ने तत्काल ही वहां से निकलने की बात सोची और आननफानन में सारा सामान पैक कर वे लोग उस धर्मशाला से निकल कर एक अच्छे से होटल में आ गए थे.

होटल में अपना सामान रख कर वे सिद्धनाथ मंदिर की ओर चल पड़े. एक बैग में कुछ कपड़े और पैसे वगैरह उन के साथ में था. यहां से तकरीबन 12 किलोमीटर का सफर उन्हें पैदल ही तय करना था.

रास्ते में कई रैस्ट हाउस थे, जिन के बाहर एजेंट लोग ग्राहक लाने के लिए रखे गए थे और कई ऐसी भी दुकानें थीं, जो उन के यहां से प्रसाद खरीदने पर उन के जूतेचप्पलों की मुफ्त में ही रखवाली करते रहेंगे.

सिया का बस चलता तो इन सब दुकानों से कुछ न कुछ जरूर खरीदती, पर वीरेन का उखड़ा हुआ मूड देख कर वह भी सीधी चलती रही. रास्ते में उन्हें कई भिखारी मिल रहे थे, जो किसी भी तरह से पैसे मांग रहे थे.

सिद्धनाथ बाबा का मंदिर आ चुका था. सिया, नताशा और तान्या के चेहरे पर एक तरह का संतोष चमक उठा था और उन लोगों ने वहां के नजारों को अपने कैमरे में कैद करना शुरू कर दिया था.

तभी तान्या की नजर एक तरफ बैठे नागा साधुओं पर गई, जो चिलम पी रहे थे.‘‘पहना दे छल्ला, लेले लल्ला,’’ एक नागा साधु ने सिया की तरफ देखते हुए कहा और फिर से चीखा, ‘‘पहना दे छल्ला, लेले लल्ला…’’ और अपने अंग की तरफ इशारा किया.

इस भद्दे इशारे पर सिया को बहुत बुरा लगा. उस ने सोचा कि वह जा कर उस नागा का मुंह ही नोच ले, पर वह जानती थी कि यहां पर नागा लोगों की पूरी जमात है और इन्हें छेड़ना किसी भी सूरत में सही नहीं होगा, इसलिए उस ने उस नागा की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

‘‘मंदिर में प्रवेश से पहले अपने हाथमुंहपैर धो लें आप लोग,’’ एक लड़का उन लोगों के पास आ कर बोला.‘‘हांहां… पर यहां कहीं तो कोई पानी की टंकी या नलका दिखाई नहीं पड़ता,’’ वीरेन ने कहा.

‘‘श्रीमानजी, यहां सब है… वह जो सामने एक कमरा सा दिख रहा है, उस में कोई भी जा कर उसे इस्तेमाल में ले सकता है… बस, उस की कीमत देनी होगी,’’ उस लड़के ने कहा.‘कीमत… पर, ये तो आम सुविधाएं हैं, सरकार और मंदिर प्रशासन की तरफ से मुफ्त मिलती हैं,’’ वीरेन ने चौंकते हुए कहा.

‘‘जी मिलती होंगी, पर यहां पर आप को कीमत चुकानी होगी. एक आदमी मात्र 100 रुपए दे कर इस बाथरूम की सुविधा ले सकता है… आप 4 लोग हैं, इसलिए 400 रुपए दे दीजिए.’’‘‘बड़ी अजीब सी बात है…’’ वीरेन बुदबुदाया.

उस का माथा गरम होता देख कर सिया ने कहा, ‘‘हाथपैर धोना तो जरूरी ही होता है, इसलिए यह लो भाई 400 रुपए…’’ कह कर सिया ने उस लड़के को पैसे दिए और सभी लोग फ्रैश हो कर सिद्ध बाबा के दर्शन की तरफ बढ़ लिए.

आगे कुछ दुकानें लगी हुई थीं, जिन पर प्रसाद बिक रहा था और प्रसाद की थाली के उचित रेट के बदले में 20 गुना दाम वसूले जा रहे थे. कोई थाली 1,100 रुपए की थी, तो कोई 2,100 रुपए की.पर मरता क्या न करता… इन चारों ने भी 1,100-1,100 रुपए की 4 थालियां ले लीं.

दर्शन के लिए लंबी लाइन लगी हुई थी. ये लोग भी लाइन में जा कर लग गए. थोड़ी देर बाद तान्या को अपने सीने पर किसी की कुहनी लगने का अंदेशा हुआ और यह अंदेशा गलत नहीं था, बल्कि मंदिर की दीवार की सफाई का बहाना करता एक जवान पंडा तान्या के सीने पर बारबार अपनी कुहनी से दबाव बना रहा था.

 

कामिनी आंटी- भाग 2: आखिर क्या थी विभा के पति की सच्चाई

क्या ऐसा भी होता है. ऐसा कैसे हो सकता है? एक लड़के का यौन शोषण आदि तमाम बातें उस की समझ के परे थीं. उस का मन मानने को तैयार नहीं था कि एक हट्टाकट्टा नौजवान भी कभी यौन शोषण का शिकार हो सकता है. पर यह एक हकीकत थी जिसे झुठलाया नहीं जा सकता था. अत: अपने मन को कड़ा कर वह पिछली सभी बातों पर गौर करने लगी. पूरा समय मजाकमस्ती के मूड में रहने वाले मयंक का रात के समय बैड पर कुछ अनमना और असहज हो जाना, इधर स्त्रीसुलभ लाज के चलते विभा का उस की प्यार की पहल का इंतजार करना, मयंक की ओर से शुरुआत न होते देख कई बार खुद ही अपने प्यार का इजहार कर मयंक को रिझाने की कोशिश करना, लेकिन फिर भी मयंक में शारीरिक सुख के लिए कोई उत्कंठा या भूख नजर न आना इत्यादि कई ऐसी बातें थीं, जो उस वक्त विभा को विस्मय में डाल देती थीं. खैर, बात कुछ भी हो, आज एक वीभत्स सचाई विभा के सामने परोसी जा चुकी थी और उसे अपनी हलक से नीचे उतारना ही था.

हलकेफुलके माहौल में रात का डिनर निबटाने के बाद विभा ने बिस्तर पर जाते ही मयंक को मस्ती के मूड में छेड़ा, ‘‘तुम्हें मुझ पर जरा भी विश्वास नहीं है न?’’ ‘‘नहीं तो, ऐसा बिलकुल नहीं है. अब तुम्हीं तो मेरे जीने की वजह हो. तुम्हारे बगैर जीने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता,’’ मयंक ने घबराते हुए कहा.

‘‘अच्छा, अगर ऐसा है तो तुम ने अपनी जिंदगी की सब से बड़ी सचाई मुझ से क्यों छिपाई?’’ विभा ने प्यार से उस की आंखों में देखते हुए कहा. ‘‘मैं तुम्हें सब कुछ बताना चाहता था, लेकिन मुझे डर था कहीं तुम मुझे ही गलत न समझ बैठो. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं विभा और किसी भी कीमत पर तुम्हें खोना नहीं चाहता था, इसीलिए…’’ कह कर मयंक चुप हो गया.

फिर कुछ देर की गहरी खामोशी के बाद अपनी चुप्पी तोड़ते हुए मयंक बताने लगा. ‘‘मैं टैंथ में पढ़ने वाला 18 वर्षीय किशोर था, जब कामिनी आंटी से मेरी पहली मुलाकात हुई. उस दिन हम सभी दोस्त क्रिकेट खेल रहे थे. अचानक हमारी बौल पार्क की बैंच पर अकेली बैठी कामिनी आंटी को जा लगी. अगले ही पल बौल कामिनी आंटी के हाथों में थर. चूंकि मैं ही बैटिंग कर रहा था. अत: दोस्तों ने मुझे ही जा कर बौल लाने को कहा. मैं ने माफी मांगते हुए उन से बौल मांगी तो उन्होंने इट्स ओके कहते हुए वापस कर दी.’’

‘‘लगभग 30-35 की उम्र, दिखने में बेहद खूबसूरत व पढ़ीलिखी, सलीकेदार कामिनी आंटी से बातें कर मुझे बहुत अच्छा लगता था. फाइनल परीक्षा होने को थी. अत: मैं बहुत कम ही खेलने जा पाता था. कुछ दिनों बाद हमारी मुलाकात होने पर बातचीत के दौरान कामिनी आंटी ने मुझे पढ़ाने की पेशकश की, जिसे मैं ने सहर्ष स्वीकार लिया. चूंकि मेरे घर से कुछ ही दूरी पर उन का अपार्टमैंट था, इसलिए मम्मीपापा से भी मुझे उन के घर जा कर पढ़ाई करने की इजाजत मिल गई.’’ ‘‘फिजिक्स पर कामिनी आंटी की पकड़ बहुत मजबूत थी. कुछ लैसन जो मुझे बिलकुल नहीं आते थे, उन्होंने मुझे अच्छी तरह समझा दिए. उन के घर में शांति का माहौल था. बच्चे थे नहीं और अंकल अधिकतर टूअर पर ही रहते थे. कुल मिला कर इतने बड़े घर में रहने वाली वे अकेली प्राणी थीं.

‘‘बस उन की कुछ बातें हमेशा मुझे खटकतीं जैसे पढ़ाते वक्त उन का मेरे कंधों को हौले से दबा देना, कभी उन के रेंगते हाथों की छुअन अपनी जांघों पर महसूस करना. ये सब करते वक्त वे बड़ी अजीब नजरों से मेरी आंखों में देखा करतीं. पर उस वक्त ये सब समझने के लिए मेरी उम्र बहुत छोटी थी. उन की ये बातें मुझे कुछ परेशान अवश्य करतीं लेकिन फिर पढ़ाई के बारे में सोच कर मैं वहां जाने का लोभ संवरण न कर पाता.’’ ‘‘मेरी परीक्षा से ठीक 1 दिन पहले पढ़ते वक्त उन्होंने मुझे एक गिलास जूस पीने को दिया और कहा कि इस से परीक्षा के वक्त मुझे ऐनर्जी मिलेगी. जूस पीने के कुछ देर बाद ही मुझे कुछ नशा सा होने लगा. मैं उठने को हुआ और लड़खड़ा गया. तुरंत उन्होंने मुझे संभाल लिया. उस के बाद क्या हुआ, मुझे कुछ याद न रहा.

2-3 घंटे बाद जब मेरी आंख खुली तो सिर में भारीपन था और मेरे कपड़े कुछ अव्यवस्थित. मैं बहुत घबरा गया. मुझे कुछ सही नहीं लग रहा था. कामिनी आंटी की संदिग्ध मुसकान मुझे विचलित कर रही थी. दूसरे दिन पेपर था. अत: दिमाग पर ज्यादा जोर न देते हुए मैं तुरंत घर लौट आया. ‘‘दूसरा पेपर मैथ का था. चूंकि फिजिक्स का पेपर हो चुका था, इसलिए कामिनी आंटी के घर जाने का कोई सवाल नहीं था. 2-3 दिन बाद कामिनी आंटी का फोन आया. आखिरी बार उन के घर में मुझे बहुत अजीब हालात का सामना करना पड़ा था. अत: मैं अब वहां जाने से कतरा रहा था. लेकिन मां के जोर देने पर कि चला जा बटा शायद वे कुछ इंपौर्टैंट बताना चाहती हों, न चाहते हुए भी मुझे वहां जाना पड़ा.

‘‘उन के घर पहुंचा तो दरवाजा अधखुला था. दरवाजे को ठेलते हुए मैं उन्हें पुकारता हुआ भीतर चला गया. हाल में मद्धिम रोशनी थी. सोफे पर लेटे हुए उन्होंने इशारे से मुझे अपने पास बुलाया. कुछ हिचकिचाहट में उन के समीप गया तो मुंह से आ रही शराब की तेज दुर्गंध ने मुझे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. मैं पीछे हट पाता उस से पहले ही उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सोफे पर अपने ऊपर खींच लिया. बिना कोई मौका दिए उन्होंने मुझ पर चुंबनों की बौछार शुरू कर दी. यह क्या कर रही हैं आप? छोडि़ए मुझे, कह कर मैं ने अपनी पूरी ताकत से उन्हें अपने से अलग किया और बाहर की ओर लपका.

‘‘रुको, उन की गरजती आवाज ने मानो मेरे पैर बांध दिए, ‘मेरे पास तुम्हें कुछ दिखाने को है,’ कुटिलता से उन्होंने मुसकराते हुए कहा. फिर उन के मोबाइल में मैं ने जो देखा वह मेरे होश उड़ाने के लिए काफी था. वह एक वीडियो था, जिस में मैं उन के ऊपर साफतौर पर चढ़ा दिखाई दे रहा था और उन की भंगिमाएं कुछ नानुकुर सी प्रतीत हो रही थीं. ‘‘उन्होंने मुझे साफसाफ धमकाते हुए कहा कि यदि मैं ने उन की बातें न मानीं तो वे इस वीडियो के आधार पर मेरे खिलाफ रेप का केस कर देंगी, मुझे व मेरे परिवार को कालोनी से बाहर निकलवा देंगी. मेरे पावों तले जमीन खिसक गई. फिर भी मैं ने अपना बचाव करते हुए कहा कि ये सब गलत है. मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया है.

‘‘तब हंसते हुए वे बोलीं, तुम्हारी बात पर यकीन कौन करेगा? क्या तुमने देखा नहीं कि मैं ने किस तरह से इस वीडियो को शूट किया है. इस में साफसाफ मैं बचाव की मुद्रा में हूं और तुम मुझ से जबरदस्ती करते नजर आ रहे हो. मेरे हाथपांव फूल चुके थे. मैं उन की सभी बातें सिर झुका कर मानता चला गया. ‘‘जाते समय उन्होंने मुझे सख्त हिदायत दी कि जबजब मैं तुम्हें बुलाऊं चले आना. कोई नानुकुर नहीं चलेगी और भूल कर भी ये बातें कहीं शेयर न करूं वरना वे मेरी पूरी जिंदगी तबाह कर देंगी.

‘‘मैं उन के हाथों की कठपुतली बन चुका था. उन के हर बुलावे पर मुझे जाना होता था. अंतरंग संबंधों के दौरान भी वे मुझ से बहुत कू्ररतापूर्वक पेश आती थीं. उस समय किसी से यह बात कहने की मैं हिम्मत नहीं जुटा सका. एक तो अपनेआप पर शर्मिंदगी दूसरे मातापिता की बदनामी का डर, मैं बहुत ही मायूस हो चला था. मेरी पूरी पढ़ाई चौपट हो चली थी.

करीब साल भर तक मेरे साथ यही सब चलता रहा. एक बार कामिनी आंटी ने मुझे बुलाया और कहा कि आज आखिरी बार मैं उन्हें खुश कर दूं तो वे मुझे अपने शिकंजे से आजाद कर देंगी. बाद में पता चला कि अंकलजी का कहीं दूसरी जगह ट्रांसफर हो गया है.

सिया के आंसू : भाग 3

‘‘अरे भैया, क्या कर रहे हो… देख कर काम करो न,’’ तान्या ने उस की नीयत जानते हुए एतराज जताया, तो वह पंडा नाराज होते हुए बोला, ‘‘अब हमारा यही काम है और इस काम में कोई चमड़े की बनी देह बीच में आ गई तो भला इस में हमारा क्या दोष है,’’ और फिर वह पंडा संस्कृत में कुछ जोरजोर से पढ़ने लगा.

‘‘अरे, आप लोग कहां लाइन में लग कर धक्के खा रहे हैं… आप तो वीआईपी लोग हैं… आप चाहें तो मैं पीछे के गेट से आप को 10 मिनट में ही स्पैशल दर्शन करा सकता हूं…’’ एक पंडे ने वीरेन के पास आ कर धीरे से कहा.

वीरेन ने लंबी लाइन में लगने के बजाय स्पैशल दर्शन के लिए हामी भर दी, तो फौरन ही वह पंडा 5,000 रुपए मांगने लगा.

‘‘पर, ये तो बहुत ज्यादा हैं,’’ वीरेन ने कहा.

‘‘अरे, तो जैसा काम है वैसा दाम है. भाई, समझ में आए तो बताओ, नहीं तो मैं दूसरा कस्टमर देखता हूं,’’ पंडा अपना सब्र खोता हुआ सा बोला.

‘‘ठीक है भैया, ये लो पैसे और जल्दी से हमें दर्शन करा दो,’’ सिया ने उस पंडे को पैसे देते हुए कहा.

फिर क्या था, उस पंडे ने उन्हें पीछे के दरवाजे से मात्र 10 मिनट में मंदिर के अंदर पहुंचा दिया था.

सिया, नताशा और तान्या तो खुशी के मारे मानो झूम रही थीं.

‘‘ऐ लड़की… अंधी है क्या… सामने साफसाफ लिखा है कि मंदिर के अंदर कोई सैल्फी नहीं, कोई तसवीर नहीं ली जाएगी…’’ एक लंबी दाढ़ी वाले बाबा ने तान्या के गले में लटकते हुए कैमरे को देख कर कहा.

‘‘पर बाबाजी, मैं सैल्फी नहीं ले रही हूं और न ही कोई फोटो ले रही हूं. यह कैमरा तो बाहर के फोटो लेने के लिए गले में टंगा हुआ था और इसीलिए अब भी इसी तरह टंगा हुआ है,’’ तान्या ने जवाब दिया.

‘‘तुम लोग तो भगवान के साथ भी सैल्फी लेने से बाज नहीं आते,’’ वह पंडा बोला और फिर घंटी बजाने में मशगूल हो गया.

पूजा करने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हुए ये चारों अभी हाथ जोड़े मंदिर के अंदर खड़े थे कि तभी गेरुए कपड़े पहने हुए एक और लड़का तान्या के पास आ कर बोला, ‘‘दीदी, अगर यहां मंदिर के अंदर सैल्फी लेनी है, तो आप को 500 रुपए देने होंगे… सैल्फी दिलवाना मेरी जिम्मेदारी होगी.’’

‘‘नहीं… मुझे कोई सैल्फीवैल्फी नहीं लेनी है… तुम जाओ यहां से,’’ तान्या चीख पड़ी.

उस के मना करने से वह पंडा भी चिढ़ गया और बोला, ‘‘अरे, हम कहां जाएंगे… हमारा तो घर यही है… और काम भी यही है.’’

उस की इस बात पर तान्या सिर्फ उसे घूरती रह गई.

मंदिर में ढोलनगाड़े बज रहे थे. लोगों की भीड़ को देख कर पंडों ने और तेजी से ढोल पीटने शुरू कर दिए थे.

‘‘कुछ देर बाद आप लोगों का नंबर आने वाला है… यह रेट लिस्ट देखिए और बताइए कि आप लोग कितने वाली पूजा कराने वाले हैं…’’ मंदिर के अंदर बैठे एक साधु ने इन लोगों से कहा.

‘‘कितने वाली पूजा का क्या मतलब है पंडितजी?’’ वीरेन ने पूछा.

‘‘वह सामने देखो, बोर्ड पर सारे रेट लिखे हुए हैं,’’ पंडित ने एक बोर्ड की तरफ इशारा करते हुए कहा.

इन चारों ने बोर्ड पर देखा, तो वहां पर हर तरह की पूजा के लिए अलगअलग रेट तय था और पूजा की अवधि के साथ उस की कीमत भी बढ़ती जा रही थी. उस में यह भी लिखा हुआ था कि कौन सी पूजा में कितने लोग कितनी कीमत चुका कर शामिल हो सकते हैं.

पूजा का भी कोई रेट होता है, यह इन चारों ने पहली बार जाना था. अब तो सिया को भी बात कुछ अखरने लगी थी.

‘‘अरे पंडितजी, टीका तो लगा दीजिए,’’ सिया ने पुजारी से कहा और अपनी प्रसाद की थाली आगे बढ़ाई.

‘‘प्रसाद के साथसाथ इस में कुछ दक्षिणा भी तो रख बच्ची,’’ पुजारी ने तिरछी नजर से देखा और सिया के माथे पर बेमन से टीका लगाते हुए कहा.

सिया ने 100 रुपए का नोट बढ़ाया, तो पुजारी नाराज हो गया और कहने लगा, ‘‘आप दक्षिणा इतनी तो दीजिए

कि एक आदमी के एक समय का भोजन तो हो ही जाए, इस 100 रुपए में भला क्या होगा…’’

हार कर सिया ने 500 रुपए दिए, तब जा कर उस पुजारी के चेहरे पर थोड़ी मुसकराहट आई.

इतना होतेहोते वीरेन का मन पूजा

से पूरी तरह हट चुका था. चारों तरफ लूटखसोट के माहौल से वह ऊब चुका था. भला कहीं पूजा करवाने का भी कोई रेट होता है. सामने ही रेट का बोर्ड

लगा हुआ था. वीरेन ने उस बोर्ड की तसवीर खींच ली, पर उसे रेट बोर्ड का फोटो लेते देख कर पुजारी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘पानी की एक बूंद से पैदा हुआ आदमी, तू एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा और यह तेरा अहंकार ही तुझे गर्त में ले जा रहा है. तू इस बोर्ड की तसवीर ले कर क्या कर लेगा… और देख लेते हैं कि तू क्या कर सकता है?’’

पुजारी की बातें सुन कर वीरेन मंदिर से बाहर आ गया. उस के पीछे से सिया, नताशा और तान्या भी बाहर आ गईं. उन चारों ने यहां चलने वाले गोरखधंधे को दुनिया के सामने लाने के लिए इस पूरे ठगी के मामले को सोशल मीडिया पर शेयर करने की गरज से मंदिर के बाहर ही एक वीडियो बनाया, जिस में पूजा के हर काम में पंडितों द्वारा पैसे उगाहने की बात कही गई थी.

अब पूजा से सब का मन हट चुका था और वे चारों वापस आने लगे थे.

रास्ते में कुछ लोकल लड़के बैठे हुए थे. वीरेन के साथ 3 लड़कियों को देख कर उन में से एक लड़का बोला, ‘‘अरे भाई, एक अकेले लड़के के साथ 3-3 लड़कियां… बड़ी नाइंसाफी है रे… हमें भी साथ ले लो…’’ यह बात इतने भद्दे ढंग से कही गई थी कि वीरेन का गुस्सा भड़कना लाजिमी था, पर सिया ने किसी तरह अपनी कसम दे कर उसे शांत किया.

उधर सोशल मीडिया पर इन चारों का रोष भरा वीडियो वायरल होते देर नहीं लगी, जहां पर एक बुद्धिजीवी वर्ग का पूरा साथ इन लोगों को मिल रहा था, वहीं दूसरी तरफ तथाकथित धार्मिक लोग सिया और वीरेन को गालियां भी दे रहे थे और कुछ धार्मिक संगठनों ने तो इन्हें जान से मार डालने की धमकी भी दे दी थी, क्योंकि इन लोगों ने सिद्धनाथ मंदिर के अंदर चलने वाले पुजारियों के गंदे खेल को उजागर करने की कोशिश की थी. नताशा और तान्या तो इस बात से डरी हुई थीं.

वे चारों जल्दी से जल्दी अपने होटल पहुंच कर आराम करना चाहते थे और होटल अब करीब ही था, पर सामने से कुछ पंडे चले आ रहे थे.

‘‘क्यों भाई, तुम लोग हमारी धर्मशाला में रुके और बिना कोई पैसे दिए, बिना कुछ दानपात्र में डाले ही वहां से चले आए… किस बात की जल्दी थी तुम लोगों को…’’ ये सब उस धर्मशाला के लोग थे, जहां ये चारों सब से पहले रुके थे.

‘‘जी देखिए, हमें वहां कुछ ऐसा महसूस हुआ, जो हमें सही नहीं लगा. वहां बाथरूम में कुछ गलत हो रहा था, इसीलिए हम ने उस धर्मशाला को छोड़ना ही सही समझा,’’ वीरेन ने शांत आवाज में कहा.

‘‘भेड़ जहां जाएगी वहीं मूड़ी जाएगी… कहां नहीं बनते हैं ये नंगे वीडियो… धर्मशाला छोड़ोगे तो होटल में भी बनेंगे… अच्छा बताओ कि इन में से किस लड़की को नंगा देखना चाहोगे तुम? मेरे इस मोबाइल में इन सब के वीडियो हैं,’’ एक पंडा अपना होंठ काटते हुए बोला.

अब तो वीरेन के गुस्से की सीमा नहीं रही. उस ने तुरंत ही उन पंडों पर अटैक कर दिया. पर वह अकेला था और वे 8-10 लोग थे. उन सब ने वीरेन को इतना मारा कि वह अधमरा हो गया और उसे उसी हालत में छोड़ कर वे पंडे, जो शायद पंडे न हो कर गुंडे थे, सब फरार हो गए.

वीरेन के सिर से खून बह रहा था. जल्द ही उसे अस्पताल ले जाना होगा, नहीं तो कुछ भी हो सकता था. वे तीनों लड़कियां मदद के लिए इधरउधर भाग रही थीं, पर कोई भी मदद करने को तैयार नहीं था.

तभी सिया को एक खाली एंबुलैंस आती दिखाई दी. उस ने हाथ दे कर उसे रुकवाया और ड्राइवर से घायल वीरेन को अस्पताल पहुंचाने की गुजारिश की. ड्राइवर ने भी मामले की गंभीरता

को समझते हुए वीरेन को तुरंत ही लिटाया और एंबुलैंस को सड़क पर दौड़ा दिया.

पर कुछ किलोमीटर चलने पर ड्राइवर को रुक जाना पड़ा, क्योंकि आगे कोई जुलूस जा रहा था. एंबुलैंस के बारबार हौर्न और हूटर बजाने का भी उन लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था. इधर वीरेन की हालत उपचार नहीं मिल पाने के चलते बिगड़ती ही जा रही थी.

जुलूस की भीड़ को न हटता देख कर  सिया खुद नीचे उतर गई और हाथ जोड़ कर भीड़ से रास्ता देने की अपील करने लगी. वह बहुत देर तक सब से प्रार्थना करती रही, पर किसी पर कोई असर नहीं हुआ.

किसी ने बताया कि आज पीले मठ वाले बाबा का जन्मदिन है और उन की झांकी उसी उपलक्ष्य में निकाली जा रही है और अभी फिलहाल तो यह भीड़ नहीं हट सकती है. अच्छा होगा कि तुम कोई दूसरा रास्ता पकड़ लो.

पर कौन सा रास्ता पकड़ती सिया. यह एक पहाड़ी जगह थी और अस्पताल तक यही एक सड़क जाती थी. इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था.

सिया भाग कर एंबुलैंस में आई, पर तब तक वीरेन मर चुका था. यह देख कर सिया की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.

कामिनी आंटी- भाग 1: आखिर क्या थी विभा के पति की सच्चाई

विभा को खिड़की पर उदास खड़ा देख मां से रहा नहीं गया. बोलीं, ‘‘क्या बात है बेटा, जब से घूम कर लौटी है परेशान सी दिखाई दे रही है? मयंक से झगड़ा हुआ है या कोई और बात है? कुछ तो बता?’’ ‘‘कुछ नहीं मां… बस ऐसे ही,’’ संक्षिप्त उत्तर दे विभा वाशरूम की ओर बढ़ गई.

‘‘7 दिन हो गए हैं तुझे यहां आए. क्या ससुराल वापस नहीं जाना? मालाजी फोन पर फोन किए जा रही हैं… क्या जवाब दूं उन्हें.’’ ‘‘तो क्या अब मैं चैन से इस घर में कुछ दिन भी नहीं रह सकती? अगर इतना ही बोझ लगती हूं तो बता दो, चली जाऊंगी यहां से,’’ कहते हुए विभा ने भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया.

‘‘अरे मेरी बात तो सुन,’’ बाहर खड़ी मां की आंखें आंसुओं से भीग गईं. अभी कुछ दिन पहले ही बड़ी धूमधाम से अपनी इकलौती लाडली बेटी विभा की शादी की थी. सब कुछ बहुत अच्छा था. सौफ्टवेयर इंजीनियर लड़का पहली बार में ही विभा और उस की पूरी फैमिली को पसंद आ गया था. मयंक की अच्छी जौब और छोटी फैमिली और वह भी उसी शहर में. यही देख कर उन्होंने आसानी से इस रिश्ते के लिए हां कर दी थी कि शादी के बाद बेटी को देखने उन की निगाहें नहीं तरसेंगी. लेकिन हाल ही में हनीमून मना कर लौटी बेटी के अजीबोगरीब व्यवहार ने उन की जान सांसत में डाल दी थी.

पत्नी के चेहरे पर पड़ी चिंता की लकीरों ने महेश चंद को भी उलझन में डाल दिया. कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि ‘‘हैलो आंटी, हैलो अंकल,’’ कहते हुए विभा की खास दोस्त दिव्या ने बैठक में प्रवेश किया. ‘‘अरे तुम कब आई बेटा?’’ पैर छूने के लिए झुकी दिव्या के सिर पर आशीर्वादस्वरूप हाथ फेरते हुए दिव्या की मां ने पूछा.

‘‘रात 8 बजे ही घर पहुंची थी आंटी. 4 दिन की छुट्टी मिली है. इसीलिए आज ही मिलने आ गई.’’

‘‘तुम्हारी जौब कैसी चल रही है?’’ महेश चंद के पूछने पर दिव्या ने हंसते हुए उन्हें अंगूठा दिखाया और आंटी की ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘विभा कैसी है? बहुत दिनों से उस से बात नहीं हुई. मैं ने फोन फौर्मैट करवाया है, इसलिए कौल न कर सकी और उस का भी कोई फोन नहीं आया.’’ ‘‘तू पहले इधर आ, कुछ बात करनी है,’’ विभा की मां उसे सीधे किचन में ले गईं.

पूरी बात समझने के बाद दिव्या ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह तुरंत विभा की परेशानी को समझ उन से साझा करेगी.

बैडरूम के दरवाजे पर दिव्या को देख विभा की खुशी का ठिकाना न रहा. दोनों 4 महीने बाद मिल रही थीं. अपनी किसी पारिवारिक उलझन के कारण दिव्या उस की शादी में भी सम्मिलित न हो सकी थी.

‘‘कैसी है मेरी जान, हमारे जीजू बहुत परेशान तो नहीं करते हैं?’’ बड़ी अदा से आंख मारते हुए दिव्या ने विभा को छेड़ा. ‘‘तू कैसी है? कब आई?’’ एक फीकी हंसी हंसते हुए विभा ने दिव्या से पूछा.

‘‘क्या हुआ है विभा, इज समथिंग रौंग देयर? देख मुझ से तू कुछ न छिपा. तेरी हंसी के पीछे एक गहरी अव्यक्त उदासी दिखाई दे रही है. मुझे बता, आखिर बात क्या है?’’ दिव्या उस की आंखों में देखते हुए बोली. अचानक विभा की पलकों के कोर गीले हो चले. फिर उस ने जो बताया वह वाकई चौंकाने वाला था.

विभा के अनुसार सुहागरात से ही फिजिकल रिलेशन के दौरान मयंक में वह एक झिझक सी महसूस कर रही थी, जो कतई स्वाभाविक नहीं लग रही थी. उन्होंने बहुत कोशिश की, रिलेशन से पहले फोरप्ले आदि भी किया, बावजूद इस के उन के बीच अभी तक सामान्य फिजिकल रिलेशन नहीं बन पाया और न ही वे चरमोत्कर्ष का आनंद ही उठा पाए. इस के चलते उन के रिश्ते में एक चिड़चिड़ापन व तनाव आ गया है. यों मयंक उस का बहुत ध्यान रखता और प्यार भी करता है. उस की समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करे. मांपापा से यह सब कहने में शर्म आती है, वैसे भी वे यह सब जान कर परेशान ही होंगे.

विभा की पूरी बात सुन दिव्या ने सब से पहले उसे ससुराल लौट जाने के लिए कहा और धैर्य रखने की सलाह दी. अपना व्यवहार भी संतुलित रखने को कहा ताकि उस के मम्मीपापा को तसल्ली हो सके कि सब कुछ ठीक है. दिव्या की सलाह के अनुसार विभा ससुराल आ गई. इस बीच उस ने मयंक के साथ अपने रिश्ते को पूरी तरह से सामान्य बनाने की कोशिश भी की और भरोसा भी जताया कि मयंक की किसी भी परेशानी में वह उस के साथ खड़ी है. उस के इस सकारात्मक रवैए का तुरंत ही असर दिखने लगा. मयंक की झिझक धीरेधीरे खुलने लगी. लेकिन फिजिकल रिलेशन की समस्या अभी तक ज्यों की त्यों थी.

कुछ दिनों की समझाइश के बाद आखिरकार विभा ने मयंक को काउंसलर के पास चलने को राजी कर लिया. दिव्या के बताए पते पर दोनों क्लिनिक पहुंचे, जहां यौनरोग विशेषज्ञ डा. नमन खुराना ने उन से सैक्स के मद्देनजर कुछ सवाल किए. उन की परेशानी समझ डाक्टर ने विभा को कुछ देर बाहर बैठने के लिए कह कर मयंक से अकेले में कुछ बातें कीं. उन्हें 3 सिटिंग्स के लिए आने का सुझाव दे कर डा. नमन ने मयंक के लिए कुछ दवाएं भी लिखीं.

कुछ दिनों के अंतराल पर मयंक के साथ 3 सिटिंग्स पूरी होने के बाद डा. नमन ने विभा को फोन कर अपने क्लिनिक बुलाया और कहा, ‘‘विभाजी, आप के पति शारीरिक तौर पर बेहद फिट हैं. दरअसल वे इरैक्शन की समस्या से जूझ रहे हैं, जो एक मानसिक तनाव या कमजोरी के अलावा कुछ नहीं है. इसे पुरुषों के परफौर्मैंस प्रैशर से भी जोड़ कर देखा जाता है.

‘‘इस समय उन्हें आप के मानसिक संबल की बहुत आवश्यकता है. आप को थोड़ा मजबूत हो कर यह जानने की जरूरत है कि किशोरावस्था में आप के पति यौन शोषण का शिकार हुए हैं और कई बार हुए हैं. अपने से काफी बड़ी महिला के साथ रिलेशन बना कर उसे संतुष्ट करने में उन्हें शारीरिक तौर पर तो परेशानी झेलनी ही पड़ी, साथ ही उन्हें मानसिक स्तर पर भी बहुत जलील होना पड़ा है, जिस का कारण कहीं न कहीं वे स्वयं को भी मानते हैं. इसीलिए स्वेच्छा से आप के साथ संबंध बनाते वक्त भी वे उसी अपराधबोध का शिकार हो रहे हैं. चूंकि फिजिकल रिलेशन की सफलता आप की मानसिक स्थिति तय करती है, लिहाजा इस अपराधग्रंथि के चलते संबंध बनाते वक्त वे आप के प्रति पूरी ईमानदारी नहीं दिखा पाते, नतीजतन आप दोनों उस सुख से वंचित रह जाते हैं. अत: आप को अभी बेहद सजग हो कर उन्हें प्रेम से संभालने की जरूरत है.’’ विभा को काटो तो खून नहीं. अपने पति के बारे में हुए इस खुलासे से वह सन्न रह गई.

अपारदर्शी सच- भाग 1: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

रात के 11 बज चुके थे. तनुजा की आंखें नींद और इंतजार से बोझिल हो रही थीं. बच्चे सो चुके थे. मम्मीजी और मनीष लिविंगरूम में बैठे टीवी देख रहे थे. तनुजा का मन हो रहा था कि मनीष को आवाज दे कर बुला ले, लेकिन मम्मी की उपस्थिति के लिहाज के चलते उसे ठीक नहीं लगा. पानी पीने के लिए किचन में जाते हुए उस ने मनीष को देखा पर उन का ध्यान नहीं गया. पानी पी कर भी अतृप्त सी वह वापस कमरे में आ गई.

बिस्तर पर बैठ कर उस ने एक नजर कमरे पर डाली. उस ने और मनीष ने एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल रख कर इस कमरे को सजाया था.

हलके नीले रंग की दीवारों में से एक पर खूबसूरत पहाड़ी, नदी से गिरते झरने और पेड़ों की पृष्ठभूमि से सजी पूरी दीवार के आकार का वालपेपर. खिड़कियों पर दीवारों से तालमेल बिठाते नैट के परदे, फर्श से छत तक की अलमारियां, तरहतरह के सौंदर्य प्रसाधनों से भरी अंडाकार कांच की ड्रैसिंगटेबल, बिस्तर पर साटन की रौयल ब्लू चादर और टेबल पर सजा महकते रजनीगंधा के फूलों का गुलदस्ता. उसे लगा, सभी मनीष का इंतजार कर रहे हैं.

तनुजा की आंख खुली, तब दिन चढ़ आया था. उस का इंतजार अभी भी बदन में कसमसा रहा था. मनीष दोनों हाथ बांधे बगल में खर्राटे ले कर सो रहे थे. उस का मन हुआ, उन दोनों बांहों को खुद ही खोल कर उन में समा जाए और कसमसाते इंतजार को मंजिल तक पहुंचा दे. लेकिन घड़ी ने इस की इजाजत नहीं दी. फुरफुराते एहसासों को जूड़े में लपेटते वह बाथरूम चली गई.

बेटे ऋषि व बेटी अनु की तैयारी करते, सब का नाश्ताटिफिन तैयार करते, भागतेदौड़ते खुद की औफिस की तैयारी करते हुए भी रहरह कर एहसास कसमसाते रहे. उस ने आंखें बंद कर जज्बातों को जज्ब करने की कोशिश की, तभी सासुमां किचन में आ गईं. वह सकपका गई. उस ने झटके से आंखें खोल लीं और खुद को व्यस्त दिखाने के लिए पास पड़ा चाकू उठा लिया पर सब्जी तो कट चुकी थी, फिर उस ने करछुल उठा लिया और उसे खाली कड़ाही में चलाने लगी. सासुमां ने चश्मे की ओट से उसे ध्यान से देखा.

कड़ाही उस के हाथ से छूट गई और फर्श पर चक्कर काटती खाली कड़ाही जैसे उस के जलते एहसास उस के जेहन में घूमने लगे और वह चाह कर भी उन्हें थाम नहीं पाई.

एक कोमल स्पर्श उस के कंधों पर हुआ. 2 अनुभवी आंखों में उस के लिए संवेदना थी. वह शर्मिंदा हुई उन आंखों से, खुद को नियंत्रित न कर पाने से, अपने यों बिखर जाने से. उस ने होंठ दबा कर अपनी रुलाई रोकी और तेजी से अपने कमरे में चली गई.

बहुत कोशिश करने के बावजूद उस की रुलाई नहीं रुकी, बाथरूम में शायद जी भर रो सके. जातेजाते उस की नजर घड़ी पर पड़ी. समय उस के हाथ में न था रोने का. तैयार होतेहोते तनुजा ने सोते हुए मनीष को देखा. उस की बेचैनी से बेखबर मनीष गहरी नींद में थे.

तैयार हो कर उस ने खुद को शीशे में निहारा और खुद पर ही मुग्ध हो गई. कौन कह सकता है कि वह कालेज में पढ़ने वाले बच्चों की मां है? कसी हुई देह, गोल चेहरे पर छोटी मगर तीखी नाक, लंबी पतली गरदन, सुडौल कमर के गिर्द लिपटी साड़ी से झांकते बल. इक्कादुक्का झांकते सफेद बालों को फैशनेबल अंदाज में हाईलाइट करवा कर करीने से छिपा लिया है उस ने. सब से बढ़ कर है जीवन के इस पड़ाव का आनंद लेती, जीवन के हिलोरों को महसूस करते मन की अंगड़ाइयों को जाहिर करती उस की खूबसूरत आंखें. अब बच्चे बड़े हो कर अपने जीवन की दिशा तय कर चुके हैं और मनीष अपने कैरियर की बुलंदियों पर हैं. वह खुद भी एक मुकाम हासिल कर चुकी है. भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति है जो उस के चेहरे, आंखों, चालढाल से छलकती है.

मनीष उठ चुके थे. रात के अधूरे इंतजार के आक्रोश को परे धकेल एक मीठी सी मुसकान के साथ उस ने गुडमौर्निंग कहा. मनीष ने एक मोहक नजर उस पर डाली और उठ कर उसे बांहों में भर लिया. रीढ़ में फुरफुरी सी दौड़ गई. कसमसाती इच्छाएं मजबूत बांहों का सहारा पा कर कुलबुलाने लगीं. मनीष की आंखों में झांकते हुए तपते होंठों को उस के होंठों के पास ले जाते शरारत से उस ने पूछा, ‘‘इरादा क्या है?’’ मनीष जैसे चौंक गए, पकड़ ढीली हुई, उस के माथे पर चुंबन अंकित करते, घड़ी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘इरादा तो नेक ही है, तुम्हारे औफिस का टाइम हो गया है, तुम निकल जाना.’’ और वे बाथरूम की तरफ बढ़ गए.

जलते होंठों की तपन को ठंडा करने के लिए आंसू छलक पड़े तनुजा के. कुछ देर वह ऐसे ही खड़ी रही उपेक्षित, अवांछित. फिर मन की खिन्नता को परे धकेल, चेहरे पर पाउडर की एक और परत चढ़ा, लिपस्टिक की रगड़ से होंठों को धिक्कार कर वह कमरे से बाहर निकल गई.

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