सफर कुछ थम सा गया- भाग 3 : क्या जया के पतझड़ रूपी जीवन में फिर बहारें आ पाईं

जया कह उठती, ‘‘बताओ तो, तुम्हारी अनदेखी कब की? सूरज, बाकी सब बाद  में… मेरे दिल में पहला स्थान तो सिर्फ तुम्हारा है.’’

सूरज उसे बांहों में भींच कह उठता, ‘‘क्या मैं यह जानता नहीं?’’

उदय 4 साल का होने को आया. सूरज अकसर कहने लगा, ‘‘घर में तुम्हारे जैसी गुडि़या आनी चाहिए अब तो.’’

एक दिन घर में घुसते ही सूरज चहका, ‘‘भेलपूरी,’’ फिर सूंघते हुए किचन में चला आया, ‘‘जल्दी से चखा दो.’’

भेलपूरी सूरज की बहुत बड़ी कमजोरी थी. सुबह, दोपहर, शाम, रात भेलपूरी खाने को वह हमेशा तैयार रहता.

सूरज की आतुरता देख जया हंस दी, ‘‘डाक्टर हो, औरों को तो कहते हो बाहर से आए हो, पहले हाथमुंह धो लो फिर कुछ खाना और खुद गंदे हाथ चले आए.’’

सूरज ने जया के सामने जा कर मुंह खोल दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ तो साफ हैं. तुम खिला दो.’’

‘‘तुम बच्चों से बढ़ कर हो,’’ हंसती जया ने चम्मच भर भेलपूरी उस के मुंह में डाल दी.

‘‘कमाल की बनी है. मेज पर लगाओ. मैं हाथमुंह धो कर अभी हाजिर हुआ.’’

‘‘एक प्लेट से मेरा क्या होगा. और दो भई,’’ मेज पर आते ही सूरज ने एक प्लेट फटाफट चट कर ली.

तभी फोन की घंटी टनटना उठी. फोन सुन सूरज गंभीर हो गया, ‘‘मुझे अभी जाना होगा. हमारा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो गया. हमारे कुछ अफसर, कुछ जवान घायल हैं.’’

जया भेलपूरी की एक और प्लेट ले आई और सूरज की प्लेट में डालने लगी तो ‘‘जानू, अब तो आ कर ही खाऊंगा. मेरे लिए बचा कर रखना,’’ कह सूरज बाहर जीप में जा बैठा.

ट्रक दुर्घटना जया की जिंदगी की भयंकर दुर्घटना बन गई. फुल स्पीड से जीप भगाता सूरज एक मोड़ के दूसरी तरफ से आते ट्रक को नहीं देख सका. हैड औन भिडंत. जीप के परखचे उड़ गए. जीप में सवार चारों लोगों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

जया की पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती. वह 3 दिन बेहोश रही. घर मेहमानों से भर गया. पर चारों ओर मरघट सा सन्नाटा. घर ही क्यों, पूरी कालोनी स्तब्ध.

जया की ससुराल, मायके से लोग आए. उन्होंने जया से अपने साथ चलने की बात भी कही. लेकिन उस ने कहीं भी जाने से इनकार कर दिया. सासससुर कुछ दिन ठहर चले गए.

जया एकदम गुमसुम हो गई. बुत बन गई. बेटे उदय की बातों तक का जवाब नहीं. वह इस सचाई को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी कि सूरज चला गया है, उसे अकेला छोड़. जीप की आवाज सुनते ही आंखें दरवाजे की ओर उठ जातीं.

इंसान चला जाता है पर पीछे कितने काम छोड़ जाता है. मृत्यु भी अपना हिसाब मांगती है. डैथ सर्टिफिकेट, पैंशन, बीमे का काम, दफ्तर के काम. जया ने सब कुछ ससुर पर छोड़ दिया. दफ्तर वालों ने पूरी मदद की. आननफानन सब फौर्मैलिटीज पूरी हो गईं.

इस वक्त 2 बातें एकसाथ हुईं, जिन्होंने जया को झंझोड़ कर चैतन्य कर दिया. सूरज के बीमे के क्व5 लाख का चैक जया के नाम से आया. जया ने अनमने भाव से दस्तखत कर ससुर को जमा कराने के लिए दे दिया.

एक दिन उस ने धीमी सी फुसफुसाहट सुनी, ‘‘बेटे को पालपोस कर हम ने बड़ा किया, ये 5 लाख बहू के कैसे हुए?’’ सास का स्वर था.

‘‘सरकारी नियम है. शादी के बाद हकदार पत्नी हो जाती है,’’ सास ने कहा.

‘‘बेटे की पत्नी हमारी बहू है. हम जैसा चाहेंगे, उसे वैसा करना होगा. जया हमारे साथ जाएगी. वहां देख लेंगे.’’

जया की सांस थम गई. एक झटके में उस की आंख खुल गई. ऐसी मन:स्थिति में उस ने उदय को अपने दोस्त से कहते सुना, ‘‘सब कहते हैं पापा मर गए. कभी नहीं आएंगे. मुझ से तो मेरी मम्मी भी छिन गईं… मुझ से बोलती नहीं, खेलती नहीं, प्यार भी नहीं करतीं. दादीजी कह रही थीं हमें अपने साथ ले जाएंगी. तब तो तू भी मुझ से छिन जाएगा…’’

पाषाण बनी जया फूटफूट कर रो पड़ी. उसे क्या हो गया था? अपने उदय के प्रति इतनी बेपरवाह कैसे हो गई? 4 साल के बच्चे पर क्या गुजर रही होगी? उस के पापा चले गए तो मुझे लगा मेरा दुख सब से बड़ा है. मैं बच्चे को भूल गई. यह तो मुरझा जाएगा.

उसी दिन एक बात और हुई. शाम को मेजर देशपांडे की मां जया से मिलने आईं. वे जया को बेटी समान मानती थीं. वे जया के कमरे में ही आ कर बैठीं. फिर इधरउधर की बातों के बाद बोलीं, ‘‘खबर है कि तुम सासससुर के साथ जा रही हो? मैं तुम्हारीकोई नहीं होती पर तुम से सगी बेटी सा स्नेह हो गया है, इसलिए कहती हूं वहां जा कर तुम और उदय क्या खुश रह सकोगे? सोच कर देखो, तुम्हारी जिंदगी की शक्ल क्या होगी? तुम खुल कर जी पाओगी? बच्चा भी मुरझा जाएगा.

‘‘तुम पढ़ीलिखी समझदार हो. पति चला गया, यह कड़वा सच है. पर क्या तुम में इतनी योग्यता नहीं है कि अपनी व बच्चे की जिंदगी संभाल सको? अभी पैसा तुम्हारा है, कल भी तुम्हारे पास रहेगा, यह भरोसा मत रखना. पैसा है तो कुछ काम भी शुरू कर सकती हो. काम करो, जिंदगी नए सिरे से शुरू करो.’’

जया ने सोचा, ‘दुख जीवन भर का है. उस से हार मान लेना कायरता है. सूरज ने हमेशा अपने फैसले खुद करने का मंत्र मुझे दिया. मुझे उदय की जिंदगी बनानी है. आज के बाद अपने फैसले मैं खुद करूंगी.’

4 साल बीत गए. जया खुश है. उस दिन उस ने हिम्मत से काम लिया. जया का नया आत्मविश्वासी रूप देख सासससुर दोनों हैरान थे. उन की मिन्नत, समझाना, उग्र रूप दिखाना सब बेकार गया. जया ने दोटूक फैसला सुना दिया कि वह यहीं रहेगी. सासससुर खूब भलाबुरा कह वहां से चले गए.

जया ने वहीं आर्मी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. इस से उसे घर भी नहीं छोड़ना पड़ा. जड़ों से उखड़ना न पड़े तो जीना आसान हो जाता है. अपने ही घर में रहते, अपने परिचित दोस्तों के साथ पढ़तेखेलते उदय पुराने चंचल रूप में लौट आया.

मेजर शांतनु देशपांडे ने उसे सूरज की कमी महसूस नहीं होने दी. स्कूल का

होमवर्क, तैरना सिखाना, क्रिकेट के दांवपेच, शांतनु ने सब संभाला. उदय खिलने लगा. उदय को खुश देख जया के होंठों की हंसी भी लौटने लगी.

शाम का समय था. उदय खेलने चला गया था. जया बैठी जिंदगी के उतारचढ़ाव के बारे में सोच रही थी. जिंदगी में कब, कहां, क्या हो जाए, उसे क्या पहले जाना जा सकता है? मैं सूरज के बगैर जी पाऊंगी, सोच भी नहीं सकती थी. लेकिन जी तो रही हूं. छोटे उदय को मैं ने चलना सिखाया था. अब लगता है उस ने मुझे चलना सिखाया. देशपांडे ने सच कहा था जीवन को नष्ट करने का अधिकार मानव को नहीं है. इसे संभाल कर रखने में ही समझदारी है.

शुरू के दिनों को याद कर के जया आज भी सिहर उठी. वैधव्य का बोझ, कुछ करने का मन ही नहीं होता था. पर काम तो सभी करने थे. घर चलाना, उदय का स्कूल, स्कूल में पेरैंट टीचर मीटिंग, घर की छोटीबड़ी जिम्मेदारियां, कभी उदय बीमार तो कभी कोई और परेशानी. आई और शांतनु का सहारा न होता तो बहुत मुश्किल होती.

शांतनु का नाम याद आते ही मन में सवाल उठा, ‘पता नहीं उन्होंने अब तक शादी क्यों नहीं की? हो सकता है प्रेम में चोट खाई हो. आई से पूछूंगी.’

जया उठ कर अपने कमरे में चली आई पर उस का सोचना बंद नहीं हुआ. ‘मैं शांतनु पर कितनी निर्भर हो गई हूं, अनायास ही, बिना सोचेसमझे. वे भी आगे बढ़ सब संभाल लेते हैं. पिछले कुछ समय से उन के व्यवहार में हलकी सी मुलायमियत महसूस करने लगी हूं. ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे जख्मों पर मरहम लगा रहा है. उदय का तो कोई काम अंकल के बिना पूरा नहीं होता. क्यों कर रहे हैं वे इतना सब?’

शाम को जया बगीचे में पानी दे रही थी. उदय साथसाथ सूखे पत्ते, सूखी घास निकालता जाता. अचानक वह जया की ओर देखने लगा.

‘‘ऐसे क्या देख रहा है? मेरे सिर पर क्या सींग उग आए हैं?’’

उदय उत्तेजित सा उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘मम्मी, मुझे पापा चाहिए.’’

जया स्तब्ध रह गई.

उस के कुछ कहने से पहले ही उदय कह उठा, ‘‘अब मैं शांतनु अंकल को अंकल नहीं पापा कहूंगा,’’ और फिर वह घर के भीतर चला गया.

उस रात जया सो नहीं पाई. उदय के मन में आम बच्चों की तरह पापा की कमी कितनी खटक रही है, क्या वह जानती नहीं. जब सूरज को खोया था उदय छोटा था, तो भी जो छवि उस के नन्हे से दिल पर अंकित थी, वह प्यार करने, हर बात का ध्यान रखने वाले पुरुष की थी. उस की बढ़ती उम्र की हर जरूरत का ध्यान शांतनु रख रहे थे. उन की भी वैसी ही छवि उदय के मन में घर करती जा रही थी.

आई और शांतनु भी यही चाहते हैं.

इशारों में अपनी बात कई बार कह चुके हैं. वही कोई फैसला करने से बचती रही है.

क्या करूं? नई जिंदगी शुरू करना गलत तो नहीं. शांतनु एक अच्छे व सुलझे इंसान हैं.

उदय को बेहद चाहते हैं. आई और शांतनु दोनों मेरा अतीत जानते हैं. शादी के बाद जब यहां आई थी, तब से जानते हैं. अभी दोनों परिवार बिखरे, अधूरेअधूरे से हैं. मिल जाएं तो पूर्ण हो जाएंगे.

वसंतपंचमी के दिन आई ने जया व उदय को खाने पर बुलाया. उदय जल्दी मचा कर शाम को ही जया को ले वहां पहुंच गया. जया ने सोचा, जल्दी पहुंच मैं आई का हाथ बंटा दूंगी.

आई सब काम पहले से ही निबटा चुकी थीं. दोनों महिलाएं बाहर बरामदे में आ बैठीं. सामने लौन में उदय व शांतनु बैडमिंटन खेल रहे थे. खेल खत्म हुआ तो उदय भागता

बरामदे में चला आया और आते ही बोला,

‘‘मैं अंकल को पापा कह सकता हूं? बोलो

न मम्मी, प्लीज?’’

जया शर्म से पानीपानी. उठ कर एकदम घर के भीतर चली आई. पीछेपीछे आई भी आ गईं. जया को अपने कमरे में ला बैठाया.

‘‘बिटिया, जो बात हम मां बेटा न कह सके, उदय ने कह दी. शांतनु तुम्हें बहुत

चाहता है. तुम्हारे सामने सारी जिंदगी पड़ी है. उदय को भी पिता की जरूरत है और मुझे भी तो बहू चाहिए,’’ आई ने जया के दोनों हाथ पकड़ लिए, ‘‘मना मत करना.’’

जया के सामने नया संसार बांहें पसारे खड़ा था. उस ने लजा कर सिर झुका लिया.

आई को जवाब मिल गया. उन्होंने अलमारी खोल सुनहरी साड़ी निकाल जया

को ओढ़ा दी और डब्बे में से कंगन निकाल पहना दिए.

जया मोम की गुडि़या सी बैठी थी.

उसी समय उदय अंदर आया. वहां का नजारा देख वह चकित रह गया.

आई ने कहा, ‘‘कौन, उदय है न? जा तो बेटा, अपने पापा को बुला ला.’’

‘‘पापा,’’ खुशी से चिल्लाता उदय बाहर भागा.

जया की आंखें लाज से उठ नहीं रही थीं. आई ने शांतनु से कहा, ‘‘मैं ने अपने

लिए बहू ढूंढ़ ली है. ले, बहू को अंगूठी पहना दे.’’

शांतनु पलक झपकते सब समझ गया. यही तो वह चाह रहा था.

मां से अंगूठी ले उस ने जया की कांपती उंगली में पहना दी.

‘‘पापा, अब आप मेरे पापा हैं. मैं आप को पापा कहूंगा,’’ कहता उदय लपक कर शांतनु के सीने से जा लगा.

बंधन टूट गए : भाग 1

यह जोड़ी बहुत ही बेमेल थी. 50 साल के ठाकुर भवानी सिंह तो 25 साल की ठकुराइन सुहानी देवी. बेमेल भले ही हो, पर लोगों की नजरों में तो यही जोड़ी सब से बेजोड़ थी, क्योंकि ठाकुर भवानी सिंह 50 साल के हो कर भी दमखम के मामले में किसी जवान लड़के को मात देते थे और ठकुराइन सुहानी देवी का रूप अपनी हद पर था. ठाकुर भवानी सिंह की पहली पत्नी 5 साल पहले ही चल बसी थीं. उन के पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं थी. रिश्तेदारों के कहने पर उन्होंने दूसरी शादी के लिए हां कर दी थी और अपने मुकाबले थोड़े कम पैसे वाले ठाकुरों के यहां से सुहानी देवी को ब्याह लाए थे.

भवानी सिंह सुहानी देवी के सामने बड़े ही गर्व से अपनी ठकुराई का बखान करते और अपने खानदान की तलवार दिखाते थे. शान के साथ अपनी खानदानी बातें बताते और हर रीतिरिवाज का बखान करते थे. हर महीने सुहानी देवी के लिए 4-5 जोड़े कपड़े और गहने लाना तो ठाकुर भवानी सिंह के लिए आम बात थी. उन का मानना था कि गहनेकपड़े औरतों के लिए ठीक उसी तरह जरूरी हैं, जैसे मर्दों के लिए शराब और मांस. उन्हें इस के लालच में फंसाओ और खुद चाहे जो भी करो. औरतें घर की चारदीवारों में नियमों, परंपराओ में फंसी रह कर भी अपनेआप को धन्यभागी समझती रहेंगी. जब सुहानी देवी नईनई ब्याह कर आई थी, तो उस की सास उसे बताती थीं कि तुम ठकुराइन हो…

फलां काम तुम्हें इस तरह से करना है और फलां काम कुछ इस तरह से… हम ठकुराइनों के खांसने और छींकने में भी एक शालीनता और एक अदा होती है और अगर घर में कोई शोक हो तो भी हमें चीखचीख कर नहीं रोना… रोने के लिए एक अलग जाति की औरतें होती हैं, जो इन्हीं मौकों पर बुलाई जाती हैं. न जाने और क्याक्या बताया गया था सुहानी देवी को, पर उसे इन सब बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. ठकुराइन होने का भार उस के लिए कुछ ज्यादा ही था. एक बार जब जेठ की दोपहरी में गरमी से परेशान हो कर सुहानी देवी ने अपने बदन के गहने उतार दिए और एक हलके कपड़े वाली साड़ी पहन ली, तो उस की सास ने कितना डांटा था उसे, ‘‘ये भारी कपड़ेलत्ते तो हम ठकुराइनों की शान हैं. इन्हें जीतेजी अपने बदन से अलग नहीं करते… दोष होता है.’’

सुहानी देवी अब इन भारी गहनों और कपड़ों को हमेशा ही ढोती रहती, पर ये भारीभारी गहने और सोने के तार वाली साडि़यों से भी ज्यादा कीमती कुछ और भी था, जिसे सुहानी ढूंढ़ रही थी. अभी तो सुहानी देवी का जवान दिल प्यार चाहता था… घंटों अपने पति के बाहुपाश में लिपटने की चाहत थी उस की. उस का मन अभी आकाश में बिना किसी बंधन के उड़ना चाहता था. ठाकुर भवानी सिंह कभीकभी तो पूरी रात घर से बाहर रहते, तो कभीकभार देर रात ही आते और आते ही औंधे मुंह बिस्तर पर गिर जाते. पूरे महीने में 4-5 ही ऐसे दिन होते, जब वे घर में रुकते, नहीं तो उन की हर रात बाहर ही गुजरती थी. कभीकभार दबी जबान से सुहानी देवी ने पूछने की कोशिश भी की, तो ठाकुर साहब ने खुद के ठाकुर होने का दावा कर के बात आईगई कर दी. ठाकुर भवानी सिंह सुहानी देवी को बिस्तर पर प्यार करना भी जानते थे, पर उन के लिए सिर्फ अपनी संतुष्टि ही माने रखती थी. सुहानी देवी को मजा मिला या नहीं,

इस बात से उन को कोई मतलब नहीं होता था. वे तो बिस्तर पर भी ठाकुर ही बने रहते थे. सुहानी देवी अपने पति से बात करना चाहती थी और आने वाले भविष्य को ले कर कुछ योजनाएं भी बनाना चाहती थी, पर कड़क स्वभाव वाले ठाकुर के साथ ऐसा हो नहीं पाता था. यों तो हवेली में नौकरचाकर भी थे, पर वे सब सुहानी देवी की सास की चमचागीरी और तीमारदारी में ही लगे रहते थे. सुहानी देवी किसी से बात करने को भी तरसती थी. एक रात को जब ठाकुर भवानी सिंह वापस लौटे तो काफी नशे में थे और मूड भी अच्छा लग रहा था, तो सुहानी देवी ने उन से पूछ ही लिया, ‘‘अच्छा, यह तो बताइए कि रोज इतनी रात तक आप बाहर रहते हो… आखिर आप जाते कहां हो?’’ सुहानी देवी की बात सुन कर ठाकुर मुसकराने लगे और बोले, ‘‘देखो सुहानी, हमारे बापदादा की किसी जमाने में तूती बोलती थी और हमारी हवेली पर औरतों का नाच होता था, हमारे बापदादा जिस औरत पर उंगली रखते वही औरत उन के बिस्तर पर बिछ जाती थी,

पर अब हमारी ठकुराई तो रही नहीं, हम बस नाम के ठाकुर हैं, पर हमारे शौक तो वही पुराने हैं,’’ ठाकुर भवानी सिंह ने पानी का एक बड़ा घूंट भरा और फिर से बोलना शुरू कर दिया, ‘‘हम अपने उसी शौक को पूरा करने के लिए शहर में जाते हैं.’’ ‘‘तो क्या आप औरतों का नाच देखने जाते हैं?’’ सुहानी देवी ने पूछा. ‘‘नहीं रे पगली, शहर में रैडलाइट एरिया नाम की एक जगह है, जहां पर पैसे दे कर औरतों के साथ मजे किए जाते हैं. हम वहीं पर मन बहलाने के लिए जाते हैं,’’ आखिरी शब्द कहतेकहते ठाकुर साहब पर नींद हावी हो गई थी और वे सोने लगे, पर सुहानी देवी की आंखों से तो नींद कोसों दूर जा चुकी थी. ‘‘तो इस का मतलब है कि ठाकुर की नजर में मेरी कोई अहमियत नहीं है… मैं बस उन की झूठी परंपराओं और सड़ेगले रीतिरिवाजों को निभाने के लिए यहां लाई गई हूं…’’ सुहानी देवी अपनेआप से ही कई सवाल करने लगी थी. वह सारी रात करवट बदलती रही थी. अगले दिन सुहानी देवी का सिर भारी सा था और मन भी उचटा सा लग रहा था. वह अपनी छत के कोने पर खड़ी दूर तक निहारने लगी थी कि उस की नजर घर के आंगन में खड़े एक नौजवान पर पड़ी, जिस की उम्र 22-23 साल की रही होगी. वह नौजवान ठाकुर साहब की पसंदीदा गाय कालिंदी को पकड़ कर खींच रहा था,

करमवती- भाग 3 : राजपाल प्लंबर कहा गिरा था

उस ने ओपन यूनिवर्सिटी से 2 साल में बीऐड भी कर लिया. जिस दिन उस का बीऐड का नतीजा आया, उस दिन मैं ने खुशी से महल्ले में मिठाई बांटी. उस की कामयाबी मेरी कामयाबी थी. ‘‘करमवती के स्कूल की प्रबंधन समिति ने उस से पहले ही बोल दिया था कि अगर उस ने बीऐड कर लिया, तो वे उस की नियुक्ति प्रवक्ता के पद पर कर देंगे और इंटर की क्लास पढ़ाने के लिए दे देंगे.

उस का यह सपना भी पूरा हो गया. उसी दिन हम ने अपने मकान की बुनियाद रख दी और कुछ महीने बाद उस में शिफ्ट हो गए.’’ ‘‘बड़े कमाल की कहानी है राजपाल तुम्हारी. शराब पीते रहते तो कहीं गटर में होते या फिर किसी हादसे का शिकार हो जाते. करमवती ने तुम्हें दोनों ही चीजों से बचा लिया.’’ ‘‘बाबूजी, अभी मैं ने आप को नाली में पड़े होने से ले कर अब तक 13 साल की कहानी सुनाई है. अभी और भी साल बाकी हैं. कहो तो वह भी सुना दूं.’’ मैं ने कहा, ‘‘जरूर सुनाओ. ऐसी कामयाबी की कहानी कौन नहीं सुनना चाहेगा.’’ ‘‘बाबूजी, करमवती ने निश्चय किया कि वह सरकारी नौकरी करेगी.

2 साल उस ने कड़ी मेहनत की. किताब बाद में लाती, चट पहले कर जाती. फिर पता क्या हुआ बाबूजी?’’ ‘‘क्या हुआ राजपाल? बताओ.’’ ‘‘पिछले महीने उसे सरकारी नौकरी का नियुक्तिपत्र मिला. धामपुर के बालिका कालेज में वह प्रवक्ता हो गई. बाबूजी, 30,000 की पगार से 70,000 की पगार पर,’’ यह कहतेकहते राजपाल भावुक हो गया. उस के औजार रुक गए. वह अपने आंसू पोंछने लगा, ‘‘पता है बाबूजी, अब वह क्या कहती है?’’ राजपाल की बात सुन कर अब मैं असमंजस में पड़ गया. किसी फिल्मी कहानी की तरह मैं उस की कहानी सुन रहा था.

मुझे लगा कि किसी फिल्मी कहानी की तरह करमवती कामयाबी के शिखर पर चढ़ कर राजपाल को अपने लायक न समझ कर उसे छोड़ने की बात करने लगी होगी. मैं अब राजपाल के मुंह से बद से बदतर बात सुनने को तैयार था. करमवती मुझे कहानी की खलनायिका नजर आने लगी. मेरी पूरी हमदर्दी राजपाल के साथ थी. मुझे लगा कि उस के आंसू खुशी के नहीं दुख के थे. मैं ने पूछा, ‘‘क्या कहती है अब करमवती? क्या तुम अब उस के लायक नहीं रहे?’’ ‘‘नहीं बाबूजी, आप यहां गलत सोच रहे हैं.’’ फिर उस ने बड़े गर्व से आगे की कहानी सुनाई, ‘‘अब करमवती कहती है कि मुझे अब इन औजारों का थैला उठाने की जरूरत नहीं है. वह कहती है कि वह जल्दी ही मुझे प्लंबरी के सामान की बड़ी सी दुकान खुलवाएगी. उस दुकान से भी बड़ी, जिस दुकान के लालाजी ने आप को मेरे पास भेजा था.

‘‘वह कहती है कि यह तो अभी हमारी नई जिंदगी की शुरुआत?है, आगेआगे देखो क्या होता?है.’’ राजपाल का काम लगभग खत्म होने को था, तभी उस के घर से फोन आया. उस ने बताया कि उस का काम खत्म होने ही वाला है. जब राजपाल का काम खत्म हो गया, तो मैं ने उस का हिसाब कर दिया. तभी घर के सामने एक कार आ कर रुकी. ड्राइविंग सीट पर कोई औरत बैठी थी और पिछली सीट पर 2 बड़े बच्चे. मुझे लगा कि कोई मेहमान आया है. तभी पिछली सीट से बड़ा लड़का नीचे उतरा. उस ने मुझे नमस्ते की और राजपाल का औजारों का थैला हाथ से पकड़ते हुए कहा, ‘‘लाओ पापा, यह मुझे दो.’’ मुझे समझते देर न लगी कि कार किस की है. तभी राजपाल बोला,

‘‘बाबूजी, यही है मेरी करमवती. और ये हैं हमारे बच्चे.’’ करमवती ने कार से उतर कर मुझे नमस्ते की. उस की आंखों में अथाह आत्मविश्वास था. ‘‘करमवती, ये वही बाबूजी हैं, जिन्होंने मुझे नाली में से खींचा था.’’ ‘‘मैं उस बात के लिए आज भी बाबूजी की एहसानमंद हूं,’’ करमवती ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुका कर कहा. ‘‘अच्छा बाबूजी नमस्ते,’’ राजपाल ने कार की अगली सीट पर बैठते हुए कहा. ‘‘नमस्ते,’’ मैं ने कहा. उस के बाद करमवती ने कार आगे बढ़ा दी. मैं हैरानी से उस कार को तब तक आगे बढ़ते देखता रहा, जब तक वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गई. मैं सोच रहा था, ‘समझदारी और हौसला हो, तो आदमी आसमान छू सकता है. करमवती कामयाबी की मिसाल है.’

करमवती- भाग 2 : राजपाल प्लंबर कहा गिरा था

‘‘मेरी घरवाली करमवती ने जैसेतैसे हाथ जोड़ कर मकान मालिक को मनाया. वह इस शर्त पर राजी हुआ कि अगर उस दिन के बाद मैं शराब पी कर आया, तो वह किसी सूरत में फिर अपने मकान में नहीं रखेगा.’’ ‘‘लेकिन, तुम शराब पीने से बाज तो नहीं आए होगे राजपाल?’’ मैं ने ताना कसा. ‘‘बाबूजी, मैं शर्मिंदा तो बहुत था, लेकिन आप को क्या बताऊं, हम शराबियों को शराब पीने की ऐसी आदत पड़ जाती है कि कितना भी चाहें पीए बिना रहा नहीं जाता. हम मजदूरों की क्या इज्जत और क्या बेइज्जती. लेकिन बाबूजी, करमवती को यह सब बरदाश्त न हुआ…’’

राजपाल काम करता गया और कहानी को आगे बढ़ाता गया. ‘‘अगले दिन मेरी हिम्मत काम पर जाने की नहीं हो रही थी, लेकिन करमवती ने मेरा हौसला बढ़ाया. उस ने एक हाथ में बच्चे को गोद में लिया और दूसरे हाथ में मेरे औजारों का थैला उठाया और कहा, ‘चलो.’ ‘‘मैं उसे ऐसा करते देख हैरान था. मैं ने उस से औजारों वाला थैला ले लिया. लेकिन उस ने काम पर मुझे अकेले न जाने दिया. मेरे लाख मना करने के बावजूद वह मेरे साथ चल दी. ‘‘काम में उस ने मेरी मदद की और शाम को काम निबटा कर मेरे साथ ही घर वापस आई. शराबी दोस्तों से मिलने के उस ने रास्ते बंद कर दिए. ‘‘वह अब रोज मेरे साथ काम पर जाने लगी. काम में वह मेरी पूरी मदद करती. अब मेरा 8 घंटे का काम 5-6 घंटे में निबटने लगा. इस से मैं ने अपना काम और बढ़ा लिया, जिस से मेरी आमदनी बढ़ने लगी. ‘

‘आप को तो मालूम होगा ही बाबूजी कि हम मजदूर तबके के लोग शाम को मजदूरी करने के बाद थकान मिटाने के बहाने शराब पीने बैठ जाते हैं और फिर पीने की कोई हद नहीं होती. दिनभर की कमाई मिनटों में स्वाहा हो जाती है. ‘‘कभीकभी तो इस चक्कर में एक पैसा भी घर नहीं पहुंचता, बल्कि कई बार तो उधारी और चढ़ जाती है. लेकिन करमवती के साथ होने से ये सब चीजें बंद हो गईं. ‘‘शराब पीने की फुजुलखर्ची घटी तो बचत अपनेआप बढ़ गई. बचत किसे खुशी नहीं देती. मैं मजदूरी का पैसा करमवती को देता. वह घर चलाती और बचत का पैसा अपने खाते में जमा कर आती. घर में अच्छा खाना, पहनना होने लगा. मेरे शराबी दोस्त मुझे ताना मारते ‘जोरू का गुलाम’, पर मैं एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देता.’’ ‘‘अच्छा, फिर तो करमवती ने तुम्हारी जिंदगी बदल दी, लेकिन आज तुम करमवती को ले कर नहीं आए?’’ मैं ने पूछा. ‘‘बाबूजी, आगे तो सुनिए. अभी तो मेरी कहानी शुरू हुई है. करमवती भी आएगी, जरूर आएगी.’’ राजपाल ने अपनी कहानी फिर आगे बढ़ा दी.

‘‘बाबूजी, करमवती से जब मेरी शादी हुई, तब वह 8वीं पास थी. वह और पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस के गरीब मांबाप ने उस की पढ़ाई रोक कर घर के कामकाज में झोंक दिया और फिर उसे मेरे पल्ले बांध दिया. ‘‘फिर वह और 3 साल मेरे साथ ऐसे ही घिसटती रही. तब उस के मन में आगे पढ़ने का विचार आया. उस ने 10वीं का प्राइवेट फार्म भरा और वह अच्छे नंबरों से पास हो गई. हमारा बच्चा भी अब 3 साल का हो गया था और हमारी शादी को 5 साल. ‘‘अब तक मेरी समझ में यह आ गया था कि शराब कितनी बुरी चीज होती?है. हम मजदूरों के लिए तो यह किसी जहर से कम नहीं. ‘‘गरीब मजदूर सोचता है कि वह शराब पी कर अपने दुख मिटा रहा होता है, लेकिन सच तो यह है बाबूजी, शराब पी कर वह अपने दुख बढ़ा रहा होता है. वह शराब पी कर तबाह होता है और गरीबी के नरक में सड़ता है. करमवती की वजह से मैं उस नरक में सड़ने से बच गया.’’ ‘‘राजपाल, तुम्हारी कहानी रोचक है. आगे बताओ, फिर तुम्हारी जिंदगी में क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘बाबूजी, करमवती को अब यकीन हो चला था कि अब मैं शराब नहीं पीऊंगा, तो उस ने मेरे साथ जाना छोड़ छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. इस से हमारी आमदनी और भी बढ़ गई. अब हम ने 2 कमरों का मकान किराए पर ले लिया. एक कमरे में करमवती ट्यूशन पढ़ाती और दूसरे कमरे में हम रहते. ‘‘लेकिन बाबूजी, करमवती का पढ़ाई का शौक अभी छूटा नहीं था. 2 साल में उस ने 12वीं भी पास कर ली. अब उस के पास इतने ट्यूशन हो गए कि घर का खर्चा ट्यूशन की आमदनी से आराम से चलने लगा. मेरी कमाई बैंक में जमा होने लगी. ‘‘ट्यूशन के बच्चों के सामने मुझे बीड़ी पीना अच्छा नहीं लगता था, तो मैं ने वह भी छोड़ दी. चाय की लत भी बहुत बुरी थी. मैं ने ठान लिया और फिर चाय पीना भी छोड़ दिया.’’ ‘‘वाह राजपाल. इतना सुधार, ऐसा निश्चय.’’ ‘‘बाबूजी, बस उस करमवती की करामात है.’’ ‘‘तो अब तो ट्यूशन वगैरह काफी अच्छी चल रही होगी और तुम्हारी बचत भी अच्छी हो रही होगी?’’ राजपाल फिर अपनी जिंदगी की कहानी सुनाने लगा और मैं भी बड़ी दिलचस्पी के साथ मगन हो कर उस की कहानी सुनने लगा. ‘‘फिर करमवती ने पहले बेटे के जन्म के 5 साल बाद एक बेटी को जन्म दिया और फिर नसबंदी करा ली. उस ने कहा,

‘छोटा परिवार, सुखी परिवार. हम इन 2 बच्चों की परवरिश ठीक से करेंगे. और बच्चों की जरूरत नहीं.’ ‘‘बाबूजी, आप भी सुन कर हैरान होंगे, करमवती ने 3 साल में बीए भी कर लिया और वह एक प्राइवेट स्कूल में मास्टरनी हो गई. बाबूजी, पूछो मत. जिस दिन करमवती स्कूल में मास्टरनी हुई, उस दिन मैं खुशी से रो पड़ा था. लोग उस दिन से मुझे ‘मास्टरनी का हसबैंड’ कहने लगे. ‘‘गरीब आदमी की आमदनी में दो पैसे बढ़ जाएं, तो उस से बड़ा सेठ कौन. यहां तो लोग अब इज्जत से भी पेश आने लगे थे.’’ ‘‘अरे वाह, ‘मास्टरनी के हसबैंड’ तुम्हारी करमवती ने तो कमाल ही कर दिया. उस के साथ तुम भी पढ़ लेते,’’ मैं ने कहा. ‘‘बाबूजी, करमवती यहीं नहीं रुकी. उस ने एमए भी पास किया और फिर तो वह इंटर कालेज में पढ़ाने लगी. अब हमारी इतनी बचत हो चुकी थी कि हम ने महल्ले में ही 100 गज का प्लौट खरीद लिया. हमारे बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे. ‘‘बच्चों को बनठन कर स्कूल जाते देखता, तो मेरा कलेजा खुशी से चौगुना हो जाता. मैं और मेहनत करता. करमवती मेरी मेहनत को सलाम करती, मेरा हौसला बढ़ाती. ‘‘लेकिन बाबूजी, करमवती तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.

 

सफर कुछ थम सा गया- भाग 1 : क्या जया के पतझड़ रूपी जीवन में फिर बहारें आ पाईं

हाथों में पत्रों का पुलिंदा पकड़े बाबूजी बरामदे के एक छोर पर बिछे तख्त पर जा बैठे. यह उन की प्रिय जगह थी.

पास ही मोंढ़े पर बैठी मां बाबूजी के कुरतों के टूटे बटन टांक रही थीं. अभीअभी धोबी कपड़े दे कर गया था. ‘‘मुआ हर धुलाई में बटन तोड़ लाता है,’’ वे बुदबुदाईं.

फिर बाबूजी को पत्र पढ़ते देखा, तो आंखें कुरते पर टिकाए ही पूछ लिया, ‘‘बहुत चिट्ठियां आई हैं. कोई खास बात…?’’

एक चिट्ठी पढ़तेपढ़ते बाबूजी का चेहरा खिल उठा, ‘‘सुनती हो, लड़के वालों ने हां कर दी. उन्हें जया बहुत पसंद है.’’

मां बिजली की गति से हाथ का काम तिपाई पर पटक तख्त पर आ बैठीं, ‘‘फिर से तो कहो. नहीं, ऐसे नहीं, पूरा पढ़ कर सुनाओ.’’

पल भर में पूरे घर में खबर फैल गई कि लड़के वालों ने हां कर दी. जया दीदी की शादी होगी…

‘‘ओ जया, वहां क्यों छिपी खड़ी है? यहां आ,’’ भाईबहनों ने जया को घेर लिया.

मांबाबूजी की भरीपूरी गृहस्थी थी.

5 बेटियां, 3 बेटे. इन के अलावा उन के चचेरे, मौसेरे, फुफेरे भाईबहनों में से कोई न कोई आता ही रहता. यहां रह कर पढ़ने के लिए

2-3 बच्चे हमेशा रहते. बाबूजी की पुश्तैनी जमींदारी थी पर वे पढ़लिख कर नौकरी में लग गए थे. अंगरेजों के जमाने की अच्छी सरकारी नौकरी. इस से उन का समाज में रुतबा खुदबखुद बढ़ गया था. फिर अंगरेज चले गए पर सरकारी नौकरी तो थी और नौकरी की शान भी.

मांबाबूजी खुले विचारों के और बच्चों को ऊंची शिक्षा दिलाने के पक्ष में थे. बड़े बेटे और 2 बेटियों का तो विवाह हो चुका था. जया की एम.ए. की परीक्षा खत्म होते ही लड़के वाले देखने आ गए. सूरज फौज में कैप्टन पद पर डाक्टर था. ये वे दिन थे, जब विवाह के लिए वरदी वाले लड़कों की मांग सब से ज्यादा थी. कैप्टन सूरज, लंबा, स्मार्ट, प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला था.

शादी से 2 महीने पहले ही घर में उस की तैयारियां जोरशोर से होने लगीं. मां ने दोनों ब्याही बेटियों को महीना भर पहले बुला लिया. बेटाबहू तो यहां थे ही. घर में रौनक बढ़ गई. 15 दिन पहले ढोलक रख दी गई. तब तक छोटी मामी, एक चाची, ताई की बड़ी बहू आ चुकी थीं. रात को खानापीना निबटते ही महल्ले की महिलाएं आ जुटतीं. ढोलक की थाप, गूंजती स्वरलहरियां, घुंघरुओं की छमछम, रात 1-2 बजे तक गानाबजाना, हंसीठिठोली चलती.

सप्ताह भर पहले सब मेहमान आ गए. बाबूजी ने बच्चों के लीडर छोटे भाई के बेटे विशाल को बुला कर कहा, ‘‘सड़क से हवेली तक पहुंचने का रास्ता, हवेली और मंडप सजाने का जिम्मा तुम्हारा. क्रेप पेपर, चमकीला पेपर, गोंद वगैरह सब चीजें बाजार से ले आओ. बच्चों को साथ ले लो. बस, काम ऐसा करो कि देखने वाले देखते रह जाएं.’’

विशाल ने सब बच्चों को इकट्ठा किया. निचले तल्ले का एक कमरा वर्कशौप बना. कोई कागज काटता, कोई गोंद लगाता, तो कोई सुतली पर चिपकाता. विवाह के 2 दिन पहले सारी हवेली झिलमिला उठी.

‘‘मां, हम तो वरमाला कराएंगे,’’ दोनों बड़ी बेटियों ने मां को घेर लिया.

‘‘बेटी, यह कोई नया रिवाज है क्या? हमारे घर में आज तक नहीं हुआ. तुम दोनों के वक्त कहां हुआ था?’’

‘‘अब तो सब बड़े घरों में इस का

चलन हो गया है. इस में बुराई क्या है?

रौनक बढ़ जाती है. हम तो कराएंगे,’’ बड़ी बेटी ने कहा.

फिर मां ने बेटियों की बात मान ली तो जयमाला की रस्म हुई, जिसे सब ने खूब ऐंजौय किया.

सूरज की पोस्टिंग पुणे में थी. छुट्टियां खत्म होने पर वह जया को ले कर पुणे आ गया. स्टेशन पर सूरज का एक दोस्त जीप ले कर हाजिर था. औफिसर्स कालोनी के गेट के अंदर एक सिपाही ने जीप को रोकने का इशारा किया. रुकने पर उस ने सैल्यूट कर के सूरज से कहा, ‘‘सर, साहब ने आप को याद किया है. घर जाने से पहले उन से मिल लें.’’

सूरज ने सवालिया नजर से दोस्त की तरफ देखा और बोला, ‘‘जया…?’’

सहचारिणी

सहचारिणी – भाग 2 : क्या सुरुचि अपने मकसद को पाने में कामयाब हो पाई

तुम्हारे साथ तुम्हारे घर जा कर ही मुझे पता चला कि तुम दफ्तर जा कर कलम घिसने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि फैशन डिजाइनिंग क्षेत्र के बहुत बड़ी हस्ती हो. तुम्हारा आलीशान मकान तो किसी फिल्म के सैट से कम नहीं था. नौकरचाकर, ऐशोआराम की कमी नहीं थी. मैं तो जैसे सातवें आसमान में पहुंच गई थी. फिर भी मेरे दिमाग में वही संदेह. इतने बड़े आदमी हो कर तुम ने मुझे क्यों चुना?

मेरी जिंदगी में कई अविस्मरणीय घटनाएं घटीं. अलौकिक आनंद के पल भी आए. जब भी तुम्हें कोई सफलता मिलती तुम मुझे अपनी बांहों में भर लेते और सीने से लगा लेते. उस स्पर्श की सुकोमलता तथा तुम्हारी आंखों में लहराता प्यार का सागर और तुम्हारे नम होंठों की नरमी को मैं कैसे भूल सकती हूं? ऐसे मधुर क्षणों में मुझे अपने पर गर्व होता. पर दूसरे ही पल मन में यह शंका शूल सी चुभती कि क्या मैं इस सुख के काबिल हूं? तुम मुझ पर इतने मेहरबान क्यों? जब कभी मैं ने अपने इन विचारों को तुम्हारे सामने प्रकट किया, तुम्हारे होंठों पर वही निश्छल हंसी आ जाती जिस ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था. फिर मैं सब कुछ भूल कर तुम्हारे प्यार में खो जाती.

मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए तुम कहते, ‘‘तुम नहीं जानतीं कि तुम क्या हो. अब रही सुंदरता की बात, तो मुझे रैंप पर कैटवाक करती विश्व सुंदरी नहीं चाहिए. मुझे जो सुंदरता चाहिए वह तुम में है.’’

‘‘एक बात कहूं, तुम ने मुझे अपना कर मुझे वह सम्मान दिया है, जो किसी को विरले ही मिलता है. मगर एक प्रश्न है मेरा…’’

‘‘हां मुझे मालूम है. अब तुम यह पूछोगी न कि तुम तो दावा करते हो कि मैं तुम्हें पहली ही नजर में भा गई. मगर पहली ही नजर में तुम्हें मेरे बारे में सब कुछ कैसे पता चला? यही है न तुम्हारा प्रश्न?’’ तुम ने मेरी आंखों में झांकते हुए शरारत भरी हंसी के साथ कहा तो मुझे मानना ही पड़ा कि तुम सुंदरता ही नहीं लोगों के दिलों के भी पारखी हो.

तुम ने मुझे अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘तो सुनो. तुम ने यह प्रश्न कई बार मुझ से कहे अनकहे शब्दों में पूछा. मगर हर बार मैं हंस कर टाल गया. आज जैसा मैं तुम्हें दिख रहा हूं मूलतया मैं वैसा नहीं हूं. मुझे डर था कि कहीं एक अनाथ जान कर तुम मुझ से दूर न हो जाओ. मैं ने जब से होश संभाला अपनेआप को एक अनाथाश्रम में पाया. सभी अनाथाश्रम फिल्मों या कहानियों जैसे नहीं होते. इस अनाथाश्रम की स्थापना एक ऐसे दंपती ने की थी जिन्हें ढलती उम्र में एक पुत्र पैदा हुआ था और वह बेशुमार दौलत और ऐशोआराम पा कर बुरी संगत में पड़ गया था. वह जिस तरह दोनों हाथों से रुपया लुटाता था और ऐश करता था, उसी तरह उसे दोनों हाथों से ढेरों बीमारियां भी बटोरनी पड़ीं. शादीब्याह कर अपना घर बसाने की उम्र में वह इन का घर उजाड़ कर चल बसा.

‘‘वे कुछ समय तक तो इस झटके को सह नहीं पाए और गहरे अवसाद में चले गए. पर अचानक एक दिन उन के घर के आंगन में मैं उन्हें मिल गया तो मेरी देखभाल करते हुए उन्हें जैसे अचानक यह बोध हुआ कि इस दुनिया में ऐसे कई बच्चे हैं, जो मातापिता के प्यार और सही मार्गदर्शन के अभाव में या तो सड़कों पर भीख मांगते हैं या गलत राह पर चल पड़ते हैं. उन्होंने निश्चय किया कि उन के पास जो अपार धनदौलत है उस का सदुपयोग होना चाहिए.

‘‘फिर उन्होंने एक ऐसे आदर्श अनाथाश्रम की स्थापना की जहां मुझ जैसे अनाथ बच्चों को घर की शीतल छाया ही नहीं, मांबाप का प्यार भी मिलता है.

‘‘मैं ने डै्रस डिजाइनिंग में स्नातकोत्तर परीक्षा पास की. उस के बाद एक दोस्त के आग्रह पर उस के काम से जुड़ गया. दोस्त पैसा लगाता है और मैं उस के व्यापार को कार्यान्वित करता हूं. तुम तो जानती ही हो कि इस क्षेत्र में कितनी होड़ लगी रहती है. इस के लिए पैसे तो चाहिए ही. पर पैसों से ज्यादा अहमियत है एक क्रिएटिव माइंड की और मेरे मित्र को इस के लिए मुझ पर भरोसा ही नहीं गर्व भी है. और मेरी इस खूबी का खादपानी यानी जान तुम ही हो,’’ तुम ने मेरी नाक को पकड़ कर झिंझोड़ते हुए कहा तो मुझे अपने आप पर गर्व ही नहीं हुआ मानसिक शांति भी मिली. तुम ने आगे कहना जारी रखा, ‘‘मगर तुम्हारे अंदर एक बहुत बड़ा अवगुण है, जो मुझे बहुत खटकता है.’’

‘‘क्या?’’ मेरा गला सूख गया.

‘‘आत्मविश्वास की कमी. तुम जो हो, अपनेआप को उस से कम समझती हो. मैं ने लाख कोशिश की पर तुम मन के इस भाव से उबर नहीं पा रही हो.’’

यह सब सुन कर मैं अपनेआप पर इतराने लगी थी. मुझे लग रहा था कि मैं दुनिया की ऐसी खुशकिस्मत पत्नी हूं जिस का पति उसे बहुत प्यार करता है और मानसम्मान देता है. मैं और भी लगन से तुम्हारे प्रति समर्पित हो गई.

तुम रातरात भर जागते तो मैं भी तुम्हारे रंगीन कल्पनालोक में तुम्हारे साथसाथ विचरण करती. तुम जब अपने सपनों को स्कैचेज के रूप में कागज पर रखते तो मुझे दिखाते और मेरे सुझाव मांगते तो मुझे बहुत खुशी होती और मैं अपनी बुद्धि को पैनी बनाते हुए सुझाव भी देती.

 

साथी साथ निभाना – भाग 1 : संजीव ने ऐसा क्या किया कि नेहा की सोच बदल गई

उस शाम नेहा की जेठानी सपना ने अपने पति राजीव के साथ जबरदस्त झगड़ा किया. उन के बीच गालीगलौज भी हुई.

‘‘तुम सविता के साथ अपने संबंध फौरन तोड़ लो, नहीं तो मैं अपनी जान दे दूंगी या तुम्हारा खून कर दूंगी,’’ सपना की इस धमकी को घर के सभी सदस्यों ने बारबार सुना.

नेहा को इस घर में दुलहन बन कर आए अभी 3 महीने ही हुए थे. ऐसे हंगामों से घबरा कर वह कांपने लगी.

उस के पति संजीव और सासससुर ने राजीव व सपना का झगड़ा खत्म कराने का बहुत प्रयास किया, पर वे असफल रहे.

‘‘मुझे इस गलत इंसान के साथ बांधने के तुम सभी दोषी हो,’’ सपना ने उन तीनों को भी झगड़े में लपेटा, ‘‘जब इन की जिंदगी में वह चुड़ैल मौजूद थी, तो मुझे ब्याह कर क्यों लाए? क्यों अंधेरे में रखा मुझे और मेरे घर वालों को? अपनी मौत के लिए मैं तुम सब को भी जिम्मेदार ठहराऊंगी, यह कान खोल कर सुन लो.’’

सपना के इस आखिरी वाक्य ने नेहा के पैरों तले जमीन खिसका दी. संजीव के कमरे में आते ही वह उस से लिपट कर रोने लगी और फिर बोली, ‘‘मुझे यहां बहुत डर लगने लगा है. प्लीज मुझे कुछ समय के लिए अपने मम्मीपापा के पास जाने दो.’’

‘‘भाभी इस वक्त बहुत नाराज हैं. तुम चली जाओगी तो पूरे घर में अफरातफरी मच जाएगी. अभी तुम्हारा मायके जाना ठीक नहीं रहेगा,’’ संजीव ने उसे प्यार से समझाया.

‘‘मैं यहां रही, तो मेरी तबीयत बहुत बिगड़ जाएगी.’’

‘‘जब तुम से कोई कुछ कह नहीं रहा है, तो तुम क्यों डरती हो?’’ संजीव नाराज हो उठा.

नेहा कोई जवाब न दे कर फिर रोने लगी.

उस के रोतेबिलखते चेहरे को देख कर संजीव परेशान हो गया. हार कर वह कुछ दिनों के लिए नेहा को मायके छोड़ आने को राजी हो गया.

उसी रात सपना ने अपने ससुर की नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की.

उसे ऐसा करते राजीव ने देख लिया. उस ने फौरन नमकपानी का घोल पिला कर सपना को उलटियां कराईं. उस की जान का खतरा तो टल गया, पर घर के सभी सदस्यों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं.

डरीसहमी नेहा ने तो संजीव के साथ मायके जाने का इंतजार भी नहीं किया. उस ने अपने पिता को फोन पर सारा मामला बताया, तो वे सुबहसुबह खुद ही उसे लेने आ पहुंचे.

नेहा के मायके जाने की बात के लिए अपने मातापिता से इजाजत लेना संजीव के लिए बड़ा मुश्किल काम साबित हुआ.

‘‘इस वक्त उस की जरूरत यहां है. तब तू उसे मायके क्यों भेज रहा है?’’ अपने पिता के इस सवाल का संजीव के पास कोई ठीक जवाब नहीं था.

‘‘मैं उसे 2-3 दिन में वापस ले आऊंगा. अभी उसे जाने दें,’’ संजीव की इस मांग को उस के मातापिता ने बड़ी मुश्किल से स्वीकार किया.

नेहा को विदा करते वक्त संजीव तनाव में था. लेकिन उस की भावनाओं की फिक्र न नेहा ने की, न ही उस के पिता ने. नेहा के पिता तो  गुस्से में थे. किसी से भी ठीक तरह से बोले बिना वे अपनी बेटी को ले कर चले गए.

उन के मनोभावों का पता संजीव को 3 दिन बाद चला जब वह नेहा को वापस  लाने के लिए अपनी ससुराल पहुंचा.

नेहा की मां नीरजा ने संजीव से कहा, ‘‘हम ने बहुत लाड़प्यार से पाला था अपनी नेहा को. इसलिए तुम्हारे घर के खराब माहौल ने उसे डरा दिया.’’

नेहा के पिता राजेंद्र तो एकदम गुस्से से फट पड़े, ‘‘अरे, मारपीट, गालीगलौज करना सभ्य आदमियों की निशानी नहीं. तुम्हारे घर में न आपसी प्रेम है, न इज्जत. मेरी गुडि़या तो डर के कारण मर जाएगी वहां.’’

 

साथी साथ निभाना – भाग 2 : संजीव ने ऐसा क्या किया कि नेहा की सोच बदल गई

‘‘पापा, नेहा को मेरे घर के सभी लोग बहुत प्यार करते हैं. उसे डरनेघबराने की कोई जरूरत नहीं है,’’ संजीव ने दबे स्वर में अपनी बात कही.

‘‘यह कैसा प्यार है तुम्हारी भाभी का, जो कल को तुम्हारे व मेरी बेटी के हाथों में हथकडि़यां पहनवा देगा?’’

‘‘पापा, गुस्से में इंसान बहुत कुछ कह जाता है. सपना भाभी को भी नेहा बहुत पसंद है. वे इस का बुरा कभी नहीं चाहेंगी.’’

‘‘देखो संजीव, जो इंसान आत्महत्या करने की नासमझी कर सकता है, उस से संतुलित व्यवहार की हम कैसे उम्मीद करें?’’

‘‘पापा, हम सब मिल कर भैयाभाभी को प्यार से समझाएंगे. हमारे प्रयासों से समस्या जल्दी हल हो जाएगी.’’

‘‘मुझे ऐसा नहीं लगता. मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी की खुशियां तुम्हारे भैयाभाभी के कभी समझदार बनने की उम्मीद पर आश्रित रहें.’’

‘‘फिर आप ही बताएं कि आप सब क्या चाहते हैं?’’ संजीव ने पूछा.

‘‘इस समस्या का समाधान यही है कि तुम और नेहा अलग रहने लगो. भावी मुसीबतों से बचने का और कोई रास्ता नहीं है,’’ राजेंद्रजी ने गंभीर लहजे में अपनी राय दी.

‘‘मुझे पता था कि देरसवेर आप यह रास्ता मुझे जरूर सुझाएंगे. लेकिन मेरी एक बात आप सब ध्यान से सुन लें, मैं संयुक्त परिवार में रहना चाहता हूं और रहूंगा. नेहा को उसी घर में  लौटना होगा,’’ संजीव का चेहरा कठोर हो गया.

‘‘मुझे सचमुच वहां बहुत डर लगता है,’’ नेहा ने सहमे हुए अपने मन की बात कही, ‘‘न ठीक से नींद आती है, न कुछ खाया जाता है? मैं वहां लौटना नहीं चाहती हूं.’’

‘‘नेहा, तुम्हें जीवन भर मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चलना चाहिए. अपने मातापिता की बातों में आने के बजाय मेरी इच्छाओं और भावनाओं को ध्यान में रख कर काम करो. मुझे ही नहीं, पूरे घर को तुम्हारी इस वक्त बहुत जरूरत है. प्लीज मेरे साथ चलो,’’ संजीव भावुक हो उठा.

अपनी आदत के अनुरूप नेहा कुछ कहनेसुनने के बजाय रोने लगी. नीरजा उसे चुप कराने लगीं. राजेंद्रजी सिर झुका कर खामोश बैठ गए. संजीव को वहां अपना हमदर्द या शुभचिंतक कोई नहीं लगा.

कुछ देर बाद नेहा अपनी मां के साथ अंदर वाले कमरे में चली गई. संजीव के साथ राजेंद्रजी की ज्यादा बातें नहीं हो सकीं.

‘‘तुम मेरे प्रस्ताव पर ठंडे दिमाग से सोचविचार करना, संजीव. अभी नेहा की

बिगड़ी हालत तुम से छिपी नहीं है. उसे यहां कुछ दिन और रहने दो,’’ राजेंद्रजी की इस पेशकश को सुन संजीव अपने घर अकेला ही लौट गया.

नेहा को वापस न लाने के कारण संजीव को अपने मातापिता से भी जलीकटी बातें सुनने को मिलीं.

गुस्से से भरे संजीव के पिता ने अपने समधी से फोन पर बात की. वे उन्हें खरीखोटी सुनाने से नहीं चूके.

‘‘भाईसाहब, हम पर गुस्सा होने के बजाय अपने घर का माहौल सुधारिए,’’ राजेंद्रजी ने तीखे स्वर में प्रतिक्रिया व्यक्त की, ‘‘नेहा को आदत नहीं है गलत माहौल में रहने की. हम ने कभी सोचा भी न था कि वह ससुराल में इतनी ज्यादा डरीसहमी और दुखी रहेगी.’’

‘‘राजेंद्रजी, समस्याएं हर घर में आतीजाती रहती हैं. मेरी समझ से आप नेहा को हमारे इस कठिनाई के समय में अपने घर पर रख कर भारी भूल कर रहे हैं.’’

‘‘इस वक्त उसे यहां रखना हमारी मजबूरी है, भाईसाहब. जब आप के घर की समस्या सुलझ जाएगी, तो मैं खुद उसे छोड़ जाऊंगा.’’

‘‘देखिए, लड़की के मातापिता उस के ससुराल के मसलों में अपनी टांग अड़ाएं, मैं इसे गलत मानता हूं.’’

‘‘भाईसाहब, बेटी के सुखदुख को नजरअंदाज करना भी उस के मातापिता के लिए संभव नहीं होता.’’

इस बात पर संजीव के पिता ने झटके से फोन काट दिया. उन्हें अपने समधी का व्यवहार मूर्खतापूर्ण और गलत लगा. अपना गुस्सा कम करने को वे कुछ देर के लिए बाहर घूमने चले गए.

सपना ने नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की है, यह बात किसी तरह उस के मायके वालों को भी मालूम पड़ गई.

उस के दोनों बड़े भाई राजीव से झगड़ने का मूड बना कर मिलने आए. उन के दबाव के साथसाथ राजीव पर अपने घर वालों का दबाव अलग से पड़ ही रहा था. सभी उस पर सविता से संबंध समाप्त कर लेने के लिए जोर डाल रहे थे.

सविता उस के साथ काम करने वाली शादीशुदा महिला थी. उस का पति सऊदी अरब में नौकरी करता था. अपने पति की अनुपस्थिति में उस ने राजीव को अपने प्रेमजाल में उलझा रखा था.

सब लोगों के दबाव से बचने के लिए राजीव ने झूठ का सहारा लिया. उस ने सविता को अपनी प्रेमिका नहीं, बल्कि सिर्फ अच्छी दोस्त बताया.

‘‘सपना का दिमाग खराब हो गया है. सविता को ले कर इस का शक बेबुनियाद है. मैं किसी भी औरत से हंसबोल लूं तो यह किलस जाती है. इस ने तो आत्महत्या करने का नाटक भर किया है, लेकिन मैं किसी दिन तंग आ कर जरूर रेलगाड़ी के नीचे कट मरूंगा.’’

उन सब के बीच कहासुनी बहुत हुई, मगर समस्या का कोई पुख्ता हल नहीं निकल सका.

संजीव की नाराजगी के चलते नेहा ही उसे रोज फोन करती. बातें करते हुए उसे अपने पति की आवाज में खिंचाव और तनाव साफ महसूस होता.

वह इस कारण वापस ससुराल लौट भी जाती, पर राजेंद्र और नीरजा ने उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी.

‘‘वहां के संयुक्त परिवार में तुम कभी पनप नहीं पाओगी, नेहा,’’ राजेंद्रजी ने उसे समझाया, ‘‘अपने भैयाभाभी के झगड़ों व तुम्हारे यहां रहने से परेशान हो कर संजीव जरूर अलग रहने का फैसला कर लेगा. तेरे पास पैसा अपनी गृहस्थी अलग बसा लेने के बाद ही जुड़ सकेगा, बेटी.’’

नीरजा ने भी अपनी आपबीती सुना कर नेहा को समझाया कि इस वक्त उस का ससुराल में न लौटना ही उस के भावी हित में है.

एक रात फोन पर बातें करते हुए संजीव ने कुछ उत्तेजित लहजे में नेहा से कहा, ‘‘कल सुबह 11 बजे तुम मुझे नेहरू पार्क के पास मिलो. हम दोनों सविता से मिलने चलेंगे.’’

‘‘हम उस औरत से मिलने जाएंगे, पर क्यों?’’ नेहा चौंकी.

‘‘देखो, राजीव भैया पर उस से अलग होने की बात का मुझे कोई खास असर नहीं दिख रहा है. मेरी समझ से कल रविवार को तुम और मैं सविता की खबर ले कर आते हैं. उसे डराधमका कर, समाज में बेइज्जती का डर दिखा कर, उस के पति को उस की चरित्रहीनता की जानकारी देने का भय दिखा कर हम जरूर उसे भैया से दूर करने में सफल रहेंगे,’’ संजीव की बातों से नेहा का दिल जोर से धड़कने लगा.

 

सहचारिणी – भाग 3 : क्या सुरुचि अपने मकसद को पाने में कामयाब हो पाई

लेकिन जैसा हर कलाकार होता है, तुम भी बड़े संवेदनशील हो. अपनी छोटी सी असफलता भी तुम से बरदाश्त नहीं होती. तुम्हारी आंखों की उदासी मुझ से देखी नहीं जाती. मैं जी जान से तुम्हें खुश करने की कोशिश करती और तुम सचमुच छोटे बच्चे की तरह मेरे आगोश में आ कर अपना हर गम भूल जाते. फिर नए उत्साह और जोश के साथ नए सिरे से उस काम को करते और सफलता प्राप्त कर के ही दम लेते. तब मुझे बड़ी खुशी होती और गर्व होता अपनेआप पर. धीरेधीरे मेरा यह गर्व घमंड में बदलने लगा. मुझे पता ही नहीं चला कि कब और कैसे मैं एक अभिमानी और सिरफिरी नारी बनती गई.

मुझे लगने लगा था कि ये सारी औरतें, जो धनदौलत, रूपयौवन आदि सब कुछ रखती हैं. वे सब मेरे सामने तुच्छ हैं. उन्हें अपने पतियों का प्यार पाना या उन्हें अपने वश में रखना आता ही नहीं है. मेरा यह घमंड मेरे हावभाव और बातचीत में भी छलकने लगा था. जो लोग मुझ से बड़े प्यार और अपनेपन से मिलते थे, वे अब औपचारिकता निभाने लगे थे. उन की बातचीत में शुष्कता और बनावटीपन साफ दिखता था. मुझे गुस्सा आता. मुझे लगता कि ये औरतें जलती हैं मुझ से. खुद तो नाकाम हैं पति का प्यार पाने में और मेरी सफलता इन्हें चुभती है. इन के धनदौलत और रूपयौवन का क्या फायदा?

उसी समय हमारी जिंदगी में अनुराग आ गया, हमारे प्यार की निशानी. तब जिंदगी में जैसे एक संपूर्णता आ गई. मैं बहुत खुश तो थी पर दिल के किसी एक कोने में एक बात चुभ रही थी. कहीं प्रसव के बाद मेरा शरीर बेडौल हो गया तो? मैं सुंदरी तो नहीं थी पर मुझ में जो थोड़ाबहुत आकर्षण है, वह भी खो गया तो? पता नहीं कहां से एक असुरक्षा की भावना मेरे मन में कुलबुलाने लगी. एक बार शक या डर का बीज मन में पड़ जाता है तो वह महावृक्ष बन कर मानता है. मेरे मन में बारबार यह विचार आता कि तुम्हारा वास्ता तो सुंदरसुंदर लड़कियों से पड़ता है. तुम रोज नएनए लोगों से मिलते हो. कहीं तुम मुझ से ऊब कर दूर न हो जाओ. मैं तुम्हारे बिना अपने बारे में कुछ सोच भी नहीं सकती थी.

अब मैं तुम्हारी हर हरकत पर नजर रखने लगी. तुम कहांकहां जाते हो, किसकिस से मिलते हो, क्याक्या करते हो… यानी तुम्हारी छोटी से छोटी बात मुझे पता होती थी. इस के लिए मुझे कई पापड़ बेलने पड़े, क्योंकि यह काम इतना आसान नहीं था.

अब मैं दिनरात अपनेआप में कुढ़ती रहती. जब भी सुंदर और कामयाब स्त्रियां तुम्हारे आसपास होतीं, तो मैं ईर्ष्या की आग में जलती. तब कोई न कोई कड़वी बात मेरे मुंह से निकलती, जो सारे माहौल को खराब कर देती.

यहां तक कि घर में भी छिटपुट वादविवाद और चिड़चिड़ापन वातावरण को गरमा देता. मेरे अंदर जलती आग की आंच तुम तक पहुंच तो गई पर तुम नहीं समझ पाए कि इस का असली कारण क्या था. तुम्हारी भलमानसी को मैं क्या कहूं कि तुम अपनी तरफ से घर में शांति बनाए रखने की पूरी कोशिश करते रहे. तुम समझते रहे कि घर में छोटे बच्चे का आना ही मेरे चिड़चिड़ेपन का कारण है. उसे मैं संभाल नहीं पा रही हूं. उस की देखभाल की अतिरिक्त जिम्मेदारी के कारण मैं थक जाती हूं, इसीलिए मेरा व्यवहार इतना रूखा और चिड़चिड़ा हो गया है. तुम्हें अपने पर ग्लानि होने लगी कि तुम मुझे और बच्चे को इतना समय नहीं दे पा रहे हो, जितना देना चाहिए.

आज तुम्हारे सामने एक बात स्वीकारने में मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं होगी. भले ही मेरी नादानी पर तुम जी खोल कर हंस लो या नाराज हो जाओ. अगर तुम नाराज भी हो गए तो मैं तुम से क्षमा मांग कर तुम्हें मना लूंगी. मैं जानती हूं कि तुम मुझ से ज्यादा देर तक नाराज नहीं रह सकते. सच कहूं? मेरी आंखें खोलने का सारा श्रेय मेरी सहेली सुरुचि को जाता है. जानते हो कल क्या हुआ था? मुझे अचानक तेज सिरदर्द हो गया था. लेकिन वास्तव में मुझे कोई सिरदर्द विरदर्द नहीं था. मैं अंदर ही अंदर जलन की ज्वाला में जल रही थी. यह बीमारी तो मुझे कई दिनों से हो गई थी जिस का तुम्हें आभास तक नहीं है. हो भी कैसे? तुम्हें उलटासीधा सोचना जो आता नहीं है. मगर सुरुचि को बहुत पहले ही अंदाजा हो गया था.

कल शाम मुझे अकेली माथे पर बल डाले बैठी देख वह मेरे पास आ कर बैठते हुए बोली, ‘‘मैं जानती हूं कि तुम यहां अकेली बैठ कर क्या कर रही हो. मैं कई दिनों से तुम से कहना चाह रही थी मगर मैं जानती हूं कि तुम बहुत संवेदनशील हो और दूसरी बात मुझे आशा थी कि तुम समझदार हो और अपने परिवार का बुराभला देरसवेर स्वयं समझ जाओगी. मगर अब मुझ से तुम्हारी हालत देखी नहीं जाती. तुम जो कुछ भी कर रही हो न वह बिलकुल गलत है. अपने मन को वश में रखना सीखो. लोगों को सही पहचानना सीखो. तुम्हारा सारा ध्यान अपने पति के इर्दगिर्द घूमती चकाचौंध कर देने वाली लड़कियों पर है. उन की भड़कीली चमक के कारण तुम्हें अपने पति का असली रूप भी नजर नहीं आ रहा है. अरे एक बार स्वच्छ मन से उन की आंखों में झांक कर देखो, वहां तुम्हारे लिए हिलोरें लेता प्यार नजर आएगा.

‘‘तुम पुरु भाईसाहब को तो जानती ही हो. वे इतने रंगीन मिजाज हैं कि रंगरेलियों का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. वही क्यों? इस ग्लैमर की दुनिया में ऐसे बहुत सारे लोग हैं. ऐसे माहौल में तुम्हारे पति ऐसे लोगों से बिलकुल अलग हैं. पुरु भाई साहब की बीवी, बेचारी मीना कितनी दुखी होगी अपने पति के इस रंगीन मिजाज को ले कर. सब के बीच कितनी अपमानित महसूस करती होगी. किस से कहे वह अपना दुख? तुम जानती नहीं हो कि कितने लोग तुम्हारी जिंदगी से जलते हैं.

‘‘पुरु भाईसाहब जैसे लोग जब उन्हें गलत कामों के लिए उकसाते हैं. तब जानती हो वे क्या कहते हैं? देखो, घर के स्वादिष्ठ भोजन को छोड़ कर मैं सड़क की जूठी पत्तलों पर मुंह मारना पसंद नहीं करता. मेरी पत्नी मेरी सर्वस्व है. वह अपना सब कुछ छोड़छाड़ कर मेरे साथ आई है और अपना सर्वस्व मुझ पर निछावर करती है. उस की खुशी मेरी खुशी में है. वह मेरे दुख से दुखी हो कर आंसू बहाती है. ऐसी पत्नी को मैं धोखा नहीं दे सकता. वह मेरी प्रेरणा है. मेरी और मेरे परिवार की खुशहाली उसी के हाथों में है.’’

फिर सुरुचि ने मुझे डांटते हुए कहा ‘‘तुम्हें तो ऐसे पति को पा कर निहाल हो जाना चाहिए और अपनेआप को धन्य समझना चाहिए.’’

उस की इन बातों से मुझे अपनेआप पर ग्लानि हुई. उस के गले लग कर मैं इतनी रोई कि मेरे मन का सारा मैल धुल गया और मुझे असीम शांति मिली. मुझे ऐसा लगा जैसे धूप में भटकते राही को ठंडी छांव मिल गई. मैं तुम से माफी मांगना चाहती हूं और तुम्हारे सामने समर्पण करना चाहती हूं. अब ये तुम्हारे हाथ में है कि तुम अपनी इस भटकी हुई पुजारिन को अपनाते हो या ठुकरा देते हो.

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