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Story In Hindi: कोचिंग के पैसे

Story In Hindi: ‘‘तो आप और पैसे नहीं देंगे?’’ अशोक ने पूछा.

‘‘अरे, कहां से ला कर दूं तुम्हें. ये 10,000 रुपए कम हैं क्या… अब तुम अपने खर्च बढ़ा लो, तो मैं क्या कर सकता हूं. और अब हम से नहीं होगा,’’ अशोक के पिताजी ने कहा.

‘‘दे दीजिए न. अब बाहर रहता है, तो खर्चे तो होंगे ही,’’ अशोक की मां मन्नू देवी जब अपने पति बजरंगी बाबू से बोलीं, तो वे मानो गरजने लगे, ‘‘अभी खेती के पीछे इतने खर्चे तुम लोगों को नहीं दिख रहे क्या…

‘‘पहले ही कम बारिश के चलते खेती के पटवन के पीछे डीजल खरीदने में ही हालत खराब थी. भाड़े पर ट्रैक्टर लिया, तो खेत की जुताई हुई.

‘‘फिर बीज और खाद के पीछे अच्छीखासी रकम खर्च हो गई. अभी फसल थोड़ी ठीक लग रही, तो कीड़ों का प्रकोप शुरू हो गया है. उस के लिए भी दवाओं का छिड़काव करना होगा.

‘‘वासंती फसल में जो थोड़ीबहुत रकम आई थी, वह सब इन सब के पीछे स्वाहा हुई जा रही है. भंडार में देख लो जा कर. मुश्किल से 4-6 बोरा अनाज होगा. और शारदीय फसल तैयार होने में 2-4 महीने तो लग ही जाएंगे. यह खेती न हुई, खर्चों का घर हो गया. और इस को शहर की हवा लग रही है…’’

‘‘अभी पढ़ रहा है, तो खर्चे होंगे ही…’’ मन्नू देवी ने भी जवाब दिया, ‘‘यह खर्चा कहां गलत हो रहा है. कल को इस की नौकरी लगी, तो भरभर थैली रुपए बटोरते रहिएगा.’’

‘‘भरभर थैली… इतना आसान है नौकरी, जो मिल जाएगी. देख तो रहा हूं औरों को, पढ़लिख कर मारेमारे फिर रहे हैं,’’ बनारसी बाबू बोले.

‘‘अशुभ क्यों बोलते हैं जी. जो सब के साथ हुआ, वह कोई जरूरी थोड़े ही है कि हमारे साथ भी हो. शुभशुभ बोलो जी,’’ मन्नू देवी ने कहा.

‘‘सही बोल रहा हूं. और जो इस की नौकरी लगी, तो क्या सब हमारी ही जेब में रख जाएगा… इसी गांव में नौकरी करने वालों को भी देख रहा हूं कि वे क्या करते हैं…’’ बनारसी बाबू गुस्से में बोले.

‘‘फिरफिर वही बात. अरे, हम अपना फर्ज निभा दें, यही बहुत है. अभी हमारा जांगर चलता है, फिर बेटों से आस क्या रखना,’’ मन्नू देवी ने कहा.

अंदर कमरे में अपना बैग ठीक करता हुआ अशोक भनभना रहा था, ‘‘जब खर्चा नहीं दे सकते, तो बाहर शहर में पढ़ाने का शौक ही नहीं रखना था. अब वहां खर्चे हैं, तो हैं. उसे वह कैसे रोक सकता है. कुछ तो शहर का स्टैंडर्ड रखना ही होता है. अभी से उधर ध्यान नहीं दिया, तो आगे का भगवान ही मालिक है.’’

‘‘थोड़ा सम झा करो बाबू मेरे,’’ मां मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘बाप हैं तुम्हारे, कोई दुश्मन नहीं हैं. थोड़ा तुम भी सम झा करो कि वे ठीक कह रहे हैं कि नहीं. हर बाप का शौक होता है कि उस का बेटा खूब पढ़ेलिखे. इस में गलत क्या है?’’

‘‘तो मैं भी गलत कहां हूं मां. वहां शहर में जैसेतैसे तो नहीं रहा जा सकता न… सुमिरन साव के बेटे रतन को देख लो. ठाट से रहता है वहां. उस के जैसा खर्च करना तो मैं सोच भी नहीं सकता. फिर भी ढंग से रहना तो पड़ेगा ही. कोचिंग और पढ़ाई के अलावा खानेपीने, कौपीकिताब, टैंपोभाड़ा के खर्चे को कौन रोक सकता है…’’

अशोक अभी भी तैश में था, ‘‘वहां लड़के ही नहीं, लड़कियां भी साथ पढ़ती हैं. उन के साथ फटेपुराने कपड़े पहन कर तो नहीं रहा जा सकता न. अभी पूजा का मौसम है. मु झे भी नए कपड़े खरीदने ही होंगे. मैं खुद सस्ते में काम चलाता हूं. मगर तुम लोगों को लगता है कि मैं वहां ऐयाशी करता हूं.’’

‘‘ये कौन कह रहा है रे. 10,000 में आजकल क्या होता है…’’ मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘मैं अपने राजा बेटा को नहीं जानती क्या कि कितने कम खर्च में वह काम चलाता है.’’

‘‘साफसाफ कह देता हूं कि इस बार जो नए कपड़े नहीं खरीद पाया, तो छठ और दीवाली पर नहीं आऊंगा,’’ अशोक ने कहा.

मन्नू देवी के तो हाथपैर फूल गए. बाप रे, दीवाली और छठ जैसे पर्व में यह नहीं आया, तो किस के बूते वह इसे पार घाट लगाएगी. घर की साफसफाई से ले कर, छठ त्योहार का सारा इंतजाम तक यही दौड़दौड़ कर पूरा करता है. 2 साल पहले एक बार नहीं था, तो उन्हें कितनी परेशानी हुई थी.

इस के बाबूजी को तो जैसे कोई मतलब ही नहीं कि घर की साफसफाई कैसे होगी, और कि क्याक्या सामान चाहिए. उस के दोनों बच्चे अरुण और नन्ही इतने छोटे हैं कि उन्हें बाहर भेजने में डर लगता है. खेत से पूजा के लिए गन्ना लाने से ले कर, पूजा के लिए मौसमी फलों तक के इंतजाम अशोक कितनी तेजी से कर जाता है.

छठपूजा के समय तो मन्नू देवी घर में तकरीबन 2 दिनों तक पूजा के पकवान, ठेंकुआ वगैरह बनाने में बिजी हो जाती हैं कि बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसे में निर्जला उपवास किए बाहर निकलने की ताकत भी कहां रह जाती है.

घर से घाट और घाट से घर दौरा को सिर पर रख कर 3 किलोमीटर दूर नदी तक आनाजाना मामूली बात है क्या. वहां भी इतनी भीड़ और गहमागहमी रहती है. मन्नू देवी यह रिस्क तो नहीं ही ले सकतीं. ऐसे में अशोक नहीं आया, तो उन का मरण हो जाएगा.

बजरंगी बाबू खेतों की ओर जा रहे थे. मन्नू देवी दोबारा पति के पास आ कर निहोरा करने लगीं, तो वे चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे पास अभी नकद कुछ नहीं है. उस को कहो कि एक मन अनाज निकाल कर बेच आए और पैसा ले जाए.’’

अब यहां कौन सा तराजूबटखरा रखा था, जो कोई एक मन अनाज तुलवाता. मन्नू देवी आननफानन बगल में रह रहे भगलू राम को बुला लाईं. उस के सिर पर एक बोरा अनाज रखवाया और अशोक को आवाज देने लगीं, ‘‘अशोक, जरा इधर आना. यह अनाज ले कर सुमिरन साव के आढ़त पर तुलवा कर पैसे ले आना.

बाकी बचा अनाज यहीं रखवा देना.’’

अशोक सारी बातें सुन चुका था, इसलिए बैग में कपड़े रखना छोड़ बाहर निकल आया.

‘‘बाबूजी ने एक मन अनाज बेचने को कहा है… मन्नू देवी बोलीं, ‘‘बाकी अनाज इसी भगलू के सिर पर रख कर वापस ले आना.’’

बाजार में आढ़त पर बोरे का मुंह खुलवा कर गेहूं के दानों को देख कर सुमरिन साव मुंह बनाते हुए बोले, ‘‘घटिया माल है. इस को तो 15 रुपए किलो की दर से ही लेना होगा.’’

‘‘अरे, अभी तो यह 20 रुपए किलो की दर से चल रहा है,’’ अशोक ने हैरत से कहा.

‘‘इस सरकार ने फ्री राशन बांट कर सारा धंधा मंदा कर दिया है,’’ सुमिरन साव अपने चिड़चिड़े अंदाज में बोला, ‘‘हम भी कौन सा खैरात खाने वाले हैं.’’

‘‘खैरात खाने की तुम्हें क्या जरूरत. ऐसे ही नहीं तुम ने बिल्डिंगें और गोदाम बना लिया है…’’ अशोक बुदबुदाया, यही अनाज शहरों में आटे के रूप में 40 रुपए किलो की दर से उसे खरीदना होता है. लेकिन गांव में कोई ढंग का खरीदार भी तो नहीं. 40 किलो अनाज के 600 रुपए अशोक के हाथ में आए, तो वह भुनभुनाया, ‘‘इन 600 रुपए में क्या होगा. एक जींस पैंट ही 1,000 रुपए में आती है. उस पर 3-4 टीशर्ट लेनी हैं, वे भी 1,000 रुपए की पड़ जाएंगी. एक नए डिजाइन का जूता भी लेना है.

‘‘इस के अलावा बाकी के खर्चे अपनी जगह. सैलून में हेयर कटिंग, 3-4 तरह के इत्र, शैंपू, साबुनतेल वगैरह के भी तो खर्चे हैं.’’

अभी तो अशोक ने अपने खर्चे में कौपीकलम और किताब को जोड़ा ही नहीं. 1-1 गाइड ही 500 में आती है. उस ने एक स्टडी लाइब्रेरी में एडमिशन ले रखा है, जिस का मासिक किराया ही 1,000 है. फिर लौज के कमरे का 4,500 का किराया है. ढाबे पर जो वह नियमित दोनों टाइम भोजन करता है, उसे 3,000 महीना देना होता है.

कोचिंग आनेजाने के लिए जो टैंपो का भाड़ा है, उस में भी 1,000 रुपए निकल जाते हैं. इतना तब है, जब वह कितनी कंजूसी के साथ काम चलाता है. और बाप है कि 10,000 से एक रुपया ज्यादा देने को तैयार नहीं है.

अशोक ने तत्काल सारे गेहूं तुलवा दिए. कोई 100 किलो थे. सुमिरन साव ने उसे 1,500 सौ पकड़ा दिए.

घर वापस आ कर अशोक ने देखा, मां काम पर लगी थीं. भगलू अभी भी वहीं खड़ा था. उसे 20 रुपए उस के मेहनताने के देने थे.

अचानक अशोक ने भगलू से कहा, ‘‘एक बोरा अनाज और निकालो और मेरे साथ चलो.’’

सुमिरन साव के यहां वह अनाज तुलवा कर उस ने पैसे लिए. अब उस के पास 3,000 रुपए थे.

बाबूजी ने अशोक को मासिक खर्च के 10,000 पहले ही दे दिए थे. अब ये 3,000 और हैं. उस ने विचार किया कि इतने पैसे से उस का ऐक्स्ट्रा काम चल जाएगा.

अशोक भगलू को 50 का नोट थमाते हुए बोला, ‘‘मां और बाबूजी को मत बताना कि हम ने एक बोरा अनाज और निकाला है. वे यहां कौन गिनती करने आएंगे कि कितने बोरा अनाज निकला है. इतना अनाज तो यहां चूहे और कीड़े खा जाते हैं.’’

भगलू कुछ समझा, कुछ नहीं समझा. उसे जल्दीजल्दी ताड़ीखाने जो जाना था. उस के हाथ में 50 का एक करारा नोट फड़फड़ा रहा था. Story In Hindi

Best Hindi Story: ब्रा

Best Hindi Story: ‘‘उफ, इन औनलाइन शौपिंग वालों ने तो हमारा सारा कामधंधा ही चौपट कर दिया है,’’ सिलाई मशीन के पायदान पर पैर रखे हुए नौरीन अपनेआप से बुदबुदाते हुए बोल रही थी.

नौरीन की परेशानी की वजह यह थी कि अब उस के पास लोग कपड़े सिलवाने कम आते थे. हर हाथ में मोबाइल है. बस, मोबाइल उठाया और अपनी पसंद के कपड़े औनलाइन मंगवा लिए.

भारत और नेपाल की सीमा पर बसा हुआ यह कसबा रौनक से भरा रहता था. सीमा पर बसे होने के चलते चहलपहल बराबर बनी रहती थी. इस कसबे में जरूरत की सारी चीजें बड़ी आसानी से मिला करती थीं.

इस कसबे के जहीन बाग नामक महल्ले में नौरीन और उस की छोटी बहन रोशनआरा रहती थीं. नौरीन 22 साल की हो गई थी और सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थी. कई बार तो उस ने सोचा कि सिलाई का काम बंद कर के कोई परचून की दुकान ही खोल ली जाए, कम से कम बोहनी तो हो जाया करेगी.

सिलाई के काम में तो कभीकभार कोई ग्राहक आता ही नहीं और घर से सिलाई का काम करने वाली नौरीन के पास कपड़े सिलवाने के ग्राहक के रूप में रजिया, फातिमा, सुनीता जैसे आसपास के दूसरे लोग ही आते थे. इन में से बहुत सी औरतें तो इतनी शर्मीली होती थीं कि कुरती का नाप देने में भी शर्म करती थीं.

इस बात पर नौरीन मुसकराते हुए कहती, ‘‘घबराओ मत भाभी, घर में कोई मर्द नहीं है और न ही कोई कैमरा लगा हुआ है, आराम से नाप दो.’’

नौरीन ने 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि घर का खर्चा चलाने के लिए उस का कमाना जरूरी था, इसलिए उस ने सिलाई के काम में अपनी अम्मी का हाथ बंटाना शुरू कर दिया. पहले तो अम्मी के पास खूब काम आता था. सलवारसूट, ब्लाउज के अलावा छोटे बच्चों की कमीजें तक सिलती थीं अम्मी.

कितनी लगन से नौरीन ने सिलाई का काम सीखा और जब अम्मी कमर दर्द से दोहरी हो जातीं, तो नौरीन उन्हें आराम करने को कहती और खुद मशीन के पायदान पर पैर जमा कर बैठ जाती और हलकेहलके पैर चला कर सिलाई करती.

उम्र के 22वें साल में नौरीन के कुंआरे और गोरे चेहरे पर चमक आने लगी. तभी उस की जिंदगी में अहमद की मुहब्बत ने दस्तक दी.

अहमद 25 साल का एक नौजवान था, जो लखीमपुर शहर का रहने वाला था और डिलीवरी बौय का काम करता था. काम के सिलसिले में नौरीन से निगाहें मिलीं और दोनों कब इश्क में गिरफ्तार हो गए, पता ही नहीं चला.

हालांकि, नौरीन की अम्मी को भी इन दोनों के फलतेफूलते इश्क का अहसास हो गया था, पर उन्होंने कभी कोई रोकटोक नहीं लगाई.

‘‘नौरीन के अब्बू नहीं रहे, भला इस उम्र में मैं कहां लड़का ढूंढ़ने जाऊंगी… अच्छा है बच्चे अपने मन से ही अपना साथी चुन लें तो…’’ अपनेआप से अकसर कह उठती थीं नौरीन की अम्मी.

दिन का 10 बजने को थे. नौरीन के मोबाइल पर अहमद का फोन आया, ‘शहर जा रहा हूं. मेरा दोस्त राज जिस होटल में काम करता है, वहां पर बड़े लोगों का सैमिनार है. हम दोनों चलते हैं. मुझे शहर में कुछ देर का काम है, फिर हम दोनों सैमिनार में बैठेंगे, खापी कर शाम तक वापस आ जाएंगे,’ अहमद ने एक सांस में यह बात कह दी थी.

मौसम भी सुहावना था और अहमद के साथ घूमने जाने की बात सुन कर नौरीन का मन भी मचल उठा था.
नौरीन ने अम्मी को बता दिया था कि वह अहमद के साथ शहर तक जा रही है, शाम तक वापस आ जाएगी.

अम्मी ने नौरीन के अहमद के साथ जाने पर कोई एतराज नहीं जताया और कहा, ‘‘अपना ध्यान रखना और शाम को जल्दी वापस आना.’’

अहमद और नौरीन बाइक पर बैठ कर शहर की ओर जाने लगे. शहर यहां से 30 किलोमीटर दूर था, पर नौरीन सोच रही थी कि काश शहर कभी न आए, बस वह यों ही अहमद के पीछे बैठ कर सफर करती रहे.

‘ग्रैंड रौयल्स’ नाम के एक होटल में वे दोनों पहुंच गए थे. अहमद ने अपने दोस्त राज से मुलाकात की और फिर वे तीनों उस हाल में गए, जहां पर सैमिनार चल रहा था. अहमद और नौरीन एकसाथ बैठ गए थे.

मंच पर 35 साल की एक खूबसूरत सी महिला ने बोलना शुरू किया, ‘‘हमारे इस सैमिनार का विषय कुछ हट कर है. दरअसल, यह कार्यक्रम महिलाओं की ‘ब्रा’ पर है. शहर में तो महिलाएं जागरूक हैं, पर हमारा अभियान गांव और कसबों की महिलाओं के बीच जागरूकता फैलाने का है, जो शर्म के चलते या तो ब्रा नहीं खरीदती हैं या फिर गलत ढंग की ब्रा पहनती हैं, जिस के चलते उन्हें पीठ दर्द तक का सामना करना पड़ता है…’’

नौरीन यह सब सुन कर पहले तो शरमाने लगी, पर जब उस महिला ने आगे काम की बातें बतानी शुरू कीं, तो उसे अच्छा लगने लगा.

‘‘हमें कसबों और गांवों की महिलाओं के मन से ब्रा के लिए छिपी शर्म निकालनी होगी. अरे भई, ब्रा महज कुछ कपड़ों का जोड़ ही तो है, जिसे हम अपने शरीर को सपोर्ट देने के लिए कुरती या ब्लाउज के अंदर पहनते हैं. अब भला इसे छिपा कर सुखाना या फिर इस की स्ट्रिप को दिख जाने से रोकना, इस में भला झिझकने की क्या बात है?’’ वह महिला बड़े अच्छे ढंग से समझा रही थी.

नौरीन गौर किया कि पीछे के बैनर पर उन की संस्था का नाम ‘नारी मन’ लिखे होने के साथ एक संदेश भी लिखा हुआ था, ‘हमारी ब्रा, हमारा शरीर, एक अभियान है. कब बदलेगा समाज, सवाल अनजान है’.

नौरीन ने बैनर पर लिखा हुआ मैडम की संस्था का मोबाइल नंबर नोट कर लिया और अहमद और नौरीन चाय और नाश्ता करने के बाद वापस कसबे की ओर चल दिए.

शाम को जब नौरीन घर पहुंची, तो उस ने अपनी अम्मी से उन की पुरानी संदूकची खोलने को कहा, तो अम्मी जरा चौंकीं, ‘‘अब भला तुझे उस संदूकची से क्या काम पड़ गया?’’

बदले में नौरीन ने मुसकराते हुए उस संदूकची को बिस्तर के नीचे से घसीटते हुए बाहर निकाला और खोलने लगी. उस संदूकची में अम्मी की उन की जवानी के दिनों की सैटिन की ब्रा लपेट कर रखी हुई थी.

नौरीन ने उस ब्रा को खोला और उलटपलट कर देखने लगी. उसे ऐसा करते देख कर अम्मी शर्म से गड़ गईं, ‘‘अरे मुई, यह तुझे क्या हो गया?’’ अम्मी अब भी शर्म से लाल थीं.

अम्मी को पुरानी बात याद आई, जब यह ब्रा नौरीन के अब्बू बाजार से खरीद कर लाए थे और कई बार अकेले में इसे पहन कर दिखाने के लिए कहा था, मगर उस जमाने में संयुक्त परिवार में रहने वाली अम्मी के लिए ऐसी डिजाइनर और सुर्ख लाल रंग की ब्रा को पहनने के बाद धोने और सुखाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था, इसलिए नौरीन की अम्मी कभी भी यह ब्रा पहन नहीं सकीं और कपड़ों के बीच लपेट कर इस संदूकची में रख दिया था.

नौरीन ने अम्मी की लाल ब्रा पकड़ कर हवा में लटका दी और उसे चारों तरफ से देखने लगी. उस की यह हरकत अब अम्मी को नागवार गुजर रही थी. उन्होंने अब नौरीन को डांटना चाहा, पर नौरीन बोल पड़ी, ‘‘अम्मी, मैं सोच रही हूं कि क्यों न हम ब्रा सिलने का ही काम शुरू कर दें…’’

नौरीन की यह बात सुन कर अम्मी ने अपना माथा पीट लिया, पर नौरीन ने उन्हें समझाया कि हमारे कसबे में रेडीमेड कपड़ों सभी दुकानों पर मर्द बैठे हैं. ज्यादातर महिलाएं उन से ब्रा खरीदते समय इतनी संकोच से भरी रहती हैं कि वे खरीदते समय ब्रा का साइज और क्वालिटी देखती तक नहीं और गलत साइज की ब्रा पहनते रहने से उन के शरीर का आकार खराब हो जाता है और कई बार वे पीठ दर्द से भी परेशान रहती हैं.

इस के बाद नौरीन बोली, ‘‘अम्मी, क्या हम घर पर इसी सिलाई मशीन से रेडीमेड जैसी दिखने वाली ब्रा सिल सकती हैं?’’

नौरीन ने पूछा तो अम्मी ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘अगर घर पर कुछ जरूरी सामान जैसे इलास्टिक, हुक और प्लाटिक के कुंडे वगैरह खरीद लिए जाएं, तो घर पर रेडीमेड जैसी ब्रा बनाई जा सकती हैं, क्योंकि कुछ कपड़ों की खास तरह की कटिंग को जब सफाई से सिला जाता है, तो ब्रा तैयार हो जाती है और इस में और ज्यादा खूबसूरती लाने के लिए इस के कपड़े पर फूलबूटे और चिकन की कढ़ाई तक की जा सकती है.’’

अम्मी को भी नौरीन की बातें अब जंच तो रही थीं, पर उन के मन में शक था कि ये ब्रा उन से औरतें खरीदेंगी भी या नहीं?

‘‘अरे अम्मी, क्यों नहीं खरीदेंगी? जब उन को अच्छे कपड़े की ब्रा हमारे पास ही मिलेगी, जिसे वे कमरे में आराम से पहन कर आगेपीछे से चैक कर लेंगी और अपने बदन पर आराम महसूस करेंगी, तो भला कौन नहीं खरीदना चाहेगा…’’ नौरीन ने उम्मीदभरी बातों से अम्मी का मन मोह लिया था.

नौरीन ने अब उस ‘नारी मन’ संस्था की आंचल मैडम को फोन लगाया और अपने और अपने कसबे के बारे में सबकुछ बताते हुए उन्हें ब्रा के बिजनैस के बारे में बताया.

नौरीन का आइडिया सुन कर आंचल मैडम बहुत खुश हुईं और उन्होंने नौरीन को खूब सराहा और ब्रा सिलने के सामान से ले कर हरमुमकिन मदद देने का वादा किया.

नौरीन ने अपने पते पर ब्रा सिलने का कुछ सामान मंगवा लिया था. बस, अब चुनौती थी कि इन सब सामान को साथ ले कर बढि़या और आरामदायक ब्रा कैसे बनाई जाए. सो, इस के लिए नौरीन ने सिलाईकढ़ाई विशेषांक की पुरानी पत्रिकाएं पढ़ीं, कुछ मदद इंटरनैट से ली और बाकी का काम नौरीन की अम्मी ने आसान कर दिया.

दिनरात की मेहनत के बाद कुछ ब्रा झने कपड़े की तो कुछ कौटन की तैयार हो गई थीं. अब बारी थी कस्टमर ढूंढ़ने की, तो इस के लिए नौरीन ने एक तार पर ब्रा को लटका दिया और बड़े अक्षरों में लिख दिया, ‘यहां महिलाओं की पसंद के अनुसार हर साइज की ब्रा बनाई जाती हैं’.

जब भी कसबे की औरतें अपने सूट वगैरह का नाप देने आतीं, तो उन की नजर इस वाक्य पर जरूर पड़ती.

‘‘तो क्या आप ब्रा भी सिलती हैं?’’ एक दिन फरजाना ने हिम्मत कर के पूछ ही लिया.

फरजाना 40 साल की मोटी औरत थी और अभी तक की जिंदगी में मारे शर्म के वह सही ब्रा का चुनाव नहीं कर पाई थी, इसलिए उस का शरीर हमेशा ढलकाढलका रहता था.

नौरीन फरजाना अंदर कमरे में ले गई और एक आदमकद शीशे के सामने खड़ा कर दिया और ढेर सारी ब्रा उस के सामने रख दीं.

‘‘हमारे यहां आप बेखटक अपनी पसंद की ब्रा पहन कर ट्राई करो और पसंद आए तभी खरीदो,’’ नौरीन ने कहा और कमरे से बाहर चली गई.

फरजाना को यह अहसास पहली बार मिल रहा था. कितना हलकापन सा महसूस हो रहा था उसे जब उस ने अपने पसंदीदा गुलाबी रंग की ब्रा को अपने तन पर कसा और हुक लगाने के बाद चारों तरफ से अपने मोटे शरीर को निहारा. आज पहली बार उस की पीठ और कंधों को आराम मिल रहा था. उस ने शीशे में पहली बार अपना यह रूप देखा और शरमा गई. कितनी खूबसूरत लग रही थी वह इस गुलाबी ब्रा में.

फरजाना के द्वारा नौरीन के काम की तारीफ सुन कर और भी औरतें नौरीन के पास पहुंचीं और धीरेधीरे ब्रा बेचने का काम तेजी से चल निकला. अब तो जो औरत सिलाई करवाने आती कम से कम 2-3 ब्रा तो जरूर ही खरीदती.

नौरीन और उस की अम्मी बराबर सिलाई करती रहतीं, पर फिर भी नौरीन को इतना काम और उस से होने वाली आमदनी भी 3 लोगों का परिवार चलाने के लिए काफी नहीं लग रही थी.

इस के लिए नौरीन ने अहमद की मदद ली और कुछ छोटेछोटे परचे छपवाए और कसबे में या लखीमपुर शहर में जहां भी अहमद डिलीवरी करने जाता, तो ये परचे भी डिलीवरी करते समय ग्राहक को पकड़ा देता और मुसकरा कर कहता, ‘‘जी हमारे घर की औरतों ने काम शुरू किया है. एक बार सेवा का मौका जरूर दें.’’

यह कदम तो काफी आशावादी था, पर नौरीन को इस का फायदा तब दिखा, जब उस की दुकान में औरतों की तादाद में इजाफा दिखा.

अब तो अम्मी सिलाई मशीन पर बैठी रहतीं और नौरीन बराबर औरतों के ब्रा का नाप लेती रहतीं. यहां पर औरतों को बड़ा फायदा यह मिल रहा था कि वे अपने पसंद की ब्रा सिलवा सकती थीं. मसलन कपड़े और रंग का चुनाव, सीने पर आने वाले कप का चुनाव और स्ट्रिप की मोटाई और पतलापन… ये सब वे अपनी पसंद के मुताबिक बनवा सकती थीं.

अब तो नौरीन ने अपनी दुकान का नाम भी रख दिया था और यह नाम था ‘34 बी’.

यह एक ब्रा के साइज का नंबर होता है, इसलिए पहलेपहल तो नौरीन के काम का मजाक बना. अम्मी ने भी नौरीन से कहा कि वह कम से कम नाम तो कुछ ढंग का रख ले, महल्ले वाले क्या कहेंगे?

पर नौरीन ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘यह नाम मुझे महिलाओं की सोच बदलने में मदद करेगा. ब्रा पहनना या ब्रा का दिख जाना कोई गलत बात तो नहीं, जो इसे छिपाया जाए.’’

नौरीन ने अपना काम फैलाने और जागरूकता जगाने के लिए कसबे के ‘कन्या पाठशाला’ की प्रिंसिपल के साथ मिल कर लड़कियों और टीचरों के साथ एक गोष्ठी का आयोजन किया और लड़कियों को सही साइज की ब्रा पहनने के लिए बढ़ावा दिया.

बुटीक नंबर ‘34 बी’ का नाम अब कसबे और कसबे के बाहर भी फैल रहा था.

अम्मी ने एक बार फिर से नौरीन से बुटीक का नाम बदलने के लिए भी कहा पर नौरीन नहीं मानी. ‘34 बी’ नाम रखना तो एक बहाना है, असली मकसद तो औरतों की झिझक को बाहर भगाना है.

नौरीन और अम्मी के इस बुटीक की धूम चारों ओर छा चुकी थी. इसी बीच नौरीन के पास आंचल मैडम का फोन आया कि नौरीन और उस की अम्मी को उन की संस्था ने महिलाओं की शर्म और झिझक खत्म करने का अभियान चलाने के लिए सम्मानित करने का निश्चय किया है और इस महीने की 10 तारीख को उन दोनों लोगों को लखीमपुर में ‘इंदिरा आडिटोरियम’ में पहुंचना है, जहां पर उन्हें सम्मानित किया जाएगा.

नौरीन के लिए तो यह अनुभव नया था ही, पर इस से भी ज्यादा खुशी उस की अम्मी को मिल रही थी.

उन्होंने एक ऐसे समय को जिया था, जब किसी के लिए ब्रा बोलना या ब्रा को खुले में सुखाना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी और आज उन की बेटी की छोटी सी कोशिश ने खुद उके लिए तो रोजगार ढूंढ़ा ही है, साथ ही साथ बहुत सारी महिलाओं की झिझक खत्म करने में मदद की है और इस बात के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है.

आडिटोरियम में तालियों की गूंज थी. अहमद ने भी आज काम से छुट्टी ले ली, ताकि वह नौरीन को सम्मानित होते हुए देख सके. नौरीन की छोटी बहन रोशनआरा को भी अहमद साथ ले आया था.

नौरीन का नाम पुकारा गया और उसे सम्मानित किया गया. उसे माइक पर कुछ बोलने को कहा गया. नौरीन ने एक कविता सुनाई :

‘‘ये स्तन नहीं, ये संकल्प हैं.

ये बोझ नहीं, ये अधिकार हैं.

ये ब्रा खुद अपनी भाषा हैं,

जहां औरत खुद अपनी परिभाषा है.

छिपाने की नहीं, अब दिखाने की बारी है.

ये ब्रा नहीं हमारी इंकलाबी सवारी हैं.’’

तालियां लगातार बज रही थीं. नौरीन का एक छोटा सा कदम कसबे की औरतों और पूरी नारी जाति के लिए एक बड़ी छलांग थी. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: एक औरत का प्रेम मुकाम

Hindi Romantic Story: ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ उस घर के अहाते से रोज ऐसी ही मारपीट की आवाज सुनाई पड़ती थी. वह नया किराएदार था. शुरू में पड़ोसियों ने किसी के घरेलू मामले से दूर रहना ही बेहतर समझा. यही सोच कर कि किराएदार शराबी होगा. शाम को शराब पी कर आता होगा और अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता होगा. लेकिन जब रोजरोज ऐसा होने लगा, तो पड़ोसियों का सब्र जवाब देने लगा.

दुनिया की रीत है कि अपने आंगन में क्या हो रहा है, इस को कोई नहीं देखता, लेकिन दूसरे के घर में एक बरतन भी खड़क जाए, तो सब के कान खड़े हो जाते हैं.

मामले को जानने के लिए किसी पड़ोसी ने दीवार के ऊपर से झांक कर देखा, तो किसी ने छत पर खड़े हो कर. मामले को जान कर कोई हंसा, तो कोई अचंभे से मुंह खोल कर रह गया. चटकारों का बाजार गरम हो गया.

पर यह मामला तो बिलकुल उलटा था. यह आदमी नहीं, बल्कि औरत थी, जो हर शाम को अपने आदमी की कुटाई करती थी. इस में अचंभे की बात यह भी थी कि आदमी इस कुटाई का कोई विरोध नहीं करता था.

वह सिर झुका कर अपनी पत्नी की ज्यादती को ऐसे सहन करता था, जैसे उस की पत्नी को उसे इस तरह पीटने का ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ हो, जैसे किसी लेखक और प्रकाशक का किसी किताब पर होता है.

पड़ोसियों को बैठेठाले हंसनेहंसाने, चटकारे लेने और मनोरंजन का काम कम से कम कुछ दिनों के लिए मुफ्त में ही मिल गया था. आज तक उन्होंने पतियों के द्वारा पत्नियों की पिटाई होने के किस्से बहुत सुने और देखे थे, लेकिन पत्नी के द्वारा पति की पिटाई होते वे पहली बार देख रहे थे. वह भी एकाध दिन नहीं, रोजाना शाम को तय समय पर और पिटाई के बाद निपट निल बटा सन्नाटा, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

ये पति पत्नी कोई और नहीं, सुधाकर और सविता थे. सुधाकर अपने मातापिता की एकलौती औलाद था. वह हरियाणा के यमुनानगर की थापर पेपर मिल में अपने पिता की सिफारिश पर लैब असिस्टैंट की नौकरी पा गया था.

उस की तनख्वाह कम थी, लेकिन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में नौकरी पक्की थी, इसलिए उस की एमए पास पढ़ीलिखी लड़की सविता से शादी हो गई थी.

सविता देखने में सुंदर, सुशील और मासूम दिखाई पड़ती थी, लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि असल में वह ऐसी थी नहीं. सासबहू के झगड़े वैसे तो आम बात है, लेकिन सविता ने तो जैसे ससुराल में आते ही इस जंग का आगाज कर दिया हो.

सुधाकर ने हरमुमकिन तरीके से सविता को समझाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. वह यह समझाने में नाकाम रहा कि सविता आखिर उस की मां से लड़ती ही क्यों है. वह कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर उस की मां से भिड़ जाती थी, फिर तो दोनों तरफ से जबानी जंग शुरू हो जाती थी.

सुधाकर समझ नहीं पाया कि आखिर सविता चाहती क्या है? वह मां को समझाता तो तड़ाक से जवाब मिलता, ‘‘औरत के गुलाम, पिट्ठू. शर्म नहीं आती तुझे. अपनी औरत को तो समझाने से गया, मुझ बुढि़या को समझाने चला है, नालायक, कलयुगी.’’

यह सुन कर सुधाकर सहम जाता. अपनी औरत को समझाता, तो वह उसे उलटे हाथों लेती, ‘‘जाओ, मां के पेटीकोट में जा कर छिप जाओ. वहां से बाहर निकले ही क्यों थे? पूरी जिंदगी वहीं रहते.’’

सुधाकर मां और पत्नी के बीच चक्की के 2 पाटों के बीच जैसा पिसता. घर की इस कलह के बीच सुधाकर
2 बच्चों का पिता बन गया, एक बेटी और एक बेटा.

लेकिन जब घर में कलह की हद हो गई तो एक दिन उस के पिता ने समझाया, ‘‘सुधाकर, तेरी मां और बहू की खटपट से मैं तंग आ गया हूं. तू तो ड्यूटी पर चला जाता है, लेकिन मेरा जीना मुहाल हो जाता है. तू हमें कहीं किराए पर कमरा ले कर दे दे, जिस से यह बुढ़ापा चैन से कटे.’’

यह सुन कर सुधाकर सोच में पड़ गया. वह बोला, ‘‘पिताजी, आप ये कैसी बातें कर रहे हो? यह मकान दादाजी और आप के खूनपसीने की कमाई का पुश्तैनी मकान है. आप किराए के मकान में जा कर क्यों रहोगे? किराए पर रहने की जरूरत पड़ेगी तो हम जा कर रहेंगे.’’

‘‘बेटा, तू कुछ भी कर… अब इन सासबहू का एकसाथ रहना मुश्किल है.’’

सुधाकर को पता नहीं था कि बापबेटे की बात को सविता ने कान लगा कर सुन लिया है. जैसे ही वह अपने कमरे में पहुंचा, सविता ने उसे आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘क्या कह रहा था बुड्ढा?’’

‘‘सविता, जबान संभाल कर. गुस्से और नफरत में तहजीब नहीं खोते.’’

‘‘ऐसी तहजीब रखो अपने पास, मेरी जूती पर. बुड्ढे को बुड्ढा नहीं कहूंगी, तो क्या जवान कहूंगी. गोद में ले कर खिला लो, दूध पीता बच्चा है तुम्हारा बाप.’’

‘‘सविता, तुम हदें पार कर रही हो.’’

‘‘मैं तो हदें पार कर ही रही हूं. तुम ध्यान से सुन लो… अब इस घर में या तो तुम्हारे मांबाप रहेंगे या फिर हम रहेंगे. और यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

अगले दिन से ही सविता ने जिन्ना की तरह घर को दो फाड़ करने का डायरैक्ट ऐक्शन शुरू कर दिया. सुधाकर घर की कलह से कांग्रेस के नेताओं की तरह घबरा गया. उस ने घर में किसी अनहोनी के डर से किराए का मकान तलाशना शुरू कर दिया.

मौडल टाउन में सुधाकर को एक ऐसा मकान किराए पर मिल गया, जिस का अहाता खास बड़ा था और जिस का मकान मालिक दूर जींद जिले में रहता था.

किराए के मकान में आ कर सुधाकर को लगा कि सविता के बरताव में बदलाव आ जाएगा, लेकिन जल्दी ही उसे एहसास हो गया कि सविता में रंचमात्र भी फर्क नहीं आया है. अब उस का सारा गुस्सा उस की तरफ डायवर्ट हो गया है. अब सविता का सारा गुस्सा उसे अपने ऊपर झेलना पड़ता.

सविता की नाराजगी अब यह थी कि सुधाकर अपने मांबाप के पास क्यों जाता है. वह सुधाकर के घर आते ही उस पर फट पड़ती थी. अब तो वह गालीगलौज से पेश आती थी और मारपीट पर भी उतर आती थी.

‘‘हरामखोर, यहां आता ही क्यों है? उन्हीं बुड्ढेबुढि़या की गोद में जा कर मर, जिन के बिना तुझ से रहा नहीं जाता. मुझ से शादी ही क्यों की थी, जब तुझे उन के साथ ही रहना था?’’

सुधाकर को समझमें नहीं आता था कि आखिर सविता को हो क्या गया है? कुछ भी हो पुश्तैनी घर में उस ने उस से कभी ‘तूतड़ाक’ से बात नहीं की थी और न ही अपने प्रति उसने आज तक इतनी नफरत देखी थी. आखिर यह नफरत उस के मन में आई कैसे?

सुधाकर कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता था. उस ने यह मकान ही किराए के लिए इसलिए पसंद किया था कि इस में मकान मालिक नहीं रहता था. ऐसे मकान मिलने बड़ी मुश्किल होते हैं. अगर उस ने तमाशा खड़ा किया और पड़ोसियों ने मकान मालिक से शिकायत कर दी, तो फिर ऐसा किराए का मकान मिलना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए न चाह कर भी सुधाकर उस के जुल्म को सहता गया. मार खा कर भी वह चुप रहता, क्योंकि एक उम्मीद बाकी थी.

अपनी भड़ास उतारने के बाद सविता आश्चर्यजनक रूप से सामान्य हो जाती थी. सविता का यह राज भी आज तक उसे समझमें नहीं आया था. सविता का गुस्सा और नाराजगी उस के लिए पहेली बने हुए थे.

एक दिन सविता की कालेज के समय की सहेली सुदीक्षा उसे ‘सरप्राइज’ करने के लिए बिना सूचना दिए उस से मिलने के लिए उस का घर तलाशती हुई तकरीबन उसी समय उस के घर पर पहुंची, जब सुधाकर के घर वापस आने का समय था.

अभी सुदीक्षा दरवाजे पर पहुंची ही थी कि उसे घर के अंदर से ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ और गालीगलौच की आवाज सुनाई दी. ऐसे में वह घर के अंदर कैसे जाए? वह उलटे पांव वापस लौटी. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सविता अपने पति के साथ ऐसा भी कर सकती है. रातभर वह सविता के बारे में सोचती रही.

सुदीक्षा सविता को कालेज के दिनों से जानती थी और उस की नजर में उस की प्यारी सहेली सविता बिलकुल भी ऐसी नहीं थी. वह जितना उस के बारे में सोचती, उस का कौतूहल उतना ही बढ़ता जाता.

अगले दिन सुदीक्षा सविता से ऐसे समय मिलने पहुंची, जब उस का पति औफिस में और बेटी स्कूल गई हुई थी. बेटा तो सविता का अभी छोटा ही था.

सुदीक्षा को देखते ही सविता खुश हो गई. उस ने उसे गले लगा लिया. फिर दोनों बैठ कर बतियाने लगीं.

चाय पीते हुए चालाकी से बातों ही बातों में सुदीक्षा ने कल वाली बात छेड़ दी. पहले तो सविता बचती रही, फिर लंबी सांस खींच कर बोली, ‘सुदीक्षा, अब तुझसे क्या बताऊं और क्या छिपाऊं? तू तो मेरी कालेज लाइफ के बारे में सबकुछ जानती ही है.’’

‘‘हां, वह तो मैं अच्छे से जानती हूं. वरुण से तेरे लव अफेयर के बारे में भी,’’ सुदीक्षा ने चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘तुझेतो पता ही है सुदीक्षा. मैं वरुण से कितना प्यार करती थी. हम दोनों ने साथ जीनेमरने की कसमें तक खा रखी थीं.’’

‘‘हांहां, मैं सब जानती हूं.’’

‘‘लेकिन सुदीक्षा, मैं उस समय ठहरी एक संस्कारी लड़की. मैं चाहती और जैसा वरुण चाहता भी था कि दूसरी बिगड़ी हुई लड़कियों की तरह खूब मौजमस्ती करती और गुलछर्रे उड़ा सकती थी. बहुत सी बिगड़ी लड़कियां तो अपने यारों के साथ कालेज के खाली पड़े क्लासरूम या फिर किसी कोने में ही…

‘‘उन दिनों सीसीटीवी कैमरे का चलन तो था ही नहीं. कुछ लड़कियां तो रोज ही किसी न किसी के साथ, लेकिन मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’

‘‘सही कह रही हो.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप ने सबकुछ जानते हुए भी सुधाकर से मेरी शादी कर दी और मैं कोई विद्रोह न कर सकी. सारी कसमें धरी की धरी रह गईं. मैं तो वरुण की नजरों में बेवफा हो गई और सुधाकर को कभी मन से अपना न सकी. यह अपराधबोध मुझेदिनरात सताता है.’’

कुछ देर सुदीक्षा माथा पकड़ कर बैठी रही, फिर कुछ सोच कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी लैला, क्या इस अपराधबोध और वरुण के प्यार को जिंदगीभर बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह सीने से चिपटाए रखेगी?

ये लैला बनने के दिन नहीं, यह मौडर्न जमाना है… जरा कुछ सोच.’’

‘‘सुदीक्षा, तुम कुछ भी कहो. मुझेहमेशा लगता है कि मैं ने वरुण के साथ बहुत गलत किया. मैं इस के लिए खुद को कुसूरवार मानती हूं और गुस्से से भर उठती हूं. अपने बस में नहीं रहती. पहले यह गुस्सा अपने सासससुर पर निकालती थी और अब वह गुस्सा सुधाकर पर निकालती हूं. उस का चेहरा देख कर ही मैं तमतमा उठती हूं.’’

‘‘लेकिन सुधाकर तो बहुत अच्छे हैं, उन पर गुस्सा क्यों करती है?’’

‘‘सुदीक्षा, देख तू भी एक औरत है. एक औरत ही दूसरी औरत के दिल की बात को समझसकती है कोई मर्द नहीं. एक औरत का दिल जिस पर आता है, वह कभी उसे भुला नहीं सकती.

‘‘वरुण की कमी शादी के बाद मुझेबहुत खलने लगी. आज भी वह मेरे रोमरोम में बसा हुआ है. सुधाकर हीरे का भी क्यों न बन जाए, वह वरुण की जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अरे सविता, तू तो इस जमाने की हीर बन रही है, बुलाऊं क्या तेरे रांझवरुण को यहीं पर,’’ सुदीक्षा ने हंसते हुए उस के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘चल पगली कहीं की. वह तो बेचारा मेरी याद में न जाने कहां तड़प रहा होगा. काश, वह एक बार आ जाता तो मैं उस के पैरों में गिर कर उस से माफी मांग लेती.’’

‘‘अच्छा चल, वरुण की बात बाद में करेंगे, यह बता इस सब में सुधाकर की क्या गलती है?’’

‘‘सुधाकर की इस में यह गलती है कि वह इस दुनिया में जनमा ही क्यों? न वह इस दुनिया में होता और न मेरी उस से शादी होती. फिर शायद मैं वरुण की ही होती.’’

सुदीक्षा यह सुन कर अपना सिर पकड़कर बैठ गई, फिर हंसते हुए और अफसोस जताते हुए बोली, ‘‘सविता, हम औरतें इसी कारण से इस दुनिया में लांछित हैं. यह दुनिया एक औरत के प्रेम मुकाम को नहीं समझपाती. तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारी शादी वरुण से कर दी होती तो यह सबकुछ न होता, जो तुम्हारे घर में हो रहा है.

‘‘लेकिन मर्द औरतों की भावनाओं को नहीं समझपाते. वे बेदर्द हो कर हमारी भावनाओं को कुचलते हैं और हम पर राज करने की कोशिश में लगे रहते हैं, इसलिए बहुत सी औरतों को विद्रोह भी करना पड़ता है. लेकिन कई बार हम भी मर्दों को नहीं समझपाती हैं.’’

‘‘मतलब?’’ सविता ने पूछा.

‘‘जिस वरुण के लिए सविता तू मरी जा रही है और अपने परिवार मैं तू ने उस के लिए इतनी उथलपुथल मचा रखी है, उस की करतूतों को सुन कर तेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी.’’

‘‘यह क्या कह रही है सुदीक्षा. मेरा वरुण ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जो मैं न सुन पाऊं. दुनिया में उस से अच्छा आदमी हो ही नहीं सकता.’’

‘‘तेरा सोचना कुछ भी गलत नहीं है. सब लैलाओं को अपना मजनूं ऐसा ही लगता है. ले अब सुन अपने रांझवरुण की करतूत. तेरी शादी के कुछ महीने बाद ही वह अपने पड़ोस की शादीशुदा भाभी को भगा ले गया, फिर वह कई दिन जेल में रहा.’’

‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता,’’ सविता ने अपने कानों पर हाथ धरते हुए कहा.

‘‘अब अनजान मत कर. अपने रोमियो की हकीकत सुन. बहुत बन ली तू जुलियट, अपने परिवार में टैंशन कर के. पता है आजकल वह एक नहीं 2-2 बिगड़ी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और तू कहती है वह कुंआरा ही तेरी याद में तड़प रहा होगा. यह मर्द जात है कहीं भी मुंह मार देती है, बस मौका मिला चाहिए.’’

‘‘तू झठ बोल रही है,’’ सविता ने कहा.

‘‘मैं झठ बोल रही हूं, तो ले यह देख, मैं सुबूत साथ लाई हूं.’’

जब सुदीक्षा ने अपने मोबाइल में वरुण और उस की प्रेमिकाओं के फोटो और उस की जेल जाने की तसवीरें दिखाईं, तो सविता का प्रेम भूत एक झटके में उतर गया. उसे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, लेकिन वह हकीकत को भी तो झठला नहीं सकती थी.

प्रेम भूत उतरते ही सविता को सुधाकर वरुण से लाख अच्छा लगने लगा था.

‘‘सुदीक्षा, तू ने तो सच में मेरी आंखें खोल दीं. मैं वरुण के प्रेम में डूब कर अपना घर तबाह कर रही थी.’’

‘‘मैं तो तुझसे केवल वैसे ही मिलने आई थी, लेकिन तेरे हालात ने मुझेतेरे सामने हकीकत लाने को मजबूर कर दिया. वरुण की करतूतों के बारे में तो मुझेबहुत पहले ही पता चल गया था, लेकिन मुझेयह नहीं पता था कि तू उस के प्रेम की यादों को अभी तक सीने से चिपकाए बैठी है.’’

कुछ देर और रुकने के बाद सुदीक्षा वहां से चली गई. अगली बार जब सुदीक्षा उस से मिलने आई, तो उस ने सविता को पुश्तैनी मकान में अपने सासससुर के साथ सुख से रहते पाया. यह देख कर उस के चेहरे पर भी मुसकान खिल गई. Hindi Romantic Story

Story In Hindi: अंदर बाहर – जब पीछे पड़ गया सांड

Story In Hindi: ‘‘मिल गया. 15 रुपए की एक बता रहा था. 20 रुपए में 2 दे दी. यानी 10 रुपए की एक फूलगोभी,’’ कहते हुए बेनी बाबू जंग जीतने वाले सेनापति के अंदाज में खुश हो गए.

आलू, बैगन, अदरक, बंदगोभी वगैरह सब्जियों से भरे झोले को संभालते हुए वे जल्दीजल्दी घर लौट रहे थे. सड़क पर दोनों तरफ सब्जी वाले बैठे थे. कोई हांक लगा रहा था, ‘‘20 में डेढ़, टमाटर ढेर.’’

फल वाला नारा बुलंद कर रहा था, ‘‘बहुत हो गया सस्ता, अमरूद ले भर बस्ता.’’ बिजली के तार पर बैठे बंदर सोच रहे थे, ‘मौका मिले, तो झपट कर अमरूद उठा लें. सौ फीसदी मुफ्त में.’

वैसे, भाषा विज्ञान का एक सवाल है कि पेड़ की शाखा पर चलने के कारण अगर बंदरों का नाम ‘शाखामृग’ पड़ा, तो आजकल के टैलीफोन और बिजली के तारों पर चलने के कारण उन का नाम ‘तारमृग’ भी क्यों न हो? उधर बेनी बाबू ने यह खयाल नहीं किया था कि भीड़ में कोई उन के पीछेपीछे चल रहा है. वह था एक भारीभरकम काला सांड़, जो शायद सोच रहा था, ‘बच्चू, तू अकेलेअकेले सब खाएगा? हजम नहीं होगा बे. एक फूलगोभी तो मुझे देता जा.’

पीछे से आती आवाज से चौंक कर बेनी बाबू ने पीछे मुड़ कर देखा और उन के मुंह से निकला, ‘‘अरे, सत्यानाश हो.’’ वे सिर पर पैर रख कर भागे. कुछकुछ उड़ते हुए.

‘अबे भाग कहां रहा है? सरकार का टैक्स है. पुलिसगुंडे सब का टैक्स है. हमारा टैक्स नहीं देगा क्या? चल, फूलगोभी निकाल,’ मानो सांड़ यह सोच कर उन के पीछे दौड़ने लगा. बेनी बाबू मानो यह सोचते हुए आगे भागे, ‘न मानूं, न मानूं, न मानूं रे. दगाबाज, तेरी बतिया न मानूं रे.’

‘अबे तुझे हजम नहीं होगा. तेरे पेट से निकलेगी गंगा. तेरा खानदान न रहेगा चंगा,’ सांड़ को जैसे गुस्सा आ गया.

एक राही ने जोरदार आवाज में कहा, ‘‘भाई साहब, जल्दीजल्दी भागिए.’’ दूसरे आदमी ने यूएनओ स्टाइल में समझौता कराना चाहा, ‘‘एक फूलगोभी उस के आगे फेंक कर घर जाइए.’’

‘जाऊं तो जाऊं कहां ऐ दिल, कहां है तेरी मंजिल?’ यह सोचते हुए तड़पने लगे बेनी बाबू. तभी ध्यान आया कि दाहिने हाथ की गली के ठीक सामने पुलिस चौकी है. और कोई न बचाए, खाकी, अपनी रख लो लाज. बचा लो मुसीबत से आज. दौड़तेहांफते हुए हाथ में थैला लटकाए बेनी बाबू थाने में दाखिल हुए.

बेनी बाबू को भीतर आता देख दारोगा बलीराम चिल्लाए, ‘‘अरे, यह क्या हो रहा है? तुम… आप कौन हैं? ऐ गिरधारी, यह कौन अंदर दाखिल हो गया? देख तो…’’ ‘‘एक सांड़ मेरे पीछे पड़ा है,’’ बेनी बाबू ने अपनी समस्या बताई.

‘‘सांड़? पीछा कर रहा है? कोई गुंडाबदमाश होता तो कोई बात होती,’’ दारोगा बलीराम ने कहा. ‘‘अरे साहब, यह सांड़ तो गुंडेबदमाश से भी दो कदम आगे है.’’

बाहर से गिरधारी ने मुनादी कर दी, ‘‘लीजिए, वे भी पधार चुके हैं.’’ इसी बीच थाने के अंदर काले पहाड़ जैसे सांड़ की ऐंट्री.

दारोगा बलीराम चौंक गए और बोले, ‘‘सुबहसुबह यह क्या बला आ गई?’’ इतने में सांड़ झपटा बेनी बाबू की ओर. वे छिप गए दारोगा बलीराम के पीछे. शुरू हो गई म्यूजिकल चेयर

रेस. टेबिल के चारों ओर चक्कर लगा रहे थे तीनों. सब से पहले बेनी, उन के पीछे दारोगा बलीराम और उन

दोनों को खदेड़ता हुआ काला पहाड़ जैसा वह सांड़… ‘‘अरे गिरधारी, इस को भगाओ, नहीं तो तुम सब को लाइन हाजिर कराऊंगा,’’ फौजी स्टाइल में दारोगा बलीराम चिल्लाए.

‘‘साहब, हम क्या करें? मामूली चोरउचक्के तो हाथ से छूट जाते हैं, ये तो बौखलाए सांड़ हैं. कैसे संभालें?’’ गिरधारी ने सच कहा. उधर झूमझूम कर, घूमघूम कर चल रहा था तीनों का चक्कर. बीच में टेबिल को घेर कर.

दारोगा बलीराम ने आदेश दिया, ‘‘हवालात का दरवाजा खोल कर इसे अंदर करो.’’ ‘‘हम लोग दरवाजा खोल रहे हैं हुजूर. आप अंदर से उसे बाहर हांकिए,’’ गिरधारी ने जोरदार आवाज में कहा.

‘‘यह तो मुझे दौड़ा रहा है. मैं कैसे हांकूंगा? इस आदमी को यहां से निकाल बाहर करो.’’ ‘‘आप ही लोग जनता की हिफाजत नहीं करेंगे, तो कौन हमें बचाएगा?’’ बेनी बाबू बोले.

‘‘निकलते हो कि नहीं…’’ दारोगा बलीराम बेनी बाबू पर यों झपटे कि झोला समेत उसे निकाल बाहर करें. सांड़ उन पर लपका. बेनी बाबू ने तुरंत टेबिल के नीचे हाथ में झोला संभालते हुए आसन जमा लिया.

सांड़ हैरान रह गया. गोभी वाला बाबू गया कहां? उसे दारोगा पर गुस्सा आ गया कि कहीं इसी ने तो गोभी नहीं खा ली? वह सांड़ दारोगा बलीराम के पीछे दौड़ता हुआ मानो बोला, ‘छुप गए तारे नजारे सारे, ओए क्या बात हो गई. तू ने गोभी चुराई तो दिन में रात हो गई.’ हवालात का दरवाजा खुला था. बलीराम पहुंचे अंदर और चिल्लाए, ‘‘अरे गिरधारी, हवालात का दरवाजा बंद कर… जल्दी से.’’

गिरधारी ने तभी आदेश का पालन किया. सांड़ बंद हवालात के सामने फुफकारने लगा और मानो बोला, ‘हुजूर, अब खोलो दरवाजा. मैं प्रजा हूं, तुम हो राजा. भूखे की गोभी मत छीनो. सुना नहीं क्या अरे कमीनो?’

इस के बाद क्या हुआ, मत पूछिए. दूसरे दिन अखबार में इस सीन की फोटो समेत खबर छपी थी. हां, इतना बता सकता हूं कि मिसेज बेनी को दोनों फूलगोभी मिल गई थीं. सहीसलामत. Story In Hindi

Hindi Story: गऊदान – ऐसा क्या था जो भरतरी को परेशान कर रही थी

Hindi Story: भरतरी को मन ही मन किसी भारी मुसीबत की चिंता खाए जा रही थी. जिस लहजे में पंडितजी का संदेश मिला था, वही उस की चिंता की अहम वजह थी.

पंडितजी बरामदे में खड़े थे. उन्हें देखते ही भरतरी का दिल जोरजोर से धड़कने लगा, पर वह हिम्मत जुटा कर बोली, ‘‘नमस्ते पंडितजी.’’

सोम शास्त्री ने नजरें उठा कर भरतरी की तरफ घूमते हुए उस से पूछा, ‘‘भरतरी, सुना है कि तुम्हारे घर लड़का पैदा हुआ?है?’’

‘‘हां पंडितजी, आप ने सच सुना है,’’ भरतरी बोली.

‘‘कल तुम आई नहीं, फिर भी मैं ने बच्चे के पैदा होने का समय पूछ कर मुहूर्त देखा है. लड़का मूल नक्षत्र में पैदा हुआ है और उस पर शनि का प्रकोप भी है.

‘‘इस से बचने का सिर्फ एक ही तरीका है कि 5 पंडितों को खाना खिलाओ और गऊदान करो.

‘‘साथ ही, मूल नक्षत्र का पूजन होगा, जिस में बिरादरी के लोगों को भोजन कराना पड़ेगा…’’ सोम शास्त्री ने भरतरी को बताते हुए पूछा, ‘‘बता, लड़के का नाम क्या रखा है?’’

‘‘अभी तो कुछ सोचा नहीं पंडितजी. हां, समशेरू ने बच्चे का नाम महावीर रखने के लिए सोचा है.’’

‘‘महावीर…’’ हैरान सोम शास्त्री के माथे पर बल पड़ गए, ‘‘छोटे लोगों का छोटा नाम ही ठीक रहता है. वैसे, बच्चे का नाम ‘प’ अक्षर से पड़ता?है, अब तुम जो चाहे नाम रख लो.’’

पंडितजी महावीर नाम इसलिए मना कर रहे थे, क्योंकि यह नाम तो उन के कुनबे में किसी का था. अब भला पिछड़ी जाति के लोग पंडितों के नाम भी रखने लगेंगे.

30-35 घरों का छोटा सा गांव, जहां गिनती में पासी ज्यादा थे, पर सब अनपढ़ थे, इसीलिए वे मुट्ठीभर पंडितों की गुलामी करते थे. पर समशेरू ऐसा नहीं था, क्योंकि वह थोड़ा पढ़ालिखा था और एक डाक्टर के साथ कुछ दिनों तक उस की दुकान पर कंपाउंडर रहा था.

अब वह खुद ही एक छोटी सी दुकान खोल कर डाक्टरी का काम कर रहा था, फिर भी उस की मां गाहेबगाहे खर्च को देखते हुए पंडितों के खेत में मजदूरी कर लिया करती थी.

इस के बाद भी पूरा परिवार गरीबी में जी रहा था, इसीलिए सोम शास्त्री की बात भरतरी को सोच में डाले हुए थी. कहां से हो सकेगा इतना जुगाड़? घर के दरवाजे पर बंधी गाय की तरफ नजर गई, तो वह मन ही मन सिहर उठी.

समशेरू ने सुना, तो वह बिफर पड़ा, ‘‘मैं कुछ नहीं करूंगा. मैं न तो गऊदान करूंगा और न ही पंडितों को भोजन कराऊंगा.’’

बेटे के मुंह से ऐसी बात सुन कर भरतरी बोली, ‘‘पहला लड़का है, कुछ तो कराना ही पड़ेगा.’’

‘‘तब जा कर घर गिरवी रख के पंडित और बिरादरी को भातभोज दो, यहां तो दालरोटी के लाले पड़ रहे हैं. मां, तुम जो बता रही हो, उस पर तकरीबन

5 हजार रुपए का खर्च बैठेगा. इतना रुपया कहां से आएगा.’’

‘‘लेकिन समाज और जातिबिरादरी के लोग क्या कहेंगे?’’

‘‘लोग क्या कहते हैं, हम यह देखें या अपनी गांठ देखें. मैं भी तो मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था. तुम ने मूल नक्षत्र की पूजा कर के कौन सा सुख उठा लिया.

‘‘मेरी बात छोड़, सुखई को देख. उस की बीवी बच्चा पैदा होते ही मर गई.

‘‘उस ने तो मूल नक्षत्र नहीं पूजा, पर हम से ज्यादा सुखी है.’’

समशेरू बहुत देर तक सोम शास्त्री पर बड़बड़ाता रहा, ‘‘ये सब पंडित के चोंचले हैं. मैं तो अपने बेटे का नाम महावीर ही रखूंगा.’’

समशेरू का फैसला सोम शास्त्री के लिए ही नहीं, बल्कि ब्राह्मणों की बनाई व्यवस्था के लिए एक चुनौती था, इसीलिए सोम शास्त्री समशेरू का रास्ता रोक कर खड़े हो गए और बोले, ‘‘समशेरू, सुना है कि तुम ने गऊदान न करने और बच्चे का मूल नक्षत्र भी न पूजने का फैसला लिया है?’’

‘‘पंडितजी, हम तो धर्मकर्म में विश्वास नहीं रखते.’’

‘‘नास्तिक… धर्म के नाम पर कलंक,’’ गुस्से में चीखते हुए सोम शास्त्री ने समशेरू के गाल पर एक थप्पड़ मारा.

सोम शास्त्री द्वारा समशेरू को थप्पड़ मारने की बात पूरे गांव में फैल गई.

पासियों के टोले में ब्राह्मणों के विरोध में बुलबुले उठने लगे. गांव में तनाव की हालत बन गई. पासियों ने पंडितों के खेत में काम करना बंद कर दिया.

एक दिन तो तनाव इतना बढ़ गया कि दोनों ओर से लाठियां और कट्टे निकल आए और मारामारी की नौबत आ गई. दोनों टोले के लोग गोलबंद हो कर घूमने लगे.

हालांकि पासी टोला एकमत था, पर गरीबों का संगठन कब तक बगैर मजदूरी किए संगठित रह सकता है

और मजदूरी पंडितों के खेतों में ही हो सकती थी, इसलिए सोम शास्त्री का पक्ष ज्यादा मजबूत था. किसी को भी अपनी ओर करना उन के लिए ज्यादा मुश्किल न था.

एक रात पंडितों की तरफ से पासी टोले पर पत्थर फेंके गए और रात में गाय के हौद में गोबर व कंकड़पत्थर भर दिए गए, तो दूसरी रात सोम शास्त्री की फसल खेत में से रातोंरात काट ली गई.

उसी दिन ब्राह्मण टोले की बैठक हुई और सभी ने एकमत से फैसला सोम शास्त्री के ऊपर छोड़ दिया.

सोम शास्त्री ने सब से पहले कूटनीति का सहारा लेते हुए पासी टोले के रमई को फोड़ने का इंतजाम किया.

पहले तो रमई नानुकर करता रहा, पर जब सौसौ के नोट देखे, तो झोंपते हुए वह बोला, ‘‘पंडितजी, आप लोग तो महान हो. आप जो भी कहेंगे, हम सब वही करेंगे.’’

सोम शास्त्री मन ही मन बहुत खुश थे, क्योंकि उन की चाल कामयाब रही थी और तीर निशाने पर लगा था. वे समय का इंतजार कर रहे थे.

शाम ढल चुकी थी. समशेरू अपनी दुकान में बैठा हुआ मरीजों को देख रहा था. कुछ देर बाद रमई की बेटी कबूतरी का नंबर आया. समशेरू उसे दवा देने लगा.

अचानक कबूतरी चिल्लाने लगी, ‘‘अरे देखो, यह डाक्टर हमारी इज्जत पर हाथ डाल रहा है.’’ वह जोरजोर से समशेरू को गालियां देने लगी. थोड़ी ही देर में दुकान के बाहर भीड़ जमा हो गई.

दुकान के आगे जमा भीड़ में से एक ने कहा, ‘‘मारो इस को. यह तो समाज के ऊपर कलंक है.’’ उस के इतना कहते ही ‘मारोमारो’ की आवाजें आने लगीं.

देखते ही देखते राहगीरों ने बेकुसूर समशेरू को दुकान से बाहर खींच लिया और लातघूंसों से पीटने लगे. अचानक तेजाब से भरी एक बोतल समशेरू के सिर से टकराई और फूट गई, जिस से समशेरू का चेहरा बुरी तरह जल गया.

दूसरे दिन अखबार में छपा था कि अपनी एक महिला मरीज को छेड़ने पर भीड़ ने डाक्टर को पीटपीट कर मार डाला.

बाजी सोम शास्त्री के हाथ लग चुकी थी. जब राहगीर समशेरू को पीट रहे थे, तब सोम शास्त्री और रमई तेजी से गांव की तरफ जा रहे थे, क्योंकि भरतरी की गाय जो लेनी थी. लेकिन गाय पंडित को अपनी तरफ आता देख कर बिदक गई और खूंटा उखाड़ कर जंगल की ओर भाग गई. Hindi Story

Story In Hindi: मनचाही मंजिल – ठाकुर रंजीर सिंह का आवारापन

Story In Hindi: ‘‘अरे, थोड़ा ‘आहऊह’ तो करो, तब तो मजा आए. क्या एकदम ठंडी लाश की तरह पड़ी रहती हो,’’ ठाकुर रंजीर सिंह अपनी बीवी सुमन के बदन से अलग होता हुआ बोला और इस के बाद अपना मोबाइल फोन उठा कर एक पोर्न साइट खोल दी.

सुमन ने शरमा कर आंखें बंद कर लीं तो रंजीर सिंह उसे जबरदस्ती फिल्म दिखाने लगा और फिल्म की हीरोइन के बड़े उभारों की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘इसे देखो, कितना भरा हुआ शरीर है. जमीन पर लिटा दो तो गद्दे का कोई काम ही नहीं है… और एक तुम हो कि शरीर में बिलकुल मांस ही नहीं है.’’

सुमन की सपाट छाती की ओर हिकारत भरी नजरों से देखते हुए रंजीर सिंह ने कहा और बेमन से उस के ऊपर चढ़ गया और अपनी मंजिल को पाने के लिए ताबड़तोड़ जोर लगाने लगा.

रंजीर सिंह के पिता ठाकुर राजेंद्र सिंह चाहते थे कि उन का बेटा खूब पढ़ाई करे और इस के लिए उन्होंने रंजीर सिंह को अपने गांव से 400 किलोमीटर दूर लखनऊ यूनिवर्सिटी में भेजा भी, पर रंजीर का मन वहां पढ़ाई में नहीं लगा. वह या तो लड़कियों के आगेपीछे घूमता, उन्हें छेड़ता और बाकी समय में कैंपस की राजनीति के चक्कर में पड़ गया.

देरसवेर ठाकुर राजेंद्र सिंह यह बात समझ गए थे कि रंजीर पढ़ाई की जगह आवारागर्दी और मौजमस्ती कर रहा है. उन का यह एकलौता लड़का था, इसलिए उन्होंने उसे वापस गांव बुला लिया.

गांव आ कर भी रंजीर सिंह की हरकतें नहीं छूटी थीं. वह यहां भी आ कर राजनीति करता और अपने पीछे लड़कों की भीड़ ले कर चलता और जिन भी औरतों और लड़कियों को छेड़ने का मन करता, उन्हें छेड़ देता.

रंजीर सिंह की ऐसी हरकतों से तंग आ कर ठाकुर राजेंद्र सिंह ने उस की शादी करा दी.

शादी के बाद रंजीर भोगविलास में डूब गया था. वह कई दिन तक अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकला था, पर जल्दी ही पत्नी से उस का मोह भंग हो गया, क्योंकि सुमन काफी दुबलीपतली थी.

पोर्न फिल्मों के शौकीन रंजीर सिंह के अंदर बैठे हवसी को मजा नहीं मिल पा रहा था और वैसे भी जिस की हर जगह मुंह मारने की आदत पड़ चुकी हो, उसे भला घर में कहां संतुष्टि मिलने वाली थी.

रंजीर सिंह अपने 4-5 दोस्तों के साथ गांव के चौराहे पर बैठता और आनेजाने वाली औरतों के भरे उभारों और उन के कूल्हों को देखता रहता.

पिछले कुछ दिनों से रंजीर सिंह की नजर गांव की एक औरत पर थी. तकरीबन 40 साल की उस औरत का नाम बिजली था.

जैसा नाम था वैसी ही बिजली की काया थी. साड़ी नीचे बांधने के चलते बिजली की गहरी नाभि हमेशा दिखती रहती थी. बिजली भी अपनी नाभि का प्रदर्शन जानबूझ कर करती थी. मर्दों की लालची निगाहों को परखने का हुनर खूब जानती थी बिजली.

बिजली के पति किशोर ने पाईपाई जोड़ कर उसे एक कैमरे वाला मोबाइल फोन दिला दिया था, ताकि बिजली उस पर दक्षिण भारत की फिल्में देख सके. बिजली को वहां की भरीपूरी हीरोइनें देखने का चसका लगा था.

आज जब बिजली कमर मटकाते हुए घर से बाहर जा रही थी, तब उस ने रंजीर सिंह को अपनी ओर घूरते हुए देखा. बिजली ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया और ब्लाउज के अंदर से उस के उभार की गोलाइयां बाहर आने को मचल उठीं.

‘‘वाह, माल हो तो ऐसा,’’ रंजीर सिंह बुदबुदा उठा था.

‘‘मालिक, कहो तो अभी उठा ले आएं आप की खातिर?’’ मनकू ने रंजीर सिंह की चापलूसी करते हुए कहा.

बदले में पकिया ने मनकू की तरफ आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘अरे, जानते नहीं कि बिजली दलित है और हमारे साहब तो खानदानी ठाकुर हैं. वे भला इस दो कौड़ी की अछूत औरत के साथ संबंध क्यों बनाएंगे…’’

पकिया की यह बात सुन कर रंजीर सिंह जोर से हंसने लगा और कहा, ‘‘औरतों के मामले में हम जातिवाद का विरोध करते हैं. भले ही वह औरत दलित है, पर,’’ अचानक से रंजीर सिंह शायराना हो गया था. वह बोला, ‘‘जिस तरह से ठाकुरों की ताकत कभी कम नहीं मानी जाती, चिलम, दारू और औरत कभी जूठी नहीं मानी जाती, इसलिए हम बिजली नाम की इस औरत का करंट जरूर चैक करना चाहेंगे.’’

बिजली का पति शहर जा कर एक दुकान पर नलसाजी का काम करता था. वह सुबह निकल जाता और देर रात तक वापस आ पाता. बिजली बड़ेबड़े सपने देखने वाली औरत थी. उस के मन में आगे बढ़ने की ललक भी थी.

बिजली के बच्चे नहीं थे, इसलिए उस ने अपनेआप को बिजी रखने के लिए आंगनबाड़ी में काम करना शुरू कर दिया था, जिस से चार पैसे भी आते थे और गांव की औरतों से भी मिलना हो जाता था.

सरकारी आंकड़े भले ही कुछ कहते हों, पर सचाई तो यह थी कि इस गांव में तरक्की के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ था. सड़कें टूटी हुई थीं. अब भी जगहजगह पानी भर जाता था और गांव में बिजली न रहने के चलते अंधेरा ही रहता था.

गांव की औरतों और मर्दों ने कई बार अपनी सारी मांगें सरपंच के सामने रखी थीं, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

‘‘यह खड़ूस सरपंच जब बदलेगा, तभी इस गांव का कुछ भला हो पाएगा,’’ आंगनबाड़ी की औरतें आपस में बातें कर रही थीं. उन में से एक की आवाज बिजली के कान में भी पड़ रही थी.

दूसरी औरत ने बताया कि किस तरह से एक बार सड़क के किनारे से आते समय अंधेरे का फायदा उठा कर किसी आदमी ने उसे छेड़ने और उस के उभारों को मसलने की कोशिश की थी.

आज बिजली दूसरे गांव से वापसी कर रही थी. वह बस से उतर कर अभी गांव में घुसी ही थी कि उस के पति का फोन आ गया. बिजली ने ब्लाउज के अंदर हाथ डाल कर मोबाइल निकाला और बात करना शुरू किया.

उस के पति ने बताया कि आज रात उसे वापस आने में देर हो जाएगी, इसलिए वह खाना समय से खा ले.

अपने पति से बातें करने के बाद बिजली ने मोबाइल को वापस अपने उभारों में छिपा लिया. दूर खड़े रंजीर सिंह ने बिजली को ऐसा करते देखा तो वह हवस से भर गया.

रंजीर सिंह बिजली के पीछेपीछे चलने लगा और मौका देख कर उस ने बिजली को पीछे से अपने हाथों से दबा दिया.

बिजली एक पल को जरूर चौंकी थी, पर रंजीर सिंह को देख कर वह मुसकरा पड़ी.

बिजली की इस मुसकराहट से रंजीर सिंह को समझते देर नहीं लगी कि उस का रास्ता साफ है, इसलिए बातचीत करने के बाद उस ने बिजली से उस का मोबाइल नंबर ले लिया.

रंजीर सिंह अब बिजली के मोबाइल फोन पर गंदे चुटकुले भेजने लगा. कभीकभी वह कोई पोर्न क्लिप भी भेज देता था.

एक दिन बिजली ने रंजीर सिंह से पूछ ही लिया कि वह ऐसी फिल्में क्यों भेजता है, तो रंजीर ने उसे बताया कि वह बिजली के मांसल अंगों को ऐसे ही नोचना और चूसना चाहता है जैसे कि इन फिल्मों में दिखाया गया है और घर में उसे अपनी पत्नी से यह सब सपोर्ट नहीं मिलता है.

‘‘पर हर चीज की कीमत होती है ठाकुर साहब,’’ बिजली एक ठाकुर को अपने पीछे लट्टू देख कर खुश हो रही थी. उस ने कीमत मांगी तो पैसे के घमंड में चूर रंजीर सिंह ने हर कीमत चुकाने का वादा कर दिया.

इस के बाद उन दोनों की बातें और मुलाकातें बढ़ती गईं और एक दिन रंजीर सिंह बिजली को ले कर गांव से 10 किलोमीटर दूर अपने फार्महाउस पर आया. वह अपने साथ शराब की 2 बोतलें भी लाना नहीं भूला था.

बिजली के हाथों से जी भर कर शराब पी गया था रंजीर सिंह. उस के बाद वह बिस्तर पर लेट गया और बिजली को अपने ऊपर आने को कहा.

शरीर से थोड़ी मोटी बिजली ठाकुर के ऊपर बैठी तो रंजीर सिंह को जन्नत का वह सुख मिला जो उसे आज तक अपनी पत्नी से नहीं मिला था. दोनों ने फार्महाउस पर जी भर कर सैक्स का मजा लिया और उस दिन के बाद से बिजली और रंजीर सिंह अकसर यहां आते, खातेपीते और जिस्मानी सुख का मजा लेते.

कुछ महीने के बाद बिजली ने जब अपना मेहनताना मांगा, तो ठाकुर रंजीर सिंह ने उसे 5,000 रुपए दे दिए, जिसे बिजली ने लेने से मना कर दिया

और अपने शरीर के बदले में बिजली ने उसे गांव का सरपंच बना देने की मांग कर डाली.

‘‘पगला गई हो क्या… तुम्हारे कहने से हम तुम्हें सरपंच बनवा देंगे… नीच जात को थोड़ा सा मुंह क्या लगा लिए, तुम तो सिर पर चढ़ कर नाचने लगी,’’ चीख रहा था रंजीर सिंह. पर बिजली खामोश थी, जैसे उसे इन सब बातों का अंदाजा पहले से ही था.

उस ने मुसकराते हुए अपना मोबाइल फोन रंजीर सिंह की ओर बढ़ा दिया, जिस में उन दोनों की बिस्तरबाजी की वीडियो क्लिप थीं, जो खुद बिजली ने बना ली थीं.

बिजली ने कहा कि अगर ये वीडियो क्लिप गांव में लोगों को दिखाई गईं, तो एक नीच जाति की औरत के साथ सोने से ठाकुर की कितनी बेइज्जती हो जाएगी, यह सोच लेना. और फिर बिजली ने एक क्लिप को इंटरनैट पर डाल देने की धमकी भी दे दी.

रंजीर सिंह की समझ में आ गया था कि वह गलती कर बैठा है, पर अब पछताने से क्या फायदा था. बिजली को खामोश रखने के लिए उसे वह देना ही होगा, जो उसे चाहिए था यानी गांव के सरपंच का पद.

ठीक समय आने पर रंजीर सिंह इस कोशिश में जुट गया और इस के लिए उस ने बिजली की जाति को ही हथियार बनाया और जोरशोर से गरीब और नीची जाति की बिजली को ही सरपंच बनाए जाने की बात कही.

बिजली थोड़ीबहुत पढ़ीलिखी थी, आंगनबाड़ी में काम भी करती थी और वह मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना भी जानती थी, इसलिए उस से बेहतर सरपंच गांव के लिए नहीं हो सकता

था. रंजीर सिंह की इन्हीं दलीलों के चलते  बिजली को गांव का सरपंच चुन लिया गया.

सरपंच बनने के बाद भी रंजीर और बिजली ने फार्महाउस पर जाना नहीं छोड़ा. दोनों साथ मिल कर ही ग्राम पंचायत भी जाते और गांव में भी साथसाथ घूमते.

एक गांव का ठाकुर था, तो दूसरी गांव की सरपंच. अब ये दोनों गांव की तरक्की करने के नाम पर साथ रहते थे और गांव वाले कुछ नहीं कह पाते थे, जिस की बड़ी वजह यह भी थी कि सरपंच बनने के बाद बिजली ने गांव और औरतों की भलाई के बहुत सारे काम करा दिए थे.

जहां पर अंधेरा रहता था, वहां अब स्ट्रीट लाइट लग रही थी. जहां पर

टूटी सड़कों के चलते जलभराव रहता था, वहां पर अब सड़क बन गई थी. गरीब और दलित बेटियों का सामूहिक विवाह का आयोजन कराती थी सरपंच बिजली.

तेज और चतुर बिजली के सरपंच बनने के बाद अब गांव में घरेलू हिंसा के मामलों में भी कमी आ रही थी. बिजली ने गांव में इस तरह के नारे भी लिखवा दिए : ‘बेटी होती घर की शान बेटी से बढ़ता है मान. बेटी कहती बातें सच्ची बेटी होती घर में अच्छी.’ दीवारों पर गांव की साफसफाई की बातें लिखी थीं : ‘साफसुथरा हो गांव हमारा यह तो है परिवार हमारा. धीरेधीरे करें तैयारी सफाई से भागे सब बीमारी.’

इस में शक नहीं था कि सरपंच के रूप में बिजली की छवि निखर कर आ रही थी, पर जैसा कि हर किसी के विरोधी होते ही हैं, इसी तरह बिजली से जलने वाली औरतों का एक गुट भी था, जिस में से एक ने बिजली पर तंज कसते हुए कहा, ‘‘ठाकुर के साथ सो कर तो कोई भी सरपंच बन सकता है.’’

यह बात सुन कर बिजली को बहुत गुस्सा आया. उसे लगा कि वह उन सब का मुंह नोच ले, पर उस ने शांति से जवाब देना ही उचित समझा, ‘‘हो सकता है, लोगों को मेरा यह तरीका गलत लगे, पर कभीकभी अपनी मांगों को ले कर सिर्फ आंदोलन करना ही काफी नहीं होता…

‘‘और फिर जिस जाति व्यवस्था के भंवरजाल में हम फंसे हैं, उस से निकलने के लिए हमें कई रास्ते खोजने पड़ते हैं… क्या पता, कौन सा रास्ता हमें हमारी मनचाही मंजिल तक पहुंचा दे,’’ बिजली बोले जा रही थी.

‘‘और फिर पैसे वाले ठाकुर तो जबरदस्ती हमारे शरीर को भोगते आए हैं… हम भले ही अछूत हों और वे हमारे हाथ का पानी न पिएं, पर वे हमारे अंगों पर मुंह मारने से गुरेज नहीं करते और अगर हम अपने शरीर का इस्तेमाल कर के अपना कुछ फायदा करते हैं, तो हर्ज ही क्या है…’’

बिजली की बुराई करने वाली औरतों को लगा था कि बिजली उन के आरोप लगाने से सहम जाएगी, पर बिजली के ऐसा कह देने से उन सब का मुंह बंद हो गया.

बिजली ने आंदोलन तो नहीं किया, पर अपने खूबसूरत शरीर का इस्तेमाल कर के अपनी मनचाही मंजिल को पा ही लिया था. Story In Hindi

Story In Hindi: दबी आवाजों का गुस्सा

Story In Hindi: ‘‘आज मंदिर में प्रोग्राम है न?’’

‘‘हां है.’’

‘‘देखिए, मुझे भी ले चलिएगा. मैं जब से यहां आई हूं, आप मुझे कहीं भी ले कर नहीं गए हैं. कंपनी में फिल्म होती है, वहां भी नहीं.’’

पत्नी के चेहरे पर रूठने के भाव साफ दिख रहे थे और बात भी सही थी. ब्याह के बाद जब से वह आई है, मैं उसे कहीं भी ले कर नहीं गया, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरे फौजी माहौल का उस पर असर पड़े.

‘‘ले चलिएगा न?’’

‘‘हां राजी, ले चलूंगा, पर…’’

‘‘परवर कुछ नहीं, आज तो मैं आप की एक न मानूंगी.’’

‘‘ठीक है, तुम तैयार हो जाओ.’’

थोड़ी देर बाद हम मंदिर की ओर जा रहे थे. मंदिर के नजदीक पहुंच कर राजी की खुशी देखते ही बनती थी.

‘‘देखिए न, मंदिर दुलहन की तरह सजा हुआ कितना अच्छा लग रहा है.’’

‘‘हां राजी, सचमुच अच्छा लग रहा है, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘कुछ नहीं राजी… आओ, लौट चलें.’’

‘‘कैसी बातें कर रहे हैं जी? मंदिर के पास आ कर भी भला लौटा जा सकता है? आप भी कभीकभी बेकार की बातें सोचने लगते हैं. चलिए, मंदिर आ गया है, जूते उतारिए.’’

‘‘यहां नहीं राजी, हम लोगों के लिए जूते उतारने की जगह दूसरी ओर है. यहां अफसर उतारेंगे.’’

‘‘क्या…’’

‘‘हां, राजी.’’

‘‘ओह…’’

तय जगह पर जूते उतार कर हम भीतर चले जाते हैं. भीतर चारों ओर एक खामोशी है. एक ओर जवान बैठे हैं, दूसरी ओर औरतें और बच्चे. बीचोंबीच मूर्ति तक जाने का रास्ता है.

हम दोनों हाथ जोड़ने के बाद लौटे, तो पंडाल से हट कर बैठी हमारी पड़ोसन मिसेज शर्मा ने राजी के लिए जगह बना दी. मैं रास्ते के पास जवानों के बीच बैठ गया. मु?ो राजी और मिसेज शर्मा की बातें साफ सुनाई दे रही थीं.

‘‘आओ बहन, आओ. शुक्र है, तुम घर से बाहर तो निकलीं.’’

‘‘क्या बात है बहनजी, मंदिर में बड़ी खामोशी है. न भजन, न कीर्तन,’’ राजी कह रही थी.

‘‘कोई मन से आए, तो भजन भी होए. बाई और्डर कौन भजन करे,’’ मिसेज शर्मा के बगल में बैठी औरत ने कहा.

‘‘बाई और्डर…?’’

‘‘हां बहन, आदेश न हो, तो यहां कोई भी न आए,’’ मिसेज शर्मा ने कहा.

‘‘मंदिर में भी…?’’

‘‘हां बहन, मंदिर में भी… न आएं तो मर्द लोगों के खिलाफ ऐक्शन लिया जाता है. कोई ज्यादा अकड़े तो कहा जाता है कि जाओ, फैमिली डिस्पैच कर दो. भला बालबच्चों को ले कर मर्द लोग कहां जाएं? इसी गम के मारे तो कितने मर्द क्वार्टरों में अपनी फैमिली लाना नहीं चाहते. उन के बीवीबच्चे भी क्या सोचते होंगे, इसीलिए यह खामोशी है… न भजन, न कीर्तन.

‘‘वह खूबसूरत पंडाल देख रही हो बहन, जिस के नीचे बैठा पंडित इस बात का इंतजार कर रहा है कि कब सीओ साहब यानी कमांडिंग अफसर और उन की मेम साहब आएं, तो पूजा शुरू हो.’’

थोड़ी देर बाद मिसेज शर्मा बोलीं, ‘‘पिछली बार मैं गलती से उस पंडाल में बैठ गई थी. मु?ो वहां पर बड़ा बेइज्जत होना पड़ा था…’’

‘‘हमारी इज्जत ही कहां है, जो बेइज्जत हों,’’ मिसेज शर्मा के पीछे बैठी एक गोरी औरत ने कहा, ‘‘कभी कंपनी में फिल्म देखने आई हो बहन?’’ राजी ने न में सिर हिला दिया.

‘‘अच्छा करती हो, नहीं तो बड़ी बेइज्जती सहनी पड़ती है. ये अफसर लोग हमारे मर्दों के कमांडर हैं. उन के साथ कैसा भी बरताव करें, सहन किया जा सकता है, पर हम औरतों में भला क्या फर्क है?

‘‘अफसरों और उन की बीवियों के लिए सोफे लगते हैं, जेसी ओज (जूनियर कमीशंड अफसर) और परिवारों के लिए कुरसियां और हम लोगों के लिए थोड़े से बैंच. जो पहले आए बैठ जाए. बाकी सब औरतें नीचे बैठ कर फिल्म देखती हैं.

‘‘और तो और, गरमियों में उन के लिए पंखों का इंतजाम होता है और सर्दियों में सिगड़ी का, जैसे हम लोहे की बनी हों, जिन पर गरमीसर्दी का कोई असर ही न होता हो…’’

‘‘हम अफसरों के साथ नहीं बैठना चाहतीं…’’ थोड़ी देर बाद उसी औरत ने कहा, ‘‘अनुशासन बनाए रखने के लिए अलगअलग इंतजाम अच्छा है, पर सब के लिए कुरसियां तो लग ही सकती हैं.’’

‘‘हमारे ही आदमी सोफे और कुरसियां लगाते हैं और उन्हीं के बीवीबच्चे उन पर नहीं बैठ सकते,’’ गोरी औरत के पास बैठी दूसरी औरत ने कहा.

‘‘7 बजे फिल्म शुरू होने का समय है, पर जब तक सीओ साहब और उन की मेम साहब न आएं, फिल्म शुरू नहीं होती. बच्चे मुंह उठाउठा कर देखते रहते हैं कि कब सीओ साहब आएं, तो फिल्म शुरू हो…

‘‘काश, सीओ साहब जान पाते कि बच्चे तालियां क्यों बजाते हैं… क्यों बजा रहे हैं?’’ पीछे बैठी गोरी औरत ने एक लंबी सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘पर कौन जानता है? कौन परवाह करता है?’’

‘‘सच कहती हो बहन, कोई परवाह नहीं करता…’’ अभीअभी आ कर बैठी सांवली औरत ने शायद गोरी औरत की बात सुन ली थी, ‘‘मेरा पति ड्राइवर है. आजकल स्कूल बस में बच्चों को ले कर जाता है. यहां से बस ठीक समय पर जाती है, पर सीओ साहब के बंगले पर जा कर खड़ी हो जाती है. जब तक उन के बच्चे नहीं आ जाते, तब तक वहां से नहीं चलती.

‘‘उन का स्कूल तो 8 बजे लगता है, पर मेरे पप्पू का तो स्कूल साढ़े 7 बजे ही लग जाता है. 3 दिन से पप्पू को टीचर सजा दे रही हैं. भला कोई सीओ साहब से पूछे कि हाजिरी कम होने पर वे बच्चों को इम्तिहान में बिठवा देंगे?’’

इतने में पीछे से एक शोर उठा कि सीओ साहब और मेम साहब आ गईं. सांवली औरत की बातें इस शोर में गुम हो कर रह गईं.

पंडितजी सीओ साहब और उन की मेम साहब के गले में फूलों की मालाएं डाल कर मंत्र बोलने लगे. पीछे से कोई बच्चा पूछ रहा था, ‘‘पंडितजी ने सीओ साहब के गले में माला क्यों डाली?’’

‘‘वे भी भगवान हैं बेटे…भगवान, फौजी भगवान…’’

राजी ने एक बार फिर पीछे मुड़ कर मेरी ओर देखा था, पर मैं उस की नजरों को सहन नहीं कर पाया. Story In Hindi

Hindi Romantic Story: यादों की चिनगारी – ट्रेन की वह मुलाकात

Hindi Romantic Story: गाड़ी अभीअभी आ कर स्टेशन पर रुकी थी. मुझे इसी गाड़ी से तकरीबन  2 घंटे बाद दूसरा इंजन लगने पर अपने शहर जाना था. मैं डब्बे के दरवाजे पर खड़ा हो कर प्लेटफार्म की भीड़ को देख रहा था.

अचानक मेरे सामने से एक जानापहचाना चेहरा गुजरा. उस चेहरे को देखते ही मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘नसरीन.’’ वह रुकी और एक भरपूर नजर मेरे चेहरे पर डाली. मुझे देख कर उस का चेहरा खिल उठा, पर कोई भी लफ्ज उस के होंठों से नहीं निकला.

मेरे हाथ बढ़ाने पर उस ने फौरन अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया और मैं ने उसे डब्बे के अंदर खींच लिया. वह चुपचाप मेरे साथसाथ मेरी सीट तक आई. मैं ने अपनी बीवी और बच्चे से उसे मिलवाया. फिर धीरेधीरे नसरीन खुले दिल से बातें करने लगी.

वह बारबार एक ही जुमला कहे जा रही थी, ‘‘आप ने इतने बरसों बाद भी मुझे एकदम पहचान लिया. इस का मतलब मेरी तरह आप भी मुझे भूले नहीं थे?’’ वह मेरी बीवी से बातें करती जाती, मगर उस की नजरें मुझ पर टिकी हुई थीं.

नसरीन बरसों पहले कालेज के जमाने में हमारे पड़ोस में रहती थी. मुझ से वह 1-2 दर्जा पीछे ही थी,  मगर फिल्में देखने और सैरसपाटे में मुझ से कहीं आगे थी. उसे फिल्म देखने की लत थी. मैं ने शायद अपनी जिंदगी की ज्यादातर फिल्में उस के साथ ही देखीं.

उसे घूमने का भी बेहद शौक था. शाम को स्टेशन के पास वाली सड़क पर वह मुझे जबरदस्ती ले जाती, इधरउधर की फालतू बातें करती और फिर हम दोनों वापस आ जाते. उसे मेरी क्या बात पसंद थी, मालूम नहीं, मगर मुझे उस के बात करने का अंदाज और खरीदारी करने का सलीका बहुत पसंद था.

नसरीन के साथ चलने में मुझे लगता कि उस की वजह से मैं बिलकुल महफूज हूं. फिर वह आगे की पढ़ाई करने के लिए एक साल के लिए दूसरे शहर में चली गई और मैं भी नौकरी की तलाश में कई शहरों की खाक छानता रहा.

वह जब वापस आई थी, उस समय मैं नौकरी न मिलने की वजह से बेहद परेशान और दुखी था. नौकरी के लिए नसरीन भी हाथपैर मार रही थी. वह हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया करती थी.

एक दिन उस ने मुझ से कहा था, ‘‘दुनिया में बड़े सुख जैसी कोई चीज नहीं है… छोटेछोटे सुख, जो हमें जानेअनजाने में मिलते रहते हैं, उन्हीं से खुश रहना चाहिए.’’ मैं उस शहर में ज्यादा दिन न ठहर सका. बाद में कई शहरों में छोटीमोटी नौकरियां करने के बाद मुझे सरकारी नौकरी मिली और मेरी जिंदगी में ठहराव सा आ गया.

बाद में नसरीन का परिवार भी वह शहर छोड़ गया था और उस का नया पता मुझे मालूम नहीं हो सका था. कई साल गुजर गए थे, मगर नसरीन की याद राख में दबी चिनगारी की तरह गरम ही रही, कभी बुझी नहीं.

जब उस का चेहरा मेरी नजरों के सामने आया, तो मैं अपनेआप को रोक न सका. वह भी बेहद खुश थी. बोली, ‘‘इत्तिफाक की बात है कि मैं भी इसी गाड़ी में बैठी थी और रास्तेभर आप की याद आती रही.’’

चूंकि बीवी को मैं ने नसरीन के बारे में कई बार बताया था, इसलिए वह भी उस से खूब दिलचस्पी से बातें कर रही थी. मैं उन दोनों के पास से उठ कर रिसाला यानी पत्रिका खरीदने नीचे उतर गया.

वापस आने पर मैं ने देखा कि नसरीन की बातें तो मेरी बीवी से हो रही थीं, मगर उस की नजरें मुझ पर जमी थीं. नसरीन अपनी बड़ी बहन से मिलने जा रही थी, जो कि इसी शहर में मास्टरनी थी. नसरीन अभी तक कोई नौकरी न पा सकी थी.

मुझे यह जान कर बहुत अफसोस और इस से भी ज्यादा अफसोस इस बात का हुआ कि वह अब बुरी तरह नाउम्मीद हो चुकी थी. उस ने मुझ से कहा कि मैं कहीं उस के लिए नौकरी का बंदोबस्त करूं. मगर, मैं उस के लिए क्या और कहां कोशिश करता.

उसे मेरी नौकरी के बारे में कहीं से पता चल गया था. मगर उसे यह नहीं मालूम था कि मैं छुट्टी खत्म कर के बीवीबच्चों के साथ वापस जा रहा हूं तो वह भी हमारे साथ चिपकी चली आई. मेरी बीवी ने उस से सिर्फ एक बार दिखाने के लिए साथ चलने को कहा था.

नसरीन बिना किसी झिझक या शर्म के तुरंत मान गई. उस के साथ चलने की बात पर मेरी बीवी के चेहरे पर नाराजगी सी दिखाई देने लगी, लेकिन फिर वह हंसनेबोलने लगी. 4-5 घंटे का सफर बातों में कितनी जल्दी गुजर गया था, कुछ पता ही नहीं चला. घर पहुंच कर मेरी बीवी के साथ उस ने भी खाना पकाने से ले कर घर की सफाई वगैरह में पूरा साथ दिया.

नसरीन 2 दिन रही. तीसरे दिन खरीदारी करने मेरी बीवी के साथ गई. मगर शाम को जब मैं दफ्तर से वापस आया, तो बीवी ने बताया कि वह 4 बजे वाली गाड़ी से बड़ी मुश्किल से वापस गई है. बाजार  में मेरे सामान की सारी खरीदारी भी उस ने अपनी पसंद से की थी, जैसे कि वह मेरी पसंदनापसंद को अच्छी तरह से जानती हो. काफी दिन बीत गए.

उस के 2-3 खत आए, मगर मैं जवाब न दे सका. इधर बीवी भी बीमार थी और वह अपने पीहर गई हुई थी. एक दिन शाम के समय मैं अपने दफ्तर के एक साथी के घर दावत में जाने के लिए तैयार हो रहा था कि अचानक दरवाजा खुला और नसरीन अंदर दाखिल हुई.

मैं हैरान रह गया. आते ही वह बोली, ‘‘अरे, आप कहीं जाने की तैयारी कर रहे हैं?’’ मैं ने तब दावत में जाना ठीक न समझा. मगर बिना किसी खबर के वह भी मेरी बीवी की गैरहाजिरी में उस का आना मुझे अखर सा गया. वह मेरी खामोशी भांप गई और बोली, ‘‘क्या आप को मेरे इस तरह से अचानक आ जाने से खुशी नहीं हुई?  ‘‘मैं तो कई दिन पहले से बाजी के घर आई हुई थी.

आज वापसी के लिए स्टेशन पर पहुंची, तो खुद से एक शर्त लगा ली कि अगर आप की ओर जाने वाली गाड़ी पहले आएगी, तो आप के यहां चली आऊंगी और अगर मेरे घर की तरफ जाने वाली गाड़ी पहले आई, तो वापस अपने घर चली जाऊंगी.

‘‘अब शर्त की बात थी, आप की ओर आने वाली गाड़ी पहले आई और मुझे मजबूरन आप के पास आना पड़ा.’’ यह सुन कर मैं हंस पड़ा, और बोला ‘अरे, शर्त की क्या बात थी… यह घर तुम्हारा नहीं है क्या?’’ यह जान कर कि मेरी बीवी घर पर नहीं है, नसरीन काफी खुश हुई थी.

फिर देर रात तक वह मुझ से इधरउधर की बातों के बीच अपने शिकवेशिकायतें ले बैठी कि आप मुझे भूल गए. आप ने मुझ से क्याक्या बातें की थीं? मैं ने उसे समझाया कि अगर मैं उसे भूल जाता तो शायद उस दिन पहचान भी न पाता. हां, मैं ने उस से कभी कोई वादा नहीं किया था.

दूसरे दिन सवेरे ही मैं ने नसरीन को विदा कर दिया. वह जाने को तैयार नहीं थी, मगर मैं ने उसे लोकलाज का वास्ता दिया तो वह चली गई.  कुछ दिन बाद पत्नी के लौटने पर जब मैं ने उसे नसरीन के आने की खबर दी, तो उस के चेहरे पर नाराजगी और गुस्से के कई रंग नजर आए.

मगर वह उस कड़वाहट को खामोशी से पी गई. तकरीबन 2-3 महीने बाद नसरीन की चिट्ठी आई. मैं ने उसे जवाब देने के लिए रख लिया. मगर बाद में न तो वह चिट्ठी ही फिर दिखाई दी और न ही मुझे जवाब देना याद रहा. 2 महीने बाद उस की चिट्ठी फिर आई.

मैं ने सोचा, अब की बार उसे जरूर खत लिखूंगा. मगर वह खत भी 10-15 दिन तक आंखें बिछाए मेरी तरफ देखता रहा और फिर नजरों से ओझल हो गया. एक दिन फिर उस का खत आया, जिस में लिखा था कि अगर इस बार भी आप लोगों ने जवाब नहीं दिया, तो वह फिर कभी खत नहीं लिखेगी.

एक दिन शाम को मैं ने बीवी से कहा, ‘‘क्यों न हम अपने बंटी की तरफ से नसरीन को अपनी खैरियत का जवाब दे दें?’’ ‘‘क्यों…?’’ बीवी ने इस छोटे से लफ्ज के जरीए अपनी सारी कड़वाहट मेरे मुंह पर थूक दी. मैं ने धीरे से कहा, ‘‘किसी के खत का जवाब न देना मुझे जरा ठीक नहीं लगता.’’ ‘‘अच्छा…’’ उस ने हैरानी से चौंकते हुए जवाब दिया, ‘‘और किसी कुंआरी लड़की का किसी शादीशुदा आदमी को खत लिखना या किसी शादीशुदा आदमी का किसी कुंआरी लड़की के खत का जवाब देना या दिलवाना क्या ठीक लगता है?

अगर यह सब ठीक है, तो मेरी नजर में ऐसे किसी भी खत का जवाब न देना भी गलत नहीं हो सकता.’’ बीवी के हांफते हुए चेहरे को मैं ने आहिस्ता से अपने सीने से लगा लिया. उस के चेहरे पर उभर आई पसीने की बूंदें मेरे सीने को भिगो रही थीं. Hindi Romantic Story

Best Hindi Story: पगली – कौन थी वो अजनबी लड़की

Best Hindi Story: ‘‘आजकल आप के टूर बहुत लग रहे हैं. क्या बात है जनाब?’’ नंदिनी संजय से चुहलबाजी कर रही थी.

‘‘क्या करूं, नौकरी का सवाल है, नहीं तो तुम्हें छोड़ कर जाने का मेरा मन बिलकुल भी नहीं करता है,’’ संजय ने भी हंसी का जवाब हंसी में दे दिया.

‘‘पहले तो ऐसा नहीं था, फिर अचानक इतने ज्यादा टूर क्यों हो रहे हैं?’’ इस बार नंदिनी ने संजीदगी से पूछा था.

‘‘तो क्या घर बैठ जाऊं?’’ संजय को गुस्सा आ गया.

‘‘इस में इतना गुस्सा होने की क्या बात है? मैं तो यों ही पूछ रही थी,’’ नंदिनी बोली.

‘‘जैसा कंपनी कहेगी, वही करना पड़ेगा.’’

‘‘ठीक है, पर…’’

‘‘तुम मुझ पर शक कर रही हो…’’ संजय ने कहा, ‘‘जैसे मैं किसी और से मिलने जाता हूं… है न?’’

‘‘अरे, मैं तो मजाक कर रही थी,’’ नंदिनी ने कहा.

‘‘तुम्हारे मन में ऐसे-ऐसे खयाल आ जाते हैं, जिन का कुछ भी मतलब नहीं होता है.’’

‘‘अच्छा बाबा, माफ कर दो. मैं तो इसलिए कह रही थी कि गरमी की छुट्टियों में हम सब बच्चों के साथ कहीं बाहर घूमने चलें,’’ नंदिनी जैसे अपनी सफाई पेश कर रही थी. ‘‘ठीक है, देखते हैं,’’ संजय ने कहा.

एक दिन घर के कामकाज निबटा कर नंदिनी छत पर चली गई थी, तभी दरवाजे की घंटी बजी.

जब दरवाजा खोला, तो सामने पड़ोसन रागिनी खड़ी थी.

‘‘आओ रागिनी भाभी, अचानक कैसे आना हुआ?’’ नंदिनी ने पूछा.

‘‘तुम्हें पता है नंदिनी कि आजकल कालोनी में क्या हो रहा है.’’

‘‘ऐसा क्या हो रहा है, जो मुझे नहीं पता?’’

‘‘अरे, पिछले कई दिनों से एक पगली इस कालोनी में आई हुई है और सब बच्चे उसे छेड़ते रहते हैं.’’

‘‘हां, मैं ने भी उसे देखा है, पर बच्चों को ऐसा नहीं करना चाहिए.’’

अभी वे दोनों बातें कर ही रही थीं कि बाहर बहुत शोर सुनाई दिया. दोनों घर के बाहर आ गईं.

नंदिनी ने देखा कि एक लड़की भाग रही थी और कुछ बच्चे उस के पीछे भाग रहे थे.

नंदिनी ने उन बच्चों को डांट लगाई और उसे अपने साथ घर में ले आई.

अंदर आते ही वह लड़की बेहोश हो गई. नंदिनी ने उस के चेहरे पर पानी के छींटे मारे. होश में आने पर वह नंदिनी से लिपट कर रोने लगी.

नंदिनी ने लड़की से उस का नाम पूछा, लेकिन वह चुप रही, फिर वह जोरजोर से चिल्लाने लगी और नंदिनी से ऐसे लिपट गई, जैसे उसे कुछ याद आ गया हो.

नंदिनी ने उसे आराम से बैठाया और उसे खाने को दिया, तो वह फटाफट    5-6 रोटियां खा गई, जैसे बहुत दिनों से भूखी हो.

‘‘कौन हो तुम?’’ पड़ोसन रागिनी ने उस लड़की से पूछा, तो वह चुप रही. कई बार पूछने पर वह बोली, ‘रेवा…रेवा…रेवा.’

‘‘नंदिनी, पता नहीं यह कहां से आई है? अब इसे यहां से जाने को कह दे,’’ रागिनी ने नंदिनी को सलाह दी.

‘‘कैसी बातें कर रही हो भाभी?  कुछ देर आराम कर ले, फिर जाने को कह दूंगी,’’ नंदिनी बोली.

‘‘देख, मैं कह रही हूं कि ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए,’’ रागिनी ने उसे फिर से सम?ाने की कोशिश की.

‘‘भाभी, आप को पता है कि मैं एक एनजीओ के साथ काम कर रही हूं. मैं उन से बात करूंगी. आप परेशान न हों,’’ नंदिनी बोली.

‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी मरजी,’’ कह कर रागिनी चली गई.

नंदिनी जब वापस आई, तो देखा कि वह लड़की कमरे के एक कोने में दुबकी डरीसहमी बैठी थी.

नंदिनी ने उसे आवाज लगाई, ‘‘रेवा…’’

वह कुछ नहीं बोली, बल्कि और सिमट कर बैठ गई.

नंदिनी उस के पास गई और पूछा, ‘‘रेवा नाम है न तुम्हारा?’’

उस लड़की ने धीरे से अपना सिर ‘हां’ में हिला दिया.

नंदिनी ने उस से कहा, ‘‘देखो, डरो नहीं. बताओ, तुम कहां से आई हो? हम तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा देंगे.’’

वह लड़की इतना ही बोली, ‘‘मेरा कोई घर नहीं है बीबीजी.’’

नंदिनी को हैरानी हुई कि यह तो कहीं से पागल नहीं लग रही है.

अचानक उस लड़की ने नंदिनी के पैर पकड़ लिए. नंदिनी को उस का बदन गरम लगा. ऐसा लगता था, जैसे उसे बुखार हो.

‘‘अच्छा ठीक है, आज की रात तुम यहीं रह जाओ. कल मैं तुम्हें अपनी संस्था में ले जाऊंगी.’’

‘‘बीबीजी, आप मुझे अपने पास रख लो. मैं घर का सारा काम करूंगी,’’ कह कर वह फिर से रोने लगी.

‘‘अच्छा, आज तो तुम यहीं रहो, फिर कल देखेंगे,’’ नंदिनी बोली.

संजय रात को काफी देर से आया था. सो, उसे उस लड़की के बारे में कुछ नहीं पता था.

अगली सुबह नंदिनी ने संजय को उस लड़की के बारे में बताया.

संजय ने साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘नंदिनी, इस को अभी घर से निकालो, पता नहीं कौन है….’’

‘‘हां संजय, लेकिन अभी मैं इसे अपनी संस्था में ले जाती हूं.’’

‘‘मैं रात को घर आऊं, तो मु?ो कोई बखेड़ा नहीं चाहिए,’’ कह कर संजय चला गया.

नंदिनी नीचे आई, तो देखा कि उस लड़की को तेज बुखार था.

रात को संजय ने नंदिनी से पूछा, ‘‘क्या वह लड़की चली गई?’’

नंदिनी ने कहा, ‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों…?’’ संजय बोला.

‘‘संजय, उसे बहुत तेज बुखार है और ऐसी हालत में वह लड़की कहां जाएगी? अगर वह मर गई तो…’’

‘‘मु?ो नहीं पता,’’ कहते हुए संजय नीचे चला गया.

वहां वह लड़की बेहोश पड़ी थी. पता नहीं क्यों संजय उसे देख कर हैरानी में पड़ गया.

‘‘नंदिनी, शायद तुम ठीक कह रही हो. अगर यह यहां से गई और मर गई, तो क्या होगा?’’

‘‘फिर क्या करें?’’

‘‘ऐसा करते हैं, जब तक यह ठीक नहीं हो जाती, इसे अपने पास ही रख लेते हैं.’’

‘‘ठीक है.’’

आजकल करतेकरते कई दिन हो गए, पर रेवा वहां से न जा सकी.

वैसे, नंदिनी अब तक सिर्फ इतना ही जान पाई कि वह एक पहाड़ी लड़की थी और किसी बाबूजी से मिलने आई थी.

‘‘तुम्हें यहां कौन छोड़ गया है?’’ नंदिनी ने पूछा.

‘‘मेरे गांव में कई लोग यहां पर फेरी लगाने आते हैं. उन्हीं लोगों के साथ मैं भी आ गई.’’

‘‘देखो, अगर तुम हमें अपने गांव का नामपता बता दोगी, तो हम तुम्हें वहां पहुंचा देंगे,’’ नंदिनी ने कहा.

‘‘मैं पहली बार अपने गांव से बाहर निकली हूं और मु?ो तो यह भी नहीं पता कि मेरे गांव का क्या नाम है.’’

पता नहीं, वह सच बोल रही थी या ?ाठ, पर नंदिनी को उस की बातों पर कभी भरोसा हो जाता, तो कभी नहीं.

अभी रेवा को आए हुए कुछ समय ही बीता था कि नंदिनी को पता चला कि वह मां बनने वाली है.

नंदिनी हैरानी में पड़ गई कि अब वह क्या करे. उस ने रेवा से पूछा कि यह सब क्या है? कौन है इस बच्चे का पिता? लेकिन रेवा का एक ही जवाब होता, ‘‘बीबीजी, मु?ो नहीं पता. शायद पागलपन के दौरे में मेरा किसी ने फायदा उठा लिया होगा.’’

‘‘तू याद करने की कोशिश तो कर, शायद याद आ जाए.’’

‘‘नहीं बीबीजी, क्योंकि जब मु?ो दौरा पड़ता है, तो उस वक्त की सारी बातें मैं भूल जाती हूं.’’

नंदिनी को कुछ भी सम?ा नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

उस ने संजय से बात की. यह सब सुन कर वह भड़क उठा, ‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था कि इस ?ां?ाट में मत फंसो. अब भुगतो.’’

‘‘तो क्या उसे घर से निकाल दूं?’’

‘‘अब क्या घर से निकालोगी? रहने दो अब.’’

नंदिनी ने अपने पड़ोसियों से बात की. सब ने यही राय दी कि उसे फौरन घर से निकाल देना चािहए.

पर नंदिनी रेवा को वहां से जाने के लिए एक बार भी नहीं कह पाई.

रेवा के मां बनने का समय भी आ गया था. नंदिनी अब तक एक बड़ी बहन की तरह रेवा की देखभाल कर रही थी.

रेवा को एक बहुत ही प्यारा बेटा हुआ. उस बच्चे को देख कर नंदिनी को अपने बच्चों के बचपन याद आ गए.

ठीक होने के बाद रेवा ने फिर से घर के काम करने शुरू कर दिए थे. सबकुछ ठीक चल रहा था कि अचानक एक दिन सुबह नंदिनी ने देखा कि रसोई बिखरी पड़ी है. इस का मतलब अभी तक रेवा नहीं आई थी.

कुछ देर उस का इंतजार करने के बाद नंदिनी उस के कमरे में आई, तो देखा कि रेवा कमरे में नहीं थी और उस का बच्चा पलंग पर सो रहा था.

नंदिनी ने बच्चे को गोद में उठा लिया. बच्चे के पास एक चिट्ठी रखी  थी. नंदिनी ने उसे पढ़ना शुरू किया:

‘दीदी, मैं पागल नहीं हूं, लेकिन मु?ो पागल बनना पड़ा, क्योंकि अगर मैं ऐसा नहीं करती, तो आप मु?ो अपने घर में नहीं रखतीं.

‘मैं बहुत गरीब घर से हूं. कुछ समय पहले संजय साहब मेरे गांव आए थे. उन्होंने मु?ो एक अच्छी जिंदगी के सपने दिखाए, लेकिन बदले में आप ने जान ही लिया होगा कि मैं ने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है.

‘दीदी, मैं ने ही साहब को मजबूर किया था कि अगर वे मु?ो अपने घर में नहीं रहने देंगे, तो मैं आप को सबकुछ सच बता दूंगी.

‘साहब जैसे भी हैं, लेकिन वह अपना घर नहीं तोड़ना चाहते हैं. अगर मैं चाहती, तो आप के घर रह सकती थी, लेकिन मैं जानती हूं कि सच को ज्यादा दिनों तक नहीं छिपाया जा सकता.

‘दीदी, आप इतनी अच्छी हैं कि कभीकभी मु?ो लगता था कि मैं आप के साथ बेईमानी कर रही हूं, लेकिन इस बच्चे की वजह से चुप कर जाती थी.

‘दीदी, अब यह आप का बच्चा है. आप जैसे चाहें इस की परवरिश कर सकती हैं.

‘मैं ने साहब को माफ कर दिया है. आप भी उन को माफ कर दो.’

नंदिनी चिट्ठी पढ़ कर मानो आसमान से नीचे गिर पड़ी. इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा गुनाह. उस की आंखों के सामने सबकुछ होता रहा और उसे पता भी नहीं चला.

उस ने कभी भी संजय और रेवा को एकसाथ नहीं देखा था और न ही दोनों को कभी बातें करते सुना था, तो फिर कब…?

नंदिनी को लगा कि कमरे की दीवारें चीखचीख कर कह रही हैं, ‘नंदिनी, पगली वह नहीं तू थी, जो अपने पति और एक अनजान लड़की पर भरोसा कर बैठी. पगली…पगली…पगली…’ Best Hindi Story

Hindi Family Story: इज्जत का रखवाला – कमलेश का मनचलापन

Hindi Family Story: कमलेश ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर भरपूर अंगड़ाई ली. उस के कसे, भरेभरे उभार मानो सामने खड़े गांव के मंदिर के पुजारी रामकिशन को खुला न्योता देते हुए लग रहे थे.

कमलेश ने उस पुजारी को सुबह के 4 बजे झठ बोल कर अपने घर में बुला लिया था. वह घर में अकेली थी. वहां दूसरा कोई न था. कमलेश उस पुजारी से अपनी हसरतों को पूरा करना चाहती थी.

कमलेश ने आगे बढ़ कर रामकिशन का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचना चाहा, मगर उस ने अपना हाथ छुड़ा लिया.

पुजारी रामकिशन की पत्नी की मौत 10 साल पहले हो चुकी थी. तब से उस की जिंदगी बेरंग हो गई थी.

आज कमलेश के इस तरह अपने घर बुलाने पर वह हैरान था. क्या उसे पूरे गांव में कोई दूसरा जवां मर्द नहीं मिला? किसी गांव वाले ने उसे कमलेश के साथ देख लिया, तो बदनामी हो जाएगी.

रामकिशन अपनी बेइज्जती होने के डर से कांप उठा था. वह कमलेश से बोला, ‘‘क्या तुझे इस गांव में कोई जवां मर्द नहीं मिला, जो मुझ बूढ़े को बहाने से बुला लाई? तुझे क्या अपने पति की बदनामी का जरा भी डर नहीं है?’’

‘‘पुजारीजी, मेरा पति पैसा कमाने बाहर गया है. इस बात को 5 महीने हो गए हैं. वह कब आएगा, पता नहीं. मैं प्यासी तड़प रही हूं,’’ कमलेश ने बताया.

पुजारी ने उसे समझाना चाहा, ‘‘अगर ऐसी बात है, तो तुझे कभी नहीं गिरना चाहिए. वह अगर तेरे लिए पैसा कमाने गया है, तो तुझे उस की अमानत किसी तीसरे के सामने नहीं परोसनी चाहिए. औरत तो घर की इज्जत होती है.’’

‘‘पुजारीजी, धर्मकर्म की बातें बुढ़ापे में ही याद आती हैं. जवानी की आग में सुलगती औरत को उपदेश नहीं, बल्कि मुहब्बत की बारिश की जरूरत होती है, जिस से उस की प्यास बुझ सके,’’ कमलेश ने अपनी समस्या बताई, तो पुजारी परेशान होता हुआ बोला, ‘‘तू गांव का कोई जवान देख, मुझ बूढ़े को क्यों पाप का भागीदार बना रही है?’’

‘‘जवान तो गांव में बहुत हैं, जो मेरे एक इशारे पर मरमिटने को तैयार हैं, मगर मैं अपने पति के कहने में बंधी हुई हूं,’’ कमलेश ने रामकिशन के सामने यह बात रखी, तो वह चौंक उठा.

‘‘क्या तेरे पति ने जाते समय ऐसा करने को कहा था? बड़ा अजीब

आदमी है,’’ रामकिशन ने हैरत भरे लहजे में पूछा.

कमलेश ने बताया, ‘‘जब मेरा पति जाने लगा था, तो उस ने मुझे चरित्रवान रहने की बात कही थी.’’

कमलेश तो अपने पति को बाहर भेजने के हक में नहीं थी. जब उस के पति ने अपनी मजबूरी जाहिर की, तो कमलेश ने भी उस की सब्र रखने वाली बात को नकार दिया था.

जब कमलेश किसी तरह नहीं मानी, तब उस के पति अमर ने उसे समझाने की गरज से सलाह दी थी, ‘मेरी जान, अगर तुम मेरी जुदाई में सब्र नहीं रख पाओ, तो तुम सुबह के 4 बजे अकेले घर से निकलना और तुम्हें जो भी पहला मर्द मिले, उस से संबंध जोड़ सकती हो. लेकिन महीने में केवल एक बार.’

अमर की यह अजीबोगरीब सलाह कमलेश खुशीखुशी मान गई. पुजारी रामकिशन ने पूछा, ‘‘तब तुम ने क्या किया?’’

‘‘कई बार मैं सुबह 4 बजे अपनी इच्छा पूरी करने के लिए घर से निकली. आज कितनी कोशिशों के बाद तुम मिले हो, इसलिए तुम्हें मुझे खुश करना होगा, वरना मैं शोर मचा कर तुम पर बलात्कार का आरोप लगा दूंगी.’’

रामकिशन सिर से ले कर पैर तक कांप उठा. उसे अपनेआप को बचाना मुश्किल लग रहा था, फिर भी उस ने दिमाग से काम लेना चाहा.

‘‘तुम ने अच्छा फैसला लिया है. तुम्हारे साथ मुझे प्यारमुहब्बत का खेल खेलना चाहिए. लेकिन मैं तुम से थोड़ा उम्र में बड़ा हूं. अभी तुम मुझे घर जाने दो, ताकि मैं थोड़ी जड़ीबूटी खा कर जोशीला हो जाऊं. मैं आज रात को दोबारा आ जाऊंगा,’’ रामकिशन ने कमलेश को समझाते हुए कहा, तो उस ने उसे घर जाने दिया.

लेकिन उस रात को रामकिशन कमलेश के घर नहीं गया. अब तो उस ने सुबहसवेरे टहलने जाना बंद कर दिया था.

कमलेश कितनी बार बहाने से मंदिर भी आई, मगर वहां कोई न कोई रामकिशन के पास बैठा होता था.

धीरेधीरे दिन गुजरने लगे. एक दिन रामकिशन सुबहसवेरे नदी पर नहाने चला गया. नहाने के बाद वह जैसे ही मुड़ा, अचानक कमलेश उस के सामने आ धमकी. वह रामकिशन का हाथ पकड़ कर अपने घर की ओर खींचने की कोशिश करने लगी.

इसी खींचातानी में रामकिशन के हाथ से मिट्टी का लोटा टूट गया. यह देख कर वह रोने लगा.

कमलेश हैरान होते हुए पूछने लगी, ‘‘यह मिट्टी का लोटा ही तो टूटा है, तुम रोते क्यों हो? मैं तुम्हें इस मिट्टी के लोटे के बदले में स्टील या पीतलतांबे का बढि़या सा लोटा दे दूंगी.’’

‘‘मैं लोटा टूटने पर इसलिए रो रहा हूं, क्योंकि इसे मेरी पत्नी ने मेरे लिए 10 साल पहले एक मेले में खरीदा था. अब वह जिंदा नहीं है. मैं इस लोटे को देख कर तसल्ली कर लेता था कि वह आज भी मेरे साथ है. पर आज लोटा टूट गया है.

‘‘ऐसा लग रहा है, जैसे वह सचमुच मुझ से अलग हो कर बहुत दूर चली गई है.’’

कमलेश यह सब देख कर मन ही मन पिघलने लगी. उसे रामकिशन की वफादारी पर हैरानी हो रही थी.

वह सोच रही थी कि एक वह है, जिस का पति परदेश पैसा कमाने गया है. वह कुछ दिनों के बाद जरूर लौट कर आएगा, क्योंकि वह वादा कर के गया है. वह फिर भी अपने तन की भूख मिटाने के लिए गिरने पर आमादा है.

पुजारी रामकिशन अब भी रो रहा था. सुबह का उजाला चारों तरफ फैलने लगा था.

कमलेश अब भी सोच रही थी कि इतनी सुबह तो रामकिशन जैसे सज्जन ही घर से बाहर निकलते हैं. अगर वह दिन के उजाले में किसी मनचले से उलझ जाती, तो वासना की दलदल में बुरी तरह फंस जाती. बदनामी मिलती सो अलग. तब वह अपनी गृहस्थ जिंदगी बरबाद होने से नहीं बचा पाती.

पुजारी रामकिशन ने कमलेश को तबाह होने से बचा लिया था. वह तो उस की इज्जत का रखवाला निकला. Hindi Family Story

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