सिसकता शैशव : अमान का अबोध बचपन- भाग 1

जिस उम्र में बच्चे मां की गोद में लोरियां सुनसुन कर मधुर नींद में सोते हैं, कहानीकिस्से सुनते हैं, सुबहशाम पिता के साथ आंखमिचौली खेलते हैं, दादादादी के स्नेह में बड़ी मस्ती से मचलते रहते हैं, उसी नन्हीं सी उम्र में अमान ने जब होश संभाला, तो हमेशा अपने मातापिता को लड़तेझगड़ते हुए ही देखा. वह सदा सहमासहमा रहता, इसलिए खाना खाना बंद कर देता. ऐसे में उसे मार पड़ती. मांबाप दोनों का गुस्सा उसी पर उतरता. जब दादी अमान को बचाने आतीं तो उन्हें भी झिड़क कर भगा दिया जाता. मां डपट कर कहतीं, ‘‘आप हमारे बीच में मत बोला कीजिए, इस से तो बच्चा और भी बिगड़ जाएगा. आप ही के लाड़ ने तो इस का यह हाल किया है.’’

फिर उसे आया के भरोसे छोड़ कर मातापिता अपनेअपने काम पर निकल जाते. अमान अपने को असुरक्षित महसूस करता. मन ही मन वह सुबकता रहता और जब वे सामने रहते तो डराडरा रहता. परंतु उन के जाते ही अमान को चैन की सांस आती, ‘चलो, दिनभर की तो छुट्टी मिली.’

आया घर के कामों में लगी रहती या फिर गपशप मारने बाहर गेट पर जा बैठती. अमान चुपचाप जा कर दादी की गोद में घुस कर बैठ जाता. तब कहीं जा कर उस का धड़कता दिल शांत होता. दादी के साथ उन की थाली में से खाना उसे बहुत भाता था. वह शेर, भालू और राजारानी के किस्से सुनाती रहतीं और वह ढेर सारा खाना खाता चला जाता.

बीचबीच में अपनी जान बचाने को आया बुलाती, ‘‘बाबा, तुम्हारा खाना रखा है, खा लो और सो जाओ, नहीं तो मेमसाहब आ कर तुम्हें मारेंगी और मुझे डांटेंगी.’’

अमान को उस की उबली हुई सब्जियां तथा लुगदी जैसे चावल जहर समान लगते. वह आया की बात बिलकुल न सुनता और दादी से लिपट कर सो जाता. परंतु जैसेजैसे शाम निकट आने लगती, उस की घबराहट बढ़ने लगती. वह चुपचाप आया के साथ आ कर अपने कमरे में सहम कर बैठ जाता.

घर में घुसते ही मां उसे देख कर जलभुन जातीं, ‘‘अरे, इतना गंदा बैठा है, इतना इस पर खर्च करते हैं, नित नए कपड़े लाला कर देते हैं, पर हमेशा गंदा रहना ही इसे अच्छा लगता है. ऐसे हाल में मेरी सहेलियां इसे देखेंगी तो मेरी तो नाक ही कट जाएगी.’’ फिर आया को डांट पड़ती तो वह कहती, ‘‘मैं क्या करूं, अमान मानता ही नहीं.’’

फिर अमान को 2-4 थप्पड़ पड़ जाते. आया गुस्से में उसे घसीट कर स्नानघर ले जाती और गुस्से में नहलातीधुलाती.

नन्हा सा अमान भी अब इन सब बातों का अभ्यस्त हो गया था. उस पर अब मारपीट का असर नहीं होता था. वह चुपचाप सब सहता रहता. बातबात में जिद करता, रोता, फिर चुपचाप अपने कमरे में जा कर बैठ जाता क्योंकि बैठक में जाने की उस को इजाजत नहीं थी. पहली बात तो यह थी कि वहां सजावट की इतनी वस्तुएं थीं कि उन के टूटनेफूटने का डर रहता और दूसरे, मेहमान भी आते ही रहते थे. उन के सामने जाने की उसे मनाही थी.

जब मां को पता चलता कि अमान दादी के पास चला गया है तो वे उन के पास लड़ने पहुंच जातीं, ‘‘मांजी, आप के लाड़प्यार ने ही इसे बिगाड़ रखा है, जिद्दी हो गया है, किसी की बात नहीं सुनता. इस का खाना पड़ा रहता है, खाता नहीं. आप इस से दूर ही रहें, तो अच्छा है.’’

सास समझाने की कोशिश करतीं, ‘‘बहू, बच्चे तो फूल होते हैं, इन्हें तो जितने प्यार से सींचोगी उतने ही पनपेंगे, मारनेपीटने से तो इन का विकास ही रुक जाएगा. तुम दिनभर कामकाज में बाहर रहती हो तो मैं ही संभाल लेती हूं. आखिर हमारा ही तो खून है, इकलौता पोता है, हमारा भी तो इस पर कुछ अधिकार है.’’

कभी तो मां चुप  हो जातीं और कभी दादी चुपचाप सब सुन लेतीं. पिताजी रात को देर से लड़खड़ाते हुए घर लौटते और फिर वही पतिपत्नी की झड़प हो जाती.

अमान डर के मारे बिस्तर में आंख बंद किए पड़ा रहता कि कहीं मातापिता के गुस्से की चपेट में वह भी न आ जाए. उस का मन होता कि मातापिता से कहे कि वे दोनों प्यार से रहें और उसे भी खूब प्यार करें तो कितना मजा आए. वह हमेशा लाड़प्यार को तरसता रहता.

इसी प्रकार एक वर्र्ष बीत गया और अमान का स्कूल में ऐडमिशन करा दिया गया. पहले तो वह स्कूल के नाम से ही बहुत डरा, मानो किसी जेलखाने में पकड़ कर ले जाया जा रहा हो. परंतु 1-2 दिन जाने के बाद ही उसे वहां बहुत आनंद आने लगा. घर से तैयार कर, टिफिन ले कर, पिताजी उसे स्कूटर से स्कूल छोड़ने जाते. यह अमान के लिए नया अनुभव था.

स्कूल में उसे हमउम्र बच्चों के साथ खेलने में आनंद आता. क्लास में तरहतरह के खिलौने खेलने को मिलते. टीचर भी कविता, गाना सिखातीं, उस में भी अमान को आनंद आने लगा. दोपहर को आया लेने आ जाती और उस के मचलने पर टौफी, बिस्कुट इत्यादि दिला देती. घर जा कर खूब भूख लगती तो दादी के हाथ से खाना खा कर सो जाता. दिन आराम से कटने लगे.

परंतु मातापिता की लड़ाई, मारपीट बढ़ने लगी, एक दिन रात में उन की खूब जोर से लड़ाई होती रही. जब सुबह अमान उठा तो उसे आया से पता चला कि मां नहीं हैं, आधी रात में ही घर छोड़ कर कहीं चली गई हैं.

पहले तो अमान ने राहत सी महसूस की कि चलो, रोज की मारपीट  और उन के कड़े अनुशासन से तो छुट्टी मिली, परंतु फिर उसे मां की याद आने लगी और उस ने रोना शुरू कर दिया. तभी पिताजी उठे और प्यार से उसे गोदी में बैठा कर धीरेधीरे फुसलाने लगे, ‘‘हम अपने बेटे को चिडि़याघर घुमाने ले जाएंगे, खूब सारी टौफी, आइसक्रीम और खिलौने दिलाएंगे.’’

पिता की कमजोरी का लाभ उठा कर अमान ने और जोरों से ‘मां, मां,’ कह कर रोना शुरू कर दिया. उसे खातिर करवाने में बहुत मजा आ रहा था, सब उसे प्यार से समझाबुझा रहे थे. तब पिताजी उसे दादी के पास ले गए. बोले, ‘‘मांजी, अब इस बिन मां के बच्चे को आप ही संभालिए. सुबहशाम तो मैं घर में रहूंगा ही, दिन में आया आप की मदद करेगी.’’

अंधे को क्या चाहिए, दो आंखें, दादी, पोता दोनों प्रसन्न हो गए.

नए प्रबंध से अमान बहुत ही खुश था. वह खूब खेलता, खाता, मस्ती करता, कोई बोलने, टोकने वाला तो था नहीं, पिताजी रोज नएनए खिलौने ला कर देते, कभीकभी छुट्टी के दिन घुमानेफिराने भी ले जाते. अब कोई उसे डांटता भी नहीं था.

स्कूल में एक दिन छुट्टी के समय उस की मां आ गईं. उन्होंने अमान को बहुत प्यार किया और बोलीं, ‘‘बेटा, आज तेरा जन्मदिन है.’’ फिर प्रिंसिपल से इजाजत ले कर उसे अपने साथ घुमाने ले गईं. उसे आइसक्रीम और केक खिलाया, टैडीबियर खिलौना भी दिया. फिर घर के बाहर छोड़ गईं.

जब अमान दोनों हाथभरे हुए हंसताकूदता घर में घुसा तो वहां कुहराम मचा हुआ था. आया को खूब डांट पड़ रही थी. पिताजी भी औफिस से आ गए थे, पुलिस में जाने की बात हो रही थी. यह सब देख अमान एकदम डर गया कि क्या हो गया.

पिताजी ने गुस्से में आगे बढ़ कर उसे 2-4 थप्पड़ जड़ दिए और गरज कर बोले, ‘‘बोल बदमाश, कहां गया था? बिना हम से पूछे उस डायन के साथ क्यों गया? वह ले कर तुझे उड़ जाती तो क्या होता?’’

दादी ने उसे छुड़ाया और गोद में छिपा लिया. हाथ का सारा सामान गिर कर बिखर गया. जब खिलौना उठाने को वह बढ़ा तो पिता फिर गरजे, ‘‘फेंक दो कूड़े में सब सामान. खबरदार, जो इसे हाथ लगाया तो…’’

वह भौचक्का सा खड़ा था. उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या? क्यों पिताजी इतने नाराज हैं?

2 दिनों बाद दादी ने रोतरोते उस का सामान और नए कपड़े अटैची में रखे. अमान ने सुना कि पिताजी के साथ वह दार्जिलिंग जा रहा है. वह रेल में बैठ कर घूमने जा रहा था, इसलिए खूब खुश था. उस ने दादी को समझाया, ‘‘क्यों रोती हो, घूमने ही तो जा रहा हूं. 3-4 दिनों में लौट आऊंगा.’’

दार्जिलिंग पहुंच कर अमान के पिता अपने मित्र रमेश के घर गए. दूसरे दिन उन्हीं के साथ वे एक स्कूल में गए. वहां अमान से कुछ सवाल पूछे गए और टैस्ट लिया गया. वह सब तो उसे आता ही था, झटझट सब बता दिया. तब वहां के एक रोबीले अंगरेज ने उस की पीठ थपथपाई और कहा, ‘‘बहुत अच्छे.’’ और टौफी खाने को दी.

परंतु अमान को वहां कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. वह घर चलने की जिद करने लगा. उसे महसूस हुआ कि यहां जरूर कुछ साजिश चल रही है.

उस के पिताजी कितनी देर तक न जाने क्याक्या कागजों पर लिखते रहे, फिर उन्होंने ढेर सारे रुपए निकाल कर दिए. तब एक व्यक्ति ने उन्हें स्कूल और होस्टल घुमा कर दिखाया. पर अमान का दिल वहां घबरा रहा था. उस का मन आशंकित हो उठा कि जरूर कोई गड़बड़ है. उस ने अपने पिता का हाथ जोर से पकड़ लिया और घर चलने के लिए रोने लगा.

बचाने वाला महान : क्यों खतरे में थी गुलाबो की जिंदगी

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का मझला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले. कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा. बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे समझ रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो

2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से समझना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मुझ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मुझे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उलझ थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुड़िया? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मुझे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मुझे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मुझे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग समझोंगे कि मुझे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई.

फलक तक : कैसे चुना स्वर्णिमा ने अपना नया भविष्य

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चाहत की शिकार : कैसे बरबाद हुई आनंद की जिंदगी

कुलमिला कर उस की जिंदगी की गाड़ी ठीकठाक चल रही थी. श्वेता से उस का परिचय होने के बाद तो जिंदगी में कोई कमी ही नहीं रह गई थी. बीचबीच में श्वेता उस के पास आती थी और उस की रातों को गुलजार कर जाया करती थी. वह अपनी जिंदगी से काफी संतुष्ट था खासकर श्वेता के आने के बाद से.

श्वेता समयसमय पर उस से थोड़ेबहुत पैसे लेती रहती थी, पर उसे इस का जरा भी अफसोस नहीं था, क्योंकि बदले में उसे श्वेता से काफीकुछ मिलता भी था.

परेशानी तब हुई, जब श्वेता की मांग दिनबदिन बढ़ने लगी. एक दिन तो उस ने उस से बड़ी मांग कर दी, ‘‘आनंद, मुझे 50,000 रुपए की सख्त जरूरत है,’’ यह उस ने आनंद के बालों में प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘क्या… 50,000 रुपए? तुम पागल तो नहीं हो गई हो क्या श्वेता?’’ आनंद ने चौंक कर उठते हुए कहा था.

‘‘क्या तुम मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते? पहली बार तुम मुझे मना कर रहे हो. क्या इतना ही प्यार है तुम्हारे दिल में मेरे लिए या फिर मुझ से मन भर गया है?’’ श्वेता ने प्यार से कहा.

‘‘देखो, जो रकम मेरे बस में है, वह मैं तुम्हें दे सकता हूं, पर 50,000 रुपए… इतने रुपए तो मेरी सालभर की तनख्वाह के बराबर हैं,’’ आनंद ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘7 साल की तनख्वाह के बराबर तो नहीं हैं न?’’ एकाएक श्वेता का रुख बदल गया.

‘‘अगर मैं पुलिस में शिकायत कर दूं तो 7 साल के लिए हवालात में चले जाओगे. सीसीटीवी कैमरे में सुबूत हैं कि तुम मुझे अपने साथ लाते रहे हो. यहां की हर गलीनुक्कड़ में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. मेरे कपड़ों पर तुम्हारी करतूत के सुबूत भी हैं. वैसे भी आजकल ‘मी टू’ के चलते बड़ेबड़ों की हालत खराब है, फिर तुम्हारी क्या बिसात है?’’

‘‘यह क्या कह रही हो श्वेता… मैं ने तो कभी तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं की. तुम पैसे के बदले मेरे पास आती रही हो,’’ आनंद ने दलील दी.

‘‘देखो, 50,000 रुपए तो मुझे हर हाल में चाहिए ही चाहिए. तुम कैसे इंतजाम करोगे, यह तुम जानो. एक हफ्ते का समय है तुम्हारे पास,’’ कहते हुए श्वेता चली गई और आनंद हैरान सा उसे जाते हुए देखता रहा.

इस के बाद से आनंद काफी चिंतित रहने लगा था. उस की कुल तनख्वाह 6,000 रुपए महीने थी जिस में से 2-3 हजार रुपए तो वह श्वेता पर ही लुटा देता था. 1,000 रुपए घर भेज दिया करता था. बाकी उस के खानेपीने पर खर्च हो जाया करते थे. पैसों के लिए एकमात्र सहारा उस का मालिक था जो 1-2 महीने से ज्यादा की एडवांस तनख्वाह नहीं दे सकता था.

तो फिर क्या किया जाए? अगर श्वेता ने पुलिस में शिकायत कर दी तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे. एक साल पहले ही वह मुंबई आया था. कोई ऐसा जानकार भी नहीं था जिस से उसे पैसों की मदद मिल सके.

आनंद मुंबई के दादर इलाके में एक प्लाट पर बने छोटे से झोंपड़ीनुमा मकान में रहता था. प्लाट के मालिक ने प्लाट की देखभाल के लिए उसे वहां टिका दिया था. प्लाट के मालिक की उस प्लाट पर एक बहुमंजिला अपार्टमैंट्स बनाने की योजना थी जिस के लिए बिल्डरों से बात चल रही थी.

आनंद को महज 6,000 रुपए तनख्वाह मिलती थी. घर पर बेकार बैठे रहने के बजाय यह भी बुरा न था. न जाने कितने लोग मुंबई जैसे बड़े शहरों में मामूली तनख्वाह पर काम करने आते हैं क्योंकि उन के पास और कोई काम नहीं होता. कइयों को तो काफी खराब हालात में रहना पड़ता है, पर वह संतुष्ट था. रहने को झोंपड़ी थी ही. वहीं कुछ कच्चापक्का बना कर खा लेता था. बिजलीपानी की सुविधा चौबीसों घंटे थी जिस का बिल मालिक अदा करता था.

काफी सोचविचार के बाद आनंद के दिमाग में एक ही उपाय आया श्वेता को रास्ते से हटाने का. उस की हत्या कर देना, पर लाश को कहां और कैसे ठिकाने लगाएगा, यह बहुत बड़ी समस्या थी.

काफी सोचविचार के बाद आनंद ने लाश को प्लाट के एक कोने में फेंक कर खुद पुलिस को सूचित करने की योजना सोची. वह खुद शिकायत करेगा तो पुलिस को शक भी नहीं होगा.

अगली बार जब श्वेता आई तो आनंद ने उस का दिल खोल कर स्वागत किया.

‘‘जैसेतैसे मैं ने रुपयों का इंतजाम किया है. आगे से इतनी बड़ी रकम मत मांगना. मैं गरीब आदमी कहां से इतनी बड़ी रकम लाऊंगा?’’ आनंद ने श्वेता को बांहों में भरते हुए कहा.

श्वेता को इस बात से मतलब नहीं था कि आनंद ने रुपयों का इंतजाम कहां से किया है. मन ही मन उस ने सोचा, ‘रुपए तो मैं तुम से हमेशा मांगूंगी. आखिर मजबूरी में तुम्हें अपना जिस्म देती हूं तो उस का भुगतान तो देना ही होगा.’

श्वेता बोली, ‘‘अगर जरूरत नहीं होती तो तुम्हें क्यों तकलीफ देती…’’

फिर वे दोनों एकदूसरे के आगोश में समा गए. आनंद सोच रहा था कि वह आखिरी बार श्वेता के जिस्म को भोग रहा है, इस के बाद तो इसे खत्म कर देना है इसलिए वह जम कर उस के बदन का मजा ले रहा था.

श्वेता सोच रही थी कि आज 50,000 रुपए लेने के बाद फिर कब उस से रकम मांगनी है.

मौका पा कर आनंद ने श्वेता का गला दबा दिया, फिर चाकू से गले को रेत दिया और लाश को एक कोने में जा कर फेंक दिया.

आनंद को अपने प्लान पर पूरा भरोसा था, इसलिए वह आराम से सो गया. अगले दिन सुबह उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर जानकारी दी कि एक औरत की लाश प्लाट के एक कोने में पड़ी हुई है.

आनंद को यह गुमान था कि पुलिस को आसानी से चकमा दिया जा सकता है और इस के लिए उस ने खुद पुलिस से शिकायत करने की तरकीब अपनाई थी. शिकायत करने वाले पर पुलिस भला क्यों शक करेगी, उस ने यही सोचा था.

पुलिस ने आ कर सब से पहले श्वेता को अस्पताल पहुंचाया, जहां उसे ‘मृत लाया गया’ घोषित कर दिया. पुलिस ने अनजान शख्स के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

आनंद बहुत खुश हुआ. उसे अपनी योजना कामयाब होती दिखाई दी, पर उसे पता नहीं था कि पुलिस शक के आधार पर उस से पूछताछ शुरू कर देगी. विरोधाभाषी बयानों के चलते वह पकड़ में आ गया और फिर मामला सुलझ गया.

आनंद ज्यादा देर तक पुलिस के सामने टिक नहीं पाया और उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. वही पुलिस को उस जगह पर भी ले गया जहां उस ने हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू छिपा कर रखा था.

इस तरह श्वेता के लालच ने उस की जिंदगी खत्म करवा दी और जिस्मानी आकर्षण ने आनंद की जिंदगी बरबाद कर दी.

सूनी मांग का दर्द: सालों बाद चंपा के घर कौन आया था

थोड़ी ही देर में चंपा उस के पास आ कर बोली, ‘‘बाईजी, कोई तरुण आए हैं.’’

‘‘तरुण….’’ वह हतप्रभ रह गई. शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. उस ने फिर पूछा, ‘‘तरुण कि अरुण…’’

‘‘कुछ ऐसा ही नाम बताया बाईजी.’’

वह ‘उफ’ कर रह गई. लंबी आह भर कर उस ने सोचा, बड़ा अंतर है तरुण व अरुण में. एक वह जो उस के रोमरोम में समाया हुआ है और दूसरा वह जो बिलकुल अनजान है….फिर सोचा, अरुण ही होगा. तरुण नाम का कोई व्यक्ति तो उसे जानता ही नहीं. यह खयाल आते ही उस का रोमरोम पुलकित हो उठा. तुरंत हाथ धो कर वह दौड़ती हुई बाहर पहुंची, देखा तो अरुण नहीं था.

‘‘आप अर्पणा हैं न?’’ आने वाले पुरुष के शब्द उस के कानों में पडे़.

‘‘जी…’’

‘‘मैं अरुण का दोस्त हूं तरुण.’’

मन में तो उस के आया, कह दे कि तुम ने ऐसा नाम क्यों रखा, जिस से अरुण का भ्रम हो लेकिन प्रत्यक्ष में होंठों पर मुसकराहट बिखेरते हुए बोली, ‘‘आइए, अंदर बैठिए…चाय तो लेंगे,’’ और बिना उस के जवाब की प्रतीक्षा किए अंदर चली गई.

चाय की केतली गैस पर रखी तो यादों का उफान फिर उफन गया. कैसा होगा अरुण….उसे याद करता भी है…जरूर करता होगा, तभी तो उस ने अपने दोस्त को भेजा है. कोई खबर तो लाया ही होगा…तभी चाय उफन गई. उस ने जल्दी गैस बंद की और चाय ले कर बैठक में आ गई.

‘‘आप ने व्यर्थ कष्ट किया. मैं तो चाय पी कर आया था.’’

‘‘कष्ट कैसा, आप पहली बार तो मेरे घर आए हैं.’’

तरुण चुपचाप चाय की चुस्कियां भरने लगा. उस की खामोशी अपर्णा को अंदर से बेचैन कर रही थी कि  कुछ बताए भी…कैसा है अरुण? कहां है? कैसे आना हुआ?

यही हाल तरुण का था, बोलने को बहुत कुछ था लेकिन बात कहां से शुरू की जाए, तरुण कुछ सोच नहीं पा रहा था. आखिर अपर्णा ने ही खामेशी तोड़ी, ‘‘अरुण कैसे हैं? ’’

‘‘उस का एक्सीडेंट हो गया है….’’

‘‘क्या?’’ अपर्णा की चीख ही निकल गई.

‘‘अभी 2 हफ्ते पहले वह फैक्टरी से घर जा रहा था कि अचानक उस की कार के सामने एक बच्चा आ गया. बच्चे को बचाने के लिए उस ने जैसे ही कार दाईं ओर मोड़ी कि उधर से आते ट्रक से एक्सीडेंट हो गया.’’

‘‘ज्यादा चोट तो नहीं आई?’’

‘‘बड़ा भयंकर एक्सीडेंट था. उसे देख कर रोंगटे खडे़ हो गए थे. ट्रक से टकरा कर कार नीचे खड्डे में जा गिरी थी. पेट में गहरा घाव है. सिर किसी तरह बच गया पर अभी भी बेहोशी छाई रहती है.’’

‘‘मुझे खबर नहीं दी?’’

‘‘खबर कौन देता? अरुण के डैडी को आप के नाम से चिढ़ है. अरुण पर उन्होंने कितनी बंदिशें नहीं लगाईं, कितनी डांट उसे नहीं पिलाई, फिर भी वह आप को नहीं भुला सका. रातरात भर आप की याद में तड़पता रहा. आप को तो पता ही होगा कि ठाकुर साहब अरुण की शादी टीकमगढ़ के राजघराने में करना चाहते थे. बात भी तय हो गई थी लेकिन अरुण ने साफ मना कर दिया. ठाकुर साहब का पारा चढ़ गया. उन्होंने छड़ी उठा ली और उसे भयंकर ढंग से पीटा लेकिन उस ने ‘उफ’ तक न की.

‘‘यह देख कर भी ठाकुर साहब अपनी जिद पर अटल रहे. लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि बेटे की शादी उस की मरजी से कर दें लेकिन वे सहमत नहीं हुए और एक दिन उन्होंने यहां तक कह दिया कि अरुण ने उन की मरजी के बगैर शादी की तो वे अपने आप को गोली मार लेंगे.

‘‘अरुण इस बात से डर गया. वह आप को खत भी न लिख सका क्योंकि वह जानता था कि डैडी अपने वचन के पक्के हैं. यदि ऐसा हो गया तो वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. दिन ब दिन उस की हालत पतली होती गई. वह आप के गम में आंसू बहाता रहा. उस दिन अस्पताल में अचेतावस्था में उस के होंठों पर जब मैं ने आप का नाम सुना तो मुझे लगा कि आप ही उसे मौत के मुंह से बचा सकती हैं. मेरे दोस्त को बचा लीजिए,’’ इतना कहते ही उस का गला रुंध गया. आंखें छलछला आईं.

इस दुखद वृत्तांत ने अपर्णा का अंतस बेध दिया. वह गहरीगहरी सांसें भरने लगी. मन में धुंधली यादें ताजा हो आईं, अतीत कचोट गया. किन कठिन परिस्थितियों में उसे घर छोड़ना पड़ा, रिश्तेदारों से नाता तोड़ना पड़ा और परिचितों, सहेलियों से मुख मोड़ना पड़ा. कहांकहां नहीं भटकी वह, लेकिन अरुण की याद भुला न सकी. प्रेम का दीपक उस के अंदर सदैव जलता रहा और आज वह उस से अलग होना चाहता है, नहीं वह ऐसा कभी भी नहीं होने देगी. यदि उसे अपने जीवन की कुरबानी भी देनी पडे़ तो वह देगी.

बेशक, उस की शादी अरुण से नहीं हो सकी, लेकिन उस के नाम के साथ उस का नाम जुड़ा तो है. यह सोचते ही उस की आंखें छलछला आईं.

तभी खामोशी को तोड़ता हुआ तरुण बोला, ‘‘अच्छा अपर्णाजी, चलता हूं. आज ही शाम को छतरपुर जाना है, आप तैयार रहिएगा.’’

वह चुप ही रही…‘हां’, ‘न’ उस के मुख से कुछ नहीं निकल सका और तरुण हवा के तेज झोंके सा बाहर निकल गया. अतीत की परछाइयों ने फिर उसे समेट लिया. एकएक लम्हा उसे कुरेदता गया.

कालिज के दिनों में उस का साथ अरुण से हुआ था. अरुण उस की कक्षा का मेधावी छात्र था. दोनों की सीट पासपास थीं इसलिए उन में अकसर किसी विषय पर बहस हो जाया करती थी. अरुण के तर्क इतने सटीक होते थे कि वह परास्त हो जाती. हार की पीड़ा उस के अंदर छटपटाती रहती. वह पूरी कोशिश कर मंजे तर्क उस के सामने रखती, लेकिन वह उतनी ही कुशलता से उस के तर्क काट देता. तर्कवितर्क का यह सिलसिला प्रेम में परिणीत हो गया. दोनों घंटों बातों में मशगूल रहते और अपने प्रेम के इंद्रधनुषी पुल बनाते. कालिज के कैंपस से ले कर चौकचौराहों तक यह प्रेमजोड़ी चर्चित हो गई.

अपर्णा के पिता हरिशंकर उपाध्याय धार्मिक विचारों के थे, वे अध्यापक थे. उन के एक ही संतान थी अपर्णा और उसे वह उच्च से उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे, लेकिन बेटी के जमाने के साथ बदलते रंगों ने उन्हें तोड़ कर रख दिया.

उन्होंने अपर्णा को समझाते हुए कहा, ‘बेटी अपनी सीमा में रहो, जैसे इस परिवार की लड़कियां रही हैं. तुम्हारा इस तरह ठाकुर के लड़के के साथ घूमना मुझे बिलकुल पसंद नहीं.’

‘पिताजी, मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’ अपर्णा ने जवाब दिया.

‘चुप नादान, तेरा रिश्ता उस से कैसे हो सकता है? वह क्षत्रिय है, हम ब्राह्मण हैं.’

‘लेकिन पिताजी, वह मुझ से शादी करने को तैयार है.’

‘उस के मानने से क्या होगा? जब तक कि उस के परिवार वाले न मानें. वह बहुत बडे़ आदमी हैं बेटी, उन्हें यह रिश्ता कभी मंजूर नहीं होगा.’

‘तब हम कोर्ट में शादी कर लेंगे.’

‘चुप बेशर्म,’ वह गुस्से से आगबबूला हो गए, ‘जा, चली जा मेरी आंखों के सामने से, वरना…. ’

यही हाल अरुण का था. जब उस के डैडी सूर्यभान सिंह को इस बात का पता चला तो वे क्रोध से पागल हो गए. यह उन के लिए बरदाश्त से बाहर था कि उन का लड़का एक मामूली पंडित की लड़की से प्यार करे. उन्होंने पहले अरुण को बहुत समझाया लेकिन जब उन की बात का उस पर कुछ असर नहीं हुआ तो उन्होंने दूसरा गंभीर उपाय सोचा.

वह सीधे हरिशंकर उपाध्याय के पास पहुंचे जो उस समय बरामदे में बैठे स्कूल का कुछ काम कर रहे थे. ठाकुर साहब को देखते ही वह हाथ जोड़ कर खडे़ हो गए.

‘हां, तो पंडित हरिशंकर, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’ अपनी जोरदार आवाज में ठाकुर साहब ने कहा.

‘बहुत ख्वाब देखने लगे हो तुम.’

‘जी ठाकुर साहब, मैं समझा नहीं.’

‘अच्छा, तो तुम्हें यह भी बताना पडे़गा. जिस बात को पूरा कसबा जानता है उस से तू कैसे अनजान है. देखो पंडित, अपनी लड़की को समझाओ कि वह मेरे बेटे से मिलना छोड़ दे वरना मैं तुम बापबेटी का वह हाल करूंगा जिस की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते हो.’

‘ठाकुर साहब, यह क्या कह रहे हैं आप….मैं आज ही उस की खबर लेता हूं. माफ करें….माफ करें.’

ठाकुर साहब के कडे़ प्रतिबंध के बाद भी अरुण अपर्णा से छुटपुट मुलाकात करने में सफल हो जाता जिस की भनक किसी न किसी तरह ठाकुर सूर्यभान को लग ही जाती और वे गुस्से से भिनभिना उठते.

उन्होंने दूसरा उपाय सोचा, क्यों न हरिशंकर का तबादला छतरपुर से कहीं और करा दिया जाए. और यह कार्य वहां के विधायक से कह कर करवा दिया. इधर पंडित हरिशंकर घबरा गए थे. तबादले का जैसे ही उन्हें आदेश मिला फौरन छतरपुर छोड़ दतिया आ गए. अपर्णा को भी पिताजी के साथ आना पड़ा.

वह दिन अपर्णा के जीवन का सब से बोझिल दिन था, जब बिना अरुण से मिले उसे दतिया आना पड़ा. जुदाई के सौसौ तीर उस के दिल में चुभ गए थे. अरुण का घर से निकलना बंद था. वह जातेजाते एक बार मिल लेना चाहती थी. लेकिन उस की हर कोशिश नाकाम हुई. एक यही दुख उसे लगातार पूरी यात्रा सालता रहा.

पिताजी के साथ अपर्णा चली तो आई लेकिन अरुण को भुला न सकी. दतिया आए अब 1 साल हो गया था. उस दौरान अरुण की उसे कोई खबर नहीं मिली. पढ़ाई भी उस की बंद हो गई. पिताजी को उस की शादी करने की जल्दी थी. मास्टर हरिशंकर ने एक अच्छा घर देख कर अपर्णा की सगाई बिना उस से पूछे ही कर दी. यह पता चलते ही उस ने शादी करने से इनकार कर दिया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ अरुण से.

यह सुन कर पिताजी उस पर बरस पडे़, ‘‘तेरी ही वजह से मुझे छतरपुर छोड़ कर दतिया आना पड़ा है फिर भी तू अरुण के नाम की माला जप रही है. कितना सताएगी मुझे. भला इसी में है कि तू घर छोड़ कर कहीं निकल जा.’’

‘ऐसा मत कहिए पिताजी, अपर्णा गिड़गिड़ा पड़ी, समझने की कोशिश कीजिए.’

‘मुझे कुछ नहीं समझना. अगर तू यहां से नहीं जाएगी तो मैं ही चला जाता हूं, ले रह तू यहां….’

आखिर दिल के हाथों मजबूर हो कर अपर्णा ने वह घर त्याग दिया और अपनी सहेली नीता के पास भिंड चली आई. नीता की मदद से उसे भिंड में नौकरी मिल गई. खानेपीने का जरिया हो गया. किराए पर मकान ले लिया. इसी बीच उस के पास शादी के कई प्रस्ताव आए लेकिन उस ने सब को ठुकरा दिया.

वह दिन याद आते ही उस की आंखें डबडबा आईं, ‘‘समाज की यह कैसी रूढ़ियां हैं कि आदमी अपना मनपसंद साथी भी नहीं ढूंढ़ सकता? वंश परिवार की परंपराएं उस पर थोप दी जाती हैं. वहां आदमी टूटेगा नहीं तो क्या जुडे़गा?’’

आज अरुण की दुर्घटना की खबर ने उसे बेचैन ही कर दिया. वह नदी के किनारे पड़ी मछली सी फड़फड़ा गई. शाम को जब तरुण आया तो वह जाने को पूरी तरह तैयार बैठी थी, इस समय तक उस ने अपनी मानसिक स्थिति संभाल ली थी.

छतरपुर पहुंचते ही अपर्णा सीधे अस्पताल पहुंची. एक वार्ड में अरुण बेड पर मूर्छित पड़ा था. खून की बोतल लगी थी. हाथपैरों में प्लास्टर बंधा था. दोस्त, परिजन, रिश्तेदार उसे घेर कर खडे़ थे. डाक्टर उपचार में लगा था. उसे समझते देर न लगी कि अभी जरूर कोई गंभीर दौर गुजरा है क्योंकि सभी के चेहरे उदास थे.

ठाकुर सूर्यभान सिंह सिर नीचे झुकाए खडे़ थे. यद्यपि वह एक नजर उस पर डाल चुके थे. आज उसे उन से डर नहीं लगा था. डाक्टर के चेहरे से मायूसी साफ झलक रही थी. सभी की निगाहें उन पर टिक गईं.

‘‘इंजेक्शन दे दिया है. 10 मिनट में होश आ जाना चाहिए,’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘लेकिन डाक्टर साहब, कुछ मिनट होश में रहता है फिर बेहोश हो जाता है,’’ ठाकुर साहब व्यग्रता से बोले.

‘‘देखिए, मैं तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूं. आप मरीज को खुश रखने की कोशिश कीजिए….कोई गहरा आघात पहुंचा है, जिस की याद आते ही उसे बेहोशी छा जाती है. वैसे ंिचंता की बात नहीं. इस रोग पर काबू पाया जा सकता है,’’ इतना कह कर डाक्टर नर्स के साथ चले गए.

मौत सा सन्नाटा छा गया. किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था. तभी तरुण अपर्णा की ओर देख कर बोला, ‘‘आप कोशिश कीजिए, शायद होश आए. एक हफ्ते से यह इसी तरह पड़ा है. होश में आने पर भी किसी से एक शब्द नहीं बोलता.’’

यह सुनते ही अपर्णा निडर हो कर अंदर गई और अरुण के पास पहुंच कर बोली, ‘‘अरुण, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगी, यहीं रहूंगी तुम्हारे पास.’’

‘‘लेकिन तुम ने तो….कोई दूसरा घर बसा लिया….शादी कर ली?’’

‘‘अरुण क्या कहते हो? किस ने कहा तुम से यह….मुझ पर विश्वास नहीं?’’

‘‘विश्वास तो था लेकिन….’’

‘‘कैसी बात करते हो? मैं तुम्हें कैसे समझाऊं? तुम्हारे नाम के अलावा कोई दूसरा नाम मेरे होंठों पर कभी नहीं आया. मेरी आंखों में आंखें डाल कर देखो, सच क्या है तुम्हें पता चल जाएगा,’’ इतना कह कर अपर्णा फूटफूट कर रो पड़ी.

अरुण कुछ क्षण उसे देखता रहा, फिर आह कर उठा. उसे लगा जैसे उस के अंदर हजारों शूल एकसाथ चुभ गए हों.

‘‘अपर्णा….’’ वह गहरी निश्वास भरता हुआ बोला, ‘‘धोखा…विश्वासघात हुआ मेरे साथ…क्या समझ बैठा मैं तुम्हें…सोच भी नहीं सकता, तुम्हारे पिताजी ने यह झूठ मुझ से क्यों बोला?’’

कुछ क्षण अंदर ही अंदर वह सुलगती रही, फिर सोचा इस से तो काम नहीं चलेगा, उसे अगर अरुण को पाना है तो डट कर आगे आना होगा,’’

इस विचार के आते ही वह दृढ़ता से बोली, ‘‘अब मैं यहां से कहीं नहीं जाऊंगी अरुण, तुम्हारे पास रहूंगी. देखती हूं कौन मुझे हटाता है.’’

तभी अरुण के सीने में भयंकर दर्द उठा और वह कराह उठा, उस के हाथपैर मछली से फड़फड़ा गए. लोग डाक्टर को बुलाने दौडे़…अरुण हांफता हुआ बोला, ‘‘बहुत देर हो गई अपर्णा, अब मैं नहीं बचूंगा….मुझे माफ…’’ और यहीं उस के शब्द अटक गए. आंखें खुली रह गईं… चेहरा एक तरफ लुढ़क गया. यह देख अपर्णा की चीख ही निकल गई.

उसे जब होश आया तो देखा ठाकुर साहब और 2-3 लोग उस के पास खडे़ थे. अरुण के शरीर को स्ट्रेचर पर रखा जा रहा था. वह तेजी से स्ट्रेचर की तरफ लपक कर बोली, ‘‘इन्हें मत ले जाओ. मैं भी इन के साथ जाऊंगी.’’

ठाकुर साहब अपर्णा को पकड़ते हुए बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो अपर्णा? पागल हो गई हो…’’

वह शेरनी सी दहाड़ उठी, ‘‘पागल तो आप हैं, इन्हें पागल बना कर मार दिया, अब मुझे पागल बना रहे हैं. मुझे आप की कृपा की जरूरत नहीं ठाकुर सूर्यभान सिंह. आप ने भले ही मुझे अपने घर की बहू नहीं बनने दिया, लेकिन विधवा बनने से आप मुझे नहीं रोक सकते.’’

वह और जोर से सिसक पड़ी, ‘‘काश, मौत कुछ क्षण ठहर जाती तो वह मांग में सिंदूर तो लगा लेती?’’ आज इस स्थिति में, कुछ पोंछने को भी उस के पास नहीं था. सबकुछ पहले से ही सूनासूना था….

इक घड़ी दीवार की : सात्वत की क्या थी उलझन

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सोलर दीदी : मुनमुन ने कैसे बदली अपनी जिंदगी

‘मैं  यह क्या सुन रहा हूं मां… मुनमुन पति का घर छोड़ कर आ गई है. फौरन उसे वापस भेजो, वरना हमारी बहुत बदनामी होगी,’ पवन की गुस्से में भरी तेज आवाज रामेश्वरी के कानों से टकराई.

‘‘फोन पर क्यों इतना चिल्ला रहा है. थोड़ा शांत हो जा. तुझे कौन सी सचाई का पता है… और देखा जाए, तो तुझे इस बात में कोई दिलचस्पी भी नहीं है. तुझे तो गांव छोड़े बरसों हो गए हैं. तू क्यों बदनामी की चिंता कर रहा है. जब से गया है, तू ने और तेरे बड़े भाई ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

‘‘ठीक भी है, आखिर अब तुम ऊंचे ओहदे पर हो, बड़े आदमी बन गए हो. शहरी चमकदमक तुम्हें इतनी रास आ गई है कि तुम दोनों ने मांबाप और गांव को ही भुला दिया है,’’ रामेश्वरी की आवाज में कड़वाहट थी.

‘मां, हम शहर में रह रहे हैं तो क्या… मुनमुन की शादी करने में तो हम ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी…’ पवन फिर भड़का, ‘इतनी सी बात पर कोई घर छोड़ कर आता है भला. थोड़ा सहना भी चाहिए. पति का हाथ तो उठ ही जाता है. इस में कौन सी नई बात है. इतना हक तो होता ही है पति का. मारपीट, लड़ाई झगड़ा किस पतिपत्नी में नहीं होता. लेकिन वह तो घर ही छोड़ कर आ गई.

‘क्या पता, अब मुनमुन कौन सा गुल खिलाएगी. सच तो यह है कि ऐसी बहन को चौराहे पर खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए. नाक कटवा दी उस ने हम सब की,’ पवन के शब्दों से कड़वाहट टपक रही थी.

‘‘वाह, मेरे काबिल बेटे. पढ़लिख कर भी तू ऐसी सोच रखता है. तुम दोनों भाइयों को न पढ़ा कर मैं ने मुनमुन की पढ़ाई पर ध्यान दिया होता, तो कम से कम आज वह अपने पैरों पर तो खड़ी हो जाती.

‘‘और बेटा, तू सही कह रहा है कि शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी तुम दोनों भाइयों ने. मैं ने और तेरे बाबूजी ने कितना कहा था कि लड़के के बारे में पहले ठीक से जांच कर लो, पर तुम दोनों भाइयों को तो जल्दी थी उस की शादी करने की, ताकि जल्दी से शहर लौट सको.

‘‘तुम ने न घरपरिवार के बारे में पड़ताल की, न लड़के के बारे में. गाय की तरह मुनमुन को उस से बांध दिया और एहसान भी जताया कि देखो बहन की शादी कितनी धूमधाम से कर दी, कितने जिम्मेदार बेटे हैं हम तो…’’ लगातार बोलने से रामेश्वरी की सांस फूलने लगी थी.

‘‘मां, रहने भी दो अब. तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी,’’ मुनमुन ने मां के हाथों से फोन लेने की कोशिश की.

‘‘बोलने दे मुझे आज…’’ रामेश्वरी ने फोन को कस कर पकड़े रखा, ‘‘सुन पवन, मैं नहीं भेजूंगी मुनमुन को वापस उस नरक में. शराबी पति की मार कब तक खाएगी वह. वह हमारे ऊपर बोझ नहीं है, जो रोटी की जगह मार और प्यार की जगह दुत्कार सहती रहे.

‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें. बहन का साथ देने के बजाय तुम्हें बदनामी का डर सता रहा है. अपने ही जब कीचड़ उछालने से नहीं चूकते, तो समाज को उंगलियां उठाने से कैसे रोक सकते हैं,’’ रोते हुए रामेश्वरी ने खुद ही फोन काट दिया था.

‘‘मां, तुम किसकिस का मुंह बंद करोगी… यह लखीमपुर खीरी जिले का एक छोटा सा गांव है. घरघर में मेरे मायके आ जाने की बात फैल गई है. बाबूजी तो 2 दिनों से खेत पर भी नहीं गए हैं.

‘‘अच्छा यही होगा कि मैं ससुराल चली जाऊं. जो मेरी किस्मत में लिखा है, उसे सह लूंगी,’’ मुनमुन से मां की पीड़ा देखी नहीं जा रही थी.

‘‘तू क्या समझाती है, मैं नहीं जानती कि तेरे साथ वहां और क्याक्या होता होगा. मां हूं तेरी. पति की मार से तू ससुराल छोड़ कर आने वाली नहीं है. सच बता, बात क्या है?’’ रामेश्वरी की अनुभवी आंखें मानो भांप गई थीं कि बात कुछ और ही है.

‘‘मां…’’ मुनमुन सुबकते हुए बोली, ‘‘शादी को डेढ़ बरस हो गया है और मैं उन्हें बच्चा न दे सकी. मुझे बांझ कह कर वे डाक्टर के पास ले गए, पर जांच में सब ठीक आया. मैं ने पति से बोला कि तुम अपनी जांच करा लो, तो वह भड़क गया.

‘‘एक दिन सास और पति दूसरे गांव में गए हुए थे किसी के ब्याह में. रात को ससुर ने मेरे साथ जबरदस्ती करनी चाही. वह बोला, ‘मेरा बेटा तुझे बच्चा नहीं दे सकता तो क्या, मैं तो हूं.’

‘‘पति को बताया, तो सास और पति दोनों ही मुझे कोसने लगे कि मैं बदचलन हूं और ससुर पर झठा इलजाम लगा रही हूं.

‘‘ससुर हाथ जोड़े ऐसे बैठा था, जैसे उस का कुसूर न हो. उस के बाद तो ससुर की हिम्मत बढ़ गई और वह जबतब मेरा हाथ पकड़ने लगा. सास ने कई बार देखा भी, पर चुप रही.

‘‘बता मां, मैं कैसे रहती वहां? जहां हर समय यही डर लगा रहता था कि न जाने कब ससुर मेरे ऊपर झपट्टा मार लेगा.’’

रामेश्वरी कुछ कहती कि तभी बिसेसर वहां आ गए.

‘‘समझ नहीं आता कि क्या करें मेरी बच्ची. तुझे घर में रखते हैं, तो गांव वाले ताने देते रहेंगे और ससुराल भेजते हैं, तो तुझे घुटघुट कर जीना होगा. वैसे भी हमारे गांव की आबोहवा लड़कियों के लिए ठीक नहीं है,’’ बिसेसर की आवाज में छिपा बाप का दर्द मुनमुन को दर्द दे गया.

‘‘बाबूजी, आप बिलकुल भी परेशान मत हों. मैं लौट जाऊंगी. सच तो यह है कि औरत चाहे जिस कोने में चली जाए, उस के लिए सारे समाज की हवा ही ठीक नहीं है. कहां महफूज है वह?’’

‘‘क्या कहूं मेरी बच्ची. देखो, आज हमारे बेटे ही हमें दोष दे रहे हैं. हमारा कुसूर यह है कि दिनरात शराब पी कर पत्नी को पीटने वाले पति के घर बेटी को झोंटा पकड़ कर क्यों नहीं ठेल देते,’’ बिसेसर सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया.

‘‘तेरे दोनों भाइयों को पढ़ाने की खातिर तेरी पढ़ाई बीच में ही छुड़ानी पड़ी और देखो, वही तेरे लायक भाई तेरे दुश्मन बन बैठे हैं,’’ रामेश्वरी के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

‘‘मां, तुम जरा भी चिंता मत करो. मैं तुम पर बोझ नहीं बनूंगी. मैं कुछ न कुछ काम जरूर ढूंढ़ लूंगी,’’ मुनमुन ने कहा.

मुनमुन ने ठान लिया था कि वह बेबसी और लाचारी का दामन नहीं थामेगी, वह जीएगी और अपने मांबाबू का सहारा भी बनेगी. सफर आसान न था, क्योंकि उस के पास कोई ऐसी डिगरी नहीं थी, जिस के बल पर नौकरी कर लेती और न ही उस के पास पैसा था, जो कोई कारोबार शुरू कर पाती.

मुनमुन गांव में काम ढूंढ़ने निकलती, तो मर्दों की गंदी नजरें और फिकरे उस का पीछा करते, ‘अरे, पति को छोड़ आई, तो किसी के साथ तो बिस्तर पर सोएगी. तो हम ही क्या बुरे हैं…’

कोई कहता, ‘‘इस में ही दोष होगा, तभी तो पति मारता था. हमारी औरतें भी तो मार खाती हैं, तो क्या वे घर छोड़ कर चली गईं. आदमी अपनी जोरू को न मारे, ऐसा कभी हुआ है…’’

मुनमुन खून का घूंट पी कर रह जाती. बिना किसी कुसूर के उसे सजा मिल रही थी. लड़की हो कर कोई काम मिलना और वह भी एक पति का घर छोड़ कर आई लड़की के लिए… कोई आसान बात न थी.

तभी मुनमुन को एक सामाजिक संस्था ‘श्रमिक भारती’ के बारे में पता चला, जो केंद्र सरकार की टेरी योजना के तहत गांवों में सोलर लाइट का कार्यक्रम चलाती थी. वह उस से जुड़ गई. तब भी समाज उस पर हंसा कि देखोे, एक लड़की हो कर कैसा काम कर रही है. पर मुनमुन ने किसी की परवाह नहीं की.

मां ने जब मुनमुन के इस फैसले पर सवालिया नजरों से उसे देखा, तो वह बोली, ‘‘मां, किस ने कहा कि यह काम केवल मर्द ही कर सकते हैं. अब औरतें भी किसी काम में मर्दों से कम नहीं हैं. फिर मां, कभी न कभी तो किसी को इस सोच को तोड़ना होगा. औरत क्या सिर्फ पिटने के लिए ही होती है?’’

ससुराल वालों ने जब यह सुना, तो वे बहुत बिगड़े और फौरन उसे वापस ले जाने के लिए पति आ पहुंचा.

वह बोला, ‘‘बहुत पर निकल आए हैं तेरे मायके आ कर. चल वापस, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा,’’

वह उस पर हाथ उठाने ही वाला था कि रामेश्वरी ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘खबरदार, जो मेरी बेटी को मारने की कोशिश की, तो सीधे थाने पहुंचा दूंगी.’’

मांबेटी का यह भयानक रूप देख पति वहां से भाग गया.

धीरेधीरे मुनमुन ने सोलर लाइट से जुड़ा हर काम सीख लिया और उसे यह काम करने की धुन सवार हो गई.

बस, इसी धुन में उस ने सोलर लाइट का कार्यक्रम शुरू कर दिया. वह गांवगांव जा कर सोलर लाइट, सोलर चूल्हे, सोलर पंखे लगाने लगी. उस की लगन और मेहनत देख कर गांव वालों के ताने तो बंद हो ही गए, साथ ही उस की जैसी सताई हुई और भी लड़कियां उस के साथ जुड़ गईं.

गांव की औरतों में अपने हक के लिए लड़ने की जैसे एक क्रांति सी आ गई. गांव के लोग जो उसे बुरी नजरों से देखते थे, उन्होंने उसे ‘सोलर दीदी’ के नाम से बुलाना शुरू कर दिया. गांव में सोलर लाइट खराब हो, पंखा खराब हो या कुछ और, बस लोग ‘सोलर दीदी’ को फोन मिलाते और वह पूरे जोश से अपने बैग में औजार रख अपनी स्कूटी पर दौड़ी चली जाती.

‘‘मैं बहुत खुश हूं मुनमुन कि तू अपने पैरों पर खड़ी हो गई है, लेकिन बेटी, अकेले जिंदगी काटना आसान नहीं है. तू कहे तो मैं कहीं और तेरे लिए रिश्ते की बात चलाऊं. तेरा तलाक हुए भी

3 साल हो गए हैं,’’ मां की आंखों में अपने लिए गर्व देख मुनमुन की आंखें भर आईं.

‘‘मां, तुम ने और बाबूजी ने मेरा साथ दे कर ही मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया है. अगर तुम दोनों ही मुझे घर से निकाल देते, तो मैं कुछ भी नहीं कर पाती. बस, किसी दिन कहीं कुएं या तालाब में मरी मिलती.

‘‘और मां, एक बार शादी कर के देख तो लिया. अभी भी हमारे समाज में औरत या तो बिस्तर पर ले जाने के लिए होती है या फिर बच्चा पैदा करने के लिए. मुझे ऐसी जिंदगी नहीं चाहिए.

‘‘अब तो मैं बस तुम दोनों की सेवा करूंगी और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीऊंगी. अभी तो मुझे काफी काम करना है. अपनी जैसी कितनी मुनमुन को राह दिखानी है,’’ मुनमुन के चेहरे पर आत्मविश्वास की जलती लौ को देख रामेश्वरी ने उसे सीने से लगा लिया.

बिसेसर पीछे खड़े उसे मन ही मन कामयाब होने का आशीर्वाद दे रहे थे.

वजह: प्रिया का कौन-सा राज लड़के वाले जान गए?

‘‘अरे, संभल कर बेटा,’’ मैट्रो में तेजी से चढ़ती प्रिया के धक्के से आहत बुजुर्ग महिला बोलीं. प्रिया जल्दी में आगे बढ़ गई. बुजुर्ग महिला को यह बात अखर गई. वे उस के करीब जा कर बोलीं, ‘‘बेटा, चाहे कितनी भी जल्दी हो पर कभी शिष्टाचार नहीं भूलने चाहिए. तुम ने एक तो मुझे धक्का मार कर मेरा चश्मा गिरा दिया उस पर मेरे कहने के बावजूद मुझ से माफी मांगने के बजाय आंखें दिखा रही हो.’’

अब तो प्रिया ने उन्हें और भी ज्यादा गुस्से से देखा. मैं जानती हूं, प्रिया को गुस्सा बहुत जल्दी आता है. इस में उस की कोई गलती नहीं. वह घर की इकलौती लाडली बेटी है.

गजब की खूबसूरत और होशियार भी. वह जल्दी नाराज होती है तो सामान्य भी तुरंत हो जाती है. उसे किसी की टोकाटाकी या जोर से बोलना पसंद नहीं. इस के अलावा उसे किसी से हारना या पीछे रहना भी नहीं भाता.

जो चाहती उसे पा कर रहती. मैं उसे अच्छी तरह समझती हूं. इसीलिए सदैव उस के पीछे रहती हूं. आगे चलने या रास्ते में आने का प्रयास नहीं करती.

मुझे जिंदगी ने भी कुछ ऐसा ही बनाया है. बचपन में अपनी मां को खो दिया था. पिता ने दूसरी शादी कर ली. सौतेली मां को मैं बिलकुल नहीं भाती थी. मैं दिखने में भी खूबसूरत नहीं. एक ही उम्र की होने के बावजूद मुझ में और प्रिया में दिनरात का अंतर है. वह दूध सी सफेद, खूबसूरत, नाजुक, बड़ीबड़ी आंखों वाली और मैं साधारण सी हर चीज में औसत हूं. जाहिर है, पापा की लाडली भी प्रिया ही थी. मेरे प्रति तो वे केवल अपनी जिम्मेदारी ही निभा रहे थे. पर मैं ने बचपन से ही अपनी परिस्थितियों से समझौता करना सीख लिया था. मुझे किसी की कोई बात बुरी नहीं लगती. सब की परवाह करती पर इस बात की परवाह कभी नहीं करती कि मेरे साथ कौन कैसा व्यवहार कर रहा है. जिंदगी जीने का एक अलग ही तरीका था मेरा. शायद यही वजह थी कि प्रिया मुझ से बहुत खुश रहती. मैं अकसर उस की सुरक्षाकवच बन कर खड़ी रहती.

आज भी ऐसा ही हुआ. प्रिया को बचाने के लिए मैं सामने आ गई, ‘‘नहींनहीं आंटीजी, आप प्लीज उसे कुछ मत कहिए. प्रिया ने आप को देखा नहीं था. वह जल्दी में थी. उस की तरफ से मैं आप से माफी मांगती हूं, प्लीज, माफ कर दीजिए.’’ ‘‘बेटा जब गलती तूने की ही नहीं तो माफी क्यों मांग रही है? तूने तो उलटा मुझे मेरा गिरा चश्मा उठा कर दिया. तेरे जैसी बच्चियों की वजह से ही दुनिया में बुजुर्गों के प्रति सम्मान बाकी है वरना इस के जैसी लड़कियां तो…’’

‘‘मेरे जैसी से क्या मतलब है आप का? ओल्ड लेडी, गले ही पड़ गई हो,’’ बुजुर्ग महिला को झिड़कती हुई प्रिया आगे बढ़ गई. मुझे प्रिया की यह बात बहुत बुरी लगी. मैं ने बुजुर्ग महिला को सहारा देते हुए खाली पड़ी सीट पर बैठाया और उन्हें चश्मा पहना कर प्रिया के पास लौट आई.

हम दोनों जल्दीजल्दी घर पहुंचे. प्रिया का मूड औफ हो गया था. पर मैं उसे लगातार चियरअप करने का प्रयास करती रही. मैं सिर्फ प्रिया की रक्षक या पीछे चलने वाली सहायिका ही नहीं थी वरन उस की सहेली और सब से बड़ी राजदार भी थी. वह अपने दिल की हर बात सब से पहले मुझ से ही शेयर करती. मैं उस के प्रेम संबंधों की एकमात्र गवाह थी. उसे बौयफ्रैंड से मिलने कब जाना है, कैसे इस बात को घर में सब से छिपाना है और आनेजाने का कैसे प्रबंध करना है, इन सब बातों का खयाल मुझे ही रखना होता था.

प्रिया का पहला बौयफ्रैंड 8वीं क्लास में उस के साथ पढ़ने वाला प्रिंस था. उसी ने पीछे पड़ कर प्रिया को प्रोपोज किया था. उस की कहानी करीब 4 सालों तक चली. फिर प्रिया ने उसे डिच कर दिया. दूसरा बौयफ्रैंड वर्तमान में भी प्रिया के साथ था. अमीर घर का इकलौता चिराग वैभव नाम के अनुरूप ही वैभवशाली था. प्रिया की खूबसूरती से आकर्षित वैभव ने जब प्रोपोज किया तो प्रिया मना नहीं कर सकी. आज भी प्रिया उस के साथ रिश्ता निभा रही है पर दिल से उस से जुड़ नहीं सकी है. बस दोनों के बीच टाइमपास रिलेशनशिप ही है. प्रिया की नजरें किसी और को ही तलाशती रहती हैं.

उस दिन हमें अपनी कजिन की शादी में नोएडा जाना था. मम्मी ने पहले ही ताकीद कर दी थी कि दोनों बहनें समय पर तैयार हो जाएं. प्रिया के लिए पापा बेहद खूबसूरत नीले रंग का गाउन ले आए थे जबकि मैं ने अपनी पुरानी मैरून ड्रैस निकाल ली. नई ड्रैस प्रिया की कमजोरी है. इसी वजह से जब भी पापा प्रिया को पार्टी में ले जाना चाहते तो इसी तरह एक नई ड्रैस उस के बैड पर चुपके से रख आते.

आज भी प्रिया ने नई डै्रस देखी तो खुशी से उछल पड़ी. जल्दी से तैयार हो कर निकली तो सब दंग रह गए. बहुत खूबसूरत लग रही थी. ‘‘आज तो तू बहुतों का कत्ल कर के आएगी,’’ मैं ने प्यार से उसे छेड़ा तो वह मुझे बांहों में भर कर बोली, ‘‘बहुतों का कत्ल कर के क्या करना है, मुझे तो बस अपने उसी सपनों के राजकुमार की ख्वाहिश है जिसे देखते ही मेरी नजरें झपकना भूल जाएं.’’

‘‘जरूर मिलेगा मैडम, मगर अभी सपनों की दुनिया से जरा बाहर निकलिए और पार्टी में चलिए. क्या पता वहीं कोई आप का इंतजार कर रहा हो,’’ मैं ने उसे छेड़ते हुए कहा तो वह हंस पड़ी. पार्टी में पहुंच कर हम मस्ती करने लगे. करीब 1 घंटा बीत चुका था. अचानक प्रिया मेरी बांह पकड़ कर खींचती हुई मुझे अलग ले गई और कानों में फुसफुसा कर बोली, ‘‘प्रज्ञा वह देखो सामने. ब्लू सूट पहने मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा है. मुझे तो बस इसी से शादी करनी है.’’

मैं खुशी से उछल पड़ी, ‘‘सच प्रिया? तो क्या तेरी तलाश पूरी हुई?’’ ‘‘हां,’’ प्रिया ने शरमाते हुए कहा.

सामने खड़ा नौजवान वाकई बहुत हैंडसम और खुशमिजाज लग रहा था. मैं ने कहा, ‘‘मुझे तेरी पसंद पर नाज है प्रिया, मैं पता लगाती हूं कि यह है कौन? वैसे तब तक तुझे उस से दोस्ती करने का प्रयास करना चाहिए.’’ वह रोंआसी हो कर बोली, ‘‘यार यही तो समस्या है. वह पहला लड़का है जो मुझे भाव नहीं दे रहा. मैं ने 1-2 बार प्रयास किया पर वह अपने घर वालों में ही व्यस्त है.’’

‘‘यार कुछ लड़के शर्मीले होते हैं. हो सकता है वह दूसरे लड़कों की तरह बोल्ड न हो जो पहली मुलाकात में ही दोस्ती के लिए उतावले हो उठते हैं.’’ ‘‘यार तभी तो यह लड़का मुझे और भी ज्यादा पसंद आ रहा है. दिल कर रहा है कि किसी भी तरह यह मेरा बन जाए.’’

‘‘तू फिक्र मत कर. मैं इस के बारे में सारी बात पता करती हूं. सारी कुंडली निकलवा लूंगी,’’ मैं ने उस लड़के की तरफ देखते हुए कहा. जल्द ही कोशिश कर के मैं ने उस लड़के से जुड़ी काफी जानकारी इकट्ठी कर ली. वह हमारी कजिन के फ्रैंड का भाई था. उस का नाम मयूर था.

वह कहां काम करता है, कहां रहता है, क्या पसंद है, घर में कौनकौन हैं जैसी बातें मैं ने प्रिया को बता दीं. प्रिया ने फेसबुक, लिंक्डइन जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर जा कर उस लड़के के बारे में और भी जानकारी ले ली. प्रिया ने फेसबुक पर मयूर को फ्रैंड रिक्वैस्ट भी भेजी पर उस ने स्वीकार नहीं की. अब तो मैं अकसर देखती कि प्रिया उस लड़के के ही खयालों में खोई रहती है. उसी की तसवीरें देखती रहती है या उस की डिटेल्स ढूंढ़ रही होती है. मुझे समझ में आ गया कि प्रिया को उस लड़के से वास्तव में प्यार हो गया है.

एक दिन मैं ने यह बात पापा को बता दी और आग्रह किया कि वे उस लड़के के घर प्रिया का रिश्ता ले कर जाएं. पापा ने उस के परिवार वालों से बात चलाई तो पता चला कि वे लोग भी मयूर के लिए लड़की ढूंढ़ रहे हैं. पापा ने अपनी तरफ से प्रिया के लिए उन्हें प्रपोजल दिया.

रविवार के दिन मयूर और उस के परिवार वाले प्रिया को देखने आने वाले थे. प्रिया बहुत खुश थी. अपनी सब से अच्छी ड्रैस पहन कर वह तैयार हुई. मैं ने बहुत जतन से उस का मेकअप किया. मेकअप कर के बालों को खुला छोड़ दिया. वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

मगर आज पहली दफा प्रिया मुझे नर्वस दिखाई दे रही थी. जब प्रिया को उन के सामने लाया गया तो मयूर और उस की मां एकटक उसे देखते रह गए. मैं भी पास ही खड़ी थी. मयूर ने तो कुछ नहीं कहा पर उस की मां ने बगैर किसी औपचारिक बातचीत के जो कहा उसे सुन कर हम सब सकते में आ गए. लड़के की मां ने कहा, ‘‘खूबसूरती और आकर्षण तो लड़की में कूटकूट कर भरा है, मगर आगे कोई बात की जाए उस से पहले ही क्षमा मांगते हुए मैं यह रिश्ता अस्वीकार करती हूं.’’

प्रिया का चेहरा उतर गया. पापा भी इस अप्रत्याशित इनकार से हैरान थे. अजीब मुझे भी बहुत लग रहा था. आखिर प्रिया जैसी खूबसूरत और पढ़ीलिखी बड़े घर की लड़की को पाना किसी के लिए भी हार्दिक प्रसन्नता की बात होती और फिर प्रिया भी तो इस रिश्ते के लिए कितनी उत्साहित थी. पापा ने हाथ जोड़ते हुए धीरे से पूछा, ‘‘इस इनकार की वजह तो बता दीजिए. आखिर मेरी बच्ची में कमी क्या है?’’

लड़के की मां ने बात बदली और मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे यह लड़की पसंद है. यदि आप चाहें तो मैं इसे अपनी बहू बनाना पसंद करूंगी. आप घर में बात कर के जब चाहें अपना जवाब दे देना.’’ पापा ने उम्मीद के साथ मयूर की ओर देखा तो वह भी हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘अंकल, जैसा मम्मी कह रही हैं मेरा जवाब भी वही है. मैं भी चाहूंगा कि प्रज्ञा जैसी लड़की ही मेरी जीवनसाथी बने.’’

प्रिया रोती हुई अंदर भाग गई. मैं भी उस के पीछेपीछे अंदर चली गई. उन्हें बिदा कर मम्मीपापा भी जल्दी से प्रिया के कमरे में आ गए. मगर प्रिया किसी से भी बात करने को तैयार नहीं थी. रोती हुई बोली, ‘‘प्लीज, आप लोग बाहर जाएं, मैं अभी अकेली रहना चाहती हूं.’’

हम सब बाहर आ गए. इस समय मेरी स्थिति अजीब हो रही थी. समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. कुसूरवार न होते हुए भी आज मैं सब की आंखों में चुभ रही थी. मम्मी मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रही थीं तो प्रिया भी नजरें चुरा रही थी. मुझे रात भर नींद नहीं आई.

अगली सुबह भी प्रिया बहुत उदास दिखी. उस की नजरों में दोषी मैं ही थी और यह बात सहन करना मेरे लिए बहुत कठिन था. मैं ने तय किया कि मैं मयूर के घर वालों के इनकार की वजह जान कर रहूंगी. प्रिया को छोड़ कर उन्होंने मुझे क्यों चुना जबकि प्रिया मुझ से लाख गुना ज्यादा खूबसूरत और स्मार्ट है, होशियार है. मैं तो कुछ भी नहीं. बात की तह तक पहुंचने का फैसला कर मैं मयूर के घर पहुंच गई. बहुत आलीशान और खूबसूरत घर था उन का. महरी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर आने को कहा. घर बहुत करीने से सजा था. मैं ड्राइंगरूम का जायजा ले रही थी कि तभी बगल के कमरे से चश्मा पोंछती बुजुर्ग महिला निकलीं.

मुझे उन्हें पहचानने में एक पल भी नहीं लगा. यह तो मैट्रो वाली वही बुजुर्ग महिला थीं जिन का चश्मा कुछ दिन पहले प्रिया ने गिरा दिया था. मैं ने उन्हें चश्मा उठा कर दिया था. मुझे सहसा सारी बात समझ में आने लगी कि क्यों प्रिया को रिजैक्ट कर उन्होंने मुझे चुना. सामने से मयूर की मां निकलीं. मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘बेटा, मैं समझ सकती हूं कि तू क्या पूछने आई है. शायद तुझे अपने सवाल का जवाब मिल भी गया होगा. दरअसल, उस दिन मैट्रो में

मैं भी वहीं थी और सब कुछ अपनी नजरों से देखा था. खूबसूरती, रंगरूप, धन, इन सब से ऊपर एक चीज होती है और वह है संस्कार. हमें एक सभ्य और व्यवहारकुशल बहू चाहिए बिलकुल तुम्हारे जैसी.’’ मैं ने आगे बढ़ कर दोनों के पांव छूने चाहे पर अम्मांजी ने मुझे गले से लगा लिया.

घर पहुंची तो प्रिया ने पहले की तरह रूखेपन से मेरी तरफ देखा और फिर अपने काम में लग गई. मैं उस के पास जा कर धीरे से बोली, ‘‘कल के इनकार की वजह जानने मैं मयूर के घर गई थी. तुझे याद हैं वे बुजुर्ग महिला, जिन का चश्मा मैट्रो में तेरी टक्कर से नीचे गिर गया था? दरअसल, वे बुजुर्ग महिला मयूर की दादी हैं और इसी वजह से उन्होंने तुझे न कह दिया. पर तू परेशान मत हो प्रिया. तेरी पसंद के लड़के को मैं कभी अपना नहीं बनाऊंगी. मैं न कह कर आई हूं.’’

प्रिया खामोशी से मेरी तरफ देखती रही. उस की आंखों में रूखेपन की जगह बेचारगी और अफसोस ने ले ली थी. थोड़ी देर चुप बैठने के बाद वह धीरे से उठी और मुझे गले लगाती हुई बोली, ‘‘पागल है क्या? इतने अच्छे रिश्ते के लिए कभी न नहीं करते. मैं करवाऊंगी मयूर से तेरी शादी.’’

मैं आश्चर्य से उसे देखने लगी तो वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘आज तक तू मेरे लिए जीती रही है. आज समय है कि मैं भी तेरे लिए कुछ अच्छा करूं. खबरदार जो न कहा.’’ मेरे दिल पर पड़ा बोझ हट गया था. मैं ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया.

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ख्वाहिशें : रोशनी ने क्यों की बेहयाई

चील उस हट्टेकट्टे सलोने खरगोश को रोज देखती और जितना वह उसे देखती, उतना ही उस का मन शिकार करने का होता. आखिरकार उस ने उस खरगोश को अपना शिकार बनाने का मन बना ही लिया. वह उस के ऊपर मंडराने लगी. फिर एक दिन मौका देख कर उस ने उस खरगोश पर झपट्टा मारा और उसे अपने मजबूत पंजों में जकड़ लिया. चील की पकड़ इतनी मजबूत थी कि बेचारा खरगोश पंजों में कसमसा कर रह गया.

रोशनी को वह गबरू नौजवान बहुत भा गया था. वह सजधज कर ठेले पर सब्जी बेचने निकलता था. रोशनी की नजर इसी सब्जी बेचने वाले राजपाल पर थी.

रोशनी का पति शशिकांत एक स्कूल में म्यूजिक टीचर था. उन के दोनों बच्चे भी उसी स्कूल में पढ़ते थे. उन के स्कूल जाने के बाद रोशनी घर में अकेली रह जाती थी. घर में उस के करने के लिए कोई खास काम नहीं होता था, क्योंकि घर का ज्यादातर काम शशिकांत ही करता था.

खाली दिमाग शैतान का घर… रोशनी मन ही मन राजपाल के संग रंगीन सपने देखती… उस के संग रंगरलियां मनाती. इन सपनों को सच करने के लिए रोशनी ने कोशिशें शुरू कर दीं. वह राजपाल से तब सब्जी खरीदती, जब कोई और औरत उस के पास न होती. वह उस से हंसीमजाक करती.

एक दिन रोशनी ने मुसकराते हुए राजपाल से बड़ी अदा के साथ कहा, ‘‘राजपाल, तुम मुझे बड़े अच्छे लगते हो. बहुत स्मार्ट हो तुम.’’

‘‘रोशनी मैडम, आप भी कम खूबसूरत नहीं हैं,’’ राजपाल ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा.

दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, तो थमने का नाम नहीं लेता था. रोशनी राजपाल से 8-10 साल बड़ी थी. वह उस को अपने इशारों पर नचा रही थी. बहुत जल्दी दोनों की दोस्ती परवान चढ़ गई.

राजपाल का शशिकांत की गैरहाजिरी में उस के घर आनाजाना शुरू हो गया. रोशनी राजपाल के साथ मौजमस्ती करने लगी. लेकिन कब तक?

शशिकांत के कान महल्ले वालों ने भरे, तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे खुद भी रोशनी के बरताव में आ रहे बदलाव के चलते शक हो रहा था. अपने शक को पुख्ता करने के लिए एक दिन वह स्कूल से किसी काम का बहाना बना कर अचानक घर आ गया. उस समय रोशनी राजपाल के साथ रंगरलियां मना रही थी.

शशिकांत ने दोनों को बिस्तर पर मजे लेते हुए पकड़ लिया. राजपाल तो जैसेतैसे शशिकांत के चंगुल से निकल भागा, पर उस का सारा गुस्सा रोशनी पर उतरा.

वहीं चमड़े की बैल्ट टंगी हुई थी. शशिकांत ने रोशनी के नंगे बदन पर उस बैल्ट की बौछार कर दी. उस ने उसे मन भर कर पीटा और जीभर कर गालियां दीं.अगर उसे वापस स्कूल न जाना होता, तो आज न जाने क्या हो जाता.

शशिकांत यह धमकी देता हुआ वहां से निकल गया कि शाम को स्कूल से वापस आ कर उसे देखेगा. वह घर के बाहर ताला लगा कर वापस स्कूल चला गया.

शशिकांत के जाने के बाद रोशनी अपने जख्मों को सहलाते हुए सुबकती रही. उसे अपने पुराने दिन याद आने लगे, जब उस के गरीब बाप ने उस की शादी 19 साल की उम्र में 33 साल के शशिकांत से कर दी थी. उसे शशिकांत न तब पसंद था और न ही अब. उस की ख्वाहिश तो हमउम्र लड़के से शादी करने की थी.

अब रोशनी 32 साल की थी और शशिकांत 46 साल का. लेकिन रोशनी जहां अपनी उम्र से कम की लगती थी, वहीं शशिकांत अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बड़ा लगता था, इसलिए कई बार दोनों को एकसाथ देख कर अनजान लोग भरम में पड़ जाते थे. ऐसे मौकों पर रोशनी बहुत परेशान हो उठती थी.

रोशनी को लगता था कि शशिकांत के साथ उस की शादी करवा कर उस के मातापिता ने उस के साथ बड़ी नाइंसाफी की है. वह सोचती थी कि उस के साथ तो कोई गबरू नौजवान होना चाहिए था. उस की यह दबी हुई इच्छा रोजाना बलवती होती जा रही थी.

जवान घोड़ी बूढ़े घोड़े को कैसे पसंद कर सकती है? उसे तो जवान घोड़ा ही चाहिए. रोशनी का गबरू नौजवान राजपाल किसी जवान घोड़े से कम न था, जिस की सवारी वह लंबे समय तक कर सकती थी.

शशिकांत शाम को बच्चों समेत घर लौटा, तो बच्चों के सामने रोशनी को कुछ भी कहने में उस ने खुद को लाचार पाया. उसे बात खुलने का भी डर था, जिस का बच्चों पर तो गलत असर पड़ता ही, साथ ही उस की समाज में बदनामी भी होती. ऐसा होने पर स्कूल वाले पूछताछ भी कर सकते थे.

स्कूल वालों ने उसे रहने के लिए मुफ्त में मकान भी दे रखा था. ऐसी हालत में उस से मकान भी खाली कराया जा सकता था और उसे नौकरी से भी हाथ धोना पड़ सकता था.

इसी उधेड़बुन में शशिकांत ने उस रात बच्चों और समाज की दुहाई देते हुए रोशनी को बहुत सम?ाया, पर वह ज्यादा कुछ न बोली.

शशिकांत का मन तो रोशनी को धक्के मार कर घर से बाहर निकालने का था, क्योंकि काम ही उस ने ऐसा किया था. लेकिन फिर अपनी मजबूरियों के चलते उस ने सब बातों पर मिट्टी डालने में ही अपनी भलाई समझ. उसे यह भी डर था कि अगर उस ने रोशनी पर ज्यादा दबाव डाला, तो वह उसे और बच्चों को छोड़ कर किसी के संग भाग भी सकती है, तब 10 और 7 साल के दोनों बच्चों का क्या होगा?

आगे से शशिकांत रोशनी की ऐसी हरकतों की अनदेखी करने लगा और उस का पहले से भी ज्यादा खयाल रखने लगा. अभी भी उस के मन के किसी कोने में रोशनी का दिल जीतने की टिमटिमाती सी उम्मीद बाकी थी.

इसी उम्मीद के सहारे वह सुबह जल्दी उठता, घर की साफसफाई करता, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करता, बच्चों और अपने लिए नाश्ता बनाता, टिफिन तैयार करता और रोशनी के लिए भी नाश्ता बना कर स्कूल जाता. उस की सारी जद्दोजेहद अपने परिवार को बचाने की थी.

लेकिन रोशनी पर इन बातों का जरा सा भी असर नहीं हुआ. वह तो अपनी अलग ही दुनिया में जी रही थी. वह सुबह जानबूझ कर शशिकांत और बच्चों के स्कूल जाने के बाद महारानी की तरह उठती, सजतीसंवरती और मन होने पर राजपाल के साथ घूमने और मौजमस्ती करने निकल जाती या फिर रूमानी गानों के संग रूमानी दुनिया में खोई रहती.

इतना जरूर था कि वह अगर बाहर जाती तो शशिकांत के घर लौटने से पहले ही लौट आती. राजपाल की मुहब्बत में उस का शशिकांत और यहां तक कि अपने बच्चों से भी मोह पूरी तरह भंग हो चुका था.

एक दिन जब रोशनी राजपाल के संग बाहर घूमने गई, तो राजपाल ने कहा, ‘‘रोशनी, हम कब तक यों ही छिपतेछिपाते मौजमस्ती करते रहेंगे? चलो, कुछ दिन खुल कर देहरादून की वादियों में बिताने जाएं.’’

रोशनी को कोई डर तो था नहीं. उस ने शशिकांत की कमजोर नब्ज को परख रखा था. उसे पता था कि समाज में बदनामी और अपनी नौकरी बचाने के चक्कर में वह उसे कुछ कहने वाला नहीं, इसलिए उस ने राजपाल की बांहों में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘मैं ने कब मना किया मेरे राजा. तुम ही तो मेरी सारी ख्वाहिशें हो. तुम ने इस से पहले कभी क्यों नहीं कहा?’’

‘‘अरे, कैसे कहता जानू? मेरे पास इतने पैसे ही नहीं थे कि तुम्हें देहरादून और मसूरी घुमा कर लाता. अब कुछ पैसे जोड़े हैं, तो कहने की हिम्मत कर रहा हूं.’’

‘‘तुम पैसे की चिंता मत किया करो. शशि और मेरा एक ही बैंक खाता है और उस का एटीएम कार्ड मेरे पास ही रहता है. बहुत पैसा जोड़ कर रखता है वह कंजूस. अब वह पैसा हमारी मौजमस्ती के काम ही तो आएगा,’’ ऐसा कह कर रोशनी ने राजपाल के गाल पर एक मस्ती भरा चुंबन लिया.

एक दिन रोशनी सूटकेस उठा कर राजपाल के साथ मौजमस्ती करने के लिए देहरादून की घाटियों की ओर चल दी. आधे रास्ते में पहुंच कर उस ने शशिकांत को फोन किया, ‘‘हैलो शशि, मैं अपने मायके जा रही हूं, हफ्तेभर में लौट आऊंगी.’’

यह कह कर उस ने फोन काट दिया और फिर शशिकांत का कोई फोन रिसीव भी नहीं किया. शशिकांत समझ गया कि रोशनी उस से झूठ बोल रही है. वह उसे धोखा दे कर किसी और के साथ घूमने गई है. उस ने उस रात बच्चों के सोने के बाद रोशनी के पिता से बात की और रोशनी की सारी करतूतें उन्हें बता दीं.

रोशनी के घर लौटने पर रोशनी के पिता भी वहां आ गए. उन्होंने भी रोशनी को अपनी इज्जत का हवाला दे कर बहुत समझाने की कोशिश की. उसे परिवार बिखरने और बच्चों की जिंदगी बरबाद होने का डर दिखाया, लेकिन रोशनी तो राजपाल के इश्क में अंधी हो चुकी थी. उसे अपने बूढ़े पिता की कोई बात समझ में नहीं आई.

जब शशिकांत को लगा कि समस्या का कोई हल नहीं निकल रहा है, तो उस ने अपने ससुर से कहा, ‘‘पिताजी, जब आप की बेटी कुछ समझने को तैयार ही नहीं है और इसे अपने बच्चों की भी चिंता नहीं है, तो फिर इन बच्चों की जिंदगी बरबाद न हो, इन्हें भी अपने साथ ले जाइए. मैं इन का खर्चापानी हर महीने में भेज दिया करूंगा.’’

बूढ़ा आदमी मरता क्या न करता. वह अपने नाती और नातिन को ले कर दिल्ली की बस में सवार हो गया. शशिकांत ने एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो कर चैन की सांस ली.

इस के बाद शशिकांत ने रोशनी से पूछा, ‘‘अब क्या इरादा है तुम्हारा?’’

‘‘जैसा चल रहा है, उस से मैं बहुत खुश हूं. मेरी सारी ख्वाहिशें पूरी हो रही हैं,’’ रोशनी ने बड़ी तसल्ली से कहा.

‘‘और जो अड़ोसपड़ोस में बदनामी हो रही है, उस का क्या?’’ शशिकांत ने पूछा.

‘‘मुझे इस की कोई चिंता नहीं. मेरी जिंदगी पर किसी का कोई हक नहीं. दुनिया क्या सोचती है, मेरी ठोकर से. मैं जैसे चाहूं, वैसे जिऊं. तुम्हें इज्जत और दुनियादारी की इतनी ही चिंता है, तो मुझ से तलाक ले लो,’’ रोशनी ने मुंह बना कर कहा.

इस टके से जवाब को सुन कर शशिकांत लाजवाब हो गया. वह समझ गया कि रोशनी से अब कुछ भी कहना बेकार है, लेकिन अब उस ने सावधानी बरतनी शुरू कर दी. उस ने बैंक में नया अकाउंट खुलवाया और उस का एटीएम कार्ड बनवाया ही नहीं.

रोशनी को जब इस बात का पता चला, तो वह भड़क उठी. शशिकांत ने उसे साफसाफ बता दिया कि वह उसे हर महीने 5,000 रुपए से ज्यादा जेबखर्च नहीं दे सकता. घर और बच्चों का खर्च भी तो वही उठा रहा है.

इस के बाद तो रोशनी आएदिन घर से गायब रहने लगी. शशिकांत को पता चला कि उस के संबंध राजपाल के अलावा और भी कई मर्दों से बन गए हैं. लेकिन शशिकांत तो अब बुरी से बुरी खबर सुनने के लिए भी तैयार बैठा था. परिवार तो उस का बिखर ही चुका था. रोशनी अपनी मरजी से आती और अपनी मरजी से चली जाती, लेकिन ऐसा कब तक चलता?

रोशनी की वजह से बदनामी बढ़ी, तो स्कूल वालों ने शशिकांत से मकान खाली करवाने और नौकरी से निकालने का लैटर एक महीने पहले थमा दिया.

यह शशिकांत के लिए एक जोरदार झटका था. समाज में तो उस की इज्जत जाती ही रही, अब पेट पर भी लात पड़ने की नौबत आ गई. बस, अब एक महीने की बात थी.

लेकिन अभी भी रोशनी को ले कर शशिकांत के मन में आस बाकी थी. उसे लगता था कि कुछ भी हो जाए, रोशनी इतनी बेरहम नहीं हो सकती. घर छूटने और नौकरी जाने के डर से वह सही रास्ते पर आ जाएगी.

शशिकांत की खुशी का ठिकाना न रहा, जब उस की बात सच साबित हो गई.

जब रोशनी ने शशिकांत की नौकरी जाने की बात सुनी, तो उस ने पूरी तरह से सुधरने का भरोसा शशिकांत को दिया.

शशिकांत धार्मिक सोच का था. इसी खुशी में वह रोशनी को ले कर हरिद्वार गया और रोशनी के साथ हर की पैड़ी पर खूब डुबकियां लगाईं.

फिर रोशनी से खुश हो कर कहा, ‘‘लो रोशनी, गंगाजी में डुबकियां लगा कर तुम्हारे सारे पाप धुल गए. अब हम दोनों नई जिंदगी की शुरुआत करेंगे और अपने बच्चों को भी वापस बुला लेंगे. शायद स्कूल वाले भी मान जाएं और वह लैटर वापस ले लें.’’

‘‘हां शशि, तुम कल ही अपने स्कूल वालों से बात करना और पूरा मामला सुलझ कर ही आना, न चाहे इस में कितना भी समय लग जाए,’’ रोशनी ने उसे पूरी तरह से भरोसा दिलाते हुए कहा.

अगला पूरा दिन शशिकांत ने स्कूल वालों को मनाने में लगा दिया. उस की बात पर यकीन करते हुए फैसला लिया गया कि शशिकांत की सेवाओं को देखते हुए उसे एक महीने का समय और दिया जाए.

इस बात से खुश हो कर शशिकांत रोशनी के लिए एक शानदार बनारसी साड़ी का गिफ्ट और मिठाई का डब्बा ले कर घर पहुंचा. वह रोशनी को सरप्राइज देना चाहता था, इसलिए उस ने रोशनी से फोन पर कोई बात नहीं की.

शशिकांत खुशीखुशी घर पहुंचा तो देखा कि घर के बाहर ताला लटका पड़ा था. उसे देख कर पड़ोसी ने कहा, ‘‘शशिकांत बाबू, आप यहां… क्या कोई सामान छूट गया है? देहरादून शिफ्ट होने की बधाई. आप ने तो बताया ही नहीं, लेकिन रोशनी भाभी ने ट्रक में सामान भरते हुए सारी बात बता दी कि तुम्हें वहां अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी मिल गई है.’’

इतना सुनते ही शशिकांत ने एक गहरी सांस ली और वहीं सिर पकड़ कर बैठ गया.

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