Story In Hindi: अछूत की तलाशी

Story In Hindi: समसपुर पंचायत में चौधरी साहब का काफी दबदबा था. आखिर हो भी क्यों न. मुसहर टोले का शायद ही कोई ऐसा आदमी था, जो चौधरी साहब का कर्जदार न हो या उन के खेत और ईंटभट्ठे में मजदूरी न करता हो.

देवन भी चौधरी साहब का खेतिहर मजदूर था. इंदिरा आवास योजना के तहत उस के पास रहने को पक्का मकान था. वह कभी चौधरी साहब के खेत में तो कभी ईंटभट्ठे पर मजदूरी किया करता था. मजदूरी से जो भी अनाज या पैसा मिलता था, उसी से देवन का गुजारा होता था.

3 साल पहले टीबी के मरीज देवन ने अपनी बीमारी के इलाज के लिए 10,000 रुपए सैकड़ा की दर से 5,000 रुपए चौधरी साहब से उधार लिए थे. वह हर महीने ब्याज का बाकायदा भुगतान भी कर दिया करता था.

पर पिछले 2 महीने से लगातार बीमार रहने के चलते देवन चौधरी साहब के ईंटभट्ठे पर नहीं जा रहा था. इस वजह से वह मूलधन तो दूर 2 महीने से ब्याज तक नहीं चुका पाया था.

चौधरी साहब जितनी आसानी से ब्याज पर रुपए लगाते थे, उस से कई गुना सख्ती से वसूली करने के लिए भी बदनाम थे. 2 महीने तक देवन जब काम पर नहीं पहुंचा और ब्याज भी नहीं भिजवाया, तो एक शाम चौधरी साहब खुद 4 लठैतों को ले कर मुसहर टोले की ओर चल दिए.

देवन की झोपड़ी के पास पहुंच कर चौधरी साहब के एक लठैत ने आवाज लगाई, ‘‘अरे देवना, कहां है रे… निकल बाहर…’’

आवाज सुन कर देवन किसी तरह लाठी टेकता हुआ बाहर निकला.

37 साल का गबरू जवान दिखने वाला देवन आज टीबी की वजह से 60 साल की उम्र वाला हड्डियों का ढांचा सा दिख रहा था.

‘‘अरे, मालिक आप…पाय लागूं …’’ बोल कर देवन ने चौधरी साहब के जूते को पकड़ लिया.

चौधरी साहब पैर से देवन के हाथों को ?ाटकते हुए चिल्लाए, ‘‘अरे, छू कर मेरा धरम भ्रष्ट करेगा क्या?’’

एक लठैत देवन द्वारा छुए गए चौधरी साहब के जूते को गमछे से साफ करने लगा.

‘‘ए देवना, चल फटाफट निकाल दो महीने का ब्याज… 1,000 रुपए,’’ चौधरी साहब चिल्लाए.

‘‘आप को तो पता ही है मालिक, 2 महीने से लगातार तबीयत बिगड़ी हुई है. दवादारू के चक्कर में ही जमा किया हुआ सारा रुपयापैसा खर्च हो गया,’’ देवन ने अपनी मजबूरी जाहिर की.

‘‘ऐ सुन… हम यहां तुम्हारी रामकथा सुनने नहीं, बल्कि सूद लेने आए हैं,’’ चौधरी साहब ने हड़काया.

‘‘मालिक, 3 साल से तो हर महीने समय पर 500 रुपए दे ही देते थे, बस इधर 2 महीने से तबीयत ज्यादा बिगड़ गई, तो काम पर नहीं जा सके, इसलिए ब्याज रुक गया…’’ देवन बोला.

‘‘चल, तलाशी दे… कितना माल छिपा रखा है अपनी अंटी में,’’ कमर से बंधी अंटी पर नजर टिकाते हुए चौधरी साहब ने बीच में टोकते हुए पूछा.

देवन ने अंटी से सौ के 3, पचास के 3, बीस के 2 और एक दस का एक नोट निकाल कर दिखाते हुए हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मालिक, अभी हमारे पास ब्याज देने के पैसे नहीं हैं. ये बस 500 रुपए हैं, जिन से आज इलाज की आखिरी दवा लेने शहर में डाक्टर के पास जाना है.

‘‘डाक्टर साहब ने कहा है कि आज आखिरी खुराक लेने के एक हफ्ते बाद मैं पूरी तरह से ठीक हो जाऊंगा… मालिक, एक बार तबीयत ठीक हो जाने दीजिए, फिर मैं आप के ईंटभट्ठे पर काम कर के आप की पाईपाई चुका दूंगा.’’

‘‘चल ड्रामेबाज, गांव की सरकारी डिस्पैंसरी में इलाज न करा कर शहर में जाएगा डाक्टर को दिखाने…’’ इतना कह कर चौधरी साहब ने एक लठैत को कुछ इशारा किया.

उस लठैत ने एक झटके में 500 रुपए देवन के हाथ से छीन कर चौधरी साहब को थमा दिए.

‘‘यह तो हुआ एक महीने का ब्याज, बाकी एक महीने का भी निकाल फटाफट,’’ नोटों को उलटपुलट कर जांचते हुए चौधरी साहब गुर्राए.

‘‘सच कह रहे हैं मालिक, बच्चे की कसम… ये पैसे मुझे दे दीजिए, दवा मंगवानी है साहब… ठीक होने के बाद मैं आप का सारा कर्जा चुका दूंगा,’’ गिड़गिड़ाते हुए देवन रोने लगा.

बाहर होहल्ला सुन कर देवन की बीवी गोद में 8 महीने के बेटे को ले कर बाहर निकल आई. वह सारी बात को समझ चुकी थी.

वह भी पति के साथ गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘हुजूर, एक भी पैसा नहीं है अभी… आप यह पैसा हमारे मालिक को दे दीजिए… दवा लानी है… बाद में ये मजदूरी कर के धीरेधीरे आप का सारा पैसा लौटा देंगे.’’

चौधरी साहब ने ऊपर से नीचे तक देवन की बीवी को ताड़ा. गठीले शरीर वाली गोरीचिट्टी देवन की बीवी ने एक मैलीकुचैली साड़ी से किसी तरह अपने अधनंगे बदन को ढका हुआ था. गोद में लिए हुए बच्चे के अंग पर कोई भी कपड़ा नहीं था.

बिना ब्लाउज के साड़ी से ढकी छाती पर आंखें गड़ाते हुए चौधरी साहब कुटिलता से मुसकराए, फिर बोले, ‘‘क्या रे, तुम दोनों प्राणी हम को बेवकूफ सम?ाते हो… पैसा घर में छिपा कर रखा है और यहां मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हो.’’

‘‘सच कहते हैं हुजूर, एक भी रुपया नहीं है घर में,’’ देवन ने जवाब दिया.

‘‘तो चल तलाशी दे घर की,’’ इतना बोल कर चौधरी साहब ने देवन की बीवी की गोद से बच्चा ले कर देवन को थमा दिया और उस की पत्नी की बांह पकड़ कर झोपड़ी के अंदर ले जाने लगे.

थोड़ी देर पहले देवन को अछूत कहने वाले चौधरी साहब को उस की बीवी का शरीर छूते समय छूतअछूत से कोई मतलब नहीं था.

‘‘मालिक, रुक्मिणी को छोड़ दीजिए, हम चलते हैं साथ में,’’ देवन टोकते हुए बोला.

चौधरी साहब के इशारे पर लठैतों ने देवन को घेर लिया. तलाशी के नाम पर चौधरी साहब देवन की बीवी के साथ घर के अंदर चले गए और दरवाजे को अंदर से बंद कर दिया.

आधा घंटे बाद चौधरी साहब कुरते के बटन लगाते हुए बाहर निकले और बोला, ‘‘सही कह रहा था देवना… पैसा नहीं था अंदर…’’

गोद में बच्चा लिए देवन बिलखबिलख कर रो रहा था. अंदर निढाल पड़ी उस की बीवी, जो कल तक अछूत मानी जाती थी, आज पराए मर्द की छुअन से खुद को दूषित महसूस कर रही थी.

चौधरी साहब ने लठैतों को चलने का इशारा किया और मूंछ पर उंगली फेरते हुए देवन से कहा, ‘‘तुझे पता है न देवन, मैं सूद से समझौता नहीं करता… इस बार तो 2 महीने का ब्याज बराबर हो गया, बाकी अगले महीने से समय पर दे देना, नहीं तो हमें आ कर इसी तरह घर की तलाशी लेनी पड़ेगी.’’ Story In Hindi

Family Story In Hindi: बड़का घराना की हार

Family Story In Hindi: 55 साल के बजरंगी सिंह ने जब विधवा दुर्गा देवी को अपने घर के कामकाज के लिए रखा तो उन की नीयत में खोट था. दुर्गा देवी ने वह काम छोड़ दिया. गांव वालों के कहने पर वह मुखिया का चुनाव लड़ बैठी. उस के सामने थी बजरंगी सिंह की बहू और बड़का घराना की शान. क्या दुर्गा देवी लोहा ले पाई?

गांव में धीरेधीरे भोर का उजाला फैल रहा था. पूरब की ओर खेतों के किनारे खड़े पेड़ों की कतार पर लालिमा ऐसे बिखर रही थी, जैसे किसी ने कूची से रंग भर दिया हो.

यह गांव बेलाडीह कहलाता था. वही गांव जहां एकएक घर की कहानी कई पीढि़यों तक फैली रहती थी. यहीं, इसी गांव के बीचोंबीच एक बड़ा सा पक्का मकान था, लोग उसे ‘बड़का घराना’ कहते थे. मालिक थे बजरंगी सिंह.

एक समय ऐसा था जब बजरंगी सिंह की हुकूमत पूरे इलाके में चलती थी. उन के बापदादा जमींदार थे. गांव के आधे खेतों पर उन्हीं का कब्जा था.

बजरंगी सिंह की उम्र होगी तकरीबन 55 साल. शरीर गठीला, मूंछ तनी हुई, चाल में अकड़. पर वक्त ने जैसे उन की रियासत का कद थोड़ाथोड़ा काटना शुरू कर दिया था. नए कानून, नई पीढ़ी और बदलते हालात ने ‘बड़का घराना’ के रसूख को हिला दिया था.

उसी गांव में रहती थी दुर्गा देवी.

40 के आसपास की औरत. रंग सांवला, कद औसत, आंखों में अजीब सी हिम्मत. पति की मौत के बाद वह अपने 4 बच्चों को ले कर अकेली रह रही थी. तो सब से बड़ी बेटी 10वीं जमात में पढ़ती थी, तो सब से छोटा बेटा अभी 3 साल का था. घर में दो वक्त की रोटी का भी भरोसा नहीं था.

पति रमेंद्र की मौत के बाद दुर्गा देवी के दिन ऐसे बीते जैसे रात खत्म ही नहीं हो रही. गांव के लोगों ने शुरूशुरू में सहारा दिया, लेकिन धीरेधीरे सब अपनीअपनी दुनिया में लग गए. उस के पास खेती लायक जमीन थी ही नहीं. मजदूरी से जो मिलता, उसी से गुजारा होता.

बच्चे रोज पेटभर खाना मांगते और दुर्गा देवी मन ही मन टूटती. वह गांव के हर बड़े आदमी के दरवाजे पर मदद की उम्मीद ले कर गई, पर कहीं से कुछ खास सहारा नहीं मिला.

तभी गांव के सब से रसूखदार आदमी बजरंगी सिंह ने उसे बुलाया और कहा, ‘‘देखो दुर्गा, हम को घर में झाड़ूपोंछा के लिए एक औरत चाहिए. तुम आ जाओ. महीने के 2,000 रुपए देंगे. इस से तुम्हारे राशनपानी का भी इंतजाम हो जाएगा.’’

दुर्गा देवी ने सोचा, ‘2,000 कम हैं, पर बच्चों के लिए कुछ तो होगा.’

मजबूरी में दुर्गा देवी ने हां कर दी. काम शुरू हुआ. वह रोज सुबह बजरंगी सिंह के घर पहुंचती. वह घर बड़ा था और पुरानी जमींदारी के ठाटबाट की गवाही देता था.

बजरंगी सिंह अकेले रहते थे. उन की पत्नी शहर में बहूबेटों के पास रहती थीं.

दुर्गा देवी को पहले दिन ही बजरंगी सिंह की नजर का मतलब समझ आ गया. उन की आंखों में वही लालच, वही वहशी चमक थी, जिस से गांव की हर औरत डरती थी.

एक दिन बजरंगी सिंह ने दुर्गा देवी का हाथ पकड़ लिया. वह कांप गई और बोली, ‘‘मालिक, छोड़ दीजिए. हम मजदूरी करने आए हैं, यह मत कीजिए.’’

यह सुन कर बजरंगी सिंह हंस पड़े और बोले, ‘‘अरे, इतना घबराती क्यों हो? मैं तुम्हारा भला ही तो करूंगा. यहां जितनी मजदूरी करोगी, उस से ज्यादा कमा सकती हो.’’

दुर्गा देवी को लगा जैसे कोई उसे आग में धकेल रहा हो. वह भाग कर बाहर निकल गई, पर मन में डर बैठ गया कि अगर काम छोड़ दिया तो बच्चों को क्या खिलाएगी?

उसी समय गांव में पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी थी. इस बार मुखिया का पद महिला के लिए रिज्वर्ड सीट थी. ‘बड़का घराना’ चाहता था कि बजरंगी सिंह की बहू चुनाव लड़े.

‘‘सीट हमारी होगी…’’ बजरंगी सिंह हर सभा में दहाड़ते थे, ‘‘गांव का मुखिया हमेशा ‘बड़का घराना’ से ही होगा.’’

पर गांव की नई पीढ़ी अब पुरानी दहशत में नहीं जीती थी. कई नौजवान चाहते थे कि कोई गरीब घर की औरत खड़ी हो. किसी ने दुर्गा देवी का नाम सुझाया.

यह सुन कर दुर्गा देवी हंस पड़ी और बोली, ‘‘तुम लोग पागल हो गए हो क्या? हम कैसे चुनाव लड़ेंगे… खर्चा कहां से आएगा?’’

पर उन नौजवानों ने ठान लिया था. धीरेधीरे बहुत सी औरतें भी दुर्गा देवी के साथ जुड़ गईं.

‘‘तुम्हारी जीत हमारी जीत होगी,’’ एक औरत ने दुर्गा देवी से कहा.

बजरंगी सिंह को जब यह खबर लगी कि दुर्गा देवी चुनाव लड़ रही है, तो वे तिलमिला उठे.

‘‘एक विधवा हमारे सामने खड़ी होगी? अपनी औकात भूल गई है,’’ बजरंगी सिंह ने अपने चमचों से कहा.

इस के बाद बजरंगी सिंह दुर्गा देवी के खिलाफ अफवाहें फैलाने लगे. उन का कोई चमचा कहता, ‘‘दुर्गा तो लालची औरत है, उसे पंचायत की कुरसी चाहिए.’’

कोई चमचा कहता, ‘‘बजरंगीजी का घर छोड़ कर अब राजनीति में जाएगी.’’

दुर्गा देवी को धमकी दी जाने लगी कि अगर वह चुनाव लड़ेगी, तो बुरा होगा.

पर दुर्गा देवी नहीं डरी. उस ने घरघर जा कर लोगों से बातें कीं. अपने भाषणों में कहा, ‘‘भाइयो, मैं गरीब हूं, पर आप की बहनबेटी हूं. अगर आप साथ दें तो हम सब इस गांव में तरक्की ला सकते हैं.’’

चुनाव नजदीक आते ही सियासी माहौल गरम हो गया. बजरंगी सिंह की बहू जीप में घूमघूम कर वोट मांगती. पंडालों में दावतें होतीं. शराब का दौर चलता. मटनचिकन का पार्टी होती.

दुर्गा देवी के पास न गाड़ी थी, न पैसे. वह पैदल गलियों में घूमघूमकर हर घर के लोगों से मिलती. लोगों का हुजूम नारे लगाता कि ‘हमारा मुखिया कैसा हो दुर्गा भाभी जैसा हो’.

एक दिन बजरंगी सिंह ने दुर्गा देवी को धमकाया, ‘‘दुर्गा, अगर तू ने चुनाव से नाम वापस नहीं लिया, तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’

दुर्गा देवी ने बजरंगी सिंह की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘मालिक, अब डरने का वक्त निकल गया. जो होगा, देखा जाएगा.’’

वोटिंग का दिन आया. गांव में भीड़ उमड़ पड़ी. औरतें पहली बार इतने जोश से वोट देने आईं. दोनों तरफ के समर्थक नारेबाजी कर रहे थे.

शाम को गिनती शुरू हुई. पहले दौर में बजरंगी सिंह की बहू आगे थी, पर उस के बाद धीरेधीरे दुर्गा देवी के वोट बढ़ने लगे.

रात के 12 बजे नतीजा आया. दुर्गा देवी 112 वोटों से जीत गई. गांव में हंगामा मच गया. औरतें नाचने लगीं. बच्चे पटाके फोड़ने लगे. ‘दुर्गा भाभी जिंदाबाद’ के नारे लगने लगे.

बजरंगी सिंह का चेहरा उतर गया. उन की बहू रोतेरोते कमरे में बंद हो गई.

दुर्गा देवी गाजेबाजे और फूलमाला से लदी घर लौटी. उस ने अपने बच्चों को गले लगाया और कहा, ‘‘अब हमारे गांव में गरीबों की भी आवाज होगी.’’

अगली सुबह गांव की गलियां अलग ही लग रही थीं. लोग कहते, ‘अब समय बदल गया. ‘बड़का घराना’ की नहीं, सब की पंचायत होगी. सब की बात सुनी जाएगी और उन का समाधान किया जाएगा.’

दुर्गा देवी ने सब से वादा किया, ‘‘हम गांव में स्कूल और डिस्पैंसरी खुलवाएंगे. अब पंचायत सिर्फ अमीरों की नहीं रहेगी.’’

बजरंगी सिंह पहली बार निराश हो कर घर के ओसारे में बैठे थे. उन का ‘बड़का घराना’ जैसे ढह चुका था. Family Story In Hindi

Story In Hindi: बिगड़ी बात बनानी है – नंदा को नींद क्यों नहीं आ रही थी

Story In Hindi: रातभर नंदना की आंखों में नींद नहीं थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उस के साथ क्या हो रहा है. पूरा शरीर टूट रहा था. सुबह उठी तो ऐसे लगा चक्कर खा कर गिर जाएगी. गिरने से बचने के लिए बैड पर बैठ गई. नंदना चुपचाप अपने बैड पर बैठी थी कि तभी उसे अपनी भाभी तनुजा की आवाज सुनाई दी,’’ क्या बात है नंदू आज तुम्हें औफिस नहीं जाना है क्या?

नंदना ने किसी तरह भाभी को जवाब दिया कि हां भाभी जाना है… अभी तैयार हो रही हूं.नंदना की आवाज की सुस्ती को महसूस कर तनुजा अपना काम छोड़ कर उस के कमरे में चली आई. पूछा, ‘‘क्या बात है नंदू तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?

‘‘हां, भाभी,’’ नंदू ने जवाब दिया.‘‘देखकर तो नहीं लगता,’’ तनुजा उस का माथा छूते हुए बोली, ‘‘अरे तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है.’’‘‘हां भाभी,’’ कहते हुए नंदना बाथरूम की तरफ भागी, उसे बहुत तेज उबकाई आई. तनुजा भी उस के पीछेपीछे गई. नंदना उलटी कर रही थी.

तनुजा चिंतित हो गई कि पता नहीं क्या हो गया नंदू को. इस के भैया भी शहर से बाहर गए हुए हैं. समझ नहीं आ रहा क्या करे. तनुजा नंदना को सहारा दे कर बिस्तर तक ले आई और फिर बिस्तर पर लेटाते हुए सख्त आवाज में बोली, ‘‘कोई जरूरत नहीं है तुम्हें औफिस जाने की… तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है.’’

नंदना बिना कोई जवाब दिए चुपचाप लेट गई.तनुजा नंदना के लिए चाय लेने किचन में चली गई. जब वह चाय ले कर आई, तो देखा कि नंदना की आंखों से आंसू टपक रहे हैं.तनुजा उस के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘रो क्यों रही है पगली. ठीक हो जाएगी.’’

‘‘आप मेरा कितना ध्यान रखती हो भाभी. आप ने कभी मुझे मां की कमी महसूस नहीं होने दी. हमेशा अपने स्नेह तले रखा. मेरी हर गलती को माफ किया… पता नहीं भाभी मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है.’’‘‘क्या हो गया है तुझे? चायनाश्ता कर ले, फिर डाक्टर के पास ले चलती हूं.’’

तनुजा के कहने पर नंदना डाक्टर के पास चलने को तैयार हो गई. तनुजा की सहेली माधवी बहुत अच्छी डाक्टर हैं. वह नंदना को उसी के पास ले गई.माधवी ने नंदना का चैकअप करने के बाद तनुजा को अपने कैबिन में बुलाया और बोली, ‘‘तनुजा, नंदना की शादी हो गई है क्या?’’‘‘नहीं माधवी, अभी तो नहीं हुई. हां, उस के रिश्ते की बात जरूर चल रही है. पर तू ये सब क्यों पूछ रही है? कुछ सीरियस है क्या?’’

‘‘हां तनुजा, बात तो सीरियस ही है. नंदना प्रैगनैंट है… लगभग 4 महीने हो चुके हैं.’’माधवी की बात सुनते ही तनुजा के पैरों तले से जमीन ही निकल गई. वह मन ही मन बुदबुदाने लगी कि नंदना तूने यह क्या किया, 4 महीने हो गए और मुझे बताया तक नहीं.और फिर तनुजा नंदना को ले कर घर आ गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उस से इस बारे में कैसे पूछे.

तनुजा ने नंदना को दवा और खाना दे कर सुला दिया. फिर सोचा शाम तक इस की तबीयत ठीक हो जाएगी तब इस से तसल्ली से पूछेगी कि ये सब कैसे हुआ.शाम को 5 बजे चाय ले कर तनुजा नंदना के कमरे में पहुंची तो देखा वह रो रही है.नंदना के सिरहाने बैठते हुए तनुजा बोली, ‘‘नंदू उठो चाय पी लो. फिर मुझे तुम से कुछ जरूरी बातें करनी हैं.’’

‘‘जी भाभी, मुझे भी आप से एक बात करनी है,’’ कह कर नंदना चाय पीने लगी.चाय पीने के बाद दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगीं कि बात की शुरुआत कौन पहले करे.आखिर मौन को तोड़ते हुए तनुजा बोली, ‘‘नंदना तुम्हें पता है कि तुम प्रैगनैंट हो?’’‘‘नहीं भाभी, पर मुझे कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है.’’

नंदना की बात पर तनुजा को गुस्सा आ गया, तुम 30 साल की होने वाली हो नंदना और तुम्हें यह पता नहीं कि तुम प्रैगनैंट हो… 4 महीने हो चुके हैं.. कैसे इतनी बड़ी बात तुम ने मुझ से बताने की जरूरत नहीं समझी? तुम्हारे भैया को और पापाजी को क्या जवाब दूंगी मैं? दोनों ने तुम्हारी जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ी है और तुम ने ऐसा कर दिया कि मैं उन्हें मुंह दिखाने लायक नहीं रही.’’

नंदना रोते हुए बोली, ‘‘आप को तो पता है न भाभी मेरे पीरियड्स अनियमित हैं… मुझे नहीं पता चला कि  ये सब कैसे हो गया.’’तनुजा अपने गुस्से पर काबू रखते हुए बोली, ‘‘कौन है वह जिसे तुम प्यार करती हो? किस के साथ रह कर तुम ने अपनी मर्यादा की सारी हदें लांघ दीं? अगर तुम्हें कोई पसंद था तो मुझे बताती न, मैं बात करती तुम्हारी शादी की.’’

‘‘भाभी, मैं और भैया के बौस वीरेंद्र,’’ इतना कह कर नंदना रोने लगी.‘‘सत्यानाश नंदना… वीरेंद्र तो शादीशुदा है और उस के बच्चे भी हैं… वह तुम से शादी करेगा?’’‘‘पता नहीं भाभी,’’ वंदना धीरे से बोली.‘‘जब भैया ने मुझे उन से पार्टी में मिलाया था, तो मुझे नहीं पता था कि वह शादीशुदा हैं. उन्होंने तो मुझे अभी भी नहीं बताया.. यह आप बता रही हैं.’’

नंदना की बात सुन कर तनुजा गुस्से से पगला सी गई. फिर नंदना के कंधे झंझोड़ते हुए बोली, ‘‘अब मैं क्या करूं नंदना, तुम्हीं बताओ? मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है. 4 दिनों में पापाजी औैर तुम्हारे भैया आ जाएंगे… कैसे उन का सामना करोगी तुम?’’‘‘मुझे बचा लो भाभी.. भैया और पापा को पता चल गया तो मैं कहीं की नहीं रहूंगी… भैया तो मार ही डालेंगे मुझे.’’

‘‘कुछ सोचने दो मुझे,’’ कह कर तनुजा अपने कमरे में चली गई. सारी रात सोचते रहने के बाद उस ने यही तय किया कि उसे रजत को बताना ही होगा कि नंदना प्रैगनैंट है, भले ही गुस्सा होंगे, लेकिन कोई हल तो निकलेगा.’’सुबह ही तनुजा ने पति रजत को फोन कर के सारी बात बता दी. सब कुछ सुनने के बाद रजत सन्न रह गया. फिर बोला, ‘‘मैं दोपहर की फ्लाइट से घर आ रहा हूं. तब तक तुम अपनी सहेली माधवी से बात कर लो. अगर अबौर्शन हो जाए तो अच्छा है… बाकी बातें बाद में देखेंगे. मुझे नहीं पता था कि वीरेंद्र मुझे इतना बड़ा धोखा देगा,’’ कह कर रजत ने फोन रख दिया.

घर का काम निबटाने के बाद तनुजा नंदना के कमरे में गई. वह घुटनों पर मुंह रखे रो रही थी.तनुजा उस के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘अब रोने से कुछ नहीं होगा. नंदू चलो हम डाक्टर के पास चलते हैं, और दोनों तैयार हो कर माधवी के पास पहुंचीं.तनुजा माधवी से बोली, ‘‘अबौर्शन कराना है नंदना का.’’‘‘ठीक है, चैकअप करती हूं कि हो सकता है या नहीं.’’

नंदना का चैकअप करने के बाद माधवी बोली, ‘‘आईर्एम सौरी तनु यह अबौर्शन नहीं हो पाएगा. इस से नंदना की जिंदगी को खतरा हो सकता है. साढ़े 4 महीने हो चुके हैं.’’माधवी की बात सुन कर तनुजा परेशान हो उठी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करे. थोड़े दिनों में तो सब को पता चल जाएगा नंदना के बारे में. फिर क्या होगा इस की जिंदगी का? कौन करेगा इस से शादी? अपनी नासमझी में नंदू ने इतनी बड़ी गलती कर दी है कि जिस की कीमत उसे जिंदगी भर चुकानी पड़ेगी. नंदू की हालत के बारे में सोच कर तनुजा की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘क्या करूं… कैसे संवारूं मैं नंदू की जिंदगी को,’’ तनुजा अपना सिर हाथों में दबाए सोच ही रही थी कि तभी रजत की आवाज सुनाई दी, ‘‘क्या हुआ तनु? सब ठीक है न?रजत को देखते ही तनुजा उस से लिपट गई, ‘‘कुछ भी ठीक नहीं है रजत, इस बेवकूफ लड़की ने अपनी जिंदगी बरबाद कर ली… माधवी कह रही है अगर अबौर्र्शन हुआ, तो उस की जान चली जाएगी.’’

रजत झल्लाते हुए बोला, ‘‘चली जाए जान इस की… क्या मुंह दिखाएंगे हम लोगों को?‘‘कैसी बातें कर रहे हो आप? आखिर नंदू हमारी बेटी जैसी है… उस ने गलती की है, तो उसे सुधारना हमारी जिम्मेदारी है न? आप हिम्मत न हारें कोई न कोई रास्ता निकलेगा ही… फिलहाल हम नंदू को घर ले चलते हैं.’’

रजत और तनुजा नंदना को ले कर घर आ गए. गुस्से की अधिकता के चलते रजत ने नंदना की तरफ न तो देखा न ही उस से एक शब्द बोला. उसे अपनेआप पर भी गुस्सा आ रहा था कि क्यों उस ने नंदू से वीरेंद्र का परिचय कराया.. उसे पता तो था ही कि साला एक नंबर का कमीना है. रजत ने कभी सोचा भी नहीं था कि वीरेंद्र उस की बहन के साथ ऐसा करेगा.

घर पहुंच कर नंदू रजत के पैरों पर गिर कर बोली, ‘‘भैया मुझे माफ कर दो… आप बचपन से मेरी गलतियां माफ करते आए हो.. भले ही आप मुझे पीट लो, लेकिन मुझ पर गुस्सा न करो.’’रजत उस का माथा थपक कर अपने कमरे में चला गया.

उस दिन तीनों में से किसी ने भी खाना नहीं खाया. सब परेशान थे. किसी को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए.तनुजा बोली, ‘‘3-4 दिन में पापाजी आ जाएंगे, उन से क्या कहेंगे? नंदना के बारे में सुन कर तो उन्हें हार्टअटैक ही आ जाएगा.’’रजत बोला, ‘‘मैं पापा से कह देता हूं कि वे अभी कुछ दिन और चाचा के यहां रह लें. तब तक हम कुछ सोच लेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर तनुजा अपने कमरे में चली गई औैर नंदना भी सोने चली गई.जब रजत कमरे में आया तो तनुजा उन से बोली, ‘‘मैं सोच रही थी कि कुछ दिनों के लिए शिमला वाले भैया के पास चली जाऊं नंदना को ले कर.’’‘‘वहां जा कर क्या करोगी? तुम्हारे भैया तो अकेले रहते हैं न,’’ रजत ने कहा.‘‘हां,’’ तनुजा ने जवाब दिया, ‘‘शादी नहीं की है उन्होंने… सोच रही हूं उन से नंदना से शादी करने की बात कहूं. वे मेरी बात नहीं काटेंगे.’’

‘‘यह तो ठीक नहीं है तनुजा कि तुम नंदना को जबरदस्ती उन से बांध दो. वैसे उन्होंने शादी क्यों नहीं की अभी तक 37-38 साल के तो हो ही गए होंगे न?’’‘‘दरअसल, वे जिस लड़की से प्यार करते थे उस ने उन्हीं के दोस्त के साथ अपना घर बसा लिया. तब से भैया का मन उचट गया. बहुत सारी लड़कियां बताईं पर उन्हें कोई भी नहीं जंची. मुझे लग रहा है नंदना और उन की जोड़ी ठीक रहेगी. मैं एक बार नंदना से भी पूछ लेती हूं.’’

‘‘जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करो. अब तो दूसरा रास्ता भी नजर नहीं आ रहा… शहर में जा कर नंदना भी धीरेधीरे सब कुछ भूल जाएगी.’’अगले ही दिन तनुजा नंदना को ले कर शिमला चली गई. रजत ने अपने पापा को कुछ दिनों तक मुंबई चाचा के पास ही रुकने को कह दिया.शिमला पहुंच कर तनुजा ने अपने भैया विमलेश को सारी बात बताई, तो वे बोले, ‘‘तनु, मुझे कोई ऐतराज नहीं है. मुझे नंदना पसंद है, लेकिन तू पहले उस से पूछ ले.’’

तनुजा ने नंदना से इस बारे में पूछा तो उस ने अपनी स्वीकृति दे दी.तनुजा ने रजत को फोन कर के सारी बात बताई. रजत बहुत खुश हुआ. बोला, ‘‘समझ नहीं आ रहा तुम्हें कैसे धन्यवाद दूं. तनुजा तुम सही मानों में मेरी जीवनसंगिनी हो… तुम्हारी जगह कोई और होती तो बात का बतंगड़ बना देती, लेकिन तुम ने बिगड़ी बात को अपनी समझ से बना दिया… मैं सारी जिंदगी तुम्हारा आभारी रहूंगा.’’

‘‘कैसी बातें कर रहे हो आप? क्या नंदना मेरी कुछ नहीं है? उसे मैं ने हमेशा अपनी छोटी बहन की तरह माना है.’’रजत ने पापा को फोन कर के बुला लिया और उन्हें सारी बात बता दी, साथ ही यह भी बता दिया कि परेशान होने की जरूरत नहीं है. तनुजा के भैया विमलेश को नंदना बहुत पसंद है और उन्होंने उस से विवाह करने की इच्छा जताई है. फिर दोनों परिवारों की रजामंदी से नंदना का विमलेश के साथ विवाह हो गया. विदाई के समय नंदना अपनी भाभी तनुजा के गले लग कर खूब रोई. वह बस यही बोले जा रही थी कि आप ने मेरी जिंदगी फिर से संवार दी भाभी… आप जैसी भाभी सभी को मिले. Story In Hindi

News Story: देखा तेरा वादा – विजय और अनामिका की प्रेम कहानी

News Story: विजय की मम्मी की मुराद पूरी हो गई थी. उन के कहने पर विजय कांवड़ ले कर आया था. कांवड़ लाने से ज्यादा खुशी तो इस बात की थी कि विजय जब लौट रहा था, तब किसी मंत्री ने कांवडि़यों पर फूलों की बारिश की थी. विजय ने कुछ फूल चुन कर उठा लिए थे और अपनी मम्मी को दे दिए थे.

‘‘ये फूल तो मैं संभाल कर रखूंगी,’’ मम्मी ने विजय का माथा चूमते हुए कहा था.

‘‘मम्मी, मैं कांवड़ तो ले आया, पर मेरे पैरों में छाले पड़ गए हैं. बहुत दर्द हो रहा है,’’ विजय ने अपने पैरों की हालत दिखाते हुए बताया.

‘‘अरे बेटा, यह तो भोले बाबा का प्रसाद है. तू ऐसा कर कुछ दिन के लिए वर्क फ्रौम होम कर ले,’’ मम्मी ने सलाह दी.

‘‘वह सब तो ठीक है, पर न जाने क्यों अनामिका ने मुंह फुला रखा है,’’ विजय बोला.

‘‘कोई बात नहीं. जब तुम दोनों मिलोगे तो सारे गिलेशिकवे दूर कर लेना,’’ मम्मी ने कहा और विजय के लिए हलदी वाला दूध बनाने रसोईघर में चली गईं.

आज विजय ने अनामिका को मिलने के लिए बुलाया था. वह पिछले एक घंटे से कैफे में बैठा था, पर अनामिका अभी तक नहीं आई थी.

विजय ने अनामिका को फोन मिलाया, पर फोन भी स्विच औफ बता रहा था. विजय मन ही मन कुढ़ रहा था और उसे गुस्सा भी बहुत आ रहा था.

अगले दिन विजय अनामिका के घर चला गया. वह घर पर ही थी, पर बात करने के मूड में नहीं लग रही थी.

विजय ने पूछा, ‘‘क्या हुआ मेरी जान? किस बात पर मुझे इग्नोर कर रही हो?’’

‘‘कुछ भी नहीं. मैं कौन होती हूं तुम्हें इग्नोर करने वाली. तुम अपनी कांवड़ यात्रा में ही मगन रहो. मुझे भी अपनी लाइफ अपने तरीके से जीने दो,’’ अनामिका बोली.

‘‘क्या बात है? हमारे बीच कांवड़ यात्रा कहां से आ गई?’’ विजय ने कुढ़ते हुए पूछा.

‘‘बीच में आई है तभी तो बोल रही हूं. तुम ने कहा था कि हम कुंभलगढ़ किला देखने जाएंगे. बारिश के मौसम में वहां के नजारे शानदार होते हैं. पर अब सब चौपट हो गया. तुम ने अपना किया वादा नहीं निभाया,’’ अनामिका ने कहा.

यह सुन कर विजय का भी पारा चढ़ गया. वह बोला, ‘‘वाह, क्या ताना मारा है. ऐसा क्या नहीं है, जो मैं ने तुम्हारे लिए नहीं किया है. तुम्हारे घर का किराया भरा, महंगे कपड़े खरीद कर दिए, अच्छे से अच्छे रैस्टोरैंट में खाना खिलाया… और जहां तक वादे की बात है, तो तुम ने भी बहुत बार अपना वादा नहीं निभाया…’’

यह सुनते ही अनामिका का भी पारा बढ़ गया. वह चिल्लाई, ‘‘बहुत खूब. तुम ने मेरे लिए इतना कुछ किया, तो क्या मैं ने तुम्हारी रातें रंगीन नहीं कीं… आज तुम मुझे खर्चे गिना रहे हो. तुम तो नरेंद्र मोदी की तरह हो गए हो. अपने अलावा किसी दूसरे की उपलब्धियां दिखाई ही नहीं देती हैं…’’

‘‘इस में नरेंद्र मोदी कहां से आ गए. उन्होंने जो कहा है, वह कर के भी दिखाया है. तुम अपनी बहस में हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री को मत घसीटो,’’ विजय बोला.

विजय नरेंद्र मोदी का फैन था, तो उसे अनामिका की यह बात चुभ गई. पैर के छालों से ज्यादा तो आज दिल के छाले फूट गए थे.

‘‘किया ही क्या नरेंद्र मोदी और उन की सरकार ने? बस, पिछली सरकारों को कोसना और अपने गुणगान करना. डबल इंजन की सरकार के सारे वादे कोरे साबित हुए हैं,’’ अब तो अनामिका एकदम लड़ाई के मूड में आ गई थी.

‘‘बताओ, कहां फेल हुई यह सरकार? मुझे भी तो पता चले…’’ विजय ने पूछा.

‘‘केंद्र सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया है, पर इस पर ज्यादा कुछ काम नहीं हुआ है. कल ही मैं एक पुराना अखबार देख रही थी. लेबर ब्यूरो रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कुशल कामगारों की तादाद महज 2 फीसदी है, जबकि दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी स्किल्ड कर्मचारी हैं और जापान में इन की तादाद 80 फीसदी तक है. सरकार के ही आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात की उम्मीद काफी कम बताई गई है कि भविष्य में कुशल कामगारों का लक्ष्य पूरा हो सकेगा.

‘‘यहां एक तरफ लोगों को काम नहीं मिल रहा है, दूसरी तरफ संघ परिवार से जुड़ी विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के कई सांसद हिंदुओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं, ताकि हिंदुओ की आबादी तेजी से बढ़ सके.’’

‘‘तो क्या हिंदुओं की आबादी नहीं बढ़नी चाहिए?’’ विजय ने पूछा.

‘‘पर ऐसा करने का मकसद क्या है? बात सिर्फ आबादी की नहीं है, पर यह हिंदुत्व का कार्ड खेलना बड़ा खतरनाक है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो कहा भी कि भाजपा और संघ द्वारा समाज में नफरत, धमकी और डर का वातावरण फैलाने की कोशिश लगातार जारी है.

‘‘महंगाई पर लगाम लगाने पर भी यह सरकार एकदम फेल हुई है. पैट्रोलडीजल के बढ़े दाम से देश में हाहाकार है. मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पैट्रोल सब से ज्यादा महंगा हुआ है, जबकि मोदी सरकार सत्ता में आने से पहले यह कहती रही कि उन की सरकार पैट्रोलडीजल के दाम कांग्रेस की सरकार से भी कम कर देगी. भारत में तेल की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं यानी मोदी सरकार का महंगाई कम करने का वादा भी सिर्फ वादा ही साबित हुआ.’’

‘‘लेकिन इस सरकार ने धारा 370 हटा कर ऐतिहासिक काम किया है,’’ विजय बोला.

‘‘सत्ता में आने से पहले भाजपा के 2 सब से बड़े हथियार थे कश्मीर मुद्दा और पाकिस्तान. इन 2 मुद्दों में से एक कश्मीर घाटी में मोदी सरकार की लगातार कोशिशों के बावजूद वहां लंबे समय से आशांति और हिंसक माहौल अब भी जारी है.

‘‘कांग्रेस की सरकार से अगर तुलना करें तो मोदी सरकार के कार्यकाल में घाटी की हालत बद से बदतर हुई है. पहलगाम कांड इस सरकार की सब से बड़ी नाकामी है. क्या कश्मीरी पंडित दोबारा घाटी में लौटे? नहीं न, फिर किस मुंह से यह दावा किया जा रहा है कि धारा 370 के हटने के बाद कश्मीर में शांति बहाल हो गई है?

‘‘ऐसे ही नोटबंदी का फैसला लिया गया था. याद कीजिए 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले के नरेंद्र मोदी के भाषण को. चुनावी रैलियों में उन का एक भी भाषण ऐसा नहीं होता था, जो बिना कालेधन के जिक्र के पूरा हो जाए. मगर आज हकीकत सब के सामने है.

‘‘नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में कहा करते थे कि उन की सरकार जब सत्ता में आएगी तो विदेशों में जमा भारतीय लोगों का कालाधन वे ले आएंगे, मगर अब भी लोगों को इस बात का इंतजार है कि विदेशों से कालाधन कब आएगा. इस मामले पर मोदी सरकार की यह सब से बड़ी नाकामी है कि अभी तक न सरकार को पता है कि विदेशों में कितना कालाधन जमा है और वह कब तक देश में वापस आएगा,’’

अनामिका आज बहस के फुल मूड में लग रही थी.

‘‘तुम कांग्रेस की जबान बोल रही हो,’’ विजय ने तुनक कर कहा.

‘‘जब कोई तर्क न बचे तो कांग्रेस के सिर पर ठीकरा फोड़ दो. तुम लोगों की यही आदत है. याद है कि मोदी सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में हर साल 2 करोड़ रोजगार का वादा किया था, मगर नए रोजगार पैदा करने के मामले में मोदी सरकार औंधे मुंह गिरी है. यही वजह है कि बेरोजगारी के मुद्दे पर भाजपा और मोदी सरकार बैकफुट पर नजर आती है.

‘‘बेरोजगारी के मुद्दे पर जब मोदी सरकार फंसी तो पकौड़े बेचने को भी रोजगार की श्रेणी में ले आई और अपनी उपलब्धि बताने लगी. सच तो यह है कि नए रोजगार पैदा करने का वादा मोदी सरकार नहीं निभा पाई है.

‘‘कहां गई ‘आदर्श ग्राम योजना’, जिस के तहत हर सांसदों के द्वारा 5 गांवों को गोद लेने की व्यवस्था है, जिस में से एक भी गांव आदर्श ग्राम की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया है?

‘‘छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके भूपेश बघेल ने तो संवादाताओं से बातचीत में आरोप लगाया, ‘नरेंद्र मोदी के 11 साल विफलताओं और जन विरोधी नीतियों का शानदार स्मारक हैं. उन्होंने शुरुआत में लोगों को सपने दिखाए और 11 साल पूरे होतेहोते सिंदूर उजाड़ने तक पहुंच गए.’

‘‘उन्होंने आगे कहा कि भाजपा के नेता इन 11 सालों का खूब ढोल पीट रहे हैं, लेकिन अगर देखें कि 11 साल में आप को क्या मिला है, तो पाएंगे कि भाजपा सरकार की सारी योजनाएं नाकाम हो गई हैं.

‘‘भाजपा सरकार के 11 साल के कार्यकाल में पूरा देश असुरक्षित महसूस कर रहा है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी कभी कहते हैं कि लोगों की कपड़ों से पहचान हो जाती है, कभी पंचर बनाने वाली बातें करते हैं, कभी श्मशान और कब्रिस्तान की बात करते हैं.

‘‘आदिवासीदलितों पर अत्याचार से वे विचलित नहीं होते, लोगों का अपमान करने में उन्हें मजा आता है और उन के लोग जनता को प्रताडि़त करते हैं, फिर भी किसी के ऊपर कोई ऐक्शन नहीं होता.

‘‘भूपेश बघेल ने यह भी कहा कि जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल से ले कर मनमोहन सिंह तक विदेश नीति में कभी कोई बदलाव नहीं आया, जिस के कारण पूरी दुनिया के लोग भारत की आवाज को गंभीरता से सुनते भी थे और जुड़ते भी थे, लेकिन हाल ही में जो आतंकवादी घटना घटी, पूरी दुनिया ने उस की आलोचना तो की, लेकिन कोई देश हमारे साथ खड़ा नहीं हुआ.

‘‘उन्होंने यह भी दावा किया कि जब भारतपाकिस्तान के बीच संघर्ष चल रहा था, तब अमेरिका के राष्ट्रपति ने आधे घंटे पहले कहा कि ‘मैं ने संघर्ष विराम करवा दिया’. अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस बात को कई बार कहा, जिस के कारण पूरा देश अपमानित महसूस कर रहा है, क्योंकि इस के पहले भारत ने कभी
दूसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की थी.

‘‘छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके भूपेश बघेल ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री ने किसानों की आय दोगुनी करने और स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात कही थी, लेकिन आज किसान अपनी फसल को औनेपौने दाम में बेचने को मजबूर हैं. आज हालात ये है कि पूरे देश में डीएपी नहीं मिल रहा, कई राज्यों में बीज उपलब्ध नहीं हैं…

‘‘है कोई जवाब तुम्हारे पास? जब तुम्हारा नेता जनता से किए वादे पूरे नहीं कर पा रहा है, तो तुम से क्या उम्मीद रखी जाए. कांवड़ लाने से तुम्हें क्या मिला? आस्था का मतलब यह नहीं है कि अंधे बन जाओ.

‘‘तुम्हारे लिए और भी जरूरी काम हैं. कल को आईएएस बनोगे तो क्या नई पीढ़ी को देश को बांटने वाली शिक्षा दोगे? नहीं न?’’ अनामिका ने अपने दिल की पूरी भड़ास निकाल दी.

विजय चुप था. एक तो उस ने वादाखिलाफी की थी, दूसरा उस ने अनामिका का यह कह कर दिल दुखाया था कि उस ने अनामिका के लिए कई काम किए हैं. यही बात अनामिका को चुभ गई थी और उस ने सरकार के बहाने विजय को लपेट दिया था. कमरे में अब भी चुप्पी छाई हुई थी. News Story

Story In Hindi: आजादी का जिहाद

Story In Hindi: ‘‘निशा, अब हमें शादी कर लेनी चाहिए?’’ मुनार ने कहा.

‘‘हां, लेकिन इस से पहले हमें बहुतकुछ सोचना पड़ेगा,’’ निशा बोली.

‘‘क्या सोचना पड़ेगा?’’ मुनीर ने सवाल किया.

‘‘यही कि तुम मुसलिम हो, मैं हिंदू हूं. वैसे तो न तुम मुसलिम हो. न मैं हिंदू. न तुम ने कभी दिन में 5 बार नमाज पढ़ी है, न रमजान में पूरे रोजे रखे हैं, न कभी हज किया है, न कभी जकात (दान) देने के बारे में सोचा है.

‘‘मैं भी न कभी मंदिर जाती हूं, न पूजापाठ करती हूं, न गंगा नहाने किसी तीर्थ पर गई हूं. लेकिन हमारे समाज का कानून कहता है कि जिस धर्म के मानने वाले मांबाप ने तुम्हें जन्म दिया है, वही तुम्हारा धर्म है,’’ निशा ने अपनी बात रखी.

‘‘यह हिंदूमुसलिम की बात कहां से आ गई हमारे बीच? सच तो यह है कि हम दोनों का धर्म अगर कोई है तो वह है इश्क का धर्म और इश्क का धर्म समाज के किसी भी बंधन को नहीं मानता,’’ मुनीर बोला.

‘‘लेकिन हमें लोगों की चिंता तो करनी पड़ेगी. हम शादी करेंगे तो हो सकता है कि हिंदू समाज तुम पर लव जिहाद का इलजाम लगा कर तुम्हारी हत्या कर दे और हो सकता है कि तुम्हारा परिवार मुझे कलमा पढ़ाने पर जोर देने लगे,’’ निशा ने कहा.

‘‘हां, हो तो सकता है. होने को तो कुछ भी हो सकता है,’’ मुनीर ने मामले की गंभीरता को समझने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘मुनीर, तुम मुनीर हो. मुनीर का मतलब होता है प्रकाश. मैं निशा हूं. निशा का मतलब होता है रात, अंधकार. न अंधेरे के बिना प्रकाश की कल्पना की जा सकती है, न प्रकाश के बिना अंधेरे की. हमें कोई जुदा नहीं कर सकता, लेकिन रहना तो हमें इसी समाज में है. हम दोनों हिंदुओं की कंपनियों में काम करते हैं. हो सकता है कि हमारी शादी को लव जिहाद कह कर हम दोनों को नौकरी से निकाल दिया जाए. तब
हम पेट भरने के लिए किस के सामने हाथ फैलाएंगे?

धर्म की हिफाजत के नाम पर कोई कट्टरपंथी तुम्हारे खिलाफ एफआईआर लिखा सकता है. तुम जेल चले जाओगे तो मैं क्या करूंगी? किस की मां को मौसी कहूंगी? राज्य सरकार ने लव जिहाद विरोधी कानून भी तो बना रखा है,’’ निशा ने कहा.

‘‘लेकिन यह सब होता क्यों है?’’ मुनीर ने सवाल किया.

‘‘इसलिए कि जो लोग अपने धर्म को खतरे में पड़ा हुआ महसूस करते हैं, उन को धर्म का मतलब पता ही नहीं है. धर्म की परिभाषा है ‘धर्मो धारयते प्रजा:’ यानी जिस तरह से लोग बरताव करते हैं, वही उन का धर्म होता है. इन लोगों ने अपने विश्वास को अपना धर्म मान लिया है.

‘‘धर्म कोई पवित्र शब्द नहीं है. पवित्र शब्द होता तो औरत की माहवारी को मासिक धर्म न कहा जाता. चोरधर्म, वेश्याधर्म, राजधर्म जैसे शब्द न बनते.

‘‘मुनीर, किसी का अपना विश्वास जब कट्टरता बन जाता है तब उसे लगता है कि उसी का धर्म दुनिया का सब से अच्छा धर्म है. वही एक सच्चा धर्म है. सब को उसी का धर्म अपनाना चाहिए. जो इसे अपनाने से इनकार करता है, उसे जिंदा रहने का हक नहीं है. दूसरे किसी विश्वास को वजूद में रहने का हक नहीं है.

यह धर्म नहीं, धर्मांधता है,’’ निशा बोली.

निशा ने भाषण सा ही दे दिया था. मुनीर एकटक उस की ओर देखता रहा.

तनिक दम ले कर निशा फिर बोली, ‘‘इन लोगों ने धर्म को जिस मतलब में लिया है, उस का नतीजा देखो. अमेरिका में ईसाई यहूदियों को मार रहे हैं. भारत में गोहत्या के शक में हिंदू मुसलिम को मार रहे हैं.

लखनऊ में शिया और सुन्नी एकदूसरे को मार रहे हैं. अफगानिस्तान में मुसलिम ही मुसलिम को मार रहे हैं. पाकिस्तान में नमाज पढ़ रहे लोगों पर बम गिराया जाता है.’’

‘‘यह धर्म नहीं, पागलपन है निशा. सरासर पागलपन,’’ मुनीर ने कहा.

‘‘लेकिन इस पागलपन का शिकार हम क्यों बनें?’’ निशा बोली.

‘‘निशा, न हम निकाह करने के लिए किसी मौलवी के पास जाएंगे, न फेरे लेने के लिए किसी पंडित को बुलाएंगे. हम कोर्टमैरिज करेंगे,’’ मुनीर ने राय दी.

‘‘कोर्टमैरिज से पहले नोटिस भी लगेगा मैरिज औफिस में. उसे कोई भी पढ़ सकता है,’’ निशा बोली.

मुनीर का दिमाग भन्ना गया. उस से कुछ कहते नहीं बन रहा था. वह उठ कर खिड़की के पास खड़ा हो गया. बाहर आसमान में घने बादल छाए हुए थे. बीचबीच में बिजली कड़क रही थी.

आसमान की ओर उंगली उठा कर मुनीर ने कहा, ‘‘यहां आओ निशा, देखो घने बादलों ने जो अंधेरा कर रखा है, उस के बीच चमक कर बिजली कैसी रोशनी फैला रही है.’’

निशा जहां बैठी थी, वहीं बैठी रही. वह बोली, ‘‘यह शायरी करने का समय नहीं है मुनीर. हम इस तरह तुम्हारे दोस्त के कमरे में चोरीछिपे कब तक मिलते रहेंगे?’’

‘‘तो हम ऐसा करते हैं, एकसाथ खुदखुशी कर के यह साबित कर देते हैं कि समाज तो क्या, मौत भी हमें अलग नहीं कर सकती.’’

‘‘फिर वही शायराना बात. खुदकुशी किसी समस्या का हल नहीं होती. बुजदिली की हद है खुदखुशी,’’ निशा बोली.

‘‘तुम तो संजीदा हो गईं. मैं तो पलों के बोझ को हलका करने के लिए मजाक कर रहा था,’’ मुनीर ने कहा.

‘‘यह मजाक का समय भी नहीं है,’’ निशा बोली.

मुनीर आ कर कुरसी पर बैठ गया. सोचता रहा, सोचता रहा. अपने प्यार और अपनी हिम्मत को आंकता रहा. बाहर बादलों ने झमाझम बारिश शुरू कर दी थी. खिड़की के शीशे पर धड़ाधड़ बारिश की बौछारें पड़ रही थीं. उन के शोर में उसे अपने और निशा के ऊपर छोड़े जाने वाले तानों की आवाज सुनाई दे रही थी.

निशा भी चुपचाप बैठी सोचती रही. आज पहली बार ऐसा हुआ था कि दोस्त के कमरे के एकांत में उन्होंने न एकदूसरे को छुआ था, न गले लगे थे, न एकदूसरे को चूमा था.

मुनीर ने एक भरपूर नजर निशा पर डाली और कहा, ‘‘हम यह देश छोड़ कर किसी और देश में जा कर रहेंगे. यहां के समाज से, यहां के लोगों से कोई वास्ता ही नहीं रखेंगे.’’

‘‘यह इतना आसान नहीं है मुनीर. कहीं पर भी हमें वर्कपरमिट कैसे मिलेगा? रहेंगे कहां? खाएंगे क्या?’’

फिर बहुत ज्यादा गंभीर हो कर निशा ने कहा, ‘‘तुम में हिम्मत है तो समाज से लोहा लो. यह लड़ाई अपने घर से शुरू करो. अपने मातापिता को समझाओ कि वे मुझे बगैर कलमा पढ़ाए अपना लें. इधर मैं भी यही लड़ाई लड़ती हूं. और अगर उन को तुम स्वीकार नहीं हो, तो मैं उन से नाता तोड़ लूंगी.’’

अब तक मुनीर भी किसी फैसले पर पहुंचने की पूरी तैयारी कर चुका था. वह बोला, ‘‘मुझे मंजूर है. मैं साबित कर दूंगा कि कोई कितना ही कट्टरतावादी क्यों न हो, न मुझ से मेरा प्यार छीन सकता है, न ही मेरी जिंदगी.’’

दोनों के चेहरों पर एक उदास सी मुसकराहट दौड़ी. वे दोनों उठ खड़े हुए. निशा ने लपक कर मुनीर को आगोश में ले लिया.

मुनीर ने उसे भींच कर छाती से लगाते हुए कहा, ‘‘चलो देखें, बाहर धरती अपने बाल खोले बारिश के झरने में नहा रहा होगी. बस, तुम धरती बनी रहना, मैं बारिश का पानी बन कर तुम्हारे अंदर समा जाऊंगा.’’

मुनीर की बांहों में से निकलते हुए निशा ने कहा, ‘‘चलो, हम जिहाद शुरू करते हैं. लव जिहाद नहीं, इनसानी हकों की हिफाजत का जिहाद, इश्क करने की आजादी का जिहाद.’’ Story In Hindi

Social Story In Hindi: होंठ लाल काली आंखें

Social Story In Hindi: सागर अपने दोस्तों के साथ घुमक्कड़ी पर निकला. हाईवे पर कुछ जवान लड़कियां भड़कीले कपड़ों में खड़ी थीं. एक ढाबे वाले ने बताया कि बांछड़ा समाज की ये लड़कियां सड़क किनारे अपने डेरों में देह धंधा करती हैं. सागर एक डेरे में गया. वहां धंधा करने वाली एक लड़की ने उसे एक कड़वे सच से रूबरू कराया.

तकरीबन 3 साल पहले की बात है. अपने दोस्तों नागेंद्र, बृजेंद्र और अरविंद के साथ 10 दिन की घुमक्कड़ी के दौरान मेरा एक ऐसे सच से सामना हुआ, जिसे देखसुन कर मेरी रूह तक कांप गई.

उस दिन शाम का समय था. रतलाम से मंदसौरनीमच की ओर हमारा अभी 7 किलोमीटर तक का सफर ही तय हुआ था कि सड़क किनारे खड़ी जवान लड़़कियों को देख कर हमें हैरानी हुई. कार की रफ्तार धीमी कर मीलों दूर तक हम यह नजारा देख रहे थे.

कुछ देर के बाद हम ने एक ढाबे पर रुकने की सोची. कार से उतर कर ढाबे पर पड़ी खाट पर हम चारों दोस्त बैठ गए. हमारे मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे.

तभी ढाबे का एक वेटर हाजिर हो गया.

अरविंद ने खाने का और्डर करते हुए उस वेटर से पूछा, ‘‘हाईवे पर ये जवान लड़कियां क्यों खड़ी रहती हैं?’’

यह सवाल सुनते ही उस वेटर ने अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘साहब, आप को चाहिए क्या? रातभर के लिए लड़की मिल जाएगी. मालिक से बात कर लीजिएगा.’’

उस वेटर का जवाब सुन कर हम लोग सकपका से गए. इस के बाद हम लोगों ने काउंटर पर जा कर ढाबे के मालिक जगदीश मीणा से उन लड़कियों के बारे में पूछा, तो उस ने बताया, ‘‘साहब, ये लड़कियां यहां के बांछड़ा समुदाय की हैं, जो अपने जिस्म का सौदा करने के लिए रोजाना ही सड़़कों पर उतर आती हैं.’’

‘‘इन्हें किसी का डर नहीं लगता, जो इस तरह खुलेआम सड़कों पर ग्राहक ढूंढ़ती हैं?’’ नागेंद्र ने पूछा.

‘‘ऐसा नहीं है कि ये लड़कियां चोरीछिपे किसी मजबूरी में इस तरह का धंधा करती हैं. इन जवान लड़कियों के मांबाप बड़े शौक से इन से यह घिनौना काम करवाते हैं. कई बार तो मांबाप ही इन लड़कियों के लिए ग्राहक ढूंढ़ कर लाते हैं.’’

जगदीश मीणा से सड़कों पर खड़ी लड़कियों के बारे में यह सच जान कर हम हैरान रह गए. खाने के समय भी हम लोगों की चर्चा में यही लड़कियां रहीं.

मध्य प्रदेश में मंदसौर से नीमच की ओर जाने वाले नैशनल हाईवे पर सफर के दौरान सड़कों पर भड़कीले कपड़ों में सजीधजी लड़कियों को देख कर गाडि़यों की रफ्तार अपनेआप ही धीमी हो जाती है.

होंठों पर लाल रंग की चटक लिपस्टिक और काजल भरी आंखों से इशारा करती लड़कियां ट्रक और कार चलाने वालों का ध्यान अपनी ओर अनायास ही खींच लेती हैं.

अपनी अदाओं से लोगों को लुभाती ये जवान लड़कियां अपने जिस्म का सौदा करती हैं. जिस्मफरोशी के इस बाजार में रोजाना न जाने कितनी ही लड़कियां चंद सौ रुपयों के लिए अपनी बोली लगाती हैं.

जिन लोगों ने महूनीमच नैशनल हाईवे का सफर किया है, उन्होंने कभी न कभी बांछड़ा समाज की इन लड़कियों को जरूर देखा होगा. भले ही किसी की गाड़ी न रुकी हो, लेकिन सड़क किनारे खड़ी 16-17 साल की उन लड़कियों को जरूर देखा गया होगा जो होंठों पर लिपस्टिक पोते, आंखों में काजल मले, खुले बालों के साथ, कमर मटकाती खुद के बिकने का इंतजार करती हैं.

रतलाम में मंदसौर, नीमच की ओर जाने वाले महूनीमच नैशनल हाईवे पर जावरा से तकरीबन 7 किलोमीटर दूर गांव बगाखेड़ा से बांछड़ा समुदाय के डेरों की शुरुआत होती है.

यहां से तकरीबन 5 किलोमीटर दूर हाईवे पर ही परवलिया डेरा है. इस डेरे में बांछड़ा समुदाय के तकरीबन 50 परिवार रहते हैं.

महूनीमच नैशनल हाईवे पर डेरों की यह हालत नीमच जिले के नयागांव तक है. रतलाम जिले के दूरदराज के गांव भी इन के डेरों से आबाद हैं.

यह समुदाय हमेशा ग्रुप में रहता है, जिन्हें डेरा कहते हैं. बांछड़ा समुदाय के ज्यादातर लोग झोंपड़ीनुमा कच्चे मकानों में रहते हैं. इन की बस्ती को आम बोलचाल की भाषा में डेरा कहते हैं.

इन लोगों के बारे में यह भी कहा जाता है कि मेवाड़ की गद्दी से उतारे गए राजा राजस्थान के जंगलों में छिप कर अपने अलगअलग ठिकानों से मुगलों से लोहा लेते रहे थे. यह भी माना जाता है कि उन के कुछ सिपाही नरसिंहगढ़ में छिप गए थे और फिर वहां से मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में चले गए.

जब सेना बिखर गई तो उन लोगों के पास रोजीरोटी चलाने का कोई जरीया नहीं बचा. गुजारे के लिए मर्द डकैती डालने लगे, तो औरतों ने देह धंधे को अपना पेशा बना लिया. ऐसा कई पीढि़यों तक चलता रहा और आखिर में यह मजबूरी एक परंपरा बन गई.

शाम हो चली थी. अभी हम लोग सड़क से उतर कर एक डेरे की तरफ बढ़ रहे थे. टिमटिमाते बल्बों की रोशनी में अपने डेरे के सामने खड़ी उन लड़कियों को देख ही रहे थे. हर उम्र के मर्दों की मौजूदगी वहां दिखाई दे रही थी. किसी के कदम नशे में डगमगाते थे, तो कोई तयशुदा चाल में अंधेरे में खुलते दरवाजों की ओर बढ़ता था. हर दरवाजे पर सजी औरतें इशारों से ग्राहकों को बुला रही थीं और हम लोग थोड़ा सहमे हुए से थे.

तभी किसी नन्ही उंगली की हलकी सी पकड़ ने मेरी सोच की डोरी को झकझोर दिया.

‘‘अंकल, मेरी दीदी आप को बुला रही है,’’ 6-7 साल की मासूम सी एक बच्ची बोली. उस की आंखों में विजयी मुस्कान थी, चेहरा दमक रहा था.

‘‘कहां है तुम्हारी दीदी?’’

‘‘वह घर के अंदर, आप मेरे साथ चलो न.’’

उस लड़की के चेहरे में छिपी मासूमियत ने मुझे झकझोर दिया. क्या वह अपनी बहन के लिए ग्राहक ढूंढ़ रही है? यह खयाल आते ही मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई.

‘‘चलो न अंकल फिर मुझे खाना भी खाना है,’’ कह कर उस लड़की ने मेरा हाथ थाम लिया.

पहले तो मैं अकेले जाने से झिझका, मगर अपने अखबार के लिए एक खास रिपोर्ट बनाने के लिहाज से मेरे कदम अपनेआप उस लड़की के साथ चल पड़े.

मेरे दोस्त मुझे जाते हुए देख रहे थे. अरविंद बोला, ‘‘चले जाओ सागर, हम लोग यहीं हैं.’’

वह बच्ची फुरती में आगेआगे भागती, गलियों से होते हुए एक दरवाजे तक मुझे ले गई. उस ने दरवाजे पर हलकी सी दस्तक दी और मुझे देख कर मुसकराई.

दरवाजा खुला. एक अधेड़ सा आदमी बाहर निकला. बच्ची मुझे भीतर तक ले गई और कमरे के एक ओर इशारा कर के बोली, ‘‘यह मेरी दीदी है.’’

सामने एक पलंग पर बैठी औरत की तरफ मैं ने अपनी नजरें दौड़ाईं. वह औरत 28-30 साल की रही होगी. चेहरा खूबसूरत नहीं, मगर थका हुआ भी नहीं, बल्कि ऐसा, जिस में वक्त ठहर गया हो.

‘‘बैठिए,’’ कहते हुए वह औरत मुसकराई, मगर मुसकराहट से ज्यादा उस की आंखों में कई सवाल थे.

‘‘पानी या चाय कुछ लेंगे आप?’’ उस औरत ने पूछा.

‘‘जी नहीं, शुक्रिया.’’

‘‘ठीक है, पहले पैसे दीजिए.’’

मैं ने 500 रुपए का एक नोट उस के सामने कर दिया. उस ने नोट उठाया, माथे से लगाया और सामने टंगे एक पर्स में डाल दिया.

‘‘कहां तक पढ़ी हैं आप? आप को यह घिनौना काम अच्छा लगता है क्या?’’ मेरे इन सवालों पर वह औरत कुछ सकपकाई, मगर दूसरे ही पल आंखों में शरारत लिए बोली, ‘‘मैं तो खूब पढ़ना चाहती थी साहब, मगर मांबाप ने परंपरा की दुहाई दी. फिर भी नहीं मानी तो कहा गया कि तुम्हारी नानी और मां ने भी यही काम किया है.

‘‘आखिर में दो जून की रोटी का वास्ता दिया गया, तो मेरी आंखों के सामने अपने छोटेछोटे भाईबहनों के चेहरे घूमने लगे और घुटने टेकते हुए मैं ने समझौता कर लिया.

‘‘साहब, बांछड़ा समुदाय की लड़कियों को परंपरा का हवाला दे कर छोटी उम्र में ही देह धंधे के दलदल में धकेल दिया जाता है.’’

‘‘यह नन्ही गुडि़या आप की बहन है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्यों वक्त बरबाद कर रहे हैं साहब. जिस काम के लिए आए हैं, उसी से मतलब रखिए,’’ उस औरत ने अपनी बांहें मेरी गरदन पर डालते हुए कहा.

मैं ने कहा, ‘‘देखिए, मैं उस नीयत से नहीं आया. मैं एक पत्रकार हूं और तुम लोगों के इस घिनौने पेशे के खिलाफ पत्रिका में लिखना चाहता हूं. मैं आप से कुछ कहना और पूछना चाहता हूं.’’

‘‘तो कहिए मगर. वक्त की कीमत है. आप घंटे के पैसे रख लीजिए, मेरी बात सुन लीजिए.’’

मैं ने फिर एक 200 का नोट उस की तरफ बढ़ा दिया. उस ने थोड़ी देर मुझे देखा और नोट रखते हुए बोली, ‘‘हां, बताइए?’’

‘‘तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि इस बच्ची का जन्म शाप बन कर रह गया है?’’ मेरे इस सवाल पर उस औरत की हंसी बाहर निकल आई. अपनेआप को संभालते हुए उस ने जो बताया, उस ने मेरी रूह को झकझोर कर रख दिया.

‘‘साहब, देश का पढ़ालिखा तबका भले ही बेटी को मां के पेट में ही मारने पर उतारू है, मगर हमारे यहां तो बेटी पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है. मगर इस जश्न के पीछे छिपा है एक शर्मनाक सच.

एक बेटी यानी कम से कम 2 पुश्तों की आमदनी का जरीया. बांछड़ा समाज में, जो बेटियों की देह पर जिंदा है, देह धंधा बुरा नहीं है, बल्कि वह लघु उद्योग बन गया है.’’

मैं ने एक सांस में कह दिया, ‘‘आप यह काम छोड़ क्यों नहीं देतीं और शादी कर लीजिए. एक नई जिंदगी
शुरू कीजिए.’’

वह औरत इस तरह हंसी जैसे मैं ने कोई बचकाना सवाल कर दिया हो. वह बोली, ‘‘शादी? हम तो हर रोज शादी करते हैं साहब… कभी घंटेभर की, कभी पूरी रात की. शादी हमारे लिए एक सौदा है, सौगात नहीं.’’

‘‘आप के मातापिता को पता है कि आप यह धंधा करती हैं?’’

मेरा सवाल पूरा होने से पहले ही उस ने जवाब दिया, ‘‘अभी जो इस डेरे से दरवाजा खोल कर बाहर जाने वाला आदमी आप ने देखा… वही मेरा बाप है.’’

यह सुन कर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई.

‘‘और वह छोटी सी गुडि़या?’’

‘‘वह मेरी बेटी है.’’

‘‘बेटी? लेकिन वह आप को दीदी क्यों बुलाती है?’’

‘‘मैं ने उसे मां कहना कभी सिखाया ही नहीं, क्योंकि अगर वह जा कर बोलेगी कि मेरी ‘मां’ बुला रही है, तो कौन मेरे पास आएगा?’’

अब मैं बुत बन गया था. उस का जवाब मेरे जेहन में गूंज गया.

वह औरत बोली, ‘‘यहां लड़कियां सिर्फ अपनी होती हैं. उन के बाप कौन हैं, यह भी हम नहीं जानते. बेटियां हमारी जगह लेती हैं और बेटे दलाल बनते हैं. यही उसूल है इस बांछड़ा डेरे का.’’

तभी बाहर से फिर वही आवाज आई, ‘‘दीदी, टाइम हो गया.’’

मुझे लगा जैसे मेरी धड़कन वहीं अटक गई.

‘‘इस बच्ची का नाम क्या है?’’

‘‘मुसकान.’’

‘‘इस का क्या सोचा है?’’

‘‘बांछड़ा समुदाय में प्रथा के मुताबिक घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है. वह मेरी तरह ही यही करेगी और मेरा सहारा बनेगी. आप यों ही वक्त बरबाद कर रहे हो.’’

अब मैं खड़ा हो गया और बाहर निकल आया. मुसकान बाहर खड़ी थी. वह मुसकराते हुए मुझ से बोली, ‘‘मेरी बख्शीश?’’

आंखों में आई नमी को पोंछते हुए मैं ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए?’’

‘‘बस 50 रुपए,’’ उस लड़की ने मासूमियत से हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा.

मैं ने चुपचाप उस लड़की की हथेली पर 50 रुपए रख दिए. वह फुदकती हुई, चिडि़या की तरह उन्हीं गलियों में गुम हो गई. Social Story In Hindi

Story In Hindi: हत्यारा मांझा

Story In Hindi: हमारे छोटे से कसबे में करीम चाचा जैसा पतंगबाज कोई नहीं था, लेकिन अब वे काफी उम्रदराज हो चुके थे. उन्होंने पतंग उड़ाना बंद कर दिया था. अब वे अपनी किराना की दुकान चलाते थे और पतंगों को उड़ते देख कर बहुत खुश होते थे.

करीम चाचा के बेटे का नाम सलीम था, जो शादीशुदा थे और एक 8 साल के बेटे फजल के बाप भी. फजल को पतंगें उड़ती देखने का बड़ा शौक था. सलीम पेंच लड़ाते, पर सामने वाले की पतंग नहीं काट पाते.

एक दिन सलीम ने अपने अब्बा से पूछा, ‘‘मेरी पतंग क्यों कट जाती है?’’

‘‘पतंग उड़ाना भी एक कला है सलीम,’’ करीम चाचा ने बताया.

‘‘आप तो अपने समय के माने हुए पतंगबाज रहे हैं, फिर मुझे यह हुनर क्यों नहीं आया?’’ सलीम बोले.

‘‘हां, रहा हूं,’’ करीम चाचा ने फख्र से कहा.

‘‘हमें भी बताइए पेंच लड़ाने की कला,’’ सलीम ने कहा.

तभी महल्ले के कुछ और लड़के भी वहां आ गए. उन में से एक लड़के राकेश ने कहा, ‘‘चाचा, हमें भी बताइए. ज्ञान पर सब का हक होता है. द्रोणाचार्य ने अपने बेटे और शिष्यों में कभी फर्क नहीं किया. उन के बेटे अश्वत्थामा से ज्यादा काबिल उन का शिष्य अर्जुन था.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं…’’ करीम चाचा ने फख्र से कहा, ‘‘लेकिन यह सीखने वाले की लगन पर होता है.’’

‘‘चलिए, हमें बताइए. आप हम लोगों के भी गुरु हुए,’’ राकेश ने कहा.

करीम चाचा ने पतंग में कन्नी बांधने के तरीके से ले कर पतंग छोड़ने, उड़ाने और पेंच लड़ाने के एक से एक तरीके बताए, जिन्हें सुन कर सब दंग रह गए और यह मान गए कि वाकई पतंग उड़ाना और दूसरे की पतंग काटना एक कला है. जैसे तलवारबाजी, तीरंदाजी, वैसे ही पतंगबाजी.

आजकल देशभर में चीनी मांझे की चर्चा जोरों पर है. वैसे तो भारत और चीन के बीच कोई भाईचारा नहीं है खासकर लड़ाई के बाद. लेकिन वर्ल्ड ट्रेड और्गैनाइजेशन की संधि के तहत भारतीय सरकार सीधेतौर पर चीनी सामान का बहिष्कार नहीं कर सकती. उस पर कोई अंकुश नहीं लगा सकती.

चीन में तो हर चीज बनने लगी है, जिस का इस्तेमाल भारत कर रहा है. लोग जम कर खरीदते हैं, क्योंकि चीन का बना माल सस्ता होता है, पर टिकाऊ तो बिलकुल नहीं.

इस का नतीजा यह हो रहा है कि होली दीवाली से ले कर तकरीबन हर बड़े त्योहार पर चीन की बनी चीजें बिकने लगी हैं और स्वदेशी चीजों को कोई कौडि़यों के भाव पर भी नहीं खरीद रहा है.

टैक्नोलौजी के मामले में चीन ने कमाल कर रखा है. आज बाजारों में बिकने वाले सस्ते, आकर्षक, शानदार मोबाइल फोन सब चीन की ही देन हैं. कुछ देशभक्त स्वदेशी चीजों को बढ़ावा देने के लिए जब चीनी सामान का विरोध करते हैं, लोगों से चीनी सामान खरीदने के बहिष्कार की बात कहते हैं, तो उधर से चीन के अखबार गरजते हुए बयान देते हैं कि भारत के लोग बुजदिल और कामचोर हैं. उन की देशभक्ति का नशा जल्दी उतर जाता है और फिर वे हम से ही सामान खरीदते हैं.

इसी बीच करीम चाचा ने सलीम से कहा, ‘‘चीनी सामान की कोई गारंटी नहीं होती. ये कारोबारी हैं. इन्हें अपने फायदे से मतलब है. इन की बनाई चीजें खरीदना ठीक नहीं है. हमारे यहां के पटाके और चीन से आए पटाकों में बहुत फर्क है. उन के पटाकों से प्रदूषण और तरहतरह की बीमारियां फैलती हैं.’’

इस पर सलीम ने कहा, ‘‘चीनी हो या देशी, होता तो दोनों के पटाकों में बारूद ही न. अब्बू, आप भी कहां अखबार की खबरों पर ध्यान देते हैं… अगर चीन का सामान खरीदने से कोई हमें देशद्रोही कहता है, तो कहता रहे. सभी खरीदते हैं. ज्यादा ही दर्द है तो सरकार पाबंदी लगा दे, इसे गैरकानूनी बता दे. तब ये सामान अपनेआप बिकना बंद हो जाएंगे. फिर हम ही क्यों सोचें? क्या हिंदू नहीं खरीदते हैं? वे तो सब से ज्यादा खरीदते हैं. दीवाली उन का त्योहार है. वे तो देवीदेवताओं की मूर्तियों से ले कर दीए तक चीन द्वारा बनाए खरीदते हैं.’’

सलीम की बात काटते हुए करीम चाचा ने कहा, ‘‘बेटा, इस में हिंदूमुसलिम वाली बात कहां से आ गई? हम एक देश में रहते हैं. उन की गलती हमारी गलती एक ही बात है और इस का बुरा नतीजा दोनों को ही भुगतना पड़ता है.’’

सलीम ने कहा, ‘‘लेकिन अब्बू, क्याक्या बंद करवाएंगे स्वदेशी के समर्थक? सारे स्वदेशी समर्थकों के पास चीनी मोबाइल हैं. कोई दूसरा रास्ता नहीं है चीनी सामान से बचने का. एक से एक डैकोरेटिव स्टाइलिश लाइट चर्च में भी लगती है, मंदिर में भी और मसजिद में भी. लोग सस्ता और सुंदर सामान ही खरीदते हैं.

देशभक्ति का इन सब से क्या लेनादेना?’’

‘‘बेटा, ये चीनी कारोबारी हैं. इन का करोड़ोंअरबों का कारोबार है. इन से हमारे देश की कंपनियां और फैक्टरियां पिछड़ रही हैं. लोगों का रोजगार छीना जा रहा है,’’ करीम चाचा ने कहा.

‘‘हमारे यहां के लोग टैक्नोलौजी में सस्ता, सुंदर सामान बनाने में पिछड़े हैं, तो यह हमारे कारोबारियों की गलती है. इस में किसी दूसरे को कुसूरवार क्यों ठहराना?’’ सलीम बोले.

‘‘अब तो पतंग और मांझा भी चीनी आने लगा है, तो क्या तुम उसे भी खरीदोगे?’’ करीम चाचा ने कहा.

‘‘क्यों नहीं?’’ सलीम ने लापरवाही से कहा और बाहर निकल गए.

‘‘सस्ते के चक्कर में किसी दिन मुसीबत में मत फंस जाना. याद रखना, सब से ज्यादा नुकसान इस्तेमाल करने वाले का होता है,’’ करीम चाचा ने कहा.

लेकिन यह सुनने के लिए सलीम उस वक्त उन के पास नहीं थे. वे घर से बाहर निकल चुके थे.

अगस्त का महीना था. आसमान में उड़ती पतंगें, लहराती पतंगें. कटती पतंगें, गिरती पतंगें. अब पहले की तरह पतंग लूटने वाले तो नहीं थे, लेकिन पतंग उड़ाने और काटने का जुनून अब भी लोगों में था.

दोपहर से शाम तक सलीम की कई पतंगें कट चुकी थीं. हर कटती पतंग पर उन का बेटा फजल उदास हो जाता. बेटे की उदासी देख कर उन्हें शर्म आने लगी. वे बेटे के सामने खुद को हारा हुआ सा महसूस करने लगे.

सलीम ने अपने बेटे फजल को दिलासा देते हुए कहा, ‘‘चिंता मत कर. कल तुम्हें खुश कर दूंगा. जितनी कहोगे, उतनी पतंगें काट कर दिखाऊंगा.’’

सलीम यह कह कर बाजार की ओर निकले. वे अपने पिता की दुकानदारी भी संभालते थे, लेकिन पतंग उड़ाने के लिए वे समय निकाल ही लेते थे. पतंग उड़ाने के गुर अपने अब्बू से पूछ लेते थे. अब्बू तो पुराने पतंगबाज थे, सो मना नहीं करते थे.

रात में फजल ने अपने दादा करीम मियां से कहा, ‘‘दादाजी हमारी 10 पतंगें कट गईं.’’

करीम मियां ने कहा, ‘‘पतंगबाजी कला है, जो अभी तुम्हारे अब्बू को नहीं आई है. मैं होता तो 10 क्या 20 पतंगें काट देता.’’

यह सुन कर सलीम ने चिढ़ते हुए कहा, ‘‘पतंगबाजी अब कोई कला नहीं रही अब्बा. सब मांझे का कमाल है. कल देखना, मैं ऐसा मांझा लाऊंगा कि आसमान में उड़ने वाली सारी पतंगें जमीन पर नजर आएंगी.’’

सलीम की बात खत्म होने से पहले अब्बू ने यह जरूर कहा, ‘‘मांझे की ताकत से पतंग काटने में अपना क्या हुनर? हमें बाजार से सावधान रहना चाहिए.’’

लेकिन सलीम तब तक अपने कमरे में जा चुके थे.

अगली सुबह सलीम ने पतंग दुकानदार से कहा, ‘‘मुझे सब से मजबूत मांझा चाहिए.’’

दुकानदार ने धीरे से कहा, ‘‘मजबूती का तो बाप है, लेकिन पुलिस छापा मार कर जब्त कर रही है. बैन लगा दिया है प्रशासन ने.’’

‘‘यहां कौन देख रहा है. तुम चुपके से दे दो.’’

‘‘लेकिन दाम थोड़े ज्यादा लगेंगे,’’ दुकानदार ने कहा.

‘‘चलेगा, लेकिन मांझा मजबूत होना चाहिए.’’

‘‘चीनी मांझा है, जो तलवार का काम करेगा. एक नहीं सौ पतंगें काटने की हैसियत रखता है, लेकिन सावधानी से बरतना,’’ दुकानदार ने धीरे से कहा.

चीनी मांझा सुन कर सलीम को यकीन आ गया कि आज तो वे बेटे को कई पतंगें काट कर दिखाएंगे और खुश करेंगे. कल अपनी हार और बेटे के उतरे चेहरे को देख कर उन्हें बहुत मायूसी हुई थी.

शाम को 4 बजे घर की छत पर फजल ने पतंग छोड़ी. पिता ने मांझा खींचा. हलकीहलकी हवा में पतंग ऊपर की ओर उठी. सलीम ने ढील दी, फिर मांझा खींचा, फिर ढील दी, फिर मांझा खींचा. थोड़ी देर में पतंग आसमान से बातें करने लगी थी.

करीम मियां भी छत पर आ गए. उन्होंने मांझे की ओर देख कर कहा, ‘‘यह बड़ा खतरनाक है. मांझा है या हथियार.’’

‘‘अब्बू, बस आज आप कुछ मत बोलना,’’ सलीम ने कहा.

तभी सलीम की पतंग का पेंच लड़ गया. सलीम ने एक जोरदार झटका दिया और सामने वाले की पतंग कट गई.

‘‘ये काटा…’’ फजल खुशी से चहक उठा.

‘‘अभी और पतंगें कटेंगी बेटा. तुम देखते जाओ अपने बाप का कमाल,’’ सलीम बोले.

‘‘यह तुम्हारा कमाल नहीं, बल्कि इस मांझे का है. मैं कहता हूं बंद करो यह तमाशा. यह पतंगबाजी नहीं, मांझाबाजी है,’’ करीम मियां ने कहा.

‘‘क्या अब्बू, आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे आप ने कभी पतंग नहीं उड़ाई…’’

‘‘हम ने पतंगें उड़ाई हैं. मैं तुम्हें भी नहीं रोकता, लेकिन यह मांझा खतरनाक है. किसी को लग गया तो मुसीबत हो जाएगी.’’

‘‘एक दिन मैं कुछ नहीं बिगड़ता अब्बू,’’ इस के बाद सलीम ने एक और पतंग काटी.

फजल खुशी से चीख पड़ा, ‘‘वाह अब्बू, कमाल कर दिया आप ने.’’

बेटे की तारीफ से सलीम का सीना फख्र से चौड़ा हो गया. आसमान में जितनी पतंगें थीं, 1-1 कर के जमीन की धूल चाटती नजर आ रही थीं.

करीम मियां ने फिर चेतावनी दी, ‘‘ऐसी ही धूल चीन ने हमें युद्ध में चटाई है अपने आधुनिक हथियारों के दम पर. बंद करो यह अनीति से, चीनी मांझे से पतंगबाजी का खेल.’’

‘‘आज नहीं दादाजी, कल हमारी 10 पतंगें कटी थीं. हम बदला ले कर रहेंगे,’’ फजल की बात सुन कर करीम मियां ने कहा, ‘‘बेटे, दूसरे के हथियार से युद्ध जीता तो क्या जीता? इस में अपना हुनर, अपना जौहर कहां है? मैं फिर कह रहा हूं कि यह खतरनाक हो सकता है.’’

‘‘अब्बू, यह युद्ध नहीं पतंगबाजी है. हुनर किसी का हो, जीत तो अपनी है. फिर यह युद्ध नहीं महज खेल है. आप अपने पोते के चेहरे की खुशी देखिए,’’ सलीम बोले.

करीम मियां अपने पोते की खुशी को देख कर चुप हो गए. सलीम धड़ाधड़ पतंगें काट रहे थे और फजल खुशी से किलकारी मार कर हंस रहा था.

सलीम कम से कम 20 पतंगें काट चुके थे और अब थक गए थे.

फजल ने कहा, ‘‘अब्बू, अब मैं पतंग काटूंगा.’’

‘‘क्यों नहीं, लेकिन जरा संभल कर,’’ सलीम बोले.

इस के बाद सलीम ने चरखी पकड़ ली. पतंग आसमान में थी. मांझा अब फजल के हाथ में था.

सलीम ने कहा, ‘‘ढील दो और अपनी पतंग दूसरी पतंग के पास ले जाओ’’

फजल ढील देता गया.

‘‘अब खींचो,’’ सलीम ने कहा.

फजल ने मांझा खींचा. दोनों पतंगें आपस में उलझ चुकी थीं. सलीम चरखी में लिपटा मांझा ले कर पीछे
खड़े थे.

‘‘यह आखिरी पतंग है. इसे हर हाल में काटना है फजल,’’ सलीम ने कहा.

‘‘जी अब्बू, ऐसा ही होगा,’’ फजल बोला.

‘‘फजल, यही मौका है. मांझे आपस में लिपट चुके हैं. एक जोरदार झटका मारो. मांझा अपनी ओर खींचो.’’

सलीम के कहे मुताबिक फजल ने झटका दिया, लेकिन 8 साल के बच्चे के हाथ का झटका काफी नहीं था.

यह देख कर सलीम ने चरखी नीचे रखी और मांझे को अपने हाथ में ले कर पूरी ताकत से खींचा. पतंग कट चुकी थी. सलीम खुशी से चीखे. लेकिन तभी फजल कराह कर जमीन पर गिर पड़ा. सलीम ने जब मांझे को झटका दिया,

तो वह फजल के गले को चीरता निकल गया.

फजल की गरदन से खून की धार बह रही थी. उसे मौत के मुंह में जाता देख कर सलीम बेहोश हो गए और करीम मियां को तो जैसे लकवा मार गया. Story In Hindi

Funny Story In Hindi: बड़े घर का कुत्ता

Funny Story In Hindi: वैसे तो हमारा महल्ला मिडिल और लोअर मिडिल क्लास फैमिलियों का तरतीबबेतरतीब जमघट है, जहां छोटीछोटी जरूरतें एकदूसरे से छीनते हम एकदूसरे से मौकेबेमौके, बहानेशहाने लड़ते रहते हैं, पर हमारे इसी महल्ले में परम पूजनीय, अति सम्माननीय समाजसेवक चिट्टा टाइकून भी रहते हैं. उन की बड़ेबड़े लोगों से दोस्ती है. उन्होंने एक कुत्ता रखा हुआ है. बीच में वे कुछ दिनों के लिए बेकुत्ता भी हो गए थे, पर अपने गेट पर उन्होंने आम आदमियों को डराने के लिए बोर्ड फिर भी लगाए रखा ‘कुत्तों से सावधान’.

लगता है कि अब आदमी से आदमी का डर जा रहा है, इसलिए बिन कुत्तों के भी सज्जनों को कुत्ते से फेक सावधान कराना पड़ता है.

छोटे घरों में तब तक शांति नहीं होती, जब तक उन में दिन में 2-4 बार तूतूमैंमैं न हो ले और बड़े घर तब तक बड़े नहीं लगते, जब तक उन में से दिन में 5-7 बार राजयोगी कुत्ते का भूंकना न सुनाई दे. बड़े घरों के कुत्ते राजयोगी होते हैं, तो छोटे घरों का आदमी खाजयोगी.

कायदे से जिन ऊंचे लोगों की फैमिली में कुत्ता नहीं होता, उन्हें ऊंचे समाज में ऊंची फैमिली होने के बाद भी साधारण फैमिली ही माना जाता है. समाज में आम आदमियों के बीच बड़ा आदमी होने की पहचान कुत्ता दिलाता है. बड़े लोगों की शान कुत्ता होता है. बड़े घरों में घर वालों से महान कुत्ता होता है. बड़े लोगों का आखिरी अरमान कुत्ता होता है. बड़े घरों की मुसकान कुत्ता होता है.

तो साहब, अब हुआ यों कि मुझे भी इंस्टाग्राम हैंडल से ही पता चला कि हमारे महल्ले के सब से बड़े लोगों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है कि उन के परिवार में सभी का लाड़ला नहीं रहा. परिवारजनों का रोरो कर हुआ बुरा हाल.

इंस्टाग्राम हैंडल पर यह दुखद समाचार पढ़ कर मेरे हाथपैर फूल गए, दिल की नसें फटने लगीं. दिमाग तो मेरे पास बरसों से नहीं है, सो उस की नसें नहीं फटीं. बदन पर रोंगटे थे, सो वे भी खड़े हो गए.

बंधुओ, छोटा आदमी तो होता ही दुखों के पहाड़ के नीचे आने को है. वह पैदा ही दुखों के पहाड़ के नीचे जीने को होता है. दुखों के पहाड़ उस की जिंदगी होते हैं, उस की बंदगी होते हैं. बड़ी से बड़ी सरकारी जेसीबी उसे दुखों के पहाड़ के नीचे से नहीं निकाल सकती.

पर बड़े आदमियों पर दुख का पहाड़ तो छोडि़ए, उस की मुट्ठीभर मिट्टी भी गिर जाए, तो उन से ज्यादा मीडिया हायतोबा मचा देता है, इसलिए दुख के पहाड़ों से मेरा विनम्र निवेदन है कि उन्हें बड़े आदमियों पर टूटने से पहले सौ बार नहीं, हजार बार सोच लेना चाहिए, ताकि कल को दुख के पहाड़ को कोई दिक्कत न हो. बड़े आदमी रोने के लिए नहीं, बल्कि रुलाने के लिए पैदा होते हैं.

मैं ने आननफानन में इंस्टाग्राम हैंडल की खबर की हकीकत की जांचपरख के लिए अपने प्रिय पड़ोसी शर्माजी को फोन लगाया.

सोशल मीडिया के जमाने में खुशी की खबर की जांच की जानी चाहिए या नहीं, पर गम की खबर की हकीकत की जांच जरूर की जानी चाहिए. शर्माजी सोएसोए भी महल्ले के पलपल की खबर पर अपनी पैनी नजर रखते हैं.

‘‘और शर्माजी, क्या हाल हैं महल्ले के? महल्ले में सब खैरियत तो है न?’’

‘नहीं यार, सब से बुरी खबर यह है कि अपने महल्ले के सब से बड़े आदमी का डियरैस्ट कुत्ता स्वर्ग सिधार गया है,’ शर्माजी ने हद से ज्यादा इमोशनल हो कर बताया. इतने इमोशनल तो वे अपनी मां के मरने पर भी नहीं हुए थे.

‘‘तो?’’ मैं ने पूछा.

‘तो क्या? मैं तो उन के घर जा रहा हूं, इसी वक्त उन के कुत्ते के स्वर्गवास की प्रार्थना सभा में शरीक होने.’

‘‘पर कुत्ते को हुआ क्या था?’’ उस वक्त मैं पिछली दफा जो हमारे महल्ले में मेरे पड़ोस के कोई मरे थे, उन की मौत की वजह को जानने को ले कर उतना उतावला नहीं हुआ था, जितना इस कुत्ते की मौत को ले कर हुआ. कोई आसपड़ोस का आम आदमी थोड़े था भाई साहब ये.

‘होना क्या यार, खास सूत्रों से पता चला कि वह कई दिनों से बीमार चल रहा था. उन्होंने उस का इलाज कहांकहां नहीं करवाया. इलाज से ले कर झाड़फूंक तक सब करवाया, पर उन के हाथ कुछ न लगा. ऐसा इलाज अगर हमारे महल्ले के कोने वाले गणेशी प्रसाद का होता, तो वह जरूर बच जाता.’

‘‘तो अब आगे का क्या प्रोग्राम है?’’

‘कुत्ते की प्रार्थना सभा में भावभीनी श्रद्धांजलि दी जाएगी.’

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘मतलब क्या… उन के पीआरओ ने सूचित किया है कि वे सिर्फ अपने बच्चों के बाप नहीं थे, एक डौग फादर भी थे. होगा वह महल्ले के लिए एक कुत्ता, पर उन के लिए परिवार का एक सदस्य था. वे उस से महल्ले वालों से भी ज्यादा प्यार करते थे. इस बात का अंदाजा

इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस कुत्ते को अपना सरनेम तक दे दिया था.’

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘उन के लिए वह केवल कुत्ता नहीं था, बल्कि निष्क्रिय परिवार के मैंबरों के बीच सब से सक्रिय मैंबर था.’

‘‘तो?’’ मैं ने फिर पूछा.

‘मैं तो रोटी बीच में खानी छोड़ कर वहां पहुंच रहा हूं, सब से पहले. बड़े लोग हैं यार… नहीं जाऊंगा तो कल को बुरा नहीं, बहुत बुरा मान जाएंगे,’ शर्माजी ने कहा और फोन काट दिया.

बेशर्म कहीं के… पिछली दफा जब शर्माजी के पड़ोस में उन के खास दोस्त की मौत हुई थी, तो मेरे सौ बार कहने के बाद भी वे बुखार का बहाना बना कर श्मशान घाट जाने से कन्नी काट गए थे. Funny Story In Hindi

Love Story In Hindi: खूबसूरत को धोखा

Love Story In Hindi: पप्पू रसिया किस्म का था. वह शादीशुदा था, लेकिन पराई औरत उस की बहुत बड़ी कमजोरी थी. वह जहां भी कोई खूबसूरत औरत देखता, लार टपकाने लगता, उसे फांसने के लिए जाल फेंकने लगता. कई औरतें उस के जाल में फंस चुकी थीं. कलावती भी उन्हीं में से एक थी, जो बहुत खूबसूरत थी.

कलावती अपने पति शंकर के साथ खुशहाल जिंदगी जी रही थी. उस की शादी को 2 साल हो चुके थे. शंकर उसे बहुत चाहता था. वह एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था. इतनी पगार मिल जाती थी कि गुजारा ठीक से हो जाता था. कलावती घर में सिलाईबुनाई का काम करती थी और कुछ कमा भी लेती थी.

सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन एक दिन बड़ा अनर्थ हो गया. बरसात का मौसम था. शंकर काम पर जा रहा था. तभी रास्ते में गरजचमक के साथ बारिश होने लगी. शंकर साइकिल खड़ी कर के एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया. तभी आसमानी बिजली गिरी और वह बुरी तरह झुलस गया. उसे अस्पताल लाया गया.

सूचना मिलने पर कलावती भी रोतीबिलखती अस्पताल पहुंची. इलाज चल रहा था, लेकिन शंकर बुरी तरह जल गया था, इसलिए कुछ घंटों बाद उस की मौत हो गई.

कलावती की सारी खुशियां लुट गईं. शहर में उस का कोई सगासंबंधी नहीं था. गांव से मायके और ससुराल वाले आए. सब के सहयोग से गांव में शंकर का क्रियाकर्म हुआ.

ससुर ने तो कलावती को गांव में रहने के लिए कहा, लेकिन वह बोली, ‘‘कंपनी के मालिक ने नौकरी देने का भरोसा दिया है. जब नौकरी नहीं मिलेगी तो मैं गांव चली आऊंगी. अभी शहर जा कर मालिक से मिलती हूं.’’

‘‘ठीक है बहू. जो तुम्हें ठीक लगे, वह करो. हम सब तुम्हारे साथ हैं,’’

ससुर बोले.

कुछ दिन ससुराल और मायके में रह कर कलावती शहर चली आई.

कंपनी का मालिक अच्छा आदमी था. उस ने कलावती का खूब साथ दिया. शंकर का पूरा भुगतान कर दिया और कलावती को चायपानी पिलाने का काम दे दिया. इस से कलावती का गुजारा चलने लगा. समय निकाल कर वह सिलाईबुनाई भी कर लेती थी.

कलावती का कमरा सड़क के किनारे ही था. पप्पू उधर से ही आयाजाया करता था. वह कलावती की खूबसूरती पर फिदा था और जानपहचान बनाने की कोशिश कर रहा था.

एक दिन कलावती पैदल कंपनी से घर लौट रही थी. रास्ते में उसे पप्पू मिल गया. उस ने स्कूटर रोक कर कहा, ‘‘आइए, बैठिए. आप को घर छोड़ दूंगा. आप ने देखा होगा, मैं आप के घर से हो कर ही आताजाता हूं. आप के पति का देहांत हो गया. मुझे बहुत दुख हुआ. लेकिन चिंता न कीजिए, सब ठीक हो जाएगा. आइए, बैठिए.’’

‘‘नहीं भैया, मैं पैदल ही चली जाऊंगी. आप जाइए. आप ने इतना कह दिया, यही बहुत है,’’ कलावती बोली.

‘‘अरे, आप मुझे गलत आदमी न समझें. आप की कंपनी के पास ही मेरी लोहे की दुकान है. आप के पति मेरी दुकान में आते थे. वे बड़े भले आदमी थे. आइए, बैठिए,’’ पप्पू बोला.

पहले तो कलावती मना करती रही, लेकिन जब पप्पू ने बहुत अपनापन दिखाया, तो वह मान गई. पप्पू ने उसे घर के पास छोड़ दिया. जाते समय वह बोला, ‘‘कभी कोई जरूरत पड़े तो बताइएगा, मैं पूरी मदद करूंगा.’’

उस दिन के बाद पप्पू अकसर कलावती से मिलने लगा. वह खूब हमदर्दी दिखाया करता था. कलावती अब सहज ढंग से उस के स्कूटर पर बैठ जाया करती थी. हंसीमजाक की बातें भी होने लगी थीं.

समय बीतता गया. धीरेधीरे पप्पू और कलावती के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. कलावती उस से घुलमिल गई.

एक दिन कलावती के मकान मालिक परिवार सहित गांव चले गए थे. उन के परिवार में शादी थी. उस दिन कलावती ने पप्पू को घर में आ कर बैठने के लिए कह दिया. वह यही तो चाहता था.

कलावती ने चाय बनाई. दोनों ने चाय पी. प्यार भरी बातें होने लगीं. पप्पू बहकने लगा. कलावती भी खुद को संभाल नहीं पाई. वह भी फिसलती गई. वह उस की बांहों में समा गई.

उस रात पप्पू अपने मकसद में कामयाब हो गया. वह संतुष्ट हो कर देर रात अपने घर गया.

पप्पू ने कलावती को बताया था कि वह कुंआरा है. उस ने कलावती से शादी करने की बात कह दी थी. वह मौका देख कर कलावती के घर आता रहा. कलावती भी उसे खूब चाहने लगी थी. वह दोबारा शादी करने का सपना देख रही थी, लेकिन उसे पता नहीं था कि जिस शख्स पर उस ने भरोसा किया है, वह मक्कार है.

पप्पू का जब कलावती से जी भर गया तो वह धीरेधीरे उस से दूर होने लगा. जब मिलता और कलावती शादी के लिए कहती तो टाल देता. एक दिन तो दोनों के बीच शादी को ले कर झगड़ा हो गया. तब से पप्पू बहुत कम उस से मिलनेजुलने लगा.

बाद में कलावती को कंपनी के किसी आदमी ने बताया कि पप्पू तो शादीशुदा है और काफी बिगड़ा हुआ आदमी है. शराब पीता है, सट्टाजुआ खेलता है और औरतों की जिंदगी बरबाद करता है.

कलावती यह जान कर बहुत पछताई, बहुत रोई. अब वह पप्पू को सबक सिखाना चाहती थी. उस ने थाने में उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी.

पप्पू को जब यह पता चला तो उस ने कलावती को डरायाधमकाया, लेकिन वह डरने वाली न थी. इस से डर कर पप्पू फरारी काटने लगा. लेकिन कब तक बचता? एक दिन मुखबिर ने थानेदार को उस की सूचना दी.

पुलिस ने पप्पू को दबोच लिया. वह अकड़ा तो हवालात में बंद कर के उस की जम कर कुटाई की गई. डंडे पड़े तो उस का सारा भूत उतर गया. अगले दिन उसे कोर्ट में पेश कर जेल भिजवा दिया गया.

कलावती को बड़ा सबक मिला. वह बहुत बड़ा धोखा खा चुकी थी. दोबारा उस ने ऐसी गलती कभी नहीं की. वह चुपचाप अपना काम कर रही थी.

मालिक ने उस का पूरा साथ दिया, क्योंकि वे शंकर को बेटे जैसा मानते थे. मालकिन भी भली थीं. उन्होंने अपने घर में ही उसे एक कमरा दे दिया. वह मालकिन का घरेलू काम भी कर दिया करती थी. Love Story In Hindi

Story In Hindi: चंगाई सभा

Story In Hindi, लेखक – आर. सेलट

पूरन पाल चुपचाप अपने सरकारी क्वार्टर के पीछे वाले दरवाजे की चौखट पर बैठा गहरी चिंता में डूबा हुआ था. उस के 3 बच्चे थे, 2 लड़कियां, जो नर्स बनने वाली थीं और एक लड़का.

पूरन पाल का एकलौता लड़का 14 साल का था, जो गूंगा ही पैदा हुआ था. पूरन पाल सोचता था, लड़कियों की शादी हो जाए और लड़के का बंदोबस्त हो जाए, तो उस की नैया भी पार लग जाए.

तकरीबन 2 महीने पहले पूरन पाल को पता चला कि शहर में विदेश से एक पादरी साहब आ कर ‘चंगाई सभा’ करने वाले हैं. चर्च के पादरी ने भी सब को इस बारे में बता दिया था. शहर में भी पोस्टर लगे थे.

फैक्टरी की दीवार पर भी एक पोस्टर चिपका था. हैरी ने बताया था, ‘‘बहुत बड़े पादरी आ रहे हैं.’’

पूरन पाल सोच रहा था कि उस के पिताजी भी तो अंगरेजों के समय में चर्च में बैरा थे. पर पहले पादरी छोटेबड़े नहीं होते थे. हां, अब समय भी तो बदल गया है. अब ऐरू को देखो, वह लालू चाचा का लड़का था और लालू चाचा तो उस के पिताजी के साथ चर्च में बैरा थे. पूरन पाल के पिताजी और लालू चाचा आपस में अच्छे दोस्त थे. दोनों मिशन के अनाथ आश्रम में पले थे.

ऐरू ने पूरन पाल के सामने ही गिरजे की किताबें बेचीं. फिर पादरी बनने की ट्रेनिंग ले ली और विदेश हो आया. वह बिशप भी बन गया है.

‘चंट था ससुरा, पर हम रहे भोंदू के भोंदू,’ सोचते हुए पूरन ने सिर झटक दिया, ‘अब तो ऐरू की बात ही और है. बंगला है, 2 कारें हैं, पत्नी शहर के बड़े अंगरेजी स्कूल में प्रिंसिपल है. लोग उसे रेवरंड ऐरन कहते हैं. कभी साथ हौकी खेलता था. अब अकेले में मिलता है, तो दुआसलाम कर लेता है, नहीं तो वह भी नहीं. कलक्टर, पुलिस कप्तान के साथ उठताबैठता है, उस के बच्चे भी तो मिशन स्कूल में ही पढ़ते हैं.’

बहरहाल, ‘चंगाई सभा’ की तैयारी जोरशोर से चल रही थी. सुनने में आया था कि 4-5 लाख रुपए भेजे हैं, विदेशी पादरी ने इंतजाम के लिए. गिरजे का सचिव डगलस बता रहा था कि विदेशी पादरी बहुत पहुंचे हुए हैं. वह सब को चंगा कर देते हैं. लंगड़े दौड़ने लगते हैं, गूंगे बोलने लगते हैं और बहरे सुनने लगते हैं.

डगलस ने कहा था, ‘‘तेरे लड़के की जीभ से ‘शैतानी बंधन’ भी खुल जाएगा. बस, यकीन पक्का होना चाहिए.’’

पूरन पाल बहुत खुश था. उसे ऐसा लग रहा था, मानो सारा तामझाम उसी के लिए हो रहा है. गिरजे के मैदान में हजारों लोगों के बैठने का इंतजाम किया गया था. दर्जनों लाउडस्पीकर और सैकड़ों बल्ब लगे थे. पूरन पाल को एक रात सपना भी आया कि उस का लड़का गोलू बोल रहा है.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब ‘चंगाई सभा’ होनी थी. पूरन पाल सुबह से ही शाम होने का इंतजार करने लगा. उस दिन इतवार था, सो फैक्टरी तो जाना नहीं था. शाम होते ही वह गोलू को तैयार कर साइकिल पर बैठा कर ले गया.

पूरा मैदान रंगबिरंगी रोशनियों से नहा रहा था. माइक पर भाषण चालू था. विदेशी पादरी के आने से पहले, जिस को जितना मौका मिला, मंच पर आ कर बोल लिया. हजारों लोग बैठे थे. कुछ बाहर से भी आए थे.

हैरिसन भी आया था, चमकीली कमीज और टाई लगा कर. पूरन पाल को हंसी आ गई. हैरिसन फैक्टरी में कुली था. घर में भले खाने को न हो, पर बड़े दिन पर रम की 3-4 बोतलें जरूर लाता था. तभी लोगों में हलचल होने लगी.

3-4 कारों का काफिला मंच के सामने रुका. गोरे विदेशी पादरी स्टेज पर चढ़ गए. बिशप ऐरू भी साथ में था.

रमेश चंद्र नामक एक नेता, जो पहले ब्याज पर पैसा देता था, वह भी वहां आया हुआ था. पूरन ने सोचा कि यह यहां क्या कर रहा है? अब भोले पूरन पाल को क्या समझ कि ऐसे ‘वोट बैंक’ बारबार तो नहीं मिलते.

एकदम सन्नाटा छा गया था. आधा घंटा ‘दुआ’ हुई. फिर चंदा इकट्ठा किया गया. कुछ लोग स्टेज पर जा कर लिफाफे दे रहे थे, कुछ नीचे घुमाए जा रहे दान के डब्बे में पैसे डाल रहे थे.

जब चंदे का डब्बा पूरन पाल के सामने आया तो उस ने 10 रुपए का सिक्का पेटी में डाल दिया. नीचे
नोट थे, इसलिए सिक्के की आवाज भी नहीं आई.

पीतल की नक्काशी वाला बड़ा सुंदर डब्बा था, जिस पर बाइबिल की आयत लिखी थी, ‘जब तुम दाएं हाथ से दान करो तो तुम्हारे बाएं हाथ को भी पता न चले’.

फिर ऐलान हुआ, ‘जो लोग चंगाई चाहते हैं, सामने आ जाएं.’

पूरन पाल भी गोलू का हाथ पकड़ कर स्टेज के सामने जा पहुंचा. चंगाई शुरू हुई तो चाय वाले एलबर्ट के लंगड़े बच्चे का हाथ पकड़ कर धकियाते हुए दौड़ाया गया. अगला नंबर गोलू का था. पूरन उसे ले कर स्टेज पर पहुंचा.

विदेशी पादरी अंगरेजी में बोलता था और देशी पादरी हिंदी में उस की बात बताता था. बिशप ऐरू और नेता रमेश चंद्र अपनी बातचीत में मशगूल थे. शायद ईसाई कब्रिस्तान के पीछे पड़ी लंबीचौड़ी जमीन की बात कर रहे थे.

विदेशी पादरी ने गोलू के सिर पर हाथ रख कर ‘दुष्ट आत्माओं’ को भगाने की दुआ की. लोग हैरानी से देख रहे थे.

पादरी ने पूछा, ‘‘लड़का बचपन से गूंगा है?’’

पूरन पाल ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. फिर पादरी धीरे से कुछ बुदबुदाने लगा. थोड़ी देर बाद उस ने कहा, ‘‘बेटा, अब बोलो, ‘जीसस लवस यू’…’’

गोलू के गले से वही पुरानी घुटी सी आवाज निकली, ‘‘इसस अम ऊ.’’

विदेशी पादरी जोर से चिल्लाया, ‘‘आलेलुइया… थैंक्स द लार्ड.’’

मंच पर बैठे लोग भी चिल्लाने लगे. उन की देखादेखी नीचे बैठे और खड़े लोग भी चिल्लाने लगे.

चर्च के पादरी ने कहा, ‘‘अब शैतानी बंधन जीभ से टूट चुका है. अब यह लड़का जल्दी ही बोलने लगेगा. बस, एक हफ्ते के अभ्यास की जरूरत है.’’

कुछ लोग अब भी चिल्ला रहे थे. पादरी साहब ने पूरन पाल को धीरे से धकियाते हुए स्टेज के दूसरी तरफ से उतरने का इशारा किया.

एक घंटे बाद ‘चंगाई सभा’ खत्म हुई. इतवार को गिरजे में पादरी ने ‘चंगाई सभा’ की बातें बढ़ाचढ़ा कर बताई.

पूरन पाल के लड़के और दूसरे लोगों के ‘चंगे’ होने की बातें बताईं.

जो लोग ‘चंगाई सभा’ में नहीं आ पाए थे, उन्हें इस बात का दुख था. गिरजे के सचिव डगलस ने नया स्कूटर खरीद लिया था.

2 महीने बाद भी पूरन पाल को थोड़ी उम्मीद थी कि शायद गोलू ठीक हो जाए. किंतु उस की आवाज में सुधार नहीं हुआ था. शाम को फैक्टरी से लौटते वक्त एलबर्ट चाय वाले के लड़के को देखा, जो ‘चंगाई सभा’ में ‘चंगा’ हो गया था, वह सड़क के किनारेकिनारे पहले की तरह बैसाखी के सहारे लंगड़ाते हुए चला आ रहा था. पूरन का दिल बैठ सा गया था.

अब वह घर के पिछवाड़े बैठा बेटे के बारे में सोच रहा था. सोचता था, गोलू ठीकठाक कहीं लग जाए,
तो बुढ़ापे में सहारा हो जाए या गोलू को ही सहारा…?

गरमियों के दिनों में शाम को पीछे बैठना पूरन को बहुत सुहाता था, ठंडीठंडी हवा उसे अच्छी लगती थी.
पर सच ही है. दिल अच्छा न हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता. तभी पीछे के कमरे में लगा कलैंडर हवा में फड़फड़ाया.

पूरन पाल ने अलसाई नजरों से देखा, कलैंडर पर हल चला रहे किसान की तसवीर थी और नीचे बाइबिल की आयत याकुब 2.26 लिखी थी, ‘निदान, जैसे देह ‘आत्मा’ के बिना मरी हुई है, वैसे ही विश्वास भी कर्म के बिना मरा हुआ है’.

पूरन पाल को मानो निदान मिल गया. सुबह गोलू को तैयार कर साइकिल पर बैठा कर ले जाने लगा तो पत्नी सारा ने पूछा, ‘‘कहां…?’’

‘‘गूंगेबहरे बच्चों के सरकारी स्कूल…’’ पूरन पाल ने जवाब दिया. Story In Hindi

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