Hindi Romantic Story: कौन तुम्हें यों प्यार करेगा…

Hindi Romantic Story ‘‘दादी, मैं बाहर खेलने जाऊं?’’ सुरभि ने सोफिया से इजाजत मांगी.

‘‘हां, लेकिन ज्यादा दूर मत जाना. यहीं अहाते में खेलना. और हां, शोर बिलकुल भी नहीं करना. दोपहर का वक्त है. सब लोग अपनेअपने घरों में सो रहे होंगे.’’

‘‘ठीक है दादी,’’ कहते हुए सुरभि दौड़ कर नीचे खेलने चली गई.

सोफिया टीवी के चैनल बदलने लगीं. सुरभि उन के बेटे कमलेश और बहू निम्मी की बेटी है. कमलेश एक सरकारी बैंक में काम करता है. बारबार तबादले से परेशान हो कर उस ने कठुआ में ही अपनी बेटी का दाखिला करा दिया था.

दोनों पतिपत्नी कामकाजी लोग हैं और बैंक में ही कभी अंबाला तो कभी चंडीगढ़ में काम करते हैं. उन का बेटा सुनील और सुरभि यहां कठुआ में अपनी दादी के साथ रहते हैं.

सोफिया अब विधवा हो चुकी हैं. उन के पति देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे.

इस साल सोफिया 97 साल की हो गई थीं. अब तो उन से हिला भी नहीं जाता था. घर में मेड आती थी, जो सुबहशाम खाना बनाती, कपड़े धो देती, बच्चों को खाना खिला देती.

बुढि़या सोफिया के पास अब कोई काम नहीं था. वे बच्चों से अखबार पढ़वाती थीं. जासूसी उपन्यासों का उन को शुरू से शौक था. वे अपने पोते सुनील को जबतब बिठा लेती थीं. कभी अखबार पढ़ने को कहती थीं, तो कभी जासूसी कहानियों को पढ़ कर सुनाने की इच्छा जाहिर करती थीं.

यह सब काम इतवार को या सरकारी छुट्टी या फिर किसी पर्वत्योहार पर ज्यादा होता था. जब थोड़ाबहुत पढ़ कर बच्चे इधरउधर भागने लगते या खेलने जाने की जिद करने लगते, तो सोफिया का एक ही सहारा होता था, टैलीविजन पर न्यूज चैनल देखना.

आज एक न्यूज चैनल बदलते हुए सोफिया के हाथ एकाएक रुक गए. आज फिर एक फौजी की लाश तिरंगे में लिपटी हुई आई थी. उस फौजी की उम्र 25 साल के आसपास रही होगी. सीमा पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुए वह जवान शहीद हो गया था. उस शहीद जवान को हवा में बंदूक की गोलियां चला कर सलामी दी जा रही थी. सब लोग सावधान की स्थिति में खड़े थे.

सोफिया के पति की विदाई भी ऐसे ही हुई थी. उन को भी ऐसे ही गोलियों की सलामी दी गई थी. गोलियों की आवाज के बीच सोफिया अपने अतीत की खोह में गुम होती चली गईं.

‘‘माफ कीजिए, क्या मैं यहां थोड़ी देर के लिए बैठ जाऊं? मैं आप को बहुत देर तक तकलीफ नहीं देने वाला हूं. बस, मुझे कठुआ तक जाना है. अगले किसी स्टेशन पर उतर कर मैं जनरल डब्बे में चला जाऊंगा. अगर आप को एतराज न हो तो…’’ उस नौजवान ने बहुत सधे हुए शब्दों में कहा था.

लेकिन पता नहीं क्यों सोफिया को गुस्सा आ गया था. बिना सौरभ की तरफ देखे ही वह बोली, ‘‘आप को पता नहीं है कि यह रिजर्वेशन वाला कंपार्टमैंट है… आप को इस कंपार्टमैंट में नहीं आना चाहिए था. अगर चढ़ना ही था, तो किसी जनरल कंपार्टमैंट में चढ़ जाते.

‘‘हम लोग जनरल कंपार्टमैंट की परेशानियों से बचने के लिए ही रिजर्वेशन कराते हैं, ताकि आराम से सफर कर सकें.’’

सोफिया पहले से ही बहुत परेशान थी. धनबाद से उस की ट्रेन थी. उसे जम्मू जाना था. घर पर उस के मांबाप अकेले थे. उधर जम्मूकठुआसांभा बौर्डर पर लगातार सीजफायर का उल्लंघन हो रहा था. मोर्टार और गोलियों की बरसात हो रही थी.

सोफिया अपने मांबाप को ले कर बहुत चिंतित थी. उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी तरह जल्द से जल्द जम्मू पहुंच जाए.

सोफिया दिल्ली में काम करती थी. धनबाद अपने किसी काम से आई थी. तब तक पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी शुरू हो गई थी. वह अभी अपना काम निबटा भी नहीं पाई थी, तब तक युद्ध जैसे हालात शुरू हो गए थे. लोगों में एक तरह का डर पैदा हो गया था. चारों तरफ अफरातफरी का माहौल बन गया था.

सोफिया को अपने मांबाप की चिंता सताने लगी थी. पहले तो उसे ट्रेन की टिकट ही नहीं मिल रही थी, पर किसी तरह इधरउधर से जुगाड़ बिठा कर उस ने टिकट का बंदोबस्त किया था.

उस नौजवान ने एक बार फिर कोशिश की, ‘‘प्लीज, केवल अगले स्टेशन तक मुझे यहां बैठने दीजिए. मुझे मालूम है कि आप बहुत नेकदिल हैं. आप का दिल मोम की तरह कोमल है और खूबसूरत लोग किसी का दिल नहीं दुखाते, बल्कि दूसरों की हमेशा मदद ही करते हैं. ऐसा पता नहीं मुझे क्यों आप को देख कर लगता है. वैसे, मेरा नाम सौरभ है.’’

इस बार सोफिया को मुड़ कर सौरभ को देखना बड़ा जरूरी हो गया. वह बोली, ‘‘अच्छा तो मैं खूबसूरत और रहमदिल भी हूं. यह तो मुझे पता ही नहीं था. आप की मेहरबानी से आज मुझे पता चल गया… शुक्रिया. आप पीछे से भी लोगों का चेहरा देख लेते हैं क्या या आप ने झूठ बोलने में पीएचडी कर रखी है?’’

सौरभ झेंप गया. उस ने सचमुच सोफिया को सामने से नहीं देखा था. वह तो हड़बड़ी में ट्रेन में चढ़ गया था. खिड़की से उस ने बस सोफिया का आधा चेहरा ही देखा था.

सौरभ झेंपते हुए बोला, ‘‘नहीं, मैं ने खिड़की से आप को देख लिया था.’’

‘‘अच्छा जी, आप कहीं इसलिए तो इस कंपार्टमैंट में नहीं चढ़ गए कि आप को एक खूबसूरत लड़की दिख गई थी और आप उस के पीछेपीछे हो लिए? आप को कहीं जाना भी है या बस यों ही ट्रेन में चढ़ गए? मैं खूब जानती हूं आप जैसे लोगों को. लड़की देखी नहीं और लगे हाथ साफ करने.’’

सौरभ बस इतना ही कह सका, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. मुझे ड्यूटी जौइन करनी है.’’

सोफिया को अब अफसोस हुआ. उस ने सौरभ को बहुत भलाबुरा कह दिया था. वह बोली, ‘‘अच्छा, बैठ जाइए.’’

सौरभ ने कहा, ‘‘जी, मैं ठीक हूं. मुझे तो खड़े रहने की आदत है.’’

‘‘फिर भी बैठ जाइए. अगला स्टेशन अभी घंटेभर बाद आएगा.’’

सौरभ पर सोफिया ने सरसरी नजर दौड़ाई. चौड़ी छाती, तांबई रंग, कद साढ़े 6 फुट. मजबूत कंधे. गोरा उम्र कोई 30-32 साल. जींसटीशर्ट में वह बेहद खूबसूरत लग रहा था. हाथ में एक बैग. बंधा हुआ एक कंबल. कुल इतना ही सामान था.

‘‘क्या करते हैं वहां जम्मू में?’’ सोफिया ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस घोड़ों के अस्तबल में काम करता हूं और मुसाफिरों को ऊपर पहाड़ पर ले जाता हूं.’’

‘‘मुझे बना रहे हैं. आप की कदकाठी और आप की पर्सनैलिटी देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि आप कोई अस्तबल या घोड़े के सईस हो. सचसच बताइए कि कौन हैं आप?’’

सौरभ का दिल इस बार तेजी से धड़का था. वह नहीं चाहता था कि अपनी असलियत सोफिया को बताए.

दरअसल, उस को कठुआ जाना था. सीमा पर हालात बहुत खराब चल रहे थे. वह अपनी बहन की शादी में यहां धनबाद आया था. शादी अभी 2 दिन पहले ही निबटी थी. तब तक देश में युद्ध जैसे हालात बन गए थे.

सौरभ अपनी पहचान किसी को बताना नहीं चाहता था कि वह एक फौजी है. इस तरह से सब को अपनी असलियत बताना उसे ठीक नहीं लगता था. वह बहुत ही शांत स्वभाव का था. ज्यादा बात करना उस के स्वभाव में नहीं था.

सौरभ बोला, ‘‘नहीं, मैं घोड़ों की देखभाल ही करता हूं. पहाड़ की चोटी पर मुसाफिर सीधे नहीं चढ़ पाते, इसलिए घोड़ों की मदद से ऊपर पहाड़ पर जाते हैं. मैं छोटामोटा काम करने वाला ही आदमी हूं. पता नहीं आप को क्यों ऐसा लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूं.’’

सौरभ की बातों में पता नहीं ऐसा क्या था कि न चाहते हुए भी सोफिया को यकीन करना पड़ गया कि सौरभ जोकुछ कह रहा है, वह सच है. शाम कब की हो चुकी थी. ट्रेन अपनी रफ्तार में दौड़ती जा रही थी.

अगला स्टेशन आने ही वाला था. उस स्टेशन से सोफिया का मुंहबोला भाई मुरारी आ कर ट्रेन में चढ़ने वाला था. उस को भी सोफिया के साथ जम्मू जाना था.

सोफिया बहुत बेचैन हो कर पहलू बदल रही थी. दरअसल, मुरारी आईटीआई का इम्तिहान दे कर सीधे स्टेशन आ कर उस के साथ ही जम्मू तक जाने वाला था.

सोफिया के पास वाली अपर बर्थ मुरारी के नाम से बुक थी. स्टेशन आया, लेकिन उस का भाई नहीं दिखा.
सोफिया ने मुरारी को फोन लगाया, ‘‘हां, मुरारी तुम कहां हो? आ जाओ स्टेशन, गाड़ी स्टेशन पर खड़ी है.’’

‘दीदी, मैं ट्रैफिक में फंस गया हूं. मुझे स्टेशन आने में करीब एकसवा घंटे से कम नहीं लगेगा,’ मुरारी ने बताया.

‘‘ट्रेन तो केवल 10 मिनट ही रुकती है इस स्टेशन पर. किसी तरह कोशिश करो जल्दी पहुंचने की,’’ सोफिया बोली.

‘दीदी, नहीं हो पाएगा. आप चली जाओ. मैं एकदो दिन बाद आ जाऊंगा,’ मुरारी ने कहा.

‘‘लेकिन मैं अकेले कैसे इतनी दूर तक का सफर करूंगी. मेरे साथ सामान भी तो है.’’

‘अरे दीदी, मैं कठुआ में अपने किसी दोस्त को फोन कर दूंगा. वह सामान उतरवा देगा. घबराने की कोई जरूरत नहीं है. सब ठीक होगा. अच्छा, रखता हूं. ट्रैफिक खुल गया है. अब स्टेशन न जा कर सीधा घर चला जाऊंगा. चलो, ठीक है. हैप्पी जर्नी दीदी.’

‘‘ठीक है, रखो फोन,’’ सोफिया ने बेमन से कहा.

सौरभ और मुरारी की कदकाठी और चेहरा एक सा था. वह सोचने लगी कि जगहजगह युद्ध जैसे हालात चल रहे हैं. पता नहीं पड़ोसी दुश्मन देश कब हमला कर दे. क्यों न वह सौरभ को ही अपने साथ ले चले? स्टेशन पर मुरारी का दोस्त तो आ ही जाएगा उस का सामान लेने.

सौरभ उतरने ही वाला था कि तभी सोफिया को परेशान देख कर बोला, ‘‘आप कुछ परेशान सी लग रही हैं.’’

‘‘हां, मेरा मुंहबोला भाई मुरारी अभी स्टेशन पर आने ही वाला था, लेकिन ट्रैफिक में फंस गया. अब मुझे अकेले ही सफर करना पड़ेगा.’’

‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. खैर, मैं चलता हूं,’’ सौरभ ने कहा.

सौरभ जब सोफिया के पास से गुजरा, तब सोफिया ने टोका, ‘‘सुनिए, आप चाहें तो मेरे भाई की सीट पर बैठ सकते हैं. अकेली लड़की के साथ में किसी विश्वासी आदमी का होना बेहद जरूरी है. अगर आप को कोई दिक्कत न हो तो.’’

‘‘लेकिन जब टीटी आएगा तब?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘अरे, टीटी से मैं बात कर लूंगी. बस आप यहीं रहिए,’’ सोफिया बोली.

सौरभ मान गया. थोड़ी देर के बाद सोफिया ने सौरभ से पूछा, ‘‘आप चाय लेंगे?’’

‘‘आप किसी ऐरेगैरे को चाय पिलाएंगी?’’ सौरभ ने चुटकी ली.

‘‘अरे, मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. आप उस बात को अब भी पकड़े हुए हैं. आदमी को पहचानने में कभीकभी गलती हो जाती है,’’ सोफिया बोली.

‘‘यानी कि आप के हिसाब से मैं गलत आदमी हूं?’’

‘‘ऐसा मैं उस समय तक ही सोचती थी, लेकिन अब नहीं. आदमीआदमी में फर्क होता है. इतनी तो परख है मुझ में,’’ सोफिया ने कहा.

‘‘तो क्या परखा आप ने? कैसा आदमी हूं मैं?’’

‘‘आप भले आदमी हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘आप भले आदमी न होते, तो मैं आप को अपने साथ सफर करने की इजाजत नहीं देती.’’

‘‘अच्छा, तो यह बात है.’’

‘‘हां, और क्या…’’

‘‘यह तो आप की जरूरत है कि आप के साथ कोई मर्द सफर करने के लिए नहीं है, नहीं तो आप मुझे अपने साथ इस कंपार्टमैंट में रुकने को न कहतीं. खैर, ऐसा होना लाजिमी भी है,’’ सौरभ ने जैसे सफाई देनी चाही.

सोफिया ने चाय की प्याली बनाई और सौरभ की तरफ बढ़ा दी. इस बार सौरभ के हाथ से सोफिया का हाथ छू गया.

ठंड के मौसम में सोफिया का हाथ बिलकुल ठंडा हो गया था. सौरभ ने चाय की प्याली थाम ली और धीरेधीरे चाय पीने लगा.

सौरभ ने गौर से सोफिया के चेहरे को निहारा. गोरा रंग, हरी आंखें. भरीभरी छातियां. जींसटौप में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

सोफिया ने पूछा, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हैं?’’

‘‘आप का खूबसूरत चेहरा.’’

‘‘मैं कहां खूबसूरत हूं. मेरी तो उम्र भी अब ढलने लगी है. मेरी उम्र के लोगों के तो बड़ेबड़े बच्चे होते हैं.’’

‘‘नहीं, मैं सच कह रहा हूं. आप बहुत खूबसूरत हैं. आप के जिस्म के हर हिस्से को कुदरत ने बहुत फुरसत से बनाया है.’’

फिर सौरभ को लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गया है. वह अब चुप हो गया था. वह खिड़की से बाहर देखने लगा था.

‘‘उधर क्या देख रहे हो? अभी मेरी खूबसूरती की बात कर रहे थे और अभी बाहर क्या निहारने लगे?’’

‘‘कुछ नहीं, कुदरत की बनाई हुई चीजें ही देख रहा था. नदी, तालाब, पहाड़, चांद की चांदनी…’’

‘‘क्या ये मुझ से भी खूबसूरत हैं?’’

सौरभ केवल हंस कर रह गया.

‘‘शादी हो गई तुम्हारी?’’ सोफिया ने सौरभ के चेहरे को निहारते हुए पूछा.

‘‘नहीं,’’ सौरभ बाहर के नजारे में कहीं खोता हुआ बोला.

‘‘शादी लायक तो तुम्हारी उम्र हो ही गई है. अब तक क्यों नहीं की?’’

‘‘यह सवाल तो मैं तुम से भी पूछ सकता हूं.’’

‘‘जिम्मेदारियां… और क्या वजह हो सकती है. मैं अपने मांबाप की अकेली बेटी हूं. मेरे मांबाप बूढ़े हैं. उन की उम्र हो गई है. आखिर किन के भरोसे उन को छोड़ूं? मेरे चले जाने के बाद उन को कौन देखेगा?

लेकिन तुम ने शादी क्यों नहीं की? तुम्हारी भी तो शादी लायक उम्र हो गई है?’’ सोफिया बोली.

‘‘वही जिम्मेदारी की बात आ जाती है. तुम्हारी वाली हालत. घर में बहन थी. उस की शादी करनी थी. उस के बाद ही तो अपनी शादी के बारे में सोचता,’’ सौरभ बोला.

दोनों अपनी हालत पर मुसकराने लगे.

‘‘अरे, मैं ने अपना फोन कहां रख दिया,’’ सौरभ को अचानक अपना फोन याद आया.

‘‘ठीक से देखो, यहींकहीं होगा.’’

सुनो, तुम अपने मोबाइल से जरा मेरे नंबर पर रिंग कर दो. हो सकता है, यहींकहीं गिरा हो. मिल जाए.’’

सोफिया ने नंबर पूछ कर मिलाया और मोबाइल की घंटी पर एक प्यारी सी रिंगटोन बजने लगी, ‘सुनो न संगेमरमर… कुछ भी नहीं है…’

मोबाइल सौरभ की सीट के बगल में ही गिरा था. रिंग मारने पर आसानी से मिल गया.

‘‘रिंगटोन तो तुम ने बहुत अच्छी लगा रखी है.’’

‘‘हां, मुझे यह गाना बेहद पसंद है.’’

‘‘तुम ने मेरी कौलर ट्यून सुनी है?’’

‘‘नहीं,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘फिर मेरा मोबाइल नंबर डायल करो.’’

सौरभ ने स्पीकर औन कर दिया. आवाज आई, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा, जैसे मैं करती हूं…’

सोफिया का चेहरा खुशी के मारे चमकने लगा.

सौरभ बोला, ‘‘ये दोनों मेरे फेवरेट गाने हैं.’’

‘‘तुम बहुत स्मार्ट हो.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम ने बहाना बना कर मेरा मोबाइल नंबर ले लिया,’’ सोफिया बोली.

‘‘नहीं, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. तुम कहो तो डिलीट कर दूं?’’

‘‘नहीं, लेकिन तुम्हें पता है कि लड़कियां अपना नंबर किस को देती हैं?’’

‘‘किस को?’’

‘‘किसी खास को.’’

‘‘अच्छा, तो क्या चलोगी मेरे साथ डेट पर?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘लेकिन तुम उम्र में मुझ से बहुत छोटे हो. कहां तुम 30 के और कहां मैं 40 की. एक दशक का अंतर है हमारी और तुम्हारी उम्र में,’’ सोफिया बोली.

‘‘प्यार में उम्र, ऊंचनीच, जातपांत, अमीरगरीब कुछ माने नहीं रखता, बस दिल मिलना चाहिए,’’ सौरभ ने बताया.

‘‘10 साल बीतने के बाद तुम ही किसी नईनवेली को खोजने लगोगे. तब मैं तुम्हारे लिए बूढ़ी हो जाऊंगी,’’ सोफिया बोली.

‘‘ऐसा नहीं होगा. मैं तुम्हें रूह की गहराइयों से चाहता हूं. तुम्हारा प्यार मेरे लिए पल दो पल का नहीं है,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘सच में?’’ सोफिया ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अच्छा, इस नंबर का क्या करना है? हो सकता है, हम फिर कभी मिलें ही न. यह हमारी आखिरी मुलाकात हो,’’ सौरभ ने कहा.

सोफिया चुप रही. ट्रेन रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. आगे का सफर बहुत अच्छा रहा. ट्रेन कठुआ स्टेशन पर पहुंची. मुरारी का दोस्त मयंक सोफिया को लेने आया था. आखिरी बार सौरभ और सोफिया मिल रहे थे.

सौरभ ने सोफिया को इशारे से कहा कि फोन करना. थोड़ी देर में गाड़ी जम्मू के लिए आगे बढ़ गई.

घर पहुंचने के बाद सोफिया का दिल किसी काम में नहीं लगता था. उस को बारबार सौरभ की याद आती थी.

एक तय समय तक लड़के वाले सोफिया को देखने और रिश्ते की बात करने के लिए आते थे, लेकिन सोफिया जिम्मेदारियों के बो?ा तले खुद को दबाती चली गई. उस ने शादी के इरादे को ही एक सिरे से खारिज कर दिया था. लेकिन सौरभ से मिल कर उस में उमंगें जागने लगी थीं.

एक दिन सोफिया ने सौरभ को फोन लगाया और शिकायत करती हुई बोली, ‘‘तुम्हें तो मेरी याद भी नहीं आती होगी न?’’

‘ऐसा नहीं है मेरी जान. तुम्हें तो मैं एक पल भी भूल नहीं सका, लेकिन केवल बात करने से काम नहीं चलता. काम भी तो करना पड़ता है. अगर घोड़े की सेवाटहल न करूं, तो मालिक मेरी जान खा जाएगा.

मेरा ज्यादातर समय टूरिस्टों के साथ ही बीतता है. पेट के लिए सब करना पड़ता है,’ सौरभ बोला.

‘‘तुम यहीं आ जाओ. चार घोड़े तुम्हारे लिए खरीद देती हूं. तुम उन की सेवा करना और मुझे उन घोड़ों पर घुमाना. जो मजदूरी तुम वहां पाते हो, यहां आ कर मुझ से ले लेना,’’ सोफिया बोली.

सौरभ ने कहा, ‘सो तो ठीक है, लेकिन मेरी नौकरी का सवाल है, नहीं तो मैं जरूर आता. एक बार नौकरी चली गई, तो फिर न मिलेगी. और तुम्हें तो पता है कि नौकरी मिलना आज के समय में कितना मुश्किल है.’
सोफिया बोली, ‘‘और तुम ने मु?ो डेट पर ले जाने को कहा था. उस का क्या हुआ?’’

‘डेट पर भी चलेंगे. अभी इधर सीजन चल रहा है. दो पैसे कमाने के दिन हैं, इसलिए मालिक से छुट्टी की बात भी नहीं कर सकता. मैं आऊंगा तुम से मिलने, लेकिन अभी तुम थोड़ा समय दो.’

‘‘सौरभ, मैं तुम्हें जीजान से चाहती और प्यार करती हूं. मैं तुम से मिलना चाहती हूं. तुम को छूना चाहती हूं. तुम में समाना चाहती हूं,’’ सोफिया ने अपना दिल खोल कर रख दिया.

‘मैं भी तुम से सच्चा प्यार करता हूं. तुम को तो भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता,’ सौरभ ने कहा.

‘‘ओह सौरभ, तुम कितने अच्छे हो,’’ सोफिया खुश हो गई.

किसी तरह 2 महीने बीते. बर्फ पिघलने के बाद पाकिस्तानी सेना ने भारत में घुसपैठ कर दी. पहलगाम, कठुआ और कारगिल के अलावा श्रीनगर, अखनूर, बारामूला में बेकुसूर नागरिक मारे जा रहे थे. अब युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था.

एक दिन सौरभ का फोन आया. उस समय सोफिया बाजार में सामान खरीदने गई थी. घर आ कर मोबाइल देखा तो कई मिस्ड काल थे.

सोफिया ने फोन मिलाया, ‘‘बोलो मेरे चरवाहे, मेरी जान ने कैसे याद किया मुझे?’’

‘मैं अब तुम्हें देखे बगैर नहीं रह सकता. तुम्हारी बहुत याद आती है. तुम्हारी आवाज सुनते ही मेरे शरीर में अजीब सी हरकत होने लगती है,’ सौरभ ने कहा.

सोफिया बोली, ‘‘आ जाओ न फिर मुझ से मिलने, तुम को किस ने रोक रखा है.’’

सौरभ बोला, ‘आ जाता, लेकिन मेरा काम मुझे रोक लेता है. तुम समझ रही हो न…’

सोफिया नाराज हो कर बोली, ‘‘ये सब कहने की बातें हैं क्या…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘सुनो सोफिया, मैं तुम से एक बेहद जरूरी बात करना चाहता हूं. मेरा काम अब ज्यादा बढ़ गया है. मैं ज्यादातर ऊंचाई पर ही रहूंगा और उतनी ऊंचाई पर कोई नैटवर्क भी नहीं आता, इसलिए फोन से बहुत मुमकिन है बात न हो पाए. पर जब भी मौका मिलेगा मैं तुम्हें फोन कर लूंगा. फोन न कर सका, तो मैं तुम्हें हर हफ्ते खत लिखा करूंगा.

‘अपना खयाल रखना. खत का भी ज्यादा इंतजार मत करना. देश में अभी इमर्जैंसी जैसे हालात हैं.

बारामूला में मेरा पूरा परिवार दादादादी, चाचाचाची सब लोग रहते हैं.

‘इधर जम्मू में हालात बिगड़े तो मेरा एक और मकान धनबाद में है. मेरे दादादादी, अपने मांपिताजी को ले कर वहीं चली जाना. रुपएपैसों की बिलकुल चिंता मत करना. एक एटीएम कार्ड तुम्हें कुरियर से भेज रहा हूं. पिन की जानकारी ह्वाट्सएप कर दी है. ये सब मोटीमोटी बातें हैं, जिन की तुम को आने वाले समय में जरूरत पड़ेगी.’

‘तुम जा कहां रहे हो? मुझे बताओगे भी या मुझे इसी तरह अपना आदेश सुनाते रहोगे फोन पर?’
‘यह जान कर तुम क्या करोगी कि मैं कहां जा रहा हूं. सेफ्टी रीजन से तुम को ये बातें बताई हैं. बस, तुम इन बातों को मानना और एक बात यह कि सेना हैडक्वार्टर के पास ही एक डाकखाना है, जिस में एक डाक बाबू ‘नील चाचा’ काम करते हैं. कोई खास जानकारी चाहिए हो, तो उन से ले लेना.’

‘‘फिर भी तुम कहां जा रहे हो, मुझे कुछ तो पता होना चाहिए.’’

सौरभ ने कहा, ‘सोफिया, मुझे भी कुछ पता नहीं है कि मुझे कहां भेजा जा रहा है. बस, मुझे भेजा रहा है और मैं जा रहा हूं और मुझे जाना भी चाहिए.

‘देश में हालात बेहद खराब हैं. लोगों की छुट्टियां रद्द हो रही हैं. सब लोग काम पर लौट रहे हैं. होमगार्ड के सिपाही, पुलिस, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, आर्मी, एयरफोर्स. सब लोग. बीएसएफ तो मोरचे पर पहले से ही डटी हुई है.’

सोफिया बोली, ‘‘लेकिन इन का तुम से क्या संबंध है? तुम तो आम नागरिक हो. आम नागरिक को युद्ध से भला क्या मतलब है और खासकर एक सईस को?’’

‘मैं इस देश का एक नागरिक हूं और मुझे लगता है कि जब देश को युद्ध जैसी इमर्जैंसी का सामना करना पड़े, तो हर आदमी को युद्ध लड़ने के लिए तैयार होना चाहिए.’

अब सोफिया का माथा ठनका. सौरभ का डीलडौल और साढ़े 6 फुट लंबा कद देख कर उस को पहले ही इस बात का शक था कि वह फौज में काम करने वाला कोई आदमी है.

सोफिया ने कहा, ‘‘अच्छा तुम ठीकठीक बताओ कि तुम कौन हो? तुम सेना में काम करते हो? गुप्तचर विभाग में हो या कौन हो? तुम को मैं जितना समझाने की कोशिश करती जा रही हूं, तुम उतना ही उलझते जा रहे हो. प्लीज, मुझे सही जानकारी दो…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘मेरा एक फोन आ रहा है. रुको, मैं तुम से बाद में बात करता हूं.’’

सौरभ का फोन कट गया था, लेकिन भीतर में कहीं गहरा था सौरभ और उस की बातें भी. कुछ भी साफसाफ नहीं बताता सौरभ. जितना सोफिया सौरभ को सम?ाना चाहती थी, कहीं गहरे में उलझती जाती थी. उस को ट्रेन में ही चेत जाना चाहिए था कि ऐसे लोगों पर जल्दी यकीन नहीं करना चाहिए था.

तभी मोबाइल पर टिंग से एक मैसेज गिरा. सोफिया ने गौर से देखा. वह एटीएम कार्ड का पिन था. 0169.
तकरीबन 15 दिनों के बाद सोफिया को डाक से एटीएम कार्ड भी मिल गया. उस में एक लिहाफा था, जिस में एक बैंक खाता था. एचडीबीसी नाम का कोई बैंक था. उस की शाखा सोफिया के घर के बहुत पास में ही थी यानी सौरभ यहां आया था और उस ने लोकेशन भी देखी थी.

अजीब बात है. सौरभ को मेरे घर और मेरे घर के पास इस बैंक के बारे में अच्छे से पता था. मेरे घर तक आ कर वह मुझ से मिले बगैर चला गया और कहता है कि मुझ से बहुत प्यार करता है. खाक प्यार करता है. जरूर कोई मायावी किस्म का आदमी है सौरभ.

लेकिन लोकलाज का भी तो डर है सौरभ को. शादी से पहले अगर कोई लड़का मिलने आता है, तो लड़की को लोग गलत नजरों से देखते हैं, लेकिन केवल मायावी कह देने भर से काम नहीं चलेगा. वह जिम्मेदार भी तो है. वह भी शादी से पहले. लोग शादी के बाद जिम्मेदारी नहीं स्वीकारते, यह तो शादी से पहले ही जिम्मेदारी स्वीकार रहा है.

पड़ोसी देश के लिए अब नाक बचाने की बात आ गई थी. हमारी फौज ने पड़ोसी मुल्क को नाकों चने चबवा दिए थे, लेकिन हमारी तरफ भी कैजुअल्टी हुई थी. चीन और नेपाल भी इन खराब हालात में पाकिस्तान का साथ दे रहे थे. पूरे देश में ब्लैकआउट चल रहा था. हर जगह अंधेरा. हर जगह डर का माहौल. दिन में ही सोता पड़ जाता था.

सब जगह लोग महफूज ठिकानों में छिप गए थे. देश के किसी भी हिस्से से कभी भी भयानक खबरें आ जाती थीं. सड़कों पर लोगों के कहीं हाथ के टुकड़े तो कहीं पैर के टुकड़े जहांतहां दिखाई देते थे. दिनरात अस्पतालों में भीड़ लगी रहती थी.

मिलिटरी अस्पतालों में कैजुअल्टी ज्यादा हुई थी. वहां एंबुलैंस में भरभर कर लोग आते थे. लोगों का हुजूम अस्पतालों के बाहर अपनों की शिनाख्त कर रहा था. सायरन बजता और लोग बंकरों की तरफ भाग जाते.

अरुणाचल प्रदेश और सियाचिन से डरावनी और भयावह खबरें आ रही थीं. रूस और इजराइल हमारे देश के साथ खड़े थे. रूस ने हमारे लिए 2 दर्जन लड़ाकू बमवर्षक हवाईजहाज भेजे थे. इजराइल भी प्रचुर मात्रा में हमें हथियार मुहैया करा रहा था, लेकिन दोनों तरफ कैजुअल्टी बढ़ रही थीं.

सोफिया का दिल हलकान हो रहा था. वह बारबार सौरभ के बारे में ही सोच रही थी कि इस युद्ध में सौरभ की क्या हालत होगी? वह क्या कर रहा होगा? वह ठीक तो होगा या नहीं? महीनाभर हो चुका था, उस से बात किए. अब तक उस का कोई फोन नहीं आया था.

फोन आता भी तो कैसे… ज्यादातर टावर पहले ही बमबारी में बरबाद हो चुके थे. कुछ थोड़ेबहुत टावर जो थे, सिक्योरिटी की वजह से वहां इंटरनैट बंद कर दिया गया था.

अब लेदे कर सेना हैडक्वार्टर और उस के डाकघर का सहारा था. सेना हैडक्वार्टर और डाकघर सोफिया के
घर के करीब था, लेकिन वह वहां सिक्योरिटी की वजह से नहीं जाना चाहती थी.

पर एक दिन अलसुबह ही सोफिया निकल पड़ी. सेना का हैडक्वार्टर और डाकघर ऊंचाई पर थे.

चलतेचलते उस की सांसें फूलने लगीं. पूछतीपाछती वह किसी तरह काउंटर पर पहुंची. वहां के पोस्टमास्टर का नाम नीलमणि था, जिन्हें सब ‘नील चाचा’ कहते थे.

सोफिया ने पूछा, ‘‘आप में से ‘नील चाचा’ कौन हैं?’’

एक दुबलापतला आदमी वहां डाक छांट रहा था. उस ने पतली ऐनक से खिड़की की तरफ देखा और कहा, ‘‘कौन?’’

सोफिया को लगा जैसे उस का आना कामयाब रहा. वह बोली, ‘‘आप ही ‘नील चाचा’ हैड पोस्टमास्टर हैं?’’
बूढ़े ने ‘हां’ में गरदन हिलाई और कहा, ‘‘डाकिया परसों डाक बांटते समय मोर्टार के छर्रे से जख्मी हो गया है. अभी वह अस्पताल में है. उस की जगह मैं उस का काम कर रहा हूं.’’

‘‘अगर आप को कोई तकलीफ न हो, तो आप मेरी डाक देख देंगे… मेरी कोई चिट्ठी आई हो तो… आप समझ रहे हैं मैं जो कह रही हूं…’’

‘नील चाचा’ ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है बेटी?’’

‘‘मेरा नाम सोफिया है.’’

सोफिया नाम सुनते ही ‘नील चाचा’ जबरदस्ती मुसकराते हुए वे बोले, ‘‘अच्छा, तो तुम सौरभ की मंगेतर हो… नहीं बेटी, तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई है. सौरभ तुम्हारे बारे में मु?ा से अकसर बातें करता था.’’

‘‘आप सौरभ को जानते हैं ‘नील चाचा’?’’

‘‘अरे, सौरभ को कौन नहीं जानता… वह बहुत ही प्यारा लड़का है.’’

‘‘वैसे क्या करते हैं वे सेना में?’’

इस बार ‘नील चाचा’ ने बहुत जोर से सोफिया को घूरा और कुछ देर तक वे उस के चेहरे को देखते रहे, फिर बोले, ‘‘तुम सोफिया ही हो न… सौरभ की मंगेतर?’’

‘‘हां,’’ सोफिया ने ‘नील चाचा’ को बहुत हैरत से देखा.

‘‘हां, तो तुम्हें सचमुच नहीं पता कि सौरभ सेना का जवान है. वह भारतीय सेना में अफसर है.’’

‘‘देखो, उस ने बताया था मुझे, लेकिन मैं भूल गई,’’ सोफिया को झिझक हुई. उसे अपने बरताव पर कोफ्त हो रही थी. नाहक ही उस ने ‘नील चाचा’ से सौरभ के बारे में पूछ लिया. आखिर क्या सोचेंगे वे…
‘‘मेरी कोई डाक आए तो बताइएगा,’’ सोफिया बोली.

‘‘जरूर,’’ ‘नील चाचा’ बोले.

सोफिया घर पहुंची तो वह सौरभ के बारे में ही सोचती रही. सेना में अफसर… और अपने आप को घोड़े की सेवा करने वाला एक मामूली सेवक बता रहा था. इंडियन आर्मी में अफसर और अपने आप को मामूली गाइड बता रहा था.

आने दो इस बार, फिर खबर लेती हूं. महीनों बात नहीं करूंगी. सम?ाता क्या है अपने आप को. बहुत स्मार्ट बनते हो, बच्चू. अब खत लिखेंगे तो जवाब भी नहीं दूंगी. इस बार मजा चखा कर दम लूंगी.

जब हम किसी से मिल नहीं पाते और उस से प्यार भी करते हैं, तो हालात बहुत मुश्किल हो जाते हैं. प्यार में पड़ी सोफिया का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वह सौरभ से मिल तो नहीं सकती थी, लेकिन मिलने की जो भी उम्मीद होती उस पर विचार करती. उस की गैरमौजूदगी में उस से लड़तीझगड़ती और फिर खुद अपनी बेबसी पर रोने भी लगती.

सोफिया का जो था, सौरभ ही था और वह तो बस यह चाहती थी कि किसी तरह उस से बात हो जाए. कहीं से उस का खत आ जाए. कहीं से उस की सलामती की खबर मिल जाए या कम से कम वह सौरभ को एक नजर भर देख ले.

इतने भर से ही सोफिया को संतोष हो जाता, लेकिन इस युद्ध ने सब मटियामेट कर दिया था. जो युद्ध में गए, वे वापस नहीं लौटे, लेकिन सोफिया का दिल कहता था कि उस का सौरभ एक दिन जरूर लौटेगा.

उस का सौरभ उस को जरूर मिलेगा.

सोफिया अपने सौरभ के प्यार में दिनोंदिन मानो गलती जा रही थी. उस का खिलाखिला रहने वाला चेहरा मुरझाने लगा था.

वह जाड़े की एक दोपहर थी, जिस दिन वह खत सोफिया को डाकिया थमा गया था. खत का मजमून देख कर वह वहीं ‘धम्म’ से आंगन में रखी कुरसी पर गिर पड़ी थी. पुरानी टूटी हुई कुरसी पर से संतुलन गड़बड़ाया और बेहोश हो कर वह गिरी तो टाइल्स से चोट लग गई.

2 महीने अस्पताल में बिताए. ठीक हुई तो सोफिया घर लौटी. सौरभ दुश्मनों से बहादुरी से लड़ता हुआ सियाचीन में शहीद हो गया था.

सोफिया की उम्र भी हो रही थी. मांपिताजी के बहुत जोर देने पर वह पहले तो 3-4 साल तक शादी के लिए तैयार ही नहीं हुई, लेकिन मांबाप की जिद के आगे उस की एक न चली और उस ने सेना के एक अफसर मेजर राजीव से शादी कर ली. अभी 4 साल पहले मेजर साहब भी नहीं रहे थे.

‘‘दादी, आप टीवी देख रही हैं या आराम करेंगी?’’ सुनील ने टोका तो सोफिया का ध्यान टूटा. घड़ी शाम के
5 बजा रही थी.

सुनील ने गलती से चैनल बदल दिया. टीवी पर एक धुन तैर रही थी, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा जैसे मैं करती हूं…’ Hindi Romantic Story

Story In Hindi: एक म्यान दो तलवार

Story In Hindi: ‘‘बिटिया नीलू, आज काम पर तू ही चली जाना. मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है,’’ बूढ़े थपरू ने अपनी बेटी से कहा.

‘‘ठीक है बाबा, मैं ही चली जाऊंगी,’’ नीलू ने खुश हो कर कहा.

थपरू चौधरी सुखराम के खेतों पर काम करता था. अगर किसी वजह से वह काम पर नहीं जा पाता था, तो अपनी बेटी नीलू को काम पर भेज देता था. इस से उस की मजदूरी नहीं कटती थी.

जटपुर के चौधरी दलितों पर अपना हक ऐसे ही सम?ाते थे, जैसे अंगरेज हिंदुस्तानियों पर. चौधरी जमीनों के मालिक थे. उन के पास धनदौलत की कमी न थी. जो दलित अपनी मेहनत, हुनर या फिर सरकार की रिजर्वेशन पौलिसी की मदद से नौकरी पा गए थे, वे शहरों में जा बसे थे. रहेसहे दलित आज भी चौधरियों के खेतों पर मजदूरी करने के लिए मजबूर थे.

चौधरी सुखराम 60 बीघे का अमीर काश्तकार था. किसी चीज की कोई कमी न थी. सबकुछ बढि़या चल रहा था. उस ने अपनी दोनों बेटियों का समय से ब्याह कर उन को ससुराल भेज दिया था. दोनों बेटों खगेंद्र और जोगेंद्र की भी अच्छे घरों में शादी कर दी थी. खगेंद्र की 2 बेटियां थीं, जो स्कूल जाने लायक हो गई थीं.

धनदौलत किसे नहीं रिझती है? खगेंद्र ने नीलू को पटा लिया. वह उस के चंगुल में फंस गई. धीरेधीरे उन के संबंधों की चर्चा पूरे गांव में फैल गई.

बूढ़े थपरू ने नीलू को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन इश्क का भूत जिस पर सवार हो जाए, तो फिर आसानी से नहीं उतरता. उस के जवाब को सुन कर बूढ़ा थपरू भी अवाक रह गया.

नीलू ने भयावह हकीकत उगलते हुए कहा, ‘‘बाबा, मुझे क्यों रोकते हो? गांव में हमारी जात की कितनी ही लोंडियां और औरतें हैं, जो चौधरियों के लड़कों से नैन मटक्का करती हैं और उन के पैसों पर मौज करती हैं. उन से संबंध बना कर नाक ऊंची कर के चलती हैं.’’

‘‘करमजली, धीरे बोल. कमबख्त, वे ऐसा करती हैं तो नाशपिटी तू भी ऐसा ही करेगी. बुढ़ापे में कुलच्छिनी मेरी नाक कटाएगी…’’ थपरू ने कहा.

इस पर नीलू खूब हंसी. उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘बाबा, दिखाओ तुम्हारी नाक कहां है? हमारी जात के लोग तो बिना नाक के पैदा होते हैं. नाक तो उन की कटती है जिन के नाक हो. नाक होती है चौधरियों की. उन की लड़की और औरत को हमारी जात का कोई लोंडा छू कर तो दिखाए…’’

‘‘चुप कर बेहया,’’ थपरू बोला.

‘‘मैं कोई तेरी गुलाम न हूं. कमा के लाती हूं और तब तेरा और अपना पेट भरती हूं. तेरे तो दोनों मुस्टंडे बेटे ब्याह कर के तुझ से अलग हो गए और तुझे मेरी छाती पर मरने के लिए छोड़ गए. अब मैं चाहे जो करूं, मुझे रोकने वाला कौन होता है. ले रोटी खा,’’ नीलू ने खाट पर थाली पटकते हुए कहा.

बूढ़ा थपरू नीलू की बात सुन कर सिहर गया. वह चुपचाप दाल के पानी में रोटी भिगो कर खाने लगा. नीलू गाय का दूध निकालने चली गई.

बूढ़ा थपरू सोच रहा था, ‘काश, मैं ने नीलू की शादी बेटों से पहले कर दी होती, तो आज यह दिन न देखना पड़ता.’

उधर नीलू को ले कर खगेंद्र के घर में भी कोहराम मचा हुआ था. खगेंद्र की पत्नी अनीता को यह बरदाश्त नहीं था कि उस का पति नीलू से किसी तरह का कोई संबंध रखे, लेकिन खगेंद्र के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

शादी के 12 साल बाद भी अनीता खगेंद्र को बेटे का सुख नहीं दे पाई थी. और बच्चे जनने से उस ने मना कर दिया था. वह पढ़ीलिखी सम?ादार औरत थी. उस का कहना था कि बेटाबेटी एकसमान होते हैं. छोटा परिवार, सुखी परिवार.

लेकिन खगेंद्र के अंदर की जमींदारों वाली पुरानी सोच जोर मार रही थी, जहां वंश चलाने के लिए बेटा होना जरूरी था. वह नीलू को रखैल बना कर उस से बेटे का सुख चाहता था.

उस का बाप सुखराम और उस की मां नंदो भी उस के साथ थी. वे भी चाहते थे कि खगेंद्र अपनी इच्छा पूरी करे, लेकिन उस का भाई जोगेंद्र इस के सख्त खिलाफ था.

जब बखेड़ा बढ़ गया तो इस मामले को ले कर एक दिन गांव में पंचायत हुई. खगेंद्र की पत्नी अनीता ने साफसाफ कह दिया, ‘‘पंचो, कान खोल कर सुन लो… एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती हैं. अगर इन्हें उस नीलू के साथ रहना तो खुशी से रहें, मेरे हिस्से की जमीनजायदाद मुझे दे दी जाए. मैं उसी से अपनी बेटियों और अपना पेट पाल लूंगी.’’

खगेंद्र और सुखराम को इस में कोई एतराज नहीं था. वे इस के लिए राजी हो गए. पंचायत में हुए समझौते के मुताबिक पहले जमीन 3 हिस्सों में बंटी. 25-25 बीघा जमीन खगेंद्र और जोगेंद्र के हिस्से में आई और 10 बीघा जमीन सुखराम को मिली.

खगेंद्र की जमीन के 2 हिस्से हुए. आधी जमीन यानी साढ़े 12 बीघा जमीन अनीता के हिस्से में आई. बाकायदा पंचायत के समझौते के मुताबिक सारी जमीनों के बैनामे लिखे गए, जिस से आने वाले समय में कोई झगड़ा न हो. अनीता और खगेंद्र का तलाक हो गया.

खगेंद्र ने नीलू से कोर्ट मैरिज कर ली और वह उस के साथ शहर में रहने लगा. उस के मांबाप भी उस के साथ आ गए.

गांव में रहने और शहर में रहने में जमीनआसमान का फर्क होता है. शहर में रह कर गांव में जा कर खेती करना खगेंद्र के बस की बात न थी, इसलिए उस ने और सुखराम ने अपनी जमीन बंटाई पर उठा दी.

बंटाईदार सालभर में पैसा पहुंचाता तो कुछ दिन तो मौसम बासंती रहता. खगेंद्र और नीलू खूब मौज उड़ाते. सुखराम भी चौधरी बना घूमता. अंगरेजी शराब की दुकान के चक्कर लगाता.

खगेंद्र भी खाली था. वह दोस्तों के साथ खूब पार्टी करता और फिर पैसा खत्म होते ही कर्जा लेने की शुरुआत होती.

लेकिन ऐसा कब तक चलता और कर्जा पहाड़ सा होता गया. जमीन का एक टुकड़ा बेचने के सिवा कोई रास्ता न था. जमीन बेचने का रोग एक बार लग जाए, तो फिर छूटता नहीं. पहले सुखराम की जमीन बिकी, फिर धीरेधीरे खगेंद्र के खूड़ बिकने लगे.

उधर सब से बड़ी चिंता की बात यह थी कि नीलू के बेटा छोड़ बेटी भी पैदा नहीं हो रही थी. खगेंद्र ने नीलू का बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. बेटे से वंशबेल चलाने की बात तो बहुत दूर जमीन, जायदाद, जमींदारा सब जाता रहा.

सुखराम की चौधराहट की चूल हिल गई. वह एक आरा मशीन पर चौकीदार हुआ. उसे बहुत पछतावा हुआ कि उस के गलत फैसले से सबकुछ बिखर गया. उसे खगेंद्र को रोकना चाहिए था, लेकिन पुरानी जमींदारी सोच उसे ले डूबी.

खगेंद्र कोई छोटा काम करने से हिचकता था. अभी तक वह शान से जमींदारों वाली जिंदगी जीता आ रहा था, अब पेट पालने के लिए क्या करे, सबकुछ तो वह गंवा बैठा था.

तब एक दिन नीलू ने उसे खरीखोटी सुना दी, ‘‘बड़ा शौक पाल रखा था दूसरी औरत रखने का. अब कुछ करने के नाम पर मां मरी जाती है.’’

ऐसा कब तक चलता. एक दिन खगेंद्र की लाश नहर में तैरती मिली. किसी ने इसे खुदकुशी का मामला बताया, तो किसी ने नीलू की करतूत. गरीब आदमी का मुकदमा कौन लड़ता है. जोगेंद्र ने खगेंद्र का अंतिम संस्कार कर पल्ला झाड़ लिया.

सुखराम पहले ही अपने बेटे खगेंद्र से अलग रहने लगा था. नीलू दूसरों के घरों में झाड़ूपोंछा कर गुजरबसर करने लगी. फिर एक बूढ़े सेठ ने उसे अपनी सेवा में रख लिया. उस के बेटे विदेश में रहते थे और उस की कोई परवाह नहीं करते थे.

बूढ़े सेठ ने बेटों से चिढ़ कर और नीलू की सेवा से खुश हो कर अपनी बहुत सी जायदाद उस के नाम कर दी.

एक दिन बूढ़ा चल बसा. नीलू के दिन सुखचैन से कटने लगे. लोग उसे अब ‘सेठानी’ कह कर पुकारते हैं. Story In Hindi

Hindi Family Story: अपना सा घर

Hindi Family Story: ‘कुछ सुना तुम ने?’

‘क्या हुआ है?’

‘कामिनी ने अपने किराएदार विवेक से शादी कर ली.’

‘यह तो एक दिन होना ही था.’

‘यह सब उस की मां की सोचीसमझी चाल है.’

‘अरे, किराएदार होने के नाते उस ने इतनी छूट दे रखी थी.’

‘यों कहो कि दहेज बचा लिया.’

‘हां, दहेज तो बचा लिया, सो बचा लिया. मगर एक मां को इतनी खुली छूट नहीं देनी चाहिए थी.’

‘अरे, जवान बेटी के होते उस ने किसी कुंआरे को मकान किराए पर दिया ही क्यों?’

‘फिर उस ने किराए की कीमत ब्याज समेत वसूल कर ली.’

पूरे महल्ले में यही सब चर्चा चल रही थी.

रमा देवी विधवा थीं. उन के पति ज्वालाप्रसाद सेल्स टैक्स अफसर थे. जब वे जिंदा थे, तभी से उन्होंने रहने के लिए बड़ा मकान बना लिया था. रिटायरमैंट के एक साल के बाद उन की मौत हो गई. उन के 2 बेटे प्रदीप और नवीन सरकारी नौकरी में अच्छे पदों पर थे.

बड़ा बेटा प्रदीप जबलपुर में असिस्टैंट इंजीनियर था, तो छोटा बेटा नवीन सैंट्रल बैंक औफ इंडिया गुना में मैनेजर था. दोनों की शादी कर उन की गृहस्थी बसा दी गई. वे अपने बीवीबच्चों के साथ मजे में थे. बड़ी बेटी करुणा की शादी कर के वे निश्चिंत हो गए थे.

कामिनी सब से छोटी बेटी थी. वह अभी तक कुंआरी थी, जो कालेज में पढ़ रही थी. मकान का कुछ हिस्सा रमा देवी ने किराए पर दे रखा था. एक कमरा ऊपर वाला अभी 2 महीने पहले ही खाली हुआ था, इसलिए उस के लिए कोई किराएदार चाहिए था, जिस की खोजबीन जारी थी. आखिरकार किराएदार की खोज पूरी हुई.

उस दिन भरी दोपहर में ऐसे ही कामिनी ने दरवाजा खोला, तो सामने एक नौजवान को खड़ा पाया. दोनों की नजरें मिलीं. नौजवान कामिनी को एकटक देखता जा रहा था.

तब कामिनी संकोच से शरमा गई. वह बोली, ‘‘कहिए?’’

वह नौजवान बोला, ‘‘सुना है, आप के यहां कोई कमरा खाली है और उसे किराए पर देना है?’’

‘‘आप ने सही सुना है. क्या आप किराएदार बन कर आए हैं?’’

‘‘हां,’’ उस नौजवान ने कहा.

‘‘भीतर आइए,’’ कामिनी ने जब यह कहा, तब उस ने नौजवान के चेहरे को गौर से देखा, तो पाया कि वे तो उसी के कालेज के नए असिस्टैंट प्रोफैसर विवेक शर्मा हैं.

कामिनी उन्हें सोफे पर बैठा कर अंदर चली गई. थोड़ी देर बाद रमा देवी आ कर बोलीं, ‘‘कहिए मिस्टर, कमरा देखने आए हो?’’

‘‘जी हां अम्मांजी,’’ उस नौजवान ने हाथ जोड़ कर उठते हुए कहा.

‘‘फिलहाल तो एक कमरा खाली है, उसे किराए पर देना है. मगर किराए पर देने से पहले मैं आप की जानकारी लेना चाहती हूं,’’ रमा देवी ने कहा.

‘‘ले लीजिए अम्मांजी, मैं देने को तैयार हूं.’’

‘‘नाम क्या है? करते क्या हो? कहां के रहने वाले हो?’’ जब रमा देवी ने एकसाथ कई सवाल पूछ लिए, तब वह नौजवान बोला, ‘‘अम्माजी, मेरा नाम विवेक शर्मा है. मैं कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर हूं और उज्जैन का रहने वाला हूं.

‘‘जाति से ब्राह्मण हो. मगर यह बताओ, तुम शादीशुदा हो या कुंआरे?’’ रमादेवी का अगला सवाल सुन कर विवेक शर्मा कुछ पल तक नहीं बोला.

तब रमा देवी ने फिर पूछा, ‘‘तुम ने बताया नहीं.’’

‘‘जी अम्मांजी, अभी कुंआरा हूं.’’

‘‘तब तो कमरा नहीं मिलेगा,’’ रमा देवी इनकार करते हुए बोलीं.

‘‘मेरे साथ मेरी अम्मां भी रहेंगी.’’

‘‘ठीक है, तब तो चलेगा. आइए, चल कर कमरा देख लीजिए,’’ कह कर रमा देवी विवेक को कमरा दिखाने ऊपर ले गईं.

थोड़ी देर बाद वे दोनों लौटे, तब तक कामिनी चाय ला चुकी थी.

चाय पीते हुए विवेक ने कहा, ‘‘मुझे कमरा पसंद है. किराया बता दीजिए.’’

‘‘मगर मैं अनजान पर कैसे भरोसा कर लूं. किसी की गवाही चाहिए,’’ रमा देवी की यह बात सुन कर विवेक कोई जवाब नहीं दे पाया. अभी 2 महीने पहले ही वह ट्रांसफर हो कर यहां आया है. गवाही किस से दिलवाए, यह समस्या थी.

तभी रमा देवी उसे चुप देख कर बोलीं, ‘‘जवाब नहीं दिया.’’

‘‘अभी मैं इस शहर में नयानया आया हूं…’’ विवेक ने कहा, ‘‘मगर आप मुझ पर विश्वास रखिए, मैं आप को किराया हर महीने दूंगा. आप किराया बता दीजिए.’’

‘‘किराया 1,500 रुपए लगेगा,’’ रमा देवी बोलीं, ‘‘लाइट और पानी का खर्च अलग से देना होगा. मंजूर हो तो आ कर रह सकते हो.’’

‘‘आप एक छोटे से कमरे का किराया ज्यादा बता रही हैं,’’ विवेक बोला.

‘‘किराया तो यही लगेगा. इस से एक पैसा भी कम नहीं होगा…’’ रमा देवी अपना फैसला सुनाते हुए बोलीं, ‘‘रहना है तो रहो. हां, एक महीने का किराया एडवांस देना होगा.’’

‘‘ठीक है, मुझे मंजूर है,’’ कह कर विवेक ने कामिनी की तरफ देख कर अपने हथियार डाल दिए. फिर रमा देवी के हाथों में एडवांस थमाते हुए वह बोला, ‘‘लीजिए यह एडवांस किराया. मकान में सब तरह की सुविधाएं हैं, इसलिए महंगा किराया भी चलेगा.’’

इतना कह कर विवेक हाथ जोड़ कर बाहर निकल गया. एक बार उस ने कामिनी की ओर देखा, फिर कामिनी अपनी मां से बोली, ‘‘मम्मी, ये तो वही सर हैं, जो हमारे कालेज में आए हैं.’’

‘‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’ रमा देवी जरा डांटते हुए बोलीं, ‘‘मगर है बड़ा समझदार. मैं ने उसे ब्राह्मण समझ कर किराए पर रखा है.’’

विवेक पहली तारीख को रमा देवी के मकान में किराएदार बन कर आ गया और थोड़े दिनों में ही उस ने रमा देवी का विश्वास जीत लिया. अब उस का ज्यादातर समय रमा देवी के यहां बीतने लगा. वह खुल कर बातें करने लगा. अगर कोई बाहरी आ जाए तो विवेक को किराएदार नहीं, बल्कि परिवार का एक जिम्मेदार सदस्य ही समझता था.

जब उन के बीच पारिवारिक संबंध बन गए, तब विवेक और कामिनी के बीच संकोच की दीवार भी टूट गई. दोनों के बीच खुल कर बातें होने लगीं. विवेक से पढ़ने के बहाने कामिनी बिना किसी रोकटोक के उस के कमरे में घंटों बैठी रहती थी.

कभीकभार विवेक कामिनी को घुमाने ले जाने लगा, जबकि रमा देवी ने कभी इस का विरोध नहीं किया. मगर धीरेधीरे यह बात महल्ले और रिश्तेदारों में फैलने लगी. विवेक किराएदार बन कर जरूर आया है, मगर अपने घर जमाई बनने का देख रहा है. अगर कोई अपरिचित उन्हें साथसाथ देख लेते थे, तब वे विवेक को कामिनी का पति समझते थे.

‘रमा देवी ने इन दोनों को इतनी छूट दे रखी है कि दोनों बेशर्मी से घूमते है.’

‘कामिनी तो पढ़ने के बहाने प्रोफैसर के कमरे में बैठ कर प्रेम गीत लिख रही है.’

‘देखो, रमा देवी इतनी अंधी हैं कि उसी के घर में प्रोफैसर रंगरेलियां मना रहा है. देखना एक दिन कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा. तब रमा देवी की आंखें खुलेंगी.’

ये सारी बातें रमा देवी के कानों में जरूर पड़ती थीं, मगर उन्होंने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया.

जब चर्चा ज्यादा होने लगी तब रमा देवी की खास सहेली कमला देवी आ कर बोलीं, ‘‘ऐ रमा, मैं क्या सुन रही हूं…’’

‘‘क्या सुन रही है कमला?’’ रमा देवी नाराजगी से बोलीं.

‘‘अरे वह प्रोफैसर, कामिनी के साथ ज्यादा ही दिख रहा है और तू अंधी बनी हुई है.’’

‘‘कमला, यह तू महल्ले वालों की भाषा बोल रही है.’’

‘‘क्या मतलब है तेरा?’’

‘‘मेरा मतलब यह है कि तू भी वही कह रही है, जो पूरा महल्ला कह रहा है.’’

‘‘अरे, महल्ले ने जो देखा है, वही मैं ने भी देखा है.’’

‘‘और तू महल्ले वालों की हां में हां मिला रही है.’’

‘‘महल्ले वालों की हां में हां नहीं मिला रही हूं, बल्कि इन आंखों से देखा है, इसलिए कह रही हूं…’’ कमला देवी बोलीं, ‘‘मेरा कहना मान, उस प्रोफैसर को निकाल दे. एक दिन वह कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा.’’

‘‘मगर तुम लोगों में से किसी ने भी प्रोफैसर को नहीं समझा,’’ रमा देवी बचाव करते हुए बोलीं.

‘‘अच्छा तो तू उसे पूरी तरह समझ चुकी है. बता क्या समझी तू? जवाब दे? चुप क्यों है? इस प्रोफैसर पर तू घमंड कर रही है, देखना एक दिन कामिनी को ले कर भाग जाएगा. तब तेरी यह अंधी आंखें खुलेंगी… इसलिए कहती हूं कि तू प्रोफैसर से कमरा खाली करा कर निकाल दे.’’

‘‘मगर कमला, कामिनी मेरी बेटी है और उस की मुझे भी चिंता है.’’

‘‘क्या खाक चिंता है तुझे. चिंता होती तो जवान बेटी के होते उस प्रोफैसर को कमरा नहीं देती.’’

‘‘अरे, मैं ने कमरा दे दिया तब तेरे पेट में क्या मरोड़ उठ रही है?’’

‘‘मैं तेरी सहेली हूं, इस नाते कह रही हूं…’’ एक बार फिर कमला देवी समझाते हुए बोलीं, ‘‘अगर तेरी समझ में नहीं आता है. तो तू जान तेरा काम जाने. अब मैं कभी नहीं कहूंगी. और दे अपनी बेटी को मनचाही छूट.

‘‘अभी मेरी बात तेरी समझ में नहीं आ रही है. जब पानी सिर से गुजर जाएगा, तब मेरी बात तेरे समझ में आएगी. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. अच्छा चलती हूं,’’ इतना कह कर कमला देवी नाराज हो कर वहां से चली गईं.

कामिनी और विवेक का प्यार अब तक पूरी तरह परवान चढ़ चुका था, मगर रमा देवी की तब भी आंखें नहीं खुलीं. लोगों में अब चर्चा बहुत गरम चलने लगी कि रमा देवी ने खुली छूट दे रखी है, तभी तो वे दोनों साथसाथ दिखाई देते हैं. कालेज में गुरुशिष्य का नाता घर आ कर बदल जाता है.

कामिनी विवेक के स्कूटर पर ही बैठ कर कालेज आती जाती है. महल्ले वाले अपनी निगाह से देख रहे थे और तरहतरह की बातें कर रहे थे.

यह बात रिश्तेदारों में भी पहुंच गई. वे भी मौका आने पर टिप्पणी करने से नहीं छूटते थे, सारा कुसूर रमा देवी को दे रहे थे. मगर रमा देवी की हालत यह थी कि जब भी वे अपने बेटों से कामिनी के लिए लड़का देखने की बातें करतीं, तब वे उन्हें उलटा कहते कि अम्मां तुम ही ढूंढ़ लो. हमें नौकरी के चलते फुरसत नहीं है.

इस तरह दोनों बेटे हाथ झटक लेते थे. विधवा रमा देवी ने कई जगह बात चलाई, मगर कुछ जगह दहेज ज्यादा मांगने के चलते बात टूट जाती, और कुछ को रमा देवी ने इसलिए खारिज कर दिया कि वे कोई नौकरी व कामधंधा नहीं करते थे. कामिनी को वे ऐसे घराने में ब्याहना चाहती थीं कि वह सुख से रह सके.

ऐसे में विधवा रमा देवी ने कहांकहां दौड़ नहीं लगाई. आगेपीछे उस की शादी तो करना ही है, इसी वजह से कामिनी और विवेक को उस ने ज्यादा छूट दे रखी थी.

आखिर वही हुआ, जिस की उम्मीद थी. कामिनी और विवेक ने गुपचुप तरीके से कोर्टमैरिज कर ली. शादी कर वे उज्जैन चले गए. तब यह बात सारे महल्ले के साथ रिश्तेदारों में भी फैल गई. रमा देवी जो चाहती
थीं, वह हो गया. मगर अब रिश्तेदारों व महल्ले वालों के ताने भी वे सुन रही थीं.

जब रमा देवी ने इस बात की खबर अपने दोनों बेटों को दी, उन्होंने भी यही राय दी कि हमें भी यह रिश्ता मंजूर है. कामिनी ने जिस से भी शादी की, वह कमाऊ है. तुम भी तो कमाऊ दामाद चाहती थीं. रहा रिश्तेदारों और महल्ले वालों का तो थोड़े दिनों तक कह कर वे भी चुप हो जाएंगे. Hindi Family Story

Story In Hindi: शिकार

Story In Hindi: वह जानता था कि उस का अंत क्या होगा. वह जो करने जा रहा है, उस का नतीजा क्या होगा. लेकिन वह खुद को मजबूर पा रहा था. हवस का जहरीला कीड़ा उस की रगरग में समा चुका था. दिल ने साथ देना बंद कर दिया था और दिमाग पर तो जैसे जंग लग चुका था.

उस के पास मोबाइल था, जिस में वह हमेशा पोर्न साइट देखता था. दिमाग में एक ही चीज भरी हुई थी कि औरत महज एक शरीर और मर्द की जरूरत पूरी करने का साधन है.

इस घने जंगल में एक घायल लड़की भी थी. बेहोश होने से पहले लड़की ने बताया था कि जानवर चराते हुए वह राह भटक गई. एक भालू ने अचानक उस पर हमला किया. खुद को बचाते हुए वह भागती रही और जंगल के बहुत अंदर आ गई थी. उसे घर जाना था.

वह लड़की कराह रही थी. भालू के पंजे की चोट और उस के डर ने उसे बेहोश कर दिया था, लेकिन इस आदमी को देख कर तो वह ऐसे डरी, जैसे अब बचना नामुमकिन हो. इस तरह तो कोई जानवर दूसरे जानवर को देख कर भी नहीं डरता, वह तो फिर भी इनसान है.

इनसान का इनसान से डरना कहां तक ठीक है? हां, ठीक ही है, क्योंकि इनसान के रूप में उसे वह लड़की महज एक शरीर के रूप में नजर आ रही थी.

वह शिकार का मजा लेने अपने एक दोस्त के साथ छिप कर इस जंगल में आया था. मचान बनाने के बाद बंदूक ले कर वह पहले मचान पर चढ़ा.

उस के दोस्त ने जैसे ही मचान की पहली सीढ़ी पर कदम रखा, तेज रफ्तार से बाघ झपटा मार कर उसे घसीटते हुए ले गया.

घबराहट और डर के मारे वह बंदूक चलाना भूल गया. दोस्त की चीखें उस के कानों में अब तक गूंज रही थीं. उसे होश संभालने में काफी समय लगा. काफी इंतजार किया, लेकिन बाघ फिर नहीं आया.

भागतीहांफती वह लड़की आई. जख्मी हालत में और अपने सामने एक मर्द को देख कर खुश होने की बजाय डर से बेहोश हो गई. जैसे अब बचने को कोई उम्मीद न हो. वह अभी भी मचान पर बैठा था. लड़की बेहोश पड़ी थी.

वह सोच रहा था कि इस से पहले लड़की को कोई जंगली जानवर शिकार कर ले उस से अच्छा है कि वह उसे मचान पर ले आए और फिर उस के साथ…

इस घने जंगल में कौन देखता है कि किस ने, किस का शिकार किया. न तो वह आसपास के गांव का है और न ही लड़की उसे पहचानती है. फिर उस ने तो लड़की की जान बचा कर अहसान ही किया है उस पर. इस अहसान के बदले अगर वह उस का शरीर पा लेता है, तो यह लड़की की जान से सस्ता ही है. अगर इसे सौदा भी मान लिया जाए तो…

वह बंदूक ताने मचान से धीरेधीरे नीचे उतरा. उसे जंगली जानवरों से भी बचना था. जंगल का कानून तो यही है कि ताकतवर कमजोर को खा कर अपने पेट की भूख शांत करता है.

उस ने पास आ कर गौर से लड़की को देखा. लड़की की उम्र 16-17 साल से ज्यादा नहीं लगी उसे. गोरा रंग, गांव की खूबसूरत बाला. सलवारकुरता कई जगह से फट चुका था. पीठ पर भालू के पंजे का निशान था. बहता हुआ खून जम चुका था.

वह लड़की को घसीटते हुए मचान तक लाया, फिर कंधे पर उठा कर मचान पर चढ़ गया.

लड़की अब भी बेहोश थी. उस ने लड़की के शरीर पर कई बार निगाह दौड़ाई.

अचानक वह उस के शरीर को घूरने लगा, फिर उस के अंदर लड़की का शरीर भोगने की लालसा जाग उठी. औरत भी तो यही चाहती है.

उसे अपनी पत्नी की बात याद आई, ‘मैं तुम्हें छोड़ कर जा रही हूं. मेरी इच्छाओं को पूरा करने के तुम काबिल नहीं हो. तुम्हें मेरे शरीर की कदर नहीं है.’

‘हां, इसी शरीर सुख के लिए तो पत्नी अपने प्रेमी के साथ चली गई मुझे छोड़ कर और मैं ने खुद को शराब और शिकार में लगा दिया. जंगलजंगल भटकने लगा. यह जानते हुए भी कि शिकार करना गैरकानूनी है.

पकड़े जाने पर सजा हो सकती है, लेकिन आदत एक बार लग गई तो छोड़ना मुश्किल होता है.’ वह सोच रहा था.

शरीर की भूख मिटाने के लिए वह रैडलाइट एरिया में जाता और शिकार की आदत के लिए वह जंगल जाता. उस ने जंगल के आसपास के गांवों में कई दोस्त बना लिए थे. शिकार करने में ज्यादा दिक्कत होती, तो वह फोरैस्ट वालों को घूस दे कर पटा लेता था.

जंगली जानवरों का शिकार करते हुए वह यही सोचता जैसे अपनी घर छोड़ कर गई पत्नी का शिकार कर रहा हो.

जंगल का कानून ही हर जगह चलता है. कहने को हम भले ही सामाजिक हो गए हों, लेकिन हकीकत यही है कि हर कमजोर शिकार है और ताकतवर शिकारी.

भागते हुए हिरन को गोली मारते समय उस के मन में यह खयाल नहीं आया कि वह हत्या कर रहा है या कानून तोड़ रहा है. हां, जब उस का दोस्त बाघ का शिकार हुआ, तब उसे जरूर लगा कि बाघ ने उस के दोस्त की हत्या की है और वह इस का बदला ले कर रहेगा.

उस ने यह कह कर खुद को समझाया कि बाघ के हाथों मरना उस के दोस्त की किस्मत थी. बाघ ताकतवर था, उस का दोस्त कमजोर. उस के मन में यह विचार नहीं आया कि वह जंगली जानवरों की हत्या कर के मजा लेने जंगल में आया है. न वह यहां होता, न उस का दोस्त मारा जाता.

अब उस का सारा ध्यान लड़की के शरीर पर था, ‘अगर मैं इस लड़की के साथ कुछ करता हूं, तो क्या गलत होगा? यह शिकार है और मैं शिकारी. यह कमजोर है और मैं ताकतवर और जंगल के कानून के हिसाब से कानून मेरे साथ है. यह कोई शहर नहीं.’

उस के मन में हवस के कीड़े कुलबुलाने लगे. उस ने लड़की के कपड़े खींचने शुरू किए कि तभी लड़की को होश आ गया.

लड़की उसे देख कर बुरी तरह डर गई और बोली, ‘‘मुझे छोड़ दीजिए.’’

उस ने हैरत और गुस्से से कहा, ‘‘तुम नीचे घायल पड़ी थी. मैं उठा कर मचान पर न लाता तो तुम बाघ का शिकार बन चुकी होती. बेहोश होने से पहले तुम ने बताया था और तुम्हारी पीठ का जख्म देख कर लग भी रहा है कि भालू ने तुम पर हमला किया था. जंगली जानवरों से डरने के बजाय तुम मुझ से डर रही हो. मैं ने तो तुम्हें बचाया है.’’

‘‘क्योंकि आप में और उन जानवरों में ज्यादा फर्क नहीं है. वे मार कर शरीर खा जाते और आप इस शरीर को खराब कर के मुझे जिंदगीभर के लिए जख्मी कर देते.’’

‘‘तुम्हें अपनी जान प्यारी है या इज्जत?’’

‘‘मैं लड़की हूं. मुझे अपनी इज्जत प्यारी है और जान भी प्यारी है, लेकिन इज्जत के बिना जिंदगी मौत के समान है,’’ वह लड़की बोली.

‘‘एक अकेली लड़की को देख कर ऐसा खयाल आना गलत नहीं है.’’

‘‘कैसा खयाल? रेप का?’’

‘‘अपनी हवस मिटाने का.’’

‘‘और आप की पलभर की हवस के लिए मैं जिंदगीभर नरक भोगती रहूं?’’ वह लड़की बोली.

‘‘मैं ऐसा भी सोच सकता था कि मैं तुम्हारी जान बचाऊं. तुम्हारे जख्मों को मरहम दूं. तुम्हें महफूज घर तक छोड़ दूं. फिर शायद तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार का बीज फूट पड़ता. लेकिन शरीर की भूख इतना इंतजार नहीं कर सकती.’’

‘‘क्या तुम लड़की के दिल में प्यार और इज्जत का भाव पाना छोटी बात समझते हो? एक औरत अगर किसी मर्द की इज्जत करती है या प्यार, यह अपनेआप में शानदार है.’’

‘‘लेकिन इतना सब्र नहीं है मुझ में. जो चाहिए वह मैं छीन कर अभी इसी वक्त ले सकता हूं. फिर इतना सब नाटक क्यों? क्यों मैं हाथ आए शिकार को छोड़ दूं.’’

‘‘अकेली लड़की शिकार है तुम्हारी नजर में?’’

‘‘अगर मैं हां कहूं तो गलत नहीं होगा. मैं बेकार में शराफत का नाटक क्यों करूं? फिर तुम साथ दो तो तुम्हें भी मजा आएगा. फिर यह रेप नहीं होगा, वह बोला.’’

‘‘प्यार भी नहीं होगा.’’

‘‘मैं रुक नहीं सकता. मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है. मैं खुद पर और काबू नहीं रख सकता,’’ कहते हुए उस ने अपनी बंदूक एक तरफ रख दी और लड़की को अपनी तरफ जबरदस्ती खींच लिया.

लड़की पहले से चोटिल थी. उस के खींचने से उसे और दर्द हुआ.

उस ने उस लड़की को जबरन लिटा दिया और उस के ऊपर आ कर उस के सीने से दुपट्टा खींच कर फेंक दिया.

लड़की ने कहा, ‘‘अगर कमजोर शिकार है ताकतवर शिकारी, तो ठीक है. कभी मैं ताकतवर हुई तो तुम्हारा शिकार कर सकती हूं.’’

वह वहशी हो चुका था. उस ने लड़की के सीने में दांत गड़ा कर कहा, ‘‘इस समय में ताकतवर हूं और यहां न कोईर् समाज है, न कानून. न गवाह, न सुबूत.’’

‘‘सुबूत मैं खुद हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी हत्या कर दूंगा. तब कोई सुबूत भी नहीं रहेगा कहते हुए,’’ उस ने उस लड़की का ऊपरी कपड़ा फाड़ डाला.

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि जिस वजह से तुम खुद को मर्द कहते हो. उस मर्दानगी की वजह से तुम्हें रेप और हत्या करनी पड़ेगी. फिर भी तुम्हें अपने मर्द होने का घमंड है?’’

‘‘यह तो कुदरती है.’’

‘‘लेकिन रेप और हत्या कुदरती नहीं है.’’

‘‘मैं कोई साधुसंत नहीं. तुम्हें देख कर मेरे अंदर हवस का भाव जागा और से पूरा करना जरूरी है मेरे लिए.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि मुझे अपना बचाव खुद करना पड़ेगा. तुम मर्द हो कर हिफाजत करने की जगह जुल्म कर रहे हो.’’

‘‘हां, कर रहा हूं. तुम अपने बचाव में सिर्फ रो सकती हो. कोई ऐसी उम्मीद भी मत रखना कि मेरा मन बदल जाएगा या आसमान से कोई देवदूत तुम्हें बचाने आ जाए.’’

‘‘तुम इनसान होते तो मेरे जख्मों पर मरहम लगाने की सोचते. मुझ डरी हुई लड़की को हिम्मत देते. लेकिन तुम जंगली जानवर ही निकले. तुम से उम्मीद करना बेकार है,’’ लड़की ने पूरी ताकत लगा कर उसे धक्का दिया.

मचान छोटा था. उस का बैलेंस बिगड़ गया. वह मचान से नीचे गिर पड़ा. लड़की ने फौरन पास पड़ी बंदूक उठा ली और उस की तरफ तान दी.

बाघ की दहाड़ सुनाई दी. बाघ उस की तरफ बढ़ रहा था. उस ने चीख कर कहा, ‘‘मुझे बचा लो. मैं माफी मांगता हूं. बाघ को गोली मारो.’’

‘‘मेरे लिए एक आदमखोर है दूसरा औरतखोर. मुझे दोनों से ही बचना है. अब तुम शिकार हो, मैं शिकारी. मर्दऔरत के बीच अगर ताकतवर और कमजोर वाली बात है, तो औरत भी ताकतवर हो सकती है. फिर तुम कैसे बचोगे?’’

उस की घिग्घी बंध चुकी थी. बाघ धीरेधीरे उस की तरफ बढ़ रहा था और लड़की उस की तरफ बंदूक ताने हुए थी, जो कभी भी चल सकती थी.

उस ने डर से कांपते हुए कहा, ‘‘बाघ के हाथों मरने से अच्छा है कि तुम मुझे गोली मार दो. प्लीज, मार दो मुझे.’’

‘‘शिकारी से रहम की उम्मीद नहीं करना चाहिए. तुम्हीं से सीखा है अभीअभी मैं ने.’’

एक दहाड़ के साथ बाघ ने उस पर छलांग लगा दी. वह चीखा चिल्लाया. थोड़ी देर में उस का दम निकल गया.

लड़की ने ट्रिगर दबाया. गोली बाघ के सिर में लगी. वह छटपटाया और ढेर हो गया.

लड़की धीरेधीरे मचान से उतरी और पूर्व दिशा की ओर बढ़ने लगी. Story In Hindi

Hindi Story: स्कूटी वाली भौजी

Hindi Story: दुर्गेश बहुत तेजी से आगे बढ़ना चाहता था. उसे लगता था कि गांव में सब से आगे उस का और उस के घरपरिवार का नाम रहे. वह पढ़ालिखा नहीं था. उस की संगत भी खराब लोगों से थी. उस का ज्यादातर समय गांव के बाहर बाग में बने मंदिर में गुजरता था. वहां रोजाना 20-25 लोग आते थे.

पहले वे सब हुक्का पीने के आदी थे, पर अब धीरेधीरे हुक्के की जगह गांजा ने ले ली. अब यह नशेडि़यों का अड्डा सा बन गया था.

दुर्गेश को भी गांजा पीने की आदत लग गई थी. गांजा बेचने वाला 10 किलोमीटर दूर के एक गांव भुलाबल से आता था.

नशे की लत में दुर्गेश एक बार मारपीट में शामिल हो गया था. पुलिस ने उसे पकड़ा और उसे जेल भेज दिया. 15 दिन जेल में रहने के बाद वह जमानत पर छूट कर आया.

इस के बाद कई महीने तक तो दुर्गेश गांव आने से बचता रहा था. पर फिर धीरेधीरे वह गांव आने लगा और अपने पुराने साथियों के साथ पहले की तरह उठनेबैठने लगा.

जेल में दुर्गेश को कई ऐसे लोग मिले थे, जो नशा बेचने के जुर्म में बंद थे. उन्हीं में से एक रहीम था. उस ने दुर्गेश की जेल में बड़ी मदद की थी. उस ने औफर दिया था कि अगर वे दोनों साथ मिल जाएं, तो अच्छा पैसा कमा सकते हैं.

जेल जाने के बाद अब दुर्गेश के मन का डर खत्म हो गया था. उसे समझ आ गया था कि पैसा सब से बड़ी चीज है. वह पुलिस और अदालत हर जगह काम आती है.

20 दिन के बाद रहीम भी जेल से बाहर आ गया था. वह दुर्गेश से मिलने उस के घर आ गया. वहां दुर्गेश ने उस की खातिरदारी की और उसे अपने बीवीबच्चों से भी मिलवाया.

दुर्गेश और रहीम एक ही उम्र के थे. रहीम की नजर दुर्गेश की पत्नी दीपा पर पड़ी. 5 और 7 साल के 2 बच्चों की मां होने के बाद भी दीपा बहुत खूबसूरत और दिलकश लग रही थी.

रहीम दीपा को देख कर मचल गया और बोला, ‘‘भौजी, अगर तुम और दुर्गेश भाई मेरी योजना के हिसाब से काम कर लो, तो कम समय में ही हम सब अमीर बन सकते हैं. आखिर कब तक गरीबी में अपनी खूबसूरती को बरबाद करती रहोगी…’’

‘‘हमें करना क्या होगा? हम तो इन से कहते रहते हैं. ये हमारी सुनते ही नहीं. केवल सपनों की दुनिया में उड़ते रहते हैं,’’ दुर्गेश के बोलने से पहले ही दीपा बोल पड़ी.

‘‘भौजी, हम लोग दूसरों के नशे का इंतजाम कर लें बस. इस से पैसा भी मिलेगा, लोग भी साथ होंगे. मैं आप को एक स्कूटी दिला देता हूं और उसे चलाना भी सिखा दूंगा.

‘‘आप पर कोई शक नहीं करेगा. आप केवल सामान लाने का काम करेंगी. बेचने के लिए नैटवर्क हम और दुर्गेश बना लेंगे,’’ रहीम बोला.

‘‘लेकिन पुलिस का क्या करेंगे?’’ दीपा के बोलने से पहले दुर्गेश बोल पड़ा.

‘‘पुलिस को पैसा चाहिए. हम और भौजी मिल कर संभाल लेंगे,’’ रहीम के इतना कहते की दीपा ने कहा, ‘‘ठीक है. मैं तैयार हूं.’’

दरअसल, दीपा को स्कूटी चलाने की बहुत पहले से ही ललक थी. वह भी पंख लगा कर उड़ना चाहती थी. 10 साल की शादी के बाद वह अपने सपने भूल चुकी थी. उस के पास खाना बनाने और बच्चे पैदा करने का ही काम रह गया था. आज रहीम ने जब उसे उस का शौक याद दिलाया, तो वह मना नहीं कर पाई.

अब रहीम अकसर दुर्गेश के घर आनेजाने लगा. उस ने एक दिन दुर्गेश और दीपा को अपना बिजनैस आइडिया सम?ाते हुए कहा, ‘‘स्मैक की अलगअलग मात्रा में बनीबनाई पुडि़या हमें आसानी से मिल जाएगी. एक किलोग्राम अफीम से 50 ग्राम से 80 ग्राम स्मैक तैयार होती है. अफीम को चूने और एक रसायन के साथ मिला कर उबालते हैं. इस से अफीम फट जाती है.

‘‘जब यह पूरी तरह से गाढ़ी हो जाती है, इसे तब तक उबाला जाता है. इस के बाद में इस गाढ़े घोल को सुखा दिया जाता है. सूखने पर यह पाउडर स्मैक कहलाता है.

‘‘उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के अलावा राजस्थान के प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ जिलों के साथसाथ मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अफीम उगाने वाले इलाकों में इसे बनाया जाता है. हमारे लोग वहां हैं. वे गोसाईंगंज तक माल भेज देंगे. भौजी केवल 15 से 20 किलोमीटर दूर तक पुडि़या स्कूटी में रख कर लाएंगी, तो किसी को शक नहीं होगा.

‘‘मैं तो कहता हूं कि अगर बच्चों का स्कूल में दाखिला भी उसी तरफ हो जाए, तो भौजी का काम और आसान हो जाएगा. मेरा घर भी उधर ही है. भौजी को कभी दिन में रुकना हो तो वहां रुक भी सकती हैं. बच्चे साथ होंगे तो पुलिस वैसे भी शक नहीं करेगी.’’

रहीम ने पूरी योजना समझा दी. उस के पास अपनी एक स्कूटी थी, जो बहुत कम समय ही चली थी. उस ने वह स्कूटी दुर्गेश को दे दी.

दीपा ने बड़ी जल्दी ही स्कूटी चलाना सीख लिया. वह इस बात से खुश थी कि गांव में वह पहली औरत थी, जो स्कूटी चला रही थी.

जब सब ठीक हो गया तो तकरीबन 2 महीने के बाद दीपा को स्मैक की पुडि़या वाला पैकेट लाने का काम दिया गया. दीपा बड़े आराम से उसे ले कर चली आई. उस के मन का डर निकल गया. इस बार सारी पुडि़या रहीम ने खुद ही अपने पास रखीं. केवल टैस्ट के रूप में 15 पुडि़या दुर्गेश को दी गईं.

दुर्गेश ने गांव वालों के बीच पुडि़या बांटना शुरू कर दिया. धीरेधीरे एक के बाद एक ग्राहक बढ़ने लगे. अब मंदिर में गांजे की जगह स्मैक का इस्तेमाल बढ़ गया.

100 ग्राम स्मैक तकरीबन एक लाख रुपए में मिलती है. इस से छोटीछोटी पुडि़या तैयार की जाती है. 13 सौ रुपए में 2 ग्राम स्मैक मिलती है. एक ग्राम में 7 से 9 पुडि़या बनती हैं. एक पुडि़या 200 रुपए में मिलती है. इस तरह से 14 सौ से 18 सौ रुपए की कमाई हो जाती है.

दीपा को महीने के 20 हजार से 25 हजार रुपए मिलने लगे. पैसा आने लगा तो दीपा को आजादी भी मिलने लगी.

रहीम इसी दिन की ताक में था. उस ने दीपा को अकेले पा कर अपने दिल की बात कह दी. दीपा ने भी समझ लिया था कि उसे अगर पैसा और आजादी चाहिए, तो रहीम की बात मान ले.

अब दीपा को भी रहीम अच्छा लगने लगा था. अखिरकार एक दिन दीपा का सांचे में ढला बदन रहीम की बांहों में था. इस के बाद तो यह सिलसिला चल निकला.

जैसेजैसे स्मैक की पुडि़या ज्यादा बिकने लगीं और कारोबार में ज्यादा पैसा आने लगा, तो दीपा ने दुर्गेश से कहा कि अब आप चुनाव लड़ने की तैयारी करो.

इस के बाद दुर्गेश ने दक्षिणापंथी पार्टी में काम करना शुरू किया. अब उस के कंधे पर अंगोछा आ गया था. एक तरफ नशे का कारोबार था, तो दूसरी तरफ राजनीति तेजी पकड़ रही थी.

एक दिन दीपा दुर्गेश से बोली, ‘‘अब हम लोगों की हालत बेहतर हो गई है. गांव से निकल कर शहर में आ गए हैं. दूसरे काम भी बढ़ गए हैं. नशे का कारोबार रहीम के हवाले कर दो. हम केवल उस की देखभाल करेंगे. अगर पकड़ा गया तो वह जाने, हमारे ऊपर कोई लांछन लगेगा, तो इमेज खराब हो जाएगी. इस के बाद पार्टी भी टिकट नहीं देगी.’’

दुर्गेश की समझ में बात आ गई. उस ने रहीम के साथ बातचीत की. सब सहमत हो गए थे. चुनाव आ गया था. दीपा ने पार्टी से टिकट मांगा. वह टिकट की कीमत देने को तैयार हो गई थी. महिला तो थी ही, खूबसूरत और हुनर वाली भी थी. बोलने में बेहतर थी. उस के ऊपर कोई दाग नहीं था. रिजर्वेशन में दीपा जिस सीट से टिकट मांग रही थी, वह महिला सीट हो गई.

5 साल में ही दीपा की जिंदगी बदल चुकी थी. नशे के कारोबार से आए पैसे ने उस की दुनिया बदल दी थी. वह दुर्गेश और रहीम दोनों को साधने में कामयाब हो गई थी.

दीपा को अपने शरीर की कीमत समझ आ गई थी. जहां पहले वह घर के अंदर केवल खाना बनाने और बच्चे पैदा की मशीन बन कर रह गई थी, अब नेता बन चुकी थी. मर्द उस के पीछेपीछे चलने लगे थे. एक बात वह समझ रही थी कि बुरा काम देर तक नहीं करना चाहिए, तभी छवि बनी रह सकती है. धीरेधीरे उस ने रहीम से पीछा छुड़ाना शुरू किया.

अब दुर्गेश ने मिट्टी की खदान का ठेका लेना शुरू कर दिया. गांव और तमाम लोगों को नशे की लत लगा कर दीपा अब ठेकेदार और नेता बन चुकी थी. उस की नजर जिले की कुरसी से हट कर मंत्री की कुरसी पर थी. 10 साल में जितनी कामयाबी उसे मिल चुकी थी, उस से वह आगे निकल चुकी थी. इलाके में उस का दबदबा था.

जिस पुलिस से दीपा को डर लगता था, वह अब उस की सिक्योरिटी करने लगी थी. उस के घर नेताओं का आनाजाना लगा रहता था. स्कूटी कहीं पीछे छूट गई थी. अब उस के पास स्कार्पियो आ गई थी. दूसरी तरफ नशा करने वाले बीमारियों में फंस कर मर रहे थे.

नशा करने वाला डूब जाता है और नशे का कारोबार करने वाला अमीर होता जाता है. यह बात जितनी जल्दी नशेड़ी की समझ में आ जाए, सही रहता है, नहीं तो नशे के भंवर में सबकुछ डूब जाता है. Hindi Story

Story In Hindi: डरावने नीले ड्रम के बाद हौरर हनीमून

Story In Hindi: एक ओर ‘औपरेशन सिंदूर’ की बड़ी कामयाबी का जश्न मनाया जा रहा था, सिंदूर की महिमा का बखान किया जा रहा था, घरघर सिंदूर बांटने की तैयारी की जा रही थी, तो दूसरी ओर पूर्वांचल से सिंदूर को मिटाने की धमाकेदार खबर आ गई, जिस ने हनीमून मनाने के लिए उतावले ताजाताजा ब्याहे गए लड़कों के दिल की धड़कन और ब्लडप्रैशर बढ़ा दिया.

अभी पति समाज नीले ड्रम के डर और डिप्रैशन से उबरा भी नहीं था कि धर्मपत्नी द्वारा हौरर हनीमून कांड को अंजाम दे दिया गया.

पत्नियों की करतूतों और शादी की ऐसी घटनाओं के लिए साल 2025 को इतिहास में सुनहरे अक्षरों के रूप में याद किया जाएगा. यह भी हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ साल 2025 को ‘पतिपत्नी और वो’ साल की संज्ञा भी दे दे.

होने वाले दामाद के साथ सास के फरार होने से ले कर समधीसमधन के ‘प्रेम पुष्पक’ पर फुर्र होने से उन के परिवार वाले उतना परेशान नहीं हुए होंगे, जितना दुखी न्यूज चैनल वालों को देखा गया.

सासदामाद और समधीसमधन के हिम्मती कारनामों पर चटकारे ले कर न्यूज बनाने और फैलाने वाले रिपोर्टरों की चांदी हो गई. वैसे भी लव ट्रैंगल मर्डर मिस्ट्री की रैसिपी पर हर कोई बिरियानी बनाने और परोसने के लिए तैयार हो जाता है.

शायद पाकिस्तान की आम जनता भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल के हमलों से उतनी खौफजदा नहीं हुई होगी, जितना नीले ड्रम ने भारतीय शदीशुदा मर्दों को डराया.

मुसकान के ड्रम कांड से रील बनाने वालों को नया आइडिया मिला और रील की दुनिया में नीले ड्रम ने डोनाल्ड ट्रंप और एलन मस्क से ज्यादा पब्लिसिटी हासिल कर ली. ड्रम स्क्रिप्ट पर वायरल होने वाले रील इंफ्लुएंसर मुसकान का अहसान जिंदगीभर नहीं चुका पाएंगे.

उत्तर प्रदेश में 52 साल की दादी और 25 साल के पोते की शादी भी खूब चर्चा में रही. बेमेल रिश्तों के मेल से बनने वाले गठबंधनों ने पिछले साल की अनंत और राधिका की ग्रांड शादी को भी पीछे छोड़ डाला.

‘पतिपत्नी और वो’ के कर्मकांडों से भरपूर साल 2025 पत्नी नामक प्राणी के नाम रहा, जिन्होंने अपनी शानदार हिम्मत और ताकत से पूरी दुनिया को हैरान कर डाला. पति को मौत दे कर प्रेमी के साथ सती बन कर साथ रहने की इच्छा रखने वाली औरतों के हिम्मती काम ने दिनेश पंडित की महिला पाठक हसीन दिलरुबा फेम रानी (तापसी पन्नू) की काली करतूतों को भी मात दे दी. इस साल ‘वो’ के चक्कर में एक से बढ़ कर एक घटनाएं हुईं.

पति से छुटकारा पाने के लिए कमर कस चुकी औरतों द्वारा पति को मौत के मुंह में भेजने वाला कंपीटिशन देख कर महसूस हो रहा है कि मौत बांटने वाली गैरपेशेवर हसीनाएं पेशेवर अपराधियों की चलतीफिरती दुकान को बंद कराने की कसम खा चुकी हैं.

धर्मपत्नियों के दिल में बसने वाले पति परमेश्वर फ्रिज, ड्रम, नदी, खाई से बरामद होने लगे. ऐसा महसूस होता है कि पौराणिक कथाओं में यमराज से पति के प्राण वापस छीन कर लाने वाली सती सावित्री का हिसाबकिताब कलियुगी बीवी अपने पति की जान यमराज को ईएमआई के तौर पर वापस दे कर चुका रही हैं.

यह और बात है कि पतिदेव को देवलोक पहुंचा कर ‘वो’ के साथ रहने की तमन्ना रखने वाली मोहतरमा को कोहबर की बजाय कारागार वाला पैकेज नसीब हो रहा है.

बहरहाल, पत्नी का ऐसा अवतार देख कर शादी की चाहत रखने वाले नौजवान इन दिनों वाइफ की बजाय लाइफ को ले कर चिंतित दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि पत्नी, पैट्रोल और पाकिस्तान का मूड कब बिगड़ जाए, यह कहना काफी मुश्किल है. Story In Hindi

News Story In Hindi: वोट काटने का खेल

News Story In Hindi: ‘‘आप सभी का अशोका राज्य में स्वागत है. जनमत नियंत्रण समिति एक सर्वे करा रही है, जिस में हमें लोगों के घरघर जा कर उन से जानकारी हासिल करनी है. हमें यह खबर मिली है कि पिछले सर्वे का आंकड़ा फर्जी था. हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरुजी इस बात से नाराज हैं कि बहुत से बाहरी लोग नाम बदल कर यहां रह रहे हैं, इसलिए आप सभी को उन्होंने अपने खर्चे पर यहां बुलाया है,’’ उस भगवाधारी ने विजय और अनामिका के साथ आए और भी दूसरे नौजवानों को इस सर्वे का मकसद बताते हुए कहा.

‘‘पर आप ने ऐसे नौजवानों को ही क्यों इस काम के लिए चुना, जिन की अभी शादी नहीं हुई है?’’ एक लड़के ने सवाल किया.

‘‘हमारे देश में नौजवानों की कोई कमी नहीं है. बहुत से नौजवानों को तो इतना पढ़नेलिखने के बाद भी कोई रोजगार नहीं मिल पाता है. हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरुजी चाहते हैं कि जरूरतमंद को काम मिले और उन का राष्ट्रवाद का मकसद भी हासिल हो जाए,’’ उस भगवाधारी ने कहा.

उस भगवाधारी के साथ खड़ी एक जवान लड़की, जिस ने खुद भगवा धारण किया हुआ था, ने बताया, ‘‘आप सब के रहने के लिए यह सरकारी स्कूल खाली करा दिया गया है. वैसे भी यहां कोई पढ़ने नहीं आता है और यह स्कूल बंद सा ही समझो.’’

वाकई उस स्कूल की हालत बड़ी जर्जर थी. कुल 4 कमरे थे. हर कमरे में लाइन से चारपाई बिछी थी. एक लाइन लड़कों के लिए तो दूसरी लाइन पर लड़कियों के सोने का इंतजाम था. टौयलेट थोड़ा दूर था और एक अस्थायी बाथरूम का भी इंतजाम किया गया था.

अनामिका ने विजय से फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘यार, यह कहां फंसा दिया तुम ने मुझे.’’

विजय बोला, ‘‘मेरे एक दोस्त ने रिक्वैस्ट की थी कि यह सर्वे करा दो, तो मैं ने हां बोल दिया. यार, यहां भी एक तरह का एडवैंचर रहेगा और हम दोनों को करीब आने का मौका भी मिलेगा.’’

‘‘आप सब लोग अब आराम कीजिए. आप के भोजन का इंतजाम कर दिया गया है. हम कल से सर्वे करेंगे. लोगों से जरूरी जानकारी के फार्म आप को कल दे दिए जाएंगे. आप को लोगों से उन के बारे में पता कर के हर किसी से 500 रुपए लेने हैं.

‘‘यह कोई फीस नहीं नहीं है, बल्कि इन पैसों से उन्हें धार्मिक यात्रा पर भेजा जाएगा, ताकि उन का जीवन धन्य हो जाए,’’ उस भगवाधारी ने कहा.

‘‘पर यहां के लोग तो गरीब लगते हैं. हम उन से 500 रुपए कैसे मांगेंगे? अगर उन्होंने मना कर दिया तो?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘यही तो मेन मुद्दा है. असली राष्ट्रवादी धार्मिक यात्रा के लिए पैसे देने से मना नहीं करेगा. जो मना करेगा, उसे हम बाहरी मान लेंगे, जो यहां नाम बदल कर रह रहे हैं.

‘‘हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरुजी का मकसद यही है कि अशोका राज्य में सिर्फ राष्ट्रवादी लोग ही रहेंगे, ताकि यह राज्य खुशहाल बन सके,’’ उस भगवाधारी ने बताया.

‘‘आप ने एक बात तो बताई ही नहीं,’’ भगवाधारी के साथ आई उस जवान लड़की ने कहा.

‘‘कौन सी बात?’’ उस भगवाधारी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘यही कि जो भी आदमी अपनी सही जानकारी देगा, उसे मंदिरों में जाने का हक मिलेगा. इस से राष्ट्रवाद को मजबूती मिलेगी और समाज का कल्याण भी होगा,’’ उस जवान लड़की ने बताया.

‘‘तुम ने सही याद दिलाया. तुम जैसी जागरूक साथी की वजह से ही हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरुजी की मुहिम कामयाब हो कर रहेगी,’’ उस भगवाधारी ने मुसकराते हुए कहा.

रात के 9 बज चुके थे. अब स्कूल में सिर्फ वही लोग थे, जो यह सर्वे करने यहां अशोका राज्य में आए थे.

हालांकि, लड़के और लड़कियों के बिस्तर अलगअलग थे, पर रात के अंधेरे में कुछ जोड़े एक ही बिस्तर पर गुटरगूं कर रहे थे. वहां कोई रोकटोक नहीं थी.

विजय और अनामिका भी एक ही चारपाई पर थे. विजय ने अनामिका के बालों में हाथ फिराते हुए कहा, ‘‘डार्लिंग, कुछ दिनों की बात है. सर्वे के बहाने हम एकसाथ रहेंगे और कुछ पैसे भी बना लेंगे.’’

‘‘पर विजय, मुझे दाल में कुछ काला लग रहा है. इन लोगों के इरादे सही नहीं लग रहे हैं. यह तो गरीबों के साथ जबरदस्ती है. 500 रुपए में मोक्ष का सपना दिखाया जा रहा है. जो भी पैसे देने में आनाकानी करेगा, उसे इस राज्य से भगा दिया जाएगा,’’ अनामिका ने विजय के कंधे पर सिर रखते हुए कहा.

विजय ने अनामिका को अपनी मजबूत बांहों में भींचते हुए कहा, ‘‘कल की कल देखेंगे. अभी तो इस रात का मजा लेते हैं.’’

अनामिका विजय को बेतहाशा चूमने लगी और उन दोनों ने चादर ओढ़ ली.

अगले दिन वे दोनों एक घर के सामने खड़े थे. वहां 2 बूढ़े पतिपत्नी रहते थे. बूढ़ा लाठी टेकता हुआ उन दोनों के पास आया और 10 रुपए निकाल कर बोला, ‘‘बेटा, तुम लोगों को फार्म में जो भरना है, खुद ही भर लो. हमें बताया गया था कि 5 रुपए के हिसाब से हम दोनों के 10 रुपए बनते हैं.

‘‘हमें इस उम्र में धार्मिक यात्रा पर जाना है. पूरी जिंदगी हम दोनों ने यहां के मंदिर के दर्शन नहीं किए हैं. हमें वह चौखट भी पार करनी है.

‘‘मैं ने किसी तरह 1,000 रुपए का इंतजाम किया है. फार्म में किसी तरह की गलती मत करना वरना ऊपर जा कर हम अपने भगवान को क्या मुंह दिखाएंगे.’’

इतने में वह भगवाधारी वहां आया और विजय से बोला, ‘‘हम ने इन दोनों की पहले ही जांचपड़ताल कर ली है. ये दोनों हमारे राज्य में रहने के लिए फिट हैं. सर्वश्रेष्ठ गुरुजी का आदेश है कि इन्हें मोक्ष मिलना ही चाहिए.’’

‘‘पर जब पहले से ही सबकुछ हो चुका है, तो फिर यह सर्वे किस काम का है?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘तुम इस पचड़े में मत पड़ो और मैं जो फार्म तुम लोगों को दे रहा हूं, उन पर दस्तखत कर दो. 20 फार्म हैं. ये सभी फर्जी लोग हैं. इन्हें हमारे राज्य से बाहर भेज दिया जाएगा. 5 रुपए के हिसाब से तुम्हारे 100 रुपए हुए. इन्हें रख लो,’’ वह भगवाधरी बोला.

अनामिका ने अपना सिर पकड़ लिया. राष्ट्रवाद के नाम पर यह कैसा खेल चल रहा था, जो उस की समझ से परे था.

‘‘यार विजय, जब इस छोटे से सर्वे में इतनी बड़ी धांधली हो रही है, तो बिहार में विपक्ष जो सरकार पर चुनाव आयोग के जरीए लाखों वोट काटने का इलजाम लगा रहा है, वह भी तो कहीं न कहीं सच ही होगा न,’’ अनामिका बोली.

‘‘बात में तो दम है. जब से यह मामला उछला है, बिहार विधानसभा चुनाव से ज्यादा यह मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है. पर आम जनता को अगर यह मामला सम?ाना हो तो वह कहां जाए? हमारे देश में वंचित समाज के लोग कितने कम जागरूक हैं, यह कड़वा सच किसी से छिपा नहीं है,’’ विजय ने मानो सरकार पर ताना मारा.

‘‘जहां तक अखबारों, न्यूज चैनलों खासकर बीबीसी की रिपोर्टिंग की बात करें तो मोटामोटा मामला कुछ यों है कि ‘सर’ यानी स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन का प्रोसैस 1 जुलाई, 2025 से शुरू हुआ है. इस के तहत 1 अगस्त, 2025 को लिस्ट का ड्राफ्ट पब्लिश किया जाना था और आखिरी लिस्ट 30 सितंबर, 2025 को पब्लिश होगी. इस से पहले इतने बड़े लैवल पर यह प्रोसैस आखिरी बार साल 2003 में हुआ था.

‘‘चिंता की बात यह है कि जो 11 दस्तावेज लोगों से मांगे जा रहे हैं, वे बड़े पैमाने पर लोगों के पास मुहैया नहीं हैं. एक सर्वे में साफ निकल कर आया है कि 63 फीसदी लोगों के पास वे कागजात नहीं हैं, जो उन से मांगे जा रहे हैं.

‘‘यहां सब से बड़ा सवाल यह है कि जो हाशिए पर खड़े समुदाय हैं, जैसे दलित, वंचित और औरतें… क्या वे सचमुच इस तरह की जद्दोजेहद में अपनी बात उठा पाएंगे और अपने फार्म जमा कर पाएंगे?’’ अनामिका बोली.

‘‘पौइंट तो तुम्हारा एकदम सही है,’’ विजय बोला.

‘‘इस के उलट 24 जून, 2025 को चुनाव आयोग ने अपने एक प्रैस नोट में कहा था कि बिहार में वोटरों की
लिस्ट का आखिरी बार स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन साल 2003 में किया गया था. उस के बाद कई लोगों की मौत होने, लोगों के दूसरी जगह चले जाने और गैरकानूनी तौर पर लोगों के बसने की वजह से फिर से एक स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन की जरूरत है.

‘‘यह भी कहा था कि जिन लोगों का नाम साल 2003 की वोटर लिस्ट में आता है, उन्हें बस चुनाव आयोग की तरफ से जारी एक फार्म भरना होगा. जिन का नाम नहीं आता, उन्हें जन्म के साल के मुताबिक दस्तावेज देने होंगे. जिन का जन्म 1 जुलाई, 1987 के पहले हुआ है, उन्हें अपने जन्मस्थल या जन्मतिथि के दस्तावेज देने होंगे.

‘‘जिन का जन्म 1 जुलाई, 1987 से 2 दिसंबर, 2004 के बीच हुआ है, उन्हें अपने साथ अपने मातापिता में से किसी एक के दस्तावेज देने होंगे. जिन का जन्म 2 दिसंबर, 2004 के बाद हुआ है, उन्हें अपने दस्तावेज के साथ अपने मातापिता के भी दस्तावेज देने होंगे.

‘‘जिन के मातापिता का नाम साल 2003 की वोटर लिस्ट में शामिल है, उन्हें अपने मातापिता के दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं होगी. हालांकि, सभी वोटरों को चुनाव आयोग की तरफ से जारी किया गया फार्म भरना होगा,’’ अनामिका ने बताया.

‘‘तो इस में दिक्कत क्या है? लोग फार्म भरें और इस मुसीबत से छुटकारा पा लें,’’ विजय बोला.

‘‘दिक्कत यह है कि सरकार के अपने ही आंकड़े बताते हैं कि चुनाव आयोग जो दस्तावेज मांग रहा है, वे ज्यादातर लोगों के पास मुहैया नहीं हैं. साल 2022 में बिहार में हुए जातिगत सर्वे के मुताबिक सिर्फ 14 फीसदी लोग 10वीं पास हैं. जिन के पास पक्का मकान है, उन की तादाद 60 फीसदी से भी कम है. चुनाव आयोग के अपने आंकड़े बताते हैं कि 21 फीसदी वोटर बिहार से बाहर रहते हैं.

‘‘ऐसे में लोगों के दस्तावेज जुटा पाना बहुत चैलेंजिंग है. वह भी इतने कम समय में. वैसे भी इस मसले पर अनपढ़ क्या, पढ़ेलिखे लोगों में भी जागरूकता की भारी कमी है,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी.

‘‘ओह, यही वजह है कि चुनाव आयोग के इस प्रोसैस को ले कर सभी विपक्षी दल एकजुट हो कर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर बिहार चुनाव से महज 3 महीने पहले ही इस की जरूरत क्यों महसूस हुई?

‘‘मैं ने भी पढ़ा था कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर काम कर रहा है और बैकडोर से एनआरसी लागू करने की कोशिश की जा रही है.

‘‘हाल ही में राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा था कि जो चोरी महाराष्ट्र में हुई, वही चोरी अब बिहार में करने की तैयारी है,’’ विजय बोला.

‘‘पर वे 11 दस्तावेज कौन से हैं, जो चुनाव आयोग मांग रहा है?’’ विजय ने थोड़ा रुक कर सवाल किया.

‘‘पहला दस्तावेज है केंद्र या राज्य सरकार या पब्लिक सैक्टर यूनिट के नियमित कर्मचारी या पैंशनर को जारी किया गया कोई भी पहचानपत्र या पैंशन भुगतान आदेश. दूसरा है 1 जुलाई, 1987 से पहले सरकार या स्थानीय अधिकारियों या बैंकों या पोस्ट औफिस या एलआईसी या पीएसयू द्वारा भारत में जारी किया गया कोई भी पहचानपत्र या प्रमाणपत्र या फिर दस्तावेज. तीसरा है सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र. चौथा है पासपोर्ट.

‘‘5वां है मान्यताप्राप्त बोर्ड या यूनिवर्सिटी द्वारा जारी मैट्रिक या शैक्षिक प्रमाणपत्र. छठा है सक्षम राज्य प्राधिकारी द्वारा जारी स्थायी निवास प्रमाणपत्र. 7वां है वन अधिकार प्रमाणपत्र. 8वां है ओबीसी या एससी या एसटी या सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी कोई भी जाति प्रमाणपत्र. 9वां है नैशनल रजिस्ट्रार औफ सिटीजन्स (जहां भी यह मौजूद है). 10वां है राज्य या स्थानीय अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया परिवार रजिस्टर. 11वां है सरकार द्वारा जारी कोई भी भूमि या घर आवंटन प्रमाणपत्र.’’

‘‘अरे, इस तरह के भी सर्टिफिकेट होते हैं क्या इस देश में?’’ विजय ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन के पहले चरण के बाद यह बात सामने आई थी कि राज्य के तकरीबन 8 फीसदी वोटर यानी 65 लाख वोटरों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट में शामिल नहीं हो पाए हैं,’’ अनामिका ने अपनी बात को आगे बढ़ाया.

‘‘इस पर तुर्रा यह कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि ऐसा जरूरी नहीं है कि वह उन वोटरों के नाम की लिस्ट भी पब्लिश करे जिन के नाम बिहार की वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट रोल में शामिल नहीं हैं.’’

‘‘यह मामला बेहद गंभीर है. सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में अपना पक्ष रखना चाहिए और जिस तरह से विपक्ष को वोट चोरी का मामला लगा है, सरकार और चुनाव आयोग से पूरे मामले पर अपना रुख साफ करने के आदेश देने चाहिए.

‘‘एक आम आदमी के पास वोट की ताकत होती है. अगर वही उस से छिन जाएगी, तो फिर देश में लोकतंत्र होने का कोई मतलब नहीं बनता है. तानाशाही पर रोक लगनी ही चाहिए,’’ विजय ने कहा.

थोड़ी देर के लिए वहां चुप्पी छा गई थी.

अशोका राज्य की हमारी काल्पनिक कहानी ने बिहार के वोटरों की समस्या पर जो बात की है, वह बहुत गंभीर है और सरकार को इस पर अपना रुख साफ करना चाहिए, वरना चुनाव आयोग को कठघरे में ऐसे ही खड़ा किया जाएगा. News Story In Hindi

Family Story In Hindi: किराए की बीवी

Family Story In Hindi, लेखिका – टी. बेगम

संतरी को गली में रात के एक बजे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी तो वह चौंक उठा. उस ने उसी ओर लपकते हुए ‘कौन है?’ की तेज आवाज उछाली, फिर एक झन्नाटेदार सीटी बजा दी.

संतरी और सीटी की आवाज सुन कर वह साया जरा तेजी से आगे बढ़ने लगा. संतरी भी सावधानी से उस साए की ओर बढ़ा. अचानक वह साया तेजी से एक दरवाजे के सामने जा खड़ा हुआ, फिर उस ने घबराहट में दरवाजे पर दस्तक दी.

दरवाजा खुला और उसी पल संतरी भी वहां आ पहुंचा. खंभे के लट्टू की रोशनी में संतरी ने दरवाजा खोलने वाले नौजवान को फटकार लगाते हुए कहा, ‘‘अपने घर की औरतों को इतनी रात तक अकेला छोड़ देते हो, तुम्हें कुछ भी खयाल नहीं कि जमाना कैसा?है?’’

वह नौजवान उस संतरी के मुंह की ओर देखने लगा, तो वह फिर भुनभुनाया, ‘‘अब मेरा मुंह क्या देख रहे हो… औरत को अंदर करो और किवाड़ लगाओ.’’

संतरी सीटी बजाता हुआ आगे की ओर बढ़ गया. उस नौजवान ने तब अपने दरवाजे पर दस्तक देने वाली लड़की के चेहरे की ओर देखा और हौले से बोला, ‘‘आइए, अंदर आ जाइए.’’

वह लड़की झिझकती हुई अंदर आ गई. नौजवान ने एक पलंग की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘अगर आप को रातभर यहीं रुकना है तो पलंग पर आराम से सो सकती हैं,’’ इतना कह कर वह दूसरे कमरे की ओर बढ़ गया.

वह लड़की देर रात तक पलंग पर लेटी हुई सोचती रही, फिर पता नहीं कब उस की आंख लग गई.

सुबह जब वह लड़की उठी तो उस ने महसूस किया कि वह देर तक सोती रही है. काफी धूप निकल आई थी. उस के पलंग के पास एक मेज पर उस के लिए नाश्ता रखा हुआ था.

उसी पल वह नौजवान वहां आ गया. उस ने लड़की को गुसलखाने का रास्ता बताया.

नहाधो कर वह लड़की नाश्ता करने लगी, फिर बोली, ‘‘आप ने तो यह भी नहीं पूछा कि मैं कौन हूं और कहां से आई हूं? आप ने अनजान लड़की पर भरोसा कर उसे ऐसे ही शरण दे दी?’’

उस लड़की की बात सुन कर वह नौजवान हंसा, फिर धीमे से बोला, ‘‘रात को तुम्हारे चेहरे से लग रहा था कि तुम आफत की मारी हो. तुम कौन हो और कहां से आई हो? यह तो अब तुम खुद ही बताओ.’’

उस लड़की के चेहरे पर उदासी छा गई. वह पलभर को चुप रही, फिर हिम्मत बटोर कर बोली, ‘‘मैं अच्छी नहीं हूं, मैं एक ‘कालगर्ल’ हूं, यानी अपना जिस्म बेचती हूं. एक रात के मैं 4-5 सौ रुपए कमा लेती हूं.

‘‘मेरे कुछ बंधे ग्राहक हैं, जो फोन कर के मुझे बुला लेते हैं.

‘‘कल रात जिस ग्राहक ने बुलाया था, उस ने कुछ ज्यादा ही वक्त ले लिया, इसीलिए इस गली को पैदल ही पार कर रही थी कि संतरी पीछे लग गया. मजबूर हो कर आप के घर पर दस्तक दे डाली.’’

वह नौजवान उस की बात सुन कर संजीदा हो गया, फिर उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या?है?’’

लड़की के होंठों पर इस बार मुसकराहट नाच उठी, ‘‘मेरे ग्राहक मुझे अलगअलग नामों से जानते हैं. कोई रेहाना के नाम से जानता है तो कोई सुरैया के नाम से. कुछ मुझे शांति देवी कहते हैं तो कुछ गीता देवी.

असली नाम तो मैं खुद भी भूल गई हूं. अगर कुछ सही याद है तो वह है मेरा फोन नंबर.’’

यह कहते हुए उस लड़की की आंखों में आंसू भर आए. उन्हें अपने रूमाल से पोंछती हुई वह बोली, ‘‘आप को देख कर जिंदगी में पहली बार लगा कि किसी शरीफ आदमी के घर में रात गुजारी है… नहीं तो यहां के नेताओं, अफसरों, सेठों ने स्याह रातों में मुझे खूब भोगा है.

‘‘मुझे कच्ची उम्र से ही फांस लिया गया था. अच्छा, अब मैं चलती हूं. आप के घर बिताई यह रात जिंदगीभर याद रहेगी.’’

वह लड़की अपना बैग उठा कर जाने ही वाली थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. नौजवान ने उठ कर दरवाजा खोला, तो सामने अपनी मां को देख कर चौंका, ‘‘मांजी, आप… अचानक…?’’

घर में दाखिल होते हुए वे अधेड़ उम्र की औरत बोलीं, ‘‘हां, मैं अब अपना फैसला सुनाने आई हूं. तुझे अब शादी करनी ही होगी. मैं ने लड़की देख ली है. फोटो साथ लाई हूं. अब तुझे इनकार नहीं करने दूंगी.’’

अचानक नौजवान की मां की नजर उस लड़की पर पड़ी. वह चौंकते हुए बोली, ‘‘अच्छा तो तू शादी कर भी लाया. खैर, मुझे तेरी पसंद मंजूर है. लड़की अच्छी है, मुझे तो बहू ही चाहिए थी.’’

उस लड़की की मांग में सिंदूर भरा था, इसलिए मां को धोखा हुआ.

मां ने उस लड़की के सिर पर हाथ फेर कर पूछा, ‘‘बहू, क्या नाम है तेरा?’’

‘‘जी… जी… सावित्री,’’ उस लड़की ने हकलाते हुए कहा.

‘‘अच्छा नाम है, हमेशा सुखी रहो,’’ मां ने फिर उस के सिर पर हाथ फेरा. फिर वे गुसलखाने में चली गईं. तभी वहीं से आवाज आई, ‘‘अनिल, आज बहू को मैं खाना बना कर खिलाऊंगी.’’

नौजवान ने लड़की की ओर देखा और धीरे से बोल, ‘‘सावित्री… या जो नाम हो तुम्हारा, अब तुम्हें 5-6 दिन यहीं रुकना होगा. तुम्हें बहू का रोल अदा करना होगा. मैं हर रात के 500 रुपए तुम्हें दूंगा. तुम्हारे नुकसान की कम से कम भरपाई ही कर पाऊंगा. मेरी आमदनी बहुत ज्यादा नहीं है. मां के जाते ही तुम भी चली जाना.’’

लड़की ने मुसकराते हुए उस की बात मान ली.

उस लड़की को 5 रातों तक उस के साथ एक ही पलंग पर सोना पड़ा. हर रात बीतने पर वह लड़की के हाथ पर 500 रुपए रख देता. वह लड़की मुसकरा कर उन्हें ले लेती.

छठे दिन मां जाने की तैयारी करने लगीं. लड़की ने तय कर लिया कि उन के जाते ही वह भी चली जाएगी. उस ने नौजवान के नाम एक खत लिखा और उसे तकिए के नीचे रख दिया. खत में उस ने लिखा था:

‘अनिल बाबू,

‘आप के साथ जो 5 रातें गुजारी हैं, उन्हें मैं हमेशा याद रखूंगी. मेरी फीस तो मेरे जिस्म को भोगने की है, सिर्फ साथ सोने की नहीं. आप ने तो मुझे हाथ तक नहीं लगाया, इसलिए मैं आप के सारे रुपए इस खत के साथ रखे जा रही हूं. हां, एक सौ का नोट आप की यादगार के रूप में ले जा रही हूं. बिना मिले जा रही हूं, इस के लिए माफ कर देना.’

अनिल की मां अपनी अटैची के साथ रिकशे में बैठ कर चली गईं. कुछ ही देर बाद वह लड़की भी रवाना हो गई. उस ने चाबी पड़ोस की एक औरत को दे कर अनिल को दे देने के लिए कह दिया.

शाम को जब अनिल घर आया तो घर पर उस की मां मिलीं. उन्होंने बताया कि वे अपना कुछ सामान भूल गई थीं, इसलिए लौट आईं. फिर अनिल को मालूम हुआ कि अजनबी लड़की जा चुकी है. वह कुछ उदास हो गया.

मां ने कहा, ‘‘तकिए के नीचे तेरी किराए की बीवी का खत रखा है, उसे पढ़ ले.’’

मां की बात सुन कर अनिल का शर्म से सिर झुक गया. फिर वह खत पढ़ने लगा.

अगले दिन सुबहसुबह उस लड़की के दरवाजे पर दस्तक हुई. दरवाजा खोलने पर उस के मुंह से अचानक ही निकल गया, ‘‘मांजी, आप…?’’

‘‘हां, मैं…’’ अनिल की मां अंदर आते हुए बोलीं, ‘‘मैं ने तुम्हें खत रखते देख लिया था. पढ़ कर जाना कि तुम अनिल की असली नहीं, किराए की बीवी हो.’’

इतना कह कर मां ने गौर से उस लड़की के चेहरे को पढ़ने की कोशिश की. उस सुंदर लड़की के चेहरे पर कई रंग आए और गए. फिर उस ने अपना बैग उठा कर कंधे से लटकाया और सख्त आवाज में बोली, ‘‘जब आप को पता चल ही गया था कि मैं क्या हूं तो फिर मेरा पता मालूम कर आप यहां क्यों आईं? खैर, मैं जा रही हूं. मैं आज दिन में ही ‘बुक’ हूं.’’

मां भी थोड़ी सख्त आवाज में बोलीं, ‘‘तो हम भी तुम्हें ‘बुक’ करने आए हैं. अनिल के लिए तुम्हें बुक करना है. पूरी जिंदगी के लिए. बोलो, मंजूर है?’’

वह लड़की ठगी सी कुछ देर के लिए खड़ी रह गई. फिर उस की आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए. उस ने मां के सीने में अपना मुंह छिपा लिया. मां उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगीं. Family Story In Hindi

Best Hindi Story: कैद

Best Hindi Story, लेखिका – नेहा अरोरा

‘‘अरे, क्यों रो रही है? अच्छा ही हुआ चला गया, तेरी जिंदगी नरक बना रखी थी,’’ श्यामा ने रोती हुई जीनत को चुप कराते हुए कहा. उस की आवाज में कड़वाहट तो थी, पर करुणा भी थी.

श्यामा की बात सुन कर एक पल को जीनत ने उसे नजर उठा कर देखा. उस की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. उस के हाथ पर गरम चिमटे से लगी मार में अभी भी चीस उठ रही थी, लेकिन जिस ने उसे यह चीस दी थी, वह जिंदा साहिल था, पर अब उस के सामने मुर्दा साहिल था, जो न उसे मार सकता था, न गाली दे सकता था.

जीनत थोड़ा और पीछे हो कर दरवाजे से टेक ले कर बैठ गई. वहां कुछ ही लोग थे. साहिल के घर वालों ने बहुत पहले ही उस की हरकतों से तंग आ कर उस से रिश्ता तोड़ लिया था और जीनत के घर वालों ने उसे समझासमझा कर थक कर अपनी दूरी बना ली थी, पर जीनत सबकुछ जानतेसमझते, सहते हुए भी अलग नहीं हो पाई.

ऐसा नहीं है कि जीनत को ऐसा खयाल ही नहीं आया, पर जब भी उस ने अपना मन बनाया, कुछ न कुछ ऐसा हुआ कि वह वापस साहिल के पास आ गई.

जीनत को पता था कि अगर वह साहिल को छोड़ कर गई तो साहिल जिंदा नहीं रह पाएगा और वह उस की मौत की जिम्मेदारी अपने सिर नहीं लेना चाहती थी.

यह वही साहिल था, जिस के साथ जीनत ने जीनेमरने की कसमें खाई थीं, साथ निभाने का वादा किया था, कई खूबसूरत साल बिताए थे… उसे छोड़ कर वह कैसे जाती?

जीनत और साहिल ने अपनी पसंद से निकाह किया था. दोनों एकदूसरे पर जान छिड़कते थे. घर वालों ने भी इस रिश्ते को मंजूरी दे दी थी.

कोई कमी नहीं थी. न परिवारों में और न ही दोनों की जोड़ी में. सब इतना बढि़या चल रहा था, पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि…

एक दिन साहिल काम पर से जल्दी लौट आया था. उस ने सोचा था कि जीनत को सरप्राइज देगा, लेकिन उस दिन जो सरप्राइज उसे मिला, वह उस की जिंदगी ले गया.

साहिल के पास घर की एक चाबी थी. धीरे से वह दबे पैर घर के भीतर आ गया था. उसे लगा था कि इस समय जीनत आराम कर रही होगी, इसलिए वह बैडरूम की तरफ चल दिया.

पर बैडरूम से आती किसी की धीमी आवाज से साहिल का माथा थोड़ा ठनका. उस ने धीरे से बैडरूम के दरवाजे की दरार से झांका, तो बिस्तर पर जीनत को अपने ही चचेरे भाई इफ्तार के साथ देख कर जैसे एक पल को उस को चक्कर ही आ गया. उन दोनों का ही ध्यान उस की तरफ नहीं गया था.

साहिल ने किसी तरह खुद को संभाला और जैसे आया था, वैसे ही वापस चला गया.

उस दिन के बाद वह साहिल शायद मर चुका था और उस की जगह एक दूसरे साहिल ने ले ली थी, इसलिए तो घर वालों को यह नया साहिल पहचान में नहीं आ रहा था.

साहिल ने अपने मुंह से उस दिन की बात कभी किसी के आगे नहीं कही, जीनत से भी नहीं. उस ने बहुत मौके दिए जीनत को कि वह यह घर छोड़ कर चली जाए.

जीनत को एहसास तो हो गया था कि शायद साहिल को पता चल चुका है, लेकिन उस ने जब भी जानने की कोशिश की, साहिल ने कुछ नहीं कहा.

जीनत ने घर छोड़ कर जाने का मन भी बना लिया था, लेकिन जब उस ने यह बात इफ्तार को बताई, तो उस ने फौरन वहां से तबादला ले लिया और पलट कर जीनत का फोन तक उठाना बंद कर दिया.

जीनत और साहिल दोनों अपने ही अंदर घुट रहे थे. इसी घुटन में साहिल ने शराब पीना शुरू कर दिया.

उस के घर वाले इस सब की वजह नहीं समझ पा रहे थे. उन्होंने साहिल को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन सब बेकार.

साहिल ने अब नशे में जीनत पर हाथ तक उठाना शुरू कर दिया था. जब वह नशे में चूर हो कर गिर पड़ता, तब जीनत उसे बिस्तर पर सही से लिटाती, चादर उढ़ाती.

नशे की हालत में गिरने के बाद साहिल के आंखों के कोनों से आंसू बह रहे होते. उन्हें देख कर जीनत का दिल पिघल जाता. उसे कई बार लगता खुद बता दे साहिल को तो शायद यह घुटन कम हो जाती, लेकिन साहिल जीनत को देखते ही भड़क जाता और जीनत को मौका ही नहीं मिल पाता.

जीनत पहले वाले साहिल की याद को मन में संजोए इंतजार करती रहती, पर उसे भी पता था कि साहिल की इस हालत की वही जिम्मेदार है और यह अपराधबोध उसे सब चीजों के बावजूद वहीं रोके रखता.

पता नहीं क्यों साहिल ने यह बात कभी किसी के आगे नहीं बताई. जीनत के घर वाले, साहिल के खुद के घर वाले साहिल को कोसते रहे, समझाते रहे और एक दिन तो साहिल के अब्बू ने उसे तमाचा भी लगा दिया, लेकिन साहिल के मुंह से फिर भी एक भी शब्द नहीं निकला.

आज भी साहिल इसी तरह नशे में चूर घर आया था. जीनत ने जब तक रोटी प्लेट में ला कर रखी, वह ठंडी हो गई थी.

साहिल गुस्से में पता नहीं क्याक्या बड़बड़ाता हुआ रसोईघर में आया और जीनत के हाथ से गरम चिमटा छीना और उस का हाथ पकड़ कर उस पर दाग दिया.

जीनत की चीख निकल गई और उस ने हाथ को छुड़ाने के लिए जोर से झटका दिया.

साहिल उस झटके से एकदम लड़खड़ा गया और पीछे की ओर गिरा. उस का सिर दीवार से जा टकराया.

जीनत भाग कर आई और उस ने साहिल को बहुत हिलाया, लेकिन शायद वह अब इस घुटन से आजाद हो गया था.

पता नहीं अब तक कौन किस की कैद में था. Best Hindi Story

Long Hindi Story: बस खाली करो – पहला भाग

Long Hindi Story: दिल्ली में कई साल से रहते हुए भी हसामुद्दीन इस शहर को ठीक ढंग से देख नहीं पाया था. कभी प्लान करता, तो पैसे न होते, जब पैसे होते, तो कारखाने की छुट्टी न होती. जब छुट्टी होती, तो कुछ घरेलू काम पड़ जाता था.

लेकिन उस शनिवार को हसामुद्दीन अपने कमरे से यह सोच कर निकला था कि आज तो कनाट प्लेस में घूमनाफिरना होगा. उस की इच्छा तो मैट्रो से जाने की हुई थी, लेकिन किराया ज्यादा होने की वजह से वह डीटीसी की नारंगी क्लस्टर बस में ही चढ़ गया, जो टर्मिनल से ही भर चुकी थी. फिर भी उसे सब से पीछे वाली एक सीट मिल गई थी.

उसी समय 2 लड़के पिछले दरवाजे की सीढि़यों पर आ कर बैठ गए. टर्मिनल से चलने तक बस में और ज्यादा भीड़ हो गई थी.

कई आदमी हसामुद्दीन के सामने खड़े थे. उस ने ‘पत्ते शाह बाबा’ को याद किया और कहा, ‘‘अगर सीट न मिलती तो आज खड़े हो कर ही जाना पड़ता.’’

जब बस अगले बस स्टौप पर रुकी, तो वहां से एक ट्रांसजैंडर पिछले दरवाजे से बस में चढ़ी, जो काफी पतली थी. उस का चेहरा लंबा और गोरा रंग था.

उस ने ‘हायहाय’ कहते हुए अपनी हथेलियों से 2 बार ताली बजाई. उस के माथे पर लाल गोल टीका लगा था. नाक में नथ और कान में झुमकी थी.

उस का साधारण सा सूटसलवार था. उस की क्लीन शेव, जो गहरे हरे रंग की थी, को चेहरे पर लगी सफेद क्रीम ने छिपा रखा था. उस ने अपने बाल ऊपर कर के टाइट बांधे हुए थे, जिन में गर्द भी भरा था और रूसी भी नजर आ रही थी.

हसामुद्दीन ने सोचा, ‘ताली बजाना इन लोगों की अपनी एक अलग पहचान है…’

तब तक वह ट्रांसजैंडर सवारियों से पैसे मांगने लगी थी. ताली बजाते हुए उस ने हसामुद्दीन से कहा, ‘‘दे न भाई.’’

हसामुद्दीन ने हाथ के इशारे से कहा, ‘‘मेरे 5 रुपए कंडक्टर के पास बकाया हैं. आप उन से ले लो.’’

हसामुद्दीन की यह बात सुन कर वह ट्रांसजैंडर मुंह बना कर आगे बढ़ गई.

हसामुद्दीन अपनी सीट से उचक कर देखने लगा कि कंडक्टर से उस ट्रांसजैंडर ने पैसे लिए या नहीं. अगर ले लिए होंगे, तो वह कंडक्टर से अपने पैसे नहीं मांगेगा.

अरे, यह क्या… वह ट्रांसजैंडर तो कंडक्टर के पास गई ही नहीं. हसामुद्दीन को अफसोस हुआ कि उसे कुछ दे देना चाहिए था.

जब हसामुद्दीन अपनी सीट से उचक कर उस ट्रांसजैंडर को देख रहा था, तब कुछ लोगों को लगा कि वह अगले बस स्टौप पर उतरेगा.

उसे उचकता देख कर एक आदमी ने दूसरे आदमी को संकेत करते हुए कहा, ‘‘वहां बैठ जाओ.’’

लेकिन हसामुद्दीन तो दोबारा अपनी सीट पर बैठ गया. तब कुछ लोग ट्रांसजैंडर और उसे देखने लगे.

एक लड़के ने हसामुद्दीन को देख कर अपने चेहरे पर मंद सी मुसकराहट दिखाई. अगले बस स्टौप पर वह ट्रांसजैंडर उतर गई.

उस लड़के के रिऐक्शन पर हसामुद्दीन ने अपना मुंह नीचे कर लिया और सोचा, ‘देश में जातिवाद, छुआछूत, बंधक मजदूर, लिंग असमानता, दहेज प्रथा, औरतों पर घरेलू हिंसा, बाल

यौन शोषण, धार्मिक हिंसा, दलितों आदिवासियों का शोषण जैसे बहुत से मुद्दे हैं, फिर ट्रांसजैंडर को हीन भावना से देखना तो परिवार और समाज से ही मिलता है. पर क्या ये लोग हमारी तरह इनसान नहीं हैं?

‘सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल, 2014 को ट्रांसजैंडर समुदाय को तीसरे लिंग के रूप में मंजूरी तो दे दी थी, पर समाज का नजरिया अभी भी बदला नहीं है…’

हसामुद्दीन ने अपनी दाईं तरफ बैठे एक आदमी को देखा. उस के देखने पर उस आदमी ने पूछा, ‘‘भाई साहब, अभी मैडिकल कितना दूर है? आने से पहले मुझे बता देना.’’

हसामुद्दीन ने अपना सिर ‘हां’ में हिलाया और उस आदमी से पूछा, ‘‘क्या आप इलाज कराने जा रहे हैं?’’

‘‘नहीं, कोई और भरती है,’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘अभी मैं उस ट्रांसजैंडर के बारे में सोच रहा था. ऐसे बहुत से ट्रैफिक सिगनल पर, रेल में लोगों से भीख
मांगते दिख जाते हैं. इन की हालत बहुत पतली है.’’

वह आदमी बोला, ‘‘पर भाई साहब, पैसे न देने पर ये लोगों से बदतमीजी करते हैं. किसी के घर खुशी होने पर ये उस के घर जाते हैं और मुंहमांगे पैसे ले कर ही वहां से टलते हैं. ऐसा माना जाता है कि इन में लोगों को दुआ और बद्दुआ देने की ताकत होती है. लोगों को इन से डर भी लगता है.’’

‘‘लेकिन बहुत से लोग तो इन्हें ‘छक्का’ कह कर मजाक उड़ाते हैं. अगर ऐसा किसी के साथ होगा, तो वह आप के खिलाफ कड़ा रुख ही अपनाएगा न?

‘‘अगर बसों, रेलगाडि़यों में ये नरमी बरतेंगे, तो मुझे नहीं लगता कि लोग इन्हें सही से जीने भी देंगे. जहां जातिधर्म, क्षेत्र, भाषा, रंगरूप के नाम पर लोगों को जिंदा जला डालते हों, तो ऐसे समाज में ये क्या करें?

‘‘सही माने में देखें तो इन्होंने जीने के लिए अपना ऐसा रुख किया है. इन को समाज में अच्छी तरह बसाने के बारे में हम सभी को सोचना चाहिए,’’ हसामुद्दीन ने कहा.

उस आदमी ने कहा, ‘‘आप की बात ठीक है, लेकिन क्षेत्र के विधायक, सांसद इन के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं? लोग तो एकदूसरे को ‘हिजड़ा’ बोल कर बेइज्जती करते हैं. आप ने बसों और ट्रेनों में सफर करते समय इन्हें लोगों से पैसे मांगते देखा होगा.

‘‘इन में से ज्यादातर तो नकली होते हैं, जो हिजड़ों जैसा हुलिया बना कर लोगों को ठगते हैं. उन में से कइयों की तो पोल भी खुल चुकी है,’’ उस आदमी ने अपनी बात रखी.

जसोला अपोलो बस स्टौप से कुछ और सवारियां चढ़ीं, लेकिन वे लड़के सीढि़यों पर ज्यों के त्यों बैठे रहे.
जब एक आदमी बस से उतरने के लिए उन के पीछे खड़ा हुआ, तब उन लड़कों में से एक ने उसे हड़काते हुए कहा, ‘‘अबे, यहीं उतरेगा क्या?’’

लेकिन उस आदमी ने तनते हुए कहा, ‘‘क्या कह रहा है बे?’’

वे लड़के उस आदमी की बात सुन कर चुप तो हो गए, लेकिन उसे घूरने लगे. उस आदमी के चेहरे पर डर का भाव तो नहीं था, पर वह दाएंबाएं देख कर चुप रहा.

बस आगे बढ़ती जा रही थी. हरकेश नगर ओखला बस स्टौप पर कुछ और सवारियां चढ़ीं और उतरीं. बस रुकते ही एक आदमी दौड़ता हुआ उन लड़कों के सामने आ कर बोला, ‘‘भाई, यह बस मैडिकल जाएगी?’’

एक लड़के ने उस से कहा, ‘‘अबे, नहीं जाएगी.’’

जब वह आदमी कुछ पीछे हटने लगा, तभी कंडक्टर ने उसे आवाज दी, ‘‘हां, जाएगी.’’

वह आदमी उन लड़कों के बगल से होता हुआ हड़बड़ी में अंदर आया और उन्हें डांटते हुए कहा, ‘‘अबे, तू तो कह रहा था कि बस मैडिकल नहीं जाएगी…’’

इस पर वे दोनों लड़के तमतमाते हुए खड़े हो गए और उन में से एक ने कहा, ‘‘देखने में सही लग रहा है, जहां जा रहा है सही से जा, नहीं तो पीछे आ. अभी तेरी सारी गरमी निकालता हूं.’’

उस आदमी ने दूसरी सवारियों से कहा, ‘‘बताएं, क्या इस की गलती नहीं है… ऊपर से कह रहा है कि गरमी निकाल दूंगा.’’

उन में से एक लड़का बोला, ‘‘बस में गरमी बहुत है, तू पीछे आ…’’

उन के बीच में न कंडक्टर कुछ बोल रहा था, न सवारियां ही कुछ बोल रही थीं. बस, सब यह तमाशा देख रहे थे.

उन दोनों के बीच होती बहस के बीच हसामुद्दीन हिम्मत करते हुए बड़बड़ाया, ‘‘लड़ो मत, शांत हो जाओ.’’

कंडक्टर बिलकुल शांत हो कर अपनी जगह पर बैठा था और ड्राइवर निश्चिंत भाव से बस चला रहा था. उन्हें इस लफड़े से कोई मतलब नहीं था.

बस में अब पीछे उतनी भीड़ नहीं थी. बस आश्रम बस स्टौप पार कर चुकी थी.

उन लड़कों में एक लड़का सांवला था. उस की उम्र 15-16 साल के बीच होगी. उस के दांत साफ दिखे, कान में बाली पहनी हुई थी. दूसरे लड़के की उम्र 20-22 साल के बीच होगी, जिस के बाएं हाथ पर जगहजगह गहरे कट के निशान थे, जो उभरे हुए दिख रहे थे. उस लड़के के दांत मटमैले और रंग साफ था.

बाल भूरे थे, जो उलझे हुए थे.

छोटा लड़का उस से कह रहा था, ‘‘भाई, मुझे घर जाना है, कुछ पैसे दे दे…’’

बड़ा लड़का लंपटता से बोला, ‘‘अबे, ‘स्टाफ’ बोल कर चला जा.’’

उस लड़के के ‘स्टाफ’ कहने पर हसामुद्दीन को याद याद आया कि जब दिल्ली में ब्लूलाइन बसें चला करती थीं, उन में स्कूलकालेज के बच्चे और दबंगई करने वाले दूसरे लोग अपनेअपने ‘स्टाफ’ चलाते थे और ब्लूलाइन वाले डीटीसी बसों के ड्राइवर और कंडक्टर से मिलीभगत कर के डीटीसी बसों को रुकवा लेते थे और अपनी बसें पहले चलवाते थे.

सभी ब्लूलाइन प्राइवेट बसें थीं, जो ठेके पर चला करती थीं. उन्हें चलाने वाले अपने रूट पर ज्यादा से ज्यादा चक्कर लगा कर 2-3 गुना पैसे कमाने के चक्कर में बड़ी तेज रफ्तार से चलते थे, जिस से आएदिन हादसे होते रहते थे.

लोग इन को दिल्ली की ‘हत्यारी ब्लूलाइन बसें’ भी कहते थे. लेकिन सितंबर, 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने इन सभी ब्लूलाइन बसों को बंद कर दिया था.

उस बड़े लड़के की गरदन पर त्रिशूल और डमरू का टैटू बना हुआ था और उस के दाएं हाथ पर ‘जय माता दी’ गुदा हुआ था. उस की पैंट सरकी हुई थी और अंडरवियर के साथ अंदर की तरफ एक पेचकस जैसा कुछ ठुंसा दिख रहा था.

जब वह लड़का उस आदमी को धमकाने के लिए खड़ा हुआ, तब उस ने अपने बाएं हाथ में लोहे के एक कड़े को कस कर फंसा लिया था, जिसे देख कर हसामुद्दीन डर गया था.

उस लड़के से नजर बचाते हुए हसामुद्दीन ने जल्दी से अपना मोबाइल पैंट की जेब में रखा. उसे लगा कि कहीं वह मोबाइल न छीन ले.

तभी बस की बाईं तरफ की सीटों पर बैठी 2 औरतों में किसी बात को ले कर गालीगलौज शुरू हुआ.

एक ने दूसरी से कहा, ‘‘सही से बैठो.’’

दूसरी ने कहा, ‘‘तझे बैठने की तमीज नहीं है.’’

दूसरी औरत बूढ़ी थी. कंडक्टर ने समझाया, ‘‘माताजी, गलत मत बोलो.’’

उस लड़के ने कंडक्टर से कहा, ‘‘अबे, तुझे चाकू चाहिए, तो मुझ से ले ले. मेरे पास है. नहीं तो मैं इन दोनों को ठीक कर देता हूं. बहुत देर से ‘चैंचैं’ लगा रखी है.’’

कंडक्टर ने उस लड़के की बात का जवाब नहीं दिया. कुछ सवारियां और कंडक्टर की दखलअंदाजी से वे दोनों औरतें चुप हुईं.

बस के ज्यादातर मर्द इन औरतों के बीच हुई बहस को सीरियसली नहीं ले रहे थे. वे उन की बहस को केवल हंसी की बात समझ रहे थे. बस के अंदर उन औरतों के अगलबगल खड़े मर्द तो मंदमंद मुसकरा रहे थे, जबकि पीछे वाले कुछ लोग ठहाके मार रहे थे.

दरअसल, ज्यादातर मर्द समाज औरतों को इनसान ही नहीं मानता है, न ही उन की बातों को गंभीरता से लेता है. सही माने में मर्द औरतों को समझाना ही नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे खुद को बेहतर समझते हैं, जबकि औरतें मर्दों से किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं. वे पुलिस, सैनिक, डाक्टर, व्यापारी, टीचर, प्रोफैसर, ड्राइवर हैं. और तो और मर्दों को पैदा करने वाली भी वे ही हैं.

लाजपत नगर बस स्टौप पर कुछ और सवारियां उतर गईं. हसामुद्दीन के बाईं तरफ एक सीट खाली हो गई और एक सीट उस से आगे की भी खाली हुई.

कंडक्टर ने उन लड़कों को मान देते हुए कहा, ‘‘भाई, सीट पर बैठ जाओ.’’

बड़ा लड़का कुछ संकोच करते हुए हसामुद्दीन के बगल वाली सीट पर आ कर बैठ गया और दूसरा लड़का आगे वाली सीट पर बैठा.

हसामुद्दीन उस बड़े लड़के से कुछ डरा हुआ था, फिर भी उस से पूछा, ‘‘तुम बदरपुर में रहते हो?’’

उस लड़के ने धीरे से कहा, ‘‘नहीं, दक्षिणपुरी में.’’

उस लड़के के मुंह से बदबू आ रही थी. उस ने कहा, ‘‘सरजी, मैं आप को जानता हूं. मैं ने आप को बदरपुर के एक स्कूल में देखा है.’’

यह सुन कर हसामुद्दीन को कुछ राहत मिली. सोचा कि कहीं किसी स्कूल के कार्यक्रम में देख लिया होगा.

हसामुद्दीन ने उस लड़के से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे मम्मीपापा हैं?’’

उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, सब हैं, लेकिन दुनिया बड़ी जालिम है, हमें जीने नहीं देती है.’’

हसामुद्दीन को लगा कि वह लड़का पूरी बात नहीं आप ही बता रहा है.

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘तुम कुछ काम सीख लो और जिंदगी में आगे बढ़ो. जो भी तुम्हारे साथ बुरा हुआ, वह बीत गया है. उसे छोड़ कर आगे बढ़ो. अपनी जिंदगी क्यों बरबाद कर रहे हो…’’

उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, दुनिया बहुत खराब है. क्या काम करें, आप ही बताओ?’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘भाई, बहुत से काम हैं. मोटर मेकैनिक का काम सीख लो, बिजली का काम सीख लो, और भी बहुत से काम हैं.’’

उस लड़के ने दोबारा कहा, ‘‘सरजी, दुनिया जीने नहीं देती,’’ कह कर वह अपना सिर दिखाने लगा और बोला, ‘‘इस में डाक्टरों ने गलत आपरेशन कर दिया था.’’

लेकिन हसामुद्दीन ने उस चोट को देखने की कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे ऐसा करना सही नहीं लग रहा था.

फिर उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, 50 रुपए दे दो.’’

हसामुद्दीन के मन में उस लड़के को 50 रुपए देने की बात आई, लेकिन वह 20 रुपए ही देने लगा, जिसे

वह लड़का नहीं ले रहा था. उस ने कहा, ‘‘सरजी, इतने कम पैसे मैं नहीं लेता.’’

लेकिन हसामुद्दीन ने उस लड़के के हाथ में जबरदस्ती पैसे रख दिए और कहा, ‘‘कुछ खा लेना.’’

उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, इतने में कहां कुछ मिलता है…’’ और अपने साथी के साथ वह एम्स (मैडिकल) वाले बस स्टौप पर उतर गया.

उस लड़के ने बात तो ठीक कही थी. इस जमाने में पैसे कीमत ही कहां है. महंगाई के दौर में आम आदमी की जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है.

उन दोनों लड़कों के उतरने पर बस कंडक्टर ने सवारियों से कहा, ‘‘ये दोनों जेबकतरे थे. इन से कौन बहस करे…’’

बस कंडक्टर ने एक बात और कही, ‘‘शनिवार के दिन दिल्ली की बसों में किसी की जेब नहीं कटती है.’’

हसामुद्दीन की बाईं तरफ एक सीट छोड़ कर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था.

हसामुद्दीन ने उस आदमी से कहा, ‘‘ये लड़के पहले ऐसा नहीं होंगे, जैसा हम ने इन्हें फिलहाल देखा है.

किसी के हालात उसे क्या से क्या बना देते हैं. मुझे लगा कि मैं ने एक लड़के को कहीं देखा है. जन्म से कोई बुरा या अच्छा नहीं होता है. अच्छा या बुरा बनने में भी समय लगता है. यह समाज उसे अच्छा या बुरा बनाता है.

उस अधेड़ आदमी ने हसामुद्दीन की तरफ देख कर कहा, ‘‘आप की बात तो ठीक है, पर बच्चे समझते कहां हैं…’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी से पूछा, ‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘केंद्रीय सचिवालय.’’

‘‘क्या आप सरकारी नौकरी में हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘नहीं… एक क्लब है, वहीं पर काम करता हूं.’’

‘‘आप कब से वहां काम कर रहे हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘पिछले 3 साल से.’’

‘‘बड़ा क्लब है?’’

हां. उस क्लब में बहुत से लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं.’’

‘‘आप पहले कहां काम करते थे?’’

‘‘साउथ ऐक्सटैंशन में एक होटल है, मैं वहीं पर कुक था.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप ने कितने साल वहां काम किया?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘25 साल से ज्यादा ही.’’

‘‘फिर तो आप को छोड़ना नहीं चाहिए था.’’

‘‘क्या करें, मालिक ने लौकडाउन का फायदा उठाते हुए 18 लोगों को निकाल दिया, जिन में मैं भी शामिल था.’’

‘‘वहां पर तो आप परमानैंट होंगे?’’

‘‘हां, छुट्टियां भी मिलती थीं. अभी भी वहां पर बहुत लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं. हमारी तो वहां एक यूनियन भी थी. मालिक ने धीरेधीरे सभी को निकालना शुरू कर दिया था.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘मालिक को यूनियन से डर होता है.’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘डर तो होता है, क्योंकि यूनियन होने से कामगार को एक तरह की सिक्योरिटी मिलती है. अगर किसी ने कामगार को उचित वेतन नहीं दिया है, तब यूनियन मैनेजमैंट के सामने अपनी बात रखती है. यूनियन न होने से कामगार अपनी बात को मजबूती से और बिना डर के नहीं रख सकता है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप उस क्लब में क्यों नहीं एक यूनियन बना लें?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब ट्रेड यूनियन बनाना आसान काम नहीं है. सरकार ने ट्रेड यूनियन बनाने के लिए नियमों में बड़ी कड़ाई की है. पहले जहां 7 लोग मिल कर यूनियन बना लेते थे, अब कुल कामगारों का 10 फीसदी कर दिया गया है. न 10 फीसदी कामगार होंगे, न यूनियन बनेगी. अब कारखाना और फैक्टरी के अंदर धरनाप्रदर्शन करने की भी छूट नहीं है. सरकार केवल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रही है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘जब ट्रेड यूनियनें नहीं होंगी, तब कामगारों की आवाज कौन उठाएगा?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब आवाज ही कौन उठा रहा है… जो हैं वे बहुत कमजोर हैं. देखिए, इस क्लब में काम करते हुए मुझे 3 साल हो गए हैं, लेकिन कोई छुट्टी नहीं मिलती है. जिस दिन काम करने नहीं गए, उस दिन की दिहाड़ी नहीं मिलती है.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप को यहां कितने पैसे मिलते हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘15,000 मिलते हैं, लेकिन आनेजाने का किराया और छुट्टी निकल लूं, तो 10,000 बच जाते हैं. लेकिन भाई साहब, बगैर छुट्टी के कैसे काम चलेगा. बस, यही सोचता हूं कि खाली बैठने से अच्छा है कि कुछ करता रहूं.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप के बच्चे तो बड़े हो गए होंगे…’’

‘‘जी…’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘कहां रहते आप हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘विनय नगर, फरीदाबाद में.’’

‘‘किराए पर रहते हैं?’’

‘‘नहीं. 30 गज का प्लौट ले कर बना लिया है. उसी में रहते हैं.’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी के पीले और जंग लगे हुए दांत देख कर पूछा, ‘‘क्या आप गुटका या पान मसाला खाते हैं?’’

‘‘नहीं, पर बीड़ी जरूर पीता हूं.’’

हसामुद्दीन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, ‘‘आप वादा कीजिए कि आज से बीड़ी नहीं पीएंगे?’’

उस आदमी ने अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया, लेकिन कहा, ‘‘वादा कर के तोड़ना नहीं चाहता हूं.’’

हसामुद्दीन ने उसे एक सलाह दी, ‘‘आप आलू, प्याज, फल बेचने का अपना काम करें. इतना पैसा तो आप फरीदाबाद में ही कमा लेंगे.

उस आदमी ने कहा, ‘‘एक बार ढाबा शुरू किया था, लेकिन चला नहीं.’’

वह आदमी केंद्रीय सचिवालय उतरने लगा, तब हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘मैं ने आप को 2 बातें बताई हैं. एक बीड़ी न पीने की और दूसरी अपना कोई काम करने की.’’

उस आदमज ने कहा, ‘‘बिलकुल भाई साहब, मैं आप की बात याद रखूंगा.’’

हसामुद्दीन सोचने लगा, ‘‘आमजन में बेरोजगारी के चलते ही ठेकेदारी प्रथा फलफूल रही है और नवउदारवादी नीति का मतलब है कि काम ज्यादा, पैसे कम और न कोई छुट्टी, न कोई स्वास्थ्य सुरक्षा और न ही कोई दूसरा फायदा. इस नीति ने केवल पूंजीपतियों को मजबूत किया है. सरकार की इच्छाशक्ति से ही इस देश में ठेकेदारी प्रथा को खत्म किया जा सकता है या लोग ठेकेदारी पर काम ही न करें.’’

निजीकरण पर हसामुद्दीन को अपनी कालोनी के एक साथी दशरथ ठाकुर की बात याद आई. वे कहते हैं, ‘सरकारी मुलाजिम खुद इस के लिए जिम्मेदार हैं. जिस की नौकरी लग जाती है, वह खुद को सरकारी दामाद समझने लगता है.’

दशरथ ठाकुर रेलवे महकमे से रिटायर हो चुके हैं. हसामुद्दीन ने उन से एक बार पूछा था, ‘‘क्या रेलवे में सभी मुलाजिम काम नहीं करते हैं?’’

तब उन्होंने कहा था, ‘‘सरकारी मुलाजिम देरी से आता है और जल्दी घर चला जाता है.’’

हसामुद्दीन इस बारे में विचार करता है कि कैंटीन में चाय पीना, सिगरेट फूंकना या किसी से बात करने का मतलब यह नहीं है कि वह काम नहीं करता है. कुछ मुलाजिम कामचोर जरूर होते हैं, लेकिन उन्हें कड़ाई से दुरुस्त किया जा सकता है न कि उदारवादी लोककल्याणकारी व्यवस्था को बदल कर पूंजीवादी व्यवस्था लागू कर दिया जाए. अंगरेजी राज में भी तो सरकारी स्कूल थे. सरकारी रेलवे और डाक महकमे थे. तब वहां काम होता था, तो आज क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या केवल डर से ही लोग सही से काम करेंगे?

निजीकरण तो इस का कोई हल नहीं है.

फैक्टरी मालिक ग्रैच्युटी नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि नवउदारवादी नीति तो केवल टैंपरेरी नौकरी देने के पक्ष में है. आज बड़ेबड़े उद्योगों में भी टैंपरेरी नौकरियां ही दी जा रही हैं.

पूंजीपतियों के पक्षधर कहते हैं, ‘भाई, सभी को परमानैंट नौकरी नहीं दी जा सकती है…’ यह सोच हमारे समाज में तेजी से बढ़ाई गई है. पर लोग यह क्यों नहीं सोचते कि कोई पूंजीपति खुद पूंजीपति नहीं बनता है, उसे मजदूर और मुलाजिम पूंजीपति बनाता है. क्या पूंजीपति मजे नहीं करते हैं? उन के बच्चों की शादी में करोड़ों रुपए खर्च नहीं होते हैं?

खर्च करना गलत नहीं है, क्योंकि एक का खर्च होना भी तो अर्थशास्त्र में दूसरे की आमदनी है. सरकारी मुलाजिमों की आड़ में तो प्राइवेट कंपनियों में काम कर रहे मजदूरों, दूसरे मुलाजिमों के हकों को इन बीते दशकों में तेजी से हड़प लिया गया है.

7 लोग मिल कर यूनियन क्यों नहीं बना सकते हैं, जबकि धर्म को बचाने के लिए 4 लोग खड़े हो कर होहल्ला कर सकते हैं? कामगारों का हक क्या हक नहीं है? किसी कंपनी के मालिक ने किसी को रोजगार दे कर क्या उसे अपना गुलाम बना लिया है?

हसामुद्दीन को बस की सीढि़यों पर बैठे उस बड़े लड़के की याद आई, जिस के शरीर पर टैटू खुदे थे. क्या वे पैदाइशी थे या समाज ने ही उसे इतना धर्मभीरू बना दिया? अच्छेबुरे की परवाह न करते हुए उस ने अपने धर्म को ज्यादा अहमियत दी, लेकिन धर्म भी एक पदार्थ है… निकालने वाले तो उस में से अच्छीअच्छी चीजें निकाल कर अपनी जिंदगी संवार लेते हैं.

दूसरी तरफ सांप्रदायिक और धार्मिक अवसरवादी तत्त्व हैं, जो ऐसे लड़कों का इस्तेमाल हैं, क्योंकि धर्मभीरूता और पक्षधरता तो हर आदमी में होती है, लेकिन सांप्रदायिकता उस के अनुपात को बढ़ा देती है.

वे दोनों लड़के भयमुक्त लग रहे थे, लेकिन उन्हें भी भूख और प्यास लगती है. उन्होंने बस में कुछ लोगों को धमकाया भी था.

आदमी में डर होता है, पर जिसे सजा का डर न हो तो वह भयमुक्त हो जाता है या व्यवस्था ही अमानवीय हो जाए, तब आदमी का डर खत्म हो जाता है. अगर आदमी की जीने की चाह ही मर जाए, तब भी आदमी को डर नहीं लगता है.

कालोनी के साथी दशरथ ठाकुर को अब सरकारी नौकरियों में कमियां नजर आती हैं, जबकि वे खुद सरकारी मुलाजिम थे. उन का पैर रेल से कट गया था. रेलवे ने उन्हें अपने महकमे में दूसरा काम दिया, उन का इलाज करवाया. यहां तक कि नकली पैर भी लगवाया. उन की रेलवे की पैंशन है, पर प्राइवेट सैक्टर में काम कर रहे कामगारों के साथ होने वाले हादसों में मालिक उन्हें बाहर का रास्ता ही दिखा देते हैं.

इतने में हसामुद्दीन को कंडक्टर की आवाज सुनाई देने लगी, ‘‘अरे भाई, बस खाली कर दो…’’

बस मिंटो रोड तक पहुंच गई थी. हसामुद्दीन बस से उतर कर मिंटो ब्रिज से होता हुआ रीगल सिनेमा की तरफ चल दिया. Long Hindi Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें