खिलाड़ियों के खिलाड़ी : मीनाक्षी की जिंदगी में कौन था आस्तीन का सांप – भाग 2

मीनाक्षी अपने प्लान में कामयाब हो रही थी. वह पूरी तैयारी के साथ यहां पर आई थी. उस ने विशाल कुमार से हुई पहली मुलाकात में ही उस की नजरों में छलकती उस की ‘खास मंशा’ को भांप लिया था. कहते हैं कि औरतों में ‘सिक्स्थ सैंस’ भी होता है जो पुरुष की आंखों के भावों को अनायास ही समझ लेता है.

मीनाक्षी ने अपने बालों में लगे गजरे के बीच एक ‘हाई पावर माइक्रो कैमरा’ छिपाया था जिस का आकार हेयरपिन की तरह था. पहले जाम टकराए, मीनाक्षी ने बड़े प्यार से विशाल को दोएक जाम ज्यादा पिला दिए और स्वयं बेसिन में हाथ धोने के बहाने अपना प्याला खाली कर देती. इस के बाद डिनर हुआ और डिनर के बाद दोनों बैडरूम में पहुंच गए.

नशे में धुत विशाल भूखे भेड़िए की तरह उस पर टूट पड़ा था. मीनाक्षी ने बहुत ही सावधानी से शूटिंग कर ली. फिर बाथरूम जाने का बहाना बना कर कैमरेरूपी हेयरपिन को अपने पर्स में संभाल कर रख दिया.

मीनाक्षी विजयी मुद्रा में देररात अपने घर पहुंची. 2 ही दिनों के बाद विशाल का फोन आ गया कि उस ने डीआईजी से बात कर ली है. अरुण नाईक की जल्दी ही रिहाई हो जाएगी. डीआईजी के प्रमोशन के लिए विशाल ने ही मुख्यमंत्री से सिफारिश की थी, इसलिए उसे यकीन था कि डीआईजी उस का यह काम जरूर कर देंगे. डीआईजी को भी विशाल के उपकारों का कर्ज उतारना था, उन्होंने विशाल का काम कर दिया और कुछ ही दिनों में अरुण नाईक जेल से रिहा हो गया.

अपने पति की रिहाई के एक दिन बाद विशाल ने मीनाक्षी को फोन किया, ‘मीनाक्षी तुम्हारा काम हो गया है न, मुझे धन्यवाद देने नहीं आओगी?’

‘आऊंगी न सर, जरूर आऊंगी. आप ने जो काम किया है उस का दाम भी तो चुकाना पड़ेगा न,’ मीनाक्षी ने हंसते हुए कहा.

‘ठीक है, कल शाम को आ जाना. हम तो तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. मीनाक्षी, तुम ने तो हम पर जादू कर दिया है,’ खुशी से उछलते हुए विशाल ने कहा.

विशाल और मीनाक्षी की दोस्ती गहरी होती जा रही थी जिस का पूरापूरा फायदा अरुण नाईक उठा रहा था. वह अपनी रिहाई के बाद शहर में सांड की तरह घूमने लगा और छोटेमोटे अपराध करने शुरू कर दिए. अरुण नाईक को भी यह यकीन हो गया था कि अब मीनाक्षी अपनी पहुंच से उस को बचा लेगी. उधर मीनाक्षी ने विशाल के साथ अपनी खास दोस्ती का फायदा उठाना शुरू कर दिया. अब उस का उठनाबैठना हाई सोसाइटी में होने लग गया था. वह अफसर या किसी भी मंत्री की केबिन में सहज शिरकत कर सकती थी. मगर विशाल इस बात से अनजान था.

एक दिन विशाल ने बातोंबातों में मीनाक्षी से कहा, ‘मीनाक्षी, चीफ सैक्रेटरी का मेरा प्रमोशन अटका हुआ है. मेरी फाइल उन के पास पड़ी हुई है. फिर आजकल मुख्यमंत्री महोदय मु?ा से नाराज चल रहे हैं. एक बार मैं तुम्हें उन से इंट्रोड्यूस करवाना चाहता हूं. क्या तुम उन से मिलना चाहोगी? एक बार उन से तुम्हारी दोस्ती हो जाएगी तो तुम्हें आगे बहुत फायदा होता रहेगा और मेरी फाइल भी…’

विशाल अपनी बात समाप्त करे इस से पहले मीनाक्षी मुसकराते हुए बोली, ‘सम?ा गई विशाल, मैं और किसी के लिए नहीं पर तुम्हारे लिए उन से जरूर मिलूंगी.’ यह कहते हुए वह विशाल की बांहों में ?ाम गई.

मीनाक्षी को यह पता था कि 2-3 साल पहले मुख्यमंत्री की पत्नी का निधन हो गया था, उन का एक ही बेटा है जो यूएस में पढ़ाई कर रहा है. मुख्यमंत्री अकेले ही रहते हैं. एक दिन विशाल ने अपने जन्मदिन की छोटी सी पार्टी में मुख्यमंत्री से मीनाक्षी की मुलाकात करवा दी. विशाल ने देखा कि मुख्यमंत्री मीनाक्षी को ऐसे देख रहे थे मानो वे नजरों से ही उसे निगल जाएंगे. विशाल के चेहरे पर मुसकान की एक महीन लकीर फैल गई. कुछ ही दिनों बाद मीनाक्षी और मुख्यमंत्री में मुलाकातें बढ़ने लगीं. मीनाक्षी ने मुख्यमंत्री पर अपने हुस्न का ऐसा जादू किया कि 4 दिनों में ही विशाल राज्य का चीफ सैक्रेटरी बन गया.

अपने प्रमोशन से अपार खुश विशाल तो अब मीनाक्षी की उंगलियों पर नाचने लगा था. वहीं, मीनाक्षी के पास वीडियोरूपी दोचार ब्रह्मास्त्र थे जिन का उपयोग वह आपातकालीन हालात में कर सकती थी.

एक दिन मीनाक्षी ने विशाल को फोन किया. ‘हैलो विशाल, कौंग्रेचुलेशन. पार्टी कब दे रहे हो?’

‘थैंक्यू मीनाक्षी, तुम ने तो कमाल कर दिया. जो फाइल 6 महीने तक नहीं हिल रही थी, उसे तुम ने 6 दिनों में निबटा दिया. ग्रेट जौब, तुम बताओ पार्टी कब चाहिए?’

‘शुभस्य शीघ्रम. कल ही हो जाए.’

‘व्हाई नौट, मीनाक्षी.’

अब तो मीनाक्षी की आएदिन पार्टियां हो रही थीं. कभी किसी अफसर के साथ तो कभी किसी मंत्री के साथ, कई बार मुख्यमंत्री भी उसे अपने बंगले पर बुला लेते. अब मीनाक्षी का रहनसहन बदल गया था. अरुण नाईक ने भी महसूस किया कि मीनाक्षी के बरताव में अब बदलाव आ रहा है, मगर उस ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वह तो अपनी अपराध की दुनिया में निश्ंिचत हो कर मौजमस्ती लूटने में मशगूल था. उसे पता था कि अब मीनाक्षी की पहुंच मुख्यमंत्री तक है, तो उस का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

मगर इधर मीनाक्षी के दिमाग में अलग खिचड़ी पक रही थी. वह अब अरुण की करतूतों से तंग आ चुकी थी. उस के छोटेमोटे अपराधों के कारण जबजब उसे जेल हो जाती थी या उस पर मुकदमा चलता था तबतब उसे छुड़ाने के लिए उसे कभी किसी पुलिस के आला अफसर या मंत्री के साथ हमबिस्तर होना पड़ता था. एक दिन उस ने अपने मन की बात विशाल को बताई कि वह अरुण से अब दूर होना चाहती है. उस के आपराधिक जीवन से अब उसे घृणा हो गई है. विशाल कुमार की मदद से उस ने एक योजना बनाई कि किसी मुठभेड़ में फर्जी एनकाउंटर से अरुण का सफाया कर दिया जाए.

पहले तो विशाल ने इस के लिए स्पष्ट रूप से मना कर दिया, पर मीनाक्षी ने जब उसे एक वीडियो क्लिप की झलक दिखाई तो उस के पसीने छूट गए. वह घबरा कर बोला, ‘मीनाक्षी, यह वीडियो तुम ने कब  शूट किया?’

मीनाक्षी ने मुसकराते हुए कहा, ‘जनाब, यह तो अपनी पहली मुलाकात का वीडियो है. ऐसे और भी वीडियो मेरे पास हैं. इसलिए, तुम मेरे रास्ते से अरुण को हटाने का इंतजाम कर दो, वरना ये वीडियो वायरल करने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगेगा.’

पोर्न स्टार : क्या सुहानी को खूबसूरती के कारण जॉब मिली?- भाग 3

कुछ दिनों के बाद देश में चुनावी माहौल गरमाने लगा था. सभी नेता अपनेअपने वोट बैंक को भुनाने में लगे हुए थे. एक शाम सुहानी को 2 बहुत ही खास लोगों का ध्यान रखने और मन बहलाने के लिए बुलाया गया. इन दोनों लोगों में से एक नेता मुसलिम पार्टी का कोई बड़ा नेता था और देश के पिछड़ेगरीब मुसलमानों का रहनुमा कहलाता था और दूसरा नेता किसी हिंदूवादी पार्टी से जुड़ा था. दोनों ही लोगों के चेहरे पर अधपकी दाढ़ी थी.

सुहानी उन दोनों को एकसाथ ऊपर के  कमरे में ले गई और बोली, “आप दोनों तो अलगअलग समुदाय और अलगअलग राजनीतिक पार्टी से आते हैं और आप दोनों में बड़ा मतभेद भी है, तो फिर यहां आप दोनों एकसाथ कैसे?”

“अरे मैडम, वे सब मतभेद तो बाहर की भोलीभाली जनता को बेवकूफ बनाने के लिए हैं, असल में हम दोनों हर काम एकदूसरे की सलाह के बिना नहीं करते हैं,” खीसे निपोरते हुए हिंदूवादी नेता बोला, जबकि मुसलिम नेता मुसकराते हुए अपने चश्मे को साफ कर रहा था.

“तो क्या आप दोनों यहां भी एकसाथ ही निबटेंगे या अलगअलग?” सुहानी ने कहा.

“हम तो आप को पहले ही बता चुके हैं कि हम दोनों अपने सारे काम एकसाथ ही करते है, इसलिए यहां भी… एकसाथ ही,” बेशर्मी से मुसलिम नेता बोला.

दोनों विरोधी दल के नेता सुहानी के साथ सभी मतों पर सहमत हो रहे थे और उस के साथ रंगीली रात का मजा लूट रहे थे. उन दोनों का आपस में ऐसा प्यार देख कर सुहानी भी मुसकराए बिना न रह सकी.

ऐसे न जाने कितने ही लोग सुहानी की जिंदगी में आते गए जिन में से बहुत से लोगों से सुहानी को वक्तीतौर पर लगाव भी हो गया और जिन से उस ने बाद में भी मुलाकातें जारी रखीं.

आज सुबह से सुहानी को कुछ उबकाइयां सी आ रही थीं. डाक्टर को दिखाया तो उलटा उस ने बधाई देनी शुरू कर दी, “बधाई हो, आप मां बनने वाली हैं.”

डाक्टर के ये शब्द सुन कर सुहानी के पैरों तले जमीन खिसक गई.

‘अगर कोई आदमी कंडोम नहीं लाता था, तो मैं उसे खुद कंडोम देती थी, फिर यह धोखा कब और कैसे हो गया… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है,’ सुहानी सोचविचार के भंवर में उलझ गई. पहलेपहल तो उस ने बच्चे को गिराना चाहा, पर डाक्टरों ने उसे कुछ मैडिकल पेचीदगियों का हवाला दे कर ऐसा न करने की सलाह दी.

काफी सोचने के बाद सुहानी के मन में भी इस बच्चे को जन्म देने की भावना ने जन्म लिया और उस ने निश्चय कर लिया कि वह बच्चे को जन्म देगी और उस के बाद एक सामान्य और शांत जिंदगी जीने की कोशिश करेगी, पर ऐसा करने में एक समस्या आ रही थी कि दिल्ली आने के बाद सुहानी ने जो भी पैसे कमाए थे, उन्हें उस ने अपने साजसिंगार, मकान के किराए, गाड़ी के खर्च वगैरह पर खुले हाथों से लुटाया था और अब एक बच्चे को जन्म दे कर उस का खर्चा उठा पाने की ताकत सुहानी के पास नहीं थी, क्योंकि बच्चे को जन्म देने के कुछ सालों तक उस की कमाई बंद हो जाएगी और बच्चे की देखरेख के लिए उसे एक नर्स भी रखनी पड़ेगी. पर इतना सारा पैसा कहां से आएगा? यह सवाल भी सुहानी के सामने मुंहबाए खड़ा था.

कई दिन तक काम पर न जाने के बाद एक दिन सुहानी ने सोचा कि क्यों न वह उन लोगों से कुछ पैसे मांग ले जो पिछले कुछ समय में उस के संपर्क में आए हैं. ऐसा सोच कर सुहानी ने फोन कर के कई लोगों से मदद मांगी.

लोग सुहानी से पहले तो अच्छी तरह से रसीली बात करते, पर जैसे ही वह पैसे की बात कहती तो वे कन्नी काट जाते. कुछ लोगों ने तो सुहानी को कई तरह की राय देनी भी शुरू कर दीं कि उसे अपने खर्चे सीमित कर के आमदनी के साधनों को बढ़ाना होगा.

मर्द कितने स्वार्थी होते हैं, यह सुहानी को आज पता लग रहा था. क्या ये वही लोग थे जो सुहानी को रातरात भर अपनी बांहों में लिए पड़े रहते थे और आज उस की मदद करने से कतरा रहे हैं?

सुहानी ने अपने बौस से उसे मैटरनिटी लीव और कुछ एडवांस के लिए बात की, तो एडवांस देना तो बहुत दूर उलटा बौस ने उसे नौकरी छोड़ने को ही कह दिया, क्योंकि उन्हें तो अपने यहां सिर्फ कुंआरी लड़कियों की ही जरूरत होती है.

आज पहली बार सुहानी का मन भर आया था. एक समय था कि उस के पास फालतू खर्चे के लिए भी काफी पैसे हुआ करते थे, पर आज जब वह अपने बच्चे को जन्म देना चाहती है, तो उस के पास पैसे ही नहीं हैं.

सुहानी को अपना घर याद आने लगा. वे मांबाप उस की नजरों के सामने घूमने लगे, जिन्हें वह अकेला छोड़ आई थी. सुहानी का मन कर रहा था कि उस के मांबाप यहां आ कर उसे अपने गले से लगा लें और कहें कि चलो जो हुआ सो हुआ अब आगे से कोई गलती मत करना और हमें अकेले छोड़ कर कभी मत जाना. पर यह तो उस का एक ऐसा हसीन ख्वाब था, जो पूरा नहीं हो सकता. अब सुहानी के पास खुदकुशी करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था.

अभी सुहानी यह सोच ही रही थी कि तभी कमरे की घंटी बजी. सुहानी ने झल्ला कर पूछा, “कौन है?”

“जी मैडम, मैं जितेश…” यह नाम सुन कर सुहानी ने दरवाजा खोला, तो सामने जितेश खड़ा मुसकरा रहा था.

“उस दिन आप होटल की लौबी में काफी परेशान दिख रही थीं. मैं ने छिप कर आप की मोबाइल पर कई लोगों से होने वाली बातें भी सुन ली थीं और मैं यह समझ पाया हूं कि आप को पैसों की सख्त जरूरत है.

“मैडम, वैसे तो मेरी सैलरी बहुत कम है, पर फिर भी आप सही समझें तो मैं आप की मदद कर सकता हूं… बताइए आप को कितने पैसे चाहिए?”

जितेश के मुंह से ऐसी बातें सुन कर सुहानी की आंखें छलछला आईं. ऐसा पहली बार हो रहा था, जब कोई मर्द उस से बिना किसी लालच के कुछ दे रहा था.

“पर जितेश, तुम मेरी मदद क्यों करना चाहते हो?”

“क्योंकि मैं प्यार करता हूं आप से…हिचक के चलते कुछ कह नहीं पाया आप से. पर आज कह रहा हूं और यह भी कह रहा हूं कि मैं आप से शादी करना चाहता हूं.”

“पर तुम्हें तो पता है न मेरे काम के बारे में और फिर मैं एक बच्चे की मां भी बनने वाली हूं. ऐसे में तुम मुझे किस तरह अपना सकोगे?”

“जी मैडम… वह सब मुझे पता है, क्योंकि मैं ने आप की सारी बातें सुन ली थीं. बस, आप अपना फैसला सुना दो… हां या न?” जितेश ने पूछा.

सुहानी को पहली बार सही माने में प्यार मिल रहा था. उस ने आगे बढ़ कर जितेश के कंधे पर अपना सिर रख दिया.

अगले दिन ही जितेश और सुहानी बिना किसी को कुछ बताए सुहानी के शहर चले गए, क्योंकि जितेश चाहता था कि सुहानी अपने पहले बच्चे को अपने मायके में ही जन्म दे.

पोर्न स्टार : क्या सुहानी को खूबसूरती के कारण जॉब मिली?- भाग 2

“मेरी पत्नी तो बिस्तर पर भी शरमाती रहती है और अपने अंगों के साथसाथ अपना मुंह भी बंद किए रहती है, पर तुम ने जबरदस्त ढंग से मेरा साथ दिया है सुहानी… मैं ने आज तक तुम्हारी जैसी खुल कर सैक्स करने वाली लड़की नहीं देखी… तुम तो पोर्न स्टार को भी मात करती हो, इसलिए यह लो अपना इनाम,” यह कह कर बौस ने बड़े नोटों की एक गड्डी सुहानी की तरफ उछाल दी.

इतने सारे नोट देख कर सुहानी की आंखें खुशी से फैल गईं. यह पहला मौका था जब उस का कौमार्य भंग हुआ था और जिस के बदले उसे इतने सारे पैसे भी मिले थे.सुहानी ने इन पैसों से घर के लिए कई  जरूरी सामान खरीदे और अपने पापा को उन के शराब के शौक को जारी रखने के लिए पैसे भी दिए.

बेटी के इस तरह से अचानक खूब पैसे लाने पर मांबाप को खुशी भी हो रही थी और हैरानी भी. सुहानी की मां ने एक बार दबी जबान से पूछा भी तो उस के पापा ने यह कह कर चुप करा दिया, “अब सुहानी नौकरी करने लगी है, इसलिए अब पैसों की कमी थोड़े ही रहेगी हमें.”

कुछ दिन ही बीते थे कि सुहानी की कंपनी में एक विदेशी क्लाइंट आया. सुहानी को इस क्लाइंट को कंपनी के गैस्ट हाउस में छोड़ कर आने की जिम्मेदारी दी गई, जिसे सुहानी ने बखूबी निभाया भी.

उस विदेशी पर भी सुहानी ने अपने हुस्न का जादू चला दिया. गाड़ी से नीचे उतरते समय सुहानी के सीने पर उस क्लाइंट की कुहनी का दबाव बढ़ता चला गया. इस बात पर जहां सुहानी को विरोध करना चाहिए था, वह सिर्फ मुसकरा कर रह गई. इस के बाद तो आंखों ही आंखों में विदेशी क्लाइंट ने सुहानी से सैक्स करने का औफर दिया, जिसे सुहानी ने स्वीकार भी कर लिया. वह रातभर उस विदेशी के साथ रही और सुबह होते ही उस क्लाइंट से मुसकरा कर पैसे मांगने लगी, “माई फीस प्लीज…”

उस विदेशी ने भी सुहानी को उस की उम्मीद से कहीं ज्यादा पैसे दिए. सुहानी को यह सब काम बहुत अच्छा लग रहा था, क्योंकि उस के हुस्न की कीमत तो उसे अब मिल रही थी.

इस तरह से सुहानी को एक झटके में ही इतने पैसे मिल जाते थे, जितने औफिस में कई महीने सिर खपा कर भी नहीं मिलते थे, इसलिए सुहानी ने आने वाले 2-3 साल तक अपने बौस, कंपनी के मेहमानों और क्लाइंटों के साथ रात गुजारने का कोई मौका नहीं जाने दिया, जिस से उसे ढेर सारे पैसे मिले.

18 साल की सुहानी अब 21 साल की हो गई थी और उस का रंगरूप और भी खिल गया था. पर इन बीते सालों में अपनी बेटी के बदलते रंगढंग को देख कर सुहानी की मां को उस के चालचलन पर शक हो गया था, पर सुहानी के पापा को शराब के लिए रोज पैसे मिल रहे थे, इसलिए उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि सुहानी क्या काम कर के ये पैसे कमा रही है, लिहाजा जब भी सुहानी की मां उसे कुछ कहती तो पापा सुहानी को ही सपोर्ट करते.

“सुहानी, तू यह जोकुछ कर रही है न, वह सब अच्छा नहीं है.”

“अरे सुहानी की मां, अब हमारी बेटी बालिग हो चुकी है. वह अपने अच्छेबुरे का फैसला खुद कर सकती है, इसलिए हमें उस के काम में ज्यादा टांग नहीं अड़ानी चाहिए,” कह कर पापा मां को चुप करा देते.

पापा का सहारा मिलते देख सुहानी के मन को बल मिला, पर उस की इच्छाएं यहीं एक छोटे शहर तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वह तो अपनी खूबसूरती के बल पर नाम और पैसा दोनों कमाना चाहती थी और इस के लिए उसे एक बड़े प्लेटफार्म की जरूरत थी, जो उसे यहां छोटे शहर में नहीं मिलने वाला था.

पिछले 3 सालों की नौकरी में सुहानी का परिचय कई रसूख वाले लोगों से हो गया था. उन्हीं लोगों में से एक आदमी था जीत सिंह, जो दिल्ली पुलिस में एक बड़ा अफसर था और जब वह पिछली बार किसी काम से सुहानी की कंपनी में गया था, तो उस ने भी सुहानी के जिस्म को भोगा था, इसलिए जब सुहानी ने उस से दिल्ली में किसी जौब के बारे में पूछा, तो उस ने बताया कि अगर वह दिल्ली आ जाए तो उस के काम का दायरा तो बढ़ेगा ही, साथ ही आगे बढ़ने के मौके भी मिलते जाएंगे.

सुहानी अच्छी तरह जानती थी कि अगर उस ने दिल्ली जाने के बारे में  अपने मांबाप को बताया तो उसे कभी इजाजत नहीं मिलेगी, इसलिए उस ने एक रात को अपना सारा सामान पैक किया और अपने मांबाप को बिना कुछ बताए दिल्ली भाग गई.

दिल्ली पहुंच कर सुहानी ने जीत सिंह से मुलाकात की. जीत सिंह ने उसे अपने फ्लैट में रुकने की जगह दी.

यह एक फाइव स्टार होटल था, जहां सुहानी की नई जौब लगी थी. उस की नौकरी लगवाने में जीत सिंह का ही योगदान था. सुहानी यहां पर होस्टैस थी और वीआईपी मेहमानों का हर तरह से ध्यान रखना ही उस का खास काम था.

सुहानी ने यहां पर भी अपना जादू बिखेरना शुरू कर दिया था. सब से पहले वहां के मैनेजर ने सुहानी पर डोरे डालने शुरू कर दिए और वह उस को किसी न किसी बहाने छूने की कोशिश करने लगा. भला सुहानी को इस सब से क्या एतराज होने वाला था.

“सुहानी, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम्हारे साथ एक रात  बिताना चाहता हूं,” मैनेजर बेबाकी से कहता जा रहा था.

“हां, पर इस दुनिया में हर चीज की कीमत देनी पड़ती है,” सुहानी ने मुसकराते हुए कहा.

“मैं तुम्हारे लिए हर कीमत देने को तैयार हूं.”

“ठीक है तो 50,000 रुपए पेशगी के तौर पर तुम्हें अभी देने होंगे…”

“तुम पेशगी मांग रही हो?”

हां, क्योंकि मर्द और मौसम का मिजाज एकजैसा होता है… कब बदल जाए, कुछ भरोसा नहीं होता,” बेशर्मी दिखाते हुए सुहानी ने कहा.

मैनेजर ने तुरंत 50,000 रुपए का चैक सुहानी को पकड़ा दिया.

रात में जब सुहानी मैनेजर के कमरे में पहुंची, तो वह पूरी तरह से नशे में चूर था. सुहानी को देख कर वह उस पर टूट पड़ा और उसे बेतहाशा चूमने लगा. उस ने सुहानी के सारे कपड़े उतार दिए और उस के होंठों को चूमने लगा.

मैनेजर के हाथ जैसे ही सुहानी के सीने की ओर बढ़े, तो सुहानी उसे रोकते हुए बोली, “अगर इन्हें छूना है तो कीमत चुकानी होगी…”

“पर मैं तो तुम्हें एडवांस पहले ही दे चुका हूं…” मैनेजर बोला.

“हां, पर उस में इन दोनों कबूतरों की कीमत नहीं शामिल है. अगर तुम इन्हें पकड़ना चाहते हो तो 10,000 रुपए अलग से देने होंगे,” सुहानी ने कहा.

“तुम तो बहुत लालची हो… तुम्हारी कीमत में तो मैं एक पोर्न स्टार के साथ रात गुजार लेता,” मैनेजर ने कहा.

“तो क्या… मैं भी तो किसी पोर्न स्टार से कम नहीं और अब समय खराब मत करो, जो करना है जल्दी करो, मुझे देर हो रही है,” सुहानी ने कहा.

बेचारा मैनेजर अजीब हालत में था. सुहानी ने एक ऐसे समय उस से पैसे की डिमांड रखी थी, जब उस के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था. उस का जोश भी हद पर था, इसलिए उस ने अपने गले की सोने की मोटी चेन को निकाल कर सुहानी के हाथ में पकड़ा दिया और बड़ी बेदर्दी से अपने दोनों  हाथों को उस के सीने पर कस दिया.

मैनेजर की यह हालत देख कर सुहानी बिना मुसकराए न रह सकी. कुछ देर बाद मैनेजर की हवस शांत हो गई और वह निढाल हो कर एक ओर लुढ़क गया.

अब तो होटल में काम करने के बाद सुहानी तकरीबन हर रात नए लोगों के साथ हमबिस्तर होती. उन में से ज्यादातर लोग इस होटल में आए वीआईपी लोग थे. सुहानी कहीं न कहीं एक कालगर्ल में तबदील हो चुकी थी.

उसी होटल में काम करने वाला एक सुपरवाइजर जितेश, जिस की उम्र 25 साल थी, सुहानी के हर अच्छेबुरे काम पर नजर रख रहा था और उसे हैरानी भी होती थी कि सुहानी जैसी खूबसूरत, टैलेंटेड और सुशील सी दिखने वाली लड़की को भला इस तरह का गंदा काम करने की क्या जरूरत है? कई बार उस ने सुहानी से पूछना भी चाहा, पर सुहानी के रुतबे के आगे वह कुछ कह नहीं सका और मनमसोस कर रह गया.

अपनी ही दुश्मन : जिस्म और पैसे की भूखी कविता – भाग 2

भाभी का मुंह खुला का खुला रह गया. बोली, ‘‘कहीं और चक्कर तो नहीं चल रहा?’’

‘‘वह बौड़म क्या चक्कर चलाएगा भाभी, फैक्ट्री से आते ही बेदम हो कर पड़ जाता है. बिलकुल बेकार नौकरी है उस की.’’ कविता रोष में बोली, ‘‘2 दिन सुबह की शिफ्ट, फिर 2 दिन शाम की और 2 दिन रात की शिफ्ट.’’

‘‘तो तुझे क्या परेशानी है.’’ भाभी ने कविता को समझाया, ‘‘दामादजी की नईनई नौकरी है. मेहनत कर रहे हैं तो आगे जा कर लाभ मिलेगा.’’

‘‘भाभी, तुम नहीं समझोगी. एक तो वैसे ही फैक्ट्री के उलटेसीधे टाइमटेबल हैं, ऊपर से मोनू को संभालने के लिए इतना वक्त देना पड़ता है. इस सब से ऊब गई हूं मैं. बिलकुल नीरस जिंदगी है, किस से कहूं. क्या कहूं?’’

भाभी आश्चर्य से देखती रह गईं. वह समझ कर भी कुछ नहीं समझ पा रही थीं. 5 फुट 5 इंच लंबी, इकहरे बदन और तीखे नैननक्श वाली उस की ननद कविता में कुछ ऐसा आकर्षण था कि उस के मोहपाश में कोई भी बंध सकता था. सुरेश के साथ भी यही हुआ था.

उस ने छत पर कई बार कविता और सुरेश को नैनों के दांवपेंच लड़ाते देखा था. इस के बाद उस ने ही दादी को समझाबुझा कर सुरेश और कविता की शादी करा दी थी. सुरेश था तो उस के पति का सहपाठी, पर कविता के चक्कर में उन्हीं के घर में घुसा रहता था.

काफी भागदौड़ के बाद सुरेश को एक कंपनी में नौकरी मिली थी. कंपनी की तरफ से ही रहने का भी इंतजाम हो गया था. कविता की नाजायज मांगों के लिए वह अपनी नौकरी खतरे में कैसे डाल सकता था. भाभी कविता की मांग सुन कर हैरत में रह गईं. सुरेश भला उस की चांदतारों की मांग के लिए रोजीरोटी की फिक्र कैसे छोड़ सकता था.

‘‘क्या सोच रही हो भाभी, बडे़ भैया तो अभी भी तुम्हारे आगेपीछे घूमते हैं.’’ भाभी को चुप देख कर कविता ने हल्के व्यंग्य में कहा, ‘‘अच्छा हुआ जो तुम ने अभी बच्चे का बवाल नहीं पाला. अभी तो खूब मौजमजे की उम्र है.’’

कविता की बात का कोई जवाब दिए बिना भाभी सोचने लगी, ‘जब तक दादी जिंदा हैं, पूरा परिवार एक डोर में बंधा है, बाद में तो सब को अलगअलग ही हो जाना है. कविता अपना घर छोड़ कर आ गई तो सब के लिए मुसीबत बन जाएगी. अपनी आधी पढ़ाई छोड़ कर शादी के मंडप में बैठ गई थी और अब बच्चे को उठा कर चली आई, वह भी यह सोच कर कि अब वापस नहीं जाएगी. जरूर इस का कुछ न कुछ इलाज करना पड़ेगा.’

‘‘कहां खो गईं भाभी,’’ कविता ने भाभी की आंखों के सामने हाथ हिलाते हुए कहा, ‘‘बड़के भैया की रोमांटिक यादों में खो गईं क्या?’’

‘‘नहीं, तुम्हारे बारे में सोच रही थी. तुम मोनू की वजह से परेशान हो न, ऐसा करो उसे यहीं छोड़ जाओ, हम पाल लेंगे. बस आगे से सावधानी रखना कि कहीं मोनू का भैया न आ जाए. रही बात सुरेश की तो उन की ड्यूटी दिन की हो या रात की, बाकी वक्त तुम्हारे साथ ही रहेंगे, तुम्हारे पास. समय बचे तो अपना ग्रैजुएशन पूरा कर लेना. तुम भी व्यस्त हो जाओगी.’’

भाभी की राय कविता को जंच गई. बात चली तो यह सुझाव घर में भी सब को पसंद आया. बहरहाल 2 दिनों बाद कविता मोनू को मायके में छोड़ कर सुरेश के पास चली गई. उस के जाने से सभी ने राहत की सांस ली.

देखतेदेखते 5 साल गुजर गए. इस बीच कविता कानपुर छोड़ कर लखनऊ आ गई. वहां उसे एक सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई थी. मोनू को भी उस ने अपने पास बुला लिया था. सुरेश शनिवार को उस के पास आता और रविवार को उस के साथ रह कर सोमवार सुबह वापस लौट जाता.

अकेली रहने की वजह से कविता के पंख फड़फड़ाने लगे. नया शहर, नई मित्र मंडली, किसी की कोई रोकटोक नहीं. बड़े लोगों से संपर्क बने तो वह पार्टियों में भी जाने लगी. मोनू की वजह से उसे नाइट पार्टियों में जाने में परेशानी होती थी, इसलिए उसे संभालने के लिए उस ने एक नौकर रख लिया.

कविता का सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन उस की जिंदगी में खलल तब पड़ा, जब सुरेश एक दिन दोपहर में आ गया. दरअसल उस दिन मंगलवार था और लखनऊ में उसे एक दोस्त की शादी में शामिल होना था. वैसे भी उस दिन कोई छुट्टी नहीं थी. उस ने सोचा था कि अचानक पहुंच कर कविता को सरप्राइज देगा. लेकिन दांव उलटा पड़ गया. ड्राइंगरूम में खुलने वाला दरवाजा खुला हुआ था. ड्राइंगरूम में खिलौने बिखरे पड़े थे. उन्हें देख कर लग रहा था कि मोनू खेल से बोर हो कर कहीं बाहर चला गया है. यह भी संभव हो कि वह मां के पास अंदर हो.

अंदर बैडरूम का दरवाजा वैसे ही भिड़ा हुआ था. अंदर से हंसनेखिलखिलाने की आवाजें आ रही थीं. सुरेश ने दरवाजे को थोड़ा सा खोल कर अंदर झांका. भीतर का दृश्य देख कर वह सन्न रह गया. बेशर्मी, बेहयाई और बेवफाई की मूरत बनी नग्न कविता परपुरुष की बांहों में अमरबेल की तरह लिपटी हुई पड़ी थी. पत्नी को इस हाल में देख कर सुरेश की आंखों में खून उतर आया. उस का मन कर रहा था कि वहीं पड़ा बैट उठा कर दोनों के सिर फोड़ दे.

‘‘पापा, पापा आ गए.’’ बाहर से आती मोनू की आवाज उस के कानों में पड़ी. कुछ नहीं सूझा तो उस ने झट से बैडरूम का दरवाजा बंद कर दिया. उसी वक्त अंदर से कुंडी लगाने की आवाज आई. यह काम शायद कविता ने किया होगा. सुरेश धीरे से बड़बड़ाया, ‘‘कमबख्त को बच्चे का भी लिहाज नहीं.’’

‘‘पापा, खेलने चलें.’’ मोनू ने सुरेश के पैर पकड़ कर इस तरह खींचते हुए कहा, जैसे उसे मम्मी से कोई मतलब ही न हो.

अब सुरेश की समझ में आ रहा था कि कविता उसे बौड़म क्यों कहती थी. सब कुछ उस की नाक के नीचे चलता रहा और वह उस पर विश्वास किए बैठा रहा. सचमुच बौड़म ही था वह. किराए का ही सही, महंगा घर, शानदार परदे, उच्च क्वालिटी की क्रौकरी, ब्रांडेड कपड़े, मोनू का महंगा स्कूल. सब कुछ कैसे मैनेज करती होगी कविता, उस ने कभी सोचा ही नहीं. यहां तक कि अभी अंदर आते वक्त उस ने दीवार के साथ खड़ी लाल रंग की आलीशान कार देखी थी, उस पर भी ध्यान नहीं दिया था उस ने. सुरेश सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया.

‘‘पापा, पापा खेलने चलें.’’ कहते हुए मोनू ने उस की टांगें हिलाईं. लेकिन वह जड़वत बैठा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे. अब तो उस के मन में यह सवाल भी उठ रहा था कि वह मोनू का पिता है या नहीं?

‘‘तुम खेलने जाओ, मैं अभी आता हूं.’’ दुखी मन से कहते हुए उस ने मोनू को बाहर भेज दिया.

सुरेश ने घड़ी देखी तो शाम के 4 बज रहे थे. सोचविचार कर उस ने कविता को उस के हाल पर छोड़ कर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया. उस ने 4 लाइनों का पत्र लिखा, ‘मैं ने तुम्हारा असली चेहरा देख लिया है. तुम्हारे खून से हाथ रंग कर मुझे क्या मिलेगा? मुझे यह भी नहीं पता कि मोनू मेरा बेटा है या किसी और का? लेकिन तुम्हें अब कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. क्योंकि मैं तुम्हें अपनी जिंदगी से निकाल कर खुली हवा में सांस लेना चाहता हूं’

सुरेश ने अपना बैग उठाया और वापस लौट गया. कभी वापस न लौटने के लिए. उस दिन से सुरेश कविता की जिंदगी से निकल गया और उस की जगह दरजनों मर्द आ गए. कविता को सुरेश के जाने का कोई गम नहीं हुआ. उस ने चैन की सांस ली. अब वह आजाद पंछी की तरह थी.

आजकल वह जिस आखिलेंद्र से पेंच लड़ा रही थी, वह व्यवसायी था और उस का पूरा परिवार लंदन में रहता था. वहां भी उन का बड़ा बिजनैस था. परिवार के कुछ लोग जरूर लखनऊ में पुश्तैनी घर में रहते थे. अखिलेंद्र उन से चोरीछिपे कविता के पास जाता था. उस के रहते उसे सुरेश की कोई चिंता नहीं थी.

धीरेधीरे कविता ने गोमतीनगर जैसे महंगे इलाके में घर ले लिया और कार भी. उस ने ड्राइविंग भी सीख ली. अखिलेंद्र चूंकि कभीकभी ही आता था और उस का लंदन आनाजाना भी लगा रहता था, इसलिए कविता ने कुछ और चाहने वाले ढूंढ लिए थे. स्कूल में वह प्रधानाध्यापक नवलकिशोर के सामने अपने सिंगल पैरेंट्स होने का रोना रोती रहती थी. कितनी ही बार वह आधे दिन की छुट्टी ले कर स्कूल से निकल जाती थी. तब तक मोनू 10 साल का हो गया था.

उस दिन कविता ने बेटे की बीमारी का रोना रो कर नवलकिशोर को 2 दिनों की आकस्मिक छुट्टी की अरजी दी थी. लेकिन अचानक ही उन्होंने उस के बेटे को देखने की इच्छा जाहिर करते हुए उस के घर चलने की इच्छा जाहिर कर दी. कविता किस मुंह से मना करती. उस ने हां कर दी. नवलकिशोर की नजर काफी दिनों से कविता पर जमी थी. वह उन्मुक्त पक्षी जैसी लगती थी, इसीलिए वह उस की हकीकत जानने को उत्सुक थे.

इसी को कहते हैं जीना : कैसा था नेहा का तरीका -भाग 2

अभी हम फाइलें देख ही रहे थे कि ललिताजी वापस चली आईं और अपने साथ नेहा को भी लेती आई थीं.

‘‘बहुत तेज बुखार है इसे. मैं साथ ही ले आई हूं. बारबार उधर भी तो नहीं न जाया जाता.’’

ललिताजी नेहा को दूसरे कमरे में सुला आई थीं और अब शर्माजी को समझा रही थीं,  ‘‘देखिए न, अकेली बच्ची वहां पड़ी रहती तो कौन देखता इसे. बेचारी के मांबाप भी दूर हैं न…’’

‘‘दूर कहां हैं…हम हैं न उस के मांबाप…हर शहर में हमारी कम से कम एक औलाद तो है ही ऐसी जिसे तुम ने गोद ले रखा है. इस शहर में नहीं थी सो वह कमी भी दूर हो गई.’’

‘‘नाराज क्यों हो रहे हैं…जैसे ही बुखार उतर जाएगा वह चली जाएगी. आप भी तो बीमार हैं न…आप का खानापीना भी देखना है. 2-2 जगह मैं कै से देखूं.’’

मैं ने भी उसी पल उन्हें ध्यान से देखा था. बहुत ममतामयी लगी थीं वह मुझे. बहुत प्यारी भी थीं.

लगभग 4 घंटे उस दिन मैं शर्माजी के घर पर रहा था और उन 4 घंटों में शर्मा दंपती का चरित्र पूरी तरह मेरे सामने चला आया था. बहुत प्यारी सी जोड़ी है उन की.  ललिताजी तो ऐसी ममतामयी कि मानो पल भर में किसी की भी मदद करने को तैयार. शर्माजी पत्नी की इस आदत पर ज्यादातर खुश ही रहते.

मेरे साथ भी मां जैसा नाता बांध लिया था ललिताजी ने. सचमुच कुछ लोग इतने सीधेसरल होते हैं कि बरबस प्यार आने लगता है उन पर.

‘‘देखो बेटा, मनुष्य को सदा इस  भावना के साथ जीना चाहिए कि मेरा नाम कहीं लेने वालों की श्रेणी में तो नहीं आ रहा.’’

‘‘मांजी, मैं समझा नहीं.’’

‘‘मतलब यह कि मुझे किसी का कुछ देना तो नहीं है न, कोई ऐसा तो नहीं जिस का कर्ज मेरे सिर पर है, रात को जब बिस्तर पर लेटो तब यह जरूर याद कर लिया करो. किसी से कुछ लेने की आस कभी मत करो. जब भी हाथ उठें देने के लिए उठें.’’

मंत्रमुग्ध सा देखता रहता मैं  ललिताजी को. जब भी उन से मिलता था कुछ नया ही सीखता था. और उस से भी ज्यादा मैं यह सीखने लगा था कि नेहा के करीब कैसे पहुंचा जाए. नेहा अपना कोई न कोई काम लिए ललिताजी के पास आ जाती और मैं उस के लिए कुछ सोचने लगता.

‘‘बहुत अच्छी लड़की है, पढ़ीलिखी है, मेरा जी चाहता है उस का घर पुन: बस जाए.’’

‘‘मांजी, उस का पति वापस आ गया तो. ऐसी कोई तलाक जैसी प्रक्रिया तो नहीं गुजरी न दोनों में. पुन: शादी के बारे में कैसे सोचा जा सकता है.’’

शर्माजी के घर से शुरू हुई हमारी जानपहचान उन के घर के बाहर भी जारी रही और धीरेधीरे हम अच्छे दोस्त बन गए.

ललिताजी से मिलना कम हो गया और हर शाम मैं और नेहा साथसाथ रहने लगे. मार्च का महीना था जिस वजह से आयकर रिटर्न का काम भी नेहा ने मुझे सौंप दिया. कभी नया राशन कार्ड बनाना होता और कभी पैन कार्ड का चक्कर. उस के घर की किस्तें भी हर महीने मेरे जिम्मे पड़ने लगीं. 2-3 महीने में नेहा के सारे काम हो गए. कभीकभी मुझे लगता, मैं तो उस का नौकर ही बन गया हूं.

कुछ दिन और बीते. एक दिन पता चला कि ललिताजी को भारी रक्तस्राव की वजह से आधी रात को अस्पताल में भरती कराना पड़ा. शर्माजी छुट्टी पर चले गए. उन के  बच्चे दूर थे इसलिए उन्हें परेशान न कर वह पतिपत्नी सारी तकलीफ खुद ही झेल रहे थे.

मेरा परिवार भी दूर था सो कार्यालय के बाद मैं भी अस्पताल चला आता था, उन के पास.

नेहा अस्पताल में नहीं दिखी तो सोचा, हो सकता है वह ललिताजी का घर संभाल रही हो. ललिताजी का आपरेशन हो गया. मैं छुट्टी ले कर उन के आसपास ही रहा. नेहा कहीं नजर नहीं आई. एक दिन शर्माजी से पूछा तो वह हंस पड़े और बताने लगे :

‘‘जब से तुम उस के काम कर रहे हो तब से वह मुझ से या ललिता से मिली कब है, हमें तो अपनी सूरत भी दिखाए उसे महीना बीत गया है. बड़ी रूखी सी है वह लड़की.’’

मुझ में काटो तो खून नहीं. क्या सचमुच नेहा अब इन दोनों से मिलती- जुलती नहीं. हैरानी के साथसाथ अफसोस भी होने लगा था मुझे.

ललिताजी अभी बेहोशी में थीं और शर्माजी उन का हाथ पकड़े बैठे थे.

एक नई दिशा : क्या अपना मुकास हासिल कर पाई वसुंधरा – भाग 2

मैडम की बातें सुन कर वसुंधरा, जो इतने दिनों से घुट रही थी, फफक कर रो पड़ी. उसे रोते देख कर मैडम ने घबरा कर कहा, ‘क्यों, क्या हुआ? घर पर सब ठीक तो है?’

वसुंधरा ने रोतेरोते सारी बात मैडम को बता दी. उस की बातें सुन कर मैडम स्तब्ध रह गईं. इनसान की मजबूरी उसे कैसेकैसे कदम उठाने पर मजबूर कर देती है. काफी देर तक वह विचार करती रहीं. सहसा उन का मन उस के पिता से मिलने को करने लगा. हालांकि उस के पिता से मिलना उन्हें खुद बड़ा अटपटा लग रहा था लेकिन वसुंधरा को बरबादी से बचाने के लिए उन का मन बेचैन हो उठा.

‘तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे पिताजी से इस विषय में बात करूंगी. कल रविवार है, उन से कहना कि मैं उन से मिलना चाहती हूं. बस, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो,’ मैडम ने वसुंधरा की पीठ थपथपाते हुए कहा.

वसुंधरा खुश हो कर सहमति से सिर हिलाते हुए चली गई.

दीनानाथ रविवार के दिन ममता मैडम के घर मिलने आ गए. उन के पति नीरज भी वहां पर मौजूद थे. चाय के बाद उन्होंने वसुंधरा के लिए आए रिश्ते के बारे में बातचीत शुरू की, ‘यह तो हमारा अहोभाग्य है कि ऐसा बड़ा घर हमें अपनी लड़की के लिए मिल रहा है.’

मैडम ने तमक कर कहा, ‘घर तो आप की बेटी के लिए अवश्य अच्छा मिल रहा है लेकिन आप ने वर के बारे में कुछ सोचा कि वह क्या करता है? कितना पढ़ा लिखा है? उस की आदतें कैसी हैं?’

तब वह अति दयनीय स्वर में बोले, ‘मैडम, आप तो हमारे समाज के चलन को जानती हैं. अच्छेअच्छे घरों के रिश्ते भी दहेज के कारण नहीं हो पाते. फिर मैं अभागा 4 बेटियों का बाप कैसे यह दायित्व निभा पाऊंगा? वह परिवार मुझ से कुछ दहेज भी नहीं मांग रहा है. बस, लड़का थोड़ा बिगड़ा हुआ है. पर मुझे भरोसा है कि वसुंधरा उसे संभाल लेगी.’

‘उसे जब उस के मातापिता नहीं संभाल पाए तो एक 20 साल की लड़की कैसे संभाल लेगी?’ अचानक मैडम कड़क आवाज में बोलीं, ‘आप वसुंधरा की शादी हरगिज वहां नहीं करेंगे. वह उसे दुख के सिवा और कुछ नहीं दे सकता. आप उस परिवार की ऊपरी चमकदमक पर मत जाएं.’

वह लाचारी से खामोश बैठे रहे. मैडम अपने स्वर को संयत करते हुए उन्हें समझाने लगीं, ‘वसुंधरा एक मेधावी छात्रा है. उम्र भी कम है. शादी एक आवश्यकता है मगर मंजिल तो नहीं. उसे पढ़ने दीजिए. प्रतियोगिताओं में बैठने का अवसर दीजिए. एक अच्छी नौकरी लगते ही रिश्तों की कोई कमी उस के जैसी सुंदर लड़की के लिए न रह जाएगी. नौकरी न केवल उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी वरन उस के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को भी बढ़ाएगी.’

मैडम की बातों से सहमत हुए बगैर वसुंधरा के पिता एकाएक उठ गए और रुखाई से बोले, ‘चलता हूं, मैडमजी, देर हो रही है. वसुंधरा की सगाई की तैयारी करनी है.’

वसुंधरा बेताबी से पिता के लौटने का इंतजार कर रही थी. उसे पूरा विश्वास था कि मैडम ने जरूर पिताजी को सही फैसला लेने के लिए मना लिया होगा. जैसे ही दीनानाथ ने घर में प्रवेश किया वसुंधरा चौकन्नी हो गई.

‘सुनती हो, तुम्हारी बेटी घर की बातें अपनी मैडमों को बताने लगी है,’ पिताजी ने गरजते हुए घर में प्रवेश किया.

‘क्या हुआ? क्यों गुस्सा हो रहे हो?’ मां रसोईघर से निकलते हुए बोलीं.

‘अपनी बेटी से पूछो. साथ ही यह भी पूछना कि क्या उस की मैडम आएगी यहां इन चारों का विवाह करने?’ पिता पूरी ताकत से चिल्लाते हुए बोले.

वसुंधरा सहम कर पढ़ाई करने लगी. तीनों बहनें भी पिताजी का गुस्सा देख कर घबरा गईं.

वसुंधरा को यह साफ दिखाई  देने लगा था कि पिताजी को समझा पाना बेहद मुश्किल है. उसे खुद ही कोई कदम उठाना पड़ेगा. उस ने फैसला ले लिया कि वह किसी भी कीमत पर राजू से विवाह नहीं करेगी. भले ही इस के लिए उसे मातापिता के कितने भी खिलाफ क्यों न जाना पड़े.

मैडम की बातों से वसुंधरा उस समय एक नए जोश से भर गई जब दूसरे दिन कालिज में उन्होंने कहा, ‘यह लड़ाई तुम्हें स्वयं लड़नी होगी, वसुंधरा. बिना किसी दबाव में आए शादी करने के लिए एकदम मना कर दो. तुम्हारी योग्यता, तुम्हारी मंजिल के हर रास्ते को खोलेगी. मैं तुम्हें वचन देती हूं कि मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगी.’

उस ने सारी बातों को एक तरफ झटक कर अपनेआप को पूरी तरह अपनी आने वाली परीक्षा की तैयारी में डुबा दिया.

‘बेटी, आज कालिज मत जाना. लड़के वाले आने वाले हैं. पसंद तू सब को है, बस, वह सब तुम से मिलना चाहते हैं. साथ ही अंगूठी का नाप भी लेना चाहते हैं,’ मां ने अनुरोध करते हुए कहा.

‘मां, मैं पहले भी कह चुकी हूं कि मैं यह विवाह नहीं करूंगी,’ वसुंधरा ने किताबें समेटते हुए कहा.

‘क्या कह रही है? हम जबान दे चुके हैं और सगाई की तैयारी भी कर चुके हैं. अब तो मना करने का प्रश्न ही नहीं उठता,’ मां ने वसुंधरा को समझाने की कोशिश करते हए कहा, ‘फिर मुझे पूरा विश्वास है कि तू उसे अवश्य अपने अनुसार ढाल लेगी.’

‘मां, मैं अपनी जिंदगी और शक्ति एक बिगड़े लड़के को सुधारने में बरबाद नहीं करूंगी,’ वसुंधरा ने दृढ़ता से कहा. फिर मां की ओर मुड़ते हुए बोली, ‘आप के सामने तो घर में ही एक उदाहरण हैं चाचीजी, क्या चाचाजी को सुधार पाईं? चाचाजी रोज रात को नशे में धुत हो कर घर लौटते हैं और चाचीजी अपनी तकदीर को कोसती हुई रोती रहती हैं. उन के तीनों बच्चे सहमे से एक कोने में दुबक जाते हैं.

अपने जैसे लोग : नीरज के मन में कैसी थी शंका – भाग 2

एक दिन शाम को नीरज जब काम से लौटा तो पंकज का कान पकड़े हुए उसे घसीटते हुए लाया और बरामदे में पटक दिया. मैं दोपहर का काम निबटा कर लेटी हुई एक पत्रिका पढ़तेपढ़ते शायद सो गई थी.

अचानक ही पंकज की चिल्लाहट से हड़बड़ा कर उठ बैठी. ‘‘देखा नहीं तुम ने, वहां बड़े मजे से उन लड़कों की साइकिल में धक्का लगा रहा था, जैसे गुलाम हो उन का. शर्म नहीं आती. मारमार कर खाल उतार दूंगा अगर आगे से उन के पास गया या कोई ऐसी हरकत की तो…’’ उस की गाल पर एक थप्पड़ और मारते हुए नीरज पंकज को मेरी ओर धकेलते हुए अंदर चला गया. नीरज के इतने क्रोधित होने पर आश्चर्य हो रहा था मुझे. आखिर इस में पंकज का क्या दोष? उसे साइकिल नहीं मिली तो वह बच्चों के साथ साइकिल को धक्का लगा कर ही अपनी अतृप्त भावना की तृप्ति करने पहुंच गया. वह क्या जाने गुलाम या बादशाह को? बच्चे का दिल तो निर्दोष होता है. मुझे दुख था तो नीरज के सोचने के ढंग पर. ऊंचनीच की भावना उसे परेशान कर रही थी.

मैं समझ गई कि कोई ऐसा भाव उस के हृदय में घर कर गया था जो हर समय उन लोगों की नजरों में उसे हीन बना रहा था और दूसरों के धनदौलत का महत्त्व उस के मस्तिष्क में बढ़ता ही जा रहा था. यद्यपि हीन हम लोग किसी भी प्रकार से नहीं थे. जब तक यह गलत भावना नीरज के मन से दूर न होगी, हमारा इस कालोनी में रहना दूभर हो जाएगा. ऐसा मुझे दिखाई देने लगा था. मैं ने भी सोच लिया कि मुझे उसी बदहाली में जाने की अपेक्षा नीरज के मन में बैठी उस भावना से लड़ाई करनी है. बड़े सोचविचार के बाद मैं ने एक कदम उठाया. नीरज के दफ्तर चले जाने के बाद मैं उन बड़े लोगों के संपर्क में आने का प्रयत्न करती रही. उन के घर में प्रवेश करने के साथ ही उन के हृदयों में प्रवेश कर के यह जानने की कोशिश करती रही कि क्या हम अपने साधारण से वेतन व साधारण जीवन स्तर के साथ उन के समाज में आदर पा सकते हैं.

सब से पहले मैं ने अपना परिचय बढ़ाया कोठी नंबर 5 की सौदामिनी से. उन के पति एक बड़ी फर्म के मालिक हैं. अनेक वर्ष विदेश रह कर आए हैं और उन के नीचे कार्य करने वाले अनेक कर्मचारी भी विदेशों से प्रशिक्षित हैं. कई सुंदर नवयुवतियां भी इन के नीचे स्टेनो, टाइपिस्ट व रिसैप्शनिस्ट का कार्य करती हैं. स्वाभाविक है कि गांगुली साहब पार्टियों और क्लबों में अधिक व्यस्त रहते हैं. एक दिन सौदामिनी ने अपने हृदय की व्यथा व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘क्या करूं, शीलाजी? अपने एक बच्चे को तो इन के इसी व्यसन के पीछे गंवा बैठी हूं. हर समय इन के साथ या तो बाहर रहना पड़ता था या घर में ही डिनर व पार्टियों में व्यस्त रहती थी. बच्चे की देखरेख कर ही नहीं पाई, आया के भरोसे ही रहा. वह न जाने कैसा बासी व गंदा दूध पिलाती रही कि बच्चे का जिगर खराब हो गया और काफी इलाज के बावजूद चल बसा.

‘‘अब प्रदीप 2 वर्ष का हो गया है. उसे छोड़ते मुझे डर लगता है. जब से यह हुआ, इन के और मेरे संबंधों में दरार पड़ती जा रही है. ये बाहर रहते हैं और मैं घर में पड़ी जलती रहती हूं.’’ वे लगभग रो पड़ीं. ‘‘अरे, इस समस्या का हल तो बहुत आसान है. आप प्रदीप को पंकज के साथ हमारे यहां भेज दिया कीजिए. दोनों खेलते रहेंगे. प्रदीप जब पंकज के साथ हिल जाएगा तो आप के पीछे से हमारे घर ठहर भी जाया करेगा. फिर आप शौक से गांगुली साहब के साथ बाहर जाइए.’’

सौदामिनी का मुंह एक ओर तो हर्ष से दमक उठा, दूसरी ओर वे आश्चर्य से मेरे मुंह की ओर देखती रह गईं, ‘‘आप कैसे करेंगी इतना सब मेरे लिए? आप को परेशानी होगी.’’ ‘‘नहीं, आप बिलकुल चिंता न कीजिए. मैं प्रदीप को जरा भी कष्ट नहीं होने दूंगी और मुझे भी उस के कारण कोई परेशानी नहीं होगी. फिर हमारे पंकज का दिल भी तो उस के साथ बहल जाएगा. वह भी तो बेचारा अकेला सा रहता है.’’ मैं ने हंसते हुए उन से विदा ली थी और अगली ही शाम को वे स्वयं प्रदीप को ले कर हमारे यहां आ गई थीं. कितनी ही देर बैठीबैठी वे हमारे छोटे से घर की गृहसज्जा की प्रशंसा करती रही थीं.

प्रदीप प्रतिदिन हमारे यहां आने लगा. अपने ढेर सारे खिलौने भी ले आता. दोनों बच्चे खेल में ही मस्त रहते. मैं बीचबीच में दोनों को खानेपीने को देती रहती. कभीकभी कहानियां भी सुनाती और पुस्तकों में से तसवीरें भी दिखाती. अब जब भी सौदामिनी चाहतीं, बड़े शौक से प्रदीप को हमारे यहां छोड़ जातीं.

आरंभ में नीरज ने बहुत आपत्ति उठाई थी, ‘‘देख लेना, भलाई के बदले में बुराई ही मिलेगी. ये बड़े लोग किसी का एहसान थोड़े ही मानते हैं.’’ ‘‘मैं कोई भी कार्य बदले की भावना से नहीं करती. बस, इतना ही जानती हूं कि इंसान को इंसानियत के नाते अपने चारों ओर के लोगों के प्रति अपना थोड़ाबहुत फर्ज निभाते रहना चाहिए. फिर, इस से हमारा पंकज भी तो बहल जाता है. मुझे तो फायदा ही है.’’

‘‘खाक बहल जाता है, देखूंगा कितने दिन ऐसे बहलाओगी उसे,’’ नीरज चिढ़ते हुए अंदर चला गया था. परंतु नीरज को यह अभी तक मालूम नहीं था कि जब से प्रदीप हमारे यहां आने लगा था, तब से पंकज मानसिक रूप से बहुत स्वस्थ रहने लगा था. वह अधिकतर प्रदीप या उस के खिलौनों में व्यस्त रहता. मुझे भी घर का कार्य करने में सहूलियत हो गई. पहले पंकज ही मुझे अधिक व्यस्त रखता था. मैं दिन में कुछ कढ़ाईसिलाई व अपने लेखन का कार्य भी नियमित रूप से करने लगी.

एक दिन शाम को हम घूमने निकले तो गांगुली साहब सुयोगवश बाहर ही खड़े मिल गए. बड़े ही विनम्र हो कर हाथ जोड़ते हुए स्वयं ही आगे बढ़ कर बोले, ‘‘आइए, शीलाजी, आप ने हम पर जो एहसान किया है वह कभी भी उतार नहीं पाऊंगा. सच, अकेले में कितना बुरा लगता था बाहर जाना. आप ने हमारी समस्या हल कर दी.’’ ‘‘मुझे शर्मिंदा न कीजिए, गांगुली साहब, पड़ोसी के नाते यह तो मेरा फर्ज था.’’ ‘‘आइए, अंदर आइए.’’ वे हमें अंदर ले गए. सौदामिनी भी आ गईं. काफी देर बैठे बातें करते रहे. बातों के दौरान ही मैं ने गांगुली साहब को जब अपना छोटा सा यह सुझाव दिया कि आधुनिक युग में रहते हुए भी घर से बाहर उन्हें इतना व्यस्त नहीं रहना चाहिए कि पत्नी घर में ऊब जाए. वे कहने लगे, ‘‘हां, मैं स्वयं ही आप के इस सुझाव के बारे में सोच चुका हूं. मैं ने परसों ही आप का लेख पढ़ा था. आप के विचार वास्तव में सराहनीय हैं. मैं तो बहुत खुश हूं कि आप जैसे योग्य, प्रतिभावान और कर्तव्यनिष्ठ हस्ती इस कालोनी में आई.’’ इतना कह कर वे जोर से हंस दिए.

हम खुशीखुशी बाहर निकल कर घर के सामने आए ही थे कि देखा पंकज और प्रदीप दोनों साइकिल से खेल रहे हैं. आश्चर्य तो नीरज को तब हुआ जब उस ने देखा कि पंकज तो गद्दी पर बैठा है और प्रदीप उसे धक्का दे रहा है. ‘‘देखो तो सही कैसे बादशाह की तरह गद्दी पर जमा बैठा है और उस से साइकिल खिंचवा रहा है. कहीं मिसेज गांगुली ने देख लिया तो…’’

‘‘वे कितनी ही बार बच्चों को ऐसे खेलता हुआ देख चुकी हैं. कोई भावना उन के मुख पर कभी दिखाई नहीं दी. सब आप के दिल का वहम है,’’ मैं ने उचित अवसर देख कर कहा और वह चुप हो गया. शायद वह अपनी गलती अनुभव करने लगा था.

अनोखी जोड़ी: विशाल ने अवंतिका को तलाक देने से क्यों मना कर दिया? -भाग 2

‘‘हां.’’

घर आया तो टैक्सी से उतरते हुए अवंतिका बोली, ‘‘चाय पी कर जाना.’’

‘‘तुम कहती हो तो जरूर पीऊंगा. तुम्हारे हाथ की अदरक वाली चाय पिए हुए 8 वर्ष हो गए हैं.’’

चाय तो क्या पी विशाल ने वह रात भी वहीं बिताई और वह भी एकदूसरे की बांहों में. आखिर पतिपत्नी तो वे थे ही. तलाक तो अभी हुआ नहीं था.

सुबह उठे तो दोनों में दांपत्य का खुमार जोरों पर था. पत्नी को बांहों में लेते हुए विशाल बोला, ‘‘अब अकेले नहीं रहेंगे. तलाक को मारो गोली.’’

अवंतिका ने भी सिर हिला कर हामी भर दी.

‘‘अगर हम बेवकूफी न करते तो अभी तक हमारे घर में 2-3 बच्चे होते. खैर, कोई बात नहीं…अब सही. क्यों?’’ विशाल बोला.

‘‘बिलकुल,’’ अवंतिका ने जवाब दिया, ‘‘अब पारिवारिक सुख रहेगा, श्री और श्रीमती विशाल स्वरूप और उन के रोतेठुनकते बच्चे, बच्चों के स्कूल टीचरों की चमचागीरी आदि. क्यों प्रिये, तुम घबरा तो नहीं गए?’’

‘‘घबराऊं और वह भी जब तुम्हारा साथ रहे? नामुमकिन.’’

घड़ी पर निगाह पड़ी तो विशाल बोला, ‘‘अरे, घंटे भर में मुझे आफिस पहुंचना है. अवंतिका प्लीज, मेरे स्नान के लिए पानी गरम कर दो.’’

अवंतिका जैसे ही रसोई में पानी गरम करने गई विशाल ने विवेक को फोन लगाया, ‘‘यार, मैं अवंतिका के घर से बोल रहा हूं. वह मान गई है और हमारे घर की बगिया में फिर से बहार आ गई है.’’

विशाल कपडे़ पहन कर बाहर निकला तो देखा अवंतिका फोन पर किसी से बात कर रही थी, ‘‘नहीं पल्लवी, आज मैं हड़ताल में नारे लगाने नहीं आऊंगी, क्योंकि वहां पुलिस मुझे गिरफ्तार कर सकती है और आज मेरे लिए बहुत अहम दिन है.’’

विशाल पूछ बैठा, ‘‘अवंतिका, यह गिरफ्तार होने का क्या मामला है?’’

‘‘बात यह है विशाल कि बड़ी तेल कंपनियां अपने उत्पाद का दाम बढ़ाए जा रही हैं…मुझे इस के विरुद्ध हड़ताल करने वालों का साथ देना था.’’

‘‘क्या बेवकूफी की बातें करती हो. आखिर तेल कंपनियों को भी तो कमाना है, और अगर जनता कीमत दे सकती है तो वे दाम क्यों न बढ़ाएं?’’

‘‘मिस्टर, मुझे अर्थशास्त्र नहीं सिखाओ,’’ गुस्से में अवंतिका बोली और एक प्लेट उठाई तो वार से बचने के लिए विशाल सीढि़यों से नीचे दौड़ पड़ा.

‘‘नमस्कारम्,’’ विशाल को देख हेमंत मुसकराया.

उधर विशाल की तरफ प्लेट फेंकते हुए अवंतिका चीखी, ‘‘निकल जाओ मेरे घर से.’’

आफिस पहुंचते ही विशाल ने विवेक को बताया, ‘‘अभी मैं ने फोन पर जो कहा था वह भूल जाओ. उस बेवकूफ की औंधी खोपड़ी अभी भी वैसी ही है. ऐसी नकचढ़ी युवती के साथ मैं नहीं रह सकता.’’

विवेक फोन पर बात कर रहा था. उस ने चोगा विशाल को थमा दिया और फुसफुसाया, ‘‘मुंशी साहब.’’

मुंशी साहब का फोन कान से लगाने के बाद विशाल के मुंह से केवल ये शब्द ही निकले, ‘जी हां सर,’ ‘बहुत अच्छा सर,’ ‘बिलकुल ठीक सर’ और ‘धन्यवाद सर.’

फोन रख कर विशाल ने ठंडी सांस ली, ‘‘अंतर्राष्ट्रीय शाखा का प्रबंधक होने का मतलब जानते हो विवेक. लंदन, पेरिस व रोम में अब मेरा आफिस होगा. निजी वायुयान, वर्ष में डेढ़ महीने की छुट्टी. कंपनी के खर्चे पर दुनिया घूमने का अवसर. मुंशी साहब ने तो छप्पर फाड़ कर मेरी झोली भर दी.’’

विवेक हंस पड़ा, ‘‘अब बीवी का क्या होगा?’’

‘‘तुम चिंता न करो. उस बेवकूफ को मना लूंगा. वार्षिक आम सभा में कितने दिन बाकी हैं?’’

‘‘10 दिन.’’

आफिस से विशाल टैक्सी ले कर  सीधे अवंतिका के घर की ओर भागा. देखा, वह एक टैक्सी पर सवार हो कर कहीं जा रही थी. उस ने अपने टैक्सी चालक के सामने 500 का नोट रखते हुए कहा, ‘‘भैया, वह जो टैक्सी गई है उसे पकड़ना है.’’

अवंतिका की टैक्सी हवाई अड्डे की ओर दौड़ रही थी. विशाल ने सोचा, जरूर वह तलाक लेने विदेश जा रही है. तभी हवाई अड्डे के पास की बत्ती लाल हो गई और दोनों टैक्सियां एकदूसरे के आगेपीछे रुकीं. विशाल उतर कर दौड़ा और अवंतिका का हाथ थाम लिया, ‘‘डार्लिंग, तुम्हें जो करना है करो. मैं कभी तुम्हें रोकूंगा नहीं, क्योंकि तुम से प्रेम जो करता हूं.’’

अवंतिका भी अपनी टैक्सी से उतरी और उस की बांहों में समा गई. बाद में वे दोनों वापस अपने आशियाने की ओर चल पडे़. विशाल ने विवेक को फोन किया, ‘‘भाई, किला फतह हो गया.’’

राह में अवंतिका ने समझाया, ‘‘विशाल, अभी हम दोनों को अपना प्रेम मजबूत करना है इसलिए मैं तुम से अलग दूसरे कमरे में सोती हूं.’’

विशाल क्या करता. चुपचाप मान गया.

रात में बिस्तर में जब विशाल ने करवट बदली तो एक बदन से हाथ टकरा गया. सोचा, अवंतिका का दिल द्रवित हो गया होगा और पास आ कर सो गई होगी. जब मुंह पर हाथ फेरा तो बढ़ी हुई दाढ़ी मिली. बत्ती जलाई तो देखा हेमंत साहब आराम से खर्राटे ले रहे हैं.

वह उठ कर दूसरे कमरे में पहुंचा तो अवंतिका के पलंग पर नारी का खुशबूदार बदन था. अंधेरे में चादर उठा कर जब विशाल उस में घुसा तो वह चीखी. उसे छोड़ कर जब विशाल अपने बिस्तर में फिर घुसा तो हेमंत ने करवट बदली और विशाल के मुंह पर हाथ फेर धीरे से बोला, ‘‘तुम्हें ठंड तो नहीं लग रही है, प्रिये.’’

वादियों का प्यार: कैसे बन गई शक की दीवार – भाग 2

कहीं ऐसा तो नहीं कि साकेत ने पहले कोई लड़की पसंद कर के उस से सगाई कर ली हो और फिर तोड़ दी हो या फिर प्यार किसी से किया हो और शादी मुझ से कर ली हो? आखिर हम ने साकेत के बारे में ज्यादा जांचपड़ताल की ही कहां है. जीजाजी भी उस के काफी वक्त बाद मिले थे. कहीं तो कुछ गड़बड़ है. मुझे पता लगाना ही पड़ेगा.

पता नहीं इसी उधेड़बुन में मैं कब तक खोई रही और फिर यह सोच कर शांत हो गई कि जो कुछ भी होगा, साकेत से पूछ लूंगी.

किंतु रात को अकेले होते ही साकेत से जब मैं ने यह बात पूछनी चाही तो साकेत मुझे बाहों में भर कर बोले, ‘देखो, कल रात कालका मेल से शिमला जाने के टिकट ले आया हूं. अब वहां सिर्फ तुम होगी और मैं, ढेरों बातें करेंगे.’ और भी कई प्यारभरी बातें कर मेरे निखरे रूप का काव्यात्मक वर्णन कर के उन्होंने बात को उड़ा दिया.

मैं ने भी उन उन्मादित क्षणों में यह सोच कर विचारों से मुक्ति पा ली कि ज्यादा से ज्यादा यह होगा कि प्यार किसी और से किया होगा पर विवाह तो मुझ से हो गया है. और मैं थकान से बोझिल साकेत की बांहों में कब सो गई, मुझे पता ही न चला.

दूसरे दिन शिमला जाने की तैयारियां चलती रहीं. तैयारियां करते हुए कई बार वही सवाल मन में उठा लेकिन हर बार कोई न कोई बात ऐसी हो जाती कि मैं साकेत से पूछतेपूछते रह जाती. रात को कालका मेल से रिजर्व कूपे में हम दोनों ही थे. प्यारभरी बातें करतेकरते कब कालका पहुंच गए, हमें पता ही न चला. सुबह 7 बजे टौय ट्रेन से शिमला पहुंचने के लिए उस गाड़ी में जा बैठे.

घुमावदार पटरियों, पहाड़ों और सुरंगों के बीच से होती हुई हमारी गाड़ी बढ़ी जा रही थी और मैं साकेत के हाथ पर हाथ धरे आने वाले कल की सुंदर योजनाएं बना रही थी. मैं बीचबीच में देखती कि साकेत कुछ खोए हुए से हैं तो उन्हें खाइयों और पहाड़ों पर उगे कैक्टस दिखाती और सुरंग आने पर चीख कर उन के गले लग जाती.

खैर, किसी तरह शिमला भी आ गया. पहाड़ों की हरियाली और कोहरे ने मन मोह लिया था. स्टेशन से निकल कर हम मरीना होटल में ठहरे.

कुछ देर आराम कर के चाय आदि पी कर हम माल रोड की सैर को निकल पड़े.

साकेत सैर करतेकरते इतनी बातें करते कि ऊंची चढ़ाई हमें महसूस ही न होती. माल रोड की चमकदमक देख कर और खाना खा कर हम अपने होटल लौट आए. लौटते हुए काफी रात हो गई थी व पहाड़ों की ऊंचाईनिचाई पर बसे होटलों व घरों की बत्तियां अंधेरे में तारों की झिलमिलाहट का भ्रम पैदा कर रही थीं. दूसरे दिन से घूमनेफिरने का यही क्रम रहने लगा. इधरउधर की बातें करतेकरते हाथों में हाथ दिए हम कभी रिज, कभी माल रोड, कभी लोअर बाजार और कभी लक्कड़ बाजार घूम आते.

दर्शनीय स्थलों की सैर के लिए तो साकेत हमेशा टैक्सी ले लेते. संकरी होती नीचे की खाई देख कर हम सिहर जाते. हर मोड़ काटने से पहले हमें डर लगता पर फिर प्रकृति की इन अजीब छटाओं को देखने में मग्न हो जाते.

इस प्रकार हम ने वाइल्डफ्लावर हौल, मशोबरा, फागू, चैल, कुफरी, नालडेरा, नारकंडा और जाखू की पहाड़ी सभी देख डाले.

हर जगह ढेरों फोटो खिंचवाते. साकेत को फोटोग्राफी का बहुत शौक था. हम ने वहां की स्थानीय पोशाकें पहन कर ढेरों फोटो खिंचवाईं. मशोबरा के संकरे होते जंगल की पगडंडियों पर चलतेचलते साकेत कोई ऐसी बात कह देते कि मैं खिलखिला कर हंस पड़ती पर आसपास के लोगों के देखने पर हम अचानक अपने में लौट कर चुप हो जाते.

नारकंडा से हिमालय की चोटियां और ग्लेशियर देखदेख कर प्रकृति के इस सौंदर्य से और उन्मादित हो जाते.

इस प्रकार हर जगह घूम कर और माल रोड से खापी कर हम अपने होटल लौटने तक इतने थक जाते कि दूसरे दिन सूरज उगने पर ही उठते.

इस तरह घूमतेघूमते कब 10 दिन गुजर गए, हमें पता ही न चला. जब हम लौट कर वापस दिल्ली पहुंचे तो शिमला की मस्ती में डूबे हुए थे.

साकेत अब अपनी वर्कशौप जाने लगे थे. मैं भी रोज दिन का काम कराने के लिए रसोई में जाने लगी.

एक दिन चुपचाप मैं अपने कमरे में खिड़की पर बैठी थी कि साकेत आए. मैं अभी कमरे में उन के आने का इंतजार ही कर रही थी कि मेरी सासूजी की आवाज आई, ‘साकेत, कल काम पर मत जाना, तुम्हारी तारीख है.’ और साकेत का जवाब भी फुसफुसाता सा आया, ‘हांहां, मुझे पता है पर धीरे बोलो.’

उन लोगों की बातचीत से मुझे कुछ शक सा हुआ. एक बार आगे भी मन में यह बात आई थी लेकिन साकेत ने टाल दिया था. मुझे खुद पर आश्चर्य हुआ, पहले दिन जिस बात को साकेत ने प्यार से टाल दिया था उसे मैं शिमला के मस्त वातावरण में पूछना ही भूल गई थी. खैर, आज जरूर पूछ कर रहूंगी. और जब साकेत कमरे में आए तो मैं ने पूछा, ‘कल किस बात की तारीख है?’

साकेत सहसा भड़क से उठे, फिर घूरते हुए बोले, ‘हर बात में टांग अड़ाने को तुम्हें किस ने कह दिया है? होगी कोई तारीख, व्यापार में ढेरों बातें होती हैं. तुम्हें इन से कोई मतलब नहीं होना चाहिए. और हां, कान खोल कर सुन लो, आसपड़ोस में भी ज्यादा आनेजाने की जरूरत नहीं. यहां की सब औरतें जाहिल हैं. किसी का बसा घर देख नहीं सकतीं. तुम इन के मुंह मत लगना.’ यह कह कर साकेत बाहर चले गए.

मैं जहां खड़ी थी वहीं खड़ी रह गई. एक तो पहली बार डांट पड़ी थी, ऊपर से किसी से मिलनेजुलने की मनाही कर दी गई. मुझे लगा कि दाल में अवश्य ही कुछ काला है. और वह खास बात जानने के लिए मैं एड़ीचोटी का जोर लगाने के लिए तैयार हो गई.

दूसरे दिन सास कहीं कीर्तन में गई थीं और साकेत भी घर पर नहीं थे. काम वाली महरी आई. मैं उस से कुछ पूछने की सोच ही रही थी कि वह बोली, ‘मेमसाहब, आप से पहले वाली मेमसाहब की साहबजी से क्या खटरपटर हो गई थी कि जो वे चली गईं, कुछ पता है आप को?’

यह सुन कर मेरे पैरों तले जमीन खिसकने लगी. कुछ रुक कर वह धीमी आवाज में मुझे समझाती हुई सी बोली, ‘साहब की एक शादी पहले हो चुकी है. अब उस से कुछ मुकदमेबाजी चल रही है तलाक के लिए.’ सुन कर मेरा सिर चकरा गया.

सगाई और शादी के समय साकेत का खोयाखोया रहना, सगाई के लिए मांबाप तक को न लाना और शादी में सिर्फ 5 आदमियों को बरात में लाना, अब मेरी समझ में आ गया था. पापा खुद सगाई के बाद आ कर घरबार देख गए थे. जा कर बोले थे, ‘भई, अपनी सुनीता का समय बलवान है. अकेला लड़का है, कोई बहनभाई नहीं है और पैसा बहुत है. राज करेगी यह.’

उन को भी तब इस बात का क्या गुमान था कि श्रीमान एक शादी पहले ही रचाए हुए हैं.

जीजाजी भी तब यह कह कर शांत हो गए थे, ‘लड़का मेरा जानादेखा है पर पिछले 5 वर्षों से मेरी इस से मुलाकात नहीं हुई, इसलिए मैं इस से ज्यादा क्या बता सकता हूं.’

इन्हीं विचारों में मैं न जाने कब तक खोई रही और गुस्से में भुनभुनाती रही कि वक्त का पता ही न चला. अपने संजोए महल मुझे धराशायी होते लगे. साकेत से मुझे नफरत सी होने लगी.

जाएं तो जाएं कहां : चार कैदियों का दर्द – भाग 2

बैरक में सन्नाटा छा गया. बाकी तीनों के चेहरों पर भी उदासी थी. रात हो चुकी थी. गार्डों की ड्यूटी बदल चुकी थी.

‘‘और तुम्हारे परिवार की कोई खैरखबर?’’ चांद मोहम्मद ने पूछा.

‘‘नहीं, कुछ पता नहीं. कोई आज तक आया भी नहीं, ‘‘अनुपम की आंखों से आंसू बहने लगे.

सुबह 4 बजे गार्ड ने ताला खोला. वे सभी रसोईघर की ओर चल दिए. दोपहर में फिर ‘टनटनटन’ की आवाज हुई. सब को अपनेअपने बैरक में जाना था.

धीरेधीरे कर के सब बैरक में पहुंचे. गार्ड ने गिनती की. गिनती मिलते ही गार्ड ने ताला लगाया. सब अपना रूखासूखा खा कर एकदूसरे से बातचीत करने लगे. कुछ सो गए.

‘‘मेरी तो सुन ली, अपनी भी कहो,’’ अनुपम ने राकेश से कहा.

‘‘पहले मेरी सुन लो. मेरा मन शायद कहने से हलका हो जाए,’’ बिशनलाल ने कहा.

‘‘अच्छा तुम्हीं कहो,’’ राकेश बोला.

‘‘बड़े मजे और चैन के साथ जिंदगी कट रही थी. हम तेंदूपत्ता और महुआ बेचते थे. महुए की शराब पीते थे. अपने में मस्त रहते?थे. लेकिन न जाने किस की नजर लग गई हमारे जंगलों को.

‘‘माओवादी अपनी अलग सरकार बना रहे थे. जो उन के विरोध में होता, उसे गोली मार दी जाती. फिर पुलिस और माओवादियों के बीच में हम आदिवासी पिसने लगे.

‘‘पुलिस को हम पर शक हो गया था कि आदिवासी माओवादियों का सहारा बनते हैं. माओवादियों को यह शक होता था कि आदिवासी पुलिस की मुखबिरी करते हैं.

‘‘पुलिस के साथ माओवादियों की इस लड़ाई में शिकार होते हैं हम जैसे कमजोर, शांत आदिवासी.

‘‘पहले जंगल महकमे वाले हम आदिवासियों पर जोरजुल्म करते थे, उस के बाद नक्सलवादी आए. फिर अमीर लोग कारोबार करने आए. उन्होंने हम से हमारी जमीनें, हमारे जंगल छीनने शुरू कर दिए. उन की मदद सरकार और पुलिस करने लगी.

‘‘हम चारों तरफ से घिरे हुए?थे. एक ओर नक्सली, दूसरी ओर पुलिस. तीसरी ओर कारोबारी, चौथी ओर से सरकार.

‘‘इसी बीच सलवा जुडूम आ गया. अब हमारे घर जलाए जाने लगे. हमारी औरतों के साथ बलात्कार होने लगे. हमें नक्सली कह कर मुठभेड़ में मारा जाने लगा.

‘‘पुलिस अपने प्रमोशन, मैडल पाने के लिए आदिवासियों को नक्सली बता कर जेलों में भरने लगी. हमारे ही लोग अब हमारे दुश्मन बन चुके थे. हमारा अमनचैन सब लुट चुका था.

‘‘एक दिन एक पुलिस ने मुझ से कहा, ‘हमारे लिए तुम जासूसी करो. नक्सलयों की सूचना दो.’

‘‘मैं ने गुस्से में कहा, ‘और बदले में आप हमारे लोगों को नक्सली बता कर फर्जी मुठभेड़ में मारो. हमारी औरतों की इज्जत लूटो. कारोबारियों से पैसा ले कर हमारे घर जलाओ.’

‘‘मेरी बात से वह पुलिस अफसर भड़क गया. उस ने गुस्से में कहा, ‘नेता मत बनो. तुम अपने बारे में सोचो.’

‘‘‘और नक्सलियों को पता चल गया, तो उन से हमें कौन बचाएगा?’ मेरे कहने पर पुलिस अफसर ने हंसते हुए कहा, ‘मौत तो दोनों तरफ है. तुम चुन लो कि किस तरह की मौत मरना चाहते हो. नक्सली एक झटके में मार देंगे और हम तिलतिल कर मारेंगे.’

‘‘मुझे लगा कि अब बस्तर के ये जंगल हमारे लिए मौत के जाल बन चुके हैं, लेकिन हम जाएं तो जाएं कहां? रात का समय था. उमस थी. झींगुरों की आवाज अचानक तेज हो गई. मैं समझ गया कि कुछ गड़बड़ है.

‘‘फिर हमारी बस्ती पर तेज लाइट पड़ी. पुलिस अफसर की आवाज सुनाई दी. आवाज रात के सन्नाटे में गूंज रही?थी. हमें अपनी बस्ती खाली करने के लिए कहा जा रहा था.

‘‘तभी गोलियों की आवाज सुनाई दी. नक्सलियों ने पुलिस पर हमला बोल दिया था. बचाव में पुलिस वाले भी छिपतेछिपाते नक्सलियों पर हमला करने लगे. लेकिन नक्सलियों की घेराबंदी तगड़ी थी. कई पुलिस वाले मारे गए. कुछ घायल हुए थे. कुछ जान बचा कर अंधेरे का फायदा उठा कर भाग गए.

‘‘इस गोलाबारी में बस्ती के भी कुछ लोग मारे गए. तभी नक्सली कमांडर वीरन की आवाज सुनाई दी, ‘लाल सलाम.’

‘‘नक्सलियों ने भी ऊंची आवाज में कहा, ‘लाल सलाम.’

‘‘बस्ती के लोग अपनेअपने घरों से बाहर आए. नक्सली कमांडर ने कहा, ‘वीरन आ गया है. अब जो तुम्हें परेशान करेगा, वह ऐसे ही कुत्ते की मौत मरेगा.’

‘‘बस्ती वालों के लिए वीरन इस समय तो फरिश्ता था, लेकिन जान बचा कर भागते हुए एक पुलिस अफसर ने वीरन का ‘लाल सलाम’ सुन लिया था.

‘‘दूसरे दिन पुलिस की कई गाड़ियां आ गईं और बस्ती पर हमला बोल दिया. आदिवासियों को लाठियों, बैल्टों से पीटते हुए पुलिस की गाड़ी में जानवरों की तरह भरा जाने लगा.

‘‘पुलिस अफसर चीख रहा था, ‘सब को गिरफ्तार करो. नक्सलियों को सपोर्ट करते हैं सब. एकएक पुलिस वाले की मौत का बदला लिया जाएगा.’

‘‘जो आवाज उठा रहा था, उसे गोली मारी जा रही थी. दिनदहाड़े औरतों को खींच कर ले जाया जा रहा था. उन के साथ जबरदस्ती की जा रही थी.

‘‘मैं ने भी भागने की कोशिश की. पुलिस अफसर ने मुझ पर गोली चलाई. गोली मेरे कंधे पर जा लगी. मैं वहीं चीखते हुए गिर गया. उस के बाद मुझे वीरन के दल का नक्सली बता कर जेल भेज दिया गया.

‘‘पता नहीं कितने आदिवासी किसकिस जेल में?थे. औरतों के साथ क्याक्या हुआ? कितने घर जलाए गए. बस्ती अब है भी या नहीं…

‘‘उस पुलिस अफसर को मालूम था कि मैं पढ़ालिखा हूं. पत्रकारों को इंटरव्यू भी दे चुका हूं, इसलिए मुझे खतरनाक नक्सली बता कर दिल्ली भेज दिया गया. सब बरबाद हो गया.’’

बिशनलाल की यह दास्तान सुन कर सब सकते में थे. बिशनलाल की आंखों में आंसू थे.

तभी सीटी की आवाज सुनाई दी. जेल के अंदर जेल गार्ड द्वारा सीटी बजाने का मतलब है खतरा.

सीटी बजने के बाद होने वाले अंजाम को कैदी बखूबी जानते थे. सीटी बजती रही और सारे जेल वाले अपनीअपनी लाठियों के साथ इकट्ठा होते रहे. माहौल में अजीब सा डर भर गया. इमर्जेंसी अलार्म बजाया गया, ताकि वे जेल गार्ड भी अपने कमरों से तुरंत ड्यूटी पर आ सकें, जिन की ड्यूटी इस वक्त नहीं थी.

थोड़ी देर में पूरी जेल छावनी में बदल गई. सारे कैदी दौड़ कर अपने बैरक के अंदर भागे.

जेल सुपरिंटैंडैंट, जेलर, उपजेलर, हवलदार सभी जेल गार्ड बैरक नंबर 2 के सामने खड़े थे. एकएक कैदी को बाहर निकाल कर लाठियोंजूतों से गिरागिरा कर पीटा जा रहा था.

कैदियों की चीखों से आसमान में उड़ते पंछी भी डर गए थे. सब पिट रहे थे और यही कह रहे थे कि ‘साहब, हम ने कुछ नहीं किया’, लेकिन वही गार्ड जो सारे कैदियों के बड़े भाई, दोस्त जैसे रहते थे, इस घड़ी बेरहम बने हुए थे.

यही वह समय होता है, जब जेल प्रशासन को अपनी धाक जमाने का मौका मिलता है. इस समय बड़े से बड़ा खतरनाक कैदी भी पनाह मांगने लगता है. बात बिगड़ने पर बाहर की फोर्स भी आ कर मोरचा संभाल लेती है.

जेल सुपरिंटैंडैंट ने कहा, ‘‘किस ने झगड़ा किया था?’’

बैरक के नंबरदार से पूछा गया. बैरक का नंबरदार, जो खुद दर्द से कराह रहा?था, ने बताया, ‘‘नए कैदी सोमेश से सुजान सिंह ने कहा था कि मुलाकात में अपने घर के लोगों से 10 हजार रुपए मंगवाओ. सोमेश ने जेलर से शिकायत करने की धमकी दी, तो गुस्से में सुजान सिंह और उस के साथियों ने सोमेश पर बुरी तरह से हमला कर दिया और उस के चेहरे पर ब्लेड मारा.’’

जेल सुपरिंटैंडैंट ने गार्डों से कहा, ‘‘सुजान सिंह और उस के साथियों को अभी ले कर आओ.’’

सुजान सिंह और उस के 5 साथी सामने लाए गए और जेल सुपरिंटैंडैंट का इशारा मिलते ही गार्डों ने उन पर बेतहाशा लाठियां बरसाना शुरू कर दिया. ‘हायहाय’ की दर्दनाक चीखें गूंजने लगीं.

‘‘इन पर केस बनाओ,’’ जेल सुपरिंटैंडैंट ने गुस्से से कहा और वापस दफ्तर की ओर चल दिए. उन के पीछेपीछे जेलर, उपजेलर और जेल के मुख्य द्वार पर तैनात संतरी भी चल दिए.

जेल गार्डों ने डर के इस माहौल का खूब फायदा उठाया. वे हर नए और कमजोर, डरे हुए कैदियों को धमका कर उन से पैसों की मांग करते. उन के परिवार द्वारा भेजे गए सामान में से अपने काम का सामान छीन लेते.

वैसे भी मुलाकात के समय मुख्य द्वार पर 2 सिपाहियों की ड्यूटी रहती है. एक रजिस्टर में लिखता, दूसरा मुलाकात करने वाले कैदी पर नजर रखता कि कहीं वह कोई गैरकानूनी सामान तो अंदर नहीं ला रहा है.

लेकिन भ्रष्टाचार यहां भी था. हर मिलने आने वाले से मुलाकात के नाम पर 10 रुपए लिए जाते. सुबह 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक ही मिलने का समय होता.

अंदर कैदियों की तादाद 450-500 होती. जिसे 5 मिनट से ज्यादा मिलना हो, उस से ज्यादा पैसे की मांग की जाती. कोई अपनी बीवीबच्चों से कईकई दिनों बाद मिल रहा होता, तो उस की बीवी 10-20 रुपए निकाल कर दे देती.

जेल में कई बार सरकारी अफसर, डाक्टर, इंजीनियर, बड़े कारोबारी भी आ जाते, तब तो मुलाकात में ड्यूटी करने वालों की चांदी होती. ऐसे थोड़े ही जेल में अपराधियों के पास गांजा, पिस्तौल, मोबाइल जैसी चीजें पहुंच जाती थीं.

जो दमदार कैदी होते, उन के साथी बाहर से जेल प्रशासन के लोगों द्वारा अंदर मनचाहा सामान पहुंचाते. बदले में जेल प्रशासन को भी खुश किया जाता.

मुलाकात के दौरान गेट पर ड्यूटी के लिए जेल के गार्ड, हवलदार बड़ी रकम जेलर व सुपरिंटैंडैंट को पहुंचाते. रसोई में काम करने वाले इन चारों कैदियों की पिटाई नहीं हुई, क्योंकि ये चारों न कभी जेल प्रशासन से उलझे, न किसी गार्ड से कभी ऊंची आवाज में बात की, बल्कि जेल गार्डों की हर सही और गलत बात भी मानी.

जेल में कुछ गार्डों द्वारा नशीली चीजों जैसे गांजा, शराब, अफीम को रसोई से ही बेची जाती. बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू तो बिलकुल खुलेआम बेचे जाते. कोई रोक नहीं थी.

आज रविवार था. नियम के मुताबिक कैदियों को पूरी,आटे का हलवा, सब्जी दी गई. चारों अपने बैरक में बैठे कैदियों की पिटाई की चर्चा कर रहे थे.

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