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सिया के आंसू : भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा  

22 साल की एक पढ़ीलिखी लड़की थी, जो बीटैक कर रही थी. वह एक कामयाब यूट्यूबर थी, जो अपनी कार खुद चलाना पसंद करती थी और देश के ज्वलंत मुद्दों पर भी अपनी राय बड़ी बेबाकी से सब के सामने रखती थी, पर किसी इनसान में इतनी अच्छाइयों का होना यह नहीं साबित करता है कि वह अंधविश्वासी नहीं होगा.

 

सिया के मन पर भी उस के बचपन से ही बताए गए रीतिरिवाजों और धर्मांधता का पूरा असर था. हां, पर जो उस का इन अंधविश्वासों में साथ नहीं देता था, वह था सिया के बचपन का दोस्त वीरेन. वीरेन से सिया की सगाई भी हो चुकी थी और शादी की तारीख भी दिसंबर महीने की थी, पर उस से पहले वीरेन और सिया अपने दोस्तों नताशा और तान्या के साथ एक धार्मिक जगह सिद्धनाथ के दर्शन करने जाना चाहते थे.

बाकी के दिन तो सफर की तैयारियों में कब निकल गए, सिया को पता ही नहीं चला और फिर वह दिन भी आ गया, जब वे चारों सफर पर निकल पड़े और रास्ते की सारी दिक्कतों को झेलते हुए वे सिद्धनाथ पहुंच गए. अभी उन लोगों की गाड़ी पूरी तरह से रुक भी नहीं पाई थी कि उन की गाड़ी के चारों तरफ अनजान लड़कों और आदमियों की भीड़ जमा हो गई.

‘‘हां जी मैडम… रुकने के लिए कमरा चाहिए… बहुत सस्ते में दिला देंगे… एसी वाला रूम… कम कीमत में…’’ उन में से कुछ लड़के साधुसंतों जैसे लग रहे थे. ‘‘बहनजी… हमारी धर्मशाला में कमरा ले लो… एकदम मुफ्त मिलेगा… और वह भी सारी सुविधाओं के साथ…’’ उन में से एक बोला.

‘‘मुफ्त… तुम लोग मुफ्त में कमरा क्यों दे रहे हो भाई?’’ वीरेन ने पूछा. ‘‘अरे भाई… यह सब तो धर्म को बढ़ावा देने के लिए है… हम आप को कमरा देते हैं और बदले में आप हमारे दानपात्र में कुछ पैसे डाल देना… मंदिर जाने के लिए प्रसाद हमारे यहां से ही लेना…’’ दूसरा लड़का बोला.

पता नहीं क्यों जहां पर भी धर्म और दानपात्र दोनों एकसाथ आते हैं, वहां पर वीरेन को एक अलग ही गंध आने लगती है, पर साधुसंतों द्वारा चलाई जा रही धर्मशाला में कमरा ले कर रहने में धर्म की सेवा होगी, ऐसा सोच कर सिया मचलने लगी, ‘‘वीरेन, सही तो कह रहे हैं ये लोग… आखिर धर्मशाला में कमरा ले कर रहने में बुराई ही क्या है?’’

‘‘हां, ठीक है, पर अगर कमरे हमारे रहने लायक नहीं होंगे, तो हम फिर किसी और होटल में चलेंगे,’’ वीरेन ने फैसला सुनाया और सिर हिला कर नताशा और तान्या ने उस पर अपनी मुहर लगा दी. आगेआगे वे लड़के चल रहे थे और पीछेपीछे ये चारों. कुछ देर पैदल चलने के बाद ही वे उस धर्मशाला के सामने खड़े थे, जिस में उन्हें रहना था. बाहर से तो एक एकदम साधारण सी बिल्डिंग लग रही थी, पर अंदर कदम रखते ही उन चारों की समझ में आ गया कि यह धर्मशाला किसी होटल से कम नहीं है.

उस धर्मशाला के एक तरफ जगमग करता हुआ मंदिर बना था और दूसरी तरफ कमरे बने हुए थे. मतलब साफ था कि वे लोग धर्मशाला का टैग लगा कर एक होटल चला रहे थे. चारों तरफ एक अलग सी सुगंध फैली हुई थी. सिया ने अपने लिए गए फैसले पर इठलाते हुए उन तीनों की तरफ देखा मानो यह कहना चाह रही हो कि देखा मेरा फैसला कितना सही था.

वीरेन अकेला एक कमरे में ठहर गया, जबकि बाकी तीनों लड़कियां दूसरे कमरे में. आज रातभर उन को आराम कर के कल सुबह ही उन लोगों को सिद्धनाथ बाबा के मंदिर के लिए निकलना था. अगली सुबह वे सभी जल्दी ही जाग गए और मंदिर दर्शन की तैयारी करने लगे. नताशा बाथरूम में नहाने गई थी, पर कुछ देर बाद ही वह बाथरूम से हड़बड़ाती हुई निकली और बाहर की ओर भागी. उसे इस तरह भागता देख कर कोई कुछ भी समझ नहीं पाया.

 

‘‘क्या हुआ नताशा…? तू इतनी परेशान क्यों है?’’ पीछे से आते हुए तान्या ने पूछा.‘‘पता है, जब मैं बाथरूम में नहा रही थी, तभी खिड़की से कोई मोबाइल के कैमरे से मेरी वीडियो शूट कर रहा था. मैं ने उसे देख कर जल्दी से कपड़े पहने  और पकड़ने के लिए बाहर लपकी, पर वहां पर कोई नहीं था. मैं इस बात की शिकायत यहां के मैनेजर से करने जा रही हूं,’’ कहने के साथ ही नताशा सीधे मैनेजर के पास पहुंची, जहां पर एक गंजा साधु बैठा हुआ था.

‘‘देखिए, यह एक तीर्थस्थल है… यहां आ कर तो सभी के मन का मैल अपनेआप धुल जाता है और फिर हमारे यहां ऐसा काम कौन करेगा भला… देखो बेटी, तुम से कोई भूल हुई है, फिर भी आप लोगों को कोई असुविधा हुई है, तो मैं आप लोगों का कमरा बदलवा देता हूं,’’ उस साधु ने कहा.

 

वह साधु मैनेजर ये बातें कहते हुए बारबार मंदिर की ओर देख कर हाथ जोड़ता और एक छोटी सी माला को हाथ में घुमा रहा था.

 

मुंहबोली बहनें- भाग 4 : रोहन ने अपनी पत्नी को क्यों दे डाली धमकी

भाभी सुंदर और समझदार थीं. शादी के बाद रोहन भैया के स्वभाव में भी बहुत परिवर्तन आ गया. अब वे काफी शांत और गंभीर रहने लगे थे. कालेज के समय वाली उच्छृंखलता अब कहीं उन के स्वभाव में नहीं दिखती थी. साल भर तक तो उन का दांपत्य जीवन बहुत अच्छी तरह चला पर अचानक न जाने क्या हुआ कि भैयाभाभी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. उन के बीच अकसर बहस होने लगी. ताईजी के लाख पूछने पर भी दोनों में से कोई भी कुछ बताने को तैयार नहीं होता. उसी दौरान मैं मायके गई थी तो ताईजी के यहां भी सब से मिलने चली गई. ताईजी ने उन लोगों के बिगड़ते रिश्ते के बारे में बताते हुए मुझे भाभी से बात कर के कारण जानने को कहा. पहले तो भाभी ने बात को टालना चाहा किंतु मेरे हठ पकड़ लेने पर उन्होंने जो कहा उस पर यकीन करना मुश्किल था.

भाभी ने कहा, ‘‘रोहन का शक्की स्वभाव उन के वैवाहिक जीवन पर ग्रहण लगा रहा है. मेरे एक मुंहबोले भाई को ले कर इन के मन में शक का कीड़ा कुलबुला रहा है. मैं उन्हें हर तरह से समझा चुकी हूं कि उस के साथ मेरा भाईबहन के अलावा और किसी तरह का कोई संबंध नहीं है पर इन्हें मेरी किसी बात पर यकीन ही नहीं है. मेरी हर बात के जवाब में बस यही कहते हैं, ‘ये मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता क्या होता है मुझे न समझाओ. किसी अमर्यादित रिश्ते पर परदा डालने के लिए मुंहबोला भाई और मुंहबोली बहन का जन्म होता है.’ इन का कहना है कि या तो अपने मुंहबोले भाई से ही रिश्ता रख लो या मुझ से. अब तुम ही बताओ इतने सालों का रिश्ता क्या कह कर खत्म करूं? कितने अपमान की बात है मेरे लिए इतना बड़ा आरोप सहना.’’

मैं ने भाभी को आश्वस्त करते हुए कहा कि आप चिंता न करें मैं भैया से बात करती हूं. मैं जब रोहन भैया से इस बारे में बात करने गई तो बात शुरू करने से पहले ही उन्होंने मेरा मुंह यह कह कर बंद कर दिया, ‘‘सोनाली, अगर तुम मुझे कुछ समझाने आई हो तो बेहतर होगा कि वापस चली जाओ.’’ रोहन भैया के रूखे व्यवहार के आगे तो मेरी बात शुरू करने की हिम्मत ही नहीं हुई. बातबात पर उन से झगड़ने और बहस कर बैठने वाली मुझ सोनाली की बोलती ही बंद हो गई. पर बात चूंकि उन के वैवाहिक रिश्ते को बचाने की थी इसलिए हिम्मत कर के मैं उन के पास बैठ गई.

‘‘रोहन भैया, बात इतनी बड़ी नहीं है कि आप ने अपना और भाभी का रिश्ता दावं पर लगा दिया है. भाभी कह रही हैं कि उन का मुंहबोला भाई है तो उन की बात का आप यकीन क्यों नहीं करते? आखिर कालेज में आप की भी तो कई मुंहबोली बहनें थीं फिर…’’ मैं आगे कुछ और बोलूं उस से पहले ही रोहन भैया वहां से उठ खड़े हुए, ‘‘हां, सोनाली, मेरी कई मुंहबोली बहनें थीं और मैं कइयों का मुंहबोला भाई था इसीलिए इस रिश्ते की हकीकत मुझ से ज्यादा कोई नहीं जानता. कह दो अपनी भाभी से या तो मैं या वह मुंहबोला भाई, जिसे चुनना है चुन ले.’’ मैं अवाक सी भैया का मुंह देखती रह गई. कालेज वाले भैया तो वे थे ही नहीं जिन से मैं कुछ बहस कर सकती. ‘रोहन भैया, रोहन भैया’ कहने वाली कालेज की बहनों का उन्हें देख कर आहें भरना मैं भी कहां भूल पाई थी कि किसी तरह का तर्क दे कर उन की सोच को झुठलाने की कोशिश करने की हिम्मत जुटा पाती.

मेरे पास भाभी को समझाने के अलावा और कोई रास्ता शेष नहीं बचा था. रोहन भैया का शक उन के अपने अनुभव पर आधारित था. न जाने मुंहबोले भाईबहन के रिश्तों को उन्होंने किस तरह जिया था. दुनिया को तो वे अपने ही अनुभव के आधार पर देखेंगे. ‘‘रिश्ता बचाना है तो आप के सामने रोहन भैया की शर्त मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है भाभी, क्योंकि उन का शक उन के अनुभव पर आधारित है और अपने ही अनुभव को भला वे कैसे नकार सकते हैं. रिश्ता बचाने के लिए त्याग आप को ही करना पड़ेगा,’’ भारी मन से भाभी से यह सब कह कर मैं चुपचाप अपने घर की ओर चल दी.

 

सिया के आंसू : भाग 2

नताशा के पास और कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि वह साधु मैनेजर यह मानने को तैयार ही नहीं था कि ऐसी कोई घटना उस की धर्मशाला में हो भी सकती है. उस की बातों से नताशा को लगा कि हो सकता है, उसे कोई गलतफहमी हो गई हो, क्योंकि आजकल ट्रायल रूम में कैमरा छिपे होने और कपड़े बदलती लड़कियों के वीडियो बना कर उन्हें बेचने और इंटरनैट पर अपलोड कर लड़कियों को ब्लैकमेल करने संबंधी जैसे कई केस सामने आ चुके थे.

 

वीरेन काफी गुस्से में था और पुलिस में रिपोर्ट करना चाह रहा था, पर यहां भी सिया ने उसे ऐसा करने से रोक लिया और बोली, ‘‘देखो, अब कुछ देर में ही हमें यहां से मंदिर के लिए निकलना है… प्लीज, कोई बखेड़ा मत खड़ा करो.’’वीरेन खून के कड़वे घूंट पी कर रह गया था, पर उस ने तत्काल ही वहां से निकलने की बात सोची और आननफानन में सारा सामान पैक कर वे लोग उस धर्मशाला से निकल कर एक अच्छे से होटल में आ गए थे.

होटल में अपना सामान रख कर वे सिद्धनाथ मंदिर की ओर चल पड़े. एक बैग में कुछ कपड़े और पैसे वगैरह उन के साथ में था. यहां से तकरीबन 12 किलोमीटर का सफर उन्हें पैदल ही तय करना था.

रास्ते में कई रैस्ट हाउस थे, जिन के बाहर एजेंट लोग ग्राहक लाने के लिए रखे गए थे और कई ऐसी भी दुकानें थीं, जो उन के यहां से प्रसाद खरीदने पर उन के जूतेचप्पलों की मुफ्त में ही रखवाली करते रहेंगे.

सिया का बस चलता तो इन सब दुकानों से कुछ न कुछ जरूर खरीदती, पर वीरेन का उखड़ा हुआ मूड देख कर वह भी सीधी चलती रही. रास्ते में उन्हें कई भिखारी मिल रहे थे, जो किसी भी तरह से पैसे मांग रहे थे.

सिद्धनाथ बाबा का मंदिर आ चुका था. सिया, नताशा और तान्या के चेहरे पर एक तरह का संतोष चमक उठा था और उन लोगों ने वहां के नजारों को अपने कैमरे में कैद करना शुरू कर दिया था.

तभी तान्या की नजर एक तरफ बैठे नागा साधुओं पर गई, जो चिलम पी रहे थे.‘‘पहना दे छल्ला, लेले लल्ला,’’ एक नागा साधु ने सिया की तरफ देखते हुए कहा और फिर से चीखा, ‘‘पहना दे छल्ला, लेले लल्ला…’’ और अपने अंग की तरफ इशारा किया.

इस भद्दे इशारे पर सिया को बहुत बुरा लगा. उस ने सोचा कि वह जा कर उस नागा का मुंह ही नोच ले, पर वह जानती थी कि यहां पर नागा लोगों की पूरी जमात है और इन्हें छेड़ना किसी भी सूरत में सही नहीं होगा, इसलिए उस ने उस नागा की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

‘‘मंदिर में प्रवेश से पहले अपने हाथमुंहपैर धो लें आप लोग,’’ एक लड़का उन लोगों के पास आ कर बोला.‘‘हांहां… पर यहां कहीं तो कोई पानी की टंकी या नलका दिखाई नहीं पड़ता,’’ वीरेन ने कहा.

‘‘श्रीमानजी, यहां सब है… वह जो सामने एक कमरा सा दिख रहा है, उस में कोई भी जा कर उसे इस्तेमाल में ले सकता है… बस, उस की कीमत देनी होगी,’’ उस लड़के ने कहा.‘कीमत… पर, ये तो आम सुविधाएं हैं, सरकार और मंदिर प्रशासन की तरफ से मुफ्त मिलती हैं,’’ वीरेन ने चौंकते हुए कहा.

‘‘जी मिलती होंगी, पर यहां पर आप को कीमत चुकानी होगी. एक आदमी मात्र 100 रुपए दे कर इस बाथरूम की सुविधा ले सकता है… आप 4 लोग हैं, इसलिए 400 रुपए दे दीजिए.’’‘‘बड़ी अजीब सी बात है…’’ वीरेन बुदबुदाया.

उस का माथा गरम होता देख कर सिया ने कहा, ‘‘हाथपैर धोना तो जरूरी ही होता है, इसलिए यह लो भाई 400 रुपए…’’ कह कर सिया ने उस लड़के को पैसे दिए और सभी लोग फ्रैश हो कर सिद्ध बाबा के दर्शन की तरफ बढ़ लिए.

आगे कुछ दुकानें लगी हुई थीं, जिन पर प्रसाद बिक रहा था और प्रसाद की थाली के उचित रेट के बदले में 20 गुना दाम वसूले जा रहे थे. कोई थाली 1,100 रुपए की थी, तो कोई 2,100 रुपए की.पर मरता क्या न करता… इन चारों ने भी 1,100-1,100 रुपए की 4 थालियां ले लीं.

दर्शन के लिए लंबी लाइन लगी हुई थी. ये लोग भी लाइन में जा कर लग गए. थोड़ी देर बाद तान्या को अपने सीने पर किसी की कुहनी लगने का अंदेशा हुआ और यह अंदेशा गलत नहीं था, बल्कि मंदिर की दीवार की सफाई का बहाना करता एक जवान पंडा तान्या के सीने पर बारबार अपनी कुहनी से दबाव बना रहा था.

 

सिया के आंसू : भाग 3

‘‘अरे भैया, क्या कर रहे हो… देख कर काम करो न,’’ तान्या ने उस की नीयत जानते हुए एतराज जताया, तो वह पंडा नाराज होते हुए बोला, ‘‘अब हमारा यही काम है और इस काम में कोई चमड़े की बनी देह बीच में आ गई तो भला इस में हमारा क्या दोष है,’’ और फिर वह पंडा संस्कृत में कुछ जोरजोर से पढ़ने लगा.

‘‘अरे, आप लोग कहां लाइन में लग कर धक्के खा रहे हैं… आप तो वीआईपी लोग हैं… आप चाहें तो मैं पीछे के गेट से आप को 10 मिनट में ही स्पैशल दर्शन करा सकता हूं…’’ एक पंडे ने वीरेन के पास आ कर धीरे से कहा.

वीरेन ने लंबी लाइन में लगने के बजाय स्पैशल दर्शन के लिए हामी भर दी, तो फौरन ही वह पंडा 5,000 रुपए मांगने लगा.

‘‘पर, ये तो बहुत ज्यादा हैं,’’ वीरेन ने कहा.

‘‘अरे, तो जैसा काम है वैसा दाम है. भाई, समझ में आए तो बताओ, नहीं तो मैं दूसरा कस्टमर देखता हूं,’’ पंडा अपना सब्र खोता हुआ सा बोला.

‘‘ठीक है भैया, ये लो पैसे और जल्दी से हमें दर्शन करा दो,’’ सिया ने उस पंडे को पैसे देते हुए कहा.

फिर क्या था, उस पंडे ने उन्हें पीछे के दरवाजे से मात्र 10 मिनट में मंदिर के अंदर पहुंचा दिया था.

सिया, नताशा और तान्या तो खुशी के मारे मानो झूम रही थीं.

‘‘ऐ लड़की… अंधी है क्या… सामने साफसाफ लिखा है कि मंदिर के अंदर कोई सैल्फी नहीं, कोई तसवीर नहीं ली जाएगी…’’ एक लंबी दाढ़ी वाले बाबा ने तान्या के गले में लटकते हुए कैमरे को देख कर कहा.

‘‘पर बाबाजी, मैं सैल्फी नहीं ले रही हूं और न ही कोई फोटो ले रही हूं. यह कैमरा तो बाहर के फोटो लेने के लिए गले में टंगा हुआ था और इसीलिए अब भी इसी तरह टंगा हुआ है,’’ तान्या ने जवाब दिया.

‘‘तुम लोग तो भगवान के साथ भी सैल्फी लेने से बाज नहीं आते,’’ वह पंडा बोला और फिर घंटी बजाने में मशगूल हो गया.

पूजा करने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हुए ये चारों अभी हाथ जोड़े मंदिर के अंदर खड़े थे कि तभी गेरुए कपड़े पहने हुए एक और लड़का तान्या के पास आ कर बोला, ‘‘दीदी, अगर यहां मंदिर के अंदर सैल्फी लेनी है, तो आप को 500 रुपए देने होंगे… सैल्फी दिलवाना मेरी जिम्मेदारी होगी.’’

‘‘नहीं… मुझे कोई सैल्फीवैल्फी नहीं लेनी है… तुम जाओ यहां से,’’ तान्या चीख पड़ी.

उस के मना करने से वह पंडा भी चिढ़ गया और बोला, ‘‘अरे, हम कहां जाएंगे… हमारा तो घर यही है… और काम भी यही है.’’

उस की इस बात पर तान्या सिर्फ उसे घूरती रह गई.

मंदिर में ढोलनगाड़े बज रहे थे. लोगों की भीड़ को देख कर पंडों ने और तेजी से ढोल पीटने शुरू कर दिए थे.

‘‘कुछ देर बाद आप लोगों का नंबर आने वाला है… यह रेट लिस्ट देखिए और बताइए कि आप लोग कितने वाली पूजा कराने वाले हैं…’’ मंदिर के अंदर बैठे एक साधु ने इन लोगों से कहा.

‘‘कितने वाली पूजा का क्या मतलब है पंडितजी?’’ वीरेन ने पूछा.

‘‘वह सामने देखो, बोर्ड पर सारे रेट लिखे हुए हैं,’’ पंडित ने एक बोर्ड की तरफ इशारा करते हुए कहा.

इन चारों ने बोर्ड पर देखा, तो वहां पर हर तरह की पूजा के लिए अलगअलग रेट तय था और पूजा की अवधि के साथ उस की कीमत भी बढ़ती जा रही थी. उस में यह भी लिखा हुआ था कि कौन सी पूजा में कितने लोग कितनी कीमत चुका कर शामिल हो सकते हैं.

पूजा का भी कोई रेट होता है, यह इन चारों ने पहली बार जाना था. अब तो सिया को भी बात कुछ अखरने लगी थी.

‘‘अरे पंडितजी, टीका तो लगा दीजिए,’’ सिया ने पुजारी से कहा और अपनी प्रसाद की थाली आगे बढ़ाई.

‘‘प्रसाद के साथसाथ इस में कुछ दक्षिणा भी तो रख बच्ची,’’ पुजारी ने तिरछी नजर से देखा और सिया के माथे पर बेमन से टीका लगाते हुए कहा.

सिया ने 100 रुपए का नोट बढ़ाया, तो पुजारी नाराज हो गया और कहने लगा, ‘‘आप दक्षिणा इतनी तो दीजिए

कि एक आदमी के एक समय का भोजन तो हो ही जाए, इस 100 रुपए में भला क्या होगा…’’

हार कर सिया ने 500 रुपए दिए, तब जा कर उस पुजारी के चेहरे पर थोड़ी मुसकराहट आई.

इतना होतेहोते वीरेन का मन पूजा

से पूरी तरह हट चुका था. चारों तरफ लूटखसोट के माहौल से वह ऊब चुका था. भला कहीं पूजा करवाने का भी कोई रेट होता है. सामने ही रेट का बोर्ड

लगा हुआ था. वीरेन ने उस बोर्ड की तसवीर खींच ली, पर उसे रेट बोर्ड का फोटो लेते देख कर पुजारी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘पानी की एक बूंद से पैदा हुआ आदमी, तू एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा और यह तेरा अहंकार ही तुझे गर्त में ले जा रहा है. तू इस बोर्ड की तसवीर ले कर क्या कर लेगा… और देख लेते हैं कि तू क्या कर सकता है?’’

पुजारी की बातें सुन कर वीरेन मंदिर से बाहर आ गया. उस के पीछे से सिया, नताशा और तान्या भी बाहर आ गईं. उन चारों ने यहां चलने वाले गोरखधंधे को दुनिया के सामने लाने के लिए इस पूरे ठगी के मामले को सोशल मीडिया पर शेयर करने की गरज से मंदिर के बाहर ही एक वीडियो बनाया, जिस में पूजा के हर काम में पंडितों द्वारा पैसे उगाहने की बात कही गई थी.

अब पूजा से सब का मन हट चुका था और वे चारों वापस आने लगे थे.

रास्ते में कुछ लोकल लड़के बैठे हुए थे. वीरेन के साथ 3 लड़कियों को देख कर उन में से एक लड़का बोला, ‘‘अरे भाई, एक अकेले लड़के के साथ 3-3 लड़कियां… बड़ी नाइंसाफी है रे… हमें भी साथ ले लो…’’ यह बात इतने भद्दे ढंग से कही गई थी कि वीरेन का गुस्सा भड़कना लाजिमी था, पर सिया ने किसी तरह अपनी कसम दे कर उसे शांत किया.

उधर सोशल मीडिया पर इन चारों का रोष भरा वीडियो वायरल होते देर नहीं लगी, जहां पर एक बुद्धिजीवी वर्ग का पूरा साथ इन लोगों को मिल रहा था, वहीं दूसरी तरफ तथाकथित धार्मिक लोग सिया और वीरेन को गालियां भी दे रहे थे और कुछ धार्मिक संगठनों ने तो इन्हें जान से मार डालने की धमकी भी दे दी थी, क्योंकि इन लोगों ने सिद्धनाथ मंदिर के अंदर चलने वाले पुजारियों के गंदे खेल को उजागर करने की कोशिश की थी. नताशा और तान्या तो इस बात से डरी हुई थीं.

वे चारों जल्दी से जल्दी अपने होटल पहुंच कर आराम करना चाहते थे और होटल अब करीब ही था, पर सामने से कुछ पंडे चले आ रहे थे.

‘‘क्यों भाई, तुम लोग हमारी धर्मशाला में रुके और बिना कोई पैसे दिए, बिना कुछ दानपात्र में डाले ही वहां से चले आए… किस बात की जल्दी थी तुम लोगों को…’’ ये सब उस धर्मशाला के लोग थे, जहां ये चारों सब से पहले रुके थे.

‘‘जी देखिए, हमें वहां कुछ ऐसा महसूस हुआ, जो हमें सही नहीं लगा. वहां बाथरूम में कुछ गलत हो रहा था, इसीलिए हम ने उस धर्मशाला को छोड़ना ही सही समझा,’’ वीरेन ने शांत आवाज में कहा.

‘‘भेड़ जहां जाएगी वहीं मूड़ी जाएगी… कहां नहीं बनते हैं ये नंगे वीडियो… धर्मशाला छोड़ोगे तो होटल में भी बनेंगे… अच्छा बताओ कि इन में से किस लड़की को नंगा देखना चाहोगे तुम? मेरे इस मोबाइल में इन सब के वीडियो हैं,’’ एक पंडा अपना होंठ काटते हुए बोला.

अब तो वीरेन के गुस्से की सीमा नहीं रही. उस ने तुरंत ही उन पंडों पर अटैक कर दिया. पर वह अकेला था और वे 8-10 लोग थे. उन सब ने वीरेन को इतना मारा कि वह अधमरा हो गया और उसे उसी हालत में छोड़ कर वे पंडे, जो शायद पंडे न हो कर गुंडे थे, सब फरार हो गए.

वीरेन के सिर से खून बह रहा था. जल्द ही उसे अस्पताल ले जाना होगा, नहीं तो कुछ भी हो सकता था. वे तीनों लड़कियां मदद के लिए इधरउधर भाग रही थीं, पर कोई भी मदद करने को तैयार नहीं था.

तभी सिया को एक खाली एंबुलैंस आती दिखाई दी. उस ने हाथ दे कर उसे रुकवाया और ड्राइवर से घायल वीरेन को अस्पताल पहुंचाने की गुजारिश की. ड्राइवर ने भी मामले की गंभीरता

को समझते हुए वीरेन को तुरंत ही लिटाया और एंबुलैंस को सड़क पर दौड़ा दिया.

पर कुछ किलोमीटर चलने पर ड्राइवर को रुक जाना पड़ा, क्योंकि आगे कोई जुलूस जा रहा था. एंबुलैंस के बारबार हौर्न और हूटर बजाने का भी उन लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था. इधर वीरेन की हालत उपचार नहीं मिल पाने के चलते बिगड़ती ही जा रही थी.

जुलूस की भीड़ को न हटता देख कर  सिया खुद नीचे उतर गई और हाथ जोड़ कर भीड़ से रास्ता देने की अपील करने लगी. वह बहुत देर तक सब से प्रार्थना करती रही, पर किसी पर कोई असर नहीं हुआ.

किसी ने बताया कि आज पीले मठ वाले बाबा का जन्मदिन है और उन की झांकी उसी उपलक्ष्य में निकाली जा रही है और अभी फिलहाल तो यह भीड़ नहीं हट सकती है. अच्छा होगा कि तुम कोई दूसरा रास्ता पकड़ लो.

पर कौन सा रास्ता पकड़ती सिया. यह एक पहाड़ी जगह थी और अस्पताल तक यही एक सड़क जाती थी. इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था.

सिया भाग कर एंबुलैंस में आई, पर तब तक वीरेन मर चुका था. यह देख कर सिया की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.

अपारदर्शी सच- भाग 1: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

रात के 11 बज चुके थे. तनुजा की आंखें नींद और इंतजार से बोझिल हो रही थीं. बच्चे सो चुके थे. मम्मीजी और मनीष लिविंगरूम में बैठे टीवी देख रहे थे. तनुजा का मन हो रहा था कि मनीष को आवाज दे कर बुला ले, लेकिन मम्मी की उपस्थिति के लिहाज के चलते उसे ठीक नहीं लगा. पानी पीने के लिए किचन में जाते हुए उस ने मनीष को देखा पर उन का ध्यान नहीं गया. पानी पी कर भी अतृप्त सी वह वापस कमरे में आ गई.

बिस्तर पर बैठ कर उस ने एक नजर कमरे पर डाली. उस ने और मनीष ने एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल रख कर इस कमरे को सजाया था.

हलके नीले रंग की दीवारों में से एक पर खूबसूरत पहाड़ी, नदी से गिरते झरने और पेड़ों की पृष्ठभूमि से सजी पूरी दीवार के आकार का वालपेपर. खिड़कियों पर दीवारों से तालमेल बिठाते नैट के परदे, फर्श से छत तक की अलमारियां, तरहतरह के सौंदर्य प्रसाधनों से भरी अंडाकार कांच की ड्रैसिंगटेबल, बिस्तर पर साटन की रौयल ब्लू चादर और टेबल पर सजा महकते रजनीगंधा के फूलों का गुलदस्ता. उसे लगा, सभी मनीष का इंतजार कर रहे हैं.

तनुजा की आंख खुली, तब दिन चढ़ आया था. उस का इंतजार अभी भी बदन में कसमसा रहा था. मनीष दोनों हाथ बांधे बगल में खर्राटे ले कर सो रहे थे. उस का मन हुआ, उन दोनों बांहों को खुद ही खोल कर उन में समा जाए और कसमसाते इंतजार को मंजिल तक पहुंचा दे. लेकिन घड़ी ने इस की इजाजत नहीं दी. फुरफुराते एहसासों को जूड़े में लपेटते वह बाथरूम चली गई.

बेटे ऋषि व बेटी अनु की तैयारी करते, सब का नाश्ताटिफिन तैयार करते, भागतेदौड़ते खुद की औफिस की तैयारी करते हुए भी रहरह कर एहसास कसमसाते रहे. उस ने आंखें बंद कर जज्बातों को जज्ब करने की कोशिश की, तभी सासुमां किचन में आ गईं. वह सकपका गई. उस ने झटके से आंखें खोल लीं और खुद को व्यस्त दिखाने के लिए पास पड़ा चाकू उठा लिया पर सब्जी तो कट चुकी थी, फिर उस ने करछुल उठा लिया और उसे खाली कड़ाही में चलाने लगी. सासुमां ने चश्मे की ओट से उसे ध्यान से देखा.

कड़ाही उस के हाथ से छूट गई और फर्श पर चक्कर काटती खाली कड़ाही जैसे उस के जलते एहसास उस के जेहन में घूमने लगे और वह चाह कर भी उन्हें थाम नहीं पाई.

एक कोमल स्पर्श उस के कंधों पर हुआ. 2 अनुभवी आंखों में उस के लिए संवेदना थी. वह शर्मिंदा हुई उन आंखों से, खुद को नियंत्रित न कर पाने से, अपने यों बिखर जाने से. उस ने होंठ दबा कर अपनी रुलाई रोकी और तेजी से अपने कमरे में चली गई.

बहुत कोशिश करने के बावजूद उस की रुलाई नहीं रुकी, बाथरूम में शायद जी भर रो सके. जातेजाते उस की नजर घड़ी पर पड़ी. समय उस के हाथ में न था रोने का. तैयार होतेहोते तनुजा ने सोते हुए मनीष को देखा. उस की बेचैनी से बेखबर मनीष गहरी नींद में थे.

तैयार हो कर उस ने खुद को शीशे में निहारा और खुद पर ही मुग्ध हो गई. कौन कह सकता है कि वह कालेज में पढ़ने वाले बच्चों की मां है? कसी हुई देह, गोल चेहरे पर छोटी मगर तीखी नाक, लंबी पतली गरदन, सुडौल कमर के गिर्द लिपटी साड़ी से झांकते बल. इक्कादुक्का झांकते सफेद बालों को फैशनेबल अंदाज में हाईलाइट करवा कर करीने से छिपा लिया है उस ने. सब से बढ़ कर है जीवन के इस पड़ाव का आनंद लेती, जीवन के हिलोरों को महसूस करते मन की अंगड़ाइयों को जाहिर करती उस की खूबसूरत आंखें. अब बच्चे बड़े हो कर अपने जीवन की दिशा तय कर चुके हैं और मनीष अपने कैरियर की बुलंदियों पर हैं. वह खुद भी एक मुकाम हासिल कर चुकी है. भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति है जो उस के चेहरे, आंखों, चालढाल से छलकती है.

मनीष उठ चुके थे. रात के अधूरे इंतजार के आक्रोश को परे धकेल एक मीठी सी मुसकान के साथ उस ने गुडमौर्निंग कहा. मनीष ने एक मोहक नजर उस पर डाली और उठ कर उसे बांहों में भर लिया. रीढ़ में फुरफुरी सी दौड़ गई. कसमसाती इच्छाएं मजबूत बांहों का सहारा पा कर कुलबुलाने लगीं. मनीष की आंखों में झांकते हुए तपते होंठों को उस के होंठों के पास ले जाते शरारत से उस ने पूछा, ‘‘इरादा क्या है?’’ मनीष जैसे चौंक गए, पकड़ ढीली हुई, उस के माथे पर चुंबन अंकित करते, घड़ी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘इरादा तो नेक ही है, तुम्हारे औफिस का टाइम हो गया है, तुम निकल जाना.’’ और वे बाथरूम की तरफ बढ़ गए.

जलते होंठों की तपन को ठंडा करने के लिए आंसू छलक पड़े तनुजा के. कुछ देर वह ऐसे ही खड़ी रही उपेक्षित, अवांछित. फिर मन की खिन्नता को परे धकेल, चेहरे पर पाउडर की एक और परत चढ़ा, लिपस्टिक की रगड़ से होंठों को धिक्कार कर वह कमरे से बाहर निकल गई.

अपारदर्शी सच- भाग 3: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

निशा उस की अच्छी सहेली थी. उस से तनुजा की कशमकश छिपी न रह सकी. तनुजा को दिल का बोझ हलका करने को एक साथी तो मिला जिस से सहानुभूति के रूप में फौरीतौर पर राहत मिल जाती थी. निशा उसे समझाती तो थी पर क्या वह समझना चाहती है, वह खुद भी नहीं समझ पाती थी. उस ने कई बार इशारे में उसे विकल्प तलाशने को कहा तो कई बार इस के खतरे से आगाह भी किया. कई बार तनुजा की जरूरत की अहमितयत बताई तो कई बार समाज, संस्कार के महत्त्व को भी समझाया. तनुजा की बेचैनी ने उस के मन में भी हलचल मचाई और उस ने खुद ही खोजबीन कर के कुछ रास्ते सुझाए.

धड़कते दिल और डगमगाते कदमों से तनुजा ने उस होटल की लौबी में प्रवेश किया था. साड़ी के पल्लू को कस कर लपेटे वह खुद को छिपाना चाह रही थी पर कितनी कामयाब थी, नहीं जानती. रिसैप्शन पर बड़ी मुश्किल से रूम नंबर बता पाई थी. कितनी मुश्किल से अपने दिल को समझा कर वह खुद को यहां तक ले कर आई थी. खुद को लाख मनाने और समझाने पर भी एक व्यक्ति के रूप में खुद को देख पाना एक स्त्री के लिए कितना कठिन होता है, यह जान रही थी.

अपनी इच्छाओं को एक दायरे से बाहर जा कर पूरा करना कितना मुश्किल होता है, लिफ्ट से कमरे तक जाते यही विचार उस के दिमाग को मथ रहे थे. कमरे की घंटी बजा कर दरवाजा खुलने तक 30 सैकंड में 30 बार उस ने भाग जाना चाहा. दिल बुरी तरह धड़क रहा था. दरवाजा खुला, उस ने एक बार आसपास देखा और कमरे के अंदर हो गई. एक अनजबी आवाज में अपना नाम सुनना भी बड़ा अजीब था. फुरफुराते एहसास उस की रीढ़ को झुनझुना रहे थे. बावजूद इस के, सामने देख पाना मुश्किल था. वह कमरे में रखे एक सोफे पर बैठ गई, उसे अपने दिमाग में मनीष का चेहरा दिखाई देने लगा.

क्या वह ठीक कर रही? इस में गलत क्या है? आखिर मैं भी एक इंसान हूं. अपनी इच्छाएं, अपनी जरूरतें पूरी करने का हक है मुझे. मनीष को पता चला तो?

कैसे पता चलेगा, शहर के इस दूसरे कोने में घरऔफिस से दसियों किलोमीटर दूर कुछ हुआ है, इस की भनक तक इतनी दूर नहीं लगेगी. इस के बाद क्या वह खुद से नजरें मिला पाएगी? यह सब सोच कर उस की रीढ़ की वह सनसनाहट ठंडी पड़ गई, उठ कर भाग जाने का मन हुआ. वह इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती. मनीष, मम्मी, बच्चे, जानपहचान वाले, रिश्तेदार सब की नजरों में वह नहीं गिर सकती.

वेटर 2 कौफी रख गया. कौफी की भाप के उस पार 2 आंखें उसे देख रही थीं. उन आंखों की कामुकता में उस के एहसास फिर फुरफुराने लगे. उस ने अपने चेहरे से हो कर गरदन, वक्ष पर घूमती उन निगाहों को महसूस किया. उस के हाथ पर एक स्पर्श उस के सर्वांग को थरथरा गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. वह स्पर्श ऊपर और ऊपर चढ़ते बाहों से हो कर गरदन के खुले भाग पर मचलने लगा. उस की अतृप्त कामनाएं सिर उठाने लगीं. अब वह सिर्फ एक स्त्री थी हर दायरे से परे, खुद की कैद से दूर, अपनी जरूरतों को समझने वाली, उन्हें पूरा करने की हिम्मत रखने वाली.

सहीगलत की परिभाषाओं से परे अपनी आदिम इच्छाओं को पूरा करने को तत्पर वह दुनिया के अंतिम कोने तक जा सकने को तैयार, उस में डूब जाने को बेचैन. तभी वह स्पर्श हट गया, अतृप्त खालीपन के झटके से उस ने आंखें खोल दीं. आवाज आई, ‘कौफी पीजिए.’

कामुकता से मुसकराती 2 आंखें देख उसे एक तीव्र वितृष्णा हुई खुद से, खुद के कमजोर होने से और उन 2 आंखों से. होटल के उस कमरे में अकेले उस अपरिचित के साथ यह क्या करने जा रही थी वह? वह झटके से उठी और कमरे से बाहर निकल गई. लगभग दौड़ते हुए वह होटल से बाहर आई और सामने से आती टैक्सी को हाथ दे कर उस में बैठ गई. तनुजा बुरी तरह हांफ रही थी. वह उस रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

दोनों ओर स्थितियां चरम पर थीं. दोनों ही अंदर से टूटने लगे थे. ऐसे ही जिए जाने की कल्पना भयावह थी. उस रात तनुजा की सिसकियां सुन मनीष ने उसे सीने से लगा लिया. उस का गला रुंध गया, आंसू बह निकले. ‘‘मैं तुम्हारा दोषी हूं तनु, मेरे कारण…’’

तनु ने उस के होंठों पर अपनी हथेली रख दी, ‘‘ऐसा मत कहो, लेकिन मैं करूं क्या? बहुत कोशिश करती हूं लेकिन बरदाश्त नहीं कर पाती.’’

‘‘मैं तुम्हारी बेचैनी समझता हूं, तनु,’’ मनीष ने करवट ले कर तनुजा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया, ‘‘तुम चाहो तो किसी और के साथ…’’ बाकी के शब्द एक बड़ी हिचकी में घुल गए.

वह बात जो अब तक विचारों में तनुजा को उकसाती थी और जिसे हकीकत में करने की हिम्मत वह जुटा नहीं पाई थी, वह मनीष के मुंह से निकल कर वितृष्णा पैदा कर गई.

तनुजा का मन घिना गया. उस ने खुद ऐसा कैसे सोचा, इस बात से ही नफरत हुई. मनीष उस से इतना प्यार करते हैं, उस की खुशी के लिए इतनी बड़ी बात सोच सकते हैं, कह सकते हैं लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी? क्या ऐसा करना ठीक होगा? नहीं, कतई नहीं. उस ने दृढ़ता से खुद से कहा.

जो सच अब तक संकोच और शर्मिंदगी का आवरण ओढ़े अपारदर्शी बन कर उन के बीच खड़ा था, आज वह आवरण फेंक उन के बीच था और दोनों उस के आरपार एकदूसरे की आंखों में देख रहे थे. अब समाधान उन के सामने था. वे उस के बारे में बात कर सकते थे. उन्होंने देर तक एकदूसरे से बातें कीं और अरसे बाद एकदूसरे की बांहों में सो गए एक नई सुबह मेें उठने के लिए.

अपारदर्शी सच- भाग 2: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

करीब सालभर पहले तक सब सामान्य था. मनीष और तनुजा जिंदगी के उस मुकाम पर थे जहां हर तरह से इतमीनान था. अपनी जिंदगी में एकदूसरे की अहमियत समझतेमहसूस करते एकदूसरे के प्यार में खोए रहते.

इस निश्चितता में प्यार का उछाह भी अपने चरम पर था. लगता, जैसे दूसरा हनीमून मना रहे हों जिस में अब उत्सुकता की जगह एकदूसरे को संपूर्ण जान लेने की तसल्ली थी. मनीष अपने दम भर उसे प्यार करते और वह पूरी शिद्दत से उन का साथ देती. फिर अचानक यों ही मनीष जल्दी थकने लगे तो उसी ने पूरा चैकअप करवाने पर जोर दिया.

सबकुछ सामान्य था पर कुछ तो असामान्य था जो पकड़ में नहीं आया था. वह उन का और ध्यान रखने लगी. खाना, फल, दूध, मेवे के साथ ही उन की मेहनत तक का. उस की इच्छाएं उफान पर थीं पर मनीष के मूड के अनुसार वह अपने पर काबू रखती. उस की इच्छा देखते मनीष भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते लेकिन वह अतृप्त ही रह जाती.

हालांकि उस ने कभी शब्दों में शिकायत दर्ज नहीं की, लेकिन उस की झुंझलाहट, मुंह फेर कर सो जाना, तकिए में मुंह दबा कर ली गई सिसकियां मनीष को आहत और शर्मिंदा करती गईं. धीरेधीरे वे उन अंतरंग पलों को टालने लगे. तनुजा कमरे में आती तो मनीष कभी तबीयत खराब होने का बहाना बनाते, कभी बिजी होने की बात कर लैपटौप ले कर बैठ जाते.

कुछकुछ समझते हुए भी उसे शक हुआ कि कहीं मनीष का किसी और से कोई चक्कर तो नहीं है? ऐसा कैसे हो सकता है जो व्यक्ति शाम होते ही उस के आसपास मंडराने लगता था वह अचानक उस से दूर कैसे होने लगा? लेकिन उस ने यह भी महसूस किया कि मनीष

अब भी उस से प्यार करते हैं. उस की छोटीछोटी खुशियां जैसे सप्ताहांत में सिनेमा, शौपिंग, आउटिंग सबकुछ वैसा ही तो था. किसी और से चक्कर होता तो उसे और बच्चों को इतना समय वे कैसे देते? औफिस से सीधे घर आते हैं, कहीं टूर पर जाते नहीं.

शक का कीड़ा जब कुलबुलाता है तब मन जितना उस के न होने की दलीलें देता है उतना उस के होने की तलाश करता. कभी नजर बचा कर डायरी में लिखे नंबर, तो कभी मोबाइल के मैसेज भी तनुजा ने खंगाल डाले पर शक करने जैसा कुछ नहीं मिला.

उस ने कईकई बार खुद को आईने में निहारा, अंगों की कसावट को जांचा, बातोंबातों में अपनी सहेलियों से खुद के बारे में पड़ताल की और पार्टियों, सोशल गैदरिंग में दूसरे पुरुषों की नजर से भी खुद को परखा. कहीं कोई बदलाव, कोई कमी नजर नहीं आई. आज भी जब पूरी तरह से तैयार होती है तो देखने वालों की नजर एक बार उस की ओर उठती जरूरी है.

हर ऐसे मौकों पर कसौटी पर खरा उतरने का दर्प उसे कुछ और उत्तेजित कर गया. उस की आकांक्षाएं कसमसाने लगीं. वह मनीष से अंतरंगता को बेचैन होने लगी और मनीष उन पलों को टालने के लिए कभी काम में, कभी बच्चों और टीवी में व्यस्त होने लगे.

अधूरेपन की बेचैनी दिनोंदिन घनी होती जा रही थी. उस दिन एक कलीग को अपनी ओर देखता पा कर तनुजा के अंदर कुछ कुलबुलाने लगा, फुरफुरी सी उठने लगी. एक विचार उस के दिलोदिमाग में दौड़ कर उसे कंपकंपा गया. छी, यह क्या सोचने लगी हूं मैं? मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती. मेरे मन में यह विचार आया भी कैसे? मनीष और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं, प्यार का मतलब सिर्फ यही तो नहीं है. कितना धिक्कारा था तनुजा ने खुद को लेकिन वह विचार बारबार कौंध जाता, काम करते हाथ ठिठक जाते, मन में उठती हिलोरें पूरे शरीर को उत्तेजित करती रहीं.

अतृप्त इच्छाएं, हर निगाह में खुद के प्रति आकर्षण और उस आकर्षण को किस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, वह यह सोचने लगी. संस्कारों के अंकुश और नैसर्गिक प्यास की कशमकश में उलझी वह खोईखोई सी रहने लगी.

उस दिन दोपहर तक बादल घिर आए थे. खाना खा कर वह गुदगुदे कंबल में मनीष के साथ एकदूसरे की बांहों में लिपटे हुए कोई रोमांटिक फिल्म देखना चाहती थी. उस ने मनीष को इशारा भी किया जिसे अनदेखा कर मनीष ने बच्चों के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया. वे नासमझ बन तनुजा से नजरें चुराते रहे, उस के घुटते दिल को नजरअंदाज करते रहे. वह चिढ़ गई. उस ने जाने से मना कर दिया, खुद को कमरे में बंद कर लिया और सारा दिन अकेले कमरे में रोती रही.

तनुजा ने पत्रपत्रिकाएं, इंटरनैट सब खंगाल डाले. पुरुषों से जुड़ी सैक्स समस्याओं की तमाम जानकारियां पढ़ डालीं. परेशानी कहां है, यह तो समझ आ गया लेकिन समाधान? समाधान निकालने के लिए मनीष से बात करना जरूरी था. बिना उन के सहयोग के कोई समाधान संभव ही नहीं था. बात करना इतना आसान तो नहीं था.

शब्दों को तोलमोल कर बात करना, एक कड़वे सच को प्रकट करना इस तरह कि वह कड़वा न लगे, एक ऐसी सचाई के बारे में बात करना जिसे मनीष पहले से जानते हैं कि तनुजा इसे नहीं जानती और अब उन्हें बताना कि वह भी इसे जानती है, यह सब बताते हुए भी कोई आक्षेप, कोई इलजाम न लगे, दिल तोड़ने वाली बात पर दिल न टूटे, अतिरिक्त प्यारदेखभाल के रैपर में लिपटी शर्मिंदगी को यों सामने रखना कि वह शर्मिंदा न करे, बेहद कठिन काम था.

दिन निकलते गए. कसमसाहटें बढ़ती गईं. अतृप्त प्यास बुझाने के लिए वह रोज नए मौकेरास्ते तलाशती रही. समाज, परिवार और बच्चे उस पर अंकुश लगाते रहे. तनुजा खुद ही सोचती कि क्या इस एक कमी को इस कदर खुद पर हावी होने देना चाहिए? तो कभी खुद ही इस जरूरी जरूरत के बारे में सोचती जिस के पूरा न होने पर बेचैन होना गलत भी तो नहीं. अगर मनीष अतृप्त रहते तो क्या ऐसा संयम रख पाते? नहीं, मनीष उसे कभी धोखा नहीं देते या शायद उसे कभी पता ही नहीं चलने देते.

सपनों की राख तले : भाग 2

कई बार निवेदिता खुद से पूछती कि उस में उस का कुसूर क्या था कि वह सुंदर थी, स्मार्ट थी. लोगों के बीच जल्द ही आकर्षण का केंद्र बन जाती थी या उस की मित्रता सब से हो जाती थी. वरना पत्नी के प्रति दुराव की क्षुद्र मानसिकता के मूल कारण क्या हो सकते थे? शरीर के रोगों को दूर करने वाले तेजेश्वर यह क्यों नहीं समझ पाए कि इनसान अपने मृदु और सरल स्वभाव से ही तो लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बनता है.

दिनरात की नोकझोंक और चिड़- चिड़ाहट से दुखी हो उठी थी निवेदिता. सोचा, क्या रखा है इन घरगृहस्थी के झमेलों में?

एक दिन अपनी डिगरियां और सर्टिफिकेट निकाल कर तेज से बोली, ‘घर में बैठेबैठे मन नहीं लगता, क्यों न मैं कोई नौकरी कर लूं?’

‘और यह घरगृहस्थी कौन संभालेगा?’ तेज ने आंखें तरेरीं.

‘घर के काम तो चलतेफिरते हो जाते हैं,’ दृढ़ता से निवेदिता ने कहा तो तेजेश्वर का स्वर धीमा पड़ गया.

‘निवेदिता, घर से बाहर निकलोगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’

‘क्यों…’ लापरवाही से पूछा था उस ने.

‘लोग न जाने तुम्हें कैसीकैसी निगाहों से घूरेंगे.’

कितना प्यार करते हैं तेज उस से? यह सोच कर निवेदिता इतरा गई थी. पति की नजरों में, सर्वश्रेष्ठ बनने की धुन में वह तेजेश्वर की हर कही बात को पूरा करती चली गई थी, पर जब टांग पर टांग चढ़ा कर बैठने में, खिड़की से बाहर झांक कर देखने में, यहां तक कि किसी से हंसनेबोलने पर भी तेज को आपत्ति होने लगी तो निवेदिता को अपनी शुरुआती भावुकता पर अफसोस होने लगा था.

निरी भावुकता में अपने निजत्व को पूर्ण रूप से समाप्त कर, जितनी साधना और तप किया उतनी ही चतुराई से लासा डाल कर तेजेश्वर उस की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ही बाधित करते चले गए.

दर्द का गुबार सा उठा तो निवेदिता ने करवट बदल ली. यादों के साए पीछा कहां छोड़ रहे थे. विवाह की पहली सालगिरह पर मम्मीपापा 2 दिन पहले ही आ गए थे. मित्र, संबंधी और परिचितों को आमंत्रित कर उस का मन पुलक से भर उठा था लेकिन तेजेश्वर की भवें तनी हुई थीं. निवेदिता के लिए पति का यह रूप नया था. उस ने तो कल्पना भी नहीं की थी कि इस खुशी के अवसर को तेज अंधकार में डुबो देंगे और जरा सी बात को ले कर भड़क जाएंगे.

‘मटरमशरूम क्यों बनाया? शाही पनीर क्यों नहीं बनाया?’

छोटी सी बात को टाला भी जा सकता था पर तेजेश्वर ने महाभारत छेड़ दिया था. अकसर किसी एक बात की भड़ास दूसरी बात पर ही उतरती है. तेज का स्वभाव ही ऐसा था. दोस्ती किसी से करते नहीं थे, इसीलिए लोग उन से दूर ही छिटके रहते थे. आमंत्रित अतिथियों से सभ्यता और शिष्टता से पेश आने के बजाय, लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ही उन्होंने वह हंगामा खड़ा किया था. यह सबकुछ निवेदिता को अब समझ में आता है.

2 दिन तक मम्मीपापा और रहे थे. तेज इस बीच खूब हंसते रहे थे. निवेदिता इसी मुगालते में थी कि मम्मीपापा ने कुछ सुना नहीं था पर अनुभवी मां की नजरों से कुछ भी नहीं छिपा था.

घर लौटते समय तेज का अच्छा मूड देख कर उन्होंने मशविरा दिया था, ‘जिंदगी बहुत छोटी है. हंसतेखेलते बीत जाए तो अच्छा है. ज्यादा ‘वर्कोहोलिक’ होने से शरीर में कई बीमारियां घर कर लेती हैं. कुछ दिन कहीं बाहर जा कर तुम दोनों घूम आओ.’

इतना सुनते ही वह जोर से हंस दी थी और उस के मुंह से निकल गया था, ‘मां, कभी सोना लेक या बटकल लेक तक तो गए नहीं, आउट आफ स्टेशन ये क्या जाएंगे?’

मजाक में कही बात मजाक में ही रहने देते तो क्या बिगड़ जाता? लेकिन तेज का तो ऐसा ईगो हर्ट हुआ कि मारपीट पर ही उतर आए.

हतप्रभ रह गई थी वह तेज के उस व्यवहार को देख कर. उस दिन के बाद से हंसनाबोलना तो दूर, उन के पास बैठने तक से घबराने लगी थी निवेदिता. कई दिनों तक अबोला ठहर जाता उन दोनों के बीच.

सपनों की राख तले : भाग 1

दौड़भाग, उठापटक करते समय कब आंखों के सामने अंधेरा छा गया और वह गश खा कर गिर पड़ी, याद नहीं.

आंख खुली तो देखा कि श्वेता अपने दूसरे डाक्टर सहकर्मियों के साथ उस का निरीक्षण कर रही थी. तभी द्वार पर किसी ने दस्तक दी. श्वेता ने पलट कर देखा तो डा. तेजेश्वर का सहायक मधुसूदन था.

‘‘मैडम, आप के लिए दवा लाया हूं. वैसे डा. तेजेश्वर खुद चेक कर लेते तो ठीक रहता.’’

आंखों की झिरी से झांक कर निवेदिता ने देखा तो लगा कि पूरा कमरा ही घूम रहा है. श्वेता ने कुछ देर पहले ही उसे नींद का इंजेक्शन दिया था. पर डा. तेज का नाम सुन कर उस का मन, अंतर, झंकृत हो उठा था. सोचनेविचारने की जैसे सारी शक्ति ही चुक गई थी. ढलती आयु में भी मन आंदोलित हो उठा था. मन में विचार आया कि पूछे, आए क्यों नहीं? पर श्वेता के चेहरे पर उभरी आड़ीतिरछी रेखाओं को देख कर निवेदिता कुछ कह नहीं पाई थी.

‘‘तकदीर को आप कितना भी दोष दे लो, मां, पर सचाई यह है कि आप की इस दशा के लिए दोषी डा. तेज खुद हैं,’’ आज सुबह ही तो मांबेटी में बहस छिड़ गई थी.

‘‘वह तेरे पिता हैं.’’

‘‘मां, जिस के पास संतुलित आचरण का अपार संग्रह न हो, जो झूठ और सच, न्यायअन्याय में अंतर न कर सके वह व्यक्ति समाज में रह कर समाज का अंग नहीं बन सकता और न ही सम्माननीय बन सकता है,’’ क्रोधित श्वेता कुछ ही देर में कमरा छोड़ कर बाहर चली गई थी.

बेटी के जाने के बाद से उपजा एकांत और अकेलापन निवेदिता को उतना असहनीय नहीं लगा जितना हमेशा लगता था. एकांत में मौन पड़े रहना उन्हें सुविधाजनक लग रहा था.

खयालों में बरसों पुरानी वही तसवीर साकार हो उठी जिस के प्यार और सम्मोहन से बंधी, वह पिता की देहरी लांघ उस के साथ चली आई थी.

उन दिनों वह बी.ए. फाइनल में थी. कालिज का सालाना आयोजन था. म्यूजिकल चेयर प्रतियोगिता में निवेदिता और तेजेश्वर आखिरी 2 खिलाड़ी बचे थे. कुरसी 1 उम्मीदवार 2. कभी निवेदिता की हथेली पर तेजेश्वर का हाथ पड़ जाता, कभी उस की पीठ से तेज का चौड़ा वक्षस्थल टकरा जाता. जीत, तेजेश्वर की ही हुई थी लेकिन उस दिन के बाद से वे दोनों हर दिन मिलने लगे थे. इस मिलनेमिलाने के सिलसिले में दोनों अच्छे मित्र बन गए. धीरेधीरे प्रेम का बीज अंकुरित हुआ तो प्यार के आलोक ने दोनों के जीवन को उजास से भर दिया.

अंतर्जातीय विवाह के मुद्दे को ले कर परिवार में अच्छाखासा विवाद छिड़ गया था. लेकिन बिना अपना नफानुकसान सोचे निवेदिता भी अपनी ही जिद पर अड़ी रही. कोर्ट में रजिस्टर पर दस्तखत करते समय, सिर्फ मांपापा, तेजेश्वर और निवेदिता ही थे. इकलौती बेटी के ब्याह पर न बाजे बजे न शहनाई, न बंदनवार सजे न ही गीत गाए गए. विदाई की बेला में मां ने रुंधे गले से इतना भर कहा था, ‘सपने देखना बुरा नहीं होता पर उन सपनों की सच के धरातल पर कोई भूमिका नहीं होती, बेटी. तेरे भावी जीवन के लिए बस, यही दुआ कर सकती हूं कि जमीन की जिस सतह पर तू ने कदम रखा है वह ठोस साबित हो.’

विवाह के शुरुआती दिनों में सुंदर घर, सुंदर परिवार, प्रिय के मीठे बोल, यही पतिपत्नी की कामना थी और यही प्राप्ति. शुरू में तेज का साथ और उस के मीठे बोल अच्छे लगते थे. बाद में यही बोल किस्सा बन गए. निवि को बात करने का ढंग नहीं है, पहननाओढ़ना तो उसे आता ही नहीं है. सीनेपिरोने का सलीका नहीं. 2 कमरों के उस छोटे से फ्लैट को सजातेसंवारते समय मन हर पल पति के कदमों की आहट को सुनने के लिए तरसता. कुछ पकातेपरोसते समय पति के मुख से 1-2 प्रशंसा के शब्द सुनने के लिए मन मचलता, लेकिन तेजेश्वर बातबात पर खीजते, झल्लाते ही रहते थे.

निवेदिता आज तक समझ नहीं पाई कि ब्याह के तुरंत बाद ही तेज का व्यवहार उस के प्रति इतना शुष्क और कठोर क्यों हो गया. उस ने तो तेज को मन, वचन, कर्म से अपनाया था. तेज के प्रति निवेदिता को कोई गिलाशिकवा भी नहीं था.

प्रेम का निजी स्वाद: महिमा की जिंदगी में क्यों थी प्यार की कमी

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