‘मां’ तो ‘मां’ है: क्या सास को मां मान सकी पारुल

बेटा पारुल 3 बजने को है खाना खाया कि नहीं ओह! माँ नही खाया आप चिंता ना करो अभी खा लेती हूँ, ठीक है 15 मिनट में फिर फोन करती हूँ सब काम छोड़ पहले खाना खा. कहने को तो निर्मला जी पारुल की सास हैं पर शादी के बाद उसकी हर इच्छा का ध्यान रखते हुए भरपूर प्यार दिया हर जरूरत का ख्याल रखा फटाफट टिफिन खोल खाना खाने बैठी ताकि माँ को तसल्ली हो जाए, खा-पी 10-15 मिनट आराम करने की सोच किसी को कमरे में ना आने के लिए चपरासी को बोल दिया.

आँख बंद कर बैठी ही थी कि एक साल पुरानी यादों ने आ घेरा, उसकी और साहिल की जोड़ी को जो कोई देखता यही कहता एक-दूसरे के लिए ही बने हैं परस्पर इतना आपसी प्रेम कि शादी के 24 साल बाद भी एक साथ घूमते-फिरते यही कोशिश रहती हर क्षण साथ ही रहें पल भर को भी अलग ना होना पड़े, बेहद प्यार करने वाले दो बेटे अंकुर व नवांकुर कहने का मतलब हंसता-मुस्कुराता सुखी परिवार. किंतु विधाता के मन की कोई नहीं जानता, पिछले साल नए साल की पार्टी का जश्न मना खुशी-खुशी सोए रात को अचानक साहिल की छाती में तेज़ दर्द उठा जब तक पारुल या घरवाले कुछ समझ हॉस्पिटल पहुंचाते तब तक साहिल का साथ छूट चुका था पारुल की दुनिया वीरान हो चुकी थी.

‌सुबह से ही लोगों का आना-जाना शुरू हो गया, साहिल थे ही इतने मिलनसार-ज़िंदादिल कि कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था वो अब नहीं है अनंत यात्रा के लिए निकल चुके हैं. पारुल को समझ नहीं आ रहा था या यूं कहलें समझना नहीं चाह रही थी ये क्या हो रहा है? एकाएक जिंदगी में कैसा तूफान आ गया? जिससे सारा घर बिखर गया तहस-नहस हो गया, बच्चों का सास-ससुर का मुँह देख अपने को हिम्मत देने लगती फिर अगले ही पल साहिल की याद संभलने ना देती.

खैर! जाने वाला चला गया, अब तो रीति-रिवाज़ निभाने ही थे तीसरे दिन उठावनी की रस्म हुई
विधि-विधान से सब  होने के बाद निर्मला जी पारुल की तरफ देख बोलीं, जल्दी से अच्छी सी साड़ी पहन तैयार हो जा आज ऑफिस खोलने जाना है. पारुल क्या किसी को भी समझ नहीं आया निर्मला जी कह क्या रही हैं? कुछ देर से फिर बोलीं, जा पारुल तैयार होकर आ तुझे आज से ही साहिल का सपना पूरा करना है जो उसका मोटरपार्ट्स का काम है जिन ऊंचाइयों तक वो ले जाना चाहता था अब तुझे ही पूर्ण करना है, उठ! मेरी बिटिया देर ना कर अपने साहिल की इच्छा पूरी करने का प्रण कर.

‌पारुल जानती-समझती थी माँ जो कुछ भी कहेंगी या करेंगी उसमे कहीं ना कहीं भलाई होगी हित ही छुपा होगा, इसलिये सवाल-जवाब किए बिना तैयार हो शॉप के लिए चल दी साथ में ससुर और दोनों बेटे अंकुर-नवांकुर थे. शॉप खोल काम शुरू करने की रस्म निभाई किंतु घर आकर उसके सब्र का बांध फिर टूट गया, निर्मला जी ने तो अपना दिल पत्थर का बना लिया था क्योंकि उनकी आंखों को पारुल व बच्चों का भविष्य जो दिख रहा था.

निर्मला जी ने अपने पति की ओर देखा फिर दोनों जन पारुल के पास आए, सिर पर हाथ रख ढाढस बांधने लगे. निर्मला जी उसका सिर अपनी गोदी में रख पुचकारते हुए बोलीं, हमारा प्यारा साहिल हमसे बहुत दूर चला गया जीवन का कटु सत्य है अब कभी ना लौटकर आएगा, परंतु यह भी उतना ही कटु सत्य है कि जाने वाले के करीबी या जो पारिवारिक सदस्य होते हैं उनकी बाकी जिंदगी सिर्फ रो-रोकर शोक करते रहने से तो नहीं बीत सकती.

जिंदा रहने के लिए खाना-पीना और घरेलू-बाहरी सभी काम करना अत्यंत जरूरी रहता है, यह तो जीवन है बेटा जिसके नियम-कायदे हम इंसानों को मानने ही पड़ते हैं हमारी इच्छा या अनिच्छा मायने नहीं रखती. बेटा अब साहिल तो नहीं है लेकिन तुझसे जुड़े दोनों बच्चे तथा हमारा परिवार है, हम सभी को एक-दूसरे का सहारा बन रहना होगा एक-दूजे के लिए ख़ुशीपूर्वक ज़िंदगानी बितानी होगी.

सबसे अहम बात जीने के लिए आत्मनिर्भर होना पड़ेगा बेटा पारुल जो भी तुझे समझा अथवा कह रही हूँ वो हमेशा अपनी माँ की सीख मान याद रखना, अब से मैं तेरी सासू माँ नहीं माँ हूँ और माँ तो माँ होती है.

साहिल को गए अभी तीन दिन हुए हैं ऐसे ही 30 दिन फिर 3 महीने और साल दर साल होते जाएंगे, ये नाते-रिश्तों का तू सोच रही हो कि तेरा व तेरे बच्चों का संग-साथ देते रहेंगे तो अभी से इस भ्रम में ना रह, भूल जा कोई साथ देता रहेगा.

वो तो जब तक हम माँ-पिता हैं तब तक तुझे किसी तरह की परेशानी ना होने देंगे लेकिन बाद में मेरी बिटिया को किसी पर भी निर्भर ना होना पड़े अभी से इस बारे में सोचना होगा, हम अपने अनुभवों व तज़ुर्बे से बता रहे हैं कोई जीवन में ज्यादा दिन साथ नहीं दे सकता एकाध दिन की बात अलग है. उठ! बेटा पारुल आगे की सोच, जो होना था हो गया हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते अब अपने और बच्चों के भविष्य की सोच बाकी का जीवन कैसे बिताना है ध्यान दे.

माँमाँ यह क्या कह रही हो आप, क्या करूं कैसे करूं? मुझे तो कुछ नहीं आता सब तो साहिल ही संभालते थे, आप सब मेरी चिंता ना करो मेरी जिंदगी कैसे ना कैसे बीत ही जाएगी.

कैसी बात कर रही है? सिर्फ भावनाओं के सहारे नहीं रहा जा सकता, समय के साथ-साथ प्रैक्टिकल होना पड़ता है जिंदगी बसर करने के लिए बहुत कुछ सहना और फिर करना भी पड़ता है. साहिल तो यादों में हम सबके साथ हमेशा रहेगा, अब तेरहवीं की रस्म के बाद ऑफिस जा व साहिल ने जो बिजनेस शुरू किया है उसको किसी के भी भरोसे ना छोड़ते हुए स्वयं के बलबूते आगे बुलंदियों तक ले जा, यह काम तुझे ही पूरा करना है बेटा.

अब कुछ और ना सोच, कुछ दिनों बाद तू ऑफिस की जिम्मेदारी संभाल घर और बच्चों को मैं देख लिया करूंगी फिर कह रही हूँ, साहिल की यादों के संग आगे बढ़ अपनी जिंदगी हंसते-मुस्कुराते बच्चों व अपनों के साथ बिता.

किन्तु…पर कैसे माँ मुझे तो बिजनेस का कुछ भी अता-पता नहीं, अकेले नहीं संभाल सकती मैं.

कितनी बार हंसकर ही सही पर साहिल से कहती थी अपने साथ कभी तो मुझे भी ऑफिस ले चला करो जानना-समझना चाहती हूँ तो पता है माँ, साहिल बोला करते थे तू तो घर की रानी बनकर रह किसी बात की चिंता ना कर मैं हूँ ना सब संभालने के लिए, अब तुम्हीं बताओ ऐसा कहकर फिर क्यूँ छोड़कर चले गए मुझे अब कैसे संभालूं?

कोई बात नहीं मेरी बच्ची, होनी का किसी को नहीं पता कब क्या हो जाए? कोई नही जानता यहां तक कि अगले पल की खैर-खबर नहीं रहती. तू समझदार हैं पढ़ी-लिखी है इसलिए काम के बारे में जल्दी सीख जाएगी, तेरे पापा को भी थोड़ी बहुत बिज़नेस की जानकारी व समझ है. वैसे तो साहिल अपने पापा को भी ऑफिस ना आने देता था यही कहता रहता था, घर पर रह आराम करो बहुत काम कर लिया किंतु फिर भी कुछेक जानकारी तो है जिससे काफी हद तक तुझे स्वनिर्भर होने में अपना योगदान दे सकेंगे.

हाँ बेटा! तू बिलकुल चिंता मत कर, अभी तेरा पापा जिंदा है नई राह पर हर कदम तेरे साथ है बस! मानसिक तौर पर खुद को मजबूत कर ले ज़रा हिम्मत ना हार, हम सबकी खुशियों का एकमात्र सहारा तू ही है. अंकुर तथा नवांकुर के जीवन की अभी शुरुआत हुई है उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें खुशियों की सौगात देने का स्वयं से वादा करते हुए घर-बाहर की जिम्मेदारी निष्ठा से पूर्ण करने का निश्चय कर, तेरे मम्मी-पापा सिर्फ और सिर्फ तेरे संग हैं.

पारुल अब हम दोनों की बात का मान रखते हुए स्वाभिमान के साथ अपने उद्देश्य को हर हाल में पूरा करना, हिम्मत कर एक और बात मन की कहना चाहूँगी, बिटिया यदि जीवन के किसी मोड़ या रास्ते में दूसरा साहिल मिलने लगे तो इधर-उधर की परवाह किए बिना निःसंकोच उसका हाथ थाम लेना, इससे सफर जीवन का आसानी से कट जाएगा समय का ज्यादा मालुम ना पड़ेगा.

माँमाँ…..आगे के शब्द नही मुँह से निकल सके निःशब्द हो चुकी थी पारुल, सिर्फ अपने माँ-पिताजी तुल्य सास-ससुर को निहार रही थी.

तभी मैडम-मैडम की आवाज से पारुल का ध्यान भंग हुआ चेतना में वापिस लौटी, हाँ-हाँ बोलो क्या कहना चाहते हो? वो मीटिंग के लिए आपका सभी इंतज़ार कर रहे हैं बता दें कब शुरू करनी है? ओह! तुम सभी मेंबर्स को जाकर कह दो 10 मिनट से बातचीत करते हैं.

पारुल उठी, एक गिलास पानी पिया और अपनी सासू माँ यानी अपनी माँ को मन ही मन हाथ जोड़ तहे दिल से धन्यवाद दिया, क्योंकि उन्हीं के स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन से प्रेरित हो कुछ ही समय में आत्मनिर्भर बन अपना आत्मसम्मान अपनी खुद की पहचान बनाने में कामयाब हो सकी थी.

कारवां : लोगों के साथ भी, लोगों के बाद भी

अतीत के ढेर में दफन दम तोड़ती, मुड़ीतुड़ी न जाने कैसीकैसी यादों को वह खींच लाती है…घटनाएं चाहे जब की हों पर उन्हें आज के परिवेश में उतारना उसे हमेशा से बखूबी आता है…कुछ भी तो नहीं भूलता उसे. छोटी से छोटी बातें भी ज्यों की त्यों याद रहती हैं.

आज अपना असली रंग खो चुके पुराने स्वेटर के बहाने स्मृतियों को बटोरने चली है…अब स्वेटर क्या अतीत को ही उधेड़ने बैठ जाएगी…उधेड़ती जाएगी…उस में पड़ आई हर सिकुड़न को बारबार छुएगी, सहलाएगी…ऐसे निहारेगी कि बस, पूछो मत…फिर गोले की शक्ल में ढालने बैठ जाएगी.

‘‘तुम्हें कुछ याद भी है नरेंद्र या नहीं, यह स्वेटर मैं ने कब बुना था तुम्हारे लिए? तब बुना था जब तुम टूर पर गए थे कहीं. हां, याद आया हैदराबाद. मालूम है नरेंद्र, अंकिता तब गोद में थी और मयंक मात्र 4 साल का था. तुम लौटे तो मैं ने कहा था कि नाप कर देखो तो इसे…हैरान रह गए थे न तुम, तुम ने मेरे हाथ से स्वेटर ले कर देखते हुए पता है क्या कहा था…’’ उस की नजरें मेरे चेहरे पर आ टिकीं, उस के होंठ मुसकराने लगे.

‘‘क्या कहा था, यही न कि भई वाह, कमाल करती हो तुम भी…तुम्हारा हाथ है या मशीन, कब बनाया? बहुत मेहनत, बहुत लगन चाहिए ऐसे कामों के लिए. यही कहा था न मैं ने…’’ उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा मैं ने…नहीं कहता तो कहती कि तुम तो ध्यान से मेरी कोई बात सुनते ही नहीं…जैसे कि तुम्हारा  कोई मतलब ही नहीं हो इन बातों से…इस घर में किस से बातें करूं मैं, दीवारों से…

गला रुंध आएगा उस का…आंखें नम पड़ जाएंगी…गलत क्या कहेगी शोभना…उस के और मेरे सिवा इस घर में कौन है, ऊपर से मैं भी चुप लगा जाऊं तो…मेरा क्या है…मैं अगर चुप भी रहूं, वक्त तो तब भी कट ही जाया करता है मेरा. शोभना की तरह बोलने की आदत भी तो नहीं है मेरी. मुझे तो बस, उस को सुनना अच्छा लगता है…अच्छा भी क्या लगता है, न सुनूं तो करूं क्या? 2 दिन भी उस की बकबक सुनने को अगर मैं न होऊं न तो वह बीमार पड़ जाती है बेचारी, सच कहूं तो उस के चेहरे पर मायूसी मुझे जरा भी नहीं भाती…वह तो गुनगुनाती, मुसकराती मेरे इर्दगिर्द डोलती हुई ही अच्छी लगती है. आज तो कुछ ज्यादा ही खुश नजर आ रही थी वह…अब अपने मुंह से कुछ कहे या न कहे मगर मैं तो इस खुशी का राज जानता था…उस के चेहरे की मुसकराहट…होंठों पर गुनगुनाहट मुझे इस बात का एहसास करा जाती है कि अब कोई त्योहार आने वाला है या फिर छुट्टियां…हो सकता है बच्चे आ ही जाएं, घरआंगन चहक उठेगा…बागबगीचा महक उठेगा. असमय अपने चमन में आ जाने वाली बहार की कल्पना मात्र से ही उस का चेहरा खिल उठा है…कोई भी छुट्टियां आने से पहले यही हाल होता है उस का…समय बे समय उठ जाने वाला गांठों का दर्द कुछ दिनों के लिए तो जैसे कहीं गायब ही हो जाता है…और सिरदर्द, कुछ दिन के लिए उस की भी शिकायत से मुक्ति मिल जाती है मेरे कानों को. वरना जब देखो तब…सिर पर पट्टा बंधा हुआ है और होंठ दर्द से कराह रहे होते हैं… ‘उफ् सिर दर्द से फटा जा रहा है…जाने क्या हो गया है….’

शोभना कई दिन से एक ही रट लगाए हुए है. पीछे का स्टोर रूम साफ करवा लूं…कहती है कि ऊनीसूती कपड़ों का जाने क्या हाल होगा, काफी समय से एक ही जगह तह किए पड़े हैं. पिछले दस दिन से हर छुट्टी के दिन काम वाली के लड़के रामधारी को भी बुलवा लेती है मदद के लिए…मैं अकसर चिढ़ जाया करता हूं, ‘एक ही दिन तो चैन से घर में बैठने को मिलता है और तुम हो कि…’

‘काहे की छुट्टी…तुम्हारा तो हर दिन संडे है…नहीं करवाना है कुछ तो वह बोलो…’

कैसे कहूं कि काम जैसा काम हो तब तो करवाऊं भी…कपड़ों को निकालेगी… छोटेछोटे ऊनीसूती फ्राक्स…टोपीमोजे… दस्ताने…एकएक को खोलखोल कर निहारेगी…सहलाएगी और फिर ज्यों की त्यों सहेज कर रख देगी. मजाल है जो किसी चीज को हाथ भी लगाने दे…सब की धूल झाड़ कर जब वापस रखना ही है तो काहे की सफाई…कुछ कह दो तो इस उम्र में कहासुनी और हो जाएगी.

मेरी सोच से बेखबर शोभना बड़ी ही तन्मयता से गोले पर गोले बनाए जा रही थी, ‘‘क्या करोगी अब इस का?’’ मैं ने यों ही पूछ लिया. ‘‘अब…धोऊंगी… सुखाऊंगी…फिर लच्छी करूंगी…फिर गोले बनाऊंगी…’’

‘‘फिर…’’

‘‘…फिर…एक स्वेटर बनाऊंगी… अपने लिए…’’

‘‘स्वेटर…अपने लिए…इस गरमी में…’’ मैं चौंका.

‘‘ए.सी. रूम में पड़ेपड़े कहां पता चलता है कि सर्दी है या गरमी…कुछ हाथ में रहता है तो समय सरलता से कट जाता है.’’

‘‘…समय काटने के और भी बहुत से साधन हैं या आंखें फोड़ना जरूरी है, देखता हूं कभी ऊन ले कर बैठ जाओगी तो कभी सिलाई की मशीन…’’

‘‘तो क्या करूं, तुम्हारी तरह किताब या पेपर ले कर बैठी रहूं…’’

‘‘नहीं बाबा, कुछ भी करो मगर मुझ से मत उलझो…लेकिन एक बात बताओ, तुम क्या करोगी इस का? तुम तो कभी कुछ गरम कपड़े पहनती ही नहीं थीं…दिसंबरजनवरी में भी सुबहसुबह बिना शाल के घूमा करती थीं…कहा करती थीं कि तुम्हें ऊनी कपड़े चुभते हैं…फिर…’’

‘‘अरे बाबा, वो तब की बात थी… अब तो बहुत ठंड लगती है, पहले सौ काम होते थे तब ठंड की कौन परवा किया करता था.’’

‘‘अच्छा, तो ये क्यों नहीं कहतीं कि अब बूढ़ी हो गई हो तुम…उम्र ढलने के साथ अब ठंड ज्यादा लगती है तुम्हें…’’

‘‘हां, और तुम तो जैसे…’’ बात बीच में ही छोड़ कर खामोश हो गई पर कितनी देर, ‘‘नरेंद्र, कभी सुबह से शाम कब हो जाती थी पता ही नहीं चलता था न…घड़ी की सृई के पीछे भागतेभागते थक जाया करती थी मैं…पूरी तरह नींद भी नहीं खुलती और अंकिता के रोने की आवाज कानों में पड़ रही होती…तुम चिढ़ कर कुछ भुनभुनाते और तकिया कान पर धर कर सो जाया करते…फिर शुरू होता काम का शाम तक न थमने वाला सिलसिला…घड़ी पर नजर जाती… ‘बाप रे, 7 बजने वाले हैं…’ जरूर काम वाली खटखटा कर लौट गई होगी…अब क्या? अब तो 10 बजे से पहले आएगी नहीं… गंदे बरतन सिंक में पड़े मुझे मुंह चिढ़ा रहे होते…बच्चों का टिफिन…तुम्हारा लंच… उफ्…फटे दूध में सनी तीनों बोतलें… झुंझलाहट आती अपनेआप पर ही…फिर कितनी भी जल्दी करती, नाश्ते में देर हो ही जाती…लंच बाक्स तुम्हारे पीछे भागभाग कर सीढि़यों पर पकड़ाया करती थी.’’

अकसर वह इस टापिक को इसी मोड़ पर ला कर…एक गहरी सांस छोड़ कर खत्म किया करती… उसे एकटक देखता रह जाता मैं…बात की शुरुआत में कितनी उत्तेजित रहती…और अंत आतेआते…मानो रेत से भरी अंजुरी खाली हो रही हो…मेरे भी होंठ मुसकराने के अंदाज में फैलतेफैलाते मानो ठिठक जाते हैं…कितनी बार तो सुन चुका हूं यही सब.

‘‘नरेंद्र, वक्त कैसे गुजर जाता है…है न, पता ही नहीं चलता…सब से बड़ी मीता की शादी को आज 20 साल पूरे हो जाएंगे. सब से छोटी अंकिता भी 2 बच्चों की मां बन चुकी है. बीच के दोनों मोहित और मयंक अपनेअपने गृहस्थ जीवन का सुखपूर्वक आनंद ले रहे होंगे. सुखी हों भी क्यों न, उन की सुखसुविधा का सदैव ही तो ध्यान रखा है हम ने…उन की जरूरतें पूरी करने के लिए हम क्या कुछ नहीं किया करते थे…मांबाप नहीं एक दोस्त बन कर पाला था हम ने उन्हें…तभी तो अपने प्यार के बारे में मोहित ने सब से पहले मुझे बताया था.

‘‘‘मां, बस, एक बार तुम ममता से मिल तो लो. दाद दोगी मेरी पसंद की… हीरा चुना है हीरा आप के लिए.’ मैं ने उस के लिए कौन सा रत्न चुना था, कहां बता पाई थी उसे…आज भी जब कभी शर्माजी की बेटी हिना मेरे सामने होती है तो मेरे दिल में एक कसक सी उठती है…काश… हिना मेरी बहू होती…’’ वैसे वह अच्छी तरह जानती है कि उस का यों अतीत में भटकना मुझे जरा भी नहीं अच्छा लगता, तभी तो आहिस्ताआहिस्ता खामोश होती चली गई, ‘‘मैं भी, न जाने कबकब की बातें याद करती हूं…है न…’’ मेरे खीझने से पहले ही वह सतर्क हो गई.

मैं आज में जीता हूं…पेपर पढ़ने से फुरसत मिलती है तो घर के आगेपीछे की खाली पड़ी, थोड़ी सी कच्ची जमीन के चक्कर काटने लग जाता हूं…और शोभना, उस की सूई तो जब देखो तब एक ही परिधि में घूमती रहती है. वही मोहित…मयंक…उन के बच्चे…मीता… अंकिता…उन के बच्चे…कुछ नहीं भूलती वह…

‘‘याद आ रही है बच्चों की…’’ मैं उस के करीब खिसक आया, ‘‘नातीपोतों के लिए इतना तरसती हो तो हो क्यों नहीं जातीं किसी के पास…सभी तो बुलाते रहते हैं तुम्हें.’’

हमेशा की तरह भड़क गई वह मेरे ऐसा कहने पर, ‘‘कहीं नहीं जाना मुझे… तुम तो यही चाहते हो कि मैं कहीं चली जाऊं और तुम्हें मेरी बकबक से छुट्टी मिल जाए…न कहीं जानेआने की बंदिश… न खानेपीने की रोकटोक…’’ बात अधूरी छोड़ चली गई वह…

पिछले कुछ वर्षों से वह कहीं जाना ही नहीं चाहती…माना मोहित के पास नहीं जाना चाहती…बड़ी बहू के स्वभाव में अजीब सा रूखापन है…बहुत अपनापन तो छोटी बहू में भी नजर नहीं आता…घर 2 पाली में बंटाबंटा सा लगता है…एक में पतिपत्नी और बच्चे…दूसरे में मांबाप और बेटा…बेटे का डबल रोल देखतेदेखते किसी का भी मन उचट जाए…वह उन सासों में से है भी नहीं जो बहू को दोषी और बेटे को निर्दोष समझें…शायद यही कारण था कि उस का मन सब से उचट गया था…

कभी कुछ कुरेद कर पूछना चाहो तो कुछ कहती भी नहीं…जो भी हो, बड़ी सफाई से अपना दर्द छिपा लिया करती है वह, कहती है, ‘अपना घर अपना ही होता है नरेंद्र…वैसे भी मैं उम्र के इस पड़ाव पर तुम से अलग रहना नहीं चाहती…तुम्हारा साथ बना रहे बस, और कुछ नहीं चाहिए मुझे…’ पहले तो ऐसी नहीं थी वह…जरा सा किसी बच्चे का जन्मदिन भी पड़ता था तो छटपटाने लगती वह…ज्यादा नहीं साल 2 साल पहले की बात है, मोहित के बेटे मयूर का जन्मदिन आने वाला था…बस, क्या था…बेसन के  लड्डू बंधने लगे… मठरियां बनने लगीं…रोजरोज की खरीदारी…कभी बहू के लिए साडि़यां लाई जा रही थीं तो कभी सलवार सूट… बच्चों के लिए ढेरों कपड़े…दुनिया भर की तैयारियां देख कर दंग रह गया था मैं… ‘ये क्या…जन्मदिन तो बस, मयूर का ही है न….’

‘तो क्या हुआ? मोहित हो या मयूर…मेरे लिए तो ऐसे अवसर पर सभी बराबर हैं,’ इतराती हुई सी बोली थी वह.

‘हमें रिजर्वेशन करवाने से पहले एक बार मोहित से बात नहीं कर लेनी चाहिए?’

‘अरे…इस में बात क्या करनी है? हर बार ही तो जाते हैं हम…खैर, तुम्हारी मरजी…कर लो…’ फोन सेट आगे खींच कर रिसीवर मेरी ओर बढ़ा दिया था शोभना ने….

‘नहीं डैड, ममा को कहिए, इस बार हम लोग नहीं मना रहे मयूर का जन्मदिन, वैसे भी उस का क्लास टैस्ट चल रहा है. हम नहीं चाहते कि उस का माइंड डिस्टर्ब हो.’

बस, सारी की सारी तैयारियां धरी रह गईं…लाख समझाया था मैं ने उसे कि तुम्हें आने से कहां मना किया है उस ने…

‘बुलाया भी कहां है…एक बार ये भी तो नहीं कहा न कि आप लोग तो आ जाइए.’

कभीकभी क्यों…अकसर ही सोचता हूं मैं कि शोभना, मेरी पत्नी, मेरी तरह क्यों नहीं सोचती. सोचती तो शायद आज वह भी सुखी रहती…हैरानी होती है.

अपने पराए या पराए अपने

पार्किंग में कार खड़ी कर के मैं दफ्तर की ओर बढ़ ही रहा था कि इतने में तेजी से चलते हुए वह आई और ‘भाई साहब’ कहते हुए मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो गई. उस की गोद में दोढ़ाई साल की एक बच्ची भी थी.

एक पल को तो मैं सकपका गया कि कौन है यह? यहां तो दूरदराज के रिश्ते की भी मेरी कोई बहन नहीं रहती. मैं अपने दिमाग पर जोर डालने लगा.

मुझे उलझन में देख कर वह बोली, ‘‘क्या आप मु  झे पहचान नहीं पा रहे हैं? मैं लाजवंती हूं. आप की बहन लाजो. मैं तो आप को देखते ही पहचान गई थी.’’

मैं ने खुशी के मारे उस औरत की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘अरी, तू है चुड़ैल.’’

मैं बचपन में उसे लाड़ से इसी नाम से पुकारता था. सो बोला, ‘‘भला पहचानूंगा कैसे? कहां तू बित्ती भर की थी, फ्रौक पहनती थी और अब तो तू एक बेटी की मां बन गई है.’’

मेरी बातों से उस की आंखें भर आईं. मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी, इस के बावजूद मैं ने उसे घर ले चलना ही ठीक समझा. वह कार में मेरी साथ वाली सीट पर आ बैठी.

रास्ते में मैं ने गौर किया कि वह साधारण थी. सूती साड़ी पहने हुए थी. मामूली से गहने भी उस के शरीर पर नहीं थे. सैंडल भी कई जगह से मरम्मत किए हुए थे.

बातचीत का सिलसिला जारी रखने के लिए मैं सब का हालचाल पूछता रहा, मगर उस के पति और ससुराल के बारे में कुछ न पूछ सका.

लाजवंती को मैं बचपन से जानता था. वह मेरे पिताजी के एक खास दोस्त की सब से छोटी बेटी थी. दोनों परिवारों में बहुत मेलजोल था. 8 हम सब भाईबहन उस के पिताजी को चाचाजी कहते थे और वे सब मेरे पिताजी को ताऊजी.

अम्मां व चाची में खूब बनती थी. दोनों घरों के मर्द जब दफ्तर चले जाते तब अम्मां व चाची अपनी सिलाईबुनाई ले कर बैठ जातीं और घंटों बतियाती रहतीं. हम बच्चों के लिए कोई बंधन नहीं था. हम सब बेरोकटोक एकदूसरे के

घरों में धमाचौकड़ी मचाते हुए खोतेपीते रहते. पिताजी ने हाई ब्लडप्रैशर की वजह से मांस खाना व शराब पीना बिलकुल छोड़ दिया था. वैसे भी वे इन चीजों के ज्यादा शौकीन नहीं थे, लेकिन चाचाजी खानेपीने के बेहद शौकीन थे.

अकसर उन की फरमाइश पर हमारे यहां दावत हुआ करती. इस पर अम्मां कभीकभी पिताजी पर   झल्ला भी जाती थीं कि जब खुद नहीं खाते तो दूसरों के लिए क्यों इतना झंझट कराते हो.

तब पिताजी उन्हें समझा देते, ‘क्या करें बेचारे पंडित हैं न. अपने घर में तो दाल गलती नहीं, हमारे यहां ही खा लेते हैं. तुम्हें भी तो वे अपनी सगी भाभी की तरह ही मानते हैं.’

मेरे पिताजी ऐक्साइज इंस्पैक्टर थे और चाचाजी ऐजूकेशन इंस्पैक्टर. चाचाजी मजाक में पिताजी से कहते, ‘यार, कैसे कायस्थ हो तुम… अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो पानी की जगह शराब ही पीता.’

तब पिताजी हंसते हुए जवाब देते, ‘लेकिन गंजे को खुदा नाखून देता ही कहां है…’

इसी तरह दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे कि अचानक न जाने क्या हुआ कि चाचाजी नौकरी से सस्पैंड हो गए. कई महीनों तक जांच होती रही. उन पर बेईमानी करने का आरोप लगा था. एक दिन वे बरखास्त कर दिए गए.

बेचारी चाची पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा. 2 बड़ी लड़कियों की तो शादी हो चुकी थी, पर 3 बच्चे अभी भी छोटे थे. सुरेंद्र 8वीं, वीरेंद्र 5वीं व लाजो चौथी जमात में पढ़ रही थी.

चाचाजी ने जोकुछ कमाया था, वह जी खोल कर मौजमस्ती में खर्च कर दिया था. आड़े समय के लिए चाचाजी ने कुछ भी नहीं जोड़ा था.

चाचाजी को बहुत मुश्किल से नगरनिगम में एक छोटी सी नौकरी मिली. जैसेतैसे पेट भरने का जुगाड़ तो हुआ, लेकिन दिन मुश्किल से बीत रहे थे. वे लोग बढ़िया क्वार्टर के बजाय अब छोटे से किराए के मकान में रहने लगे. चाची को चौकाबरतन से ले कर घर का सारा काम करना पड़ता था.

लाड़प्यार में पले हुए बच्चे अब जराजरा सी चीजों के लिए तरसते थे. दोस्ती के नाते पिताजी उस परिवार की ज्यादा से ज्यादा माली मदद करते रहते थे.

समय बीतता गया. चाचाजी के दोनों लड़के पढ़ने में तेज थे. बड़े लड़के को बीए करने के बाद बैंक में नौकरी मिल गई और छोटे बेटे का मैडिकल कालेज में दाखिला हो गया.

मगर लाजो का मन पढ़ाई में नहीं लगा. वह अकसर बीमार रहती थी. वह बेहद चिड़चिड़ी और जिद्दी भी हो गई थी और मुश्किल से 8वीं जमात ही पास कर पाई.

फिर पिताजी का तबादला बिलासपुर हो गया. मैं भी फोरैस्ट अफसर की ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया. कुछ अरसे के लिए हमारा उन से संपर्क टूट सा गया.

फिर न पिताजी रहे और न चाचाजी. हम लोग अपनीअपनी दुनिया में मशगूल हो गए. कई सालों के बाद ही इंदौर वापस आना हुआ था.

शाम को जब मैं दफ्तर से घर पहुंचा तो देखा कि लाजो सब से घुलमिल चुकी थी. मेरे दोनों बच्चे ‘बूआबूआ’ कह कर उसे घेरे बैठे थे और उस की बेटी को गोद में लेने के लिए उन में होड़ मची थी.

मेरी एकलौती बहन 2 साल पहले एक हादसे में मर गई थी, इसलिए मेरी बीवी उमा भी ननद पा कर खुश हुई.

खाना खाने के बाद हम लोग उसे छोड़ने गए. नंदानगर में एक चालनुमा मकान के आगे उस ने कार रुकवाई.

मैं ने चाचीजी के पैर छुए, पर वे मु  झे पहचान न पाईं. तब लाजो ने मुझे ढूंढ़ निकालने की कहानी बड़े जोश से सुनाई.

चाचीजी मुझे छाती से लगा कर खुश हो गईं और रुंधे गले से बोलीं, ‘‘अच्छा हुआ बेटा, जो तुम मिल गए. मुझे तो रातदिन लाजो की फिक्र खाए जाती है. दामाद नालायक निकला वरना इस की यह हालत क्यों होती.

‘‘भूखों मरने से ले कर गालीगलौज, मारपीट सभी कुछ जब तक सहन करते बना, यह वहीं रही. फिर यहां चली आई. दोनों भाइयों को तो यह फूटी आंख नहीं सुहाती. अब मैं करूं तो क्या करूं? जवान लड़की को बेसहारा छोड़ते भी तो नहीं बनता.

‘‘बेटा, इसे कहीं नौकरी पर लगवा दो तो मुझे चैन मिले.’’

सुरेंद्र भी इसी शहर में रहता था. अब वह बैंक मैनेजर था. एक दिन मैं उस के घर गया. उस ने मेरी बहुत खातिरदारी की, लेकिन वह लाजो की मदद के नाम पर टस से मस नहीं हुआ.

लाजवंती का जिक्र आते ही वह बोला, ‘‘उस का नाम मत लीजिए भाई साहब. वह बहुत तेज जबान की है. वह अपने पति को छोड़ आई है.

‘‘हम ने तो सबकुछ देख कर ही उस की शादी की थी. उस में ससुराल वालों के साथ निभाने का ढंग नहीं है. माना कि दामाद को शराब पीने की लत है, पर घर में और लोग भी तो हैं. उन के सहारे भी तो रह सकती थी वह… घर छोड़ने की क्या जरूरत थी?’’

सुरेंद्र की बातें सुन कर मैं अपना सा मुंह ले कर लौट आया.

मैं बड़ी मुश्किल से लाजो को एक गांव में ग्रामसेविका की नौकरी दिला सका था.

चाचीजी कुछ दिन उस के पास रह कर वापस आ गईं और अपने बेटों के साथ रहने लगीं.

मेरा जगहजगह तबादला होता रहा और तकरीबन 15 साल बाद ही अपने शहर वापस आना हुआ.

एक दिन रास्ते में लाजो के छोटे भाई वीरेंद्र ने मुझे पहचान लिया. वह जोर दे कर मुझे अपने घर ले गया. उस ने शहर में क्लिनिक खोल लिया था और उस की प्रैक्टिस भी अच्छी चल रही थी.

लाजो का जिक्र आने पर उस ने बताया कि उस की तो काफी पहले मौत हो गई. यह सुनते ही मुझे धक्का लगा. उस का बचपन और पिछली घटनाएं मेरे दिमाग में घूमने लगीं. लेकिन एक बात बड़ी अजीब लग रही थी कि मौत की खबर सुनाते हुए वीरेंद्र के चेहरे पर गम का कहीं कोई निशान नहीं था.

मैं चाचीजी से मिलने के लिए बेताब हो उठा. वे एक कमरे में मैलेकुचैले बिस्तर पर पड़ी हुई थीं. अब वे बहुत कमजोर हो गई थीं और मुश्किल से ही उठ पाती थीं. आंखों की रोशनी भी तकरीबन खत्म हो चुकी थी.

मैं ने अपना नाम बताया तभी वे पहचान सकीं. मैं लाजो की मौत पर दुख जाहिर करने के लिए कुछ बोलने ही वाला था कि उन्होंने हाथ पकड़ कर मुझे अपने नजदीक बैठा लिया.

वे मेरे कान में मुंह लगा कर धीरे से बोलीं, ‘‘लाजो मरी नहीं है बेटा. वह तो इसी शहर में है. ये लोग उस के मरने की झूठी खबर फैला रहे हैं. तुम ने जिस गांव में उस की नौकरी लगवा दी थी, वहीं एक ठाकुर साहब भी रहते थे. उन की बीवी 2 छोटेछोटे बच्चे छोड़ कर मर गई. गांव वालों ने लाजो की शादी उन से करा दी.

‘‘लाजो के अब 2 बेटे भी हैं. वैसे, अब वह बहुत सुखी है, लेकिन एक बार उसे अपनी आंखों से देख लेती तो चैन से मरती.

‘‘एक दिन लाजो आई थी तो वीरेंद्र की बीवी ने उसे घर में घुसने तक नहीं दिया. वह दरवाजे पर खड़ी रोती रही. जातेजाते वीरेंद्र से बोली थी कि भैया, मुझे अम्मां से तो मिल लेने दो. लेकिन ये लोग बिलकुल नहीं माने.’’

लाजो की यादों में डूब कर चाचीजी की आंखों से आंसू बहने लगे थे.

वे रोतेरोते आगे बोलीं, ‘‘बताओ बेटा, उस ने क्या गलत किया? उसे भी तो कोई सहारा चाहिए था. सगे भाई हो कर इन दोनों ने उस की कोई मदद नहीं की बल्कि दरदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया. तुम्हीं ने उस की नौकरी लगवाई थी…’’

तभी मैं ने महसूस किया कि सब की नजरें हम पर लगी हुई हैं. मैं उस जगह से फौरन हट जाना चाहता था, जहां अपने भी परायों से बदतर हो गए थे.

मैं ने मन ही मन तय कर लिया था कि लाजो को ढूंढ़ निकालना है और उसे एक भाई जरूर देना है.

छद्म वेश : मधुकर और रंजना की कहानी

शाम धुंध में डूब चुकी थी. होटल की ड्यूटी खत्म कर तेजी से केमिस्ट की दुकान पर पहुंची. उसे देखते ही केमिस्ट सैनेटरी पैड को पेक करने लगा. रंजना ने उस से कहा कि इस की जगह मेंस्ट्रुअल कप दे दो. केमिस्ट ने एक पैकेट उस की तरफ बढ़ाया.

मधुकर सोच में पड़ गया कि यह युवक मेंस्ट्रुअल कप क्यों ले रहा है. ऐसा लगता तो नहीं कि शादी हो चुकी हो. शादी के बाद आदमियों की भी चालढाल बदल जाती है.

इस बात से बेखबर रंजना ने पैकेट अपने बैग में डाला और घर की तरफ कदम बढ़ा दिए. बीचबीच में रंजना अपने आजूबाजू देख लेती. सर्दियों की रात सड़क अकसर सुनसान हो जाती है. तभी रंजना को पीछे से पदचाप लगातार सुनाई दे रही थी, पर उस ने पीछे मुड़ कर देखना उचित नहीं समझा. उस ने अपनी चलने की रफ्तार बढ़ा दी. अब उस के पीछे ऐसा लग रहा था कि कई लोग चल रहे थे. दिल की धड़कन बढ़ गई थी. भय से चेहरा पीला पड़ गया था. घर का मोड़ आते ही वह मुड़ गई.

अब रंजना को पदचाप सुनाई नहीं दे रही थी. यह सिलसिला कई दिनों से चल रहा था. यह पदचाप गली के मोड़ पर आते ही गायब हो जाती थी. घर में भी वह किसी से इस बात का जिक्र नहीं कर सकती. नौकरी का बहुत शौक था. घर की माली हालत अच्छी थी. वह तो बस शौकिया नौकरी कर रही थी. स्त्री स्वतंत्रता की पक्षधर थी, पर खुद को छद्म वेश में छुपा कर ही रखती थी. स्त्रीयोचित सजनेसंवरने की जगह वह पुरुष वेशभूषा में रहती. रात में लौटती तो होंठों पर लिपस्टिक और आईब्रो पेंसिल से रेखाएं बना लेती. अंतरंग वस्त्र टाइट कर के पहनती, ताकि स्त्रियोचित उभार दिखाई न दे. इस से रात में जब वह लौटती तो भय नहीं लगता था.

लेकिन कुछ दिनों से पीछा करती पदचापों ने उस के अंदर की स्त्री को सोचने पर मजबूर कर दिया. रंजना ने घर के गेट पर पहुंच कर अपने होंठ पर बनी नकली मूंछें टिशू पेपर से साफ कीं और नौर्मल हो कर घर में मां के साथ भोजन किया और सो गई.

होटल जाते हुए उस ने सोचा कि आज वह जरूर देखेगी कि कौन उस का पीछा करता है. रात में जब रंजना की ड्यूटी खत्म हुई तो बैग उठा कर घर की ओर चल दी. अभी वह कुछ ही दूर चली थी कि पीछे फिर से पदचाप सुनाई दी.

रंजना ने हिम्मत कर के पीछे देखा. घने कोहरे की वजह से उसे कुछ दिखाई नहीं दिया. एक धुंधला सा साया दिखाई दिया. जैसे ही वह पलटी, काले ओवर कोट में एक अनजान पुरुष उस के सामने खड़ा था.

यह देख रंजना को इतनी सर्दी में पसीना आ गया. शरीर कांपने लगा. आज लगा, स्त्री कितना भी पुरुष का छद्म वेश धारण कर ले, शारीरिक तौर पर तो वह स्त्री ही है. फिर भी रंजना ने हिम्मत बटोर कर कहा, ‘‘मेरा रास्ता छोड़ो, मुझे जाने दो.’’

‘‘मैं मधुकर. तुम्हारे होटल के करीब एक आईटी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं.’’

‘‘तुम इस होटल में काम करते हो. यह तो मैं जानता हूं.’’

‘‘तुम शादीशुदा हो क्या?’’

रंजना ने नहीं में गरदन हिलाई. वह जरूरत से ज्यादा डर गई. उस का बैग हाथ से छूट गया और सारा सामान बिखर गया.

रंजना अपना सामान जल्दीजल्दी समेटने लगी, लेकिन मधुकर के पैरों के पास पड़ा केमिस्ट के यहां से खरीदा मेंस्ट्रुअल कप उस की पोल खोल चुका था. मधुकर ने पैकेट चुपचाप उठा कर उस के हाथ में रख दिया.

‘‘तुम इस छद्म में क्यों रहती हो? मेरी इस बात का जवाब दे दो, मैं रास्ता छोड़ दूंगा.’’

‘‘रात की ड्यूटी होने की वजह से ये सब करना पड़ा. स्त्री होने के नाते हमेशा भय ही बना रहता. इस छद्म वेश में किसी का ध्यान मेरी ओर नहीं गया, लेकिन आप ने कैसे जाना?’’

‘‘रंजना, मैं ने तुम्हें केमिस्ट की दुकान पर पैकेट लेते देख लिया था.’’

‘‘ओह… तो ये बात है.’’

‘‘रंजना चलो, मैं तुम्हें गली तक छोड़ देता हूं.’’

दोनों खामोश साथसाथ चलते हुए गली तक आ गए. मधुकर एक बात का जवाब दो कि तुम ही कुछ दिनों से मेरा पीछा कर रहे हो.

रहस्यमयी लड़के का राज आज पता चल ही गया. हाहाहा… क्या बात है?

चलतेचलते बातोंबातों में मोड़ आ गया. मधुकर रंजना से विदा ले कर चला गया.

रंजना कुछ देर वहीं खड़ी रास्ते को निहारती रही. दिल की तेज होती धड़कनों ने रंजना को आज सुखद एहसास का अनुभव हुआ.

घर पहुंच कर मां को आज हुई घटना के बारे में बताया. मां कुछ चिंतित सी हो गईं.

सुबह एक नया ख्वाब ले कर रंजना की जिंदगी में आई. तैयार हो कर होटल जाते हुए रंजना बहुत खुश थी. मधुकर की याद में सारा दिन खोई रही. मन भ्रमर की तरह उड़उड़ कर उस के पास चला जाता था.

ड्यूटी खत्म कर रंजना उठने को हुई, तभी एक कस्टमर के आ जाने से बिजी हो गई. घड़ी पर निगाह गई तो 8 बज चुके थे. रंजना बैग उठा कर निकली, तो मधुकर बाहर ही खड़ा था.

‘‘रंजना आज देर कैसे हो गई?’’

‘‘वो क्या है मधुकर, जैसे ही निकलने को हुई, तभी एक कस्टमर आ गया. फौर्मेलिटी पूरी कर के उसे रूम की चाबी सौंप कर ही निकल पाई हूं.’’

रंजना और मधुकर साथसाथ चलते हुए गली के मोड़ पर पहुंच मधुकर ने विदा ली और चला गया.

यह सिलसिला चलते हुए समय तो जैसे पंखों पर सवार हो उड़ता चला जा रहा था. दोनों को मिले कब 3 महीने बीत गए, पता ही नहीं चला. आज मधुकर ने शाम को डेट पर एक रेस्तरां में बुलाया था.

ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी रंजना खुद को पहचान नहीं पा रही थी. मां की साड़ी में लिपटी रंजना मेकअप किए किसी अप्सरा सी लग रही थी. मां ने देखा, तो कान के पीछे काला टीका लगा दिया और मुसकरा दीं.

‘‘मां, मैं अपने दोस्त मधुकर से मिलने जा रही हूं,’’ रंजना ने मां से कहा, तो मां पूछ बैठी, ‘‘क्या यह वही दोस्त है, जो हर रोज तुम्हें गली के मोड़ तक छोड़ कर जाता है?’’

‘‘हां मां ,ये वही हैं.’’

‘‘कभी उसे घर पर भी बुला लो. हम भी मिल लेंगे तुम्हारे दोस्त से.’’‘‘हां मां, मैं जल्दी ही मिलवाती हूं आप से,’’ कंधे पर बैग झुलाती हुई रंजना निकल पड़ी.

गली के नुक्कड़ पर मधुकर बाइक पर बैठा उस का इंतजार कर रहा था.

बाइक पर सवार हो रैस्टोरैंट पहुंच गए. मधुकर ने रैस्टोरैंट में टेबल पहले ही से बुक करा रखी थी.

रैस्टोरैंट में अंदर जा कर देखा तो कौर्नर टेबल पर सुंदर सा हार्ट शेप बैलून रैड रोज का गुलदस्ता मौजूद था.

‘‘मधुकर, तुम ने तो मुझे बड़ा वाला सरप्राइज दे दिया आज. मुझे तो बिलकुल भी याद नहीं था कि आज वैलेंटाइन डे है. नाइस अरैंजमैंट मधुकर…

‘‘आज की शाम तुम ने यादगार बना दी…’’

‘‘रंजना बैठो तो सही, खड़ीखड़ी मेरे बारे में कसीदे पढ़े जा रही हो, मुझे भी तो इजहारेहाल कहने दो…’’ मुसकराते हुए मधुकर ने कहा.

‘‘नोटी बौय… कहो, क्या कहना है?’’ हंसते हुए रंजना बोली.

मधुकर ने घुटनों के बल बैठ रंजना का हाथ थाम कर चूम लिया और दिल के आकार की हीरे की रिंग रंजना की उंगली में पहना दी.

‘‘अरे वाह… रिंग तो  बहुत सुंदर है,’’ अंगूठी देख रंजना ने कहा.

डिनर के बाद रंजना और मधुकर बाइक पर सवार हो घर की ओर चले जा रहे थे, सामने से एक बाइक पर 2 लड़के मुंह पर कपड़ा बांधे उन की बाइक के सामने आ गए. मधुकर को ब्रेक लगा कर अपनी बाइक रोकनी पड़ी.

लड़कों ने फब्तियां कसनी शुरू कर दीं और मोटरसाइकिल को उन की बाइक के चारों तरफ घुमाने लगे. उस समय सड़क भी सुनसान थी. वहां कोई मदद के लिए नहीं था. रंजना को अचानक अपनी लिपिस्टिक गन का खयाल आया. उस ने धीरे से बैग में हाथ डाला और गन चला दी.

गन के चलते ही नजदीक के थाने  में ब्लूटूथ के जरीए खबर मिल गई. थानेदार 5 सिपाहियों को ले कर निकल पड़े. कुछ ही देर में पुलिस के सायरन की आवाज सुनाई देने लगी.

लड़कों ने तुरतफुरत बैग छीनने की कोशिश की. मधुकर ने एक लड़के के गाल पर जोरदार चांटा जड़ दिया. इस छीनाझपटी में रंजना का हाथ छिल गया, खून रिसने लगा.

बैग कस कर पकड़े होने की वजह से बच गया.

सामने से पुलिस की गाड़ी  आती देख लड़के दूसरी दिशा में अपनी बाइक घुमा कर भाग निकलने की कोशिश करें, उस से पहले थानेदार ने उन्हें धरदबोचा और पकड़ कर गाड़ी में बैठा लिया.

थानेदार ने एक सिपाही को आदेश दिया कि इस लड़के की बाइक आप चला कर इस के घर पहुंचा दें. इस लड़के और लड़की को हम जीप से इन के घर छोड़ देते हैं.

रंजना और मधुकर जीप में सवार हो गए.

‘‘आप का क्या नाम है?’’ थानेदार ने अपना सवाल रंजना से किया.

‘‘मेरा नाम रंजना है. मैं एक होटल में रिसेप्शनिस्ट हूं. ये मेरे दोस्त मधुकर हैं. ये आईटी कंपनी में इंजीनियर के पद पर हैं.’’

‘‘रंजना, आप बहुत ही बहादुर हैं. आप ने सही समय पर अपनी लिपिस्टिक गन का इस्तेमाल किया है.’’

‘‘सर, रंजना वाकई बहुत हिम्मत वाली है.’’

थानेदार ने मधुकर से पूछा, ‘‘तुम भी अपने घर का पता बताओ.’’

‘‘सर, त्रिवेणी आवास विकास में डी 22 नंबर मकान है. उस से पहले ही मोड़ पर रंजना का घर है.’’

‘‘ओके मधुकर, वह तो पास ही में है.’’

पुलिस की जीप रंजना के घर के सामने रुकी.

पुलिस की गाड़ी देख रंजना की मां घबरा गईं और रंजना के पापा को आवाज लगाई, ‘‘जल्दी आइए, रंजना पुलिस की गाड़ी से आई है.’’

रंजना के पापा तेजी से बाहर की ओर लपके. बेटी को सकुशल देख उन की जान में जान आई.

थानेदार जोगिंदर सिंह ने सारी बात रंजना के पापा को बताई और मधुकर को भी सकुशल घर पहुंचाने के लिए कहा.

थानेदार जोगिंदर सिंह मधुकर को अपने साथ ले कर जीप में आ बैठे, ‘‘चल भई जवान तुझे भी घर पहुंचा दूं, तभी चैन की सांस लूंगा.’’

मधुकर को घर के सामने छोड़ थानेदार जोगिंदर सिंह वापस थाने चले गए.

मधुकर ने घर के अंदर आ कर इस बात की चर्चा मम्मीपापा के साथ खाना खाते हुए डाइनिंग टेबल पर विस्तार से बताई.

मधुकर के पापा का कहना था कि बेटा, तुम ने जो भी किया उचित था. रंजना की समझदारी से तुम दोनों सकुशल घर आ गए. मधुकर रंजना जैसी लड़की तो वाकई बहू बनानेलायक है. मम्मी ने भी हां में हां मिलाई.

‘‘मधुकर, खाना खा कर रंजना को फोन कर लेना.’’ मां ने कहा.

‘‘जी मम्मी.’’

मधुकर ने खाना खाने के बाद वाशबेसिन पर हाथ धोए और वहां लटके तौलिए से हाथ पोंछ कर सीधा अपने कमरे की बालकनी में आ कर रंजना को फोन मिलाया. रिंग जा रही थी, पर फोन रिसीव नहीं किया.

मधुकर ने दोबारा फोन मिलाया ट्रिन… ट्रिन. उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो, मैं रंजना की मम्मी बोल रही हूं…’’

‘‘जी, मैं… मैं मधुकर बोल रहा हूं. रंजना कैसी है?’’

‘‘बेटा, रंजना पहली बार साड़ी पहन कर एक स्त्री के रूप में तैयार हो कर गई थी और ये घटना घट गई. यह घटना उसे अंदर तक झकझोर गई है. मैं रंजना को फोन देती हूं. तुम ही बात कर लो.’’

‘‘रंजना, मैं मधुकर.‘‘

‘‘क्या हुआ रंजना? तुम ठीक तो हो ? तुम बोल क्यों नहीं रही हो?’’

‘‘मधुकर, मेरी ही गलती है कि मुझे इतना सजधज कर साड़ी पहन कर जाना ही नहीं चाहिए था.’’

‘‘देखो रंजना, एक न एक दिन तुम्हें इस रूप में आना ही था. घटनाएं तो जीवन में घटित होती रहती हैं. उन्हें कपड़ों से नहीं जोड़ा जा सकता है. संसार में सभी स्त्रियां स्त्रीयोचित परिधान में ही रहती हैं. पुरुष के छद्म वेश में कोई नहीं रहतीं. तुम तो जमाने से टक्कर लेने के लिए सक्षम हो… इसलिए संशय त्याग कर खुश रहो.’’

‘‘मधुकर, तुम ठीक कह रहे हो. मैं ही गलत सोच रही थी.’’

‘‘रंजना, मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपना बनाना चाहता हूं.’’

‘‘लव यू… मधुकर.’’

‘‘लव यू टू रंजना… रात ज्यादा हो गई है. तुम आराम करो. कल मिलते हैं… गुड नाइट.’’

सुबह मधुकर घर से औफिस जाने के लिए निकल ही रहा था कि मम्मी की आवाज आई, ‘‘मधुकर सुनो, रंजना के घर चले  जाना. और हो सके तो शाम को मिलाने के लिए उसे घर ले आना.’’

‘‘ठीक है मम्मी, मैं चलता हूं,’’ मधुकर ने बाइक स्टार्ट की और निकल गया रंजना से मिलने.

रंजना के घर के आगे मधुकर बाइक पार्क कर ही रहा था कि सामने से रंजना आती दिखाई दी. साथ में उस की मां भी थी. रंजना के हाथ में पट्टी बंधी थी.

‘‘अरे रंजना, तुम्हें तो आराम करना चाहिए था.’’

‘‘मधुकर, मां के बढ़ावा देने पर लगा कि बुजदिल बन कर घर में पड़े रहने से तो अपना काम करना बेहतर है.’’

‘‘बहुत बढ़िया… गुड गर्ल.’’

‘‘आओ चलें. बैठो, तुम्हें होटल छोड़ देता हूं.’’

‘‘रंजना, मेरी मां तुम्हें याद कर रही थीं. वे कह रही थीं कि रंजना को शाम को घर लेते लाना… क्या तुम चलोगी मां से मिलने?’’

‘‘जरूर चलूंगी आंटी से मिलने. शाम 6 बजे तुम मुझे होटल से पिक कर लेना.’’

‘‘ओके रंजना, चलो तुम्हारी मंजिल आ गई.’’

बाइक से उतर कर रंजना ने मधुकर को बायबाय किया और होटल की सीढ़ियां चढ़ कर अंदर चली गई.

मधुकर बेचैनी से शाम का इंतजार कर रहा था. आज रंजना को मां से मिलवाना था.

मधुकर बारबार घड़ी की सूइयों को देख रहा था, जैसे ही घड़ी में 6 बजे वह उठ कर चल दिया, रंजना को पिक करने के लिए.

औफिस से निकल कर मधुकर होटल पहुंच कर बाइक पर बैठ कर इंतजार करने लगा. उसे एकएक पल भारी लग रहा था.

रंजना के आते ही सारी झुंझलाहट गायब हो गई और होंठों पर मुसकराहट तैर गई.

बाइक पर सवार हो कर दोनों मधुकर के घर पहुंच गए.

मधुकर ने रंजना को ड्राइंगरूम में बिठा कर कर मां को देखने अंदर गया. मां रसोई में आलू की कचौड़ी बना रही थीं.

‘‘मां, देखो कौन आया है आप से मिलने…’’ मां कावेरी जल्दीजल्दी हाथ पोछती हुई ड्राइंगरूम में पहुंचीं.

‘‘मां, ये रंजना है.’’

‘‘नमस्ते आंटीजी.’’

‘‘नमस्ते, कैसी हो  रंजना.’’

‘‘जी, मैं ठीक हूं.’’

मां कावेरी रंजना को ही निहारे जा रही थीं. सुंदर तीखे नाकनक्श की रंजना ने उन्हें इस कदर प्रभावित कर लिया था कि मन ही मन वे भावी पुत्रवधू के रूप में रंजना को देख रही थीं.

‘‘मां, तुम अपने हाथ की बनी गरमागरम कचौड़ियां नहीं खिलाओगी. मुझे तो बहुत भूख लगी है.’’

मां कावेरी वर्तमान में लौर्ट आई और बेटे की बात पर मुसकरा पड़ीं और उठ कर रसोई से प्लेट में कचौड़ी और चटनी रंजना के सामने रख कर खाने का आग्रह किया.

रंजना प्लेट उठा कर कचौड़ी खाने लगी. कचौड़ी वाकई बहुत स्वादिष्ठ बनी थी.

‘‘आंटी, कचौड़ी बहुत स्वादिष्ठ बनी हैं,’’ रंजना ने मां की तारीफ करते हुए कहा.

मधुकर खातेखाते बीच में बोल पड़ा, ‘‘रंजना, मां के हाथ में जादू है. वे खाना बहुत ही स्वादिष्ठ बनाती हैं.’’

‘‘धत… अब इतनी भी तारीफ मत कर मधुकर.’’

नाश्ता खत्म कर रंजना ने घड़ी की तरफ देखा तो 7 बजने वाले थे. रंजना उठ कर जाने के लिए खड़ी हुई.

‘‘मधुकर बेटा, रंजना को उस के घर तक पहुंचा आओ.’’

‘‘ठीक है मां, मैं अभी आया.’’

मां कावेरी ने सहज, सरल सी लड़की को अपने घर की शोभा बनाने की ठान ली. उन्होंने मन ही मन तय किया कि कल रंजना के घर जा कर उस के मांबाप से उस का हाथ मांग लेंगी. इस के बारे में मधुकर के पापा की भी सहमति मिल गई.

सुबह ही कावेरी ने अपने आने की सूचना रंजना की मम्मी को दे दी थी.

शाम के समय कावेरी और उन के पति के आने पर रंजना की मां ने उन्हें आदरपूर्वक ड्राइंगरूम में बिठाया.

‘‘रंजना के पापा आइए, यहां आइए, देखिए मधुकर के मम्मीपापा आ गए  हैं.’’

रंजना और मधुकर के पापा के बीच राजनीतिक उठापटक के बारे में बातें करने के साथ ही कौफी की चुसकी लेते हुए इधरउधर की बातें भी हुईं.

रंजना की मम्मी मधुकर की मां कावेरी के साथ बाहर लौन में झूले पर बैठ प्रकृति का आनंद लेते हुए कौफी पी रही थीं.

मधुकर की मां कावेरी बोलीं, ‘‘शारदाजी, मैं रंजना का हाथ अपने बेटे के लिए मांग रही हूं. आप ना मत कीजिएगा.’’

‘‘कावेरीजी, आप ने तो मेरे मन की बात कह दी. मैं भी यही सोच रही थी,’’ कहते हुए रंजना की मां शारदाजी मधुकर की मां कावेरी के गले लग गईं.

‘‘कावेरीजी चलिए, इस खुशखबरी को अंदर चल कर सब के साथ सैलिब्रेट करते हैं.’’

शारदा और कावेरी ने हंसते हुए ड्राइंगरूम में प्रवेश किया तो दोनों ने चौंक कर देखा.

‘‘क्या बात है, आप लोग किस बात पर इतना हंस रही हैं?’’ रंजना के पिता महेश बोले.

‘‘महेशजी, बात ही कुछ ऐसी है. कावेरीजी ने आप को  समधी के रूप में पसंद कर लिया है.’’

‘‘क्या… कहा… समधी… एक बार फिर से कहना?’’

‘‘हां… हां… समधी. कुछ समझे.’’

‘‘ओह… अब समझ आया आप लोगों के खिलखिलाने का राज.’’

‘‘अरे, पहले बच्चों से तो पूछ कर रजामंदी ले लो,’’ मधुकर के पाप हरीश ने मुसकरा कर कहा.

रंजना के पापा महेश सामने से बच्चों को आता देख बोले, ‘‘लो, इन का नाम लिया और ये लोग हाजिर. बहुत लंबी उम्र है इन दोनों की.’’

मधुकर ने आते ही मां से चलने के लिए कहा.

‘‘बेटा, हमें तुम से कुछ बात करनी है.”

“कहिए मां, क्या कहना चाहती हैं?’’

‘‘मधुकर, रंजना को हम ने तुम्हारे लिए मांग लिया है. तुम बताओ, तुम्हारी क्या मरजी है.’’

‘‘मां, मुझे कोई ओब्जैक्शन नहीं है. रंजना से भी पूछ लो कि वे क्या चाहती हैं?’’

मां कावेरी ने रंजना से पूछा, ‘‘क्या तुम मेरी बेटी बन कर मेरे घर आओगी.’’

रंजना ने शरमा कर गरदन झुकाए हुए हां कह दी.

यह देख रंजना के पापा महेशजी चहक उठे. अब तो कावेरीजी आप मेरी समधिन हुईं.

ऐसा सुन सभी एकसाथ हंस पड़े. तभी रंजना की मां शारदा मिठाई के साथ हाजिर हो गईं.

‘‘लीजिए कावेरीजी, पहले मिठाई खाइए,’’ और झट से एक पीस मिठाई का कावेरी के मुंह में खिला दिया.

कावेरी ने भी शारदा को मिठाई खिलाई. प्लेट हरीशजी की ओर बढ़ा दी. मधुकर ने रंजना को देखा, तो उस का चेहरा सुर्ख गुलाब सा लाल हो गया था. रंजना एक नजर मधुकर पर डाल झट से अंदर भाग गई.

‘‘शारदाजी, एक अच्छा सा सुविधाजनक दिन देख शादी की तैयारी कीजिए. चलने से पहले जरा आप रंजना को बुलाइए,’’ मधुकर की मां कावेरी ने कहा.

रंजना की मां शारदा उठीं और अंदर जा कर रंजना को बुला लाईं. कावेरी ने अपने हाथ से कंगन उतार कर रंजना को पहना दिए.

रंजना ने झुक कर उन के पैर छुए.

हरीश और कावेरी मधुकर के साथ शारदाजी और महेशजी से विदा ले कर घर आ गए.

2 महीने बाद शारदाजी के घर से आज शहनाई के स्वर गूंज रहे थे. रंजना दुलहन के रूप में सजी आईने के सामने बैठी खुद को पहचान नहीं पा रही थी. छद्म वेश हमेशा के लिए उतर चुका था.

‘‘सुनो रंजना दी…’’ रंजना की कजिन ने आवाज लगाई, ‘‘बरात आ गई…’’

रंजना मानो सपने से हकीकत में आ गई. रंजना के पैर शादी के मंडप की ओर बढ़ गए.

जमीं से आसमां तक : माया डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट

2 बच्चों की मां माया आज डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थी. पर इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उस ने बड़ी जद्दोजेहद की थी. पिता ने कम उम्र में उस की शादी करा दी थी, जहां सुख किस चिडि़या का नाम है,

माया ने कभी महसूस ही नहीं किया था. फिर उस ने एक ऐसा कड़ा फैसला लिया कि उस की जिंदगी ही पलट गई. कैसे हुआ यह सब?

अपने अतीत की यादों में खो चुकी माया का ध्यान तब भंग हुआ, जब बाहर स्कूल से लौट रहे बच्चों की आवाज उस के कानों में सुनाई दी. तभी आशा दीदी भी मिठाई का डब्बा लिए घर आ गई थीं.

दोनों बच्चे आशा दीदी के हाथ में मिठाई का डब्बा देख कर खुशी से चहक कर पूछ बैठे, ‘मौसी, आज किस खुशी में हमें मिठाई मिलने वाली है?’

‘‘बच्चो, आज से तुम्हारे भविष्य की एक नई शुरुआत होने वाली है. तुम्हारी मम्मी ने यूपीएससी का इम्तिहान पास कर लिया है. अब वे बड़ी अफसर बनेंगी.’’

आशा दीदी ने मिठाई का डब्बा खोलते हुए बच्चों की तरफ बढ़ा दिया. माया आशा दीदी के गले लग गई और आंसुओं की धारा बह निकली.

आशा दीदी ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘माया तुम ने अपने बुलंद इरादों से जमीं से आसमां तक का सफर तय किया है और समाज को एक संदेश दिया है कि औरत हमेशा ही मर्दों पर हावी रही है.’’

‘‘दीदी, अगर आप मुझे संबल न देतीं, तो मैं तो कभी की टूट चुकी होती. दीदी, मेरी कामयाबी के पीछे आप का भी बड़ा योगदान है, थैंक यू दीदी,’’ माया आशा दीदी से बोली.

माया को यूपीएससी के रिजल्ट का बेसब्री से इंतजार था. सुबह से ही उस की नजरें मोबाइल स्क्रीन पर टिकी हुई थीं. दोपहर के समय उस के दोनों बच्चे स्कूल गए हुए थे और जैसे ही रिजल्ट आया और अपना नाम लिस्ट में देख कर माया जोर से चीख पड़ी. उस ने सब से पहले आशा दीदी का नंबर डायल किया.

आशा दीदी ने जैसे ही काल रिसीव किया, माया मारे खुशी के बोली,

‘‘दीदी, मेरा सिलैक्शन यूपीएससी में हो गया है.’’

आशा दीदी भी खुशी से झम उठीं और फोन पर बधाई देते हुए बोलीं, ‘‘बधाई हो माया. मैं तेरा मुंह मीठा कराने घर पर आ रही हूं.’’

आशा माया की कजिन सिस्टर थीं, जिन्होंने बुरे समय में माया और उस के बच्चों को अपने घर में पनाह दी थी. आज माया से ज्यादा खुशी आशा दीदी को हो रही थी.

आशा दीदी से बातचीत का सिलसिला खत्म हुआ, तो माया ने मोबाइल फोन सोफे पर रख कर अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं. माया के अतीत के दिनों के पन्ने एकएक कर के खुलते जा रहे थे.

नरसिंहपुर जिले के जिस गांव भिलमा ढाना में माया का जन्म हुआ था, उस गांव में ज्यादातर लोग गरीब आदिवासी ही रहते थे, जो खेतीबारी और मजदूरी कर के रोजीरोटी चलाते थे. माया के पिता भी मजदूरी और खेतीबारी से अपना परिवार चलाते थे.

गांव का स्कूल 10वीं क्लास तक ही था. 10वीं की पढ़ाई के बाद माया के पापा उस की शादी के लिए भागदौड़ करने लगे थे. वे कहते थे कि बेटी के लिए अच्छा रिश्ता ढूंढ़ने में पिता की एडि़यां घिस जाती हैं.

गांव से तकरीबन 7-8 किलोमीटर दूर गोटी टोरिया गांव था, जहां 12वीं जमात तक का सरकारी स्कूल था. माया ने जिद कर के वहां बायोलौजी सब्जैक्ट से एडमिशन ले लिया. वह गांव से ही दूसरी लड़कियों के साथ साइकिल से रोजाना अपडाउन करती थी.

उन दिनों स्कूल में टीचर ने बताया था कि बायोलौजी से पढ़ने वाले डाक्टर बन सकते हैं. बस फिर क्या था, माया के सिर पर डाक्टर बनने का भूत सवार हो गया. इस के लिए वह दिनरात पढ़ाई करने लगी.

जब माया ने हायर सैकंडरी का इम्तिहान दिया, तब वह 17 साल की गांव की मासूम लड़की थी. पढ़ने में अव्वल माया का रिजल्ट आने से पहले ही उस की शादी हो जानी चाहिए की चर्चा होने लगी थी. उस उम्र तक माया ठीक से शादी का मतलब भी नहीं जानती थी. वह अच्छी तरह पढ़लिख कर डाक्टर बनना चाहती थी.

गांव से 50 किलोमीटर दूर तक आगे कालेज की पढ़ाई का कोई इंतजाम नहीं था. किसी बड़े शहर में रह कर पढ़ने की उस के पिता की हैसियत भी नहीं थी.

माया का स्कूल का रिजल्ट आने के पहले ही एक दिन बड़े घर से उस के लिए रिश्ता आया, तो उस के पिता की खुशी का ठिकाना नहीं था.

भोपाल में रहने वाले जिस घर से माया के लिए रिश्ता आया था, वह काफी रसूखदार था. उस घर के लोग पढ़ेलिखे और बड़े सरकारी पदों पर थे.

उन का कहना था कि हमें केवल अच्छी होशियार लड़की चाहिए, तो पिताजी ने उन से गर्व से कहा था, ‘‘हमारी बेटी माया पढ़ने में अच्छी है. हमेशा फर्स्ट डिवीजन में पास होती है और डाक्टर बनना चाहती है, पर हमारी हैसियत उसे पढ़ाने की नहीं है.’’

माया को अपने घर की बहू बनाने आए सूटबूट पहने हुए राम कुमार ने माया के पिताजी से कहा, ‘‘आप चिंता न करें. हमारी भी इसी उम्र की एक बेटी है, वह भी डाक्टर बनने के लिए एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है. हम माया को अपनी बेटी मान कर आगे पढ़ाएंगे और डाक्टर बनाएंगे.’’

पिता के लिए बिना दहेज घर बैठे रिश्ता ले कर आए राम कुमार किसी फरिश्ते से कम नहीं थे. उन्होंने झट से बेटी का रिश्ता राम कुमार के बेटे पवन से तय कर दिया.

महीनेभर बाद ही माया की शादी हो गई. गांव के मिट्टी के कच्चे घर से विदा हो कर पहली बार भोपाल शहर आई माया के पैर जमीं पर नहीं थे.

ससुराल वाले भोपाल में एक बड़े फ्लैट में रहते थे. यह सब माया के लिए सपना सरीखा था. माया को लगा कि बापू ने भले ही उस की शादी जल्दी कर दी है, मगर वह ठीक जगह पहुंच गई है और यहां से वह डाक्टर बनने के अपने सपने को आसानी से पूरा कर लेगी.

शादी के कुछ दिन तो मेहमानों की भीड़ और नईनवेली बहू की खातिरदारी में ठीक बीते, लेकिन माया को कुछ दिन बाद ही पता लगा कि उस का पति पवन किसी और लड़की के साथ रिलेशन में है, तो उस के पैरों तले जमीन ही खिसक गई.

धीरेधीरे ससुराल वालों के बरताव से माया को लगा कि उन्हें एक बहू नहीं नौकरानी चाहिए थी, इसलिए एक छोटे से गांव के गरीब घर में शादी करा दी.

माया भले ही गरीब घर से थी, लेकिन मातापिता ने उसे बड़े लाड़प्यार से पाला था. ससुराल जाते ही उस के अरमान धरे के धरे रह गए. उस की जिंदगी तबाह सी हो गई थी.

ससुराल में सासससुर, पति के अलावा एक ननद, देवर दिनभर माया से घर का काम कराते थे. उसे लगता जैसे वह बड़े घरों में काम करने वाली बाई हो. घर में एक दादी सास भी थीं, जो बीमार रहती थीं. वे बिस्तर पर ही शौच करती थीं. ससुराल के लोग हर समय माया से उन की गंदगी साफ कराते थे.

माया सुबह जल्दी उठ कर 5-6 लोगों का नाश्ता, फिर खाना बनाती, ?ाड़ूपोंछा लगाने के साथ पूरे घर के कपड़े साफ करते हुए उसे कब सुबह से रात हो जाती, पता ही नहीं चलता था. रात में बिस्तर पर पति का देहसुख नहीं मिलता था. पति उस के साथ किसी वहशी दरिंदे की तरह बरताव करता, तो वह सुबक कर रह जाती.

माया की एक ननद भी थी, जो भोपाल से ही एमबीबीएस कर रही थी. माया उस से कुछ बात करने की कोशिश भी करती, तो वह माया को हीनभावना से देखती. वह माया से बात भी करना पसंद नहीं करती थी.

एक छोटा देवर मनजीत था, जो माया को सपोर्ट करता था, लेकिन परिवार के दबाव के चलते वह खुल कर साथ नहीं दे पाता था. कभीकभार चोरीछिपे वह मदद कर दिया करता था.

माया को खाने तक के लाले पड़ गए थे. उसे अपने कपड़ों में रोटियां छिपा कर रखनी पड़ती थीं, फिर जा कर वह हर किसी से नजरें बचा कर खाती थी.

उन दिनों गांव के किसी भी घर में मोबाइल फोन तो दूर टैलीफोन भी नहीं था. शादी के बाद कई महीनों तक माया की घर पर बात नहीं हो पाई थी.

एक दिन पिताजी माया से मिलने भोपाल आए. उन्होंने देखा कि माया तो आलीशान घर में रह रही है. पर उस दिन भी सुबहसुबह पवन ने माया की पिटाई की थी. माया के शरीर पर जगहजगह नीले निशान पड़ गए थे.

माया ने पिताजी को अपनी परेशानी बताते हुए कहा, ‘‘मैं इस घर में नौकरों की तरह जिंदगी काट रही हूं. आप मुझे अपने साथ घर ले चलो, अब और सहन नहीं होता.’’

माया के पिताजी ने उस से कहा, ‘‘शाम को तैयार रहना. मैं आ कर तुझे साथ ले जाऊंगा.’’

पिता को लगा कि माया बेवजह ही ससुराल वालों की शिकायत कर रही है. पतिपत्नी में थोड़ाबहुत टकराव तो चलता ही रहता है. वे भी तो माया की मां को भलाबुरा कह देते हैं.

माया रात के 9 बजे तक अपने पिताजी का इंतजार करती रही, लेकिन वे नहीं आए. सम?ा नहीं आया आखिर उन की ऐसी क्या मजबूरी थी. उस दिन माया को अपने पिताजी पर बहुत गुस्सा आया और ऐसा लगा कि अब इस दुनिया में उस का कोई सहारा नहीं है.

माया उम्र में छोटी थी, पिताजी की परेशानी को नहीं समझाती थी. माया के पिताजी उसे गांव ले जाते तो समाज के लोगों के तानों की वजह से उन की जिंदगी दूभर हो जाती.

माया की शारीरिक और मानसिक हालत लगातार खराब होती जा रही थी, जिस से उबरने का कोई रास्ता उसे दिखाई नहीं दे रहा था. उस के मन में कई बार ऐसे खयाल आते थे कि वह इन सब का खून कर दे या फिर खुद मर जाए.

पर समय गुजरने के साथसाथ माया एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी, पर उस की हैसियत अभी भी एक नौकरानी की तरह थी. उस के पास न पैसे थे, न कोई जानपहचान. ससुराल वालों से तंग आ कर उस का मन करता कि कहीं भाग जाए, पर बच्चों की खातिर घर छोड़ कर नहीं जा पा रही थी.

पर जब पानी सिर से ऊपर हो गया, तो माया के अंदर ऐसा गुस्सा था कि उस ने कुछ भी नहीं सोचा. अपने बच्चों के भविष्य के बारे में भी नहीं सोचा. उस ने ठान लिया था कि जो काम वह यहां करती है, वही काम बाहर कर लेगी. ?ाड़ूपोंछा लगाना, बरतन धोना कर लेगी, लेकिन अब वह इस घर में नहीं रहेगी. बच्चों को वह मजदूरी कर के पाल लेगी.

आखिरकार एक रात माया ने अपने बच्चों के साथ पति का घर छोड़ ही दिया. घर छोड़ने के बाद वह यहांवहां भटकते हुए रेलवे स्टेशन पहुंची, लेकिन पता नहीं था कि कहां जाना है.

तभी माया को अपनी एक कजिन सिस्टर आशा दीदी की याद आई. वे भोपाल में ही अपने भाई के साथ एक कमरे में रह कर पढ़ाई कर रही थीं. पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए वे ब्यूटीपार्लर में भी काम करती थीं.

माया खोजते हुए आशा दीदी के पास पहुंची और उन्हें अपनी दुखभरी कहानी सुना दी. अपने दोनों बच्चों समेत माया उन के साथ उसी कमरे में रहने लगी. कुछ दिन बाद माया अपने लिए काम ढूंढ़ने लगी, ताकि वह उन पर बोझ बन कर न जी सके.

गांव में घर का खर्च चलाने के लिए माया की मां कपड़ों की सिलाई करती थीं. बचपन से उस ने भी उन्हें देखदेख कर सिलाई करना सीख लिया था. वह सब आज काम आ गया.

माया ने पास में ही एक सिलाई सैंटर पर काम करना शुरू कर दिया. सिलाई से मिले पैसे जोड़ कर उस ने एक सिलाई मशीन खरीद ली.

सिलाई मशीन खरीदने के बाद माया ने अपना खुद का सिलाई का काम शुरू कर दिया. सिलाई करने के बाद जो समय बचता, उस में वह अपनी कालोनी के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी.

आमदनी बढ़ते ही माया ने अलग से एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया था. अपने बच्चों को पालते हुए सब से ज्यादा सुकून इस बात का था कि उसे मार नहीं खानी पड़ती थी.

माया दिनरात मेहनत कर के भी 3-4 हजार रुपए ही कमा पा रही थी, जो महीनेभर में खर्च हो जाते थे. जब कभी बच्चे बीमार पड़ते, तो उन्हें डाक्टर को दिखाने के भी पैसे नहीं रहते थे, मजबूरन मैडिकल स्टोर से दवा ला कर उन को खिलानी पड़ती थी.

ससुराल में रहते हुए माया ने चोरीछिपे बीए की पढ़ाई कर ली थी. इस में उस के देवर मनजीत ने कालेज की फीस भर कर कुछ किताबें भी दिलाई थीं. वह कभी कालेज नहीं गई, बस घर में थोड़ाबहुत पढ़ कर इम्तिहान देती गई और पास होती गई.

वह पढ़ाई अब माया के काम आने लगी. नौकरी की तलाश में वह यहांवहां भटक रही थी, तभी मनजीत ने उसे यूपीएससी के इम्तिहान के बारे में बताया और कुछ जरूरी किताबें भी ला कर दीं.

माया ने सोच लिया था कि एक बार में नहीं होगा, तो दूसरीतीसरी बार में जरूर होगा. बिना किसी कोचिंग के तैयारी शुरू कर 12-12 घंटे पढ़ाई करने के बाद माया एक ब्यूटीपार्लर में पार्टटाइम नौकरी भी करती रही.

माया ने पहले ही अटैंप्ट में प्रीलिम्स इम्तिहान पास कर लिया और मेन एग्जाम की तैयारी में जुट गई. दिनरात की मेहनत रंग लाई और माया ने यूपीएससी का मेन एग्जाम भी क्लियर कर लिया.

माया बड़ी अफसर बन चुकी थी. तकरीबन 3-4 साल अलगअलग जिलों में रहते हुए इसी साल उज्जैन जिले में उस की पोस्टिंग डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के तौर पर हो गई थी.

एक दिन औफिस में अपने केबिन में बैठी माया कुछ फाइलें देख रही थी कि अर्दली ने एक कागज की परची उस की टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘मैडम, कोई आप से मिलना चाहता है.’’

माया ने नजरें उठा कर परची पर लिखे नाम को गौर से देखा और नाम पढ़ते ही अर्दली से कहा, ‘‘आने दो.’’

वह शख्स जैसे ही अंदर आया, तो माया ने अपनी नजरें फाइल पर गड़ाते हुए उसे कुरसी पर बैठ जाने को कहा. वह माया का पति पवन था, जो कामधंधे की तलाश में भोपाल से उज्जैन आया था.

यहां के एक बैंक में सिक्योरिटी गार्ड का काम कर रहे पवन को बंदूक के लाइसैंस के लिए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की इजाजत चाहिए थी. माया को सामने देख कर वह शर्मिंदा हो रहा था. उस की हिम्मत कुछ कहने की नहीं हो रही थी.

माया के पूछने पर पवन ने बुझे मन से बताया था कि पापा की मौत के बाद बहनों की शादी में काफी पैसा खर्च हो गया. पैसों की तंगी का जब दौर शुरू हुआ, तो जिस लड़की के चक्कर में उस ने माया को पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया था, वह लड़की मौका मिलते ही कैसे किसी गैर की बांहों में झलने लगी थी. घर में केवल बूढ़ी मां रह गई थीं, जिन से घर का काम भी नहीं हो पा रहा था.

पवन के मन में खयाल आया कि वह माया से अपने बच्चों के बारे में पूछ ले, लेकिन उस की हिम्मत जवाब दे गई. आज माया जिस मुकाम पर है, पवन को दोबारा तो नहीं मिल सकती.

पवन ने नजरें झाका कर अपनी एप्लीकेशन माया की तरफ बढ़ा दी. माया ने एप्लीकेशन पढ़ी और उस पर अपने दस्तखत कर पवन की ओर बढ़ा दी. पवन ने एप्लीकेशन अपने हाथों में ली और चुपचाप केबिन से बाहर निकल गया.

आलू वड़ा: क्यों खुश था दीपक

‘‘बाबू, तुम इस बार दरभंगा आओगे तो हम तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे,’’ छोटी मामी की यह बात दीपक के दिल को छू गई.

पटना से बीएससी की पढ़ाई पूरी होते ही दीपक की पोस्टिंग भारतीय स्टेट बैंक की सकरी ब्रांच में कर दी गई. मातापिता का लाड़ला और 2 बहनों का एकलौता भाई दीपक पढ़ने में तेज था. जब मां ने मामा के घर दरभंगा में रहने की बात की तो वह मान गया.

इधर मामा के घर त्योहार का सा माहौल था. बड़े मामा की 3 बेटियां थीं, म?ाले मामा की 2 बेटियां जबकि छोटे मामा के कोई औलाद नहीं थी.

18-19 साल की उम्र में दीपक बैंक में क्लर्क बन गया तो मामा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वहीं दूसरी ओर दीपक की छोटी मामी, जिन की शादी को महज 4-5 साल हुए थे, की गोद सूनी थी.

छोटे मामा प्राइवेट नौकरी करते थे. वे सुबह नहाधो कर 8 बजे निकलते और शाम के 6-7 बजे तक लौटते. वे बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे. ऐसी सूरत में जब दीपक की सकरी ब्रांच में नौकरी लगी तो सब खुशी से भर उठे.

‘‘बाबू को तुम्हारे पास भेज रहे हैं. कमरा दिलवा देना,’’ दीपक की मां ने अपने छोटे भाई से गुजारिश की थी.

‘‘कमरे की क्या जरूरत है दीदी, मेरे घर में 2 कमरे हैं. वह यहीं रह लेगा,’’ भाई के इस जवाब में बहन बोलीं, ‘‘ठीक है, इसी बहाने दोनों वक्त घर का बना खाना खा लेगा और तुम्हारी निगरानी में भी रहेगा.’’

दोनों भाईबहनों की बातें सुन कर दीपक खुश हो गया.

मां का दिया सामान और जरूरत की चीजें ले कर दोपहर 3 बजे का चला दीपक शाम 8 बजे तक मामा के यहां पहुंच गया.

‘‘यहां से बस, टैक्सी, ट्रेन सारी सुविधाएं हैं. मुश्किल से एक घंटा लगता है. कल सुबह चल कर तुम्हारी जौइनिंग करवा देंगे,’’ छोटे मामा खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘आप का काम…’’ दीपक ने अटकते हुए पूछा.

‘‘अरे, एक दिन छुट्टी कर लेते हैं. सकरी बाजार देख लेंगे,’’ छोटे मामा दीपक की समस्या का समाधान करते हुए बोल उठे.

2-3 दिन में सबकुछ सामान्य हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे घर छोड़ता तो दीपक की मामी हलका नाश्ता करा कर उसे टिफिन दे देतीं. वह शाम के 7 बजे तक लौट आता था.

उस दिन रविवार था. दीपक की छुट्टी थी. पर मामा रोज की तरह काम पर गए हुए थे. सुबह का निकला दीपक दोपहर 11 बजे घर लौटा था. मामी खाना बना चुकी थीं और दीपक के आने का इंतजार कर रही थीं.

‘‘आओ लाला, जल्दी खाना खा लो. फेरे बाद में लेना,’’ मामी के कहने में भी मजाक था.

‘‘बस, अभी आया,’’ कहता हुआ दीपक कपड़े बदल कर और हाथपैर धो कर तौलिया तलाशने लगा.

‘‘तुम्हारे सारे गंदे कपड़े धो कर सूखने के लिए डाल दिए हैं,’’ मामी खाना परोसते हुए बोलीं.

दीपक बैठा ही था कि उस की मामी पर निगाह गई. वह चौंक गया. साड़ी और ब्लाउज में मामी का पूरा जिस्म झांक रहा था, खासकर दोनों उभार.

मामी ने बजाय शरमाने के चोट कर दी, ‘‘क्यों रे, क्या देख रहा है? देखना है तो ठीक से देख न.’’

अब दीपक को अजीब सा महसूस होने लगा. उस ने किसी तरह खाना खाया और बाहर निकल गया. उसे मामी का बरताव समझ में नहीं आ रहा था.

उस दिन दीपक देर रात घर आया और खाना खा कर सो गया.

अगली सुबह उठा तो मामा उसे बीमार बता रहे थे, ‘‘शायद बुखार है, सुस्त दिख रहा है.’’

‘‘रात बाहर गया था न, थक गया होगा,’’ यह मामी की आवाज थी.

‘आखिर माजरा क्या है? मामी क्यों इस तरह का बरताव कर रही हैं,’ दीपक जितना सोचता उतना उलझ रहा था.

रात खाना खाने के बाद दीपक बिस्तर पर लेटा तो मामी ने आवाज दी. वह उठ कर गया तो चौंक गया. मामी पेटीकोट पहने नहा रही थीं.

‘‘उस दिन चोरीछिपे देख रहा था. अब आ, देख ले,’’ कहते हुए दोनों हाथों से पकड़ उसे अपने सामने कर दिया.

‘‘अरे मामी, क्या कर रही हो आप,’’ कहते हुए दीपक ने बाहर भागना चाहा मगर मामी ने उसे नीचे गिरा दिया.

थोड़ी ही देर में मामीभांजे का रिश्ता तारतार हो गया. दीपक उस दिन पहली बार किसी औरत के पास आया था. वह शर्मिंदा था मगर मामी ने एक झटके में इस संकट को दूर कर दिया, ‘‘देख बाबू, मुझे बच्चा चाहिए और तेरे मामा नहीं दे सकते. तू मुझे दे सकता है.’’

‘‘मगर ऐसा करना गलत होगा,’’ दीपक बोला.

‘‘मुझे खानदान चलाने के लिए औलाद चाहिए, तेरे मामा तो बस रोटीकपड़ा, मकान देते हैं. इस के अलावा भी कुछ चाहिए, वह तुम दोगे,’’ इतना कह कर मामी ने दीपक को बाहर भेज दिया.

उस के बाद से तो जब भी मौका मिलता मामी दीपक से काम चला लेतीं. या यों कहें कि उस का इस्तेमाल करतीं. मामा चुप थे या जानबूझ कर अनजान थे, कहा नहीं जा सकता, मगर हालात ने उन्हें एक बेटी का पिता बना दिया.

इस दौरान दीपक ने अपना तबादला पटना के पास करा लिया. पटना में रहने पर घर से आनाजाना होता था. छोटे मामा के यहां जाने में उसे नफरत सी हो रही थी. दूसरी ओर मामी एकदम सामान्य थीं पहले की तरह हंसमुख और बिंदास.

एक दिन दीपक की मां को मामी ने फोन किया. मामी ने जब दीपक के बारे में पूछा तो मां ने ?ाट से उसे फोन पकड़ा दिया.

‘‘हां मामी प्रणाम. कैसी हो?’’ दीपक ने पूछा तो वे बोलीं, ‘‘मुझे भूल गए क्या लाला?’’

‘‘छोटी ठीक है?’’ दीपक ने पूछा तो मामी बोलीं, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. अब की बार आओगे तो उसे भी देख लेना. अब की बार तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे. तुम्हें खूब पसंद है न.’’

दीपक ने ‘हां’ कहते हुए फोन काट दिया. इधर दीपक की मां जब छोटी मामी का बखान कर रही थीं तो वह मामी को याद कर रहा था जिन्होंने उस का आलू वड़ा की तरह इस्तेमाल किया, और फिर कचरे की तरह कूड़ेदान में फेंक दिया.

औरत का यह रूप उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

‘मामी को बच्चा चाहिए था तो गोद ले सकती थीं या सरोगेट… मगर इस तरह…’ इस से आगे वह सोच न सका.

मां चाय ले कर आईं तो वह चाय पीने लगा. मगर उस का ध्यान मामी के घिनौने काम पर था. उसे चाय का स्वाद कसैला लग रहा था.

दोहरी जिंदगी: शादीशुदा मोनू और रिहाना का क्या रिश्ता था

मोनू की शादी कुछ महीने पहले सायरा से हुई थी, जो काफी खूबसूरत थी, पर उस की छोटी बहन रिहाना कहीं ज्यादा खूबसूरत थी. सायरा पेट से हो चुकी थी. कुछ ही महीने में उस की डिलीवरी होने वाली थी. इस वजह से घर का कामकाज करना अब सायरा के बस की बात नहीं थी. लिहाजा, सायरा ने अपने काम में हाथ बंटाने के लिए रिहाना को बुला लिया.

रिहाना मेहनती होने के साथसाथ चंचल और खुली सोच वाली लड़की थी. यही वजह थी कि जल्दी ही रिहाना अपने जीजा मोनू से काफी घुलमिल गई और दोनों आपस में हंसीमजाक करने लगे.

एक दिन रिहाना बाथरूम में नहा रही थी और जानबूझ कर तौलिया बाहर भूल गई थी. उस ने अपनी दीदी को आवाज लगाई, पर वह सो रही थी. मोनू सामने सोफे पर बैठा कुछ काम कर रहा था.

इतने में रिहाना ने अपने जीजा मोनू से कहा, ‘‘जीजू, बाहर तौलिया रखा है, जरा मुझे दे दो.’’

मोनू ने कहा, ‘‘क्यों? तुम खुद आ कर ले लो.’’

रिहाना बोली, ‘‘अगर मैं ऐसे ही आ गई, तो आप के होश उड़ जाएंगे.’’

मोनू बोला, ‘‘क्यों…? ऐसा क्या है तुम में?’’

रिहाना ने कहा, ‘‘वह तो मुझे देख कर ही पता चलेगा.’’

मोनू ने जोश में आते हुए कहा, ‘‘ठीक है, तुम आ जाओ. मैं भी तो देखूं कि आखिर कैसी लगती है मेरी साली बिना कपड़ों के.’’

रिहाना बोली, ‘‘जीजू, मजाक मत करो. जल्दी से तौलिया दो. कभी मौका मिलेगा, तो मैं आप को अपना जलवा जरूर दिखाऊंगी.’’

मोनू ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं तुम्हारे जलवे का इंतजार करूंगा. मैं भी तो देखना चाहता हूं कि आखिर हमारी साली कैसे जलवा दिखाएगी,’’ यह कहते हुए उस ने तौलिया रिहाना को देते हुए उस का हाथ पकड़ लिया.

रिहाना ने घबराते हुए कहा, ‘‘क्या कर रहे हो आप? दीदी आ जाएंगी.’’

मोनू ने कुछ नहीं सुना और बोला, ‘‘कितना कमसिन हाथ है,’’ कहते हुए उस ने रिहाना के दोनों हाथ चूम लिए.

रिहाना सिहर उठी और जल्दी से उस ने अपना हाथ अंदर खींच लिया. मोनू सायरा के पास चला गया, जो गहरी नींद में सो रही थी.

कुछ ही देर में रिहाना बाथरूम से बाहर आई और सीधे सायरा के कमरे में पहुंची. मोनू वहीं बैठा था.

मोनू की नजर जैसे ही रिहाना पर पड़ी, उस के होश उड़ गए. रिहाना के गोरे गालों पर पानी की बूंदें ऐसे लग रही थीं मानो मोतियों से उस का चेहरा सजा हो. गीले कपड़ों में उस का गुलाबी बदन ऐसे दिख रहा था मानो कोई हूर जन्नत से उतर कर उस के सामने आ गई हो.

तभी रिहाना ने चुटकी बजा कर अपने जीजा का ध्यान तोड़ा और बोली, ‘‘क्या हुआ? अभी यह हाल है कि अपनी सुधबुध खो बैठे हो, तो गौर करो कि जब कभी मुझे उस हालत में देख लिया, जिस हालत में दीदी को रात को बिस्तर पर देखते हो, तो आप का क्या हाल होगा.’’

मोनू के पास रिहाना के इस सवाल का कोई जवाब न था. वह तो रिहाना का मस्त हुस्न देख कर उस का दीवाना बन बैठा था.

तभी रिहाना ने सायरा को उठाया और कहा, ‘‘दीदी, नाश्ता कर लो. जीजू कब से तुम्हारे उठने का इंतजार कर रहे हैं.’’

सायरा जल्दी से उठी और फ्रैश हुई. इतने में रिहाना नाश्ता ले कर आ गई. उस ने अपनी दीदी को नाश्ता कराया और एक नजर अपने जीजू पर डाली तो देखा कि उस के जीजू किसी खयाल में गुम हैं.

दरअसल, मोनू तो रिहाना के गदराए बदन और उस के हुस्न को पाने का तानाबाना बुन रहा था. रिहाना समझ चुकी थी कि जीजू उस के हुस्न के दीवाने हो गए हैं.

तभी सायरा बोली, ‘‘क्या हुआ? तबीयत तो सही है न? आज काम पर नहीं जाना है क्या? अभी तक नाश्ता लिए ऐसे ही बैठे हो… कोई टैंशन है क्या?’’

मोनू ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘नहीं… औफिस में एक जरूरी काम था, उसे पूरा नहीं किया और मैं भूल गया. सोच रहा हूं कि उसे पूरा कैसे करूं…’’

सायरा बोली, ‘‘ठीक है, अब तुम औफिस जाओ और अपना अधूरा काम पूरा करो.’’

थोड़ी देर में मोनू औफिस चला गया, पर आज उस का मन काम में

नहीं लग रहा था. वह तो अपनी साली रिहाना की याद में गुमसुम हो कर रह गया था.

जल्द ही वह समय भी आ गया, जब सायरा को डिलीवरी के लिए अस्पताल में भरती करना पड़ा. कुछ ही घंटों में सायरा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया, जिसे पा कर पूरा घर खुश हो गया.

2-3 दिन बाद सायरा और उस की बच्ची अस्पताल से घर वापस आ गईं. रिहाना अब अपनी बहन सायरा के साथ उस के कमरे में ही सोती थी, क्योंकि देर रात किसी चीज की जरूरत होती तो रिहाना ही उसे लाती थी.

रिहाना मौका देख कर अपने मोनू को छेड़ती रहती थी, ‘‘क्या बात है जीजू, रातभर सोए नहीं क्या, जो आंखें लाल हो रही हैं… लगता है कि दीदी के बिना नींद नहीं आई. और आएगी भी कैसे, उन से लिपट कर सोने की जो आदत पड़ी है,’’ कह कर उस ने अंगड़ाई लेते हुए आगे कहा, ‘‘मु?ा से आप का यह दुख देखा नहीं जा रहा है. दिल करता है कि दीदी की कमी को मैं तुम्हारी बांहों में आ कर पूरी कर दूं, ताकि आप को चैन की नींद आ सके.’’

मोनू बोला, ‘‘अगर तुम्हें मेरा इतना ही खयाल है, तो रात को मेरे पास आती क्यों नहीं?’’

रिहाना ने रिझाते हुए कहा, ‘‘आ तो जाऊं, पर डर लगता है कि कहीं मेरे कुंआरे बदन की तपिश से आप जल न जाओ. मेरे बदन की एक झलक से तो आप अपनी सुधबुध ही खो बैठे थे.’’

मोनू ने ताना मारते हुए कहा, ‘‘तुम बस अपनी दीदी का ही खयाल रखोगी, कुछ खयाल अपने जीजू का भी रख लिया करो. क्यों इस बेचारे को तड़पा रही हो.’’

रिहाना ने कहा, ‘‘तरस तो बहुत आता है आप पर, मगर डर लगता है कि कहीं मुझ कुंआरी को भी मां न बना दो, तब मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रहूंगी.’’

मोनू ने रिहाना से कहा, ‘‘तुम मुझ पर भरोसा रखो. तुम बिनब्याही मां नहीं बनोगी, मैं इस बात का पूरा खयाल रखूंगा.’’

रिहाना चहक कर बोली, ‘‘तो ठीक है, आप इंतजाम करो. मैं मौका देख कर आज आप का अकेलापन दूर कर दूंगी,’’ कहते हुए वह दूसरे कमरे में चली गई.

रात को मोनू औफिस से आ कर सायरा के कमरे में गया. सायरा और बच्ची सो रही थी.

मोनू अपने कमरे में गया और कपड़े बदलने लगा, तभी रिहाना खाना ले कर उस के कमरे में पहुंच गई और जैसे ही उस की नजर बिना कमीज के मोनू पर पड़ी, तो वह शरमा कर वापस मुड़ी.

तभी मोनू ने उस का हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी बांहों में खींचता हुआ बोला, ‘‘हमें कब अपने हुस्न का जलवा दिखाओगी मेरी जान…’’

रिहाना ने मोनू की बांहों से आजाद होते हुए कहा, ‘‘सब्र करो. सब्र का फल मीठा होता है,’’ फिर वह कमरे से बाहर चली गई.

रात का 1 बजा था. सायरा और बच्ची दोनों गहरी नींद में सो रही थीं. रिहाना चुपके से उठी और मोनू के कमरे के पास जा कर? झाकने लगी.

मोनू की आंखों से भी नींद कोसों दूर थी. वह मोबाइल फोन पर ब्लू फिल्म देख रहा था. कान में ईयरफोन लगा था. रिहाना कब उस के कमरे में दाखिल हुई, उसे पता ही नहीं चला.

रिहाना ने भी चुपके से मोनू के मोबाइल पर अपनी नजरें जमा दीं. जैसे ही उस ने स्क्रीन पर सैक्सलीला देखी, उस की हवस भड़कने लगी और वह सिसकियां भरने लगी. करवट बदलते समय मोनू की नजर रिहाना पर पड़ी, तो वह हड़बड़ा कर बैठ गया.

रिहाना हवस भरी नजरों से मोनू को देखने लगी. मोनू ने फौरन रिहाना का हाथ पकड़ा और उसे अपने बिस्तर पर खींचते हुए अपनी बांहों में भर लिया.

रिहाना ने पूछा, ‘‘क्या देख रहे थे?’’

मोनू बोला, ‘‘कुछ नहीं… नींद नहीं आ रही थी, तो टाइमपास कर रहा था.’’

रिहाना ने हंसते हुए कहा, ‘‘बहुत अच्छा टाइमपास कर रहे थे.’’

मोनू ने बिना कुछ जवाब दिए रिहाना के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. रिहाना सिहर उठी. मोनू ने उस के होंठों को आजाद करते हुए उस की गरदन पर चुम्मों की बौछार कर दी.

रिहाना बोली, ‘‘क्या इरादा है जनाब का…’’

मोनू ने कहा, ‘‘आज इरादा मत पूछो. मुझे वह सब करने दो, जिस के लिए मैं बेकरार हूं.’’

रिहाना ने कहा, ‘‘मुझे डर लगता है कि कहीं मैं पेट से हो गई तो…?’’

‘‘मैं ने उस का इंतजाम कर लिया है,’’ मोनू ने उसे कंडोम का पैकेट दिखाते हुए कहा.

रिहाना शरमा गई और मोनू के गले लग गई. मोनू भी मचल उठा और वह रिहाना के एकएक कर के सारे कपड़े उतारने लगा.

रिहाना का गोरा और गदराया बदन देख कर मोनू मचल उठा और उस के बदन के हर हिस्से को चूमने और चाटने लगा. मोनू की इस हरकत ने रिहाना को इस कदर तड़पा दिया कि वह अपने होश ही खो बैठी और मोनू को अपने ऊपर खींचने लगी.

मोनू पूरी तरह जोश में भरा हुआ था. उस ने उसे अपनी बांहों में कस कर पकड़ा. रिहाना शुरू में तो तड़प उठी, पर जल्द ही उसे भी मजा आने लगा.

थोड़ी देर में वे दोनों बिस्तर पर निढाल पड़े थे. रिहाना ने एक अलग ही मजा महसूस किया. उस ने मोनू के गाल को चूमते हुए कहा, ‘‘मजा आ गया. आप ने जो सुख मुझे दिया है, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती. मैं आप से बहुत प्यार करती हूं, कभी मुझे अपने से दूर मत करना.’’

मोनू बोला, ‘‘मैं भी तुम से बहुत प्यार करता हूं. मुझे छोड़ कर कभी मत जाना.’’

इस के बाद रिहाना चुपचाप अपने कमरे में चली गई और अपनी बहन सायरा के पास जा कर लेट गई, जो अभी तक गहरी नींद में सोई हुई थी.

इस तरह मोनू अपनी घरवाली और साली दोनों के मजे लूट रहा था. सायरा इन सब बातों से अनजान थी. पर यह राज कब तक छिपता.

हर रात की तरह आज भी रिहाना चुपके से मोनू के कमरे में आई. उन

दोनों ने अपनेअपने कपड़े उतारे और कामलीला में मगन हो गए.

तभी सायरा की आंख खुल गई. उसे प्यास लगी थी. रिहाना का कुछ अतापता न था, इसलिए वह खुद उठ कर पानी लेने रसोईघर में चली गई.

रसोईघर से लग कर ही मोनू का वह कमरा था, जहां आजकल वह सो रहा था. सायरा जब दरवाजे के पास से गुजरी तो उस ने कमरे के भीतर से एक अजीब सी आवाज आती हुई सुनी. उस के पैर वहीं थम गए और वह कान लगा कर गौर से सुनने लगी.

रिहाना की सिसकियां सुन कर सायरा दंग रह गई. जैसे ही उस ने दरवाजे पर हाथ लगा कर धकेला, वह खुल गया. अंदर का नजारा देख कर सायरा दंग रह गई. मोनू और रिहाना सैक्स करने में इस तरह मदहोश थे कि उन्हें सायरा के आने का पता ही न चला.

सायरा चीखी, ‘‘तुम दोनों को शर्म नहीं आती.’’

मोनू और रिहाना सायरा की आवाज सुन कर एकदूसरे से अलग होते हुए अपनेअपने कपड़े उठाने लगे.

सायरा मोनू से बोली, ‘‘मुझे धोखा दे कर अपनी साली से नाजायज रिश्ता कायम करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई.

‘‘और रिहाना, तुम तो मेरी बहन थी. अपनी ही बहन के सुहाग के साथ यह सब करने से पहले तुम्हें एक बार भी अपनी बहन का खयाल नहीं आया.

मैं अभी अब्बा को तुम दोनों की यह घिनौनी हरकत बताती हूं.’’

मोनू के पास अपनी सफाई के कोई शब्द नहीं थे. वह चोर की तरह चुप खड़ा रहा.

रिहाना ने कहा, ‘‘मैं इन से प्यार करती हूं और ये भी मुझ से प्यार करते हैं.’’

तभी मोनू भी तपाक से बोला, ‘‘मैं रिहाना से प्यार करता हूं और उस के बिना नहीं रह सकता.’’

सायरा चिल्लाई, ‘‘और मेरा और मेरी बच्ची का क्या?’’

मोनू ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें भी अपने साथ रखूंगा. तुम्हारा पूरा खर्च उठाऊंगा और तुम्हें भी बराबर प्यार दूंगा.’’

सायरा गुस्से से लालपीली होती हुई बोली, ‘‘रखो अपना खर्चा अपने पास. और रही प्यार की बात, अगर तुम मुझ से प्यार करते तो मुझे धोखा दे कर मेरी ही बहन के साथ मुंह काला नहीं करते. प्यार करने वाले अपने प्यार को धोखा नहीं देते. मुझे तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं रहना.’’

कुछ देर के बाद सायरा के अब्बू और भाई आ गए और मोनू को बुराभला कहते हुए सायरा और रिहाना को वहां से ले गए.

कुछ दिन बाद सायरा ने मोनू पर केस कर दिया और वह मुकदमे में उलझ कर रह गया.

इस दोहरे प्यार ने मोनू से उस का सबकुछ छीन लिया. उस की इस हरकत से उस की बीवी सायरा, साली रिहाना और वह मासूम बच्ची, जो अभी पैदा ही हुई थी, सब की जिंदगी बरबाद हो कर रह गई.

नई चादर: विधवा शरबती की मुसीबत

बस, इतनी सी थी उस की खूबसूरती की जमापूंजी, मगर करमू जैसे मरियल से अधेड़ के सामने तो वह सचमुच अप्सरा ही दिखती थी. आगे चल कर सब ने शरबती की सीरत भी देखी और उस की सीरत सूरत से भी चार कदम आगे निकली. अपनी मेहनतमजदूरी से उस ने गृहस्थी ऐसी चमकाई कि इलाके के लोग अपनीअपनी बीवियों के सामने उस की मिसाल पेश करने लगे.

करमू की बिरादरी के कई नौजवान इस कोशिश में थे कि करमू जैसे लंगूर के पहलू से निकल कर शरबती उन के पहलू में आ जाए. दूसरी बिरादरियों में भी ऐसे दीवानों की कमी न थी. वे शरबती से शादी तो नहीं कर सकते थे, अलबत्ता उसे रखैल बनाने के लिए हजारों रुपए लुटाने को तैयार थे.

धीरेधीरे समय गुजरता रहा और शरबती एक बच्चे की मां बन गई. लेकिन उस की देह की बनावट और कसावट पर बच्चा जनने का रत्तीभर भी फर्क नहीं दिखा. गांव के मनचलों में अभी भी उसे हासिल करने की पहले जैसे ही चाहत थी. तभी जैसे बिल्ली के भाग्य से छींका टूट पड़ा. करमू एक दिन काम की तलाश में शहर गया और सड़क पार करते हुए एक बस की चपेट में आ गया. बस के भारीभरकम पहियों ने उस की कमजोर काया को चपाती की तरह बेल कर रख दिया था.

करमू के क्रियाकर्म के दौरान गांव के सारे मनचलों में शरबती की हमदर्दी हासिल करने की होड़ लगी रही. वह चाहती तो पति की तेरहवीं को यादगार बना सकती थी. गांव के सभी साहूकारों ने शरबती की जवानी की जमानत पर थैलियों के मुंह खोल रखे थे, मगर उस ने वफादारी कायम रखना ही पति के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि समझते हुए सबकुछ बहुत किफायत से निबटा दिया.

शरबती की पहाड़ सी विधवा जिंदगी को देखते हुए गांव के बुजुर्गों ने किसी का हाथ थाम लेने की सलाह दी, मगर उस ने किसी की भी बात पर कान न देते हुए कहा, ‘‘मेरा मर्द चला गया तो क्या, वह बेटे का सहारा तो दे ही गया है. बेटे को पालनेपोसने के बहाने ही जिंदगी कट जाएगी.’’

वक्त का परिंदा फिर अपनी रफ्तार से उड़ चला. शरबती का बेटा गबरू अब गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाने लगा था और शरबती मनचलों से खुद को बचाते हुए उस के बेहतर भविष्य के लिए मेहनतमजदूरी करने में जुटी थी. उन्हीं दिनों उस इलाके में परिवार नियोजन के लिए नसबंदी कैंप लगा. टारगेट पूरा न हो सकने के चलते जिला प्रशासन ने आपरेशन कराने वाले को एक एकड़ खेतीबारी लायक जमीन देने की पेशकश की.

एक एकड़ जमीन मिलने की बात शरबती के कानों में भी पड़ी. उसे गबरू का भविष्य संवारने का यह अच्छा मौका दिखा. ज्यादा पूछताछ करती तो किस से करती. जिस से भी जरा सा बोल देती वही गले पड़ने लगता. जो बोलते देखता वह बदनाम करने की धमकी देता, इसलिए निश्चित दिन वह कैंप में ही जा पहुंची. शरबती का भोलापन देख कर कैंप के अफसर हंसे.

कैंप इंचार्ज ने कहा, ‘‘एक विधवा से देश की आबादी बढ़ने का खतरा कैसे हो सकता है…’’

कैंप इंचार्ज का टका सा जवाब सुन कर गबरू के भविष्य को ले कर देखे गए शरबती के सारे सपने बिखर गए. बाहर जाने के लिए उस के पैर नहीं उठे तो वह सिर पकड़ कर वहीं बैठ गई.

तभी एक अधेड़ कैंप इंचार्ज के पास आ कर बोला, ‘‘सर, आप के लोग मेरा आपरेशन नहीं कर रहे हैं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘कहते हैं कि मैं अपात्र हूं.’’

‘‘क्या नाम है तुम्हारा? किस गांव में रहते हो?’’

‘‘सर, मेरा नाम केदार है. मैं टमका खेड़ा गांव में रहता हूं.’’

‘‘कैंप इंचार्ज ने टैलीफोन पर एक नंबर मिलाया और उस अधेड़ के बारे में पूछताछ करने लगा, फिर उस ने केदार से पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि तुम्हारी बीवी पिछले महीने मर चुकी है?’’

‘‘हां, सर.’’

‘‘फिर तुम्हें आपरेशन की क्या जरूरत है. बेवकूफ समझते हो हम को. चलो भागो.’’

केदार सिर झुका कर वहां से चल पड़ा. शरबती भी उस के पीछेपीछे बाहर निकल आई. उस के करीब जा कर शरबती ने धीरे से पूछा, ‘‘कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

‘‘एक लड़का है. सोचा था, एक एकड़ खेत मिल गया तो उस की जिंदगी ठीकठाक गुजर जाएगी.’’

‘‘मेरा भी एक लड़का है. मुझे भी मना कर दिया गया… ऐसा करो, तुम एक नई चादर ले आओ.’’

केदार ने एक नजर उसे देखा, फिर वहीं ठहरने को कह कर वह कसबे के बाजार चला गया और वहां से एक नई चादर, थोड़ा सा सिंदूर, हरी चूडि़यां व बिछिया वगैरह ले आया.

थोड़ी देर बाद वे दोनों कैंप इंचार्ज के पास खड़े थे. केदार ने कहा, ‘‘हम लोग भी आपरेशन कराना चाहते हैं साहब.’’

अफसर ने दोनों पर एक गहरी नजर डालते हुए कहा, ‘‘मेरा खयाल है कि अभी कुछ घंटे पहले मैं ने तुम्हें कुछ समझाया था.’’

‘‘साहब, अब केदार ने मुझ पर नई चादर डाल दी है,’’ शरबती ने शरमाते हुए कहा.

‘‘नई चादर…?’’ कैंप इंचार्ज ने न समझने वाले अंदाज में पास में ही बैठी एक जनप्रतिनिधि दीपा की ओर देखा.

‘‘इस इलाके में किसी विधवा या छोड़ी गई औरत के साथ शादी करने के लिए उस पर नई चादर डाली जाती है. कहींकहीं इसे धरौना करना या घर बिठाना भी कहा जाता है,’’ उस जनप्रतिनिधि दीपा ने बताया.

‘‘ओह…’’ कैंप इंचार्ज ने घंटी बजा कर चपरासी को बुलाया और कहा, ‘‘इस आदमी को ले जाओ. अब यह अपात्र नहीं है. इस की नसबंदी करवा दें… हां, तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘शरबती.’’

‘‘तुम कल फिर यहां आना. कल दूरबीन विधि से तुम्हारा आपरेशन हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन साहब, मुझे भी एक एकड़ जमीन मिलेगी न?’’

‘‘हां… हां, जरूर मिलेगी. हम तुम्हारे लिए तीसरी चादर ओढ़ने की गुंजाइश कतई नहीं छोड़ेंगे.’’

शरबती नमस्ते कह कर खुश होते हुए कैंप से बाहर निकल गई तो उस जनप्रतिनिधि ने कहा, ‘‘साहब, आप ने एक मामूली औरत के लिए कायदा ही बदल दिया.’’

‘‘दीपाजी, यह सवाल तो कायदेकानून का नहीं, आबादी रोकने का है. ऐसी औरतें नई चादरें ओढ़ओढ़ कर हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर देंगी. मैं आज ही ऐसी औरतों को तलाशने का काम शुरू कराता हूं,’’ उन्होंने फौरन मातहतों को फोन पर निर्देश देने शुरू कर दिए. दूसरे दिन शरबती कैंप में पहुंची तो वहां मौजूद कई दूसरी औरतों के साथ उस का भी दूरबीन विधि से नसबंदी आपरेशन हो गया.

कैंप की एंबुलैंस पर सवार होते समय उसे केदार मिला और बोला, ‘‘शरबती, मेरे घर चलो. तुम्हें कुछ दिन देखभाल की जरूरत होगी.’’

‘‘मेरी देखभाल के लिए गबरू है न.’’

‘‘मेरा भी तो फर्ज बनता है. अब तो हम लिखित में मियांबीवी हैं.’’

‘‘लिखी हुई बातें तो दफ्तरों में पड़ी रहती हैं.’’

‘‘तुम्हारा अगर यही रवैया रहा तो तुम एक बीघा जमीन भी नहीं पाओगी.’’

‘‘नुकसान तुम्हारा भी बराबर होगा.’’

‘‘मैं तुम्हें ऐसे ही छोड़ने वाला नहीं.’’

‘‘छोड़ने की बात तो पकड़ लेने के बाद की जाती है.’’

शरबती का जवाब सुन कर केदार दांत पीस कर रह गया. कुछ साल बाद गबरू प्राइमरी जमात पास कर के कसबे में पढ़ने जाने लगा. एक दिन उस के साथ उस का सहपाठी परमू उस के घर आया.

परमू के मैलेकुचैले कपड़े और उलझे रूखे बाल देख कर शरबती ने पूछा, ‘‘तुम्हारी मां क्या करती रहती है परमू?’’

‘‘मेरी मां नहीं है,’’ परमू ने मायूसी से बताया.

‘‘तभी तो मैं कहूं… खैर, अब तो तुम खुद बड़े हो चुके हो… नहाना, कपड़े धोना कर सकते हो.’’

परमू टुकुरटुकुर शरबती की ओर देखता रहा. जवाब गबरू ने दिया, ‘‘मां, घर का सारा काम परमू को ही करना होता है. इस के बापू शराब भी पीते हैं.’’

‘‘अच्छा शराब भी पीते हैं. क्या नाम है तुम्हारे बापू का?’’

‘‘केदार.’’

‘‘कहां रहते हो तुम?’’

‘‘टमका खेड़ा.’’

शरबती के कलेजे पर घूंसा सा लगा. उस ने गबरू के साथ परमू को भी नहलाया, कपड़े धोए, प्यार से खाना खिलाया और घर जाते समय 2 लोगों का खाना बांधते हुए कहा, ‘‘परमू बेटा, आतेजाते रहा करो गबरू के साथ.’’

‘‘हां मां, मैं भी यही कहता हूं. मेरे पास बापू नहीं हैं, तो मैं जाता हूं कि नहीं इस के घर.’’

‘‘अच्छा, इस के बापू तुम्हें अच्छे लगते हैं?’’

‘‘जब शराब नहीं पीते तब… मुझे प्यार भी खूब करते हैं.’’

‘‘अगली बार उन से मेरा नाम ले कर शराब छोड़ने को कहना.’’ इसी के साथ ही परमू और गबरू के हाथों दोनों घरों के बीच पुल तैयार होने लगा. पहले खानेपीने की चीजें आईंगईं, फिर कपड़े और रोजमर्रा की दूसरी चीजें भी आनेजाने लगीं. फिर एक दिन केदार खुद शरबती के घर जा पहुंचा.

‘‘तुम… तुम यहां कैसे?’’ शरबती उसे अपने घर आया देख हक्कीबक्की रह गई.

‘‘मैं तुम्हें यह बताने आया हूं कि मैं ने तुम्हारा संदेश मिलने से अब तक शराब छुई भी नहीं है.’’

‘‘तो इस से तो परमू का भविष्य संवरेगा.’’

‘‘मैं अपना भविष्य संवारने आया हूं… मैं ने तुम्हें भुलाने के लिए ही शराब पीनी शुरू की थी. तुम्हें पाने के लिए ही शराब छोड़ी है शरबती,’’ कह कर केदार ने उस का हाथ पकड़ लिया.

‘‘अरे… अरे, क्या करते हो. बेटा गबरू आ जाएगा.’’

‘‘वह शाम से पहले नहीं आएगा. आज मैं तुम्हारा जवाब ले कर ही जाऊंगा शरबती.’’

‘‘बच्चे बड़े हो चुके हैं… समझाना मुश्किल हो जाएगा उन्हें.’’

‘‘बच्चे समझदार भी हैं. मैं उन्हें पूरी बात बता चुका हूं.’’

‘‘तुम बहुत चालाक हो. कमजोर रग पकड़ते हो.’’

‘‘मैं ने पहले ही कह दिया था कि मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं,’’ केदार ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा. शरबती की आंखें खुद ब खुद बंद हो गईं. उस दिन के बाद केदार अकसर परमू को लेने के बहाने शरबती के घर आ जाता. गबरू की जिद पर वह परमू के घर भी आनेजाने लगी. जब दोनों रात में भी एकदूसरे के घर में रुकने लगे तो दोनों गांवों के लोग जान गए कि केदार ने शरबती पर नई चादर डाल दी है.

परमू, गबरू और केदार बहुत खुश थे. खुश तो शरबती भी कम नहीं थी, मगर उसे कभीकभी बहुत अचंभा होता था कि वह अपने पहले पति को भूल कर केदार की पकड़ में आ कैसे गई?

एक दिन अपने लिए : आभा किसे पहचान नहीं पाई

‘कल संडे है. सोनू की भी छुट्टी है. अलार्म बंद कर के सोती हूं,’ सोचते हुए आभा मोबाइल की तरफ बढ़ी, मगर फिर एक बार व्हाट्सऐप चैक कर लें सोच उस ने हरे से सम्मोहक आइकोन पर क्लिक कर दिया. स्क्रोल करतेकरते एक अनजान नंबर से आए मैसेज पर अंगूठा रुक गया.

‘‘कैसी हो आभा?’’ पढ़ कर एकबार को तो आभा समझ नहीं पाई कि किस का मैसेज है, फिर डीपी पर टैब किया. तसवीर कुछ जानीपहचानी सी लगी.

‘‘अरे, यह तो अनुराग है,’’ आभा के दिमाग को पहचानने में ज्यादा मशकक्त नहीं करनी पड़ी.

‘‘फाइन,’’ लिख कर आभा ने 2 अंगूठे वाली इमोजी के साथ रिप्लाई सैंड कर दी.

‘‘क्या हुआ? किस का मैसेज था?’’ मां ने अचानक आ कर पूछा तो आभा को लगा मानो चोरी पकड़ी गई हो.

‘‘यों ही…कोई अननोन नंबर था,’’ कह कर आभा ने बात टाल दी.

‘‘अच्छा सुनो सोनू को सुबह 4 बजे जगा देना. उसे अपने फाइनल ऐग्जाम के प्रोजैक्ट पर काम करना है. और हां 1 कप चाय भी बना देना ताकि उस की नींद खुल जाए…’’ मां ने उसे आदेश सा दिया और फिर सोने चली गईं.

अलार्म बंद करने को बढ़ता आभा का हाथ रुक गया. उस ने मोबाइल को चार्जिंग में लगा दिया ताकि कहीं बैटरी लो होने के कारण वह स्विच औफ न हो जाए वरना नींद खुलेगी और फिर 4 बजे नहीं जगाया तो सोनू नाराज हो कर पूरा दिन मुंह फुलाए घूमता रहेगा. मां नाराज होंगी सो अलग. यह और बात है कि इस चक्कर में उसे रातभर नींद नहीं आई. वैसे नींद न आने का एक कारण अनुराग का मैसेज भी था.

आभा रातभर अनुराग के बारे में ही सोचती रही. अनुराग उस के कालेज का दोस्त था. एकदम पक्के वाला… शायद कुछ और समय दोनों ने साथ बिताया होता तो यह दोस्ती प्यार में बदल सकती थी, मगर कालेज के बाद अनुराग सरकारी नौकरी की तैयारी करने के लिए कोचिंग लेने दिल्ली चला गया. न इकरार का मौका मिला और न ही इजहार का… एक कसक थी जो मन में दबी की दबी ही रह गई.

इसी बीच आभा के पिता की एक ऐक्सीडैंट में मृत्यु हो गई और अपनी मां के साथसाथ छोटे भाई सोनू की जिम्मेदारी भी उस पर आ गई. पिता के जाने के बाद मां अकसर बीमार रहने लगी थीं. सोनू उन दिनों छठी कक्षा की परीक्षा देने वाला था.

आभा का अपने पिता की जगह उन के विभाग में नौकरी मिल गई. वह जिंदगी की गुत्थी सुलझाने के फेर में उलझती चली गई. 10 साल बाद आज अचानक अनुराग के मैसेज ने उस के दिल में खलबली सी मचा दी थी.

‘कल दिन में बात करूंगी,’ सोचते हुए आखिर उसे नींद आ ही गई.

घरबाहर संभालती आभा हर सुबह 5 बजे बिस्तर छोड़ देती और फिर यह उसे रात 11 बजे ही नसीब होता. औफिस जाने से पहले नाश्ते से ले कर लंच तक का काम उसे निबटाना होता.

9 बजे तक वह भी औफिस के लिए निकल लेती, क्योंकि 10 बजे बायोमैट्रिक प्रणाली से अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी होती है. उस के बाद कब शाम के 6 बज जाते हैं, पता ही नहीं चलता. घर लौटने पर 1 कप गरम चाय का प्याला जरूर उसे मां के हाथ का मिलता जिसे पी कर वह फिर से रिचार्ज हो कर अपने मोर्चे पर तैनात होने यानी रसोई में जाने के लिए कमर कस लेती.

जैसेतैसे रात के 11 बजे तक कंप्यूटर की तरह खुद को शटडाउन दे कर चार्जिंग में लगा देती है ताकि अगले दिन के लिए बैटरी पूरी तरह चार्ज रहे. यही है उस की दिनचर्या… कभीकभार मेहमानों के आ जाने या मां की बीमारी बढ़ जाने आदि पर यह और भी ज्यादा हैक्टिक हो जाती है. फिर तो बस शरीर मानो रोबोट ही बन जाता है. अंतिम बार खुद के लिए कब कुछ लमहे निकाले थे, याद ही नहीं पड़ता…

बस, इसी तरह मशीन सी चलती जिंदगी में अचानक अनुराग के मैसेज ने जैसे लूब्रिकैंट का काम किया.

सुबह के लगभग 11 बजे जब आभा औफिस के रूटीन काम से थोड़ा फ्री हुई तो उसे अनुराग का खयाल आया. मोबाइल में उस के रात वाले मैसेज को ढूंढ़ कर फोन नंबर एक कागज पर लिखा और डायल कर दिया. जैसे ही फोन के दूसरी तरफ घंटी बजी, उस के दिल की धड़कनें भी तेज हो गईं.

‘‘कैसी हो आभा?’’ स्नेह से भरी आवाज सुन कर आभा खिल उठी.

‘‘थोड़ी व्यस्त… थोड़ी मस्त…’’ अपना कालेज के जमाने वाला डायलौग मार कर वह खिलखिला पड़ी. अनुराग ने भी उस की हंसी में भरपूर साथ दिया. दोनों काफी देर तक इधरउधर की बातें करते रहे. आभा के पिता की मृत्यु की खबर सुन कर अनुराग उस के प्रति सहानुभूति से भर उठा. आभा ने भी उस के परिवार के बारे में जानकारी ली और फिर आगे भी संपर्क में रहने का वादा करने के साथ फोन रख दिया.

अनुराग से बात करने के बाद आभा को लगा कि जिस तरह मशीनों में तकनीकी खामियां आती हैं और उन्हें मरम्मत की जरूरत पड़ती है ठीक उसी तरह उस के मन को भी मैकेनिक की जरूरत थी. तभी तो आज पुराने दोस्त से बात कर के उस का मन भी कितना हलका हो गया. ठीक वैसे ही जैसे ओवरहालिंग के बाद मशीनें स्मूद हो जाती हैं

लगभग रोज आभा और अनुराग की फोन पर बात होने लगी. वक्त और संपर्क की खाद और पानी मिलने से यह रिश्ता भी पुष्पितपल्लवित होने लगा. कभीकभी आभा के मन में अनुराग को पाने की ख्वाहिश बलवती होने लगती, मगर उस की पत्नी का खयाल कर के वह अपने मन को समझा लेती थी.

‘‘सुनो, औफिशियल काम से तुम्हारे शहर में आया हूं… होटल राजहंस… शाम को मिल सकती हो?’’ अनुराग के अचानक आए इस प्रस्ताव से आभा चौंक गई.

‘‘हां, मगर… किसी ने देख लिया तो… बिना मतलब बवाल हो जाएगा… किसकिस को सफाई दूंगी… तुम तो जानते हो, यह शहर बहुत बड़ा नहीं है…’’ आभा ने कह तो दिया मगर उस के दिल और दिमाग में जंग जारी थी. मन ही मन वह भी अनुराग का साथ चाहती थी.

‘‘क्या तुम रह पाओगी बिना मिले जबकि तुम्हें पता है कि मैं तुम से कुछ ही मिनट्स की दूरी पर हूं,’’ अनुराग ने प्यार से कहा.

‘‘अच्छा ठीक है… मैं शाम को 5 बजे आती हूं?’’ आखिर आभा का दिल उस के दिमाग से जंग जीत ही गया.

इतने बरसों बाद प्रिय को सामने देख कर आभा भावुक हो गई और अनुराग की बांहों में समा गई. अनुराग ने भी उसे अपने घेरे में कस लिया और फिर उस के माथे पर एक चुंबन अंकित कर दिया.

दोनों लगभग घंटेभर तक साथ रहे. कौफी पी और बहुत सी बातें कीं. अनुराग की ट्रेन शाम 7 बजे की थी, इसलिए आभा ने उस से फिर मिलने का वादा करते हुए विदा ली.

इसी तरह 6 महीने बीत गए. फोन पर बात और वीडियो चैट करतेकरते दोनों काफी नजदीक आ गए थे. कभीकभी दोनों बहुत ही अंतरंग बातें भी कर लेते थे, जिन्हें सुन कर आभा के शरीर में झनझनाहट सी होने लगती थी.

एक रोज जब अनुराग की पत्नी अपने मायके गई हुई थी तब वह आभा के साथ देर रात वीडियो पर चैट कर रहा था.

‘‘अनुराग, अपनी शर्ट उतार दो,’’ अचानक आभा ने कहा.

अनुराग ने एक पल सोचा और फिर शर्ट उतार दी. उस के बाद पाजामा भी.

‘‘अब तुम्हारी बारी है…’’ अनुराग ने कहा तो आभा का चेहरा शर्म से लाल हो गया. उस ने तुरंत चैट बंद कर दी मगर अब आभा का युवा मन अनुराग की कामना और भी तीव्रता से करने लगा. सोनू और मां की जिम्मेदारियों के कारण वह अपनी शादी के बारे में सोच नहीं पा रही थी. मगर उस की अपनी भी कुछ कामनाएं थीं जो रहरह कर सिर उठाती थीं.

‘काश, उसे सिर्फ एक दिन भी अनुराग के साथ बिताने को मिल जाए. इस एक दिन में वह अपनी पूरी जिंदगी जी लेगी. अनुराग का प्रेम अपने मनमस्तिष्क में समेट लेगी,’ आभा कल्पना करने लगी. वह ऐसी संभावनाएं तलाशने लगी कि उसे यह मौका हासिल हो सके. वह नहीं जानती थी कि कल क्या होगा, मगर एक रात वह अपनी मरजी से जीना चाहती थी.

उस ने एक दिन डरतेडरते अपनी यह कल्पना अनुराग के साथ साझा की तो वह भी राजी हो गया. तय हुआ कि दोनों दूर के किसी तीसरे शहर में मिलेंगे.

अनुराग के लिए तो यह ज्यादा मुश्किल नहीं था, लेकिन आभा का बिना कारण बाहर जाना संभव नहीं था. मगर तकदीर भी शायद आभा पर मेहरबान होना चाह रही थी. अत: उसे एक दिन उस के लिए देना चाह रही थी ताकि वह अपनी कल्पनाओं में रंग भर सके.

आभा के औफिस में वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ. आभा ने शतरंज में भाग लिया. अधिक महिला प्रतिभागी न होने के कारण उस का चयन राज्य स्तर पर विभागीय प्रतिभागी के रूप में हो गया. इस प्रतियोगिता का फाइनल राउंड जयपुर में होना था, जिस में भाग लेने के लिए आभा को 2 दिनों के लिए जयपुर जाना था.

आभा ने टूरनामैंट की डेट फिक्स होते ही अनुराग को बता दिया. हालांकि आभा सहित सभी प्रतिभागियों के ठहरने की व्यवस्था विभाग के गैस्ट हाउस में की गई थी, मगर आभा ने अपनी सहेली के घर रुकने की खास परमिशन अपने लीडर से ले ली.

आभा अपने साथियों के साथ बस से सुबह 6 बजे जयपुर पहुंच गई. अनुराग की ट्रेन 10 बजे आने वाली थी. आभा ठीक 10 बजे रेलवे स्टेशन पहुंच गई. फिर अनुराग के साथ एक होटल में पतिपत्नी के रूप में चैकइन किया. थोड़ी देर बातें करने के बाद आभा ने उस से विदा ली, क्योंकि दोपहर बाद उस का मैच था. हालांकि दोनों ही अब दूरी बरदाश्त नहीं कर पा रहे थे, मगर जिस बहाने ने उन्हें मिलाया था उसे निभाना भी तो जरूरी था वरना पूरी टीम को उस पर शक हो जाता.

आभा ने बेमन से अपना मैच खेला और पहले ही राउंड में बाहर हो गई. उस ने टीम लीडर से तबीयत खराब होने का बहाना बनाया और 2 ही घंटों में वापस होटल आ गई. अनुराग ने उसे देखते ही बांहों में भर लिया और उस के चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. आभा ने उसे कंट्रोल किया. वह इन लमहों को चाय की चुसकियों की तरह घूंटघूंट पी कर जीना चाहती थी. आभा की जिद पर दोनों मौल में घूमने चले गए. रात 9 बजे डिनर करने के बाद जब वे रूम में आए तो अनुराग ने उस की एक न सुनी और सीधे बिस्तर पर खींच लिया और उस पर बरस पड़ा. आभा प्यार की इस पहली बरसात में पूरी तरह भीग गई.

उस के बाद रातभर दोनों जागते रहे और रिमझिम फुहारों का आनंद लेते रहे. सुबह दोनों ने एकसाथ शावर लिया और नहातेनहाते एक बार फिर प्यार के दरिया में तैरने लगे. आभा पूरी तरह तृप्त हो चुकी थी. आज उसे लगा मानो उस की हर इच्छा पूरी हो गई. अब उसे अधिक की चाह नहीं थी.

इसी बीच आभा के टीम लीडर का फोन आ गया. उन्हें 10 बजे रवाना होना था. आभा ने अनुराग के होंठों को एक बार भरपूर चूसा और दोनों होटल से बाहर आ गए. अनुराग ने उस के लिए कैब बुला ली थी.

‘‘कैसा रहा तुम्हारा यह अनुभव?’’ अनुराग ने शरारत से पूछा.

‘‘मैं ने आज जाना है कि कभीकभी फूलों को तोड़ कर खुशबू हवा में बिखेर देनी चाहिए… कभीकभी किनारों को तोड़ कर बहने में कोई बुराई… खुद के लिए चाहने में कुछ भी अपराध नहीं…बेशक समाज इसे नैतिकता के तराजू में तोलता है, मगर मैं ने अपने मन की सुनी और मुझे उसी का पलड़ा भारी लगा,’’ आभा ने अनुराग का हाथ थाम कर दार्शनिक की तरह कहा.

अनुराग उस की बात को कितना समझा, कितना नहीं यह मालूम नहीं, मगर आभा आज एक दिन अपने लिए जी कर बेहद खुश थी. अब वह एकबार फिर से तैयार थी. बाकी सब के लिए जीने की खातिर.

सबक: संध्या का कौनसा राज छिपाए बैठा था उसका देवर

संध्या की आंखों में नींद नहीं थी. बिस्तर पर लेटे हुए छत को एकटक निहारे जा रही थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, जिस से वह आकाश के चंगुल से निकल सके. वह बुरी तरह से उस के चंगुल में फंसी हुई थी. लाचार, बेबस कुछ भी नहीं कर पा रही थी. गलती उस की ही थी जो आकाश को उसे ब्लैकमेल करने का मौका मिल गया. वह जब चाहता उसे एकांत में बुलाता और जाने क्याक्या करने की मांग करता. संध्या का जीना दूभर हो गया था. आकाश कोई और नहीं उस का देवर ही था. सगा देवर. एक ही घर, एक ही छत के नीचे रहने वाला आकाश इतना शैतान निकलेगा, संध्या ने कल्पना भी नहीं की थी. वह लगातार उसे ब्लैकमेल किए जा रहा था और वह कुछ भी नहीं कर पा रही थी. बात ज्यादा पुरानी नहीं थी. 2 माह पहले ही संध्या अपने पति साहिल के साथ यूरोप ट्रिप पर गई थी. 50 महिलापुरुषों का गु्रप दिल्ली इंटरनैशनल एअरपोर्ट से रवाना हुआ.

15 दिनों की यात्रा से पूर्व सब का एकदूसरे से परिचय कराया गया. संध्या को उस गु्रप में नवविवाहित रितू कुछ अलग ही नजर आई. उसे लगा रितू के विचार काफी उस से मिलते हैं. बातबात पर खिलखिला कर हंसने वाली रितू से वह जल्द ही घुलमिल गई. रितू का पति प्रणव भी काफी विनोदी स्वभाव का था. हर बात को जोक्स से जोड़ कर सब को हंसाने की आदत थी उस की. एक तरह से रितू और प्रणव में सब को हंसाने की प्रतिस्पर्धा चलती थी. संध्या इस नवविवाहित जोड़े से खासी प्रभावित थी. संध्या और उस के पति साहिल के बीच वैसे तो सब कुछ सामान्य था, लेकिन जब भी वह रितू और प्रणव की जोड़ी को देखती आहें भर कर रह जाती. प्रणव के विपरीत साहिल गंभीर स्वभाव का इंसान था, जबकि संध्या साहिल से अलग खुले विचारों वाली थी. यूरोप यात्रा के दौरान ही संध्या, रितू और प्रणव इतना घुलमिल गए कि विभिन्न पर्यटन स्थलों में घूम आने के बाद भी होटल के रूम में खूब बातें करते, हंसीमजाक होता. साहिल संध्या का हाथ पकड़ खींच कर ले जाता. वह कहता कि चलो संध्या, बहुत देर हो गई. इन्हें भी आराम करने दो. हम भी सो लेते हैं. गु्रप लीडर ने सुबह जल्दी उठने को बोला है.

मगर संध्या को कहां चैन मिलता. वह अपने रूम में आ कर भी मोबाइल पर शुरू हो जाती. वहाट्सऐप पर शुरू हो जाता रितू से जोक्स, कौमैंट्स भेजने का सिलसिला. रितू ने संध्या के फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज डाली. संध्या ने तुरंत स्वीकार कर ली. दिन में जो फोटोग्राफी वे लोग करते उसे वे व्हाट्सऐप पर एकदूसरे को भेजते. फोटो पर कौमैंट्स भी चलते. रात को रितू और संध्या के बीच व्हाट्सऐप पर घंटों बातें चलतीं. जोक्स से शुरू हो कर, समाजपरिवार की बातें होतीं. धीरेधीरे यह सिलसिला व्यक्तिगत स्तर पर आ गया. एकदूसरे की पसंद, रुचि से ले कर स्कूलकालेज की पढ़ाई, बचपन में बीते दिनों की बातें साझा करने लगीं.

एक रात रितू ने व्हाट्सऐप पर संध्या के सामने दिल खोल कर रख दिया. शादी से पहले के प्यार और शादी तक सब कुछ बता दिया. शादी से पहले रितू की लाइफ में प्रणव था. दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों का परिवार अलगअलग धर्म और जाति का था. उन के प्यार में कुछ अड़चनें आईं. शादी को ले कर दोनों परिवारों में तकरार हुई पर आखिर रितू और प्रणव ने सूझबूझ दिखाते हुए अपनेअपने परिवार को मना लिया. रितू और प्रणव की शादी हो गई.व्हाट्सऐप पर रितू की लव स्टोरी पढ़ कर संध्या के मन में हलचल पैदा हो गई. उसे अपना अतीत याद हो आया. उस रात उस का मन किया वह भी रितू को वह सब कुछ बता दे जो उस का अतीत है, लेकिन वह हिम्मत नहीं कर पाई कि पता नहीं रितू क्या सोचेगी. वह उस के बारे में न जाने क्या धारणा बना ले. अजीब सी हलचल मन में लिए संध्या सो गई.

अगली रात संध्या अपनेआप को रोक नहीं पाई. रोज की तरह व्हाट्सऐप पर बातों का सिलसिला चल ही रहा था कि मौका देख कर संध्या ने लिख डाला कि मेरा भी एक अतीत है रितू. मैं भी किसी से प्यार करती थी. पर वह प्यार मुझे नहीं मिल सका.

रितू ने आश्चर्य वाला स्माइली भेजा और लिखा कि बताओ कौन था वह? क्या लव स्टोरी है तुम्हारी?

फिर संध्या ने रितू को अपनी लव स्टोरी बताने का सिलसिला शुरू कर दिया. वह मेरे कालेज में ही था. उस का नाम संजय था. हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते थे. हर 1-2 घंटे में मोबाइल पर हमारी बातें नहीं होतीं, तो लगता बहुत कुछ अधूरा है लाइफ में. दोनों में खूब बातें होतीं और तकरार भी. दुनिया से बेखबर हम अपने प्यार की दुनिया में खोए रहते. हमारा प्यार सारी हदें पार कर गया. विश्वास था कि घर वाले हमारी शादी को राजी हो जाएंगे. इसी विश्वास को ले कर मैं ने खुद को संजय को सौंप दिया. संध्या ने रितू को व्हाट्सऐप पर आगे लिखा, उस दिन पापा ने मुझ से कहा कि बेटी, तुम्हारी पढ़ाई पूरी हो चुकी है. हम चाहते हैं कि अब अच्छा सा लड़का देख कर तुम्हारी शादी कर दें. मैं एकाएक पापा से कुछ नहीं बोल पाई. बस, इतना ही कहा कि पापा मुझे नहीं करनी शादी. अभी मेरी उम्र ही क्या हुई है.

इस पर पापा ने कहा कि उम्र और क्या होगी? 25 साल की तो हो चुकी हो. जब मैं ने कहा कि नहीं पापा, मुझे नहीं करनी शादी तो वे हंस पड़े. बोले सच में अभी बच्ची हो. मैं ने पापा की बात को गंभीरता से नहीं लिया, पर वे मेरी शादी को ले कर गंभीर थे. एक दिन पापा ने मुझे बताया कि एक अच्छे परिवार का लड़का है तेरे लायक. किसी बड़ी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर है. 25 लाख का पैकेज है. वे अगले हफ्ते तुझे देखने आ रहे हैं. पापा की बात सुन कर मैं अवाक रह गई. मुझ से रहा नहीं गया. मैं ने हिम्मत जुटा कर पापा से कहा कि पापा, मैं एक लड़के से प्यार करती हूं. आप उन से बात कर लीजिए. पापा मेरी तरफ देखते रह गए. उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उन की नजर में मैं सीधीसादी नजर आने वाली लड़की किस हद तक आगे बढ़ चुकी हूं.

पापा ने पूछा कि कौन है वह लड़का? मैं ने संजय का नाम, पता बताया तो पापा का गुस्सा बढ़ गया कि कभी उस परिवार में अपनी बेटी का रिश्ता नहीं करूंगा. मैं अंदर तक हिल गई. मुझे लगा मेरे सपने रेत से बने महल की तरह धराशायी हो जाएंगे. मैं ने तो संजय को सब कुछ सौंप दिया था. धरती हिलती हुई नजर आई उस दिन मुझे.

पापा और सब घर वालों ने 2-4 दिन में ऐसा माहौल बनाया कि मेरी और संजय की शादी नहीं हो पाई. अगले हफ्ते ही साहिल और उस के घर वाले मुझे देखने आ गए. मुझे पसंद कर लिया गया. रिश्ता पक्का हो गया. पापा ने सख्त हिदायत दी कि संजय का जिक्र भूल कर भी कभी न करूं. इस तरह मेरी शादी साहिल से हो गई. मैं अतीत भूल कर अपना घर बसाने में लग गई. शादी को 2 साल हो चुके हैं. संध्या ने रितू से व्हाट्सऐप पर अपने अतीत की बातें शेयर की और संजय का वह फोटो भेजा जो उस ने संजय के फेसबुक अकाउंट से डाउनलोड किया था.

‘‘अरे वाह, मैडम तुम ने तो बखूबी हैंडल कर लिया लाइफ को,’’ रितू ने संध्या की कहानी सुन कर लिखा.

इसी तरह हंसीमजाक और व्यक्तिगत बातें शेयर करते हुए यूरोप का ट्रिप पूरा हो गया. जब वे वापस घर पहुंचे तो संध्या और साहिल थक कर चूर हो चुके थे. तब रात के 2 बज रहे थे. सुबह देर तक सोते रहे. सास ने दरवाजा खटखटाया कि संध्या, साहिल उठ जाओ… सुबह के 11 बज चुके हैं. नहा कर नाश्ता कर लो. संध्या हड़बड़ा कर उठी. फटाफट फ्रैश हो कर तैयार हुई और किचन में आ गई. नाश्ता तैयार कर डाइनिंग टेबल पर लगाया तब तक साहिल भी तैयार हो चुका था. दोनों ने नाश्ता किया. तभी संध्या को खयाल आया कि मोबाइल कहां है. उस ने इधरउधर देखा पर नहीं मिला. आखिर कहां गया मोबाइल? उसे ध्यान आ रहा था कि रात को जब आई थी तो डाइनिंग टेबल पर रखा था.

‘‘संध्या मैं औफिस जा रहा हूं. आज बौस आ रहे हैं. 3 बजे उन के साथ मीटिंग है,’’ साहिल ने घर से निकलते हुए कहा.

‘‘ठीक है.’’

साहिल के जाने के बाद संध्या मोबाइल ढूंढ़ने में जुट गई. हर जगह देखा. वह अपने देवर आकाश के कमरे में जा पहुंची कि कहीं उस ने देखा हो. वह उस के कमरे में पहुंची तो मोबाइल आकाश के हाथों में देखा. वह मोबाइल स्क्रीन पर व्हाट्सऐप पर मैसेज पढ़ रहा था. वह मैसेज जो संध्या ने रितू को लिखे थे. वह सब कुछ पढ़ चुका था और मोबाइल को साइड में रखने ही जा रहा था.

‘‘आकाश, क्या कर रहे हो? मेरा मोबाइल तुम्हारे पास कहां से आया? क्या देख रहे थे इस में?’’ संध्या ने पूछा तो हमउम्र देवर आकाश के होंठों पर कुटिल मुसकान दौड़ गई.

‘‘कुछ नहीं भाभी, बस आप की लव स्टोरी पढ़ रहा था. आप के लवर का फोटो भी देखा. बहुत स्मार्ट है वह. क्या नाम था उस का संजय?’’ आकाश ने कहा तो संध्या की आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

‘‘कुछ नहीं है… आकाश वे सब मजाक की बातें थीं,’’ संध्या ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘अगर भैया को ये सब मजाक की बातें बता दूं तो…?’’ आकाश ने तिरछी नजरें करते हुए कहा. उस की आंखों में शरारत साफ नजर आ रही थी.

संध्या को आकाश के इरादे नेक नहीं लगे. उसे अफसोस था कि उस ने किसी अनजानी दोस्त के सामने क्यों अपने अतीत की बातें व्हाट्सऐप पर लिखी. लिख भी दी थीं तो डिलीट क्यों नहीं कीं.

‘‘तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे आकाश. यह मजाक अच्छा नहीं है तुम्हारे लिए,’’ संध्या ने सख्त लहजे में कहा.

यह सुन कर आकाश अपनी औकात पर उतर आया, ‘‘भाभी जान, क्यों घबराती हो, ऐसा कुछ नहीं करूंगा. आप बस देवर को खुश कर दिया करो.’’

संध्या गुस्सा पीते हुए बोली, ‘‘मुझे क्या करना होगा? तुम क्या चाहते हो?’’

‘‘भाभी, इतना बताना पड़ेगा क्या आप को? आप शादीशुदा हैं. शादी से पहले भी आप काफी ज्ञान रखती थीं,’’ आकाश ने बेशर्मी से कहा.

संध्या को लगा वह बहुत बड़े जाल में फंसने जा रही है. अब करे भी तो क्या करे?

‘‘क्या सोच रही हो संध्या? आकाश अचानक भाभी से संध्या के संबोधन पर उतर आया.

‘‘मुझे सोचने का वक्त दो आकाश,’’ संध्या ने कहा.

‘‘ओके, नो प्रौब्लम. जैसा तुम्हें ठीक लगे. पर याद रखना मेरे पास बहुत कुछ है. भैया को पता चल गया तो धक्के मार कर घर से निकाल देंगे तुम्हें.’’

‘‘पता है, तुम किस हद तक नीचता कर सकते हो,’’ संध्या ने रूखे स्वर में कहा.

संध्या अब क्या करे? कैसे पीछा छुड़ाए आकाश से? वह देवरभाभी के रिश्ते को कलंकित करने पर उतारू था. वह जब भी मौका मिलता संध्या का रास्ता रोक कर खड़ा हो जाता कि क्या सोचा तुम ने?

आकाश मोबाइल पर संध्या को कौल करता, ‘‘इतने दिन हो गए, अभी तक सोचा नहीं क्या? क्यों तड़पा रही हो?’’

संध्या पर आकाश लगातार दबाव बढ़ा रहा था. उस का जीना दूभर हो गया. इसी उधेड़बुन में वह करवटें बदल रही थी. उस की नींद उड़ चुकी थी. वह सुबह तक किसी निर्णय पर पहुंचना चाहती थी. उस के सामने दुविधा यह थी कि वह खुद को बचाए या आकाश की वजह से परिवार में होने वाले विस्फोट से बचे. वह चाहती थी किसी तरह आकाश को समझा सके, ताकि यह बात अन्य सदस्यों तक नहीं पहुंचे, लेकिन करे तो क्या करें. अचानक उस के दिमाग में एक विचार कौंधा. हां, यही ठीक रहेगा. उस ने मन ही मन सोचा और गहरी नींद में सो गई. अगले दिन संध्या ने घर का कामकाज निबटाया और अपनी सास से बोली, ‘‘मम्मीजी, मुझे मार्केट जाना है कुछ घर का सामान लाने. घंटे भर में वापस जा जाऊंगी.’’

फिर संध्या जब घर लौटी तो उस के चेहरे पर चिंता की लकीरों के बजाय चमक थी. उस ने पढ़ा था कि राक्षस को मारने के लिए मायावी होना ही पड़ता है. वह आकाश को भी उसी के हथियार से मारेगी… उस का सामना करेगी. मार्केट से वह अपने मोबाइल में वायस रिकौर्डिंग सौफ्टवेयर डलवा आई. कुछ देर बाद ही आकाश ने घर से बाहर जा कर संध्या के मोबाइल पर कौल की. संध्या पूरी तरह तैयार थी.

‘‘हैलो संध्या क्या सोचा तुम ने?’’ आकाश ने पूछा.

‘‘मुझे क्या करना होगा?’’ संध्या ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं बस वही सब… तुम्हें बताना पड़ेगा क्या?’’

‘‘हां, बताना पड़ेगा. मुझे क्या पता तुम क्या चाहते हो?’’

‘‘तुम मेरे साथ…’’ और फिर सब कुछ बताता चला गया आकाश. कब, कहां, क्या करना होगा.

‘‘और अगर मैं मना कर दूं तो क्या करोगे?’’ संध्या ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं तुम्हारी लव स्टोरी सब को बता दूंगा.’’

संध्या गुस्से से चिल्ला पड़ी, ‘‘जाओ, सब को बताओ. परंतु एक बात याद रखना तुम जो मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो न मैं इस की शिकायत पुलिस में करूंगी. ऐसी हालत कर दूंगी कि कई जन्मों तक याद रखोगे.’’

‘‘कैसे करोगी?’’ क्या प्रूफ है तुम्हारे पास?’’ आकाश ने कहा.

‘‘घर आ कर देख लेना यों कायरों की तरह घर से बाहर जा कर क्या बात कर रहे हो,’’ संध्या का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था.

शाम को आकाश घर आया. संध्या ने मौका मिलते ही धीमे से कहा ‘‘पू्रफ दूं या वैसे ही मान जाओगे? तुम ने जो भी बातें की हैं वह सब मोबाइल में रिकौर्ड हैं और इस की सीडी अपने लौकर में रख ली है.’’

आकाश को विश्वास नहीं हो रहा था कि संध्या इस कदर पलटवार करेगी. वह चुपचाप अपने कमरे में खिसक गया. संध्या आज अपनी जीत पर प्रसन्न थी. व्हाट्सऐप के जरीए जो मुसीबत उस पर आई थी, वह उस से छुटकारा पा चुकी थी.

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