Romantic Hindi Story: इश्क की उड़ान

Romantic Hindi Story: कहते हैं कि जब कोई इश्क में होता है, तो उसे रंगीन ख्वाबों के नए पंख लग जाते हैं और वह अपनी ही बनाई दुनिया के आसमान में उड़ने लगता है. कल्पना और अजीत के इश्क की यह उड़ान उन्हें दिल्ली से भोपाल ले आई थी.

दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके में पड़ोसी रहे कल्पना और अजीत के लिए भोपाल जाने की यह राह कहने को आसान थी, पर वहां उन के प्यार का एक अलहदा ही इम्तिहान होना था.

हुआ यों कि भोपाल आने से पहले दिल्ली में एक रात अजीत ने कल्पना को मोबाइल फोन पर बताया, ‘‘कल्पू, अब हमें अपने प्लान को आखिरी अंजाम तक ले जाना होगा. मुझे लगता है कि हम दोनों के घर वालों को हमारे प्यार की भनक लग गई है और इस से पहले कि वे जातपांत का वही पुराना राग अलापें, हमें यहां से कहीं दूर चले जाना होगा.’’

‘पर हम जाएंगे कहां?’ कल्पना ने सीधा सवाल किया.

‘‘देखो, हम इश्क के मारों की तरह सीधा मुंबई तो भागेंगे नहीं,’’ अजीत ने कहा.

‘तो मेरा सपनों का राजकुमार मुझे किस शहर में ले जा कर अपने दिल और घर की रानी बनाएगा?’ कल्पना ने ठिठोली की.

‘‘कल्पू, मैं ने सोच लिया है कि हम दोनों भोपाल चलेंगे. वहां मेरा एक दोस्त संजीव रहता है. वह हम दोनों को कोई काम भी दिला देगा और हमारी कोर्ट मैरिज भी करा देगा,’’ अजीत ने कहा.

‘ठीक है, मैं सारी तैयारी कर के रखूंगी,’ कल्पना ने कहा.

24 साल का अजीत ग्रेजुएशन कर चुका था और पढ़ाई में भी बहुत अच्छा था. वह बहुत सुलझा हुआ नौजवान था. वह हद से ज्यादा मेहनती भी था. रंगरूप से भी वह ठीक था. बस, एक ही कमी थी कि वह दलित समाज से था और ब्राह्मणों की लड़की कल्पना को अपना दिल दे बैठा था.

दूसरी तरफ कल्पना 22 साल की बहुत खूबसूरत लड़की थी. वह अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी और उन की लाड़ली भी. पर वह अपने मांबाप को अजीत के बारे में बताने से डरती थी.

बहरहाल, एक दिन तय समय पर अजीत और कल्पना अपने घर में बिना बताए निकले और भोपाल की ट्रेन में बैठ कर दिल्ली के लिए जैसे हमेशा के लिए पराए हो गए.

भोपाल जंक्शन पर अजीत का दोस्त संजीव मिला और उन्हें अपने साथ घर ले गया. संजीव काफी साल से भोपाल में अकेला रह रहा था. उस का घर बड़ा तालाब के पास ही था.

जब अजीत और कल्पना ने पहली बार बड़ा तालाब देखा, तो कल्पना के मुंह से अचानक निकला, ‘‘संजीव, यह तालाब है या कोई समुद्र. मुझे तो लगा कि गांव का कोई तालाब होगा, थोड़ा सा बड़ा होगा, पर यह तो बहुत ज्यादा बड़ा है यार…’’

‘‘यह इनसानों द्वारा बनाई गई एक बहुत बड़ी झोल है और लगता है कि कोई समुद्री छोर है. ऐसा माना जाता है कि बड़ा तालाब को 11वीं शताब्दी में बनवाया गया था. तब इस इलाके में पीने की पानी की बड़ी समस्या थी.

‘‘भोपाल आज भी इसी तालाब का पानी पीता है. यही नहीं, बड़ा तालाब आज भोपाल के लोगों के लिए जीवनरेखा के साथसाथ मनोरंजन और रोजगार का जरीया भी बन गया है,’’ संजीव ने बताया.

‘‘मुझे तो भोपाल शहर बड़ा अच्छा लगा. रास्ते में जब हम आटोरिकशा में आ रहे थे तो ढलान और चढ़ाई वाली बलखाती सड़कें देख कर मैं तो रोमांचित हो गई,’’ कल्पना ने कहा.

‘‘यह शहर जितना खूबसूरत है, उस से भी ज्यादा खूबसूरत यहां के लोग हैं. और अब तो तुम भी यहां आ गई हो, तो हमारे शहर का रुतबा और ज्यादा बढ़ गया है,’’ संजीव कल्पना को देख कर बोला.

‘‘अगर तेरी फ्लर्टिंग खत्म हो गई हो तो हमें वह मकान भी दिखा दे, जहां हमारे रहने का इंतजाम किया गया है,’’ अजीत कल्पना को अपनी तरफ खींच कर बोला.

संजीव ने अपने ही इलाके में एक वन बीएचके फ्लैट दिखाया, जो पहली मंजिल पर बना था. ग्राउंड फ्लोर पर मकान मालिक अपने परिवार के साथ रहता था.

कल्पना और अजीत को वह मकान पसंद आया. उन्होंने अपना सामान वहां रखा. सब से अच्छी बात यह थी कि उस फ्लैट में मकान मालिक ने रोजमर्रा का जरूरी सामान रखा हुआ था, जिस का इस्तेमाल वे दोनों कर सकते थे.

ऊपर से तो कल्पना और अजीत बहुत खुश थे, पर मन ही मन वे डरे हुए थे. कल्पना जानती थी कि उस के पापा ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखवा दी होगी और आज नहीं तो कल उन्हें पता चल जाएगा कि अजीत भी अपने घर से गायब है.

हालांकि, उन दोनों ने अपने मोबाइल फोन में नए सिमकार्ड भी डलवा लिए थे, पर उन की हिम्मत नहीं हो पा रही थी अपनेअपने घर बात करने की.

संजीव अपने मकान पर जा चुका था. उस का अगला काम था कल्पना और अजीत को कहीं कोई काम दिलाना और फिर उन की कोर्ट मैरिज करवाने का इंतजाम करना.

‘‘कल्पू, हम ने सही फैसला लिया है न? अगर तुम चाहो तो हम वापस जा कर अपने बड़ों से माफी मांग सकते हैं,’’ अजीत ने रोटी का कौर कल्पना को खिलाते हुए कहा.

‘‘सही या गलत का तो पता नहीं, पर अब जब हम यहां आ ही गए हैं, तो खुद को तो यह चुनौती दे ही सकते हैं कि चाहे कैसे भी हालात हों, हमें हिम्मत नहीं हारनी है,’’ कल्पना बोली.

कल्पना और अजीत दोनों अच्छे खातेपीते घर के थे. उन के पास इतने पैसे तो थे कि 2 महीने आराम से भोपाल में गुजार दें, पर अगर उन्हें जिंदगीभर साथ रहना था, तो सिर्फ प्यार की किश्ती उन का बेड़ा पार नहीं कर सकती थी. उन्हें कड़ी मेहनत करनी थी और जो भी काम मिलता, उस में अपना सबकुछ झोंक
देना था.

अगले दिन संजीव अजीत को एक अखबार एजेंट करीम मियां के पास ले गया. करीम मियां इस धंधे के पुराने खिलाड़ी थे. उन्होंने अजीत से कहा, ‘‘देखो बरखुरदार, तुम अच्छेखासे पढ़ेलिखे हो, पर फिलहाल मैं तुम्हें सुबह घरघर अखबार डालने का काम दिलवा सकता हूं. सुबह 2 घंटे का काम है. 2,000 रुपए महीना मिल जाएंगे. उस के बाद तुम कोई दूसरा धंधा भी पकड़ सकते हो.’’

‘‘करीम मियां, काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता. मुझे अखबार बांटने में कोई परेशानी नहीं है. पर मेरे पास कोई साइकिल नहीं है और मैं भोपाल में नया हूं,’’ अजीत बोला.

‘‘मुझे पता है बेटा. संजीव ने मु?ो सब बता दिया है. साइकिल तो मैं तुम्हें दे दूंगा और जहां तक अखबार बांटने के इलाके का सवाल है, तो मेरा एक छोकरा तुम्हें वे सारे घर दिखा देगा, जहां तुम्हें अखबार डालना है,’’ करीम मियां ने कहा.

अजीत को साइकिल मिल गई और उसे अगली सुबह से अपनी नई नौकरी पर लग जाना था. कल्पना खुश हुई कि चलो एक को तो नौकरी मिली.

‘‘यार, मैं सोच रहा हूं कि सुबह अखबार बांटने के बाद किसी दुकान पर कोई छोटीमोटी नौकरी भी पकड़ लूंगा. इस से हम दोनों अंटी से और ज्यादा मजबूत हो जाएंगे,’’ अजीत बोला.

‘‘सुनो अजीत, मैं ने कल्पना के लिए एक जगह बात की है. वह इलैक्ट्रोनिक्स आइटम का बड़ा शोरूम है, जहां लड़कियां पैकिंग करती हैं. उस शोरूम का मालिक बड़ा ही शरीफ है.

‘‘सब से अच्छी बात तो यह है कि वह शोरूम मेरे औफिस के ही नजदीक है. मैं ही सुबह कल्पना को अपनी बाइक से ले जाऊंगा और फिर शाम को वापस ले आऊंगा. महीने के 10,000 रुपए मिलेंगे,’’ संजीव बोला.

‘‘यह तो बहुत अच्छी खबर है. मैं घर पर अकेले क्या करती… कुछ पैसा और जुड़ेगा तो हम जल्दी सैटल हो कर शादी भी कर लेंगे,’’ कल्पना ने खुश हो कर कहा.

अगले दिन अजीत सुबह 5 बजे अपनी साइकिल ले कर करीम मियां के पास निकल गया. इधर, 8 बजे के आसपास संजीव कल्पना को ले कर इलैक्ट्रोनिक्स सामान के शोरूम में ले गया.

कल्पना को उसी दिन से काम मिल गया. सुबह 9 बजे से शाम के 6 बजे तक ड्यूटी थी. शाम को 6 बजे संजीव उसे अपनी बाइक से घर वापस ले आया.

घर पर अजीत मौजूद था. वह बोला, ‘‘कल्पू, कैसा रहा आज का दिन?’’

‘‘एकदम बढि़या. पैकिंग करने में ज्यादा दिक्कत नहीं है. मैं सोच रही हूं कि अगर मालिक मुझे ओवरटाइम भी करने दे तो मैं पैकिंग के अलावा वहां के और भी तमाम काम सीखना चाहूंगी, जैसे सेल्स वाले क्या करते हैं, टैलीविजन वगैरह सामान बेचने की कला कैसे आती है,’’ कल्पना ने अपने मन की बात रखी.

‘‘मुझे भी एक दुकान के बाहर मोबाइल फोन के कवर बेचने वाले अंकल ने नौकरी पर रख लिया है. 8,000 रुपए महीना देंगे. सुबह 8 बजे तक अखबार का काम खत्म, उस के बाद मोबाइल कवर बेचने का धंधा.

‘‘मुझे मोबाइल फोन की सारी सैटिंग्स पता हैं, किसी को कोई दिक्कत आएगी, तो उस की समस्या भी सुलझा दूंगा,’’ अजीत बोला.

‘‘फिर तो मेरी पार्टी बनती है. अभी बड़ा तालाब के सामने बने रैस्टोरैंट में चलते हैं और चाइनीज खाते हैं,’’ संजीव बोला.

वे तीनों बाहर खाना खाने चले गए. जब कल्पना और अजीत वापस घर आए, तो कल्पना बोली, ‘‘यार, वैसे तो सब सही जा रहा है, पर अभी भी एक अनजाना डर मन में है कि अगर हमारे घर वालों को पता चल गया, तो क्या होगा…’’

‘‘तुम सही कह रही हो. सारा दिन मुझे बस यही खयाल रहता है कि अगर उन्होंने तुम्हें ढूंढ़ लिया और जबरदस्ती अपने साथ ले गए, तो मेरा क्या होगा…’’ अजीत बोला.

‘‘क्यों न हम यहां के थाने में शिकायत लिखवा दें कि हम दोनों बालिग हैं और अपनी मरजी से यहां रहते हैं. अगर हमें कुछ खतरा महसूस होता है, तो पुलिस को हमारी हिफाजत करनी होगी,’’ कल्पना ने सु?ाव दिया.

‘‘इस सब का एक ही हल है और वह है हमारी कोर्ट मैरिज. हम कल ही अर्जी दाखिल कर देते हैं और मंजूरी मिलते ही शादी कर लेंगे,’’ अजीत बोला.

हुआ भी यही. तकरीबन 2 महीने बाद अजीत और कल्पना ने शादी कर ली. संजीव ने सारा इंतजाम किया था. इसी तरह देखतेदेखते 6 महीने गुजर गए.

अजीत और कल्पना अपनी नौकरी में जैसे खो गए थे. वे दोनों बहुत मेहनती थे और रोजाना 15 घंटे अपने काम को देते थे.

घर वापस आते तो बहुत ज्यादा थके होते थे. खाना खाया और बिस्तर पकड़ लिया. इस से उन दोनों की शादीशुदा जिंदगी नीरस होने लगी थी.

शायद यही वजह थी कि कल्पना अब संजीव के करीब हो रही थी या संजीव को ऐसा महसूस हो रहा था. वह शुरू से ही कल्पना की खूबसूरती का कायल था और उसे घर से शोरूम और शोरूम से घर लाने ले जाने में और ज्यादा जुड़ने लगा था.

कभीकभार जब कल्पना बहुत ज्यादा थकी होती थी, तब वह बाइक पर संजीव के कंधे से लग कर ऊंघने लगती थी. ऐसा कई बार अजीत ने भी देखा था, पर उसे कल्पना पर यकीन था. पर उसे कोई रिस्क भी नहीं लेना था.

एक दिन रविवार को अजीत और कल्पना बड़ा तालाब के सामने बैठे सुहानी शाम का मजा ले रहे थे.

अजीत ने कल्पना का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘क्या तुम इस शादी से खुश हो? मैं जानता हूं कि यह अनजाना शहर है और मेरे सिवा तुम्हारा यहां कोई नहीं है.

‘‘हम दोनों मजबूरी में ऐसा काम कर रहे हैं, जो हमारी पढ़ाई से कमतर है. जो खुशियां मुझे तुम्हें देनी चाहिए, वे मैं फिलहाल नहीं दे पा रहा हूं. कल्पू, तुम मुझे छोड़ कर तो नहीं चली जाओगी न?’’

अजीत के मुंह से अचानक यह सब सुन कर कल्पना एकदम हैरान रह गई. उस की आंखों में आंसू आ गए.

वह बोली, ‘‘अजीत, यह ठीक है कि हमारे दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं और जो ख्वाब हम ने देखे थे, वे शायद इस हकीकत से ज्यादा हसीन थे, पर प्यार करने का मतलब यह नहीं होता कि दुख के समय में साथ छोड़ दो.

‘‘मैं इसलिए ज्यादा काम नहीं कर रही हूं कि मुझे घर काटने को दौड़ता है या मुझे ज्यादा पैसे चाहिए, बल्कि मैं चाहती हूं कि काम और मेहनत के मामले में मैं किसी भी तरह तुम से उन्नीस न रहूं. मैं हर हाल में तुम्हारे साथ खुश हूं और हमेशा रहूंगी.’’

अजीत के मन से शक के बादल छंट गए. इसी बीच एक दिन अजीत ने संजीव से कहा, ‘‘यार, तुम एक बार मेरे घर फोन कर के वहां के हालात के बारे में जानो. उन्हें यह जताना कि जैसे तुम्हें पता ही नहीं है कि मैं यहां तुम्हारे पास हूं.’’

‘‘पर अगर उन्हें भनक लग गई तो?’’ संजीव ने कहा.

‘‘आज नहीं तो कल उन्हें पता चल ही जाएगा. हम कब तक यों छिप कर रहेंगे. कल्पना कहती नहीं है, पर उसे अपने मम्मीपापा की बहुत याद सताती है,’’ अजीत बोला.

अगले दिन संजीव ने अजीत के घर फोन लगाया और बोला, ‘‘अंकल, मैं भोपाल से अजीत का दोस्त संजीव बोल रहा हूं. बड़े दिन से अजीत से बात नहीं हो पाई है. सब ठीक तो है न?’’

‘‘बेटा, अजीत तो कई महीने से गायब है. हमारे पड़ोसी ने उन की बेटी को अगवा करने के इलजाम में अजीत का नाम पुलिस थाने में लिखवा दिया है. पता नहीं वे दोनों कहां होंगे… साथ हैं भी या नहीं…’’

यह सुनते ही संजीव के मन में एक बार आया कि वह सब सचसच बता दे, पर कल्पना के बारे में सोच कर वह चुप रह गया.

जब अजीत के पापा ने अपनी पत्नी को संजीव के फोन के बारे में बताया, तो उन्हें शक हुआ कि कहीं अजीत और कल्पना भोपाल में तो नहीं हैं. वे तभी कड़ा मन कर के कल्पना के घर गईं और फोन वाली बात बता दी.

अगले ही दिन अजीत और कल्पना के मांबाप भोपाल जा पहुंचे और संजीव पर दबाव डालने और पुलिस की धमकी देने के बाद अजीत और कल्पना के मकान का पता उगलवा लिया.

घर की डोरबैल बजी. कल्पना को लगा कि संजीव आया होगा. उस ने दरवाजा खोला और सामने मम्मीपापा को देख कर उस का रंग सफेद पड़ गया.

तब तक अजीत भी दरवाजे पर आ गया था. उन्हें देख कर पहले तो वह सकपकाया, पर बाद में धीरे से बोला, ‘‘अंदर आइए.’’

उन सब के साथ संजीव भी था. वह इस सब के लिए खुद को अपराधी सा महसूस कर रहा था.

पहले तो कल्पना के पापा को बड़ा गुस्सा आया, पर जब उन्हें पता चला कि अपनी गृहस्थी को बेहतर करने के लिए वे दोनों इतनी ज्यादा कड़ी मेहनत कर रहे हैं, तो वे मन ही मन खुश भी हुए.

‘‘मैं न तो इस शादी से खुश हूं और न ही तुम दोनों से नाराज हूं. किसी मांबाप को गुस्सा तब आता है, जब उन की औलाद भाग कर शादी तो कर लेती है, पर दुनिया के थपेड़े खा कर उन का प्यार चार दिन में ही हवाहवाई हो जाता है.

‘‘तुम दोनों खुश रहो और हमेशा यहीं भोपाल में रहना, मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूं, क्योंकि इस बुढ़ापे में मैं अपने खानदान और चार लोगों से यह नहीं सुनना चाहता कि मेरी बेटी ने छोटी जाति के लड़के से शादी कर के हमारी नाक कटवा दी.

‘‘मैं कुछ पैसे तुम्हें दे दूंगा और वहां पुलिस में दर्ज कराई गई अपनी शिकायत रद्द करवा दूंगा. मुझे लगता है कि अजीत के मांबाप को भी मेरा यह आइडिया सही लगेगा.’’

यह सुन कर अजीत के पापा की तो मानो जान में जान आई. उन के बोलने से पहले ही कल्पना ने कहा, ‘‘हमारा मकसद आप लोगों की बेइज्जती कराना नहीं था. यहां संजीव ने हमें सहारा दे कर हमारा हौसला बढ़ाया था. यह हमारा सच्चा दोस्त है.

‘‘और हां, हम दोनों ने शादी कर के कोई गुनाह नहीं किया है और अगर आप को लगता है कि हम यहीं भोपाल में रहें, तो हमें कोई दिक्कत नहीं है. हम यहीं अपनी गृहस्थी बसाएंगे.’’

‘‘अजीत बेटा, मैं जानता हूं कि तुम एक समझदार बच्चे हो. मैं और तुम्हारी मां भी यही चाहते हैं कि तुम यहां अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करो,’’ अजीत के पापा ने कहा. वे सब एक रात वहां रहे और फिर अगले दिन वहां से चले गए. उन्होंने कुछ पैसे भी अपने बच्चों के अकाउंट में डलवा दिए थे.

इस घटना को 6 साल बीत गए थे. एक दिन अजीत और कल्पना के पापा के पास एक ह्वाट्सएप आया, जिस में एक इनविटेशन था. अजीत और कल्पना ने अपनी कड़ी मेहनत से इलैक्ट्रोनिक्स के सामान का अपना शोरूम खोला था. अगले रविवार को उस की ओपनिंग थी.

वे चारों दोबारा भोपाल गए. अजीत और कल्पना बहुत खुश हुए. उन दोनों की मम्मियों ने उस शोरूम का उद्घाटन किया, जिस का नाम था ‘कल्पना इलैक्ट्रोनिक्स’. अजीत और कल्पना की कड़ी मेहनत का सुखद नतीजा. Romantic Hindi Story

Short Hindi Story: छोटी जात

Short Hindi Story: गांव पिपलिया खुर्द, जिला सतना. मिट्टी के घर, टूटी पगडंडी और रात के अंधेरे में अब भी लोग सड़कों पर नहीं निकलते. वहीं रहती थी सीमा, एक कोरी जात की लड़की. पिता रामभरोसे दलित टोले में जूते बनाने का काम करते थे. मां की बचपन में ही मौत हो गई थी.

‘बेटी हो कर पढ़ाई करेगी? तू तो हाथ का काम सीख, यही तेरा भविष्य है,’ बस्ती के लोग अकसर कहते.

मगर सीमा ने यह मान लिया था कि उस की जात उस की नियति नहीं है. गांव के सरकारी स्कूल से उस ने 10वीं जमात पास की, लेकिन असली लड़ाई तो उस के बाद शुरू हुई.

जब इंटर के लिए शहर जाना चाहा, तो पंचायत ने विरोध किया, ‘लड़की है, अकेली जाएगी शहर? और पढ़लिख कर करेगी क्या?’

पिता ने भी हाथ खड़े कर दिए, ‘‘बिटिया, हम गरीब हैं, छोटी जात वाले हैं, ये बड़े सपने हमें शोभा नहीं देते.’’

सीमा ने तब पहली बार सीधे आंखों में आंख डाल कर कहा, ‘‘बाबूजी, मैं पढूंगी. चाहे भूखी रहूं, लेकिन पढ़ाई नहीं छोडूंगी.’’

वह खेतों में मजदूरी करने लगी. दिन में स्कूल, रात में चूल्हा. शहर की गलियों में झाड़ू भी लगाई, लेकिन किताबों का साथ नहीं छोड़ा. धीरेधीरे, वह बीए, फिर एमए तक पहुंच गई.

कालेज में अकसर टीचर भी ताना मारते, ‘तुम जैसी जात की लड़कियां यहां क्यों आती हैं? टीचर बनोगी क्या?’

सीमा मुसकरा कर कहती, ‘‘नहीं सर, अफसर बनूंगी.’’

आईएएस की कोचिंग करनी थी, मगर पैसे नहीं थे. उस ने सरकारी लाइब्रेरी में बैठ कर नोट्स बनाना शुरू किया. दिनभर न पढ़ पाने पर रात को शौचालय की सफाई के बाद बल्ब की रोशनी में पढ़ती थी.

और एक दिन जब उस का नाम अखबार में आया, ‘सीमा बंसोड़, अनुसूचित जाति वर्ग से, टौपर’ तो उसी गांव की पंचायत, जो कभी विरोध करती थी, अब मिठाई बांट रही थी.

सीमा ने अपना पहला भाषण उसी स्कूल में दिया, जहां उस के नाम से कभी टीचर मुंह चिढ़ाते थे.

‘‘जात वह दीवार है, जिसे मैं गिरा नहीं सकी, लेकिन उस पर चढ़ कर मैं ने उड़ना जरूर सीख लिया.’’

अब वही लोग, जिन की बेटियां कभी स्कूल नहीं जाती थीं, सीमा को देख कर पूछते, ‘हमारी बेटी भी अफसर बन सकती है न?’

सीमा मुसकरा कर कहती, ‘‘अगर जात, गरीबी और लड़कपन एकसाथ हो सकते हैं, तो जीत भी साथ हो
सकती है.’’ Short Hindi Story

Best Hindi Story: खुशी के आंसू

Best Hindi Story, लेखक – डा. राजेंद्र यादव आजाद

राधा पेट से थी. इस खबर से घर में खुशियां छा गईं, क्योंकि सालों बाद भवानी देवी की हवेली में किसी बच्चे की किलकारियां गूंजने वाली थीं.

भवानी देवी ने अपने बेटे विजय की शादी बड़ी धूमधाम से की थी. विजय वैसे तो पढ़ाई के साथसाथ खेलकूद में भी अव्वल आता था और अगर वह चाहता तो सिविल सेवा की नौकरी भी कर सकता था, लेकिन भवानी देवी की इच्छा थी कि उन का बेटा सेना का अफसर बने, क्योंकि भवानी देवी के पति कर्नल सूबे सिंह भी भारतीय सेना के जांबाज थे, जो 1971 के युद्ध में शहीद हो गए थे.

कर्नल सूबे सिंह के शहीद होने के समय भवानी देवी 6 महीने के पेट से थीं. पति के शहीद होने के 3 महीने बाद हवेली में किलकारियां गूंजी थीं. गमगीन परिवार में खुशियां छा गई थीं. भवानी देवी ने बड़े चाव से अपने बेटे का नाम विजय रखा था.

विजय धीरेधीरे बड़ा होता गया और भवानी देवी की उम्र ढलती गई. शहर से ग्रेजुएशन करने के बाद विजय भारतीय थल सेना में भरती हो गया था. इस के बाद उस की शादी एक अमीर परिवार की लड़की राधा से कर दी गई.

आज पोते के जन्म की खुशी में भवानी देवी फूली नहीं समा रही थीं. महल्ले में मिठाई बांटी गई.

समय का पहिया अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता जा रहा था तो भवानी देवी की हवेली में भी समय अपना रूप दिखा रहा था.

आज एक बार फिर हवेली में संकट के बादल मंडरा रहे हैं. भवानी देवी के पोते संदीप को भयंकर बुखार हो जाने के चलते शहर के बड़े अस्पताल में भरती कराया गया, लेकिन दाएं अंग को हवा लग जाने के चलते वह अपाहिज हो गया. घर का माहौल गमगीन हो गया.

संदीप जब अपाहिज हुआ था, तब उस की उम्र थी 4 साल थी. इसी दौरान राधा ने एक बेटी को भी जन्म दे दिया था.

विजय सेना में था, इसलिए वह अपनी बेटी और पत्नी राधा को शहर ले गया, लेकिन संदीप को दादी भवानी देवी ने उन के साथ शहर नहीं भेजा.

बड़ा बेटा संदीप अपाहिज होने के चलते विजय को अपने घर के वारिस की चिंता सताने लगी, तो उस ने तीसरी औलाद करने की सोची और बेटा पैदा हुआ.

इधर गांव में संदीप अपनी दादी के साथ ही रहता था. वह हवेली जो कभी लोगों से भरी रहती थी, अब सुनसान थी.

भवानी देवी ने संदीप का दाखिला गांव के ही सरकारी स्कूल में करा दिया. संदीप पढ़ाई में होशियार था.

उस ने कभी अपनी विकलांगता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. वह अपाहिज होते हुए भी अपने सभी काम कर लेता था.

दादी भवानी देवी संदीप को स्कूल छोड़ती और लाती थीं, लेकिन गांव के कुछ दबंग छात्र संदीप की विकलांगता के चलते उस का मजाक उड़ाते थे. संदीप खून का घूंट पी कर रह जाता था.

संदीप ने अपनी 12वीं जमात बहुत अच्छे नंबरों से पास की और आगे की पढ़ाई के लिए शहर में जाने इच्छा जाहिर की, तो विजय ने मना कर दिया, ‘‘आगे पढ़ कर क्या करोगे? तुम अपाहिज हो तो कौन तुम्हारा खयाल रखेगा?’’

लेकिन संदीप की जिद के चलते विजय को ?ाकना पड़ा, क्योंकि दादी भवानी देवी जो उस के साथ खड़ी थीं. उन्होंने विजय से कहा, ‘‘संदीप को आगे पढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. मैं इस के साथ रहूंगी.’’

संदीप ने शहर के कालेज में दाखिला ले लिया, लेकिन यहां भी उस की विकलांगता के चलते उस के सहपाठी उस का मजाक उड़ाने लगे, तो उसे निराशा ने घेर लिया.

आज जब संदीप कालेज से आया, तो वह अपनी दादी से कुछ नहीं बोला और अपने कमरे में जा कर बंद हो गया.

भवानी देवी ने सोचा कि दिनभर का थकाहारा होगा, इसलिए आराम कर रहा है, लेकिन जब रात को खाने के समय दादी ने संदीप का दरवाजा खटखटाया, तो भी उस ने कमरा नहीं खोला, तो वे चिंतित हो कर बोलीं, ‘‘संदीप, कमरा खोलो अपनी दादी के लिए.’’

थोड़ी देर के बाद जब संदीप ने दरवाजा खोला, तो वह अपनी दादी से लिपट कर रोने लगा.

‘‘क्या बात है बेटा? मुझे बताओ,’’ दादी बोलीं.

‘‘दादी, आप अभी गांव चलो. मैं अब नहीं पढ़ूंगा. पापा सही कहते थे कि तुम विकलांग हो, अब आगे नहीं पढ़ना चाहिए. मैं पढ़ाई छोड़ रहा हूं,’’ संदीप ने कहा.

‘‘यह क्या बेटा, अभी से हार मान ली… तुम्हें तो मेरा सपना पूरा करना है. तुम्हें पढ़ाई कर के आईएएस जो बनना है. तुम्हारी विकलांगता तुम्हारी पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए. मैं हर पल तुम्हारे साथ खड़ी हूं. मैं जब तक तुम्हें आईएएस नहीं देख लूंगी, तब तक मरूंगी नहीं.

‘‘तुम्हें अपनी दादी के लिए पढ़ना होगा. तुम ऐसे लोगों के लिए मिसाल बनोगे, जो अपनी विकलांगता को बोझ समझ कर अपना रास्ता बदल लेते हैं.’’

‘‘ठीक है दादी, मैं आज के बाद कभी आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगा.’’

अगली सुबह जब संदीप सो कर उठा तो उस में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था. वह फैसला कर चुका था कि अब चाहे उस की विकलांगता का कितना भी मजाक उड़ाया जाए, वह दुखी नहीं होगा. उसे तो केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है.

कालेज में संदीप अपनी जगह बैठ कर क्लास लेने लगा. राजनीति विज्ञान के प्रोफैसर उम्मेद सिंह आए और अपना विषय पढ़ाने लगे.

इस के बाद संदीप दिनभर गुमसुम बैठा रहा था. लंच में नेहा ने उस के पास आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है संदीप, आप कल उन आवारा लोगों की बातें दिल से क्यों लगा बैठे? चलो, चाय पी कर आते हैं. मुझे उम्मीद है आप उन की बातों को जरूर भूल जाओगे.

‘‘एक बात कहूं संदीप, जब मदमस्त हाथी चलता है तो उस के पीछे न जाने कितने कुत्ते भौंकते हैं. तुम हाथी हो मेरे दोस्त.’’

फिर वे दोनों कालेज की कैंटीन की तरफ चल दिए. थोड़ी देर के बाद वे कैंटीन में चाय पी कर वापस क्लास रूम में आ गए.

नेहा भी गांव से शहर पढ़ने आई थी. वह भी संदीप की ही क्लास में थी. वह मन ही मन संदीप को चाहने लगी थी, लेकिन उस ने कभी अपने प्यार का इजहार नहीं किया था. वे दोनों अब अच्छे दोस्त बन चुके थे.

संदीप हर बाधा को पार करता हुआ अपनी पढ़ाई कर रहा था. उस ने बीए भी अच्छे अंकों से पास की थी.

नेहा और संदीप ने राजनीति विज्ञान से एमए करने का विचार बनाया और दोनों का दाखिला जेएनयू में हो गया.

संदीप का केवल एक ही मकसद था कि उसे आईएएस बनने है, क्योंकि यह सपना संदीप का नहीं, बल्कि उस की दादी का भी था. वह अब होस्टल में रहते हुए अपनी एमए की पढ़ाई के साथसाथ आईएएस की तैयारी भी करने लगा था.

एक दिन नेहा ने कहा, ‘‘संदीप, आज गंगा ढाबे पर खाना खाने चलते हैं.’’

‘‘अरे नेहा, मैस में ही खा लेंगे न,’’ संदीप बोला.

‘‘नहीं, आज तो आप को मेरी बात माननी ही पड़ेगी,’’ नेहा बोली.

‘‘अरे बाबा, आप बड़ी जिद्दी हो,’’ संदीप ने कहा और दोनों हंस पड़े. जेएनयू में घूमते हुए वे गंगा ढाबा की तरफ चल पड़े.

‘‘संदीप, एक बात बोलूं… अगर आप सुनो तो,’’ नेहा बोली.

‘‘बोलो नेहा, क्या कहना चाह रही हो?’’ संदीप ने कहा.

‘‘संदीप, आई लव यू. मैं आप से बहुत प्यार करती हूं,’’ नेहा ने कहा, तो संदीप बोला, ‘‘नेहा, मुझ विकलांग के लिए यह आप की हमदर्दी है प्यार नहीं.’’

‘‘नहीं संदीप, मैं सच में आप से प्यार करती हूं. आप दुनिया के एक बेहतरीन इनसान हैं,’’ नेहा ने कहा.

‘‘तो क्या आज यह कहने के लिए ही आप ने मुझे बुलाया था?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘कुछ ऐसा ही समझ लो,’’ नेहा ने कहा.

इस के बाद उन दोनों ने गंगा ढाबे पर खाना खाया. वैसे, संदीप भी मन ही मन नेहा को बहुत चाहता था, लेकिन कभी अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाया था. आज जब नेहा ने संदीप को आई लव यू कहा तो संदीप की भावनाओं का ज्वार टूट पड़ा और उस ने भी नेहा को आई लव यू बोल दिया.

संदीप और नेहा ने आईएएस का फार्म भर दिया था. अपनी एमए की पढ़ाई के साथसाथ वे दोनों आईएएस की भी कोचिंग ले रहे थे.

यूपीएससी ने प्रीलिमिनरी ऐग्जाम की तारीख तय कर दी, तो संदीप और नेहा के दिल की धड़कन बढ़ने लगी. तय समय पर प्रीलिमनरी का ऐग्जाम हो गया और नेहा और संदीप का रिजल्ट भी अच्छा रहा. वे दोनों प्रीलिमनरी पास कर चुके थे और अब मेन ऐग्जाम की तैयारी में जुट गए थे.

कहते हैं कि मेहनत रंग लाती है और संदीप व नेहा की मेहनत भी रंग ला रही थी. दोनों ने ही पहले चांस में ही मेन ऐग्जाम भी क्लियर कर लिया. अब बारी थी इंटरव्यू की. उन दोनों को यकीन था कि उन का इंटरव्यू भी अच्छा ही हो जाएगा.

नेहा बोली, ‘‘सुनो संदीप, मुझे उम्मीद है कि हमारा इंटरव्यू भी अच्छा हो जाएगा. मैं चाहती हूं कि आप अपने मम्मीपापा से हमारी शादी की बात कर लें.’’

नेहा की बातें सुनकर संदीप एकदम से चौंक गया और बोला, ‘‘क्या हम अभी शादी की बात करें? देखो नेहा, हम अच्छे दोस्त तो हैं लेकिन क्या आप के मम्मीपापा एक अपाहिज से अपनी आईएएस बेटी की शादी करा देंगे? शायद नहीं.

‘‘नेहा, आप का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. आप ऐसा करो कि किसी अच्छे से लड़के से शादी कर लो. मैं अपाहिज हूं. मैं आप के लायक नहीं हूं.’’

‘‘क्या बात कर रहे हो संदीप… मैं ने आप से प्यार किया है. मैं आप के सिवा किसी की भी पत्नी नहीं हो सकती. अगर मेरी शादी आप से नहीं हुई, तो मैं जिंदगीभर शादी नहीं करूंगी.’’

संदीप बोला, ‘‘ठीक है तो फिर आप अपने मम्मीपापा से बात करो और मैं भी घर में बात करता हूं. लेकिन हम यह बात इस इंटरव्यू के बाद ही करेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ नेहा ने कहा.

इंटरव्यू में नेहा और संदीप पास हो गए. वे अब आईएएस बन चुके थे. दोनों को ही ट्रेनिंग के लिए मसूरी भेज दिया गया. ट्रेनिंग के बाद दोनों को ही राजस्थान कैडर मिला, तो वे बहुत खुश हुए.

नेहा ने तो अपने मम्मीपापा को इस शादी के लिए तैयार कर लिया, लेकिन संदीप के पापा और मम्मी इस शादी के लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि नेहा अनुसूचित जाति की लड़की थी और संदीप राजपूत था.

संदीप एक बार फिर टूट गया. उस ने नेहा को अपने मांबाप का फैसला सुना दिया.

नेहा बोली, ‘‘संदीप, मैं आप को अपना पति मान चुकी हूं और मैं आप के सिवा किसी दूसरे की पत्नी नहीं बन सकती. हम अच्छे दोस्त थे, हैं और आगे भी रहेंगे.’’

जब भवानी देवी की पता चला कि नेहा और संदीप शादी करना चाहते हैं, लेकिन विजय और राधा इस शादी से खुश नहीं हैं तो उन्होंने तय किया कि वे अपने पोते को उस का सच्चा प्यार दिला कर ही रहेंगी.

भवानी देवी तत्काल गांव से जयपुर आईं और संदीप व नेहा से बात की और कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे यह शादी करा कर ही रहेंगी.

संदीप बोला, ‘‘दादी, पापा चाहते हैं कि मेरी शादी अपनी जाति में ही हो.’’

यह सुन कर भवानी देवी ने विजय को फोन किया और कहा, ‘‘तुम किस जमाने में जी रहे हो… आज 21वीं सदी में भी तुम जातिवाद की बातें कर रहे हो. क्या हो गया है तुम्हारी सोच को. देखो, मैं इन दोनों बच्चों की कोर्ट मैरिज करा रही हूं. तुम्हें आना है तो आ जाना.’’

अपनी मां की बातें सुन कर विजय गुस्से में आ गया और बोला, ‘‘मां, तुम जैसा चाहे वैसा करो. हमारा तुम से कोई वास्ता नहीं है और फोन काट दिया.’’

भवानी देवी ने संदीप और नेहा की कोर्ट मैरिज करवा दी. वे दोनों जयपुर में अपनी दादी के साथ रहने लगे. उन की जिंदगी की नैया हंसीखुशी चल रही थी.

नेहा ने एक बेटे को जन्म दे दिया था, लेकिन संदीप को दुख था कि वह अपने मांबाप का प्यार नहीं पा सका. लेकिन आज जब अखबारों में देश के टौप 10 आईएएस की लिस्ट में पहले व दूसरे नंबर पर संदीप और नेहा का नाम छपा तो विजय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया.

विजय राधा से बोला, ‘‘देखो राधा, हमारा बेटा और बहू देश के टौप 10 आईएएस की लिस्ट में हैं. चलो, हम उन से मिलने जयपुर चलते हैं.’’

राधा और विजय जयपुर संदीप के घर आए और सारे गिलेशिकवे भूल कर बेटे और बहू को गले लगा लिया.

आज एक बार फिर भवानी देवी की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन ये आंसू गम के नहीं, बल्कि खुशी के थे. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: समर की रोशनी

Hindi Romantic Story, लेखक – सागर चौधरी

समर एक ऐसी मुहब्बत को जी रहा था, जो शायद बहुत पहले मर चुकी थी. वह इस रिश्ते में कब से अकेला था, बस उसे अहसास नहीं था कि रोशनी कब की, किसी और की हो चुकी थी. वह अब जो भी अपना समय उसे देती, वह सिर्फ पुरानी यादों के नाते.

यों तो एक जमाने में वे दोनों पूरापूरा दिन एकदूसरे को देखते गुजारते थे. हैदराबाद के एक माल में दोनों शोरूम सेल्स स्टाफ थे. समर मैंस वियर में कस्टमर्स को कपड़े दिखाता, तो दूसरी तरफ किड्स वियर में रोशनी मम्मियों की मदद करती.

शाम को वे दोनों 45 नंबर की बस पकड़ते और हुसैन सागर ?ाल के एक किनारे पर उतर जाते. एक घंटा दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाल कर बैठते और बातें करते. ?ाल की तरफ से आने वाली हवा रोशनी के घुंघराले बालों को रहरह कर उड़ाती रहती.

समर के लिए सबकुछ स्लो मोशन जैसा चलता था, इसलिए वह अकसर रोशनी की जुल्फों में खो जाता. वह उस की तरफ देख तो रहा होता, मगर कई बार रोशनी की आवाज उसे सुनाई न देती.

फिर वे दोनों वापस 45 नंबर की बस पकड़ते. समर मुशीराबाद उतरता तो रोशनी टोली चौकी. दोनों ही बस्तियों में रहते थे, मगर एकदूसरे से 10 किलोमीटर दूर.

यह साल 2014 था. एक शाम ऐसी बारिश में दोनों फंसे कि घंटों बाद भी 1-2 बसें ही आई थीं, सब ठसाठस भरी हुईं. 2 घंटे के बाद भी बारिश के थमने का नाम न था. रोशनी की अप्पी (बड़ी बहन) कई बार फोन कर चुकी थीं.

रोशनी ने कहा कि वह आटोरिकशा से चली जाएगी और समर को अब लौटना चाहिए, मगर उस ने कहां सुनना था.

आटोरिकशा आते ही समर एकदम से रोशनी के साथ उस में बैठ गया और आटोरिकशा वाले को कहा, ‘‘टोली चौकी ले लो.’’

रोशनी ने परेशान होते हुए उसे कहा, ‘‘तुम क्यों जा रहे हो? तुम वापसी में काफी लेट हो जाओगे.’’

समर ने जवाब दिया, ‘‘लेकिन उतने समय मैं तुम्हारे साथ भी तो रह पाऊंगा.’’

रोशनी कुछ न बोली, बस समर के कंधे पर अपना सिर रख दिया. समर ने भी अपनी बाजू पीछे से सरकाते हुए रोशनी को कमर से पकड़ लिया और दोनों यों ही टोली चौकी पहुंच गए.

पैसे रोशनी ने दिए. उसे मालूम था कि समर के आधे से ज्यादा पैसे तो किराए में खर्च हो जाते हैं.

रोशनी ने समर से कहा, ‘‘तुम इसी आटोरिकशा से लौट जाना.’’

समर ने कहा, ‘‘हां, ठीक है.’’

मगर समर को घर पहुंचने की जल्दी भी तो नहीं थी. अपनी यादों के साथ उसे बस की खिड़की पर बैठ कर जाना ज्यादा पसंद था.

बस स्टौप तक जाते हुए समर खुद ब खुद मुसकरा रहा था. कभी दौड़ता तो कभी चलने लगता. बारिश अब थम सी गई थी और रात इतनी ज्यादा कि अब बस स्टौप पर लोग भी कम थे.

5 साल गुजर गए थे, मगर वह बारिश की रात जैसे कल ही की बात हो. समर आज भी बारिश को बड़ी मुहब्बत से देखता है.

2 साल पहले समर दिल्ली आ गया था. अब वह एक बड़े होटल में स्टीवर्ड था. रोशनी ने उसे इंगलिश बोलना सिखाया था, जिस की वजह से एक दिन जब यह औफर आया था तो रोशनी ने ही जिद की थी कि वह चला जाए. माल की नौकरी में स्टाफ को मैनेजर से बहुत भलाबुरा सुनना पड़ता है. पैसे भी मुश्किल से 8,000 रुपए मिलते थे.

समर ने कहा था कि वह वहां जाते ही रोशनी के लिए भी कुछ देखेगा. उस ने सोचा था एक साल के अंदर वे दोनों फिर साथ होंगे, मगर दूसरा और तीसरा साल भी गुजर गया. समर और रोशनी अब भी एकदूसरे को देख नहीं पाए थे.

वे दोनों फोन पर कुछ कहते नहीं, मगर अंदर ही अंदर उन का प्यार एकदूसरे के लिए जहर बनता जा रहा था. न वे एकसाथ रह पा रहे थे, न एकदूसरे से दूर.

समर का अकेलापन उस के अंदर के प्यार के महासागर को कोयला बन कर सोख रहा था. उस की जरूरत अब सिर्फ रोशनी की आवाज सुन कर खत्म नहीं होती थी. वह उसे छूना चाहता था, अपनी बांहों में भरना चाहता था, उस के होंठों को चूमना चाहता था, मगर रोशनी कहीं भी नहीं होती.

दूसरी ओर, रोशनी के लिए समर का होना ही सबकुछ था. उसे फर्क नहीं पड़ता था कि समर उस के पास मौजूद था या नहीं. वह हर रोज उसे अपने दिनभर की बात अब भी वैसे ही शेयर करती, जैसे 5 साल पहले हुसैन सागर झील के किनारे पर किया करती थी. समर के अकेलेपन को खत्म करने के लिए उस ने अपनी तसवीरें भी भेजी थीं. वैसी तसवीरें जिन का हकदार सिर्फ समर ही था.

हालांकि, रोशनी ने शुरू से ही समर को कह दिया था कि उन की शादी नहीं हो सकती. जैसे वह भविष्य को देख चुकी हो. उस का परिवार और समाज कभी समर, एक हिंदू दलित, को स्वीकार नहीं करता.

मगर दिल के अंदर के फासले जिस तरह से बढ़ रहे थे, वे रोशनी को डराने लगे थे. ‘अगर समर सचमुच चला गया तो…’ रोशनी के दिल में यह सवाल अब रहरह कर उठता था.

एक समय वह भी आया जब समर 10 मिनट की फोन काल पर भी प्यार से बात नहीं कर पाता था. किसी न किसी बात पर उस का गुस्सा रोशनी पर निकल आता था.

‘‘जब तुम औफिस से घर जा रही होती हो तभी तुम फोन करती हो. मुझे बस के हौर्न के बीच में तुम्हारी आवाज सुननी पड़ती है… और जब मैट्रो लेती हो तो तुम्हारी आवाज चली जाती है. मुझे नहीं करना बात इस तरह. रखो फोन,’’ समर कहता.

रोशनी अप्पी या बच्चों के सामने घर पर बात नहीं कर पाती थी. एक दिन उस के जीजाजी ने उन के सारे मैसेज पढ़ लिए थे. उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर उसे उन के साथ रहना है तो समर को अपनी जिंदगी से निकालना पड़ेगा.

समर और रोशनी की मुहब्बत ने पिछले 5 साल में ऐसी कई दीवारों को पार किया था, मगर बरसों की दूरी ने उन के बीच एक गहरी खाई बना दी थी सबकुछ खत्म होता लग रहा था.

तभी रोशनी ने समर से कहा कि वह 2 दिन के लिए दिल्ली आएगी और उस के साथ रहेगी. खुशी के मारे समर की आंखों से आंसू निकल आए थे. वह 5 साल बाद रोशनी से मिलने वाला था.

रोशनी ने अपने घर वालों से कहा था कि कंपनी वाले उसे ट्रेनिंग के लिए भेज रहे हैं और रहनेसहने का इंतजाम भी उन्होंने ही किया है.

तब पतझड़ शुरू ही हुआ था. धूप में गरमी और छांव में हलकी सी सिहरन महसूस होती. वे 3 दिन रोशनी और समर की जिंदगी के सब से खूबसूरत पल थे. समय जैसे ठहर सा गया था. वे सब कसमेवादे, सपने जो कुछ महीने पहले टूटते नजर आ रहे थे, वे फिर से जुड़ गए थे.

रोशनी ने इन सब के बीच समर को यह नहीं बताया था कि घर पर उस की शादी की बात चल रही थी. वह उन 3 दिनों में समर को खुश देखना चाहती थी. वह सबकुछ देना चाहती थी, जो समर का था. मगर उस ने यह भी तय कर लिया था कि यह उन की आखिरी मुलाकात थी.

मानो एक कर्ज था समर के प्यार का जो रोशनी सूद समेत वापस करने आई हो. उस ने सोचा था, ‘समर अब अधूरा महसूस नहीं करेगा और अपनी जिंदगी में आगे बढ़ेगा.’

मगर समर के लिए तो यह उम्मीद का नया रास्ता था. उसे लगने लगा था कि अब सबकुछ नामुमकिन है. शायद रोशनी उस के साथ भाग कर शादी करने को तैयार हो जाए. जहां रोशनी उस मुलाकात के जरीए 5 साल के मुहब्बत को दफन करने आई थी, वहीं समर की मरी मुहब्बत में एक नई जान आ गई थी.

रोशनी के वापस जाते ही समर फिर से दिनभर उसे फोन करने लगा. इंतजार करना समर का सब से खूबसूरत टाइमपास बन गया.

तभी एक दिन रोशनी ने समर का भरम थोड़ा और कहा, ‘‘मैं सलमान से मिली समर. पहली बार तुम्हें छोड़ कर कोई और आदमी मुझे अच्छा लगा है.’’

समर उस दिन नाइट शिफ्ट में था. किसी बहुत बड़े उद्योगपति ने होटल में पार्टी रखी थी. समर का काम था लोगों का मुसकरा कर स्वागत करना. उस ने रोशनी से कहा था, ‘‘मुबारक हो. अपना खयाल रखना.’’

इतना कह कर समर ने फोन रख दिया था. उस दिन समर ने सब का स्वागत किया. चेहरे पर से मुसकराहट तब तक नहीं गई, जब तक उस ने पार्टी फ्लोर नहीं छोड़ा.

शिफ्ट खत्म होते ही समर ने खुद को बाथरूम में बंद किया और फिर ऐसे रोया जैसे दुनिया खत्म हो गई हो.

एक महीने बाद रोशनी का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘समर, अभी मत जाओ प्लीज. इतनी दूर चले हो मेरे साथ, कुछ दूर और चल लो. मैं तुम्हारे बिना यह नहीं कर सकती. एक बार मेरी शादी हो जाए, फिर चले जाना.’’

समर ने रोशनी से इतना प्यार किया था कि वह अगर उसे कह देती कि जीना छोड़ दो तो शायद वह अपनी सांसें बंद कर लेता.

समर ने कहा कि वह जैसा कहेगी वैसा ही होगा. रोशनी जितना और जब चाहती, समर उस के लिए मौजूद रहता.

रोशनी ने कहा, ‘‘समर, हम कभी अलग नहीं होंगे. यह शादी सिर्फ समाज के लिए है. तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता.’’

फिर एक दिन वह समय भी आया जब शादी की रस्में शुरू हुईं. रोशनी के हाथों में मेहंदी लगी थी.

समर ने उस से पूछा था, ‘‘क्या चाहिए तुम्हें मेरी जान? शादी है तुम्हारी आज, तुम जो कह दोगी वह ला देंगे हम तुम्हें.’’

रोशनी ने कहा था, ‘‘तुम मुझ से एक वादा करो…’’

समर मुसकराया और बोला, ‘‘एक और वादा… तुम जो चाहे मांग लो सब तुम्हारा है.’’

रोशनी ने कहा, ‘‘वादा करो, हम कभी अलग नहीं होंगे.’’

समर ने हामी भर दी.

रोशनी की शादी हुए कई हफ्ते बीत गए थे. समर ने उसे सैकड़ों मैसेज भेजे थे, मगर जवाब एक भी नहीं मिला था उसे.

फिर एक दिन समर ने मैसेज में लिखा, ‘आई लव यू.’

जवाब आया, ‘समर प्लीज, आगे बढ़ो अब.’

Story In Hindi: सबक

Story In Hindi, लेखक – सुनील

‘‘जरा यहां गाड़ी रोकना…’’ मीना के इतना कहते ही ड्राइवर ने झट से ब्रेक लगा दिए.

‘गांव तो अभी डेढ़ किलोमीटर दूर है. मैडम ने अभी एकदम से गाड़ी क्यों रुकवाई?’ आईएएस मीना की इस पहेली से जूझते ड्राइवर मनोहर ने सोचा.

मीना गाड़ी से बाहर निकलीं. कच्ची सड़क पर अभी भी धूल उड़ रही थी. तेज धूप में उन्होंने अपने काले चश्मे लगाए और एक खेत की पगडंडी की तरफ चल दीं. जब उन के साथ के लोग पीछेपीछे आने लगे, तो उन्होंने बिना मुड़े ही हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

उस पगडंडी पर तकरीबन 100 मीटर दूर एक ट्यूबवैल नजर आ रहा था. पानी चल रहा था. धान की फसल में पानी छोड़ा गया था. भरी दोपहर में वहां कोई नहीं था. एक पेड़ की छांव में कुत्ता ऊंघ रहा था.

जब मीना उस कुत्ते के करीब से गुजरीं, तो उस के कान खड़े हो गए. एक बार आंखें खोलीं और फिर सुस्ताने लगा. उस की सांसें धौकनी की तरह बड़ी तेज चल रही थीं.

मीना थोड़ा आगे बढ़ीं और उस ट्यूबवैल के पास जा कर खड़ी हो गईं.

दूर खड़े स्टाफ ने सोचा कि मैडम को प्यास लगी होगी, पर पानी तो गाड़ी में भी रखा था, वह भी बोतलबंद, तो इतनी दूर जाने की क्या जरूरत थी?

उधर आईएएस मीना के मन में बड़ी कशमकश थी और कुछ पुरानी यादें भी, जो आज भी नासूर बन कर उन को टीस दे रही थीं.

आज से 10 साल पहले की बात है, जब 15 साल की मीना सरकारी स्कूल में 10वीं जमात में पढ़ती थी. पढ़ाई में बड़ी होशियार, पर जाति से दलित थी, तो उस के तेज दिमाग की कोई कीमत नहीं थी.

मीना के मांबापू सरपंच के खेतों में मजदूर थे और अपने 5 जनों के परिवार को जैसेतैसे पाल रहे थे. मीना के 2 छोटे भाई आवारा थे और दिनभर यहांवहां पैर भिड़ाते घूमते रहते थे.

‘‘अरी ओ मीना, उठ जा. आज स्कूल नहीं जाना क्या?’’ जब मां की यह आवाज मीना के कानों में पड़ी तो वह झट से उठ बैठी.

मीना पढ़ाई में तो तेज थी ही, अच्छी देह की मालकिन भी थी. लंबा चेहरा, काले घने बाल, उभरी हुई बड़ी छातियां, चौड़े कूल्हे, जो उसे 20 साल की भरीपूरी लड़की दिखाते थे. यही वजह थी कि वह कई लोगों की हवसभरी निगाहों में आ चुकी थी. चूंकि दलित थी, तो ऊंची जात के लोग उसे अपने बाप का माल समझ कर हाथ साफ करना अपना जन्मजात हक समझते थे.

स्कूल के हैडमास्टर सेवकराम ऊंची जाति के थे और हमेशा मीना की ऊंची छातियों को मसलने के सपने देखते थे. उन्हें पता था कि अकेले यह काम इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि मीना दबंग लड़की थी. अकेले उस पर हावी होना सेवकराम की बूढ़ी हड्डियों के बस की बात नहीं थी.

यही वजह थी कि उन्होंने स्कूल के 2 लड़कों महेश और दीपक को अपना परम चेला बनाया हुआ था. वे जानते थे कि महेश और दीपक की लार भी मीना की देह पाने के लिए टपकती रहती है. पर चूंकि मीना उन दोनों लड़कों को पसंद नहीं करती थी, तो सेवकराम ने एक टीचर बनवारी दास को भी अपने ‘हवसी गिरोह’ में शामिल कर लिया था. वे चारों ऊंची जाति के थे.

आज जब मीना स्कूल पहुंची, तो उस की पक्की सहेली गीता ने कहा, ‘‘मीना, तू हैडमास्टर साहब से मिल लेना.

उन्होंने तो तुझे कल ही अपने पास बुलाया था, पर मैं तुझे बताना भूल गई. तू उस समय बनवारी दास सर ने नोट्स ले रही थी.’’

थोड़ी देर के बाद मीना हैडमास्टर साहब के कमरे में पहुंची. उस समय वे अकेले थे. मीना को देखते ही वे कुरसी से खड़े हो गए और उस के पास आ गए.

‘‘सर, आप ने मुझे बुलाया था?’’ मीना ने पूछा.

हैडमास्टर साहब ने मीना को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा, ‘‘हां. मैं तुम्हारी पढ़ाई से बहुत खुश हूं. मुझे उम्मीद है कि तुम हमारे स्कूल का नाम रोशन करोगी.’’

‘‘सर, मैं बड़ी मेहनत कर रही हूं. आप के आशीर्वाद से अच्छा रिजल्ट आएगा,’’ मीना ने कहा.

इतने में हैडमास्टर साहब ने मीना के गाल पर चुटकी काटते हुए कहा, ‘‘यह हुई न बात. मैं शाम को 5 बजे हमारे खेत वाले ट्यूबवैल पर कुछ बच्चों को पढ़ाता हूं. आज शाम से तुम भी आ जाना. जितनी ज्यादा मेहनत करोगी, उतना ऊपर जाओगी,’’ और इतना कह कर हैडमास्टर साहब मीना की छातियों को घूरने लगे.

मीना को इस तरह हैडमास्टर का घूरना थोड़ा अखरा, पर उस ने सोचा, ‘ऐसा नहीं हो सकता. हैडमास्टर साहब बड़े अच्छे इनसान हैं. ये तो मुझे शाम को पढ़ाने की बात भी कर रहे हैं. अपने दिमाग पर काबू पा. और अगर कोई ऐसीवैसी बात हुई तो मैं संभाल लूंगी.’

‘‘जी सर, मैं शाम को आ जाऊंगी,’’ इतना कह कर मीना वहां से चली गई. मीना के जाने के बाद हैडमास्टर सेवकराम ने महेश, दीपक और बनवारी दास को अपने पास बुलाया. उन के आते ही सेवकराम ने कहा,

‘‘मीना शाम को खेत पर आने के लिए मान गई है. हमारे पास आज का ही मौका है. शाम को वहां लोगों की ज्यादा आवाजाही नहीं होती है. उसे आसानी से अपने काबू में कर लेंगे.’’

‘‘बड़ी पढ़ाकू बनती है. छोटी जात की हो कर बड़ी सरकारी अफसर बनने का सपना देख रही है. आज शाम को इस का सारा नशा उतार देंगे,’’ महेश ने कहा.

‘‘कल इस का बापू मेरे पास आ कर गिड़गिड़ा रहा था और कह रहा था कि यही हमारी आखिरी आस है. पढ़ने में ठीक है, तो कोटे से सरकारी नौकरी मिल जाएगी.

‘‘इतना ही नहीं, मुझ से 500 रुपए उधार ले गया था. मुझे पता है कि वापस नहीं मिलेंगे. इस की बेटी से ही वसूल कर लेंगे,’’ हैडमास्टर सेवकराम ने कहा.

‘‘आप की चाल तो एकदम बढि़या है. बस, किसी तरह मीना आज शाम को ट्यूबवैल पर आ जाए,’’ बनवारी दास ने कहा.

‘‘तू मिल आई हैडमास्टर साहब से? वे क्या बोल रहे थे?’’ वापस क्लास में आई मीना से गीता ने पूछा.
मीना ने सारी बात बता दी. गीता भी खुश हुई कि मीना को खुद हैडमास्टर साहब कोचिंग देंगे, वह भी फ्री में.

दोपहर को घर का काम कर मीना ने खाना बनाया और अपने दोनों निकम्मे भाइयों को खिलाया. उस के मांबापू सरपंच के खेत पर गए थे.

मीना ने घर के सारे काम निबटाए और फिर स्कूल से मिला होमवर्क किया. उसे आज हैडमास्टर साहब से पढ़ने की जल्दी थी.

शाम के साढ़े 4 बजे मीना ने अपना सूटसलवार बदला और बस्ता ले कर हैडमास्टर साहब के खेतों की ओर चल दी. वहां तक जाने में आधा घंटे का समय लगना था.

हैडमास्टर साहब का ट्यूबवैल वाला खेत पगडंडी से थोड़ा अंदर था और वहां कोई नहीं आताजाता था. उस समय भी वहां सन्नाटा छाया हुआ था.

जब मीना ट्यूबवैल पर पहुंची, तो देखा कि हैडमास्टर रामसेवक के साथ वहां महेश और दीपक के अलावा बनवारी दास भी मौजूद थे. वह थोड़ा चौकन्ना हो गई, क्योंकि उसे महेश और दीपक कतई पसंद नहीं थे.

‘‘अरे, आओ मीना. तुम तो समय की बड़ी पाबंद हो,’’ हैडमास्टर रामसेवक बोले. उस समय उन्होंने बनियान और लुंगी पहनी हुई थी.

वहां एक खाट बिछी थी और 2-3 कुरसियां पड़ी हुई थीं. मीना ने हैडमास्टर रामसेवक और टीचर बनवारी दास को ‘नमस्ते’ कहा और फिर एक तरफ खड़ी हो गई.

उन चारों ने पहले ही प्लान बना लिया था कि पानी देने के बहाने मीना के गिलास में नशे की गोली मिला देंगे, फिर उस की जवानी का रस पीएंगे.

महेश ट्यूबवैल के कोठरे से 3-4 गिलास पानी के लिए आया. उस ने अपने हाथ से मीना को पानी दिया और कहा, ‘‘गरमी बहुत है. पहले पानी पी लो, फिर हम तीनों पढ़ाई करेंगे.’’

मीना ने गिलास हाथ में ले लिया, पर सारा पानी नहीं पीया, बस कुछ घूंट ही हलक के नीचे उतारा.

पता नहीं क्यों मीना को वहां अच्छा नहीं लग रहा था. उस ने अपनी चुन्नी को कमर पर कस कर बांध लिया था. जब तक वह कुरसी पर बैठती, तब तक उसे लगा कि सिर घूम रहा है.

मीना ने हैडमास्टर सेवकराम से कहा कि उसे पेशाब करने जाना है. यह सुन कर उन सब की बांछें खिल गईं.

रामसेवक बोले, ‘‘हां, यहीं पीछे एक छोटी सी कोठरी और है, वहां चली जाओ.’’

मीना जल्दी से वहां से निकली. उस का सिर अब तेजी से घूम रहा था. वह उस कोठरी में गई और हलक में उंगली डाल कर उलटी कर दी. इस से नशे का असर कम हुआ और फिर उस ने मटके में रखे पानी से अपना मुंह अच्छी तरह से धोया और फिर मन ही मन कुछ सोच कर वह ट्यूबवैल की तरफ बढ़ गई.

वहां जाते ही मीना ने कहा, ‘‘सर, मेरे सिर में दर्द हो रहा है. मुझे नींद भी बहुत आ रही है.’’

इतना सुनते ही दीपक बोला, ‘‘कोई बात नहीं, तुम खाट पर लेट जाओ. थोड़ी देर में आराम आ जाएगा.’’

मीना खाट पर लेट गई और सोने की ऐक्टिंग करने लगी. थोड़ी देर के बाद जब सब को लगा कि नशे का असर हो गया है, तो वे चारों उस पर छाने लगे.

दीपक ने मीना की चुन्नी खोलनी चाही कि तभी मीना ने कस कर एक लात उसे जमा दी. लात सीधी छाती पर पड़ी थी. दीपक दूर जा गिरा और एक ईंट उस के सिर पर लगी. उसे चक्कर आने लगे.

इस बीच उन तीनों को जैसे सांप सूंघ गया, क्योंकि उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि मीना ही उन पर यह चाल चल देगी.

तभी मीना ने अपनी कुहनी महेश के जबड़े पर मारी और घायल शेरनी की तरह उठ बैठी. टीचर बनवारी दास उस का यह खतरनाक रूप देख कर वहां से चंपत हो गया. अब बचे थे हैडमास्टर सेवकराम. मीना ने उन का बनियान खींच कर फाड़ दिया और जोर से चिल्लाई, ‘‘कोई बचाओ. ये लोग मेरी इज्जत पर हाथ डाल रहे हैं.’’

इतने में वहां बैठा एक कुत्ता जोर से भौंकने लगा. कुत्ते का शोर सुन कर उस खेत से थोड़ा दूर कुछ किसान चारा काट रहे थे. वे एकदम से ट्यूबवैल की तरफ दौड़े.

हैडमास्टर सेवकराम की घिग्गी बंध गई. फटी बनियान को संभालते हुए वे वहां से भागना चाहते थे, पर मीना ने उन पर मुक्कों की बरसात कर दी और चिल्लाई, ‘‘नीच आदमी. तेरी इतनी हिम्मत. मैं गरीब घर की बेटी जरूर हूं, पर कमजोर नहीं.’’

सेवकराम हाथ जोड़ने लगे, पर तब तक बाकी लोग वहां पहुंच गए. उन्होंने वहां का सीन देखते ही सबकुछ समझ लिया और हैडमास्टर पर पिल पड़े…

आईएसएस मीना जैसे अपनी यादों से लौट आईं. उस दिन के बाद हैडमास्टर सेवकराम ने वह स्कूल छोड़ दिया था. टीचर बनवारी दास को भी स्कूल से निकाल दिया गया. महेश और दीपक कहां गए, किसी को पता नहीं चला.

आईएसएस मीना ने काला चश्मा लगाया और वहां से लौटने लगीं. ऊंघ रहे कुत्ते ने उन्हें दोबारा देखा. उन्होंने बड़े प्यार से उसे पुचकारा और गाड़ी की तरफ बढ़ गईं. Story In Hindi

Hindi News Story: उपराष्ट्रपति के बहाने तीर तानों के चलाने

Hindi News Story: ‘‘यार, बहुत दिनों से मैं अपने पुराने दोस्तों से नहीं मिली हूं. सोच रही हूं कि कल उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना लूं,’’ अनामिका ने विजय से कहा.

‘‘बना लो, पर मैं नहीं चल पाऊंगा,’’ विजय बोला.

‘‘क्यों? तुम कहीं जा रहे हो क्या?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘नहीं, पर उन लोगों के साथ मैं बोरियत महसूस करता हूं. वे हर बात में राजनीति घुसेड़ देते हैं. कभी भी अपनी बातें नहीं करते हैं. और वह जो तुम्हारा बैस्ट फ्रैंड है न जितेश, वह तो मुझे फूटी आंख नहीं सुहाता है,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मेरे दोस्तों का नाम सुन कर इतना बिदक क्यों जाते हो? मैं इतने दिनों के बाद उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना रही हूं और तुम मेरा मूड खराब कर रहे हो,’’ अनामिका थोड़ा नाराज हो कर बोली.

‘‘मैं कब मना कर रहा हूं. तुम जाओ अपने दोस्तों के पास और मजे करो,’’ विजय ने माहौल को थोड़ा हलका बनाते हुए कहा.

‘‘मैं तो जाऊंगी ही. जितेश से मेरी बात हुई थी. वह आज कन्फर्म कर देगा. फिर मैं, जितेश, राहुल, सुरजीत और सोनिया सब कल लंच पर मिलेंगे,’’ अनामिका ने अपना प्लान बता दिया.

इतने में जितेश का फोन आ गया, ‘‘हां जितेश, बोलो… कल हम सब मिल रहे हैं न?’’ अनामिका ने पूछा.

‘हां, हम सब ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट पर मिलेंगे. तुम देर मत करना. कल बड़ा मजा आएगा,’ उधर से जितेश की आवाज आई.

‘‘ठीक है. मैं टाइम से पहुंच जाऊंगी,’’ इतना कह कर अनामिका ने फोन काट दिया.

अगले दिन अनामिका ने अपना पसंदीदा सूटसलवार पहना और ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट जा पहुंची. उस के सारे दोस्त पहले ही वहां आ गए थे.

‘‘विजय ने परमिशन दे दी यहां आने की?’’ जितेश ने चुटकी ली.

‘‘क्या मतलब?’’ अनामिका ने आंखें तरेरते हुए पूछा.

‘‘पहले अपनी रिजर्व्ड सीट पर बैठते हैं, लंच का और्डर करते हैं, फिर कुछ टांग खिंचाई करेंगे. क्यों, सही कहा न जितेश?’’ सोनिया ने एक आंख दबाते हुए कहा.

‘‘एकदम सही पकड़े हैं आप. आज हमारा टारगेट ही यह सूटसलवार वाली दबंग लड़की है, जो विजय के प्यार में ऐसी बावली हो गई है कि अपने दोस्तों को भी भूल गई है,’’ राहुल बोला.

अनामिका को कुछ समझ नहीं आया. उसे भूख लगी थी. वह बोली, ‘‘विजय पुराण बाद में बांच लेना, पहले कुछ पेट पूजा कर लेते हैं.’’

‘‘जो हुक्म हमारी राजदुलारी,’’ जितेश ने रैस्टोरैंट का मेन दरवाजा खोलते हुए कहा.

दरअसल, जब से अनामिका की विजय से गहरी दोस्ती हुई थी, तब से वह अपने पुराने दोस्तों से बिलकुल कट गई थी. जब भी वे अनामिका को मिलने के लिए कहते, तब अनामिका विजय के साथ होने की मजबूरी जाहिर करती. फोन पर अपने दोस्तों को सिर्फ विजय की अच्छाइयां ही बताती थी. इस बात से अनामिका के सारे दोस्त उकता गए थे.

आज जब अनामिका लंच पर आई तो सब को मौका मिल गया उस की खिंचाई करने का. सब से पहले सुरजीत ने ताना कसा, ‘‘वैसे आज सूरज जरूर पश्चिम से निकला होगा, तभी तो अनामिका आज बिना विजय के हमारे साथ यहां बैठी है.’’

‘‘अबे यार, क्यों इसे तंग कर रहा है. अगर विजय को पता चल गया तो इसे अभी यहां से ले जाएगा,’’ सोनिया बोली.

‘‘मेरा विजय है ही ऐसा. मेरी एक आवाज पर कुछ भी कर सकता है. दुनिया में वही मेरी सब से ज्यादा केयर करता है,’’ अनामिका राहुल की प्लेट में मंचूरियन राइस सर्व करते हुए बोली.

‘‘हां, मैं ने भी देखा है विजय को अच्छी तरह, मेरे 1,000 रुपए तो आज तक वापस नहीं किए… पर तेरे लिए वह दुनिया हिला सकता है,’’ जितेश ने कहा.

‘‘यह ज्यादा हो रहा है. अगर विजय ने तुम्हारे 1,000 वापस नहीं किए, तो मैं कर देती हूं, पर उस पर इतना बड़ा इलजाम तो मत लगा,’’ अनामिका झल्ला कर बोली.

‘‘तू इलजाम की बात करती है. विजय की पैरवी करने में तू उपराष्ट्रपति रह चुके जगदीप धनखड़ से भी आगे निकल चुकी है, जिन्हें हाल ही में अपनी सेहत का हवाला दे कर पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

‘‘कभी राजग सरकार के चहेते उपराष्ट्रपति रहे जगदीप घनखड़ पर अचानक ऐसी कौन सी गाज गिरी कि वे एकदम से एकांतवास में चले गए?’’ जितेश ने कहा.

‘‘तुम्हारा मतलब क्या है? मेरे और विजय के रिश्ते के बीच ये जगदीप धनखड़ अचानक कहां से आ गए? उन का हम सब से क्या लेनादेना?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘तुम्हारा रवैया हमें जगदीप धनखड़ की याद दिलाता है, जिन्होंने हमेशा राजग की हां में हां मिलाई. तुम भी विजय के मामले में ऐसा ही बरताव करती हो. पर जो हाल अब जगदीप धनखड़ का हुआ है, वह किसी से छिपा नहीं है,’’ सोनिया बोली.

‘‘ऐसा क्या हुआ है जगदीप धनखड़ के साथ?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘जगदीप धनखड़ ने सत्ता पक्ष राजग का हमेशा साथ दिया. उन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में ‘सैक्यूलरिज्म’ और ‘सोशलिज्म’ जैसे शब्दों को जोड़े जाने को ‘नासूर’ करार दिया था.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान साफ कहा था कि ‘संसद सब से ऊपर है’ और संविधान के मुताबिक कोई भी संस्था इस से ऊपर नहीं हो सकती है.

‘‘उन्होंने कहा था कि सब से ऊपर तो संसद ही है, उस से ऊपर कोई अथौरिटी नहीं है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि संसद में जो सांसद चुन कर आते हैं, वे आम जनता की नुमाइंदगी करते हैं. संसद ही सबकुछ होती है, इस से ऊपर कोई नहीं होता है.’’

‘‘तुम अनुच्छेद 142 वाली बात भी तो बताओ. चलो, रहने दो. मैं ही सुनाती हूं…’’ सोनिया ने कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद 142 को ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ की संज्ञा देते हुए कहा था कि हम ऐसे हालात नहीं बना सकते, जहां आप भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें और वह भी किस आधार पर?

‘‘संविधान के तहत आप के पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है. इस के लिए 5 या उस से ज्यादा जस्टिसों की जरूरत होती है.

‘‘हाल ही में जजों ने उपराष्ट्रपति को तकरीबन आदेश दे दिया और उसे कानून की तरह माना गया, जबकि वे संविधान की ताकत को भूल गए. अनुच्छेद 142 अब लोकतांत्रिक ताकत के खिलाफ एक ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ बन गया है, जो चौबीसों घंटे न्यायपालिका के पास उपलब्ध है.’’

‘‘जगदीप धनखड़ ने एक कार्यक्रम के दौरान सुनियोजित धर्मांतरण का आरोप लगाया और कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. उन्होंने कहा कि सनातन कभी विष नहीं फैलाता, सनातन स्वशक्तियों का संचार करता है. एक और संकेत दिया गया है जो बहुत खतरनाक है और देश की राजनीति को भी बदलने वाला है. यह नीतिगत तरीके से हो रहा है, संस्थागत तरीके से हो रहा है, सुनियोजित साजिश के तरीके से हो रहा है और वह है धर्म परिवर्तन.

‘‘उन्होंने आगे कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. वे समाज के कमजोर वर्गों को निशाना बनाते हैं. वे हमारे आदिवासी लोगों में ज्यादा घुसपैठ करते हैं. लालच देते हैं. हम एक नीति के रूप में संरचित तरीके से बहुत दर्दनाक धार्मिक रूपांतरण देख रहे हैं और यह हमारे मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है,’’ सुरजीत ने बताया.

अनामिका उन सब की बातें बड़ी ध्यान से सुन रही थी.

राहुल ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने मार्च, 2023 में शैक्षणिक संस्थानों और छात्र राजनीति पर बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि कुछ यूनिवर्सिटी देश विरोधी विचारधारा का अड्डा बन चुकी हैं. उन के इस बयान को जेएनयू और कुछ दूसरी केंद्रीय यूनिवर्सिटियों की ओर इशारा समझ गया था.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में रुकावट से ले कर बिना चर्चा के विधेयक पास होने के आरोपों तक, कई मुद्दों पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया था. उन्होंने खासतौर पर उन बड़े वकीलों पर निशाना साधा था, जो विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस की नुमाइंदगी करने वाले राज्यसभा सदस्य भी हैं.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना की थी, जिस में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की कौलेजियम सिस्टम को पलटने की कोशिश की गई थी.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की हाजिरी में दोनों सदनों द्वारा तकरीबन सर्वसम्मति से पास कानून को रद्द करने के लिए बड़ी अदालत पर सवाल उठाया था.

उन्होंने सांसदों की भी आलोचना करते हुए कहा था कि जब कानून को रद्द किया गया, तो सांसदों की तरफ से विरोध का एक स्वर तक नहीं उभरा,’’ सुरजीत ने जैसे जगदीप धनखड़ की एकतरफा राय की बखिया उधेड़ दी.

अनामिका थोड़ी देर तक चुप रही, फिर वह बोली, ‘‘ठीक है कि किसी उपराष्ट्रपति को अपने पद की गरिमा बना कर रखनी चाहिए. उन्हें सत्ता पक्ष का राग नहीं अलापना चाहिए. उन्हें विपक्ष की बातों का भी मान रखना चाहिए.

‘‘पर अब तो देश को नया उपराष्ट्रपति भी मिल गया है. राजग के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन देश के अगले उपराष्ट्रपति चुने गए हैं. मंगलवार, 9 सितंबर, 2025 को उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में उन के हक में कुल 452 वोट पड़े. कुल 767 सांसदों ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट दिया. इन में से 752 वैलिड थे और बाकी 15 अमान्य करार दिए गए.

‘‘सीपी राधाकृष्णन के सामने विपक्षी पार्टियों के साझा उम्मीदवार के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रह चुके बी. सुदर्शन रेड्डी चुनौती पेश कर रहे थे. बी. सुदर्शन रेड्डी को 300 फर्स्ट प्रैफरैंस वोट मिले और सीपी राधाकृष्णन को 452 वोट,’’ बताते हुए अनामिका ने अपना ज्ञान बघारा.

‘‘इस से ज्यादा बदलाव नहीं आएगा. ये भी जगदीप धनखड़ जैसे ही साबित होंगे. जब तक सरकार की राजी में राजी रखेंगे, तब तक इन्हें अच्छा ट्रीटमैंट मिलेगा, जब बागी सुर अपनाएंगे तो दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल दिए जाएंगे,’’ जितेश बोला.

‘‘तुम भी विजय का ऐसे ही राग अलापती हो. किसी दिन उस की खामियों पर अपनी राय देना, तब सारी असलियत सामने आ जाएगी,’’ सोनिया बोली.

‘‘यार, इतना भी शर्मिंदा मत करो. ठीक है, विजय मेरी जिंदगी में बहुत खास है, पर मैं उस की अंधी पैरवी नहीं करती. लेकिन अगर तुम्हें ऐसा लगता है, तो आज के बाद मैं ध्यान रखूंगी और सही को सही और गलत को गलत कहूंगी, चाहे मेरी और विजय की अनबन ही क्यों न हो जाए,’’ अनामिका बोली.

‘‘यह हुई न बात. अब आई अनामिका अपने पुराने रंग में. इसी बात पर आज के लंच का बिल अनामिका देगी,’’ राहुल बोला.

यह सुनते ही सब ने ठहाका लगा दिया. अनामिका सब को टेढ़ी निगाहों से देख रही है. उस ने अपनी हंसी रोक रखी थी. Hindi News Story

Hindi Family Story: रंग लौट आए

Hindi Family Story: इस समय गोवा के खुशनुमा मौसम को चार चांद लग रहे थे. हवाओं में खूबसूरत नमी सिमट रही थी. मानसून की पहली बारिश ने कितनी ही मटमैली हो गई चीजों से कैसीकैसी धूल की परतें मिटा कर उन की चमक वापस लौटा दी थी.

मिसाल के तौर पर गुलमोहर का दरख्त कितना चटख हरा लगने लगा था. इतना ही नहीं, रिमझिम के मधुर संगीत के साथ धरती अपनी प्यास पूरी तरह बुझा लेने को उतावली थी, मगर अभी बस रिमझिम ही चल रही थी. तेज बौछारों का आना तो अभी बाकी था.

इस रिमझिम के सुर में डूबे हुए नारियल के पेड़ तो जैसे इतराए जा रहे थे. उन के पास बशर्ते मीठा जल था, लेकिन बादलों का यह उपहार उन को दीवाना कर देता था.

नारियल के पेड़ सड़क के किनारे इतने अनुशासित खड़े थे, जैसे किसी प्राइमरी पाठशाला की सभा में सीधे खड़े विद्यार्थी. हवा और रिमझिम की संगत में नारियल के पेड़ दीवाने बन कर संगीत के दीवानों की तरह झूम रहे थे.

गोवा की राजधानी पणजी से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर कैंडोलिम बीच पर एक नौजवान इस रिम?िम में सराबोर हो कर लहरों का आनाजाना देख रहा था.

इस नौजवान का नाम रोशन है. वह साफसाफ महसूस कर रहा है कि गोवा राज्य के उत्तरी भाग में बने इस छोटे से शहर कैंडोलिम में इस बार गिनेचुने सैलानी ही आए हैं, जबकि यह गोवा के सब से लंबे समुद्री बीच में से एक है.

रोशन को इस बार यहां लगातार हो रही बरसात की वजह से कम सैलानी होने का कोई दुख नहीं हो रहा था. इस की वजह यह थी कि उस की कुछ महीने की पक्की कमाई कुछ दिन पहले ही हो गई थी. अब वह एकदम निश्चिंत था.

अब वे जमाने गए कि जब रोशन घबराया सा रहता था. रोज रात को एक रजिस्टर में अपनी कमाई का हिसाबकिताब लिखा करता था. डरता रहता था कि कल को क्या होगा. अब उसे कोई फिक्र नहीं.

मीठी रिमझिम की तो लगातार झड़ी लगी हुई थी. इस समय सुबह के 10 बजे थे और रोशन का मन सूरज की तरह खिलाखिला था. इस तरह खिले रहने की आदत बनाने में उस की पुरानी प्रेमिका झलक का बड़ा ही योगदान रहा था. वह हमेशा खुश ही रहती थी.

रिमझिम की हर रिमझिम में कमाल और धमाल था. चाहे माहवारी की वजह से पूरे बदन में भयंकर दर्द हो रहा हो, पेट और कमर पर बल पड़े हों, मगर रिमझिम भी न जाने कौन सी मिट्टी की बनी थी कि वह अपनी एक सांस से दर्द को खींच लेती, फिर दूसरी सांस से मुसकराना, खिलखिलाना शुरू कर देती.

रोशन ने ‘आल इज वैल’ का यह सूत्र झलक से ही पाया था. वह उस शाम को आज तक न भूला है. हंस कर कैसे बोली थी झलक, ‘‘ऐ रोशन, इधर देख तो. नजर मिला न. कैसी उदासी और कैसा सुबकना?

‘‘देखो, कुछ भी हो, मगर तुम मुझे भूलना मत. बस इसी तरह हमारा प्यार अमर रहेगा. शादी की दावत खा कर जाना. भूलना मत,’’ ऐसी सीख दे गई वह. उस भावुक दिन, जब अपनी शादी का कार्ड देने बुलाया था.

इसी तरह की बातें हुआ करती थीं झलक की. वह तो अपनेआप में अनोखी थी. शादी के एक महीने बाद जब मायके आई तो वह सीधा रोशन को मिलने आ गई. घबराए से रोशन की सम?ा में नहीं आ रहा था कि झलक इतनी बेखौफ हो भी कैसे सकती है.

‘‘ओहो, इस में खौफ की कौन सी बात है रोशन?’’ रोशन के दिल की बात पढ़ कर बोली थी झलक, ‘‘सुन अब, गौर से सुन, तुझे एक बढि़या सलाह देने आई हूं,’’ वह किलक कर बोली थी.

‘‘झलक, तू मुझ को सलाह देगी… ठीक है, पर शादी करने की सलाह तो बिलकुल मत ही देना मुझे,’’ रोशन ने बिदक कर कह दिया था.

‘‘अरे पगले, कभी नहीं. शादी तो बरबादी है रे. अगर मेरे बाप पर इतना कर्ज न होता तो मै भी कौन सा शादी कर के ससुराल जाने वाली थी. कतई नहीं. बिलकुल नहीं,’’ झलक की यह सच्ची और खरी सी यह बात सुन कर रोशन ने भी बस गरदन हिला दी थी. इस सच से तो वह एकदम वाकिफ था, इसीलिए तो झलक से आज भी खफा न था. उस से नफरत नहीं करता था.

रोशन को सब मालूम था कि सट्टे और जुए का शौकीन झलक का बाप कितना गलीज है. झलक का बाप इतना गिरा हुआ था कि तब भी झलक ने अपनी सोच मैली न होने दी. ऐसे बाप की इतनी समझदार औलाद थी झलक. इतना नीच और नशेड़ी कि हर किसी से रुपए उधार मांगता फिरता था. शरमलाज तो जैसे सब बेच कर खाई थी उस जानवर ने. कितनी जगह से कर्ज ले रखा था. सब से ज्यादा तो लिया था उस डोलम होटल वाले से.

डोलम होटल वाले का एक भाई था. उस ने झलक से शादी की जिद कर ली थी. डोलम होटल वाला तो ?ालक को जैसे कोई चीज समझ कर डील कर रहा था.

गरीब की बेटी सारे गांव की दिलरुबा झलक ने यह कड़वी हकीकत बहुत पहले ही निगल कर पचा ली थी, इसलिए उस को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता था. उस ने वैसे भी अपनी मनमरजी की छोटी सी जिंदगी 14 साल की उम्र से 19 साल की उम्र तक तबीयत से जी ली थी. अब 20 की उम्र में बाप के कर्ज के बदले बेटी बलिदान कर दी गई थी.

डोलम होटल वाले को लगता था कि मासूम और कोमल झलक उस के भाई की पत्नी बनने जा रही है, पर यह उस की नादानी ही थी.

दरअसल, रोशन और झलक पिछले कई महीने से एकदूजे के हो गए थे. एकदूसरे की बांहों में दोनों को सांस आती और फिर हर तरह के प्यार की प्यासी झलक तो रोशन को ही अपना सबकुछ मानती थी.

रोशन ही तो उस का मातापिता, सगा, बंधु, परिचित, रिश्तेदार था. पिछले साढ़े 5 साल से हर साल उस के साथ शादी की सालगिरह मनाती थी.

वे दोनों दुनिया के लिए भले ही कुंआरे थे, मगर उन दोनों को ही पता था कि वे एकदूजे के लिए पतिपत्नी थे. दोनों देर तक गोमती पुल के नीचे एक कोने में समोसा और जलेबी खाते हुए अपने होने वाले बेटाबेटी के नाम तय करते थे. नाटकनाटक में झगड़ा भी किया करते थे, ताकि पतिपत्नी जैसा अहसास कर सकें.

और आज वही झलक गोवा में किसी और के संग हनीमून मना कर मायके लौटी थी.

यह झलक भी गजब थी कि ‘रोशनरोशन’ करती हुई सीधा उसी से मिलने आ गई थी.

‘‘गोवा में तेरा यह सब सामान खूब बिकेगा. मैं ने देखा है वहां मछलीचावल खाते हुए. एक से बढ़ कर एक चीनी मिट्टी की प्लेट. तू तो लखनऊ से मुंबई जा और वहां से बस का किराया 520 रुपए. सीधा पणजी चला जा,’’ यही राय देने आई थी झलक.

रोशन का घर लखनऊ में था. उस के पिता चीनी मिट्टी के बरतन बनाते और बेचा करते थे. रोशन को भी इस काम में बहुत ही चाव था. वह महज 9 बरस की कच्ची उम्र में सब सीख गया था. चिकनी मिट्टी को गीला कर के कितना सुखाना है, उसे आकार देते समय कितना धीरज रखना है, कैसे पकाना है वगैरहवगैरह.

रोशन ने आगे पढ़ाई भी नहीं की. किसी तरह 10वीं कर पाया था. सबक याद ही नहीं होता था उस को.
‘‘जितनी देर में यह सबक याद होता है उतनी देर में तो मैं कितने बरतन बना लेता,’’ एक दिन रोशन ने अपने लंगोटिया यार पामू से कहा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कभी भी जल्दी नहीं. इस मिट्टी में कोई राज होता है. इसे हौलेहौले सामने आने दिया करो,’’ पामू उसे प्यार से समझाया करता.

पामू का परिवार भी चीनी मिट्टी के बरतन बनाया करता था. पामू भी तो इस काम को कुछ अलग ही ढंग से सीखने की कोशिश करता था, मगर कभी कुछ का कुछ बना देता, फिर कहता कि यह कलाकृति है. इस के पीछे एक सोच है.

मगर पामू के मातापिता को वह कलाकृति किधर से भी समझ नहीं आती थी. उसे वह एक तरफ रख कर अपने और्डर को पूरा करने लगते. उन को कप और प्लेट के बहुतायत में और्डर मिला करते थे.

पामू को कप और प्लेट के सिवा सबकुछ बनाने का मन करता. कभी मीनार, कभी टोपी, कभी गुटका तो कभी मुड़ा हुआ सांप. उस का दिमाग कुछ और ही किया करता था. खैर, वे तो पुराने दिन हो गए थे.

अब झलक की उस हौसलाअफजाई के बाद रोशन की आज की तसवीर एकदम अलहदा है.

28 साल के रोशन को अब इस जगह का सबकुछ मालूम था. वह सब जानतासमझता था. जिस गैस्ट हाउस में वह रहता था, उधर भी सब से जानपहचान हो गई थी.

गैस्ट हाउस में उस को ‘रोशन दादा’ कहने वाले कितने ही नौजवान थे. ज्यादातर तो हिमाचल प्रदेश के थे. सीधेसरल पहाड़ी नौजवान. मेहनती और सच्चे. इन के भरोसे ही यहां के ज्यादातर होटल चल पा रहे थे.

अब रोशन एक अलग ही उमंग में भरा हुआ है. वह 2 दिन बाद कार्निवाल के लिए जाने वाला है. कार्निवाल
की तैयारी का आलम इधर गजब ही रहता है. कितने तरह के तो बैंड आते हैं. देशीविदेशी पर्यटक बैंड की धुन पर खूब झूमते और नाचते हैं.

रोशन को तो कितनी बार यह भी लगता है कि कार्निवाल के चलते ही यहां की रंगत है. मगर फिर कितनी बार उस को लगता है कि इस के इतने सारे रंगबिंरगे तट हैं. इस वजह से गोवा एकदम खास है और अलग है.

रोशन के सोचने या न सोचने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था, मगर कैंडोलिम बीच पर कार्निवाल की धूम ने कुछेक सैलानियों को मस्ती के सागर में तैरा दिया था.

‘अरे… अरे…’ खुशी के मारे एकाएक रोशन की आंखें चौड़ी हो गईं. कार्निवाल में रोशन ने अचानक ही पामू को देखा.

‘‘पामू… पामू… ओ पामू… पहचाना?’’ रोशन चीख कर बोला.

‘‘ओह रोशन, मैं ने एक ही बार में पहचान लिया,’’ कह कर पामू बच्चों के जैसे खिलखिला उठा.

पामू इधर कुछ नया करने का सोच कर आया था, पर इतना भी नया कर न सका. रोशन जानता था कि उस का लंगोटिया यार पामू एक सच्चा कलाकार है. उस की मदद करनी चाहिए.

रोशन ने एक उपाय सोचा. उस की जेब में 10,000 रुपए थे. इस समय उसे बारबार झलक याद आ रही थी.

‘‘पामू, इस बार इधर कम सैलानी हैं. लेकिन फिक्र मत कर, तेरी कलाकृतियां यहां बिक जाएंगी. दिखाना तो कैसा सामान लाया है?’’ रोशन उत्सुक हो कर पूछने लगा.

पामू ने अपना बक्सा खोल कर दिखाया. रोशन ने गौर से देखा. कुछ काम तो कमाल का कर रखा था पामू ने. उस ने छोटेछोटे प्रतीक बना रखे थे.

‘‘ये किस सांचे में ढाल कर बनाए?’’ रोशन कुछ पेपरवेट देखने लगा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कोई भी सांचा नहीं है. अपनी कल्पना से ढाला है इन को. मगर यह तो सब को समझ नहीं आता है न,’’ कह कर पामू किसी गहरी सोच में डूब गया था.

‘‘पामू, तू इतने दिन इधर कैसे रहा? जब कमाई नहीं तो फिर रोटीपानी कैसे किया सब?’’

‘‘वह सब हो गया था.’’

‘‘कैसे मगर?’’ रोशन ने पूछा.

‘‘वह बस्तरिया बाजार है न, उधर गिटार बजाते हैं लड़के. उन के लिए नाचता था मैं, तो रोज का 200 रुपए हो जाता था. खाना वे ही देते थे, बस सोने का किसी न किसी जगह इंतजाम हो जाता था,’’ पामू ने हंस कर कहा.

वह आगे बोला, ‘‘2 दिन पहले ही इधर आया हूं. इधर होटल में किराया कम है न,’’ मगर ऐसा उस ने अपनी मजबूरी और परेशानी छिपाने के लिए कहा था. उस का यह अंदाज पुराना था और यह तो रोशन ने खूब भांप ही लिया था.

‘‘पामू, अभी तो शुरुआत है. मगर यहां कभीकभार ऐसे टूरिस्ट मिल जाते हैं, जो कलाकार को मुंहमांगी रकम देते हैं,’’ रोशन बोला.

‘‘हांहां, ऐसा हुआ है न मेरे साथ. 2 बार हुआ है. मुझे रुपया भी दिया और सैंडविच भी खिलाया, इसलिए तो मुझे भरोसा है,’’ पामू अब भी उम्मीद का दामन छोड़ना नहीं चाहता था.

‘‘कल मिलते हैं,’’ कह कर रोशन ने पामू से विदा ली.

रोशन झलक से फोन पर बात करता हुआ चला जा रहा था. ?ालक के ब्याह को अब 4 साल से भी ऊपर हो चले थे, इसलिए झलक अब एकदम बिंदास रहती थी. बच्चे उस ने पैदा किए नहीं. अपने तरीके से दिल से जिंदगी जीने लगी थी झलक.

रोशन ने बातों ही बातों में झलक को पामू की दशा का भी सच्चा हाल बयान कर दिया था. झलक ने इस बात को काफी गंभीरता से सुना.

झलक के साथ एक कमाल की बात हो गई थी. वह अब अपनी जिंदगी को खेल सम?ाने लगी थी. इसी खेलखेल में एक दिन झलक लौटरी के 50 टिकट खरीद कर ले आई. हर टिकट 500 रुपए का था. मगर कमाल की बात यह हुई कि 5 लाख का नकद इनाम झलक के नाम खुल गया. झलक की महिमा ही बढ़ गई.

मगर झलक भी ऐसी मजेदार कि उस ने एक रुपया तक न रखा. तथाकथित पति को ही सारे नोट थमा दिए. बस, उस घटना के बाद तो जैसे जादू ही हो गया था. अब ससुराल में झलक को कोई न रोकता था, न टोकता था.

झलक भी कोई बावली न थी कि पागलपंथी ही करने लगे. आचरण तो उस का संतुलित ही था, मगर अब वह अपने तरीके से बड़े फैसले लेने लग गई थी.

मिसाल के तौर पर झलक का देवर अपनी गर्लफ्रैंड को काठमांडू घुमाने ले जाना चाहता था. झलक ने उस की इस इच्छा का मान रखा. उस के पास पूरे 20 रुपए न थे, तो झलक ने उसे 20,000 रुपए दिए.

देवर झलक का मुरीद बन गया था. बात बाद में खुल गई थी. सारे परिवार को भी पता चल गया, मगर झलक पर किसी ने उंगली तक न उठाई. उस की पहली वजह यह कि झलक ने जो किया अपने परिवार के लिए किया. दूसरी और जोरदार वजह यह कि उसी गर्लफ्रैंड से देवर की सगाई और शादी भी हो गई थी.

अब देवरदेवरानी झलक की मुट्ठी में बंद थे, मगर झलक ने अपनी मुट्ठी कभी कस कर रखी ही नहीं.

इस बार रोशन की बात का मतलब महसूस कर झलक ने अपने तेज और बल का इस्तेमाल कर लिया. एक ही घंटे की चर्चा में देवरदेवरानी ने हां भर दी. गोवा जा कर और वहां का मुआयना कर के एक छोटा होटल खोलने की इच्छा बन गई उन की.

उसी रात को तीनों रवाना हो गए. झलक और देवरानी पीछे बैठे. आगे की सीट पर कार ड्राइवर और देवर. कार ड्राइवर भी इतना होशियार था कि उस ने तय समय से 4 घंटे पहले गोवा पहुंचा दिया.

कार्निवाल की धूम से सारा गोवा जवांजवां था. झलक अपने हनीमून के बाद अब आई थी, मगर कैंडोलिम
तो उस ने आज ही देखा था. रोशन से मुलाकात हो गई. खूब गपशप हुई.

इस दफा रोशन को यह वाली झलक कुछ अलगअलग सी लगी. मगर रोशन कुछ ही देर में सामान्य भी हो गया था, क्योंकि अब वह खुद भी पहले वाला रोशन तो था नहीं.

24 घंटे बाद देवरदेवरानी ने रोशन की मदद से कुछेक जगह बातचीत कर ली थी. एक बनाबनाया होटल मिल रहा था. थोड़ी मरम्मत की दर कार थी. उस की जिम्मेदारी रोशन ने उठा ली थी.

धीरेधीरे होटल की सजावट के लिए पामू को और्डर मिल गया था. पामू को तो जैसे मनचाही मुराद मिली, बिन मांगे मोती मिले.

रोशन ने पामू को ठीक से समझा दिया था. उस के लिए रहने और खाने का मुफ्त इंतजाम हो गया था. इस के अलावा टीम लगा कर कलाकृति बनाने का अलग से एडवांस मिल रहा था. इस तरह अब एक साल तक पामू को इधर ही काम करना था.

झलक ने पामू की जीवन नैया भी डगमग होने से बचा ली थी. इस डील को पक्का कर के यह तीनों अब लौट रहे थे. रोशन ने हाथ हिला कर वापस जाती झलक के चेहरे को गौर से देखा था.

रोशन को लगा जैसे उस की जन्मजन्मांतर की पत्नी झलक उस से कह रही है, ‘रोशन, तुम मुझे भी लौटा कर ले चलो. चलो, हम गोमती के पुल के नीचे बैठ कर समोसाजलेबी खाएं. अपनी वहीं बातें करें.’

रोशन का हिलता हुआ हाथ एकाएक रुक गया. उस के कान में झनझनाहट सी हुई. लगा, जैसे उस से कोई फुसफुसा कर कह रहा था. इस झलक ने रोशन की जिंदगी संवारने और अपनी बरबाद करने के लिए यह जन्म लिया है. Hindi Family Story

Hindi Funny Story: हनीमून की सनक

Hindi Funny Story: पिछले हफ्ते सब से छोटे बेटे की शादी ईएमआई पर निबटाते ही इधर मेरे मन में गंगा स्नान की भावना कुलांचें मारने लगी, तो उधर मेरी बीवी के मन में हनीमून पर जाने की.

सब से छोटे बेटे की शादी कर के लगा ज्यों गंगू तेली ने गृहस्थी का रण नहीं, बल्कि महारण जीत लिया हो. मैं अपने को सिकंदर से महान फील कर रहा था. हर शादीशुदा अपने घर में बच्चा पैदा होने पर उतना खुश नहीं होता जितना खुश वह उस का ब्याह हो जाने पर होता है.

बच्चों की शादियों से निबटीं तो एक दोपहर अचानक बीवी ने मेरे दिमाग पर भिनभिनाते हुए कहा, ‘‘सुनो जी…’’

‘‘अब क्या है?’’ मैं ने मिमियाते हुए पूछा तो वे बोलीं, ‘‘हे पतित देव, इस गृहस्थी में कदमकदम पर हम जहन्नुम तक गए, पर आज तक हनीमून पर नहीं गए. हनीमून में हुए बलिदानी कहते हैं कि शादी के बाद हनीमून पर गए बिना स्वर्ग नहीं जाया जाता.

‘‘बीतिकाल के कवि बीमारी लाल भी कह गए हैं कि हनीमून स्वर्ग का मारग है, जहां सयानप चालाकी सब सही. तहां झूठे चलै संग एक्स फ्रैंड के, जग जो कहै अब सो कही.’’

‘‘मतलब?’’ मैं दोबारा मिमियाया.

‘‘मतलब यह कि स्वर्ग का रास्ता हनीमून से हो कर जाता है. गृहस्थी में रहते बहुत नरक भोग लिया, अब…’’

अपनी पीठ पर पत्नी का सिर ढोते उस के मुख से ज्यों ही जहर से भी जहर वचन सुने तो मैं तो मैं, मेरी रूह तक कांप उठी. लगा, ज्यों उस में उस समय सोनम की आत्मा प्रवेश कर गई हो.

पर मैं राजा नहीं हूं भाई साहब… माना, मैं ने कदमकदम पर उस की हर इच्छा का खून किया है, ऐसे में अब कहीं इस ने किसी को मेरे नाम की सुपारी दे कर मेरा फाइनल खून कराने की तो नहीं सोची होगी? पर फिर सोचा कि अपनी मैरिज लव मैरिज तो है नहीं.

वैसे अंदर की बात कहूं सज्जनो, आजकल भाई लोगों से उतना डर नहीं लगता जितना डर नएनए तो छोडि़ए, 50 साल पुराने मुझ जैसे पतिपत्नियों को भी एकदूसरे से लग रहा है.

आह, क्या हनीमून जमाना आ गया भाई साहब. नहीं कहीं हनी, न कहीं मून. बस जिधर देखो, उधर खून ही खून.

मतलब, मेरा इधर का काम खत्म तो अब उधर का काम भी खत्म? आह रे गृहस्थी, तेरी यही कहानी. जिम्मेदारियां खत्म तो आत्मा हनीमूनयानी. लगता है, गृहस्थी की चक्की में पिसते मर्द की जरूरत परिवार को तभी तक रहती है जब तक उस के कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है. जैसे ही जिम्मेदारियां खत्म, वह काम का न काज का दुश्मन अनाज का.

आखिर मैं ने अपने को गुप्त हौसला देते हुए उसे समझा कर कहा, ‘‘देखो बेगम, जो अरेंज्ड मैरिज करते हैं, वे हनीमून पर नहीं जाया करते. वे हर शाम अपने से भी अपना मुंह छिपाते गलीसड़ी सब्जियां लाने सब्जी मंडी जाया करते हैं.

‘‘हनीमून जाने की तो छोड़ो, हम तो अब श्मशान घाट जाने लायक भी नहीं. अरेंज्ड मैरिज वालों के लिए हनीमून पर जाना पाप नहीं, महापाप होता है.

‘‘अरेंज्ड मैरिज वाले जो हनीमून पर जाते हैं तो वे मरने से पहले ही नरक को जाते हैं. हनीमून पर लव मैरिज करने वाले जाया करते हैं.

‘‘हनीमून पर जाना लव मैरिज वालों को ही शोभा देता है. हनीमून पर लव मैरिज करने वालों का ही एकाधिकार है. अरेंज्ड मैरिज करने वालों को ऐसी छिछोरी हरकत शोभा नहीं देती है.’’

हे मेरे समय के घोड़ी की लात खाने वाले अरेंज्ड विवाहितो, पता नहीं मैं कितना उन दिनों का बचाखुचा अरेंज्ड मैरिड खुशनसीब हूं जिन दिनों की शादियों में न फोटोग्राफर कदमकदम पर वरवधू को फेरे लगाने से रोका करता था और न ही शादी के तुरंत बाद हनीमून पर जाने के बाद मरवाए जाने की परंपरा थी.

उन दिनों शादी के तुरंत बाद हर शादीशुदा अपनी बीवी को दिल में लिए चार पैसे कमाने चुपचाप शहर चला जाया करता था और बीवी घर में बारहमासे गा कर पति की कमी को पूरा किया करती थी.

वैसे अब काबिलेगौर है यह कि मेरी जायज हरकत पर हरपल सोशल मीडिया के टच में रहने वाली मेरी परमादणीय बीवी अब मुझे हनीमून पर जाने के लिए उकसाने हेतु अगला क्या तीर चलाती है?

वैसे किसी भी वर्ग के परिवार की जिम्मेदारियां दुनियाभर के झूठ बोल, इधरउधर ठगी करने के बाद शायद ही कोई बाप होगा, जो स्वर्ग जाना नहीं चाहता होगा. Hindi Funny Story

Hindi Story: दूसरा मौका

Hindi Story: सदैव की प्रेमिका शीरी उस से उम्र में बड़ी थी और निचली जाति की भी. बड़ी मुश्किलों से उन की शादी हुई, पर ससुराल में शीरी को ज्यादा इज्जत नहीं मिली. बाद में वह औफिस में भी तरक्की करती गई, तो सदैव को यह बाद खटकने लगी. उस ने एक प्लान के तहत शीरी से शादी की थी. क्या था वह प्लान?

लखनऊ शहर के बाहरी छोर पर बना हुआ यह एक ओपन एयर रैस्टोरैंट था. ओपन एयर यानी सबकुछ खुला हुआ, यहां तक कि किचन में बनने वाली डिश को भी ग्राहक अपनी आंखों के सामने देख सकता था.

रैस्टोरैंट के बीच में अमलतास का एक पेड़ था, जिस के पीले रंग के फूल अपनी छठा बिखेर रहे थे. इस पेड़ के चारों तरफ कुरसियों और टेबलों को सजाया गया था और किनारे की क्यारियों में देशीविदेशी फूल लगे हुए थे.

एक किनारे पर आर्टिफिशियल झरना बना हुआ था, जिस से गिरता हुआ पानी आंखों को सुकून देता था. कभीकभी जब हवा का झौंका आता तो मिलेजुले फूलों की खुशबू फैल जाती. तब यहां बैठे प्रेमी जोड़ों का मन और भी रूमानी हो उठता था.

सदैव और शीरी ने किनारे वाली टेबल चुनी थी और दोनों अपने लिए मनपसंद चीजों का और्डर भी दे चुके थे. उन के यहां आने का मकसद सिर्फ टेस्टी खाना ही नहीं था, बल्कि अपने भविष्य के बारे में संजीदा बातें भी करना था.

सदैव और शीरी दोनों एक ही न्यूज चैनल ‘खबर तक’ में काम करते थे. सदैव एसोसिएट प्रोड्यूसर था, जबकि शीरी न्यूज रिपोर्टर थी.

साथ काम करतेकरते कब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया पता ही नहीं चला और दोनों एकदूसरे के प्यार को 4 साल तक ईमानदारी की कसौटी पर जांचतेपरखते रहे और फिर जब दोनों ने समझ लिया कि उन के प्यार का रंग पक्का है, जिस पर पानी की कोई बौछार कोई असर नहीं डालेगी, तब उन दोनों ने शादी के बंधन में बंध जाने का फैसला कर लिया.

पर सदैव और शीरी के लिए शादी की राह इतनी आसान नहीं हो जाने वाली थी. सदैव अभी 25 साल का था और शीरी 27 साल की. उन दोनों का अलगअलग जाति से होना भी समस्या था, क्योंकि सदैव ब्राह्मण कुल से था, जबकि शीरी लोहार जाति की थी.

सदैव साधारण मिडिल क्लास परिवार का था. उस के परिवार वालों ने सदैव को पढ़ाने के लिए बैंक से
लोन लिया था, जिसे वे कई सालों तक चुकाते रहे थे, दूसरी तरफ शीरी मिर्जापुर के एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखती थी.

शीरी के पापा एक मेकैनिकल वर्कशौप चलाते थे और तकरीबन 15 लोगों का स्टाफ था उन की वर्कशौप पर और इसी के सामने उन का आलीशान मकान बना हुआ था.

सदैव और शीरी दोनों जानते थे कि दूसरी जाति में शादी करना अब भी उतना आसान नहीं है, पर शीरी बहुत आशावादी लड़की थी. उस का मानना था कि अच्छा सोचने से अच्छा होता है, जबकि सदैव पर नैगेटिव सोच हावी रहती थी, क्योंकि जिस परिवार से वह ताल्लुक रखता था, वह परिवार भी छोटी सोच से अभी तक ऊपर नहीं उठ पाया था.

हालांकि, शीरी और सदैव ने जब शादी करने का फैसला किया था उस के बाद से शीरी अकसर ही सदैव की मां से, सदैव के दोस्त की हैसियत से फोन पर बात किया करती और उन का हालचाल लिया करती थी.

सदैव की मां भी बड़े प्यार से शीरी से बातें करती थीं, पर तब तक ही जब तक उन्हें यह नहीं पता चला कि उन का बेटा शीरी से शादी करना चाहता है.

‘‘क्या, अब उस लोहारिन से शादी करेगा तू, हमारा धर्म नष्ट कराएगा तू… नीच जाति की लड़की को घर लाएगा,’’ बम फूट गया था जैसे सदैव के घर में और कई बार बेटे और मातापिता में शादी को ले कर तीखी बहस भी हुई.

मिर्जापुर में जब शीरी ने फोन पर अपने मांबाप को उस की उम्र से छोटे और एक ब्राह्मण लड़के से शादी करने की बात बताई थी, तो उसे भी नाराजगी और गुस्सा ही झेलना पड़ा था.

शीरी के मांबाप ने खूब खरीखोटी सुनाई. उन्हें लोहार जाति का होने पर कोई अफसोस नहीं था और इसीलिए वे लोग चाहते थे कि शीरी अपनी जाति वाले किसी लड़के से ही शादी करे, ब्राह्मण जाति का लड़का उन्हें बिलकुल लुभा नहीं रहा था.

पर शीरी अपने मन और सदैव के प्यार के आगे मजबूर थी, सो उस ने अपने घर में साफ कर दिया था कि सदैव के अलावा वह किसी और से शादी नहीं करेगी.

‘‘तो क्या तुम अपनी ब्राह्मण सास से अपने लिए ‘लोहारिन’ और ‘छोटी जाति’ जैसे शब्द सुन पाओगी?’’

शीरी की मां ने कहा तो शीरी ने बदले जमाने और नई सोच का हवाला देते हुए कहा, ‘‘आप लोग अपने मन से कहानियां मत बनाओ. जहां तक सदैव के घर वालों की बात है तो सदैव उन्हें मना लेगा, पर पहले आप लोग तो मान जाओ.’’

सदैव ने भी अपने घर में अल्टीमेटम दे दिया था कि अगर उस की शादी शीरी से नहीं होगी तो वह खुदकुशी कर लेगा. उस की बात सुन कर मांबाप दोनों सन्न रह गए थे और बेटे की इस बात ने उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था.

दोनों परिवार आपस में मिले. उन लोगों की मुलाकात के समय काफी तनाव का माहौल था, पर दोनों परिवार ही अपने बच्चों की जिद के आगे मजबूर थे, इसलिए तमाम जद्दोजेहद और उठापटक के बाद बड़े बेमन से दोनों तरफ से शादी के लिए हां तो कर दी गई.

लेकिन सदैव के मांबाप चाहते थे कि शादी के कार्ड पर लड़की के नाम के आगे ‘विश्वकर्मा’ की जगह ‘शर्मा’ लिखवा दिया जाता तो ठीक रहता, क्योंकि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके में एक ब्राह्मण वर्ग शर्मा नामक सरनेम का इस्तेमाल करता है, जिस से ब्राह्मण परिवार की साख बनी रहती और रिश्तेदारी में लड़की के लोहार होने की बात दब जाती.

पर अपना सरनेम बदला जाना शीरी के मांबाप को कतई मंजूर नहीं हुआ और उन्होंने इस बात से साफ इनकार कर दिया.

इस बात पर सदैव ने भी नाराजगी जताई तो सदैव की शादीशुदा बहन रोमी ने बीच का रास्ता बताया कि वे लोग 2 तरह के कार्ड छपवाएं. एक पर ‘विश्वकर्मा’ सरनेम हो जो लड़की वालों का रियल सरनेम है, इसलिए वे कार्ड उन्हें दिखा दिए जाएं, जबकि जो कार्ड उन्हें अपनी रिश्तेदारी में बांटने हैं उस पर वे लोग ‘शर्मा’ सरनेम डलवा दें और इस कार्ड की भनक लड़की वालों को न दी जाए.

बहन की इस सलाह पर ही अमल किया गया और इसे बड़ी चालाकी से अंजाम दिया गया.

शादी के कर्मकांड में भी कई रुकावटें आईं, पर सदैव के पापा सब बातों को सुलझे दिमाग से संभालते गए और शीरी और सदैव की शादी हो गई.

सदैव और शीरी को शादी के बाद सदैव के पुश्तैनी घर यानी मनमीत नगर जाना था जो नोएडा से तकरीबन 550 किलोमीटर की दूरी पर तराई इलाके में बसा हुआ था.

शीरी ने कार में बैठेबैठे ही सदैव के मकान पर नजर डाली जो एक छोटा सा साधारण मकान था. अंदर जा कर देखने पर भी घर और घर के लोग सामान्य से ही लगे, पर इस से शीरी को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि उसे तो कुछ दिन यहां रुकने के बाद वापस नोएडा अपने 3 बीएचके के फ्लैट में ही जाना था, जिसे सदैव ने किराए पर ले रखा है.

पहलेपहल ही शीरी का स्वागत अच्छा नहीं हुआ. उस को लंबा घूंघट न करने के लिए डांट पड़ी और किचन में घुसने को मना कर दिया गया, जबकि शीरी पहले से ही इन सब बातों के लिए तैयार थी.

शीरी किसी आदर्श बहू की तरह रोज सुबह 5 बजे जाग जाती और घर का झाड़ूपोंछा करने के बाद नहाती, फिर नाश्ते की तैयारी करने लगती, जबकि घर के सभी लोग तब तक सोते ही रहते. सास के जागने के बाद वह उन्हें रात की भीगी हुई मेथी का पानी देती और ससुर को अंकुरित स्प्राउट, जबकि देवर का नाश्ता रोज बदल कर देने का फरमान था सास का, सो देवर के लिए रोज इंटरनैट से देख कर नया नाश्ता बना देती.

‘‘ये चावल किस ने पकाए हैं? जरूर शीरी भाभी ने पकाए होंगे,’’ किचन में ननद की आवाज गूंज रही थी.
पर शीरी ने बिना सब्र खोए कहा, ‘‘दीदी, अगर आप को दूसरे चावल खाने हैं, तो मैं दोबारा पका देती हूं.’’

इस बात के बदले में ननद से कुछ न बोला गया. वह किचन से बाहर पैर पटकती चली गई.

जब तक शीरी अपनी ससुराल में रही, तब तक कोई ऐसा दिन नहीं गया होगा कि उस के काम में कोई कमी नहीं निकाली गई हो.

पर फिर भी शीरी अपनी जबान को दांतों तले दबाए रही और किसी के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा.

आज शीरी और सदैव को नोएडा अपने काम पर लौटना था, इसलिए शीरी किसी विजेता की तरह नोएडा वापस आ रही थी. दोनों ने वापस आ कर औफिस जौइन कर लिया था.

अपनी शादी से पहले शीरी ने कश्मीर में हुए एक आतंकी हमले के दौरान तमाम खतरों के बीच जा कर बहुत शानदार रिपोर्टिंग की थी. आज काम पर लौटते ही उस के क्रिएटिव हैड ने अपने केबिन में बुला कर उसे शादी की बधाई देने के बाद शाबाशी दी और साथ ही उस की बेहतर और बेबाक रिपोर्टिंग के लिए उसे ‘न्यूज स्टार’ नामक अवार्ड मिलने की बधाई भी दी.

शीरी ने तुरंत ही यह बात बताने के लिए सदैव को फोन लगाया तो उस ने फोन काट दिया. उस की किसी गलती पर बौस ने उसे डांटा था. शाम को भी वह अनमना सा था.

‘‘यह सब होता रहता है,’’ शीरी ने कहा तो सदैव को बुरा लग गया.

‘‘तुम्हें तो अवार्ड दिया जा रहा है, इसलिए तुम खुश हो,’’ सदैव ने झंझलाते हुए कहा.

सदैव का यह रूप देख कर शीरी ने शांत हो जाना ही ठीक समझा. अगले 2-3 दिन तक घर का माहौल काफी बोझिल सा रहा.

अगले दिन सदैव ने शीरी से अपनी मंशा जाहिर कर दी कि उन के फ्लैट का किराया बहुत ज्यादा जाता है, तो क्यों न वे कोई फ्लैट खरीद लें. शीरी को इस में कोई बुराई नहीं नजर आई.

सदैव और शीरी ने अपने अपार्टमैंट्स से कुछ दूरी पर बने ‘शालीमार अपार्टमैंट्स’ में एक फ्लैट बुक कर दिया और 50 फीसदी रकम का भुगतान कर के बाकी पैसों की मासिक किस्त बनवा ली. शीरी ने अपनी सैलेरी से ईएमआई का पेमेंट करना स्वीकार कर लिया था.

कुछ दिनों के बाद ही शीरी ने अंबेडकरनगर में जा कर गरीब बच्चों के दुखदर्द को सामने लाने के लिए रिपोर्टिंग की, जिस की खूब तारीफ हुई और अब स्टाफ के लोगों को लगने लगा था कि हो न हो बहुत जल्दी ही शीरी को उस के लगातार अच्छे काम के लिए प्रमोशन दिया जाएगा.

और हुआ भी वही, शीरी को प्रमोट कर दिया गया, जबकि सदैव का साधारण सा इन्क्रीमेंट ही किया गया.
शाम को जब सदैव घर आया तो चाय पीते समय काफी गुस्से में लग रहा था और बौस और मैनेजमैंट के भेदभाव वाले रवैए के बारे में अनापशनाप बोल रहा था.

कहीं न कहीं सदैव के मुंह से यह बात भी निकल गई कि शीरी का अवार्ड और प्रमोशन उस के लड़की होने के चलते है, क्योंकि लड़कियों के लिए बहुत सारी चीजें पाना आसान हो जाता है. बौस लोग लड़कियों को पसंद करते हैं और उन्हें आगे बढ़ाने से उन का भी उल्लू सीधा होता है.

‘‘उल्लू सीधा होने से क्या मतलब है सदैव? तुम भी मेहनत करो तो तुम भी आगे बढ़ सकोगे,’’ शीरी का सब्र जवाब दे रहा था, इसलिए उस ने सवाल किया.

‘‘अरे, यह बात तुम अच्छी तरह समझती हो. अब भला उस अंबेडकरनगर वाली रिपोर्टिंग में तो ऐसी कोई खास बात नहीं थी, जिस के लिए वाहवाही की जाए.

‘‘पर आजकल तो दलित जाति के लिए दो हमदर्दी भरे शब्द बोल कर कोई भी लाइमलाइट में आ सकता है,’’ सदैव गुस्से में बक रहा था.

कितना जहर भरा था सदैव के मन और उस की बातों में, यह शीरी को अब धीरेधीरे पता चल रहा था, पर उस के पास सदैव के इस बरताव पर सिर्फ अवाक और दुखी होने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.

4 महीने बीत चुके थे और इन्हीं खट्टीमीठी बातों के बीच शीरी को पता चला कि वह पेट से है. तुरंत ही उस ने यह खबर सदैव को सुनाई.

बाप बनने की खबर सुन कर सदैव भी खुशी से फूला नहीं समाया और शीरी ने जल्द ही अपनी मां को फोन लगा कर यह खुशखबरी सुना दी.

मां ने ढेर सारी सावधानियां रखने की ताकीद करनी शुरू कर दी, जबकि अभी तो शीरी का पेट से होना शुरुआती दौर में था.

7 महीने हो गए और अब शीरी को औफिस से मैटरनिटी लीव ले कर घर पर ही रहना था.

एक दिन शीरी ने कहा, ‘‘सासू मां यहां आ जातीं, तो ठीक रहता.’’

इस बात पर सदैव ने भी रजामंदी जताई और अपनी मां को नोएडा आ कर रहने को कहा, पर उसे अपनी मां की तरफ से कड़वे शब्द ही सुनने को मिले, ‘‘तो तू क्या चाहता है कि अब मैं आ कर तेरी बीवी की सेवा करूं और जब उस का बच्चा हो तो नौकरानी की तरह काम करूं?’’

सदैव समझ गया था कि उस की मां नोएडा नहीं आएंगी, इसलिए उस ने शीरी से मिर्जापुर से अपनी मां को ही बुला लेने को कहा.

शीरी ने अपनी मां को बुला लिया और उस की मां ने आते ही किचन और शीरी की देखभाल का जिम्मा संभाल लिया.

समय आने पर शीरी ने एक खूबसूरत सी बेटी को जन्म दिया. सदैव बहुत खुश हुआ, पर उस की मां और पापा की तरफ से कड़वे शब्द ही आए कि ‘एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा. ऊंचे कुल की लड़की से शादी करता तो लड़का पैदा होता. इस ने तो लड़की पैदा कर के रख दी है. और करो नीची जाति की लड़की से शादी’.

सदैव को अपने मांबाप से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी, पर अब तो शीरी से शादी कर के वह भी जैसे परेशान ही हो रहा था.

औफिस में शीरी का बढ़ता हुआ कद और फिर लड़की पैदा होने पर अपने घर वालों द्वारा कोसे जाने से तो सदैव परेशान था ही कि इसी समय एक घटना और हो गई.

शीरी के चचेरे भाई हर्ष का उस की पत्नी से घरेलू विवाद के चलते तलाक हो गया, जिस के चलते शीरी परेशान थी, तो सदैव ने कहा, ‘‘तलाक के मामले हम लोगों में बहुत कम होते हैं, जबकि तुम लोगों में तो बातबात में तलाक हो जाता है.’’

सदैव की इस बात पर शीरी ने एतराज जताते हुए ‘हम लोग’ और ‘तुम लोग’ जैसे शब्दों का मतलब पूछा, जिस पर सदैव ने ‘हम लोग’ का मतलब ऊंची जाति और ‘तुम लोग’ का मतलब नीची जाति बताया.

शीरी को सम?ा में आ रहा था कि सदैव भले ही अच्छी नौकरी कर रहा था, देखने में भी अच्छा था, पर उस की सोच बहुत छोटी थी और वह उस सोच से ऊपर भी नहीं बढ़ पा रहा था.

न जाने कितनी बार शीरी ने सदैव से कहा कि अगर उसे औफिस में तरक्की नहीं मिल पा रही है, तो उसे किसी दूसरे चैनल में नौकरी करनी चाहिए, पर सदैव तो जहां था वहीं पड़े रहना चाहता था, उलटे शीरी की ये बातें उसे बुरी लग जाती थीं, तो वह उस से सीधे मुंह बात नहीं करता था.

2 दिन बाद शीरी का बर्थडे था. शीरी बहुत खुश थी, पर सदैव के चेहरे पर खुशी का कोई नामोनिशान नहीं था. हालांकि, उस ने बेमन से शीरी को विश जरूर किया और औफिस के लिए निकल गया.

शाम को सदैव जल्दी नहीं आया तो पूछने पर उस ने बताया कि वह औफिस में बिजी है. सदैव रात के 10 बजे घर आया. उस ने शराब पी हुई थी. वह सीधा अपने कमरे में चला गया. उस के इस बरताव पर शीरी का सब्र जवाब दे गया था.

शीरी ने सदैव से बात शुरू की, ‘‘मैं ने तो अपनी जाति और अपनी उम्र नहीं छिपाई थी. तुम्हारे परिवार से जो भी दर्द मिला, वह भी मैं ने सब हंस कर सहा, पर शादी के बाद तुम्हारे बरताव और प्यार में जमीनआसमान का फर्क क्यों आया?’’

शीरी आज सबकुछ साफ कर लेना चाहती थी. सदैव ने भी लड़खड़ाती जबान में उसे जवाब दिया, ‘‘दरअसल, तुम से शादी करना मेरा एक कैलकुलेशन था.

‘‘कैसा कैलकुलेशन?’’ शीरी ने पूछा, जिस के बदले में सदैव ने जो बताया उसे सुन कर शीरी चौंक गई थी.

सदैव ने नशे की झांक में शीरी को बताया कि उस ने शीरी से शादी सिर्फ इसलिए की है, क्योंकि आमतौर पर उस जैसी अमीर लड़की से उस की शादी नहीं हो पाती, वह नोएडा में कभी अपना फ्लैट नहीं खरीद पाता. मतलब, सदैव ने शीरी के परिवार के रुतबे और पैसे को देखते हुए सोचासमझा जाल बिछाया और शीरी से शादी की.

शीरी की समझ में आ रहा था कि उस ने सदैव से शादी कर के भारी भूल कर दी है. उस ने तो सदैव से प्यार किया था पर सदैव ने उसे अपना झूठा चेहरा ही दिखाया था.

लेकिन आज सदैव शराब के नशे में था, इसलिए न चाहते हुए भी उस की जबान चल रही थी, ‘‘और सच कहूं तो मुझे लगता है कि यह बच्चा मेरा नहीं है. मुझे तुम्हारे उस कलीग आशु पर शक है. आखिर वह भी तो छोटी जाति काही है.’’

सदैव ने यह बात कह कर एक हिचकी ली, पर उस के इन शब्दों ने मानो शीरी के कानों में पिघला सीसा उड़ेल दिया था. उसे लगा कि अपने गुस्से को संभालने में उस के शरीर का सारा जोर लगा जा रहा है.

शीरी के नथुने फड़कने लगे थे और पीछे खड़ी उस की मां की आंखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे.

‘‘मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मुझ से तुम को समझने में भूल हो गई,’’ शीरी यह कहते हुए उठ खड़ी हुई थी.

अगली सुबह ही शीरी ने सदैव के खिलाफ घरेलू हिंसा और दिमागीतौर पर परेशान का केस दायर कर दिया और सदैव के पास तलाक के कागजात भिजवा दिए.

पहले तो सदैव ने इस बात को हलके में लिया, पर जब उसे लगातार कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े और केस और वकीलों का खर्चा उठाना पड़ा, तो उस की जेब जवाब देने लगी. अभी तो उसे शीरी का खर्चा देना था और अपनी बेटी को हर महीने तय रकम भी देनी थी… और अब तो उस के हाथ से उस का फ्लैट भी निकल जाएगा.

सदैव ने शीरी से माफी मांग कर समझौता करना चाहा, पर शीरी अपने फैसले पर अडिग थी.

‘‘मैं ने तुम्हें समझने में पहली बार तो भूल कर दी थी, पर दूसरी बार भूल नहीं करूंगी. बड़ी मुश्किल से दूसरा मौका मिला है अपनी जिंदगी को संवारने का,’’ शीरी के चेहरे पर कठोर भाव थे.

शीरी ने ठीक मौके पर सदैव को पहचान लिया था, जिस ने प्रेम का जाल सिर्फ इसलिए फैलाया ताकि शीरी जैसी अमीर लड़की को अपनी पत्नी बना कर उस के पैसे पर ऐश कर सके.

जाति और ऊंचनीच के ढेर में पड़े हुए सदैव को तलाक दे कर शीरी ने खुद की जिंदगी को दूसरा मौका दिया था. Hindi Story

Story In Hindi: 2 नाव की सवारी

Story In Hindi: इम्तियाज की शादी शकीला से बड़ी धूमधाम से हुई थी. शकीला भी कोई ऐसेवैसे घर की लड़की नहीं थी, बल्कि एक अच्छे परिवार की पढ़ीलिखी लड़की थी. भले ही उस का रंग सांवला था, पर उस के चेहरे पर एक अजीब सी कशिश थी.

लंबे डीलडौल की और ऊंची उठी हुई छातियों की मलिका होने के साथसाथ शकीला की आवाज भी बड़ी मधुर थी. उस के काले घनेलंबे बालों का तो कहना ही क्या था.

बायोलौजी में बीएससी कर शकीला ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्च खुद उठाने के काबिल थी.

इम्तियाज मुंबई के सांताक्रूज इलाके में शकीला के साथ अकेला रहता था. दोनों में बहुत गहरा प्यार था. शकीला इम्तियाज पर जान छिड़कती थी, क्योंकि इम्तियाज भी शकीला के घर के कामों में काफी मदद करता था और उस की हर खुशी का खूब खयाल रखता था.

इम्तियाज एक सौफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन खूबसूरत लड़की देख कर अकसर उस का दिल मचलने लगता था.

शकीला जब पेट हुई तो उस की अम्मी ने शकीला की देखभाल के लिए अपनी छोटी बेटी सानिया को उस के घर भेज दिया.

डिलीवरी होने में अभी एक हफ्ता बाकी था. सानिया ने पहले ही आ कर शकीला के घर की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाल ली थी और अपनी बहन शकीला को आराम देने में पूरी मदद करने लगी थी.

इम्तियाज ने जब शकीला की बहन सानिया को देखा तो उस का दिल मचलने लगा और वह उसे पाने के सपने संजोने लगा.

सानिया बला की खूबसूरत थी. एकदम गोरीचिट्टी, बड़ीबड़ी आंखें, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल और मदमस्त उठी हुई छातियां देख कर इम्तियाज तो उस का ऐसा दीवाना हुआ कि बस उसे पाने के लिए जुगत भिड़ाने लगा.

कुछ दिनों बाद शकीला ने आपरेशन के जरीए एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया. इस वजह से शकीला को एक हफ्ते तक अस्पताल में भरती रहने को कहा गया.

इम्तियाज ने औफिस से छुट्टी ले ली और शकीला और बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करने लगा.

2 दिन तक इम्तियाज ढंग से सो नहीं पाया, तो शकीला बोली, ‘‘आप आज रात घर पर जा कर आराम कर लो. वैसे भी सानिया घर में अकेली है.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘ठीक है, मैं थोड़ा आराम कर के सवेरे जल्दी आ जाऊंगा. तुम अपना खयाल रखना.’’

देर रात घर पहुंच कर इम्तियाज ने डोरबैल बजाई तो सानिया नींद से उठती हुई दरवाजा खोलने आई.

सानिया ने जैसे ही दरवाजा खोला, उस की उभरी हुई छातियां देख कर इम्तियाज के मन में हलचल मचने लगी.

इम्तियाज सानिया से बोला, ‘‘मैं काफी थका हुआ हूं. थोड़ा आराम कर के मुझे सुबह 4 बजे जल्दी अस्पताल जाना है. अगर मेरी आंख नहीं खुली, तो मुझे 4 बजे उठा देना.’’

सानिया ने कहा, ‘‘ठीक है जीजाजी, आप आराम करो. मैं आप को 4 बजे उठा दूंगी,’’ और फिर वह ड्राइंगरूम में ही अपने बिस्तर पर लेट गई.

इम्तियाज बाथरूम जा कर फ्रैश होने लगा. जब वह बाथरूम से निकला, तो ड्राइंगरूम में सानिया को लेटे देख कर उस का मन डोलने लगा.

इम्तियाज काफी देर तक सानिया को यों ही निहारता रहा, फिर धीरे से उस के करीब जा कर उस ने सानिया के उभारों पर अपना हाथ रख दिया और उन्हें सहलाने लगा.

सानिया चौंक कर उठ गई और अपने जीजा से अलग होते हुए बोली, ‘‘यह आप क्या कर रहे हो…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘कुछ नहीं. मै देख रहा हूं कि तुम्हारे इस संगमरमरी बदन को कुदरत ने बड़ी फुरसत से बनाया है. मैं इसे चूमना चाहता हूं. तुम्हारे इस दूधिया बदन से प्यार करना चाहता हूं.’’

सानिया बोली, ‘‘आप को शर्म नहीं आती जीजाजी… आप मेरी सगी बहन के शौहर हैं और आप उन्हें कैसे धोखा दे सकते हैं…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘मैं शकीला को धोखा नहीं दे रहा हूं. मैं तो बस तुम्हारे साथ कुछ समय गुजारना चाहता हूं.’’

‘‘यह गलत है. आप मुझ से दूर हो जाओ. मैं अपनी बहन को धोखा नहीं दे सकती,’’ सानिया ने कहा.

‘‘पर मैं तो तुम दोनों को ही अपने साथ जिंदगीभर रखना चाहता हूं,’’ कहते हुए इम्तियाज ने सानिया के रसभरे गुलाबी होंठों को चूमना शुरू कर दिया.

सानिया इम्तियाज से अलग होने के लिए छटपटाने लगी कि तभी इम्तियाज ने उस के उभारों पर अपना हाथ फेरना शुरू कर दिया.

थोड़ी सी नानुकर के बाद सानिया सिसकियां भरने लगी. वह इम्तियाज को अपने ऊपर खींचने लगी, तो इम्तियाज को यह समझते देर न लगी कि सानिया गरम हो चुकी है.

इम्तियाज ने सानिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसे प्यार करने लगा. सानिया भी अब पूरा मजा लेने लगी. कुछ देर तक वे दोनों यों ही एकदूसरे के जिस्म से खेलते रहे, फिर चरमसुख पर पहुंच कर अलग हो गए.

सानिया मुसकराते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप ने तो मुझे वह खुशी दी है, जिस की मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. अब मैं आप के बिना नहीं रह सकती. यह खुशी मुझे आप से बारबार चाहिए.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. तुम्हारा जब भी दिल करेगा, मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगा.’’

सानिया ने कहा, ‘‘पर जब कुछ दिनों के बाद मैं यहां से चली जाऊंगी, तब आप मुझे यह खुशी कैसे दोगे?’’

इम्तियाज बोला, ‘‘हम दोनों शादी कर लेंगे, क्योंकि मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

सानिया ने सवाल किया, ‘‘यह कैसे हो सकता है? मैं अपनी ही बहन का घर नहीं उजाड़ सकती.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. जब तक हम दोनों को शादी करने का मौका नहीं मिलता, हम यों ही एकदूसरे के जिस्म की जरूरत पूरी करते रहेंगे.’’

तभी 4 बज गए. इम्तियाज जल्दी से उठा और फ्रैश हो कर अस्पताल की तरफ भागा.

अस्पताल पहुंच कर इम्तियाज ने देखा कि शकीला गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उस के माथे को चूमा तो उस की आंख खुल गई.

शकीला ने इम्तियाज का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘आ गए आप. मेरी वजह से आप को कितनी तकलीफ हो रही है. आप को बिलकुल भी आराम नहीं मिल रहा है. मैं कितनी खुशनसीब हूं, जो आप जैसा शौहर मुझे मिला.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘खुशनसीब तो मैं हूं जो तुम्हारे जैसी मुहब्बत करने वाली बीवी मुझे मिली है और जिस ने मुझे बाप बनने का नसीब अता किया है. साथ ही, तुम मुझे दिलोजान से प्यार करती हो.’’

शकीला ने कहा, ‘‘आप भी बस कुछ भी बोल देते हो. आप खुद मुझे इतना प्यार देते हो, उस के सामने मेरा प्यार तो कुछ भी नहीं.’’

इस तरह इम्तियाज दो नाव की सवारी करने लगा. उसे जब भी मौका मिलता, वह सानिया के जिस्म के मजे लूटता.

फिर एक दिन ऐसा भी आया जब इम्तियाज की असलियत सब के सामने आ गई.

हुआ यों कि शकीला के घर आने के बाद काफी दिनों तक इम्तियाज को सानिया से मिलने का मौका नहीं मिला, तो एक रात जब शकीला गहरी नींद में सो गई तो इम्तियाज चुपके से उठा और सानिया के कमरे में चला गया.

सानिया पहले तो इम्तियाज को अपने कमरे में देख कर घबरा गई, पर जब इम्तियाज ने उसे अपनी बांहों में पकड़ कर चूमना शुरू किया, तो उस के भी सब्र का बांध टूट गया और उस ने अपनेआप को इम्तियाज के हवाले कर दिया.

इसी बीच अचानक शकीला की आंख खुल गई. आवाज सुन कर जब वह सानिया के कमरे में पहुंची तो इम्तियाज और सानिया का जिस्मानी खेल देख कर उस के होश उड़ गए.

शकीला ने चीख कर इम्तियाज को कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती… अपनी बीवी के होते हुए किसी दूसरी लड़की के साथ यह हरकत करते हुए… मैं तुम्हें एक शरीफ इनसान सम?ाती थी, पर तुम तो एकदम घटिया निकले.

‘‘मैं ने तुम पर आंख मूंद कर भरोसा किया और तुम ने मेरी ही छोटी बहन को अपने जाल में फंसा लिया.’’
इम्तियाज बोला, ‘‘मेरी बात तो सुनो मेरी जान.’’

शकीला ने कहा, ‘‘अब क्या रह गया सुनने को. मैं तो तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहती. मुझे नफरत है ऐसे मर्दों से जो अपनी बीवी को धोखा देते हैं.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘मैं तुम से भी प्यार करता हूं और सानिया से भी. मैं वादा करता हूं कि तुम दोनों का बहुत खयाल रखूंगा. मैं सानिया से भी निकाह कर के उसे अपने साथ रखूंगा. तुम मुझे सानिया दे दो, मैं तुम्हारे पैर चूमूंगा.’’

शकीला ने इम्तियाज के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘बेशर्म इनसान, तुझे शर्म नहीं आती अपनी बीवी के सामने ही उस की छोटी बहन से निकाह करने को कहने की. तू ने ऐसा सोच भी कैसे लिया…

‘‘मैं जा रही हूं अपने बेटे को ले कर तुम्हारी जिंदगी से दूर. मैं इस पर तुम जैसे घटिया बाप का साया भी नहीं पड़ने देना चाहती.’’

डरीसहमी सानिया ने भी अपना सामान पैक किया और शकीला के साथ चलने को तैयार हो गई.

इम्तियाज अपने किए पर पछता रहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आइंदा ऐसा कोई काम नहीं करूंगा जिस से तुम्हारा दिल दुखे.’’

शकीला ने कहा, ‘‘मैं अब तुम्हें ऐसा मौका कभी नहीं दूंगी. मेरा तो दिल टूट चुका है तुम्हारी इस हरकत से. तुम ने क्या सोचा था कि एकसाथ दो नाव में सवारी कर के जिंदगी का मजा ले लोगे… यही हरकत अगर मैं करती तो तुम मुझे बदचलन कहते और दुनियाभर के इलजाम लगाते.

‘‘मैं उन औरतों में से नहीं हूं जो अपने शौहर के जुल्म को बरदाश्त करती है. मैं अगर इज्जत देना जानती हूं, तो सामने वाले से भी इज्जत ही चाहती हूं.

‘‘तुम्हें यह घमंड था कि दोनों बहनों से निकाह कर के उन के जिस्म से खेलते रहोगे और तुम्हें कोई रोकेगा भी नहीं. मैं आज के बाद तुम्हारी सूरत भी नहीं देखूंगी. तुम्हें तलाक का नोटिस मिल जाएगा. अब मैं तुम्हारे साथ एकपल भी नहीं रह सकती.’’

इस तरह शकीला ने इम्तियाज से तलाक ले लिया और जो थप्पड़ उस ने इम्तियाज के मुंह पर मारा, उस का असर इम्तियाज के दिल और जिंदगी पर भी एक गहरी छाप छोड़ गया.

इम्तियाज के दो नाव में सवारी करने के चक्कर में उस के हाथ से सानिया तो गई ही, उसे अपनी बीवी शकीला और बेटे से भी हाथ धोना पड़ा.

शकीला ने अपने शौहर को छोड़ कर यह साबित कर दिया कि औरत किसी से कम नहीं होती. हमें गर्व है शकीला जैसी औरतों पर. Story In Hindi

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