रेटिंग: दो स्टार

सईद अख्तर मिर्जा की 1980 में प्रदर्शित सर्वाधिक चर्चित व कल्ट फिल्म ‘‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’’ पर उसी नाम से बनी यह रीमेक फिल्म 1980 की फिल्म के मुकाबले बहुत ही घटिया है.

फिल्म ‘‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’’ शुरू होती है सड़क पर अपने स्कूटर पर बैठकर जा रहे अल्बर्ट पिंटो (मानव कौल) से. कुछ दूर जाने के बाद सड़क पर  अंडरवर्ल्ड के साटम का खास आदमी नायर (सौरभ शुक्ला) जीप लेकर अल्बर्ट पिंटो को मिलता है. अल्बर्ट पिंटो अपना स्कूटर छोड़कर उसकी जीप में सवार हो जाता है. नायर उसे एक बंदूक देता है. अब यह दोनों मुंबई से गोवा जा रहे हैं. गोवा में सूर्यकांत और जगताप की हत्या अल्बर्ट पिंटो को करनी है. मुंबई से गोवा पहुंचने से पहले रास्ते में कई जगह यह दोनो रूकते हैं, ढाबे पर खाना खाते हैं, बिअर पीते हैं, आपस में कई तरह की बाते करते हैं.

इस बात का भी खुलासा होता है कि हाईवे पर चल रहे ढाबों में खानपान के साथ ही वेश्यागीरी व समलैंगिकता का धंधा भी धड़ल्ले से चल रहा है. गोवा पहुंचने से पहले बीच बीच में अबर्ट पिंटो अतीत में जाता रहता है, जिससे धीरे धीरे पता चलता है कि अल्बर्ट पिंटो की अभी तक शादी नहीं हुई है. उसकी प्रेमिका स्टेला (नंदिता दास) है. वह स्टेला के साथ ही रहता है. स्टेला का भाई व पिता, अल्बर्ट पिंटों को पसंद नहीं करते. अल्बर्ट पिंटो के पिता जोफ पिंटो एक सरकारी विभाग में कार्यरत अति ईमानदार इंसान हैं. एक दिन टीवी समाचार से ही अल्बर्ट को पता चलता है कि जगताप व सूर्यकांत द्वारा कई सौ करोड़ रूपए के घोटाले करने को हुए खुलासे में सीधा आरोप जोफी पिंटो पर लगा है. अल्बर्ट पिंटों के पिता भ्रष्टाचार के आरोप में सस्पेंड कर दिए जाते हैं. फिर जोफी पिंटो फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं. इसलिए अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा है और वह एक डीसीपी लोगों की मदद से अंडरवर्ल्ड डौन साटम के पास पहुंचकर उनके साथ काम करना शुरू करता है और जगताप व सूर्यकांत की हत्या करने के लिए गोवा जा रहा है. इधर बीच बीच में पुलिस इंस्पेक्टर प्रमोद (किशोर कदम), अल्बर्ट पिंटो की तलाश के सिलसिले में स्टेला सहित कई लोगो से पूछताछ कर रहा है. पर किसी के पास कोई सुराग नहीं है.

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अल्बर्ट इतना गुस्से में है और उसका दिमाग इतना खराब हो चुका है कि उसे हर आम इंसान कौआ लगता है. गरीब लोगों का हंसते व नाचते गाते देखकर उसे आश्चर्य होता है.

फिल्म में आम इंसान के फ्रस्ट्रेशन के साथ ही देश के हालातों पर रोशनी डालने का असफल प्रयास है. पूरी फिल्म व इसके घटनाक्रम कहीं से भी इमानदार व विश्सनीय नजर नहीं आते. फिल्म की गति बहुत धीमी है. कथा कथन की शैली के चलते भी यह फिल्म आम इंसान के सिर के उपर से गुजर जाती है. यह रीमेक फिल्म मौलिक फिल्म की तरह किसी भी मुद्दे को सही परिपेक्ष, संवेदनशीलता व संजीदगी के साथ नहीं उठाती.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो कमजोर पटकथा व कमजोर चरित्र चित्रण के बावजूद मानव कौल काफी हद तक फिल्म को संभालने का प्रयास करते हैं. करियर की यह सबसे कमजोर परफार्मेंस वाली फिल्म है. स्टेला के किरदार में नंदिता दास ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. सौरभ शुक्ला अपने कुछ हास्य पंचो की वजह से ध्यान आकर्षित करने में सफल होते हैं.

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एक घंटा तीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’’ का निर्माण पिंकी अंकुर पटेल, नुपुर राजे, सौमित्र रानाडे, विक्रम सक्सेना व जगमीत सिंह ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक सौमित्र रानाडे, संगीतकार अविषेक मजुमदार, कैमरामैन राहुल डे, गीतकार अश्विन कुमार तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं-मानव कौल, नंदिता दास, सौरभ शुक्ला, किशोर कदम, अतुल काले व अन्य.

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