Bihar : प्रशांत किशोर की जीत

Bihar. जन सुराज पार्टी के अध्यक्ष प्रशांत किशोर ने पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में शानदार जीत हासिल की. उन्हें 64,151 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 44,827 और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 14,273 वोट मिले थे. इस तरह 19,234 वोटों के अंतर से प्रशांत किशोर जीत गए.

सीनियर पत्रकार पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘महज 8-9 महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 98,151 वोट मिले थे और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 46,308 वोट. तब जन सुराज के उम्मीदवार केसी सिंह को सिर्फ 7,690 वोट आए थे. मगर अब माहौल बदल चुका है.

पिछले चुनाव से मुकाबला करें तो भाजपा ने इस चुनाव में लगभग 54,000 वोट गंवाए और राजद ने 30,000 यानी भाजपा का नुकसान बड़ा है. बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक जन सुराज की तरफ शिफ्ट हुए हैं. यही भाजपा के लिए खतरे की घंटी है.’’

सच तो यह है कि दिल्ली के जंतरमंतर से ले कर बांकीपुर तक जो जेनजी आंदोलन हुआ है, वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी ही है. अब तक भाजपा का विरोध दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक किया करते थे. मगर अब उन का विरोध सवर्ण और शहरी मध्यमवर्गीय लोग कर रहे हैं, जो उन के कोर वोटर हैं.

पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘अंधभक्ति से बिदकने के कई कारण गिने जा सकते हैं. सब से बड़ी बात बिहार में देखें तो सब से बड़ी वजह सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना है, जिस से एक बड़ा वर्ग नाराज है.

‘‘पार्टी का पहला मुख्यमंत्री उन्हें ऐसा नहीं चाहिए था, जिस पर अपराध के दाग हों. जिस की बातचीत में वह दबंगई हो और जिसे राजद के दौर में उन्होंने भोगा है. उन्हें बारबार पार्टी विद डिफरैंस की घुट्टी पिलाई गई थी.

‘‘दूसरी वजह, जमीनी कार्यकर्ताओं के नाम पर डमी लोगों को आगे बढ़ाना और नीरज कुमार सिन्हा जैसे उम्मीदवार को थोपना. इसे बांकीपुर की जनता अपना अपमान सम झ रही थी.

‘‘कायस्थ भाजपा के साथ बताए जाते हैं, मगर कायस्थों में भी इस फैसले को ले कर कम गुस्सा नहीं था. नीट आंदोलन का मसला तो सब पर हावी था ही. मध्यम वर्ग को लगने लगा था कि सरकार उन के बच्चों की पढ़ाई और कैरियर को ले कर गंभीर नहीं है.

‘‘इस में आप यूजीसी के मसले को जोड़ दें, भरत तिवारी प्रकरण को जोड़ दें, नीट छात्रा की संदिग्ध हत्या के मामले को जोड़ दें, राम मंदिर चंदा चोरी को जोड़ दें. ये तमाम ऐसे मामले हैं, जिन के कारण भाजपा का कोर वोटर ठगा महसूस कर रहा है. उस के अंदर गुस्सा है.’’

जाहिर सी बात है कि इस गुस्से को इस बार प्रशांत किशोर ने बखूबी भुनाया और वे आगे भी भुनाएंगे. अगर ऐसा ही माहौल बना रहा तो जल्द ही प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज बिहार की राजनीति में खाली हो रहे जद (यू) और राजद के स्पेस को भरने में जुट जाएगी.

कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जिस का सब से आसानी से जन सुराज से सम झौता हो सकता है. अगर प्रशांत किशोर कुछ बुनियादी वैचारिक मसले पर साथ देने को तैयार हों तो वामदल भी उन के साथ आ सकते हैं.

मगर ध्यान से देखें तो यह जीत इतनी आसान नहीं थी. जहां भाजपा और जद (यू) के सैकड़ों विधायकों के अलावा अनेक केंद्रीय मंत्री और बड़े नेता इस उपचुनाव के पीछे लगे हों, इस जीत को अप्रत्याशित तो नहीं कहा जा सकता.

बांकीपुर भाजपा का सब से सुरक्षित और पारंपरिक गढ़ के रूप में मशहूर रहा है. लेकिन जब प्रशांत किशोर ने इस क्षेत्र से परचा भरा, तो यहां की लड़ाई दिलचस्प बन गई. भाजपा ने इसे इज्जत का सवाल बना कर अपनी सारी ताकत यहां  झोंक दी. आखिर वह ऐसा करने को मजबूर थे. नीतिन नवीन और सम्राट चौधरी की इज्जत भी दांव पर थी, क्योंकि उन के कार्यकाल में एक विधानसभा सीट का उपचुनाव हो रहा था.

सवाल यह है कि पटना जिले के बांकीपुर विधान सभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर जीत गए, तो हारा कौन? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव?

भाजपा के अहं के चलते उस ने हार का स्वाद चखा. सत्ता पक्ष को सम झना होगा कि अब भारतीय मतदाताओं में जागरूकता बढ़ी है. अब पहले की तरह परिवार तंत्र चल नहीं सकता. मतदाता नेताओं को कसौटी पर कसने लगे हैं.

बिहार में भी परिवारतंत्र को ठेस लगी है और अनेक नेता सत्ता से बेदखल हुए हैं. ऐसे में इस फार्मूले को बहुत भरोसे का नहीं माना जा सकता. अब अंधभक्ति वाले दिन गुजरे दिनों की बात होने लगी है. ठीक है कि जनता नेतापुत्रों का सम्मान करती है, मगर वह उसे राजा या सर्वेसर्वा मानने को तैयार नहीं. वह काम भी देख रही होती है. अब मतदाताओं को उम्मीदवारों की नीयत भांपते देर नहीं लगती है, जिस से नेतापुत्रों की नियति भी बदल जाती है.

सीनियर पत्रकार अनूप नारायण सिंह कहते हैं, ‘‘जिन को लगता था कि किसी को भी मैदान में उतार देंगे तो चुनाव जीत जाएंगे, यह भ्रम टूटा है. भाई लोकतंत्र है, यह बात सम िझए. जनता किसी की नहीं है. जो आप को कुरसी पर बैठ सकता है, वह आप को कुरसी से उतार भी सकता है. शुरुआत बांकीपुर से हुई है. खत्म कहां से होगा, यह नहीं कहा जा सकता.’’

प्रशांत किशोर की यह जीत न सिर्फ भाजपा के लिए, बल्कि राजद के लिए भी खतरे की घंटी है. विपक्ष की भूमिका में अब प्रशांत किशोर तेजस्वी यादव से कहीं ज्यादा तेजतर्रार साबित होंगे. जीत का सेहरा जनता ने उन के सिर पर इसी उम्मीद के साथ रखा है. अब देखना यही है कि प्रशांत किशोर इसे कितना संभाल पाते हैं. Bihar

तेजस्वी के नजदीकी रिश्तेदार हैं अखिलेश यादव, क्या आपको पता है?

यूपी बिहार के जानेमाने नेता मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव हमेशा ही सुर्खियों में रहे है लेकिन राजनीति में जितने इनके चर्चे है उससे कही ज्यादा इनके आपसी संबंध को लेकर बातें होते है. दोनों नेता मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव एकदूसरे के समधी लगते है. जानिए कैसे?

 

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कन्नौज लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाए गए तेज प्रताप सिंह यादव पहले भी सांसद रहे चुके हैं. वह अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के दामाद हैं. लालू यादव की छोटी बेटी राज लक्ष्मी से उनकी शादी हुई है. तेज प्रताप को अखिलेश यादव का भरोसेमंद और करीबी परिवार में करीबी माना जाता है.

हालांकि तेज प्रताप सिंह यादव पहले भी चुनाव मैदान में दांव लगा चुके हैं. वह परिवार की पारंपरिक सीट मैनपुरी से सांसद रहे चुके हैं. वह मुलायाम सिंह यादव के भाई रतन सिंह यादव के पौत्र हैं. उन्होंने इंग्लैन के लीड्स यूनिवर्सिटी से एमएससी की हुई है. सांसद रहने से पहले वह सैफई के ब्लॉक प्रमुख भी रह चुके हैं. उनके पिता का नाम रणवीर सिंह यादव है, जो अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं.

आपको बता दें कि कई बात तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव को एक साथ एक मंच या फंक्शन में देखा गया है, पहली बार तब सुर्खियों में आंए थे जब तेजस्वी यादव की शादी थी.  यहां डिंपल और अखिलेश शादी में शरीक हुए है.

नई दिल्ली में समाजवादी प्रमुख अखिलेश यादव और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के बीच भी एक मुलाकात हुई थी. दिवंगत शरद यादव के घर पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दोनों के बीच ये छोटी सी मुलाकात हुई.

ऐसे बदलेगी बिहार की सियासत

भारतीय जनता पार्टी ने बिहार में 17 साल बाद शाहनवाज हुसैन को अहमियत देने का काम किया है. इस के जरीए वह मुसलिमों को बताना चाहती है कि उन की चिंता भी उसे है.

दूसरी तरफ बिहार में नीतीश कुमार पर राष्ट्रीय जनता दल हमलावर है. उन को ‘निर्लज्ज कुमार’ का नाम दे कर 5 साल तक विधानसभा के बौयकौट का नारा दिया गया है. कमजोर पड़ते नीतीश कुमार को भाजपा भी बिहार से दूर करना चाहती है.

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नया नाम ‘निर्लज्ज कुमार’ रख दिया है. तेजस्वी यादव का कहना है कि बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक की चर्चा के दौरान विधानसभा में मौजूद विधायकों को जिस बुरी तरह से मारापीटा गया और उन की बेइज्जती की गई, उसे शब्दों में बताया नहीं जा सकता?है.

तेजस्वी यादव ने ये बातें अपने ट्विटर हैंडिल पर बताईं. उन्होंने लिखा, ‘महिला विधायक अनीता देवी नौनिया के पैर में चोट लगी. उन का ब्लाउज पकड़ कर घसीटा गया. उन के साथ बताई न जाने वाली बदसुलूकी की गई. जिस समय विधानसभा में यह हो रहा था, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा के चरणों में बैठ कर आनंद ले रहे थे.’

तेजस्वी यादव ही नहीं, दूसरे कई विधायकों ने भी इस बात की शिकायत की. विधायक सत्येंद्र कुमार ने कहा, ‘एसपी ने मेरी छाती पर पैर रख कर बुरी तरह से मारा.’

इस घटना के विरोध में तेजस्वी यादव ने कहा, ‘अगर सीएम नीतीश कुमार ने घटना पर माफी नहीं मांगी, तो वे 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट करेंगे.’

किसी विरोधी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा के बौयकौट का यह पहला मामला है. वैसे, पिछले कुछ सालों में विधानसभा में मारपीट की तमाम घटनाएं हुई हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, पर किसी विपक्षी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट पहली बार हो रहा है.

राजद और बिहार सरकार के बीच विधानसभा में मारपीट का मामला नाक का सवाल बन गया है. राजद के नेता तेजस्वी यादव ही नहीं, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी इस घटना को ले कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए अपने ट्विटर पर लिखते हैं, ‘लोहिया जयंती के दिन कुकर्मी आदमी कुकर्म नहीं करेगा, तो कुकर्मी कैसे कहलाएगा?’

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लालू प्रसाद यादव अपने ट्विटर पर आगे लिखते हैं, ‘जब पुलिस विधानसभा में घुस कर विधायकों को मार सकती है, तो सोचिए, जब उन के घर पर जाएगी, तो क्या करेगी.’

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी अपने ट्विटर पर लिखा, ‘तुम ने आज जो चिनगारी भड़काई है, वह कल तुम्हारे काले सुशासन को जला कर राख कर देगी.’

इस घटना को ले कर तमाम ऐसे वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखे, जिन में पुलिस महिला विधायक को घसीट कर ले जा रही थी.

सरकार की तरफ से दावा किया  गया कि राजद के विधायक विधानसभा के अध्यक्ष को विधानसभा में आने से रोक रहे थे. विधायकों के हमले से उन्हें बचाने के लिए ऐसा किया गया.

तेजस्वी यादव और लालू परिवार के विरोध पर बिहार के मुख्यमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. नीतीश कुमार की खामोशी की वजह यह है कि वे इस घटना को तूल नहीं देना चाहते हैं, जबकि तेजस्वी यादव इस बात को मुद्दा बनाना चाहते हैं. आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार में राजनीति का नया अखाड़ा बनेगा.

क्या है बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधयेक 2021

बिहार विधानसभा में मारपीट की घटना का कारण राजद के विधायकों द्वारा बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधयेक 2021 का विरोध किया जाना था. राजद और बाकी विपक्ष जैसे कांग्रेस और वाम दलों का कहना है कि नीतीश सरकार इस विधेयक की आड़ में पुलिस को विशेष अधिकार दे रही है, जिस के बाद पुलिस बिना किसी वारंट के किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है.

विधायक इस बात का विरोध कर रहे थे, जिस की वजह से विधानसभा में पुलिस बुलानी पड़ी और मारपीट की यह घटना घट गई, जिसे बिहार की राजनीति में एक काला अध्याय माना जा रहा है. यह केवल काला अध्याय ही नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों को एकजुट करने का जरीया भी बन गया है.

बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 को ले कर राजद, कांग्रेस और वाम दल नीतीश सरकार पर हमलावर हैं. नीतीश कुमार की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी भी अलग से पूरे मामले को देख रही है. उस के लिए भी यह अवसर की तरह से है.

जैसेजैसे विपक्षियों द्वारा नीतीश कुमार पर हमले होंगे, उन की पकड़ बिहार से कम होगी. इस से भाजपा को नीतीश कुमार को हाशिए पर धकेलना आसान होता जाएगा.

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शाहनवाज बन सकते हैं भाजपा का नया चेहरा

बिहार की राजनीति में शाहनवाज हुसैन को ले कर अटकलों का दौर चल रहा है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि शाहनवाज हुसैन बिहार में भाजपा का नया चेहरा होंगे. इन के जरीए वह मुसलिम तबके में अपनी पैठ बनाने का काम करेगी.

मुसलिम तबका बिहार में यादव समाज के साथ मिल कर भाजपा को विस्तार नहीं करने दे रहा है. राजद को कमजोर करने के लिए भी जरूरी है कि मुसलिम तबके को उस से अलग किया जाए. शाहनवाज हुसैन ऐसे नेता हैं, जिन से यह काम हो सकता है.

साल 2001 में 32 साल की उम्र में केंद्र की अटल सरकार में शाहनवाज हुसैन को उड्डयन मंत्री बनाया गया था. तब वे भाजपा के ‘पोस्टर बौय’ कहे  जाते थे.

शाहनवाज हुसैन की इमेज कट्टर मुसलिम की नहीं है. उन का प्रेम विवाह रेनू नामक लड़की से हुआ था, जो उन के साथ पढ़ती थी.

साल 2004 में जब वे किशनगंज सीट से अपना चुनाव हार गए, तो भाजपा की राजनीति में हाशिए पर चले गए. साल 2009 में वे सांसद बने, पर भाजपा में उन की अहमियत को कम कर दिया गया.

तकरीबन 17 साल बाद शाहनवाज हुसैन को केंद्र की राजनीति से बिहार भेजा गया. यहां नीतीश सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया.

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भाजपा की मुख्यधारा में शाहनवाज हुसैन की वापसी को नए नजरिए से देखा जा रहा है. बिहार में शाहनवाज हुसैन को मंत्री बनाने के लिए विधानपरिषद का सदस्य बनाया गया. इस के बाद वे उद्योग मंत्री बनाए गए. उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया.

शाहनवाज हुसैन के बहाने भाजपा मुसलिमों को यह संदेश देने का काम कर रही है कि वह उन की चिंता करती है. दिल्ली में मोदीशाह की जोड़ी बनने के बाद शाहनवाज हुसैन को पहली बार अहमियत दी जा रही है.

शाहनवाज हुसैन के बारे में यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्र में उन की उपयोगिता दिख नहीं रही थी, जिस के चलते उन्हें बिहार भेजा गया?है.

गायब तेजस्वी यादव सामने आए और बताया कहां थे वह

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद ‘गायब’ तेजस्वी सामने आए और कहा,”मेरे प्यारे बिहार, मैं यहीं हूं।”
मालूम हो कि लोकसभा चुनाव के बाद से ही बिहार में आरजेडी के युवा नेता और बिहार में महागठंधन की कमान संभालने वाले तेजस्वी यादव ने आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ी और लोगों से मुखातिब हुए।

तेजस्वी ने क्या कहा

तेजस्वी के सक्रिय राजनीति से दूर रहने की वजह से विपक्ष के नेता उन पर राजनीतिक कटाक्ष कर रहे थे। कईयों ने तो यहां तक कह दिया था कि तेजस्वी यादव आरजेडी को मिली करारी हार की वजह से डर गए हैं और उन की राजनीति में पुनर्वापसी का इरादा नहीं है।
सोशल मीडिया पर भी तरहतरह के कयास लगाए जा रहे थे और यूजर्स उन्हें ट्रोल भी कर रहे थे।
एक ने लिखा था,”बिहार में चमकी बुखार से बच्चों की मौत हो रही है और उधर तेजस्वी इंगलैंड में क्रिकेट वर्ल्ड कप का मजा ले रहे हैं।”

तेजस्वी का जवाब

इधर सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय होते हुए तेजस्वी ने ट्वीट कर इस का जवाब देते हुए कहा है,”पिछले कुछ हफ्तों से मैं अपने चोट के इलाज में व्यस्त था। हालांकि, मैं राजनीतिक विरोधियों के साथसाथ मसालेदार कहानियों को पकाने वाले मीडिया के एक वर्ग को देख कर मजा ले रहा हूं।”

इस के बाद तेजस्वी ने एक के बाद एक 4 ट्वीट कर कहा, “हम उन लोगों के प्रति जवाबदेह हैं, जो हम में एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के विकल्प की तलाश करते हैं और यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारी लड़ाई जारी है।”

बच्चों की मौत दुखद

तेजस्वी ने बिहार में चमकी बुखार से सैकङों गरीब बच्चों की मौत पर संवेदना जताते हुए कहा,”इस दुखद समय में पार्टी के कार्यकर्ताओं, नेताओं से बिना किसी फोटोबाजी किए पीड़ित परिवारों के घर जाने को कहा गया। इस के अलावा सांसदों से इस मामले को संसद में उठाने को कहा गया, मेरे प्रिय बिहार, मैं यहीं हूं।”

राबङी को क्यों आया था गुस्सा

हाल ही में पत्रकारों के एक सवाल पर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबङी देवी झल्ला उठी थीं।
दरअसल, जब पत्रकारों ने पूछा कि तेजस्वी बहुत दिनों से नजर नहीं आ रहे, क्या वे इंगलैंड में क्रिकेट वर्ल्ड कप देखने गए हैं? तो राबङी देवी को इस सवाल पर गुस्सा आ गया और कहा कि नहीं, तेजस्वी तुम्हारे घर में हैं।

अब जब तेजस्वी ने जवाब दे दिया है तो सोशल मीडिया पर लोग उन्हें आराम करने की सलाह दे रहे हैं। कुछ कह रहे हैं, नेता को भी हक है निजी जीवन जीने की।
बात तो सही है, पर यहां डर्टी पौलिटिक्स की शुरुआत भी तो नेता लोग ही करते हैं, जनता जनार्दन तो बस उस में तङका लगाती है बस।

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