Hindi Story:अब पछताए क्या होत- बाबागीरी में बनते ब्रैंड

Hindi Story.उस दिन कई दिनों बाद थोड़ी गुनगुनी धूप निकली हुई थी. सर्दी के मौसम में गुनगुनी धूप और वह भी शनिवार को जब आस्ट्रेलिया में सभी व्यापारिक संस्थान बंद होते हैं, सोने पर सुहागा वाली बात थी.

मैं अवकाश का आनंद लेने किलडा बीच पर चला आया था. काफी देर तक वहां प्राकृतिक दृश्यों का लुत्फ लेता रहा. कुछ ऐसे नजारे भी देखे जो विदेशों में ही देखे जा सकते थे. उस के बाद मैं लूणा पार्क चला आया था. दोपहर के बाद फलिंडर स्ट्रीट स्टेशन के निकट भारतीय रैस्टोरैंट फलोरा में खाना खाने के पश्चात सराइन आप रिमैंबरेंस चला गया और वहां काफी देर बैठा रहा.

जब घर लौटा तो आंसरिंग मशीन और मेरे मोबाइल पर भी एक मित्र के कई संदेश आए हुए थे.

मैं ने तुरंत उस का नंबर डायल किया. उस ने फोन उठाते ही गुस्से से कहा, ‘‘कहां गायब हो गया था सुबह से? मैं तो फोन करकर के थक गया. तुम तो मोबाइल भी नहीं उठा रहे थे.’’

‘‘सौरी यार,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं मोबाइल घर पर ही भूल गया था.’’ उस से मैं ने कह तो दिया लेकिन वास्तव में मैं स्वयं ही जानबूझ कर मोबाइल घर छोड़ गया था. वास्तव में मैं शांति से दिन गुजारना चाहता था.

मेरे यह पूछने पर कि कैसे याद किया, उस ने अत्यंत प्रसन्नता से बताया, ‘‘ओह यार, आजकल इंडिया से अपने गुरु महाराज आस्ट्रेलिया आए हुए हैं. कल वे हमारे घर पर प्रवचन करेंगे. तुम अवश्य आना.’’

‘‘यार, मुझ से कहां आया जाएगा?’’

‘‘क्यों, तुम्हारे क्या पैर भारी हैं?’’

‘‘तुम जानते तो हो, मेरी धार्मिक कार्यों में…’’

‘‘दिलचस्पी नहीं,’’ उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘‘वाइन की तो पूरी बोतल डकार जाता है मगर धार्मिक कार्यों के नाम पर तुम्हारे पेट में मरोड़ उठने लगती है.’’ उस ने अपनत्व की भावना से आगे कहा, ‘‘ज्यादा इधरउधर की मत हांक… और हां, आते हुए बेबी तथा उस के बच्चों को भी साथ ले आना. जीजाजी तो सिडनी गए हुए हैं.’’

लो, एक और मुसीबत गले पड़ गई. मेरे घर से मैलटन, जहां उस की बहन बेबी रहती है, कम से कम 45 किलोमीटर दूर होगा. पहले तो शायद न जाता, मगर अब तो उस की बहन और बच्चों को भी साथ ले कर जाना पड़ेगा. फोन पर मेरी ओर से कोई जवाब न मिलने पर वह बोला, ‘‘क्या हुआ, मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही है?’’

‘‘अरे, सुन रहा हूं भई, निश्ंिचत रह, मैं बेबी तथा बच्चों को साथ ले आऊंगा.’’

‘‘यार, तुम से एक और रिक्वैस्ट है,’’ उस की आवाज अत्यंत हलीमीभरी थी, ‘‘गुरु महाराज को 100 डौलर से कम दक्षिणा मत देना.’’

‘‘अरे, यह भी कोई कहने वाली बात है,’’ मैं ने तुरंत कह तो दिया, लेकिन मन ही मन यह अवश्य सोचा था कि यहां डौलर छापने की मशीन तो नहीं लगी हुई है. इसे क्या मालूम कि ट्रेन के किराए

के 5-6 डौलर बचाने के लिए मैं 5 किलोमीटर की दूरी पर अपने इंस्टिट्यूट तक प्रतिदिन पैदल आताजाता हूं.

खैर, मैं उस के घर चला गया, वहां उस के कई रिश्तेदार तथा परिचित आए हुए थे.

मैं ने धीरे से 50 डौलर महाराज के सिंहासन के सामने पड़ी थाली में डाल कर माथा टेक दिया, लेकिन अगले ही पल हिसाब भी लगा लिया कि भारतीय करैंसी में कितने रुपए बन गए तथा मन ही मन अपनेआप को कोसते हुए तथा मित्र को भी एक भद्दी सी गाली निकालते हुए कहा, ‘ससुरे ने अढ़ाईतीन हजार रुपए का नुकसान करवा दिया.’

गुरु महाराज प्रवचन देने लगे. उन का एकएक बोल मनमंदिर के किवाड़ खोल रहा था. चांदी जैसे उज्ज्वल वस्त्रों से सुशोभित वे किसी देवर्षि की तरह लग रहे थे. सचमुच ही ऊपर वाले ने इन महापुरुषों को कोई विशेष गुण दिया होता है. मगर गुरु महाराज की ओर देखते हुए यों प्रतीत हो रहा था मानो वे मेरे परिचित हों, लेकिन यह मेरे मन का वहम हो सकता था, क्योंकि मैं तो इंडिया में रहते हुए भी कभी किसी धार्मिक सम्मेलन में नहीं गया था.

महाराज को चढ़ावा भी काफी चढ़ गया था. घर वालों ने भी सोने की मोटी चेन, हाथ का कड़ा तथा डौलरों से भरा लिफाफा उन के चरणों में रख दिया था. तदोपरांत लंगर छक कर संगत चली गई थी.

महाराजजी से परिचय करवाने के लिए मेरा मित्र मुझे उन के निकट ले गया. मगर उस की बात पूरी होने से पहले ही महाराज बोल पड़े थे, ‘‘मैं जानता हूं इन्हें, डा. शुक्ला हैं. समाचारपत्रों में अकसर मैं इन के बारे में पढ़ता रहता हूं.’’ और उन्होंने मुझ से पूछा, ‘‘तू ने पहचाना नहीं मुझे? मैं रमेश हूं, मेछी?’’ और उन्होंने मुसकराते हुए मेरे मित्र से परदाफाश कर दिया, ‘‘यह तो मेरे साथ ही गांव के स्कूल में पढ़ा करता था.’’

पलभर में ही चलचित्र की रील की तरह सबकुछ मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था. तभी तो महाराज का चेहरा मुझे इतना जानापहचाना लग रहा था.

हम दोनों गांव के राजकीय स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे. वह पढ़ाई में नालायक विद्यार्थियों जैसा था, लेकिन बातचीत में इस कदर शातिर था कि आसमान को भी पैबंद लगा देता था. वह इस प्रकार की दलीलें देता कि झूठ भी सच साबित हो जाता था. हमारे अध्यापक अकसर उस से कहा करते थे कि तू इतना चालाक है कि बड़ा हो कर लीडर बनेगा. स्कूल में पढ़ते समय ही वह देसी शराब और सिगरेट भी पीता था.

मुझे अभी तक याद है कि कैसे उस ने एक बार मुझे पीटा था और मुख्य अध्यापक से भी मेरी पिटाई करवाई थी. स्कूल के निकट ही साइकिल पर तिनके वाली कुल्फी बेचने वाला आया करता था. एक टके (2 पैसे) की एक कुल्फी. मेछी (रमेश) ने मुझ से कुल्फी ले कर देने को कहा था. मैं ने मना कर दिया तो उस ने मुझे 3-4 थप्पड़ रसीद कर दिए. मैं ने उसी समय मुख्य अध्यापक से उस की शिकायत कर दी. उन्होंने झटपट उसे बुला लिया. लेकिन मेछी ने सरासर झूठ बोलते हुए पासा ही पलट दिया, ‘सर, यह बिना किसी बात के मुझे गालियां दे रहा था. मुझे क्रोध आ गया और तब मैं ने इस के 2-4 चांटे लगा दिए.’’ मुख्य अध्यापक ने उस की बात पर विश्वास करते हुए

2-3 थप्पड़ मारते हुए मुझे डांटा, ‘‘एक तो गालियां बकता है और फिर शिकायत भी करता है.’’

और तभी उन्होंने झट से मेछी को आदेश दे डाला, ‘‘लगा इस के दोचार थप्पड़ और.’’ मेछी ने फिर मेरे चांटे मार दिए. मैं स्तब्ध सा मुख्य अध्यापक के कार्यालय से जब बाहर आया तो मेछी ने पहले से भी ज्यादा अकड़ कर कहा, ‘‘अब कुल्फी ले कर देगा या तेरी और करवाऊं पिटाई.’’

….और आज वही मेछी मेरे सम्मुख सिंहासन पर विराजमान है.

गुरु महाराज से बहुत सारी बातें हुईं. उन के अमेरिका, कनाडा, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में आश्रम भी थे और उपासक भी. मेरे आकलन के अनुसार, उन के पास करोड़ों की संपत्ति तो अवश्य होगी.

घरपरिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने मुसकराते हुए कहा था, ‘साधुसंतों का परिवार तो उन के शिष्य होते हैं. यही लोग हमारा परिवार हैं तथा समाज भी.’

गुरु महाराज तो शाम की फ्लाइट से अपने भक्तों से मिलने के लिए ब्रिसबेन चले गए थे मगर मेरे मन की यादों की पिटारी खोल गए थे.

मैं बचपन से ही संगीतप्रेमी था और नाटकों में अभिनय भी किया करता था. गाना गाने के लिए स्कूल की ओर से हमेशा मुझे ही भेजा जाता था. और मैं हर बार कोई न कोई पुरस्कार प्राप्त करता था.

कहीं भी ढोल बजने लगता तो स्वयं ही मेरे पैर थिरकने लग जाते.

हमारे गांव से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव में मजार है. कुछ लोग अपने कष्ट दूर करने के बहाने वहां जाते थे. जिन लोगों में पीर की ‘हवा’ आती थी, वे वहां ‘खेलने’ (झूमने) लगते थे. वहां यह मान्यता भी थी कि लगातार 5 बार वहां जाने से मनोकामना पूरी हो जाती है.

मैं भी प्रत्येक वीरवार ऊबड़खाबड़ और कंकड़ोंभरे रास्ते पैदल चल कर वहां जाता था. मगर शायद मेरी भावना में स्वार्थीपन अधिक तथा श्रद्धा कम थी. लेकिन लगातार 5 बार जाने के बावजूद मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई थी. आप यह भी जानना चाहोगे कि मैं वहां क्या मांगता था. वास्तव में मैं वहां जा कर हर बार यही प्रार्थना किया करता था कि पीर मुझे भी ‘खेलने’ में लगा दे.

लेकिन मेरी ख्वाहिश मन में ही रह गई थी.

गांव में एक कुम्हारों यानी मुसलमानों का घर था. अब तो पूरी तरह याद नहीं कि  वे लोग कुम्हार थे या मुसलमान. वर्षों पुरानी बात है. उन के परिवार के सदस्यों में पीर की ‘हवा’ आती थी. वे लोग वीरवार वाले दिन शाम को ढोल बजाने लगते तथा कुछ समय बाद उन के परिवार का कोई सदस्य ‘खेलने’ लग जाता और अपने शरीर पर ‘छेंटे’ मारने लगता.

मैं कभीकभी उन के घर चला जाता था. वे लोग खुले आंगन में ढोल बजा कर ‘खेलते’ थे. लेकिन एक बार न जाने क्या हुआ. कुछ पता ही न चल पाया कि  कब ढोल की थाप मुझ पर हावी हो गई थी और मैं भी ढोल की थाप के साथसाथ झूमने लगा था. उन्होंने मुझे ‘छेंटा’ पकड़ा दिया और मैं ‘छेंटे’ से अपने शरीर पर वार करने लगा था तथा जैसे वे बोलते गए वैसे ही हक, हक… कहता रहा.

मगर शीघ्र ही यह खबर मेरे घर खबर पहुंच गई थी. मेरे घर वाले कुम्हारों को भलाबुरा कहते हुए मुझे घसीटते हुए ले गए थे. घर वालों ने मेरी धुनाई भी कर डाली थी और स्वयं भी बहुत परेशान हुए थे.

जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी कि मुझे भी असर हो गया है और मुझ में भी हवा आने लगी है.

एक दिन शाम को मैं बंजर जमीन की ओर जा रहा था. गांव की एक महिला ने मुझे रोक कर मेरे पांव छुए और गोद में उठाए हुए बालक की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘जी, कहते हैं इस पर किसी प्रेत का साया है. दिनभर रोता रहता है. आप कोई उपाय बताइएगा.’

और मैं ने भी झट से यों कह दिया जैसे मैं तंत्रविद्या में निपुण था. ‘इस के सिर के ऊपर से कलौंजी घुमा कर पक्षियों को डाल देना, शीघ्र ही ठीक हो जाएगा.’

वास्तव में उस महिला के पूछने पर तुरंत ही मुझे कुछ याद आ गया था. एक बार मेरी माताजी ने किसी साधु से मेरे बारे में पूछा था तो उस ने यह उपचार बताया था.

मुझ में हवा आने की खबर हमारे गांव से शीघ्र ही निकटवर्ती गांवों में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. उस महिला की तरह और भी कई लोग अपने दुखों के समाधान के लिए मेरे पास आने लगे थे. दिमाग तो मेरा पहले से ही तेज था. मैं घरपरिवार में सुने टोटके और साथ ही अंधविश्वास से जुड़े ढंग भी बता देता था.

एक बार मैं कुबैहड़ी गांव जा रहा था. एक महिला अपने पोते को मेरे पास ला कर बोली, ‘महाराज, यह कुछ भी खातापीता नहीं है. दूध तो बिलकुल भी नहीं पीता. पहले तो पूरी बोतल पी जाता था. मुझे शक है कि मेरी बड़ी बहू ने इस के लिए टोना कर दिया है.’

मैं ने मस्तिष्क पर बल डाला तो मुझे शीघ्र ही याद आ गया कि जब मेरे छोटे भाई को भूख नहीं लगती थी तो एक हकीम ने बताया था कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डुबो कर उस दूध को पिलाना  चाहिए. मैं ने भी वही नुस्खा उसे बता दिया. और साथ में यह भी बोल दिया कि इस के गले में सुराख वाला तांबे का सिक्का काले धागे में डाल कर बांध देना.

संभवतया मेरी ख्याति और फैल जाती, अगर भेद न खुलता. दरअसल, उस औरत के बच्चे को भूख लगने लगी थी और वह खुश हो कर दूध की गड़वी तथा गुड़ का बड़ा सा ढेला मेरे घर दे गई थी, क्योंकि मेरे बतलाए उपाय से उस का पोता ठीक हो गया था.

एक वैज्ञानिक होने के नाते अब मैं स्पष्टीकरण दे सकता हूं कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डालने से उस दूध में खनिज पदार्थ लोहे की मात्रा बढ़ गई होगी और बच्चे की रक्ताल्पता (अनीमिया) में सुधार आ गया होगा. बाकी सब तो अंधविश्वास की बातें थीं जिन के बिना लोगों की संतुष्टि नहीं होती.

घरपरिवार में पता चलते ही मेरी खूब पिटाई हुई थी. पिताजी चीखचीख कर पूछ रहे थे, ‘तू कब से सयाना बन कर लोगों को उपाय बताने लगा है.’ उन्होंने मुझे गांव से निकाल दिया और लुधियाना पढ़ने भेज दिया. मैं बस डिगरियां ही प्राप्त करता रहा और एक वैज्ञानिक बन गया. अब तो सेवानिवृत्त भी हो चुका हूं.

….और आज गुरु महाराज से मिल कर सबकुछ याद आने लगा था, लेकिन मेरे मन में यह विचार भी बारबार कौंधता रहा कि इतनी उपाधियां प्राप्त कर के और अंतराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक बन कर मुझे क्या मिला. 34-35 वर्ष की नौकरी के उपरांत सेवानिवृत्त होने पर जितनी राशि मुझे मिली थी उतनी तो गुरु महाराज ने आस्ट्रेलिया के एक फेरे में ही बना ली होगी. फिर उन की और भी कई प्रकार की सेवाएं होती होंगी.

मुझे पछतावा होने लगा था. इस से तो अच्छा होता गांव में ही रहता. मेरी तो उन दिनों भी काफी ख्याति हो गई थी. अब तक मेरे भी कई बंगले व आश्रम बन जाते तथा करोड़ों में बैंक बैलेंस होता. मगर अब तो बहुत देर हो चुकी है. अब तो मेरा मन भी बारबार यही कह रहा है, अब पछताए क्या होत. Hindi Story

Superstition Crime: तांत्रिक की हैवानियत – 10 साल में 12 हत्याएं

Superstition Crime, Writer – मोहित कुमार

एक ऐसा सीरियल किलर जो बेहद शातिर और खतरनाक था, 6 महीने तक ड्राइवर बन कर छिपा रहा और लोगों व पुलिस की आंखों में धूल झोंकता रहा.

पुलिस भी उस की असलियत नहीं जान पाई थी. इस मास्टरमाइंड ने अपनी चालाकी और रहस्यमयी पहचान से लंबे समय तक कानून को मात देता रहा. इस सनकी कातिल ने 12 लोगों की हत्या की थी मगर लाख कोशिशों के बावजूद पुलिस को चकमा दे कर फरार हो जाता था। मगर कहते हैं न कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और यही हुआ भी। एक दिन पुलिस के शिकंजे में यह आ ही गया।

उसे पकड़ने के लिए पुलिस को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. मीडिया की सुर्खियों में रही इस कातिल की कहानी ने सब को हैरान कर दिया था। जानते हैं, इस कातिल की रहस्य से जुड़ी क्राइम स्टोरी :

हम बात कर रहे हैं गुजरात के राजकोट में पुलिस हिरासत में लिए गए नवल सिंह और उसे पकड़वाने वाला शख्स जिगर गोहिल की. नवल सिंह नगमा (काल्पनिक नाम) महिला से प्यार करता था. दोनों के बीच प्यार हुआ तो फिर जिस्मानी ताल्लुकात भी बन गए। इस बीच नगमा उस पर शादी करने का दबाव डालने लगी। लेकिन वह शादी करने का झांसा देता रहता. इस के बाद प्यार का झूठा वायदा करने वाले इस तांत्रित प्रेमी ने उस महिला से पीछा छुड़ाने के लिए उस का कत्ल कर कर दिया. जब नगमा के मांबाप और उस के भाई को पता चला कि नगमा गुम है तो उस की तलाशी हुई. मांबाप और उस के भाई को नहीं पता था कि उस के तांत्रिक प्रेमी ने नगमा की हत्या कर उसे दफना दिया है.

पुलिस में शिकायत

जब नगमा के घर वाले अपनी बेटी को ढूंढ़ने में कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. तांत्रिक डरा हुआ था और जब उसे लगा कि पुलिस मेरे पास पहुंच सकती है तो उस ने एक साजिश रची. उस ने नगमा के मांबाप और भाई से बताया कि वह अपनी तंत्र (Superstition) विद्या से नगमा को ढूंढ़ सकता है मगर इस के लिए सब को एक सुनसान दरगाह पर आना होगा.

फिर तांत्रिक अपने षड्यंत्र में कामयाब हो गया और तीनों को प्रसाद में खतरनाक जहर मिला कर खिला दिया, जिस से तत्काल तीनों की मौत हो गई.

मौत के घाट उतार कर उस ने उन तीनों के पास एक सुसाइड नोट रख दिया. इस मर्डर में सीरियल किलर जिगर गोहिल भी था. पुलिस ने इस अपराधी को पकड़ कर हिरासत में रखा था, लेकिन अचानक लौकअप में उस की तबियत बिगड़ गई और वह मर गया.

इस की मौत को लेकर पुलिस खुद ताज्जुब कर रही थी. इस के बाद पुलिस द्वारा इस सीरियल किलर का पोस्टमार्टम कराया गया. जब पुलिस को पता चला कि उस की मौत हार्ट अटैक से हुई है तो पुलिस सोच में पड़ गई क्योंकि जिन 12 लोगों की मौत हुई थी उन की भी हार्ट अटैक से मौतें हुई थीं.

कौन था नवल

नवल एक तांत्रिक था. वह अपने झूठे तंत्रमंत्र का डर दिखा कर लोगों को फंसाता और उन के पैसे लूट कर मौत के घाट उतार दिया करता था. यह तांत्रिक अहमदाबाद के सुरेंद्र नगर में काला जादू किया करता था. इस को तांत्रिक बनने का आइडिया एक तांत्रिक को देख कर आया था. बाकी इस ने टीवी पर आने वाले क्राइम शो पर सीखा.

तांत्रिक जानता था कि बहुत से लोग लालच में पैसे या सोना डबल कराने के लिए तांत्रिक का सहारा लिया करते हैं. बस, इसी बात को जान कर उस ने लोगों को फायदा उठाना चालू कर दिया. इस तांत्रिक का काला जादू चल पडा. इस के बाद वह लोगों को ठगता चला गया.

2021 के एक रोड ऐक्सिडैंट में एक नौजवान की मौत हो गई थी. पुलिस इसे रोड ऐक्सिडैंट मान कर फाइल बंद कर दी। मगर उस के भाई को शक था कि उस का भाई रोड ऐक्सिडैंट में नहीं बल्कि किसी ने उस की हत्या की है. भाई की मौत का पता लगाने के लिए वह पुलिस के चक्कर काटता रहा, लेकिन पुलिस ने उस की एक भी बात नहीं मानी. इस के बाद वह अपने भाई के कातिल का पता करने में लग गया.

कौन था हत्यारा

उसे पता चला कि 1 महीने पहले उस का भाई एक तांत्रिक (Superstition) के संपर्क में आया था. उस का नाम नवल था. इस के बाद वह नवल के करीब जाने लग गया। उस को पता चला कि उस के पास भी एक कार है जिसे रात में टैक्सी के रूप में चलवाता है. नवल को एक टैक्सी ड्राइवर की जरूरत थी और वह उस के पास जा पहुंचा और पार्ट टाइम टैक्सी चलाने लगा.

उस का ड्राइवर बनने के बाद जिगर को पता चला कि तंत्रमंत्र के अलावा उस के और भी कई रूप हैं. इस के बाद जिगर 7 महीने तक उस का ड्राइवर बना और तंत्रमंत्र के अलावा सारी जानकारी इकट्ठा करने लगा.

जिगर ने नवल का भरोसा इतना जीत लिया था कि उसे अपने पूरे रहस्य बता दिया करता था. नवल ने जिगर से कहा कि एक बिजनैसमैन मेरे पास पैसे डबल कराने आने वाला है. फिर क्या था, नवल जिगर को लालच दे कर बोला कि कार की स्टैपनी में एक बोतल और उस में सोडियम नाइट्रेट नाम का रसायन छिपा हुआ है.

इस के साथ ही एक शराब की बोतल भी है. नवल ने प्लान बनाया था कि वह आदमी उस के पास पैसे डबल कराने आएगा तो तुम उसे इस शराब को पिला देना जिस से उस की मौत हो जाएगी. उस ने बताया कि इस रसायन को पिला कर उस ने कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया है. उस ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह हार्ट अटैक आती है. इस बात को सुन कर जिगर को यकीन हो गया था कि उस के भाई की भी मौत इस ने ही की है, क्योंकि पोस्टमार्टम में भी इसी रसायन का नाम आया था. इस के बाद वह पुलिस को मैसेज के जरिए इस बात की जानकारी देता है और अपनी लोकेशन भी बता देता है.

इस के बाद नवल को अरेस्ट कर लिया गया। पुलिस ने पूछताछ की तो उस की बात सुन कर हैरान हो गई थी क्योंकि पुलिस ने एक आम आदमी को अरेस्ट नहीं किया था बल्कि एक सीरियल किलर को अरेस्ट किया था क्योंकि यह किलर 10 साल में 12 कत्ल कर चुका था. पहला कत्ल दादी, दूसरा कत्ल मां और तीसरा कत्ल अपने चाचा का. पुलिस का कहना है कि नवल एक पैसे वाले तांत्रिक (Superstition) को जानता था जो इसी रसायन का प्रयोग किया करता था. पुलिस का मानना है कि 12 कत्ल से भी ज्यादा मौतों का आंकड़ा भी हो सकता था. इस से पूरी पूछताछ करने से पहले ही इस की मौत हो चुकी है. Superstition Crime

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