Story in Hindi: नहीं हुई मुन्नी बदनाम- रमेश और चंदू की अनबन

Story in Hindi. चंदू पहली बार रमेश से मवेशियों के हाट में मिला था. दोनों भैंस खरीदने आए थे. अब चंदू के पास कुल 2 भैंसें हो गई थीं. दोनों भैंसों से सुबहशाम मिला कर 30 लिटर दूध हो जाता था, जिसे बेच कर घर का गुजारा चलता था. इस के अलावा कुछ खेतीबारी भी थी.

चंदू अपनी बीवी और बेटी के साथ खुश था. तीनों मिल कर खेतीबारी से लेकर भैंसों की देखभाल और दूध बेचने का काम अच्छी तरह संभाले हुए थे.

एक दिन चंदू अपनी भैंसों को चराने कोसी नदी के तट पर ले गया. वहां एक खास किस्म की घास होती थी जिसे भैंसें बड़े चाव से चरती थीं और दूध भी ज्यादा देती थीं.

रमेश भी वहां पर भैंस चराने जाता था. रमेश से मिल कर चंदू खुश हो गया. दोनों अपनी भैंसों को चराने रोजाना कोसी नदी के तट पर ले जाने लगे. भैंसें घास चरती रहतीं, चंदू और रमेश आपस में गपें लड़ाते रहते.

रमेश के पास एक अच्छा मोबाइल फोन था. वह उस में गाना लगा देता था. दोनों गानों की धुन पर मस्त रहते. कभी कोई अच्छा वीडियो होता तो रमेश चंदू को दिखाता.

चंदू भी ऐसा ही मोबाइल फोन लेने की सोचता था, पर कभी उतने पैसे न हो पाते थे. उस के पास सस्ता मोबाइल फोन था जिस से सिर्फ बात हो पाती थी.

कुछ दिनों से एक चरवाहा लड़की अपनी 20-22 बकरियों को चराने कोसी नदी के तट पर लाने लगी थी. वह 20 साल की थी. शक्लसूरत कोई खास नहीं थी, लेकिन नई जवानी की ताजगी उस के चेहरे पर थी.

रमेश ने जल्दी ही उस लड़की से दोस्ती बढ़ा ली थी. अब वह चंदू के साथ कम ही रहता था. वह हमेशा उस लड़की को दूर ले जा कर बातें करता रहता था.

रमेश से ही चंदू को मालूम हुआ था कि उस चरवाहा लड़की का नाम मुन्नी है, जो पास के गांव में अपनी विधवा मां के साथ रहती है.

चंदू को हमेशा चिंता रहती थी कि भैंसों का पेट भरा या नहीं. मौका देख जहां अच्छी घास मिलती वह काट लेता ताकि घर लौट कर भैंसों को खिला सके. लेकिन रमेश मुन्नी के चक्कर में अपनी भैंसों की भी परवाह नहीं करता था. वह चंदू को ही अपनी भैंसों की देखरेख करने को कह कर खुद मुन्नी के साथ दूर झाड़ियों की ओट में चला जाता था.

चंदू को रमेश और मुन्नी पर बहुत गुस्सा आता. दोनों मटरगश्ती करते रहते और उसे दोनों के मवेशियों की देखभाल करनी पड़ती.

एक दिन चंदू ने गौर किया कि एक काली और ऊंचे सींग वाली बकरी गायब है. उस ने इधरउधर ढूंढ़ा पर वह कहीं नहीं मिली. वह घबरा गया और दौड़तेदौड़ते उन   झाडि़यों के पास जा पहुंचा जिन की ओट में रमेश और मुन्नी थे ताकि उन्हें बकरी के खोने के बारे में बता दे. लेकिन चंदू के अचरज और नफरत का ठिकाना न रहा जब उस ने उन दोनों को आधे कपड़ों में एकदूसरे से लिपटे देखा.

चंदू उलटे पैर लौट गया. थोड़ी देर और ढूंढ़ने पर चंदू को वह खोई हुई बकरी एक गड्ढे में बैठ कर जुगाली करते हुए मिल गई. वह शांत हो गया लेकिन उसे रमेश पर रहरह कर गुस्सा आ रहा था.

काफी देर बाद रमेश चंदू के पास आया तो चंदू उस पर उबल पड़ा, ‘‘तुम जो भी कर रहे हो वह ठीक नहीं है. तुम 2 बच्चों के बाप हो. घर पर तुम्हारी बीवी है, फिर भी ऐसी हरकत. अगर कहीं कुछ गलत हो गया तो मुन्नी से कौन शादी करेगा?’’

रमेश सब सुन रहा था. वह बेहयाई से बोला, ‘‘तुम्हें भी मजा करना है तो कर ले. मैं ने कोई रोक थोड़ी लगा रखी है,’’ इतना कह कर वह एक गाना गुनगुनाते हुए अपनी भैंसों की तरफ चल पड़ा.

धीरेधीरे 5 महीने बीत गए. मुन्नी पेट से हो गई थी. उस के पेट का उभार दिखने लगा था.

रमेश ने भी अब मुन्नी से मिलनाजुलना कम कर दिया था. मुन्नी खुद बुलाती तभी जाता और तुरंत वापस आ जाता. उस ने मुन्नी को   झाडि़यों में ले जाना भी बंद कर दिया था.

कुछ दिनों के बाद रमेश ने कोसी नदी के तट पर भैंस चराने आना भी छोड़ दिया. जब रमेश कई दिनों तक नहीं आया तो एक दिन मुन्नी ने चंदू के पास आ कर रमेश के बारे में पूछा.

चंदू ने जवाब दिया, ‘‘मु  झे नहीं मालूम कि रमेश अब क्यों नहीं आ रहा है.’’

मुन्नी रोने लगी. वह बोली, ‘‘अब इस हालत में मैं कहां जाऊंगी. किसे अपना मुंह दिखाऊंगी. कौन मु  झे अपनाएगा. रमेश ने शादी का वादा किया था और इस हालत में छोड़ गया.’’

थोड़ी देर आंसू बहाने के बाद मुन्नी दोबारा बोली, ‘‘अगर रमेश कहीं मिले तो एक बार उसे मु  झ से मिलने को कहना.’’

‘‘ठीक है. वह मिला तो मैं जरूर कह दूंगा,’’ चंदू ने कहा.

इस के बाद मुन्नी धीरे से उठी और बकरियों के पीछे चली गई.

उस दिन से चंदू रमेश पर नजर रखने लगा.

एक दिन चंदू ने रमेश को मोटरसाइकिल पर शहर की ओर जाते देखा. मोटरसाइकिल पर दूध रखने के कई बड़े बरतन लटके हुए थे.

‘‘कहां जा रहे हो रमेश? आजकल तुम दिखाई नहीं देते?’’ चंदू ने पूछा.

‘‘आजकल काम बहुत बढ़ गया है. शहर में 200 घरों में दूध पहुंचाने जाता हूं इसीलिए समय नहीं मिलता,’’ रमेश ने दोटूक जवाब दिया.

‘‘200 घर… पर तुम्हारी तो 2 ही भैंसें हैं. वे 30-40 लिटर से ज्यादा दूध नहीं देती होंगी, फिर 200 घरों में दूध कैसे देते हो?’’ चंदू ने पूछा.

‘‘ऐसा है…’’ रमेश अटकते हुए बोला, ‘‘मैं गांव के कई लोगों से दूध खरीद कर शहर में बेच देता हूं.’’

‘‘इसीलिए इतनी तरक्की हो गई है. मोटरसाइकिल की सवारी करने लगे हो…’’ चंदू ने कहा, ‘‘खैर, एक बात बतानी थी. मुन्नी तुम्हें याद कर रही थी. तुम्हें जल्दी से जल्दी मिलने को कह रही थी.’’

मुन्नी का जिक्र आते ही रमेश परेशान हो गया. वह बोला, ‘‘इन फालतू बातों को छोड़ो. मेरे पास समय नहीं है. मु  झे शहर जाना है. देर हो रही है,’’ कह कर उस ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और चला गया.

चंदू को बहुत गुस्सा आया. कोई लड़की परेशानी में है और रमेश को जरा भी परवाह नहीं है. लेकिन चंदू क्या कर सकता था.

एक दिन चंदू अपनी भैंसें कोसी नदी के तट पर चरा रहा था कि तभी उस ने किसी के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनी. उस समय वहां कोई नहीं था.

चंदू आवाज की दिशा में आगे बढ़ा. कुछ दूर चलने के बाद उस ने   झाडि़यों के पीछे मुन्नी को लेटे देखा जो रहरह कर चीख रही थी. चंदू कुछकुछ सम  झ गया कि शायद मुन्नी को बच्चा जनने का दर्द हो रहा था.

मुन्नी की हालत खराब थी. वह बेसुध हो कर जमीन पर पड़ी थी. कभीकभी वह अपने हाथपैर पटकने लगती थी. चंदू ने सोचा कि लौट जाए, लेकिन मुन्नी को इस हाल में छोड़ कर जाना उसे ठीक नहीं लगा. वह हिम्मत कर के मुन्नी के पास पहुंचा और उसे ढांढस बंधाने लगा.

थोड़ी देर बाद बच्चे का जन्म हो गया. चंदू ने लाजशर्म छोड़ कर मुन्नी की देखभाल की. बच्चे को साफ कर अपने गमछे में लपेट कर मुन्नी के पास लिटा दिया. मुन्नी को बेटा हुआ था.

जब सूरज डूबने को आया तब जा कर मुन्नी कुछ ठीक महसूस करने लगी. लेकिन बच्चे को देख कर वह रो पड़ी. बिना शादी के पैदा हुए बच्चे को वह अपने पास कैसे रख सकती थी?

मुन्नी रोते हुए बोली, ‘‘मैं इस बच्चे को अपने साथ नहीं रख सकती. लोग क्या कहेंगे? इसे यहीं छोड़ जाती हूं या कोसी में बहा देती हूं.’’

यह सुन कर चंदू कांप गया. कुछ सोच कर वह बोला, ‘‘अगर तुम बच्चे को अपने साथ नहीं रखना चाहती तो मैं इसे अपने पास रख लूंगा.’’

‘‘ठीक है भैया, जैसा आप चाहो. लेकिन इस बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए, नहीं तो मैं बदनाम हो जाऊंगी,’’ कह कर मुन्नी लड़खड़ाते कदमों से अपनी बकरियों को हांक कर घर की ओर चल पड़ी.

बच्चे को गोद में उठा कर चंदू भी भैंसों के साथ घर लौट आया. बच्चे को देख कर उस की पत्नी बोली, ‘‘यह किस का बच्चा उठा लाए हो?’’

चंदू ने   झूठ बोला, ‘‘पता नहीं किस का बच्चा है. मु  झे तो यह   झाडि़यों के पीछे मिला था. शायद अनचाहा बच्चा है. इस की मां इसे झाड़ियों के पीछे फेंक गई होगी.’’

चंदू की पत्नी बोली, ‘‘चलो, बच्चे की जिंदगी बच गई. हमारी एक ही बेटी है, अब बेटे की कमी पूरी हो गई.’’

पत्नी की बात सुन कर चंदू ने राहत की सांस ली. लेकिन चंदू को रमेश का मतलबी रवैया खटकता था. कोई कुंआरी लड़की के प्रति इतना लापरवाह कैसे हो सकता है?

रमेश बहुत तरक्की कर रहा था. चंदू ने गांव वालों से सुना कि उस ने काफी सारी जमीन और एक ट्रैक्टर खरीद लिया था. वह पक्का मकान भी बनवा रहा था. लेकिन चंदू को यह सम  झ में नहीं आता था कि 200 घरों में दूध देने के लिए कम से कम 200 लिटर दूध चाहिए, जबकि उस की भैंसें 30-40 लिटर से ज्यादा दूध नहीं देती होंगी.

हैरानी की बात यह भी थी कि गांव वाले भी रमेश को दूध नहीं बेचते थे क्योंकि गांव में दूध की कमी थी.

धीरेधीरे 6 महीने बीत गए. चंदू पहले की तरह अपनी भैंसों को चराने कोसी नदी के तट पर ले जाता था, पर मुन्नी ने वहां आना छोड़ दिया था.

एक शाम चंदू अपनी भैंसों को चरा कर लौट रहा था तो रास्ते में उस ने एक बरात जाती देखी. पता किया तो मालूम हुआ कि बगल के गांव में मुन्नी नाम की किसी लड़की की शादी है.

चंदू समझ गया कि उसी मुन्नी की शादी है. वह खुश हो गया. बेचारी मुन्नी बदनाम होने से बच गई.

घर पहुंचा तो चंदू ने एक और नई बात सुनी. गांव में कई पुलिस वाले आए थे और रमेश को गिरफ्तार कर के ले गए थे.

रमेश अपने घर में नकली दूध बनाता था. उस से खरीदा हुआ दूध पी कर शहर के कई लोग बीमार पड़ गए थे. चंदू को रमेश की तरक्की का राज अब अच्छी तरह समझ में आ गया था. Story in Hindi

नसीब : वैदेही की दर्द भरी कहानी

Social Story. वैदेही फार्मेसी के आखिरी साल में थी. वह मोहिते परिवार की सबसे शांत और सुशील बेटी थी. घर में कोई मेहमान भी आ जाए तो गिलास का पानी ले कर बाहर नहीं आती थी. कुछ सवालों के जवाब देने के अलावा वह कभी किसी से बात नहीं करती थी.

वैदेही पढ़ाईलिखाई में होशियार थी. देखने में भी वह खूबसूरत थी इसलिए हर कोई उस के लिए एक अच्छा रिश्ता चाहता था. घर में दादादादी थे. छोटी बहन अक्षरा 8वीं जमात में पढ़ती थी. पिता की किराना की दुकान थी और मां मालिनी खुशमिजाज. इस तरह से वैदेही का एक सुंदर परिवार था.

‘‘अरे ओ मालिनी, 8 बज गए, नाश्तापानी दोगी कि ऐसे ही भूखा मारोगी?’’

‘‘हांहां लाती हूं. हम लोग मरमर के काम करते हैं, फिर भी भूख नहीं लगती है और इन्हें चारपाई पर बैठेबैठे ही भूख लग जाती है. 2 बेटों को जन्म दिया है तो दोनों के घर जा कर रहना चाहिए न. मैं ने अकेले ठेका ले रखा है क्या इन बूढ़ेबुजुर्गों का?’’

‘‘अब चुप हो जा मां, क्या सवेरेसवेरे तुम दोनों का बड़बड़ाना शुरू हो जाता है.’’

‘‘बहू, चाय रख दे. वामन काका आए हैं.’’

‘‘12 बजे तक 4 कप चाय पी कर जाएगा यह बुड्ढा. पूरी जिंदगी बीत गई यही सब करने में.’’

‘‘बहू, चाय ला रही हो न?’’

‘‘हां, ला रही हूं बाबा.’’

दादादादी के साथ मां की होने वाली किचकिच देख कर वैदेही का शादी से मन ही उठ गया था. हम पढ़ेलिखे हैं, खुद कमाखा सकते हैं, शादी कर के दूसरे के परिवार में नौकर की तरह क्यों रहना? वैदेही शाम को कालेज से आई. मातापिता कमरे में ही बैठे थे.

‘‘क्यों न हम 4-5 दिन के लिए कहीं घूम आएं? अब तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं.’’

‘‘मालिनी, मैं ने कितनी बार कहा है कि पैसे ले लो और बच्चों को ले कर कहीं घूमने चली जाओ. मांपिताजी को छोड़ कर मैं कहीं बाहर नहीं जा सकता हूं.’’

‘‘हां, हमेशा की तरह बहाना बनाओ. उन्हें 4-5 दिन के लिए अपने छोटे भाई के पास क्यों नहीं भेज देते?’’

‘‘मैं ऐसा नहीं करूंगा और आगे से इस मुद्दे पर किसी तरह की कोई बात नहीं होगी,’’ ऐसा बोलते हुए नितिन हाथ में पकड़ा अखबार फेंकते हुए घर से बाहर निकल गया. मालिनी हमेशा की तरह रसोई में जा कर रोने लगी.

‘‘मेरा नसीब ही फूटा है. यह बंगला, गाड़ी और पैसा होने के बावजूद कोई फायदा नहीं है. कभी थिएटर में फिल्म देखने तक नहीं गई. होटल में खाना, सैरसपाटा करना किसी तरह का कोई मजा नहीं है जिंदगी में.’’

‘‘मां, मेरी शादी होने के बाद मेरे साथ भी तो ऐसा ही होगा?’’

‘‘ऐसा नहीं है बेटी. औरत का जन्म ही दूसरों के लिए हुआ है. तुम दोनों

मेरी प्यारी बेटियां हो, यही मेरा असली सुख है.’’

मेहमानों का देखने आना, सिर पर पल्लू रख कर चलना, दहेज की मांग करना, शादी के बाद सासननद के ताने सुनना और उन के छोटेछोटे बच्चों की सेवा करना, बड़ों के पैर छूना वगैरह कितनी बकवास परंपराएं हैं.

इस के अलावा किसी की मौत हो जाने के बाद 10-10 दिन तक नातेरिश्तेदारों का जमावड़ा लगने पर सभी को खाना बना कर खिलाना वगैरह.

एक बहू को लगातार घर का काम करते हुए वैदेही ने करीब से देखा. एक बार शादी हो गई तो हम इस परंपराओं में पूरी तरह से फंस जाएंगे, जिस से छुटकारा मिलना मुश्किल है. इस से बेहतर है कि मैं शादी ही न करूं.

एक दिन दूध लेने वैदेही बाहर गई. पड़ोस के ही सार्थक से उस की टक्कर हो गई. सार्थक हैंडसम था. 10वीं के बाद डिप्लोमा कर के 2 साल से वह पुणे की एक कंपनी में नौकरी करता था. इस समय वह 2 महीने की छुट्टी ले कर गांव आया था. वैदेही उसे अच्छी लगती थी, इसलिए वह अलगअलग तरीके से उस का ध्यान खींचने की कोशिश करता था.

दूसरे दिन वैदेही कालेज जाने के लिए निकली. सार्थक भी उस के पीछेपीछे मोटरसाइकिल से गया. वैदेही ने अपनी गाड़ी के शीशे में से सार्थक को आते हुए देखा और नजरअंदाज कर के चली गई.

सार्थक पूरा दिन उस के फार्मेसी कालेज में बैठा रहा. शाम को कालेज से निकलते ही उस ने वैदेही को रोक लिया, ‘‘वैदेही, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मुझ से शादी करोगी?’’

‘‘पागल हो क्या तुम? काम क्या करते हो?’’

‘‘पुणे की एक कंपनी में नौकरी करता हूं. 15,000 रुपए तनख्वाह है मेरी. तुम भी वहां 12,000 से 13,000 रुपए कमा सकती हो. सुखी संसार होगा हमारा.’’

‘‘चुप… घर वाले सुनेंगे तो मुझे ही मार डालेंगे.’’

‘‘क्यों मारेंगे? अभीअभी मेरे फ्रैंड की लव मैरिज हुई है. पहले रजिस्टर मैरिज करेंगे, फिर जान को खतरा है बता कर पुलिस स्टेशन में एफआईआर कर देंगे. कुछ नहीं होता है.’’

‘‘बहुत प्रैक्टिस किए लगते हो. चलो हटो रास्ते से.’’

‘‘तो क्या मैं हां समझ?’’

‘‘मैं ने हां बोला क्या?’’

‘‘लेकिन, न भी तो नहीं कहा अभी तुम ने.’’

वैदेही मन ही मन हंसते हुए अपनी गाड़ी पर बैठ के निकल गई. सार्थक अकसर अपनी खिड़की से उस के घर की तरफ देखता रहता था.

वैदेही के बाहर निकलने पर हाथ हिला कर इशारा करता था. मोबाइल फोन पर गाने बजाता था. उसे कालेज में जा कर गिफ्ट देता था. उस के बाहर जाते ही वह भी मोटरसाइकिल ले कर उस के पीछे लग जाता था.

‘‘तुम बस हां कह दो वैदेही. कुछ दिक्कत नहीं होगी. मेरा एक दोस्त पुणे में पुलिस विभाग में है. वह हमारी मदद करेगा. मैं तुम्हें जिंदगीभर खुश रखूंगा. तुम जैसा कहोगी वैसे ही होगा. तुम्हें कभी बिना खाए सोना नहीं पड़ेगा.

‘‘मुझ से ज्यादा तुम्हें कोई प्यार नहीं करेगा. मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं. सिर्फ तुम हां कह दो.’’

सार्थक की रोमांटिक कविताएं, मैसेज सबकुछ वैदेही को अच्छे लगते थे. दादादादी की रोजरोज की किचकिच, मांपिता के बीच आपसी मनमुटाव देख कर वह सोचने लगी, अरैंज मैरिज करने के बाद मेरे साथ भी यही होगा. ऐसे में भाग कर सार्थक से शादी कर लेने में क्या बुराई है.

इसी विचार के साथ एक दिन वैदेही सार्थक के साथ भाग कर पुणे आ गई. इस के बाद दोनों परिवारों की खूब बदनामी हुई.

सार्थक वैदेही के साथ अपने एक दोस्त के फ्लैट में रहने लगा. 10-15 दिन अच्छे से बीते. इस के बाद वैदेही नौकरी करने की जिद करने लगी.

‘‘अभी इस की जरूरत नहीं है. पैसे की कमी होगी तो मैं खुद तुम्हारे लिए नौकरी देखूंगा स्वीट हार्ट.’’

एक दिन सार्थक कोल्डड्रिंक की बोतल ले कर आया, जिसे देखते ही वैदेही ने मुंह लगाया और आधी बोतल खाली कर दी. 5-10 मिनट बाद उसे नींद आने लगी.

‘‘सार्थक, मुझे कुछ हो रहा है यार.’’

‘‘कुछ नहीं होगा. तुम बैड पर चुपचाप सो जाओ. मैं यहीं हूं.’’

दूसरे दिन जब वैदेही उठी तो देखा कि उस की बगल में कोई दूसरा लड़का सोया हुआ है. वैदेही के साथ जो हुआ, उसे वह समझ गई. वह जल्दी से कमरे से बाहर आई.

‘‘धोखेबाज, तुम ने मुझे फंसाया है. मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी. पुलिस में शिकायत करूंगी,’’ वैदेही ने सार्थक से कहा.

‘‘जा, पुलिस के पास जा. वे लोग तुम्हें खड़ा भी करेंगे क्या. 10 दिन पहले वही पुलिस तुम्हें अपने मांपिता के पास जाने की कह रही थी तो तुम ने नहीं सुना.’’

‘‘कितने गिरे हुए इनसान हो तुम. एक लड़की की जिंदगी से खेलते हुए तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आई?’’

‘‘अरे ओ लड़की, जो अपने जन्म देने वाले मांपिता की नहीं हुई तो वह भविष्य में मेरा क्या होगी? मांपिता के चेहरे पर कालिख लगाते हुए तुम्हें जरा भी लाजशर्म नहीं आई. और अब तुम मुझ से लाजशर्म की बात करती हो?’’

वैदेही फूटफूट कर रोने लगी. पुलिस के पास जाने में उसे शर्म आ रही थी. सार्थक के अलावा जिंदगी में कभी किसी पर यकीन नहीं किया था. अब मैं यहां से कहां जाऊंगी. लेकिन यहां रहूंगी तो धंधा करना पड़ेगा.

‘‘मांपिता को दुख दे कर दुनिया में कोई खुश नहीं रह सकता, यह सच है. मुझे माफ कर दो, लेकिन किसी तरह सार्थक के चंगुल से बाहर निकालो,’’ वैदेही मन ही मन खुद को कोस रही थी.

सार्थक बाहर चला गया था. थोड़ी देर बाद ही उन्मेष बैडरूम से बाहर आया.

‘‘मैं ने सब सुन लिया है. इस लफंगे के साथ घर छोड़ कर तुम आई थी. तुम ने कभी सोचा कि तुम्हारे इस बरताव से मांपिता की समाज में कितनी बदनामी होगी. जिंदगी के 20 साल साथ रहने वाले मांपिता को छोड़ कर 2 महीने की पहचान के इस गुंडेमवाली के जाल में कैसे फंस गई तुम? ऐसे में तुम्हारी पढ़ाईलिखाई का क्या फायदा है?’’

‘‘मैं सब समझ रही हूं, लेकिन अब क्या करूं?’’

‘‘तुम्हारे लिए एक प्रस्ताव है मेरे पास. मेरी बीवी के बच्चा नहीं हो सकता है. क्या तुम मुझे बच्चा दोगी? मैं जिंदगीभर तुम्हें प्यार और इज्जत दूंगा.’’

‘‘सार्थक के साथ रहने के बजाय अगर मेरी जिंदगी किसी के काम आ जाए तो इस में क्या गलत है. मैं तैयार हूं तुम्हारे साथ रहने के लिए. लेकिन, सार्थक…?’’

‘‘उसे मैं देख लूंगा. उस के मुंह पर पैसे फेंक कर मैं तुम्हें उस से आजाद करा लूंगा.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हारे साथ आने के लिए तैयार हूं.’’

वैदेही बैग ले कर उन्मेष के साथ एक नए सफर पर निकल गई. Social Story

Hindi Story : दो नावों की सवारी, किसको पड़ी भारी

Hindi Story. ‘‘जब मैं उसे देखता हूं, तो अपने होश खो बैठता हूं. उस के बिना तो मेरा जीना मुश्किल हो गया है,’’ राकेश ने अपने दोस्त अजय से कहा.

अजय ने चेहरे पर हलकी सी मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘यार राकेश, तू तो बड़ा छिपा रुस्तम निकला. तू ने आज तक कभी यह बात नहीं बताई.’’

राकेश बोला, ‘‘प्यार ऐसी चीज है, जिस के बारे में किसी को नहीं बताया जा सकता. तू मेरा बचपन का दोस्त है, इसलिए मैं ने तुझे यह बात बताने की हिम्मत की है.’’

राकेश और अजय एक झोंपड़ी में बैठे हुए ये बातें कर रहे थे, जो राकेश के खेत पर बनी हुई थी. यहीं पर खेतों में सिंचाई करने के लिए एक ट्यूबवैल लगा था.

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राकेश ज्यादातर ट्यूबवैल पर ही रहता है. यहीं उस के कुछ दोस्त आ जाते थे, जिन से उस का मन लगा रहता था.

गांव की ज्यादातर औरतें इसी ट्यूबवैल पर पानी भरने आती थीं. क्या करें, उन की भी मजबूरी थी, क्योंकि गांव का पानी खारा था. गीता भी यहां रोजाना पानी लेने आती थी. राकेश और गीता की प्रेम कहानी इसी ट्यूबवैल से शुरू हुई थी.

राकेश बीए में पढ़ता था. उस के 2 बड़े भाई थे. एक भाई नौकरी करता था और दूसरा भाई खेती संभालता था. राकेश कालेज से पढ़ कर यहीं  झोंपड़ी में आ जाता था, क्योंकि यहां हरेभरे पेड़ थे और शांत माहौल था.

रोजाना की तरह गीता आज भी पानी भरने आई थी. वह अपना बरतन भरने वाली थी कि बिजली चली गई. वह सोच में पड़ गई कि अब क्या करे. उधर राकेश पास में ही चारपाई पर बैठा किताबें पढ़ रहा था. अकेली लड़की, आसपास भी कोई नहीं, ऐसे में किसी का भी मन भटक सकता है. ऐसा ही राकेश के साथ भी हुआ. वह गीता को प्यारभरी नजरों से देखने लगा.

राकेश को देख कर गीता के मन में शक पैदा होने लगा और वह घबरा कर इधरउधर देखने लगी. राकेश गीता से बातें करना चाह रहा था, पर उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. थोड़ी देर बाद राकेश हिम्मत बटोर कर चारपाई से उठा और गीता की तरफ बढ़ा, लेकिन उस के पास पहुंचते ही वह सबकुछ भूल गया.

गीता ने राकेश को देख कर अच्छी तरह पहचान लिया कि वह उस से बात करना चाहता है, पर घबराहट के चलते कुछ कह नहीं पा रहा है. गीता का डर खत्म हुआ और उस के खूबसूरत चेहरे पर मुसकान आ गई.

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गीता की इस मुसकान को देख कर राकेश के दिल में गुदगुदी होने लगी. इसी बीच बिजली आ गई. राकेश ने फौरन मोटर चला दी और गीता पानी भरने लगी. पानी भर कर गीता गांव की तरफ जाने लगी, तो राकेश उसे तब तक देखता रहा, जब तक वह गांव में नहीं पहुंच गई.

एक दिन राकेश ने ठान लिया कि वह गीता से अपने प्यार का इजहार कर के ही रहेगा. उसी समय गीता रोजाना की तरह पानी भरने आई. राकेश हिम्मत कर के गीता के पास गया और बोला, ‘‘गीता, मुझे तुम से कुछ कहना है.’’ गीता बोली, ‘‘क्या?’’ राकेश बोला, ‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगी?’’ गीता ने कहा, ‘‘बुरा क्यों मानूंगी?’’

राकेश हिम्मत कर के धीरे से बोला, ‘‘गीता, मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. तुम मुझे अच्छी लगने लगी हो.’’ यह सुन कर गीता का चेहरा सुर्ख पड़ गया. यह देख राकेश डर गया. गीता बिना कुछ बोले पानी का बरतन ले कर चली गई. रास्ते में वह राकेश के बारे में सोचती जा रही थी और बीचबीच में उस के चेहरे पर हलकी मुसकराहट भी आ जाती थी.

इस के बाद राकेश और गीता के बीच रोजाना बातें होती रहीं और दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. अजय को पता चला कि राकेश जिस लड़की से प्यार करता है, वह तो उसी की महबूबा है, तो वह उस से जलने लगा.

अजय का गीता से एक साल से इश्क का चक्कर चल रहा था. गीता भी अजय को प्यार करती थी, लेकिन राकेश को इस बारे में कुछ पता नहीं था. गीता का खिंचाव अजय से हट कर राकेश की तरफ बढ़ने लगा, यह बात अजय को अच्छी नहीं लग रही थी.

एक दिन अजय ने गीता से पूछा, ‘‘तू राकेश से बात क्यों करती है?’’ गीता ने जवाब दिया, ‘‘तुझे क्या मतलब है? मैं किसी से भी बात करूं, मेरी मरजी.’’ यह सुन कर अजय के अंदर मानो ज्वालामुखी फट पड़ा था. वह मन ही मन राकेश से नफरत करने लगा. उस ने सोच लिया, ‘अगर गीता मेरी नहीं हुई, तो मैं किसी की भी नहीं होने दूंगा.’

अजय ने भोला से बात की. भोला एक नंबर का ऐयाश था. उस की कमजोरी लड़की औैर शराब थी. ‘‘भोला, अगर आज तेरी मदद मिले, तो तु  झे हुस्न और शराब दोनों मिल सकते हैं.’’ यह सुन कर भोला पागल भेडि़ए की तरह फड़फड़ाने लगा और बोला, ‘‘जल्दी बोल यार, क्या करना है?’’ अजय ने जैसे ही शराब की बोतल निकाली, भोला के मुंह में पानी आ गया. अजय बोला, ‘‘आज जितनी पीना चाहे उतनी पी लेना, लेकिन अभी नहीं. काम हो जाने के बाद.’’

भोला अजय के साथ राकेश के ट्यूबवैल पर आ गया. राकेश वहां चारपाई पर बैठ कर पढ़ाई कर रहा था. अजय और भोला उस के पास आ कर बैठ गए. राकेश कुछ कहने वाला था कि अजय ने राकेश के गले में रस्सी डाली और उसे खींचने लगा. राकेश ने थोड़ी देर हाथपैर मारे, फिर शांत हो गया.

दोनों ने उसे झोंपड़ी में डाल दिया और झोंपड़ी के पीछे छिप गए. वहां दोनों ने खूब शराब पी. थोड़ी देर बाद गीता पानी भरने आई. जब राकेश दिखाई नहीं दिया, तो वह झोंपड़ी के अंदर चली गई. उस ने जैसे ही राकेश की लाश को देखा, तो वह डर के मारे कांपने लगी. वह कुछ सोचती, उस से पहले ही अजय और भोला ने उसे दबोच लिया.

अजय गीता से बोला, ‘‘आज तेरी वजह से मेरे दोस्त की जान गई है. पहले तू ने मु  झ से प्यार किया और फिर राकेश से. तु झे यह नहीं पता कि मेरे दिल पर क्या बीत रही थी. ‘‘तुम लड़कियों में यही कमी है. पहले प्यार का ढोंग करती हो, फिर किनारा कर जाती हो. आज तु  झे इस की सजा जरूर मिलेगी.’’

यह कह कर उन दोनों ने गीता को पकड़ लिया और बारीबारी से मुंह काला करने के बाद उसे जाने दिया.

बेचारी गीता अपने दुपट्टे को मुंह में दबाए रोती हुई गांव की तरफ चल दी. साथ ही, वह अपनेआप को कोसती जा रही थी कि आज अगर वह दोतरफा प्यार नहीं करती, तो शायद राकेश की जान और उस की इज्जत नहीं जाती. Hindi Story

Social Story :13 साल की वेश्या – शहजाद की रंगरलियां

Social Story. आज रविवार है यानी छुट्टी का दिन, इसलिए घर वालों की ओर से शहजाद को सुबह ही एक काम की जिम्मेदारी सौंप दी गई है, ईख के खेत में पानी लगाना. उस की 10 बीघा जमीन गांव फौलादपुरा से पूर्व की तरफ 2 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसे वह अपना ‘चक’ कहता है.

आबादी और मकानों की लगातार बढ़ती तादाद से शहजाद का गांव फौलादपुरा पश्चिम की ओर देवबंद शहर से मिलने ही वाला है. अगले कुछ सालों में शायद फौलादपुरा देवबंद शहर का एक महल्ला कहलाने लगे.

फौलादपुरा से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय है. इस कालेज से शहजाद ने बीए किया है. एक साल एमए हिंदी की भी पढ़ाई की थी, लेकिन फेल हो जाने के चलते बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी.

प्रोफैशनल कोर्स की बहुत ज्यादा डिमांड देख कर शहजाद ने देवबंद के प्राइवेट आईटीआई संस्थान ‘मदनी टैक्निकल इंस्टीट्यूट’ में दाखिला ले लिया.

इंस्टीट्यूट से छुट्टी होने के बाद शहजाद इलैक्ट्रौनिक की एक दुकान पर काम करता है. इस से उस की जेब और पढ़ाई का खर्च निकल आता है.

शहजाद अपनी पढ़ाई और काम में बहुत ज्यादा बिजी रहता है, इसलिए उसे घर और खेती का काम कभीकभार ही करना पड़ता है. लेकिन आज छुट्टी के दिन सुबह ही उस की ड्यूटी पक्की हो गई है कि उसे खेत में पानी लगाना है. पानी रजवाहे से लिया जाएगा, जिस का ओसरा सुबह 11 बजे शुरू हो कर दोपहर के डेढ़ बजे तक रहेगा.

शहजाद ठीक 11 बजे साइकिल से खेत पर पहुंच गया. रजवाहे से पानी चालू कर वह देवबंद घूमने चल दिया, क्योंकि उस का खाने का तंबाकू खत्म हो गया था, जिसे वह और उस के देस्त ‘रोक्कड़’ कहते हैं. वह उस के बिना नहीं रह सकता.

‘जब तक देवबंद से ‘रोक्कड़’ ले कर आऊंगा, खेत भरा मिलेगा,’ यही शहजाद का अंदाजा था.

देवबंद में कई जगहों पर घूमने के बाद एक भी दुकान खुली हुई नहीं दिखाई दी. रविवार के दिन सभी दुकानें बंद रहती हैं. कुछ हफ्ते से एसडीएम के आदेश पर इस नियम का सख्ती से पालन किया जा रहा है. दुकान खोलने पर चालान कटने का डर रहता है. शाम के समय ही कुछ जरूरी सामान की दुकानें खुल सकेंगी.

‘रोक्कड़’ के बिना शहजाद का काम नहीं चलेगा, क्योंकि इस के न खाने पर सारा जबड़ा हिलता हुआ सा महसूस होने लगता है. कभीकभी ऐसा भी लगता है, जैसे सभी दांत तुरंत मुंह से बाहर गिर जाएंगे. अजीब सी कुलबुलाहट होने लगती है, इसलिए दुकान से न मिलने पर किसी न किसी दोस्त से ‘रोक्कड़’ लेना ही पड़ेगा.

एक दोस्त से ‘रोक्कड़’ ले कर शहजाद वापस खेत पर लौटा. अभी केवल एक घंटा ही बीता था. आते ही उस ने चैक किया कि खेत भरा है या नहीं? खेत अभी आधा ही भरा था. वह खेत की मेंड़ पर खड़ा हो कर सोचने लगा कि जब तक खेत पूरी तरह भर नहीं जाता, तब तक क्या किया जाए?

शहजाद सोच ही रहा था कि अचानक उस ने देखा कि एक बेमेल जोड़ा उस की तरफ ही आ रहा है. देवबंद जाने वाली पक्की सड़क से हट कर, कच्चे रास्ते से पैदल ही वह जोड़ा चला आ रहा था. इस रास्ते के दोनों ओर गन्ने के खेत थे. कुछ छिले हुए और कुछ बिना छिले हुए.

लड़की आगे चल रही थी और लड़का उस से कोई 5-7 कदम पीछे. पहले तो शहजाद ने अंदाजा लगाया कि दोनों में कोई चक्कर नहीं. लेकिन ईख की ओट आते ही लड़के ने लड़की के साथ गंदी हरकतें शुरू कर दीं. तब वह समझ गया कि दोनों में कोई चक्कर है.

लड़के ने लड़की के कूल्हे पर चूंटा. लड़की उस लड़के की ओर देख कर मुसकरा दी. कुछ इशारा करते हुए लड़की आगे बढ़ गई. लड़का कुतिया के पीछे कुत्ते के समान उछलकूद सी करते हुए चलने लगा.

लड़का एकदम हट्टाकट्टा था. मैली सी पैंटटीशर्ट पहने हुए, यही कोई 24-25 साल का. इस के उलट लड़की एकदम नादान, कुछ दुबलीपतली सी. न कूल्हों में ज्यादा भारीपन, छाती में हलका सा उभार. सांवला सा रंग, ज्यादा खूबसूरत भी नहीं. बस, कामचलाऊ. छोटा कद, उम्र यही कोई 13-14 साल. उस जोड़ी को देख कर नहीं लगता था कि लड़की लड़के के लिए किसी भी तरह से ठीक है.

उन दोनों को अपनी ओर आता देख शहजाद ईख की ओट में छिप गया. उसे यकीन था कि उन दोनों ने उसे नहीं देखा.

लड़कालड़की शहजाद के खेत के बगल वाले ईख के खेत में घुस गए. शहजाद तुरंत भांप गया कि मामला दूसरा है. शहजाद बहुत ही सावधानी से एकदम चुपचाप उन के पैरों के निशान देखता हुआ उसी जगह पर जा पहुंचा, जहां लड़कालड़की गए थे. उस ने दूर से जोकुछ देखा, उसे अपनी आंखों पर यकीन न हुआ. लड़की उस लड़के से चुंबक के समान चिपकी हुई थी.

शहजाद ने बहुत सी ब्लू फिल्में देखी थीं. रेप के किस्से सुने थे. लेकिन इस तरह का सैक्स देखने का मौका उसे पहली बार मिला था. उस के मन में एक हलचल सी मच गई. शरीर में कुछ हरारत सी होने लगी. लेकिन वह दिमागी रूप से बहुतकुछ चाहते हुए भी जिस्मानी रूप से कुछ न कर सका. पासा उलटा पड़ सकता था.

अगर शहजाद उन दोनों को धमकाता तो उस की भी धुनाई हो सकती थी. लड़का उस से काफी तगड़ा था. साथ ही, उस पर कोई गंदा इलजाम भी लग सकता था, इसलिए वह चुपचाप दबे पैर कुछ सोचते हुए वापस खेत की मेंड़ पर लौटा.

शहजाद ने तुरंत उसी दोस्त को फोन मिलाया, जिस से वह ‘रोक्कड़’ ले कर आया था, ‘‘हैलो, जल्दी आ. जुगाड़ फंसा हुआ है. अगर काम करना है, तो 5 मिनट में रजवाहे वाले खेत पर आ जा. किसी और को भी साथ लेते आना.’’

शहजाद के फोन करने के ठीक 8-10 मिनट बाद ही 2 लड़के बाइक से उस के पास पहुंच गए. उन के उतावलेपन को देख कर ऐसा लगा, जैसे अड्डे पर खड़े शहजाद के फोन का ही इंतजार कर रहे थे. फिर तीनों प्लान बना कर उसी जगह पर धमक पड़े, जहां वह जोड़ा था. शहजाद को वह जगह पता ही थी. लड़कालड़की दोनों अलगअलग लेटे हुए थे, लेकिन एकदूसरे के हाथ पकड़ रखे थे.

शहजाद और उस के दोस्तों ने पुलिस के समान दबिश दी. ‘धबड़धबड़’ की आवाज सुनते ही लड़का गिरतापड़ता भाग गया. लड़की भाग न सकी और फंस गई.

शहजाद ने उस लड़की की ओर आंखें निकाल कर डांटते हुए पूछा, ‘‘क्या कर रही थी? कौन था तेरे साथ?’’

लड़की ने घबराते हुए और तकरीबन भागने की हालत में खड़े हो कर कहा, ‘‘कोई नहीं था. मैं किसी को नहीं जानती. मैं तो अकेली ही शौच करने के लिए आई थी.’’

‘‘तो फिर यह पैंट किस की है? तू तो सलवार पहने हुए है या फिर पैंट भी साथ ले कर आई थी,’’ उन में से एक लड़के ने जमीन पर पड़ी पैंट की ओर इशारा करते हुए पूछा. वह लड़का अपनी पैंट वहीं छोड़ गया था.

‘‘मैं कुछ नहीं जानती. मुझे जाने दो. तुम मुझे मार डालोगे,’’ लड़की डरीसहमी सी बोली. वह उन सब की घूरती आंखें देखते ही उन की नीयत पहचान गई थी. वे तीनों उसे घेरे खड़े ताक रहे थे.

उन में से एक ने अपना रोब जमाते हुए कहा, ‘‘अच्छा, अपनी सलवार खोल कर दिखा, तू ने क्या किया है? अभी सब शीशे के समान साफ हो जाएगा. अभी पता चल जाएगा तेरी करतूतों का.’’

‘‘नहीं, मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया, जैसा तुम समझ रहे हो.’’

लड़की कुछ और बोलना चाह ही रही थी कि दूसरे लड़के ने तुरंत उस की कनपटी पर एक थप्पड़ जड़ दिया और बोला, ‘‘दिखा जल्दी, वरना अभी तेरे नाड़े से तेरा गला घोंट दूंगा.’’

लड़की ने डर कर तुरंत अपना नाड़ा खोल दिया और सलवार नीचे खिसका दी. तभी उन में से एक लड़के ने उस लड़की को गोद में उठाया और उसी ईख में कुछ दूर ले गया. थोड़ी देर बाद वह लड़का उठ कर आया, तो दूसरे लड़के ने उस लड़की को तुरंत दबा लिया.

थोड़ी देर बाद उस दोस्त ने शहजाद से कहा, ‘‘जा, तू भी अपना जुगाड़ कर ले,’’ लेकिन उस ने यह कहते हुए मना कर दिया, ‘‘नहीं यार, ज्यादा नहीं, बेचारी मर जाएगी.’’ शहजाद दुखी था. उस ने लड़की से पूछा, ‘‘वह लड़का तुझे कितने में तय कर के लाया था?’’ लड़की ने झिझकते हुए बता दिया, ‘‘50 रुपए में.’’

शहजाद ने अपनी जेब से 100 रुपए का नोट निकाला और उस के हाथ में थमा दिया. लड़की के चेहरे से दुख के बादल छंट गए और उस के शरीर में एक खुशी की लहर दौड़ गई. वह इस तरह चल दी जैसे कुछ हुआ ही नहीं. उस की चाल में भी टेढ़ापन नहीं दिखा.

10 दिन बाद देवबंद के पवित्र धार्मिक स्थल देवीकुंड पर ‘मां त्रिपुर बाला सुंदरी’ का मेला शुरू हो गया. यह मेला महीनेभर चलता था. आसपास के गांवों के लोगों के साथ ही दूरदराज की जगहों से भी लोग इस मेले को देखने आते थे. ज्यादा दूर के लोग अपने रिश्तेदारों के यहां ठहरते थे और अकसर रात के समय मेला देखने जाते थे.

जब मेला अपने जोरों पर था, शहजाद की भी मेला देखने की इच्छा हुई. घर पर 2 मेहमान दोस्त भी आए हुए थे, जिन्होंने मेले जाने को कहा था. रात के समय भीड़भाड़ ज्यादा होती थी. रात की भीड़ में लड़कियों के साथ अकसर छेड़छाड़ भी हो जाती थी.

शहजाद मेहमानों के साथ मेले की रंगबिरंगी दुनिया का मजा उठाने में बिजी था. कहीं स्टेज पर जोकर हंसाहंसा कर ग्राहकों को अपना शो देखने के लिए बुला रहे थे, तो कहीं लड़की तख्तों के बनाए स्टेज पर डांस कर के ‘मौत का कुआं’ देखने के लिए लोगों को बुला रही थी, जिस के पास ही बैठा एक छोकरा बड़बड़ा रहा था, ‘‘असली मौत का खेल देखो, नकली में पैसा मत फूंको, चले आओ.’’

किसी जगह पर हिजड़े लड़की के कपड़े पहन कर बिलकुल लड़की जैसे दिखते हुए ग्राहकों को अपनी ओर खींचने में लगे हुए थे. तमाशाई चिल्लाचिल्ला कर अपने शो की ओर बुला रहे थे.

उस भीड़ की दुनिया में शहजाद की नजर अचानक उसी 13-14 साल की लड़की पर पड़ी. उसे ईख के खेत वाली सारी घटना परदे पर चलने वाली फिल्म के समान दिखाई दी. शहजाद ने उस लड़की को मेहमान दोस्तों को दिखाते हुए सारा किस्सा बता दिया.

उस समय वह लड़की आर्य समाज पंडाल के बगल में बैठी हुई एक अधेड़ के साथ कुछ बतिया रही थी. पंडाल के उस तरफ थोड़ा अंधेरा था, इसलिए लोगों का ध्यान उधर कम ही जा रहा था.

एक ठेली से चाऊमीन खा कर वह लड़की उस अधेड़ के साथ प्रसाद ले कर मंदिर की ओर बढ़ी. लेकिन उन दोनों का प्रसाद चढ़ाना तो महज एक बहाना था. वे मंदिर के रास्ते से होते हुए पीछे आम के बाग में पहुंचे. पीछेपीछे शहजाद और उस के मेहमान दोस्त भी थे.

रात के इस पहर इस जगह पर लोगों की आवाजाही बंद हो चुकी थी. इस सूनेपन का फायदा उठा कर उन दोनों ने संबंध बना लिया. लड़की ने बिना चीखेचिल्लाए उस अधेड़ का पूरा साथ दिया.

अचानक शहजाद ने अपने मेहमानों के साथ उन दोनों को घेर लिया. उस अधेड़ की कनपटी पर 2-3 थप्पड़ मार कर उसे चलता कर दिया और लड़की को अपने दोनों मेहमानों के सामने परोस दिया.

काम पूरा हो जाने के बाद शहजाद ने उसे 200 रुपए थमा दिए. लड़की मुसकराती हुई चली गई. शहजाद मेहमानों समेत घर लौट आया.

2 दिन बाद शहजाद फिर मेला देखने पहुंचा. आज वह ‘राष्ट्रीय कवि सम्मेलन’ देखने आया था. उस ने सोचा कि जब तक कवि सम्मेलन ठीक से शुरू नहीं हो जाता, तब तक मेला घूम लिया जाए.

शहजाद घूमतेटहलते मेले के सब से बड़े झाले पर आ पहुंचा. वह खड़ा हो कर झले का टिकट लेने का विचार बना ही रहा था कि वही लड़की 2 होमगार्ड वालों के साथ बात करती हुई दिखाई दी. शहजाद फिर उस लड़की के पीछे हो लिया.

दोनों होमगार्ड उस लड़की को एक शिविर में ले गए. उस समय वहां केवल एक कार्यकर्ता था. एक होमगार्ड ने कुछ समय पहले वहां पहुंच कर उसे कहीं भेज दिया. पीछे से दूसरा होमगार्ड लड़की को ले कर शिविर में घुस गया. उन में से एक बाहर के शिविर में बैठ गया और दूसरा उस शिविर के पीछे छोटे से तंबू में घुस गया. 10-15 मिनट बाद वह बाहर आया, तो दूसरा पहुंच गया. तकरीबन इतने ही समय बाद वह भी बाहर आ गया.

उन दोनों के तंबू से निकल आने के बाद भी वह लड़की बाहर नहीं आई. शहजाद पूरे एक घंटे तक इंतजार करता रहा, लेकिन नतीजा जीरो था. शहजाद मेले में लौट आया, पर उस के दिमाग में वही लड़की घूमती रही.

मेले वाली दूसरी घटना के बाद शहजाद फिर अपने उसी खेत पर पहुंचा, जहां उस ने लड़की को पहली बार देखा था. वह मुख्य रूप से आया तो था कच्ची बस्ती में, जो उस के खेत से तकरीबन 200 मीटर की दूरी पर थी. वह खेत का निरीक्षण करता हुआ उस ओर निकल गया था.

कच्ची बस्ती से शहजाद को देशी मुरगा खरीदना था. शाम को कुछ खास लोग घर पर आने वाले थे. उस ने अपने एक जानकार से बात की, जो शहजाद के खेतों की देखभाल करता था, ईख छिलवाता था, गन्ने की बुग्गी भरवाता था और वक्त पड़ने पर उस की बेगार भी करता था.

बातों ही बातों में उस आदमी से पता चला कि इस बस्ती की एक लड़की 3 दिन से गायब है. पूरा देवबंद, गांवदेहात छान डाले, लेकिन समझ नहीं आ रहा है कि चोरों का माल कौन हजम कर गया?

शहजाद के सामने तुरंत उस मेले वाली लड़की का चित्र सा बन गया. उस ने लड़की के रूपरंग, उम्र, कपड़े, कदकाठी के बारे में पूछा, तो उस का शक यकीन में बदल गया. इस बारे में उस ने आगे बात करना ठीक नहीं समझ, क्योंकि इस मामले में वह भी फंस सकता था.

उस बस्ती के बहुत से लड़के राहजनी, चोरीचकारी करने वाले और गुंडे थे. गुंडों से बच कर निकलना ही सही था. रस्सी का सांप बना कर उस के गले में भी डाला जा सकता था.

समय कब रुका है और उसे कौन रोक सका है. 5 महीने बीतने के बाद शहजाद को अपने एक दोस्त के साथ किसी काम के सिलसिले में दिल्ली जाना पड़ा. एक रात दिल्ली में ही रुकने की योजना थी. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास दोनों ने एक होटल में कमरा बुक किया और रात को जीबी रोड की तरफ निकल गए.

वे दोनों किसी अच्छे माल की तलाश में घूम रहे थे कि अचानक शहजाद की नजर उसी 13-14 साल वाली लड़की पर पड़ी. इस समय उस का शरीर कुछ भराभरा सा दिखाई दे रहा था. छातियां उठी हुई थीं. शायद उस ने सांस रोक कर थोड़ा फुला भी रखी थीं. बदन के साथ ही कुछ चरबी गालों पर भी चढ़ गई थी.

होंठों पर सुर्खी, नैननक्श तीखे, अच्छे कपड़े, 2 मंजिलों के एक कोठे की खिड़की से मुंह बाहर निकाले हुए वह लड़की राहगीरों को इशारा कर रही थी कि आओ और मुझे अपनी हवस का शिकार बनाओ.

शहजाद को उस लड़की को देख कर यकीन न हुआ कि वह 13-14 की उम्र में वेश्या बन जाएगी. वह अपने दोस्त को नीचे ही छोड़ कर उसी कोठे पर पहुंचा और 1,000 रुपए में सौदा तय कर लिया. उस ने अपना काम निबटा कर लड़की से पूछा, ‘‘मुझे जानती हो?’’ ‘‘जानती तो नहीं, शायद पहचानती जरूर हूं. यहां बहुत से कस्टमर आते हैं. सब को याद रखना मुश्किल है.’’

‘‘तुम मेरे साथ अपने घर चलना चाहोगी?’’ शहजाद ने हमदर्दी दिखाते हुए उस से पूछा. ‘‘नहीं, मैं यहां पहले से ज्यादा खुश हूं. कम से कम यहां मुझे भरपेट खाना तो मिल जाता है. सौतेली मां ने तो मुझे वह भी नहीं दिया और ऊपर से धंधा भी कराया.’’

फिर उस लड़की ने लंबी आह भरते हुए कहा, ‘‘यहां से निकल पाना अब इतना आसान नहीं. पता नहीं यहां कितने दिन सड़ना पड़ेगा…’’ Social Story

Romantic Story : देह- क्यों खौफ में जी रही थी बुधिया

Romantic Story. चारपाई पर लेटी हुई बुधिया साफसाफ देख रही थी कि सूरज अब ऊंघने लगा था और दिन की लालिमा मानो रात की कालिमा में तेजी से समाती जा रही थी.

देखते ही देखते अंधेरा घिरने लगा था… बुधिया के आसपास और उस के अंदर भी. लगा जैसे वह कालिमा उस की जिंदगी का एक हिस्सा बन गई है…

एक ऐसा हिस्सा, जिस से चाह कर भी वह अलग नहीं हो सकती. मन किसी व्याकुल पक्षी की तरह तड़प रहा था. अंदर की घुटन और चुभन ने बुधिया को हिला कर रख दिया. समय के क्रूर पंजों में फंसी उलझी बुधिया का मन हाहाकार कर उठा है.

तभी ‘ठक’ की आवाज ने बुधिया को चौंका दिया. उस के तनमन में एक सिहरन सी दौड़ गई. पीछे मुड़ कर देखा तो दीवार का पलस्तर टूट कर नीचे बिखरा पड़ा था. मां की तसवीर भी खूंटी के साथ ही गिरी पड़ी थी जो मलबे के ढेर में दबे किसी निरीह इनसान की तरह ही लग रही थी.

बुधिया को पुराने दिन याद हो आए, जब वह मां की आंखों में वही निरीहता देखा करती थी. शाम को बापू जब दारू के नशे में धुत्त घर पहुंचता था तो मां की छोटी सी गलती पर भी बरस पड़ता था और पीटतेपीटते बेदम कर देता था.

एक बार जवान होती बुधिया के सामने उस के जालिम बाप ने उस की मां को ऐसा पीटा था कि वह घंटों बेहोश पड़ी रही थी. बुधिया डरीसहमी सी एक कोने में खड़ी रही थी. उस का मन भीतर ही भीतर कराह उठा था.

बुधिया को याद है, उस दिन उस की मां खेत पर गई हुई थी… धान की कटाई में. तभी ‘धड़ाक’ की आवाज के साथ दरवाजा खुला था और उस का दारूखोर बाप अंदर दाखिल हुआ था. आते ही उस ने अपनी सिंदूरी आंखें बुधिया के ऊपर ऐसे गड़ा दी थीं मानो वह उस की बेटी नहीं महज एक देह हो.

‘बापू…’ बस इतना ही निकल पाया था बुधिया की जबान से. ‘आ… हां… सुन… बुधिया…’ बापू जैसे आपे से बाहर हो कर बोले थे, ‘यह दारू की बोतल रख दे…’ ‘जी अच्छा…’ किसी मशीन की तरह बुधिया ने सिर हिलाया था और दारू की बोतल अपने बापू के हाथ से ले कर कोने में रख आई थी. उस की आंखों में डर की रेखाएं खिंच आई थीं.

तभी बापू की आवाज किसी हथौड़े की तरह सीधे उसे आ कर लगी थी, ‘बुधिया… वहां खड़ीखड़ी क्या देख रही है… यहां आ कर बैठ… मेरे पास… आ… आ…’

बुधिया को तो जैसे काटो तो खून नहीं. उस की सांसें तेजतेज चलने लगी थीं, धौंकनी की तरह. उस का मन तो किया था कि दरवाजे से बाहर भाग जाए, लेकिन हिम्मत नहीं हुई थी. उसी पल बापू की गरजदार आवाज गूंजी थी, ‘बुधिया…’

न चाहते हुए भी बुधिया उस तरफ बढ़ चली थी, जहां उस का बाप खटिया पर पसरा हुआ था. उस ने   झट से बुधिया का हाथ पकड़ा और अपनी ओर ऐसे खींच लिया था जैसे वह उस की जोरू हो.

‘बापू…’ बुधिया के गले से एक घुटीघुटी सी चीख निकली थी, ‘यह क्या कर रहे हो बापू…’ ‘चुप…’ बुधिया का बापू जोर से गरजा और एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस के दाएं गाल पर दे मारा था.

बुधिया छटपटा कर रह गई थी. उस में अब विरोध करने की जरा भी ताकत नहीं बची थी. फिर भी वह बहेलिए के जाल में फंसे परिंदे की तरह छूटने की नाकाम कोशिश करती रही थी. थकहार कर उस ने हथियार डाल दिए थे.

उस भूखे भेड़िए के आगे वह चीखती रही, चिल्लाती रही, मगर यह सिलसिला थमा नहीं, चलता रहा था लगातार…

बुधिया ने मां को इस बाबत कई बार बताना चाहा था, मगर बापू की सुलगती सिंदूरी आंखें उस के तनमन में झुरझुरी सी भर देती थीं और उस पर खौफ पसरता चला जाता था, वह भीतर ही भीतर घुटघुट कर जी रही थी.

फिर एक दिन बापू की मार से बेदम हो कर बुधिया की मां ने बिस्तर पकड़ लिया था. महीनों बिस्तर पर पड़ी तड़़पती रही थी वह. और उस दिन जबरदस्त उस के पेट में तेज दर्द उठा. तब बुधिया दौड़ पड़ी थी मंगरू चाचा के घर. मंगरू चाचा को  झाड़फूंक में महारत हासिल थी.

बुधिया से आने की वजह जान कर मंगरू ने पूछा था, ‘तेरे बापू कहां हैं?’ ‘पता नहीं चाचा,’ इतना ही कह पाई थी बुधिया. ‘ठीक है, तुम चलो. मैं आ रहा हूं,’ मंगरू ने कहा तो बुधिया उलटे पैर अपने झोंपड़े में वापस चली आई थी.

थोड़ी ही देर में मंगरू भी आ गया था. उस ने आते ही झाड़फूंक का काम शुरू कर दिया था, लेकिन बुधिया की मां की तबीयत में कोई सुधार आने के बजाय दर्द बढ़ता गया था.

मंगरू अपना काम कर के चला गया और जातेजाते कह गया, ‘बुधिया, मंत्र का असर जैसे ही शुरू होगा, तुम्हारी मां का दर्द भी कम हो जाएगा… तू चिंता मत कर…’

बुधिया को लगा जैसे मंगरू चाचा ठीक ही कह रहा है. वह घंटों इंतजार करती रही लेकिन न तो मंत्र का असर शुरू हुआ और न ही उस की मां के दर्द में कमी आई. देखते ही देखते बुधिया की मां का सारा शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया.

आंखें पथराई सी बुधिया को ही देख रही थीं, मानो कुछ कहना चाह रही हों. तब बुधिया फूटफूट कर रोने लगी थी. उस के बापू देर रात घर तो आए, लेकिन नशे में चूर. अगली सुबह किसी तरह कफनदफन का इंतजाम हुआ था.

बुधिया की यादों का तार टूट कर दोबारा आज से जुड़ गया. बापू की ज्यादतियों की वजह से बुधिया की जिंदगी तबाह हो गई. पता नहीं, वह कितनी बार मरती है, फिर जीती है… सैकड़ों बार मर चुकी है वह. फिर भी जिंदा है… महज एक लाश बन कर.

बापू के प्रति बुधिया का मन विद्रोह कर उठता है, लेकिन वह खुद को दबाती आ रही है. मगर आज बुधिया ने मन ही मन एक फैसला कर लिया. यहां से दूर भाग जाएगी वह… बहुत दूर… जहां बापू की नजर उस तक कभी नहीं पहुंच पाएगी.

अगले दिन बुधिया मास्टरनी के यहां गई कि वह अपने ऊपर हुई ज्यादतियों की सारी कहानी उन्हें बता देगी. मास्टरनी का नाम कलावती था, मगर सारा गांव उन्हें मास्टरनी के नाम से ही जानता है.

कलावती गांव के ही प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती हैं. बुधिया को भी उन्होंने ही पढ़ाया था. यह बात और है कि बुधिया 2 जमात से ज्यादा पढ़ नहीं पाई थी.

‘‘क्या बात है बुधिया? कुछ बोलो तो सही… जब से तुम आई हो, तब से रोए जा रही हो. आखिर बात क्या हो गई?’’ मास्टरनी ने पूछा तो बुधिया का गला भर आया. उस के मुंह से निकला, ‘मास्टरनीजी.’’ ‘‘हां… हां… बताओ बुधिया… मैं वादा करती हूं, तुम्हारी मदद करूंगी,’’ मास्टरनी ने कहा तो बुधिया ने बताया, ‘‘मास्टरनीजी… उस ने हम को खराब किया… हमारे साथ गंदा… काम…’’ सुन कर मास्टरनी की भौंहें तन गईं. वे बुधिया की बात बीच में ही काट कर बोलीं, ‘‘किस ने किया तुम्हारे साथ गलत काम?’’ ‘‘बापू ने…’’ और बुधिया सबकुछ सिलसिलेवार बताती चली गई.

मास्टरनी कलावती की आंखें फटी की फटी रह गईं और चेहरे पर हैरानी की लकीरें गहराती गईं. फिर वे बोलीं, ‘‘तुम्हारा बाप इनसान है या जानवर… उसे तो चुल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए. उस ने अपनी बेटी को खराब किया.

‘‘खैर, तू चिंता मत कर बुधिया. तू आज शाम की गाड़ी से मेरे साथ शहर चल. वहां मेरी बेटी और दामाद रहते हैं. तू वहीं रह कर उन के काम करना, बच्चे संभालना. तुम्हें भरपेट खाना और कपड़ा मिलता रहेगा. वहां तू पूरी तरह महफूज रहेगी.’’ बुधिया का सिर मास्टरनी के प्रति इज्जत से झुक गया.

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरते ही बुधिया को लगा जैसे वह किसी नई दुनिया में आ गई हो. सबकुछ अलग और शानदार था. बुधिया बस में बैठ कर गगनचुंबी इमारतों को ऐसे देख रही थी मानो कोई अजूबा हो.

तभी मास्टरनीजी ने एक बड़ी इमारत की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘देख बुधिया… यहां औरतमर्द सब एकसाथ कंधे से कंधा मिला कर काम करते हैं.’’ ‘‘सच…’’ बुधिया को जैसे हैरानी हुई. उस का अल्हड़ व गंवई मन पता नहीं क्याक्या कयास लगाता रहा. बस एक झटके से रुकी तो मास्टरनी के साथ वह वहीं उतर पड़ी.

चंद कदमों का फासला तय करने के बाद वे दोनों एक बड़ी व खूबसूरत कोठी के सामने पहुंचीं. फिर एक बड़े से फाटक के अंदर बुधिया मास्टरनीजी के साथ ही दाखिल हो गई. बुधिया की आंखें अंदर की सजावट देख कर फटी की फटी रह गईं.

मास्टरनीजी ने एक मौडर्न औरत से बुधिया का परिचय कराया और कुछ जरूरी हिदायतें दे कर शाम की गाड़ी से ही वे गांव वापस लौट गईं. शहर की आबोहवा में बुधिया खुद को महफूज सम  झने लगी. कोठी के चारों तरफ खड़ी कंक्रीट की मजबूत दीवारें और लोहे की सलाखें उसे अपनी हिफाजत के प्रति आश्वस्त करती थीं.

बेफिक्री के आलम से गुजरता बुधिया का भरम रेत के घरौंदे की तरह भरभरा कर तब टूटा जब उसे उस दिन कोठी के मालिक हरिशंकर बाबू ने मौका देख कर अपने कमरे में बुलाया और देखते ही देखते भेडि़या बन गया. बुधिया को अपना दारूबाज बाप याद हो आया.

नशे में चूर… सिंदूरी आंखें और उन में कुलबुलाते वासना के कीड़े. कहां बचा पाई बुधिया उस दिन भी खुद को हरिशंकर बाबू के आगोश से.

कंक्रीट की दीवारें और लोहे की मजबूत सलाखों को अपना सुरक्षा घेरा मान बैठी बुधिया को अब वह छलावे की तरह लगने लगा और फिर एक रात उस ने देखा कि नितिन और श्वेता अपने कमरे में अमरबेल की तरह एकदूसरे से लिपटे बेजा हरकतें कर रहे थे. टैलीविजन पर किसी गंदी फिल्म के बेहूदा सीन चल रहे थे.

‘‘ये दोनों सगे भाईबहन हैं या…’’ बुदबुदाते हुए बुधिया अपने कमरे में चली आई. सुबह हरिशंकर बाबू की पत्नी अपनी बड़ी बेटी को समझा रही थीं, ‘‘देख… कालेज जाते वक्त सावधान रहा कर. दिल्ली में हर दिन लड़कियों के साथ छेड़छाड़ व बलात्कार की वारदातें बढ़ रही हैं. तू जबजब बाहर निकलती है तो मेरा मन घबराता रहता है. पता नहीं, क्या हो गया है इस शहर को.’’

बुधिया छोटी मालकिन की बातों पर मन ही मन हंस पड़ी. उसे सारे रिश्तेनाते बेमानी लगने लगे. वह जिस घर को, जिस शहर को अपने लिए महफूज समझ रही थी, वही उसे महफूज नहीं लग रहा था.

बुधिया के सामने एक अबूझ सवाल तलवार की तरह लटकता सा लगता था कि क्या औरत का मतलब देह है, सिर्फ देह? Romantic Story

Story in hindi : समझौता – क्या जूही ने खुद के साथ समझौता किया?

Story in hindi: डाक्टर के हाथ से परचा लेते ही जूही की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. बेचारी आज बहुत परेशान थी. होती भी क्यों न, मां को कैंसर की बीमारी जो थी. इधर 6 महीने से तो उन की सेहत गिरती ही जा रही थी. वे बेहद कमजोर हो गई थीं.

पिछले महीने मां को अस्पताल में भरती कराना पड़ा. ऐसे में पूरा खर्चा जूही के ऊपर आ गया था. मां का उस के अलावा और कौन था. पिता तो बहुत पहले ही चल बसे थे. तब से मां ने ही जूही और उस के दोनों भाइयों को पालापोसा था.

तभी जूही के कानों में मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘बेटी जूही, जरा पानी तो पिला दे. होंठ सूखे जा रहे हैं मेरे.’’ अपने हाथों से पानी पिला कर जूही मां के पैर दबाने लगी. परचा पकड़ते ही वह परेशान हो गई, ‘अब क्या करूं?’

रिश्तेदारों ने भी धीरेधीरे उन से कन्नी काट ली थी. जैसेजैसे वक्त बीतता जा रहा था, खर्चे तो बढ़ते ही जा रहे थे. सबकुछ तो बिक गया था. अब क्या था जूही के पास? तभी जूही को सुभाष का ध्यान आया. उस की परचून की दुकान थी. वह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. जूही उस की दुकान की तरफ चल दी.

सुभाष जूही को देख कर चौंका और उस के अचानक इस तरह से आने की वजह पूछी, ‘‘आज मेरी याद कैसे आ गई?’’ कह कर सुभाष उस की कमर पर हाथ फेरने लगा. जूही ने कहा, ‘‘वह… लालाजी… मां की तबीयत काफी खराब है. मैं आप से मदद मांगने आई हूं. दवा तक के पैसे नहीं हैं मेरे पास,’’ कहते हुए वह हिचकियां ले कर रोने लगी.

जूही की मजबूरी में सुभाष को अपनी जीत नजर आई, ‘‘बोल न क्या चाहती है? मैं तो हर वक्त तैयार हूं. बस, तू मेरी इच्छा पूरी कर दे,’’ बोलते हुए सुभाष ने उस की तरफ ललचाई नजरों से ऐसे देखा, जैसे कोई गिद्ध अपने शिकार को देखता है.

जूही सुभाष की आंखों में तैर रही हवस को पढ़ चुकी थी. वह तो खुद ही समर्पण के लिए आई थी. हालात से हार मान कर वह उस के सामने जमीन पर बैठ गई. आखिर चारा भी क्या था, उस के पास सम?ौते के सिवा. जीत की खुशबू पा कर सुभाष की हवस दोगुनी हो गई थी. उस ने अपने मन की कर डाली.

थोड़ी देर बाद सुभाष ने जूही को रुपए देते हुए कुटिल मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘कभी भी, कैसी भी जरूरत हो, मैं तुम्हारी मदद के लिए तैयार हूं. बस, एक रात के लिए तू मेरे पास आ जाना.’’ खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए जूही वापस अस्पताल आ गई. उस ने दवा और अस्पताल के बिल चुकाए. वह मन ही मन सोच रही थी, ‘आज तो मैं ने सम?ौता कर के मां की दवाओं का इंतजाम कर दिया, लेकिन अब आगे क्या होगा?’ यही नहीं, जूही को अपने दोनों भाइयों की पढ़ाई और खानेपीने के खर्च की भी चिंता सताने लगी थी.

अब जब भी पैसों की जरूरत होती, जूही सुभाष के पास चली जाती और कुछ दिन के लिए परेशानी आगे टल जाती. वह अकसर अपने को दलदल में फंसा हुआ महसूस करती, लेकिन जानती थी कि रुपएपैसे के बिना गुजारा नहीं है. धीरेधीरे मां की सेहत में सुधार होने लगा. भाइयों की पढ़ाई भी पूरी हो गई. नौकरी मिलते ही दोनों भाइयों ने अपनीअपनी पसंद की लड़कियों से शादी कर ली.

मां ने जब भाइयों से घर की जिम्मेदारी लेने को कहा, तो उन्होंने खर्चा देने से मना कर दिया. अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर वे अलग हो गए. घर का खर्च, मां की बीमारी, डाक्टर की फीस व दवाओं का खर्च… इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए जूही को बस एक सहारा दिखता था सुभाष.

लेकिन, जूही अब थक कर टूट चुकी थी. एक दिन मां ने उसे उदास देखा तो वे पूछे बिना न रह सकीं, ‘‘क्या हुआ आज तुझे? तू इतनी चुप क्यों हैं?’’ और उस की पीठ पर प्यार भरा हाथ फेरा. जूही सिसकसिसक कर रोने लगी. वह मां से लिपट कर बहुत रोई. मां हैरान भी हुईं और परेशान भी, क्योंकि सिर्फ वे ही जानती थीं कि जूही ने इस घर के लिए क्याक्या कुरबानियां दी हैं.

कुछ दिन बाद जूही की मां हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं. उन के जाने के बाद जूही बहुत अकेली रह गई. इधर सुभाष को भी उस में कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई थी. जिस मकान में जूही रहती थी, वह भी बिक गया. सब सहारे साथ छोड़ कर जा चुके थे.

जूही ने एक कच्ची बस्ती में एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया और लोगों के घरों में रोटी बनाने लगी. रोज सपने बुनती, जो सुबह उठने तक टूट जाते थे, फिर भी उस ने हिम्मत नहीं हारी. पर शरीर भी कब तक साथ देता. अब जूही बीमार रहने लगी थी. तेज बुखार होने की वजह से एक दिन सांसें थमीं तो दोबारा चालू ही नहीं हो पाईं. आज उस ने फिर एक नया सम?ौता किया था मौत के साथ. वह मौत के आगोश में हमेशाहमेशा के लिए चली गई थी…Story in hindi

Story in Hindi: सैंडल- गुड्डी किशन की अनोखी जोड़ी

Story in Hindi. अपने बैडरूम के पीछे से किसी बच्ची के जोरजोर से रोने की आवाज सुन कर मैं चौंका. खिड़की से झाकने  पर पता चला कि किशन की बेटी गुड्डी दहाड़ें मारमार कर रो रही थी.

मैं ने खिड़की से ही पूछा, ‘‘अरी लीला, छोरी क्यों रो रही है?’’ इस पर गुड्डी की मां ने जवाब दिया, ‘‘क्या बताएं सरकार, छोरी इस दीवाली पर बहूरानी जैसे सैंडल की जिद कर रही है…’’ वह कुछ रुक कर बोली, ‘‘इस गरीबी में मैं इसे सैंडल कहां से ला कर दूं?’’ मैं अपनी ठकुराहट में चुप रहा और खिड़की का परदा गिरा दिया.

मैं ने जब से होश संभाला था, तब से किशन के परिवार को अपने खेतों में मजदूरी करते ही पाया था. जब 10वीं जमात में आया, तब जा कर समझ आया कि कुछ नीची जाति के परिवार हमारे यहां बंधुआ मजदूर हैं. सारा दिन जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी मुश्किल से इन्हें दो जून की रोटी व पहनने के लिए ठाकुरों की उतरन ही मिल पाती थी. इस में भी बेहद खुश थे ये लोग.

गुड्डी किशन की सब से बड़ी लड़की थी. भूरीभूरी आंखें, गोल चेहरा, साफ रंग, सुंदर चमकीले दांत, इकहरा बदन. सच मानें तो किसी ‘बार्बी डौल’ से कम न थी. बस कमी थी तो केवल उस की जाति की, जिस पर उस का कोई वश नहीं था. वह चौथी जमात तक ही स्कूल जा सकी थी.

अगले ही साल घर में लड़का पैदा हुआ तो 13 साल की उम्र में स्कूल छुड़वा दिया गया और छोटे भाई कैलाश की जिम्मेदारी उस के मासूम कंधों पर डाल दी गई. दिनभर कैलाश की देखभाल करना, उसे खिलानापिलाना, नहलानाधुलाना वगैरह सबकुछ गुड्डी के जिम्मे था. कैलाश के जरा सा रोने पर मां कहती, ‘‘अरी गुड्डी, कहां मर गई? एक बच्चे को भी संभाल नहीं सकती.’’

बेचारी गुड्डी फौरन भाग कर कैलाश को उठा लेती और चुप कराने लग जाती. इस काम में जरा सी चूक होने पर लीला उसे बड़ी बेरहमी से पीटती. फिर भी वह सारा दिन चहकती रहती. शायद बेटी होना ही उस का जुर्म था.

मेरी शादी के बाद ‘ऊंची एड़ी के सैंडल’ पहनना गुड्डी का सपना सा बन गया था. गृहप्रवेश की रस्म के समय उस ने मेरी बीवी के पैरों में सैंडल देख लिए थे. बस, फिर क्या था, उस ने मन ही मन ठान लिया था कि अब तो वह सैंडल पहन कर ही दम लेगी. उस की सोच का दायरा बस सैंडल तक ही सिमट कर रह गया था.

गुड्डी कभीकभार हमारी कोठी में आया करती थी. एक बार की बात है कि वह अपने हाथ में मुड़ातुड़ा अखबार का टुकड़ा लिए इठलाती हुई जा रही थी. मैं ने पूछ लिया, ‘‘गुड्डी, क्या है तेरे हाथ में?’’ वह चुप रही. मैं ने मांगा तो कागज का टुकड़ा मुझे थमा दिया. मैं ने अखबार का पन्ना खोल कर देखा तो पाया कि वह सैंडल का इश्तिहार था, जिसे गुड्डी ने सहेज कर अपने पास रखा था.

मैं ने अखबार का टुकड़ा उसे वापस दे दिया. वह लौट गई. इस से पहले भी कमरे में झाड़ू लगाते समय मैं ने एक बार उसे अपनी बीवी के सैंडल पहनते हुए देख लिया था. मेरे कदमों की आहट सुन कर गुड्डी ने फौरन उन्हें उतार कर एक ओर सरका दिया. मैं ने भी बचकानी हरकत जान कर उस से कुछ नहीं कहा.

गुड्डी की जिद को देख कर मन तो मेरा भी बहुत हो रहा था कि उसे एक जोड़ी सैंडल ला दूं. मगर मांबाबूजी के आगे हिम्मत न पड़ती थी, अपने मजदूरों पर एक धेला भी खर्च करने की. बाबूजी इतने कंजूस थे कि एक बार गांव के कुछ लोग मरघट की चारदीवारी के लिए चंदा मांगने आए थे तो उन्हें यह कह कर लौटा दिया, ‘‘अरे बेवकूफो, ऐसी जगह पर चारदीवारी की क्या जरूरत है, जहां जिंदा आदमी तो जाना नहीं चाहता और मरे हुए उठ कर आ नहीं सकते.’’

बेचारे गांव वाले अपना सा मुंह ले कर लौट गए. गुड्डी को कुछ ला कर देना तो दूर की बात है, हमें उस से बात करने तक की इजाजत नहीं थी. हमारे घरेलू नौकरों तक को नीची जाति के लोगों से बात करने की मनाही थी. गांव में उन के लिए अलग कुआं, अलग जमीन पर धान, सागसब्जी उगाने का इंतजाम था.

वैसे तो किशन की झोपड़ी हमारी कोठी से कुछ ही दूरी पर थी, मगर उस के परिवार में कितने लोग हैं, इस का मुझे भी अंदाजा नहीं था. मैं राजस्थान यूनिवर्सिटी से बीकौम का इम्तिहान पास कर वकालत पढ़ने विलायत चला गया. वहां भी गुड्डी मेरे लिए एक सवाल बनी हुई थी.

देर रात तक नींद न आने पर जब घर के बारे में सोचता तो गुड्डी के सैंडल की याद ताजा हो उठती. मैं मन ही मन उसे अपने परिवार का सदस्य मान चुका था. 4 साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला. मैं ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली थी. अब बात आगे काम सीखने की थी, जो मैं यहां अपने देश में ही करना चाहता था. इधर पिताजी ने जोधपुर हाईकोर्ट में अपने वकील दोस्त भंडारी से मेरे बारे में बात कर ली थी इसलिए मैं भारत लौट रहा था.

चंद रोज बाद ही मैं मुंबई एयरपोर्ट पर था. एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन करीब डेढ़ किलोमीटर दूर था. 4 साल तक विदेश में रहने के बावजूद भी मैं मांबाबूजी के खिलाफ जाने की हिम्मत तो नहीं जुटा पाया था, फिर भी किसी तरह उन्हें मनाने का मन बना लिया था.

ट्रेन के आने में अभी 5 घंटे का समय था, इसलिए रिकशे वाले को जूतों की किसी अच्छी सी दुकान पर ले चलने को कहा. वहां से गुड्डी के लिए एक जोड़ी सैंडल खरीदे और रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

कुली ने सारा सामान टे्रन में चढ़ा दिया. मैं ने सैंडल वाली थैली अपने हाथ में ही रखी. यह थैली मुझे अपने मन की पोशाक जान पड़ती थी, जिस के सहारे मैं ऊंचनीच का भेद भुला कर पुण्य का पापड़ सेंकने की फिराक में था.

मेरा गांव रायसिंह नगर मुंबई से तकरीबन 800 किलोमीटर दूर था. आज बड़ी लाइन के जमाने में भी वहां तक पहुंचने में 20 घंटे लग जाते हैं और 3 बार ट्रेन बदलनी पड़ती है. आजादी से 2 साल पहले तो 3 दिन और 2 रातें सफर में ही गुजर जाती थीं. अगले दिन शाम तकरीबन 5 बजे मैं थकाहारा गांव पहुंचा.

गांव में त्योहार का सा माहौल था. पूरा गांव मेरे विदेश से लौटने पर खुश था. गांवभर में मिठाइयां बांटी जा रही थीं. सभी के मुंह पर एक ही बात थी, ‘‘छोटे सरकार विदेश से वकालत पढ़ कर लौटे हैं.’’ मैं बीकानेर इलाके का पहला वकील था. उस जमाने में वकील को लोग बड़ी इज्जत से देखते थे. घर पहुंचने पर बग्घी से उतरते ही मैं ने किशन की झोपड़ी की ओर एक नजर डाली, मगर वहां गुड्डी नहीं दिखाई दी.

रात 9 बजे के बाद माहौल कुछ शांत हुआ. पर मेरा पूरा बदन टूटा जा रहा था. खाना खाया और दर्द दूर करने की दवा ले कर सो गया. अगले दिन सुबह 9 बजे के आसपास मेरी आंख खुली. श्रीमतीजी मेरा सूटकेस व दूसरा सामान टटोल रही थीं. उस ने अपने मतलब की सभी चीजें निकाल ली थीं, जो मैं उस के लिए ही लाया था. यहां तक कि मां की साड़ी, पिताजी के लिए शाल, छोटे भाईबहनों के कपड़े वगैरह सबकुछ मेरे जगने से पहले ही बंट चुके थे. पर सैंडल वाली थैली नदारद थी.

मैं ने सोचा कि सुधा ने अपना समझ  कर कहीं रख दी होगी. दोपहर के खाने के बाद मैं ने सोचा कि अब गुड्डी के सैंडल दे आऊं. उसे बड़ी खुशी होगी कि बाबूजी परदेश से मेरे लिए भी कुछ लाए हैं. मैं ने अपनी बीवी से पूछा, ‘‘सुधा, वह लाल रंग की थैली कहां रख दी, जिस में सैंडल थे?’’ सुधा ने जवाब दिया, ‘‘ऐसी तो कोई थैली नहीं थी आप के सामान में.’’ मैं ने फिर कहा, ‘‘अरे यार, मुंबई से लाया था. यहींकहीं होगी. जरा गौर से देखो.’’ सुधा ने सारा सामान उलटपुलट कर दिया, मगर वह लाल रंग की थैली कहीं नहीं मिली.

काफी देर के बाद याद आया कि अजमेर रेलवे स्टेशन पर एक आदमी बड़ी देर से मेरे सामान पर नजर गड़ाए था, शायद वही मौका पा कर ले गया होगा. यह बात मैं ने सुधा को बताई तो वह बोली, ‘‘चलो अच्छा ही हुआ. किसी जरूरतमंद के काम तो आएगी. वैसे भी मेरे पास तो 6-7 जोड़ी सैंडल पड़े हैं.’’

इस पर मैं ने कहा, ‘‘अरी सुधा, वह मैं तुम्हारे लिए नहीं गुड्डी के लिए लाया था.’’ गुड्डी का नाम सुनते ही सुधा सिसकने लगी. उस की आंखें भीग गईं. वह बोली, ‘‘किसे पहनाते, गुड्डी को मरे तो 4 महीने हो गए.’’

सुधा की पूरी बात सुन कर मैं भी रो पड़ा. सुधा ने बताया कि मेरे जाने के एक साल बाद ही बेचारी गरीब को एक ऐयाश शराबी के साथ ब्याह दिया गया. उम्र में भी वह काफी बड़ा था. गुड्डी लोगों के घरों में झाड़ूपोंछा कर जो भी 2-4 रुपए कमा कर लाती, उसे भी वह मारपीट कर ले जाता.

चौबीसों घंटे वह शराब पी कर पड़ा रहता था. बहुत दुखी थी बेचारी. फिर भी उस ने अपने सपने को ज्यों का त्यों संजो कर रखा था. करीब 4 महीने पहले बड़ी मुश्किल से छिपछिपा कर बेचारी ने 62 रुपए जोड़ लिए थे. करवाचौथ के दिन गांव में हाट लगा था, जहां से गुड्डी अपना सपना खरीद कर लाई थी. उसे क्या पता था कि यह सपना ही उस के लिए काल बन जाएगा.

गुड्डी ने हाट से वापस आ कर सैंडल ऊपर के आले में रखे थे. एक बार पहन कर देखे तक नहीं कि कहीं मैले न हो जाएं. शाम को न जाने कहां से उस के पति की नजर सैंडल पर पड़ गई. कहने लगा, ‘‘बता चुड़ैल, कहां से लाई इतने पैसे? किस के साथ गई थी?’’ और लगा उसे जोरजोर से पीटने.

गुड्डी पेट से थी. उस ने एक लात बेचारी के पेट पर दे मारी. वही लात उस के लिए भारी पड़ गई. उस की मौत हो गई. उस का पति आजकल जेल में पड़ा सड़ रहा है. यही थी गुड्डी की दर्दभरी कहानी, जिसे सुन कर कोई भी रो पड़ता था.

पर अब न गुड्डी थी, न गुड्डी का सपना. Story in Hindi

Story In Hindi: गर्भपात – क्या रमा अनजाने भय से मुक्त हो पाई?

Story In Hindi: सुबह उठते ही रमा की नजर कैलेंडर पर पड़ी. आज 7 तारीख थी. उस के मन ने अपना काम शुरू कर दिया. झट से रमा के मन ने गणना की कि आज उस के गर्भ का तीसरा महीना पूरा और चौथा शुरू होता है जबकि रमा इसी गणना को मन में नहीं लाना चाहती थी क्योंकि मन में इस विचार के आते ही उस पर उस का पुराना भय हावी हो जाता और वह इस भय से बचना चाहती थी.

रमा डरतेडरते बाथरूम गई. वेस्टर्न स्टाइल की सीट पर बैठते ही उस का गला सूखना शुरू हो गया. उसे लग रहा था कि यदि उसे जल्दी से पानी नहीं मिला तो उस का दम घुट जाएगा. सामने ही नल था और वह पूरा जोर लगा कर उठने की कोशिश करने लगी. फिर भी उस से उठा नहीं गया.

तभी अचानक उस के पेट में दर्द उठा और नीचे पूरा पाट खून से भर गया. ऐसा उस के साथ दूसरी बार हो रहा था. रमा की रुलाई फूट पड़ी और वह अपनी प्यास भूल गई. उस ने किसी तरह से उठ कर दरवाजा खोला और अपने पति को पुकारा. उस की दर्द भरी आवाज सुन कर रवि बिस्तर छोड़ कर भागे. किसी तरह रमा को संभाला और उसे कार में डाल कर अस्पताल ले गए. डाक्टर ने रमा के गर्भ को साफ किया और घर भेज दिया. रमा फिर से खाली हाथ घर लौट आई थी.

रमा की शादी को 3 साल बीत चुके थे और इन 3 सालों में दूसरी बार उस का गर्भपात हुआ था. जब वह पहली बार गर्भवती हुई थी तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई थी. पति रवि और सास मीना खुशी से झूम उठे थे. पर तब भी कहीं भीतर से रमा उदास हो गई थी. एक अनजाना सा डर तब भी उस के मन में था. उस के मन में यही डर था कि कहीं बच्चे के जन्म के समय उस की मृत्यु न हो जाए. इस डर के कारण उस की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रही थी. उस का खानापीना भी कम हो गया था. दूध और फल उसे हजम ही नहीं होते थे. केवल पेट भरने के लिए वह सूखी चपाती खाती थी.

रमा के इस व्यवहार को देख कर उस की सास मीना सोचतीं कि शुरूशुरू में ऐसा सभी औरतों के साथ होता है पर धीरेधीरे सब ठीक हो जाता है लेकिन तीसरा महीना खत्म होते ही जब रमा का गर्भपात हो गया था तो उस का रोना देख कर मांबेटा दोनों ही घबरा गए. डाक्टर ने जांच के बाद गर्भाशय साफ किया और उसे घर भेज दिया.

इस घटना के बाद कुछ दिनों तक रमा उदास रही थी लेकिन सास का अपनापन भरा व्यवहार और पति के प्यार में वह इस हादसे को भूल गई. 8 महीने बाद फिर रमा ने गर्भ धारण किया. इस बार रवि उसे ले कर डा. प्रेमा के पास पहुंच गए.

डा. प्रेमा स्त्री रोग विशेषज्ञ थीं. उन्होंने दोनों को तसल्ली दी, ‘‘देखिए, डरने की कोई बात नहीं है. मैं ने ठीक से जांच कर ली है. रमा के गर्भाशय की स्थिति जरा ठीक नहीं है. वह थोड़ा नीचे की ओर खिसका हुआ है. ऐसे में उन को फुल बेडरेस्ट की जरूरत है. ज्यादा समय लेटे ही रहना है. पैरों के नीचे भी तकिया लगा कर रखना है और केवल शौच जाने के लिए उठना है. शौच जाते समय भी ध्यान रखें कि जोर नहीं लगाना है.’’

‘‘देखो रमा, जैसे डाक्टर बता रही हैं वैसे ही करना है और खुश रहना है,’’ रवि ने प्यार से कहा.

‘‘हां, खुश रहना बहुत जरूरी है,’’ डा. प्रेमा ने भी सलाह दी, ‘‘अच्छी किताबें पढ़ो, मधुर संगीत सुनो और सुखद भविष्य की कल्पना कर के खुश रहो,’’ रवि ने प्यार से कहा.

‘‘डाक्टर, मेरी जान को तो खतरा नहीं है?’’ रमा ने डरतेडरते पूछा था.

‘‘तुम ने ऐसा क्यों सोचा?’’

डा. प्रेमा ने पूछा.

‘‘मुझे डर लगता है.’’

‘‘किस बात का?’’

‘‘मैं दर्द सहन नहीं कर पाऊंगी और मर जाऊंगी.’’

‘‘सभी औरतें मर जाती हैं क्या?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो आप इस तरह का क्यों सोच रही हैं?’’

रमा और रवि खुशीखुशी वापस घर आए. मां को सारी बातें बताईं. रवि मां से बोले, ‘‘मां, अब रमा का ध्यान आप को ही रखना है. मैं तो सारा दिन बाहर रहता हूं.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है. रमा तो मेरी बेटी है. अब मैं इस की सहेली भी बन जाऊंगी और इसे खुश रखूंगी.’’

मीना अब जीजान से रमा के साथ हो लीं. उसे बिस्तर से बिलकुल उठने नहीं देतीं. सहारा दे कर शौचालय ले जातीं. टानिक और विटामिन की गोलियां समय पर देतीं. बातबात पर उसे हंसाने की कोशिश करतीं. 3 महीने ठीक से निकले. पर चौथा शुरू होते ही शौचालय में फिर से रमा का गर्भपात हो गया. रवि फिर उसे ले कर अस्पताल गए और रमा इस बार फिर वहां से खाली हो कर घर आ गई.

रवि एक दिन अकेले जा कर डाक्टरसे मिले, ‘‘डाक्टर, अब की बार क्या हुआ? ऐसा बारबार क्यों होता है?’’

‘‘सब ठीक चल रहा था,’’ डा. प्रेमा ने बताया, ‘‘मैं नहीं जानती, ऐसा क्यों हुआ. अगली बार जब यह गर्भवती हों तो आप शुरू में ही मुझ से संपर्क करें. इन के कुछ टैस्ट करवाने पड़ेंगे, उस के बाद ही गर्भपात के कारणों का पता चलेगा.’’

दूसरी बार गर्भपात होने के बाद से रमा की उदासी और भी बढ़ गई. उस का शरीर काफी कमजोर हो गया था. इस बार रवि ने मन ही मन फैसला कर लिया कि यह तमाशा और अधिक नहीं चलेगा. रमा मानसिक और शारीरिक रूप से संतुलित हो जाए उस के बाद ही बच्चे की बात सोची जाएगी. जरूरत पड़ी तो वह किसी बच्चे को गोद ले लेंगे.

जीवन अपनी गति से चलने लगा. धीरेधीरे रमा सामान्य हो चली. इस बीच वह अपने भाई की शादी के लिए अपने मायके गई तो 2 महीने रह कर वापस लौटी.

मायके से लौटने पर रमा बहुत प्रसन्नचित्त थी. घर के कामकाज में वह अपनी सास के साथ लगातार हाथ बंटाती. खाली समय में ‘जिम’ भी जाती. उस की सहेलियों का दायरा भी बढ़ गया था. एक बड़े पुस्तकालय की वह सदस्य भी बन गई थी. एक बार माइंड पावर नामक एक पुस्तक उस के हाथ लगी. उस पुस्तक में जब उस ने पढ़ा कि हमारा मन हमारा कितना बड़ा मित्र बन सकता है और उतना ही बड़ा शत्रु भी बन सकता है तो वह हैरान रह गई. अपने मन में बैठे डर का उस ने विश्लेषण किया और सोचा, क्या उस का मन ही उसे मां  नहीं बनने दे रहा है? क्या उस का मन ही हर तीसरे माह के समाप्त होते ही उस का गर्भपात करवा रहा है? एक दिन उस ने रवि से इस बारे में बात की.

‘‘रवि, इस किताब में जो भी लिखा है क्या वह सच है?’’

‘‘इतने बड़े मशहूर लेखक की किताब है, उस की यह किताब बेस्ट सैलर भी है. कितने ही लोग इसे पढ़ कर अपना जीवन सुधार चुके हैं.’’

‘‘मैं नहीं मानती. मैं ने तो हमेशा ही बच्चा चाहा है, फिर गर्भपात क्यों हुआ? अगर मेरा मन बच्चा नहीं चाहता तो मुझे भी गर्भनिरोधक गोलियों का प्रयोग करना आता था.’’

‘‘मुझे लगता है तुम्हारा मन 2 भागों में बंटा हुआ है. एक मन तो मां बनना चाहता है और दूसरा प्रसव पीड़ा से डरता है.’’

‘‘हां, तुम ठीक कहते हो पर मुझे बताओ, मैं क्या करूं?’’

रमा परेशान हो उठी थी. शादी हुए 7 साल बीत चुके थे. वे दोनों अब बच्चे की बात ही नहीं करते. पर मन ही मन रमा के अंदर एक संघर्ष चल रहा था. वह उस संघर्ष पर विजय पाना चाहती थी. उस का एक ही तरीका था कि वह पूरी सच्ची बात रवि को बताए. एक रात वह रवि से बोली, ‘‘रवि, मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूं जोकि मैं ने आज तक तुम्हें नहीं बताई है. जब मैं 10 साल की थी तो मेरी बूआ प्रसव के लिए मायके आई थीं. जिस दिन उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हुई उस दिन घर में कोई नहीं था. केवल मैं और बूआ ही थीं. मां और पिताजी बाहर गए हुए थे.

‘‘डाक्टर के अनुसार बूआ के प्रसव में अभी 10-15 दिन बाकी थे पर अचानक ही उन्हें दर्द शुरू हो गया. भयानक दर्द से बूआ तड़पती रहीं और मैं उन्हें देख कर रोती रही. तड़पतेतड़पते बूआ बिस्तर से नीचे उतर आई थीं. दर्द के कारण चिल्लाने से उन का गला सूख गया था. उन्होंने मुझ से पानी मांगा पर मैं इतनी डर गई कि ऐसा लगा जैसे मैं वहां से हिल नहीं पाऊंगी.

‘‘बूआ ‘पानीपानी’ चिल्लाती रहीं पर मैं उन्हें पानी नहीं दे पाई और कुछ देर बाद सब शांत हो गया. बूआ खून और पानी के ढेर में शांत सी हो कर सो गईं. तभी मां आ गईं. उन्हें देख कर मैं जहां डर कर बैठी थी वहीं चिल्लाई,  ‘मां,’ देखो तो बूआ को क्या हुआ? उन्हें पानी दो.’

‘‘मां ने बूआ को देखा तो पाया कि वह सदा के लिए ही शांत हो गई थीं, पर मेरे नन्हे मन में यह बैठ गया कि अगर मैं बूआ को पानी दे देती तो शायद वह बच जातीं, मेरा मन अपराधबोध से भर गया.

‘‘तीसरा महीना शुरू होते ही वह अपराधबोध मुझ पर इस कदर हावी हो जाता है कि मैं रात में कितनी बार उठ कर पानी पीती हूं. बूआ का पानी मांगना मेरे दिलोदिमाग में छा जाता है. मेरी बूआ मेरे कारण ही बिना मां बने ही इस दुनिया से चल बसीं. इसलिए मैं सोचती हूं कि शायद अतीत का अपराधबोध और प्रसव पीड़ा का वह भयावह दृश्य ही मुझे डराता है और डर के मारे मेरा गर्भपात हो जाता है.’’

‘‘पहले क्यों नहीं बताया यह सब,’’ रवि बोले ‘‘बूआ की मौत की जिम्मेदार तुम नहीं हो. यह अपराधबोध तो मन से बिलकुल ही निकाल दो. एक 10 साल की बच्ची किसी की मौत का कारण कैसे बन सकती है और तुम्हारा दूसरा डर तो बिलकुल बेकार है. उस का सामना तो हम आसानी से कर सकते हैं. हम पहले से ही डाक्टर से बात कर लेंगे कि तुम्हारा बच्चा आपरेशन द्वारा ही हो. तुम्हें प्रसव पीड़ा होगी ही नहीं.’’

‘‘अगर डाक्टर नहीं मानी तो?’’

‘‘जरूर मानेंगी, जब तुम्हारी कहानी सुनेगी तो उन्हें मानना ही पड़ेगा.’’

दूसरे दिन ही रमा और रवि डा. कांता के पास पहुंचे. डा. कांता एक प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ थीं. उन के पास जच्चाबच्चा से संबंधित एक से एक कठिन केस आते थे. अनुभवों के आधार पर वह इतना ज्ञान प्राप्त कर चुकी थीं कि जब रमा और रवि उन के पास सलाह के लिए आए तो उन्होंने सब से पहले रमा के पिछले सभी गर्भपातों के बारे में जानकारी हासिल की और रमा के लिए कुछ जरूरी टैस्ट लिख दिए. जब टैस्टों की रिपोर्ट आई तो उन्हें पता चला कि रमा को टोक्सो प्लाज्मा है. डा. कांता ने बताया कि रुबैला और टोक्सो प्लाज्मा ये 2 ऐसी बीमारियां हैं जो किसी गर्भवती महिला के लिए घातक होती हैं.

रुबैला अगर गर्भवती स्त्री को हो तो उस के कीटाणु पेट में पल रहे शिशु तक पहुंच कर उसे नुकसान पहुंचाते हैं. पर रमा के खून की जांच के बाद पता चला कि उसे टोक्सो प्लाज्मा हुआ है. यह खून में फैला हुआ इन्फेक्शन है जो ज्यादातर चूहों और बिल्लियों में पाया जाता है, पर कई बार यह मनुष्यों में भी आ जाता है और गर्भवती स्त्री के गर्भ में पल रहे शिशु के लिए घातक होता है. रमा के साथ भी यही हो रहा था. डाक्टर ने रमा को सलाह दी कि अगली बार गर्भ का निश्चय होते ही वह तुरंत अस्पताल में भर्ती हो जाए.

रमा गर्भ ठहरते ही डा. कांता के नर्सिंग होम में दाखिल हो गई. डा. कांता ने शुरू से ही रमा को उचित दवाइयां देनी शुरू कर दीं. रमा को बिलकुल बेडरेस्ट पर रखा. देखते ही देखते 4 महीने सही से निकल गए. अब तो रमा पूरी तरह आशा से भर गई थी.

डाक्टर की निगरानी, उचित दवाओं और अपने सकारात्मक विचारों और भावनाओं के कारण रमा के 9 महीने पूरे हुए. पूर्वनिश्चित समय पर डाक्टर ने आपरेशन किया और जीताजागता, रोताचिल्लाता प्यारा सा बच्चा उसकी गोद में थमा दिया. Story In Hindi

Hindi Family Story: मोहिनी – कौन सी गलती ने बर्बाद कर दिया परिवार

Hindi Family Story: मनोहरा की पत्नी मोहिनी बड़ी शोख और चुलबुली थी. अपनी अदाओं से वह मनोहरा को हमेशा मदहोश किए रहती थी. उस को पा कर मनोहरा को जैसे पंख लग गए थे और वह हमेशा आकाश में उड़ान भरने को तैयार हो उठता था. मोहिनी उस की इस उड़ान को हमेशा ही सहारा दे कर दुनिया जीतने का सपना देखती रहती थी.

अपने मायके में भी मोहिनी खुली हिरनी की तरह गांवभर में घूमती रहती थी. इस में उसे कोई हिचक नहीं होती थी, क्योंकि उस की मां बचपन में ही मर गई थी और सौतेली मां का उस पर कोई कंट्रोल न था.

मोहिनी छोटेबड़े किसी काम में अपनी सीमा लांघने से कभी भी नहीं हिचकती थी. शादी से पहले ही उस का नाम गांव के कई लड़कों से जोड़ा जाता था. वैसे, ब्याह कर अपने इस घर आने के बाद पहले तो मोहिनी ने अपनी बोली और बरताव से पूरे घर का दिल जीत लिया, पर जल्दी ही वह अपने रंग में आ गई.

मनोहरा के बड़े भाई गोखुला की सब से बड़ी औलाद एक बेटी थी, जो अब सयानी और शादी के लायक हो चली थी. उस का नाम सलोनी था. गोखुला के 2 बेटे अभी छोटे ही थे. गोखुला की पत्नी पिछले साल हैजे की वजह से मर गई थी.

मोहिनी के सासससुर और गोखुला अब कभीकभी सलोनी की शादी कर देने की चर्चा छेड़ देते थे, जिस से वह डर जाती थी. उस की शादी में अच्छाखासा खर्च होने की उम्मीद थी.

मोहिनी चाहती थी कि अगर किसी तरह उस का पति अपने भाई गोखुला से अलग होने को राजी हो जाए, तो होने वाले इस खर्च से वह बच निकलेगी.

मोहिनी ने माहौल देख कर मनोहरा को अपने मन की बात बताई. मनोहरा एक सीधासादा जवान था. वह घर के एक सामान्य सदस्य की तरह रहता और दिल खोल कर कमाता था. वह इन छलप्रपंचों से कोसों दूर था.मोहिनी की बातों को सुन कर पलभर के लिए तो मनोहरा को बहुत बुरा लगा, पर मोहिनी ने जब इन सारी बातों की जिम्मेदारी अपने ऊपर छोड़ देने की बात कही, तो वह चुप हो गया.

यही तो मोहिनी चाहती थी. अब वह आगे की चाल के बारे में सोचने लग गई. पहले कुछ दिनों तक तो उस ने सलोनी से खूब दोस्ती बढ़ाई और उसे घूमनेफिरने, खेलनेखिलाने वगैरह की पूरी आजादी दे दी, फिर खुद ही अपने सासससुर से उस की शिकायत भी करने लगी.

1-2 बार उस ने सलोनी को गुपचुप उसी गांव के रहने वाले अपने चहेते पड़ोसी रामखिलावन के साथ मेले में भेज दिया और पीछे से ससुर को भी भेज दिया.

सलोनी के रंगे हाथ पकड़े जाने पर मोहिनी ने उस घर में रहने से साफ इनकार कर दिया. सासससुर और गांव वाले उसे समझासमझा कर थक गए, पर उस ने तब तक कुछ नहीं खायापीया, जब तक कि पंचों ने अलग रहने का फैसला नहीं ले लिया.

अब तो मोहिनी की पौबारह थी. अकेले घर में उसे सभी तरह की छूट थी. न दिन में कोई देखने वाला, न रात में कोई उठाने वाला. अब तो वह अपनी नींद सोती और अपनी नींद जागती थी. मनोहरा तो उस के रूप और जवानी पर पहले से ही लट्टू था, बंटवारा होने के बाद से तो वह उस का और भी एहसानमंद हो गया था.

मनोहरा दिनभर अपने खेतों में काम करता और रात में खापी कर मोहिनी के रूपरस का पान कर जो सोता, तो 4 बजे भोर में ही पशुओं को चारापानी देने के लिए उठता.

इस बीच मोहिनी क्या करती है, क्या खातीपीती है, कहां उठतीबैठती है, इस का उसे बिलकुल भी एहसास न था और न ही चिंता थी.

मोहिनी ने एक मोबाइल फोन खरीद लिया. कुछ ही दिनों में उस ने अपने पुराने प्रेमी से फोन पर बात की, ‘‘सुनो कन्हैया, अब मैं यहां भी पूरी तरह से आजाद हूं. तुम जब चाहो समय निकाल कर यहां आ सकते हो, केवल इतना ध्यान रखना कि मेरे गांव के पास आ कर पहले मुझ से बातचीत कर के ही घर पर आना… समझे?’’

‘क्यों, अब मेरे रात में आने से तुझे अपनी नींद में खलल पड़ती है क्या? दिन में बारबार तुम्हारे यहां आने से नाहक लोगों को शक होगा,’ कन्हैया ने कहा.

‘‘रात के अंधेरे में तो सभी काला धंधा चलाते हैं, पर दिन के उजाले में भी कुछ दिन अपना काला धंधा चला कर मजा लेने में क्या हर्ज है. रात को पशुशाला में गोबर की बदबू के बीच वह मजा कहां, जो दिन के उजाले में अपने मर्द के बिछावन पर मिलेगा.’’

‘ठीक है, मोहिनी. तुम्हारी बातों को मैं ने कब काटा है. यह आदेश भी सिरआंखों पर, लेकिन जोश के साथ होश कभी नहीं खोना चाहिए… ठीक है, कल दोपहर बाद…’ कन्हैया बोला.

दूसरे दिन सवेरे ही मोहिनी ने मनोहरा को चायनाश्ता करा कर, दोपहर का खाना दे कर खेत पर काम करने इस तरह विदा किया, जैसे कोई मां अपने बच्चे को तैयार कर पढ़ने के लिए भेजती है.

ठीक साढ़े 12 बजे मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. भीतरबाहर, अगलबगल देख कर मोहिनी ने कन्हैया को घर पर आने का सिगनल दे दिया.

कन्हैया सावधानी से उस के दरवाजे तक आ गया और वहां से उसे अपने आंगन तक ले जाने के लिए तो मोहिनी वहां मौजूद थी ही. तकरीबन 2 घंटे तक कन्हैया वहां रह कर मौजमजा लेता रहा, फिर जैसे आया था वैसे ही लौट गया.

ठीक उसी समय अलग हुए बराबर के घर में सलोनी अपने छोटे भाई रमुआ के साथ पशुओं को खूंटे से बांध रही थी. आज रमुआ अपने साथ दोपहर का खाना नहीं ले जा सका था, इसी वजह से वह सवेरे ही पशुओं को हांक लाया था.

सलोनी ने चाची के घर से निकल कर एक अजनबी को जाते देखा, तो उसे कुछ अटपटा सा लगा, पर वह चुप लगा गई.

दूसरे दिन भी जब सलोनी बैलों को पानी पिलाने के लिए दरवाजे पर आई, तो गांव के ही रामखिलावन को मोहिनी के घर से निकलते देखा. देखते ही वह पहचान गई कि यह वही रामखिलावन है, जिस के साथ चाची उसे बदनाम कर के दादादादी और उन से अलग हुई थी.

अब तो सलोनी के मन में कुछ उथलपुथल सी होने लगी. उस ने अपने मन को शांत कर एक फैसला लिया और मुसकराने लगी.

अब सलोनी बराबर चाचा के घर की निगरानी करने लगी. वह अपने आंगन से निकल कर चुपके से चाचाचाची के घर की ओर देख लेती और लौट जाती. एक दिन उसे फिर एक नया अजनबी उस आंगन से निकलते हुए दिखा.

अब सलोनी से रहा नहीं गया. उस ने अपनी दादी से सारी बातें बताईं. वह बूढ़ी अपनी एक खास जवान पड़ोसन से मदद ले कर इस बात की जांच में जुट गई.

तीनों मिल कर छिपछिप कर एक हफ्ते तक निगरानी करती रहीं. सलोनी की बात सोलह आने सच साबित हुई. फिर दादी ने अपने बड़े बेटे गोखुला और अपने पति से सहयोग ले कर एक नई योजना बनाई और 2-4 दिनों तक और इंतजार किया.

दूसरी ओर मोहिनी इन सभी बातों से अनजान मौजमस्ती में मशगूल रहती थी. वैसे, उस के घर में जो भी मर्द आता था, वह कोई कीमती चीज उसे दे जाता था.

कन्हैया को आए जब कई दिन हो गए, तो मोहिनी के मन की तड़प बढ़ गई, दिल जोरों से धड़कने लगा. उसे खयाल आया कि सिकंदर भी आने से मना कर चुका है, तो क्यों न आज फिर एक बार कन्हैया को ही बुला लिया जाए. उस ने झट से मोबाइल फोन उठा लिया.

दूसरी ओर से कन्हैया ने पूछा, ‘हां मोहिनी, क्या हालचाल है? तुम वहां खुश तो हो न?’

‘‘क्या खाक खुश रहूंगी. तुम तो इधर का जैसे रास्ता ही भूल बैठे. दिनभर बैठी रहती हूं मैं तुम्हारी याद में और तुम तो जैसे डुमरी का फूल बन गए हो आजकल.’’

‘बोलो क्या हुक्म है?’

‘‘आज तुम दोपहर के 12 बजे मेरे घर आ जाओ.’’

‘हुजूर का हुक्म सिरआंखों पर,’ कहते हुए कन्हैया ने फोन काट दिया.

मोहिनी ने तो अपनी योजना बना ली थी, पर उसे भनक तक नहीं थी कि कोई उस पर नजर रखे हुए है. कन्हैया पर नजर पड़ते ही सभी सावधान हो गए. वह एक ओर से आ कर मोहिनी के आंगन में घुस गया. लोगों ने देखा कि मोहिनी उसे दरवाजे से भीतर ले गई.

सलोनी ने दादी के कहने पर मनोहरा चाचा को भी बुला कर अपने दरवाजे पर बैठा लिया था. धीरेधीरे कुछ और लोग आ गए और जब तकरीबन आधा घंटा बीत गया होगा, तब मनोहरा को आगे कर सभी लोग उस के दरवाजे पर पहुंच गए.

दस्तक देने पर जब दरवाजा नहीं खुला, तब लोगों ने मनोहरा को ऊंची आवाज लगा कर मोहिनी को बुलाने को कहा. उस की आवाज को पहचान कर मोहिनी को कुछ शक हुआ, क्योंकि आज उसे धान के खेत की निराईगुड़ाई करनी थी. आज उसे शाम में भी देर से आने की उम्मीद थी. वह कन्हैया संग पलंग पर प्रेम की पेंगें भर रही थी.

ज्यों ही मोहिनी ने दरवाजा खोला, सामने मनोहरा के संग पासपड़ोस के लोगों को देख कर उस के होश उड़ गए. वह कुछ बोलती, इस से पहले ही पूरा हुजूम उस के आंगन में घुस गया और कन्हैया को भी धर दबोचा.

पत्नी मोहिनी के सामने हमेशा भीगी बिल्ली बना रहने वाला मनोहरा आज न जाने कैसे बब्बर शेर बन कर दहाड़ता हुआ उस पर पिल पड़ा और चिल्लाया, ‘‘आज मैं इस को जान से मार कर ही चैन की सांस लूंगा.’’

उस दिन के बाद से फिर न तो मोहिनी कभी वापस गांव में दिखी और न ही उस का प्रेमी. सुना था कि वह शहर जा कर कई घरों में बरतन मांज कर फटेहाल गुजारा कर रही है. Hindi Family Story

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