Story In Hindi: जय बाबा सैम की

Story In Hindi: अंकिता ने अमित को अपने खास दोस्तों से मिलवाने के लिए अपनी सहेली महक के घर लंच पर बुलाया था. उन दोनों को वहां पहुंचे चंद मिनट ही हुए होंगे कि अंकिता की दूसरी प्रिय सहेली रिया भी अपने पति राजीव के साथ आ पहुंची.

महक के पति मोहित ने रिया पर नजर पड़ते ही उस की तारीफ की, ‘‘रिया, आज तो तुम्हें देख रास्ते में न जाने कितने लड़के गश खा कर गिरे होंगे.’’

‘‘एक भी नहीं गिरा,’’ रिया ने उदास दिखने का अभिनय किया.

‘‘मैं नहीं मान सकता. देखो, संसार की सब से खूबसूरत स्त्री को सामने देख कर मेरा दिल कितना तेज धड़क रहा है,’’ अपनी छाती पर रखने के लिए मोहित ने अचानक रिया का हाथ पकड़ लिया.

‘‘जय बाबा सैम की…’’ रिया ने अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास करने के बजाय शरारती अंदाज में नारा लगाया.

‘‘जय…’’ अंकिता और महक ने हाथ उठा कर जोशीली आवाज में नारा पूरा किया तो मोहित ने झेंपते हुए रिया का हाथ छोड़ दिया.

अमित को इन तीनों सहेलियों का व्यवहार अटपटा लगा.

‘‘यार, इस नए बंदे के सामने तो अपने बाबा सैम का गुणगान इतनी जल्दी शुरू मत करो,’’ मोहित ने बुरा सा मुंह बना कर टिप्पणी की.

‘‘हम मरते दम तक भी बाबा का गुणगान करना बंद नहीं करेंगे,’’ महक ने अपने पति के गाल पर प्यार से चिकोटी काटी.

‘‘उन्होंने हमें जो ज्ञान दिया है, उसे हम तीनों ने हमेशा के लिए गांठ बांध लिया है,’’ अंकिता ने महक की बात का समर्थन किया.

‘‘यह बाबा सैम कौन हैं?’’ अमित ने उत्सुकता दर्शाते हुए अंकिता से सवाल पूछा.

‘‘सैम का किस्सा तुम्हें जरा फुरसत में सुनाऊंगी अमित, पहले यह बताओ कि चाय पियोगे या कौफी?’’ महक ने टालते हुए कहा.

‘‘मैं चाय पिऊंगा.’’

सालभर पहले अंकिता अपनी इन दोनों करीबी सहेलियों महक और रिया से परिचित नहीं थी. एक रविवार की सुबह ये दोनों बिना कोई सूचना दिए पहली बार उस से मिलने कामकाजी महिलाओं के होस्टल में आ पहुंची थीं. महक ने अपना परिचय दिया तो पता चला कि वह मेरठ की रहने वाली है और वहां कालेज में समीर के साथ पढ़ा करती थी. समीर जौब करने दिल्ली आ गया था जबकि महक मेरठ में एक पब्लिक स्कूल में पढ़ा रही थी.

उस दिन महक ने गंभीर लहजे में अंकिता को बताया था, ‘‘किसी जानकार ने मुझे महीनाभर पहले बताया कि उस ने समीर को एक सुंदर लड़की के साथ फिल्म देख कर बाहर निकलते देखा था. यह सुन कर मेरा माथा ठनका, क्योंकि समीर ने मुझ से शादी करने का वादा कर रखा है. हम दोनों के बीच प्रेम का रिश्ता करीब 4 साल से चल रहा है. कहीं वह मुझे धोखा तो नहीं दे रहा, यह जानने के लिए मैं ने जब उस के पीछे एक प्राइवेट डिटैक्टिव लगाया तो पता चला कि जनाब दिल्ली में एक नहीं बल्कि 2-2 लड़कियों से चक्कर चला रहे हैं.’’

उस का इशारा अंकिता और रिया की तरफ था. अंकिता समीर की कंपनी में जौब कर रही थी जबकि रिया से उस का परिचय किसी दोस्त के माध्यम से एक विवाह समारोह में हुआ था.

उन तीनों ने आपस में खुल कर बातें कीं तो समीर की बेवफाई सामने आ गई. वह अंकिता और रिया के साथ भी प्यार का खेल खेल रहा था.

बहुत ज्यादा परेशान और गुस्से में नजर आ रही महक बोली, ‘‘हमारे लिए सब से पहले यह जानना जरूरी है कि समीर हम में से किसी का जीवनसाथी बनने लायक है भी या नहीं. अगर वह हम तीनों को बेवकूफ बना कर हमारी भावनाओं से खेल रहा है तो हिसाब बराबर करने के लिए हमें उसे तगड़ा सबक सिखाना चाहिए.’’

उन तीनों ने साथ बैठ कर समीर की असलियत उजागर करने के लिए योजना बनाई. फिर योजनानुसार पहले अंकिता ने फोन कर के समीर से कहा कि वह आज शाम उस के साथ गुजारना चाहती है. उस ने 6 बजे नेहरू पार्क में उसे मिलने के लिए बुलाया.

रिया ने भी उसी शाम समीर को अपने घर में 6 बजे चाय पीने के लिए बुलाया. बातोंबातों में वह उसे यह बताना नहीं भूली कि उस शाम उस के मातापिता भी घर पर नहीं होंगे.

आखिर में महक ने समीर को फोन कर के जानकारी दी कि वह एक रिश्तेदार को देखने आज दिल्ली आ रही है और रात 8 बजे के करीब वापस मेरठ लौट जाएगी. अत: उस ने 6 बजे उसे अपने मामा के घर मिलने के लिए बुलाया.

समीर ने उन तीनों से ही शाम 6 बजे मिलने का वादा कर लिया.

अमित ने चाय का पहला घूंट भरने के बाद जायकेदार चाय बनाने के लिए महक की दिल खोल कर तारीफ की.

महक ने प्रसन्न अंदाज में अमित से पूछा, ‘‘अब तुम यह बताओ कि हमारी अंकिता के साथ तुम ने इश्क का चक्कर कब, कहां और कैसे चलाया?’’

‘‘यह मेरे दोस्त नीरज की शादी में आई हुई थी. मैं तो पहली ही नजर में इसे अपना दिल दे बैठा था,’’ अमित ने कुछ शरमाते हुए सब को जानकारी दी.

‘‘पहली बार अंकिता को देख कर मुझ पर भी कुछ ऐसा ही प्रभाव पड़ा था, पर अफसोस कि तब तक मेरी बरात रिया के फार्म हाउस तक पहुंच चुकी थी,’’ राजीव के इस मजाक पर सब दिल खोल कर हंसे तो रिया ने चिढ़ाने वाले अंदाज में अपनी जीभ निकाली.

‘‘अच्छा, एक बात बताओ. क्या तुम किसी भी सुंदर लड़की को देख कर लाइन मारना शुरू कर देते हो?’’ महक ने एक ही झटके से यह टेढ़ा सवाल अमित से पूछा.

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ अमित की आवाज में लड़खड़ाहट थी.

‘‘ऐसी बात हो भी तो फिक्र नहीं,’’ महक ने उस की टांग खींचना जारी रखा, ‘‘किसी भी सुंदर लड़की को देखते ही अगर तुम्हारे सिर पर लाइन मारने का भूत सवार हो जाता हो तो अपना यह शौक तुम रिया और मेरे साथ फ्लर्ट कर के पूरा कर लेना. हम दोनों ऐसी किसी छेड़छाड़ का बिलकुल बुरा नहीं मानेंगी.’’

‘‘वाह, क्या खुलेआम झूठ बोला जा रहा है यहां,’’ मोहित ने हंसते हुए अपनी पत्नी की बात का विरोध किया, ‘‘बहुत अच्छी हैं ये सालियां, हंसीमजाक करो और खाओ इन से गालियां… कितनी शानदार और बढि़या तुकबंदी की है न मैं ने, राजीव?’’ मोहित ने खुद ही अपनी तारीफ कर डाली.

राजीव के बोलने से पहले ही रिया ने उस की बात को खारिज करते हुए कहा, ‘‘बिलकुल झूठी बात है यह. सहेलियो, हम स्वस्थ हंसीमजाक का जवाब गालियों से बिलकुल नहीं देतीं लेकिन जब मामला शालीनता की सीमा तोड़ता नजर आए तो ही मजबूर हो कर यह नारा लगाती हैं, ‘‘बोलो, बाबा सैम की…’’

‘‘जय…’’ तीनों सहेलियों ने एकसाथ जोशीले अंदाज में ‘जय’ कहा, तो राजीव और मोहित से आगे कुछ कहते नहीं बना.

समीर के मन में खोट था और वह शाम को 6 बजे रिया या महक के बजाय अंकिता से मिलने पहुंच गया. घर में किसी और के न होने का फायदा उठाते हुए जब वह जबरदस्ती उस के कपड़े उतारने की कोशिश करने लगा तो बैडरूम में छिपी महक और रिया वहां से निकल कर उस के सामने ड्राइंगरूम में आ गईं. उन तीनों को एकसाथ सामने देख समीर की हालत एकदम से बेहद खस्ता हो गई. उस ने महक को सफाई देने की कोशिश की, पर उस का झूठ चला नहीं.

उन तीनों के तेज गुस्से को भांप उस ने अपनी जान बचा कर वहां से भागने की कोशिश की, पर तीनों गुस्साई शेरनियों के चंगुल से वह कैसे बच सकता था. तीनों ने उस चालबाज इंसान की पहले जम कर चप्पल व सैंडिलों से धुनाई की और फिर उसे एक झटके में अपनीअपनी जिंदगियों से निकाल कर फेंका.

महक और रिया उस रात अंकिता के घर में ही रुकीं. उस रात साथसाथ हंस और आंसू बहा कर सुबह तक वे तीनों अच्छी सहेलियां बन गई थीं. महक ने वार्त्तालाप को फिर से रास्ते पर लौटाते हुए इस बार अंकिता से पूछा, ‘‘क्या तू ने भी अमित को अपना भावी जीवनसाथी बनाने का फैसला उसी रात कर लिया था?’’

अंकिता ने प्यार से अमित का हाथ पकड़ कर जवाब दिया, ‘‘नहीं, मुझे तो इन जनाब को अपना भावी जीवनसाथी स्वीकार करने में महीना लग गया. वैसे मुझे नहीं लगता कि अमित दिलफेंक इंसान है. इसलिए तुम दोनों इसे ज्यादा तंग मत करो.’’

‘‘क्या हम तुम्हें तंग कर रही हैं?’’ महक ने अमित का हाथ थाम कर बड़ी अदा से पूछा.

‘‘नहीं तो,’’ उस के खुले व्यवहार ने अमित को शरमाने पर मजबूर कर दिया था.

‘‘शरमाओ मत, अमित. मौका मिलते ही अपनी इन दोनों सालियों से फ्लर्ट किया करो, क्योंकि किसी और लड़की के साथ फ्लर्ट करना तुम्हारे लिए अब ख्वाब बन कर रह जाएगा,’’ मोहित ने शरारती अंदाज में मुसकराते हुए अमित को सलाह दी.

‘‘लगे हाथ तुम्हें एक किस्सा और सुना देती हूं,’’ महक ने एकाएक संजीदा हो कर बोलना शुरू किया, ‘‘तुम्हें नेक सलाह देने वाले मेरे पति पर भी मात्र 6 महीने पहले शिखा नाम की एक खूबसूरत तितली से रोमांस करने का भूत चढ़ा था. जब हम तीनों को इन के रोमांस के बारे में पता चला…’’

मोहित ने अपनी पत्नी को टोकते हुए सफाई दी, ‘‘मुझ पर उस से इश्क लड़ाने का भूत नहीं चढ़ा था बल्कि शिखा ही इस स्मार्ट बंदे के पीछे हाथ धो कर पड़ गई थी.’’

उस के कहे कोअनसुना कर महक ने बोलना जारी रखा, ‘‘…तो हम तीनों शिखा से मिलने उस के फ्लैट पर पहुंच गईं. तुम अंदाजा लगा सकते हो कि हम तीनों गुस्साई शेरनियों ने शिखा का क्या हाल किया होगा. हम से उस ने थप्पड़ भी खाए और कुछ कीमती सामान भी हमारे हाथों तुड़वाया. मुझे विश्वास है कि हमारी शक्लें याद कर उसे महीनों ढंग से नींद नहीं आई होगी,’’ रिया अमित को यह बताते हुए काफी खुश लग रही थी.

मोहित ने झेंपे से अंदाज में मुसकराते हुए अमित को सफाईर् दी, ‘‘मेरे मन में कोई खोट नहीं था, पर इन्हें कौन समझाए. तुम ही बताओ कि किसी से मारपीट करना अच्छी बात है क्या?’’

‘‘बाबा सैम के साथ हुए अनुभव ने हमें उस मामले में बिलकुल सही राह दिखाई थी. बोलो, बाबा सैम की…’’

‘‘जय…’’ महक की आवाज में अपनी आवाज मिलाते हुए तीनों सहेलियों ने नारा लगाया और फिर जोर से हंसने लगीं.

समीर वाली घटना से सबक ले कर उस रात वे तीनों इस नतीजे पर पहुंचीं कि अधिकतर स्मार्ट, सुंदर और सफल युवक शादी होने के बाद भी अन्य खूबसूरत लड़कियों के साथ फ्लर्ट करेंगे. समस्या यह थी कि वे तीनों अपने भावी जीवनसाथी के रूप में ऐसे ही स्मार्ट, सुंदर और सफल  युवकों के सपने देखती थीं.

‘‘हमारे जीवनसाथी हमें अंधेरे में रख कर समीर की तरह मूर्ख बनाएं, हम ऐसी नौबत कभी आने ही नहीं देंगी. हम अपने पतियों की किसी गलत हरकत को कभी एकदूसरे से नहीं छिपाएंगी. उन्होंने अगर किसी अन्य लड़की से गलत रिश्ता बनाने की कोशिश की तो हम तीनों मिल कर उस अवैध प्रेम संबंध का समूल नाश करेंगी. चालाक और चरित्रहीन समीर आज से हमारे लिए ‘बाबा सैम’ हुआ और उस से मिले सबक को हम तीनों कभी नहीं भूलेंगी,’’ तीनों सहेलियों ने उस दिन से एकदूसरे के हितों का हमेशा ध्यान रखने की कसम खाई थी.

हंसी का दौर थम जाने के बाद महक ने अमित को बताया, ‘‘शिखा का हम ने जो बुरा हाल किया था, उस की खबर इश्क लड़ाने की शौकीन अन्य खूबसूरत तितलियों तक हम ने ही पहुंचाई. आज की तारीख में वे सब इन दोनों कामदेव के अवतारों से फ्लर्ट करने से डरती हैं.’’

राजीव ने अमित को भावुक लहजे में समझाने का नाटक करना शुरू किया, ‘‘अमित, मेरी मानो तो अंकिता के साथ शादी करने से बचो. शादी के बाद तुम्हें मन मार कर जीना पड़ेगा. जब भी कोई सुंदर लड़की तुम से हंसनाबोलना शुरू करेगी तो इन तीनों की सैम बाबा का नारा लगाती सूरतें आंखों के सामने आ कर तुम्हारी जबान को लकवा मार देंगी.’’

‘‘मेरे दिल में न अब खोट है, न कभी आएगा. अंकिता से शादी कर के मैं खुशीखुशी इन तीनों शेरनियों के साथ रिश्ता जोड़ने को तैयार हूं,’’ खुल कर मुसकराते अमित ने उस की सलाह को नजरअंदाज करते हुए अंकिता का हाथ चूम लिया.

अमित की आंखों में अपने लिए प्यार का सागर लहराते देख अंकिता खुश हो कर उस के गले लग गई.

‘‘मैं ने गाजर का हलवा बनाया है. हमारे गु्रप में एक समझदार इंसान के शामिल होने की खुशी में मैं सब का मुंह मीठा कराती हूं,’’ महक किचन की तरफ चली गई थी.

‘‘अमित, हमारे इतना समझाने के बावजूद तुम ने ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत सच साबित कर दी है,’’ मोहित ने यों अपना चेहरा लटका लिया मानो सचमुच बहुत दुखी हो, तो बाकी सब ने उस के इस बढि़या अभिनय पर जोरदार ठहाका लगाया.

कुछ देर बाद गाजर के हलवे का स्वाद चखते ही राजीव ने महक से कहा, ‘‘महक, जरा अपना हाथ इधर करो, मैं उसे चूमना चाहता हूं.’’

‘‘किस खुशी में?’’

‘‘बहुत स्वादिष्ठ हलवा बनाया है तुम ने.’’

‘‘मुंह से मेरी तारीफ कर देने से काम चल जाएगा.’’

‘‘पर हाथ चूम कर तारीफ करने का मजा ही कुछ और है,’’ कहते हुए राजीव ने महक का हाथ पकड़ लिया.

‘‘बोलो, बाबा सैम की…’’ महक ने हाथ छुड़ाने की कोशिश किए बिना नारा लगाने की शुरुआत की.

‘‘जय…’’ रिया और अंकिता नाटकीय अंदाज में आंखें तरेरती हुईं अपनी सहेली की सहायता करने को उठ खड़ी हुईं.

राजीव ने महक का हाथ छोड़ा और मोहित की तरफ देख कर मरे से स्वर में बोला, ‘‘बाबा सैम…’’

‘‘हाय… हाय…’’ मोहित ने बेहद दुखी इंसान की तरह अपना माथा ठोंकते हुए नारा पूरा करने में उस का साथ दिया तो बाकी सभी हंसतेहंसते लोटपोट हो गए. Story In Hindi

Hindi Kahani: मोबाइल गरम हो गया – सोनू और रेखा की चुहलबाजी

Hindi Kahani: सोनू एक गरीब घर का बेरोजगार नौजवान था. वह थोड़ाबहुत पढ़ालिखा था. काफी कोशिशों के बाद भी उसे सरकारी नौकरी नहीं मिली, तो मजबूरन अपना गांव छोड़ कर एक शहर में आ गया और प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा.

शहर में सोनू किराए के मकान में रहता था. कुछ दिन बाद वहां मकान मालिक की एक रिश्तेदार रेखा रहने के लिए आई. वह बहुत खूबसूरत थी. गोरा रंग, कसा बदन, काले व घुंघराले बाल, बड़ीबड़ी आंखें, कोई भी देखे तो देखता ही रह जाए.

सोनू सुबह उठ कर खाना बनाता, बरतन मांजता और काम पर चला जाता. यह उस का रोज का काम था.

यह देख कर रेखा को बहुत तकलीफ होती थी. कुछ दिन बीत जाने के बाद रेखा ने उस से कहा, ‘‘सोनू, मैं तुम्हारे लिए खाना बना देती हूं.’’

यह बात सोनू को बहुत अच्छी लगी और अब वह रेखा के साथ खाना खाने लगा.

रेखा सोनू से खूब बतियाती थी और मस्ती भी करती थी, लेकिन सोनू कुछ नहीं कहता था. वह सिर्फ हंस कर रह जाता था.

अब सोनू को रेखा बहुत अच्छी लगने लगी थी. एक दिन उस ने हिम्मत कर के रेखा के गाल को छू दिया.

रेखा हंस कर रह गई और कुछ नहीं बोली. सोनू को यह देख कर बहुत अच्छा लगा.

एक दिन जब सोनू काम से वापस आया, तो रेखा ने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया और खूब जोर से उस के गाल पर काट लिया.

सोनू सिहर कर रह गया और बाहर चला गया. धीरेधीरे दोनों में नजदीकियां बढ़ती गईं.

एक दिन की बात है. सोनू काम से लौटा, तो उस ने देखा कि रेखा दरवाजे पर खूब सजधज कर खड़ी थी. वह सोनू को अंदर नहीं जाने दे रही थी.

सोनू ने भी सोचा कि जो होगा देखा जाएगा. उस ने रेखा को अपनी बांहों में भर कर उस के गाल पर ऐसा काटा कि दांत के निशान बन गए.

रेखा का गाल इतना लाल हो गया कि उस से खून निकल आएगा. उस की आंखों से आंसू निकलने लगे.

रेखा ने सोनू को बहुत डांटा, ‘‘मैं तो तुम्हें दोस्त सम?ाती थी और तुम एकदम निर्दयी निकले.’’

यह सुन कर सोनू शर्मिंदा हो गया. उस ने अपना बिस्तर उठाया और सोने के लिए छत पर जाने लगा.

जातेजाते उस ने रेखा से कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं अब दोबारा तुम्हें कभी नहीं छुऊंगा.’’

छत पर लेटे सोनू की आंखों से नींद कोसों दूर थी. यह कहावत भी सच है कि आग और फूस जब नजदीक होंगे, तो कभी न कभी आग जरूर लगेगी.

रात बीत रही थी. रात के तकरीबन 11 बज रहे थे. रेखा ने अपना मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए स्विच बोर्ड में लगाया.

थोड़ी देर बाद रेखा ने सोचा कि क्यों न वह मोबाइल चार्जर से निकाल कर अपने पास रख कर सो जाए. जब वह मोबाइल फोन निकालने लगी, तो उस ने देखा कि वह गरम हो गया था.

रेखा अंदर से दरवाजा धीरेधीरे पीटने लगी. छत पर लेटा सोनू जाग रहा था. वह सीढि़यों से उतर कर दरवाजे के पास आया और बोला, ‘‘रेखा, क्या बात है? इतनी रात को तुम जोरजोर से दरवाजा क्यों पीट रही हो?’’

रेखा ने कहा, ‘‘तुम अंदर आओ, तो बताऊं कि क्या बात है.’’

सोनू अंदर गया, तो रेखा ने कहा, ‘‘सोनू, मेरा मोबाइल फोन बहुत गरम हो गया है.’’

सोनू ने मोबाइल फोन को चार्जर से निकाल कर मेज पर रख दिया और कहा, ‘‘मोबाइल तो ज्यादा गरम नहीं है. थोड़े समय में ठंडा हो जाएगा.’’

फिर वे दोनों एकदूसरे को देखते रहे. सोनू बोला, ‘‘क्या अब मैं छत पर सोने जाऊं?’’

रेखा ने अंगड़ाई ली और कहने लगी, ‘‘अगर तुम नामर्द हो, तो जाओ. अगर मर्द हो, तो मेरा मोबाइल ठंडा कर के जाओ.’’

यह सुन कर सोनू ने दरवाजा अंदर से बंद किया और रेखा को बांहों में भर कर बिस्तर पर ले गया. फिर वे दोनों प्यार के सागर में इतनी बार डूबे कि सुबह कब हुई, पता ही नहीं चला. रेखा का बदन इतना टूट गया था कि उस में उठने की ताकत भी नहीं रही थी.

कुछ दिनों के बाद रेखा अपने गांव चली गई और सोनू को उसी मोबाइल फोन से फोन किया, जो उस रात गरम हो गया था.

फोन पर ही रेखा ने शादी करने का इरादा जताया. उस ने कहा, ‘‘प्यारे सोनू, अब तुम घर चले आओ.’’

सोनू उस के गांव गया और दोनों ने एक मंदिर में जा कर शादी कर ली. इस के बाद वे हंसीखुशी अपनी जिंदगी बिताने लगे. Hindi Kahani

Hindi Family Story: विश्वासघात – सीमा के कारण कैसे टूटा प्रिया का घर

Hindi Family Story: प्रिया ने पालने में सोई अपनी नवजात बच्ची को मुसकराते देखा तो वह भी मुसकरा दी. प्रिया उस में अपना और निर्मल का अक्स ढूंढ़ने की कोशिश करने लगी. निर्मल को एक बेटी की चाह थी जबकि वह बेटा चाहती थी, क्योंकि वह निर्मल के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थी.

प्रिया एक छोटे शहर में पलीबढ़ी थी. इकलौती संतान होने के कारण मातापिता की दुलारी थी. निर्मल की बूआ उन के पड़ोस में रहती थीं. वे ही निर्मल का रिश्ता उस के लिए लाई थीं. निर्मल मुंबई में मल्टीनैशनल कंपनी में काम करते थे. उन के मातापिता कार दुर्घटना में चल बसे थे. उन के जाने के बाद बूआ ने ही उन की परवरिश की थी. प्रिया के मातापिता को निर्मल पसंद थे, इसलिए चट मंगनी और पट ब्याह कर दिया.

शादी के 1 हफ्ते बाद प्रिया निर्मल के साथ मुंबई आ गई. निर्मल एक अपार्टमैंट में 7वीं मंजिल पर 3 कमरों के फ्लैट में रहते थे. शादी के बाद दोनों ने फ्लैट को बड़े जतन से सजाया. निर्मल अपने नाम के अनुसार स्वभाव से बहुत ही निर्मल थे. उन में बिलकुल बनावटीपन नहीं था.

कुछ ही समय बाद प्रिया ने निर्मल को 2 से 3 होने की खुशखबरी सुना दी. दोनों बहुत खुश थे. अब निर्मल उस का बहुत ध्यान रखने लगे थे. उसी दौरान निर्मल के प्रमोशन ने उन की खुशी को दोगुना कर दिया. परंतु काम की जिम्मेदारी बढ़ने की वजह से अब वे ज्यादा व्यस्त रहने लगे.

प्रिया दिन भर अकेले काम करते थक जाती थी, इसलिए दोनों ने एक बाई रखने का फैसला किया. महानगर मुंबई में लोग बहुत व्यस्त रहते हैं. किसी को किसी से कोई लेनादेना नहीं होता. अंतर्मुखी होने के कारण प्रिया भी ज्यादातर घर में ही रहती थी. इसीलिए उन्होंने बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड से बाई ढूंढ़ने के लिए मदद मांगी. कुछ ही दिन बाद उस ने एक बाई को भेजा.

लगभग 30 साल की दुबलीपतली रमा बाई को उन्होंने मामूली पूछताछ के बाद काम पर रख लिया. रमा बाई ने बताया कि वह पास की बिल्डिंग में और 3 घरों में काम करती है. उसके 2 बच्चे हैं. पति स्कूल में चपरासी है. इस से अधिक जानने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी.

रमा बाई सुबह 8 बजे काम पर आती और करीब 10 बजे तक काम निबटा कर चली जाती. जब वह काम करने आती तब निर्मल के औफिस जाने का समय होता था, इसलिए प्रिया ज्यादातर निर्मल के लिए नाश्ता और टिफिन तैयार करने में व्यस्त होती थी. धीरेधीरे रमा बाई घर की सदस्य जैसी बन गई. वह प्रिया के छोटेमोटे कामों जैसे बाजार से दूधसब्जी लाने में मदद करने लगी.

अब अकसर प्रिया का मौर्निंग सिकनैस की वजह से जी मचलाने लगा और उस के लिए खाना बनाना मुश्किल होने लगा. यह देख कर एक दिन रमा बाई ने उस के आगे एक प्रस्ताव रखा. बोली, ‘‘मैडमजी, मेरी एक छोटी बहन है. बेचारी गूंगी है, शादी नहीं हो पाई, इसलिए हमारे साथ ही रहती है.

अगर आप कहें तो जब तक आप की डिलिवरी नहीं हो जाती आप उसे खाना बनाने और दूसरे कामों के लिए रख लें. आप को जो ठीक लगे उसे दे देना. सुबह मैं साथ ले आया करूंगी और शाम को साथ ले जाया करूंगी.’’

प्रिया और निर्मल को उस की बात जंच  गई, इसलिए उन्होंने हां कह दिया. अगले ही दिन रमा बाई अपने साथ 22-23 वर्ष की लड़की को ले आई. उस ने उस का नाम सीमा बताया. सीमा देखने में बहुत सुंदर थी. प्रिया को उस के गूंगे होने पर बहुत तरस आया. सीमा उन के घर खाना बनाने का काम करने लगी. वह सभी काम बहुत अच्छे तरीके से व समय से पहले कर देती.

वह प्रिया को समय से फल काट कर खिलाती, समय पर खाना खिलाती. पतिपत्नी दोनों सीमा के काम से बेहद खुश थे. कभीकभी निर्मल को औफिस के काम से बाहर जाना पड़ता. तब प्रिया सीमा को रात को घर पर रोक लेती. सीमा निर्मल का कुछ विशेष ही ध्यान रखती थी, परंतु प्रिया को इस में कोई बुराई नजर नहीं आई, इसलिए उस ने उस पर कुछ ज्यादा ध्यान नहीं दिया. फिर उन दिनों अकसर तबीयत खराब रहने के कारण वह परेशान भी रहती थी.

हालांकि प्रिया को सीमा का निर्मल के बूट पौलिश करना और बाथरूम में कपड़े रखना शुरू से अखरता था, परंतु दूसरे ही क्षण वह इसे नारीसुलभ जलन समझ कर भूल जाती. कभीकभी तो उसे अपने इस विचार पर खुद पर शर्म महसूस होती कि एक गूंगी लड़की पर शक कर रही है.

इस बीच प्रिया का चौथा महीना शुरू हो गया था. उस दिन निर्मल औफिस की फाइलें घर ले आए थे और आते ही ड्राइंगरूम में टेबल पर सभी फाइलें फैला कर काम करने बैठ गए. प्रिया की तबीयत सुबह से ही ठीक नहीं थी, इसलिए उस ने सीमा को रात को घर पर रोक लिया. खाना खा कर वह बैडरूम में आराम करने लगी और निर्मल अपना काम निबटाने में व्यस्त हो गए.

करीब रात के 1 बजे कुछ आवाजों से उस की नींद टूट गई. निर्मल बिस्तर पर नहीं थे. उन के तेजतेज बोलने की आवाज आ रही थी. वह ड्राइंगरूम की ओर तेज कदमों से भागी. वहां का दृश्य देख कर अवाक रह गई. सीमा एक ओर खड़ी रो रही थी.

उस के कपड़े अस्तव्यस्त और कई जगह से फटे थे. प्रिया को देख कर निर्मल हकबका कर सफाई देने लगे, ‘‘प्रिया, मैं ने कुछ नहीं किया. यह अचानक आ कर मुझ से लिपट गई. जब मैं ने इसे पीछे धकेला तो इस ने अपने कपड़ों को फाड़ना शुरू कर दिया.’’

सीमा लगातार रोए जा रही थी. वह प्रिया के गले से लिपट गई. उस की हालत देख कर प्रिया का चेहरा तमतमा उठा. उस के अंदर की औरत जैसे जाग उठी. बोली, ‘‘मुझे आप से कतई यह उम्मीद नहीं थी कि आप इतना गिर जाएंगे.’’

‘‘प्रिया, यह झूठी है… मैं सच कह रहा हूं… मैं ने कुछ नहीं किया,’’ निर्मल लगातार अपनी सफाई दे रहे थे. ‘‘सचाई सामने है और फिर भी आप…छि:,’’ कहते हुए वह सीमा को अपने बैडरूम में ले आई. प्रिया ने उसे पानी पिलाया और किसी तरह चुप करवाया.

‘‘सीमा, मैं बहुत शर्मिंदा हूं…प्लीज मुझे माफ कर दो,’’ प्रिया ने सीमा के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा.

प्रिया मन ही मन खुद को उस का कुसूरवार मान रही थी, क्योंकि उसी के कहने पर उस पर विश्वास कर सीमा रात को रुकी थी. फिर उस ने उसे अपने साथ ही सुला लिया. अगले दिन रमा बाई के आते ही सीमा ने रोरो कर और इशारों से उसे सब कुछ बता दिया.

वह बारबार निर्मल की ओर इशारा कर के रो रही थी. उस की हालत देख कर रमा बाई ने हंगामा खड़ा कर दिया. उस ने उन के सामने ही पुलिस को फोन कर दिया. प्रिया और निर्मल ने उसे रोकने का भरसक प्रयत्न किया. ‘‘क्या मैडमजी, तुम भी अपने आदमी को बचाना चाहती हो? सीमा की जगह तुम्हारी बहन होती तब क्या करतीं?’’ रमा बाई गुस्से से बोली.

10 मिनट में पुलिस की वरदी में 1 आदमी उन के सामने खड़ा था. निर्मल उसे और रमा बाई को अपनी सफाई देते रहे, पर दोनों ने उन की एक न सुनी. प्रिया दोनों हाथों से सिर पकड़े वहीं सोफे पर चुपचाप बैठी रही. पुलिस वाले ने निर्मल को थाने चलने को कहा. निर्मल बहुत घबरा गए. वे मिन्नत करने लगे. आखिर उस पुलिस वाले ने 50 हजार पर रमा बाई और निर्मल में समझौता करवा दिया.

अचानक बच्ची के रोने की आवाज से प्रिया की तंद्रा भंग हो गई. वह भूतकाल से वर्तमान में लौट आई. वह उठ कर बैठने का प्रयास करने लगी. तभी बाहर से निर्मल उस के मातापिता के साथ कमरे में दाखिल हुए और उन्होंने लपक कर बच्ची को गोद में उठा लिया. अपने मातापिता को देख कर प्रिया के पीले पड़े चेहरे पर खुशी फैल गई.

‘‘अरे हमारी गुडि़या अपने नानानानी के पास आने के लिए रो रही है,’’ प्रिया की मां ने निर्मल से बच्ची को अपनी गोद में लेते हुए कहा.

‘‘प्रिया, कैसी हो?’’ बाबूजी ने उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा.

‘‘बिलकुल ठीक हूं,’’ प्रिया ने मुसकरा कर उत्तर दिया.

‘‘तुम ने जूस नहीं लिया…यह लो जूस पी लो,’’ निर्मल ने जूस का गिलास उस के हाथ में थमा दिया.

प्रिया धीरेधीरे जूस पीने लगी. निर्मल के माथे पर बालों की एक लट झूलती बड़ी अच्छी लग रही थी. पिछले 2 दिनों से वे अकेले भाग दौड़ कर रहे थे. नर्स बता रही थी कि एक क्षण के लिए भी उन्होंने पलक नहीं झपकी. मां की गोद में गुडि़या सो गई थी. उसे पालने में लिटा कर मां ने उस के हाथ से जूस का खाली गिलास ले लिया.

‘‘नींद आ रही है…तू भी सो जा. मैं तेरे लिए नाश्ता बना कर लाती हूं,’’ फिर उस के बाबूजी से बोली, ‘‘आप भी नहा लीजिए. निर्मल बेटा, तुम किचन में सामान निकालने में मेरी मदद कर दो. मैं नाश्ता बनाती हूं. फिर सब साथ मिल कर बैठेंगे,’’ कहते हुए मां कमरे से बाहर निकल गईं. प्रिया को बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी. पिछले 5 महीने उस ने बड़े ही कष्ट से काटे थे.

वह मानसिक और शारीरिक यातना से गुजरी थी. सीमा वाले हादसे के बाद वह निर्मल के साथ एक छत के नीचे रहना नहीं चाहती थी, परंतु आने वाले बच्चे के भविष्य और मांबाबूजी के खयाल से उस ने चुप्पी साध ली. आज भी वह यह सोच कर कांप जाती है कि अगर उस ने अलग होने का फैसला कर लिया होता और अपने मायके लौट जाती तब कितना बड़ा अनर्थ हो जाता.

वह तो गनीमत थी कि डाक्टर की सलाह मान कर उस ने रोज पार्क जाना शुरू कर दिया था. वहीं उस की मुलाकात तनु से हुई. तनु उस के साथ स्कूल में पढ़ती थी. एक दिन उस ने बताया कि उस ने घर के काम के लिए एक लड़की रख ली है जो गूंगी है, तो प्रिया का दिल जोर से धड़कने लगा.

‘‘क्या नाम है उस का?’’ कांपते होंठों से प्रिया ने पूछा.

‘‘सीमा, बेचारी बोल नहीं सकती. मेरी बाई को बहन है,’’ तनु ने जवाब दिया.

प्रिया का दिल अनजाने डर से कांप उठा. उसे लगा कि अगर तनु को पता चल गया तो क्या सोचेगी उस के पति के चरित्र को ले कर. प्रिया ने तनु से मेलजोल कम कर दिया. तनु का फोन भी वह नहीं उठाती. लगभग 2 महीने बीत गए.

फिर एक दिन कैमिस्ट की दुकान पर तनु उस से टकरा गई. उस का रंग पीला हो गया था. वह कुछ बुझीबुझी सी थी. उस ने पहले की तरह उस से बातचीत करने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. औपचारिकता के नाते उस ने उस से बातचीत की.

उस के होंठों से हंसी जैसे गुम ही हो गई थी. 2 ही दिन बाद तनु उसे फिर से पार्क में मिल गई. वह बहुत उदास और बीमार सी लगी. प्रिया इस का कारण पूछे बिना रह नहीं सकी. थोड़ी सी नानुकर के बाद तनु टूट गई. उस ने रोतेरोते अपना दुख बांटा जिसे सुन कर प्रिया सकते में आ गई.

तनु ने उसे जो कुछ बताया वह हूबहू उस की कहानी से मिलता था. तनु के मोबाइल में सीमा का फोटो था, इसलिए उस के प्रति उस का संदेह गहरा हो गया.

उस ने अपनी आपबीती तनु को सुनाई. तब दोनों ने तय किया कि वे सीमा के बारे में पता लगाएंगी और फिर एक दिन वे दोनों सीमा और रमा बाई के बारे में पूछतेपूछते उन के घर जा पहुंचीं. बाहर गली में ही उन्होंने भीड़ लगी देखी. पानी भरने के लिए औरतें आपस में लड़ रही थीं.

‘‘तुम दोनों बहनें अपने को समझती क्या हो?’’ पानी की बालटी पकड़े एक औरत बोली.

‘‘खबरदार, जो कोई आगे आया, काट कर फेंक दूंगी सब को,’’ दूसरी आवाज आई. तनु और प्रिया वहीं रुक उन की लड़ाई देखने लगीं. दोनों यह देख कर हैरान रह गईं कि सीमा फर्राटे से बोल रही थी.

‘‘सब से पहले हम दोनों पानी भरेंगी. तुम सब चुडै़लें सुबहसुबह हमारा दिमाग क्यों खराब कर रहीं,’’ सीमा चिल्ला रही थी.

तनु प्रिया का हाथ पकड़ उसे खींचते हुए गली से बाहर ले आई.

‘‘यह सीमा गूंगी नहीं है. देखा कैसे फर्राटे से बोल रही है,’’ प्रिया ने कहा.

‘‘हां प्रिया, इस का मतलब इन दोनों ने जो हमारे साथ किया वह सोचीसमझी साजिश के तहत किया,’’ तनु ने गुस्से से कहा.

‘‘हमें इन्हें सबक सिखाना होगा, लेकिन कैसे, समझ नहीं आ रहा ,’’ प्रिया बोली.

‘‘चलो हम इन्हें पुलिस के हवाले करते हैं,’’ तनु ने प्रिया का हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘लेकिन इस से पहले हमें इन के खिलाफ सुबूत इकट्ठे करने होंगे.’’ घर आ कर उन्होंने अपनेअपने पतियों को सारा माजरा समझाया. फिर सब ने मिल कर फैसला किया कि वे पुलिस के साथ मिल कर उस के सहयोग से इन्हें पकड़वाएंगे.

फिर चारों थाने में गए और अपने साथ हुई ठगी की आपबीती सुनाई. पुलिस ने सब से पहले मालूम किया कि वे दोनों फिलहाल कहां काम कर रही हैं. उन्हें पता चला कि वे अभी किसी नवदंपती के घर पर ही काम कर रही हैं. तब पुलिस ने उस दंपती के साथ मिल कर उन का भांडा फोड़ने की योजना बनाई. संयोग से उन के घर में सीसीटीवी कैमरा लगा था.

कुछ ही दिनों में रमा बाई और सीमा ने वहां भी ऐसा ही खेल खेला, परंतु कैमरे में उन की सारी हरकत कैद हो गई और जो आदमी पुलिस की वरदी में आया वह रमा बाई का शराबी पति था जो पहले दंपती को डराताधमकाता था और फिर पैसे ले कर समझौता करवाता था. उन तीनों को ठगी करने के जुर्म में जेल हो गई. प्रिया की मां उस के लिए नाश्ता ले आई थीं. उन्होंने प्रिया के सिर पर प्यार से हाथ रखा तो प्रिया मुसकरा दी. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: 50 लाख का इनाम – किसकी लगी लौटरी?

Best Hindi Kahani: ‘सर, हमारी मोबाइल कंपनी ने लकी ड्रा में आप को विजेता चुना है. मुंबई में होने वाले शानदार समारोह में आप को 50 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा. कृपया उस के अग्रिम टैक्स और प्रोसैसिंग फीस के रूप में 25 हजार रुपए आज ही 11 बजे तक कंपनी के बैंक अकाउंट 18760… में जमा करा दें. अगर आप 11 बजे तक यह रकम जमा नहीं करा पाते हैं, तो यह इनाम किसी दूसरे शख्स को दे दिया जाएगा.’

कामता प्रसाद के मोबाइल फोन पर सुबहसुबह यह संदेश आया. उसे पढ़ कर वे खुशी से झुम उठे.

कामता प्रसाद के गांव से बैंक तकरीबन 15 किलोमीटर दूर शहर में था. वे रुपए ले कर फौरन बैंक की ओर चल दिए. 11 बजे से पहले उन्होंने बैंक में रुपए जमा करा दिए.

कामता प्रसाद का बेटा रमन राजधानी के एक नामी इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था. वह उसी दिन अपने एक दोस्त सुकेश के साथ गांव आ गया.

कामता प्रसाद ने जब 50 लाख का इनाम जीतने की बात बताई, तो वह बोला, ‘‘पिताजी, बैंक में रुपए जमा कराने से पहले आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?

‘‘जरा से पैसों के लालच में आपने अपनी पूंजी भी गंवा दी,’’ रमन ने अफसोस के साथ कहा.

‘‘क्या मतलब…?’’ कामता प्रसाद ने हैरानी से पूछा.

‘‘चाचाजी, कोई मोबाइल कंपनी इस तरह के इनाम नहीं बांटती है. यह ठगी का नया तरीका है, जिस में आप जैसे भोलेभाले लोग फंस जाते हैं,’’ सुकेश ने कहा.

ठगी की बात जान कर कामता प्रसाद परेशान हो उठे. सुकेश ने उन्हें समझाया, ‘‘आप परेशान मत होइए. मेरे मामाजी पुलिस इंस्पैक्टर हैं. हम लोग उन के साथ बैंक जा कर पता करते हैं.’’

कामता प्रसाद को समझबुझ कर रमन और सुकेश उसी समय शहर की ओर चल दिए. सुकेश के मामा देवांशु राय पुलिस स्टेशन में ही थे. पूरी बात सुन कर वे फौरन बैंक की ओर चल दिए.

बैंक मैनेजर ने अपने कंप्यूटर पर उस अकाउंट की जांच की, फिर बोला, ‘‘इस खाते में औनलाइन बैंकिंग होती है. इस में आज सुबह से 5 आदमियों ने 25-25 हजार की रकम जमा कराई है और यह सारी रकम थोड़ी ही देर बाद निकाल ली गई है.’’

‘‘इस का मतलब है कि कई लोग इस ठगी के शिकार हुए हैं,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा.

‘‘जी हां, इस खाते की पिछली जानकारी बता रही है कि इस में पिछले कई दिनों से 25-25 हजार की रकम जमा हो रही है और वह थोड़ी ही देर में औनलाइन ट्रांसफर कर दी जाती है,’’ मैनेजर ने बताया.

‘‘क्या आप हमें इस के खाताधारी का पता दे सकते हैं?’’ रमन ने कहा.

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ मैनेजर ने खाताधारी का पता प्रिंट कर के दे दिया.

रमन इंस्पैक्टर देवांशु राय की ओर मुड़ते हुए बोला, ‘‘अंकल, मुझे पूरी उम्मीद है कि यह पता फर्जी होगा, लेकिन फिर भी वहां चल कर एक बार जांच कर लेनी चाहिए.’’

‘‘ठीक है,’’ देवांशु राय ने सिर हिलाया, फिर मैनेजर से बोले, ‘‘आप यह खाता फ्रीज कर दीजिए.’’

‘‘आप चिंता मत कीजिए,’’ मैनेजर ने कहा.

रमन और सुकेश इंस्पैक्टर देवांशु राय के साथ उस पते पर चल दिए. जैसा कि अंदाजा था, वह पता फर्जी निकला.

‘‘अंकल, जिस मोबाइल फोन से एसएमएस आया था, उस के दफ्तर में चल कर पता करना चाहिए कि यह नंबर किस का है,’’ रमन ने अपनी राय दी.

‘‘ओके,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा.

वहां से पता चला कि यह नंबर सिविल लाइंस में रहने वाले गिरिजा कुमार का था. वहां से सभी लोग सीधे गिरिजा कुमार के घर पहुंचे. वे तकरीबन 55 साल के शख्स थे.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उन्हें मोबाइल नंबर बताते हुए पूछा, ‘‘मिस्टर गिरिजा कुमार, इस मोबाइल नंबर से आज सुबह आप ने किसकिस को एसएमएस किया था?’’

‘‘इंस्पैक्टर साहब, यह मोबाइल नंबर मेरा नहीं है,’’ गिरिजा कुमार ने कहा.

‘‘यह कैसे हो सकता है. मोबाइल कंपनी ने हमें बताया है कि पिछले हफ्ते यह सिम कार्ड आप ने खरीदा है,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा.

‘‘जरूर कोई गलतफहमी हुई है.

मैं ने पिछले हफ्ते इस कंपनी का सिम कार्ड जरूर खरीदा था, लेकिन उस का नंबर दूसरा है,’’ गिरिजा कुमार ने अपना मोबाइल नंबर दिखाते हुए कहा.

‘‘इस का मतलब है कि आप ने एक नहीं, 2 सिम कार्ड खरीदे हैं. आप की भलाई इसी में हैं कि दूसरा मोबाइल भी चुपचाप हमारे हवाले कर दें,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय की आवाज सख्त हो गई.

‘‘इंस्पैक्टर साहब, मेरा विश्वास कीजिए. मैं ने एक सिम कार्ड ही खरीदा है,’’ गिरिजा कुमार ने मजबूती से अपनी बात रखी.

रमन ने इंस्पैक्टर देवांशु को अलग ले जा कर कहा, ‘‘अंकल, ये शख्स शरीफ आदमी मालूम पड़ते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि इन्होंने सिम कार्ड खरीदते समय जो आईडी दी हो, उस पर ही दूसरा सिम कार्ड बेच दिया गया हो.’’

‘‘ऐसा हो भी सकता है, लेकिन इस की जांच कैसे की जाए? हमारे पास इस समय और कोई सूत्र भी तो नहीं है,’’ इंस्पैक्टर देवांशु ने कुछ सोचते हुए कहा.

‘‘जिन लोगों ने उस खाते में 25-25 हजार रुपए जमा करवाए हैं, अगर उन से किसी तरह संपर्क हो सके तो पता लगाया जा सकता है कि उन को एमएमएस किस मोबाइल नंबर से आया था. उस के बाद शायद हमें कोई और सूत्र मिल सके,’’ रमन ने अपना विचार बताया.

‘‘उन सब के संपर्क सूत्र बैंक मैनेजर से मिल सकते हैं,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा. वे गिरिजा कुमार के पास आए और बोले, ‘‘फिलहाल तो हम आप के खिलाफ कोईर् कार्यवाही नहीं कर रहे हैं, लेकिन आप शक के घेरे में हैं, इसलिए बिना पुलिस की इजाजत के शहर से बाहर मत जाइएगा.’’

इस के बाद सभी लोग बैंक मैनेजर के पास वापस आए. मैनेजर ने कहा, ‘‘जिन लोगों ने पैसे जमा किए हैं, उन के  पते तो नहीं हैं, लेकिन मोबाइल नंबर जरूर मिल जाएंगे. क्योंकि फार्म में मोबाइल नंबर का कौलम होता है.’’

‘‘इतना ही काफी होगा,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा, तो मैनेजर ने सारे फार्म मंगवा दिए. इंस्पैक्टर ने उन में से 5 लोगों के नंबर नोट कर लिए.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उन नंबरों पर फोन किया, तो पता चला कि उन में से 2 लोगों को उसी नंबर से एसएमएस आया था, जिस से कामता प्रसाद को फोन आया था. बाकी 3 लोगों को दूसरे नंबरों से एसएमएस आया था. इस समय वे सारे नंबर स्विच औफ चल रहे थे.

‘‘अंकल पता कीजिए, अगर इन सारे नंबरों के सिम कार्ड एक ही दुकान से बेचे गए हैं, तो सम?िए कि हम अपराधियों तक पहुंच गए हैं,’’ रमन ने अपनी राय दी.

‘‘वह कैसे?’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने हैरानी से पूछा.

‘‘आप पता तो कीजिए,’’ रमन ने जोर देते हुए कहा.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने पुलिस स्टेशन आ कर पूछताछ कराई, तो रमन का अंदाजा सही निकला. ये सारे नंबर न केवल एक ही कंपनी के थे, बल्कि उन के सिम कार्ड भी एक ही शोरूम से बेचे गए थे. वे रमन और सुकेश को ले कर उस शोरूम में पहुंच गए.

रमन के कहने पर उन्होंने शोरूम के मालिक को उन नंबरों को नोट कराते हुए कहा, ‘‘इन नंबरों के सिम कार्ड खरीदने के लिए जो फार्म भरे गए थे, आप उन्हें अभी मंगवाइए.’’

शोरूम के मालिक ने थोड़ी ही देर में फार्म मंगवा दिए. रमन ने उन्हें देखते हुए कहा, ‘‘ये सारे फार्म एक ही हैंडराइटिंग में भरे गए हैं. क्या आप बता सकते हैं कि इन्हें आप के किसी मुलाजिम ने भरा है या कस्टमर ने खुद भरा है?’’

शोरूम के मालिक ने उन फार्मों को गौर से देखा, फिर बोला, ‘‘यह हमारे मुलाजिम रमेश की हैंडराइटिंग है.’’

‘‘आप अभी रमेश को बुलवाइए,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा. वे रमन की बात सम?ा गए थे.

रमेश के आने पर इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उसे वे फार्म दिखाते हुए पूछा, ‘‘यह फार्म तुम ने भरे हैं?’’

‘‘जी,’’ रमेश ने हां में सिर हिलाया.

‘‘तुम ने क्यों भरे हैं?’’

‘‘ग्राहकों की मदद के लिए ज्यादातर फार्म हम लोग ही भरते हैं.’’

‘‘इन फार्मों के साथ ग्राहकों के जो आईडी लगे हैं, वे तुम कहां से लाए थे?’’ रमन ने पूछा.

‘‘इन्हें ग्राहकों ने खुद ही दिया था,’’ रमेश ने कहा.

‘‘इन मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल अपराध के लिए किया गया है. तुम्हारी भलाई इसी में है कि सचसच बता दो, वरना तुम्हें भी इन अपराधों में शामिल माना जाएगा,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘जी, मैं सच कह रहा हूं.’’

‘‘मिस्टर रमेश, हमें शक है कि आप ने किन्हीं दूसरे ग्राहकों के आईडी को

इन सिम कार्डों को बेचने में इस्तेमाल किया है, इसलिए मेरा कहना मानिए और पुलिस के साथ सहयोग कीजिए,’’ रमन ने अपनी आंखें रमेश के चेहरे पर गड़ाते हुए कहा.

यह सुन कर रमेश घबरा उठा. थोड़ी सख्ती करने पर उस ने कबूल कर लिया कि जो ग्राहक इस दुकान से सिम कार्ड खरीदते थे, उन के ही आईडी की फोटोकौपी करवा कर उस ने 2-2 हजार रुपए में ये सिम कार्ड एक शख्स को बेचे थे, पर उसे उस शख्स का नाम और पता नहीं मालूम था.

‘‘तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा कि तुम ने कितना खतरनाक काम किया है,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने रमेश पर गुस्से से भरी नजर डाली, फिर अफसोस के साथ बोले, ‘‘अगर उस शख्स का नाम या पता मालूम होता, तो उसे पकड़ा जा सकता था, लेकिन अब तो कुछ भी नहीं हो सकता.’’

‘‘अभी भी बहुतकुछ हो सकता है,’’ रमन हलका सा मुसकराया, फिर रमेश

से बोला, ‘‘इस शोरूम में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. जिन दिनों ये सिम कार्ड बेचे गए, क्या उन दिनों की रेकौर्डिंग

देख कर तुम उस आदमी को पहचान सकते हो?’’

‘‘जी, मैं तुरंत पहचान लूंगा,’’ रमेश ने पछतावे के साथ कहा.

रमेश ने रेकौर्डिंग देख कर उस आदमी को पहचान लिया. इंस्पैक्टर देवांशु राय ने रेकौर्डिंग की एक कौपी ले ली, फिर अपने बड़े अफसर से बात कर उस आदमी का फोटे न्यूज चैनलों पर चलवा दिया.

थोड़ी ही देर में इंस्पैक्टर देवांशु राय के पास एक आदमी का फोन आ गया कि यह अपराधी उस के पड़ोस में रहता है.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उस का पता नोट कर तुरंत वहां छापा मार कर उसे गिरफ्तार कर लिया. उस के घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई. थोड़ी सख्ती होते ही उस ने कबूल कर लिया कि इनाम का एसएमएस भेज कर उस ने काफी लोगों को ठगा था.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उस आदमी को जेल भेज दिया. अपने पैसे वापस मिलने पर कामता प्रसाद ने रमन और सुकेश को जी भर कर आशीर्वाद दिया. Best Hindi Kahani

Hindi Kahani: हिंडोला – दीदी और अपने प्यार के बीच झूलती अनुभा

Hindi Kahani: ढाई इंच मोटी परत चढ़ आई थी, पैंतीसवर्षीय अनुभा के बदन पर. अगर परत सिर्फ चर्बी की होती तो और बात होती, उस के पूरे व्यक्तित्व पर तो जैसे सन्नाटे की भी एक परत चढ़ चुकी थी. खामोशी के बुरके को ओढ़े वह एक यंत्रचालित मशीनीमानव की तरह सुबह उठती, उस के हाथ लगाने से पहले ही जैसे पानी का टैप खुल जाता, गैस पर चढ़ा चाय का पानी, चाय के बड़े मग में परस कर उस के सामने आ जाता. कार में चाबी लगाने से पहले ही कार स्टार्ट हो जाती और रास्ते के पेड़ व पत्थर उसे देख कर घड़ी मिलाते चलते, औफिस की टेबल उसे देखते ही काम में व्यस्त हो जाती, कंप्यूटर और कागज तबीयत बदलने लगते.

आज वह मल्टीनैशनल कंपनी में सीनियर पोस्ट पर काबिज थी. सधे हुए कदम, कंधे तक कटे सीधे बाल, सीधे कट के कपड़े उस के आत्मविश्वास और उस की सफलता के संकेत थे.

कादंबरी रैना, जो उस की सेके्रटरी थी, की ‘गुडमार्निंग’ पर अनुभा ने सिर उठाया. कादंबरी कह रही थी, ‘‘अनु, आज आप को अपने औफिस के नए अधिकारी से मिलना है.’’

‘‘हां, याद है मुझे. उन का नाम…’’ थोड़ा रुक कर याद कर के उस ने कहा, ‘‘जीजीशा, यह क्या नाम है?’’

कादंबरी ने हंसी का तड़का लगा कर अनुभा को पूरा नाम परोसा, ‘‘गिरिजा गौरी शंकर.’’

किंतु अनुभा को यह हंसने का मामला नहीं लगा.

‘‘ठीक है, वह आ जाए तो 2 कौफी भेज देना.’’

बाहर निकल कर कादंबरी ने रोमा से कहा, ‘‘लगता है, एक और रोबोट आने वाली है.’’

‘‘हां, नाम से तो ऐसा ही लगता है,’’ दोनों ने मस्ती में कहा.

जीजीशा तो निकली बिलकुल उलटी.  जैसा सीरियस नाम उस का, उस के उलट था उस का व्यक्तित्व. क्या फिगर थी, क्या चाल, फिल्मी हीरोइन अधिक और एक अत्यंत सीनियर पोस्ट की हैड कम लग रही थी. उस के आते ही सारे पुरुषकर्मी मुंहबाए लार टपकाने लगे, सारी स्त्रियां, चाहें वे बड़ी उम्र की थीं

या कम की, अपनेअपने कपड़े, चेहरे व बाल संवारने लगीं.

लगभग 35 मिनट के बाद जीजीशा जब अनुभा के कमरे से लौटी तो उस के कदम कुछ असंयमित से थे. वह कादंबरी के सामने की कुरसी पर धम से बैठ गई.

‘‘लीजिए, पानी पीजिए. उन से मिल कर अकसर लोगों के गले सूख जाते हैं,’’ मिस रैना ने अनुभा के औफिस की तरफ इशारा किया. अनुभा तो थी ही ऐसी, कड़क चाय सी कड़वी, किंतु गर्म नहीं. कड़वाहट उस के शब्दों में नहीं, उस के चारों ओर से छू कर आती थी.

जीजीशा अनुभा की हमउम्र थी, परंतु औफिस में उसे रिपोर्ट तो अनुभा को ही करना था. औफिस में सब एकदूसरे का नाम लेते थे, सिर्फ नवीन खन्ना को बौस कहते थे.

ऐसा नहीं था कि गला सिर्फ जीजीशा का सूखा हो, उस से मिल कर अनुभा की जीवनरूपी मशीन का एकएक पुर्जा चरचरा कर टूट गया था. जीजीशा ने उसे नहीं पहचाना, किंतु अनुभा उसे देखते ही पहचान गई थी. जीजीशा, उर्फ गिरिजा गौरी शंकर या मिट्ठू?

पलभर में कोई बात ठहर कर सदा के लिए स्थायी क्यों बन जाती है? अनुभा के स्मृतिपटल पर परतदरपरत यह सब क्या खुलता जा रहा था? कभी उसे अपना बचपन झाड़ी के पीछे छुप्पनछुपाई खेलता दिखता तो कभी घुटने के ऊपर छोटी होती फ्रौक को घुटने तक खींचने की चेष्टा में बढ़ा अपना हाथ.

एक दिन फ्रौक के नीचे सलवार पहन कर जब वह बाहर निकली थी उस की फैशनेबल दीदी यामिनी, जो कालेज में पढ़ती थीं, उसे देख कर हंसते हुए उस के गाल पर चिकोटी काट कर बोलीं, ‘अनु, यह क्या ऊटपटांग पहन रखा है? सलवारसूट पहनने का मन है तो मम्मी से कह कर सिलवा ले, पर तू तो अभी कुल 14 बरस की है, क्या करेगी अभी से बड़ी अम्मा बन कर?’

इठलाती हुई यामिनी दीदी किताबें हवा में उछाल कर चलती बनीं.

अनुभा कभी भी दीदी की तरह नए डिजाइन के कपड़े नहीं पहन पाई. उस में ऐसा क्या था जो तितलियों के झुंड में परकटी सी अलगथलग घूमा करती थी. घर में भी आज्ञाकारी पुत्री कह कर उस के चंचल भाईबहन उस पर व्यंग्य कसते थे.

‘मां की दुलारी’, ‘पापा की लाड़ली’, ‘टीचर्स पैट’ आदि शब्दों के बाण उस पर ऐसे छोड़े जाते थे मानो वे गुण न हो कर गाली हों. अनुभा के भीतर, खूब भीतर एक और अनुभा थी, जो सपने बुनती थी, जो चंचल थी, जो पंख लगा कर आकाश में ऊंची उड़ान भरा करती थी. उस के अपने छोटेछोटे बादल के टुकड़े थे, रेशम की डोर थी और तीज बिना तीज वह पींग बढ़ाती खूब झूला झूलती थी, जो खूब शृंगार करती थी, इतना कि स्वयं शृंगार की प्रतिमान रति भी लजा जाए. पर जिस गहरे अंधेरे कोने में वह अनुभा छिपी थी उसे कोई नहीं जान पाया कभी.

एक दिन जब उस के साथ कालेज आनेजाने वाली सहेली कालेज नहीं आई थी, वह अकेली ही माल रोड की चौड़ी छाती पर, जिस के दोनों ओर गुलमोहर के सुर्ख लाल पेड़ छतरी ताने खड़े थे, साइकिल चलाती घर की तरफ आ रही थी. रेशमी बादलों के बीच छनछन कर आ रही धूप की नरमनरम किरणों में ऐसी उलझी कि ध्यान ही नहीं रहा कि कब उस की साइकिल के सामने एक स्कूटर और स्कूटर पर विराजमान एक नौजवान उसे एकटक देख रहा था.

‘लगता है आप आसमान को सड़क समझ रही हैं. यदि मैं अपना पूरा बे्रक न लगा देता तो मैडम, आप उस गड्ढे में होतीं और दोष मिलता मुझे. माना कि छावनी की सड़कें सूनी होती हैं, पर कभीकभी हम जैसे लोग भी इन सड़कों पर आतेजाते हैं और आतेजाते में टकरा जाएं और वह भी किस्मत से किसी परी से…’

अनुभा इस कदर सहम गई, लजा गई और पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि गुलमोहर का लाल रंग उस के चेहरे को रंग गया. अटपटे ढंग से ‘सौरी’ बोल कर तेजतेज साइकिल भगाती चल पड़ी वहां से.

स्कूटर वाला तो निकला उस के भाई सुमित का दोस्त, जो कुछ दिन पहले ही एअरफोर्स में औफिसर बन कर लौटा था. बड़ा ही स्मार्ट, वाक्चतुर. ड्राइंगरूम में उसे बैठा देख वह चौंक पड़ी, वह बच कर चुपके से अपने कमरे की ओर लपकी तभी उस के भाई ने उसे आवाज दी, अपने मित्र से परिचय कराया, ‘आलोक, मिलो मेरी छोटी बहन अनुभा से.’

‘हैलो,’ कह कर वह बरबस मुसकरा पड़ी.

‘सुमित, अपनी बहन से कहो कि सड़क ऊपर नहीं, नीचे है.’

और वह भाग गई, उस के कानों में उन दोनों की बातचीत थोड़ीथोड़ी सुनाई पड़ रही थी, समझ गई कि माल रोड की चर्चा चल रही थी. अपने को बातों का केंद्र बनता देख वह कुमुदिनी सी सिमट गई थी. रात होने को आई, पर उस रात वह कुमुदिनी बंद होने के बदले पंखड़ी दर पंखड़ी खिली जा रही थी.

उन के घर जब भी आलोक आता, उस के आसपास मीठी सी बयार छोड़ जाता. पगली सी अनुभा आलोक की झलक सभी चीजों में देखने लगी थी, सिनेमा के हीरो से ले कर घर में रखी कलाकृतियों तक में उसे आलोक ही आलोक नजर आता था. अनुभा अचानक भक्तिन बनने लगी, व्रतउपवास का सिलसिला शुरू कर दिया. मां ने समझाया, ‘पढ़ाई की मेहनत के साथ व्रतउपवास कैसे निभा पाएगी?’

‘मम्मी, मेरा मन करता है,’ उस ने उत्तर दिया था.

‘अरे, तो कोई बुरा काम कर रही है क्या? अच्छे संस्कार हैं,’ दादी ने मम्मी से कहा.

अनुभा के मन में सिर्फ अब आलोक को पाने की चाहत थी. कालेज जाने से पहले वह मन ही मन सोचती कि बस किसी तरह आलोक मिल जाए.

‘बिटिया, कहीं पिछले जन्म में संन्यासिनी तो नहीं थी? पता नहीं इस का मन संसार में लगेगा कि नहीं?’ मम्मी को चिंता सताती.

‘कुछ नहीं होगा. अपनी यामिनी तो दोनों की कसर पूरी कर देती है. चिंता तो उस की है. न पढ़ने में ध्यान, न घर के कामकाज में. जब देखो तब फैशन, डांस और हंगामा,’ उस के पिता ने मां से कहा था.

‘हां जी, ठीक कहते हो, अब यामिनी की शादी कर दो. फिर मेरी अनुभा के लिए एक अच्छा सा वर ढूंढ़ देना.’

और अनुभा के भीतर वाली अनुभा ‘धत्’ बोल कर हंस पड़ी.

उस के पैर द्रुतगति से तिगदा-तिग-तिग, तिगदा-तिग-तिग तिगदा-तिग-तिग-थेई की ताल पर थिरक रहे थे. परंतु सहसा उस के पैरों की थिरकन द्रुतगति से विलंबित ताल पर होती हुई समय आने से पहले ही रुक गई. पैरों से घुंघरू उतार कर वह चुपचाप जाने लगी तो उस के डांस टीचर ने कहा, ‘आज एक नया तोड़ा सिखाना था, यामिनी तो कभी ठीक से सीखती नहीं, अब तुम भी जा रही हो.’

‘5 साल से नृत्य सीख रही हूं मास्टरजी, अब मैं सितार सीखूंगी,’ अनुभा ने सहज भाव से कहा.

‘हांहां क्यों नहीं,’ मास्टरजी ने भी हामी भर दी थी.

कौन जान पाया कि अनुभा के पैरों की थिरकन क्यों रुक गई. उस में कोई बाहरी परिवर्तन होता तो कोई देखता. अनुभा अपनी पढ़ाई और सितार के तारों में खो गई. दीदी यामिनी की शादी में आलोक दूल्हा बन के आया. दीदी चली गई, उस सपने के हिंडोले में बैठ कर जो उस ने अपने लिए बुना था.

‘याद है माल रोड वाली सड़क की वह टक्कर.’

जीजा बना आलोक उस से ठिठोली करता. जीजा को साली से मजाक करने का पूरा अधिकार था.

जिस घोड़ी पर बैठ कर आलोक आया था उस के गले में पड़ा खूबसूरत हार सब के आकर्षण का केंद्रबिंदु था. उस हार में जड़ा था खूबसूरत पत्थर, जिसे सब देखते नहीं थकते थे.

‘यह कौन है?’ जिज्ञासा से भरे सवाल निकले.

‘आलोक की क्या लगती है?’

‘हाय कितनी सुंदर है, पूरी मौडल जैसी.’

पता चला कि आलोक के पिता के मित्र की लड़की थी और आलोक की बचपन की ‘स्वीटहार्ट’. तब आलोक ने उस से शादी क्यों नहीं की? वह अभी छोटी थी और बहुत महत्त्वाकांक्षी. उस ने अपने लिए जो लक्ष्य तय किए थे उस में विवाह का स्थान था ही नहीं. विवाह को वह बंधन मानती थी. वे दोनों स्वतंत्र थे और स्वच्छंद भी.

यामिनी दीदी ने अपना घर बसाया, खिड़कियों पर झालरदार सफेद लेस के पर्दे टांगे, परंतु जब वह ‘खूबसूरत पत्थर’ उन के घर की खिड़कियों के सारे शीशे तोड़ गया, तब 6 महीने की अपनी प्यारी सी गुडि़या आन्या को गोद में लिए, अपने हाथों बसाए घर का दरवाजा खोल कर, मायके लौट आई थीं. टूटे हुए दिल व उजड़ी हुई गृहस्थी के दुख से यामिनी दीदी थरथर कांप रही थीं. मम्मी, पापा और पूरे घर ने उसे आत्मीयता का गरम लिहाफ ओढ़ा कर संभाल लिया था. दीदी की सारी मस्ती स्वाह हो गई. वे कभी ठीक से पढ़ी नहीं, जैसेतैसे उन्हें पापा ने एकआध कोर्स करवा कर स्कूल में नौकरी दिलवा दी थी. पुनर्विवाह तो क्या, उस घर में विवाह शब्द एक अछूत रोग की तरह माना जाने लगा. यहां तक कि अनुभा के लिए विवाह प्रसंग कभी छिड़ा ही नहीं. वह तो अच्छा हुआ कि सुमित की शादी यामिनी की शादी के महीने भर बाद ही हो गई थी वरना…

आज वही खूबसूरत नुकीला पत्थर उस के सामने कुरसी पर बैठा था. अनुभा सोच में पड़ी थी. क्या वह पोल खोल दे?

न मालूम कितनी और गृहस्थियां उजाड़ देगी यह! किंतु ऐसा क्यों होता है कि हमेशा ‘पति, पत्नी और वो’ में सब से अधिक दोष ‘वो’ को देते हैं? क्या स्त्री प्यार, प्रशंसा व प्रलोभनों से परे है? क्यों पुरुष के हाथ उस के अपने वश में नहीं रहते? इसी उधेड़बुन में डूबतीउतराती, वह नवीन खन्ना से आज की मीटिंग के बारे में बताने दाखिल हुई.

केवल 40 वर्ष की उम्र में नवीन जिस मुकाम पर पहुंचा था, वह मुकाम पुराने जमाने में 60 साल तक भी हासिल नहीं होता था. कंपनी का सीईओ मोटी तनख्वाह, उस से भी मोटे बोनस, उस से भी अधिक धाक. देशविदेश की डिगरियां हासिल कर के उस ने अपने लिए कौर्पोरेट जगत में एक विशिष्ट स्थान बना लिया था. बड़ीबड़ी कंपनियां व बैंक उसे पके आम की तरह लपकने को तैयार रहते थे.

अनुभा स्वयं भी अत्यंत मेधावी थी. आईआईएम में सब से पहला व बड़ा पैकेज उसी को मिला था. 2 साल जापान रही, फिर लंदन. नवीन खन्ना से उस की मुलाकात लंदन में हुई थी. जिस कंपनी में अनुभा काम कर रही थी उस का विलय दूसरी कंपनी में होने वाला था, नवीन खन्ना ने उस की योग्यता को भांप लिया था और उसे सीधे 4 सोपान आगे की पोस्ट व तनख्वाह दे डाली थी.

अनुभा भी भारत वापस आना चाहती थी. सो आ गई. बस तब से वह मुंबई में काम कर रही थी. उस पर नवीन की योग्यताओं की प्रमाणपट्टी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था. जो व्यक्ति अनेक डिगरियां हासिल कर ले, जो करोड़ों रुपयों का ढेर लगाता हो, परंतु जिस का कोई नैतिक चरित्र न हो, जो धड़ल्ले से बातबात पर झूठ बोलता हो, जो अपनी पत्नी का फोन देख कर काट देता हो, जो मीटिंग व क्लायंट का भूत अपनी घरगृहस्थी पर लादे रहता हो, जो पति, पिता व पुरुष की मर्यादा न पहचानता हो, उसे अनुभा न तो आदर दे सकती थी न अपनी मित्रता. अनुभा के पिता अकसर अंगरेजी की एक कहावत कहा करते थे, जिस का सारांश था, ‘मैं कालेज तो गया, परंतु शिक्षित नहीं हुआ.’

बस यों समझ लीजिए कि नवीन खन्ना उस कहावत का साक्षात प्रमाण था.

एक बार एक बेहद खूबसूरत किंतु 55 वर्षीय महिला क्लायंट ने अनुभा से कहा था, ‘तेरा बौस तो मुझ जैसी बुढि़या पर भी लाइन मार रहा था.’

अनुभा कर भी क्या सकती थी. चारों तरफ यही सब तो बिखरा पड़ा था. आज के जमाने में दो ही तो पूजे जा रहे हैं, लाभ और पैसा.

कभी वह सोचती थी, क्या इन पुरुषों की पत्नियों को इन के चक्करों का पता नहीं चलता? क्या औफिस में काम कर रही विवाहित स्त्रियों के पतियों को पता नहीं चलता या फिर पता होते हुए भी वे खुली आंखों सोते रहते हैं या फिर पैसे की हायहाय ने प्यार व वफा का कोई मतलब नहीं रहने दिया है?

जो भी हो जीजीशा की नियुक्ति के बाद जीजीशा और नवीन को अकसर  औफिस के बाद इकट्ठे बाहर निकलते देखा जाता था. जीजीशा अभी तक स्वतंत्र थी और उसी तरह स्वच्छंद भी. पता नहीं आलोक को और आलोक की तरह कितनों को कब और कहां छोड़ आई थी?

अनुभा का रिश्ता शुद्ध कामकाज से था. रात को सोते समय कभीकभी पापा की सुनाई हुई लाइनें ‘किसकिस को याद कीजिए, किसकिस को रोइए, आराम बड़ी चीज है, मुंह ढक के सोइए’ मजे के लिए दोहराती थी.

परंतु वह आराम की नींद कब सो पाई थी. अभी जीजीशा को आए 4-5 महीने ही हुए थे कि वह अचानक एक हफ्ते तक औफिस नहीं आई और जब आई तो बेहद दुबली लग रही थी. मेकअप के भीतर भी उस के गालों का पीलापन छिप नहीं पा रहा था. एक भयावह डर उस की आंखों में तैर रहा था. पता चला कि जीजीशा बीमार है, बहुत बीमार.

‘क्या हुआ है उसे?’ सब की जबान पर यही प्रश्न था.

15 दिन औफिस आने के बाद वह फिर गैरहाजिर हो गई थी. वह अस्पताल में भरती थी. उस के रोग का निदान नहीं हो पा रहा था. अनुभा फूलों का गुलदस्ता ले कर उस से मिलने गई थी और ‘शीघ्र स्वस्थ हो जाओ’ भी कह आई थी.

फिर एक दिन औफिस में उस खबर का बर्फीला तूफान आया. जीजीशा के रोग की पहचान की खबर. जिस रोग के लक्षण उसे क्षीण कर रहे थे उस ने उस के अंतरंग मित्रों के होश उड़ा दिए थे. नवीन खन्ना का औफिस व घर मानो 8 फुट मोटी बर्फ से ढक गया था. सब के दिमाग में अफरातफरी मची थी. जिस बीमारी का नाम लेने की हिम्मत न होती हो, उस एचआईवी के लक्षण जीजीशा की रक्त धमनियों में बह रहे थे. कितने ही लोग अपनेअपने रक्त का निरीक्षण करा रहे थे. अनुभा भयभीत हो उठी. आज पहली बार अनुभा इतनी बेचैन हुई. वह उस कड़ी को देख कर कातर हो रही थी जो यामिनी दीदी, आन्या और आलोक को जोड़ रही थी. आलोक और जीजीशा के रिश्ते की कड़ी. घबरा कर उस ने पहली फ्लाइट पकड़ी और मुंबई से अपने घर इलाहाबाद आ गई.

‘अनुभा मैडम को क्या हुआ?’ उस के औफिस में एक प्रश्नवाचक मूक जिज्ञासा तैर गई. इलाहाबाद पहुंच कर बगैर किसी से कुछ कहेसुने, उस ने यामिनी दीदी और आन्या के तमाम टैस्ट करवाए और जब दोनों के निरीक्षण से डाक्टर संतुष्ट हो गए, तब जा कर वह इत्मीनान से पैर पसार कर लेट गई. मां ने उस का सिर अपनी गोद में ले लिया और स्नेहपूर्वक उस के माथे का पसीना पोंछने लगीं, ‘‘एसी चल रहा है और तू है कि पसीने में तरबतर, जैसे किसी रेस में दौड़ कर आई हो.’’

‘‘रेस में ही नहीं मम्मा, मैं तो महारेस में दौड़ कर आई हूं. ट्राईथालौन समझती हो, बस उसी में दौड़ कर लौटी हूं.’’

हक्कीबक्की मां उस का मुंह ताकती रह गईं. मन ही मन अनुभा मां से जाने क्याक्या कहे जा रही थी. एक ही जीवन में कई तरह की दौड़ हो गई. सब से पहले मालरोड पर साइकिल चलाई, फिर पढ़ाई कैरियर और यामिनी दीदी की बिखरी हुई जिंदगी के दलदल में फंसी और दौड़ का अंतिम चरण? वह तो मुंबई से इलाहाबाद, इलाहाबाद से अस्पताल, अस्पताल के गलियारों की दौड़. उफ, यह अंतिम दौर उस का कठिनतम दौर था. उसे लगा जैसे दीदी और आन्या किसी सुनामी से बच कर किनारे पर सुरक्षित पड़ी हों.

निश्ंिचतता और मां की गोद उसे धीरेधीरे नींद की दुनिया में ले जाने लगी, वह सपनों के हिंडोले में झूलने लगी. अचानक उसे लगा कि अगर आलोक उसे मिल गए होते तो…तो…हिंडोला टूट गया. यह क्या? फिर भी वह हंस रही है. खुशी की हंसी, राहत की हंसी. अच्छा हुआ, आलोक की वह नहीं हुई. Hindi Kahani

Hindi Story: बंपर ड्रा-बीवी के चंगुल में थानेदार

थानेदार साहब की पत्नी की फरमाइशें रोजाना बढ़ती जा रही थीं. वे परेशान थे, आखिर करें तो क्या करें? इधर लोगों में बहुत जागरूकता आ गई थी. थोड़ी भी आड़ीटेढ़ी बात होती कि ‘मानवाधिकार आयोग’ को फैक्स कर देते थे.

कुछ उठाईगीर तो आजकल मोबाइल फोन पर रेकौर्डिंग कर के उन्हें सुना भी देते थे. एक बार तो थानेदार साहब अपनी फेसबुक पर थे कि अचानक एक वीडियो दिखा. उन्हें लगा कि यह तो किस्सा कहीं देखा है.

उस वीडियो की असलियत यही थी कि थानेदार साहब एक शख्स को पंखा बना कर लात, जूतों, डंडे से मार रहे थे. थोड़ी देर बाद जब जूम कर के कैमरा थानेदार के चेहरे पर गया, तो पता चला कि अरे, यह तो वे खुद ही हैं.

कुछ महीने पहले उन्होंने एक अपराधी को जेब काटने पर मारा था और उस से जेबकटी का अपना हिस्सा मांगा था. पर उस ने नहीं दिया था, तब उसे पंखे पर लटका कर पिटाई की थी.

यह वीडियो वही था. इसी के चलते उन का तबादला हो गया था. वे तो शानदार सैटिंग वाले थे, हमेशा मंदिर में भिखारी से ले कर पुजारी और भगवान को चढ़ावा चढ़ाते थे, जिस की बदौलत लाइन हाजिर नहीं हो पाए थे. बात वैसे इतनी सी थी कि एक जेबकटी की रिपोर्ट आई थी. रिपोर्ट करने वाले बंदे ने बताया कि 6 हजार रुपए निकाले गए थे.

बाजार का दिन था और उस दिन जेबकटाई का ठेका पोटा को दिया गया था. उसे पकड़ कर जब पूछा गया, तो उस ने कसम खा कर कहा था कि कुल जमा 8 सौ रुपए थे. अब सच्चा कौन था और झूठा कौन था, पता नहीं.

बस, यही बात पता करने के लिए उसे पंखे पर लटका कर कुटाई की थी और सच की खोज को आम कर देने के चलते थानेदार साहब बदनाम हो गए थे.

बाद में पता चला कि जिस की जेब कटी थी, वही झूठ बोला था. उस की घर वाली ने साड़ी खरीदने के लिए रुपए जेब से निकाल लिए थे.

थानेदार साहब की बहुत इच्छा हुई कि पोटा से माफी मांग लें. लेकिन वरदी के घमंड के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि पोटा ने बारबार कहा था, ‘सर, बेईमानी के काम में ईमानदारी बहुत जरूरी है. मैं ईमानदारी से बता रहा हूं.’

लेकिन जो होना था, वह हो ही गया था. पर आज तक वे जान ही नहीं पाए थे कि आखिर किस ने वीडियो शूट किया था, क्योंकि आजकल तो पैन में भी शूटिंग की सहूलियत आने लगी है. जो नया थाना मिला था, वहां के भूखेनंगे, अमीर सब अच्छे दिनों की औलाद थे. उम्मीद से भरे हुए. महात्मा गांधी की बातों पर चलने वाले कि मामला आपस में सुलझा लो बेहतर है, इसलिए रिपोर्टारिपोर्टी कुछ होती नहीं थी.

थानेदार साहब को हैरत थी कि आखिर ऐसी अहिंसक जगह पर थाना खोलने की जरूरत क्या थी?

जिंदगी में अगर आप एक बार जो खर्चा करने लगें, उस पर लगाम लगाना अगले जन्म में ही मुमकिन है. पत्नीजी को जो खर्च की आदतें लग गई थीं, वे कम होने का नाम ही नहीं लेती थीं. रिश्तेदार भी भिखारियों की तरह आ कर जीजाजी, मामाजी कहते हुए महीनों तक पड़े रहते थे. ऐसे में माली हालत भिखारियों जैसी हो जाना जायज थी.

थानेदार साहब ने पुराने घाघ अपने हवलदार को बुला कर पूछा, ‘‘यहां कुछ महीने और रहा, तो पैंटशर्ट उतार कर तीरथ जाना होगा.’’

हवलदार ने उन्हें तसल्ली दी और अच्छे दिनों का वास्ता देते हुए कहा, ‘‘इतंजार का फल मीठा होता है. आप इंतजार करें.’’

बिल्ली के भाग्य से छींका टूट भी गया. मामला कुछ ऐसा हुआ कि कहीं एक लड़के और लड़की का चोंच लड़ाने का मामला था. कहानी में अमीरीगरीबी की जगह जातपांत आ गई. लड़की वालों ने कहा कि ‘प्राण जाए पर जाति न जाए’ और लड़के को प्यार से बुला कर समझाया, मनाया और जब उस के दिमाग में बात नहीं गई, तो एक लट्ठ जो दिया तो वह मजनू ऐसा गिरा कि खड़ा ही नहीं हो पाया.

उसी दिन एक रिपोर्ट और आई कि एक घर में सेठसेठानी के यहां 2 लोगों ने बंदूक की नोक पर लूटमार कर ली थी. दोनों की रिपोर्ट आ गई और थानेदार साहब ने जांच के लिए एक हवलदार को लगा दिया.

इधर पिछले हफ्ते घरवाली ने नोटिस दे दिया था कि अगर कुछ कमाई नहीं की, तो वह मायके चली जाएगी. उसी समय यह सुनहरे 2 केस हो गए.

थानेदार साहब ने हवलदार को अपने कमरे में बुला कर खास हिदायत दी, ‘‘पहले लूट वाले केस को सुलझाते हैं. हत्या वाला तो आईने की तरह साफ है.’’

हवलदार थानेदार से ज्यादा शातिर था और उस ने करतब दिखाना शुरू कर दिया. जहां डकैती हुई थी, उस गांव के और उस गांव से लगे 10 गांवों के उठाईगीरों, गुंडों के अलावा शरीफ घरों के एक दर्जन लड़कों को पकड़ लिया.

थाने के नाम से उन सब को ठंड लगने लगी थी. दिल्ली से और कुछ के लोकल विधायक, सांसद के फोन आने लगे. जिन के फोन आए, उन्हें एक अलग कमरे में बिठा कर ‘चाय का आर्डर’ करवा दिया. चाय के बाद उन से माफी मांगते हुए एक घंटे और रुक कर कानून की मदद करने की गुजारिश की.

चाय की रिश्वत से ही लड़के मान गए और शांति के साथ मोबाइल पर फिल्में देखने लगे. जिन के फोन नहीं आए थे, उन्हें एकएक कर के कमरे में ले गए और उन्हें बताया गया कि इस मुकदमे की जमानत नहीं होती है और वकील की फीस में 50 हजार खर्च होंगे, फोकट में बदनामी और होगी. टुच्चे पत्रकार चटकारे लेले कर खबर छापेंगे सो अलग.

हवलदार ने थानेदार साहब के सामने ऐसा दिल दहला देने वाला सीन पेश किया कि सब की घिग्घी बंध गई. कुछ प्रवचन सुन कर रोने लगे, कुछ थानेदार साहब के पैरों में गधे की तरह लोटपोट हो गए.

हैरत की बात यह थी कि 2 आदमियों ने लूटा और बुलाया गया था 80 को. 20 थाने में फोन से छूट गए थे. अब जो रकम थी, वह 60 लोगों से ही वसूल करनी थी. उन के मोबाइल, पैन, चश्मे सब उतार कर गुप्त जांच कर ली गई थी और थानेदार साहब कहीं से

2 नंगे तार ले आए, उन्हें बिजली के स्विच में डालते हुए बोले, ‘‘इसे छुआने के बाद जो 750 वोल्ट का करंट लगेगा, तो देश में आबादी रुक जाने में तुम सहयोगी हो जाओगे.’’

तार देख कर भविष्य की चिंता कर के आखिर वे सबकुछ देने को तैयार हो गए, जिस की मांग रखी गई थी. कुछ कमजोर, नंगे लोग भी थे. कुल जमा तकरीबन 3 लाख रुपए की कमाई हो गई और 20 हजार हवलदार, पत्रकारों को और ऊपर भिजवाने के बाद भी 2 लाख का मुनाफा हो गया था. जो 2 लुटेरे थे, वे अभी भी खोजे जाने बाकी थे. वैसे, पूरी लूट 10-20 हजार रुपए की हुई थी.

दूसरा केस तो इश्कमुहब्बत का था. शहर के सब आशिकों को पकड़ कर थाने ले आए और मर्डर केस के बारे में जो मुगलेआजम से ले कर प्रेम कहानी के आखिर तक कहानी सुनाई गई, तो आशिकों ने मां कसम खा कर कहा, ‘वह हमारी बहन जैसी हैं.’

‘‘तब ही तो सालो, तुम ने अपने जीजा का मर्डर कर दिया,’’ थानेदार साहब ने गुस्से में कहा.

सब प्रेमी माथा ठोंकने लगे, ‘कैसे मुंह से बहन शब्द निकल गया. मर्डर केस में मिली उम्रकैद में कैसे जवानी अंधेरे में डूब जाएगी…’

उस महाकाव्य को हवलदार ने पढ़ कर सुनाया, तो सब थरथर कांपने लगे और इस केस में भी थानेदार साहब ने 6 लाख रुपए दक्षिणा में लिए थे.

हत्यारे तो पहले से ही पता थे. उन का केस कमजोर करने के नाम पर एकएक लाख रुपए अलग से लिए और मामला मारने का नहीं, बल्कि एक हादसे का बना दिया गया था.

जिनजिन को थानेदार साहब ने लूट या हत्या में बुलवाया था और छोड़ दिया था, वह सब उन के गुण गाते थक नहीं रहे थे और कुछ ने जो चाय पी लेने के बाद घर का रास्ता नापा था, वे भी खुश थे. कुछ छोटीमोटी शिकायत हुई भी तो विधायक, सांसद ने वे शिकायतें कचरे के डब्बे में फेंक दीं. वे थानेदार साहब का एहसान भूले नहीं थे कि उन के फोन करते ही थानेदार साहब ने चाय पिला कर उन्हें इज्जत के साथ छोड़ दिया था.

थानेदार साहब बहुत खुश थे कि चलो, उन का लकी बंपर ड्रा खुल गया था. वे इंतजार कर रहे थे, ‘काश, ऐसी लौटरी हर महीने खुलती रहे, तो नीचे से ऊपर तक सब खुश रहेंगे. दुनियादारी निभाना इसी को तो कहते हैं.’

थानेदार साहब आजकल बहुत खुश हैं और नई बंपर लौटरी का इंतजार कर रहे हैं.

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