Crime Story: पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश पर लगाया गोबर

Crime Story: आ नेमुल्लमाशब्द तो सुना ही होगा. किसी धातु पर सोने या चांदी की पतली परत चढ़ाना, जिस से वह चमकने लगे और कीमती दिखे, जैसेकलईयागिलट’. पर क्या आप ने यह सुना है कि एक मांबाप ने अपनी ही बेटी को मार कर उस की लाश को वहां रखा, जहां वे अपने पालतू पशु बांधते थे और पकड़े जाने की सूरत में पुलिस को गुमराह करने के लिए उस लाश पर जानवरों का गोबर लगा दिया गया था?


इज्जत की खातिर अपनी औलाद को मारने का यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मैनपुरी इलाके का है. औनर किलिंग की भेंट चढ़ी उस लड़की का नाम ज्योति था, जिस की लाश 20 जनवरी, 2023 को गांव के चौकीदार मनोज कठेरिया ने बरामद की थी. उस का परिवार भोगांव के मौजेपुर गांव में अपने घर से गायब था.


दरअसल, अशोक यादव नाम के एक शख्स की 24 साल की बेटी ज्योति के पास ही के एक गांव के रहने वाले नौजवान से प्रेम संबंध थे और वह उसी से शादी करना चाहती थी, पर परिवार वाले इस बात पर राजी नहीं थे. इसी तनातनी के चलते अशोक यादव ने अपनी पत्नी और बेटों की मदद से 19 जनवरी, 2023 की रात के 12 बजे ज्योति की गला दबा कर हत्या कर दी और पास ही बने अहाते में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया था.


इस घटना के दूसरे दिन अशोक यादव के घर में ताला लगा देख कर गांव वालों ने इस की सूचना पुलिस को दी. घटना की एफआईआर गांव के ही चौकीदार मनोज कठेरिया ने अशोक यादव, उन की पत्नी रामा देवी, बेटे अमित, अनुज और अवनीश के खिलाफ दर्ज कराई थी. लेकिन ट्रायल के दौरान ज्योति के मांबाप ने दावा किया था कि उस ने खुदकुशी की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि मनोज कठेरिया ने सिंचाई को ले कर हुए एक झगड़े के चलते एफआईआर दर्ज कराई थी, क्योंकि उस की खेती की जमीन उन की जमीन से सटी हुई थी.


पर सुबूतों और गवाहियों के बाद अब उत्तर प्रदेश की मैनपुरी कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज जहेंद्र पाल सिंह ने ज्योति के मांबाप को उस की गला घोंट कर हत्या करने और लाश को खेत में दफनाने के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुना दी. इतना ही नहीं, कोर्ट ने सुबूतों की कमी के चलते ज्योति के तीनों भाइयों को बरी कर दिया और हर कुसूरवार पर 60,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया. Crime Story   

Akhilesh Yadav Family : प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के रिश्ते में आयी दरार

Akhilesh Yadav Family :  उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष और मुलायम सिंह यादव व साधना यादव की बहू अपर्णा यादव और उन के पति प्रतीक यादव का रिश्ता अब खत्म होने के कगार पर दिखाई दे रहा है.

प्रतीक यादव ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपर्णा यादव  को ‘फैमिली डिस्ट्रॉयर’ (घर तोड़ने वाली) तक कह दिया और कहा कि उनकी मानसिक स्थिति इस समय बहुत खराब है. उन्होंने अपर्णा पर कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं. अंदाजा लगाया जा रहा है कि एक बेहद खूबसूरत प्रेम कहानी अब अंत की ओर बढ़ रही है. वह रिश्ता, जो कभी ईमेल के जरिए शुरू हुआ था, अब इंस्टा पोस्ट से खत्म होता दिख रहा है.

अपर्णा और प्रतीक की प्रेम कहानी. स्कूल के दिनों से शुरू हो गई थी. अपर्णा और प्रतीक की मुलाकात एक दोस्त की जन्मदिन पार्टी में हुई. पार्टी के दौरान बात बढ़ी और दोनों ने ईमेल आईडी शेयर की. यह साल 2001 की बात है. उस समय अपर्णा हर रोज ईमेल चेक नहीं कर पाती थीं, लेकिन प्रतीक ने उनके लिए अपने प्रेम को शब्दों में पिरोना शुरू कर दिया. जब अपर्णा ने अपनी मेल आईडी चेक की, तो उनके इनबॉक्स में प्रतीक के प्रेम भरे मेल्स की भरमार थी. इसके बाद अपर्णा ने जवाब दिया और दोनों का प्यार बढ़ता गया.

शुरुआत में अपर्णा को प्रतीक के मुलायम सिंह यादव का बेटा होने की जानकारी नही थी. 2001 में शुरू हुई इस प्रेम कहानी ने करीब 10 साल तक साथ निभाया. इस दौरान दोनों ने एक-दूसरे को जाना और परिवारों के बारे में जानकारी हासिल की. इसके बाद दोनों ने परिवार की सहमति से शादी करने का फैसला किया और 4 दिसंबर, 2011 को प्रतीक और अपर्णा परिणय सूत्र में बंध गए.

इस शादी में अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, अनिल अंबानी जैसे वीवीआईपी शामिल हुए. लखनऊ से सैफई तक इस शादी का भव्य जश्न मनाया गया.

प्रतीक यादव फिटनेस फ्रीक और बॉडी बिल्डिंग एक्सपर्ट हैं. उन्होंने रियल एस्टेट में भी कदम रखा. वहीं, अपर्णा यादव प्रशिक्षित क्लासिकल सिंगर हैं और उन्होंने मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशन और पॉलिटिक्स में डिप्लोमा प्राप्त किया है. शादी के बाद उन्होंने राजनीति में रुचि दिखाई. दोनों के दो बच्चे भी हैं.

अपर्णा यादव की राजनीति में रुचि थी. मुलायम सिंह यादव ने उन्हें 2017 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट से चुनाव लड़ाया, लेकिन वे भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं. इसके बाद उन्होंने भाजपा का रुख किया और 2022 से पहले सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं. कहा जाता है कि इस बदलाव से मुलायम परिवार में मतभेद बने. राजनीति, महत्वाकांक्षा और निजी मतभेदों के चलते जन्मजनमांतर का वादा अब टूटता दिखाई दे रहा है. Akhilesh Yadav Family

Hindi Story: सच्चे प्यार की पहचान

Hindi Story: बनसारी नदी उफान पर थी. परसेहरा गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. ऊंची जाति की विधवा सरिता ने अपना सामान बांध लिया था. पर वह बाढ़ में फंस गई. इतने में जोखू मछुआरा नाव ले कर आया. क्या वह सरिता को बचा पाया?

पूरे इलाके में हल्ला मचा हुआ था कि बनसारी नदी बढ़ी चली रही है. ननका बांध से और भी ज्यादा पानी छोड़ दिया गया है. इस के बाद अभी और भी पानी छोड़ा जाने वाला है. परसेहरा गांव के लोगों में एक अजीब सी बेचैनी और दहशत फैल रही थी, क्योंकि बाढ़ का पानी तो कर चला जाता है, पर अपने पीछे तबाही और भुखमरी के निशान छोड़ जाता है, जिस का असर महीनों तक देखने को मिलता रहता है और बाढ़ में जाने कितनों की जानें भी चली जाती हैं.
इस गांव के लोगों को आज भी याद है कि 3 साल पहले भी बाढ़ आई थी और अपने साथ सबकुछ बहा ले गई थी.

तब लोगों के घरों और फसलों का नामोनिशान तक नहीं मिला था.
सरकार द्वारा मुआवजा देने का ऐलान तो कर दिया गया था, पर सरकारी काम में घालमेल के चलते वह मुआवजा किस को मिला, यह आज तक कोई नहीं जान सका. गांव में बाढ़ के आने पर लोग अगर समय रहते ऊंची जगह पर पहुच जाते तो जान बच सकती थी, पर इस गांव में एक ही ऊंची जगह थी, जहां पर बाढ़ का पानी नहीं जा सकता था और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की तीमंजिला हवेली, पर पिछली बार बाढ़ आने पर जब गांव के लोगों ने नाथ सिंह से शरण मांगी थी, तो ठाकुर ने अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोला था.


ठाकुर गांव के गरीब और छोटी जाति के लोगों को अपनी हवेली में घुसने नहीं देना चाहता था, क्योंकि छोटी जाति के लोगों के अंदर जाने से उस की हवेली गंदी हो जाती और वैसे भी नीची जाति के लोगों का हवेली में आना ठाकुर नाथ सिंह की शान के खिलाफ था. गांव के बहुत से लोग हवेली के ऊंचे दरवाजे को बड़ी उम्मीद के साथ पकड़े रहे थे और फिर अचानक से आई पानी की तेज धार उन्हें अपने साथ बहा ले
गई थी.


3 साल पहले के जख्म अभी भर भी नहीं पाए थे कि अब फिर से गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. सभी लोग खौफजदा थे और अपने घरों का सामान बांध कर उसे ऊंची दीवारों पर या किसी और महफूज जगह रखने की कोशिश कर रहे थे. इस अफरातफरी में सरिता नाम की एक औरत भी थी, जो बिलकुल भी नहीं घबरा रही थी. ‘‘मैं ने इतने उतारचढ़ाव और दुख देख लिए हैं कि अब किसी बाढ़ या तूफान से मुझे डर नहीं लगता,’’ अपनेआप में ही बुदबुदा रही थी सरिता, जो 35 साल की एक विधवा थी और गांव के स्कूल में टीचर थी. उस का पति भी इसी गांव में ठाकुर के यहां काम करता था, पर एक सड़क हादसे में उस की जान चली गई थी.


सरिता अकेली रह गई थी, पर उस ने साहस नहीं छोड़ा था और खुद नौकरी कर के अपनी गुजरबसर शुरू कर दी थी. भले ही सरिता ने अपनेआप को बिजी कर लिया था, पर उस का शरीर तो अभी भरपूर जवान ही था और जवानी की अपनी कुछ मांगें होती हैं. सरिता का शरीर भी ऐसी ही मांग करता था. सरिता जब रात में बिस्तर पर लेटती थी तो उस का मन करता था कि कोई उसे अपनी बांहों में भींच ले और उस के पूरे शरीर को तब तक सहलाए जब तक कि वह मदहोश हो जाए. पर एक विधवा होने के नाते वह लोकलाज के डर से ऐसे खयाल आते ही अपने विचारों को  देती थी और ठंडे पानी से हाथमुंह धो कर सोने की कोशिश करती थी.


ऐसा नहीं था कि विधवा सरिता से कोई शादी करने को तैयार नहीं था, कई रिश्ते भी आए पर सरिता इन आए रिश्तों के पीछे लोगों की मंशा और कमाऊ पत्नी के पैसे पर मजे करने की नीयत को सम? गई थी और हर आए रिश्ते को वह ठुकरा देती थी. गांव में ही जोखू नाम का गरीब मछुआरा था, जो सरिता को दूर से खूब घूरघूर कर देखता था. ‘‘क्या जोखू, काहे मास्टरनी को इतना घूरे जाते हो…’’ सत्तू ने पूछा तो सकुचाते हुए जोखू ने बताया था कि सरिता उसे बहुत अच्छी लगती है. ‘‘पर वह तो एक विधवा है,’’ सत्तू
ने कहा.


‘‘तो क्या हुआ, विधवा भी औरत ही होती है. उस के भी जी होता है,’’ जोखू ने कहा पर साथ ही साथ वह अच्छी तरह से जानता था कि गोरे रंग की सरिता कभी भी एक मछली पकड़ने वाले और शक्ल से काले से दिखने वाले आदमी से शादी नहीं करेगी. वैसे भी सरिता एक ऊंची जाति की औरत थी और जोखू एक मछुआरा, इसीलिए तो जोखू ने कभी सरिता से अपने प्यार का इजहार नहीं किया था. वह तो सरिता को दूर से ही आतेजाते देखता और खुश हो लेता था.


गांव में स्थानीय नेता राजेश कुमार के गुरगे जीप दौड़ा कर ऐलान कर रहे थे कि लोग घबराए नहीं, नेताजी की तरफ से आप लोगों को महफूज रखने की पूरी कोशिश की जाएगी और आप लोगों को इस बार बाढ़ आने पर बिलकुल भी परेशानी नहीं होगी. इस के लिए गांव के स्कूल की छत पर ही एक राहत शिविर लगाया जा रहा है, जहां पर आप लोगों को जरूरत की सारी चीजें मिलेंगी. राजेश कुमार बाढ़ जैसी आपदा के समय इस तरह के हथकंडों से अपना वोटबैंक पक्का करना चाहता था.


सरिता ने अपना कुछ सामान 2 बक्सों में समेट कर चारपाई पर रख दिया और फिर पाए के नीचे 4-4 ईंटें लगा कर चारपाई को ऊंचा कर दिया. हालांकि, इतने से वह सामान महफूज नहीं रहने वाला था, क्योंकि बाढ़ के पानी का लैवल काफी ऊंचा रहता था. फिर भी सरिता ने राहत की सांस ली थी. पानी अभी गांव में नहीं घुसा था और रात हो चली थी. सरिता ने दाल और चावल  बनाए और खा लिए. बाकी का खाना एक बरतन में रख दिया, फिर चारपाई के किनारे बैठ गई.


सभी को डर था कि बाढ़ का पानी रातबिरात गांव में घुस सकता है, इसलिए सब लोग सावधान रहे.
दिनभर के काम से थकीहारी सरिता की आंख लग जाती थी. वह बारबार आंख खोल कर देख लेती थी कि पानी गांव में तो नहीं गया, पर देर रात तक तो पानी गांव की सरहद के बाहर ही था. सरिता अचानक से हड़बड़ा कर जागी थी. उस ने देखा कि पानी उस के कमरे के अंदर गया था. चारपाई के पाए के निचले हिस्सों को पानी छूने लगा था. गांव में अलग तरह का शोर फैला हुआ था. लोगों के पानी में निकलने की आवाजें रही थीं और जानवर रंभा रहे थे. सरिता समझ गई थी कि उस ने देर कर दी है.

समय रहते उसे राहत शिविर में चले जाना चाहिए था, पर मन में यकीन था कि हो सकता है इस बार बाढ़ गांव के अंदर कर बाहर से ही चली जाए, तभी तो वह अपनी चारपाई पर ही बैठी रही थी, लेकिन अब तो खतरा सामने ही गया था. अब उसे इसी गंदे पानी में से निकल कर राहत शिविर या और किसी महफूज जगह जाना होगा. सरिता ने अपनी साड़ी को घुटनों तक किया और पानी में पहला कदम रखा, फिर धीरेधीरे कमरे के बाहर तक आई. बाहर का सीन डरावना था. चारों ओर पानी ही पानी था. सरिता का मन पानी देख कर घबरा उठा था. इतने पानी में वह कैसे चल पाएगी? पर हौसला कर के वह तकरीबन 500 मीटर ही चल पाई थी कि उस की हिम्मत जवाब दे गई थी.


पानी के हलके वेग की लहरों से सरिता के पैर टक्कर नहीं ले पा रहे थे और सरिता को लगा कि अब वह गिर जाएगी, पर ठीक तभी जोखू एक नाव ले कर गया. उस नाव पर गांव के छोटे बच्चे, 2-4 औरतें और कुछ बुजुर्ग पहले से ही बैठे हुए थे. जोखू ने सरिता को इशारे से नाव में बैठ जाने को कहा. सरिता जैसेतैसे कर के नाव में बैठ गई थी. जोखू ने नाव को स्कूल की तरफ मोड़ दिया, जहां पर राहत शिविर लगाया गया था. स्कूल पहुंच कर जोखू ने नेता राजेश कुमार के गुरगों और सरकार के लोगों से उन्हें शरण देने की बात कही, पर उन में से एक आदमी ने जोखू को धक्का देते हुए कहा, ‘‘यह राहत शिविर गांव के ऊंची जाति के लोगों के लिए है, छोटी जाति के लोग कहीं दूसरी जगह जा कर अपना जुगाड़ करें.’’ जोखू को बहुत गुस्सा आया, पर वह कुछ  नहीं कर सका.


जोखू ने सरिता से कहा, ‘‘मास्टरनीजी, आप यहां उतर जाओ, क्योंकि आप ऊंची जाति की हो. आप
को ये लोग रख लेंगे. हम लोग देखते हैं कि हमें क्या करना है.’’ सरिता ने भी सरकारी लोगों का बरताव देखा था और उसे भी अच्छा नहीं लगा था. उस ने जोखू की आंखों में देखा और कुछ सोच कर नाव से उतरने से मना कर दिया. सरिता नाव से नहीं उतरी तो जोखू को भी अच्छा महसूस हुआ और उस का जोश दोगुना हो गया. वह तेजी से नाव खेने लगा. नाव गांव में भरे पानी में इधरउधर जा रही थी, पर उन लोगों को अब एक ऐसी जगह की तलाश थी, जहां पर वे खानापीना बना कर खा सकें और आने वाले कुछ दिन वहां पर रह भी सकें.


नाव पर बैठे लोग अपनीअपनी राय दे रहे थे, पर जोखू को पता था कि ऐसी जगह तो पूरे गांव में एक ही है और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की हवेली. जोखू ने बिना कुछ कहे हवेली की तरफ नाव मोड़ दी थी और हवेली के गेट के बाहर पहुंच कर ही दम लिया था. नाव पर बैठे लोगों की आंखों में कोई चमक नहीं उभरी थी, क्योंकि वे सब जानते थे कि ठाकुर नाथ सिंह अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोलेगा और ही किसी तरह की कोई मदद करेगा. ‘‘यह हिम्मत और एकता दिखाने का समय है. जैसा हम कहते हैं वैसा ही करना, नहीं तो बाढ़ में हम सब मारे जाएंगे,’’ यह कहने के साथ ही जोखू ने अपनी योजना सब को बता दी थी.


नाव पर बैठे लोग पानी में उतर कर हवेली के गेट तक गए और फिर उसे खटखटाने लगे. शोर सुन कर हवेली के गार्ड गांव वालों को डांटने लगे. इसी बीच ठाकुर नाथ सिंह भी अपनी छत पर पानी का जायजा लेने पहुंच गया था. इधर, जोखू अपना मछली पकड़ने का जाल ले कर पानी में तैरते हुए हवेली के पीछे छोटे गेट के पास पहुंच गया. उस ने मछली पकड़ने के जाल को दीवार पर फंसाया और उस के सहारे दीवार पर चढ़ गया, फिर आसानी से हवेली के अंदर उतर गया. जोखू एक योजना के तहत काम कर रहा था. हवेली के एक कमरे में उस ने देखा कि ठाकुर की 14 साल की बेटी मोबाइल चला रही है.


कालेकलूटे जोखू को देख कर वह घबरा उठी थी, पर जोखू ने उसे चुप रहने का इशारा किया और उस के मुंह पर हाथ रख कर उस के कान में कहा कि वह उन लोगों की मदद करे, नहीं तो गांव के सारे लोग मारे जाएंगे. लड़की को कुछ सम? नहीं आया. जोखू तकरीबन धकेलते हुए उस लड़की को ले कर छत पर ठाकुर के सामने पहुंच गया और ठाकुर से हवेली का गेट खोल कर गांव वालों को हवेली के अंदर पनाह देने की बात कही और ऐसा नहीं करने पर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को भी कहा. ठाकुर नाथ सिंह अपनी बेटी की हिफाजत के प्रति संजीदा था.

वह जानता था कि मछुआरा जोखू आज पूरी तैयारी कर के आया है. हो सकता है कि उस के पास कुछ हथियार भी हो और वह आज कुछ भी कर सकता है. नाथ सिंह ने मौके की नजाकत  समझकर फैसला कर लिया था. ठाकुर इस इस समय निहत्था और लाचार था, इसलिए उस ने हवेली का गेट खोल कर सिर्फ 15-20 गांव वालों को अंदर आने की छूट दे दी, पर साथ में यह शर्त भी रख दी कि ये लोग हवेली की छत के एक कोने में रहेंगे और शोरशराबा भी नही करेंगे. जोखू ने तुरंत ही ठाकुर की हर बात मान ली थी.
लोग हवेली के अंदर रहे थे. बुजुर्गों को तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने ठाकुर की हवेली के अंदर पैर रखा है. वे डरेसहमे हुए से बढ़े चले जा रहे थे.


बुजुर्गों और औरतों को छत पर छोड़ने के बाद जोखू फिर से बाहर की ओर जाने लगा, तो सरिता अनायास ही बोल पड़ी, ‘‘अरे जोखू, अब कहां जा रहे हो. थोड़ा दम तो ले लो, पानी तो पीते जाओ.’’ जोखू से पहली बार किसी औरत ने इतने प्यार से कुछ पूछा था. उसके मन में सरिता के प्रति दबा हुआ प्यार दस गुना हो चला था. जोखू कुछ देर तक सरिता द्वारा खुद का नाम पुकारे जाने के रस में डूबा रहा, फिर कुछ देर बाद जोखू ने उसे बताया कि वह नाव ले कर गांव के और लोगों की मदद और उन्हें महफूज जगह पर ले कर जाने के लिए जा रहा है. जाखू की यह बात सुन कर सरिता भी जबरन उस के साथ हो ली.


सरिता के कपड़े भीगे हुए थे. वह नाव पर जोखू के पास ही सिमट कर बैठ गई थी. सरिता ने देखा कि कैसे जोखू लोगों के घरघर जा कर उन की मदद करने में लगा हुआ था. 3 साल पहले आई बाढ़ के बाद गांव वालों ने बालू और मिट्टी से कुछ टीले बना लिए थे, ताकि फिर से कभी बाढ़ के आने पर काम सकें. आज वही समय गया था. कुछ लोगों को जोखू ने उन ऊंचे टीलों पर पहुंचाया, तो कुछ को पंचायत भवन की छत पर. शाम तक जोखू भले ही थक कर चूर हो गया था, पर उसे संतोष था कि कम से कम गांव के लोग बाढ़ के पानी से महफूज तो हैं.


शाम ढली तो हवेली की छत पर बैठे गांव के लोगों ने छत पर ही अलगअलग हिस्सों में खाना बनाना शुरू कर दिया. आज किसी का हिस्सा बंटा नहीं था. कोई किसी से तेल मांग रहा था, तो कोई किसी से नमक और लोग एकदूसरे के पास जाजा कर खाने का मजा भी ले रहे थे. आज हवेली की छत पर बैठे गांव के अलगअलग घरों के लोग एक परिवार जैसे बन गए थे. सरिता ने भी खाना बना कर जोखू को खिलाया और खुद उस के बाद खाया. सरिता और जोखू के लिए छत पर लेटने के लिए जगह नहीं थी, तो सरिता नीचे के बरामदे के एक कोने में चादर डाल कर लेट गई, जबकि जोखू पास में ही बैठ गया. शायद उसे लेटने में ?ि?ाक लग रही थी. बाढ़ के चलते बिजली तो पहले ही जा चुकी थी और अब ठाकुर की हवेली भी अंधेरे में नहा रही थी.


सरिता को रात में ठंड लगने लगी, तो उस की आंख खुली और उस ने घोर अंधेरे में कोशिश कर के देखा कि जोखू भी नंगी फर्श पर सिकुड़ा हुआ लेटा है. सरिता को जोखू पर दया भी आई और प्यार भी उमड़ पड़ा. वह रात के अंधेरे में भूल गई थी कि वह एक विधवा है. इस समय वह केवल एक औरत थी. उसे जाने क्या सू? कि वह भी जोखू के पास लेट गई और अपना एक हाथ जोखू के मजबूत सीने पर रख दिया. इस समय भी जोखू के बदन से मछलियों जैसी महक रही थी, पर जोखू के प्यार में पगी हुई सरिता को आज यह सब अच्छा लग रहा था.


अचानक जोखू ने करवट ली और सरिता को अपनी मजबूत बांहों में कस  लिया था. सरिता ने भी कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह भी हर एक छुअन से और भी मचल जाती थी. वे दोनों एकदूसरे के बदन को सहलाते और चूमते रहे थे. जब जोखू को लगा कि सरिता ने पूरी तरह समर्पण कर दिया है, तो वह उस के शरीर में प्रवेश कर गया और सरिता के मुलायम अंगों पर अपनी हथेली घुमाता रहा. तपती धरती पर जाने कितने सालों के बाद आज पानी बरसा था और यह बरसात पूरी रात में कई बार होती रही थी.
सुबह हो चुकी थी. सरिता और जोखू एकदूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. ‘‘हम तुम से ब्याह करना चाहते हैं. क्या तुम भी हम से ब्याह करोगी?’’ जोखू ने सकुचाते हुए पूछा, तो सरिता कुछ नहीं बोल सकी. उस की चुप्पी में ही उस की हां छिपी हुई थी.


गांव से पानी उतर कर निकल जाने में पूरे 2 दिन लग गए थे. बाढ़ का पानी अपने साथ सबकुछ बहा ले गया था. बाढ़ के जाने के बाद फसल का काफी नुकसान तो हुआ ही था, पर इस बार की बाढ़ ने ठाकुर की अकड़ खत्म कर दी थी. बाढ़ ने ठाकुर नाथ सिंह को यह संदेश भी दिया था कि ऊंट चाहे जितना भी ऊंचा क्यों हो एक दिन तो पहाड़ के नीचे आता ही है. अगर गांव के लोगों ने एकता नहीं दिखाई होती, तो इस बार भी लोग बाढ़ में बह गए होते. हालांकि, इस बाढ़ ने भी लोगों से फिर से काफीकुछ छीन लिया था, पर बाढ़ खत्म होने के बाद सरिता और जोखू ने शादी कर ली थी और दोनों खुशी से रहने लगे थे. सच्चे प्यार की यही तो पहचान होती है. Hindi Story

Film: ओ रोमियो – क्या गुस्सैल ‘कबीर सिंह’ को भी मात देगा शाहिद कपूर का नया किरदार ‘हुसैन उस्तरा’

Film: शाहिद कपूर एक बार फिर अपने इंटेंस अवतार में नजर आने वाले हैं. विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ओ रोमियो’ का पहला लुक टीजर रिलीज होते ही चर्चा में आ गया है. टीजर में शाहिद का उग्र और रॉ अंदाज दर्शकों को उनके किरदार ‘कबीर सिंह’ की याद दिला रहा है. इस दमदार टीजर ने फिल्म को लेकर फैंस की उत्सुकता और भी बढ़ा दी है.

फिल्म मेकर्स का कहना है कि यह फिल्म ‘वास्तविक घटनाओं पर आधारित है. इस दावे के सामने आते ही इंटरनेट मीडिया पर अटकलें शुरू हो गई हैं. दर्शक कयास लगा रहे हैं कि फिल्म की कहानी मुंबई के गैंगस्टर हुसैन उस्तरा, बदले की आग में जलती सपना दीदी और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की असल गैंगवार से जुड़ी हो सकती है. टीजर देखने के बाद से ही लोग हुसैन उस्तरा की असली कहानी जानने को बेताब हैं.

हुसैन उस्तरा (फिल्म में शाहिद कपूर) : यह मुंबई का कुख्यात गैंगस्टर था जो अंडरवर्ल्ड में दाऊद इब्राहिम गैंग से जुड़ा था. वह कॉन्ट्रैक्ट किलर था. कई हत्याओं में उसका नाम भी आया था. हुसैन बेहद बेरहम और हिंसक अपराधी था. अंडरवर्ल्ड की दुनिया में उसका नाम डर का पर्याय बन गया था.

मशहूर क्राइम जर्नलिस्ट एस. हुसैन जैदी की किताबों ‘डोंगरी टू दुबई’ और ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ में बताया गया है कि हुसैन उस्तरा पहले दाऊद गैंग के लिए काम करता था, बाद में मतभेद और सत्ता की लड़ाई के चलते अलग हो गया.

हुसैन उस्तरा की हत्या दाऊद के गुर्गों द्वारा ही की गई थी. वे दाऊद को सीधी चुनौती दे रहे थे और सपना दीदी की मदद कर रहे थे, इसलिए दाऊद की डी कंपनी ने उन्हें रास्ते से हटा दिया. हुसैन उस्तरा की कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड इतिहास का चर्चित अध्याय मानी जाती है.

सपना दीदी (फिल्म में तृप्ति डिमरी) : अशरफ खान उर्फ ‘सपना दीदी’ के पति, महमूद कालिया, की हत्या दाऊद इब्राहिम ने मुंबई एयरपोर्ट पर पुलिस एनकाउंटर (कथिततौर पर सेटअप) के जरिए करवाई थी. पति की मौत का बदला लेने के लिए अशरफ खान ने अपराध की दुनिया में कदम रखा और ‘सपना दीदी’ बनीं.

‘उस्तरा’ नाम की वजह : हिंसक लड़ाई करने और अपने दुश्मन के शरीर पर उस्तरे से एक लंबा घाव करने की वजह से उसे ‘उस्तरा’ नाम दिया गया था.

रिलीज और बॉक्स ऑफिस क्लैश

विशाल भारद्वाज की यह रोमांटिकथ्रिलर फिल्म 13 फरवरी, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. बॉक्स ऑफिस पर इसकी सीधी टक्कर शनाया कपूर और आदर्श गौरव की रोमांटिक और एडवेंचर मूवी ‘तू या मैं’ से होगी. Film

Geo Politics: गहरी पैठ

Geo Politics. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप सरकार की गैरकानूनी घुसपैठियों की धरपकड़ और कानूनी ढंग से आए छोटे से गुनाहगारों को वापस भेजने की पौलिसी ने अब देश के बेरोजगार युवाओं का अमेरिकी ड्रीम खत्म कर दिया है. खेत और मकान बेच कर लाखों रुपए लगा कर असलीनकली वीजा ले कर अमेरिका या कई देशों में घूमनेघामने के लिए घुसना अब बेकार है. हालांकि अभी भी लाखों भारतीय लड़के वहां हैं और कम से कम भारत से ज्यादा कमा रहे हैं.


अमेरिका में कमाई इसलिए हो रही है क्योंकि गोरे अमेरिका ने अपना कुछ खास सामान जैम मोबाइल की तकनीक, इंटरनैट, यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप, एक्स दुनियाभर को खरीदने की लत डाल दी है. कुछ अमेरिकी युवाओं की देन जिस पर बाहर के अक्लमंद लोगों ने दिमाग लगाया, ने अमेरिका को मालामाल कर दिया है और वहां के गोरे समझ रहे हैं कि उन के पास दुनिया की चाबी है.


अमेरिकी ड्रीम अभी फिलहाल ठंडा हुआ है पर बंद नहीं हुआ है क्योंकि अब गोरे अमेरिकी उसी तरह मौजमस्ती के आदी हो गए हैं जैसे हमारे यहां के पंडेपुजारी और उन के पौलिटिकल सरकारी नौकर बिजनैसमैन भक्त. अमेरिकियों से अब काम नहीं हो पाएगा. अमेरिका में सैकड़ों पंजाबी युवा बड़ेबड़े ट्रक चला रहे हैं क्योंकि गोरे हट्टेकट्टे भी उस तरह की मुसीबत वाला मेहनती काम नहीं करना चाहते. खेतों में ट्रैक्टरों, थ्रैशरों को चलाना, लोडिंगअनलोडिंग करना, टैक्सियां चलाना, सफाई करना जैसा काम या तो वहां के कालों के हाथों में है या भारत जैसे देशों से गए लोगों के हाथों में.

पंजाब से गए लड़कों को  कर के भी इतनी अंगरेजी जाती है कि वे दूसरे देशों के भगोड़ों से ज्यादा अच्छा काम पा लेते हैं. इस के बावजूद डंकी रूट अब ठंडा तो रहेगा. दूसरे देशों में भाषा की दिक्कत रहेगी. यूरोप के देशों में अब भारतीय मूल के लोग दिख जाएंगे पर उन्हें यूरोप में सैटल होने में वक्त लगता है. यूरोप के देश छोटेछोटे हैं, लोग छोटेसंकरे मकानों में रहते हैं, जहां छिपने की जगहें कम हैं. यूरोपीय दूसरे लोगों को आसानी से मिलाते भी नहीं हैं.


जरमनी, नार्वे, स्वीडन, फ्रांस सब देशों में अब बाहरी लोगों को आने से रोकने की मांग बढ़ने लगी है. जब से मुसलिम कट्टरपंथी गोलियों की बरसात करने लगे हैं और हिंदू कट्टरपंथी हर गोल पत्थर को पूजने लगे हैं हर पेड़ की जड़ को पानदान समझने लगे हैं, साफसुधरा, डिसिप्लिन वाले यूरोपीयन बाहरी लोगों को सिरदर्द समझने लगे हैं.


भारत के युवा वर्ग के पास अब एक ही काम है, किसी मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे से चिपक जाओ और मुफ्त की खाओ. जब तक इस देश में बेवकूफ भक्त हैं, बहुत से अपनी मेहनत का एकचौथाई तक निठल्लों के खिला देंगे. डोनाल्ड ट्रंप की पुलिस के डर में रहने से यहां रहो और दूसरों को डरा कर रहो. हाथ में एक लाठी और अपने जैसे 6-7 का साथ होना वसूली के लिए काफी है.

कांग्रेस को केरल में कौर्पोरेशनों, नगर निकायों, जिला पंचायतों के चुनावों में अपनी ही तरह के भाजपा विरोधी लैफ्ट फ्रंट के मुकाबले अच्छी बढ़त मिली है. हालांकि भाजपा को भी कुछ फायदा हुआ है पर यदि भाजपा की अलगाववादी हिंदूमुसलिम पौलिसियां चलती रहीं और वहां भी हर चर्च और मसजिद के नीचे हिंदू मंदिर निकलने लगे तो वह लैफ्ट और कांग्रेस दोनों को हरा देगी.


भाजपा की खासीयत है कि उस की पुरोहितों की जमात पिछले 50 सालों से रातदिन एक कर के लोगों को पौराणिक हिंदू धर्म का पाठ बड़ी तेजी से पढ़ा रही है. चूंकि पौराणिक हिंदू धर्म के शिकार के लोगों के पास लिखने की कलम है, पढ़ने की समझने वे बहकावे में कर अपनी रोजीरोटी की जगह राम, शिव और किसी और देवीदेवता को बचाने में जुट जाते हैं.


अगर एक को सिर्फ 5 लोग 500 लोगों  को हर रोज बारबार सुनाते रहें तो कुछ दिनों में 500 में से
200-250 उस को सच मानने लगते हैं. भाजपा ने ऐसे लोगों की फौज तैयार कर ली है जो ?ाठ को फैलाने की ही नौकरी करते हैं. उन्हें पैसे भी मिलते हैं, साधन भी मिलते हैं और चूंकि उन के पास केंद्र सरकार है, वे सैकड़ों के फंसे काम भी करवा सकते हैं.


जब अपना काम निकलवाना होता है तो  सच मानने में हर्ज नहीं होता. हर राज्य हमेशा यही करता रहा है. आखिर यह देश यों ही 2,000 साल उन लोगों का गुलाम नहीं बना जो यहां सिर्फ व्यापार करने या इसे लूट कर लौट जाना चाहते थे. इन लुटेरों और व्यापारियों को जल्दी ही पता चल गया था कि यहां के लोग आसानी से ?ाठ का शिकार बन जाते हैं. उन्होंने पहले यहीं के  बोलने को साथ मिला लिया, उन को उन का हिस्सा दिया पर खुद बड़ा हिस्सा खाने लगे, यहीं रह कर.


1947 में हम आजाद हुए पर नाकाम करने वाले  से छुटकारा मिला. वे अलगअलग शक्ल में आते रहे हैं. कभी एक पार्टी और ?ांडे के नाम पर तो कभी दूसरी के नाम पर. जो सुधार दिखता है वह साइंस की बदौलत है. यह सुधार अफ्रीका में भी हुआ, तिब्बत में भी हुआ, सहारा के रेगिस्तान में भी हुआ. आज देश में फिर मंदिर ज्यादा बन रहे हैं, फैक्टरियां कम. धर्म की दुकानें ज्यादा बन रही हैं, स्कूलकालेज कम.
लोगों को बहकाने और बरगलाने की कीमत देश ने पहले भी दी है, आज भी दे रहा है और आगे भी देगा. केरल एक कोना बचा था जहां लोग समझदार, पढ़ेलिखे थे. अब वह भी अनपढ़ों का राज्य बनता जा रहा है, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की तरह का. Geo Politics                                  

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