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Story in Hindi : ऐलान ए जग

Story in Hindi. ‘‘जल्दी चलो,’’ वह बोला.

‘‘मैं तो तुम्हारे पीछेपीछे ही आ रही हूं. तुम्हारे ही पैर नहीं उठ रहे हैं. मुड़मुड़ कर पीछे क्या देख रहे हो? दिल में कुछ है क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, गांव छूट रहा है न… संगीसाथी… अपने लोग… छूट गए एक ही  झटके में. दर्द तो होगा ही. बहुत मजबूरी में गांव छोड़ रहा हूं.’’

‘‘एक बार फिर सोच लो, अभी कोई ज्यादा दूर नहीं आए हैं,’’ वह ठिठक कर खड़ी हो गई.

‘‘अब क्या सोचना है. हम तो अब ऐसे रास्ते पर निकल चुके हैं, जहां से वापस लौटना नामुमकिन है. मैं इस घटना को कमजोरी नहीं बनाना चाहता हूं. एक जंग की शुरुआत हो चुकी है.’’

‘‘हम गरीब मजदूर हैं, मेहनत के सिवा हमारे पास कुछ भी नहीं है. इतनी बड़ी लड़ाई हम कैसे लड़ेंगे? आने वाली परेशानियों को सोच कर डर गए, तो हम मुसीबत में आ सकते हैं, इसलिए हमें जल्दीजल्दी चलना चाहिए. समय नहीं है.’’

‘‘अभी बहुत समय है. स्टेशन कौन सा दूर है. गांव के लोग रात में दुबके पड़े होंगे. इस समय कौन आता है इधर?’’

‘‘यह रात हमारी दुश्मन बन गई है.’’

‘‘हमारा कुछ भी अपना नहीं है… हमारी इच्छाएं, हमारी खुशियां दूसरों के हाथों में होती हैं. हम मशीन हो कर रह जाते हैं. सामंत लोग हमें इनसान सम झते ही कहां हैं?

‘‘जब अपने ही दुश्मन बन जाएं, तो दूसरे रास्ते तलाशने पड़ते हैं. तुम अपने गांव को बहुत प्यार करते हो न?’’

‘‘हां, पर अब हम गांव छोड़ चुके हैं, यह अब फांसी का फंदा बन चुका है.’’

‘‘जहां जाएंगे, वहां ठीक से रह पाएंगे क्या?’’   ‘‘समय हर जख्म को भर देता है.’’

‘‘अगर ऐसा नहीं हुआ तो…’’ ‘‘कुछ नहीं होगा. नई माटी… नई गंध… नए लोगों के साथ नई जिंदगी बसाएंगे.’’

‘‘वह दिन जिंदगी का सब से अच्छा दिन होगा. जो कुछ हुआ, उस में तुम कहीं मु झे कुसूरवार तो नहीं मानते?’’

‘‘नहीं.’’   ‘‘वजह तो मैं ही थी.’’

‘‘तुम कुसूरवार नहीं हो. कोई भी हमारे बीच आया, तो उस का भी यही हाल होगा.’’

‘‘मैं बहुत खुश हूं कि तुम अपने गांव से इतना प्यार करते हो. एक न एक दिन इस गांव में तुम्हारे साथ जरूर वापस आऊंगी.

‘‘यह मेरी भी तो ससुराल है. जिस ने मेरी ससुराल… मेरा सुखचैन छीना, उस का सबकुछ छीन कर रहूंगी. मैं बदले की आग में जल रही हूं.’’

‘‘तुम्हारी बातों में बड़ी ताकत है. मु झे बहुत अच्छा लगता है, जब तुम बोलती हो. हमारे हालात बिगड़ गए हैं. हर कदम संभल कर उठाना है. कुछ छूटता है, तो कुछ मिलता भी है. यह तो जिंदगी में चलता ही रहता है.’’

‘‘औरत अपने को हर हाल में महफूज रखना चाहती है. कुछ गलत कदम भी उठ जाते हैं, जिस का नतीजा उसे शैतान के खूनी पंजों तक पहुंचा देता है. हर जगह औरत का शोषण होता है… वह बारबार टूटती है… जुड़ती है… उजड़ती है… बसती है.

‘‘मैं जिंदा रहना चाहती हूं, मैं बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती. औरत की बेइज्जती कुदरत की बेइज्जती है.’’

‘‘मैं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं. इसीलिए तो इतना बड़ा काम कर दिया.’’

‘‘इसे हम जश्न के रूप में लेंगे… हम ऐसे जश्न हर रोज मनाएंगे… अपने साथ… औरों के साथ…’’

‘‘हम अपराधी हो गए हैं… कानून की नजरों में… गांव की नजरों में.’’

‘‘तुम अपराधी नहीं हो. तुम ने वही किया, जो हर पति करता. सच से कहीं भाग तो नहीं रहे हो न?’’

‘‘भाग कर जाऊंगा कहां? रहना तो यहीं है. हम ने इस तरह की जिंदगी सोची नहीं थी.’’

‘‘किस ने सोचा था? तुम ने सोचा था कि तुम्हारी बीवी के साथ चौधरी इतनी गिरी हरकत… बलात्कार करेगा आज रात? सोचने भर से ही जी कांप जाता है. वह बाप की उम्र का था. उस ने वह कर दिया… बेशर्म था.’’

‘‘उसे काट भी तो दिया.’’ ‘‘हम दोनों भी तो सजा के भागीदार हो गए?’’

‘‘बिना काटे भी तो मैं सजा का भागीदार बन जाता… अपनी नजरों में… तुम्हारी नजरों में?’’

‘‘खुश तो हो?’’ ‘‘दुखी नहीं हूं. मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता.’’

‘‘मैं ही कहां चाहती हूं तुम्हें खोना? इतना ही होता, तो मैं चौधरी को कटने नहीं देती. मौजमस्ती करती, उस के साथ और तुम फावड़ा ले कर खेत में काम करते. मु झे पसंद नहीं है यह सब… घिन आती है.’’

‘‘मैं खुश हूं तुम्हारा खून पानी नहीं हुआ है.’’

‘‘सच बताओ, तुम को कभी ऐसा लगता था क्या?’’ ‘‘नहीं.’’

‘‘हम और मजबूत हो गए.’’ ‘‘हर मोरचे पर मैं तुम्हारे साथ आगेआगे चलूंगी.’’

‘‘इसे बरकरार रखना है… हम जरूर कामयाब होंगे.’’

‘‘तुम सुल झे हुए हो. यह कामयाबी की पहली शर्त है.’’

‘‘हमें निराश नहीं होना पड़ेगा.’’

‘‘मुझे यहां का रास्ता नहीं मालूम है. कोई छोटा रास्ता पकड़ो. आम रास्ते से चलना अब ठीक नहीं होगा.’’

‘‘रात को इधर कौन आएगा?’’ ‘‘पूछ कर नहीं आएगा.’’

‘‘तेज चलो. समय बहुत कम है.’’

‘‘हम बहुत नजदीक आ गए हैं. मेरा मूड आज नाचने… गाने… मौजमस्ती करने का था. टेपरेकौर्डर में आज ही नई बैटरी लगवाई थी.’’   ‘‘मु झे मालूम है.’’

‘‘दिल को चोट लगी है… कह नहीं पा रही हूं?’’ उस का गला भर आता है. दोनों चुपचाप कुछ दूर तक चलते रहे.

‘‘बात करने से रास्ता जल्दी कट जाता है,’’ वह खामोशी तोड़ता है.

‘‘खामोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है. मु झे बात करने में बहुत मजा आता है. बात करने से जी हलका होता है.’’

‘‘हमारी खुशी चौधरी ने छीन ली.’’

‘‘तुम्हारा यह रूप मु झे बहुत प्यारा लगा.’’ ‘‘मैं कमजोर नहीं रहूंगा.’’

‘‘कमजोर मर्द को औरत पसंद नहीं करती.’’

‘‘अविश्वास ही इनसानी रिश्ते को कमजोर बनाता है.’’

‘‘गलती करने का समय नहीं है. जिंदगी अंधेरे में चली जाएगी.’’

‘‘मैं भावुक हूं, लेकिन बेवकूफ नहीं. हालात की नाजुकता को सम झता हूं.’’

‘‘वह जो खेत में नीम का पेड़ है न, वहीं चल कर थोड़ी देर बैठते हैं. वहां से स्टेशन भी साफ दिखेगा. सिगनल हुआ कि दौड़ कर गाड़ी पकड़ लेंगे.

‘‘स्टेशन जाना अभी ठीक नहीं है. वहां गांव का कोई आदमी मिल गया, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी.’’

दोनों आम रास्ता छोड़ खेत की मेंड़ पकड़ कर टेढ़ेमेढ़े रास्ते से होते हुए नीम के पेड़ के नीचे पहुंचे.

सुघरी ने बैग से निकाल कर एक नई चादर बिछा दी.

‘‘कितनी अच्छी है?’’ जमना ने उसे छू कर देखा.

‘‘मेरी भाभी मुंबई से लाई थीं… मेरी सुहागरात के लिए…’’

‘‘यहीं हमारी सुहागरात मनेगी,’’ कह कर वह हंसा.

‘‘आज जितना मिलेगा, उतने में ही हम अपना अच्छा समय बिताएंगे.’’

‘‘तु झे डर नहीं लगता है.’’  ‘‘नहीं. डरना क्या है? हर हालात से मुकाबला करने को तैयार रहना है. डरडर कर जीना कोई जीना नहीं रह जाता. हमें जिंदगी को अपने हिसाब से जीना है.’’

‘‘लोग बड़े गुनाह करते हैं और मजे से जीते हैं.’’ ‘‘हां, तुम ठीक कहते हो.’’

‘‘अब हम जोरजुल्म बरदाश्त नहीं करेंगे. अभी तो शुरुआत है… बहुतकुछ करना बाकी है.’’ ‘‘हक की लड़ाई लड़ेंगे.’’

‘‘यह काम पहले हो गया होता, तो आज हमारी यह हालत नहीं होती?’’ ‘‘हम ने सही राह पकड़ ली है.’’

‘‘थोड़ी और धार की जरूरत है.’’

‘‘गांव में सब से ज्यादा तुम्हारा ही परिवार चौधरी का शिकार हुआ है. जो उस ने मेरे साथ करने की कोशिश की, वह उस के जोरजुल्म की अगली कड़ी थी. किसी ने उस के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की, उन की आंखों के सामने ही उन की बहूबेटियों की इज्जत लुटती रही और वे सबकुछ देखते रहे.

‘‘तुम्हारे बाबा ने आवाज उठाई थी. सामंतों ने उन की इतनी पिटाई की कि जिंदगीभर चारपाई से उठ नहीं सके. इस भयानक नतीजे को देख कर फिर किसी ने हिम्मत नहीं की.

‘‘चौधरी को जाना था, उस ने आग को सीने से लगाने की कोशिश की. तुम्हारे अंदर तुम्हारे बाबा की आग थी, राख से ढकी हुई… वक्त की हवा लगते ही ज्वाला बन गई. इतिहास रच गया.’’

‘‘तुम तो एकदम नेता हो गई हो.’’ ‘‘जुल्म के पैरों तले कुचली गई

एक औरत हूं, जिस की सुहागरात खून में रंग गई.’’

‘‘मु झे तुम्हारी बातें कुछ अलग सी लगती हैं.’’

‘‘तुम खुश तो हो न? जो काम तुम ने किया, वह मैं ने किया होता तो मैं बहुत खुश होती.’’

‘‘मैं खुश हूं, तभी तो तुम्हारे साथ हूं. सुनते हैं, प्यार में लोग कमजोर हो जाते हैं.’’

‘‘एकदम  झूठ. वे प्यार नहीं करते होंगे. तुम खुद सोचो न.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो. मैं ही कभीकभी गड़बड़ा जाता हूं. तुम ने चौधरी को काट दिया. तुम मु झ से बहुत ज्यादा प्यार करती हो. कितना खुश हूं आज मैं.’’

‘‘चौधरी शैतान था. मैं ने बहुत कोशिश की उसे बहलानेफुसलाने की, पर उस पर तो शैतान सवार था. उसे आदत पड़ गई थी. वह मु झे उसी अंदाज में इस्तेमाल करना चाहता था.

‘‘मैं उस नरक की जिंदगी से मरना ज्यादा पसंद करती हूं. वह मु झ पर एकदम हावी हो गया था. तुम समय पर नहीं आए होते, तो वह अपनी मनमानी कर लेता. फिर उस की नहीं, मेरी लाश वहां पड़ी होती.’’

‘‘ऐसी बातें मत करो.’’

‘‘तुम ने मु झे बचाया है इसलिए कि मैं तुम्हारी बीवी हूं. जिसे तुम जीजान से प्यार करते हो. अपनी प्यारी चीज पर जब खतरा आया दिखता है, तो इनसान उस से मुकाबला करने के लिए अपनी पूरी ताकत  झोंक देता है.

‘‘तुम्हीं सोचो, तुम मु झे उस हालत में देख कर आंखें बंद कर के ऊपर वाले को याद करते, तो क्या हो जाता? तुम्हारे ऊपर वाले के आने के पहले तुम्हारी बीवी की इज्जत चौधरी लूट चुका होता और तुम नामर्द बने खड़ेखड़े आंसू बहाते रहते.

‘‘मैं खुश हूं… तुम को पति के रूप में पा कर. मैं तो तुम्हारी यादों में खोई हुई थी कि तभी चौधरी आ टपका, हमारी जिंदगी में जहर बन कर.

‘‘उसे देख कर मेरे मन में कुछ शक तो हो ही गया था. फिर भी मैं ने हिम्मत जुटा ली थी किसी भी हालात से निबटने के लिए.

‘‘मैं ने मन बना लिया था कि थोड़ा इधरउधर की बातें कर के उसे टरका दूंगी. वह मालिक है, यह तो याद ही रखना था. उस ने तुम से कहा और तुम आज्ञाकारी नौकर की तरह बोरिंग चालू करने खेत में चले गए.

‘‘मैं अकेली हो गई थी एक खूंख्वार मांसभक्षी के सामने, जो मेरे अंगअंग को ऐसे देख रहा था, जैसे कोई कसाई बकरे को.

‘‘मैं कमरे में आ गई. वह भी मेरे पीछेपीछे आ गया. उसे चौकी पर बैठने को कहा. वह एक खतरनाक मुसकराहट के साथ बैठ गया.

‘‘मैं जैसे ही बाहर निकलने के लिए आगे बढ़ी कि उस ने बाज की तरह  झपट कर मु झे पकड़ लिया.

‘‘मैं ज्यादा कुछ सम झती, वह तब तक मु झ पर हावी हो चुका था. उस ने मेरे कपड़े नोच कर मु झे नंगा कर दिया था कि मैं बाहर निकल कर न भाग सकूं. उस की प्लानिंग सही थी. मेरा नंगा होना मेरी मजबूरी बन गई थी.

‘‘मैं उस से लड़तेलड़ते थक गई थी… सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. उसे तो बस अपनी आग शांत करने की जल्दी थी.

‘‘मु झे महसूस होने लगा कि मैं अपने को ज्यादा देर तक नहीं बचा सकती. वह भूखे भेडि़ए की तरह मेरे नंगे जिस्म को नोच रहा था.

‘‘वह चाहता था कि प्यार से ही काम हो जाए, लेकिन मैं कतई राजी नहीं थी. लिहाजा, वह पहले से भी ज्यादा खूंख्वार हो गया.

‘‘मैं उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. उस का शिकंजा कसता गया. मैं ने पूरी ताकत से लात मार कर उसे चौकी से नीचे गिरा दिया.

‘‘मैं जैसे ही साड़ी ले कर बाहर जाने को भागी, उस के हाथ में मेरा पैर आ गया. उस ने  झटके से मु झे कमरे में खींच लिया.

‘‘मैं ने जोर से चिल्लाना शुरू किया, ताकि तुम सुन कर आ जाओ… या वह मु झे अपनी बदनामी के डर से छोड़ दे.

‘‘मु झे मालूम था कि वहां और भी लोग होंगे, पर उस के ऊपर इस का कोई असर नहीं पड़ा. तब तक तो तुम आ ही गए. सबकुछ अपनी आंखों से देख लिया और चौधरी के ऊपर फावड़े से वार पर वार करने लगे.

‘‘उस के कितने टुकड़े हो गए थे… गिनना भी मुश्किल हो गया था. खून के फव्वारे से पूरा कमरा रंग गया था. तुम्हारे ऊपर भी खून के छींटे पड़े थे.

‘‘मैं कोने में खड़ी थरथर कांप रही थी. बहुत ही डरावना नजारा था. तुम ने फावड़ा एक तरफ रख कर मेरी तरफ देखा. मैं दौड़ कर तुम से लिपट गई.’’

‘‘मैं ने जो किया, उसे क्या कहेंगे?’’ जमना ने पूछा.

‘‘तुम ने मेरी इज्जत बचा ली थी. एक मर्द का काम किया,’’ सुघरी उस से लिपट कर बोली.

‘‘लेकिन मु झे लगता है, हम लोग अकेले पड़ गए हैं. कोई साथ नहीं देगा. सब गाली देते होंगे… घर वालों को लोग बहुत सताएंगे… मारपीट करेंगे,’’ जमना ने शक जाहिर किया.

‘‘ऐसा मत सोचो. हमारे साथ समाज के सताए लोग होंगे, उन की हमदर्दी होगी. जहां तक हमारे घर वालों को मारनेपीटने का सवाल है, उन की तरफ आंख उठा कर कोई देखेगा भी नहीं.

‘‘चौधरी की मौत से हमारा परिवार ताकतवर हो गया है. सब से ज्यादा खुश होेंगे तुम्हारे बाबा… अब कोई भी गांव की बहूबेटियों की तरफ बुरी नजर डालेगा, तो वह सोचेगा, कहीं कोई और जमना किसी चौधरी को फिर काट न दे?’’ सुघरी फख्र से बोली.

उन्होंने स्टेशन की तरफ देखा. गाड़ी आ चुकी थी और हरी बत्ती जल गई थी. जल्दीजल्दी दोनों ने सामान समेटा और स्टेशन की तरफ दौड़ पड़े. Story in Hindi

-उदय भानु राय

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में सामाजिक न्याय की हत्या

West Bengal Politics. पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण को 27 फीसदी से घटा कर महज 7 फीसदी कर दिया गया है. यह फैसला सामाजिक न्याय के खिलाफ एक बड़ा हमला है. पिछड़े वर्गों के लिए लड़ाई लड़ने वाले लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि यह फैसला गरीबों, दलितों और पिछड़ों की तरक्की को रोकने की साजिश है. राज्य सरकार का कहना है कि यह बदलाव अदालत के निर्देशों और पुरानी ओबीसी सूची के मुताबिक किया गया है, लेकिन इस फैसले ने सामाजिक न्याय को ले कर गंभीर बहस छेड़ दी है.

आरक्षण कोई दान नहीं है. ऐसे में अगर ओबीसी आरक्षण का दायरा अचानक बहुत छोटा कर दिया जाए तो इस का सब से बड़ा असर उन्हीं गरीब और पिछड़े परिवारों पर पड़ेगा जो सरकारी नौकरियों और पढ़ाईलिखाई में आरक्षण के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे.

इस मुद्दे को केवल हिंदू बनाम मुसलमान बना कर देखना भी सही नहीं होगा. सरकार ने केवल 66 पुरानी ओबीसी जातियों को मान्यता देते हुए 7 फीसदी आरक्षण लागू किया. इस का मतलब यह है कि जिन हिंदू या मुसलिम जातियों को पहले ओबीसी का फायदा मिल रहा था, वे अब उस से बाहर हो जाएंगी, इसलिए इस फैसले का असर केवल मुसलिम तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी पिछड़े वर्गों पर पड़ेगा जो पहले इस व्यवस्था का हिस्सा थे.

यह नहीं भूलना चाहिए कि पश्चिम बंगाल के मुसलिम मूल रूप से पिछड़े और दलित थे जो सदियों पहले ब्राह्मणवादी समाज के कहर से निकलने के लिए इसलाम की शरण में चले गए थे.

सवाल यह है कि अगर किसी समाज को पहले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा माना गया था तो किस आधार पर उन्हें बाहर किया गया? क्या ओबीसी की लिस्ट से बाहर करने के लिए कोई नया और वैज्ञानिक सर्वे नहीं होना चाहिए था? क्या पूरे आरक्षण को घटा देना सामाजिक न्याय का समाधान है?

भारत का संविधान समान अवसर की बात करता है. अगर किसी सूची में गड़बड़ी थी तो उस का समाधान निष्पक्ष सर्वे, पारदर्शी प्रक्रिया और पिछड़ेपन के वैज्ञानिक आकलन से निकलना चाहिए था न कि ऐसे फैसले से जिस से लाखों ओबीसी नौजवानों के पढ़ने और रोजगार के संवैधानिक रास्ते ही बंद हो जाएं.

सामाजिक न्याय का उद्देश्य किसी धर्म को लाभ या नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि वास्तविक सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना है, इसलिए जरूरत इस बात की है कि ओबीसी सूची का निर्धारण राजनीतिक प्रेरणा के बजाय स्वतंत्र आयोग, सामाजिक सर्वे और संवैधानिक मानकों के आधार पर हो, तभी आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य समान अवसर और सामाजिक न्याय को पूरा कर सकेगी.

यह भाजपा की घटिया राजनीति का नतीजा है. हिंदुत्व की आंधी में सामाजिक न्याय के परखच्चे उड़ा दिए गए. इस फैसले से लाखों पिछड़े परिवारों का भविष्य अंधकार में चला गया. सरकारी नौकरियों और पढ़ाईलिखाई में उन की जगह छिन गई.

दुख की बात यह है कि ओबीसी के नेता चुप हैं. हिंदुत्व की लहर में वे भी बह गए हैं. वे अब खुद को हिंदू मान कर आरक्षण की लड़ाई भूल गए हैं. जो वर्ग सदियों से शोषण का शिकार रहा उसे अब फिर से पीछे धकेल दिया गया है. पिछड़े वर्गों को पढ़ाईलिखाई और नौकरी में बराबरी का मौका मिलना चाहिए. 7 फीसदी आरक्षण इतना कम है कि ज्यादातर नौजवान प्रतियोगिता में टिक ही नहीं पाएंगे.

भाजपा में सैकड़ों सांसद,  पार्षद, विधायक, सरपंच हैं, जो सत्ता का मजा तो ले रहे हैं पर अपने ही समाज के हक छीने जाने पर चुप हैं. ये विभीषण और सुग्रीव हैं जो अपने भाइयों का गला कटते देख कर खुद खुश हैं.

भाजपा सरकार ने कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है, लेकिन असल में यह मुसलिम और अन्य पिछड़े समुदायों को टारगेट करने की राजनीति है. सामाजिक न्याय सब के लिए होना चाहिए, किसी एक धर्म या जाति के लिए नहीं. ओबीसी नौजवान अब बेरोजगारी और निराशा में जीने को मजबूर होंगे. उन के सपने टूट गए हैं. जब देश में सामाजिक न्याय की बात होती है तो आरक्षण सब से बड़ा हथियार होता है. इसे कमजोर करना गरीबों के साथ धोखा है.

पश्चिम बंगाल में ओबीसी के आरक्षण का इतिहास मंडल आयोग से जुड़ा है, लेकिन इस राज्य में इस की अपनी खास यात्रा रही है. 1980 में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद 1990 में केंद्र सरकार ने ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू किया लेकिन पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक वामपंथी सरकार रही जिस में ओबीसी आरक्षण बहुत सीमित था क्योंकि तब राज्य में जाति आधारित पिछड़ापन को अलग तरीके से देखा जाता था.

साल 1993 में पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ. साल 1994 में पहली बार सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 5 फीसदी आरक्षण लागू किया गया, जो बाद में बढ़ कर 7 फीसदी हो गया. इस समय 66 जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया. ये ज्यादातर हिंदू पिछड़ी जातियां थीं. राज्य में कुल आरक्षण की सीमा 50 फीसदी के आसपास रखी गई लेकिन इन में ओबीसी के लिए 7 फीसदी ही रहा.

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने साल 2010 के बाद ओबीसी सूची में बड़े पैमाने पर नई जातियां जोड़ दीं और कुल ओबीसी आरक्षण 17 फीसदी कर दिया गया. ममता बनर्जी ने 2 श्रेणियां बनाईं. ओबीसी-ए के लिए 10 फीसदी

और ओबीसी-बी के लिए 7 फीसदी. इस दौरान तकरीबन 113 जातियां शामिल की गईं, जिन में मुसलिम जातियां भी थीं. सरकार का तर्क था कि इस से सभी वर्गो के पिछड़ों को लाभ मिलेगा.

मई, 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने साल 2010 के बाद जोड़ी गई सभी जातियों को अमान्य करार दे दिया. कोर्ट ने कहा कि इन समुदायों को ओबीसी बनाने के लिए उचित सर्वे, डाटा और पिछड़ापन का वैज्ञानिक आकलन नहीं किया गया था. कई मामलों में धर्म को आधार माना गया जो संविधान के खिलाफ है. कोर्ट ने 2010 से पहले की 66 जातियों को बरकरार रखा और कुल ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी तक सीमित कर दिया.

जून, 2026 में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को लागू किया. विधानसभा में 2 बिल पास कर ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी पर वापस लाया गया और साल 2010 से पहले की मूल 66 जातियों को ही मान्यता देते हुए नई सूची जारी कर दी गई. इस से भाजपा को सब से बड़ा फायदा यह हुआ कि साल 2010 के बाद जोड़ी गई मुसलिम जातियां ओबीसी के दायरे से बाहर हो गईं.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक

50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं होना चाहिए. पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण हमेशा दूसरे राज्यों से कम रहा. ममता बनर्जी ने 7 फीसदी से बढ़ा कर 17 फीसदी किया.

तृणमूल कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय बताती रही, जबकि विपक्ष और कोर्ट ने इसे अनुचित वोट बैंक पौलिटिक्स कहा. अब भाजपा ने कोर्ट के आदेश के बहाने मुसलिमों को ओबीसी से बाहर कर दिया लेकिन इस से नुकसान सिर्फ मुसलिमों को ही नहीं हुआ क्योंकि साल 2010 में जोड़ी गई लगभग 50 जातियों में ज्यादातर तो हिंदू जातियां ही थीं.

पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार को समझना चाहिए कि आरक्षण कोई भीख नहीं है, बल्कि यह सभी पिछड़ों को मिलना चाहिए. सरकार को यह सम?ाना चाहिए कि सामाजिक न्याय के बिना विकास अधूरा है.Reality

Hindi Social Story : संस्कार

Hindi Social Story. अदिति को क्या पता था कि जिस छात्रा को वे उस की छोटी जाति होने के कारण पसंद नहीं करती थीं, एक दिन उसी की शरण में उन्हें जाना पड़ेगा. फिर क्या हुआ?

‘‘है लो, क्या मैं कमलाजी से बात कर सकती हूं?’’ उधर से जवाब मिला, ‘‘जी नहीं, वे बाहर गई हैं.’’

‘‘कब तक वापस आएंगी?’’

जवाब मिला, ‘‘एक हफ्ते बाद… वैसे आप को क्या काम है?’’

मैं ने बताया कि मेरा एक बहुत ही जरूरी काम है. तब उन की सैक्रेटरी ने कहा, ‘‘मैडम, पहले आप मिलने का वक्त तय कर लीजिएगा.’’

मैं ने हफ्तेभर बाद का समय लिया और फोन रख दिया.

मेरे माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. मुझे अपने बेटे सौरभ का कैरियर बरबाद होता नजर आ रहा था. जन कल्याण केंद्र दिल्ली की मानी हुई संस्था थी. वह अनगिनत लोगों को इंसाफ दिलाती आ रही थी. कमला देवी, यानी उस केंद्र की अध्यक्ष की पहुंच प्रधानमंत्री तक थी.

हफ्तेभर बाद जब मैं जन कल्याण केंद्र के दफ्तर में कमलाजी के सामने पहुंची, तो वे बोलीं, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’

मैं ने देखा तो देखती ही रही. नजरें मानो हटना ही नहीं चाहती थीं. मैं ने कहा, ‘‘अरे कमलाजी, आप… आप ने शायद मुझे पहचाना नहीं. याद है, आप मेरी ही क्लास में थीं?’’

कुछ पल वे सोचती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘अरे हां, आप अदिति मैडम हैं न?’’

मुझे संतोष हो गया कि चलो, अपना काम तो बना. कमला बोलीं, ‘‘हां, बताइए, क्या काम है?’’

‘‘कमलाजी, मेरा बेटा सौरभ इंजीनियरिंग के आखिरी साल का छात्र है…’’

वे बोलीं, ‘‘मैडम, मैं वही कमला हूं, आप की छात्रा… मुझे ‘जी’ न कहें.’’

मैं कुछ देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘अभी कुछ दिन पहले कालेज में होने वाली हड़ताल को रोकने वाले छात्रों में मेरा बेटा भी था. वे चाहते थे कि हड़ताल न हो, मगर कालेज के दादा किस्म के छात्र हड़ताल के मूड में थे.

‘‘काफी मारपीट के बाद जब मामला प्रिंसिपल तक पहुंचा, तो उन्होंने भी सौरभ को बिना बात दोषी ठहराते हुए कालेज से निकाल दिया.

‘‘गुंडों का मुखिया यहां के उद्योगपति का एकलौता बेटा है और उस के पिता से कालेज को काफी तगड़ी इमदाद मिलती है, इसलिए प्रिंसिपल भी उस से दबता है.

‘‘अब तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं… मेरे बेटे की तो जिंदगी ही अंधेरे में डूबती नजर आ रही है, जबकि वह हर साल अव्वल आता है. अब तो बस आप ही कुछ कर सकती हो, क्योंकि उस गुंडे के पिता की पहुंच काफी है.’’

वे चुपचाप बैठी सुनती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘आप उस लड़के का नाम, पिता का नाम, अपने बेटे का नाम व कालेज के बारे में लिख कर दे दें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगी.’’

मैं ने जरूरी जानकारी लिख कर दी और विदा ले कर चली आई. जब घर पहुंची, तो दिल कुछ पुरानी यादें सोचने को मजबूर था…

तब मैं 7वीं क्लास की टीचर थी. एक दिन देखा, मेरी क्लास में एक नई लड़की आई थी. वह सहमीसहमी सी चुपचाप बैठी थी. मालूम हुआ कि हमारे स्कूल के सफाई कर्मचारी की लड़की थी.

मैं ने सोचा, ‘अब पढ़ाना तो पड़ेगा ही. क्या जमाना आ गया कि ब्राह्मण भी अब ‘अछूतों’ को पढ़ाएंगे. सत्यानाश हो इस सरकार का, हमारा तो धर्म ही भ्रष्ट कर दिया.’

उसी क्लास में कुछ तेज लड़कियों की एक टोली थी. वे सब मेरी ही कालोनी में रहती थीं. प्रमिला उन सब की मुखिया थी और मेरी सब से ज्यादा मुंहलगी छात्रा थी.

उसी शाम प्रमिला अपने मातापिता के साथ हमारे घर आई, तो मैं ने बताया कि आज हमारी क्लास में एक अछूत लड़की आई है. पता नहीं, मैं उसे कैसे पढ़ा पाऊंगी. मेरा तो दिल ही नहीं कर रहा कि मैं स्कूल जाऊं. गंदी, अछूत… प्रमिला मेरी बातें गौर से सुन रही थी.

अगले दिन जब कमला स्कूल आई, तो वह लड़कियों से बोली, ‘मैं भी खेलूंगी.’

तभी प्रमिला बोल पड़ी, ‘नहीं, हम तुम्हें नहीं खिलाएंगे. दूर हटो.’

वह बेचारी सहम कर एक तरफ खड़ी हो गई. वह खेल देखती रही. उस की आंखों में भी अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ खेलने की चाह उभरती, मगर कोई उस से बात तक न करता. अछूत जो ठहरी, बेचारी.

क्लास में यह मालूम होते ही कि वह स्कूल के सफाई कर्मचारी की बेटी है, सब उस से दूरदूर रहतीं. वह चुपचाप अकेले खाना खाती. अकेली रहती. सब लड़कियां खूब चिढ़ातीं, तो उस की आंखों में आंसू भर आते.

मैं सारी बात जानती थी, मगर चुप रहती. सोचती, अच्छा है, खुद परेशान हो कर स्कूल छोड़ देगी, तो बवाल कटेगा.

एक दिन वह हिम्मत कर के प्रमिला से बोली, ‘मुझे भी अपने साथ खेलने दो न.’

प्रमिला फौरन बोली, ‘तुम अछूत हो, तुम हमारे साथ नहीं खेल सकती.’

उस की समझ में नहीं आया, तो वह बोली, ‘प्रमिला, यह अछूत क्या होता है?’

प्रमिला बोली, ‘यह तो मुझे भी नहीं पता… कल अपने मातापिता से पूछ कर बता दूंगी.’

कमला बेचारी चुपचाप वापस क्लास में चली गई.

अगले दिन प्रमिला ने सब के सामने बताया, ‘पता है, अछूत कौन होते हैं? जो गंदे होते हैं, उन्हें अछूत कहते हैं. तुम सब से ही ज्यादा गंदी लड़की हो, तभी तो हम तुम्हें नहीं खिलाते.’

कमला अपने साफसुथरे हाथों और कपड़ों की तरफ देखती हुई बोली, ‘लेकिन मैं तो रोज नहाती हूं, साफ कपड़े पहनती हूं… फिर मैं गंदी कैसे हुई?’

प्रमिला बोली, ‘यह तो हम नहीं जानते, मगर दूर हटो, हम से मत बोला करो.’

कमला रोती हुई मेरे पास आई और सारी बात बताई. पर मैं ने उसे ही डांट दिया, ‘वे सब ठीक ही तो कह रही हैं. चलो, चुपचाप बैठो. ज्यादा शिकायतें मत लगाया करो.’

उस बेचारी का दिल तो वैसे ही दुखी था. मेरी डांट से वह और भी सहम गई.

कुछ वक्त बाद सालाना इम्तिहान का नतीजा निकला, तो कमला अव्वल रही.

कमला ने अब 8वीं क्लास में दाखिला लिया. मैं उस को हिंदी पढ़ाती थी. एक दिन मैं ‘गंगा’ नामक पाठ पढ़ा रही थी. उस में लिखा था, ‘गंगा में स्नान करने से सब ‘पवित्र’ हो जाते हैं, सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं, सब शुद्ध हो जाते हैं.’

उस के कुछ दिनों बाद गंगा स्नान की छुट्टियां पड़ीं. जब स्कूल खुला, तो मैं ने देखा, कमला बहुत खुश थी. वह क्लास में बैग रख कर भागीभागी लड़कियों के पास गई और जोरजोर से बोली, ‘अब तो मैं भी खेलूंगी. पता है प्रमिला, अब की बार मैं ने अपने बाबा से खूब जिद की कि वे मुझे गंगा नहला दें. अब तो मैं गंदी भी नहीं रही. मैं तो शुद्ध हूं. याद है, उस दिन मैडम पाठ में यही बातें पढ़ा रही थीं.’

सब लड़कियां चुप थीं. वे सब मेरे पास आईं, तो कमला भी साथ में थी. सब ने वही बात बताई, जो मैं पहले ही सुन चुकी थी.

अचानक कमला आगे आ कर बोली, ‘मैडम, अब तो मैं इन के साथ खेल लूं? अब तो मैं गंगा नहा आई.’

मगर मेरे दिमाग में बचपन से ही जाति भेद घुट्टी की तरह पिलाया गया था, वह उस वक्त बुरी तरह से उबाल मार रहा था. मैं बिगड़ कर बोली, ‘गंगा भी तुम ने गंदी कर दी… तुम तो फिर भी वही अछूत हो.’

यह सुन कर वह रोने लगी और भाग कर क्लास में चली गई.

मैं ही नहीं, हर टीचर उसे इसी निगाह से देखती थीं. बात आईगई हो गई. कमला 2 साल बाद उसी दबेघुटे माहौल में रह कर, तमाम तकलीफों के बावजूद हाईस्कूल के इम्तिहान में जिलेभर में अव्वल आई. उसी दौरान मेरे पति का तबादला हो गया.

अब उसी कमला को इस रूप में देख कर मैं बीती बातों को याद कर के सिहर गई थी.

मेरे रिटायर इंजीनियर पति सीधेसादे, शरीफ इनसान थे. वे अपने बेटे का केस उस उद्योगपति से कभी भी नहीं जीत सकते थे. ऐसी हालत में मेरी सारी उम्मीदें ‘जन कल्याण केंद्र’ पर टिकी थीं.

तकरीबन 15 दिन गुजर गए, मगर कमला देवी की तरफ से कोई खबर न आई. मुझे यकीन हो गया कि कमला देवी मेरा काम नहीं करेंगी.

एक दिन टेलीफोन की घंटी बजी. मैं ने फोन उठाया, तो कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम नमस्ते, माफ कीजिएगा, मैं दूसरे कामों में मशगूल थी, मगर आप की ओर से लापरवाह हरगिज नहीं थी. आप का काम होने ही वाला है. क्या आप कल मेरे दफ्तर आ सकती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘बताओ, कब आऊं?’’

वे बोलीं,  ‘‘दोपहर को किसी भी समय आ जाइएगा.’’

अगले दिन दोपहर को जब मैं कमला देवी के दफ्तर पहुंची, तो उन्होंने उठ कर मेरा स्वागत किया और चाय को पूछा.

मैं सकुचा गई, तो वे बोलीं, ‘‘नहीं मैडम, ऐसा कुछ नहीं है. मैं पंडितजी से कह कर चाय मंगवाऊंगी.’’

मैं शर्म से जमीन में गड़ी जा रही थी. मगर कमला देवी साफ दिल की थीं, इसलिए उन का इरादा मेरी बेइज्जती करने का नहीं था.

जब चाय आई, तो मैं ने चुपचाप उठा कर पी ली. फिर मैं ने उन से पूछा,  ‘‘अब बताओ, आप इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं?’’

वे सोचते हुए बोलीं,  ‘‘मैडम, मैं एमए तक लगातार अव्वल आई. जब शादी की बात चलती, तो कोई अच्छा लड़का नहीं मिला. इस बीच मेरे बाबा की मौत हो गई. मैं ने बहुत सोचासमझा और फिर यहां दिल्ली में आ कर यह  ‘जन कल्याण केंद्र’ खोल कर जनता की सेवा में जुट गई.

‘‘पहले यह एक छोटी सी संस्था थी, मगर मैं ने अपना तनमनधन इस में लगा दिया. बहुत मेहनत की… नतीजा आप देख ही रही हैं.

‘‘जहां तक शादी करने का सवाल था, तो मेरे साथ समाजसेवा करने वाला कोई मिलता ही न था. फिर किसी और जाति का होता, तो मुझ अछूत से शादी कैसे करता? चाहे मुझ में लाख गुण सही, मगर जाति से तो मैं अछूत ही थी.’’

मैं नजरें झुकाए सब चुपचाप सुनती रही, फिर बात बदलते हुए मैं ने पूछा,  ‘‘अच्छा, यह तो बताओ, आप ने मेरा काम इतनी जल्दी कैसे कर दिया?’’

वे बोलीं, ‘‘मैडम, आप ही पढ़ाया करती थीं,  ‘‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु…’’

उन के इन लफ्जों से एक तमाचा सा मुझे लगा. मुझे महसूस हुआ, जैसे एकबारगी मेरा वजूद हिल गया है. मेरे पढ़ाए को जिंदगी में उतारने वाली इस अछूत कन्या की दया की याचिका अब मैं खुद थी, जो खुद तो सारी उम्र सब को पढ़ाती रही, लेकिन खुद उस को अपनी जिंदगी में उतार न पाई.

मैं पसीने से भीग गई. उस पल चाहा कि जमीन फट जाए और मैं उस में समा जाऊं. अपनी  ‘गंगा’ वाली बात याद कर के तो मैं शर्म से पानीपानी हो गई और बोझिल मन से घर वापस आ गई.

कमला देवी की कोशिशों के कारण ही उस गुंडों के मुखिया को कालेज से निकाल दिया गया था और मेरे बेटे को दोबारा दाखिला मिल सका.

अगले दिन मैं ने कमला देवी को फोन किया,  ‘‘मैं जानती हूं, आप हमेशा काम में जुटी रहती हैं… मगर क्या आप समय निकाल कर शाम को मेरे घर आ सकती हैं?’’

वे बोलीं, ‘‘जी मैडम, मैं जरूर आऊंगी.’’

मैं शाम होने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी.

कमला देवी जब अपनी गाड़ी से उतरीं, तो मैं उन्हें आदर से अंदर ले गई और खुद चाय बना कर लाई.

कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम, आप ने क्यों इतनी परेशानी उठाई?’’

‘‘मैं किन शब्दों में आप का धन्यवाद करूं…’’

कमला देवी हंसती हुई बोलीं,  ‘‘मैडम, यह आप को क्या हो गया है?’’

मैं लाजसंकोच छोड़ कर बोली,  ‘‘सच, आज आप को देख कर लगता है कि आप कितनी निर्मल, कितनी पवित्र थीं? अगर आप गंदे तालाब को भी छू दो, तो वह गंगा बन जाए.’’

वे चुप रहीं. कुछ देर बातें करने के बाद जब वे विदा ले कर चलीं, तो उन की तरफ देखते हुए मुझे लग रहा था कि उन के ऊपर मेरे द्वारा चिपकाया गया  ‘अछूत’ नाम का धब्बा तेजी से धुंधला होता जा रहा था.  Hindi Social Story

— वंदना कश्यप

Short Story in Hindi : अलाव की आंच

Short Story in Hindi. सत्यप्रकाश के नाम में ही ‘सत्य’ था. यही उस की सब से बड़ी ताकत भी थी और कमजोरी भी. सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटतेकाटते उस की चप्पलें घिस चुकी थीं. उस ने देखा था कि कैसे एक गरीब किसान अपने हक के मुआवजे के लिए बाबू के सामने गिड़गिड़ा रहा था और वहीं दूसरी ओर एक रसूखदार आदमी नोटों की गड्डी थमा कर चंद मिनटों में अपना गलत काम करवा कर मुसकराते हुए निकल गया था.

सत्यप्रकाश का खून खौल उठता था. जब उस ने एक दिन दफ्तर में हो रहे इस नाइंसाफी के खिलाफ गुस्से में आवाज उठाई तो सिस्टम ने मिल कर उसी पर ‘सरकारी काम में बाधा डालने’ का आरोप मढ़ दिया. ऊंची पहुंच वालों के सामने सिस्टम नतमस्तक था और सत्य अकेला खड़ा था.

इस सिस्टम को बदलने और लोगों का दुखदर्द दूर करने के लिए सत्यप्रकाश ने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा.

उस ने तय किया कि वह नाइंसाफी के खिलाफ लड़ेगा, लेकिन यह राह कांटों भरी थी.

सत्यप्रकाश ने जब एक भ्रष्ट अफसर व स्थानीय नेता के गठजोड़ के खिलाफ मोरचा खोला तो मुश्किलें उस के दरवाजे पर दस्तक देने लगीं. धमकियां, झूठे मुकदमे और अपनों का दूर होना… सब एकसाथ शुरू हुआ.

एक शाम जब सत्यप्रकाश थकाहारा चाय की दुकान पर बैठा था, इलाके के एक बुजुर्ग रामदीन चाचा उस के पास आए. रामदीन चाचा ने उस के कंधे पर हाथ रखा और धीमी आवाज में कहा, ‘‘सत्य, क्यों इस सेवा के कीचड़ में कूदे हो बेटा? आज का सिस्टम भ्रष्ट है. यहां जो नेताओं के चाटुकार हैं, घूसखोर हैं, बेईमान हैं, वे ही सुखी हैं. गलत लोगों की तरह बड़ी पहुंच बनाओ, अपना घर भरो… वरना भरत भूषण तिवारी की तरह मार दिए जाओगे.’’

सत्यप्रकाश ने चौंक कर रामदीन चाचा की तरफ देखा. रामदीन चाचा की आंखों में खौफ और तजरबा दोनों था.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘दुनिया का यही दस्तूर है सत्य, अपना उल्लू सीधा करो, सुखी रहोगे. इस मुगालते में मत रहना कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा होगा. अगर तुम मार दिए गए तो यही मोमबत्तियां उठाने वाले समाजसेवी तुम्हारे नाम पर अपनी रोटियां सेंकेंगे, अपना उल्लू सीधा करेंगे, लेकिन जीतेजी तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा. सब तमाशबीन हैं.’’

चाचा की बातें सत्यप्रकाश के सीने में तीर की तरह चुभ गईं. उस रात वह सो नहीं सका. वह खिड़की के पास खड़ा हो कर अंधेरे आसमान को निहारता रहा. उस के मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘देश में यह सब क्या हो रहा है? जहां ईमानदारी एक गुनाह बन गई है और बेईमानी एक काबिलीयत? कैसे सुधार होगा इस सिस्टम का? क्या वाकई इस अंधेरे से जीतने का कोई रास्ता नहीं है?’

तभी सत्यप्रकाश को अपने भीतर से एक आवाज सुनाई दी. उसे याद आया कि निराशा के सब से घने दौर में भी इनसान को अपने अंदर की उम्मीद को मरने नहीं देना चाहिए. हालात चाहे जितनी भी उलट हों, हवाएं चाहे जितनी भी खिलाफ हों, हार मान लेना कोई औप्शन नहीं था.

सत्यप्रकाश ने मन ही मन कहा, ‘प्रवाह में ठहराव है, मंजिल नहीं, पड़ाव है… रात भले ही सारी पड़ी हो और बाहर का अलाव बुझा सा हो, लेकिन मैं अपने भीतर के अलाव को बुझने नहीं दूंगा…’

सत्यप्रकाश को समझ आ गया कि सुधार रातोंरात नहीं होगा और न ही यह लड़ाई आसान है. लेकिन अगर हर कोई डर कर अपना उल्लू सीधा करने में लग गया तो यह समाज पूरी तरह अंधकार

में डूब जाएगा. भरत भूषण तिवारी जैसे लोगों की शहादत बेकार न जाए, इस के लिए किसी न किसी को तो मशाल थामे रखनी होगी.

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण सड़कों पर पड़ी तो सत्यप्रकाश की आंखों में निराशा के आंसू नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था. उस ने अपनी डायरी उठाई, चप्पल पहनी और एक बार फिर नाइंसाफी के खिलाफ गवाही देने के लिए घर से निकल पड़ा. वह अकेला था, पर अब उसे भीड़ की परवाह नहीं थी.

Political Analysis: दबेकुचले तिलचट्टों ने निकाला सरकार का तेल

Political Analysis. 25 जुलाई, 2026 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया. सोशल मीडिया पर कौकरोच जनता पार्टी के नाम से बने एक पेज ने देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उसी पेज पर लिखवा लिया और नई पीढ़ी का भविष्य तय करने वाले नेताओं को जता दिया कि हर काम में वाहवाही लूटने वाले सत्ताधारियों को अपनी नाकामियों की जवाबदेही भी लेनी होगी.

दबेकुचले कौकरोचों ने चूलें हिलाईं

6 जून, 2026 को दिल्ली के जंतरमंतर से शुरू हुए इस आंदोलन को पहले किसी ने सीरियसली नहीं लिया. अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपके नाम के एक नौजवान ने डाक्टरी से जुड़ी नीट परीक्षा में हुई धांधली को ले कर नौजवान पीढ़ी को धरने पर आने का न्योता दिया तो ज्यादा चहलपहल नहीं हुई.

फिर सोनम वांगचुक ने अनशन शुरू किया तो लोगों के कान खड़े हुए और जब अचानक से एक दिन जब दिल्ली पुलिस उन्हें धरने वाली जगह से उठा कर ले गई तब इस आंदोलन ने अंगड़ाई ली और 20 जुलाई को जंतरमंतर से संसद तक के मार्च पर पुलिस ने छात्रों पर लाठियां भांजी तो देशभर में छात्र एकजुट होने लगे.

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क्या हुआ 20 जुलाई को

अभिजीत दीपके की अगुआई में नौजवान नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को ले कर जंतरमंतर से संसद की ओर बढ़ रहे थे. वहां सुबह से भारी भीड़ थी. पुलिस प्रशासन द्वारा इंटरनैट पाबंदियों और तमाम तरह की रोक के बावजूद हजारों की तादाद में छात्र और युवा इस प्रदर्शन में शामिल हुए थे.

तथाकथित बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश के बाद पुलिस और सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बल प्रयोग और लाठीचार्ज किया. कुछ जगहों पर भीड़ द्वारा पथराव, बैरिकेड तोड़ने और पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाएं हुईं, जिस से कई जवान और प्रदर्शनकारी घायल हो गए. नतीतजन, पुलिस ने इस मामले में हत्या के प्रयास और दंगे जैसी गंभीर धाराओं के तहत कई एफआईआर दर्ज कीं.

पुलिस और सरकार ने इलजाम लगाया कि इस आंदोलन में छात्र कम थे और असामाजिक तत्व ज्यादा तो यह मार्च अपने मकसद से भटक गया, इसी वजह से पुलिस को ये कड़े कदम उठाने पड़े.

बदला आंदोलन का चेहरा

20 जुलाई की अराजकता के बाद 23 जुलाई तक यह आंदोलन पूरी तरह से बदल गया. पहले तो सिर्फ जेन जी जंतरमंतर पर दिखाई देते थे, पर इस के बाद जीवन के हर क्षेत्र से आए युवा एकजुटता दिखाते हुए, एकदूसरे का खयाल रखते हुए और आंदोलन की जिम्मेदारी लेते हुए वहां पहुंचे. बिहार में तो पूरा माहौल ही बदल गया था.

जंतरमंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी. जो लोग आंदोलन की जगह पर नहीं जा पा रहे थे, वे सोशल मीडिया के जरीए रील्स देख कर वहां की पलपल की खबर ले रहे थे. सोशल मीडिया अब गोदी मीडिया पर हावी होने लगा था. हर किसी के हाथ में मोबाइल का कैमरा चालू था और वह हर छोटी से छोटी बात को भी इंस्टाग्राम पर अपलोड कर रहा था. नतीजतन, छात्रों के लिए खाना भेजने वालों की तादाद भी बढ़ गई थी.

वंचित समाज के नौजवानों ने झेली लाठियां

दिल्ली में चूंकि हर तबके के नौजवान जंतरमंतर पर जा रहे थे, पर बिहार जैसे राज्य में पुलिस से लोहा लेने वाले छात्रों में उस वंचित समाज के बच्चे थे जो पढ़ाई को अपना हथियार बना कर अपनी तरक्की करते हैं.

नीट परीक्षा में तथाकथित धांधली के विरोध में दिल्ली के जंतरमंतर से शुरू हुआ आंदोलन अब बिहार के कई जिलों में तेज होता गया. जहानाबाद, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर के बाद गया शहर में भी बड़ी तादाद में छात्र सड़कों पर उतर आए थे. प्रदर्शन के दौरान कई इलाकों में दुकानें बंद कराई गई थीं, प्रमुख सड़कों पर जाम लग गया था और प्रशासन को भारी पुलिस बल के साथ मोरचा संभालना पड़ा था.

अगर आप गौर से देखेंगे तो इस आंदोलन की अगुआई वंचित समाज के उन नौजवानों ने की थी, जो किसी अमीर ऊंचे तबके की औलाद नहीं थे. शरीर से दुबलेपतले लड़केलड़कियों ने उसी पुलिस से लोहा लिया, जिन में उन्हीं के समाज के कर्मी ज्यादा थे. कहने का मतलब है कि एक ही समाज के लोग आमनेसामने थे, पर वे छात्र तो मानो सिर पर कफन बांध कर आए थे.

ऐसे छात्र तो मानो पुलिस का इम्तिहान ले रहे थे और बोल रहे थे कि कर लो कितना जुल्म कर सकते हो, निकाल लो अपनी भड़ास, पर न झुकेंगे और न ही घर जाएंगे. यही वजह थी कि ऐसे छात्र पुलिस से ही कह रहे थे कि अगर लाठियां भांजनी हैं, तो 10 मिनट पहले बता देना, हम वार्मअप कर लेंगे. उन्होंने पीले रंग के बैरिकेड्स की रेल बना कर रोड पर दौड़ाया, जिस से प्रशासन की हिम्मत की कलई का चांदी रंग काला पड़ गया.

डेढ़ पसली के वे गेहुएं रंग के कौकरोच पुलिस के सामने ऐसे फुरती से इधरउधर कूदफांद रहे थे कि खाकी के रखवालों को यह नहीं सूझ रहा था कि आधा पेट खाना खाने वालों में इतनी गजब की ताकत और जोश कहां से आ गया है.

सोशल मीडिया पर आए हजारों वीडियो में साफ दिखा कि दिल्ली का जंतरमंतर हो या पटना की सड़कें फ्रंट पर वे नौजवान थे, जिन के कंधे पर 300-400 रुपए का बैग टंगा था, जिस में शायद कोई मुड़ातुड़ा पोस्टर होगा, एक जोड़ी कपड़े होंगे, टूथपेस्ट और टूथब्रश होगा और होंगे वे सपने जो किसी परीक्षा के लीक होने से बह गए थे.

मामला सिर्फ पेपर लीक नहीं

यह आंदोलन सिर्फ पेपर लीक से जुड़ा नहीं था, बल्कि नौजवान पीढ़ी की वह भड़ास थी, जिसे कोई नहीं समझ पा रहा था. केंद्र सरकार से नाराजगी इस का एक पक्ष था, जबकि यह पीढ़ी अपने समाज और धर्म की बंदिशों की भी सताई हुई है.

घर पर मांबाप इन्हें हर बात के लिए कहते हैं यह हमारे पिछले जन्म का नतीजा है कि हम उस समाज में पैदा हुए, जो अगड़ों की जीहुजूरी करने के लिए बना है. धर्म के ठेकेदारों के बहकावे में वे कहते हैं कि पढ़ाईलिखाई से ज्यादा जरूरी कांवड़ यात्रा में जा कर गंगाजल लाने से भला होगा, कलश यात्रा में हिस्सा लेने से आप का यह जन्म सुधर जाएगा.

देखा जाए तो ऐसे बच्चों की अपने परिवार के साथ संवाद करने की ताकत भी न के बराबर है. इस में इन की गलती नहीं है, क्योंकि समाज का ढांचा ही ऐसा बना दिया गया है कि वंचित समाज को किसी भी तरीके से पंगु बना दिया जाए. वे विचार से इतने ज्यादा कुंद हो जाएं कि अगर कभी कोई बात कहना भी चाहे तो उसे निपट मूर्ख कह कर चुप करा दिया जाए. अगर वह जय भीम का नारा लगाए तो उसे हेय समझ कर ग्रुप से ही बेदखल कर दिया जाए. अगर वह खुद को हिंदू न कहे तो उसे मुसलिम का साथी बता कर बाहरी साबित किया जाए.

इस आंदोलन में एक सवाल यह भी उठा था कि पुलिस वालों की वरदी पर उन के नाम क्यों नहीं लिखे हैं? इस की एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि वंचित समाज के आंदोलनकारियों से सामने उन्हीं के समाज के पुलिस वाले खड़े हैं. ऐसे पुलिस वालों के मुंह सिल दिए गए थे, ताकि लाठी, आंसू गैस के गोले और बंदूक बोल सके.

यह आज की बात नहीं है, बल्कि सदियों से यही होता आया है कि अगड़ों द्वारा इन्हीं समाज के लोगों को आमनेसामने कर दिया जाता रहा है. जब देश में जमींदारी प्रथा हावी थी तब जमींदारों के गुरगे इसी तबके के होते थे जो अपनों का ही सिर फोड़ने में अपनी शान समझते थे. इसे ‘सत्ता की दलाली’ न कहें तो और क्या नाम दें?

वंछित समाज और पढ़ाईलिखाई

अगर हालिया आंदोलन की बात करें तो यह भी समझ आता है कि वंचित समाज, जिस में एससी, एसटी और ओबीसी तबके के नौजवान आते हैं, उन का सीधा संबंध पढ़ाईलिखाई के अधिकार, सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता से है. नीट या किसी भी तरह के पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी जैसी घटनाएं सब से ज्यादा उन गरीब, दलित, पिछड़े और आदिवासी परिवारों के युवाओं को प्रभावित करती हैं जो भारी संघर्ष के बाद डाक्टर या फिर कोई बड़ा अफसर बनने का सपना देखते हैं.

पर यह सपना तब सपना रह जाता है जब महंगे कोचिंग संस्थानों और निजी शिक्षा से दूर रहने वाले गांवदेहात के और वंचित वर्ग के छात्र केवल अपनी कड़ी मेहनत और सरकारी संसाधनों पर निर्भर रहने को मजबूर होते हैं. इस से उन में अवसरों की छीनाझपटी देखने को मिलती है.

नतीजतन, पेपर लीक और धांधली के चलते मेधावी और गरीब छात्रों की सीटें पैसे वाले या दबंग वर्ग के लोगों द्वारा प्रभावित हो जाती हैं, जिस से उन का डाक्टर या दूसरा बड़ा अफसर बनने का सपना टूट जाता है.

इस पर अगर परीक्षा रद्द हो जाती है या बारबार टलती है तो एक साधारण परिवार पर कर्ज और मानसिक तनाव का भारी बोझ बहुत ज्यादा बढ़ जाता है.

जंतरमंतर और देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे प्रदर्शनों में वंचित व शोषित समाज के नौजवानों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया, क्योंकि यह उन के लिए केवल एक परीक्षा की नहीं, बल्कि वजूद और हक की लड़ाई बन गई थी.

दुख की बात है कि इस तबके की लड़ाई सिर्फ गरीबी से नहीं है, बल्कि सिस्टम से भी है. बच्चा डाक्टर तो बनना चाहता है पर कोचिंग की फीस कहां से लाए? अगर कहीं से फीस का जुगाड़ कर भी और पेपर लीक हो जाए, तो मेहनत बरबाद और तनाव घर कर लेता है. स्कूलकालेज में भेदभाव झेलना तो आम बात है. स्किल भी ढंग से नहीं मिल पाता है.

समाज भी साथ नहीं देता. गांव से शहर पढ़ने जाओ तो वहां किराए पर कमरा नहीं मिलना, गांव में अलग बस्ती, सोशल मीडिया पर गालियां खाने का शाप लग जाता है. कहीं नौकरी मिल भी जाए तो ‘कोटे वाला’ का टैग लग जाता है. इस आंदोलन को भी देख लीजिए. इसे ‘एक जाति का’ बता कर इसे दबाने की कोशिश की गई थी, पर इस बार यह जेन जी रुका नहीं और जता दिया इस तबके को सदियों से कौकरोच ही समझा गया है पर आज इस तिलचट्टे ने सरकार का तेल निकाल दिया. Political Analysis

Caste Discrimination: दलित दूल्हे के मंदिर पर चढ़ने से बवाल

Caste Discrimination. दलित मंदिर में गया. अगडे़ समाज को यह बात नागवार गुजरी. पंचायत हुई, बीचबचाव किया गया. लेकिन असली सवाल यह है कि मंदिर में जाने से समाज का भला होता है या नहीं?

तमाम कोशिशों के बावजूद राजस्थान राज्य में अभी भी पोंगापंथ और जाति के नाम पर फर्क बरकरार है. इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां आएदिन ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जो इनसानियत को शर्मसार करती हैं.

कभी डायन के नाम पर औरतों की हत्या कर दी जाती है, तो कभी ऊंचीनीची जाति के नाम पर समूची बस्तियां राख कर दी जाती हैं. सरकार की ओर से किए जाने वाले सारे दावे हवाई साबित हो रहे हैं.

बूंदी जिले के नैनवां थाना इलाके के जजावर गांव में दलित दूल्हे के मंदिर पर चढ़ने के मामले को ले कर हुआ बवाल इस का सुबूत है.

एक दलित दूल्हे ने मंदिर में जा कर दर्शनपूजन क्या कर लिया, उस पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. यह मामला सिर्फ मंदिर में दर्शनपूजन करने तक ही नहीं सिमटा है, बल्कि यह इस बात का सुबूत है कि अभी भी भारत में किस तरह से किसी खास जाति को एक दायरे में बांधने की कोशिश की जा रही है.

यह मामला इस बात की भी गवाही दे रहा है कि अभी भी जाति के नाम पर किस तरह से दलितों पर जोरजुल्म हो रहा है.

मामला कुछ यों है कि लक्ष्मीनारायण खटीक के बेटे सुरेश की शादी थी. शादी के दिन सुरेश गांव के बीच बने लक्ष्मीनाथ मंदिर जा पहुंचा. वह मंदिर में पूजा भी नहीं कर पाया था कि किसी ने उसे देख लिया.

इस के अगले ही दिन शुरू हो गया इस परिवार को सताने का खेल. दूसरे दिन पंचपटेलों की बैठक बुलाई गई. इस बैठक में इस बात पर एतराज जताया गया कि एक दलित गांव के मंदिर में कैसे घुस गया. इस से न केवल मंदिर का अपमान हुआ है, बल्कि पूरे गांव की परंपरा टूटी है.

पंचों ने दूल्हे के पिता को पंचायत में बुलाया. पहले तो उसे लताड़ा, उस पर जुर्माना भी लगाया गया. लक्ष्मीनारायण यह दुहाई देता रहा कि गांव का मंदिर है, फिर वह उस में क्यों नहीं जा सकता है?

पंचपटेल अपनी दादागीरी पर उतारू थे. उन्होंने इस मुद्दे को नाक का सवाल बना लिया. उन का गुस्सा इतना बढ़ गया कि बाजार बंद का ऐलान कर दिया गया.

अगले दिन कुंड के चौक में महापंचायत जुटी. इस महापंचायत ने दलित होने के बाद भी मंदिर की चौखट पर कदम रखना अपराध बताया. पहले तो जुर्माना लगाया गया, लेकिन जब लक्ष्मीनारायण ने जुर्माना चुकाने में मजबूरी जाहिर की, तो यह फरमान सुनाया गया कि वे महापंचायत में पूरे गांव के सामने सार्वजनिक रूप से माफी मांगें या गांव छोड़ दें.

इस धमकी से दलित बस्ती के लोग इतना डर गए कि वे गांव छोड़ने का मन बनाने लगे. कुछ लोगों ने दूल्हे और उस के पिता पर माफी मांगने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. रिश्तेदारों ने भी सम?ाया कि गांव में रहना है, तो गलती मान लेनी चाहिए.

इस दौरान महापंचायत के फरमान की बात किसी तरह पुलिस तक पहुंची. लोगों की नजरें बचा कर दूल्हे के पिता लक्ष्मीनारायण ने नैनवां थाने में पनाह ली.

पूरा मामला सुनने के बाद पुलिस गांव में गई, लेकिन गांव में तनाव को देखते हुए वापस आ गई. इस के बाद उपखंड अधिकारी प्रकाश चंद भटनागर, पुलिस उपाधीक्षक प्रेमचंद कुर्डिया, तहसीलदार रमेश चंद्र, नैनवां व देई के थानाधिकारी पूरे लावलश्कर के साथ जजावर गांव पहुंचे.

गांव में भारी फोर्स के बीच एक बार फिर महापंचायत हुई. इस दौरान पुलिस व अफसरों के खिलाफ नारेबाजी करते हुए उन पर दबाव बनाने की कोशिश की गई, लेकिन अफसरों ने दिलेरी दिखाई. उन्होंने पंचपटेलों को कानून का डर दिखाया और साफ तौर पर कहा कि अगर पंचपटेलों ने अपना फरमान वापस न लिया, तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा.

अफसरों की मौजूदगी में एक बार फिर ग्राम पंचायत भवन में पंचायत हुई. इस में गांव के कुछ लोगों ने बीचबचाव किया और दोनों पक्ष सामने बैठे.

इस पंचायत में पुलिस व अफसर मौजूद रहे, फिर भी कुछ लोगों ने लक्ष्मीनारायण पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का दबाव बनाया.

इस बार भी पुलिस ने सख्ती दिखाई. अफसरों ने ऐलान किया कि दलितों को भी मंदिरों में जाने का हक है. पुलिस उपाधीक्षक ने ऐलान किया कि वे लोग भी गिरफ्तार होंगे, जिन्होंने नारेबाजी की है. अगर इस परिवार को किसी तरह का नुकसान होता है, तो भी सख्त कानूनी कार्यवाही की जाएगी.

पुलिस व प्रशासनिक अफसरों के सख्त रुख को देखते हुए पढ़ेलिखे कुछ लोग आगे आए और दोनों पक्षों में लिखित में सम?ौता कराया. इस के बाद पूरे गांव को सम?ौते का मजमून पढ़ कर सुनाया गया.

साथ ही, इस बात के लिए ताकीद की गई कि दोबारा इस तरह की हरकत हुई और किसी दलित परिवार को मंदिर में जाने से मना किया गया या उसे किसी तरह का नुकसान पहुंचाया गया, तो संबंधित शख्स के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी.

समझौते के तहत लक्ष्मीनारायण ने अपनी रिपोर्ट वापस ले ली.

असल में दलितों को तो क्या किसी को भी मंदिरों में जाने की जरूरत नहीं. मंदिरों और दूसरे धर्मों की पूजने की जगहों ने भक्तों से लिया ही है, उन्हें कुछ दिया नहीं. लेते समय हर तरह की चालबाजी की गई, ऊंचनीच सिखाई गई, औरतों के साथ फर्क किया गया, हिंदुओं में जाति का बंटवारा किया गया और दान के नाम पर मोटा पैसा वसूला गया.

दलितों या पिछड़ों को ही नहीं, ऊंचों को भी अपना आज या कल सुधारना है, तो ?ागड़ों की जड़ों इन मंदिरों के पीछे भागना बंद करना चाहिए. असली सुख तो कारखानों, खेतों या दुकानों में काम कर के पैसा कमा कर मिलेगा. इन में ऊंचनीच की जगह है क्या?

Editorial: गहरी पैठ-औरतों को हुनर सिखाने से दूर रखा ताकि गुलाम बनी रहे

Editorial. दिल्ली में एक बस ड्राइवर और उस के साथी पर एक औरत के लगाए रेप चार्ज पर पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. 2012 के केस की याद दिलाते हुए इस औरत का कहना है कि बस 7 किलोमीटर तक चलाई गई जब एकएक कर के 2 जनों ने उस से रेप किया.

इस मामले में पेंच यह है कि यह औरत सैक्स वर्कर का काम कर रही है और रात के 12 बजे के करीब बस में बैठाई गई थी. औरत ने शायद पुलिस रिपोर्ट में लिखाया है कि तय 3,000 रुपए कुछ देर के लिए तय हुए थे पर बस में चढ़ने के बाद बस में सवार 3 लोगों ने रातभर सैक्स करने की मांग 1,500 रुपए में रखी. जब झगड़ा हुआ तो पुलिस थाने में शिकायत की गई.

2012 के मामले में रेप की शिकार स्टूडैंट थी जो अपने साथी के साथ देर शामको जा रही थी जब खाली बस में सवार लोगों ने उन्हें सिर्फ लिफ्ट दी थी पर बाद में लड़के को बाहर फेंक दिया और लड़की को बुरी तरह रौंदा और उस के प्राइवेट पार्ट में रौड तक सिर्फ मजे के लिए डाली.

इस मामले में औरत 4 बच्चों की मां है, उस का आदमी निठल्ला टीबी का मरीज है और पैसा कमाने के लिए वह औरत रात को सैक्स से कमाई के लिए निकली. अपने घरों से दूर रह रहे सैक्स के प्यासों से अकेले, बिना दलाल के बदन बेचना गुनाह नहीं कानून में इसलिए रेप का मामला तो लेनदेन को सुलटाने के लिए नहीं बनाया गया, यह पुलिस को देखना होगा. अगर सुलह पहले से न हो तो अदालतों को सिर खपाना पड़ेगा कि क्या करें.

असल समस्या तो यह है कि औरतों को यह क्यों आज भी कहा जा रहा है कि वे बदन किराए पर दे कर पैसे कमा सकती हैं और मर्दों को यह पाठ क्यों पढ़ाया जा रहा है कि आज भी औरत का सैक्स खरीदा जा सकता है और उस से फिर जबरदस्ती की जाती है.

गरीब औरतों को आज इतना हुनर क्यों नहीं सिखाया जा रहा कि वे बिना बदन बेचे भी अच्छा पैसा कमा लें. अभी तक बदन बेचने में ज्यादा स्किल की जरूरत नहीं होती पर दूसरे कामों में खासी स्किल सीखनी होती है. पर आफतें तो इस धंधे में भी होती हैं, क्योंकि न मालूम कौन सा ग्राहक कौन सी बीमारी ले कर चल रहा है, कितना मैला और बदबूदार है, कितना खतरनाक है और मारपीट तक को सैक्स का आनंद समझता है.

सदियों से औरतों को जानबूझ कर हुनर नहीं सिखाए गए ताकि उन्हें मनमरजी से पुरुष की सेवा में लगा कर रखा जाए. अब जब गोरों से नहीं, राजाओं, जमींदारों, सेठों, पुजारियों के आतंक से भी 1947 में आजादी मिली तो 2026 में एक 30 साला औरत को क्यों बदन का सहारा लेना पड़े. मनमरजी से सैक्स करने का उसे हक है चाहे पति से, चाहे किसी दूसरे से, पर पैसे के लिए क्यों करना पड़ रहा है. यह सरकार, समाज और धर्म निकम्मापन दिखाता है जो दावा करते हैं कि हम ही तो बचाते हैं. Editorial

Social Story : तीसरा

Social Story. गांव के लोग नए कलक्टर से गांव के बांध का उद्घाटन कराना चाहते थे, पर कलक्टर ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया. इस से गांव वाले हैरान थे. पर जब उन्हें नए कलक्टर के बारे में पता चला, तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. क्या था कलक्टर की जिंदगी का राज?

कुरुक्षेत्र शहर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर पिहोवा रोड पर गांव मुर्तजापुर गांव में बहुत बड़ा बांध बनाया गया. वहां बहती नदी पर खूबसूरत और चौड़ा पुल बनाया गया जिस से कि गांव के अंदर से आने और बाहर से निकलने वाले ट्रैफिक की वजह से ज्यादा परेशानी न हो.

अब बाहर से जाने वाला ट्रैफिक पुल से निकल जाएगा और गांव में गाडि़यों की भीड़ भी जमा नहीं होगी. साथ ही, बांध बनाने से किसानों को बारिश में फसल खराब होने का खतरा भी नहीं और सूखा पड़ने पर पानी का भी इंतजाम हो गया.

गांव वाले आज खुशी से फूले नहीं समा रहे. गांव की तो मानो काया ही पलट गई. सब आपस में बातें कर रहे थे कि नए कलक्टर ने तो गांव की सूरत ही बदल डाली. पंचायत ने गुजारिश की कि इस पुल और बांध का उद्घाटन भी कलक्टर के हाथों कराया जाए.

आखिर वह दिन भी आ गया. कलक्टर साहब आए और सीधे रैस्टहाउस में चले गए. सभी गांव वाले उन का धन्यवाद करना चाहते थे लेकिन कलक्टर साहब ने किसी से मिलना तो दूर अपनी शक्ल तक न दिखाई.

आखिर 2 दिन बाद उद्घाटन की पूरी तैयारी हो गई. कलक्टर साहब को न्योता भेजा गया कि उद्घाटन उन्हीं के शुभ हाथों से होगा. सरपंच खुद कलक्टर साहब से मिलने गए, तो बाहर ही उन का पीए मिल गया, ‘‘भाई, ये आप के सरजी का पूरा नाम क्या है, क्योंकि बाहर तो केवल एससी लिखा है? आप पूरा नाम बता दो ताकि इस निमंत्रण पर उन का पूरा नाम लिख दें.’’

‘‘सरपंचजी, पूरा नाम तो मैं भी नहीं जानता, मुझे भी केवल एससी ही पता है. आप एससी ही लिख दीजिए और यह निमंत्रण पत्र मुझे दे दीजिए, मैं उन्हें दे दूंगा. कलक्टर साहब आराम कर रहे हैं. इस समय उन से कोई नहीं मिल सकता.’’ ‘‘अगर कलक्टर साहब अभी आराम फरमा रहे हैं, तो हम बाद में आ जाएंगे. हम चाहते हैं कि हम गांव के कुछ लोग खुद उन्हें न्योता दें.’’ ‘‘देखिए सरपंचजी, कलक्टर साहब आज बहुत बिजी रहेंगे, इसलिए आज मिलना मुमकिन न होगा. आप फिक्र मत कीजिए, मैं आप लोगों का संदेश उन्हें दे दूंगा. वैसे भी कल आप सब ही मिल लीजिएगा उन्हें,’’ कहते हुए पीए ने टाल दिया.

अगले दिन उद्घाटन वाली जगह पर पूरा गांव खुशी से झूमता हुआ जमा था. कलक्टर साहब काली पैंट, सफेद दूधिया सी शर्ट पर डार्क रौयल ब्लू रंग का कोट पहने, सिर पर घुंघराले मैगी जैसे बाल, आंखों पर धूप का काला चश्मा, चेहरे पर मास्क लगाया हुआ, रोबीली चाल से चलते हुए आए और गांव के कुछ खास लोग उन्हें फूलमाला पहनाने लगे, लेकिन कलक्टर साहब ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

रिबन काट कर उद्घाटन किया गया. उस के बाद सरपंच ने कलक्टर साहब को फूलमाला पहनाने की कोशिश की, कलक्टर साहब ने हाथ रोक दिया और नत्थूलाल को स्टेज पर बुला कर कहा कि यह सम्मान उन्हें दिया जाए. ‘‘कलक्टर साहब, यह सम्मान आप के लिए है. आप ने नत्थूलाल भाई को क्यों बुलाया? मैं इस का कुछ मतलब नहीं समझा ?’’ सरपंच ने हैरानी से पूछा. नत्थूलाल चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था.

तब कलक्टर साहब ने अपने चेहरे से चश्मा तथा मास्क हटाया और पूरे गांव वालों के सामने जोर की आवाज में बोले, ‘‘गांव वालो, जरा गौर से देखो मुझे. क्या आप में से कोई जानता है मुझे? कोई पहचानता है मुझे? क्योंकि मैं इसी गांव की पैदाइश हूं. इस सम्मान पर मेरा हक नहीं (नत्थूलाल की तरफ इशारा कर के), बल्कि इन का हक है, इसलिए यह सम्मान इन्हें दिया जाए.’’

सभी हैरान हो कर यह सब सुन और देख रहे थे, लेकिन किसी की समझा में कुछ नहीं आ रहा था. हां, तभी बचनी दौड़ीदौड़ी स्टेज की तरफ आई और कलक्टर साहब को गले से लगा लिया. उस की आंखें आंसुओं का साथ ही नहीं छोड़ रही थीं. सरपंच हैरान से खड़े यह सब देख रहे थे. कुछ न सम?ा पाने पर वे बोले, ‘‘कलक्टर साहब….आप इस गांव की पैदाइश हैं… कौन? हैं आप और बचनी भाभी और नत्थूलाल को कैसे जानते हैं आप?’’

फिर नत्थूलाल और बचनी की तरफ मुखातिब होते हुए सरपंच बोले, ‘‘क्या आप पहचानते हैं कलक्टर साहब को?’’ लेकिन वे दोनों चुप रहे. कलक्टर साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘काकी, दाई अम्मां, रानी चाची, बिमला मौसी…’’ इस तरह कई नाम लिए. सब अपनाअपना नाम सुन कर हैरानी से देखने लगे कि कौन हैं ये.

‘‘क्या अभी भी आप लोगों ने नहीं पहचाना मुझे? दाई अम्मां, आप तो नहीं भूल सकती मुझे. याद करो वह दिन जब मेरा जन्म हुआ था.मुझे देखते ही मेरी नाल तक नहीं काटी थी आप ने. ‘मेरी मां खून से लथपथ पड़ी थीं और मैं नाल से मां के साथ बंधी वहीं गंदगी में पड़ी रो रही थी. मुझे साफ कर के गोद में लेना तो दूर रहा, बल्कि हाथों में से ऐसे पटका जैसे हाथों पर बिच्छू हो, जिस ने काट खाया हो.

‘‘हां… मैं वही हूं, वही तीसरा. आप तो जानते हो न तीसरा कौन? मैं वही तीसरा एससी मतलब सुशीला चौधरी. नत्थूलाल के बेटे मन्नु की औलाद, जिसे आप लोगों ने तीसरा कह कर कहीं फेंक आने के लिए मेरे दादादादी को कहा था, पर जब वे नहीं माने तो गांव वालों ने क्याक्या नहीं उन्हें कहा, कैसीकैसी धमकियां उन्हें दी गईं.

‘‘क्या कुछ नहीं मेरे मातापिता और दादादादी को सहन करना पड़ा मेरी वजह से, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी. न केवलमुझे दूसरे भाईबहनों की तरह पाला बल्कि उन से ज्यादा प्यार दिया और मेरे भाईबहनों ने कभी मुझे अहसास नहीं होने दिया कि मैं उन के जैसी या जैसा नहीं, बल्कि तीसरा जैंडर हूं. उन्होंने हमेशा मुझे अपने जैसा ही समझा. हमेशा मुझे बड़ी बहन का ओहदा दिया.

‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस परिवार की वजह से हूं वरना न जाने मेरा भविष्य क्या होता. अब तक मन्नु और मुनिया और उन के चारों बच्चे भी स्टेज तक आ चुके थे. बचनी ने जोर दे कर कहा, ‘‘तू कोई तीसरावीसरा नहीं है, तू मेरी बच्ची है मेरी. मेरी सब से बड़ी और सब से लाड़ली पोती है तू.’’ आंखों में आंसू लिए बचनी ने नत्थूलाल से पूछा, ‘‘आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’

‘‘लेकिन फिर भी तुम ने बिना बताए जान लिया… वह कैसे?’’ ‘‘मां का दिल है न. 2 दिन से बहुत बेचैनी हो रही थी. आप से कहा भी कि मेरी बात करा दो लेकिन आप टालते रहे और मैं अंदर ही अंदर परेशान होती रही.’’

‘‘मैं समझ रहा था तेरी परेशानी, मगर मैं तुम सब के चेहरों पर यह रौनक देखना चाहता था, इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया. मैं ने ही सुशीला से गांव की परेशानियों का जिक्र किया था.और सुशीला ने गांव की परेशानियों का हल निकाल कर खुद भी यहां हमारे साथ रहने के लिए अपनी पोस्टिंग कुछ समय के लिए यहां करा ली.’’

सब गांव वालों को अपनी वे बातें याद आने लगीं कि कैसे उन्होंने इस बच्ची को दुत्कारा था, किस तरह से उस के मातापिता और दादादादी को इसे गांव से निकालने के लिए कहा करते थे. दाई को भी याद आ गया वह दिन जब इस बच्ची का जन्म हुआ था.

दरअसल, यह बात है आज से 26-27 साल पहले की, जब कुरुक्षेत्र से तकरीबन 20 किलोमीटर पिहोवा रोड पर मुर्तजापुर गांव के एक किसान परिवार नत्थूलाल के बेटे मन्नु की शादी गांव के ही आसाराम की बेटी मुनिया से हुई. शादी के तकरीबन एक महीने बाद ही मुनिया के पांव भारी हो गए. घर में सब परिवार, जो कि लेदे कर मातापिता, मन्नु, मुनिया और मन्नु की छोटी बहन गुडि़या, बहुत ही खुश थे? घर में नया मेहमान जो आने वाला था.

मुनिया की खूब सेवा होती, खूब लाड़ लड़ाए जाते, खूब खयाल रखा जाता. सभी बेसब्री से आने वाले मेहमान का इंतजार कर रहे थे, लेकिन एक दिन जब मुनिया को दर्द शुरू हो गया तो मुनिया की सास बचनी देवी ने झट से मुनिया को गरम दूध में कैस्ट्रौल डाल कर पिलाया और उसे ऊपर छत पर 4-5 चक्कर काटने को कहा. 2-4 घंटे के भीतर ही दर्द बढ़ गया और मुनिया को एक छोटे से अलग कमरे में लिटा दिया गया और सास दौड़ कर दाई को बुला लाई.

शाम को अंधियारा छाने लगा था कि बच्चे के रोने की आवाज आई. कमरे के बाहर खड़े सब लोग खुशी से उछल पड़े. सब एकदूसरे को बधाई देते हुए गले लगाने लगे. अब उत्सुकता यह थी कि हुआ क्या है बेटा या बेटी? सब लोग टकटकी लगा कर दरवाजे की ओर देख रहे थे कि इतने में मुंह लटकाए हुए दाई बाहर आई.

नत्थूलाल ने पूछा, ‘‘अरे भाभी, लाओ… बच्चा सब से पहले मेरी गोद में देना.’’ बचनी बोली, ‘‘न जी न, पहला हक तो दादी का है,’’ कहते हुए जैसे ही वह दाई से बच्चा लेने को पलटी, लेकिन दाई के खाली हाथ देख कर एक पल के लिए सहम गई, ‘‘भाभी, बच्चा कहां है? बच्चा लाओ और अपना नेग लो.’’

दाई को खामोश देख कर नत्थूलाल भी बोला, ‘‘हांहां भाभी, आज तो मुंहमांगा नेग मिलेगा, लेकिन लाओ पहले हमारे कुलदीपक के दर्शन तो कराओ.’’ ‘‘काहे का कुलदीपक… मैं तो उसे अंदर ही पटक आई,’’ कहते हुए दाई ने मुंह बना लिया.

दाई की बात सुन कर नत्थूलाल को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘अंदर पटक आई का क्या मतलब हुआ भाभी, लड़का हो या लड़की हमारे लिए तो कुलदीपक ही है. आज के समय में लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं. जैसे लड़का कुल का दीपक है तो लड़की भी तो कुल की ज्योति है न, तो हुए न दोनों कुलदीपक.

‘‘हमारी बहू का पहला बच्चा, जो भी है हमारा खून है. लाओ, हमारी गुडि़या या हमारा गुड्डू जो भी है ला कर हमारी झोली में दे दो और हमारे कलेजे को ठंडक पहुंचाओ.’’ ‘‘काहे का लड़का और काहे की लड़की भाई, वह तो तीसरा है तीसरा. मैं तो चली. बचनी, तू ही संभाल अपनी बहू को और बच्चे को फेंक आ कहीं जा के,’’ कहते हुए दाई घर से बाहर जाने के लिए कदम उठाने लगी.

‘‘तीसरा… बच्चे को फेंक आई… भाभी, क्या कह रही हो तुम, हमें कुछ समझा नहीं आ रहा,’’ नत्थूलाल बोला. ‘‘अरे भाई, तीसरा नहीं समझाते हो? वही…..जिस को सब नीची नजर से देखते हैं.’’

बचनी दौड़ती हुई अंदर गई. देखा तो मुनिया खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. बच्चा जारजार रोए जा रहा था, क्योंकि बच्चे के पैदा होते ही दाई उसे मुनिया की टांगों के बीच में लिटा कर सफाई किए बिना और बच्चे की नाल काटे बिना ही जाने की जो ठान ली थी.

बचनी ने अंदर का हाल देखा तो दौड़ी आई और दाई का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘भाभी, इस में बहू और बच्चे का क्या दोष? आप चल कर नाल काट कर बहू और बच्चे को संभालो. ऐसा न हो कोई अधर्म हो जाए हमारे हाथों से…’’ कहते हुए बचनी दाई के हाथपैर जोड़ने लगी.

अब तक नत्थूलाल भी समझ चुका था कि क्या हुआ है. उस ने झट से जेब से बिना देखे, बिना गिने मुठ्ठी भर कर रुपए निकाले और दाईं को देते हुए बोले, ‘‘भाभी, मेरी बहू और बच्चे को कुछ न होने देना.’’

नोटों से भरी मुठ्ठी देख दाई के मुंह में पानी आ गया. वह बोली, ‘‘भाई, बहू से तो मेरी को दुश्मनी न है, पर यह बच्चा कहीं भी जा के फेंक आ, नहीं तो यह गांव तुझे जीने नहीं देगा,’’ कहते हुए कमरे में जा कर बच्चे की नाल काट कर मुनिया के बदन की सफाई कर के ठीकठाक किया. लेकिन बच्चे को फिर हाथ तक न लगाया. उसे बचनी ने खुद से साफ कर के कपड़े में लपेटा.

जब दाई जाने लगी तो नत्थूलाल ने एक मुट्ठी नोटों की और थमा दी और बोला, ‘‘भाभी, किसी से कोई जिक्र न करना, आप को हमारी लाज का वास्ता. अभी हम सोचते हैं कुछ कि बच्चे का क्या करना है.’’

इतनी बात बचनी के कानों में पड़ी तो वह कमरे से बाहर आ गई. उस की गोद में बच्चा था. वह बोली, ‘‘क्यों जी, क्यों न जिक्र करें? जो भी कुदरत ने दिया इसे अस्वीकार कर दें क्या? यह भी इनसान ही है. हमारी बहू ने इनसान का बच्चा जना है, जानवर का नहीं, जो हम छिपाते फिरें,’’ कहते हुए उस ने बच्चे को सीने से लगा लिया.

नत्थूलाल भी सोचने पर मजबूर हो गया, ‘‘बचनी, कह तो तुम सही रही हो. इस में बहू और बच्चे का क्या कुसूर है,’’ और दाईं से बोला, ‘‘भाभी, मु?ो किसी की कोई चिंता नहीं. गांव वाले जब जो कहेंगे तब हम देख लेंगे.’’

अब तक मन्नु शांत खड़ा अचरज से यह सब देखसुन रहा था. मां ने उस की ?ाली में बच्चे को डालते हुए कहा, ‘‘मन्नु, इस तरह चुप क्यों है? देख अगर तू ही इसे नहीं स्वीकारेगा, तो दुनिया तो तेरे से पहले ही इसे दुत्कारेगी, इसलिए हम से पहले तु?ो इस सच को स्वीकारना होगा. ले… ले अपने बच्चे को गोद में ले कर प्यार कर.’’

मां की बात सुन कर मन्नु में भी जोश भर गया. उस ने बच्चे को गोद में ले कर प्यार किया और सीने से लगा लिया. पैसे के लालच में दाई ने अपना सारा काम तो कर दिया, मगर कहीं न कहीं उस के दिल में डर था कि इस बच्चे का ये क्या करेंगे? क्या इसे अपनाएंगे या कहीं किसी को दे आएंगे या यों ही फेंक देंगे?

खैर, दाई अपना कम निबटा कर, अपनी मेहनत से भी ज्यादा पैसे ले कर खुशी से अपने घर चली गई. अब उसे नत्थूलाल ने कहा था कि किसी से कुछ न कहे, मगर एक दिन दाई के मुंह से बात निकली और एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे के कान तक जा पहुंची.

पूरे गांव को खबर हो गई कि नत्थूलाल के बेटे मन्नु की बीवी मुनिया ने तीसरे को जन्म दिया. आसपड़ोस की औरतें पहुंच गई नत्थूलाल के घर इस बात को पुख्ता करने. उन में से एक काकी आते ही लगीं आवाज लगाने, ‘‘बचनी, अरी ओ बचनी.’’ ‘‘आओ काकी, आओ. बड़े दिनों बाद आई हो. आओ बैठो. मैं जरा बच्चे को उस की मां को पकड़ा कर आती हूं,’’ बचनी जानती थी कि इन सब को पता चल चुका है कि मुनिया का बच्चा हो गया है, तो फिर छिपाए क्यों?

‘‘न बचनी न, बैठने का समय कहां है री. पहले तो यह बता… मैं क्या सुन के आई हूं… तेरी कुलछनी बहू ने क्या जन दिया…’’ ‘‘काकी, बुरा मत मानो. मेरी सुलछनी बहू के बारे में कुछ मत कहो और रही बच्चे की बात तो जो कुदरत ने दिया वह सिरमाथे पर. अब भला इस में बहू या बच्चे का क्या दोष?’’

बचनी की बात सुन कर काकी और दूसरी औरतें चुप हो गईं, लेकिन जातेजाते काकी एक बात बचनी के कानों में डाल गईं, ‘‘देख बचनी, यह तो सही है कि जो दिया कुदरत ने दिया इस में बहू का क्या दोष, लेकिन कुदरत के किए को हम संभाल तो सकते हैं न, इस बच्चे को कहीं छोड़ आओ या इन्हीं की बिरादरी में दे दो वरना ऐसा न हो कल को गांव में तुम लोगों का हुक्कापानी ही बंद हो जाए.’’

काकी की इस तरह की सीधीसीधी धमकी से एक पल के लिए तो बचनी के प्राण कंठ में आ गए, लेकिन दूसरे ही पल हिम्मत कर के वह बोली, ‘‘काकी, कल किस ने देखा है, जो होगा देखा जाएगा.’’ इसके बाद जैसे ही नत्थूलाल और मन्नु अपने काम से घर आए तो बचनी ने सारी बात कह सुनाई.

नत्थूलाल बोला, ‘‘बचनी, तू चिंता मत कर. देखना इस बच्चे को मैं क्या से क्या बनाऊंगा. गांव वाले जो कहते हैं, करते हैं उन्हें उन का काम करने दो और हमें हमारा.’’

वह बच्चा उस परिवार में पलने लगा. उस का नाम सुशीला रखा गया. सुशीला के बाद उस के 2 भाई और 2 बहनें और हुईं. सब को पढ़ायालिखाया गया. पहले तो सुशीला को स्कूल में एडमिशन देने से मना किया गया, लेकिन नत्थूलाल और मन्नु ने भागदौड़ कर के सरकारी कागज बनवाए, जिस में साफसाफ परमिशन दी गई थी कि तीसरे जैंडर के बच्चे भी आम बच्चों के साथ पढ़ सकते हैं.

सुशीला भी अब आम बच्चों के साथ पढ़ रही थी. 10वीं के बाद जिस तरह से बाकी बच्चों को बड़े स्कूल और फिर कालेज भेजा गया, तब सुशीला को उन से अलग कर दिया गया. उसे कहां और क्यों भेजा गया, यह नत्थूलाल के सिवा कोई नहीं जानता था. आज वही बच्ची एक कलक्टर बन कर जिस गांव में जिल्लत सही, उसी गांव की भलाई के लिए दिनरात कोशिश कर रही है.

यह सब सुन कर गांव वाले जो शर्म से आंखें नीची किए खड़े थे, एकजुट हो गए. एक बुजुर्ग बोले, ‘‘सुशीला बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने खुद को बड़ा बना कर कुदरत की रचना में भी नुक्स निकालना चाहा. अनजाने में हम से बहुत बड़ी गलती हो गई.

‘‘अब तुम थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए यहीं रहोगी. इसी गांव में और हमें अपने किए का पछतावा करने का मौका दोगी.’’

हिजड़ा कहो या किन्नर या फिर तीसरा जैंडर, देखने में बिलकुल साधारण इनसान जैसे होते हैं. वे भी एक आम इनसान की तरह जीना चाहते हैं, मगर समाज उन्हें बारबार तीसरा जैंडर या अलग तरह के होने का एहसास दिलाता है, उन्हें अपने से अलगथलग रख कर भेदभाव करता है. पर कुदरत के दिए गए तोहफे से भेदभाव कैसा?

लेखक : प्रेम बजाज

Editorial : गहरी पैठ- बिहार बीजेपपी को चढ़ावे की चिंता

Editorial. जैसी उम्मीद थी, बिहार की भारतीय जनता पार्टी को मंदिरों, पूजापाठ और चढ़ावे की ज्यादा फिक्र है, बजाय दलितों, पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों और बिहार से बाहर जाने को मजबूर हुए मजदूरों की कुछ सोचने की. पहली कैबिनेट मीटिंग में 3,615 करोड़ रुपए के प्रौजैक्ट एप्रूव किए गए जिन में मंदिरों तक जाने के रास्ते, मंदिरों की मरम्मत, मंदिरों को नई जगह देने जैसे काम शामिल हैं.

बिहार का गरीब तबका जिस का बड़ा हिस्सा अब पढ़लिख गया है, बगावत न कर दे इस के लिए पुख्ता इंतजाम किया गया है. पुलिस फोर्स को स्कूटर दिए जा रहे हैं, थाने बन रहे हैं, गाडि़यां खरीदी जा रही हैं.

इस सब का मकसद एक ही है. जनताको धर्म के नाम पर लूटते रहो, बहकाते रहो, जो सही बात बोले उसे पकड़ कर बंद कर दो. दलित, अति पिछड़े, मुसहर जैसे लोग जिन के बच्चे पढ़लिख गए वे भी बोले नहीं इस के लिए धर्म के पुजारियों का भी दबाव है, उन के लिए कथा भी कराई जा रही है, धार्मिक जलसों में नाचनेगाने को लगाया जा रहा है पर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाया जा रहा है.

बिहार किसी जमाने में बहुत अमीर राज्य था, दूसरे उत्तर भारत के इलाकों से ज्यादा. तभी वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय बना जो मीलों में फैला है. यह बात दूसरी है कि नालंदा में कोई नहर या सड़क या मकान या खेती के प्रोडक्शन की बात नहीं होती थी. पर दूसरे इलाकों में तो यह भी नहीं था और तभी कभी ग्रीक, कभी शक, कभी हूण, कभी अफगान, कभी मंगोल कब्जे करते रहते थे. बिहार में पुराने मंदिर नहीं हैं इसलिए वह चमका.

आज मंदिरों की बाढ़ आ रही है जो तराई से आने वाली बाढ़ से भी ज्यादा खतरनाक है. सम्राट चौधरी इसे और बढ़ाएंगे. 20 साल नीतीश कुमार ने इस थोड़ाबहुत कंट्रोल किया था पर भाजपा ने हेरफेर कर के उन्हें धक्का दिया है और अब मंदिरों की बात होगी.

बिहार की आम जनता आज भी सीधी और बेवकूफ है. उसे सदियों से पढ़नेलिखने नहीं दिया गया. कांग्रेसी सरकारों ने गांवगांव में स्कूल खोले पर वहां ऊंची जातियों के पढ़ाने वाले घुस गए जिन्होंने साजिश के तहत दलितों, पिछड़ों को पढ़ने नहीं दिया.

जो थोड़ीबहुत चमक बिहार में दिखती है वह तकनीक की बदौलत है. बिजली पैदा करना आसान है तो हर सड़क पर बत्ती लग सकती है, हर घर में लाइट है. बाकी अंधेरा है. सब से नीचे के पायदान पर रहने वाला बिहार अपने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से पैसों के मामले में आधा है और यह फर्क बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं क्योंकि अब पूजापाठ, पुलिस अत्याचार, बुलडोजर का राज आ गया है जिस में मरेगा गरीब, नीची पिछड़ी जाति का जना जिस की न आवाज है, न सुनवाई.  Editorial

Politics : अंबेडकर को सिर्फ मूर्ति बनाने की साजिश

Politics. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने डाक्टर भीमराव अंबेडकर की विरासत को सम्मानित करने और दलित मतदाताओं के बीच पैठ मजबूत करने के लिए ‘डाक्टर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ बनाई है. इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा में अंबेडकर की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण करना, मूर्तियों के ऊपर छत्र और बाउंड्री वाल बनवाना शामिल है.

सरकार ने इस के लिए 403 करोड़ रुपए का बजट पास किया है. इस से उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के हर क्षेत्र में 10-10 स्मारकों का विकास किया जाएगा.

इस योजना में अंबेडकर के साथ ही साथ दलितों के साथ जुड़े संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों के स्मारकों के विकास को भी शामिल किया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार के इस कदम को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है. पार्टी इस के जरीए दलित वोटर को जोड़ना चाह रही है. हर विधानसभा को करीबकरीब एक करोड़ रुपए इस काम के लिए मिलेंगे.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने तय किया है कि प्रदेशभर में जहां कहीं भी  अंबेडकर की प्रतिमा होगी, वहां पर प्रतिमा के ऊपर छत्र लगाने का काम कराया जाएगा. जहां पर अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित होगी वहां पर जो पार्क होगा. उस की बाउंड्री वाल का निर्माण और उस के सुंदरीकरण का काम भी सरकार अपने पास ले रही है.

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग में 50 करोड़ रुपए की लागत से ‘भारत रत्न’ भीमराव अंबेडकर मैमोरियल एंड कल्चरल सैंटर का निर्माण होगा. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 28 जून को इस की आधारशिला रखेंगे. इस में अंबेडकर की 45 फुट ऊंची प्रतिमा लगेगी और अंबेडकर की पुण्यतिथि 6 दिसंबर पर इस का उद्घाटन करवाए जाने की तैयारी है.

‘भारत रत्न’ अंबेडकर के नाम पर बनने वाले मैमोरियल सैंटर में अंबेडकर की प्रतिमा के साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी, म्यूजियम और शानदार एडिटोरियम भी बनाया जाएगा. स्मारक में पूरे साल कल्चरल प्रोग्राम का आयोजन किया जाएगा. छात्रों के लिए सैमिनार के आयोजन किए जाएंगे. यहां छात्रों को अंबेडकर पर शोध करने के लिए जरूरी चीज मुहैया करवाएगी.

यहां बनने वाली लाइब्रेरी को काफी बड़ी होगी. उस में अंबेडकर से जुड़ी किताबों का संग्रह होगा.

मूर्तियां होंगी दलित वोट का सहारा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की नजर से दलित वोट काफी खास माने जा रहे हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में यही दलित वोट भाजपा से खिसक गया था, जिस की वजह से उत्तर प्रदेश में पार्टी को 33 सीटों का नुकसान हुआ था. ऐसे में अब भाजपा दलित वोटरों को काफी अहम मान रही है.

साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट पर हर पार्टी की नजर है. उत्तर प्रदेश में तकरीबन 22 फीसदी दलित वोट हैं. यहां विधानसभा की आरक्षित 86 सीट में 84 दलितों के लिए हैं.

उत्तर प्रदेश की लगभग 150 विधानसभा सीटों पर दलित वोट ही हारजीत तय करते हैं. उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री रही मायावती दलितों की सब से बड़ी नेता मानी जाती रही हैं. 1995, 1997, 2003 और 2007 वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं. साल 2007 बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी.

इस के बाद धीरधीरे मायावती की ताकत कम होती गई. बसपा को लगातार 2012, 2017 और 2022 में हार का सामना करना पड़ा है. विधानसभा में बसपा से सिर्फ एक विधायक है. वहीं लोकसभा में एक भी सांसद बसपा का नहीं है. बसपा को अभी भी 9 फीसदी वोट मिलते हैं.

क्यों नहीं लग पाई पेरियार की मूर्ति

मायावती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने प्रदेश के अलगअलग हिस्सों में अंबेडकर की प्रतिमाएं लगवाई थीं. अंबेडकर की पत्नी रमा बाई के नाम पर लखनऊ में एक बड़ा स्मारक भी बनवाया गया था.

मायावती ने तब लखनऊ में अपनी मूर्तियां भी लगवाई थीं, जिस को ले कर खुद भाजपा ने ही सवाल खड़े किए थे. मायावती लखनऊ में जिन दलित महापुरुषों की मूर्तियां लगवाना चाहती थी उन में एक नाम पेरियार ईवी रामास्वामी नायकर का भी था. भाजपा को ब्राह्मण विरोधी पेरियार के नाम से नफरत थी.

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने पेरियार की मूर्ति का कड़ा विरोध किया था. उन का मानना था कि पेरियार राम विरोधी थे, जबकि असल में वे ब्राह्मण विरोधी थे. उन के विचार हिंदू देवीदेवताओं के खिलाफ थे.

मायावती के तीसरे कार्यकाल 2002-2003 के दौरान जब मूर्ति लगाने का प्रस्ताव था. तब बसपा भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही थी. भाजपा ने मूर्ति स्थापना का विरोध करते हुए सरकार से हटने की धमकी दी थी, जिस के कारण मायावती को यह योजना स्थगित करनी पड़ी थी.

उस समय मूर्ति न लगने का कारण यह बताया गया था कि पेरियार दक्षिण भारत के समाज सुधारक थे, इसलिए उन की मूर्ति उत्तर प्रदेश में नहीं लगनी चाहिए. मूर्ति न लगने देने का कारण पेरियार के ईश्वर विरोधी और तर्कवादी विचारों को धार्मिक भावनाओं खिलाफ माना गया था.

मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थीं तो उन्होंने भाजपा के दबाव को माना और पेरियार की मूर्ति लगाने की योजना को टाल दिया.

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पेरियार की नीतियों का मतलब था मंदिरों की दुकानदारी खत्म होना और पंडों को किए जाने वाले दान की बचत होना. दोनों बातें जनता के लिए लाभदायक हैं, पर धर्म का प्रचार इतना जबरदस्त है कि मायावती भी कुछ न कर पाईं और कांशीराम की नीतियां भी राजनीति का शिकार हो गईं.

क्या अंबेडकर की मूर्ति से होगा लाभ

भारतीय जनता पार्टी लगातार दलित और पिछड़ी जातियों से जुड़े महापुरुषों को अपने साथ जोड़ने की योजना पर काम कर रही है. अंबेडकर के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल की सब से ऊंची मूर्ति गुजरात में लगाई. उन के जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ घोषित किया. बिहार के बड़े ओबीसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को साल 2024 में ‘भारत रत्न’ दिया.

इस का लाभ भाजपा को साल 2025 के विधानसभा चुनाव में मिला. ?ारखंड के बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को ‘जनजाति गौरव दिवस’ घोषित किया.

इसी तरह से संत रविदास का भी महिमामंडन किया. साल 2023 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को भारत का दूसरा सब से बड़ा सम्मान ‘पद्म विभूषण’ दिया. निषादराज गुहा और सुहेलदेव राजभर जैसे बड़े महापुरुषों का भी भाजपा ने महिमामंडन किया.

भाजपा दूसरे विचारों के महापुरुषों का सम्मान दे कर अपनी अलग पैठ बनाने का काम कर रही है. यह बात और है कि जमीनी लैवल पर वह जातीय भेदभाव को खत्म नहीं कर पा रही है.

दूसरी ओर नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा शासन के दौरान दलित उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं. एनसीआरबी की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 की तुलना में 2022 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों में 13.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

सब से अधिक मामले भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में 15,368, राजस्थान में 8,752, मध्य प्रदेश में 7,733 और बिहार में 6,509 दर्ज किए गए थे. देश की कुल दलित उत्पीड़न की 76 फीसदी घटनाएं 5 भाजपा शासित राज्यों में हुईं.

औरतों के साथ अन्याय भी लगातार बढ़ रहा है. पढ़ीलिखी औरतों को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं और घरों में उन के साथ होने वाला भेदभाव एक नई शक्ल में सामने आ रहा है.

अंबेडकर के संविधान को कितना मानती है भाजपा

सब से बड़ा सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी अंबेडकर की मूर्तियां तो लगवा रही है पर उन के बनाए संविधान का कितना पालन करती है? भाजपा पर चुनाव में धांधली, संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग, घरों को बुलडोजर से गिराने और फर्जी एनकांउटर के तमाम आरोप हैं. इस को ले कर कोर्ट तक ने टिप्पणियां की हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के शासन में ‘बुलडोजर न्याय’ की कोई जगह नहीं है. कोर्ट ने कहा कि ‘सरकार या प्रशासन बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी का घर नहीं तोड़ सकते हैं. केवल एफआईआर में नाम आने से कानूनी अधिकार नहीं हासिल हो जाता. सजा देने का अधिकार केवल कोर्ट को है सरकार या प्रशासन को नहीं.’

इसी मसले पर कोर्ट ने कहा कि नोटिस और सुनवाई जरूरी है. प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का समय देना चाहिए. तुरंत बदले की कार्रवाई गलत है. अगर अवैध निर्माण के आधार पर यह हो रहा हो तो सब के साथ होना चाहिए. किसी एक का चुनाव करना कानून सम्मत नहीं है. घर तोड़ना केवल संपत्ति का नुकसान नहीं है, यह संविधान की धारा 21, जीवन और गरिमा से जुड़ा मामला होता है.

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जावेद मोहम्मद का घर अवैध कह कर गिरा दिया गया. जावेद 2022 के सरकार विरोधी प्रदर्शन का हिस्सा थे. 2022 का ही दूसरा मामला दिल्ली का था. वह भी 2022 के प्रदर्शन के कारण किया गया था.

लोकसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान भाजपा ने और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ‘अभी एक फैशन हो गया है… अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर… इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता.’ यह अमित शाह द्वारा संविधान निर्माता अंबेडकर का अपमान माना गया था. अब भाजपा उन्हीं अंबेडकर के सम्मान में उतर आई है. भाजपा सरकार के मंत्री रहे ब्राह्मण वर्ग से आने वाले पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी ने अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फाल्स गौड्स’ में अंबेडकर की आलोचना की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अंबेडकर के विचारों में काफी मतभेद रहे हैं. अब भाजपा इन को ‘जोड़ने’ करने की कोशिश कर रही है. अंबेडकर समानता यानी इक्वैलिटी पर जोर देते थे. दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता की बात करता है. इन दोनो के विचारो में अंतर है.

इक्वैलिटी यानी समानता और समरसता यानी हार्मोनी के बीच जो अंतर है, वही अंतर अंबेडकर और संघ के बीच भी है. संघ वर्चस्व के उद्देश्य के लिए सद्भाव की अवधारणा का उपयोग करता है, जबकि अंबेडकर समानता की अवधारणा का उपयोग आजादी के लिए करते थे.

अंबेडकर की अवधारणा में समानता में जीवन को सम्मान के साथ समान अधिकारों की वकालत की गई है. अंबेडकर का समता का लक्ष्य और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समरसता को एकसमान नहीं माना जा सकता है. समरसता का मतलब है एक होना और समता का मतलब है एकसमान होना है. समरसता कायम करने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समानता पहली शर्त है.

भाजपा इस का कहीं पालन करते नहीं दिखती है. अंबेडकर का अंतिम लक्ष्य धर्मांतरण नहीं, जाति उन्मूलन था. उन्होंने 1935 में हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की और 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया था.

अब भाजपा अंबेडकर की मूर्तियों पर छत्र लगा कर उन को छत्रपति बनाना चाहती है. हिंदू धर्म में छत्र का अपना महत्त्व है. इस को ब्राह्मण, राजा और शंकराचार्य ही धारण करते हैं. छत्र के सहारे बाबा साहब को धार्मिक चोले में रखने की तैयारी  की जा रही है.

दलित समाज के नौजवानों को नौकरी और कारोबार करना है, ऐेसे में केवल बड़े महापुरुषों का महिमामंडन करने से वह वोट नहीं देने वाला है. उसे समानता चाहिए जहां उस के साथ जाति का भेदभाव और उत्पीड़न न हो सके. केवल अंबेडकर की मूर्तियां लगाने से वह वोट नहीं देने जा रहा है. Politics

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