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Politics : मायावती स्मारक नहीं संस्थान बनवातीं

Politics. मायावती इन दिनों अपने राजनीतिक उत्तराधिकार की तलाश में हैं. भतीजे आकाश आनंद को हटा कर वे अपनी भतीजी दीपिका आनंद को राजनीति में लाने का मन बना रही हैं. लेकिन सवाल यह है कि इतने साल तक उत्तर प्रदेश में मायावती को सत्ता मिली थी, पहचान की राजनीति भी मिली थी. लेकिन क्या दलित समाज को वह आर्थिक ताकत मिल पाई, जिस की उसे सब से ज्यादा जरूरत थी?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती का दौर सिर्फ एक राजनीतिक अध्याय नहीं था, बल्कि यह उस सामाजिक बदलाव का दौर भी था, जब एक दलित महिला उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सत्ता के शीर्ष तक पहुंची थी. उन्होंने 4 बार मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की कमान संभाली थी. पहली बार 3 जून, 1995 से अक्तूबर, 1995 तक, फिर मार्च से सितंबर, 1997, मई, 2002 से अगस्त, 2003 और सब से लंबे कार्यकाल में मई, 2007 से मार्च, 2012 तक.

इतना लंबा राजनीतिक अनुभव और सत्ता का इतना बड़ा अवसर किसी भी नेता को इतिहास बदलने की ताकत देता है, इसलिए आज जब उत्तर प्रदेश फिर विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ रहा है और बहुजन समाज पार्टी के भीतर नेतृत्व को ले कर चर्चा तेज है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि मायावती के बाद पार्टी कौन संभालेगा?

मायावती को जो सत्ता मिली थी, उस का सब से बड़ा और सब से स्थायी फायदा दलित समाज को क्या मिला?

मायावती की राजनीति ने दलित समाज को एक आवाज दी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया और अंबेडकरकांशीराम की विरासत को सत्ता की राजनीति के केंद्र में रखा.

उन के शासन में लेकिन क्या दलित समाज को आर्थिक रूप से इतना मजबूत बनाया गया कि वह आने वाली पीढि़यों के लिए अपनी दिशा खुद तय कर सके?

मायावती ने अपने कार्यकाल में अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, कांशीराम स्मारक स्थल, बौद्ध विहार, ईको गार्डन और राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल बनवाए थे. अंबेडकर की प्रतिमाएं बनाई गई थीं, पर अंबेडकर का सपना उस से कहीं बड़ा और ज्यादा जरूरी था.

लखनऊ और नोएडा में बड़ेबड़े स्मारक बने, लेकिन अंबेडकर का सपना सिर्फ इतना तो नहीं था कि उन के नाम पर पार्क बनें. उन का सपना था कि जिस समाज को पढ़ाईलिखाई से दूर रखा गया, वह पढ़ाईलिखाई में सब से आगे जाए.

जिस समाज को आर्थिक संसाधनों से दूर रखा गया, वह आर्थिक रूप से मजबूत बने. जिस समाज को फैसले लेने से दूर रखा गया, वह नीति बनाने की ताकत हासिल करे.

कितने युवाओं को मशीन चलाने के बजाय मशीन बनाने की ट्रेनिंग मिली? कितने युवाओं को सिर्फ सरकारी नौकरी की तैयारी कराने के बजाय उद्योग शुरू करने की ट्रेनिंग मिली? कितने किसानों को आधुनिक खेती, ड्रोन, सौर ऊर्जा, नई सिंचाई तकनीक, प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ने का बड़ा अभियान चला? कितने युवाओं को इलैक्ट्रौनिक्स, रोबोटिक्स, कंप्यूटर, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस या मौडर्न टैक्निक से जोड़ा गया?

दलित राजनीति की सब से बड़ी ताकत उस का वोट है, लेकिन अगर किसी समाज की पूरी राजनीतिक ताकत सिर्फ चुनाव के दिन वोट देने तक सीमित रह जाए तो वह अधूरी ताकत है.

वोट देने का हक ताकत देता है, लेकिन पढ़ाईलिखाई उस ताकत को दिशा देती है, तकनीक उसे रोजगार देती है, उसे आर्थिक स्वतंत्रता देता है और संगठन उसे लंबे समय तक मजबूत बनाए रखता है.

मायावती ने दलित समाज को उस बड़े पैमाने पर आर्थिक और तकनीकी आंदोलन में बदलने की कोशिश उतनी दिखाई नहीं दी जितनी दिखाई देनी चाहिए थी.

एक गरीब दलित परिवार का बच्चा अगर पढ़ कर इंजीनियर बनता है, अपनी कंपनी खोलता है और 50 लोगों को नौकरी देता है तो यह सिर्फ एक इनसान की कामयाबी नहीं है, यह पूरे सामाजिक ढांचे को बदलने वाली घटना है.

लेकिन अगर वही बच्चा पढ़ाई छोड़ कर या स्कूली पढ़ाई करने के बावजूद मजबूरी में मजदूरी करने लगे, छोटेमोटे काम में चला जाए या सिर्फ सरकारी नौकरी की उम्मीद में सालों तैयारी करता रहे तो सवाल सिस्टम पर उठेगा.

मायावती को सिर्फ स्मारक नहीं, संस्थान खड़े करने चाहिए थे. अगर सरकार के पास संसाधन हैं तो उसे ऐसी चीजें बनानी चाहिए जो पीढि़यों तक नतीजे देती रहें.

मान लीजिए उत्तर प्रदेश में एक बड़ा दलित तकनीकी कौशल मिशन शुरू किया जाता. हर मंडल में आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र बनते. वहां गांव के बच्चों को सिखाया जाता.

इलैक्ट्रौनिक उपकरण बनाना, सोलर पैनल लगाना और बनाना, ड्रोन चलाना और ड्रोन से खेती करना, आधुनिक कृषि मशीनों की मरम्मत, कंयूटर प्रोग्रामिंग, मोबाइल और इलैक्ट्रौनिक्स रिपेयरिंग, मशीन डिजाइन, वैल्डिंग और आधुनिक निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण, औनलाइन कारोबार, डिजिटल मार्केटिंग, छोटे उद्योग का प्रबंधन और ट्रेनिंग के बाद बैंक से आसान कर्ज, बाजार और सरकारी खरीद से जोड़ा जाता, तो 10-15 साल में देश की तसवीर कितनी बदल सकती थी.

यह सिर्फ कल्पना नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों ने पढ़ाईलिखाई, तकनीक और कौशल को विकास की सीढ़ी बनाया है.

जापान के 5 युवाओं की कहानी यहां बहुतकुछ सिखाती है. साल 1863 में जापान के चोशू क्षेत्र के 5 युवा इतो हिरोबुमी, इनोउए काओरू, इनोउए मासारू, एंडो किनसुके और यामाओ योजो ब्रिटेन गए थे. उस समय जापान में विदेश जाना बेहद मुश्किल था. पर वे वहां घूमने नहीं गए थे.

उन्होंने जा कर देखा कि पश्चिमी देश तकनीक, रेलवे, उद्योग, इंजीनियरिंग और प्रशासन कैसे चला रहे हैं. उन्होंने भाषा सीखी, वैज्ञानिक शिक्षा ली और अलगअलग संस्थानों को सम?ा. फिर वे पांचों जापान वापस लौटे, लेकिन असली कहानी वापसी के बाद शुरू हुई.

किसी ने रेलवे के विकास में भूमिका निभाई, किसी ने इंजीनियरिंग और उद्योग के विकास में, किसी ने टकसाल व्यवस्था में और किसी ने प्रशासन तथा राजनीतिक संस्थाओं के निर्माण में योगदान दिया. जापान के मौडर्नाइजेशन में इन पांचों लोगों की भूमिका को इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जाता है. उन्होंने सिर्फ यह नहीं कहा कि दूसरे देश हम से आगे हैं. उन्होंने पूछा, ‘हम उन से सीख कर अपने देश को आगे कैसे ले जाएं?’

यही सोच किसी भी पिछड़े समाज को बदल सकती है

उत्तर प्रदेश में भी ऐसी सोच की जरूरत थी. मायावती के पास सत्ता थी. उन के पास प्रशासन था. उन के पास बजट था. उन के पास लाखों समर्थक थे. उन के पास दलित समाज में असाधारण राजनीतिक असर था.

उस पौलिटिकल पावर को ऐसी संस्थाओं में क्यों नहीं बदला गया जो अगले 50 साल तक दलित युवाओं को मजबूत करतीं? अगर लखनऊ में एक बड़ा पार्क बनता है, वहां करोड़ों रुपए लगा कर पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां बनवाई हैं, तो लोग वहां जाते हैं, देखते हैं और लौट आते हैं, लेकिन अगर उसी पैसे से हजारों बच्चों के लिए तकनीकी संस्थान बनते हैं, तो वे बच्चे आगे चल कर हजारों परिवारों की जिंदगी बदल सकते हैं.

दलित समाज को किसी नेता का इंतजार क्यों करना चाहिए? यह सवाल सिर्फ मायावती से नहीं, पूरी दलित राजनीति से है. अगर कोई समाज हर चुनाव में यह इंतजार करे कि कोई नेता आएगा, उस की समस्या उठाएगा और उसे आगे ले जाएगा, तो समाज हमेशा किसी दूसरे की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना रहेगा.

असल ताकत तब आएगी जब गांव का दलित युवा खुद तय करे, मैं सिर्फ मजदूर नहीं बनूंगा, मैं मशीन चलाना सीखूंगा. मैं सिर्फ नौकरी नहीं करूंगा, मैं कारोबार भी करूंगा. मैं सिर्फ खेती नहीं करूंगा, आधुनिक खेती करूंगा. मैं सिर्फ मोबाइल इस्तेमाल नहीं करूंगा, तकनीक बनाना सीखूंगा. मैं सिर्फ वोट नहीं दूंगा, नीति को भी सम?ांगा. मैं अपने बच्चों को ऐसी तालीम दूंगा कि उन्हें किसी नेता के सहारे की जरूरत न पड़े.

मायावती की राजनीति की सब से बड़ी ताकत दलितों का भरोसा रही है, लेकिन उन के राजनीतिक गठबंधनों ने समयसमय पर इस भरोसे को तोड़ा है, कभी समाजवादी पार्टी के साथ और कभी भाजपा के साथ सत्ता साझा करने के फैसलों ने सत्ता हासिल करने के लिए उन्होंने वैचारिक विरोधियों से भी सम?ाता किया.

1990 के दशक में बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया, जबकि बाद के सालों में भाजपा के समर्थन से भी मायावती सरकार बनी. 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को 98 सीटें और 23.06 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 88 सीटें मिलीं.

आलोचना यहीं से उठती है कि जिस राजनीति ने दलितों को सामाजिक सम्मान और स्वतंत्र राजनीतिक आवाज देने का दावा किया, उस में सत्ता के लिए अलगअलग दलों के साथ सम?ाते कितने दूर तक जायज थे? ऐसे फैसलों ने दलित मतदाताओं के उस भरोसे को चोट पहुंचाई कि बसपा उन की राजनीति को किसी भी कीमत पर सत्ता से ऊपर रखेगी. उन्होंने  ‘दलित वोट का सौदा’ किया दलितों के साथ ‘विश्वासघात’ किया.

जिस समाज की वजह से मायावती सत्ता के शीर्ष तक पहंचीं, उन से सवाल है कि कि उन्होंने लोगों को अपनी जिंदगी बदलने की क्षमता कितनी दी? आप ने दलित समाज को सत्ता की भाषा तो सिखाई, लेकिन क्या आप ने उसे नई इकोनौमी की भाषा भी उतनी मजबूती से सिखाई?

आप ने अंबेडकर का नाम सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया, लेकिन क्या अंबेडकर के विचारों को हर गांव के स्कूल और हर युवा के कौशल तक पहुंचाया? आप ने स्मारक बनाए, लेकिन क्या उसी लैवल पर तकनीकी संस्थान बनाए? आप ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाया, लेकिन क्या उतने ही बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रतिनिधित्व तैयार किया?

अब सवाल मायावती के बाद की पीढ़ी का है. आज चर्चा इस बात की भी हो रही है कि बसपा में अगली पीढ़ी कौन होगी?

लेकिन शायद दलित समाज को इस सवाल को थोड़ा अलग तरीके से देखना चाहिए.

सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मायावती के बाद कौन? सवाल होना चाहिए कि मायावती के बाद दलित समाज कैसा होगा? क्या वह सिर्फ चुनावी आंकड़ा होगा या हजारों उद्यमियों का समाज होगा? क्या वह सिर्फ सरकारी नौकरी का इंतजार करेगा या अपनी कंपनियां बनाएगा? क्या उस के युवा सिर्फ मजदूरी करेंगे या आधुनिक तकनीक सीख कर दुनिया के बाजार में काम करेंगे? क्या गांव के बच्चे सिर्फ अंबेडकर की प्रतिमा के सामने फोटो खिंचाएंगे या अंबेडकर के विचारों को पढ़ कर अपनी जिंदगी बदलेंगे?

अंबेडकर को याद करने का सब से मजबूत तरीका शायद यही है कि दलित समाज पढ़ाईलिखाई में आगे निकले. जिसे आर्थिक रूप से कमजोर रखा गया था, वह आर्थिक रूप से ताकतवर बने. जिसे फैसला लेने से दूर रखा गया था, वह खुद फैसला लेने के हालात में पहुंचे.

मायावती ने दलित राजनीति को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन उस राजनीति की अगली परीक्षा कहीं ज्यादा मुश्किल है. स्मारकों से आगे बढ़ कर स्कूल चाहिए. स्कूलों से आगे कौशल चाहिए. कौशल से आगे उद्योग चाहिए. उद्योग से आगे आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए.

शायद यही वह काम है जिसे आने वाली दलित राजनीति को प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि किसी समाज को हमेशा यह नहीं चाहिए कि उस का नेता उस के लिए लड़ता रहे. असली जीत तब होगी जब वह समाज इतना शिक्षित, संगठित, कुशल और आर्थिक रूप से मजबूत हो जाए कि उसे अपने अधिकार के लिए किसी एक नेता का इंतजार ही न करना पड़े. Politics

Editorial : पौराणिक कथाओं से खत्म होता दलित छात्रों का कैरियर

Editorial. देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराने वाले 23 आईआईटी में जाति का जम कर बोलबाला है. यहां पढ़ रहे 1.2 लाख स्टूडैंट्स में से आधे ऊंची जातियों के हैं और वे खातेपीते घरों से हैं जिन्हें बचपन से अपने को ऊंचा होने का एहसास दिलाया गया है. आमतौर पर एक बड़ा गुट एकसाथ रहता है और इन में आपसी मतभेद कम होते हैं.

बाकी आधों से ये आधे खार खाए रहते हैं क्योंकि जहां ऊंची जाति वालों को पूरी 11 से 15 लाख की फीस, जिस में होस्टल और मैस का खाना शामिल है, देनी होती है, रिजर्वेशन पाए वालों को बहुत कम देनी होती है और वे कुछ लाख दे कर पढ़ाई में अच्छे हों तो इंजीनियर बन जाते हैं.

ऊंची जाति वाले छात्रों को यह खलता रहता है कि ये रिजर्वेशन वाले यदि प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों में जाते तो उन्हें पूरी 15 से 40 लाख की फीस देनी पड़ती. ऊंची जाति के छात्र नीची जाति वालों को आज भी तंग करते रहते हैं.

आईआईटी बौम्बे में रिजर्वेशन पाने वाले एक सैकंड ईयर के स्टूडैंट साहिल वाकोड़े ने 18 सितंबर को डीन की भेदभाव वाली नीति और उस की शिकायतों पर ध्यान न देने पर आत्महत्या कर ली. वह अपनेआप गलत था. वह दलित था न.

तमाम आरक्षण के बावजूद, तमाम जाति है ही नहीं के नारों के बावजूद असलियत यही है कि दलित स्टूडैंट्स कही भी हों, उन्हें मानसम्मान तो दूर पास बैठने तक नहीं दिया जाता. पढ़ाई की जगह पर यह भेदभाव शुरू हो जाता है, स्कूलों से, और मैरिट में अच्छे नंबर लाए जाने पर भी बंद नहीं होता.

इस देश में एकलव्य मरे नहीं हैं, द्रोणाचार्यों की भरमार है जो अर्जुनों के कहने पर नीची जाति वालों को हुनर देना नहीं सिखाते. यह देश उस की पूजा करता है जिस ने उस शंबूक का गला काट डाला जिस ने वेदों को याद करना शुरू कर दिया था और उसे ही एक ब्राह्मण लड़के की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया था.

जब हर किताब, अखबार, टीवी चैनल पर नीची जाति वालों को हर जगह बेइज्जत किया जाता है तो डीन प्रोफैसर सूर्यनारायण डूला ने नकल का आरोप लगा कर साहिल को सस्पैंड करने की बात को समर्थन क्यों नहीं देगा. नीट की परीक्षा में पेपर लीक हुए, लाखों में ऊंची जाति के छात्रों को पेरेंट्स ने अपने ऊंची जाति के लाड़लों के लिए खरीदे, कुछ नहीं हुआ. एक एकलव्य, एक शंबूक, एक अंबेडकर, एक मायावती, एक पासवान साथ बैठ जाएं यह आईआईटी के आधे छात्रों और आधी फैकल्टी को मंजूर नहीं है.

नकल करने का आरोप ऐसा ही है जैसा एकलव्य के गुरुदक्षिणा न देने का है. यह शंबूक के कारण ब्राह्मण पुत्र की हत्या है. जीवन भर लगा कर, मैरिट में जगह बना कर आईआईटी बौम्बे में पहुंचे साहिल वाकोड़े का पूरा कैरियर एक इनविजिलेटर ने सैकड़ों पौराणिक कथाओं की तरह खत्म कर दिया.

यह पहला और आखिरी मामला नहीं है. हर जगह हो रहा है, और जैसेजैसे पढ़ाई में तेज हो कर दलितपिछड़े घरों के बच्चे ऊंचे स्थानों पर पहुंच रहे हैं, गुस्सा उबल रहा है. एक रिधिका शर्मा ने इंस्टाग्राम टीम पर दलित स्टूडैंट्स की अपने हक और इज्जत मांगने पर जम कर हल्ला मचाया है. उस के 7 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं क्योंकि वह दलितों को अपनी जगह, गीता के अनुसार पैरों से बाहर धकेलने में विश्वास रखती है. ऐसे हजारों हैं जो अपनी बात कहते हैं और ऊंची जाति वाले पैसे वाले सुनते हैं.

दलितों के पास आज भी जबान नहीं. आज भी वे अपने ही लोगों को या अपनी वकालत करने वालों को पैसा देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन में मन के भीतर वही बैठा है कि वे पिछले, दलित इसलिए हैं कि उन के पूर्वजन्म के कर्म अच्छे नहीं थे. वे मन से न विरोध करना जानते हैं, न अपनी बात कहने वालों का साथ दे पाते हैं. वे तो बिक जाते हैं, भगवा खेमों में जो बैठते हैं और रोहित वेमुला जैसी मौत पर 2-4 रोज स्यापा कर के इसे अपना भाग्य मान लेते हैं.Editorial

Editorial : बिना नेता के बहकाया जा रहा है वंचित समाज

Editorial. आमतौर पर कोई जना नेता तभी बन पाता है जब वह अपने पीछे चल रहे लोगों का भला सोचता हो, कुछ ऐसा करता हो जो पीछे चलने वाले अकेले नहीं कर सकते और उन्हें एक समूह, एक भीड़ की जरूरत हो और उस भीड़ को सही रास्ता दिखाने वाले की. इतिहास में ऐसे लोगों की कमी नहीं रही है जिन्होंने भीड़ को पहले बड़ेबड़े वादों से ऊंचाइयों पर ले जाने का भरोसा दिया पर रास्ते में किसी खाई में फेंक दिया.

अछूतों, एकदम गंदा काम करने वालों, हिंदू वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोगों को, जिन्हें संविधान में एससी कहा गया है और आमतौर पर अछूत कहा जाता है, को कांशीराम ने 1970 के आसपास एक मंच पर खड़ा करने की कोशिश की थी. भीमराव अंबेडकर ने पहले इन के हितों की बात की थी पर वे पूरी कांग्रेस को उन की अगुआई करने को तैयार नहीं कर सके.

नेता बिना हजारों सालों से लूटे जाने, पैरों वालों से कुचले जाने और सताए जाने वाले वे लोग जानवरों सा जीवन जी कर भी सेवा करने में लगे रहे क्योंकि उन्हें बहका दिया था कि यह सब उन के पिछले जन्मों का फल हैं. न अंबेडकर, न गांधी, न कांशीराम उन्हें इस सोच से निकाल कर बराबरी की जगह पर खड़ा कर पाए.

उम्मीद थी कि मायावती, जो कांशीराम का दायां हाथ बन गई थीं, कुछ कर पाएंगी पर वे सत्ता सुख की चाशनी चख कर अपने पीछे चल रहे लोगों को भूल गईं. पिछड़ी भीड़ के आगे कोई और उभरा नहीं तो बेबस हो कर वह मायावती के पीछे चलती रही जबकि मायावती उन्हीं लोगों की गोद में जा बैठीं जिन्होंने वर्णव्यवस्था, पिछले जन्म की मूर्खता वाली ?ाठी कहानियां गढ़ी थीं. आज भी इन दलितों का कोई नेता नहीं जबकि इन में से सैकड़ों पढ़लिख कर ऊंची पोस्टों पर आ गए हैं. जिस ने भी कुछ खराखरा कहने की कोशिश की, उसे मायावती की तरह गाड़ीबंगला दे कर खरीद लिया गया.

देश की 25-30 करोड़ आबादी जन्म से मरने तक जानवरों की तरह जीती रहे, यह विज्ञान और तकनीक के युग में धब्बा है. मायावती भी जिम्मेदार हैं और पीछे की भीड़ भी. यह भीड़ उसी तरह की मूर्ख है जैसे 1930 से 1945 तक जरमनों की भीड़ हिटलर के पीछे चली. उसी तरह की भीड़ है जैसी चीनियों की माओ के पीछे चली. जैसी आज उत्तर कोरिया के किम जोंग उन के पीछे चल रही है.

दलित किसी भी तरह से किसी भी ब्राह्मण से कम नहीं हैं. न अक्ल में, न बल में, न मेहनत में. उलटे वे ब्राह्मणों से ज्यादा तेज हैं पर बस सही नेता और सही रास्ते से भटक रहे हैं. मायावती उन्हें एक गंदी खाई के बाद दूसरी गंदी गहरी खाई में धकेल रही हैं. कुछ अलग हो कर सीधे भगवाइयों के साथ मिल गए हैं पर वहां और बुरी हालत है. वे अपने जैसों के सही नेता नहीं हैं और इसलिए हर समय अपमान सहते हैं, भेदभाव सहते हैं.  Editorial

Politics : आईना – ‘दिमागी नक्सल’ का सवाल और लोकतंत्र की आजादी

Politics. ‘नक्सल’ शब्द सुनते ही आज हमारे सामने बंदूक, जंगल और हिंसा की तसवीर आ जाती है, लेकिन ‘नक्सल’ शब्द की शुरुआत बंदूक से नहीं हुई थी. इस की शुरुआत जमीन, किसान और अधिकार के सवाल से हुई थी.

1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिग जिले के नक्सलबाड़ी इलाके में किसानों का आंदोलन खड़ा हुआ. जमीन पर अधिकार, बंटाईदार किसानों के हक और जमींदारों के शोषण के खिलाफ किसानों में गुस्सा था. इन लोगों को कम्युनिस्टों ने सही रास्ता बताया पर वह रास्ता पुराणों से हो कर मंदिरों के बीच से नहीं गुजरना था. इसी आंदोलन के नाम पर आगे चल कर ‘नक्सल’ शब्द प्रचलित हुआ.

उस समय किसान का सवाल सीधा था कि जिस जमीन पर हम मेहनत करते हैं, उस पर हमारा हक क्यों नहीं? गरीब किसान और खेत मजदूर शोषण क्यों सहें? हमारी शिकायत कौन सुनेगा?

इन सवालों को सम?ाना जरूरी है, क्योंकि किसी आंदोलन के पैदा होने की सामाजिक वजह सम?ाना और बाद में उस के नाम पर हुई हिंसा का समर्थन करना एक बात नहीं है.

नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद नक्सल आंदोलन का एक हिस्सा धीरेधीरे हथियारबंद माओवादी राजनीति की ओर चला गया.  ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मण द्रोणाचार्य ने शूद्र एकलव्य से हथियार छीना था, कांग्रेस की तब की पौराणिकवादी सरकार ने पाखंड को हथियार बनाया पर वह कामयाब नहीं हुआ.

किसान मजदूर ने बंदूक, हत्या, विस्फोट और हिंसा को संघर्ष का रास्ता बनाया. यहां से मामला बदल गया. लोकतांत्रिक समाज में किसी की हत्या करना, अपहरण करना, विस्फोट करना या बंदूक के बल पर व्यवस्था बदलने की कोशिश करना स्वीकार नहीं किया जा सकता पर तब की सरकार जमींदारों को खुश करने में लगी थी क्योंकि वही लगान वसूल करते थे और गांवों को गरीब रखते थे ताकि कलकत्ता (अब कोलकाता) की फैक्टरियों को सस्ते मजदूर मिलते रहें.

लेकिन सवाल फिर भी बचता है, आखिर लोग नक्सल क्यों बनते हैं?

हर किसी के नक्सल बनने की वजह एकजैसी नहीं होती. कहीं जमीन का विवाद है, कहीं आदिवासियों का विस्थापन, कहीं जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार का सवाल, कहीं गरीबी और बेरोजगारी, कहीं प्रशासन की अनदेखी और कहीं स्थानीय शोषण.

जब किसी आदमी को लगातार यह महसूस होने लगे कि उस की बात कोई नहीं सुन रहा, इंसाफ मिलने का रास्ता बंद है और व्यवस्था ताकतवर लोगों के पक्ष में खड़ी है, तो उस के भीतर व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा पैदा होता है. अगर उस गुस्से को लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता और हिंसक संगठन उसे अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं, तो कुछ लोग हथियारबंद राजनीति की ओर चले जाते हैं.

इस का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि हिंसा जायज हो जाती है. अन्याय का कारण सम?ाना और हिंसा का समर्थन करना 2 अलग बातें हैं.

किसी किसान की जमीन का सवाल है तो उस की बात सुनी जानी चाहिए. किसी आदिवासी के विस्थापन का सवाल है तो उस के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए. किसी गरीब को न्याय नहीं मिल रहा है तो उसे न्याय मिलना चाहिए. गांव में स्कूल, अस्पताल, सड़क और रोजगार नहीं है तो सरकार से सवाल होना चाहिए. लेकिन बंदूक उठाना इस का लोकतांत्रिक समाधान नहीं हो सकता.

यहीं से आज के ‘दिमागी नक्सल’ वाले सवाल को सम?ाना जरूरी है.

अगर कोई शख्स जमींदार के जुल्म के खिलाफ खड़ा हुआ था, तो क्या वह देश का दुश्मन था? अगर कोई किसान अपनी जमीन और मेहनत का हक मांगता है तो क्या वह देश का दुश्मन है? अगर कोई मजदूर शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है तो क्या वह देश का दुश्मन है? और अगर आज कोई नागरिक सरकार की किसी नीति पर सवाल उठाता है तो क्या वह भी ‘दिमागी नक्सल’ हो गया?

यहीं असली बहस है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द इस्तेमाल किया. लालकिले से कही गई बात को सामान्य राजनीतिक बयान मान कर छोड़ देना आसान नहीं है. प्रधानमंत्री देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर हैं, इसलिए यह पूछना जरूरी है कि आखिर ‘दिमागी नक्सल’ से उन का मतलब किन लोगों से है?

अगर इस का मतलब उन लोगों से है जो हिंसक माओवादी गतिविधियों का समर्थन करते हैं, युवाओं को हथियार उठाने के लिए उकसाते हैं या हिंसा के जरीए लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म करना चाहते हैं, तो उन के खिलाफ कानून मौजूद है. कार्रवाई होनी चाहिए.

लेकिन अगर इस शब्द का दायरा इतना बड़ा है कि इस में सरकार की आलोचना करने वाले, आंदोलन करने वाले, पत्रकार, लेखक, विद्यार्थी, शिक्षक या सरकार की नीतियों से असहमत नागरिक भी शामिल हो जाएं, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता की बात होगी, क्योंकि सरकार से सवाल पूछना नागरिक का अपराध नहीं, उस का अधिकार है.

प्रधानमंत्री देश के हैं, लेकिन सरकार देश नहीं है. सरकार आतीजाती है. राजनीतिक दल सत्ता में आते हैं और बाहर जाते हैं. नेता बदलते हैं, लेकिन देश और संविधान किसी एक सरकार या नेता से बहुत बड़े हैं, इसलिए सरकार की आलोचना को देश की आलोचना सम?ाना लोकतंत्र की बुनियादी भावना के खिलाफ है.

आजादी का मतलब केवल इतना नहीं है कि भारत पर किसी विदेशी सत्ता का शासन नहीं है. आजादी का मतलब यह भी है कि भारत का नागरिक अपने मन की बात कह सके, सरकार से सवाल कर सके, किसी नीति का विरोध कर सके, गलत फैसले के खिलाफ आवाज उठा सके और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति दर्ज करा सके.

अगर नागरिक को यह डर रहने लगे कि सरकार की आलोचना करने पर उसे किसी खतरनाक राजनीतिक विशेषण से पुकार दिया जाएगा, तो फिर आजादी का असली मतलब कमजोर पड़ जाएगा.

हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की पूरी कहानी असहमति की कहानी भी है. अंगरेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को उस समय सत्ता की नजर में विद्रोही कहा जाता था. गांधी ने अंग्रेजी सत्ता का विरोध किया. भगत सिंह ने औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी. डाक्टर अंबेडकर ने सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाए. ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने सदियों पुरानी सामाजिक रूढि़यों को चुनौती दी.

अगर हर सवाल पूछने वाले को उस समय देश का दुश्मन कह दिया जाता तो क्या भारत आजाद हो पाता?

सवाल यह नहीं है कि हर आंदोलन सही होता है या हर विरोध जायज होता है. सवाल यह है कि गलत आंदोलन को गलत साबित करने का लोकतांत्रिक तरीका क्या है?

अगर हिंसा हुई है तो मुकदमा चलाइए. अगर अपराध हुआ है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई कीजिए. अगर कोई हिंसा के लिए उकसा रहा है तो उस के खिलाफ कार्रवाई कीजिए. अगर किसी ने ?ाठ फैलाया है तो तथ्य सामने रखिए.

लेकिन कोई केवल सरकार से असहमत है, इसलिए उस के माथे पर ‘नक्सल’ का ठप्पा लगा देना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं हो सकता.

आज ‘अर्बन नक्सल’ जैसे शब्द भी सुनने को मिलते हैं. अब ‘दिमागी नक्सल’ सामने आया है. सवाल यह है कि इस की सीमा क्या है? कौन तय करेगा कि कौन ‘दिमागी नक्सल’ है?सरकार? पुलिस? कोई अफसर? कोई राजनीतिक दल? कोई पंडापुजारी या भगवा गमछा पहनने वाला? ‘हिंदू खतरे में है’ का नारा लगाने वाला या फिर कानून और अदालत?

ये सवाल इसलिए जरूरी हैं क्योंकि राजनीतिक विशेषण बहुत जल्दी हथियार बन जाते हैं. आज किसी एक विचार वाले शख्स को एक नाम दिया जाएगा, कल किसी दूसरी सरकार के समय दूसरे विचार वाले लोगों को दूसरा नाम दिया जा सकता है.

सत्ता बदलती रहती है, लेकिन बनाए गए राजनीतिक हथियार रह जाते हैं, इसलिए ऐसी भाषा से सावधान रहना चाहिए. लोकतंत्र में सरकार को आलोचना से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. सरकार को जवाब देना चाहिए.

कोई पूछे कि नौकरी कहां है? तो जवाब नौकरी से दीजिए. कोई पूछे कि महंगाई क्यों बढ़ी? तो जवाब आंकड़ों और नीतियों से दीजिए. कोई पूछे कि परीक्षा में गड़बड़ी क्यों हुई?

तो जवाब पारदर्शी जांच से दीजिए. कोई पूछे कि गांव में अस्पताल क्यों नहीं है? तो जवाब अस्पताल बना कर दीजिए. कोई पूछे कि किसान को फसल का उचित मूल्य क्यों नहीं मिल रहा? तो जवाब नीति बना कर दीजिए. कोई पूछे कि गांव में मंदिर बन सकता है तो स्कूल क्यों नहीं? तो जवाब स्कूल बना कर दीजिए. कोई पूछे कि धर्मशाला बन सकती है तो लाइब्रेरी क्यों नहीं? तो जवाब लाइब्रेरी बना कर दीजिए.

सवाल पूछने वाले को ‘दिमागी नक्सल’ कह देने से सवाल खत्म नहीं होगा, बल्कि सवाल पूछने वाला और ज्यादा सवाल करेगा. और करना भी चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है.

अब जरा उस शब्द पर लौटिए, ‘दिमागी’. दिमाग से सोचने वाला आदमी अगर सत्ता से सवाल करता है तो क्या वह ‘दिमागी नक्सल’ है? अगर कोई विद्यार्थी पूछता है कि परीक्षा में धांधली क्यों हुई, तो क्या वह ‘दिमागी नक्सल’ है? कोई बेरोजगार युवा पूछता है कि नौकरी कहां है, तो क्या वह ‘दिमागी नक्सल’ है? कोई किसान अपनी फसल का उचित मूल्य मांगता है, तो क्या वह ‘दिमागी नक्सल’ है? कोई पत्रकार सरकारी आंकड़ों पर सवाल उठाता है, तो क्या वह ‘दिमागी नक्सल’ है? कोई लेखक सत्ता की नीतियों की आलोचना करता है, तो क्या वह ‘दिमागी नक्सल’ है? कोई शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर बोलता है, तो क्या वह ‘दिमागी नक्सल’ है? कोई नागरिक पूछता है कि उस के गांव में सड़क क्यों नहीं बनी, अस्पताल में डाक्टर क्यों नहीं है और स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं है, तो क्या वह भी देश के खिलाफ खड़ा माना जाएगा?

अगर इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है तो फिर ‘दिमागी नक्सल’ की साफ सीमा और परिभाषा सामने आनी चाहिए.

दिमागी होना गलत नहीं है. दिमाग बंद कर देना जरूर खतरनाक है. लोकतंत्र को ऐसे नागरिक चाहिए जो सोचें, सवाल करें और गलत को गलत कह सकें.

विचार गलत है तो विचार से जवाब दीजिए. तर्क गलत है तो तर्क से जवाब दीजिए. आरोप गलत है तो तथ्य सामने रखिए. अपराध हुआ है तो कानून कार्रवाई करे. हिंसा हुई है तो कानून कार्रवाई करे. लेकिन असहमति का जवाब ‘दिमागी नक्सल’ का ठप्पा नहीं हो सकता.

नक्सलवाद की समस्या का स्थायी समाधान केवल बंदूक से भी नहीं हो सकता. जहां दशकों तक गरीबी, विस्थापन, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, बेरोजगारी और न्याय तक पहुंच की कठिनाई रहती है, वहां असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है.

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हिंसा का विरोध जरूरी है, लेकिन उन हालाल को समझना भी जरूरी है जिन से असंतोष पैदा होता है.

अगर सरकार सचमुच नक्सलवाद को खत्म करना चाहती है तो सुरक्षा अभियान के साथसाथ स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार, न्याय और सम्मान भी देना होगा. जायज शिकायतों को सुनना होगा, क्योंकि जिस आदमी को लगता है कि उस की बात सुनने वाला कोई नहीं है, वह किसी ऐसे शख्स की बात सुन सकता है जो उसे व्यवस्था बदलने का सपना दिखा रहा हो.

लोकतंत्र की खूबी यही है कि वह असंतोष को हिंसा में बदलने से पहले आवाज देता है. आंदोलन का अधिकार देता है. संगठन बनाने का अधिकार देता है. चुनाव का रास्ता देता है. अदालत का रास्ता देता है. प्रैस और साहित्य का रास्ता देता है, इसलिए असहमति को जगह देना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उस की ताकत है.

आजादी की असली रक्षा केवल सीमा पर खड़ा सैनिक नहीं करता, वह नागरिक भी आजादी की रक्षा करता है जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है. वह पत्रकार भी आजादी की रक्षा करता है जो सत्ता से सवाल पूछता है. वह लेखक भी आजादी की रक्षा करता है जो समाज की कमियों पर लिखता है. वह किसान भी आजादी की रक्षा करता है जो अपने हक की मांग करता है. वह विद्यार्थी भी आजादी की रक्षा करता है जो गलत व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाता है, इसलिए हमें तय करना होगा कि हमें कैसा भारत चाहिए.

ऐसा भारत जहां नागरिक केवल सरकार की तारीफ करें या ऐसा भारत जहां नागरिक सरकार से यह भी पूछ सके कि आपने जो वादा किया था, वह पूरा क्यों नहीं हुआ?

मेरे लिए आजादी का मतलब साफ है कि दिमाग को किसी सत्ता के सामने गिरवी न रखना, सवाल पूछने की आजादी, असहमति की आजादी, गलत को गलत कहने की आजादी, नाइंसाफी के खिलाफ खड़े होने की आजादी और सत्ता से जवाब मांगने की आजादी.

अगर कोई बंदूक उठाता है तो कानून अपना काम करे. अगर कोई हिंसा करता है तो कानून अपना काम करे. लेकिन अगर कोई कलम उठाता है, सवाल उठाता है या शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात कहता है तो उस के दिमाग को ‘नक्सल’ कह कर खारिज करना लोकतंत्र के हित में नहीं है.

हिंसा का विरोध कीजिए, लेकिन हर असहमति को नक्सल मत बनाइए, क्योंकि सवाल पूछने वाला नागरिक लोकतंत्र का दुश्मन नहीं होता. वह लोकतंत्र का प्रहरी होता है.

देश सरकार से बड़ा है. संविधान किसी एक दल से बड़ा है. लोकतंत्र किसी एक नेता से बड़ा है और भारत किसी एक राजनीतिक विचारधारा से बहुत बड़ा है, इसलिए आज जरूरत ‘दिमागी नक्सल’ खोजने की नहीं, दिमागी आजादी बचाने की है, क्योंकि जिस दिन नागरिक सवाल पूछना छोड़ देगा, उस दिन लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा खतरा किसी जंगल में छिपा नक्सली नहीं होगा, बल्कि हमारे भीतर बैठा वह डर होगा जो हमें अपनी ही बात कहने से रोक देगा.

याद रहे कि आजादी का असली मतलब यही है कि दिमाग आजाद रहे और सवाल जिंदा रहें. Politics

Story in Hindi : ऐलान ए जग

Story in Hindi. ‘‘जल्दी चलो,’’ वह बोला.

‘‘मैं तो तुम्हारे पीछेपीछे ही आ रही हूं. तुम्हारे ही पैर नहीं उठ रहे हैं. मुड़मुड़ कर पीछे क्या देख रहे हो? दिल में कुछ है क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, गांव छूट रहा है न… संगीसाथी… अपने लोग… छूट गए एक ही  झटके में. दर्द तो होगा ही. बहुत मजबूरी में गांव छोड़ रहा हूं.’’

‘‘एक बार फिर सोच लो, अभी कोई ज्यादा दूर नहीं आए हैं,’’ वह ठिठक कर खड़ी हो गई.

‘‘अब क्या सोचना है. हम तो अब ऐसे रास्ते पर निकल चुके हैं, जहां से वापस लौटना नामुमकिन है. मैं इस घटना को कमजोरी नहीं बनाना चाहता हूं. एक जंग की शुरुआत हो चुकी है.’’

‘‘हम गरीब मजदूर हैं, मेहनत के सिवा हमारे पास कुछ भी नहीं है. इतनी बड़ी लड़ाई हम कैसे लड़ेंगे? आने वाली परेशानियों को सोच कर डर गए, तो हम मुसीबत में आ सकते हैं, इसलिए हमें जल्दीजल्दी चलना चाहिए. समय नहीं है.’’

‘‘अभी बहुत समय है. स्टेशन कौन सा दूर है. गांव के लोग रात में दुबके पड़े होंगे. इस समय कौन आता है इधर?’’

‘‘यह रात हमारी दुश्मन बन गई है.’’

‘‘हमारा कुछ भी अपना नहीं है… हमारी इच्छाएं, हमारी खुशियां दूसरों के हाथों में होती हैं. हम मशीन हो कर रह जाते हैं. सामंत लोग हमें इनसान सम झते ही कहां हैं?

‘‘जब अपने ही दुश्मन बन जाएं, तो दूसरे रास्ते तलाशने पड़ते हैं. तुम अपने गांव को बहुत प्यार करते हो न?’’

‘‘हां, पर अब हम गांव छोड़ चुके हैं, यह अब फांसी का फंदा बन चुका है.’’

‘‘जहां जाएंगे, वहां ठीक से रह पाएंगे क्या?’’   ‘‘समय हर जख्म को भर देता है.’’

‘‘अगर ऐसा नहीं हुआ तो…’’ ‘‘कुछ नहीं होगा. नई माटी… नई गंध… नए लोगों के साथ नई जिंदगी बसाएंगे.’’

‘‘वह दिन जिंदगी का सब से अच्छा दिन होगा. जो कुछ हुआ, उस में तुम कहीं मु झे कुसूरवार तो नहीं मानते?’’

‘‘नहीं.’’   ‘‘वजह तो मैं ही थी.’’

‘‘तुम कुसूरवार नहीं हो. कोई भी हमारे बीच आया, तो उस का भी यही हाल होगा.’’

‘‘मैं बहुत खुश हूं कि तुम अपने गांव से इतना प्यार करते हो. एक न एक दिन इस गांव में तुम्हारे साथ जरूर वापस आऊंगी.

‘‘यह मेरी भी तो ससुराल है. जिस ने मेरी ससुराल… मेरा सुखचैन छीना, उस का सबकुछ छीन कर रहूंगी. मैं बदले की आग में जल रही हूं.’’

‘‘तुम्हारी बातों में बड़ी ताकत है. मु झे बहुत अच्छा लगता है, जब तुम बोलती हो. हमारे हालात बिगड़ गए हैं. हर कदम संभल कर उठाना है. कुछ छूटता है, तो कुछ मिलता भी है. यह तो जिंदगी में चलता ही रहता है.’’

‘‘औरत अपने को हर हाल में महफूज रखना चाहती है. कुछ गलत कदम भी उठ जाते हैं, जिस का नतीजा उसे शैतान के खूनी पंजों तक पहुंचा देता है. हर जगह औरत का शोषण होता है… वह बारबार टूटती है… जुड़ती है… उजड़ती है… बसती है.

‘‘मैं जिंदा रहना चाहती हूं, मैं बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती. औरत की बेइज्जती कुदरत की बेइज्जती है.’’

‘‘मैं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं. इसीलिए तो इतना बड़ा काम कर दिया.’’

‘‘इसे हम जश्न के रूप में लेंगे… हम ऐसे जश्न हर रोज मनाएंगे… अपने साथ… औरों के साथ…’’

‘‘हम अपराधी हो गए हैं… कानून की नजरों में… गांव की नजरों में.’’

‘‘तुम अपराधी नहीं हो. तुम ने वही किया, जो हर पति करता. सच से कहीं भाग तो नहीं रहे हो न?’’

‘‘भाग कर जाऊंगा कहां? रहना तो यहीं है. हम ने इस तरह की जिंदगी सोची नहीं थी.’’

‘‘किस ने सोचा था? तुम ने सोचा था कि तुम्हारी बीवी के साथ चौधरी इतनी गिरी हरकत… बलात्कार करेगा आज रात? सोचने भर से ही जी कांप जाता है. वह बाप की उम्र का था. उस ने वह कर दिया… बेशर्म था.’’

‘‘उसे काट भी तो दिया.’’ ‘‘हम दोनों भी तो सजा के भागीदार हो गए?’’

‘‘बिना काटे भी तो मैं सजा का भागीदार बन जाता… अपनी नजरों में… तुम्हारी नजरों में?’’

‘‘खुश तो हो?’’ ‘‘दुखी नहीं हूं. मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता.’’

‘‘मैं ही कहां चाहती हूं तुम्हें खोना? इतना ही होता, तो मैं चौधरी को कटने नहीं देती. मौजमस्ती करती, उस के साथ और तुम फावड़ा ले कर खेत में काम करते. मु झे पसंद नहीं है यह सब… घिन आती है.’’

‘‘मैं खुश हूं तुम्हारा खून पानी नहीं हुआ है.’’

‘‘सच बताओ, तुम को कभी ऐसा लगता था क्या?’’ ‘‘नहीं.’’

‘‘हम और मजबूत हो गए.’’ ‘‘हर मोरचे पर मैं तुम्हारे साथ आगेआगे चलूंगी.’’

‘‘इसे बरकरार रखना है… हम जरूर कामयाब होंगे.’’

‘‘तुम सुल झे हुए हो. यह कामयाबी की पहली शर्त है.’’

‘‘हमें निराश नहीं होना पड़ेगा.’’

‘‘मुझे यहां का रास्ता नहीं मालूम है. कोई छोटा रास्ता पकड़ो. आम रास्ते से चलना अब ठीक नहीं होगा.’’

‘‘रात को इधर कौन आएगा?’’ ‘‘पूछ कर नहीं आएगा.’’

‘‘तेज चलो. समय बहुत कम है.’’

‘‘हम बहुत नजदीक आ गए हैं. मेरा मूड आज नाचने… गाने… मौजमस्ती करने का था. टेपरेकौर्डर में आज ही नई बैटरी लगवाई थी.’’   ‘‘मु झे मालूम है.’’

‘‘दिल को चोट लगी है… कह नहीं पा रही हूं?’’ उस का गला भर आता है. दोनों चुपचाप कुछ दूर तक चलते रहे.

‘‘बात करने से रास्ता जल्दी कट जाता है,’’ वह खामोशी तोड़ता है.

‘‘खामोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है. मु झे बात करने में बहुत मजा आता है. बात करने से जी हलका होता है.’’

‘‘हमारी खुशी चौधरी ने छीन ली.’’

‘‘तुम्हारा यह रूप मु झे बहुत प्यारा लगा.’’ ‘‘मैं कमजोर नहीं रहूंगा.’’

‘‘कमजोर मर्द को औरत पसंद नहीं करती.’’

‘‘अविश्वास ही इनसानी रिश्ते को कमजोर बनाता है.’’

‘‘गलती करने का समय नहीं है. जिंदगी अंधेरे में चली जाएगी.’’

‘‘मैं भावुक हूं, लेकिन बेवकूफ नहीं. हालात की नाजुकता को सम झता हूं.’’

‘‘वह जो खेत में नीम का पेड़ है न, वहीं चल कर थोड़ी देर बैठते हैं. वहां से स्टेशन भी साफ दिखेगा. सिगनल हुआ कि दौड़ कर गाड़ी पकड़ लेंगे.

‘‘स्टेशन जाना अभी ठीक नहीं है. वहां गांव का कोई आदमी मिल गया, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी.’’

दोनों आम रास्ता छोड़ खेत की मेंड़ पकड़ कर टेढ़ेमेढ़े रास्ते से होते हुए नीम के पेड़ के नीचे पहुंचे.

सुघरी ने बैग से निकाल कर एक नई चादर बिछा दी.

‘‘कितनी अच्छी है?’’ जमना ने उसे छू कर देखा.

‘‘मेरी भाभी मुंबई से लाई थीं… मेरी सुहागरात के लिए…’’

‘‘यहीं हमारी सुहागरात मनेगी,’’ कह कर वह हंसा.

‘‘आज जितना मिलेगा, उतने में ही हम अपना अच्छा समय बिताएंगे.’’

‘‘तु झे डर नहीं लगता है.’’  ‘‘नहीं. डरना क्या है? हर हालात से मुकाबला करने को तैयार रहना है. डरडर कर जीना कोई जीना नहीं रह जाता. हमें जिंदगी को अपने हिसाब से जीना है.’’

‘‘लोग बड़े गुनाह करते हैं और मजे से जीते हैं.’’ ‘‘हां, तुम ठीक कहते हो.’’

‘‘अब हम जोरजुल्म बरदाश्त नहीं करेंगे. अभी तो शुरुआत है… बहुतकुछ करना बाकी है.’’ ‘‘हक की लड़ाई लड़ेंगे.’’

‘‘यह काम पहले हो गया होता, तो आज हमारी यह हालत नहीं होती?’’ ‘‘हम ने सही राह पकड़ ली है.’’

‘‘थोड़ी और धार की जरूरत है.’’

‘‘गांव में सब से ज्यादा तुम्हारा ही परिवार चौधरी का शिकार हुआ है. जो उस ने मेरे साथ करने की कोशिश की, वह उस के जोरजुल्म की अगली कड़ी थी. किसी ने उस के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की, उन की आंखों के सामने ही उन की बहूबेटियों की इज्जत लुटती रही और वे सबकुछ देखते रहे.

‘‘तुम्हारे बाबा ने आवाज उठाई थी. सामंतों ने उन की इतनी पिटाई की कि जिंदगीभर चारपाई से उठ नहीं सके. इस भयानक नतीजे को देख कर फिर किसी ने हिम्मत नहीं की.

‘‘चौधरी को जाना था, उस ने आग को सीने से लगाने की कोशिश की. तुम्हारे अंदर तुम्हारे बाबा की आग थी, राख से ढकी हुई… वक्त की हवा लगते ही ज्वाला बन गई. इतिहास रच गया.’’

‘‘तुम तो एकदम नेता हो गई हो.’’ ‘‘जुल्म के पैरों तले कुचली गई

एक औरत हूं, जिस की सुहागरात खून में रंग गई.’’

‘‘मु झे तुम्हारी बातें कुछ अलग सी लगती हैं.’’

‘‘तुम खुश तो हो न? जो काम तुम ने किया, वह मैं ने किया होता तो मैं बहुत खुश होती.’’

‘‘मैं खुश हूं, तभी तो तुम्हारे साथ हूं. सुनते हैं, प्यार में लोग कमजोर हो जाते हैं.’’

‘‘एकदम  झूठ. वे प्यार नहीं करते होंगे. तुम खुद सोचो न.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो. मैं ही कभीकभी गड़बड़ा जाता हूं. तुम ने चौधरी को काट दिया. तुम मु झ से बहुत ज्यादा प्यार करती हो. कितना खुश हूं आज मैं.’’

‘‘चौधरी शैतान था. मैं ने बहुत कोशिश की उसे बहलानेफुसलाने की, पर उस पर तो शैतान सवार था. उसे आदत पड़ गई थी. वह मु झे उसी अंदाज में इस्तेमाल करना चाहता था.

‘‘मैं उस नरक की जिंदगी से मरना ज्यादा पसंद करती हूं. वह मु झ पर एकदम हावी हो गया था. तुम समय पर नहीं आए होते, तो वह अपनी मनमानी कर लेता. फिर उस की नहीं, मेरी लाश वहां पड़ी होती.’’

‘‘ऐसी बातें मत करो.’’

‘‘तुम ने मु झे बचाया है इसलिए कि मैं तुम्हारी बीवी हूं. जिसे तुम जीजान से प्यार करते हो. अपनी प्यारी चीज पर जब खतरा आया दिखता है, तो इनसान उस से मुकाबला करने के लिए अपनी पूरी ताकत  झोंक देता है.

‘‘तुम्हीं सोचो, तुम मु झे उस हालत में देख कर आंखें बंद कर के ऊपर वाले को याद करते, तो क्या हो जाता? तुम्हारे ऊपर वाले के आने के पहले तुम्हारी बीवी की इज्जत चौधरी लूट चुका होता और तुम नामर्द बने खड़ेखड़े आंसू बहाते रहते.

‘‘मैं खुश हूं… तुम को पति के रूप में पा कर. मैं तो तुम्हारी यादों में खोई हुई थी कि तभी चौधरी आ टपका, हमारी जिंदगी में जहर बन कर.

‘‘उसे देख कर मेरे मन में कुछ शक तो हो ही गया था. फिर भी मैं ने हिम्मत जुटा ली थी किसी भी हालात से निबटने के लिए.

‘‘मैं ने मन बना लिया था कि थोड़ा इधरउधर की बातें कर के उसे टरका दूंगी. वह मालिक है, यह तो याद ही रखना था. उस ने तुम से कहा और तुम आज्ञाकारी नौकर की तरह बोरिंग चालू करने खेत में चले गए.

‘‘मैं अकेली हो गई थी एक खूंख्वार मांसभक्षी के सामने, जो मेरे अंगअंग को ऐसे देख रहा था, जैसे कोई कसाई बकरे को.

‘‘मैं कमरे में आ गई. वह भी मेरे पीछेपीछे आ गया. उसे चौकी पर बैठने को कहा. वह एक खतरनाक मुसकराहट के साथ बैठ गया.

‘‘मैं जैसे ही बाहर निकलने के लिए आगे बढ़ी कि उस ने बाज की तरह  झपट कर मु झे पकड़ लिया.

‘‘मैं ज्यादा कुछ सम झती, वह तब तक मु झ पर हावी हो चुका था. उस ने मेरे कपड़े नोच कर मु झे नंगा कर दिया था कि मैं बाहर निकल कर न भाग सकूं. उस की प्लानिंग सही थी. मेरा नंगा होना मेरी मजबूरी बन गई थी.

‘‘मैं उस से लड़तेलड़ते थक गई थी… सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. उसे तो बस अपनी आग शांत करने की जल्दी थी.

‘‘मु झे महसूस होने लगा कि मैं अपने को ज्यादा देर तक नहीं बचा सकती. वह भूखे भेडि़ए की तरह मेरे नंगे जिस्म को नोच रहा था.

‘‘वह चाहता था कि प्यार से ही काम हो जाए, लेकिन मैं कतई राजी नहीं थी. लिहाजा, वह पहले से भी ज्यादा खूंख्वार हो गया.

‘‘मैं उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. उस का शिकंजा कसता गया. मैं ने पूरी ताकत से लात मार कर उसे चौकी से नीचे गिरा दिया.

‘‘मैं जैसे ही साड़ी ले कर बाहर जाने को भागी, उस के हाथ में मेरा पैर आ गया. उस ने  झटके से मु झे कमरे में खींच लिया.

‘‘मैं ने जोर से चिल्लाना शुरू किया, ताकि तुम सुन कर आ जाओ… या वह मु झे अपनी बदनामी के डर से छोड़ दे.

‘‘मु झे मालूम था कि वहां और भी लोग होंगे, पर उस के ऊपर इस का कोई असर नहीं पड़ा. तब तक तो तुम आ ही गए. सबकुछ अपनी आंखों से देख लिया और चौधरी के ऊपर फावड़े से वार पर वार करने लगे.

‘‘उस के कितने टुकड़े हो गए थे… गिनना भी मुश्किल हो गया था. खून के फव्वारे से पूरा कमरा रंग गया था. तुम्हारे ऊपर भी खून के छींटे पड़े थे.

‘‘मैं कोने में खड़ी थरथर कांप रही थी. बहुत ही डरावना नजारा था. तुम ने फावड़ा एक तरफ रख कर मेरी तरफ देखा. मैं दौड़ कर तुम से लिपट गई.’’

‘‘मैं ने जो किया, उसे क्या कहेंगे?’’ जमना ने पूछा.

‘‘तुम ने मेरी इज्जत बचा ली थी. एक मर्द का काम किया,’’ सुघरी उस से लिपट कर बोली.

‘‘लेकिन मु झे लगता है, हम लोग अकेले पड़ गए हैं. कोई साथ नहीं देगा. सब गाली देते होंगे… घर वालों को लोग बहुत सताएंगे… मारपीट करेंगे,’’ जमना ने शक जाहिर किया.

‘‘ऐसा मत सोचो. हमारे साथ समाज के सताए लोग होंगे, उन की हमदर्दी होगी. जहां तक हमारे घर वालों को मारनेपीटने का सवाल है, उन की तरफ आंख उठा कर कोई देखेगा भी नहीं.

‘‘चौधरी की मौत से हमारा परिवार ताकतवर हो गया है. सब से ज्यादा खुश होेंगे तुम्हारे बाबा… अब कोई भी गांव की बहूबेटियों की तरफ बुरी नजर डालेगा, तो वह सोचेगा, कहीं कोई और जमना किसी चौधरी को फिर काट न दे?’’ सुघरी फख्र से बोली.

उन्होंने स्टेशन की तरफ देखा. गाड़ी आ चुकी थी और हरी बत्ती जल गई थी. जल्दीजल्दी दोनों ने सामान समेटा और स्टेशन की तरफ दौड़ पड़े. Story in Hindi

-उदय भानु राय

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में सामाजिक न्याय की हत्या

West Bengal Politics. पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण को 27 फीसदी से घटा कर महज 7 फीसदी कर दिया गया है. यह फैसला सामाजिक न्याय के खिलाफ एक बड़ा हमला है. पिछड़े वर्गों के लिए लड़ाई लड़ने वाले लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि यह फैसला गरीबों, दलितों और पिछड़ों की तरक्की को रोकने की साजिश है. राज्य सरकार का कहना है कि यह बदलाव अदालत के निर्देशों और पुरानी ओबीसी सूची के मुताबिक किया गया है, लेकिन इस फैसले ने सामाजिक न्याय को ले कर गंभीर बहस छेड़ दी है.

आरक्षण कोई दान नहीं है. ऐसे में अगर ओबीसी आरक्षण का दायरा अचानक बहुत छोटा कर दिया जाए तो इस का सब से बड़ा असर उन्हीं गरीब और पिछड़े परिवारों पर पड़ेगा जो सरकारी नौकरियों और पढ़ाईलिखाई में आरक्षण के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे.

इस मुद्दे को केवल हिंदू बनाम मुसलमान बना कर देखना भी सही नहीं होगा. सरकार ने केवल 66 पुरानी ओबीसी जातियों को मान्यता देते हुए 7 फीसदी आरक्षण लागू किया. इस का मतलब यह है कि जिन हिंदू या मुसलिम जातियों को पहले ओबीसी का फायदा मिल रहा था, वे अब उस से बाहर हो जाएंगी, इसलिए इस फैसले का असर केवल मुसलिम तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी पिछड़े वर्गों पर पड़ेगा जो पहले इस व्यवस्था का हिस्सा थे.

यह नहीं भूलना चाहिए कि पश्चिम बंगाल के मुसलिम मूल रूप से पिछड़े और दलित थे जो सदियों पहले ब्राह्मणवादी समाज के कहर से निकलने के लिए इसलाम की शरण में चले गए थे.

सवाल यह है कि अगर किसी समाज को पहले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा माना गया था तो किस आधार पर उन्हें बाहर किया गया? क्या ओबीसी की लिस्ट से बाहर करने के लिए कोई नया और वैज्ञानिक सर्वे नहीं होना चाहिए था? क्या पूरे आरक्षण को घटा देना सामाजिक न्याय का समाधान है?

भारत का संविधान समान अवसर की बात करता है. अगर किसी सूची में गड़बड़ी थी तो उस का समाधान निष्पक्ष सर्वे, पारदर्शी प्रक्रिया और पिछड़ेपन के वैज्ञानिक आकलन से निकलना चाहिए था न कि ऐसे फैसले से जिस से लाखों ओबीसी नौजवानों के पढ़ने और रोजगार के संवैधानिक रास्ते ही बंद हो जाएं.

सामाजिक न्याय का उद्देश्य किसी धर्म को लाभ या नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि वास्तविक सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना है, इसलिए जरूरत इस बात की है कि ओबीसी सूची का निर्धारण राजनीतिक प्रेरणा के बजाय स्वतंत्र आयोग, सामाजिक सर्वे और संवैधानिक मानकों के आधार पर हो, तभी आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य समान अवसर और सामाजिक न्याय को पूरा कर सकेगी.

यह भाजपा की घटिया राजनीति का नतीजा है. हिंदुत्व की आंधी में सामाजिक न्याय के परखच्चे उड़ा दिए गए. इस फैसले से लाखों पिछड़े परिवारों का भविष्य अंधकार में चला गया. सरकारी नौकरियों और पढ़ाईलिखाई में उन की जगह छिन गई.

दुख की बात यह है कि ओबीसी के नेता चुप हैं. हिंदुत्व की लहर में वे भी बह गए हैं. वे अब खुद को हिंदू मान कर आरक्षण की लड़ाई भूल गए हैं. जो वर्ग सदियों से शोषण का शिकार रहा उसे अब फिर से पीछे धकेल दिया गया है. पिछड़े वर्गों को पढ़ाईलिखाई और नौकरी में बराबरी का मौका मिलना चाहिए. 7 फीसदी आरक्षण इतना कम है कि ज्यादातर नौजवान प्रतियोगिता में टिक ही नहीं पाएंगे.

भाजपा में सैकड़ों सांसद,  पार्षद, विधायक, सरपंच हैं, जो सत्ता का मजा तो ले रहे हैं पर अपने ही समाज के हक छीने जाने पर चुप हैं. ये विभीषण और सुग्रीव हैं जो अपने भाइयों का गला कटते देख कर खुद खुश हैं.

भाजपा सरकार ने कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है, लेकिन असल में यह मुसलिम और अन्य पिछड़े समुदायों को टारगेट करने की राजनीति है. सामाजिक न्याय सब के लिए होना चाहिए, किसी एक धर्म या जाति के लिए नहीं. ओबीसी नौजवान अब बेरोजगारी और निराशा में जीने को मजबूर होंगे. उन के सपने टूट गए हैं. जब देश में सामाजिक न्याय की बात होती है तो आरक्षण सब से बड़ा हथियार होता है. इसे कमजोर करना गरीबों के साथ धोखा है.

पश्चिम बंगाल में ओबीसी के आरक्षण का इतिहास मंडल आयोग से जुड़ा है, लेकिन इस राज्य में इस की अपनी खास यात्रा रही है. 1980 में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद 1990 में केंद्र सरकार ने ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू किया लेकिन पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक वामपंथी सरकार रही जिस में ओबीसी आरक्षण बहुत सीमित था क्योंकि तब राज्य में जाति आधारित पिछड़ापन को अलग तरीके से देखा जाता था.

साल 1993 में पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ. साल 1994 में पहली बार सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 5 फीसदी आरक्षण लागू किया गया, जो बाद में बढ़ कर 7 फीसदी हो गया. इस समय 66 जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया. ये ज्यादातर हिंदू पिछड़ी जातियां थीं. राज्य में कुल आरक्षण की सीमा 50 फीसदी के आसपास रखी गई लेकिन इन में ओबीसी के लिए 7 फीसदी ही रहा.

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने साल 2010 के बाद ओबीसी सूची में बड़े पैमाने पर नई जातियां जोड़ दीं और कुल ओबीसी आरक्षण 17 फीसदी कर दिया गया. ममता बनर्जी ने 2 श्रेणियां बनाईं. ओबीसी-ए के लिए 10 फीसदी

और ओबीसी-बी के लिए 7 फीसदी. इस दौरान तकरीबन 113 जातियां शामिल की गईं, जिन में मुसलिम जातियां भी थीं. सरकार का तर्क था कि इस से सभी वर्गो के पिछड़ों को लाभ मिलेगा.

मई, 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने साल 2010 के बाद जोड़ी गई सभी जातियों को अमान्य करार दे दिया. कोर्ट ने कहा कि इन समुदायों को ओबीसी बनाने के लिए उचित सर्वे, डाटा और पिछड़ापन का वैज्ञानिक आकलन नहीं किया गया था. कई मामलों में धर्म को आधार माना गया जो संविधान के खिलाफ है. कोर्ट ने 2010 से पहले की 66 जातियों को बरकरार रखा और कुल ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी तक सीमित कर दिया.

जून, 2026 में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को लागू किया. विधानसभा में 2 बिल पास कर ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी पर वापस लाया गया और साल 2010 से पहले की मूल 66 जातियों को ही मान्यता देते हुए नई सूची जारी कर दी गई. इस से भाजपा को सब से बड़ा फायदा यह हुआ कि साल 2010 के बाद जोड़ी गई मुसलिम जातियां ओबीसी के दायरे से बाहर हो गईं.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक

50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं होना चाहिए. पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण हमेशा दूसरे राज्यों से कम रहा. ममता बनर्जी ने 7 फीसदी से बढ़ा कर 17 फीसदी किया.

तृणमूल कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय बताती रही, जबकि विपक्ष और कोर्ट ने इसे अनुचित वोट बैंक पौलिटिक्स कहा. अब भाजपा ने कोर्ट के आदेश के बहाने मुसलिमों को ओबीसी से बाहर कर दिया लेकिन इस से नुकसान सिर्फ मुसलिमों को ही नहीं हुआ क्योंकि साल 2010 में जोड़ी गई लगभग 50 जातियों में ज्यादातर तो हिंदू जातियां ही थीं.

पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार को समझना चाहिए कि आरक्षण कोई भीख नहीं है, बल्कि यह सभी पिछड़ों को मिलना चाहिए. सरकार को यह सम?ाना चाहिए कि सामाजिक न्याय के बिना विकास अधूरा है.Reality

Hindi Social Story : संस्कार

Hindi Social Story. अदिति को क्या पता था कि जिस छात्रा को वे उस की छोटी जाति होने के कारण पसंद नहीं करती थीं, एक दिन उसी की शरण में उन्हें जाना पड़ेगा. फिर क्या हुआ?

‘‘है लो, क्या मैं कमलाजी से बात कर सकती हूं?’’ उधर से जवाब मिला, ‘‘जी नहीं, वे बाहर गई हैं.’’

‘‘कब तक वापस आएंगी?’’

जवाब मिला, ‘‘एक हफ्ते बाद… वैसे आप को क्या काम है?’’

मैं ने बताया कि मेरा एक बहुत ही जरूरी काम है. तब उन की सैक्रेटरी ने कहा, ‘‘मैडम, पहले आप मिलने का वक्त तय कर लीजिएगा.’’

मैं ने हफ्तेभर बाद का समय लिया और फोन रख दिया.

मेरे माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. मुझे अपने बेटे सौरभ का कैरियर बरबाद होता नजर आ रहा था. जन कल्याण केंद्र दिल्ली की मानी हुई संस्था थी. वह अनगिनत लोगों को इंसाफ दिलाती आ रही थी. कमला देवी, यानी उस केंद्र की अध्यक्ष की पहुंच प्रधानमंत्री तक थी.

हफ्तेभर बाद जब मैं जन कल्याण केंद्र के दफ्तर में कमलाजी के सामने पहुंची, तो वे बोलीं, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’

मैं ने देखा तो देखती ही रही. नजरें मानो हटना ही नहीं चाहती थीं. मैं ने कहा, ‘‘अरे कमलाजी, आप… आप ने शायद मुझे पहचाना नहीं. याद है, आप मेरी ही क्लास में थीं?’’

कुछ पल वे सोचती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘अरे हां, आप अदिति मैडम हैं न?’’

मुझे संतोष हो गया कि चलो, अपना काम तो बना. कमला बोलीं, ‘‘हां, बताइए, क्या काम है?’’

‘‘कमलाजी, मेरा बेटा सौरभ इंजीनियरिंग के आखिरी साल का छात्र है…’’

वे बोलीं, ‘‘मैडम, मैं वही कमला हूं, आप की छात्रा… मुझे ‘जी’ न कहें.’’

मैं कुछ देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘अभी कुछ दिन पहले कालेज में होने वाली हड़ताल को रोकने वाले छात्रों में मेरा बेटा भी था. वे चाहते थे कि हड़ताल न हो, मगर कालेज के दादा किस्म के छात्र हड़ताल के मूड में थे.

‘‘काफी मारपीट के बाद जब मामला प्रिंसिपल तक पहुंचा, तो उन्होंने भी सौरभ को बिना बात दोषी ठहराते हुए कालेज से निकाल दिया.

‘‘गुंडों का मुखिया यहां के उद्योगपति का एकलौता बेटा है और उस के पिता से कालेज को काफी तगड़ी इमदाद मिलती है, इसलिए प्रिंसिपल भी उस से दबता है.

‘‘अब तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं… मेरे बेटे की तो जिंदगी ही अंधेरे में डूबती नजर आ रही है, जबकि वह हर साल अव्वल आता है. अब तो बस आप ही कुछ कर सकती हो, क्योंकि उस गुंडे के पिता की पहुंच काफी है.’’

वे चुपचाप बैठी सुनती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘आप उस लड़के का नाम, पिता का नाम, अपने बेटे का नाम व कालेज के बारे में लिख कर दे दें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगी.’’

मैं ने जरूरी जानकारी लिख कर दी और विदा ले कर चली आई. जब घर पहुंची, तो दिल कुछ पुरानी यादें सोचने को मजबूर था…

तब मैं 7वीं क्लास की टीचर थी. एक दिन देखा, मेरी क्लास में एक नई लड़की आई थी. वह सहमीसहमी सी चुपचाप बैठी थी. मालूम हुआ कि हमारे स्कूल के सफाई कर्मचारी की लड़की थी.

मैं ने सोचा, ‘अब पढ़ाना तो पड़ेगा ही. क्या जमाना आ गया कि ब्राह्मण भी अब ‘अछूतों’ को पढ़ाएंगे. सत्यानाश हो इस सरकार का, हमारा तो धर्म ही भ्रष्ट कर दिया.’

उसी क्लास में कुछ तेज लड़कियों की एक टोली थी. वे सब मेरी ही कालोनी में रहती थीं. प्रमिला उन सब की मुखिया थी और मेरी सब से ज्यादा मुंहलगी छात्रा थी.

उसी शाम प्रमिला अपने मातापिता के साथ हमारे घर आई, तो मैं ने बताया कि आज हमारी क्लास में एक अछूत लड़की आई है. पता नहीं, मैं उसे कैसे पढ़ा पाऊंगी. मेरा तो दिल ही नहीं कर रहा कि मैं स्कूल जाऊं. गंदी, अछूत… प्रमिला मेरी बातें गौर से सुन रही थी.

अगले दिन जब कमला स्कूल आई, तो वह लड़कियों से बोली, ‘मैं भी खेलूंगी.’

तभी प्रमिला बोल पड़ी, ‘नहीं, हम तुम्हें नहीं खिलाएंगे. दूर हटो.’

वह बेचारी सहम कर एक तरफ खड़ी हो गई. वह खेल देखती रही. उस की आंखों में भी अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ खेलने की चाह उभरती, मगर कोई उस से बात तक न करता. अछूत जो ठहरी, बेचारी.

क्लास में यह मालूम होते ही कि वह स्कूल के सफाई कर्मचारी की बेटी है, सब उस से दूरदूर रहतीं. वह चुपचाप अकेले खाना खाती. अकेली रहती. सब लड़कियां खूब चिढ़ातीं, तो उस की आंखों में आंसू भर आते.

मैं सारी बात जानती थी, मगर चुप रहती. सोचती, अच्छा है, खुद परेशान हो कर स्कूल छोड़ देगी, तो बवाल कटेगा.

एक दिन वह हिम्मत कर के प्रमिला से बोली, ‘मुझे भी अपने साथ खेलने दो न.’

प्रमिला फौरन बोली, ‘तुम अछूत हो, तुम हमारे साथ नहीं खेल सकती.’

उस की समझ में नहीं आया, तो वह बोली, ‘प्रमिला, यह अछूत क्या होता है?’

प्रमिला बोली, ‘यह तो मुझे भी नहीं पता… कल अपने मातापिता से पूछ कर बता दूंगी.’

कमला बेचारी चुपचाप वापस क्लास में चली गई.

अगले दिन प्रमिला ने सब के सामने बताया, ‘पता है, अछूत कौन होते हैं? जो गंदे होते हैं, उन्हें अछूत कहते हैं. तुम सब से ही ज्यादा गंदी लड़की हो, तभी तो हम तुम्हें नहीं खिलाते.’

कमला अपने साफसुथरे हाथों और कपड़ों की तरफ देखती हुई बोली, ‘लेकिन मैं तो रोज नहाती हूं, साफ कपड़े पहनती हूं… फिर मैं गंदी कैसे हुई?’

प्रमिला बोली, ‘यह तो हम नहीं जानते, मगर दूर हटो, हम से मत बोला करो.’

कमला रोती हुई मेरे पास आई और सारी बात बताई. पर मैं ने उसे ही डांट दिया, ‘वे सब ठीक ही तो कह रही हैं. चलो, चुपचाप बैठो. ज्यादा शिकायतें मत लगाया करो.’

उस बेचारी का दिल तो वैसे ही दुखी था. मेरी डांट से वह और भी सहम गई.

कुछ वक्त बाद सालाना इम्तिहान का नतीजा निकला, तो कमला अव्वल रही.

कमला ने अब 8वीं क्लास में दाखिला लिया. मैं उस को हिंदी पढ़ाती थी. एक दिन मैं ‘गंगा’ नामक पाठ पढ़ा रही थी. उस में लिखा था, ‘गंगा में स्नान करने से सब ‘पवित्र’ हो जाते हैं, सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं, सब शुद्ध हो जाते हैं.’

उस के कुछ दिनों बाद गंगा स्नान की छुट्टियां पड़ीं. जब स्कूल खुला, तो मैं ने देखा, कमला बहुत खुश थी. वह क्लास में बैग रख कर भागीभागी लड़कियों के पास गई और जोरजोर से बोली, ‘अब तो मैं भी खेलूंगी. पता है प्रमिला, अब की बार मैं ने अपने बाबा से खूब जिद की कि वे मुझे गंगा नहला दें. अब तो मैं गंदी भी नहीं रही. मैं तो शुद्ध हूं. याद है, उस दिन मैडम पाठ में यही बातें पढ़ा रही थीं.’

सब लड़कियां चुप थीं. वे सब मेरे पास आईं, तो कमला भी साथ में थी. सब ने वही बात बताई, जो मैं पहले ही सुन चुकी थी.

अचानक कमला आगे आ कर बोली, ‘मैडम, अब तो मैं इन के साथ खेल लूं? अब तो मैं गंगा नहा आई.’

मगर मेरे दिमाग में बचपन से ही जाति भेद घुट्टी की तरह पिलाया गया था, वह उस वक्त बुरी तरह से उबाल मार रहा था. मैं बिगड़ कर बोली, ‘गंगा भी तुम ने गंदी कर दी… तुम तो फिर भी वही अछूत हो.’

यह सुन कर वह रोने लगी और भाग कर क्लास में चली गई.

मैं ही नहीं, हर टीचर उसे इसी निगाह से देखती थीं. बात आईगई हो गई. कमला 2 साल बाद उसी दबेघुटे माहौल में रह कर, तमाम तकलीफों के बावजूद हाईस्कूल के इम्तिहान में जिलेभर में अव्वल आई. उसी दौरान मेरे पति का तबादला हो गया.

अब उसी कमला को इस रूप में देख कर मैं बीती बातों को याद कर के सिहर गई थी.

मेरे रिटायर इंजीनियर पति सीधेसादे, शरीफ इनसान थे. वे अपने बेटे का केस उस उद्योगपति से कभी भी नहीं जीत सकते थे. ऐसी हालत में मेरी सारी उम्मीदें ‘जन कल्याण केंद्र’ पर टिकी थीं.

तकरीबन 15 दिन गुजर गए, मगर कमला देवी की तरफ से कोई खबर न आई. मुझे यकीन हो गया कि कमला देवी मेरा काम नहीं करेंगी.

एक दिन टेलीफोन की घंटी बजी. मैं ने फोन उठाया, तो कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम नमस्ते, माफ कीजिएगा, मैं दूसरे कामों में मशगूल थी, मगर आप की ओर से लापरवाह हरगिज नहीं थी. आप का काम होने ही वाला है. क्या आप कल मेरे दफ्तर आ सकती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘बताओ, कब आऊं?’’

वे बोलीं,  ‘‘दोपहर को किसी भी समय आ जाइएगा.’’

अगले दिन दोपहर को जब मैं कमला देवी के दफ्तर पहुंची, तो उन्होंने उठ कर मेरा स्वागत किया और चाय को पूछा.

मैं सकुचा गई, तो वे बोलीं, ‘‘नहीं मैडम, ऐसा कुछ नहीं है. मैं पंडितजी से कह कर चाय मंगवाऊंगी.’’

मैं शर्म से जमीन में गड़ी जा रही थी. मगर कमला देवी साफ दिल की थीं, इसलिए उन का इरादा मेरी बेइज्जती करने का नहीं था.

जब चाय आई, तो मैं ने चुपचाप उठा कर पी ली. फिर मैं ने उन से पूछा,  ‘‘अब बताओ, आप इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं?’’

वे सोचते हुए बोलीं,  ‘‘मैडम, मैं एमए तक लगातार अव्वल आई. जब शादी की बात चलती, तो कोई अच्छा लड़का नहीं मिला. इस बीच मेरे बाबा की मौत हो गई. मैं ने बहुत सोचासमझा और फिर यहां दिल्ली में आ कर यह  ‘जन कल्याण केंद्र’ खोल कर जनता की सेवा में जुट गई.

‘‘पहले यह एक छोटी सी संस्था थी, मगर मैं ने अपना तनमनधन इस में लगा दिया. बहुत मेहनत की… नतीजा आप देख ही रही हैं.

‘‘जहां तक शादी करने का सवाल था, तो मेरे साथ समाजसेवा करने वाला कोई मिलता ही न था. फिर किसी और जाति का होता, तो मुझ अछूत से शादी कैसे करता? चाहे मुझ में लाख गुण सही, मगर जाति से तो मैं अछूत ही थी.’’

मैं नजरें झुकाए सब चुपचाप सुनती रही, फिर बात बदलते हुए मैं ने पूछा,  ‘‘अच्छा, यह तो बताओ, आप ने मेरा काम इतनी जल्दी कैसे कर दिया?’’

वे बोलीं, ‘‘मैडम, आप ही पढ़ाया करती थीं,  ‘‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु…’’

उन के इन लफ्जों से एक तमाचा सा मुझे लगा. मुझे महसूस हुआ, जैसे एकबारगी मेरा वजूद हिल गया है. मेरे पढ़ाए को जिंदगी में उतारने वाली इस अछूत कन्या की दया की याचिका अब मैं खुद थी, जो खुद तो सारी उम्र सब को पढ़ाती रही, लेकिन खुद उस को अपनी जिंदगी में उतार न पाई.

मैं पसीने से भीग गई. उस पल चाहा कि जमीन फट जाए और मैं उस में समा जाऊं. अपनी  ‘गंगा’ वाली बात याद कर के तो मैं शर्म से पानीपानी हो गई और बोझिल मन से घर वापस आ गई.

कमला देवी की कोशिशों के कारण ही उस गुंडों के मुखिया को कालेज से निकाल दिया गया था और मेरे बेटे को दोबारा दाखिला मिल सका.

अगले दिन मैं ने कमला देवी को फोन किया,  ‘‘मैं जानती हूं, आप हमेशा काम में जुटी रहती हैं… मगर क्या आप समय निकाल कर शाम को मेरे घर आ सकती हैं?’’

वे बोलीं, ‘‘जी मैडम, मैं जरूर आऊंगी.’’

मैं शाम होने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी.

कमला देवी जब अपनी गाड़ी से उतरीं, तो मैं उन्हें आदर से अंदर ले गई और खुद चाय बना कर लाई.

कमला देवी बोलीं, ‘‘मैडम, आप ने क्यों इतनी परेशानी उठाई?’’

‘‘मैं किन शब्दों में आप का धन्यवाद करूं…’’

कमला देवी हंसती हुई बोलीं,  ‘‘मैडम, यह आप को क्या हो गया है?’’

मैं लाजसंकोच छोड़ कर बोली,  ‘‘सच, आज आप को देख कर लगता है कि आप कितनी निर्मल, कितनी पवित्र थीं? अगर आप गंदे तालाब को भी छू दो, तो वह गंगा बन जाए.’’

वे चुप रहीं. कुछ देर बातें करने के बाद जब वे विदा ले कर चलीं, तो उन की तरफ देखते हुए मुझे लग रहा था कि उन के ऊपर मेरे द्वारा चिपकाया गया  ‘अछूत’ नाम का धब्बा तेजी से धुंधला होता जा रहा था.  Hindi Social Story

— वंदना कश्यप

Short Story in Hindi : अलाव की आंच

Short Story in Hindi. सत्यप्रकाश के नाम में ही ‘सत्य’ था. यही उस की सब से बड़ी ताकत भी थी और कमजोरी भी. सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटतेकाटते उस की चप्पलें घिस चुकी थीं. उस ने देखा था कि कैसे एक गरीब किसान अपने हक के मुआवजे के लिए बाबू के सामने गिड़गिड़ा रहा था और वहीं दूसरी ओर एक रसूखदार आदमी नोटों की गड्डी थमा कर चंद मिनटों में अपना गलत काम करवा कर मुसकराते हुए निकल गया था.

सत्यप्रकाश का खून खौल उठता था. जब उस ने एक दिन दफ्तर में हो रहे इस नाइंसाफी के खिलाफ गुस्से में आवाज उठाई तो सिस्टम ने मिल कर उसी पर ‘सरकारी काम में बाधा डालने’ का आरोप मढ़ दिया. ऊंची पहुंच वालों के सामने सिस्टम नतमस्तक था और सत्य अकेला खड़ा था.

इस सिस्टम को बदलने और लोगों का दुखदर्द दूर करने के लिए सत्यप्रकाश ने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा.

उस ने तय किया कि वह नाइंसाफी के खिलाफ लड़ेगा, लेकिन यह राह कांटों भरी थी.

सत्यप्रकाश ने जब एक भ्रष्ट अफसर व स्थानीय नेता के गठजोड़ के खिलाफ मोरचा खोला तो मुश्किलें उस के दरवाजे पर दस्तक देने लगीं. धमकियां, झूठे मुकदमे और अपनों का दूर होना… सब एकसाथ शुरू हुआ.

एक शाम जब सत्यप्रकाश थकाहारा चाय की दुकान पर बैठा था, इलाके के एक बुजुर्ग रामदीन चाचा उस के पास आए. रामदीन चाचा ने उस के कंधे पर हाथ रखा और धीमी आवाज में कहा, ‘‘सत्य, क्यों इस सेवा के कीचड़ में कूदे हो बेटा? आज का सिस्टम भ्रष्ट है. यहां जो नेताओं के चाटुकार हैं, घूसखोर हैं, बेईमान हैं, वे ही सुखी हैं. गलत लोगों की तरह बड़ी पहुंच बनाओ, अपना घर भरो… वरना भरत भूषण तिवारी की तरह मार दिए जाओगे.’’

सत्यप्रकाश ने चौंक कर रामदीन चाचा की तरफ देखा. रामदीन चाचा की आंखों में खौफ और तजरबा दोनों था.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘दुनिया का यही दस्तूर है सत्य, अपना उल्लू सीधा करो, सुखी रहोगे. इस मुगालते में मत रहना कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा होगा. अगर तुम मार दिए गए तो यही मोमबत्तियां उठाने वाले समाजसेवी तुम्हारे नाम पर अपनी रोटियां सेंकेंगे, अपना उल्लू सीधा करेंगे, लेकिन जीतेजी तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा. सब तमाशबीन हैं.’’

चाचा की बातें सत्यप्रकाश के सीने में तीर की तरह चुभ गईं. उस रात वह सो नहीं सका. वह खिड़की के पास खड़ा हो कर अंधेरे आसमान को निहारता रहा. उस के मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘देश में यह सब क्या हो रहा है? जहां ईमानदारी एक गुनाह बन गई है और बेईमानी एक काबिलीयत? कैसे सुधार होगा इस सिस्टम का? क्या वाकई इस अंधेरे से जीतने का कोई रास्ता नहीं है?’

तभी सत्यप्रकाश को अपने भीतर से एक आवाज सुनाई दी. उसे याद आया कि निराशा के सब से घने दौर में भी इनसान को अपने अंदर की उम्मीद को मरने नहीं देना चाहिए. हालात चाहे जितनी भी उलट हों, हवाएं चाहे जितनी भी खिलाफ हों, हार मान लेना कोई औप्शन नहीं था.

सत्यप्रकाश ने मन ही मन कहा, ‘प्रवाह में ठहराव है, मंजिल नहीं, पड़ाव है… रात भले ही सारी पड़ी हो और बाहर का अलाव बुझा सा हो, लेकिन मैं अपने भीतर के अलाव को बुझने नहीं दूंगा…’

सत्यप्रकाश को समझ आ गया कि सुधार रातोंरात नहीं होगा और न ही यह लड़ाई आसान है. लेकिन अगर हर कोई डर कर अपना उल्लू सीधा करने में लग गया तो यह समाज पूरी तरह अंधकार

में डूब जाएगा. भरत भूषण तिवारी जैसे लोगों की शहादत बेकार न जाए, इस के लिए किसी न किसी को तो मशाल थामे रखनी होगी.

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण सड़कों पर पड़ी तो सत्यप्रकाश की आंखों में निराशा के आंसू नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था. उस ने अपनी डायरी उठाई, चप्पल पहनी और एक बार फिर नाइंसाफी के खिलाफ गवाही देने के लिए घर से निकल पड़ा. वह अकेला था, पर अब उसे भीड़ की परवाह नहीं थी.

Political Analysis: दबेकुचले तिलचट्टों ने निकाला सरकार का तेल

Political Analysis. 25 जुलाई, 2026 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया. सोशल मीडिया पर कौकरोच जनता पार्टी के नाम से बने एक पेज ने देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उसी पेज पर लिखवा लिया और नई पीढ़ी का भविष्य तय करने वाले नेताओं को जता दिया कि हर काम में वाहवाही लूटने वाले सत्ताधारियों को अपनी नाकामियों की जवाबदेही भी लेनी होगी.

दबेकुचले कौकरोचों ने चूलें हिलाईं

6 जून, 2026 को दिल्ली के जंतरमंतर से शुरू हुए इस आंदोलन को पहले किसी ने सीरियसली नहीं लिया. अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपके नाम के एक नौजवान ने डाक्टरी से जुड़ी नीट परीक्षा में हुई धांधली को ले कर नौजवान पीढ़ी को धरने पर आने का न्योता दिया तो ज्यादा चहलपहल नहीं हुई.

फिर सोनम वांगचुक ने अनशन शुरू किया तो लोगों के कान खड़े हुए और जब अचानक से एक दिन जब दिल्ली पुलिस उन्हें धरने वाली जगह से उठा कर ले गई तब इस आंदोलन ने अंगड़ाई ली और 20 जुलाई को जंतरमंतर से संसद तक के मार्च पर पुलिस ने छात्रों पर लाठियां भांजी तो देशभर में छात्र एकजुट होने लगे.

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क्या हुआ 20 जुलाई को

अभिजीत दीपके की अगुआई में नौजवान नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को ले कर जंतरमंतर से संसद की ओर बढ़ रहे थे. वहां सुबह से भारी भीड़ थी. पुलिस प्रशासन द्वारा इंटरनैट पाबंदियों और तमाम तरह की रोक के बावजूद हजारों की तादाद में छात्र और युवा इस प्रदर्शन में शामिल हुए थे.

तथाकथित बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश के बाद पुलिस और सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बल प्रयोग और लाठीचार्ज किया. कुछ जगहों पर भीड़ द्वारा पथराव, बैरिकेड तोड़ने और पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाएं हुईं, जिस से कई जवान और प्रदर्शनकारी घायल हो गए. नतीतजन, पुलिस ने इस मामले में हत्या के प्रयास और दंगे जैसी गंभीर धाराओं के तहत कई एफआईआर दर्ज कीं.

पुलिस और सरकार ने इलजाम लगाया कि इस आंदोलन में छात्र कम थे और असामाजिक तत्व ज्यादा तो यह मार्च अपने मकसद से भटक गया, इसी वजह से पुलिस को ये कड़े कदम उठाने पड़े.

बदला आंदोलन का चेहरा

20 जुलाई की अराजकता के बाद 23 जुलाई तक यह आंदोलन पूरी तरह से बदल गया. पहले तो सिर्फ जेन जी जंतरमंतर पर दिखाई देते थे, पर इस के बाद जीवन के हर क्षेत्र से आए युवा एकजुटता दिखाते हुए, एकदूसरे का खयाल रखते हुए और आंदोलन की जिम्मेदारी लेते हुए वहां पहुंचे. बिहार में तो पूरा माहौल ही बदल गया था.

जंतरमंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी. जो लोग आंदोलन की जगह पर नहीं जा पा रहे थे, वे सोशल मीडिया के जरीए रील्स देख कर वहां की पलपल की खबर ले रहे थे. सोशल मीडिया अब गोदी मीडिया पर हावी होने लगा था. हर किसी के हाथ में मोबाइल का कैमरा चालू था और वह हर छोटी से छोटी बात को भी इंस्टाग्राम पर अपलोड कर रहा था. नतीजतन, छात्रों के लिए खाना भेजने वालों की तादाद भी बढ़ गई थी.

वंचित समाज के नौजवानों ने झेली लाठियां

दिल्ली में चूंकि हर तबके के नौजवान जंतरमंतर पर जा रहे थे, पर बिहार जैसे राज्य में पुलिस से लोहा लेने वाले छात्रों में उस वंचित समाज के बच्चे थे जो पढ़ाई को अपना हथियार बना कर अपनी तरक्की करते हैं.

नीट परीक्षा में तथाकथित धांधली के विरोध में दिल्ली के जंतरमंतर से शुरू हुआ आंदोलन अब बिहार के कई जिलों में तेज होता गया. जहानाबाद, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर के बाद गया शहर में भी बड़ी तादाद में छात्र सड़कों पर उतर आए थे. प्रदर्शन के दौरान कई इलाकों में दुकानें बंद कराई गई थीं, प्रमुख सड़कों पर जाम लग गया था और प्रशासन को भारी पुलिस बल के साथ मोरचा संभालना पड़ा था.

अगर आप गौर से देखेंगे तो इस आंदोलन की अगुआई वंचित समाज के उन नौजवानों ने की थी, जो किसी अमीर ऊंचे तबके की औलाद नहीं थे. शरीर से दुबलेपतले लड़केलड़कियों ने उसी पुलिस से लोहा लिया, जिन में उन्हीं के समाज के कर्मी ज्यादा थे. कहने का मतलब है कि एक ही समाज के लोग आमनेसामने थे, पर वे छात्र तो मानो सिर पर कफन बांध कर आए थे.

ऐसे छात्र तो मानो पुलिस का इम्तिहान ले रहे थे और बोल रहे थे कि कर लो कितना जुल्म कर सकते हो, निकाल लो अपनी भड़ास, पर न झुकेंगे और न ही घर जाएंगे. यही वजह थी कि ऐसे छात्र पुलिस से ही कह रहे थे कि अगर लाठियां भांजनी हैं, तो 10 मिनट पहले बता देना, हम वार्मअप कर लेंगे. उन्होंने पीले रंग के बैरिकेड्स की रेल बना कर रोड पर दौड़ाया, जिस से प्रशासन की हिम्मत की कलई का चांदी रंग काला पड़ गया.

डेढ़ पसली के वे गेहुएं रंग के कौकरोच पुलिस के सामने ऐसे फुरती से इधरउधर कूदफांद रहे थे कि खाकी के रखवालों को यह नहीं सूझ रहा था कि आधा पेट खाना खाने वालों में इतनी गजब की ताकत और जोश कहां से आ गया है.

सोशल मीडिया पर आए हजारों वीडियो में साफ दिखा कि दिल्ली का जंतरमंतर हो या पटना की सड़कें फ्रंट पर वे नौजवान थे, जिन के कंधे पर 300-400 रुपए का बैग टंगा था, जिस में शायद कोई मुड़ातुड़ा पोस्टर होगा, एक जोड़ी कपड़े होंगे, टूथपेस्ट और टूथब्रश होगा और होंगे वे सपने जो किसी परीक्षा के लीक होने से बह गए थे.

मामला सिर्फ पेपर लीक नहीं

यह आंदोलन सिर्फ पेपर लीक से जुड़ा नहीं था, बल्कि नौजवान पीढ़ी की वह भड़ास थी, जिसे कोई नहीं समझ पा रहा था. केंद्र सरकार से नाराजगी इस का एक पक्ष था, जबकि यह पीढ़ी अपने समाज और धर्म की बंदिशों की भी सताई हुई है.

घर पर मांबाप इन्हें हर बात के लिए कहते हैं यह हमारे पिछले जन्म का नतीजा है कि हम उस समाज में पैदा हुए, जो अगड़ों की जीहुजूरी करने के लिए बना है. धर्म के ठेकेदारों के बहकावे में वे कहते हैं कि पढ़ाईलिखाई से ज्यादा जरूरी कांवड़ यात्रा में जा कर गंगाजल लाने से भला होगा, कलश यात्रा में हिस्सा लेने से आप का यह जन्म सुधर जाएगा.

देखा जाए तो ऐसे बच्चों की अपने परिवार के साथ संवाद करने की ताकत भी न के बराबर है. इस में इन की गलती नहीं है, क्योंकि समाज का ढांचा ही ऐसा बना दिया गया है कि वंचित समाज को किसी भी तरीके से पंगु बना दिया जाए. वे विचार से इतने ज्यादा कुंद हो जाएं कि अगर कभी कोई बात कहना भी चाहे तो उसे निपट मूर्ख कह कर चुप करा दिया जाए. अगर वह जय भीम का नारा लगाए तो उसे हेय समझ कर ग्रुप से ही बेदखल कर दिया जाए. अगर वह खुद को हिंदू न कहे तो उसे मुसलिम का साथी बता कर बाहरी साबित किया जाए.

इस आंदोलन में एक सवाल यह भी उठा था कि पुलिस वालों की वरदी पर उन के नाम क्यों नहीं लिखे हैं? इस की एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि वंचित समाज के आंदोलनकारियों से सामने उन्हीं के समाज के पुलिस वाले खड़े हैं. ऐसे पुलिस वालों के मुंह सिल दिए गए थे, ताकि लाठी, आंसू गैस के गोले और बंदूक बोल सके.

यह आज की बात नहीं है, बल्कि सदियों से यही होता आया है कि अगड़ों द्वारा इन्हीं समाज के लोगों को आमनेसामने कर दिया जाता रहा है. जब देश में जमींदारी प्रथा हावी थी तब जमींदारों के गुरगे इसी तबके के होते थे जो अपनों का ही सिर फोड़ने में अपनी शान समझते थे. इसे ‘सत्ता की दलाली’ न कहें तो और क्या नाम दें?

वंछित समाज और पढ़ाईलिखाई

अगर हालिया आंदोलन की बात करें तो यह भी समझ आता है कि वंचित समाज, जिस में एससी, एसटी और ओबीसी तबके के नौजवान आते हैं, उन का सीधा संबंध पढ़ाईलिखाई के अधिकार, सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता से है. नीट या किसी भी तरह के पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी जैसी घटनाएं सब से ज्यादा उन गरीब, दलित, पिछड़े और आदिवासी परिवारों के युवाओं को प्रभावित करती हैं जो भारी संघर्ष के बाद डाक्टर या फिर कोई बड़ा अफसर बनने का सपना देखते हैं.

पर यह सपना तब सपना रह जाता है जब महंगे कोचिंग संस्थानों और निजी शिक्षा से दूर रहने वाले गांवदेहात के और वंचित वर्ग के छात्र केवल अपनी कड़ी मेहनत और सरकारी संसाधनों पर निर्भर रहने को मजबूर होते हैं. इस से उन में अवसरों की छीनाझपटी देखने को मिलती है.

नतीजतन, पेपर लीक और धांधली के चलते मेधावी और गरीब छात्रों की सीटें पैसे वाले या दबंग वर्ग के लोगों द्वारा प्रभावित हो जाती हैं, जिस से उन का डाक्टर या दूसरा बड़ा अफसर बनने का सपना टूट जाता है.

इस पर अगर परीक्षा रद्द हो जाती है या बारबार टलती है तो एक साधारण परिवार पर कर्ज और मानसिक तनाव का भारी बोझ बहुत ज्यादा बढ़ जाता है.

जंतरमंतर और देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे प्रदर्शनों में वंचित व शोषित समाज के नौजवानों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया, क्योंकि यह उन के लिए केवल एक परीक्षा की नहीं, बल्कि वजूद और हक की लड़ाई बन गई थी.

दुख की बात है कि इस तबके की लड़ाई सिर्फ गरीबी से नहीं है, बल्कि सिस्टम से भी है. बच्चा डाक्टर तो बनना चाहता है पर कोचिंग की फीस कहां से लाए? अगर कहीं से फीस का जुगाड़ कर भी और पेपर लीक हो जाए, तो मेहनत बरबाद और तनाव घर कर लेता है. स्कूलकालेज में भेदभाव झेलना तो आम बात है. स्किल भी ढंग से नहीं मिल पाता है.

समाज भी साथ नहीं देता. गांव से शहर पढ़ने जाओ तो वहां किराए पर कमरा नहीं मिलना, गांव में अलग बस्ती, सोशल मीडिया पर गालियां खाने का शाप लग जाता है. कहीं नौकरी मिल भी जाए तो ‘कोटे वाला’ का टैग लग जाता है. इस आंदोलन को भी देख लीजिए. इसे ‘एक जाति का’ बता कर इसे दबाने की कोशिश की गई थी, पर इस बार यह जेन जी रुका नहीं और जता दिया इस तबके को सदियों से कौकरोच ही समझा गया है पर आज इस तिलचट्टे ने सरकार का तेल निकाल दिया. Political Analysis

Caste Discrimination: दलित दूल्हे के मंदिर पर चढ़ने से बवाल

Caste Discrimination. दलित मंदिर में गया. अगडे़ समाज को यह बात नागवार गुजरी. पंचायत हुई, बीचबचाव किया गया. लेकिन असली सवाल यह है कि मंदिर में जाने से समाज का भला होता है या नहीं?

तमाम कोशिशों के बावजूद राजस्थान राज्य में अभी भी पोंगापंथ और जाति के नाम पर फर्क बरकरार है. इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां आएदिन ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जो इनसानियत को शर्मसार करती हैं.

कभी डायन के नाम पर औरतों की हत्या कर दी जाती है, तो कभी ऊंचीनीची जाति के नाम पर समूची बस्तियां राख कर दी जाती हैं. सरकार की ओर से किए जाने वाले सारे दावे हवाई साबित हो रहे हैं.

बूंदी जिले के नैनवां थाना इलाके के जजावर गांव में दलित दूल्हे के मंदिर पर चढ़ने के मामले को ले कर हुआ बवाल इस का सुबूत है.

एक दलित दूल्हे ने मंदिर में जा कर दर्शनपूजन क्या कर लिया, उस पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. यह मामला सिर्फ मंदिर में दर्शनपूजन करने तक ही नहीं सिमटा है, बल्कि यह इस बात का सुबूत है कि अभी भी भारत में किस तरह से किसी खास जाति को एक दायरे में बांधने की कोशिश की जा रही है.

यह मामला इस बात की भी गवाही दे रहा है कि अभी भी जाति के नाम पर किस तरह से दलितों पर जोरजुल्म हो रहा है.

मामला कुछ यों है कि लक्ष्मीनारायण खटीक के बेटे सुरेश की शादी थी. शादी के दिन सुरेश गांव के बीच बने लक्ष्मीनाथ मंदिर जा पहुंचा. वह मंदिर में पूजा भी नहीं कर पाया था कि किसी ने उसे देख लिया.

इस के अगले ही दिन शुरू हो गया इस परिवार को सताने का खेल. दूसरे दिन पंचपटेलों की बैठक बुलाई गई. इस बैठक में इस बात पर एतराज जताया गया कि एक दलित गांव के मंदिर में कैसे घुस गया. इस से न केवल मंदिर का अपमान हुआ है, बल्कि पूरे गांव की परंपरा टूटी है.

पंचों ने दूल्हे के पिता को पंचायत में बुलाया. पहले तो उसे लताड़ा, उस पर जुर्माना भी लगाया गया. लक्ष्मीनारायण यह दुहाई देता रहा कि गांव का मंदिर है, फिर वह उस में क्यों नहीं जा सकता है?

पंचपटेल अपनी दादागीरी पर उतारू थे. उन्होंने इस मुद्दे को नाक का सवाल बना लिया. उन का गुस्सा इतना बढ़ गया कि बाजार बंद का ऐलान कर दिया गया.

अगले दिन कुंड के चौक में महापंचायत जुटी. इस महापंचायत ने दलित होने के बाद भी मंदिर की चौखट पर कदम रखना अपराध बताया. पहले तो जुर्माना लगाया गया, लेकिन जब लक्ष्मीनारायण ने जुर्माना चुकाने में मजबूरी जाहिर की, तो यह फरमान सुनाया गया कि वे महापंचायत में पूरे गांव के सामने सार्वजनिक रूप से माफी मांगें या गांव छोड़ दें.

इस धमकी से दलित बस्ती के लोग इतना डर गए कि वे गांव छोड़ने का मन बनाने लगे. कुछ लोगों ने दूल्हे और उस के पिता पर माफी मांगने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. रिश्तेदारों ने भी सम?ाया कि गांव में रहना है, तो गलती मान लेनी चाहिए.

इस दौरान महापंचायत के फरमान की बात किसी तरह पुलिस तक पहुंची. लोगों की नजरें बचा कर दूल्हे के पिता लक्ष्मीनारायण ने नैनवां थाने में पनाह ली.

पूरा मामला सुनने के बाद पुलिस गांव में गई, लेकिन गांव में तनाव को देखते हुए वापस आ गई. इस के बाद उपखंड अधिकारी प्रकाश चंद भटनागर, पुलिस उपाधीक्षक प्रेमचंद कुर्डिया, तहसीलदार रमेश चंद्र, नैनवां व देई के थानाधिकारी पूरे लावलश्कर के साथ जजावर गांव पहुंचे.

गांव में भारी फोर्स के बीच एक बार फिर महापंचायत हुई. इस दौरान पुलिस व अफसरों के खिलाफ नारेबाजी करते हुए उन पर दबाव बनाने की कोशिश की गई, लेकिन अफसरों ने दिलेरी दिखाई. उन्होंने पंचपटेलों को कानून का डर दिखाया और साफ तौर पर कहा कि अगर पंचपटेलों ने अपना फरमान वापस न लिया, तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा.

अफसरों की मौजूदगी में एक बार फिर ग्राम पंचायत भवन में पंचायत हुई. इस में गांव के कुछ लोगों ने बीचबचाव किया और दोनों पक्ष सामने बैठे.

इस पंचायत में पुलिस व अफसर मौजूद रहे, फिर भी कुछ लोगों ने लक्ष्मीनारायण पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का दबाव बनाया.

इस बार भी पुलिस ने सख्ती दिखाई. अफसरों ने ऐलान किया कि दलितों को भी मंदिरों में जाने का हक है. पुलिस उपाधीक्षक ने ऐलान किया कि वे लोग भी गिरफ्तार होंगे, जिन्होंने नारेबाजी की है. अगर इस परिवार को किसी तरह का नुकसान होता है, तो भी सख्त कानूनी कार्यवाही की जाएगी.

पुलिस व प्रशासनिक अफसरों के सख्त रुख को देखते हुए पढ़ेलिखे कुछ लोग आगे आए और दोनों पक्षों में लिखित में सम?ौता कराया. इस के बाद पूरे गांव को सम?ौते का मजमून पढ़ कर सुनाया गया.

साथ ही, इस बात के लिए ताकीद की गई कि दोबारा इस तरह की हरकत हुई और किसी दलित परिवार को मंदिर में जाने से मना किया गया या उसे किसी तरह का नुकसान पहुंचाया गया, तो संबंधित शख्स के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी.

समझौते के तहत लक्ष्मीनारायण ने अपनी रिपोर्ट वापस ले ली.

असल में दलितों को तो क्या किसी को भी मंदिरों में जाने की जरूरत नहीं. मंदिरों और दूसरे धर्मों की पूजने की जगहों ने भक्तों से लिया ही है, उन्हें कुछ दिया नहीं. लेते समय हर तरह की चालबाजी की गई, ऊंचनीच सिखाई गई, औरतों के साथ फर्क किया गया, हिंदुओं में जाति का बंटवारा किया गया और दान के नाम पर मोटा पैसा वसूला गया.

दलितों या पिछड़ों को ही नहीं, ऊंचों को भी अपना आज या कल सुधारना है, तो ?ागड़ों की जड़ों इन मंदिरों के पीछे भागना बंद करना चाहिए. असली सुख तो कारखानों, खेतों या दुकानों में काम कर के पैसा कमा कर मिलेगा. इन में ऊंचनीच की जगह है क्या?

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