Editorial: पुलवामा से पहलगाम तक – कब थमेगा खून का यह सिलसिला?

Editorial: साल 1965 और 1971 की फुल फ्लैज्ड वार्स और कारगिल, उरी, पुलवामा और अब पहलगाम पर बदले की झड़पों से यह तो तय हो गया है कि चाहे कुछ कर लो पाकिस्तान से अगर दहशतगर्द आ रहे हैं तो उन्हें रोकना नामुमकिन है. भारत पाकिस्तान के ठिकानों पर हमले कर के कुछ का अगर खात्मा भी कर दे तो और नए पनप आते हैं. लड़ाई, सेना, बम, टैंक, हवाईजहाज, मिसाइलें और यहां तक कि एटम बम अचानक घुस आए बंदूकधारियों के हमलों से देश को नहीं बचा सकते.

हम चाहे कितना कहते रहें कि ये आतंकवादी पाकिस्तान की सेना के साए तले पलते हैं, यह पक्का है कि न सेना और न इन आतंकवादियों के सरगने 7 मई जैसे हमलों से बदलने वाले हैं. अगर 9 जगह हमारी मिसाइलों ने कुछ तोड़फोड़ कर दी, कुछ को मार दिया, कुछ गोलाबारूद खत्म कर दिया तो कुछ ही दिनों में फिर ये दहशत फैलाने वाले भारत के आम इलाकों में घुसने की प्लानिंग करने लगेंगे.

देश में वोट जमा करने के लिए इन का फायदा उठाया जाता है, यह अब पक्का है. लालबहादुर शास्त्री ने, इंदिरा गांधी ने, अटल बिहारी वाजपेयी ने और नरेंद्र मोदी सब ने इस का फायदा उठाया. पर वोट के अलावा देश को क्या मिला? वोट भी एक पार्टी को मिले, इस से आम जनता को लाभ नहीं हुआ.

अच्छा यह रहेगा कि अब बेमतलब की धर्म की दुकानों पर नफरत की चीजें बेचना बंद कर दी जाएं चाहे वे नारे हों, चाहे निशान हों या गोलाबारूद. पाकिस्तान की सेना और वहां के नेता तो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें तो उसी से जनता से पैसा छीनने का मौका मिलता है पर भारत में धर्म की दुकानों में नफरत की चीजें बेचने से सब से बड़ा फायदा मंदिरोंमसजिदों को होता है. यहां कमाई के लिए तो कारखाने हैं, व्यापार है, सरकारी ठेके हैं, बहुत बड़ी काम पर लगी जनता है. नेताओं की उन से वसूली हो जाती है.

यहां सेना की राजनीति या सरकार में कोई दखल देने की इच्छा नहीं है. वे अपने में व्यस्त हैं, पैसा मिल रहा है, अफसरों की शानशौकत है, सिपाहियों की नौकरियां हैं. उन्हें न नफरत से मतलब है, न पार्टियों से.

अब ‘आपरेशन सिंदूर’ का सबक होना चाहिए कि नफरत का सामान बेचना बंद हो क्योंकि यह साफ हो गया है कि इस नफरत से कुछ मिल नहीं रहा. आम जनता सिर्फ लूटी जा रही है. उसे कुछ पड़ोसियों के साथ न रहने की हिदायतें दी जा रही हैं, उस से चंदे वसूले जा रहे हैं, उसे नफरत को बढ़ावा देने वाले अपने ही धर्म के स्टंटों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने को उकसाया जा रहा है.

आम हिंदू इस कदर धर्म के चंगुल में इन नफरत की दुकानों की वजह से फंस गया?है कि वह साल के 365 दिनों में 100 दिन इन्हीं में लगाने लगा है. उसे तो 100 दिन भी लौटा दिए जाएं और नफरती सामान खरीदने से भी रोक दिया जाए ताकि वह पैसा अपने बच्चों की पढ़ाई, बीवी की सेहत, मकान की मरम्मत, साफसुथरे कपड़ों पर खर्च कर सके, न हथियारों पर हो, न देवीदेवताओं के चढ़ावे में. हिंदूमुसलिम करने में कुछ नहीं रखा. जो सीजफायर नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ ने किया है वह देशभर की हर गली, हर महल्ले, हर गांव, हर कसबे, हर शहर, हर मंदिर के सामने, हर मसजिद के सामने हो.

यह सीजफायर 2 देशों के बीच नहीं, 2 लोगों के बीच हो. दोनों सदियों से इस विशाल जमीन जिसे 1947 अनडिवाइडिड इंडिया कहा जाता था, में रहते रहे हैं, आगे भी सीजफायर के साथ, दोस्ती का हाथ बढ़ा कर, हमदर्द बन कर एकसाथ अपनेअपने देश, अपनीअपनी कौम, अपनेअपने घरों को बढ़ाते हुए रहें.

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सरकारें कई तरह से गरीबों को गरीब और बेबस रखने की कोशिश करती रहती हैं. गरीबों के वोटों पर जीतने के बावजूद सब जगह की चुनी हुई सरकारें भी ऐसे हुक्म निकालती रहती हैं जिन से गरीबों को नुकसान हो. अमेरिका के सनकी और खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नया हुक्म जारी किया है कि सभी ट्रक ड्राइवरों को अंगरेजी अच्छी तरह आनी चाहिए.

कहने को यह हुक्म सेफ्टी के लिए है कि ड्राइवर तरहतरह के फाइन पढ़ सकें और पुलिस वालों को जवाब दे सकें पर असल में इस का मकसद है कि गरीब अनपढ़ या दूसरे देशों से आए ट्रक ड्राइवरों से रोजीरोटी छीन ली जाए और मोटे गुस्सैल, लड़ाकू मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) भक्तों को नौकरियां मनमाने दामों पर दी जा सकें.

ट्रक कंपनियों ने दूसरे देशों से आए लीगल और इल्लीगल ड्राइवर रखने शुरू कर दिए हैं ताकि माल चोरी न हो, वे सड़कों पर एक्सीडेंट न करें. दूसरों से बेबात का झगड़ा न करें, पुलिस से ढंग से पेश आएं और सस्ते में मिल जाएं. ट्रंप ने अपने अनपढ़ गोरों को नौकरियां दिलवाने के लिए हुक्म जारी कर दिया चाहे ये सड़कों पर टेढ़ीसीधी गाड़ी चलाएं, रास्ते के डाइनर्स (ढाबों) पर हल्ला करें, लड़कियों को ले कर चलें, ट्रक का माल चोरी करें.

अब ट्रंप ने हुक्म दिया है तो तामील होगा ही क्योंकि मिलिटरी, पुलिस और मागा गैंग मिल कर खुले अमेरिका में दहशत का माहौल खड़ा करने में कामयाब हो गए हैं जैसे भारत में मुसलमान या दलित के लिए ट्रक चलाना आज भी आसान नहीं है (वे खलासी बन सकते हैं, ड्राइवर नहीं), वैसे ही अमेरिका में होगा.

ऐसा नहीं कि अंगरेजी नहीं जानने वाले दूसरे देशों से छिपछिपा कर आए हों, बहुत से काले अमेरिकी भी अनपढ़ हैं क्योंकि स्कूलों से उन्हें जरा सा झगड़ा करने पर निकाल दिया गया था और मां या बाप उन्हें सड़कों पर छोड़ कर अपनी जान बचाने में लग गए थे. अमेरिका में अमीरी है पर फिर भी बहुत से लोग सड़कों पर ही तिरपाल के नीचे रहते हैं. उन में बहुतों की पैदाइश भी तिरपाल के नीचे हुई और बड़े भी वे सड़कों पर हुए, बिना स्कूल गए.

ट्रंप इन को ड्राइवरी भी नहीं करने देना चाहते क्योंकि ट्रक ड्राइवरों की कमाई अच्छी है. कालों, लैटिनों, सिखों, अरबों, पाकियों, अफगानों, वियतनामियों से तो नौकरियां छीनने के लिए ट्रंप ने यह हुक्म जारी
किया है.

भारत में ऐसा सा कुछ होने लगा है और ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी का मंत्रालय ड्राइवरों की पढ़ाई का स्टैंडर्ड फिक्स करने में लगा है. मंत्रालय ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट भी खुलवाना चाहता है ताकि बेहद गरीब लोगों को ड्राइवरी के काम से बाहर रखा जा सके. ट्रंप की जैसी सरकारें कई देशों में हैं. ट्रंप और मागा अकेले नहीं हैं. ये गैंगस्टर हैं जो समाज को कंट्रोल में रखना चाहते हैं.

आतंकी वारदात

मोदी सरकार को एक और झटका लगा जब ऐन चुनावों से पहले कश्मीर में आतंकवादियों ने जम्मू से श्रीनगर जा रहे सीआरपीएफ की बसों के काफिले पर आत्मघाती हमला कर के 40 जवानों को शहीद कर दिया. एक मारुति ईको वैन में 70 किलोग्राम विस्फोटक पदार्थ भरा गया और यह 78 वाहनों के बीच आ गई और फिर उस को उड़ा दिया गया जिस से 2 बसों में सवार सैनिकों में से 40 की तुरंत मुत्यु हो गई.

पुलवामा के आदिल अहमद डार ने हमले को अंजाम दिया. बाद में सोशल मीडिया पर उस का मैसेज वायरल हुआ जो घटना से कुछ दिनों पहले रिकौर्ड किया गया था. पाकिस्तान से संचालित किए जा रहे जैश ए मोहम्मद ने भी दावा किया कि उस ने हमला करवाया.

दिल दहलाने वाले इस हत्याकांड ने फिर जगजाहिर कर दिया है कि भारतीय जनता पार्टी और महबूबा मुफ्ती की साझी सरकार का आतंकवादियों पर कोई असर नहीं पड़ा है और वे अपना अलगाववाद किसी भी सूरत में छोड़ने को तैयार नहीं.

इस तरह की आतंकवादी घटना का हो जाना देश की गुप्तचर संस्थाओं के निकम्मेपन की पोल खोलता है क्योंकि यह कांड बिना पूर्व योजना के नहीं किया जा सकता है. इस के लिए लंबी प्लानिंग चाहिए होती है और इतने सारे वाहन किस समय कहां होंगे, यह पता होना जरूरी है. हमारी गुप्तचर संस्थाएं यदि यह सूंघ नहीं पाईं तो बेहद अफसोस की बात है.

कश्मीर में ही नहीं, देश के कई हिस्सों में आतंकवादियों के हौसले ऐसी करतूतों के सफल हो जाने से बुलंद हो जाते हैं. पंजाब में छिटपुट सुरसुराहाट शुरू हो गई है. छत्तीसगढ़ में माओवादी चुप नहीं हैं. उत्तरपूर्व में प्रस्तावित नागरिक कानून के कारण बेहद नाराजगी है. कश्मीर में हमारी सुरक्षाव्यवस्था में साफ दिखता क्रैक इन सब के हौसले मजबूत करता है.

कहने को तो केंद्र में हमारे पास एक मजबूत सरकार है पर जब सारे फैसलों के लिए केवल एक ही शख्स अधिकृत हो तो परेशानियां हो सकती हैं. भाजपा अगर महबूबा मुफ्ती के मारफत जम्मूकश्मीर पर ले दे कर फैसले करने के मूड में होती तो शायद शांति का कुछ माहौल बनता पर दोनों कट्टरवादियों ने अपनेअपने स्टैंड पर अड़े रह कर अलगाववादी आतंकवादियों को भरपूर मसाला दे दिया. आम कश्मीरी को यह भरोसा नहीं हो पा रहा है कि उस का विकास तो भारत के साथ ही होना है.

धर्म के नाम पर उसे अलग करने की छूट मिली हुई है क्योंकि दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार खुद ही हर समय धर्म का आलाप करती रहती है. जब नागरिकता कानून में धर्म को आधार बनाया जा सकता है तो कश्मीरियों को कैसे समझाएंगे कि अल्पसंख्यक हो कर भी वे भारत में कहीं ज्यादा सुखी रहेंगे. कुछ बिगड़ैल सिरफिरे तो अति कराएंगे ही, जैसे मैदानी इलाकों में गौरक्षकों से कराई जाती है.

पुलवामा आतंकी हमला मुहब्बत के दिन मौत की हैवानियत

14 फरवरी, 2019. वैलेंटाइन डे. मतलब इश्क का दिन. जब पूरी दुनिया में प्यार में लिपटे गुलाब फिजाओं में तैर रहे थे, उसी दिन ‘धरती की जन्नत’ कहा जाने वाला खुशरंग कश्मीर लहू के लाल रंग में नहला दिया गया. वहीं के एक खूबसूरत नौजवान आदिल अहमद डार ने डर को ही अपना कफन बना कर जिहाद के नाम पर ऐसी बेवकूफी कर दी जिस ने उस के साथसाथ कई और घरों के चिराग समय से पहले ही बुझा दिए.

ये चिराग देहाती मिट्टी के बने थे और बहुत गरीब घरों की दहलीज से निकल कर देश की सरहद तक पहुंचे थे. इन्होंने अपनी इच्छा से देशसेवा को चुना था और कड़ी मेहनत से अपने बदन को इस कदर लोहा बनाया था कि दुश्मन की एकाध गोली भी उन का कुछ न बिगाड़ सके.

ये जवान सोशल मीडिया के नकली शूरवीर नहीं थे, बल्कि देश के उस बहुजन समाज की नुमाइंदगी करते थे जो खेतीकिसानी और मजदूरी करते हुए भी अपने दिल में देशप्रेम को सब से ऊपर रखता है.

वीरवार, 14 फरवरी, 2019 को ठंड में जकड़े जम्मूकश्मीर के पुलवामा जिले में एक फिदायीन हमले में सीआरपीएफ के ऐसे ही 40 से ज्यादा कर्मठ जवान शहीद हो गए. सरकारी अफसरों के मुताबिक, आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के एक आतंकवादी आदिल अहमद डार ने विस्फोटकों से लदी एक गाड़ी से सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही एक बस को टक्कर मार दी, जिस से यह दिल दहलाने वाला कांड हुआ.

दरअसल, सैंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के 2,500 से ज्यादा जवान 78 गाडि़यों के काफिले में जा रहे थे कि जम्मूकश्मीर हाईवे पर श्रीनगर से 30 किलोमीटर दूर अवंतिपोरा इलाके में लाटूमोड पर इस काफिले पर घात लगा कर हमला किया गया.

यह धमाका इतना जबरदस्त था कि बस के परखच्चे उड़ गए. उस में बैठे जवानों का क्या हुआ होगा, यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सीआरपीएफ के महानिदेशक आरआर भटनागर ने बाद में इस हमले के बारे में बताया, ‘‘यह एक विशाल काफिला था और तकरीबन 2,500 सैन्यकर्मी अलगअलग गाडि़यों में जा रहे थे. धमाका करने के बाद इस काफिले पर कुछ गोलियां भी चलाई गईं.’’

जानकारी के मुताबिक, यह काफिला जम्मू से सुबह के साढ़े 3 बजे चला था और माना जा रहा था कि इसे शाम होने तक श्रीनगर पहुंचना था. काफिले में घाटी लौट रहे सैन्यकर्मियों की तादाद ज्यादा थी, क्योंकि हाईवे पर पिछले 2-3 दिन से खराब मौसम और दूसरी कई प्रशासनिक वजहों से कोई आवाजाही नहीं हो रही थी.

सड़क पर रास्ते की जांच के लिए एक दल को तैनात किया गया था और काफिले में आतंक निरोधक बख्तरबंद गाडि़यां मौजूद थीं. इस हमले में निशाना बनी बस सीआरपीएफ की 76वीं बटालियन की थी और उस में 39 सैन्यकर्मी सवार थे.

जैसे ही यह खबर आग की तरह देशभर में फैली, सोशल मीडिया पर मानो भूचाल सा आ गया. हो भी क्यों न, पिछले कई सालों से कश्मीर पर हो रही बेवजह की राजनीति का खमियाजा मारे गए जवानों ने जो भुगता था.

बहुत से लोगों ने भारतीय सरकार से पाकिस्तान को सबक सिखाने की गुहार लगाई. किसी ने आतंकियों का सिर काट कर लाने की बात कही तो ज्यादातर लोगों ने इस वारदात का जिम्मेदार इसलाम धर्म को ही ठहरा दिया.

विपक्षी दलों ने इस घटना पर कोई ज्यादा राजनीति नहीं खेली. कांग्रेस ने सरकार को आड़े हाथ जरूर लिया कि मोदी राज में यह 5 साल में 17वां बड़ा आतंकी हमला है, पर साथ ही यह भी साफ कर दिया कि वह देश की सुरक्षा से जुड़े इस मसले पर पूरी तरह से सरकार के साथ है.

इस पूरे मामले को गौर से देखने पर यह सवाल उठता है कि हमारी सेना और खुफिया तंत्र से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई कि एक सिरफिरा नौजवान 300 किलो विस्फोटक से भरी एक गाड़ी लाया और उसे जवानों से भरी बस से भिड़ा दिया?

सेना के एक सीनियर अफसर की मानें तो पहले जब सुरक्षा बलों का काफिला चलता था तो बीच में सिविल गाडि़यों को नहीं आने देते थे. लेकिन पिछले कुछ समय से घाटी में हालात थोड़े ठीक हुए थे इसलिए ऐसे काफिलों के आगेपीछे सिविल गाडि़यां चलने लगी थीं. यह लापरवाही ही कही जाएगी जो अब खतरनाक रूप में सामने आई है.

वैसे, आतंकियों ने जिस तरह से इस हमले को अंजाम दिया है, वैसा अकसर अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है. इस हमले में जैश ए मोहम्मद नाम के आतंकी संगठन के ‘अफजल गुरु स्क्वाड’ का नाम सामने आया है. इस दस्ते का नारा है ‘मारो और मर जाओ’. इस का फिदायीन दस्ता बड़ा घातक माना जाता है.

आदिल अहमद डार भी एक ऐसा ही फिदायीन था जो जन्नत के चक्कर में आग का गोला बन कर दूसरों पर कहर की आतिशी बारिश कर गया.

पुलवामा के ही काकपुरा के गुंडीबाग का रहने वाला यह नौजवान एक वीडियो में जो बोला वह जहर ही था जो उस के मन में भर दिया गया था. उस ने कहा, ‘जब तक यह वीडियो आप के सामने आएगा मैं जन्नत में पहुंच चुका हूंगा.’

अब यह ऐसी कौन सी जन्नत है जो धरती के स्वर्ग से भी प्यारी है? वहां गए जिहादियों को ऐसी कौन सी सहूलियतें मिलती हैं जो वे धरती पर पसरी कुदरत की बहार को भी फीका समझने लगते हैं?

सच तो यह है कि कश्मीर 2 देशों के बीच फंसी वही धरती है जहां सेना के साए के बावजूद आतंकवाद का दायरा बढ़ता जा रहा है. साल 1986 के चुनाव में वहां हुई धांधलियों के बाद चरमपंथियों ने अपने पैर पसारने शुरू किए थे.

शेख अब्दुल्ला की मौत के बाद वहां किसी ऊंचे कद के नेता की घोर कमी हो गई थी. जो लोकल नेता उभरे, वे कट्टर इसलामी सोच से भरे थे. उन्हें छिपेतौर पर पाकिस्तान की शह मिलती थी.

अपने थोड़े से फायदे और भारतीय खुफिया तंत्र के पूरी तरह फेल हो जाने का ही नतीजा था कि आने वाले चंद सालों में कश्मीर अपनों की ही लगाई आग में झुलसने लगा.

इस का सीधा असर कश्मीर की जनता पर पड़ा. वे लोग हर लिहाज से पिछड़ते चले गए. वे यह भी नहीं समझ पा रहे थे कि किस का पक्ष लें. उन का अपनी ही जन्नत से मोह भंग होने लगा. जो रहनुमा लगते थे वे आतंकी संगठन से ज्यादा कुछ नहीं निकले. भारतीय नेताओं ने भी जुमलेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं दिया, इसलिए कश्मीर की जनता को भारतीय सेना अपनी दुश्मन लगी.

14 फरवरी को सीआरपीएफ पर हुआ हमला इसी की कड़ी था. सवाल उठता है कि आतंकियों ने यह जो इतना ज्यादा विस्फोटक इकट्ठा किया वह कहीं से तो आया होगा? अगर वह पाकिस्तान से नहीं लाया गया तो और भी खतरनाक बात है कि ऐसे सामान आसानी से आतंकियों को मिल जाते हैं. फिर तो 2-4 लोग कहीं योजना बनाएं, कोई गाड़ी चुराएं और बना दें किसी को भी मानव बम.

भारतीय खुफिया तंत्र की मानें तो पहले ये मानव बम पाकिस्तान से मंगाए जाते थे, पर अब कश्मीर के लोकल लड़के ही यह काम करने लगे हैं. जैश ए मोहम्मद में ही अब कश्मीरी लड़कों की भरती की जाने लगी है. अगर ये मरते हैं तो कश्मीर में इन के जनाजों में भीड़ जुटती है. सोशल मीडिया पर इन को शहीद बताया जाता है. अब इस ताजा हमले ने कश्मीर को और सुलगा दिया है.

पाकिस्तान पर निशाना

इस आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को कोसना शुरू कर दिया है और उसे सबक सिखाने के लिए दुनियाभर से अपने हक में माहौल बनाना शुरू कर दिया है. अपनी धरती से आतंकी गतिविधियों को चलाने की पाकिस्तान की चाल को उजागर करने के लिए भारत ने दुनिया के कई बड़े देशों से बात की है. लेकिन एक कड़वी हकीकत तो यह भी है कि पाकिस्तान खुद आतंकी हमलों की मार झेल रहा है. वहां के आतंकी संगठनों ने उस की नाक में दम कर रखा है.

वैसे भी पाकिस्तान के साथ सीधी लड़ाई या सर्जिकल स्ट्राइक करने से इस समस्या का हल नहीं होगा. युद्ध में तो सीधेसीधे दोनों देशों का बड़ा नुकसान होगा. दोनों देश कई साल पीछे चले जाएंगे. जब से चीन ने पाकिस्तान को माली मदद देना शुरू किया है, वह किसी कीमत पर नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान कमजोर हो.

चीन ने इस हमले की घोर निंदा तो की है, पर मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादियों की लिस्ट में डालने की भारत की अपील का समर्थन करने से मना कर दिया है.

इस सब के उलट हमें इस बात पर ज्यादा गंभीरता से विचार करना चाहिए कि भारत ने पिछले तकरीबन 30 साल से कश्मीर में इतनी भारी तादाद में सेना और दूसरे सुरक्षा बलों को तैनात किया हुआ है तो क्या उस से हम आतंकवाद पर कंट्रोल कर सके हैं?

अभी हाल ही में भाजपा और पीडीपी ने मिल कर वहां सरकार बनाई थी, लेकिन वे दोनों भी वहां के लोगों में नई उम्मीद जगाने में नाकाम रहीं. अगर भाजपा पीडीपी को उस के मनमुताबिक राज करने देने का मौका देती तो पता तो चल जाता कि वहां की जनता का मिजाज क्या है. अगर भाजपा की सरकार केंद्र में मुसलिम राष्ट्रपति दे सकती है तो क्या उसे अब किसी कश्मीरी मुसलिम चेहरे को कश्मीर का राज्यपाल नहीं बना देना चाहिए था? क्या जरूरत थी उत्तर प्रदेश के एक नेता पर मेहरबान होने की?

आंख के बदले आंख किसी समस्या का हल नहीं है. कश्मीर पर भी यह बात लागू होती है. हमें ठंडे दिमाग से यह सोचना होगा कि ऐसी क्या वजहें हैं जो कश्मीर के नौजवान हिंसा के इस रास्ते पर चल रहे हैं? क्या वहां की जनता हमेशा के लिए इसी तरह संगीनों के साए में जीती रहेगी? क्या वहां के मासूम बच्चे नहीं चाहते होंगे कि उन के कंधे पर भी किताबों से भरा बस्ता हो और वे बेखौफ हो कर स्कूल में पढ़ने जाएं.

अगर रेतीले राजस्थान के कोटा में ऐजूकेशन हब बन सकता है तो हरेभरे कश्मीर में क्यों नहीं?

अंधभक्ति से काम नहीं चलेगा

कश्मीर में 40 अर्धसैनिकों की दुखद मृत्यु के बदले आतंकवादियों और उन्हें शह देने वाले पाकिस्तान के खिलाफ जिस तरह की भाषा का उपयोग एक वर्ग कर रहा है, वह स्पष्ट करता है कि जिस महान संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान, धैर्य, सदाचार, सत्यवचन का बखान हम हर पल करते हैं, वह कम से कम इस वर्ग में तो नहीं है, जो असल में संस्कृति का स्वयंभू ठेकेदार बना हुआ है.

न केवल पाकिस्तानी सरकार, बल्कि प्रधानमंत्री, पाकिस्तान में खुलेआम घूमते आतंकवादियों के नेताओं को मांबहन की गालियां ट्विटर, व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दी जा रही हैं, हर उस भारतीय को भी दी जा रही हैं जो भावनाओं की जगह सोचीसमझी नीति अपनाने की वकालत कर रहा है. यह कट्टर वर्ग न केवल आतंकवादियों के खिलाफ आग उगल रहा है, आतंकवादियों के लपेटे में हर कश्मीरी को भी ले रहा है और लड़कियों तक को नहीं छोड़ रहा.

केवल यह सुझाव देने पर कि पाकिस्तान या आतंकवादियों से समझौतों से भी शांति लाई जा सकती है, यह कट्टर वर्ग उग्र हो उठता है. यह वर्ग भूल रहा है कि इसकी इस कट्टरता के बावजूद इस के पुरखे मुट्ठीभर यूनानियों, हूणों, पार्शियों, मुसलमानों, अफगानों, मुगलों, फ्रैंच, ब्रिटिश, डच से हारते रहे हैं. भारत का इतिहास इन हारों से भरा हुआ है, क्योंकि हम बोलने और गाली देने में तो दक्ष हैं पर कुछ करने में निकम्मे.

आज मोबाइल की सुविधा के कारण कुछ शब्दों में गाली देना इतना आसान हो गया है जितना अपने घर के सामने खड़े हो कर गुजरते राहगीर को देना. ताकत तो वह होती है जब संख्या में कम होते हुए भी हमला करने वालों को हराया जा सके.

मांबहनों की भद्दी गालियां असल में चरित्र की सही पहचान करा रही हैं, हमारा बल नहीं दिखा रहीं. मोबाइल के पीछे छिप कर वार करना पेड़ या शिखंडी के पीछे से तीर मारने की तरह है. पर जो समाज उसे सही और दैविक मानता हो, उस से और क्या अपेक्षा की जा सकती है?

जहां जरूरत है कि पूरा देश आतंकवादियों के हौसले पस्त करे, वे जहां पनप रहे हैं, जहां प्रशिक्षण ले रहे हैं, वहां उन्हें रोकें, उन्हें देश में घुसने न दें. अगर होम ग्रोथ यानी अपने ही देश की पैदावार हों तो या तो उन्हें पकड़ लें या समझा कर राह पर ला सकें.

आतंकवाद बहुत गंभीर समस्या है और हमें उसे रोकने में बहुत चतुराई की जरूरत होगी. अंधभक्ति और गालियों से काम नहीं चलेगा चाहे वह किसी धर्म के प्रति हो या व्यक्ति विशेष के प्रति.

पुलवामा हमले पर बौलीवुड बनाएगा फिल्म

बीते फरवरी 14 तारीख को पुलवामा में हुए आतंकी हमले में सीआरपीएफ के करीब 40 जवानों की मौत हो गई. इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान पर जवाबी हमला करते हुए एयर स्ट्राइक किया. इस पूरे घटनाक्रम पर बौलीवुड में फिल्म बनने वाली है, फिल्म के साथ संजय लीला भंसाली और भूषण कुमार जैसे बड़े नाम जुड़ गए हैं.

खबरों की माने को फिल्म के निर्देशक होंगे अभिषेक कपूर. अभिषेक केदारनाथ के निर्माता हैं. भंसाली और भूषण कुमार के अलावा महावीर जैन भी फिल्म को प्रोड्यूस करेंगे. अभी तक फिल्म का स्टारकास्ट तय नहीं किया गया है. पर प्रोडक्शन और डायरेक्शन टीम को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि बड़े सितारे फिल्म से जुड़ेंगे.

वहीं खबर ये भी है कि फिल्म और टीवी सीरियल बनाने वाले निर्माताओं ने पुलवामा से लेकर बालाकोट तक और बाद में विंग कमांडर अभिनन्दन वर्तमान की वापसी तक को फिल्मी जामा पहनाने का फैसला किया है.

आपको बता दें कि 26 फरवरी को बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की गई थी, जिसमें दावा किया जा रहा है कि बहुत से आतंकी मारे गए हैं. हालांकि अभी तक मारे गए आतंकियों के आधिकारिक आंकड़े नहीं मिले हैं. पर देश के वायुसेना की इस जवाबी कार्रवाई से देशवासी बड़े ही जोश में हैं.

पाकिस्तानी एक्टर्स की बद्तमीजी पर इंडियन एक्टर्स ने लगाई फटकार

पुलवामा में  आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा हुई टेंशन से इंटरटेंनमेंट इंडस्ट्रीज भी नहीं बची. बीते दिन भारतीय वायु सेना के जवान विंग कमांजर अभिनंदन को पाकिस्तानी आर्मी ने पकड़ा. अभिनंदन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुए. इसके बाद पाकिस्तान कुछ कलाकारों ने अभिनंदन के फोटो और वीडियो को शेयर करते हुए मजाक उड़ाया, जिसके जवाब में भारतीय स्लेब्स ने उनकी क्लास ली.

विंग कमांडर की फोटो शेयर करते हुए पाकिस्तानी एक्टर वीना मलिक ने लिखा कि, अभी अभी तो आए हो, अच्छी मेहमान नवाजी हो गई आपकी.

इसपर करारा जवाब देते हुए स्वरा फास्कर ने ट्वीट किया कि, वीना जी…लानत है तुम पर और तुम्हारी बीमार मानसिकता पर. तुम्हारी ऐसी खुशी पूरी तरह बेशरमी है. हमारा औफिसर बहादुर, दयालु और स्वाभिमानी है. कम से कम तुम्हारी सेना के उस मेजर में कुछ शालीनता बाकी है जो अभिनंदन से पूछताछ कर रहा है साथ ही तुम्हारे देश की जनता में भी जो शांति चाहती है.

इसके अलावा भाबी जी घर पर हैं कि स्टार सौम्या टंडन ने वीना मलिक को फटकार लगाते हुए कहा कि, विश्वास नहीं कर सकती कि उसके जैसा कोई ऐसी बात लिख रहा है. यह वाकई बहुत दुख की बात है.

अदनान सामी ने भी पाकिस्तान के इन ट्रोलर्स को मुंहतोड़ जवाब देते हुए लिखा कि, डियर पाक ट्रोल्स आपकी गालियां आपकी असलियत सामने लाती हैं. आपके और गंदगी की बाल्टी के बीच एकमात्र अंतर बाल्टी है.

आपको बता दें कि अदनान सामी के पिता पाकिस्तान के राजनायिक थे. 2016 में अदनान ने भारत की नागरिकता ले ली थी.

पाकिस्तान ने दिया भारत में कलाकारों पर बैन का जवाब

जब भी पाकिस्तान भारत पर हमला करता है दोनों देशों की राजनैतिक फ्रंट पर गर्मागर्मी तो होती ही है, साथ में सांस्कृतिक, मनोरंजन, खेल समेत सारे क्षेत्र बुरी तरह से प्रभावित होते हैं. यही हालत एक बार और देखी जा रही है. हाल ही में पुलवामा हमले के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते बहुत खराब हो गए हैं. एक ओर कूटनीतिक दबाव बनाते हुए भारत ने आर्थिक मोर्चे पर कई महत्वपूर्ण कदम उठाएं तो वहीं बौलीवुड ने भी पाकिस्तानी कलाकारों का बहिष्कार किया. बीते शुक्रवार रिलीज हुई टोटल धमाल को भी पाकिस्तान में रिलीज नहीं किया गया. भारत की ओर से इस सख्ती का जवाब पाकिस्तान ने भी दिया है.

बीते दिन पाकिस्तान के लाहौर कोर्ट में एक याचिका दायर कर भारतीय फिल्मों के व्यापार, प्रदर्शन और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है. पाकिस्तान के एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक शेख मुहम्मद लतीफ ने अपने वकील के माध्यम से याचिका कर इस प्रतिबंध की मांग की है. मुहम्मद लतीफ ने अपनी याचिका में कहा है कि 2016 में संघीय सरकार ने भारतीय फिल्मों समेत अन्य कंटेंट के आयात पर प्रतिबंध लगाया था, पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 31 जनवरी 2017 में एक अधिसूचना जारी कर इस प्रतिबंध को हटाने की बात कही थी. अपने इस अधिसूचना के लिए सरकार ने पाकिस्तानी सिनेमा उद्योगों के पुनरुद्धार करने की आड़ ली है.

उन्होंने आगे कहा कि पुलवामा हमले के बाद औल इंडियन सिने वर्कर्स ने भारतीय फिल्म उद्योग में काम करने वाले पाकिस्तानी अभिनेताओं पर आधिकारिक प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है. इसके जवाब में कार्रवाही की मांग करते हुए वो आग्रह करते हैं कि 2017 के नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया जाए और फिल्मों समेत अन्य भारतीय कंटेंट्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए.

सिद्धू ‘कपिल शर्मा शो’ से हुए बाहर? जानिए सच्चाई

पुलवामा हमले पर कपिल शर्मा शो के जज नवजोत सिंह सिद्धू के एक बयान के बाद जिस तरह से देश भर में हो हल्ला हुआ उसके बाद खबर आई कि प्रोड्यूसर ने सिद्धू को शो से बाहर कर दिया है. बीते शनिवार-रविवार को सिद्धू शो में आये तो सोशल मीडिया पर बवाल मच गया लेकिन बाद में लोगों का गुस्सा शांत हुआ जब अर्चना के शो में एंट्री का वीडियो आया. पर अर्चना के हालिया बयान को सुनकर आपको इस खबर की सत्यता पर भी शक होगा.

सिद्धू को शो से हटाया गया है इसका कोई भी आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. ना कपिल की ओर से, ना प्रोड्यूसर की ओर से और ना ही चैनल की ओर से. पर एक समाचार एजेंसी की खबर की माने तो अर्चना ने कहा कि वो सिद्धू की जगह शो में नहीं आई हैं. वो सिद्धू की परमानेंट रिप्लेसमेंट नहीं हैं. अर्चना ने बताया है कि उन्होंने पुलवामा अटैक के पहले ही दो एपिसोड शूट कर लिए थे जो सोन चिड़िया स्टारकास्ट और सेलेब्रिटी क्रिकेट लीग प्रमोशन के लिए आने वाले सितारों के साथ थे. इस दौरान सिद्धू किसी काम के कारण शो में नहीं आ सके जिसके बाद टेंप्रोरी तौर पर दो एपिसोड्स के लिए अर्चना ने कुर्सी संभाली है. सोशल मीडिया पर सिद्धू के खिलाफ विरोध का माहौल तैयार है. लोग सोनी टीवी के बहिस्कार का आवाह्न कर रहे हैं.

मसूद अजहर को छोड़ना भारत की सबसे बड़ी गलती थी

पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर आतंकी हमले के बाद पूरा देश आक्रोशित है, 38 जवानो के शवों को देखकर हर आंख भीगी है. हर जुबान से बस यही निकल रहा है कि बस अब बहुत हुआ… अब इन्हे छोड़ना नहीं है. जिस वक़्त देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद जवान के ताबूत को कंधा दिया वो पल पूरे देश को रुला गया. पुलवामा की घटना और इससे पहले हुई कई घटनाएं ना घटतीं अगर हमने मसूद अज़हर जैसे खूंखार आतंकी को अपने चंगुल से ना निकलने दिया होता. बहुत बड़ी गलती हो गई जब कंधार विमान हाईजैक के दौरान आतंकी मसूद अजहर को छोड़ा गया. अगर उसको उस वक़्त शूट कर दिया जाता तो शायद संसद, उरी, पठानकोट और अब पुलवामा में आतंकी हमले न होते.

पुलवाम की साजिश रचने वाला जैश-ए-मुहम्मद का सरगना मौलाना मसूद अजहर वही आतंकी है, जिसे कंधार विमान हाईजैक के दौरान रिहा करना पड़ा था. मसूद अजहर की रिहाई के बाद पाकिस्तान चौड़ा हो गया और उसकी शह पाकर ही मसूद ने आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद को जन्म दिया. इसमें कोई शक नहीं कि मसूद के आतंकी संगठन को जहां पाकिस्तानी सेना का पूरा सपोर्ट है वहीं चीन भी उसको पूरा सपोर्ट करता है और उसका इस्तेमाल भारत को परेशान करने के लिए करता है.

मसूद अजहर को साल 1994 में पहली बार गिरफ्तार किया गया था. कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन का सदस्य होने के आरोप में उस वक्त उसकी श्रीनगर से गिरफ्तारी हुई. मौलाना मसूद अजहर की गिरफ्तारी के बाद, जो कुछ हुआ उसका शायद किसी को अंदाजा भी नहीं था. अज़हर को छुड़ाने के लिए आतंकियों ने 24 दिसंबर, 1999 को 180 यात्रियों से भरे एक भारतीय विमान को नेपाल से अगवा कर लिया और विमान को कंधार ले गए. भारतीय इतिहास में यह घटना ‘कंधार विमान कांड’ के नाम से दर्ज है. कंधार विमान कांड के बाद भारतीय जेलों में बंद आतंकी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक जरगर और शेख अहमद उमर सईद की रिहाई की मांग की गई और यात्रियों की जान बचाने के लिए छह दिन बाद 31 दिसंबर को आतंकियों की शर्त मानते हुए भारत सरकार ने मसूद अजहर समेत तीनों आतंकियों को छोड़ दिया. इसके बदले में कंधार एयरपोर्ट पर अगवा रखे गए विमान के बंधकों समेत सभी को छोड़ दिया गया.

यहीं से शुरू हुई जैश की कहानी 

जेल से छूटने के बाद मसूद अजहर ने फरवरी 2000 में जैश-ए-मुहम्मद आतंकी संगठन की नींव रखी, जिसका मकसद था भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना और कश्मीर को भारत से अलग करना. उस वक्त सक्रिय हरकत-उल-मुदाहिददीन और हरकत-उल-अंजाम जैसे कई आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद में शामिल हो गए. खुद मसूद अजहर भी हरकत-उल-अंसार का महासचिव रह चुका है. साथ ही हरकत-उल-मुजाहिदीन से भी उसके संपर्क थे.

संसद, पठानकोट, उरी से लेकर पुलवामा हमले में जैश का हाथ

यह कोई पहली बार नहीं है, जब जैश ने भारत को दहलाने की कोशिश की हो. साल 2001 में संसद हमले से लेकर उरी और पुलवामा हमले में जैश का हाथ रहा है. अपनी रिहाई और आतंकी संगठन की स्थापना के दो महीने के भीतर ही जैश ने श्रीनगर में बदामी बाग स्थित भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली थी.

बड़े आतंकी हमले में जैश का हाथ

28 जून, 2000:

जम्मू कश्मीर सचिवालय की इमारत पर हमला. जैश ने ली हमले की जिम्मेदारी.

14 मई, 2002:

जम्मू-कश्मीर के कालूचक में हुए हमले में 36 जवान शहीद हो गए, जबकि तीन आतंकी मारे गए.

1, अक्टूबर 2008:

जैश के तीन आत्मघाती आतंकी विस्फोटक पदार्थों से भरी कार लेकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा परिसर में घुस गए. इस घटना में 38 लोग मारे गए.

26/11 मुंबई हमला:

26/11 मुंबई आतंकी हमले को भी जैश ने अंजाम दिया था. 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में समुद्र के रास्ते आए 10 आतंकियों ने 72 घंटे तक खूनी तांडव किया था. इस हमले में 166 लोग मारे गए थे, जबकि कई घायल हो गए थे. इस हमले का मास्टर माइंड भी मसूद अजहर रहा है. मुंबई हमले में 9 आतंकी भी मारे गए थे. इस में एक जिंदा आतंकी आमिर अजमल कसाब को भी पकड़ा गया था, जिसे बाद में फांसी की सजा दी गई.

संसद हमला

13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर हुए हमले के पीछे भी लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद के आतंकियों का हाथ. इस हमले में 6 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे, जबकि तीन संसद भवन कर्मी भी मारे गए. संसद हमले का दोषी अफजल गुरु भी जैश से जुड़ा था. उसे 10 फरवरी 2013 में फांसी दी गई थी.

पठानकोट हमला

जनवरी 2016 को पंजाब के पठानकोट स्थित वायु सेना ठिकाने पर हमले के लिए भी ज़िम्मेदार. इस हमले में वायुसेना और एनएसजी के कुल सात सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे. दो दिनों की मुठभेड़ के बाद सभी आतंकियों को मार गिराया गया था.

उरी हमला

18 सितंबर, 2016 में कश्मीर के उरी स्थित सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में भी जैश का हाथ रहा है. उरी हमले में 18 सैनिक शहीद हो गए थे. इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी और पीओके में घुसकर कई आतंकी ठिकानों का खात्मा कर दिया था.

आतंकी संगठनों की सूची में शामिल ‘जैश’

जैश-ए-मुहम्मद को भारत ने ही नहीं बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र भी आतंकी संगठनों की सूची में शामिल कर चुका है. हालांकि अमेरिका के दबाव के बाद पाकिस्तान ने भी साल 2002 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था, मगर अंदर ही अंदर सेना का पूरा सपोर्ट जैश को मिलता रहा. भारत मसूद अज़हर के प्रत्यर्पण की पाकिस्तान से कई बार मांग कर चुका है, लेकिन पाकिस्तान हर बार सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए इस मांग को नामंजूर कर देता है. इसके लिए उसे चीन की मदद भी बराबर मिल रही है. चीन ने तो मसूद अज़हर को आतंकी मानने तक से इंकार कर दिया है.

भारत को अब अपने पड़ोसी देशों – पकिस्तान और चीन से टक्कर लेने और और उनको कड़ा सबक सिखाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. सांप को दूध पिलाने से वो अपनी प्रवृत्ति नहीं छोड़ देगा, पुलवामा के बाद तो हमें ये बाद अच्छी तरह समझ में आ जानी चाहिए.

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