Hindi Story: लिफाफे में रसगुल्ला

Hindi Story:अपने देश में मिठाइयों की परंपरा बहुत पुरानी है. शादीब्याह, जन्मदिन, तबादला, चुनाव या कोई भी सैलिब्रेशन हो, मुंह मीठा करना तो बनता ही है. लेकिन मिठाइयां भी कई तरह की होती हैं. कुछ मिठाइयां कागज के डब्बे में आती हैं और कुछ मिठाइयां लिफाफे में आती हैं और लिफाफे में आया हुआ रसगुल्ला बेहद मीठा होता है. यह आधुनिक और विकसित भारत की सब से उन्नत मिठाई है.
यह ऐसी मिठाई है कि इस में चींटी लगती है, डायबिटीज बढ़ती है और ही ब्लड प्रैशर बढ़ता है.

बस, मन मीठा हो जाता है, सिस्टम मीठा हो जाता है. और जो रसगुल्ले लिफाफे में आते हैं, वे साधारण रसगुल्ले नहीं होते हैं. इतने मुलायम और पसंदीदा होते हैं कि इन के लिए नियमकानून खुद पिघल कर आइसक्रीम बन जाते हैं, जमीन पर बिछ जाते हैं. और ये इतने सफेद होते हैं कि काले से काले काम भी सफेदसफेद लगने लगते हैं. इन रसगुल्लों को खाने के बाद अफसर की फाइलें दौड़ने लगती हैं, जनता की अर्जियां इस टेबल से उस टेबल तक उछलकूद करने लगती हैं. जितना भारी लिफाफा, उतनी तेज दौड़ होती है उस फाइल की. देखने और सुनने में यह लिफाफा बहुत ही मासूम और खूबसूरत दिखता है, लेकिन उस पर रसगुल्ला लिखा होता है और ही मिठाई लिखी होती है, लेकिन मीठा पूरा होता है.

उस में खालिस देशी घी के लड्डू जितनी मिठास और काजू कतली के जैसे स्वाद भरे होते हैं. हलका इतना होता है कि जेब में रखा जा सके और भारी इतना होता है कि किसी भी काम का बो? अपने कंधे पर उठा सके. अगर कोई इस लिफाफे के बारे में नहीं जानता और सम?ाता है, तो या तो वह बहुत बड़ा गधा और बेवकूफ है या फिर बहुत ईमानदार है और उस की नईनई भरती हुई है और पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर करने के बारे में सोच रहा है, जिस में उस की खैर नहीं है. जिसे ऐसे लिफाफे के बारे में ज्ञान नहीं है, उसे इस ज्ञान की बहुत जरूरत है. नेताजी किसी अफसर के घर जाते हैं, तो कहते हैं, ‘अरे साहब, बस
शगुन है.’ अफसर भी मुसकरा कर जवाब देते हैं, ‘अरे, इस की क्या जरूरत थी,’ जबकि दोनों जानते हैं कि सब से ज्यादा इसी चीज की जरूरत थी. बाकी बातें तो औपचारिकता होती हैं, मेन सैलिब्रिटी तो यही होता है.

फिर वह अफसर बड़े ही सलीके से शगुन को अलमारी में रख देता है, ताकि उस के बच्चों का भविष्य भी मीठामीठा रहे और उस की पत्नी के गले में नौलखा हार सजता रहे. लिफाफा के रसगुल्ले खाने का सब से बड़ा फायदा यह है कि ही इसे रिश्वत कहा जाता है और ही यह कड़वा और बदनाम और संवैधानिक होता है. एक तरह से देखा जाए, तो रिश्वत बहुत ही खराब शब्द हैयह भी कोई कहने का और बोलने का शब्द है. हां, रसगुल्ला कहना सही है. रसगुल्ला संस्कृति है, परंपरा है, मिठास है और जब लिफाफे में रहता है, तो सम्मान भी कहा जा सकता है. उधर ईमानदारी अपना माथा कूटती रहती है कि गलती मेरी ही थी क्या कि मैं ने लिफाफा को पहना और ही रसगुल्ला खा पाई और हिस्से में मेरी सूखी रोटी आई? सब भाषण में ईमानदारी की तारीफ करते हैं, लेकिन खाते समय कोई बांट कर खाना याद नहीं रखता है.

लिफाफे के रसगुल्ले को कमतर मत मानिए, क्योंकि लिफाफे का रसगुल्ला बहुत ही चमत्कारिक होता है. जो कल तक फाइल जांच के अधीन होती है, वह विचाराधीन हो जाती है और परसों मंजूर. अगर कोई भूलेभटके उस फाइल के बारे में पूछ ले, तोप्रोसैस चल रहा हैजैसे जवाब हमेशा तैयार रहते हैं. रसगुल्ला पाचन का तरीका इसे कह सकते हैं. सब से मजेदार बात यह है कि लिफाफे में रसगुल्ले देने वाला और लेने वाला दोनों ही खुद को नैतिकता का पहरेदार मानते हैं. देने वाला सोचता है कि मजबूरी में दे रहा हूं और लेने वाला सोचता है कि अब लक्ष्मी को कौन मना करने जाए. जनता सोचती रह जाती है कि वह क्या करे.
आजकल डिजिटल जमाना है. रसगुल्ले भी स्मार्ट हो गए हैं. पहले हाथ से दिए जाते थे, पर अब सिस्टम के जरीए पहुंचते हैं, पर नाम वही रहता है लिफाफे में रसगुल्ले. तकनीक बदली है, स्वाद नहीं बदला है और ही रसगुल्ले का मिजाज बदला है.

अगर आप को भी ऐसे रसगुल्ले खाने को मिलें, तो बेवकूफों के जैसे छोड़ कर पछताना नहीं. सम?ादार वही है जो लिफाफा खाए और मुंह मीठा होने का दावा भी करे. लेकिन एक बात का ध्यान जरूर रखना कि लिफाफे में रसगुल्ला सुन कर सचमुच लिफाफे में रसगुल्ला मत भेजिएगा, क्योंकि अफसर उसे आप के मुंह पर फेंक देगा. नारियल के चक्कर में नहर में बह गया बच्च उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में दनकौर के दौला रजपुरा गांव में 27 फरवरी को गंग नहर में बहते नारियल को पकड़ने की कोशिश में.

4 साल का अदनान तेज बहाव में डूब गया. दरअसल, दौला रजपुरा के रहने वाले इसरार का छोटा बेटा अदनान उस शाम को अपने 10 साल के बड़े भाई के साथ नहर किनारे खेल रहा था. उसी समय नहर में एक नारियल तैरता दिखाई दिया. दोनों भाई उसे लेने पानी में उतरे. बड़ा भाई किसी तरह बाहर निकल गया, लेकिन अदनान तेज बहाव के चलते पानी में बह गया. उस के परिवार वालों ने प्रशासन पर देरी करने का आरोप लगाया.

रेखा शाह

Political Story: 2025 धुरंधर साल की मजाकिया पड़ताल

Political Story: सा 2025 को भारतीय इतिहास में उस ब्लौकबस्टर फिल्म की तरह दर्ज किया जाएगा, जिस में डायरैक्टर बदलते रहे, पटकथा रोज लिखी गई, कलाकार खुद ही डायलौग बोलते रहे और दर्शक बेचारे टिकट ले कर भी सिनेमाघरों से बाहर नहीं निकल पाए.
इस में कहानी थी, सस्पैंस था, रोमांस था, वादविवाद था, संवाद था, एक्शन था, थ्रिलर था, बस नहीं था तो इंटरवल और ही चैनल बदलने का औप्शन, क्योंकि पूरा देश ही सिनेमाघर और देशवासी दर्शक बने हुए थे.


भक्ति, भीड़ और व्यूअरशिप का त्रिवेणी संगम फिल्म की ओपनिंग भव्य रही. प्रयागराज महाकुंभ में तकरीबन 65 करोड़ श्रद्धालुओं ने पाप धोने के लिए आस्था की डुबकी लगाई. कुछ श्रद्धालु ऐसे भी थे, जिन्होंने मनका विक्रेता मोनालिसा की आंखों में डुबकी लगा कर वैतरणी पार करने का शौर्टकट रास्ता खोज लिया. भक्ति, भावुकता और व्यूअरशिप, तीनों का त्रिवेणी संगम हुआ. कैमरे भी श्रद्धा में लीन थे, बस लाइक और शेयर बाकी रह गया था.


एक्शन सीन : भगदड़ से ब्लास्ट तक
जैसे फिल्म में हर मसाला होता है, वैसे ही शांत भक्ति के बाद भारतीय पटल पर एक्शन सीन भी देखने को मिले. महाकुंभ, दिल्ली रेलवे स्टेशन और रथ यात्रा की भगदड़. एयर इंडिया का प्लेन क्रैश, पहलगाम आतंकी हमला, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल की हिंसा, दिल्ली ब्लास्ट, गोवा नाइट क्लब आगजनी और रोहित शेट्टी की फिल्म की तरह कोहरे में यमुना एक्सप्रैसवे पर गाडि़यों की टक्कर, इन सब ने साल को पूरी तरहधमाकेदारबना दिया.

इन घटनाओं से देश कुछ देर के लिए जरूर थमा, लेकिन इन हालात में भी माननीयों के चुनावी दौरे और विदेशी यात्राएं बदस्तूर जारी रहीं. दर्शक कन्फ्यूज हो गए कि यह ब्रेकिंग न्यूज है या अगली वैब सीरीज का ट्रेलर या फिर अविराम जीवन का परम सत्य. गौसिप, गलतफहमियां और टीआरपी की दुलहन
पिछले साल केबंटोगे तो कटोगेके बाद इस सालआई लव मोहम्मदऔरआई लव महादेवजैसे नारे राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज हुए. एसआईआर, शरबत जिहाद, बीएलओ, टैरिफ, जीएसटी और जेनजी जैसे शब्द चर्चा में रहे. बाबाओं और नेताओं का बड़बोलापन, अक्षय का ठुमकना, माननीय द्वारा हिजाब हटाने की घटना, सब ने सुर्खियां बटोरीं.


इधर मोस्ट बैचलर राहुल गांधी और सलमान खान को इस साल भी दुलहन नहीं मिली, उधर वक्फ संशोधन विधेयक और एसआईआर प्रक्रिया, सब ने मिल कर गौसिप चैनलों की टीआरपी को दुलहन बना दिया.
इंटरनैशनल कूटनीति का मल्टीस्टारर सीन इंटरनैशनल फ्रेम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपग्लोबल फूफाका रोल निभाते हुए नोबेल अवार्ड की तलाश में भटकते रहे, लेकिन भारतीय कूटनीति और नार्वेजियन नोबेल कमेटी ने मोगेंबो कोखुशहोने का मौका ही नहीं दिया. टैरिफ की आड़ में ट्रंप भारत के पीछे ऐसे पड़े रहे, जैसे कुत्तों के पीछे दिल्ली कोर्ट.


आपरेशन सिंदूर और एशिया कप के दौरान पाकिस्तान को कूटा गया. कूटनीति का यह मल्टीस्टारर सीन था, जिस में संवाद कम और संदेश ज्यादा था. रोमांस, क्राइम और नीला ड्रम रोमांस और थ्रिलर ने भी दर्शकों को निराश नहीं किया. समधीसमधन, चाचीभतीजा और सासदामाद की भागमभाग प्रेमकथाएं ट्रैंड में रहीं. शादीशुदा मर्दों की जिंदगी में राहुकेतु साथसाथ गोचर करते दिखे. ‘वोके चक्कर में नीला ड्रम, हौरर हनीमून और हसीन दिलरुबा टाइप घटनाओं ने सस्पैंस को हद पर पहुंचा दिया. मीडिया और सोशल मीडिया सनसनी तैमूर के घर उस के अब्बाजान छोटे नवाब पर चाकू से हमला किया गया. मीडिया नेसब से तेजबनने की होड़ में वीरू पाजी को असली देहांत से पहले ही श्रद्धांजलि दे दी.


सोशल मीडिया पर भारतीयधुरंधरसे ज्यादा पाकिस्तानी डकैत ने लोकप्रियता हासिल की. अपने सैयारा के लिए नौजवान सिनेमाघरों में सिसकियां लेते दिखे. कपिल शर्मा के शो में हंसी की बौछार कम और उस के कैफे पर गोलियों की बौछार ज्यादा चर्चा में रही. खेल, चुनाव और क्षेत्रीय संगीत आईपीएल में बैंगलुरु की जीत के जश्न में फैंस ने कुरबानी तक दे डाली. एसआईआर के बाद बिहार चुनाव में प्लसमाइनस का खेला देखने को मिला. पुराने उम्मीदवारों का टिकट और पुराने अवैध वोटर का नाम कटा, तो नए उम्मीदवार को टिकट और वोटर लिस्ट में नए वोटर का नाम जुड़ा.


फाइनली सुशासन की रीलौंचिंग हुई, हालांकि इस दौरान मछलीपालन नौटंकी, टिकटकटवा ड्रामा, जूतमपैजार और गालीगलौज के चुनावी मैटेरियल ने वोटरों का भरपूर मनोरंजन किया. आखिरी सीन : गो इंडिया से इंडगोक्राइसिस हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा का सपना भले ही पूरा हुआ हो, लेकिन इंडिगो क्राइसिस ने टाई पहनने वालों को भी हलकान कर दिया. इस साल के आखिर में इंडिगो ने यात्रियों केगोपरइंडलगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. साल 2025 में भी नाम बदलो, भाग्य बदलो अभियान जारी रहा. राजभवन से लोक भवन, पीएमओ से सेवा तीर्थ, मनरेगा सेजी राम जी’… नाम बदलते रहे. डौलर के मुकाबले रुपया भी नेताओं के चारित्रिक असर का अनुसरण करता दिखा और गिरने में मौद्रिक महारत हासिल की.


बाढ़, चुनाव और अपराध का सीजन समय पर आया. दिवालिया साल में दीवाली को यूनैस्को की विश्व धरोहर में जगह मिली. भारत में पाकिस्तानीरहमान डकैतका डांस और हिजाब मामले के चलते पाकिस्तान में भारतीयसुशासन बाबूसुर्खियों में बने रहे. कुलमिला कर, साल 2025 ने साबित कर दिया कि भारत में मनोरंजन के लिए सिनेमाघर की जरूरत नहीं, बल्कि खबरें ही काफी हैं. धुरंधर साल 2025 के इस मजाकिया पोस्टमार्टम का यहीं एंड किया जाता है, क्योंकि नए साल 2026 का लाइव टैलीकास्ट शुरू हो चुका है.      Political Story   

Political Story: राजभवन में एक दिन

Political story: अपने बचपन में खूब बाल पत्रिकाएं जैसेनंदन’, ‘पराग’, ‘चंदामामा’, ‘बाल भारती’, ‘चंपकवगैरह पढ़ी थीं, जिन में राजारानियों, राजकुमारों, जानवरों से जुड़े मजेदार किरदारों की कहानियां हुआ करती थींअब राजारानी हैं, तो राजमहल भी होंगे ही. तो उस जमाने में हमारे जैसे बच्चे कल्पनालोक में डूब जाते थे कि राजमहल कैसा होता होगा. जाहिर सी बात है कि वे भव्य तो होंगे ही. होना भी चाहिए. वह समय राजतंत्र का भी था.


मगर वह राजतंत्र अब लोकतंत्र में बदल गया है, तो राजारानी तो हैं नहीं, मगर राजमहल मौजूद हैं, जो म्यूजियमों में या होटलों में बदल गए हैं. पुराने जमाने में इन राजमहलों की शानशौकत का कहना ही क्या था. फिर बाल कहानियों में तो वे अपनी पूरी शान से मौजूद रहते थे, जिस में रहने का हम सपना भी नहीं देख सकते थे. मगर एक इच्छा तो रहती ही है मन में कि वहां जा कर उन की भव्यता देखते कि राजपरिवार के लोग कैसे रत्नजटित राजमुकुट लगाए राजमहलों में रहते होंगे. राजा सोने के एक भव्य, बड़े सिंहासन पर सलमेसितारों से सजा मखमली छत्र लगा कर बैठा होगा.


उन की देह पर आभूषणों का भंडार जो सजा रहता था. गले में बड़ेबड़े हार, कानों में बड़ेबड़े  झुमके या बड़ीबड़ी बालियां, बांह पर बाजूबंद, कलाई में कंगन और कमर में करधनी. ये सब खासे सच्चे सोने के होते थे, जिन की तसवीरें पत्रिकाओं में छपी होती थींआखिरचंदामामा’, ‘नंदन’, ‘परागवगैरह में बताए गए किरदार तेनालीराम, बीरबल, गोपाल भांड़ वगैरह तो सामान्य लोग ही थे, जो अपनी चतुराई और बुद्धिमानी से वहां पहुंच गए थे. मगर हम लोगों के पास चतुराई थी और ही बुद्धिमानी, सो वहीं के वहीं रह गए. और एक छोटी सी नौकरी तक पहुंच कर वोटर भर बन कर रह गए.


पुराने जमाने में इन राजमहलों में एक राजदरबार भी हुआ करता था. क्या भव्यता रहती थी उस की. राजा या तो आमोदप्रमोद में बिजी या हंसतेमुसकराते इनामइकराम बांट रहा होगा. अकबर के राजदरबार से प्रेरणा ले कर इस राजदरबार की पहली परिकल्पना तुलसीदास ने रामदरबार के लिए की थी. वह हर रामलीला के बाद बतौर  झांकी अंत में दिखाई जाती है. सो, उस की चकाचौंध आंखों में बसी थी. बाद में राजा रवि वर्मा ने इसे अपनी कल्पना से चित्रों में उतार दिया, तो उस की कौपियां अब देशभर में दिखाई देती हैं.


मगर लोकतंत्र की आंधी ने यह सबकुछ खत्म कर दिया. कुछेक देशों में यह राजतंत्र अब भी है. जैसे कि पहले आधुनिक लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले इंगलैंड में राजा होता है. लेकिन वह नाममात्र का ही राजा है. वैधानिक ताकत तो संसद के पास है. इसी तरह के राजतंत्र अभी भी वजूद में हैं, जिन के प्रति प्रजा पूरी श्रद्धा रखती है. भगवान के समान पूजती नहीं, मगर विश्वास तो रखती ही है. इस से क्या हुआ? राजतंत्र तो है . 1857 में बहादुर शाह जफर को जब अंगरेजों ने कैद किया था, तब उस का असली राज दिल्ली और उस के आसपास (एनसीआर) में ही था. मगर वह हिंदुस्तान का बादशाह कहलाता था. हिंदुस्तान मतलब सम रहे हैं . इस हिंदुस्तान में दक्षेस, यानी दक्षिण एशिया के सभी देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका वगैरह समाहित थे.


इस के बाद जहांजहां राजतंत्र खत्म हुआ, उसे या तो मिटा दिया गया या फिर सजावटी रूप में सजा कर राजमहलों तक सीमित कर दिया गया. अंगरेजों ने भारत में यही किया था. वे एकएक कर राजतंत्रों को हड़पते जाते और उसे अपने ब्रिटिश लोकतंत्र में रखते जाते थे. वह तो 1857 में कुछ की चेतना जगी, तो लोग सजग हुए और विद्रोह कर दिया. बड़ी मुश्किल से वह बगावत रुकी. अंगरेजों को डर हुआ कि यहां तो लोकतंत्र आएगा नहीं, उन की दुकानदारी भी जाती रहेगी. सो, उन्होंने साफ कह दिया कि तुम अपने राज में राजा बने रागरंग करते रहो. बस, विद्रोह करना और हमें धंधा करते देना. और इस तरह भारत में तकरीबन 600 रजवाड़े बच रहे थे.


1947 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें और समेट दिया और प्रिवी पर्स का एक नन्हा टुकड़ा उन के मुंह पर मार दिया था. वे फिर भी खुश थे कि राजा कहला रहे हैं . और क्या चाहिए. लेकिन 1971 में इंदिरा गांधी ने वह भी उन से छीन लिया कि अब भारत में लोकतंत्र रहेगा. वैसे यहां लोकतंत्र है, तो क्या हुआ, राजमहल तो हैं ही. बस, उन का नामकरण बदल गया है. आजादी से पहले इसे गवर्नमैंट हाउस बोलते थे. अब वह राजभवन हो गया है. और इन राजभवनों में राज्यपाल रहते हैं. लेकिन नाम बदलने से क्या होता है. चीजें तो वैसे ही रह सकती हैं. असली मुखिया भले ही मुख्यमंत्री हो, राज्य का काम तो राज्यपाल के नाम से ही चलता है. सो, उन की अपनी अहमियत है ही. लिहाजा, एक हसरत थी कि हम भी राजभवन देखते, जो कभी राजमहल कहलाता था.


बिहार विधानसभा से जो सीधी सड़क आगे जाती है, उस के दूसरे छोर पर है राजभवन. इस के बाईं ओर मुख्यमंत्री का आवास है. मतलब एक तरफ राजप्रतिनिधि, तो दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि, लेकिन हमें उधर क्या जाना? हमें तो राजप्रतिनिधि के पास जाना है. चारों तरफ सुरक्षा की जबरदस्त घेराबंदी और चौकसी.
सो, हम दाईं ओर एक सिपाहीश्री के कथनानुसार मुड़ लिए. सड़क के उस पार एक बड़ा सा प्रवेश द्वार. उस की बगल में सिक्योरिटी औफिस में आमंत्रणपत्र दिखाया. आरक्षी निरीक्षकश्री ने अपनी बड़ीबड़ी मूंछों के पीछे मुसकराहट को छिपाते और कमर में बंधी गन को सहलाते हुए आगे का रास्ता दिखा दिया.

जनताजनार्दन वैसे ही डरी रहती है. राजमहल जाने से पहले उसे कुछ और ज्यादा डरना चाहिए शायद.
खैर, दोबारा एक सड़क आगे राजभवन की ओर. सड़क के दोनों तरफ के सघन पेड़पौधे जंगल का भरम पैदा कर रहे थे. बिहार के बनने के बाद जो यहां के पहले राज्यपाल सर एडवर्ड गेट थे, वे पूर्वोत्तर के भयानक जंगलों में खूब भागदौड़ कर चुके थे. शायद इसलिए उन्होंने इस परिसर में ही नहीं, इस इलाके में भी वृक्षारोपण कराया होगा, ताकि यह इलाका जंगलों की तरह दिखे और वे पूर्वोत्तर के पुराने दिनों को भूल जाएं.


एडवर्ड गेट ने पूर्वोत्तर पर ही एक इतिहास पुस्तकहिस्ट्री औफ असमतैयार किया था. वह पूर्वोत्तर के इतिहास को जानने का एक प्रमुख, प्रामाणिक स्रोत माना जाता है. बाद में पता चला कि राजभवन परिसर में कुल 27 बाग हैं. एक बाग तो आमों का है, जिस में आमों के 25 प्रजातियों के तकरीबन 35 पेड़ हैं. इसी तरह दूसरी तरह के फलों के पेड़ हैं. फूलों की असंख्य प्रजातियां वहां खिलतेमुर झाते रहते हैं. एक मनोरम सरोवर है, तो भव्य गौशाला भी है.  सफेद रंग का एक तिमंजिला सादे ढंग का भवन है, जिसे राजभवन कहा जाता है. हर तल आजकल के भवनों से अलग बीसेक फुट ऊंचा होगा. अब राजभवन के दरबार में जा रहा हूं, तो एक सोच बनी थी.

मगर वहां दर्शक दीर्घा में कुछ काठ की कुरसियां पड़ी थीं. सामने मंच पर पुखराजी कलर वाले मखमली आवरण से ढकी, आबनूसी रंग वाली नक्काशीदार बड़ी सी गद्दीदार कुरसी थी, जिसे पारंपरिक सफेद वेशभूषा में एक भृत्य तकरीबन पकड़ कर खड़ा था. गोया अगर उस ने उस कुरसी की देखभाल नहीं की, तो कोई उसे उठा कर भाग जाए. खैर, यह राजभवन का प्रोटोकौल है. इस कुरसी के अगलबगल 2-2 सामान्य कुरसियां थीं. मंच के दोनों छोरों पर काले कपड़ों और चश्मों में 2 कमांडो अटैंशन की मुद्रा में खड़े थे. राज्यपाल महोदय का आगमन हुआ. कोई छत्र और चंवर भी नहीं. सिर पर राजमुकुट क्या, कोई पगड़ी तक नहीं. यह सामान्य सादे वेशभूषा में कमांडों और कुछ लोगों के साथ राज्यपाल दरबार में चले रहे हैं. दरबार के ठीक मध्य में पुराने जमाने का कोई पीतल का बड़ा सा  झाड़फानूस टंगा है.

इस से बड़ेबड़े और बढि़या, चमचम चमकते  झाड़फानूस तो औसत दर्जे के होटलों में  झूलते रहते हैं. हां, यहां मौडर्न अंदाज के सिलिंग फैन जरूर  झूम रहे थे, जो बदलाव की बात बताता सा लग रहा था. प्रोटोकौल के मुताबिक महामहिम राज्यपाल के सम्मान में सभी खड़े हो गए. मंचासीन होने के बाद वे दोबारा खड़े हुए, क्योंकि राष्ट्रगान होने वाला था. ठीक तय समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ. पत्रिका का लोकार्पण होना था, जो उन्होंने किया. फिर कहा, ‘मु झे इस बात की खुशी है कि मैं उस पत्रिका का लोकार्पण कर रहा हूं, जिस में सनसनी नहीं, संवेदनशीलता है.’


दूसरे लोगों ने भी अपनी बातें कहीं. कार्यक्रम के बाद दोबारा राष्ट्रगान हुआ. दर्शक दीर्घा के एक कोने में चायजलपान का इंतजाम था. राज्यपाल ने खुद मेजबानी करते हुए सभी को जलपान कराया. फिर हम सभी वहां से विदा हो लिए.        Political Story

Political Story: विश्वगुरु का खिताब हमारे नाम

Political Story: कांग्रेसी चमचा और संघी देशभक्त जब भी आमनेसामने जाते तो उन में वैचारिक भिड़ंत उतनी ही स्वाभाविक होती जितनी आपस में टकराने वाले सांडों की भिड़ंत. उन में एकदूसरे को बरदाश्त करने की ताकत साल 1925 से ही ऐसी गायब हो गई थी जैसे गधे के सिर से सींग.


यह अद्भुत भिड़ंत आज भी जारी है और अनुमान ही नहीं समुद्र के खारे पानी की तरह पूरा विश्वास है कि जब तक सूरजचांद रहेगा, कांग्रेसी और संघी भिड़ंत का कोई तोड़ नहीं रहेगा. हाई वोल्टेज करंट की तरह ज्वलंत और किसी सुपर बल्ब की तरह यह भिड़ंत अनंतकाल तक जगमगाती रहेगी और आम पब्लिक गोलगप्पों की तरह चटकारे लेले कर इस का मजा लेती रहेगी. बंधुओ, इस में छटांक भर की भी कमी जाए तो कसम इस लेखनी की जो कभी फिर इसे लिखने के लिए उठा लूं.


एक संघी देशभक्त सुबह की शाखा से ऐसे ही खुश हो कर लौट रहा था, जैसे तरोताजा घोड़ा हष्टपुष्ट घास चरने और धूल में लोटने के बाद बिलकुल मस्त दिखाई देता है, लेकिन उसे क्या पता था कि अगले ही मोड़ पर उसे वह मनहूस सूरत दिखाई दे जाएगी, जिसे वह सपने में भी देख कर बिदक जाता है. अंदाजा लगाइए कि कौन मनहूस होगा वह? बिलकुल सटीक अंदाजा है आप का, वह था कांग्रेसी चमचा जो उस संघी के लिए किसी देशद्रोही से कम था. एकदूसरे को देखते ही वे दोनों ऐसे ताव खा गए जैसे सांप और नेवला अचानक से एकदूसरे के सामने जाएं और जब ही गए और नूरा कुश्ती हो, यह तो नामुमकिन ही है. एकदूसरे को देख कर दोनों गरम रेत में भुनते चने की तरह तड़तड़ भुनक गए.


‘‘और संघी देशभक्त, शाखा में जा कर अपना ब्रेनवाश मतलब मन मैला कर आए…’’ चमचे ने कुटिल मुसकान से कटाक्ष की कटार भोंकते हुए कहा. ‘‘ चमचे देशद्रोही, जबान संभाल कर चलाया कर. हमारी शाखा हमारा मन मैला नहीं करती, बल्कि हमें संस्कृति, संस्कार, अनुशासन और देशभक्ति का पाठ पढ़ाती है, तुम्हारी तरह बदमिजाजी का नहीं,’’ देशभक्त ने दशकों से रटारटाया भाषण ?ाड़ दिया. ‘‘ओहो, बड़े अनुशासन और संस्कार की बातें करते हो संघीफिर यह लाठी ले कर शाखा में क्यों जाते
हो, जरा बताओ तो अनुशासित संघी सिपाही?’’


‘‘अबे चमचे, ध्यान से सुन. यह लाठी नहीं, हमारादंडहै. यह किसी पर हमला या आत्मरक्षा के लिए नहीं, बल्कि शारीरिक अभ्यास के लिए होता है. अगर यह लाठी होती, तो अब तक तुम्हारे सिर पर पटक दी होती. ‘‘इतिहास गवाह है कि 1925 से आज तक किसी संघी ने अपने दंड को लाठी की तरह इस्तेमाल नहीं किया. आज तक किसी संघी पर लाठी चलाने के जुर्म में हिंदुस्तान के किसी भी थाने में एक
भी एफआईआर दर्ज नहीं है. उम्मीद है कि अब तुम्हारी दंड और लाठी को ले कर भ्रांति दूर हो गई होगी.’’
चमचे को संघी देशभक्त की बात का कोई जवाब नहीं सू? रहा था. अभी भी वहदंडऔरलाठीके भेद के पेंच में फंसा हुआ था, लेकिन अगर वह अपने घोर वैचारिक शत्रु के सामने इतनी आसानी से हाथ डाल दे, तो वह अपनी जमात को क्या मुंह दिखलाएगा.


वह तो इस बार वैसे भी चुनावी टिकट की घुड़दौड़ में शामिल है. उसे तो अपने ही इस हार को ले कर अजगर की तरह लपेट लेंगे. संघी से तो वह निबट भी लेगा लेकिन अजगरों और ऐनाकोंडाओं से कैसे निबटेगा? लेकिन फिलहाल तो उसे सामने वाले घाघ शत्रु से निबटना है. यहां जीत गया तो अपनों में वाहवाही अपनेआप हो जाएगी. वह तपाक से संघी का मखौल उड़ाते हुए बोला, ‘‘अरे देशभक्त, यह तो बताओ, भारत को विश्वगुरु की पदवी पर कब बैठा रहे हो? अब तो तुम्हारी सरकार को सत्ता शासन संभाले हुए भी 11 बरस हो गए हैं. रोज तुम्हारे नेता विश्वगुरु होने का दंभ भरते रहते हैं.’’


यह बात देशभक्त को तिलमिलाने के लिए काफी थी. वह बोला, ‘‘चमचे, तुम अंधे होने के साथसाथ बहरे भी हो. हम तो विश्वगुरु के पायदान पर ही खड़े हैं. देखते नहीं कि आज भारत के प्रधानमंत्री विश्व के अंतर्राष्ट्रीय नेता बन चुके है. दुनिया चीखचीख कर कह रही है कि भारत विश्वगुरु है, लेकिन तुम्हें सुनाई नहीं पड़ता.’’
देशभक्त की यह बात चमचे को हजम नहीं हुई. वह बोला, ‘‘अरे देशभक्त, अपने मुंह इतने मियां मिट्ठू भी मत बनो कि कोई तुम्हारी बात पर यकीन ही करे. ऐसे अंतर्राष्ट्रीय नेता होने का भी क्या फायदा जब तुम्हारी दखल कहीं भी हो. 2 देशों के बीच आज भी युद्ध रुकवाने का ठेका दुनिया के डौन अमेरिका के पास ही है. छोटेछोटे देश भी हमें आंखें दिखाने से नहीं हिचकते, पावरफुल तो हमारी सुनते ही नहीं. संयुक्त राष्ट्र संघ में भी हमें स्थायी सीट नहीं मिली, वीटो पावर मिलना तो दूर की कौड़ी है.’’


देशभक्त ने सोचा कि चमचा तो उस की ही नहीं, बल्कि उस के नेता की भी किरकिरी कर रहा है, नहले पर दहला जड़ रहा है. उस ने अपनी काली टोपी को ठीक करते हुए कहा, ‘‘चमचे, लगता है तुम्हें और तुम्हारे नेताओं को अंतर्राष्ट्रीय मामलों की रत्तीभर सम? नहीं. इन मामलों में समय लगता है. तुम्हारा नेता तो विदेशों में अनापशनाप देश विरोधी बातें कह कर देश की फजीहत कराता है, जबकि हमारे नेता तुरुप चाल चलते हैं, जिन को सम?ाना हर किसी की बात नहीं.’’ देशभक्त की यह बात सुन कर चमचा ठठा लगा कर खूब जोर से हंसा और फिर बोला, ‘‘यार, तुम कैसे देशभक्त हो? अगर हमारा नेता देशद्रोह कर रहा है, तो शोर क्यों मचा रहे हो? हिम्मत है तो उस के देशद्रोही होने पर मुकदमा चलाओ. साबित होने पर अदालत खुद उसे जेल भेजेगी. शोर मचाने से तो कुछ होने वाला नहीं. या फिर तुम्हारी सरकार में दम नहीं. तुरुप चाल की बात तो छोड़ ही दो.’’


देशभक्त ने सोचा कि चमचे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर से खींच कर राष्ट्रीय स्तर पर लाता हूं. वहां बाजी विकास के मामले में अपने हाथ में रहेगी. उस ने कहा, ‘‘चमचे, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तुम हो नहीं. तुम राष्ट्रीय स्तर की बात करो. राष्ट्र में विकास की गंगा बह रही है, उस ओर देखो.’’ चमचे ने शुतुरमुर्ग की तरह गरदन को इधरउधर घुमा कर देखा मानो वह विकास की बहती गंगा को देखने की कोशिश कर रहा हो और वह उसे कहीं दिखाई दे रही हो, ‘‘अरे भाई, कहां है वह विकास की गंगा? हम ने तो अभी तक भगीरथ की गंगा सुनी थी, यह विकास की गंगा कब से बहने लगी?’’ चमचे की नौटंकी पर देशभक्त को गुस्सा तो बहुत आया, फिर भी उस ने शाखा पर सब्र का पाठ सीखा था. उस ने सब्र से काम लिया और कहा, ‘‘तुम सच में अंधे हो चमचे. सारी दुनिया में भारत के विकास का डंका बज रहा है और तुम्हें रौकेट की तेज रफ्तार से होता विकास दिखाई नहीं देता.’’


‘‘सचमुच देशभक्त, देश तरक्की कर रहा है. देश का राजा 90 करोड़ लोगों को अपने हाथों से राशनपानी बांट रहा है. किसानों की जेब में हर साल 6-6 हजार का चुग्गा डाल रहा है. सही है 90 करोड़ लोगों के पास दानापानी नहीं और किसान की कीमत मात्र 6 हजार. वाह रे देश के राजा,’’ चमचे में ताने का जहरबु? तीर छोड़ा. इस से हमारा देशभक्त हत्थे से उखड़ गया. वह तमतमाता हुआ बोला, ‘‘तुम कांग्रेसियों ने अपने 60 साल के राज में देश को ऐसा बदहाल कर के छोड़ा, उस की वजह से देश की यह हालत हुई.’’
‘‘लेकिन देशभक्त, 6साल पहले और 11 साल अब, कुलमिला कर 17 साल तो तुम्हारी साल भी रही. फिर देशभक्त, जनता को तुम से सवाल करने का भी हक बनता है कि तुम ने क्या किया? तुम 90 करोड़ लोगों को इतना भी आत्मनिर्भर नहीं बना पाए कि वे अपने राशनपानी का इंतजाम खुद कर सकते? इस का मतलब तो यही है कि तुम बेरोजगारों को रोजगार नहीं दे सके, उन्हें आत्मनिर्भर नहीं बना सके.’’


देशभक्त को लगा कि वह अपने ही जाल में फंस रहा है. शाखा में उस नेदंड युद्धमें पैंतरा बदलने में महारथ हासिल की थी. उस ने पैंतरा बदलते हुए कहा, ‘‘चमचे, देखते नहीं कि तरक्की का आलम यह है कि कुछ ही सालों में हिंदुस्तान में सैकड़ों की तादाद में अरबपति हो गए हैं. ‘‘मर्सिडीज बैंज हुरुन इंडिया वैल्थ रिपोर्ट के मुताबिक इस समय भारत में 358 अरबपति हैं. अरबपतियों की तादाद में हम अमेरिका, चीन और जापान के बाद विश्व में हम चौथे नंबर पर पहुंच गए हैं. इसी से पता चलता है कि हम ने तरक्की की कितनी ऊंची छलांग लगाई है.’’


यह सुन कर चमचा जोर से हंसा, फिर बोला, ‘‘हां भाई देशभक्त, तरक्की मापने का तुम्हारा पैमाना वाकई जोरदार है. इतना तो मु? भी मालूम है कि इन अरबपतियों की कुल संपत्ति भारत की जीडीपी के आधे के बराबर है. मतलब यह कि गिनती के कुछ अरबपति भारत की बहुत बड़ी संपत्ति पर कुंडली मार कर बैठे हैं और गरीब जनताहायहायकर रही है. तभी तो तुम्हारी सरकार को पूंजीपतियों की सरकार कहा जाता है.’’ देशभक्त हमेशा की तरहपूंजीपतिशब्द सुनते ही भिनक गया. उस ने देखा कि चमचा किसी भी तरह से काबू में नहीं रहा है, दे दनादन वार पर वार कर रहा है. तब उस ने कहा, ‘‘अरे, हमारी सरकार ने देशभर में सड़कों का जाल बिछा दिया है. ऐसी तरक्की कभी देखी है क्या?’’


‘‘बेशक, सरकार ने सड़कों का जाल बिछा दिया है और साथ ही बेमियादी टोल टैक्स के टालें भी जगहजगह पर खड़े कर दिए हैं. हाईवे पर पहुंचते ही आदमी को जेब खाली होने का डर सताने लगता है. बसों के किराए में बेतरतीब बढ़ोतरी हो जाती है. टोल टैक्स के टालों पर बैठे गुंडे आएदिन आम आदमी से मारपीट करते हैं और उन सड़कों का क्या देशभक्त, जिन में गड्ढे ही गड्ढे हैं? सड़कें बनती बाद में हैं टूट पहले जाती हैं,’’ चमचे ने ताना कसा. ‘‘अरे, सड़कों के इस तरह टूटने के लिए तो भ्रष्ट ठेकेदार, इंजीनियर और अफसर जिम्मेदार हैं,’’ देशभक्त के मुंह से हकीकत सांप की मौसी की तरह बाहर गई.
‘‘मतलब देशभक्त, आखिर तुम ने यह भी मान ही लिया कि भ्रष्टाचार का बोलबाला अब भी चरम पर है. तुम्हारी सरकार का भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा वैसा ही खोखला साबित हुआ, जैसे स्विस बैंक से काला धन वापस लाने का वादा टांयटांय फिस हो गया.’’


अब देशभक्त क्या बोले? अपनी ही सरकार के खिलाफ कैसे बोले? कुछ देर वह चुप रहा. उसे चुप देख कर चमचा जोश में गया. दंड तो देशभक्त के पास था, लेकिन शब्दों कादंड प्रहारकिया चमचे ने, ‘‘अरे देशभक्त, एक बात और बता दूं कि जो विश्वगुरु बनने की तुम बात करते हो, उस के तो तुम अभी पासिंग भी नहीं हो. ‘‘शिक्षा मंत्रालय की ताजातरीन रिपोर्ट के अनुसार देशभर में 1,04,125 प्राइमरी स्कूल ऐसे हैं जिन में महज एक ही टीचर है. इन स्कूलों में 33,76,769 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. ऐसी शिक्षा व्यवस्था से क्या तुम विश्वगुरु बन सकते हो देशभक्त?’’ ‘‘अरे चमचे, क्या तुम्हें पता नहीं कि भारत ने विश्व को तक्षशिला और नालंदा जैसे महान विश्वविद्यालय दिए हैं,’’ देशभक्त ने ज्ञान पेला. ‘‘बेशक, लेकिन वह युगों पुरानी बात है.

क्या भारत उसी युग में जीने के लिए मजबूर है? क्या हम उस युग से बाहर नहीं निकलेंगे? अपनी जनता
को वही पुरानी घुट्टी पिलाते रहेंगे. वे विश्वविद्यालय तो हमारी शिक्षा व्यवस्था की तरह खंडहर बन चुके हैं.
‘‘आज टाइम्स हाईयर एजूकेशन वर्ल्ड एजूकेशन रैंकिंग-2026 की रिपोर्ट के अनुसार हमारा एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के टौप के 100 विश्वविद्यालयों में नहीं है. यह है हमारी शिक्षा का लैवल. तब की बात मत करो जब दुनिया का 45 फीसदी व्यापार हमारे हाथों में था. आज हमारे हाथों में दुनिया का 2 फीसदी व्यापार भी नहीं है.’’


यह सुन कर देशभक्त चौंक गया. उस का मन हुआ कि शाखा के दंड को आज लाठी बना ही लिया जाए और एक ही वार में चमचे के तरबूज के बीज बिखेर दिए जाएं, लेकिन तभी उसे याद आया कि वह तो संघ के अनुशासन में बंधा है. नागपुर के नागपाश में कस कर बंधा है. जबतक वहां से आज्ञा नहीं होगी, वह अपनी हिफाजत में भी दंड को लाठी नहीं बना सकता नहीं, तो वह संघी नहीं रहेगा, इसलिए वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता. लेकिन तभी संघी देशभक्त को याद आया कि इस चमचे का बरातघर सरकारी जमीन कब्जा कर के बना है. उस ने अक्ल से काम लेते हुए कहा, ‘‘देशद्रोही चमचे, सुना है तुम्हारा बरातघर सरकारी जमीन पर बना है, बुलडोजर…’’


बुलडोजर का नाम सुनते ही चमचा देशभक्त का वाक्य पूरा होने से पहले तो गुस्सा हो गया, पर फिर बोला, ‘‘पर देशभक्त, यह तो बता कि सरकारी सड़कों पर बने शहर के 30-40 मंदिरों की आमदनी किस की जेब में जाती है?’’ अब देशभक्त अपनी सत्ता की हनक के बावजूद और चमचा 60 साल तक के राज के रोब के बावजूद मुंह लटका कर आगे निकल गए. एक यह सोचता हुआ कि एक दिन विश्वगुरु का खिताब भी हमारे नाम हो जाएगा और दूसरा यह सोचता हुआ कि किसी दिन सत्ता सुख फिर मिलेगा.  Political Story

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