Crime Story: यह गाली नहीं बिहारी स्वाभिमान पर हमला

Crime Story: उत्तराखंड की महिला सशक्तीकरण और बाल विकास मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू ने 2-3 जनवरी 2026 को पहलागढ़, अल्मोड़ा (सोमेश्वर) में एक कार्यक्रम के दौरान बिहारी लड़कियों को ले कर एक आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. वायरल वीडियो में वे कह रहे थे किअगर शादी नहीं हो रही है तो बिहार से लड़की ले आओ… 20,000 से 25,000 रुपए में लड़कियां मिल जाती हैंऔरहम तुम्हें शादी करवा देंगे.’

इस बयान ने बिहार और देशभर में व्यापक आलोचना और राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है. राष्ट्रीय जनता दल के विधायक अमरेंद्र्र कुमार कुशवाहा ने बताया कि बिहारी लड़कियों को ले कर दिया गया साहू का अभद्र, अश्लील और अपमानजनक बयान कोई सामान्य फिसलन या निजी टिप्पणी नहीं है. यह पूरे बिहार, बिहारी समाज और विशेष रूप से बिहारी स्त्रियों के स्वाभिमान पर सीधा हमला है.
यह बयान उस सामंती, अहंकारी और स्त्री विरोधी सोच का परिचायक है, जिस में बिहार को गाली देना और बिहारी पहचान को नीचा दिखाना एक तरह का अधिकार मान लिया गया है.

बिहारी लड़कियां किसी की जबान की गंदगी सहने के लिए पैदा नहीं हुई हैं. वे खेतों में काम करने वाली मेहनतकश महिलाएं भी हैं, यूनिवर्सिटी में रिसर्च करने वाली छात्राएं भी, प्रशासन, चिकित्सा, विज्ञान, खेल और कला के क्षेत्र में देश का नाम रोशन करने वाली सशक्त नागरिक भी. बिहार की महिलाओं ने उलट हालात में भी संघर्ष किया है, अपमान में भी आत्मसम्मान बचाया है और अवसर मिलने पर दुनिया को अपनी हैसियत दिखाई है. ऐसे में उन के खिलाफ गालीनुमा बयान देना केवल बेहूदगी नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध भी है.

साहू का यह बयान उस पुरानी सोच को उजागर करता है, जिस में बिहार को हमेशा हाशिए पर, मजदूरी पर और उपहास के केंद्र में रखा गया. यह वही सोच है जो बिहारियों को सस्ते मजदूर के रूप में देखती है और बिहारी औरतों को सम्मान नहीं, बल्कि वस्तु सम?ाती है. यह बयान सिर्फ महिलाओं का अपमान नहीं करता, बल्कि पूरे बिहारी समाज को अपमानित करता है.सब से शर्मनाक पहलू यह है कि इस बयान के बाद सत्ता और संगठन की ओर से कोई साफ, सख्त और नैतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई. चुप्पी केवल मौन नहीं होती, वह सहमति भी होती है.

यदि यही भाषा किसी और राज्य, किसी और समाज या किसी और वर्ग के लिए इस्तेमाल की गई होती, तो अब तक नैतिकता, संस्कृति और मर्यादा की दुहाई देते हुए बड़ेबड़े बयान चुके होते. लेकिन जब गाली बिहार और बिहारियों को दी जाती है, तो उसे हलके में ले लिया जाता है. यह दोहरा मापदंड नहीं, तो और क्या है? बिहारी स्वाभिमान किसी पार्टी, नेता या संगठन की जागीर नहीं है. यह उस समाज की सामूहिक चेतना है जिस ने देश के हर कोने में ईंटपत्थर जोड़े हैं, खेतों से ले कर फैक्टरियों तक काम किया है और लोकतंत्र को अपने वोट से जिंदा रखा है. बिहार को गाली देना आसान है, लेकिन बिहार के आत्मसम्मान को तोड़ना नामुमकिन.

आज जरूरत इस बात की है कि साहू के इस बयान की खुल कर, बिना लागलपेट के निंदा की जाए. यह कोईनिजी रायनहीं है, यह सार्वजनिक अपमान है. सार्वजनिक जीवन में रहने वालों को यह सम?ाना होगा कि उन की जबान उन की जिम्मेदारी होती है. गाली दे कर बच निकलना लोकतंत्र में स्वीकार करने लायक नहीं है और ही सभ्य समाज में. बिहारी समाज को भी अब साफ और एकजुट आवाज में कहना होगा कि वह बेइज्जती सहने के लिए नहीं बना है. हमारी बेटियां हमारी पहचान हैं, हमारी ताकत हैं और हमारे स्वाभिमान का प्रतीक हैं. उन के सम्मान पर किया गया कोई भी हमला, चाहे वह किसी भी शख्स, पद या राजनीतिक संरक्षण से लैस क्यों हो, बरदाश्त नहीं किया जाएगा.    

Political News: दीपक प्रकाश वंशवाद की नई बेल

Political News: बिहार विधानसभा चुनाव में बंपर जीत मिलने के बाद 20 नवंबर, 2025 को पटना के गांधी मैदान में पूरे जोशोखरोश के साथ मुख्यमंत्री समेत 26 मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह हुआ, जिसे लाखों लोगों ने देखा. इस गठबंधन के 6 विधायकों पर एक मंत्री बनाने का विचार हुआ. इस फार्मूले के तहत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोरचा को भी एक मंत्री पद मिलना था. अब चूंकि इस दल के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा सदस्य हैं, तो उन के 4 में से किसी एक विधायक का मंत्री बनना तय था. लोग यही कयास लगा रहे थे कि शायद उन की पत्नी स्नेहलता मंत्री बनेंगी, जो सासाराम विधानसभा से  जीती हैं. मगर जब अचानक ही मीडिया में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने की खबर आई, तो सभी चौंक गए.


इस चौंकने की वजह यह थी कि दीपक प्रकाश विधानसभा का चुनाव तो क्या जीतते, जब वे उम्मीदवार भी नहीं थे. वे विधानपरिषद के सदस्य भी नहीं थे. फिर वे मंत्री पद पर काबिज कैसे हुए, यह सवाल हैरान करने वाला था. राजनीतिशास्त्र की जरा भी जानकारी रखने वाला यह जानता है कि किसी भी नागरिक को मंत्रिमंडल में मंत्री तो क्या, मुख्यमंत्री तक बनाया जा सकता है. बस, उसे अगले 6 महीने में विधानसभा या विधानपरिषद का सदस्य बनना होगा.


यहां उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पार्टी को मजबूत बनाने के लिए यह चाल चली, जो लोगों को बड़ी देर बाद सम? में आया. दरअसल, विधानपरिषद के 3 सदस्य भी विधानसभा के लिए चुने गए हैं. ऐसे में विधानपरिषद के इन 3 सीटों के लिए चुनाव होंगे ही. भाजपा, जद (यू) या दूसरा कोई बड़ा दल इस पर अपनी दावेदारी पेश करे, इस के पहले ही उपेंद्र कुशवाहा ने एक तरह से अपनी दावेदारी पेश कर दी है.
अब कोई सरकार अपने ही मंत्री को सिर्फ इस कारण से तो मंत्रिमंडल से हटाने से रही कि वह विधानमंडल का सदस्य नहीं है. सो, यह भाजपा और जद (यू) के लिए मजबूरी है कि वे दीपक प्रकाश को विधानपरिषद का सदस्य बनाने में सहयोग करें.


दीपक प्रकाश के सदस्य बन जाने से उपेंद्र कुशवाहा को एक और फायदा है. वह यह कि अगले 2 साल बाद राज्यसभा के चुनाव के वक्त वे खुद एक उम्मीदवार होंगे. ऐसे में उन्हें अपनी पार्टी के वोट पक्के हो जाएंगे, जिस से वे दोबारा राज्यसभा के सांसद सदस्य के रूप में आसानी से चुन लिए जाएंगे. पर अब यह सवाल उठने लगा है कि राजनीति में कोरे दीपक प्रकाश क्या कुछ कर पाएंगे? 36 साल के दीपक प्रकाश बीटैक पास हैं और मल्टीनैशनल कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी भी कर चुके हैं. बाद में उन्होंने अपना बिजनैस शुरू किया. राजनीति में उन की ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, मगर मां स्नेहलता, जो सासाराम से उम्मीदवार थीं, के चुनाव प्रचार में उन्होंने जम कर पसीना बहाया था.


मूल रूप से उत्तर प्रदेश निवासी रिटायर्ड अधिकारी एसएन मिश्रा की बेटी साक्षी मिश्रा से दीपक प्रकाश ने लव मैरिज की हुई है. साक्षी मिश्रा ने भी अपनी सास स्नेहलता का खुल कर चुनाव प्रचार किया था.
यह ठीक है कि कल तक दीपक प्रकाश को कोई जानता भी नहीं था, मगर आज वे अचानक चर्चा का विषय बन गए हैं. विपक्ष द्वारा फटाफट परिवार और वंशवाद के आरोप मढ़े जाने लगे. कहा गया किये महानुभाव रालोमो अध्यक्ष सह राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं. खुद उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा सांसद हैं. पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को विधानसभा चुनाव सासाराम से लड़वाया, वे जीत गईं. बेटा बचा हुआ था, तो वाइल्ड कार्ड एंट्री दिलवा कर सीधे मंत्रीपद की शपथ दिलवा दी’.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोदी क्या, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी परिवारवाद के खिलाफ हैं. लेकिन गठबंधन धर्म का पालन भी तो जरूरी है. ऐसे में सहयोगी दलों का खयाल रखना ही होता है और यही वजह रही कि दीपक प्रकाश को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों का आशीर्वाद भी मंच पर मिल गया. उपेंद्र कुशवाहा ने बिना किसी सदन के सदस्य रहे अपने बेटे को बिहार मंत्रिमंडल में अपनी पार्टी के कोटे से शामिल करवाया. यह उपेंद्र कुशवाहा का निजी फैसला था. अब इस को ले कर सोशल मीडिया पर उपेंद्र कुशवाहा को ट्रोल किया जाने लगा.


ऐसे में पहले उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार के ही एक पुराने जमाने के जुमले को सुना दिया किखाने के वक्त मक्खियां भिनभिनाती ही हैं. सो बाएं हाथ से मक्खियों को भगाते रहो और दाएं हाथ से खाते रहो’.
यह अलग बात है कि उपेंद्र कुशवाहा ने बाद में सफाई दी कि उन्हें ऐसा करने को क्यों मजबूर होना पड़ा. वे बोले किवे संगठन बनाते थे, जो आगे चल कर बिखर जाता था, टूट जाता था. आगे यह बिखरे, टूटे, इस के लिए उन्होंने यह इंतजाम किया है’.


लंबे समय से राजनीति में अज्ञातवास में रहने वाले उपेंद्र कुशवाहा की बातों में दम तो है ही, तभी तो यह ट्रोल करना रुक गया है. याद रहे कि सीट बंटवारे से पहलेएनडीए में इस बार कुछ भी ठीक नहीं हैकह कर हाहाकार मचा देने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने ऐसी सधी राजनीतिक बाजी खेली है कि चुनाव नतीजों और कैबिनेट गठन के बाद हर कोई उन के राजनीतिक कौशल की चर्चा कर रहा है. चुनाव नतीजों के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान सब से ज्यादा फायदे में नजर रहे थे. लोजपा का 29 विधानसभा सीटों पर लड़ कर 19 जीतना और उस के हिसाब से 2 मंत्री मिलना स्वाभाविक है. जीतनराम मां? की पार्टी हम का 6 सीट लड़ना और 5 जीत कर एक मंत्री बनना प्रत्याशित बात है.

ध्यान रहे कि सीट बंटवारे में 6 सीट मिलने और खासतौर पर महुआ सीट लोजपा को मिलने से उपेंद्र कुशवाहा की खुली नाराजगी के बाद उन को मनाने के लिए रातोंरात नित्यानंद राय हवाईजहाज से दिल्ली ले गए थे. लोकसभा चुनाव के दौरान पवन सिंह के लड़ने से काराकाट सीट पर उपेंद्र कुशवाहा के फंसने और आखिरकार हारने के चलते शाहाबाद और मगध में राजग को महागठबंधन ने पीछे छोड़ दिया था. भाजपा विधानसभा में उन की नाराजगी नहीं चाहती थी. उपेंद्र कुशवाहा माने, लेकिन अपनी राजनीतिक ताकत की भरपूर कीमत वसूली.


उपेंद्र कुशवाहा ने खुल कर स्वीकार किया है किबेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाना, सिर्फ काबिलीयत का मामला नहीं था, बल्कि यह पार्टी बचाने की मजबूरी भी थी. उन्होंने साफ कहा कि 2014 में 3 सांसद जीते, जिन में से 2 पार्टी छोड़ गए. इसी तरह 2015 में 2 विधायक आए और चले भी गए. मतलबपार्टी खड़ी करें और लोग टूट जाएं. इस से बचने का बस एक ही उपाय उन के पास बचा था’. उन के इस बयान ने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. क्या यह परिवारवाद है या एक छोटी पार्टी के वजूद की सिक्योरिटी?
बहरहाल, दीपक प्रकाश ने 22 नवंबर, 2025 को मंत्री, पंचायती राज विभाग, बिहार, पटना में पदभार ग्रहण किया. वैसे, अगले साल बिहार में पंचायती चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में उन के काम चुनौती से भरे तो होंगे ही, देखते हैं कि ऊंट किस करवट बैठता है.    Political News

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