News Story: ‘विश्वगुरु’ का विदेश कूटनीति में फेल होना

News Story: इ बार दिल्ली में मौसम नेताओं की तरह पलटूराम बना हुआ है, कभी सर्द तो कभी गरम. बेचारे कूलर बेचने वाले दुकान पर मक्खियां मारते दिख रहे हैं और सिर खुजा रहे हैं कि कूलर का बाजार तेज रहेगा या मंदा. पर आम आदमी थोड़ी राहत की सांस ले रहा है. विजय भी ऐसे ही लोगों की लिस्ट में शामिल है और चूंकि आज रविवार है तो उस ने अनामिका के साथ कहीं घूमने का प्लान बनाया है. पर अनामिका अब तक क्यों नहीं आई? इतने में बाहर कोई हलचल हुई. विजय ने देखा कि कोई काले रंग की उबर गाड़ी से आया था. एक जवान लड़की. पर जैसे ही वह गाड़ी से नीचे उतरी, तो आसपास जमा लोगों की भीड़ की नजरें उस पर ही जम गईं.

उस लड़की ने बिहार के मछुआरों की पारंपरिक चोली और घाघरा जैसी ड्रैस पहनी हुई थी. उस ड्रैस से उस के उभार और ज्यादा उभर आए थे. सिंगार भी किसी मछुआरिन सा था. नंगे पैर जब वह मटकमटक कर चल रही थी, तब कुछ मनचले सीटियां बजाने लगे. चूंकि अभी वह लड़की विजय को साफसाफ नहीं दिख रही थी, तो उसे महसूस ही नहीं हुआ कि यह बिंदास मछुआरिन किस के घर जाएगी. थोड़ा आगे आने पर जब विजय ने उस लड़की को देखा, तो अपना सिर पीट लिया, क्योंकि वह और कोई नहीं, अनामिका थी. विजय हैरान रह गया कि आज अनामिका को इस तरह उस के घर आने की क्या जरूरत थी. थोड़ी देर में डोरबैल बजी और बाहर से आवाज आई, ‘‘ बाबू, हम बाड़, हमरा के जान…’’

विजय ने जल्दी से दरवाजा खोला और अनामिका को ऊपर से नीचे घूरा. टाइट ब्लाउज, बदन से चिपकी धोती और हाथ में एक बैग, अनामिका एकदम अतरंगी लग रही थी.
‘‘जल्दी से अंदर आओ. और यह सब क्या नौटंकी है?’’
‘‘हम बाड़हमरा के खाना चाही,’’ अनामिका ने इतना कहा और खिलखिला कर हंस दी.
‘‘अनामिका, ज्यादा मजाक नहीं.
तुम उतरी तो काली गाड़ी से हो और यह सब प्रपंच क्यों? गाड़ी से आने की क्या जरूरत थी? और तुम आज बिहारी क्यों बोल रही हो? यह मेरे सिर के ऊपर से जा रही है,’’ विजय झल्लाया.
‘‘क्या एक मछुआरे की बेटी अपनी पारंपरिक वेशभूषा नहीं पहन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.
‘‘पर मौका भी तो होना चाहिए . कोई फैंसी ड्रैस कंपीटिशन तो चल नहीं रहा. तुम तो टीशर्ट और जींस ज्यादा पहनती हो. तुम ने देखा नहीं, लोग तुम्हारी खिल्ली उड़ा रहे थे,’’ विजय
ने कहा.

‘‘मैं विश्वगुरु बनने निकली हूं. मुझे अपनी पारंपरिक वेशभूषा और बिहारी भाषा पर गर्व है.’’
‘‘यहां भाषा कहां से बीच में गई?’’ विजय बोला.
‘‘अपनी महल्ले वाली लड़ाई भूल गया. उन सरदारजी के हक में तू ने खूब बोला, पर उन की ठेठ पंजाबी तू खुद नहीं समझ पाया था. बड़ा चला था तू उन अंकलों का झगड़ा सुलटाने, खुद ही बुराई मोल ले कर बैठ गया. तू भी मोदीजी की तरह कूटनीति में फेल हो गया.’’
‘‘अब यहां पर कूटनीति और मोदीजी कैसे बीच में गए?’’

‘‘जैसे तू उन अंकलों का झगड़ा निबटाने में नाकाम रहा, उसी तरह मोदीजी दावे तो बहुत कर रहे थे, पर ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच की जंग की कूटनीति पर वे फेल हो गए. इस में भाषा का बड़ा रोल होता है. शब्दों का सही खेल ही कूटनीति की कामयाबी की पहली सीढ़ी है. विदेश के मसलों पर आप की भाषाई जानकारी बेवकूफी भी जाहिर कर सकती है.’’
‘‘क्या तुम मुझे आसान शब्दों में समझा सकती हो? मुझ में और मोदीजी की कूटनीति में क्या समानता है?’’
‘‘तुम समझ नहीं रहे हो. किसी राज्य का मुख्यमंत्री होने और देश का प्रधानमंत्री होने में बहुत ज्यादा फर्क है. आप को दुनियाभर में आनाजाना पड़ सकता है. यह ठीक है कि आप की अपनी भाषा पर अच्छी पकड़ है, पर उस का असर विदेशी कूटनीति पर पड़ भी रहा है या नहीं, यह भी बहुत ज्यादा अहम बात है.
‘‘विदेश कूटनीति में भाषा का रोल बहुत खास होता है. वहां वह भाषणबाजी के टूल की तरह इस्तेमाल नहीं होती है, बल्कि एक देश की संस्कृति, इतिहास, और मूल्यों को भी सब के सामने रखती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘जैसे?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘जैसे तुम्हें मेरी बिहारी भाषा के चंद शब्द ही बरदाश्त नहीं हो रहे थे. तुम्हें कोफ्त हो रही थी. तुम मुझे झेल रहे थे.
‘‘पर जब विदेश कूटनीति की बात होती है, तो भाषा विदेश मंत्रियों, राजदूतों और दूसरे कूटनीतिज्ञों के बीच संचार का मुख्य साधन बन जाती है.
‘‘भाषा एक देश की संस्कृति को दूसरे देश में पहुंचाने में मदद करती है, जिस से दोनों देशों के बीच समझ और सहयोग बढ़ता है. यही वजह है कि भाषा व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने में मदद करती है, क्योंकि यह व्यावसायिक संचार को आसान बनाती है.
‘‘सब से जरूरी बात तो यह है कि भाषा राजनयिक संबंधों को मजबूत बनाने में मदद करती है, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच समझ और विश्वास को बढ़ाती है.

‘‘मैं हिंदी में किसी प्रधानमंत्री के बात करने को गलत नहीं मानती, पर उस हिंदी को अन्य भाषाओं में जब ट्रांसलेट किया जाता है और दूसरे लोगों को सुनाया जाता है, तब उस दुभाषिए ने क्या उसे सही से समझा है या कहने वाले कीमन की बातका मतलब समझा है, इस की जवाबदेही कौन तय करेगा?’’
‘‘क्या तुम किसी उदाहरण से अपनी बात समझा सकती हो?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘बात बहुत पुरानी है. मैं ने बीबीसी में एक लेख पढ़ा था देवीलाल के बारे में. वही देवीलाल जो हरियाणा के दबंग नेता थे और जिन्हें हरियाणा की जनता नेताऊकी उपाधि दी थी.
‘‘बात साल 1989 की है. 1 दिसंबर, 1989 को आम चुनाव के बाद नतीजे आने के बाद संयुक्त मोरचा संसदीय दल की बैठक हुई और उस बैठक में विश्वनाथ सिंह के प्रस्ताव पर चंद्रशेखर के समर्थन से चौधरी देवीलाल को संसदीय दल का नेता मान लिया गया था.


‘‘देवीलाल धन्यवाद देने के लिए खड़े जरूर हुए, लेकिन सहज भाव से उन्होंने कहा, ‘मैं सब से बुजुर्ग हूं, मुझे सबताऊकहते हैं, मुझेताऊबने रहना ही पसंद है और मैं यह पद विश्वनाथ प्रताप को सौंपता हूं.’
‘‘उस समय तरह तरह की बातें चली थीं. देवीलालकिंगबन सकते थे, परकिंगमेकरबन गए. वीपी सिंह और उन के बीच पहले ही कोई समझौता हो चुका था. हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक तो देवीलाल के खुद का आत्मविश्वास प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं था.
‘‘मुझे लगता है कि अगर खुद में आत्मविश्वास की कमी में भाषा पर अच्छी पकड़ होना भी बहुत माने रखती है. मैं 2 लोगों की बातों से अपना पक्ष रखूंगी. नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री और नामचीन संपादक पत्रकार रहे एमजे अकबर ने देवीलाल के निधन पर लिखे स्मृति लेख में लिखा था, ‘दरअसल, देवीलाल ने महसूस कर लिया था कि शहरी भारत उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, लिहाजा उन्होंने खुद को सब से बड़े पद की दौड़ से अलग कर लिया था.’


‘‘इसी तरह देवीलाल की राजनीतिक जीवनी लिख चुके और आधुनिक भारतीय इतिहासकार प्रोफैसर केसी यादव बताते हैं, ‘देवीलाल खुद बहुत संपन्न परिवार के थे. वे 1930 से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे, लेकिन उन का अंदाज ठेठ ग्रामीणों वाला ही रहा. वे दिल्ली के पावर कौरिडोर में खेतिहर मजदूरों और गरीबगुरबों की सब से बड़ी उम्मीद थे. देश का अभिजात्य तबका उन को भदेस, दबंग और लठैत नेता की तरह ही देखता रहा.’
‘‘देवीलाल की यहताऊवाली इमेज हरियाणा में तो लोगों को खूब पसंद थी, पर पूरा देश उन्हें उन के भाषाई तेवर से पसंद करता, शायद देवीलाल को भी इस में शक था. खुद उन्होंने या उन के सलाहकारों ने इसे ध्यान में रख कर ही यह फैसला लिया होगा, जो समझदारी भरा फैसला था. इस से देवीलाल कीकिंगमेकरकी इमेज हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई.’’
‘‘तुम्हारी बात में दम है. हम 8,000 करोड़ के हवाईजहाज में तो चल सकते हैं, करोड़ों की काली गाड़ी में सड़कें नाप सकते हैं, पर जब विदेश की कूटनीति पर बात करनी हो, तो भाषा का टूल सब से खास होता है.

‘‘अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मुंहफट नेता हैं. वे कब क्या बोल दें, कोई नहीं जान सकता. वे दुनिया के एक धड़े में मशहूर हो सकते हैं, पर उन का भाषा का लैवल भी कोई कमाल का
नहीं है. ‘‘इधर नरेंद्र मोदीविश्वगुरुहोने का दावा तो करते हैं, पर विदेश कूटनीति में फेल दिखते हैं. उन के हाल में लिए गए बहुत से फैसले लोगों के मन में शक पैदा करते हैं. पड़ोसी देशों से बिगड़ते संबंध इस का सब से बड़ा उदाहरण है.
‘‘चीन की बात करें तो साल 2020 में गलवान घाटी झड़प के बाद एलएसी पर तनाव लगातार बना रहा. व्यापार घाटा रिकौर्ड लैवल पर पहुंचा और सीमा विवाद का कोई पक्का हल नहीं निकला.
‘‘इतना ही नहीं, पाकिस्तान में तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट के बाद भी आतंकवाद और सीमा पार घुसपैठ जारी रही. कूटनीतिक संवाद पूरी तरह ठप है. भारत नेपाल, मालदीव और बंगलादेश में चीन के बढ़ते असर को रोकने में भारत नाकाम रहा. नेपाल ने नया नक्शा जारी किया, मालदीव मेंइंडिया आउटअभियान चला, बंगलादेश में भी चीन का निवेश बढ़ा.


‘‘इजराइल के खुल कर समर्थन से अरब देशों में भारत की पारंपरिक साख को नुकसान पहुंचा है. कतर में
8 पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का मामला और फिर ईरान इजराइल तनाव में साफ रुख ले पाना, विदेश नीति की दुविधा दिखाता है,’’ विजय ने अपनी बात रखी.
‘‘अब तुम ने सही रग को पकड़ा है. चुनाव के समय जनता के सामने विदेश नीति की बड़ी बड़ी बातें करने से देश की कूटनीति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, बल्कि हमें समस्या की जड़ में जा कर उस का पक्का हल ढूंढ़ना होता है.
‘‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष असीम मुनीर ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध में कितना अहम रोल निभाते हैं, यह तो आने वाला समय बताएगा, पर उन की गुपचुप कूटनीति पर आज दुनियाभर में बात हो रही है. जो काम भारत के लोग नरेंद्र मोदी से पूरा होने की उम्मीद देख रहे थे, वे सीन में कहीं भी नहीं दिखाई दे रहे हैं,’’ अनामिका बोली.


‘‘तभी तुम आज अपनी पारंपरिक वेषभूषा और बिहारी भाषा का ज्यादा ही दिखावा कर रही थी. मुझे समझ गया है कि दिखावा करना और अमल में लाना दोनों अलग बातें हैं.
‘‘किसी प्रदेश में दिए गए चुनावी भाषण में आप कुछ भी पारंपरिक पहन कर वहां की भाषा के
2-4 वाक्य बोल कर जनता का दिल एक बार को जीत सकते हैं, पर विदेश कूटनीति में हर कदम सोचसमझ कर उठाना पड़ता है. यहीविश्वगुरुबनने का मूलमंत्र है,’’ जब विजय ने यह बात कही, तो अनामिका ने तालियां बजाईं.
‘‘चलो, आज इसी खुशी में मैं तुम्हें लिट्टीचोखा खिलाती हूं. हरी मिर्च का अचार जरूर खाना, उस का स्वाद ही अलग लैवल का होता है,’’ अनामिका ने इतना कहा और आईने के सामने अपने बाल संवारने लगी. अभी उसे अपनी ड्रैस भी बदलनी थी. टीशर्ट और जींस, जिस में वह कमाल की लगती है.         

News Story: ‘जी राम जी’ का बवाल

News Story: शनिवार का दिन था. शाम के 6 बज रहे थे. विजय घर पर अकेला था. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. विजय ने दरवाजा खोला. बाहर अनामिका खड़ी थी. वह दनदनाती हुई भीतर आई. उस का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था.‘‘क्या हुआ? घायल शेरनी क्यों बनी हुई हो? सब ठीक है ? तुम तो अपनी सहेली के घर गई थी,’’ विजय ने पूछा. ‘‘सत्यानाश हो गया. और तुम तो अपना मुंह खोलो ही मत. सब तुम्हारा ही कियाधरा है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘मैं ने क्या किया? सुबह तो तुम्हारा मूड एकदम ठीक था,’’ विजय बोला.
इतने में अनामिका ने अपने बैग से एक प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप निकाली और विजय के सामने रख दी. ‘‘यह क्या है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम्हारी करतूत…’’ अनामिका बोली, ‘‘मैं प्रैग्नेंट हूं. कहा था कि प्रोटैक्शन लगा लेना, पर तुम्हें तो अपने मजे से मतलब है.’’ वह स्ट्रिप देख कर विजय के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने कांपते हाथ से वह स्ट्रिप उठाई और अपना माथा पकड़ लिया. ‘‘अब मुंह से कुछ बोलोगे या ऐसेही माथा पकड़े इसे घूरते रहोगे?’’ अनामिका बोली तुम  ही क्यों कोस रही हो? सारी गलती क्या मेरी है? तुम्हें भी तो ध्यान रखना चाहिए था. सब तुम्हारी लापरवाही का नतीजा है,’’ विजय बोला. तुम सही कह रहे हो. यहां मैं तुम्हारी जीहुजूरी करती रहूं और वहां केंद्र सरकार चाहती है कि दुनियाजय राम जीबोलती रहे,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब यहां केंद्र सरकार कहां से गई?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम और केंद्र सरकार एकजैसे हो. सारी गलती सामने वाले की. अब बताओ कि मनरेगा का नाम बदल करजी राम जीकरने की क्या तुक थी?’’ ‘‘तुम किस बारे में कह रही हो?’’ विजय ने कहा. अनामिका ने कहा, ‘‘मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के बारे में, जो भारत की गांवदेहात से जुड़ी सब से बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना रही है. यह साल 2005 में कांग्रेस सरकार के समय में लागू हुई थी. यह योजना गांवदेहात में 100 दिनों का गारंटेड रोजगार देती थी, जिस से गरीबों, किसानों और मजदूरों को पैसे के तौर पर ताकत मिलती थी. ‘‘पर अब केंद्र की मोदी सरकार ने चूंकि इस योजना से जुड़ा नया बिल पास किया है और इस काविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है, तो इस पर विपक्ष ने बवाल मचाया है.’’


‘‘इस बारे में किस ने क्या कहा है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस पर गहरा एतराज जताया है. ‘ हिंदूअखबार में एक लेख के जरीए मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि मनरेगा को बुल्डोज कर दिया गया है. ‘‘सोनिया गांधी ने आगे कहा कि सरकार ने पिछले 11 सालों में इसे कमजोर किया और अबवीबीजी राम जीबिल से इसे पूरी तरह बदल दिया है, जो एक काला कानून है. वजह, केंद्र सरकार द्वारा यह बिल बिना बहस, राज्यों से सलाह या विपक्ष की सहमति के बिना पास किया गया. नया कानून केंद्र सरकार को रोजगार तय करने का हक देता है, जो जमीनी हकीकत से दूर है.


‘‘सोनिया गांधी ने इसे करोड़ों किसानों, मजदूरों और गरीबों के हितों पर हमला बताया और कांग्रेस द्वारा इस का विरोध करने का वादा किया. उन्होंने मनरेगा को महात्मा गांधी के सर्वोदय (सभी का कल्याण) का प्रतीक बताया और इस के ध्वस्त होने को नैतिक नाकामी कहा, जो सालों तक माली और इनसानी नुकसान पहुंचाएगा,’’ अनामिका ने कहा. यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘लेकिन क्या तुम जानती हो कि मनरेगा से पहले इस योजना का नाम नरेगा था. मई, 2004 में तब की संप्रग सरकार ने गांवदेहात के इलाकों के लिए एक रोजगार योजना को अपने न्यूनतम सा? कार्यक्रम में शामिल किया था. ‘‘भारत में 11वीं पंचवर्षीय योजना (साल 2007-12) पर काम शुरू होने से पहले ही इस पर काम करने वाले वर्किंग ग्रुप ने उस समय देश में मौजूद करीब 36 फीसदी गरीब आबादी पर खास चिंता जताई थी. उसी समय से गांवदेहात के इलाकों के लिए एक योजना बनाने पर काम शुरू हो गया था.


‘‘हालांकि, इस से पहले ही वीपी सिंह वाली केंद्र सरकार ने ऐसी योजना पर विचार किया था, लेकिन वह योजना कामयाब नहीं हो पाई थी. दिसंबर, 2004 में नैशनल रूरल गारंटी स्कीम (नरेगा) का विधेयक पेश किया गया था. ‘‘यह योजना मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य में चल रही एक रोजगार योजना से प्रेरित थी. उस के बाद यह विधेयक उस समय ग्रामीण विकास मंत्रालयकी संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था. जून, 2005 में समिति के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने इसे आजादी के बाद का सब से खास बिल बताया था.
‘‘अब केंद्र सरकार ने नए अधिनियम कोविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है. केंद्र सरकार के इस नए अधिनियम में नाम के अलावा भी कई बदलाव किए गए हैं, जैसे नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोजगार देने का प्रस्ताव है.


‘‘मजदूरों को उन की मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या अधिकतम 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा. इस योजना के तहत होने वाले कामों को 4 मुख्य क्षेत्रों में बांटा गया है, जैसे जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, बाजार और भंडारण जैसे आजीविका इन्फ्रास्ट्रक्चर और जलवायु में बदलाव से निबटने वाले काम. ‘‘इन सभी का रिकौर्डविकसित भारत नैशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैकनाम के नैशनल डाटाबेस में रखा जाएगा. भ्रष्टाचार रोकने के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी, जियोटैगिंग और जीपीएस आधारित रियलटाइम मौनिटरिंग को अनिवार्य बनाया गया है. ‘‘सब से बड़ा रणनीतिक बदलाव योजना की फंडिंग में हुआ है. अब तक मनरेगा पूरी तरह केंद्र प्रायोजित थी, लेकिन अब यह 60:40 के अनुपात (केंद्र:राज्य) पर आधारित होगी, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 होगा. इस के अलावा, यह अब पूरी तरहडिमांड ड्रिवननहीं रहेगी.


‘‘केंद्र सरकार हर साल राज्यों के लिए एक निश्चित बजट तय करेगी. अगर राज्य उस बजट से ज्यादा खर्च करते हैं, तो अतिरिक्त बो? उन्हें खुद उठाना होगा. इस पूरी योजना का सालाना बजट तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपए आंका गया है.’’ ‘‘दूर के ढोल सुहावने. तुम तो इस बिल का कागजी करतब बता रहे हो, जमीनी हकीकत से इस का दूरदूर तक कोई नाता नहीं है,’’ अनामिका बोली.  तुम कहना क्या चाहती हो?’’ विजय ने कहा. ‘‘यही कि किसी बिल में अगर सुधार करना भी है, तो उस के लिए योजना का नाम बदलने की क्या जरूरत है? पहले यह योजना महात्मा गांधी के नाम पर थी, तो अब इसेजी राम जीक्यों बना दिया गया है?’’ अनामिका बोली.


‘‘अरे, ‘जी राम जीबोलने में क्या हर्ज है? अब सनातनी भारत मेंजी राम जीही बोला जाएगा ?’’ विजय ने कहा. ‘‘बस, यहीं पर मु? सरकार की नीयत में खोट नजर आता है. भारत जैसे सैकुलर देश में जहां कई धर्मों के लोग रहते हैं, वहां धर्म विशेष और उस में भीरामका नाम जोड़ने की क्या वजह थी? ‘‘फिर प्रियंका गांधी की कही बात भी तो सच ही लगती है. उन्होंने कहा, ‘मु? नाम बदलने की यह सनक सम? नहीं आती. इस में खर्चा बहुत होता है, इसलिए मु? सम? नहीं आता कि वे बेवजह ऐसा क्यों कर रहे हैं. मनरेगा ने गरीब लोगों को 100 दिन के रोजगार का अधिकार दिया था. यह बिल उस अधिकार को कमजोर करेगा…’


‘‘इस के आगे प्रियंका गांधी बोलीं, ‘उन्होंने दिनों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ाई है. पहले ग्राम पंचायत तय करती थी कि मनरेगा का काम कहां और किस तरह का होगा, लेकिन यह बिल कहता है कि केंद्र सरकार तय करेगी कि फंड कहां और कब देना है, इसलिए ग्राम पंचायत का अधिकार छीना जा रहा है. हमें यह बिल हर तरह से गलत लगता है.’ ‘‘जहां तक सैकुलर होने की बात है तोजी राम जीजैसे नाम वाली सरकारी योजनाओं से हर केंद्र सरकार को परहेज करना चाहिए. हमारे देश में 75 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो गरीब हैं और उन में से ऐसे हैं जो सालभर दिहाड़ी मजदूरी नहीं कर पाते हैं. वे सभीराम भक्ततो नहीं हैं. इस तरह की योजना से देश के गैरहिंदुओं को लगेगा कि सरकार जानबू? कर चाहती है कि धर्म विशेष के लोग सिर्फ योजना के नाम से ही इस का फायदा लें पाएं.


‘‘गैरहिंदू ही क्यों, एससी और एसटी तबके के बहुत से लोग हिंदू देवीदेवताओं की पूजा नहीं करते हैं खासकर अंबेडकरवादी सोच के लोग भी इस योजना से कन्नी काट सकते हैं या फिर उन्हें उकसाया जा सकता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार सिर्फ रामभक्तों के लिए यह योजना लाई है? ‘‘मेरा ऐसा कहने की एक वजह यह है कि हिंदुओं के भी हजारों देवीदेवता हैं. शैव भक्त क्या राम भक्त हो सकते हैं, क्योंकि उन का पूजा करने का अपनाअपना तरीका है.’’ ‘‘तुम मामले को बेवजह धार्मिक रंग दे रही हो. सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है,’’ विजय ने कहा. ‘‘मेरी मंशा सही है, पर सरकार के इन सांसद की भी सुन लो. जब इस बिल पर चर्चा हो रही थी, तब उस में भाग लेते हुए भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था कि प्रभु राम चाहते थे तो मंदिर बन गया और अब वे चाहते हैं कि विकसित गांव बनें.

यह विधेयक रामराज्य लाने के लिए लाया गया है, गांधीजी के सपनों को पूरा करने के लिए लाया गया है.
‘‘बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था किजी राम जीसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांवों का चौतरफा विकास होगा भ्रष्टाचार रुकेगा. इस विधेयक से हिंदुत्व और सनातन की भावना उभर कर सामने आई है.’’ ‘‘तो तुम्हारा यह मानना है कि इस से देश को रफ्तार नहीं मिलेगी?’’ विजय ने कहा. ‘‘रफ्तार तो मनरेगा से ही मिल रही थी. अगर बिल में कुछ अच्छे बदलाव होते तो बात सम? में आती, पर यहां तोजी राम जीका खेल चल रहा है. कहीं ऐसा हो कि इस योजना का हीराम नाम सत्यहो जाए और साथ ही ऐसे करोड़ों लोगों के सपने बिखर जाएं जो साल के 365 दिनों में इज्जत से 100 दिन की मजदूरी पा कर अपने घरों में चूल्हा जलाते हैं,’’ अनामिका ने कहा.


‘‘तुम्हें तो हर बात में कमी निकालनी है और कुसूर मोदी सरकार पर मढ़ना है. कभी तारीफ भी तो कर दिया करो,’’ विजय ने कहा. ‘‘जैसे तुम ने सारा कुसूर मु? पर मढ़ दिया कि मेरी गलती से मैं प्रैग्नेंट हुई
हूं. क्यों सही कहा ?’’ अनामिका ने ताना कसा. और नहीं तो क्याजब तुम्हें पता है कि अभी हम शादी नहीं कर सकते हैं, तो क्यों यह बवाल खड़ा किया. अब कहीं इसे साफ कराओ,’’ विजय बोला. ‘‘यार, तुम तो बड़े दब्बू निकले. जैसे ही जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो मु? पर भड़ास निकाल दी,’’ अनामिका ने कहा, ‘‘तुम सत्ता पक्ष के हिमायती लोगों को यही बीमारी है कि जब मामला हाथ से निकल जाए, तो सामने वाले को ही कोस दो. ‘‘पर डरो मत. यह प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप मेरी नहीं है. यह तो मेरी सहेली की बड़ी बहन की है, जिस की शादी को 2 साल हो गए हैं और अब उस के घर यह खुशखबरी आई है. मैं खुद अभी जल्दबाजी में शादी नहीं करना चाहती. अभी तो हमें और ज्यादा एकदूसरे को सम?ाना है,’’ कह कर अनामिका ने अपनी बात खत्म की. यह सुन कर विजय की सांस में सांस आई और उस ने अनामिका को गले से लगा लिया. News Story: 
          

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