Special Story : प्यार किया तो परिवार छोड़ो

Special Story. राहुल और नेहा कालेज में साथ पढ़ते थे. दोनों ने नौकरी लगने के बाद शादी कर ली. राहुल के मातापिता इस शादी के खिलाफ थे, लेकिन बेटे की जिद के आगे झुक गए. शादी के बाद नेहा ससुराल में रहने लगी. मगर वहां हर छोटी बात पर उस की तुलना उस की जेठानी से होने लगी.

दरअसल, राहुल के बड़े भाई की शादी उस के मातापिता की पसंद की लड़की से हुई थी, जो दहेज भी खूब लाई थी. ऐसे में नेहा को अपनी ससुराल में खूब तानेउलाहने मिलने लगे. शादी के बाद नेहा नौकरी पर भी जाती थी, मगर सुबह जल्दी उठ कर उसे जेठानी के साथ पूरे घर का काम खत्म करना होता था और फिर भी वह ढेर सारा तनाव ले कर औफिस पहुंचती थी.

शाम को थकीहारी नेहा घर लौटती तो सास की वही जलीकटी कान में गरम सीसे सी घुसती, ‘‘हम ने तो छोटी बहू लाने के लिए बड़े सपने देखे थे. कितने अच्छेअच्छे रिश्ते आ रहे थे राहुल के लिए. इसे तो कुछ करनाधरना ही नहीं आता. अगर हमारी पसंद की लड़की आती तो ऐसा नहीं होता… अपने घर से क्या लाई है? मुंह उठाए खाली हाथ चली आई. मेरा बेटा तो फंस गया.’’

कुछ सालों बाद हालात इतने खराब हो गए कि राहुल को अलग घर लेना पड़ा. अलग रहने के बाद रोज का टकराव खत्म हो गया. नेहा भी अपने औफिस शांति से जाने लगी.

यह कहानी केवल राहुल और नेहा की नहीं है, बल्कि भारत के ऐसे हजारों जोड़ों की है जिन्होंने लव मैरिज की है.

भारत में प्रेम विवाह आज भी केवल 2 लोगों का नहीं, बल्कि 2 विचारधाराओं का टकराव है. एक ओर नई पीढ़ी है, जो अपने जीवनसाथी का चुनाव खुद करना चाहती है, तो दूसरी ओर पारंपरिक परिवार व्यवस्था है, जो शादी को केवल 2 लोगों का नहीं, बल्कि 2 परिवारों का मिलन मानती है. यही कारण है कि प्रेम विवाह करने वाले हजारों नौजवान शादी के बाद ऐसे तनाव का सामना करते हैं, जिस की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती है.

प्रेम विवाह और बहू पर पहला हमला

भारतीय परिवारों में प्रेम विवाह के बाद सब से ज्यादा दबाव लड़की पर पड़ता है. लड़के के मातापिता और रिश्तेदार अकसर यह मानने को तैयार नहीं होते कि उन के बेटे ने उन की इच्छा के खिलाफ अपनी अपनी पसंद से किसी लड़की को चुना है. वे लड़की को ताना मारते हैं कि इस ने हमारे बेटे को फंसा लिया… दानदहेज तो कुछ लाई नहीं… आवारा है, मेरा लड़का फंस गया…

ये केवल शब्द नहीं होते, बल्कि ये धीरेधीरे लड़की को सताने का रूप ले लेते हैं. लड़की को हर छोटीबड़ी बात पर यह एहसास कराया जाता है कि वह इस परिवार में जबरन घुसी है.

इस का नतीजा यह होता है कि शादी के शुरुआती सालों में ही पतिपत्नी का जीवन तनाव से भरा हो जाता है. कई बार पति अपनी पत्नी और मातापिता के बीच संतुलन नहीं बना पाता है. घर 2 गुटों में बंट जाता है और सब से ज्यादा नुकसान उस लड़की का होता है, जिस ने केवल अपने पसंद के इनसान से शादी करने का हौसला दिखाया था.

जब प्रेम विवाह अपराध जैसा लगे

आज भी देश के अनेक हिस्सों में प्रेम विवाह को परिवार की इज्जत से जोड़ कर देखा जाता है. लड़की या लड़का हर अपनी पसंद से शादी कर ले तो इसे मातापिता की हार सम?ा लिया जाता है. अखबार और टीवी चैनल ऐसे समाचारों से भरे पड़े हैं, जिन में प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को सामाजिक बहिष्कार, धमकियों, हिंसा और यहां तक कि औनर किलिंग का सामना करना पड़ा है. अनेक मामलों में लड़की को ससुराल में लगातार सताया जाता है, क्योंकि उसे परिवार की पसंद के बजाय बेटे की पसंद माना जाता है.

संयुक्त परिवार की असली चुनौती

प्रेम विवाह की ज्यादातर समस्याओं का संबंध केवल प्रेम विवाह से नहीं, बल्कि विवाह के बाद की रहने की व्यवस्था से भी है. भारत में अभी भी बड़ी तादाद में नौजवान शादी के बाद अपने मातापिता के साथ ही रहते हैं. यह व्यवस्था अरेंज मैरिज में तो किसी तरह चल जाती है, क्योंकि दोनों परिवारों की मरजी और रजामंदी उस शादी से जुड़ी होती है, लेकिन प्रेम विवाह में अकसर टकराव रहता है.

पश्चिमी देशों में नहीं होता ऐसा

पश्चिमी देशों में भी परिवार होते हैं, मातापिता होते हैं और पीढि़यों के बीच मतभेद भी होते हैं. लेकिन वहां शादी के बाद एक खास फर्क दिखाई देता है. पश्चिमी देशों में यहां की तरह अपने जवान बच्चों के लिए दूल्हा या दुलहन मातापिता नहीं ढूंढ़ते, बल्कि वहां ज्यादातर प्रेम विवाह ही होते हैं. कालेज में, औफिस में लड़कालड़की एकदूसरे को पसंद कर लेते हैं, डेट करते हैं और बात बन गई तो शादी कर लेते हैं. शादी के बाद ज्यादातर जोड़े अपना घर बसाते हैं. वे अपने मातापिता से प्यार और इज्जत का रिश्ता बनाए रखते हैं, लेकिन उन की रोजमर्रा की घरेलू जिंदगी अलग होती है.

इस व्यवस्था के चलते सासबहू, बहूननद या दामादससुर के बीच होने वाले दैनिक टकराव का डर बहुत कम हो जाता है. नया शादीशुदा जोड़ा अपनी शर्तों पर जिंदगी शुरू करता है और अपने रिश्ते को विकसित होने का समय देता है.

इस का मतलब यह नहीं है कि पश्चिमी समाज में कोई समस्या नहीं है. वहां तलाक की दर ज्यादा है और दूसरी तमाम सामाजिक चुनौतियां भी हैं. लेकिन प्रेम विवाह को ले कर पारिवारिक दुश्मनी काफी कम दिखाई देती है, क्योंकि शादी के बाद निजी आजादी को अहमियत दी जाती है. वहां दहेज हत्याएं नहीं होती हैं, बहू को जला कर नहीं मार डालते हैं, उस को फांसी पर नहीं लटका देते हैं या उसे समाज के सामने बेइज्जत नहीं करते हैं.

अलग रहना है हल

भारतीय संस्कृति में मातापिता से अलग रहने की बात अकसर लालच या काहिली से जोड़ दी जाती है. लेकिन हर  बार ऐसा नहीं होता है. अगर 2 पीढि़यों के विचारों में लगातार टकराव हो रहा हो, अगर घर का माहौल जहरीला बन चुका हो, अगर पतिपत्नी का रिश्ता लगातार दबाव में हो, तो अलग रहना कई बार रिश्तों को बचाने का अच्छा जरीया बन सकता है.

अलग रहने का मतलब मातापिता को छोड़ देना नहीं है. इस का मतलब केवल इतना है कि हर परिवार को अपनी निजता और आजादी मिले. कई परिवारों में देखा गया है कि अलग घर में रहने के बाद बहू और सास के संबंध पहले से बेहतर हो जाते हैं, क्योंकि रोजरोज की दखलअंदाजी खत्म हो जाती है.

कुछ बातों पर गौर कर लें

आज प्रेम विवाह करने वाले नौजवानों के सामने सब से बड़ा मुद्दा केवल प्यार नहीं, बल्कि माली और सामाजिक समस्याओं का भी है, इसलिए शादी से पहले कुछ सवालों पर विचार कर लेना जरूरी है, जैसे :

* क्या लड़का और लड़की दोनों अपने पैरों पर खड़े हैं?

* क्या दोनों नौकरी या किसी कारोबार से अपना घर चला सकते हैं?

* क्या वे किराए का घर लेने या अलग रहने के हालात में हैं?

* क्या वे परिवार के विरोध का मानसिक दबाव झेल सकते हैं?

* क्या वे दोनों एकदूसरे के प्रति इतने प्रतिबद्ध हैं कि मुश्किल समय में साथ खड़े रह सकें?

केवल प्यार की बुनियाद पर लिया गया फैसला कई बार जिंदगी की चुनौतियों के सामने कमजोर पड़ जाता है, इसलिए प्रेम विवाह करने से पहले भावनाओं के साथसाथ माली और सामाजिक तैयारी भी जरूरी है.

मांबाप को भी बदलना होगा

सारी जिम्मेदारी केवल नौजवान पीढ़ी पर नहीं डाली जा सकती है. मातापिता को भी यह सम?ाना होगा कि बच्चे कोई जायदाद नहीं हैं, जिन की जिंदगी के हर फैसले पर उन का आखिरी हक हो. अगर बेटा या बेटी पढ़लिख कर अपने जीवनसाथी का चुनाव करता है, तो उसे अपराध की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. जो बहू या दामाद परिवार में आया है, उसे इज्जत मिलनी चाहिए, फिर चाहे शादी लव मैरिज हो या पारंपरिक तरीके से की गई हो.

आखिरकार किसी भी शादी की कामयाबी इस बात से तय नहीं होती कि रिश्ता किस ने तय किया था. उस की कामयाबी इस बात से तय होती है कि उस में प्यार, इज्जत और विश्वास कितना है.

प्रेम विवाह न तो सभी समस्याओं का समाधान है और न ही सभी समस्याओं की जड़. लेकिन एक सच बारबार सामने आता है कि प्रेम विवाह करने वाले अनेक जोड़े पारिवारिक टकराव का सामना करते हैं, खासकर तब जब वे ऐसे घर में रहते हैं जहां उन्हें पूरी स्वीकृति नहीं मिलती है, इसलिए आज के नौजवानों को प्रेम विवाह करने से पहले केवल दिल की नहीं, बल्कि दिमाग की भी सुननी चाहिए. अपनी जेब पर भी नजर डाल लेनी चाहिए.

नएनवेले जोड़े किराए के घर में रह कर भी अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं. रिश्तों की कामयाबी की बुनियाद मकान का मालिक होना नहीं, बल्कि आपसी इज्जत, आर्थिक सम?ादारी और पारिवारिक सहयोग होता है. जब आप किसी तीसरेचौथे शख्स की दखलअंदाजी के बिना एकदूसरे के साथ होते हैं और एकदूसरे को वक्त देते हैं, तो आप का आपसी रिश्ता, जो अभी नयानया बना है, जल्दी ही मजबूत होने लगता है. एकदूसरे पर विश्वास जमता है, जो लंबी और कामयाब शादीशुदा जिंदगी के लिए जरूरी है. आप अलग घर ले कर रहेंगे तो तनाव से दूर रहेंगे. खुश रहेंगे, जिम्मेदार बनेंगे और भविष्य की प्लानिंग बेहतर तरीके से कर पाएंगे. Special Story

Sexual Health : मेरी दुनिया मेरा मन, क्या सैक्सुअल फैंटेसी खतरा है?

Sexual Health. इनसान का मन जितना दिखता है, उस से कहीं ज्यादा गहरा और राज से भरा है. हमारे भीतर एक ऐसी दुनिया बसती है, जहां हम अकेले होते हैं, अपने विचारों, इच्छाओं, डर, सपनों और कल्पनाओं के साथ.

इसी भीतरी दुनिया का एक हिस्सा है फैंटेसी यानी कल्पना. यह वह जगह है, जहां नामुमकिन भी मुमकिन लगता है, अधूरा भी पूरा हो जाता है और दबे हुए भाव भी आकार लेने लगते हैं.

जब हम फैंटेसी शब्द सुनते हैं, तो अकसर बच्चों की कहानियां याद आती हैं… परियां, जादू, सुपर हीरो, उड़ते महल और बोलते जानवर. बचपन की फैंटेसी आनंद, रोमांच और हैरानी से भरी होती है, लेकिन जैसेजैसे इनसान बड़ा होता है, उस की कल्पनाएं भी बदलने लगती हैं. अब उन में इच्छाएं होती हैं, भावनाएं होती हैं, अधूरी चाहतें होती हैं और कई बार वे बातें भी होती हैं, जिन्हें वह असली जिंदगी में जी नहीं पाता.

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इसी में एक रूप है सैक्सुअल फैंटेसी. इस शब्द को ले कर समाज में सब से ज्यादा भ्रम है. लोग इसे या तो गलत मान लेते हैं या बीमारी समझ  लेते हैं या फिर अपराध से जोड़ देते हैं, जबकि सच यह है कि हर सैक्सुअल फैंटेसी गलत नहीं होती. यह इनसान के सामान्य दिमागी प्रोसैस का हिस्सा भी हो सकती है.

कल्पना की निजी दुनिया

सैक्सुअल फैंटेसी का मतलब केवल शारीरिक संबंध की कल्पना नहीं है. यह उस से कहीं बड़ी है. इस में निकटता की चाह, किसी के द्वारा चाहे जाने की इच्छा, रोमांच की तलाश, भावनात्मक जुड़ाव, शक्ति का अनुभव, समर्पण की भावना या प्यार पाने की लालसा भी शामिल हो सकती है.

कई बार इनसान अपनी अलसी जिंदगी में संयमित, जिम्मेदार और नियंत्रित रहता है. वह हर समय नियमों में बंधा रहता है. ऐसे में उस का मन एक ऐसी जगह बनाता है, जहां वह बिना किसी फैसले, आलोचना या सामाजिक दबाव के अपने भीतर की इच्छाओं को महसूस कर सके. यह फैंटेसी की दुनिया है.

यह जरूरी नहीं कि इनसान अपनी हर कल्पना को सच करना चाहता हो. कई बार कल्पना केवल कल्पना होती है… मन की एक निजी फिल्म, जिसे इनसान जीता नहीं, केवल सोचता है.

फ्रायड ने क्या कहा था

मनोविज्ञान के जनक माने जाने वाले सिगमंड फ्रायड का मानना था कि मनुष्य की अनेक इच्छाएं समाज, नैतिकता, डर और नियमों के दबाव में दब जाती हैं. वे इच्छाएं गायब नहीं होतीं, बल्कि सपनों, कल्पनाओं या बरताव के रूप में बाहर आती हैं.

आधुनिक मनोविज्ञान इस विचार को थोड़ा अलग तरीके से देखता है. आज माना जाता है कि हमारा अचेतन मन सीधे शब्दों में नहीं बोलता, बल्कि वह प्रतीकों, संकेतों और कल्पनाओं के माध्यम से अपनी बात कहता है यानी कभीकभी फैंटेसी हमारे भीतर छिपी भावनाओं का संकेत भी हो सकती है.

फैंटेसी की 3 जरूरतें

आधुनिक मनोवैज्ञानिक जस्टिन लेहमिलर की रिसर्च के मुताबिक, ज्यादातर सैक्सुअल फैंटेसी 3 तरह की मनोवैज्ञानिक जरूरतों से जुड़ी होती हैं… कनैक्शन, एक्साइटमैंट और कंट्रोल.

कनैक्शन : कोई मुझे चाहे

हर इनसान चाहता है कि कोई उसे सम?ो, चाहे, स्वीकार करे. यह जरूरत बचपन से शुरू होती है और जिंदगीभर बनी रहती है. कई लोगों की कल्पनाओं में प्यार, अपनापन, निकटता और भावनात्मक जुड़ाव खास होता है.

अगर किसी इनसान ने बचपन में स्नेह की कमी महसूस की हो या किशोरावस्था में प्यार किया हो पर कह न पाया हो, तो उस के भीतर चाहे जाने की इच्छा गहरी हो सकती है. ऐसे लोग अकसर ऐसी कल्पनाएं करते हैं, जहां कोई उन्हें बेहद प्यार करता है, समझता है या उन्हें चुनता है.

यह सामान्य है. समस्या तब शुरू होती है, जब इनसान कल्पना और असलियत का अंतर खो देता है. जब एकतरफा प्यार जुनून बन जाए. कई बार कोई इनसान किसी से प्यार करने लगता है, जबकि सामने वाला उसे पसंद नहीं करता. फिर भी वह अपने मन में एक कहानी बना लेता है कि वह भी मु?ो चाहता है, वह अभी मना कर रही है, एक दिन मान जाएगी. यहीं से फैंटेसी का अंधेरा पक्ष शुरू होता है.

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जब इनसान सामने वाले के इनकार को स्वीकार नहीं कर पाता, तब जुनून जन्म लेता है. पीछा करना, धमकाना, हिंसा करना, एसिड अटैक, रेप जैसी घटनाएं कई बार इसी मानसिक गंदी सोच से जुड़ी होती हैं. कुछ लोग यह भ्रम भी पाल लेते हैं कि कोई सैलिब्रिटी उन से प्यार करता है. यह खतरनाक मानसिक हालत हो सकती है.

एक्साइटमैंट : नया, अलग और रोमांचक

इनसान का दिमाग नवीनता से जोश में आता है. कुछ नया, अनिश्चित या रोमांचक होने पर हमारे शरीर में डोपामाइन और एड्रेनालिन जैसे रसायन सक्रिय होते हैं, जो जोश और मजा देते हैं.

समस्या यह है कि रोजमर्रा की एक जैसी जिंदगी से मन जल्दी ऊब जाता है. वही समय, वही दिनचर्या, वही जिम्मेदारियां, तब मन कुछ नया चाहता है. इसी कारण बहुत से लोग अपनी कल्पनाओं में रोमांच खोजते हैं. वे कुछ ऐसा सोचते हैं, जो असली जिंदगी से अलग हो. इस में कोई बुराई नहीं, जब तक यह केवल कल्पना की सीमा में हो और किसी को नुकसान न पहुंचाए.

आज के नौजवानों में यह बेचैनी ज्यादा दिखती है. सुविधाएं बढ़ी हैं, पर संतोष घटा है, इसलिए कई लोग ड्रग्स, तेज रफ्तार, वीडियो गेम, जोखिम भरे बरताव या लगातार नए रिश्तों में थ्रिल खोजते हैं. लेकिन हर रोमांच की एक सीमा होती है. धीरेधीरे मन को उस से भी ज्यादा जोश चाहिए होता है. यहीं से कई बार इनसान गलत रास्तों की ओर मुड़ जाता है.

कंट्रोल : ताकत और समर्पण का खेल

इनसान के भीतर ताकत पाने की इच्छा भी होती है. कई लोग जिंदगी में दबे हुए रहते हैं… बचपन में डांट, बेइज्जती, बुलीइंग या कंट्रोल का अनुभव करते हैं. बड़े हो कर वे ऐसी कल्पनाएं कर सकते हैं, जहां वे ताकतवर हों, किसी पर कंट्रोल रखते हों.

दूसरी ओर कुछ लोग अपनी असली जिंदगी में इतने फैसले लेते हैं, इतने जिम्मेदार होते हैं कि वे अपनी निजी दुनिया में कंट्रोल छोड़ देना चाहते हैं. उन्हें किसी और के नेतृत्व या कंट्रोल में सुख महसूस होता है.

इन दोनों हालात में अपनेआप में कुछ गलत नहीं है, अगर सबकुछ सहमति, सम्मान और सुरक्षा के भीतर हो. समस्या तब है, जब कंट्रोल हिंसा में बदलने लग जाए.

जब किसी इनसान को दूसरे की इच्छा, दर्द या असहमति की परवाह न रहे, जब हिंसा ही जोश का स्रोत बन जाए, जब सहमति खत्म हो जाए, तब यह मानसिक विकार और सामाजिक खतरा बन जाता है.

कब सामान्य, कब असामान्य

यह सब से खास सवाल है. हर फैंटेसी रोग नहीं है. हर कल्पना अपराध नहीं है. हर निजी इच्छा शर्म की बात नहीं है. लेकिन कुछ संकेत बताते हैं कि मामला गंभीर हो सकता है. इनसान कल्पना और असलियत में फर्क न कर पाए. सामने वाले की सहमति को अहमियत न दे. हिंसा, जबरदस्ती या शोषण में आनंद महसूस करे. बिना ऐसी कल्पनाओं के सामान्य जिंदगी न जी पाए. संबंध टूटने लगें, अपराधबोध बढ़े या बरताव खतरनाक हो जाए. कानून तोड़ने की सोच पैदा हो ऐसी हालत में माहिर की मदद जरूरी है.

रिश्तों में ताजगी भी ला सकती है

एक हैल्दी और मैच्योर संबंध में कल्पनाएं कई बार संवाद का हिस्सा बन सकती हैं. वे रिश्तों में ताजगी, नयापन और खुलापन ला सकती हैं. कई जोड़े अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर बातचीत कर के एकदूसरे को बेहतर समझते हैं.

कभी केवल प्रिय इनसान की कल्पना ही आत्मीयता बढ़ा देती है..कभी किसी खास हालात की कल्पना उत्साह जगा देती है. यह सब इनसान की स्वाभाविक मानसिक संरचना का हिस्सा है. शर्त सिर्फ एक है कि सम्मान, सहमति और संतुलन.

शर्म नहीं, समझ जरूरी है

हमारा समाज सैक्स और मानसिकता दोनों विषयों पर खुल कर बात करने से बचता है. नतीजा यह होता है कि लोग अपनी सामान्य भावनाओं को भी अपराध सम?ाने लगते हैं और कई बार गंभीर समस्याएं छिपी रह जाती हैं.

जरूरत है समझ की. अगर कोई कल्पना किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रही, इनसान की जिंदगी को बाधित नहीं कर रही और उस की निजी मानसिक दुनिया तक सीमित है, तो उसे ले कर अपराधबोध पालना उचित नहीं.

लेकिन अगर कल्पना हिंसा, जुनून, भ्रम या जबरदस्ती में बदल रही है, तो उसे नजरअंदाज करना भी खतरनाक है. आखिर में इनसान का मन कोई अदालत नहीं, जहां हर विचार पर सजा सुनाई जाए. मन एक संसार है, जहां उजाला भी है, अंधेरा भी.

फैंटेसी उसी संसार का हिस्सा है.

वह कभी रचनात्मक होती है, कभी सांत्वना देती है, कभी रोमांच भरती है और कभी भीतर छिपे घावों का संकेत बनती है, इसलिए सैक्सुअल फैंटेसी को केवल अपराध या बीमारी कह देना अधूरा सच है. सही बात यह है कि उसे समझना चाहिए, क्योंकि जब समझ होती है, तभी सीमा भी तय होती है और सुरक्षा भी.  Sexual Health

Hookup Culture: कितना सही, कितना गलत

Hookup Culture: आज के मौडर्न वर्ल्ड में हुकअप, मेकआउट और वन नाइट स्टैंड जैसे शब्द अक्र सुनने को मिलते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन का असल मतलब क्या है? दरअसल, हुकअप कल्चर आज की जेनेरेशन में तेजी से बढ़ रहा है. इस का मतलब होता है कि जब 2 लोग बिना किसी रिश्ते या कमिटमैंट में आए सिर्फ सैक्सुअल रिलेशन बनाते हैं. यानी महज मुलाकात के बाद अगर उन का रिश्ता केवल फिजिकल लैवल तक ही सीमित रह जाए, तो उसे हुकअप कहा जाता है.

मान लीजिए आप किसी क्लब या पार्टी में गए और वहां आप की मुलाकात किसी ऐसे इनसान से हुई जो आप को पसंद आ गया. अगर वह इनसान भी आप को पसंद करे और दोनों की सहमति से बिना किसी रिलेशनशिप में आए सिर्फ सैक्सुअल रिलेशन बन जाए, तो आज की भाषा में इसे हुकअप कहा जाता है. इस तरह के रिश्तों में न तो किसी तरह की कमिटमैंट की जरूरत होती है और न ही जिम्मेदारियों का बोझ. असल में, यह एक तरह से कैजुअल अरेंजमैंट होता है जहां दोनों लोग केवल अपनी फिजिकल नीड्स पूरी करने के लिए साथ आते हैं.

हुकअप और मेकआउट जैसे रिश्तों के जहां कुछ फायदे हैं, वहीं इन के नुकसान भी कम नहीं हैं. अगर फायदों की बात करें तो सब से बड़ी बात यह है कि शुरुआत से ही दोनों पार्टनर क्लियर रहते हैं कि वे किसी सीरियस रिलेशनशिप में नहीं बंधना चाहते. इस वजह से दिल टूटने का खतरा कम हो जाता है. साथ ही, दोनों अपनीअपनी फिजिकल जरूरतें पूरी कर खुश रहते हैं और किसी तरह की जिम्मेदारी भी नहीं उठानी पड़ती. दरअसल, आज के यंगस्टर्स कमिटमैंट और जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं, ऐसे में उन्हें यह रिलेशनशिप का तरीका आसान लगता है.

अगर नुकसान की बात करें तो सब से बड़ी दिक्कत तब सामने आती है जब कैजुअल हुकअप के दौरान लड़की प्रेग्नेंट हो जाती है. शुरुआत में दोनों पार्टनर यह मान कर चलते हैं कि उन का रिश्ता सिर्फ फिजिकल तक ही सीमित रहेगा, लेकिन प्रेग्नेंसी की स्थिति में हालात अचानक बदल जाते हैं. तब सवाल उठता है कि आखिर इस की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? चाहे दोनों ने सीरियस रिलेशन नहीं चाहा हो, लेकिन इस स्थिति में किसी एक को तो आगे आना ही पड़ता है. लड़की के लिए पीछे हटना लगभग नामुमकिन होता है और लड़के पर भी दबाव बढ़ जाता है. नतीजा यह होता कि बिना चाहत और बिना प्यार के दोनों एक ऐसी मुश्किल में फंस सकते हैं, जिस की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

आज की जेनरेशन अकसर मस्ती और फन के नाम पर हर चीज को ट्राई करने के लिए तैयार हो जाती है, लेकिन कई बार वह इस के नतीजों के बारे में सोचती ही नहीं है. सच तो यह है कि हर चीज के साथ फायदे और नुकसान दोनों जुड़े होते हैं, इसलिए कोई भी कदम उठाने से पहले उस के परिणामों पर अच्छी तरह विचार करना जरूरी है. Hookup Culture

Live-in Relationship का खौफनाक अंजाम

Live-in Relationship, लेखक – महेश कांत शिवा

27 जून, 2025 को हरियाणा के पानीपत में एक औरत की उस के लिवइन पार्टनर ने गला काट कर हत्या कर दी और फरार हो गया. दरअसल, उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के गांव केलई की रहने वाली उषा के पति की काफी दिनों पहले मौत हो गई थी. गांव में रोजगार न होने के चलते वह कामधंधे की तलाश में पानीपत चली आई.

उषा पानीपत की गंगाराम कालोनी में किराए के कमरे में रहने लगी. यहां पर उस की मुलाकात उत्तर प्रदेश के बदायूं के रहने वाले महेंद्र नामक एक नौजवान से हुई. पहले उन दोनों में दोस्ती हुई और फिर बाद में उन्होंने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला कर लिया.

बताया जाता है कि पिछले कुछ समय से उषा और महेंद्र में किसी बात को ले कर झगड़ा चल रहा था. 24 जून, 2025 को महेंद्र्र ने चाकू से उषा का गला काट कर उस की हत्या कर दी और फरार हो गया. हालांकि, पुलिस ने महेंद्र को 2 दिन बाद ही गिरफ्तार कर लिया.

महेंद्र ने पुलिस को बताया कि उषा उस से बातबात पर झगड़ा करने लगी थी. उसे शक था कि वह किसी दूसरे मर्द से फोन पर बात करने लगी थी. उस की इसी हरकत से तंग आ कर उस ने उषा की हत्या कर दी.

इसी तरह पश्चिम बंगाल की रहने वाली 24 साल की ब्यूटी खातून तकरीबन 6 महीने पहले अपने परिवार वालों को बिना बताए पानीपत आई थी. यहां वह पुराना औद्योगिक क्षेत्र के कुलदीप नगर में किराए पर रहने लगी और एक फैक्टरी में काम करने लगी.

इसी दौरान ब्यूटी खातून की जानपहचान सूरज पठान नाम के एक नौजवान से हुई. दोनों में पहले दोस्ती हुई और कुछ ही दिनों में दोस्ती प्यार में बदल गई. इस के बाद वे लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

हालांकि, ब्यूटी खातून ने अपनी बहन नेहा खातून को फोन कर के बता दिया था कि वह पानीपत में है और एक लड़के से प्यार करती है और वे दोनों एकसाथ रहते हैं. पर 19 जून, 2025 को सूरज पठान ने ब्यूटी खातून की हत्या कर दी.

गिरफ्तारी के बाद सूरज पठान ने बताया कि ब्यूटी खातून उस के अलावा किसी दूसरे लड़के से भी बात करती थी. उस ने अनेक बार ब्यूटी खातून को सम?ाया कि वह किसी दूसरे से बात न करे, लेकिन वह नहीं मानी.

इसी के चलते सूरज पठान ने 19 जून, 2025 को ईंट से ब्यूटी खातून के सिर पर वार किया, जिस से उस की मौत हो गई.

14 जून, 2025 को पानीपत से सटे करनाल शहर में 35 साल की पूजा नामक औरत की हत्या भी उस के लिवइन पार्टनर ने कर दी थी.

पूजा मूल रूप से कंबोपुरा गांव की रहने वाली थी और उस की शादी गांव बढ़ेडा में हुई थी. वह 3 बच्चों की मां थी. वह अपने पति को छोड़ कर करनाल की दीवान कालोनी में एक आदमी के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी थी.

उन दोनों में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ और पूजा के लिवइन पार्टनर ने उस की गला दबा कर हत्या कर दी और लाश को एक एंबुलैंस में घर के बाहर छोड़ कर फरार हो गया.

हरियाणा के पलवल के गांव नांगल ब्राह्मण का रहने वाला योगेश फरीदाबाद में प्राइवेट नौकरी करता था, जहां उस की जानपहचान उत्तर प्रदेश के अयोध्या की रहने वाली एक लड़की से हुई. दोनों में मुलाकात हुई और प्यार हो गया. इस के बाद योगेश ने साल 2017 में उस लड़की से लवमैरिज की थी.

शादी के बाद योगेश के 2 बच्चे हुए, जिन में 6 साल की बेटी और 10 महीने का बेटा था. इस के बाद उस की अपनी पत्नी से अनबन रहने लगी, तो योगेश की पत्नी उसे छोड़ कर बच्चों समेत अपने मायके चली गई और वहीं रहने लगी.

पत्नी के मायके जाने के बाद योगेश फरीदाबाद की नौकरी छोड़ कर हरियाणा के रेवाड़ी आ गया और यहां के धारूहेड़ा इलाके में एक अस्पताल में ओटी असिस्टैंट की नौकरी करने लगा.

नौकरी के दौरान योगेश की मुलाकात करनाल के वकीलपुरा सदर बाजार की रहने वाली प्रिया से हुई. दोनों में दोस्ती हुई और फिर प्यार हो गया, जिस के बाद उन दोनों ने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया.

बाद में प्रिया भी अपने 3 बच्चों को ले कर आ गई और वे धारूहेड़ा के सैक्टर 6 में एक किराए के मकान में रहने लगे. प्रिया ने अपने तीनों बच्चों का दाखिला गुरुकुलम स्कूल में करा दिया.

बताया जाता है कि उन दोनों के बीच कुछ समय से किसी बात को ले कर अनबन चल रही थी. इसी बीच स्कूल की छुट्टी पड़ने के चलते प्रिया ने अपने तीनों बच्चों को अपनी बहन के पास भेज दिया. अब मकान में योगेश और प्रिया ही रह रहे थे.

जानकारी के मुताबिक, 2 से 6 जून, 2025 के बीच योगेश ने अपनी लिवइन पार्टनर प्रिया की गला घोंट कर हत्या कर दी और लाश को बैड में छिपाने के बाद खुद भी फांसी का फंदा लगा कर खुदकुशी कर ली.

इस बात का पता तब चला जब 6 जून, 2025 को लोगों को योगेश के मकान से बदबू आई, जिस के बाद लोगों ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने कमरे का दरवाजा तोड़ा तो योगेश फांसी पर लटका हुआ मिला.

रेवाड़ी पुलिस ने भी रूटीन वर्क की तरह योगेश की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और आगे की जांच में जुट गई. उस वक्त योगेश के परिवार वालों सुसाइड करने की वजह पत्नी से अनबन होना बताई थी.

बेटे की मौत के बाद योगेश के पिता गिरीराज 19 जून को अपने बेटे का सामान लेने के लिए धारूहेड़ा पहुंचे. जब वे कमरे से बैड को उठाने लगे, तो वह काफी भारी लगा.

जैसे ही बैड खोला गया, तो उस में कपड़ों के बीच में एक औरत हाथ दिखाई दिया. वह योगेश की लिवइन पार्टनर प्रिया की लाश थी.

इसी तरह मूल रूप से उत्तराखंड के नानकमत्ता की रहने वाली 2 बच्चों की मां पूजा गुरुग्राम के थाना सैक्टर 5 में उत्तराखंड के ही सितारगंज गौरीखेड़ा के मूल बाशिंदे 25 साल के मुश्ताक अहमद के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहती थी.

पूजा एक स्पा सैंटर में काम करती थी, जबकि मुश्ताक टैक्सी चलाता था. कुछ दिनों पहले मुश्ताक पूजा को घुमाने के बहाने उत्तराखंड ले गया और वहां पर गरदन धड़ से अलग कर उस की हत्या कर दी.

हत्या के बाद मुश्ताक ने लाश के सिर को एक प्लास्टिक के थैले में डाल कर नाले में बहा दिया, जबकि धड़ को चादर में लपेट कर दूसरे नाले में फेंक दिया और छिपने के लिए कर्नाटक भाग गया.

उधर, जब काफी दिनों से पूजा नहीं मिली, तो उस की बहन ने उस की थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई. पूजा की बहन ने पुलिस को बताया था कि उस की बहन मुश्ताक के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहती थी.

गुरुग्राम सैक्टर 5 थाना पुलिस ने पहले तो गुरुग्राम में ही पूजा की तलाश की, लेकिन जब वह नहीं मिली, तो उत्तराखंड में स्थानीय पुलिस के सहयोग से मुश्ताक को गिरफ्तार कर पूछताछ की गई.

मुश्ताक ने पुलिस को बताया कि उस की पूजा से मुलाकात रुद्र्रपुर बसस्टैंड पर हुई थी. वे दोनों बस से गुरुग्राम आ रहे थे. चूंकि दोनों एक ही राज्य के रहने वाले थे, तो दोनों में आसानी से दोस्ती हो गई. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ऐक्सचेंज किया.

इसी बीच पूजा की बहन की तबीयत खराब हो गई, तो मुश्ताक उसे अपनी टैक्सी में ले कर उस की बहन के घर भी गया, जिस से दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई और उन्होंने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया. तब से पूजा मुश्ताक को अपना पति मानने लगी थी.

इस बीच मुश्ताक अपने घर उत्तराखंड गया तो उस के परिवार वालों ने उस पर दबाव बना कर अपनी रिश्तेदारी की ही एक लड़की से शादी करा दी. जब पूजा को इस बात का पता चला तो वह मुश्ताक के घर पहुंच गई और मुश्ताक को अपना पति बताते हुए हंगामा किया. परिवार और रिश्तेदारों ने विवाद को आगे न बढ़ाते हुए पूजा और मुश्ताक को घर से बाहर निकाल दिया.

कुछ दिनों बाद मुश्ताक पूजा को धूमाने के बहाने उत्तराखंड ले गया और गरदन काट कर उस की हत्या कर दी.

बढ़ती जरूरतें और इच्छाएं

दरअसल, लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों की समय बढ़ने के साथसाथ जरूरतें और इच्छाएं भी बढ़ने लगती हैं. लिवइन रिलेशनशिप में आने से पहले दोनों के बीच भले ही यह सहमति बने कि वे दोनों एकदूसरे पर निर्भर नहीं रहेंगे, दोनों एकदूसरे पर पैसे से जुड़ा दबाव या सामाजिक बंधन का दबाव नहीं डालेंगे.

लेकिन जैसेजैसे समय गुजरता है और दोनों के बीच रिश्ता गहरा होता चला जाता है, वैसे ही उन की जरूरतें बढ़नी शुरू हो जाती हैं. दोनों में कहीं न कहीं वे भावनाएं भी पैदा होने लगती हैं, जो पतिपत्नी के रिश्ते के बीच होती हैं.

लिवइन रिलेशनशिप टूटने की दूसरी बड़ी वजहें

* दोनों के साथ रहने के चलते उन के खर्चे भी बढ़ते चले जाते हैं, फिर खर्चे उठाएगा कौन, यह सम?ा नहीं आता.

* लड़की या लड़के द्वारा शादी का दबाव बनाना.

* रसोईघर का खर्च और मकान का किराया कौन भरेगा, यह बड़ी समस्या.

* अगर दोनों के पहले से बच्चे हैं, तो उन की स्कूल फीस और दूसरे खर्च कौन उठाएगा.

* दोनों के घूमनेफिरने पर होने वाला खर्च किस की जेब से जाएगा.

* आपसी संबंध बनने के बाद महिला का पेट से हो जाना.

* परिवार द्वारा लड़के या लड़की की शादी दूसरी जगह तय कर दिया जाना. Live-in Relationship

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