मध्य प्रदेश : दांव पर सब दलों की साख

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ कर मध्य प्रदेश की जनता और चुनी गई कांग्रेसी सरकार से गद्दारी की थी या फिर अपनी गैरत की हिफाजत की थी, इस का सटीक फैसला अब मीडिया या चौराहों पर नहीं, बल्कि जनता की अदालत में 10 नवंबर, 2020 को होगा जब 28 सीटों पर हुए उपचुनावों के वोटों की गिनती हो रही होगी. इन 28 सीटों में से 16 सीटें ग्वालियरचंबल इलाके की हैं, जहां वोट जाति की बिना पर डलते हैं और इस बार भी भाजपा और कांग्रेस के भविष्य का फैसला हमेशा की तरह एससीबीसी तबके के लोग ही करेंगे, जिन का मूड कोई नहीं भांप पा रहा है.

साल 2018 के विधानसभा के चुनाव में इन वोटों ने भाजपा और बसपा को अंगूठा दिखाते हुए कांग्रेस के हाथ के पंजे पर भरोसा जताया था, लेकिन तब हालात और थे. ये हालात बारीकी से देखें और समझें तो महाराज कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का असर कम, बल्कि एट्रोसिटी ऐक्ट से पैदा हुई दलितों और सवर्णों की भाजपा से नाराजगी ज्यादा थी.

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दलित इस बात से खफा थे कि भाजपा सवर्णों को शह दे रही है और इस मसले पर अदालत भी उस के साथ है, इस के उलट ऊंची जाति वाले इस बात से गुस्साए हुए थे कि संसद में अदालत के फैसले को पलट कर मोदी सरकार उन की अनदेखी करते हुए दलितों को सिर चढ़ा रही है, जबकि वे हमेशा उसे वोट देते आए हैं.

इसी इलाके में बड़े पैमाने पर एट्रोसिटी ऐक्ट को ले कर हिंसा हुई थी. इस का नतीजा यह हुआ कि इन दोनों ही तबकों के वोट भाजपा से कट कर कांग्रेस की झोली में चले गए और वह इस इलाके की 36 सीटों में से 26 सीटें ले गई.

भाजपा राज्य में 230 सीटों में से महज 109 सीटें ले जा पाई और कांग्रेस 114 सीटें ले जा कर बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों की मदद से अल्पमत की सही सरकार बना ले गई.

दिग्गज और तजरबेकार कमलनाथ ने बहैसियत मुख्यमंत्री जोरदार शुरुआत की जिस से लोगों को आस बंधी थी कि 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार भाजपा से बेहतर साबित होगी, लेकिन सवा साल में ही कांग्रेस की खेमेबाजी और फूट उजागर हुई तो हुआ वही जिस का हर किसी को डर था.

कमलनाथ और परदे के पीछे से सरकार हांक रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी शुरू कर दी नतीजतन वे राम भक्तों की पार्टी से जा मिले जिस के एवज में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में ले लिया और उन के 22 समर्थक विधायकों की मदद से सरकार बना ली जिस की अगुआई एक बार फिर वही शिवराज सिंह चौहान कर रहे हैं, जिन्हें जनता ने 2018 में खारिज कर दिया था.

इतना ही नहीं, भाजपा ने सिंधिया समर्थक 14 विधायकों को मंत्री पद से भी नवाजा और वादे या सौदे के मुताबिक सभी को उन की सीटों से ही टिकट भी दिए.

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सब की हालत पतली

अब क्या ये सभी कांग्रेसी भाजपा के हो कर दौबारा जीत पाएंगे, यह सवाल बड़ी दिलचस्पी से सियासी गलियारों में पूछा जा रहा है जिस का सटीक जवाब तो 10 नवंबर को ही मिलेगा, पर इन नए भगवाइयों की हालत खस्ता है, जो पहले भाजपा की बुराई करते थकते नहीं थे और अब जनता को बता रहे हैं कि भाजपा क्यों कांग्रेस से बेहतर है. लेकिन ऐसा करते और कहते वक्त उन की आवाज में वह दमखम नहीं रह जाता जो 2018 के चुनाव प्रचार के वक्त हुआ करती था. कांग्रेस इन्हें गद्दार और दागी कह तो रही है, लेकिन उस के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर क्यों वह अपने विधायकों को बांधे रखने में नाकाम रही और क्यों उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार गिराने मजबूर होना पड़ा.

अब ज्यादातर सीटों पर मुकाबला कांग्रेस बनाम कांग्रेस छोड़ चुके नए भाजपाइयों के बीच हो रहा है. भाजपा को बहुमत के लिए 9 सीटें और चाहिए, जबकि कांग्रेस को सरकार बनाने पूरी 28 सीटों पर जीत की दरकार है. लेकिन राह दोनों की ही आसान नहीं है, तो इस की अपनी वजहें भी हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पहले जैसे लोकप्रिय नहीं रह गए हैं और भाजपा कार्यकर्ता सिंधिया खेमे की खातिरदारी में जुटने से बच रहा हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि ये जीत भी गए तो उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला. हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया जनता को यह बताने लगे हैं कि वे और उन के समर्थक दिलोदिमाग दोनों से भाजपाई हो चुके हैं. इस के लिए वे जयजय श्रीराम का नारा सड़कों पर आ कर लगाने लगे हैं और भाजपाई उसूलों पर चलते हुए संघ के दफ्तर की भी परिक्रमा करने लगे हैं.

दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को यह एहसास है कि उन के पास खासतौर से इस इलाके में जमीनी कार्यकर्ताओं का टोटा है और 16 में से कोई 10 सीटों पर सिंधिया खेमे के उम्मीदवारों की खुद की अपनी भी साख है जिसे तोड़ पाने के लिए उन के पास काबिल और लोकप्रिय उम्मीदवार नहीं हैं जिस की भरपाई करने वे सिंधिया की गद्दारी को चुनावी मुद्दा बनाने की जुगत में भिड़े हैं.

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भाजपा निगल रही बसपा वोट

कोई मुद्दा न होने और कोरोना महामारी के चलते वोटिंग फीसदी कम होने के डर से भी सभी पार्टियां हलकान हैं. ऐसे में जो पार्टी अपने वोटर को बूथ तक ले आएगी, तय है कि वह फायदे में रहेगी. साफ यह भी दिख रहा है कि कोरोना के डर के चलते बूढ़े वोट डालने नहीं जाएंगे. इस इलाके में कभी मजबूत रही बसपा अब दम तोड़ती नजर आ रही है. 2018 के चुनाव में वह यहां महज एक सीट जीत पाई थी जो अब तक का उस का सब से खराब प्रदर्शन था, इस के बाद भी 6 सीटों पर उस ने भाजपा और कांग्रेस दोनों का खेल बराबरी से बिगाड़ा था. बसपा के वोटरों पर इन दोनों पार्टियों की नजर है, जिस के चलते दोनों का दलित प्रेम उमड़ा जा रहा है.

मायावती का भाजपा के लिए झुकाव किसी सुबूत का मुहताज नहीं है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दलित समुदाय कई फाड़ हो चुका है. सामाजिक समरसता के जरीए भाजपा एससीबीसी तबके में थोड़ीबहुत ही सही सेंध लगा चुकी है. उसे उम्मीद है कि अगर इस तबके के 30 फीसदी वोट भी उसे मिले तो सवर्ण वोटों के सहारे दिनोंदिन मुश्किल होती जा रही इस जंग को वह जीत लेगी. दूसरी तरफ कांग्रेस को उम्मीद है कि पिछली बार की तरह ये वोट उसे ही मिलेंगे. बसपा के खाते में अब वही वोट जा रहे हैं जो 20 साल से उसे मिलते रहे हैं, लेकिन मायावती के ढुलमुल रवैए के चलते दलित नौजवान वोटर यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन सी पार्टी हकीकत में उस की हिमायती है.

साख का सवाल

ज्योतिरादित्य सिंधिया को यह साबित करने में पसीने आ रहे हैं कि 2018 की तरह वोट उन के नाम पर पड़ेंगे तो शिवराज सिंह भी यह साबित नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा और वे खुद पहले की तरह अपराजेय हैं, इसलिए उन्होंने ‘शिवज्योति ऐक्सप्रेस’ का नारा दिया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की बूआ कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे भी अपने बबुआ के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रही हैं.

साख मायावती की भी दांव पर लगी है कि बसपा अगर इस बार भी सिमट कर रह गई तो आगे के लिए उस के दामन में कुछ नहीं रहेगा. कमलनाथ को भी साबित करना है कि वे एक बेहतर मुख्यमंत्री थे जो अपनों की ही साजिश का शिकार हुए थे.

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यानी अब जो जीता वह सिकंदर हो जाएगा और हारे के पास हरि नाम भी नहीं बचेगा, इसलिए सारे नेता वोटरों को लुभाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सब का सहारा ले रहे हैं, जिन्हें मालूम है कि यह चुनाव आम चुनाव से भी ज्यादा अहम उन के वजूद के लिए है और जानकारों की दिलचस्पी इस इलाके में बिहार के बराबर ही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अगर कांग्रेस वोटर के दिमाग में यह बात बैठा पाई कि भाजपा ने जोड़तोड़ कर सरकार बना कर राज्य का भला नहीं किया है तो बाजी भगवा खेमे को महंगी भी पड़ सकती है, क्योंकि विकास और रोजगार के मुद्दों पर तो वोटर की नजर में दोनों ही पार्टियां नकारा हैं.

जानें काले गेहूं पर सफेद झूठ

मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर से 40 किलोमीटर दूर बसे कस्बे देपालपुर के गांव शाहपुरा के एक किसान सीताराम गेहलोत इन दिनो बेहद खुश हैं. जो भी सुनता है उनके गांव की तरफ भागता है. सीताराम ने काला गेंहू बोया है जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं और जो जानते हैं वह बड़ा दिलचस्प और हैरतअंगेज है कि इस गेंहू की बनी रोटी खाने से न केवल कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी ठीक होती है बल्कि दूसरी कई डायबिटीज़, मोटापा और हाइ ब्लडप्रेशर सरीखी बीमारियाँ भी दूर होती हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि काला गेंहू खाने से तनाव भी दूर होता है और दिल की बीमारी यानि हार्ट अटैक भी नहीं होता.

सीताराम गेंहू की यह अनूठी किस्म पंजाब के नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नालाजी इंस्टीट्यूट यानि एनएबीआई से लाये हैं. जिसे नाबी भी कहा जाता है. गेहूं का रंग हरे और पकने के बाद पीले के अलावा भी कुछ और खासतौर से काला हो सकता है इस बात पर भरोसा करना मुश्किल काम है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि काले रंग का गेहूं होता है पर क्या वह वाकई उतना चमत्कारी होता है जितना बताया जाता है, यह जरूर शक वाली बात है.

lie on black wheat

सीताराम गेहलोत काले गेंहू के बीज के लिए 2 साल से नाबी के चक्कर काट रहे थे, तब कहीं जाकर इस साल उन्हें 5 किलो बीज मिला जिसे वे श्री विधि से उगा रहे हैं इस विधि में फसलों की पैदावार ज्यादा होती है और फसल पर तेज हवा और पानी का असर नहीं होता.

काला गेहूं हर किसी की जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय है, वजह केवल इसका रंग ही नहीं बल्कि वे गिनाई जा रही खूबियां भी हैं जिनसे कई बीमारियां न होने या उनके दूर होने की भी चर्चा जमकर होती रहती है. फसल की पैदावार और बढ़वार के वक्त इस गेहूं की  वालियों का रंग हरा ही होता है. लेकिन जैसे जैसे फसल बढ़ती जाती है वैसे वैसे उनका रंग बदलकर काला होने लगता है. यह कोई कुदरत का करिश्मा नहीं है, बल्कि जानकारों की मानें तो एंथोसायनिन नाम का रसायन इसका जिम्मेदार है, जिसकी अधिकता से फसलें नीली बैंगनी या फिर काले रंग की होती हैं. अनाज, सब्जी या फलों का रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट की तादाद पर निर्भर रहता है. अधिकतर पेड़ पौधे हरे क्लोरोफिल की वजह से होते हैं.

दरअसल, एंथोसायनिन एक अच्छा एंटीऔक्सीडेंट होता है, जो हरे रंग के गेहूं के मुकाबले काले गेहूं में 40 गुना ज्यादा तक होता है. काले गेहूं में आयरन भी 60 फीसदी से ज्यादा पाया जाता है.

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अगर ये खूबियां कुदरत ने काले गेहूं को बख्शी हैं तो कुछ कमियां भी उसमें हैं. मसलन इसमें स्टार्च और प्रोटीन के अलावा दूसरे पोषक तत्व कम मात्रा में होते हैं. फिर क्यों और कौन काले गेहूं को अमृत सरीखा बताकर बेच रहा है, इसकी जांच होनी चाहिए. जानकार हैरानी होती है कि कुछ वेबसाइट्स पर काले गेहूं का आटा 2 से लेकर 4 हजार रु प्रतिकिलों तक बिक रहा है.

इस बारे में मध्य प्रदेश कृषि विभाग में कार्यरत स्वदेश विजय कहते हैं कि यह हम भारतीयों के चमत्कारों के आदी हो जाने की वजह से है. जबकि हकीकत में काले गेहूं के बाबत ऐसा कोई दावा जानकारों ने नहीं किया है. हां, काले गेंहू पर काम कर रही नाबी की वैज्ञानिक मोनिका गर्ग ने यह जरूर माना है कि अभी इसका प्रयोग चूहों पर किया गया है जिसके नतीजे उत्साहवर्धक आए हैं. जिन चूहों पर काले गेंहू का प्रयोग किया गया उनका वजन कम हुआ है और उनका कोल्स्ट्रोल और शुगर भी कम हुआ लेकिन इन्सानों के मामले में भी ऐसा हुआ है या होगा इसका दावा नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि एंथोसायनिन आक्सीडेंट की वजह से इंसानों को भी फायदा होगा पर वह ठीक वैसा ही जैसा दूसरे एंटऔक्सीडेंट्स से होता है.

तो फिर काले गेंहू के नाम पर हल्ला क्यों इस सवाल का जबाब साफ है कि इसे बढ़ा चढ़ा कर पेश करने वाले जरूर तबियत से चांदी काट रहे हैं. बात ठीक वैसी ही है कि दो सर, चार सींग और छह पैरों वाले पैदा हुये बछड़े को लोग भगवान का अवतार या लीला मानते उसका पूजा पाठ शुरू कर देते हैं, दक्षिणा भी चढ़ाने लगते हैं. फसलों के मामले में भी बगैर सोचे समझे और जाने अगर लोग महज रंग की बिना पर अंधविश्वासी होकर पैसा लुटा रहे हैं तो वे खुद का ही नुकसान कर रहे हैं.

काले गेंहू से अगर कैंसर ठीक होता है तो कोई वजह नहीं कि इस जानलेवा और लाइलाज बीमारी से एक भी मौत हो और शुगर के मरीजों जिनकी तादाद देश में 6 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही है को तो रोज सुबह शाम गुलाबजामुन की दावत उड़ाना चाहिए क्योंकि काला गेंहू जो है. हकीकत में एक साजिश के तहत सफेद झूठ फैलाकर काले गेंहू का काला कारोबार कुछ लोग कर रहे हैं जैसे चमत्कारी विज्ञापन वाले किया करते हैं कि हमारी दवाई की एक खुराक लो और सालों पुराना बावसीर जड़ से मिटाओ. बावसीर के मरीज ठीक हो जाने के लालच के चलते एक नहीं बल्कि हजारों खुराक फांक जाते हैं, लेकिन उनकी सुबह की तकलीफ दूर नहीं होती.

यह तय है कि काले गेंहू में कुछ ऐसे गुण हैं जो हर फसल में नहीं होते और होते भी हैं तो  अलग अलग तरीके से होते हैं, इसमें कुछ तत्व ज्यादा हैं जो हैरानी की बात नहीं पर सनसनी और हैरानी गेंहू के काले होने के नाम पर फैलाई जा रही है तो लोगों को इससे सावधान भी रहना चाहिए.

अब सिंधिया ने बताया नरेंद्र मोदी को नाना

जैसे जैसे मध्यप्रदेश मे चुनाव प्रचार शबाब पर आता जा रहा है वैसे वैसे नेताओं के तेवर भी तीखे होते जा रहे हैं. बड़े नेता विपक्षी नेताओं का सीधे नाम लेने के बजाय उन्हें उनके प्रचिलित नामों से संबोधित कर तंज कस रहे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल गांधी को राहुल बाबा कहना शुरू कर दिया है जो लगभग पप्पू का पर्याय ही है. वैसे तो छोटे बच्चे को बाबा प्यार से कहा जाता है लेकिन शिव भक्तों को भी बाबा कहने का चलन है. अब अमित शाह राहुल को कौन सा वाला बाबा कह रहे हैं इसे समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नही.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान घोषित तौर पर मामा हैं वे खुद को मामा कहलवाने में फख्र भी महसूस करते हैं लेकिन एक मीटिंग मे कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मामा के साथ साथ नाना संबोधन का भी जिक्र किया तो जनता बिना समझाए समझ गई कि इशारा नरेंद्र मोदी की तरफ है. अशोकनगर जिले की मुंगावली विधानसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार बृजेन्द्र सिंह यादव का प्रचार करते उन्होंने कहा कि जनता इस बार मामा और नाना दोनो को बोरिया बिस्तर बांध कर भगा देगी .

नाना के खिताब पर भाजपा खेमे की प्रतिक्रिया जब आएगी तब आएगी पर राहुल गांधी अक्सर राफेल मुद्दे को हवा देते चोर चौकीदार कहते रहते हैं. यह संबोधन अगर ज्यादा चलन में आ गया तो तय है भाजपा को कड़ा कदम उठाना पड़ेगा सवाल आखिर उसके मुखिया की साख का जो है राजनीति मे ऐसे प्रिय अप्रिय संबोधन वाले नेताओं की भरमार है कुछ संबोधनों से इमेज चमकती है तो कुछ से बिगड़ती भी है. कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह दिग्गी राजा के संबोधन से भले ही नवाजे जाते हों पर साल 2003 के चुनाव प्रचार मे उमा भारती ने उन्हें मिस्टर बंटाढार कहते चुनाव प्रचार अभियान चलाया था तो कांग्रेस की लुटिया ही डूब गई थी. इस तरह के रखे हुए नाम क्या सच में वोटर की मानसिकता पर फर्क डालते हैं इस पर कोई मान्य शोध भले ही न हुआ हो लेकिन सामान्य अनुभव बताता है कि इससे फर्क तो पड़ता है मसलन राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को महारानी कहने से जनता में नकारात्मक संदेश जाता है पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की चाउर ( चावल ) वाले बाबा की छवि और संबोधन ने उन्हें 2013 के चुनाव मे काफी फायदा पहुंचाया था. धान के बोनस को लेकर किसान उनसे इस बार खफा हैं इसलिए भाजपा इस बार इस संबोधन से बच रही है.

मध्यप्रदेश मे ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी महाराज बनाने पर शिवराज सिंह ने एतराज जताया था जिसकी गंभीरता समझते सिंधिया ने खुद को आम आदमी कहा था और अपने संसदीय क्षेत्र मे दलितों आदिवासियों के घर जाना शुरू कर दिया था जिससे यह मुद्दा तूल नही पकड़ पाया था हालांकि अपने चुनावी विज्ञापनों में भाजपा कह यही रही है कि माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज. बड़े ही नही कई छोटे मोटे नेता भी इसी तरह के नामों और संबोधनों से जाने जाते हैं जो अक्सर किसी न किसी रिश्ते को प्रदर्शित करते हुए होते हैं मसलन मामा, चाचा, कक्का, दाउ, दीदी और भाभी वगेरह. आत्मीयता भी इन संबोधनों से जाहिर होती है अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नाना बनाने पर भाजपा खुश ही होगी क्योंकि बतौर मामा शिवराज सिंह ने खूब लोकप्रियता बटोरी है पर अब ज्योतिरादित्य उन्हें कंस और शकुनि के बाद तीसरा मामा भी कहने लगे हैं तो लोगों का खूब मनोरंजन भी हो रहा है.

मायावती की साख पर सवाल

चुनाव के पहले और चुनाव के बाद नेताओं की बदलती फितरत से पीछा छुड़ाना उनको भारी पड़ता है. जनता को उनकी कही बातों पर भरोसा नहीं होता है. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से 3 बार मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में भाजपा के साथ नहीं जाने की बात कहती है तो उनपर जनता को यकीन नहीं हो रहा है. छत्तीसगढ़ के चुनाव प्रचार में मायावती वहां के मुद्दो पर राय देने की जगह पर केवल अपनी सफाई देने की कोशिश कर रही हैं. वह कांग्रेस और भाजपा दोनो की सांपनाथ-नागनाथ कहती है. छत्तीसगढ की जनता को यह समझ नहीं आ रहा कि चुनाव में सांपनाथ-नागनाथ नजर आने वाली भाजपा-कांग्रेस के साथ चुनाव के बाद मायावती समझौता कैसे कर लेती हैं?

5 राज्यों के विधनसभा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, मणिपुर और तेलंगाना के पहले बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहती थी. अचानक बसपा ने यूटर्न लिया और खुद की चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. मायावती उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की बात भले करती हो पर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में वह सपा के साथ भी नहीं है. यहां सपा-बसपा भी अलग अलग ही चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस नेता सुरेन्द्र सिंह राजपूत कहते हैं, असल में मायावती उसूल की नहीं अपने मुनाफे की राजनीति करती हैं. ऐसे में वह वहां अकेले चुनाव लड़ रही हैं. कांग्रेस हमेशा की साम्प्रदायिकता विरोधी विचारधरा को एकजुट करके चुनाव लड़ना चाहती है.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में मायावती की बसपा कहीं चुनावी लड़ाई में नहीं हैं. वह वोट काटने का काम करेंगी. जिसका प्रभाव कांग्रेस पर अधिक पड़ेगा. छत्तीसगढ में भाजपा और कांग्रेस के बीच पिछले चुनाव में सीट और वोट प्रतिशत दोनों के बीच बहुत ही कम फासला था. ऐसे में कुछ वोटों के कटने से ही जीत हार का गणित बदल सकता है. मायावती को लगता है कि छत्तीसगढ में अगर उनकी पार्टी कुछ सीटें भी ले आई तो वह किंगमेकर बन सकती है. जिसके बाद उनके लिये अपनी कोई भी बात मनवानी सरल होगी. चुनाव के पहले सांपनाथ-नागनाथ कहने वाली मायावती भाजपा-कांग्रेस के साथ नहीं जायेगी इसकी कोई गांरटी नहीं है.

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