Hindi Kahani: अधेड़ को सबक


Hindi Kahani. ए अधेड़ आदमी ट्रेन में सफर कर रहा था. उस के आसपास कई औरतें बैठी हुई थीं. वह ट्रेन लोकल थी, इसलिए छोटेछोटे स्टेशनों पर भी रुक रही थी. जब भीड़ बढ़ जाती तो उस अधेड़ आदमी का हाथ गलत काम के लिए हरकत में जाता. कभी नींद के बहाने तो कभी ऐसे ही वह औरतों को छू देता था.

एक स्टेशन पर उस अधेड़ के आसपास की सीटें खाली हो गईं, लेकिन थोड़ी ही देर में लड़कियों का एक दल गया. जहां भी जगह मिली, लड़कियां बैठने लगीं. वे खिलाड़ी लग रही थीं और शायद कहीं खेलने जा रही थीं. ट्रेन आगे बढ़ रही थी और वे लड़कियां खिलखिला रही थीं.
वह अधेड़  अपने काले चश्मे के अंदर से उन्हें घूर रहा था. उस के पास एक काफी स्मार्ट लड़की बैठी थी. उस लड़की के बगल में एक पहलवान किस्म की उस की सहेली कविता बैठी थी, जो मर्दों की तरह बातें कर रही थी.

अपनी आदत के मुताबिक, अधेड़ दोबारा उस स्मार्ट लड़की से सटने लगा. उस ने अपना हाथ लड़की की जांघ पर रखा और फिरसौरीकह कर हटा लिया. इस के बाद भी वह छेड़छाड़ की लगातार कोशिश कर रहा था. अचानक कविता का ध्यान अधेड़ की हरकतों की ओर गया. वह बड़े ध्यान से उस की कारगुजारी देखने लगी. कुछ देर बाद उस ने जगह बदल ली. अब वह अधेड़ के पास बैठ गई.

एक स्टेशन पर भीड़ बढ़ी. कई ग्वाले दूध के डब्बे ले कर चढ़ आए. लोगों का ध्यान बंटा तो अधेड़ का हाथ दोबारा हरकत में गया. कभी हाथ कविता की जांघ पर पड़ता तो कभी कंधे पर. लेकिन कुछ देर बाद वह अधेड़ वहां से उठ गया और कुछ दूर सिंगल वाली सीट पर जा कर बैठ गया.

अरे, यह क्या? दर्द से उस के आंसू निकल आए थे. उस ने चश्मा उतार कर रूमाल से आंसू पोंछे. उस की हरकतें कविता देख कर मंदमंद मुसकरा रही थी. अधेड़ भी एक बेचारे की तरह कविता को देख रहा था.
बाकी किसी को कुछ पता नहीं था कि उन दोनों के बीच क्या हुआ. किसी का ध्यान भी उस ओर नहीं था, क्योंकि कोई शोरशराबा नहीं हुआ था.

अधेड़ बारबार अपनी जांघ सहला रहा था. वह खुद से सवाल कर रहा था, ‘क्या कोई देख रहा है? यह लड़की कौन है? क्या इसे पता चल गया था? अब कभी नहीं करूंगा ऐसा…’कुछ देर बाद वह अधेड़ उठा और दूर जा कर बैठ गया. अब उसे वह पहलवान टाइप की लड़की कविता नहीं दिखाई दे रही थी. वह मन ही मन उसे कोस रहा था. अब भी वह कुछ औरतों के पासही बैठा था, लेकिन उस का हाथ कहीं और नहीं, अपनी जांघ पर ही था. वह धोती के ऊपर से अपनी जांघ सहलारहा था,

जैसे बहुत दर्द हो रहा हो.कुछ देर बाद कविता अपनी सीट से उठी और उस अधेड़ की खोज में निकल पड़ी. एक सीट पर दुबका वह अधेड़ उसे दिखाई पड़ गया कविता ने मुसकरा कर मजाकभरे लहजे में उस अधेड़ से धीरे से पूछा, ‘‘क्या हुआ अंकल?’’ अधेड़ कुछ नहीं बोला. उस ने नजरें झुका लीं. कविता भी आगे कुछ नहीं बोली और वह अपनी सीट पर लौट आईवह अब भी मंदमंद मुसकरा रही थी.

कुछ देर बाद उन लड़कियों का स्टेशन गया. ट्रेन रुकी तो वे सब जल्दीजल्दी उतरने लगीं.
कविता उतरते समय अधेड़ से बोली, ‘‘बाय अंकल. जांघ में हल्दीप्याज गरम कर के लगा लीजिएगा.’’
कविता ट्रेन से उतर गई तो अधेड़ ने राहत की सांस ली. अभी इस सवाल का जवाब बाकी है कि अधेड़ ने अपनी सीट क्यों छोड़ी और पहलवान टाइप लड़की कविता ने उस का क्यों मजाक उड़ाया?
कविता ने फुरसत के पलों में खिलखिलाते हुए अपनी सहेलियों को बताया, ‘‘आज ट्रेन में बहुत मजा
आया. एक मनचले बुढ़ऊ को जम कर मजा चखाया.’’

‘‘कब? किसी को कुछ पता नहीं चला?’’ सहेलियों में से एक ने पूछा.‘‘हां. चुपचाप मजा चखाया. वह गोल्डी को छेड़ रहा था. मेरी नजर पड़ी तो मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं उसे डांट भी सकती थी, लेकिन उस के पास बैठ कर चुपचाप उस की जांघ पर बोरा सिलने वाले इस सूए के पिछले भाग को इतनी जोर से चुभाया कि उस के आंसू निकल आए.‘‘पोल खुलने के डर से वह कुछ कह भी नहीं सका. पूरा दर्द सह गया. असली मर्द होगा तो दोबारा ऐसी हरकत नहीं करेगा.’’

लड़कियां खूब जोर से हंसीं. गोल्डी बोली मुझे भी बहुत गुस्सा रहा था, लेकिन मैं कुछ बोली नहीं, पर तुम ने उसे सबक सिखा ही दिया.’’ ‘‘हां. मैं यह सूआ लिए रहती हूं और नुकीले भाग से नहीं, पीछे के हिस्से से
ही मनचलों की चीख निकाल लेती हूं. यह मेरा कारगर हथियार है. खून नहीं निकलता, लेकिन जान निकाल लेता है. इस सूए से मेरे पिता तेंदूपत्ते से भरे बोरे सिला करते थे. काम ऐसा करो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे,’’ 

कविता ने कहा.बाकी लड़कियां उस की तारीफ कर रही थीं. सुरेखा ने कहा, ‘‘बढि़या रहा सबक सिखाने का तुम्हारा तरीका. ये अधेड़ और बूढ़े लोग भी शर्मनाक काम करते हैं. अपनी मर्यादा भूल जाते हैं.’’

Hindi Kahani : औरत

Hindi Kahani. रिमझिम शादी के 4 साल में 2 बच्चों की मां बन गई. उस का पति अंजुम शराबी था और मारपीट भी करता था. रिमझिम इस जिंदगी से तंग गई और एक दिन उस ने अंजुम को ही धुन दिया. क्या वह अपनी शादी निभा पाई? उस के बच्चों का क्या हुआ?

कि सिरे से इस कहानी को शुरू करूंऋतुएं अपना वेश बदलती रहती हैं. बादलों के बीच झांकते कई अक्सर भी अपना रूप बदलते रहते हैं और सब से ज्यादा इनसान अपना बरताव बदलता रहता है.
18 साल की उम्र में ब्याह और फिर 20-22 साल की उम्र में 2 बच्चों की मां बन जाना, अल्हड़पन और जवानी रिमझिम के हिस्से में कभी नहीं आई. पति शराबी था. संयुक्त परिवार था. सब की बातों को सुनती, सहती. तानों को सहतेसहते उस का मन सब से उचाट हो गया था.

आज भी रिमझि को याद है ब्याह के चौथे दिन ही पति का गलत बरताव. रात के 11 बज रहे थे. अंजुम अभी तक घर नहीं लौटे थे. घर के सभी सदस्यों से रिमझिम पूछ चुकी थी. सभी का यही कहना था कि जाएगा कुछ देर में. रिमझिम का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. तभी दरवाजे की घंटी बजी. वह बेतहाशा दौड़ी और दरवाजा खोला, सामने अंजुम शराब के नशे में चूर था. उसे कुछ समझ  नहीं आया. रोते हुए बोली, ‘‘आप शराब पी कर आए हैं?’’

‘‘हां, पी कर आया हूं. तेरे बाप के पैसे की नहीं पी कर आया हूं,’’ इतना कह करान्नाटेदार थप्पड़ से रिमझिम का गाल लाल हो गया. रिमझिम की डबडबाई आंखों में अपने मातापिता का स्नेहिल चेहरा धुंधलाने लगा. उसे लगा कि अगर दीवार का सहारा नहीं लिया, तो वह चकरा कर वहीं गिर जाएगी.
तभी ससुर दौड़ कर आए और रिमझिम को सास के पास बैठा कर अंजुम के पास चले गए.
सास ने कहा, ‘‘अब तुम्हें ही इसे संभालना है बहू. बहुत पीताखाता है.’’

‘‘आप लोग जान रहे थे तो इन की शादी क्यों कराई?’’ रिमझिम की बेबसी उस की आंखों से बह रही थी.
‘‘जी छोटा मत करो, कोई कोई रास्ता निकल आएगा. तुम गई हो, अब सब संभाल लोगी,’’ सास
की रुंधी हुई आवाज रिमझिम को असमय ही मैच्योर हो गई. मारपीट, गालीगलौज अब रोज की बात हो गई थी.

एक दिन अंजुम दिन में ही पी कर गया. बच्चे घर में ही थे. रिमझिम बच्चों को ले कर ऊपर के कमरे में
चली गई.कुछ देर बाद अंजुम आया और दहाड़ते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे से बगैर पूछे ऊपर आने की? बकरा लाया हूं. जाओ, उसे पकाओ. और हां, मेरे 4 दोस्त भी साथ में हैं.’’ रिमझिम बच्चों के सामने किसी तरह का बखेड़ा नहीं चाहती थी. वह चुपचाप नीचे चली गई. अंजुम भी साथ में गया और बच्चे भी.

रसोईघर में नम आंखों से रिमझिम प्याज काटने लगी कि तभी अंजुम उसे पकड़ कर बोला, ‘‘रो रही हो? बकरा बनाने को बोल दिया इसलिए?’’ रिमझिम गुस्से से अंजुम को देखने लगी. अंजुम बोला, ‘‘आंखें नीची कर बेशर्म औरत.’’ लेकिन रिमझिम अंजुम को उसी तरह देखती रही.

तभी अंजुम बालों से पकड़ कर रिमझिम को घसीटने लगा. बच्चे सहमे हुए दरवाजे से छिप कर देख रहे थे.
रिमझिम अपने ही बच्चों के सामने यह बेइज्जती सहन नहीं कर पाई. वह अचानक शेरनी की तरह झपटी और अंजुम को वहीं पटक कर घूंसे मारने लगी. वह चिल्लाती जा रही थी, ‘‘देख मेरी हिम्मतदेखना चाहता था . बहुत हो गया तुम्हारा वहशीपन, अब मैं दिखाऊंगी बगैर पीए अपना वही रूप.’’
अंजुम का नशा कपूर की तरह उड़ गया था. सास ससुर, जेठ जेठानी सभी आवाज सुन कर गए. ससुर की कड़कड़ाती आवाज सुनाई दी, ‘‘यही कमीनी है. इसी के चलते घर में कलह हो रही है.’’

इतना सुनते ही रिमझिम दहाड़ उठी, ‘‘अभी तक मैं ही कलह कर रही थीहै ? आप का बेटा संस्कारी है. जब मैं पीटी जाती थी, तब तो आप लोग खामोश रहे और आज जब मैं अपने लिए आवाज उठा रही हूं, तो आप सब की निगाह में कमीनी हो गई.’’

‘‘चुप कर बेशर्म औरत, आज तक तेरे जैसी औरत कहीं नहीं देखी. बेहया कहीं की. अंजुम ठीक करता है. अगर तुम्हारे ऊपर लाठीडंडा चले, तो तुम बेहयाई पर उतर आओगी.’’ तड़प कर रिमझिम उठी और हाथ का डंडा ससुर पर फेंक मारा. सारे लोग अवाक से ताकते रह गए.

‘‘अंजुम, तुम अपना परिवार ले कर अलग हो जाओ. मुझे से अब यह सब बरदाश्त नहीं होगा,’’ ससुर धीमी आवाज में बोले.‘‘एक शर्त पर, घर मेरे नाम पर होगा,’’ रिमझिम की हठी आवाज हवा में तैर गई.
बंटवारा हो गया. अंजुम अपने परिवार के साथ इस घर में गया, पर पीना नहीं छूटा और ही छूटी मारपीट.

जेठ के बेटे की शादी थी. रिश्तेदारों की भीड़ से घर अटा पड़ा था. रात 9 बजे रिमझिम सब को खाना खिला रही थी. अंजुम आया और उस का हाथ पकड़ कर खींचने लगा. रिमझिम ने झटके से
हाथ छुड़ा लिया कि तभी हवा में लहराता हाथ उस के गालों पर पड़ा. वह गुस्से में बदहवास अंजुम पर टूट पड़ी. गुस्से से दांत किटकिटाते हुए बोली, ‘‘संभल जाओ अंजुम, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा.’’ परिवार के कुछ लोग कर रिमझिम को साथ ले गए.

4 सासों के बीच रिमझिम बैठी थी.
‘‘बहू तुम ने अच्छा नहीं किया अपने पति को मार कर. हमारे धर्म में पति पर हाथ उठाना पाप है. जिस पति की लंबी उम्र के लिए तुम तीजत्योहार करती हो उस को तुम कैसे मार सकती होतुम्हें नरक में भी जगह नहीं मिलेगी.’’

‘‘नरक की भी चाह नहीं रही अब मेरी. इस से बुरा और क्या हो सकता है किसी के लिए. 25 साल से जुल्म सहती आई हूं. अब नहीं और कभी नहीं,’’ रिमझिम की मजबूत, लेकिन कांपती आवाज सुनाई दी.
‘‘बेलगाम हो गई है रिमझिम,’’ उस की अपनी सास ने धीरे से कहा.

समय रेत की तरह फिसलता रहा. बच्चों को एक खास माहौल में रखने की जिद में रिमझिम जिद्दी से और जिद्दी होती गई. उस के दोनों बच्चे काबिल थे. अच्छी परवरिश और रिमझिम के दिए संस्कार से बड़ा बेटा डाक्टर और छोटा बीडीओ बन गया.

बच्चों के बड़े पद पर जाते ही सारे रिश्तेदारों की नजरों में रिमझिम के लिए एक खास जगह बन गई. ससुर भी अपनी बहू के कायल हो गए, पर रिमझिम के दिल में किसी के लिए कोई इज्जत नहीं बची थी. वह सब को आदरस्नेह देती थी, पर दिल के अंदर अजीब से भाव भरे हुए थे.

बड़े बेटे की शादी की तैयारी में बिजी रिमझिम खुद सबकुछ कर रही थी. उसे रिश्तेदारों का कोई सहयोग नहीं चाहिए था. बेटे को देखती और बलिहारी जाती. उस के लिए अपने बच्चों की खुशियों से ज्यादा कुछ नहीं था. सास बनने की चाह उस के चेहरे पर अनूठी मुसकान बिखेर रही थी.अंजुम में बदलाव आया था, पर अकड़ अभी भी बाकी थी. शराब कम हुई थी, पर पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी.

रिमझिम नहीं चाहती थी कि बेटे की शादी में कोई भी शराब पी कर माहौल को खराब करे. सब से ज्यादा तो डर उसे अपने पति से ही था. आज शाम बेटे की बरात जानी थी. रिमझिम का मन अजीब सी उथलपुथल से भर रहा था. उस ने मन ही मन एक फैसला लिया.दोपहर के 2 बज रहे थे. रिमझिम अपने पति के पास गई और बोली, ‘‘बारात में कोई शराब पी कर नहीं जाएगा.’’

‘‘तुम बावली हो गई हो क्या? पीनापिलाना हमारी शान है,’’ अंजुम ने कहा. ‘‘पत्नी को पीटना और बच्चों को दुत्कारना भी शायद आप के लिए शान की बात है, है ?’’ ‘‘उन सब बातों को अभी भूल जाओ रिमझिम. वैसे तुम किसकिस को रोकोगीअगर ऐसा करोगी तो शायद कोई बरात में ही नहीं जाए.’’
‘‘ जाए कोई. मुझे  फर्क नहीं पड़ता. पर शराब पीकर कोई नहीं जाएगा और यही मेरा आखिरी फैसला है. बच्चे भी सहमत हैं मुझे से,’’ रिमझिम ने अपनी बात रख दी. अंजुम अजीब उलझन में फंस गया. दोस्त और कई रिश्तेदार बगैर शराब कहीं जाते ही नहीं. दोस्तों तक बात पहुंची. उन्हें ?ाटका लगा.

एक दोस्त ने ताना कसा, ‘‘तुम मेहरारू भक्त हो गए हो क्या अंजुम? तुम उन की बात क्यों मानोगे? मालिक तो तुम हो. तुम जैसा चाहोगे भाभीजी को वैसा ही करना होगा. औरतों का घर पर राज नहीं चलना चाहिए. आओ, पी कर चलते हैं. देखते हैं कि भाभीजी क्या कर लेंगी.’’ दोस्तों की हुंकार के सामने अंजुम भी शेर बन गया और शराब का दौर शुरू हो गया.

इधर शादी का लोकगीत का गीत गाया जा रहा था. रिमझिम की आंखें खुशी से नम थीं. मां को खुश देख कर विनय का भी मन खुशी  था. आज बरसों के बाद मां के चेहरे पर सुकून था. तभी अंजुम आया और दूल्हे के गाड़ी में बैठ गया. रिमझिम तमतमा उठी. अंजुम के मुंह से उठती शराब की बदबू उस की सांसों को मानो रोक रही थी.

अचानक रिमझिम दहाड़ी, ‘‘अंजुम, आप गाड़ी से नीचे उतरिए. आप बरात में नहीं जाएंगे और जिसजिस ने भी शराब पी है, वे अपनेअपने घर चले जाएं.’’
अंजुम गाड़ी से उतरा और तमतमाते हुए बोला, ‘‘बहुत गरमी चढ़ गई है शरीर में. सब उतार दूंगादेखता हूं कि कौन मुझे बैठने नहीं देता है…’’

अंजुम गाड़ी में बैठने गया कि तभी विनय ने गाड़ी का दरवाजा बंद कर लिया और बोला, ‘‘पापा, आप लोग बरात में नहीं जाएंगे.’’ ‘‘मैं तेरा बाप हूं,’’ अंजुम चीखा. ‘‘मैं सिर्फ मां का बेटा हूं.’’‘‘रिमझिम, मान जाओ. तकरीबन सभी ने पी रखी है. अगर तुम्हारी यही जिद रही तो इक्कादुक्का लोग ही बरात में जा पाएंगे और अगर अंजुम नहींगया तो शादी की रस्में कौन निभाएगा?’’ ससुर बोले.

ससुर का कहना भी रिमझिम ने ठुकरा दिया, ‘‘मैं निभाऊंगी. जैसे अभी तक बच्चों की परवरिश करती आई हूं. और रहा सवाल इक्कादुक्का लोगों के बरात में जाने का, तो यही बेहतर है. मेरी बहू के घर कोई भी नशेड़ी या गंजेड़ी नहीं जाएगा.’’ 
रिमझिम दूल्हे की गाड़ी में बैठ गई. गाड़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी. सभी हैरान हो कर एक औरत की हिमाकत और हिम्मत देखते रह गए. Hindi Kahani

लेखक – कात्यायनी सिंह             

  

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