Motivational Story : उस का गणित

Motivational Story. मनोज हर दिन जिस मिनी बस में बैठता था, उसी जगह से लक्ष्मी भी बस में बैठती थी. आमतौर पर वे एक ही बस में बैठा करते थे, मगर कभीकभार दूसरी में भी बैठ जाते थे.

उन दिनों उन के बस स्टौप से सिविल लाइंस तक का किराया 4 रुपए लगता था, मगर लक्ष्मी कंडक्टर को 3 रुपए ही थमाती थी. इस बात को ले कर उस की रोज कंडक्टर से बहस होती थी, मगर उस ने एक रुपया कम देने का जैसे नियम बना ही लिया था.

कभीकभार कोई बदतमीज कंडक्टर मिलता, तो लक्ष्मी को बस से उतार देता था. वह पैदल आ जाती थी, पर एक रुपया नहीं देती थी.

लक्ष्मी मनोज के ही महकमे के किसी दूसरे सैक्शन में चपरासी थी. एक साल पहले ही अपने पति की जगह पर उस की नौकरी लगी थी.

लक्ष्मी का पति शंकर मनोज के महकमे में ड्राइवर था. सालभर पहले वह एक हादसे में गुजर गया था.

लक्ष्मी की उम्र महज 25 साल थी, मगर उस के 3 बच्चे थे. 2 लड़के और एक लड़की.

एक दिन मनोज पूछ ही बैठा, ‘‘लक्ष्मी, तुम रोज एक रुपए के लिए कंडक्टर से झगड़ती हो. क्या करोगी इस तरह एकएक रुपया बचा कर?’’

‘‘अपनी बेटी की शादी करूंगी.’’ ‘‘एक रुपए में शादी करोगी?’’ मनोज हैरान था.

‘‘बाबूजी, यों देखने में यह एक रुपया लगता है, मगर रोजाना आनेजाने के बचते हैं 2 रुपए. महीने के हुए 60 रुपए और सालभर के 730 रुपए.  10 साल के 7 हजार, 3 सौ. 20 साल के 14 हजार, 6 सौ.

‘‘5 सौ रुपए इकट्ठे होते ही मैं किसान विकास पत्र खरीद लेती हूं. साढ़े 8 साल बाद उस के दोगुने पैसे हो जाते हैं. 20 साल बाद शादी करूंगी, तब तक 40-50 हजार रुपए तो हो ही जाएंगे.’’

मनोज उस का गणित जान कर हैरान था. उस ने तो इस तरह कभी सोचा ही नहीं था. भले ही गलत तरीके से सही, मगर पैसा तो बच ही रहा था.

लक्ष्मी को खूबसूरत कहा जा सकता था. कई मनचले बाबू और चपरासी उसे पाने को तैयार रहते, मगर वह किसी को भाव नहीं देती थी.

लक्ष्मी का पति शराब पीने का आदी था. दिनभर नशे में रहता था. यही शराब उसे ले डूबी थी. जब वह मरा, तो घर में गरीबी का आलम था और कर्ज देने वालों की लाइन.

अगर लक्ष्मी को नौकरी नहीं मिलती, तो उस के मासूम बच्चों का भूखा मर जाना तय था.

पैसे की तंगी और जिंदगी की जद्दोजेहद ने लक्ष्मी को इतनी सी उम्र में ही कम खर्चीली और समझदार बना दिया था.

एक दिन लक्ष्मी ने न जाने कहां से सुन लिया कि 10वीं जमात पास करने के बाद वह क्लर्क बन सकती है. बस, वह पड़ गई मनोज के पीछे, ‘‘बाबूजी, मुझे कैसे भी कर के 10वीं पास करनी है. आप मुझे पढ़ालिखा कर 10वीं पास करा दो.’’

वह हर रोज शाम या सुबह होते ही मनोज के घर आ जाती और उस की पत्नी या बेटाबेटी में से जो भी मिलता, उसी से पढ़ने लग जाती. कभीकभार मनोज को भी उसे झेलना पड़ता था.

मनोज के बेटाबेटी लक्ष्मी को देखते ही इधरउधर छिप जाते, मगर वह उन्हें ढूंढ़ निकालती थी. वह 8वीं जमात तक तो पहले ही पढ़ी हुई थी, पढ़नेलिखने में भी ठीकठाक थी. लिहाजा, उस ने गिरतेपड़ते 2-3 सालों में 10वीं पास कर ही ली.

कुछ साल बाद मनोज रिटायर हो गया. तब तक लक्ष्मी को लोवर डिविजनल क्लर्क के रूप में नौकरी मिल गई थी. उस ने किसी कालोनी में खुद का मकान ले लिया था. धीरेधीरे पूरे 20 साल गुजर गए.

एक दिन लक्ष्मी अचानक मनोज के घर आ धमकी. उस ने मनोज और उस की पत्नी के पैर छुए. वह उसे पहचान ही नहीं पाया था. वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई थी. उस का शरीर भी भराभरा सा लगने लगा था.

लक्ष्मी ने चहकते हुए बताया, ‘‘बाबूजी, मैं ने अपनी बेटी की शादी कर दी है. दामादजी बैंक में बाबू हैं. बेटी बहुत खुश है.

‘‘मेरे बड़े बेटे राजू को सरकारी नौकरी मिल गई है. छोटा बेटा महेश अभी पढ़ रहा है. वह पढ़ने में बहुत तेज है. देरसवेर उसे भी नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘क्या तुम अब भी कंडक्टर को एक रुपया कम देती हो लक्ष्मी?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘नहीं बाबूजी, अब पूरे पैसे देती हूं…’’ लक्ष्मी ने हंसते हुए बताया, ‘‘अब तो कंडक्टर भी बस से नहीं उतारता, बल्कि मैडम कह कर बुलाता है.’’

थोड़ी देर के बाद लक्ष्मी चली गई, मगर मनोज का मन बहुत देर तक इस हिम्मती औरत को शाबाशी देने का होता रहा. Motivational Story

Hindi Short Story : प्रतिदान

Hindi Short Story. छोटी बूआ जब अपनी ससुराल से भागीं, तो अचानक ‘कुलटा’ हो गईं. कई साल बाद एक दिन मेरा उन से सामना हुआ, तो सीना फख्र से चौड़ा हो गया. क्यों?

बरसों पहले एक दिन जब मैं अपने स्कूल से लौटा, तो घर में कुहराम मचा हुआ था. सभी लोग छोटी बूआ को कोसे जा रहे थे कि ‘कुलटा’ ससुराल छोड़ कर भाग गई. उस उम्र में मैं भागने का मतलब तो क्या जानता था, पर बूआ भाग भी लेती हैं, यह जान कर मुझे खुशी हुई थी.

धीरेधीरे लोगों ने बूआ को उसी तरह भुला दिया, जिस तरह नेता अपने चुनावी वादों को भुला देते हैं. न जाने मैं उन्हें क्यों नहीं भुला पाया. बचपन से ही मुझे छोटी बूआ से अजीब सा लगाव था.

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बरसों बाद मुझे गांव में डिगरी कालेज की इमारत की बुनियाद का पत्थर रखने के लिए न्योता दिया गया. उन दिनों मैं विदेश से छुट्टियों में घर आया था.

दरअसल, मुझ जैसे विदेशों में काम कर रहे कुछ भारतीयों की माली मदद से ही यह कालेज बनने जा रहा था, इसलिए कमिश्नर की अगवानी के लिए सरपंचजी मुझे भी डाकबंगला ले गए.

कमिश्नर कोई औरत हैं, यह जान कर मुझे हैरानी सी हुई.

‘‘जी, मुझे शोभा देवी कहते हैं,’’ कहते हुए कमिश्नर साहिबा ने हाथ आगे बढ़ा दिया, तो पलभर के लिए मैं हैरान रह गया. आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा, कटे बाल, सामने के बाल कुछ अधपके से, रेशमी साड़ी में वे इतनी प्यारी व रोबदार लग रही थीं कि नजरें हटाने को जी ही नहीं चाह रहा था.

जानपहचान होने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘सरपंचजी, आप चलिए, मैं इन के साथ कुछ जरूरी सलाहमशवरा कर के आती हूं.’’

सरपंच के वहां से जाते ही उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया, तो मैं बुरी तरह सकपका गया.

‘‘क्या बात है रे विशु, अपनी बूआ को भी नहीं पहचान सका?’’ यह कह कर उन की आंखें डबडबा आईं. मैं तो जैसे ठगा सा खड़ा था. ‘‘छोटी बूआ?’’ अचानक मेरे मुंह से निकला, तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया.

‘‘देख रे विशु, जब से मैं यहां आई हूं, तेरे बारे में ही पता कर रही थी. भैयाभाभी तो शायद मुझे से हमेशा के लिए रूठ गए हैं,’’ छोटी बूआ ने कहा.

‘‘नाम बदलने से इनसान नहीं बदल जाया करते…’’ उन्होंने आपबीती शुरू की, ‘‘तू तो तब काफी छोटा था. मुझ जैसी बाल विधवा पर ससुराल में क्याक्या जुल्म नहीं ढाए गए.

‘‘आखिर कब तक सहती. जब हिम्मत जवाब दे गई, तो एक दिन मौका पा कर ससुराल से भागी और बंबई जाने वाली गाड़ी में चढ़ गई. साथ में थोड़े गहने और रुपए रख लिए थे.

‘‘लेकिन बंबई के वीटी रेलवे स्टेशन पर उतरते ही मैं जिस्म के सौदागरों के हत्थे चढ़ गई. अगर वक्त साथ न देता, तो मैं आज किसी कोठे पर बैठी होती.

‘‘सरला देवी नाम की एक दिलेर औरत ने मुझे न केवल बदमाशों से बचाया, बल्कि मेरी लगन देख कर अपने घर पर भी रखा. मुझे सिविल सर्विस के इम्तिहान में कामयाब होने के लिए पूरी मदद की. उन्होंने कानूनी तौर पर मुझे गोद ले कर मेरा नाम भी बदल दिया… यह समझ लो कि एक तरह से मुझे समाज में सिर उठा कर जीने के लायक बना दिया.’’

‘‘पर बूआजी, इस गांव ने तो आप को सिवा रुसवाई और गालियों के कुछ भी नहीं दिया… आप की जगह मैं होता, तो यहां कभी वापस न आता.’’

‘‘नहीं रे विशु, यही तो गलत है. मैं तो चाहती हूं कि हर गांव में लड़कियों के लिए भी कालेज खुलें, औरतों के लिए कल्याण केंद्र खुलें, ताकि वे भी आजाद होने के लिए पढ़लिख सकें, ताकि मुझ जैसी किसी बाल विधवा को असहाय जिंदगी जीने या ससुराल छोड़ कर भागने के लिए मजबूर न होना पड़े. यही तो मेरा प्रतिदान होना चाहिए.’’

मैं डबडबाई आंखों से बूआ के पैर छूने के लिए झुक गया.

–प. विश्वनाथन ‘राचेकविपुरा’

Feel-Good Story in Hindi : मुरलीजी की कचौड़ी

Feel-Good Story in Hindi. मुरलीजी की कचौड़ी पूरे इलाके में अपने स्वाद के लिए मशहूर थीं. पर अब उन के बेटों ने वहां रैस्टोरैंट बना दिया. मुरलीजी को लगा कि कुछ तो गलत हो रहा है और इसी चिंता में वे बीमार हो गए. क्या गलत हुआ था?

मुरलीजी की कचौड़ी की दुकान शहर की छोटी, पर बहुत ही पुरानी दुकान थी. यह दुकान जितनी जगह में छोटी थी, उतनी ही मशहूरी में बहुत बड़ी थी. दुकान पर उन के नाम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, बस शहर के लोग उसे ‘मुरलीजी की कचौड़ी’ के नाम से जानते थे.

दुकान के बाहर खुद मुरलीजी कोयले की भट्ठी लगा कर गरम तेल की बहुत बड़ी कड़ाही में कचौडि़यां बनाते थे. वे कचौडि़यां बना कर बहुत बड़े बरतन में उन्हें डालते थे, जहां पर उन का बड़ा बेटा मोहन और नौकर पैसे ले कर कचौडि़यां पैक कर के ग्राहकों को देते थे. साथ में बहुत ही चटपटी चटनी भी देते थे. जो लोग वहीं दुकान पर खाना चाहते थे, उन्हें पुराने अखबार के कागज पर कचौड़ी के ऊपर चटनी डाल कर देते थे.

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ज्यादातर ग्राहक दुकान के बाहर खड़े हो कर कचौड़ी को बहुत चाव से स्वाद लेले कर खाते थे, क्योंकि दुकान के अंदर बैठने के लिए बहुत ही कम जगह थी. सिर्फ एक ही बैंच थी. दुकान पर हमेशा लंबी लाइन लगी रहती थी.

लाइन में खड़े लोग कचौडि़यां बनाते हुए मुरलीजी को बड़े ध्यान से देखते थे. वे गुंदे हुए मैदे के बड़े गोले को कटोरी बना कर उस में आलू का मसाला भरते थे, फिर दोबारा उस का गोला बनाते और दोनों हाथों से दबा कर तश्तरी जैसा आकार दे कर गरम तेल की कड़ाही में एकएक कर के डाल देते थे.

जब 50-50 कचौडि़यां एकसाथ कड़ाही में तलती थीं, तो वह छटा देखते ही बनती थी. कचौडि़यों की खुशबू आसपास फैलती थी और सड़क पर चलते हुए लोग उस खुशबू से खिंच कर वहां चले आते थे.

कई लोग तो कचौडि़यां पैक करा कर दूसरे शहरों में अपने सगेसंबंधियों को भेजते थे, क्योंकि वे कचौडि़यां दूसरे दिन और भी अपना स्वाद बरकरार रखती थीं और इसीलिए दिन में मुरलीजी हजारों कचौडि़यां बेचते थे. इस के चलते शाम तक उन की बड़ी मजबूत तिजोरी पैसों से भर जाती थी. पर उन्हें कभी भी पैसे का घमंड नहीं था, न ही इतनी छोटी दुकान चलाते हुए शर्म आती थी.

हालांकि, मुरलीजी के पास 2-3 बहुत बड़े बंगले थे और शहर में दूसरी जगह खरीदी गई दुकानें भाड़े पर दी हुई थीं, पर उन के दोनों बेटों को इस छोटी सी दुकान पर बैठ कर शर्म आती थी.

मुरलीजी ने अपने बेटों के लिए बहुत ही शानदार बंगला रहने को बनवाया था, पर दुकान जैसे 30 साल पहले थी, वैसे ही आज थी. उन के पास वाली बहुत बड़ी दुकान बिक रही थी और उस के ऊपर का हाल भी बिक रहा था. मुरलीजी ने अपने बेटों के कहने पर रैस्टोरैंट बनाने के लिए हाल समेत वह दुकान मुंहमांगे दामों पर खरीद ली.

बेटों ने उस रैस्टोरैंट में महंगा और शानदार फर्नीचर लगवाया और डिजाइनर टेबलकुरसियां भी रखवाईं. साथ में यूनिफौर्म वाले वेटर भी थे.

यह सारा आइडिया मुरलीजी के छोटे बेटे सोहन का था, जो दिल्ली में पढ़ कर आया था. दिल्ली में उसे अच्छी नौकरी मिली भी, पर तनख्वाह उस के पापा की दुकान की रोज की कमाई से काफी कम थी, इसीलिए उस ने 2-3 महीने नौकरी कर के छोड़ दी. इतने में तो शहर के अच्छे मकान का किराया भी मुश्किल से चुकाया जा पाता है.

मुरलीजी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. रैस्टोरैंट पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक दिन शहर के बड़ेबड़े लोगों को न्योता दे कर उस रैस्टोरैंट का उद्घाटन किया गया.

सुबह स्थानीय अखबार में पहले पन्ने पर इश्तिहार भी दिया गया. अमीर घर के लोगों के लिए यह अच्छा था, क्योंकि शहर में कोई बड़ा रैस्टोरैंट था भी नहीं. पर रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो छोटेमोटे ग्राहक रोजाना वहां नहीं आ पाते थे.

अब मुरलीजी को सिर्फ कैश काउंटर पर बैठना था और साथ ही रैस्टोरैंट पर नजर रखनी थी कि सभी को सर्विस बराबर मिल रही है या न. कचौडि़यां दुकान के पुराने नौकर बना रहे थे, साथ में उस के लिए 2-3 नए कुक भी रख लिए गए. वे कई बार कचौडि़यां बना कर गरम करने के लिए उन्हें बड़े ओवन में रख देते थे. अब हर काम दुकान की तरह न हो कर कंपनी की तरह होता था.

भट्ठी अब दुकान के पिछले भाग में लगा दी गई, क्योंकि इतने बड़े रैस्टोरैंट के आगे भट्ठी अच्छी नहीं लगती है. भट्ठी आगे नहीं थी, तो कचौडि़यों की खुशबू भी सड़क पर नहीं फैलती थी. लोग अब दुकान के आगे से आतेजाते, तो महसूस करते थे कि कुछ तो कमी है.

इस तरह से शाही अंदाज में खाना हो तो बड़ा बिल भी चुकाना पड़ेगा. रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो मिडिल क्लास ग्राहक वहां रोजरोज नहीं आ पाते थे. सामने एक बहुत बड़ा स्कूल था. उस में बहुत सारे बच्चे पढ़ते थे. पहले वे आधी छुट्टी होते ही काफी तादाद में कचौड़ी खाने आते थे.

उस समय पूरी सड़क ब्लौक हो जाती थी, इसीलिए मुरलीजी एक घंटा पहले ही कचौडि़यां बना कर रख देते थे और दूसरे ग्राहकों को आधी छुट्टी खत्म होने के बाद आने को कहते थे.

पहले कचौड़ी का जितना बिल होता था, उतनी तो अब रैस्टोरैंट में वेटर की टिप हो जाती थी. अब छोटेछोटे बच्चे रोज रैस्टोरैंट में बैठ कर कचौड़ी नहीं खा सकते ठें, क्योंकि इतना ज्यादा बिल देना उन के बस का नहीं था.

इस सब के बावजूद महंगा वाला रैस्टोरैंट अच्छा ही चल रहा था. हालांकि, अब वहां के खर्चे भी बहुत बढ़ गए थे, धीरेधीरे पहले जो कचौड़ी बेचने में मुनाफा रहता था, वह अब रैस्टोरैंट में नहीं रहा. मुरलीजी को पूरे दिन काउंटर पर बैठना और पैसे गिनना और शाम को हिसाब लगाना अच्छा नहीं लगता था. कह सकते हैं कि उन्हें मजा नहीं आ रहा था और न ही उन्हें ग्राहकों के चेहरे पर संतुष्टि दिख रही थी.

ऐसे ही 2-3 महीने निकल गए. एक दिन मुरलीजी बहुत ज्यादा बीमार हो गए. उन्हें जिंदगी में पहली बार हौस्पिटल में भरती कराया गया. उन के बहुत सारे टैस्ट हुए, पर डाक्टर को उन की बीमारी समझ  में नहीं आ रही थी. इस वजह से डाक्टर टैस्ट पर टैस्ट कराए जा रहे थे कि शायद कोई कहीं तकलीफ पकड़ में आए.

डाक्टर को मुरलीजी की बीमारी पकड़ में नहीं आई, पर मुरलीजी समझ  गए कि वे क्यों बीमार हो गए. उन्हें याद आया कि एक बार वे बिल बनाते समय पैसों को ले कर ग्राहक से ही उलझ  गए थे. वह बहुत पुराना ग्राहक था और सालों से दुकान आता रहा था, पर अब दूसरे शहर में नौकरी के चलते उस का कभीकभार आना होता था. वह ग्राहक जब भी घर आता, तो यहां से 100 के आसपास कचौडि़यां पैक करा कर अपने शहर ले जाता था.

वह ग्राहक इस बार मुरलीजी का यह रूप देख कर हैरानी में पड़ गया कि इस आदमी के चेहरे पर हमेशा ही मुसकराहट होती थी, पर आज झुनझुलाहट क्यों दिख रही है.

‘‘मुरलीजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ उस ग्राहक ने प्यार व अपनेपन से सिर्फ इतना ही पूछा.

मुरलीजी को हौस्पिटल के बिस्तर पर लेटेलेटे न जाने कितने ही ऐसे किस्से याद आने लगे. फिर एक दिन उन्हें हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई.

एक दिन जब दोनों बेटे सुबह 10 बजे रैस्टोरैंट पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उन के पापा पुरानी दुकान के आगे भट्ठी लगा कर कचौडि़यां तल रहे थे और उस की वही पुरानी खुशबू के चलते दुकान के आगे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी.

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आज दुकान में वैसा ही इंतजाम था, जैसा रैस्टोरैंट खोलने से पहले था. तमाम लोग हैरानी से दुकान की ओर बढ़ने लगे और देखने लगे कि आज खुद मुरलीजी कचौडि़यां बना रहे हैं. आज मुरलीजी के चेहरे पर वही पहले वाली रौनक थी.

लोग कानाफूसी करते हुए मुरलीजी से बात करने की कोशिश कर रहे थे, पर आज वे अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुन रहे थे. बस, किस ग्राहक को कितनी कचौडि़यां चाहिए, वही पूछ रहे थे और यह भी पूछ रहे थे कि कचौडि़यां पहले जैसी ही बनी हैं न?

दोनों बेटे अपने पापा को देख रहे थे, उन पर गुस्सा हो रहे थे, पर इतने ग्राहकों की भीड़ के सामने उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.

दोपहर को जब मुरलीजी थोड़े फ्री हुए तो छोटे बेटे सोहन ने कहा, ‘‘पापा, यह सब क्या है? इतना खर्च किया हम ने रैस्टोरैंट बनाने पर और आप…’’

मुरलीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘पंछी को पिंजरे में बंद हो कर जैसा लगता होगा, वैसा ही मुझे  लग रहा था. कह सकते हैं कि बहुत बुरा लग रहा था. शायद इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी में पहली बार बीमार हुआ.

‘‘मैं ने 40 साल से इसी तरह काम किया है और बंगले बनवाए, बैंक बैलेंस खड़ा किया. अब इस उम्र में मैं बदल नहीं सकता और न ही अपनेआप से कोई समझोता कर सकता हूं. मैं अगर पहले जैसा नहीं बना, तो शायद जी भी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘पर पापा, यह जो इतना बड़ा रैस्टोरैंट खोला है, इस का क्या करना?’’ बड़े बेटे मोहन को कुछ समझ  में नहीं आ रहा था.

‘‘बेटा, मैं तो इसलिए तैयार हुआ था कि तुम लोगों को एक छोटी सी दुकान में भट्ठी पर बैठने में शर्म आती है. गलती तुम्हारी नहीं है, क्योंकि तुम ने वह नहीं देखा, जो मैं ने देखा है. तुम लोग पढ़ेलिखे हो, तुम्हारी दोस्ती अच्छे पढ़ेलिखे लोगों से है. तुम लोगों ने शुरू से ही बंगलागाड़ी देखी है, शायद इसीलिए मैं ने रैस्टोरैंट खोलने के लिए तुम लोगों की बात मानी.

‘‘अब यह रैस्टोरैंट तुम लोग चलाओ. जो लोग फास्ट फूड खाना चाहते हैं, पंजाबी और विदेशी खाना खाना चाहते हैं और अच्छी कीमत देना चाहते हैं, उन्हें तुम संभालो. मैं अपनी कचौड़ी की दुकान में ही ठीक हूं.

‘‘मैं कचौडि़यां बनाऊंगा, क्योंकि इस रैस्टोरैंट के चलते मेरे बरसों पुराने कचौड़ी खाने वाले ग्राहक और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इस जगह से दूर हो चुके हैं, क्योंकि वे रोजरोज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं. न मेरी कचौड़ी खाने वाले खुश हैं और न ही मैं कचौड़ी बनाने वाला. पर आज हम दोनों ही खुश हैं,’’ लंबी लाइन देख कर वे खुशी से उठते हुए बोले.

इस पर सोहन ने कहा, ‘‘पापा, आप हमें माफ कर दो. हम ने आप को इस उम्र में बदलने की कोशिश की. पर जब हम इस उम्र में नहीं बदल सकते हैं, तो कैसे उम्मीद रखें कि आप को इस उम्र में बदल देंगे.’’  Feel-Good Story in Hindi

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