Funny Hindi Story : प्राण जाए पर…सामान न जाए

Funny Hindi Story. घुमरी बाबा किसी यजमान के यहां से श्राद्धभोज का खाना खा कर और साथ ही घर वालों के लिए गठरी में खाना बांध कर अपने घर को लौट रहे थे.

उन्होंने भोज में पूरी, सब्जी, दही, लड्डू, जलेबी वगैरह चीजें खूब डट कर खाई थीं. पेट निकल कर मटका हो गया था. हाथपैर भारी लग रहे थे.

घुमरी बाबा गहरी नींद सोते थे. भरपेट खाना खाने के बाद उन की आंखें खुलनी मुश्किल हो जाती थीं. बाबा का कहना था कि ‘मर कर टर जाओ और खा कर पसर जाओ’. उस दिन भी वे रास्ते में एक पेड़ की छांव में सिरहाने गठरी रख कर पसर गए और पलभर में खर्राटे भरने लगे.

घुमरी बाबा अभी कुछ ही देर तक सो पाए थे कि कहीं से एक सांड़ आ गया और बाबा की गठरी के पास पहुंच गया. उस ने गठरी समेत उस में रखा खाना चबा लिया.

गठरी चबाते समय उस में रखी जलेबी का रस बाबा की चुटिया पर गिर गया, इसलिए उस बेशर्म सांड़ ने बाबा की चुटिया भी चबानी शुरू कर दी.

बाबा की नींद खुली, तो सिरहाने सांड़ को देख कर वे घबरा गए और धीरेधीरे गुहार करने लगे, ‘‘दुहाई प्रभु, दुहाई, जान बचा लो…’’

सांड़ ने शायद बाबा की गुहार सुन ली. उस ने चूसी हुई चुटिया को उगल दिया व अलग हट कर खड़ा हो गया.

सांड़ के अलग हटते ही बाबा उसे कोसने लगे, ‘‘यह नीच सांड़ नहीं, कुत्ता है. सांड़ जाति के लिए कलंक है.’’

सांड़ कुछ ही देर बाद पागुर करने लगा. बाबा अब वहां से खिसकने की ताक में लग गए. उन्होंने देखा कि सांड़ का सारा ध्यान पागुर करने में लगा हुआ है. घुमरी बाबा धीरे से उठ कर खिसकते हुए गांव वाले रास्ते की ओर बढ़ते गए. कुछ देर बाद बाबा ने पलट कर देखा, तो सांड़ को अपनी ओर पीछेपीछे आता हुआ पाया.

घबरा कर बाबा दौड़ने लगे. वे दौड़ भी रहे थे और पलटपलट कर बारबार पीछे देख भी रहे थे. तभी अचानक वह एक कुएं में गिर पड़े.

बाबा काफी डर गए. उन्हें लगा कि अब बचना मुश्किल है. वे किसी तरह से हाथपैर मार कर अपने को बचाने की कोशिश करने लगे.

कुएं के आसपास कुछ किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे. कुएं में किसी के गिरने की आवाज सुन कर वे गुहार लगाते हुए वहां आ पहुंचे.

गांव के और लोग भी वहां कुएं के पास पहुंच गए. कुएं का पानी काफी ऊपर तक था. उस में से हाथ बढ़ा कर भी घुमरी बाबा को खींचा जा सकता था.

कुछ लोग बाबा को बांस और रस्सी के सहारे निकालना चाहते थे, मगर कमल काका ने हाथ से खींचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. तब तक बाबा के हाथपैर भी जवाब देने लगे थे.

लोग सोच रहे थे कि अब क्या किया जाए कि तभी नागा सिंह वहां आ पहुंचा. वह काफी लंबातगड़ा था. वह तुरंत घुटनों के बल बैठ गया और कुएं में हाथ लटका कर बोला, ‘‘बाबा, अपना हाथ दो. जल्दी से अपना हाथ दो.’’

नागा सिंह बराबर कह रहे थे, मगर बाबा ने अपना हाथ नहीं दिया. तभी बाबा के एक पड़ोसी को कुछ याद आया.

पड़ोसी ने नागा सिंह से कहा, ‘‘अरे नागा भाई, घुमरी बाबा पुरोहिती करने वाले पंडित हैं. जिंदगीभर उन्होंने केवल लिया है, दिया नहीं. देने के नाम पर उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है. वह मर जाएंगे, मगर कुछ देंगे नहीं. उन्हें अगर बचाना है, तो कहो कि बाबा, आप मेरा हाथ लो.’’

नागा सिंह ने कहा, ‘‘बाबा, आप मेरा हाथ लो, जल्दी मेरा हाथ लो…’’ और सचमुच बाबा ने लपक कर नागा का हाथ पकड़ लिया.

नागा सिंह ने सहीसलामत बाबा को कुएं से बाहर निकाल लिया. बाबा ने कुएं में से निकल कर किसी को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि इधरउधर ताकते हुए गाली दी, ‘‘कहां है वह सांड़ का पिल्ला? वह नीच, मेरा सब माल खा गया. पूरी, सब्जी, लड्डू, जलेबी के साथ गमछा भी खा गया.’’ Funny Hindi Story

Funny Story in Hindi : पत्नी का स्वच्छता अभियान

Funny Story in Hindi. उस दिन सुबहसुबह अपनी पत्नी की कोयल जैसी आवाज सुन कर मैं चौंक गया कि हर पल शेरनी जैसी दहाड़ने वाली मेरी श्रीमतीजी में यह कायापलट कैसे हो गया?

वे प्यार भरी आवाज में बोलीं, ‘‘अजी उठिए और गरमागरम चाय पीजिए.’’

मेरी आंखों को विश्वास ही नहीं हुआ कि ये मेरी ही धर्मपत्नी हैं.

मैं ने डरतेडरते पूछ ही लिया, ‘‘प्रिय, क्या तुम सचमुच मेरी पत्नी ही हो या मैं कोई सपना देख रहा हूं?’’

‘‘हांहां, मैं तुम्हारी ही धर्मपत्नी हूं. चलिए, जल्दी से चाय पी कर फारिग हो जाइए और घर के सारे काम निबटा दीजिए,’’ मेरी ‘स्वीटहार्ट’ मेरे गले में अपनी बांहें डालते हुए बोलीं.

मैं ने किसी अच्छे आज्ञाकारी कुत्ते की तरह अपनी दुम हिलाते हुए कहा, ‘‘ओके डार्लिंग, जब तुम आज हम पर इतनी मेहरबान हो, तो समझो कि घर का सारा काम भी हो ही गया.’’

मेरी महबूबा जोरजोर से हंसते हुए बोलीं, ‘‘यह हुई न मर्दों वाली बात.’’

हमारी सारी पड़ोसनें भी इसलिए तो जलीभुनी रहती हैं कि उन के ‘मर्द’ घर के किसी काम में हाथ नहीं डालते हैं, जबकि मैं हर रोज पत्नी के काम में हाथ बंटाता रहता हूं.

इस के बाद मेरी अप्सरा जैसी पत्नी ने किसी जासूस की तरह राज उगलते हुए कहा, ‘‘आज से मैं अपने महल्ले में ‘स्वच्छता अभियान’ की शुरुआत करूंगी, क्योंकि गलीगली में शोर है कि ‘स्वच्छ भारत’ बनाने के लिए साफसफाई अभियान रफ्तार पकड़ रहा है.’’

मैं ने अपनी समझदार बीवी का आइडिया सुना, तो हैरान रह गया. जिस औरत को टैलीविजन देखने, क्लब जाने का चसका लगा हो, उस के लिए अपने घर को साफसुथरा रखना बहुत मुश्किल काम है.

मैं बुदबुदाया, ‘जेब में नहीं धेला, चढ़ना रेला.’ मतलब, जेब में पैसा नहीं और सफर करना रेल का. अपने घर के अंदरबाहर चाहे गंदगी पसरी हो, पर सनक चढ़ी है महल्ले में ‘स्वच्छता अभियान’ में कुछ करदिखाने की.

मैं ने अपनी स्वप्नसुंदरी पत्नी को टोकते हुए पूछा, ‘‘डार्लिंग, क्या तुम अकेले ही पूरा महल्ला साफ करोगी?’’

‘‘नहींनहीं, मैं अकेले ही इस गंदगी में हाथ नहीं डालूंगी, बल्कि महल्ले की जो औरतें अपना टाइमपास करने के लिए एकदूसरे के घरों में सेंध लगा कर पारिवारिक रिश्तों को तोड़ने में माहिर हैं, उन को एक मंच दिया जा रहा है और मैं उन की रिंग लीडर हूं,’’ मेरी पत्नी किसी पहलवान की तरह अपनी छाती ठोंकते हुए बोलीं.

मुझे अपनी पत्नी की इन बचकानी हरकतों को जान कर बड़ी कोफ्त हुई. मैं फिर बुदबुदाया, ‘पता नहीं, घर में अब कौन सा जलजला आने वाला है.’

मेरी पत्नी मेरा चेहरा देख कर कहने लगीं, ‘‘शायद तुम मेरी कामयाबी के मनसूबे जान कर जलने लगे हो. आखिर मर्द हो न तुम… सारी की सारी अक्ल तुम्हीं में ही है.’’

मैं ने अपनी बीवी को प्यार से समझाया, ‘‘बेगम साहिबा, बड़ी मुश्किल से तुम मेरी जिंदगी में आई हो, फिर ऐसी दिल तोड़ने वाली बातें कर के क्यों मेरी लानतमलानत कर रही हो? आखिर तुम मेरी चांद जैसी खूबसूरत महबूबा हो.’’

थोड़ी देर बाद तिल का ताड़ बनाने वाली मेरी पत्नी जींस व टीशर्ट पहन कर हाथ में झाड़ू पकड़े हुए आईं और कहने लगीं, ‘‘सचसच बताओ कि मैं अब कैसी लग रही हूं?’’

मेरा दिल किया कि पत्नी को डांटते हुए कहूं, ‘तुम ‘स्वच्छता अभियान’ में जा रही हो या किसी फूहड़ मौडलिंग शो में?’ पर अपने दब्बू स्वभाव से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह अपने ‘मन की बात’ नहीं कह सका.

तभी बाहर आंगन में बड़े जोर का शोर सुनाई दिया. महल्ले की वे औरतें जो महल्ले की गंदगी को साफ करने जाने वाली थीं, हमारे ही घर की ओर कूच कर रही थीं. साथ ही साथ बैनर व गत्तों पर लिखे नारों का शोर भी बड़ा कानफाड़ू था. ‘गलीगली में शोर है, साफसफाई का जोर है’, ‘जब तक सूरजचांद रहेगा, ‘सफाई अभियान’ का नाम रहेगा’, ‘जब भी नारी ने झाड़ू को उठाया, गंदगी ने सिर नहीं उठाया’, ‘मर्दों को हम देतीं ललकार, औरतों पर न करो अत्याचार’ वगैरह.

तभी मेरी पत्नी ने उन सब पड़ोसनों को कुछ टिप्स दिए कि ‘स्वच्छता अभियान’ को इस ढंग से चलाना है कि मीडिया व दूसरे लोगों को लगे कि सचमुच ही औरतें साफसफाई के प्रति गंभीर हैं. फिर कल जब चहुंओर हमारी चर्चा होगी, तो देखना कि कोई इस गांव को भी गोद ले लेगा. अखबारों में फोटो छपेंगे सो अलग.

इस के बाद वे सभी जब घर से चली गईं, तो मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगा कि पता नहीं मेरी जानलेवा बीवी कौन सा करिश्मा कर के आ जाएंगी कि मेरी बचीखुची जिंदगी भी समाज के लोगों के ताने सुन कर नासूर बन जाए.

मुझे तो दिनभर अपने दफ्तर में भी बौस की खरीखोटी सुननी पड़ती है, जबकि मेरे साथी पीठ पीछे यह कहने से नहीं चूकते हैं, ‘बेचारा क्या करे, यह तो जोरू का गुलाम है.’

दफ्तर से घर आओ, तो काम के बोझ के मारे वैसे ही दम निकल जाता है. और तो और घर का काम भी मेरे कंधों पर टिका है. बस, किसी तरह पत्नी खुश रहे, इसी गम में हर रोज मरताखपता रहता हूं. अगर किसी के पास इस समस्या से निबटने का इलाज है, तो जरूर बताए. Funny Story in Hindi

Hindi comedy story: सवाल 2 रुपए का

Hindi comedy story. यह बात उन दिनों की है, जब महंगाई ज्यादा नहीं थी. महज 10 रुपए में आधा किलो दही आ जाता था. राजनगर नाम के एक महल्ले में रमानाथ नाम के एक रिटायर प्रोफैसर छोटे से मकान में अकेले रहते थे. वे बहुत ही सीधे, सरल, परंतु भुलक्कड़ स्वभाव के थे. वे हर समय किसी न किसी खयाल में खोए रहते थे.

एक दिन की बात है. रात के 8 बजे वे खाना खाने बैठे तो देखा कि दही नहीं है. फिर क्या था? वे हाथ में डब्बा और जेब में 10 रुपए का नोट ले कर बाजार की ओर चल पड़े.

डेरी की दुकानें अकसर जल्दी बंद हो जाती हैं. रमानाथजी बाजार में बहुत घूमे, पर सभी दुकानें बंद हो चुकी थीं. आखिर में उन्हें एक दुकान खुली मिल ही गई. दुकान वाला दुकान बंद कर ही रहा था कि रमानाथजी वहां पहुंच गए.

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‘‘भाई साहब, आधा किलो दही दे दीजिए,’’ रमानाथजी ने दुकानदार के हाथ में डब्बा देते हुए कहा.

‘‘बाबूजी, दही आधा किलो से कुछ कम है… 8 रुपए दे दीजिए,’’ दुकानदार ने डब्बे में दही डालते हुए कहा.

‘‘ठीक है, यह लीजिए 10 रुपए का नोट.’’

‘‘बाबूजी, 2 रुपए तो छुट्टे नहीं हैं. कल सुबह आप बाजार में सब्जियां खरीदने आएंगे, तो अपने 2 रुपए ले लीजिएगा.’’

‘‘ठीक है, कोई बात नहीं. 2 रुपए कल ले जाऊंगा,’’ रमानाथजी ने दही का डब्बा पकड़ कर जाते हुए कहा.

अचानक वे रुके, पीछे मुड़ कर सोचने लगे, ‘मैं भुलक्कड़ हूं. दुकान कहां है, जरा निशान तो देख लूं…

‘हां, दुकान के सामने एक सफेद सांड़ बैठा जुगाली कर रहा है. दुकानदार 60 साल का बूढ़ा है. उस के सिर पर एक भी बाल नहीं है. चेहरे पर दाढ़ीमूंछ भी नहीं है. कुलमिला कर आलू की तरह चिकना.’

रमानाथजी घर पहुंचे, खाना खाया और सो गए. फिर वे सुबह उठे, नहाएधोए, चाय बना कर पी और अखबार देखने लगे. अचानक उन्हें 2 रुपए का खयाल आया.

गरमी के दिन थे. कंधे पर छतरी लटका कर रमानाथजी घर से निकल पड़े. वे बाजार में बहुत घूमे, पर उन्हें आलू की तरह चिकने सिर वाला कोई दुकानदार नहीं मिला. तब उन्हें याद आया कि दुकान के सामने सफेद सांड़ बैठा था.

रमानाथजी सांड़ की तलाश में बाजार में घूमने लगे. सूरज सिर पर आ गया था. धूप तेज होने लगी थी. प्यास से गला सूख रहा था. एक होटल में उन्होंने 10 रुपए का चायनाश्ता कर लिया. इस तरह 10 रुपए का चूना लग गया. मगर वह कमबख्त सांड़ कहां मर गया? रमानाथजी माथे का पसीना पोंछते हुए सोच रहे थे.

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सुबह होते ही सांड़ उठ कर सब्जी मंडी में मुंह मारने चला गया था. सब्जियां खाखा कर उस का पेट भर गया और दुकानदारों के डंडे खाखा कर उस की मोटी चमड़ी में जलन होने लगी. ऊपर से धूप भी तेज हो गई थी. तब वह एक नीम के पेड़ की छाया में बैठ कर जुगाली करने लगा. वहां नाई की दुकान थी. नाई की दाढ़ीमूंछ और सिर के बाल बढ़े हुए थे.

‘‘मिल गया सांड़, मिल गया. अब मैं दही वाले दुकानदार से 2 रुपए मांग लूंगा…’’ खुशी से चहकते हुए रमानाथजी नाई की दुकान में चले गए.

नाई को एक ग्राहक की हजामत बनाते देख रमानाथजी हैरानी से बोले, ‘‘वाह बेटा, जिंदगी में पहली बार देख रहा हूं कि एक रात… केवल एक रात में आलू जैसा चिकना सिर भालू बन गया है.’’

‘‘साहब, आप साफसाफ बोलें. यह आलू और भालू की भाषा मेरी समझ में नहीं आ रही है,’’ नाई ने कहा.

‘‘ऐ मिस्टर, मेरे 2 रुपए निकालिए,’’ रमानाथजी बोले.

‘‘2 रुपए… साहब, क्या आप चंदा मांगने आए हैं?’’

‘‘जी नहीं, रात को मैं ने 8 रुपए का दही खरीदा था. मैं ने आप को 10 रुपए का नोट दिया था. रात को आप के पास छुट्टा नहीं था. सो, अब मैं 2 रुपए लेने आया हूं.’’

‘‘आलू, भालू, दही, 2 रुपए… क्या है यह सब… लगता है, मैं पागल हो जाऊंगा,’’ नाई ने अपने सिर के बाल खुजाते हुए कहा.

‘‘घोर कलयुग आ गया है… अरे, आप ने केवल 2 रुपए मारने के लिए रातोंरात अपना धंधा ही बदल दिया. दाढ़ीमूंछ और सिर के बाल बढ़ा लिए. इतना ही नहीं, 60 साल का बुढ़ापा छोड़ 40 साल का जवान बन गए.

‘‘हाय रे घोर कलयुग, नीम के नीचे बैठा सांड़ सुबूत है कि मैं सच बोल रहा हूं,’’ रमानाथजी हैरानी से बाहर देखते हुए बोले.

रमानाथजी के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि वहां अब सांड़ नहीं था. वे झट बाहर निकल कर बोले, ‘‘अरे, अभी तो यहां सांड़ बैठा हुआ था. लगता है, मुझे भरम हो गया था. बेकार ही तुम्हें बेईमान कह दिया.’’

रमानाथजी फिर से सांड़ की तलाश में धूप में छतरी लगा कर घूमने लगे. वे भूखप्यास से बेहाल हो गए. फिर से 10 रुपए का नाश्ता किया.

अब धूप में चलना मुश्किल था. रमानाथजी ने घर जाने के लिए 10 रुपए का रिकशा किया. रिकशा उन के घर की ओर चल पड़ा. वे मन ही मन अपने को कोसने लगे, ‘केवल 2 रुपए के लिए 30 रुपए का चूना…’

अचानक रिकशे वाले को उन्होंने रुकने को कहा. एक मकान के नीचे सांड़ आराम कर रहा था. वह नेताजी का मकान था. चमचों से घिरे नेताजी गद्दी पर बैठे चुनाव की बातें कर रहे थे कि रमानाथजी वहां पहुंच गए.

‘‘कहिए मतदाता महोदय, मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं? महल्ले में पक्की नालियों का इंतजाम, बिजली, नल…’’ नेताजी बोले.

‘‘नेताजी, अब मैं क्या कहूं? आप तो आप हैं. जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों डकारने वाला केवल 2 रुपए मार सकता है? नहींनहीं, वह दही वाला कोई और ही था. अब मैं नहीं कहूंगा कि एक दही बेचने वाला रातोंरात नेता बन गया. वह भी केवल 2 रुपए मारने के लिए.

‘‘जाइए, आप पर 2 रुपए छोड़ दिए. नमस्कार,’’ रमानाथजी जल्दी से निकलते हुए बोले.

नेताजी और उन के चमचे कुछ समझ नहीं पाए और वे सब रमानाथजी को देखते रह गए.

रमानाथजी सांड़ की ओर देखते हुए रिकशे में बैठ गए. वे सोच रहे थे, ‘मुझे 30 रुपए की बरबादी का गम नहीं है. मुझे तो केवल 2 रुपए नहीं मिलने का दुख ज्यादा है.

Funny Hindi Story : हाईटैक

Funny Hindi Story. जयपुर को ‘गुलाबी नगरी’ के रूप में जाना जाता है. गरीब दास को इस गुलाबी नगरी का एक और रंग नजर आया और वह रंग सुनहरा है. यह रंग कोई साधारण रंग नहीं, बल्कि हाईटैक रंग है.

हुआ यों कि कल वे दफ्तर से घर जा रहे थे. किंग्स रोड से गुजरते हुए एक ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें रुकने का इशारा किया.

गरीब दास ने अपनी मोटरसाइकिल को सड़क किनारे ला कर खड़ा किया.

‘‘क्या बात है?’’ उन्होंने सिपाही से पूछा. ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार इतनी ज्यादा क्यों थी?’’ उस सिपाही ने सवाल के जवाब में सवाल किया.

‘‘रफ्तार तो ज्यादा नहीं थी. मैं खुद ही ज्यादा रफ्तार से नहीं चलता. हो सकता है, थोड़ी ज्यादा हो गई हो. दरअसल, मोटरसाइकिल का स्पीडोमीटर आज ही खराब हो गया है,’’ गरीब दास ने वजह बताई.

‘‘निकालो 8 सौ रुपए,’’ सिपाही ने आदेश किया. गरीब दास को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा. 8 सौ रुपए तो क्या, उन के पास सौ रुपए का ही एक नोट था.

‘‘सिपाहीजी, मुझे माफ कीजिए. अभी ट्रैफिक कम है, इसलिए थोड़ी रफ्तार बढ़ गई होगी. मैं आगे से ध्यान रखूंगा,’’ गरीब दास मिमियाए.

‘‘जाओ, साहब से बात करो,’’ सिपाही ने एक ओर इशारा किया. गरीब दास ने देखा कि साहब वरदी में सजे जिप्सी से सटे हुए खड़े थे.

गरीब दास साहब के पास पहुंचे और अपनी समस्या बता कर माफ करने को कहा. साहब ने उन्हें अपने पीछे आने को कहा और जिप्सी के पीछे ले जा कर उस में बैठे एक और सिपाही के जिम्मे कर दिया.

सिपाही ने उन्हें पहले तो घूरा और जिप्सी में रखे कंप्यूटर के स्क्रीन पर देखने को कहा. गरीब दास ने स्क्रीन पर देखा. उन्होंने स्क्रीन पर खुद को मोटरसाइकिल से आते हुए देखा.

वे इस नजारे को देख कर सपनों में जाने ही वाले थे कि सिपाही ने स्क्रीन के उस भाग को दिखाया, जो उन की मोटरसाइकिल की रफ्तार को दिखा रहा था. उन की मोटरसाइकिल 42 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से जा रही थी, जबकि तय रफ्तार 40 किलोमीटर प्रति घंटा थी.

उस सिपाही ने गरीब दास से पूछा, ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार तय रफ्तार से ज्यादा क्यों है?’’

‘‘लेकिन यह तो सिर्फ 2 किलोमीटर ही ज्यादा है. आगे से मैं खयाल रखूंगा,’’ गरीब दास बोले.

इस बीच गरीब दास ने देखा कि कुछ मोटरसाइकिलें तो इतनी तेज रफ्तार से जा रही थीं कि उन की रफ्तार किसी भी हाल में 60 किलोमीटर प्रति घंटा से कम न होगी. पर पता नहीं क्यों उन को रोकने की जरूरत वे पुलिस वाले नहीं समझ  रहे थे.

इस के अलावा कई गाडि़यां बहुत ज्यादा धुआं भी छोड़ रही थीं. कुछ गाडि़यां तो ट्रैफिक के सही ढंग से चलने में रुकावट भी पहुंचा रही थीं, पर इस से भी ट्रैफिक वालों पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

उन की निगाहें 2 तरह के लोगों पर ज्यादा टिकी थीं. पहले वे दोपहिया चलाने वाले, जो हैलमैट नहीं पहने थे और वे कार चालक, जो सीट बैल्ट नहीं बांधे हुए थे. इस तरह के लोग उन के लिए आमदनी का अच्छा जरीया थे.

गरीब दास हैलमैट पहने हुए थे. इस के बावजूद उन्हें रोका गया था, तो शायद इस की वजह उन की मोटरसाइकिल का नंबर था, जो किसी और राज्य का था, जहां से गरीब दास तबादला हो कर आए थे. बाहरी राज्य के सवार भी ट्रैफिक पुलिस के लिए आसान शिकार होते हैं.

‘‘अब आप का चालान होगा और कोर्ट से आप गाड़ी छुड़ा लेना,’’ सिपाही ने कहा.

यह सुन कर गरीब दास बेचैन हो गए. कोर्ट का चक्कर? बाप रे बाप, अब क्या किया जाए?

उन की दिमागी हालत को देख कर सिपाही समझ  गया कि लोहा गरम हो गया है, हथौड़ा चलाने का यही सही समय है.

‘‘4 सौ रुपए निकालो, चालान भी नहीं करूंगा और सारे रिकौर्ड्स भी डिलीट कर दूंगा,’’ सिपाही ने कहा.

‘‘पर मेरे पास 4 सौ रुपए नहीं हैं,’’ रोंआसा होते हुए गरीब दास ने कहा.

‘‘अच्छा, चलो 2 सौ रुपए दे दो,’’ सिपाही झुंझला कर बोला. उसे दूसरे ग्राहकों को भी देखना था, जो अपना नंबर लगाए खड़े थे.

‘‘लेकिन मेरे पास तो सौ रुपए का एक नोट है,’’ गरीब दास ने कहा. सिपाही खीज कर बोला, ‘‘चलो, वही दो और दफा हो जाओ.’’

गरीब दास ने झिझकते हुए पर्स से सौ रुपए का एकलौता नोट निकाला और उस सिपाही के हवाले कर दिया. उस सिपाही ने गरीब दास को मोटरसाइकिल ले जाने की इजाजत दे दी.

गरीब दास सिर पर पांव रख कर भागे, पर रिश्वतखोरी में हाईटैक को देख कर हैरान रह गए. उन्होंने सुना था कि ट्रैफिक पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इस तरह के वाहन को ‘इंटर्सेप्टर’ कहते हैं. सरकारी खजाने को जाने वाले कोष को ये ‘इंटर्सेप्ट’ कर अपनी जेब में रख कर इस नाम को सच साबित कर रहे थे.

सब से खास बात यह कि इस ‘इंटर्सेप्टर ह्वीकल’ को ऐसी जगह पर रखा जाता था, जहां भीड़ कम हो और वाहन चालक थोड़ी ज्यादा रफ्तार से गाड़ी चलाए. साथ ही, ऐसे मोड़ पर किनारे कर इस ह्वीकल को खड़ा किया जाता कि वाहन चालकों की निगाह उस ओर न जाए.

घर पहुंचने पर गरीब दास की पत्नी ने पूछा, ‘‘लाइटर लाए?’’

‘‘नहीं. दरअसल, पैसे एक हाईटैक शो देखने में खत्म हो गए,’’ गरीब दास ने जवाब दिया.

पत्नी कुछ समझ तो नहीं पाईं, पर गरीब दास के चेहरे पर शाम 6 बजे ही 12 बजते देख कर चुप रहीं.

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