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Sexual Health : मेरी दुनिया मेरा मन, क्या सैक्सुअल फैंटेसी खतरा है?

Sexual Health. इनसान का मन जितना दिखता है, उस से कहीं ज्यादा गहरा और राज से भरा है. हमारे भीतर एक ऐसी दुनिया बसती है, जहां हम अकेले होते हैं, अपने विचारों, इच्छाओं, डर, सपनों और कल्पनाओं के साथ.

इसी भीतरी दुनिया का एक हिस्सा है फैंटेसी यानी कल्पना. यह वह जगह है, जहां नामुमकिन भी मुमकिन लगता है, अधूरा भी पूरा हो जाता है और दबे हुए भाव भी आकार लेने लगते हैं.

जब हम फैंटेसी शब्द सुनते हैं, तो अकसर बच्चों की कहानियां याद आती हैं… परियां, जादू, सुपर हीरो, उड़ते महल और बोलते जानवर. बचपन की फैंटेसी आनंद, रोमांच और हैरानी से भरी होती है, लेकिन जैसेजैसे इनसान बड़ा होता है, उस की कल्पनाएं भी बदलने लगती हैं. अब उन में इच्छाएं होती हैं, भावनाएं होती हैं, अधूरी चाहतें होती हैं और कई बार वे बातें भी होती हैं, जिन्हें वह असली जिंदगी में जी नहीं पाता.

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इसी में एक रूप है सैक्सुअल फैंटेसी. इस शब्द को ले कर समाज में सब से ज्यादा भ्रम है. लोग इसे या तो गलत मान लेते हैं या बीमारी समझ  लेते हैं या फिर अपराध से जोड़ देते हैं, जबकि सच यह है कि हर सैक्सुअल फैंटेसी गलत नहीं होती. यह इनसान के सामान्य दिमागी प्रोसैस का हिस्सा भी हो सकती है.

कल्पना की निजी दुनिया

सैक्सुअल फैंटेसी का मतलब केवल शारीरिक संबंध की कल्पना नहीं है. यह उस से कहीं बड़ी है. इस में निकटता की चाह, किसी के द्वारा चाहे जाने की इच्छा, रोमांच की तलाश, भावनात्मक जुड़ाव, शक्ति का अनुभव, समर्पण की भावना या प्यार पाने की लालसा भी शामिल हो सकती है.

कई बार इनसान अपनी अलसी जिंदगी में संयमित, जिम्मेदार और नियंत्रित रहता है. वह हर समय नियमों में बंधा रहता है. ऐसे में उस का मन एक ऐसी जगह बनाता है, जहां वह बिना किसी फैसले, आलोचना या सामाजिक दबाव के अपने भीतर की इच्छाओं को महसूस कर सके. यह फैंटेसी की दुनिया है.

यह जरूरी नहीं कि इनसान अपनी हर कल्पना को सच करना चाहता हो. कई बार कल्पना केवल कल्पना होती है… मन की एक निजी फिल्म, जिसे इनसान जीता नहीं, केवल सोचता है.

फ्रायड ने क्या कहा था

मनोविज्ञान के जनक माने जाने वाले सिगमंड फ्रायड का मानना था कि मनुष्य की अनेक इच्छाएं समाज, नैतिकता, डर और नियमों के दबाव में दब जाती हैं. वे इच्छाएं गायब नहीं होतीं, बल्कि सपनों, कल्पनाओं या बरताव के रूप में बाहर आती हैं.

आधुनिक मनोविज्ञान इस विचार को थोड़ा अलग तरीके से देखता है. आज माना जाता है कि हमारा अचेतन मन सीधे शब्दों में नहीं बोलता, बल्कि वह प्रतीकों, संकेतों और कल्पनाओं के माध्यम से अपनी बात कहता है यानी कभीकभी फैंटेसी हमारे भीतर छिपी भावनाओं का संकेत भी हो सकती है.

फैंटेसी की 3 जरूरतें

आधुनिक मनोवैज्ञानिक जस्टिन लेहमिलर की रिसर्च के मुताबिक, ज्यादातर सैक्सुअल फैंटेसी 3 तरह की मनोवैज्ञानिक जरूरतों से जुड़ी होती हैं… कनैक्शन, एक्साइटमैंट और कंट्रोल.

कनैक्शन : कोई मुझे चाहे

हर इनसान चाहता है कि कोई उसे सम?ो, चाहे, स्वीकार करे. यह जरूरत बचपन से शुरू होती है और जिंदगीभर बनी रहती है. कई लोगों की कल्पनाओं में प्यार, अपनापन, निकटता और भावनात्मक जुड़ाव खास होता है.

अगर किसी इनसान ने बचपन में स्नेह की कमी महसूस की हो या किशोरावस्था में प्यार किया हो पर कह न पाया हो, तो उस के भीतर चाहे जाने की इच्छा गहरी हो सकती है. ऐसे लोग अकसर ऐसी कल्पनाएं करते हैं, जहां कोई उन्हें बेहद प्यार करता है, समझता है या उन्हें चुनता है.

यह सामान्य है. समस्या तब शुरू होती है, जब इनसान कल्पना और असलियत का अंतर खो देता है. जब एकतरफा प्यार जुनून बन जाए. कई बार कोई इनसान किसी से प्यार करने लगता है, जबकि सामने वाला उसे पसंद नहीं करता. फिर भी वह अपने मन में एक कहानी बना लेता है कि वह भी मु?ो चाहता है, वह अभी मना कर रही है, एक दिन मान जाएगी. यहीं से फैंटेसी का अंधेरा पक्ष शुरू होता है.

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जब इनसान सामने वाले के इनकार को स्वीकार नहीं कर पाता, तब जुनून जन्म लेता है. पीछा करना, धमकाना, हिंसा करना, एसिड अटैक, रेप जैसी घटनाएं कई बार इसी मानसिक गंदी सोच से जुड़ी होती हैं. कुछ लोग यह भ्रम भी पाल लेते हैं कि कोई सैलिब्रिटी उन से प्यार करता है. यह खतरनाक मानसिक हालत हो सकती है.

एक्साइटमैंट : नया, अलग और रोमांचक

इनसान का दिमाग नवीनता से जोश में आता है. कुछ नया, अनिश्चित या रोमांचक होने पर हमारे शरीर में डोपामाइन और एड्रेनालिन जैसे रसायन सक्रिय होते हैं, जो जोश और मजा देते हैं.

समस्या यह है कि रोजमर्रा की एक जैसी जिंदगी से मन जल्दी ऊब जाता है. वही समय, वही दिनचर्या, वही जिम्मेदारियां, तब मन कुछ नया चाहता है. इसी कारण बहुत से लोग अपनी कल्पनाओं में रोमांच खोजते हैं. वे कुछ ऐसा सोचते हैं, जो असली जिंदगी से अलग हो. इस में कोई बुराई नहीं, जब तक यह केवल कल्पना की सीमा में हो और किसी को नुकसान न पहुंचाए.

आज के नौजवानों में यह बेचैनी ज्यादा दिखती है. सुविधाएं बढ़ी हैं, पर संतोष घटा है, इसलिए कई लोग ड्रग्स, तेज रफ्तार, वीडियो गेम, जोखिम भरे बरताव या लगातार नए रिश्तों में थ्रिल खोजते हैं. लेकिन हर रोमांच की एक सीमा होती है. धीरेधीरे मन को उस से भी ज्यादा जोश चाहिए होता है. यहीं से कई बार इनसान गलत रास्तों की ओर मुड़ जाता है.

कंट्रोल : ताकत और समर्पण का खेल

इनसान के भीतर ताकत पाने की इच्छा भी होती है. कई लोग जिंदगी में दबे हुए रहते हैं… बचपन में डांट, बेइज्जती, बुलीइंग या कंट्रोल का अनुभव करते हैं. बड़े हो कर वे ऐसी कल्पनाएं कर सकते हैं, जहां वे ताकतवर हों, किसी पर कंट्रोल रखते हों.

दूसरी ओर कुछ लोग अपनी असली जिंदगी में इतने फैसले लेते हैं, इतने जिम्मेदार होते हैं कि वे अपनी निजी दुनिया में कंट्रोल छोड़ देना चाहते हैं. उन्हें किसी और के नेतृत्व या कंट्रोल में सुख महसूस होता है.

इन दोनों हालात में अपनेआप में कुछ गलत नहीं है, अगर सबकुछ सहमति, सम्मान और सुरक्षा के भीतर हो. समस्या तब है, जब कंट्रोल हिंसा में बदलने लग जाए.

जब किसी इनसान को दूसरे की इच्छा, दर्द या असहमति की परवाह न रहे, जब हिंसा ही जोश का स्रोत बन जाए, जब सहमति खत्म हो जाए, तब यह मानसिक विकार और सामाजिक खतरा बन जाता है.

कब सामान्य, कब असामान्य

यह सब से खास सवाल है. हर फैंटेसी रोग नहीं है. हर कल्पना अपराध नहीं है. हर निजी इच्छा शर्म की बात नहीं है. लेकिन कुछ संकेत बताते हैं कि मामला गंभीर हो सकता है. इनसान कल्पना और असलियत में फर्क न कर पाए. सामने वाले की सहमति को अहमियत न दे. हिंसा, जबरदस्ती या शोषण में आनंद महसूस करे. बिना ऐसी कल्पनाओं के सामान्य जिंदगी न जी पाए. संबंध टूटने लगें, अपराधबोध बढ़े या बरताव खतरनाक हो जाए. कानून तोड़ने की सोच पैदा हो ऐसी हालत में माहिर की मदद जरूरी है.

रिश्तों में ताजगी भी ला सकती है

एक हैल्दी और मैच्योर संबंध में कल्पनाएं कई बार संवाद का हिस्सा बन सकती हैं. वे रिश्तों में ताजगी, नयापन और खुलापन ला सकती हैं. कई जोड़े अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर बातचीत कर के एकदूसरे को बेहतर समझते हैं.

कभी केवल प्रिय इनसान की कल्पना ही आत्मीयता बढ़ा देती है..कभी किसी खास हालात की कल्पना उत्साह जगा देती है. यह सब इनसान की स्वाभाविक मानसिक संरचना का हिस्सा है. शर्त सिर्फ एक है कि सम्मान, सहमति और संतुलन.

शर्म नहीं, समझ जरूरी है

हमारा समाज सैक्स और मानसिकता दोनों विषयों पर खुल कर बात करने से बचता है. नतीजा यह होता है कि लोग अपनी सामान्य भावनाओं को भी अपराध सम?ाने लगते हैं और कई बार गंभीर समस्याएं छिपी रह जाती हैं.

जरूरत है समझ की. अगर कोई कल्पना किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रही, इनसान की जिंदगी को बाधित नहीं कर रही और उस की निजी मानसिक दुनिया तक सीमित है, तो उसे ले कर अपराधबोध पालना उचित नहीं.

लेकिन अगर कल्पना हिंसा, जुनून, भ्रम या जबरदस्ती में बदल रही है, तो उसे नजरअंदाज करना भी खतरनाक है. आखिर में इनसान का मन कोई अदालत नहीं, जहां हर विचार पर सजा सुनाई जाए. मन एक संसार है, जहां उजाला भी है, अंधेरा भी.

फैंटेसी उसी संसार का हिस्सा है.

वह कभी रचनात्मक होती है, कभी सांत्वना देती है, कभी रोमांच भरती है और कभी भीतर छिपे घावों का संकेत बनती है, इसलिए सैक्सुअल फैंटेसी को केवल अपराध या बीमारी कह देना अधूरा सच है. सही बात यह है कि उसे समझना चाहिए, क्योंकि जब समझ होती है, तभी सीमा भी तय होती है और सुरक्षा भी.  Sexual Health

साढ़ू से करें पक्का दोस्ताना, पर साली बन सकती है अड़चन

Society News in Hindi: आजकल सोशल मीडिया पर साढ़ू के रिश्ते को ले कर एक वीडियो बहुत देखा जा रहा है. इस में बताया जाता है कि ‘साढ़ू एक ही फैक्टरी से ठगे गए 2 इनसान होते हैं’. असल में पत्नी की बहन के पति को साढ़ू कहा जाता है, जिस का मतलब वीडियो में ऐसे निकाला गया है कि एक ही मां की 2 बेटियों से अलगअलग शादी करने वाले 2 इनसान रिश्ते में साढ़ू हो जाते है. जब संयुक्त परिवारों का दौर था, तब इस रिश्ते को बहुत अहमियत नहीं दी जाती थी, पर आज के समय में जब घरों में बच्चों की संख्या कम होने लगी है, ऐसे में साढ़ू का रिश्ता भी खास हो गया है.

ससुराल में साढ़ू का स्टेट्स एकजैसा होता है, जिस वजह से कई बार आपस में संबंध बिगड़ने का खतरा भी रहता है. जब नया दामाद ससुराल में आता है, तो पुराने की अहमियत थोड़ी कम हो जाती है. कई बार जो दामाद ज्यादा अमीर या दबदबे वाला होता है, उस की अहमियत ज्यादा होती है. ऐसे में साढ़ू की आपस में थोड़ी खींचतान हो जाती है.

जरूरत इस बात की होती है कि साढ़ू के साथ किसी भी तरह की होड़ न रखें. दोनों का ही ससुराल में बराबर का हक होता है. दिखावे में आपसी संबंध खराब न करें. एक ही उम्र के साढू के साथ भाई जैसा रिश्ता रखें. सोशल मीडिया के वीडियो केवल दिखावा होते हैं, यह समझ कर उन को देखें.

बदल गया है बहन का रिश्ता

पहले छोटी बहन और बड़ी बहन के बीच आपस में एक दूरी रहती थी. बड़ी बहन छोटी बहन को अनुशासन में रखती थी. कई बार उन के बीच उम्र का भी फर्क होता था. आज के दौर में 2 बहनों के बीच उम्र की दूरी कम हो गई है. कई बार दोनों ही अकेली होती हैं, तो उन के बीच नजदीकियां ज्यादा होती हैं. वे बहन से ज्यादा दोस्त की तरह हो जाती हैं. वे एकदूसरे की बातों को अच्छी तरह से समझती हैं. वे एकदूसरे की मदद भी करती हैं.

कुछ बहनों के बीच तो इतनी गहरी दोस्ती होती है कि वे एकदूसरे के हर राज जानती हैं. एकदूसरे के बौयफ्रैंड वाले रिश्तों को भी समझती हैं. शरीर में होने वाले बदलाव, कैरियर, दोस्ती, पढ़ाईलिखाई और घरेलू झगड़े दोनों मिलजुल कर बांटती हैं.

जिस तरह से 2 बहनों में अच्छी बनती है, उसी तरह से अगर इन के पतियों यानी साढ़ू के बीच बनने लगे, तो एकदूसरे पर भरोसा बन जाएगा और समाज में एक भरोसेमंद रिश्ता मिल जाएगा. जिस तरह से 2 बहनों के बीच आयु वर्ग एकजैसा होता है, वही साढ़ू के साथ भी होता है.

साढ़ू भी अमूमन एक ही उम्र के होते हैं. ज्यादा से ज्यादा आपस में 2-4 साल का फर्क होता है. ऐसे में उन के आपसी विचार मिलते हैं. जरूरत पड़ने पर वे एकदूसरे के काम आ सकते हैं. संयुक्त परिवार जैसा भरोसा कर सकते हैं. इस के बाद भी साढ़ू के साथ आपसी संबंधों में खिंचाव भी होता है. इस की वजह यह है कि साढ़ू की पत्नी साली होती है. समाज में जीजासाली के संबंध अलग तरह से देखे जाते हैं.

जीजासाली के संबंध डालते हैं दरार

साढ़ू के साथ आपसी संबंधों में दरार पड़ने की खास वजह जीजासाली के संबंध होते हैं. जीजासाली के संबंधों में खुलापन होता है. आपस में हंसीमजाक का भी रिश्ता होता है. कई बार आपस में गहरे संबंध भी जीजासाली के बीच होते हैं.

जीजासाली के गलत संबंधों को समाज हलके नजरिए से भले ही देखता हो, पर साढ़ू ऐसे रिश्ते को सही नहीं मानता. ऐसे में जब उस को यह अहसास भी होता है तो साढ़ू के साथ रिश्ते चल नहीं पाते हैं, इसलिए बड़े साढ़ू को इस बात का खयाल रखना चाहिए कि वह अपनी साली के साथ हंसीमजाक का दायरा न पार करे.

कई बार हंसीमजाक ही ऐसा हो जाता है, जिस का सही असर नहीं पड़ता. उस से आपस में शक बढ़ जाता है. जीजासाली के संबंधों के बीच आया शक साढ़ू के साथ रिश्तों में दरार डालने का काम करता है. कई मामलों में तो साढ़ू के साथ रिश्ता टूट सा भी जाता है.

देवरभाभी के बाद जीजासाली का ही रिश्ता इतना खतरनाक होता है, जिस को ले कर तमाम तरह की कहानियां सुनने और पढ़ने को मिलती हैं.

इस की 2 खास वजहें होती हैं. एक तो जीजासाली की बात हो या देवरभाभी की दोनों रिश्तों में ही आपस में उम्र का फासला कम होता है. दूसरे, दोनों ही रिश्तों में हंसीमजाक होता है. मजाकमजाक में बात आगे बढ़ती है. अगर बात सैक्स संबंधों तक नहीं पहुंची तो मसला मजाक का मान लिया जाता है. अगर बात मजाक से आगे बढ़ी तो सैक्स संबंधों तक पहुंच जाती है.

तीसरी एक बात और होती है कि दोनों को आपस में अकेले मिलने के तमाम मौके होते हैं. इस अकेलेपन का फायदा मिल जाता है. अगर बात घरपरिवार तक पहुंचती भी है तो वे आपस में ही इस को दबाने का काम करते हैं. ऐसे में ये रिश्ते खतरनाक बन जाते हैं.

ऐसे में यह बात साफ है कि साढ़ू के आपस में संबंध तभी अच्छे होंगे जब जीजासाली के बीच संबंध सहज होंगे. अगर वहां संबंध सहज नहीं हैं, तो साढ़ू के साथ भी रिश्ते नहीं बनेंगे. इन बातों को दरकिनार कर के देखें तो साढ़ू का आपस में रिश्ता बहुत अच्छा होता है. जरूरत होती है कि इस को दोस्त के जैसा रखा जाए.

ऐसे में साढ़ू एक फैक्टरी से ठगे गए 2 इनसान नहीं होते. अगर वे दोनों समझदार हैं तो उन में खून का रिश्ता न होते हुए भी उतना ही करीबी संबंध बन सकता है.

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