पुरुषों में तनाव बढ़ने के क्या हैं कारण, जानें यहां

तेजी से बदलती दिनचर्या और इस भागदौड़ भरी लाइफ में पुरुषों में तनाव एक आम समस्या बन गई है.
अपने रोजमर्रा के जीवन में पुरुष अकसर छोटीछोटी बातों पर तनाव ले लेते हैं. जो उन की हैल्थ के लिए हानिकारक तो है ही साथ ही उन के वैवाहिक जीवन के लिए चिंता का सबब बन सकता है. पुरुषों के बीच तनाव की समस्या, इस के लक्षणों की पहचान और इस से कैसा बचा जाए, ये हम आप को बताते हैं.

इन बातों का रखें ध्यान

तनाव पुरुषों के जीवन के लगभग सभी क्षेत्र को प्रभावित करता है, इसलिए जीवनशैली में बदलाव तनाव की समस्या को कम करने में मदद करता है. तनाव के कारण पुरुषों के स्वास्थ्य में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं.

1. ब्लड प्रैशर का बढ़ना

बढ़ते तनाव के चलते पुरुषों में ब्लड प्रैशर की समस्या आम बात है. हाईपर टैंशन के चलते भी ब्लड प्रैशर में बदलाव आता है, जिस के चलते पुरुष ज्यादा गुस्सा और चिड़चिड़े हो जाते हैं.

2. थका हुआ महसूस करना 

तनाव पुरुषों को शारिरीक रूप से तो कमजोर करता ही है पर मानसिक रूप से भी नुकसान पहुंचाता है. जिस के चलते पुरुष थका हुआ महसूस करने लगते हैं.

3. दिल तेजी से धड़कना

तनाव में घबराहट होना एक आम बात है, जिस के चलते आप की दिल की धड़कन तेजी से बढ़ने लगती है.

4. इम्यूनिटी सिस्टम कमजोर होना

तनाव, घबराहट होना, हाईपर टैंशन और दिल की धड़कन तेजी से बढ़ना इन सभी कारणों से इम्यूनिटी सिस्टम कमजोर हो जाता है.

लाइफस्टाइल में बदलाव ही बचाव 

-योग और मैडिटेशन का प्रयोग करें, इस से मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के तनाव दूर करने में मदद मिलती है.

-तनाव से बचाव के लिए पर्याप्त नींद लें.

-अपनी परेशानियों को दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें.

-तनाव को कम करने के लिए आप अपनी पसंद का गाना सुनें. लाफ्टर थैरेपी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं.

सेक्स समस्याओं पर खुलकर बात करें लड़के

बात भी सही है पर सेक्स से जुड़ी बीमारियों के बारे में किसी अपने से बात करना इतना आसान नहीं है, कम से कम जवान होते लड़कों के लिए. अब संजय को ही लीजिए, उस ने हाल में आई मूंछों को ताव देते हुए एक सेक्स वर्कर से संबंध बना लिए और कंडोम का भी इस्तेमाल नहीं किया. इस के बाद उसे बीमारी हो गई. वह किसी माहिर डॉक्टर के पास नहीं गया और किसी तंबू वाले नीमहकीम से दवा ले ली. सब से बड़ी बात तो यह कि संजय ने अपने किसी खास दोस्त को भी इस मामले में कुछ नहीं बताया, घर वालों से तो दूर की बात है.

नीमहकीम ने संजय को जम कर लूटा और बीमारी भी बढ़ती गई. हार कर वह डॉक्टर के पास गया और अपनी बीमारी का सही इलाज कराया.

संजय जैसे बहुत से लड़के हैं जो अपनी सेक्स समस्याओं को राज ही रखते हैं. कहीं न कहीं इस में उन का अहम आड़े आ जाता है कि भरी जवानी में अगर वे किसी से इस का जिक्र करेंगे तो उन का मजाक बनाया जाएगा. पर ऐसा होता नहीं है. अगर वे जरा सी भी दिक्कत महसूस करें तो सीधे किसी अपने से बात करें, ठीक उसी तरह जैसे कोई लड़की अपनी मां या किसी बड़ी से अपनी शारीरिक समस्याओं पर बात करती है. इस मामले में मांबेटी का रिश्ता आपस में इतना खुला होता है कि वे जिगरी सहेलियों की तरह अपनी ऐसी समस्याओं जैसे माहवारी आदि पर बेहिचक बातचीत करती हैं और समस्या को ज्यादा गंभीर नहीं होने देती हैं.

लड़कों के मामले में उन के बड़ों जैसे पिता या भाई को भी उन पर नजर रखनी चाहिए कि वे कहीं किसी सेक्स समस्या को ले कर मानसिक तनाव से तो नहीं गुजर रहे हैं या उन के किसी दोस्त से भी वे पूछ सकते हैं, क्योंकि बहुत सी बार लड़के अपने दोस्त से ऐसी समस्या को शेयर कर लेते हैं. वैसे तो जवान होते लड़कों को अपने बड़ों से ऐसा कुछ नहीं छिपाना चाहिए जो सेक्स की बीमारी से जुड़ा हो. यह उन के फायदे का ही सौदा होता है, इसलिए झिझके नहीं बल्कि किसी आम बीमारी की तरह सेक्स से जुडी बीमारी पर अपनों से बात करें और सुखी रहें.

जानें, क्यों पुरुष नसबंदी है जरूरी

मर्दानगी शब्द भारतीय पुरुषों के लिए शान की बात होती है. वे सब कुछ खो सकते हैं परंतु अपनी मर्दानगी को नहीं. अपनी पत्नी का सहयोग करने से उन की इस तथाकथित मर्दानगी को बट्टा लग जाता है तथा पत्नी पर रोब गांठने से उन की मर्दानगी में चारचांद लगते हैं.

वे प्यार में अपनी जान देने तक की बात तो कर सकते हैं, परंतु पत्नी के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए स्वयं नसबंदी करवाने के बारे में सोच भी नहीं सकते जबकि चिकित्सा विज्ञान आज इतनी तरक्की कर चुका है कि दर्दरहित यह प्रक्रिया कुछ ही मिनटों में समाप्त हो जाती है.

इस के बावजूद हजार में से कोई 1 पुरुष ही है जो नसबंदी के लिए सहमत होता है और वह भी चोरीछिपे, रिश्तेदारों एवं समाज को बताए बिना. जबकि महिला नसबंदी खुले में शिविर लगा कर की जाती है. सरकार भी महिला नसबंदी का ही ज्यादा प्रचार करवाती है. नसबंदी करवाने के लिए महिलाओं को रुपए भी मिलते हैं.

ग्रामीण संस्था ‘आशा’ भी महिलाओं को ही नसबंदी के फायदे एवं नुकसान की जानकारी देती है. कुछ गांवों में तो टारगेट पूरा करने के लिए ट्रकों में भरभर कर महिलाओं को शिविरों में लाया जाता है. ये पैसों के लालच में यहां आ तो जाती हैं परंतु उचित देखभाल न होने के कारण कई बार हादसे का भी शिकार हो जाती हैं.

हमारे देश की यह विडंबना है कि परिवार नियोजन का सारा दारोमदार महिलाओं पर ही छोड़ दिया गया है. महिलाएं भी पुरुषों को कंडोम इस्तेमाल करने के लिए नहीं कह सकती हैं परंतु स्वयं बिना सोचेसमझे इस्तेमाल करने से नहीं हिचकतीं. बचपन से त्याग और कर्तव्य पालन की घुट्टी जो कूटकूट कर पिलाई जाती है उन्हें.

सरल है पुरुष नसबंदी

डेनमार्क में हुए एक शोध से पता चलता है कि गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं अकसर अवसाद में चली जाती हैं. आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की मानें तो सभी चिकित्सक यही कहते हैं कि महिला नसबंदी की तुलना में पुरुष नसबंदी अधिक सरल, सुरक्षित, आसान एवं कम खर्चीली है.

पुरुष नसबंदी में स्पर्म्स को ले जाने वाली नलिका ‘वासडिफरैंस’ को कट कर दिया जाता है. इस के लिए शल्यचिकित्सक सब से पहले अंडकोषों के ऊपर वाली चमड़ी पर सूई लगा कर उसे सुन्न करते हैं और फिर एक खास तरह की चिमटी से बारीक सूराख कर के उस नली को बाहर निकाल कर अंडकोषों से वीर्य को पेशाब की नली तक पहुंचाया जाता है. पुन: इस थैली को बीच से काट कर दोनों कटे हुए सिरों को बांध कर उन के मुंह बंद कर दिए जाते हैं और वापस अंडकोष थैली के अंदर डाल देते हैं. इस प्रक्रिया में 20 से 25 मिनट लगते हैं. व्यक्ति को न तो एनेस्थीसिया की आवश्यकता होती है और न ही अस्पताल में भरती होना पड़ता है.

यह प्रक्रिया बिना किसी चीरे या टांके के संपूर्ण हो जाती है. इस प्रक्रिया के कुछ ही घंटों बाद व्यक्ति अपने पैरों से चल कर घर जा सकता है. यह गर्भनिरोध के लिए महिला नसबंदी जितना ही प्रभावशाली होता है.

सैक्स क्षमता पर प्रभाव

इस के विपरीत महिला नसबंदी में उक्त महिला को लोकल एनेस्थीसिया दिया जाता है तथा एक चीरा एवं टांका भी लगता है. महिला को पूरी तरह सामान्य होने में 1 हफ्ता लग जाता है. इस प्रक्रिया में महिला को संक्रमण और अंदरूनी भागों में चोट लगने का भी खतरा होता है. दूरबीन प्रक्रिया में तो औजार अंदाज से अंदर डाला जाता है.

अत: इस में गुरदा खराब होने एवं अंदरूनी रक्तस्राव होने की भी संभावना रहती है, जबकि पुरुषों में इस प्रकार की कोई समस्या नहीं होती और न ही उन के सैक्स ड्राइव में कोई कमी आती है.

क्यों है पुरुषों को हार्टअटैक का अधिक जोखिम

तेज रफतार जिंदगी, बदलती जीवनशैली व गलत खानपान ने इंसान के हार्ट को खासा नुकसान पहुंचाया है. भारत में हार्ट संबंधी समस्या पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक बढ़ने लगी है. युवाओं में भी अब हार्टअटैक कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है.

भारत में हृदय रोगों के आंकड़े बढ़ रहे हैं. देखा गया है कि भारतीयों को हार्टअटैक की शिकायत पश्चिमी आबादी से करीब एक दशक पहले हो जाती है. इस के अलावा, भारतीयों में हृदयरोग संबंधी जटिलताएं व गंभीरता भी यहां उपलब्ध कमजोर चिकित्सा सेवाओं व इलाज लेने में देरी के चलते अधिक होती हैं.

कई अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों को हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा अधिक होता है, जबकि दोनों में मधुमेह और उच्च रक्तचाप का जोखिम बराबर है. इंडियन हार्ट एसोसिएशन के मुताबिक, ‘भारतीय पुरुषों में 50 प्रतिशत हार्टअटैक 50 साल की उम्र से पहले और 25 प्रतिशत हार्टअटैक 40 साल से कम उम्र में होता है.’

हार्टअटैक का कारण आमतौर पर कोरोनरी हार्ट रोग होता है जिस में हृदय की मांसपेशियों में औक्सीजनयुक्त रक्त का प्रवाह अचानक अवरुद्ध हो जाता है और परिणामस्वरूप हृदय को औक्सीजन नहीं मिल पाती. इस का कारण कोरोनरी आर्टरी की भीतरी सतह पर कोलैस्ट्रौल का जमाव है. कोलैस्ट्रौल की इस परत का जमाव कई सालों तक होता है.

आसान शब्दों में, हार्टअटैक तब होता है जब हृदय की मांसपेशियों में रक्त का प्रवाह रुक जाता है, जोकि लंबे समय से चली आ रही दिल की बीमारी या खराब जीवनशैली, खानपान, मोटापा और तनाव के कारण होता है.

पुरुषों में हार्टअटैक के बढ़ते मामलों के जो कई कारण हैं, उन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है हार्मोनल स्तर. ऐसा देखा गया है कि प्रीमीनोपौजल महिलाओं में एस्ट्रोजन के स्तर को सुरक्षा प्रदान करते हैं और ऐसे में महिलाओं में दिल के रोग मीनोपौज के बाद बढ़ते हैं और कमोबेश पुरुषों के समान हो जाते हैं.

इस के अलावा, एक और पहलू है महिलाओं और पुरुषों दोनों में तनाव का स्तर. शुरू में यह माना जाता था कि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को काम के मोरचे पर ज्यादा तनाव होता है जिस की वजह से उन में हार्टअटैक के मामले भी अधिक होते हैं, लेकिन हाल के समय में देखा गया है कि औरतें भी अपने कार्यक्षेत्रों में अधिक तनावजनित व गंभीर किस्म की भूमिकाओं में सक्रिय हैं, ऐसे में यह फर्क अब मिटने लगा है. अलबत्ता, दोनों में तनाव को सहने की क्षमता अलग होती है.

व्यवहार के स्तर पर महिलाएं अकसर दूसरों के साथ अपनी भावनाओं को बांटने वाली होती हैं और अपनी देखभाल पर भी समय लगाती हैं, जैसे कि पढ़ने या स्नातकोत्तर आदि पर, जिस के चलते उन का तनाव कम होता है, जबकि पुरुषों की आदत होती है कि वे अपनी भावनाओं को अपने तक ही सीमित रखते हैं. इस का परिणाम यह होता है कि आगे चल कर पुरुषों में तनाव बुरा असर डालने लगता है. देखा गया है कि तनाव के समय रक्त वाहिकाएं (आर्टरीज) सिकुड़ती हैं, जिस से ब्लडप्रैशर बढ़ता है और अगर किसी व्यक्ति में पहले से ही रक्तवाहिकाएं संकुचित होती हैं, तो यह बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है.

जीवनशैली का असर

खानपान और जीवनशैली संबंधी आदतों का अध्ययन करने पर यह पाया गया है कि पुरुषों की जीवनशैली औरतों के मुकाबले अस्वस्थकर होती है, जिस का असर उन के दिल पर ज्यादा पड़ता है.

शराब का सेवन भी दिल के रोगों का प्रमुख कारण है. हार्ट यूके के मुताबिक, ‘करीब 37 प्रतिशत पुरुष सरकार द्वारा सु झाई गई शराब के सेवन संबंधी मात्रा से अधिक नियमितरूप से सेवन करते हैं, जबकि महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 28 प्रतिशत है. इसी तरह, महिलाओं की तुलना में पुरुषों में धूम्रपान भी काफी अधिक प्रचलित होने की वजह से उन में हृदयरोगों का जोखिम अधिक होता है और यह युवा मरीजों में प्रमुख कारण है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं की तुलना में पुरुष मोटापे के अधिक शिकार होते हैं. इस का काफी हद तक कारण खानपान की आदतें हैं. आमतौर पर महिलाओं के मुकाबले, पुरुष अधिक मांस का सेवन करते हैं और वे ज्यादातर रैड मीट खाते हैं. दूसरी तरफ, पुरुषों की तुलना में महिलाएं गोभी प्रजाति की सब्जियों का सेवन 19 प्रतिशत अधिक करती हैं और इसी तरह वे 14 प्रतिशत अधिक पत्तेदार सब्जियां खाती हैं. मीट, खासतौर से रैड मीट से शरीर में इन्लेमेशन का खतरा बढ़ जाता है और इस में सैचुरेटेड वसा की अधिकता के चलते यह कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं का कारण भी बनता है. इस तरह, अधिक मात्रा में भोजन में मांस और कम सब्जियों के सेवन की वजह से भी पुरुषों में दिल के मर्ज बढ़ रहे हैं.

लेकिन महिलाओं में हृदय रोगों को अकसर कम कर के आंका जाता है

क्योंकि यह गलत धारणा है कि वे कार्डियोवैस्कुलर रोगों से सुरक्षित होती हैं. इस के अलावा, भारत में सांस्कृतिक व सामाजिक कारणों के चलते भी औरतों की सेहत को पुरुषों की तुलना में कम महत्त्व मिलता है. हृदयरोगों को कम महत्त्व दिया जाता है और साथ ही, महिलाओं के रोगों के सामने आने की कम परिस्थितियों के चलते भी उन के मामले में इलाज की स्थिति कमजोर बनी हुई है.

अमेरिका के हाल के आंकड़ों से यह सामने आया है कि 2 दशकों से भी अधिक अवधि के दौरान प्रौढ़ महिलाओं (35 से 54 वर्ष) में मायोकार्डियल रोगों के मामलों में बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसी आयुवर्ग के पुरुषों में ये घट रहे हैं. इसलिए, महिलाओं को अपने स्वास्थ्य  को ले कर अधिक सचेत होने व कार्डियोवैस्कुलर रोगों से जुड़े जोखिमों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है, जिस से हृदय संबंधी जोखिमों के खतरों को कम किया जा सके.

‘‘युवाओं में अधिक कोलैस्ट्रौल लैवल से हृदयरोगों के जोखिमों का पहले से पता लगाया जा सकता है वाली सोच के मामले में हमें कोलैस्ट्रौल को सही ढंग से सम झना होगा. यही हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में अवरोध खड़ा करता है जिस की वजह से हार्टअटैक होता है. इंसान के शरीर को कई प्रकार के कार्यों के लिए कोलैस्ट्रौल की आवश्यनकता होती है. कोलैस्ट्रौल 2 प्रकार का होता है- अच्छा कोलैस्ट्रौल एचडीएल कहलाता है जबकि दुष्प्रभावी कोलैस्ट्रौल को एलडीएल कहते हैं. एलडीएल कोलैस्ट्रौल ही शरीर की धमनियों की अंदरूनी परतों में जमा हो कर हार्टअटैक और स्ट्रौक का कारण बनता है.

विश्वप्रसिद्ध लांसेट जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, 19 देशों में 43 वर्षों तक ऐसे करीब 4 लाख लोगों पर नजर रखी गई जिन्हें शुरू में किसी प्रकार का हृदय रोग नहीं था. अध्ययन में पाया गया कि 45 वर्ष से कम उम्र में अधिक कोलैस्ट्रौल लैवल के चलते आगे चल कर हृदयरोगों की आशंका बढ़ जाती है. साथ ही, जिन व्यक्तियों में कोलैस्ट्रौल का स्तर कम होता है उन में हार्टअटैक का जोखिम भी कम होता है. वैज्ञानिकों ने इस की वजह रक्त में नुकसानदायक लिपिडों का कम होना पाया है जोकि कोरोनरी आर्टरीज को नुकसान पहुंचाता है और धीरेधीरे यह नुकसान गंभीर रूप ले लेता है.

अध्ययन में यह भी पाया गया है कि अधिक कोलैस्ट्रौल स्तर वाले मरीजों में जल्दी इलाज शुरू करने से बाद के वर्षों में हृदय संबंधी समस्याएं और स्ट्रोक का खतरा घट जाता है.

अमेरिका में एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि शरीर की धमनियों में 20 से 30 वर्ष की आयुवर्ग में कोलैस्ट्रौल का जमाव होने लगता है. ऐसे में, आगे चल कर समस्याओं से बचने के लिए जीवन में जल्दी ही उपाय करना फायदेमंद है.

आज के दौर में फास्ट और प्रोसैस्ड फूड की अधिकता, शारीरिक व्यायाम का अभाव और ताजे फलों एवं सब्जियों का कम सेवन, मोटापा तथा कोलैस्ट्रौल स्तर में गड़बड़ी (एलडीएल की अधिक और एचडीएल की कम मात्रा) जैसी समस्याएं बच्चों में बढ़ रही हैं जो आगे चल कर उन में हार्टअटैक और स्ट्रोक का कारण बन सकती हैं. इसलिए, पेरैंट्स को चाहिए कि वे अपने बच्चों को इन तमाम दुष्प्रभावों के बारे में शुरू से ही सजग बनाएं और संतुलित व सेहतमंद जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करें.

(लेखक इंटरवैंशनल कार्डियोलौजी, फोर्टिस मैमोरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में सलाहकार हैं.)

क्या स्पर्म से पुरुषों में ताकत बढ़ती है, पढ़ें पूरी खबर

लेखक- ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

आलोक के सासससुर व मातापिता परेशान हो गए. आलोक की बीवी उस के घर आने को तैयार नहीं थी. उसे बहुत समझाया, मगर वह मानी नहीं. इस की पूरी पड़ताल की गई. तब सचाई का पता चला कि आलोक अपनी बीवी के साथ हमबिस्तरी करने से दूर भागता था, इस कारण उस की बीवी उस के पास रहना नहीं चाहती थी.

आलोक के दोस्तों से बात करने पर पता चला कि आलोक अपनी ताकत नहीं खोना चाहता था. इस कारण वह अपनी बीवी से दूर भागता था.

उस का कहना था, ‘‘वीर्य बहुत कीमती होता है. उसे नष्ट नहीं करना चाहिए. इस के संग्रह से ताकत बढ़ती है.’’ यह जान कर आलोक के मातापिता ने अपना सिर पीट लिया.

ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिन में हमें इस बात का पता चलता है कि यह भ्रम कितनी व्यापकता से फैला हुआ है, इस भ्रम की वजह से कई खुशहाल परिवार उजड़ जाते हैं. इन उजड़े हुए अधिकांश परिवारों के व्यक्तियों का मानना होता है कि वीर्य संगृहीत किया जा सकता है. क्या इस के संग्रह से ताकत आती है? क्या वाकई यह भ्रम है या यह हकीकत है. हम यहां इस को समझने का प्रयास करते हैं.

आलोक के मातापिता समझदार थे. वे आलोक को डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर यह सुन कर मुसकराया. उन्होंने आलोक से कहा, ‘‘तुम्हारी तरह यह भ्रम कइयों को होता है.’’

डाक्टर ने आलोक को कई उदाहरण दे कर समझाया तब उस की समझ में आया कि उस ने वास्तव में एक भ्रम पाल रखा था, जिस के कारण उस का परिवार टूटने की कगार पर पहुंच गया था. उस के परिवार और उस की खुशहाल जिंदगी को डाक्टर साहब और उस के मातापिता ने अपनी सूझबूझ से बचा लिया. नतीजतन, वह आज अपनी बीवी और 2 बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहा है.

शरीर विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान के अपने नियम हैं. उन के अपने सिद्धांत हैं. वे उन्हीं का पालन करते हैं. नियम कहता है कि वीर्य को संगृहीत नहीं किया जा सकता है. जिस तरह एक भरे हुए गिलास में और पानी नहीं भरा जा सकता है वैसे ही वीर्यग्रंथि में एक सीमा के बाद और वीर्य नहीं भरा जा सकता है. यदि शरीर में वीर्य बनना जारी रहा तो वह किसी न किसी तरह शरीर से बाहर निकल जाता है.

वीर्य का गुणधर्म है बहना

वीर्य शरीर से बहने और बाहर निकलने के लिए शरीर में बनता है. वह किसी न किसी तरह बहेगा ही. यदि आप हमबिस्तरी कर के पत्नी के साथ आनंददायक तरीके से बहा दें तो ठीक से बह जाएगा, यदि ऐसा नहीं करोगे तो वह स्वप्नदोष के जरिए बह कर निकल जाएगा.

वीर्य का कार्य प्रजनन चक्र को पूरा करना होता है. बस, वहीं उस का कार्य और वही उस की उम्र होती है. उस में उपस्थित शुक्राणु औरत के शरीर में जाने और वहां अंडाणु से मिल कर शिशु उत्पन्न करने के लिए ही बनते हैं. उन की उम्र 2 से 3 दिन के लगभग होती है. यदि उस दौरान उन का उपयोग कर लिया जाए तो वे अपना कार्य कर लेते हैं अन्यथा वे मृत हो जाते हैं.

मृत शुक्राणु अन्य शुक्राणु को मारने का काम भी करते हैं. इसलिए इस को जितना बहाया जाए, शरीर में उतने स्वस्थ शुक्राणु पैदा होते हैं. शरीर मृत शुक्राणुओं को शरीर से बाहर निकालता रहता है. इस से शरीर की क्रिया बाधित नहीं होती है.

शरीर को ताकत यानी ऊर्जा वसा और कार्बोहाइड्रेट से मिलती है. हम शरीर की मांसपेशियों को जितना मजबूत करेंगे, हम उतने ताकतवर होते जाएंगे. यही शरीर का गुणधर्म है. इसी वजह से शारीरिक मेहनत करने वाला 40 किलो का एक हम्माल 100 किलोग्राम की बोरी उठा लेता है जबकि 100 किलोग्राम का एक व्यक्ति 40 किलोग्राम की बोरी नहीं उठा पाता. इसलिए यह सोचना कि वीर्य संग्रह से ताकत आती है, कोरा भ्रम है.

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