Baba Culture Story. यह नहीं मालूम कि उन का असली नाम ‘स्वामी’ था या ‘बोतलानंद’ या फिर दोनों ही थे. सच तो यह है कि उन में ‘बोतल’ जैसा खिंचाव था. जैसे शराबी किसी शराब की बोतल की ओर खिंचा चला आता है ठीक उसी तरह उन के भक्त भी अपना दिमाग अलमारी में बंद कर उन के पैरों में लमलेट हो जाया करते थे.
गजब का चमत्कार था उन में. हर समस्या का चुटकी बजाते इलाज, वह भी बहुत सस्ता, आसान और टिकाऊ. भक्त चाहें तो ‘तनमनधन’ से फीस अदा कर सकते थे. कोई दबाव, डर, धमकी कुछ भी तो नहीं था. सारा खेल श्रद्धा पर टिका था. हमें तो लगता है कि अगर कश्मीर, आतंकवाद या पाकिस्तान को सबक सिखाने जैसे मसले हों या घोर गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे, स्वामी बोतलानंद महाराज के पास इन का भी कोई शर्तिया इलाज जरूर होगा.
सरकार को एक बार उन से जरूर इन मसलों पर सलाह लेनी चाहिए, यह हमारा सुझाव है. सस्ते में और मजेमजे में इतनी बड़ी समस्याओं का इलाज हो जाए तो इस में बुराई क्या है? यही तो हम सब चाहते भी हैं. खैर, अब मूल मुद्दे पर आते हैं कि स्वामीजी के नामकरण का आखिर राज क्या था? हर आम आदमी को यह नाम अटपटा लगेगा लेकिन यह पक्का है कि इस के मूल में कुछ न कुछ शुभ संकेत जरूर छिपा होगा.
जैसे कोई भी चमत्कारी बाबाओं की लीलाओं की थाह कभी नहीं पा सकता, ठीक वैसे ही स्वामी बोतलानंद महाराज को समझना आसान नहीं था. नाम हो या उन के कारनामे, सबकुछ किसी गहरे राज में लिपटी मुश्किल पहेली सा था. ऐसा लगता है कि स्वामी बोतलानंद महाराज नाम का सही मतलब सिर्फ और सिर्फ सच्चे भक्त ही समझ सकते हैं जो सिर्फ सुनते हैं, कभी सवाल नहीं करते.
हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसना भी ठीक नहीं है. क्या तर्क से कभी किसी का भला हुआ है? उलटे लोग धर्मकर्म से कटते चले जाते हैं, श्रद्धा का नाश हो जाता है. स्वामी बोतलानंद महाराज का आश्रम कहो या कुटिया शहर से दूर सुनसान जगह पर बनी थी लेकिन सरकारी कृपा से वहां देशीविदेशी शराब के ठेके जरूर खुले हुए थे, इसलिए वह सुनसान जगह आबाद रहती थी.
इसे स्वामी बोतलानंद महाराज का कल्याणकारी काम माना जाए जो उन्होंने ऐसी सुनसान जगह को आबाद किया. पीने के शौकीन भक्तों के लिए तो यह सोने पर सुहागा जैसा है. पूरा पैकेज एक छत के नीचे. महाराज बोतलानंद स्वामी के दर पर कोई भेदभाव नहीं, कोई रोकटोक भी नहीं. कायदेकानून का वहां न कोई वजूद और न ही जरूरत.
अब आप को दिव्य स्वामी बोतलानंद महाराज के दर्शन भी करा देते हैं. उन की कुटिया में लेदे कर एक बिछौना नजर आता था. उसी पर महाराज कभी बैठे, कभी लेटे तो कभी आधी नींद की हालत में मिलते थे.
पूरी कुटिया बोतलों से अटी नजर आती थी. खालीभरी बोतलों के बीच महाराज झूमते हुए प्रवचन करते रहते थे. कुछ नासमझों को उन की यह अदा रोनापीटना लग सकती है लेकिन बंदर अदरक का स्वाद नहीं जानता इसलिए बंदरों की सोच पर हमें कुछ कहना भी नहीं है. धर्म और श्रद्धा की बात हो तो सवाल खड़े करना घोर पाप है. यहां जो है, जैसा है, बस मान लो. स्वामी बोतलानंद महाराज की कुटिया गरीबों और अमीरों से भरी रहती थी. भक्तों की ऐसी जबरदस्त भीड़ हर किसी के हिस्से में नहीं आती.
स्वामी बोतलानंद महाराज की एक खूबी यह भी थी कि वे कभी किसी भक्त को ‘न’ नहीं कहते थे. शायद ही उन के मुंह से कभी ऐसे शब्द निकले हों, ‘तुम्हारा काम नहीं होगा… यह सोच अच्छी नहीं है…’ जैसी जो भी इच्छा भक्त जाहिर करते महाराज तुरंत उन्हें आशीर्वाद दे देते.
अब सब से निराली खूबी देखिए. स्वामी बोतलानंद महाराज न संन्यासी का चोला धारण करते थे और न ही लंबे केश, जटाजूट. मतलब एक संन्यासी की इमेज से वे कोसों दूर थे. एक आम शराबी की तरह जो हर वक्त मदहोश रहता है. जिसे न तन का होश और न मन का. सबकुछ कुदरती रूप में देशी स्टाइल में चलता था.
यह बड़ी अच्छी बात है. फालतू के दिखावे, बाहरी आडंबर का क्या करना? जैसे हैं, उसी रूप को सच में दिखा दें, यह भी कम ईमानदारी नहीं है, वरना धर्म के कारोबार में मार्केटिंग इतनी हावी हो गई है कि हकीकत का पता पुलिस केस होने पर ही पता चलता है, इसलिए हम उन के इस रूप को दिल से नमस्कार करते हैं. उन्हें जमीन पर लेट कर प्रणाम करते हैं. सभी भक्तजन एक बार जोर से जयकारा लगाएं, ‘‘बाबा बोतलानंद महाराज की जय.’’ Baba Culture Story




