Baba Culture Story : स्वामी बोतलानंद महाराज

Baba Culture Story. यह नहीं मालूम कि उन का असली नाम ‘स्वामी’ था या ‘बोतलानंद’ या फिर दोनों ही थे. सच तो यह है कि उन में ‘बोतल’ जैसा खिंचाव था. जैसे शराबी किसी शराब की बोतल की ओर खिंचा चला आता है ठीक उसी तरह उन के भक्त भी अपना दिमाग अलमारी में बंद कर उन के पैरों में लमलेट हो जाया करते थे.

गजब का चमत्कार था उन में. हर समस्या का चुटकी बजाते इलाज, वह भी बहुत सस्ता, आसान और टिकाऊ. भक्त चाहें तो ‘तनमनधन’ से फीस अदा कर सकते थे. कोई दबाव, डर, धमकी कुछ भी तो नहीं था. सारा खेल श्रद्धा पर टिका था. हमें तो लगता है कि अगर कश्मीर, आतंकवाद या पाकिस्तान को सबक सिखाने जैसे मसले हों या घोर गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे, स्वामी बोतलानंद महाराज के पास इन का भी कोई शर्तिया इलाज जरूर होगा.

सरकार को एक बार उन से जरूर इन मसलों पर सलाह लेनी चाहिए, यह हमारा सुझाव है. सस्ते में और मजेमजे में इतनी बड़ी समस्याओं का इलाज हो जाए तो इस में बुराई क्या है? यही तो हम सब चाहते भी हैं. खैर, अब मूल मुद्दे पर आते हैं कि स्वामीजी के नामकरण का आखिर राज क्या था? हर आम आदमी को यह नाम अटपटा लगेगा लेकिन यह पक्का है कि इस के मूल में कुछ न कुछ शुभ संकेत जरूर छिपा होगा.

जैसे कोई भी चमत्कारी बाबाओं की लीलाओं की थाह कभी नहीं पा सकता, ठीक वैसे ही स्वामी बोतलानंद महाराज को समझना आसान नहीं था. नाम हो या उन के कारनामे, सबकुछ किसी गहरे राज में लिपटी मुश्किल पहेली सा था. ऐसा लगता है कि स्वामी बोतलानंद महाराज नाम का सही मतलब सिर्फ और सिर्फ सच्चे भक्त ही समझ सकते हैं जो सिर्फ सुनते हैं, कभी सवाल नहीं करते.

हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसना भी ठीक नहीं है. क्या तर्क से कभी किसी का भला हुआ है? उलटे लोग धर्मकर्म से कटते चले जाते हैं, श्रद्धा का नाश हो जाता है. स्वामी बोतलानंद महाराज का आश्रम कहो या कुटिया शहर से दूर सुनसान जगह पर बनी थी लेकिन सरकारी कृपा से वहां देशीविदेशी शराब के ठेके जरूर खुले हुए थे, इसलिए वह सुनसान जगह आबाद रहती थी.

इसे स्वामी बोतलानंद महाराज का कल्याणकारी काम माना जाए जो उन्होंने ऐसी सुनसान जगह को आबाद किया. पीने के शौकीन भक्तों के लिए तो यह सोने पर सुहागा जैसा है. पूरा पैकेज एक छत के नीचे. महाराज बोतलानंद स्वामी के दर पर कोई भेदभाव नहीं, कोई रोकटोक भी नहीं. कायदेकानून का वहां न कोई वजूद और न ही जरूरत.

अब आप को दिव्य स्वामी बोतलानंद महाराज के दर्शन भी करा देते हैं. उन की कुटिया में लेदे कर एक बिछौना नजर आता था. उसी पर महाराज कभी बैठे, कभी लेटे तो कभी आधी नींद की हालत में मिलते थे.

पूरी कुटिया बोतलों से अटी नजर आती थी. खालीभरी बोतलों के बीच महाराज झूमते हुए प्रवचन करते रहते थे. कुछ नासमझों को उन की यह अदा रोनापीटना लग सकती है लेकिन बंदर अदरक का स्वाद नहीं जानता इसलिए बंदरों की सोच पर हमें कुछ कहना भी नहीं है. धर्म और श्रद्धा की बात हो तो सवाल खड़े करना घोर पाप है. यहां जो है, जैसा है, बस मान लो. स्वामी बोतलानंद महाराज की कुटिया गरीबों और अमीरों से भरी रहती थी. भक्तों की ऐसी जबरदस्त भीड़ हर किसी के हिस्से में नहीं आती.

स्वामी बोतलानंद महाराज की एक खूबी यह भी थी कि वे कभी किसी भक्त को ‘न’ नहीं कहते थे. शायद ही उन के मुंह से कभी ऐसे शब्द निकले हों, ‘तुम्हारा काम नहीं होगा… यह सोच अच्छी नहीं है…’ जैसी जो भी इच्छा भक्त जाहिर करते महाराज तुरंत उन्हें आशीर्वाद दे देते.

अब सब से निराली खूबी देखिए. स्वामी बोतलानंद महाराज न संन्यासी का चोला धारण करते थे और न ही लंबे केश, जटाजूट. मतलब एक संन्यासी की इमेज से वे कोसों दूर थे. एक आम शराबी की तरह जो हर वक्त मदहोश रहता है. जिसे न तन का होश और न मन का. सबकुछ कुदरती रूप में देशी स्टाइल में चलता था.

यह बड़ी अच्छी बात है. फालतू के दिखावे, बाहरी आडंबर का क्या करना? जैसे हैं, उसी रूप को सच में दिखा दें, यह भी कम ईमानदारी नहीं है, वरना धर्म के कारोबार में मार्केटिंग इतनी हावी हो गई है कि हकीकत का पता पुलिस केस होने पर ही पता चलता है, इसलिए हम उन के इस रूप को दिल से नमस्कार करते हैं. उन्हें जमीन पर लेट कर प्रणाम करते हैं. सभी भक्तजन एक बार जोर से जयकारा लगाएं, ‘‘बाबा बोतलानंद महाराज की जय.’’ Baba Culture Story

Religious Superstition : रील्स का पाखंडी ‘डिजिटल बाबा’

Religious Superstition. हरियाणा की धरती, जो कभी मेहनतकश किसानों और विचारकों की ज्ञानभूमि हुआ करती थी, आज डिजिटल युग के ‘रील्स मार्केटिंग’ वाले बाबाओं की चारागाह बन चुकी है.

हांसी के नंद नगर में सजे ‘श्री बालाजी धाम’ के दरबार पर नजर डालें, तो समझ आता है कि 21वीं सदी में भी अंधविश्वास को कितने शातिर ढंग से बेचा जा सकता है.

गद्दी पर बैठे हैं तथाकथित महंत डाक्टर दिनेश पुरी, जिन्हें लोग ‘हांसी वाले बाबा’ कहते हैं, मगर इन की असलियत चमचमाती मर्सिडीज गाड़ी, यूट्यूबरों की फौज और कोर्टकचहरी के चक्करों के बीच हिचकोले खा रही है.

यह वही ‘डिजिटल ठगी’ का मौडर्न कुनबा है जहां लच्छेदार बातों की चाशनी में लपेट कर सीधेसादे लोगों की जेब और दिमाग दोनों पर डाका डाला जाता है. कतई गजब ढा रखा है इन धंधेबाजों ने.

परची का धंधा

डाक्टर दिनेश पुरी के दरबार का विज्ञान बड़ा सीधा है, कैमरा औन करो, भावुकता का माहौल बनाओ, और फिर एक परची निकाल कर किसी लाचार इनसान के भूत, भविष्य और वर्तमान का फैसला कर दो.

विज्ञान और चिकित्सा को अंगूठा दिखाते हुए यहां तंत्रमंत्र से कैंसर ठीक करने के दावे बेचे जाते हैं. जब लोग अपनी गंभीर बीमारियों और पारिवारिक समस्याओं से टूट चुके होते हैं, तब यह ढोंगी उन्हें इलाज के बजाय दैवीय चमत्कार के चक्रव्यूह में फंसाता है.

लेकिन जैसा कि कबीर कह गए हैं कि काठ की हांड़ी बारबार नहीं चढ़ती… इस कथित चमत्कार की पोल तब खुली जब हांसी के ही एक वकील राजेश कुमार ने इस पाखंड को कोर्ट तक घसीट लिया.

बाबा ने सरेआम परची निकाल कर वकील पर तंत्रमंत्र का झूठा आरोप मढ़ा था, जिस के जवाब में पुलिस ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज की, बल्कि अब यह ढोंगी अदालत में मानहानि के मुकदमे भुगत रहा है.

शिकायत करने वाले वकील राजेश कुमार ने अदालत में बेहद मजबूत कानूनी तर्क रखे हैं. वकील का कहना है कि बाबा का यह कृत्य केवल एक शख्स की मानहानि नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों पर सीधा हमला है.

बिना किसी सुबूत के, भरे दरबार में लाइव कैमरे के सामने किसी पर ‘कैंसर करवाने का तांत्रिक प्रयोग’ करने का आरोप लगाना मानसिक प्रताड़ना की श्रेणी में आता है.

कानूनी तर्कों के मुताबिक, बाबा ने सोशल मीडिया के विशाल मंच का इस्तेमाल कर के पीडि़त परिवार का सामाजिक बहिष्कार करवाया, जिस से उन की इज्जत पूरी तरह धूल में मिल गई.

अब पीडि़त पक्ष की मांग बेहद कड़क है कि बाबा को उसी सोशल मीडिया पर लाइव आ कर, हाथ जोड़ कर लिखित और मौखिक माफी मांगनी होगी, क्योंकि कानून के राज में कोई भी ढोंगी खुद को अदालत से ऊपर नहीं समझ सकता.

कसता कानूनी शिकंजा

यह पूरा मामला केवल मानहानि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधेतौर पर कानून की धज्जियां उड़ाने का है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के ढोंग पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 (ठगी/ धोखाधड़ी) और धारा 356 (मानहानि) के तहत गंभीर कानूनी कार्रवाई बनती है.

इस के साथ ही, तंत्रमंत्र और दैवीय शक्तियों से कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों को ठीक करने का भ्रामक दावा करना ‘ड्रग्स एंड मैजिक रैमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954’ के तहत एक संज्ञेय अपराध है.

जातिगत नफरती टिप्पणी

इस पाखंडी का अहंकार सिर्फ अंधविश्वास फैलाने तक सीमित नहीं रहा. जब समाज के सजग लोगों और किसान नेताओं ने इन के पाखंड को ‘डिजिटल आतंकवाद’ कह कर बेनकाब करना शुरू किया, तो बाबा अपनी मर्यादा भूल गए.

भरे मंचों से और बयानों में विशिष्ट समाजों और उन के नेतृत्व को निशाना बनाते हुए ‘हुड्डासूडा’ जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया. यह किसी आध्यात्मिक गुरु की भाषा नहीं, बल्कि एक डरे हुए सियार की बौखलाहट है.

मर्सिडीज वाला अध्यात्म

साध्वी देवा ठाकुर और धर्मेंद्र हुड्डा जैसे लोगों ने जब इन के तंत्र की परतें खोलीं, तो सच सामने आया कि इस भीड़ के पीछे असल खेल ‘कैश और कीवर्ड्स’ का है. सोशल मीडिया पर जो लाखों की रील्स दिखती हैं, उन के पीछे यूट्यूबरों को दी जाने वाली अघोषित रकम और तगड़ी पीआर टीम काम करती है.

जनता से चढ़ावे और ‘रसीद’ के नाम पर काटी गई गाढ़ी कमाई धर्मार्थ कामों में जाने के बजाय लग्जरी गाडि़यों के टायर घिसने और इस झूठे भ्रामक प्रचार तंत्र को जिंदा रखने में फूंकी जा रही है. साफ कहें तो यह अध्यात्म नहीं, बल्कि अंधविश्वास की रील्स बना कर नोट छापने की मौडर्न फैक्टरी है.

राहत की बात यह है कि इस डिजिटल पाखंड के खिलाफ हरियाणा का प्रबुद्ध समाज और स्थानीय सामाजिक संगठन अब खुल कर खिलाफ उतरने लगे हैं. तर्कशील सोसाइटियों, छात्र संगठनों और किसान यूनियनों ने इस अंधविश्वास के खिलाफ एक बड़ा वैचारिक मोरचा खोल दिया है.

कहा जा रहा है कि बीमारियों के लिए बाबाओं के परचों के बजाय अच्छे अस्पतालों और डाक्टरों पर भरोसा करें. यह सामाजिक आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि हरियाणवी समाज अब इन ढोंगियों के झांसे में आ कर अपनी गाढ़ी कमाई और स्वाभिमान को लुटने नहीं देगा.

यह समय हरियाणवी समाज के लिए पूरी तरह जागने का है. कानून अपनी कार्रवाई पुलिस फाइलों और हिसार कोर्ट के चक्करों में कर ही रहा है व धर्मेंद्र हुड्डा ने भी कानूनी कार्रवाई की बात कही है, लेकिन सब से बड़ा बहिष्कार जनता की अदालत को करना होगा.  Religious Superstition

Superstition: अंधविश्वास के घोड़े, तरक्की में रोड़े

Superstition. राम सजीवन के घर बेटा पैदा हुआ. पंडित ने पोथीपत्रा पलटने के बाद कहा, ‘‘बेटे की नाक के दाहिनी ओर तिल है. ज्योतिष विद्या के अनुसार यह बहुत शुभ है. ऐसे तिल वाला इनसान सुखी और मालामाल होता है.

‘‘इस बच्चे को जिंदगीभर रुपएपैसे की कमी नहीं होगी. अगर नाक के बाएं हिस्से पर तिल होता, तो इसे जिंदगीभर कड़ी मेहनत करनी पड़ती. फिर भी यह सुखी न रहता. कई बार मुश्किल हालात का सामना भी करना पड़ता. अगर आप के बेटे की नाक के बीच में तिल होता, तो यह जिंदगीभर सफर ही करता रहता.’’

राम सजीवन बेहद खुश हुए कि बेटे को रुपएपैसे की कमी नहीं रहेगी. वह हमेशा खुशहाल रहेगा. बेटा बड़ा हो कर स्कूल जाने के काबिल हुआ, तो भी उसे स्कूल नहीं भेजा गया.

गांव के सरपंच ने कहा, ‘‘इसे स्कूल भेजो. अगर यह पढ़ेगा नहीं, तो जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा. इस के साथ के बच्चे स्कूल जाने लगे हैं.’’

यह सुन कर राम सजीवन कहता, ‘‘सरपंचजी, आप ने सुना नहीं कि पंडितजी ने इस के जन्म पर क्या कहा था. इसे कभी भी रुपएपैसे की कमी नहीं रहेगी. इस की नाक के नीचे दाहिनी ओर तिल है. आखिर, पढ़लिख कर करेगा क्या… कोई सरकारी नौकरी पा जाएगा बस.’’

राम सजीवन ने पंडित की बात मान कर अपने बेटे को स्कूल नहीं भेजा. उस के साथ के कई बच्चे पढ़लिख कर अफसर बन गए, लेकिन राम सजीवन का बेटा अपने खेत में घास काटता रह गया.

इसी तरह की एक और घटना है. कामचोर गनपत को गांव के पुजारी शिवशंकर ने बताया कि अगर धनदौलत चाहिए, तो कमल पर बैठे गणेशजी की पूजा करो, जल्द ही मालदार हो जाओगे. पर इस बात का ध्यान रहे कि शरीर पर मात्र धोती होनी चाहिए और कोई कपड़ा नहीं होना चाहिए. सुबह और शाम को सूरज डूबते ही रात के 10 बजे तक मंत्र के साथ लगातार हवन करो.

गनपत को अमीर बनने का जुनून सवार हो गया. वह कमल पर बैठे गणेश की तसवीर के सामने पूजा करने के लिए बेचैन हो गया. बाजार में कमल पर बैठे गणेश की तसवीर खूब ढूंढ़ी, पर उसे नहीं मिली.

एक दुकानदार को उस ने कहा कि जितना भी पैसा लगे, ले लो और कमल पर बैठे गणेश वाली तसवीर मंगाओ.

उस ने गनपत से 3 सौ रुपए ले कर कमल पर बैठे गणेश की तसवीर मंगा कर दे दी, जबकि ऐसी तसवीर 10 रुपए में आसानी से मिल जाती है.

गनपत सुबहशाम घर के सारे काम छोड़ कर केवल धोती पहन कर गणेश की पूजा करता. शरीर का ऊपरी हिस्सा खुला होने की वजह से उसे मच्छरों ने खूब काटा, जिस से उसे मलेरिया बुखार हो गया.

अंधविश्वास के चक्कर में वह अमीर तो नहीं बना, लेकिन घर में जो पैसा था, वह भी उस के इलाज में चला गया.

कीर्ति का बेटा पढ़ने में कमजोर होने के साथसाथ फुजूल की बातों में ज्यादा ध्यान देता था. स्कूल से रोज उस की शिकायत आती थी कि वह होमवर्क नहीं करता.

कीर्ति एक बाबा के पास अपनी सहेली के साथ बेटे को ले कर दिखाने गई. बाबा ने 501 रुपए लिए और उसे एक लौकेट दे दिया और कहा कि इसे हमेशा गले में पहना कर रखो. बेटा पढ़ने लगेगा.

उस बाबा ने यह भी कहा कि अपने बेटे की जगह तुम हरे रंग के गणेशजी की पूजा करो, क्योंकि बुद्धि का कारक बुध ग्रह होता है और हरे रंग का कारक बुध है. अगर ऐसे लोग हरे रंग के या पन्ने से बने गणेशजी की पूजा करें, तो उन के बुध ग्रह से संबंधित सभी दोष कम हो जाएंगे और इस का उन्हें लाभ मिलेगा.

कीर्ति अपने बच्चे की ओर ध्यान देने के बजाय बाबा के चक्कर में पड़ गई. गणेश की पूजा में ज्यादा से ज्यादा समय गंवाने लगी. नतीजतन, उस का बेटा स्कूल के हर टैस्ट में फेल होता गया.

पुराने खयालों की श्यामा की नईनवेली बहू आई. महल्ले के लोगों ने देख कर खूब सराहा कि श्यामा की बहू बहुत सुंदर और गुणी है. लेकिन महल्ले की राधा से रहा नहीं गया और उस ने कह दिया, ‘‘बाकी सब तो ठीक है, लेकिन बहू के दाएं गाल पर तिल है. पता नहीं, श्यामा को फलेगा कि नहीं.’’

श्यामा का भी ध्यान बहू के तिल पर गया और वे परेशान हो उठीं. दूसरे ही दिन वे बीमार पड़ गईं. नातेरिश्तेदार कहने लगे कि बहू के कदम पड़ते ही सास बीमार पड़ गई. न जाने क्या होगा.

पढ़ीलिखी होने की वजह से बहू रत्ना ने घर वालों से कहा, ‘‘यह आप लोगों का वहम है. तिल होने से कुछ नहीं होता. आप लोगों को परेशानी है कि मेरे दाएं गाल पर तिल है. मैं कल ही यह तिल हटवा दूंगी.’’

सास ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्या ऐसा भी हो सकता है?’’

‘‘हो सकता है. लेजर मशीन से शरीर के किसी भी हिस्से का तिल हटाया जा सकता है,’’ रत्ना ने कहा.

रत्ना दूसरे दिन ही ब्यूटीपार्लर में जा कर दाएं गाल का तिल हटवा कर घर आ गई. उस की सास ने देखा कि गाल पर तिल अब नहीं है. उस ने राधा को बुला कर दिखाया और कहा, ‘‘देख, मेरी बहू के दाएं गाल पर तिल नहीं है.’’

राधा मुंह बना कर चली गई. तिल से घर में कुछ हुआ नहीं, लेकिन बेवजह तिल हटवाने के लिए हजारों रुपए चले गए.

शंकर का कारोबार नहीं चल रहा था. वह परेशान रहता था. उस की पत्नी आरती ने कहा, ‘‘जरूर दुकान पर कोई टोटका कर गया है, इसलिए दुकान नहीं चल रही है. पड़ोसन संध्या बता रही थी कि एक बाबा हैं, जो लोगों की परेशानियां हल कर देते हैं.’’

शंकर ने कहा, ‘‘मैं बाबाओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता. सब के सब ढोंगी होते हैं. पिछली बार भी तुम्हारे कहने पर एक बाबा के पास गया था, तो दुकान तो चली नहीं, लेकिन 10 हजार रुपए का नुकसान हो गया था.’’

आरती ने एक दिन बाबा से मिल कर सारी बातें बताईं. बाबा ने कहा कि तंत्र शास्त्र में ऐसे कई टोटके हैं, जिन से ऐसी सभी समस्याएं तुरंत हल हो जाती हैं. तुम्हारी मुसीबत का हल निकालने के लिए 5 हजार रुपए खर्च करने होंगे.

आरती ने शंकर को सारी बातें बताईं. पहले तो वह तैयार नहीं हुआ, लेकिन बाद में वह पत्नी के दबाव के आगे  झुक गया. 5 हजार रुपए देने के बाद भी शंकर की माली हालत में कोई सुधार नहीं आया.

थकहार कर शंकर ने अपने दोस्त हरीश को सारी बातें बताईं. उस ने सलाह दी कि तुम जूस या फिर आइसक्रीम की दुकान खोलो. आसपास ऐसी दुकान नहीं है.

शंकर ने वैसा ही किया और उस की दुकान चल निकली.

दरअसल, कोई तांत्रिक, साधु, पंडित और ज्योतिषी घाटे में चल रहे उद्योगधंधे को न तो फायदे में पहुंचा सकते हैं और न ही कुछ और कर सकते हैं. टोटके से केवल समय और पैसे की बरबादी होती है. अंधविश्वास के खूंटे में बंधे रहने से न तो समाज की तरक्की होगी और न ही देश की.

रमेश कुमार ‘रिपु’

Story : बसंती

Story. गांव का एकलौता पुरोहित भोला इस बात से पूरी तरह वाकिफ था कि मरने से पहले बसंती की मां बेटी के पास कुछ चांदी के सिक्के व जेवरात छोड़ गई है, जिसे किसी बहाने से हासिल कर के वह कुछ दिनों के लिए अपनी बदहाली तो दूर कर ही सकता है.

थोड़ी देर में ही पूजा का काम खत्म कर उस ने एक गहरी नजर से बीमार सुमन की ओर देखा. फिर बसंती की ओर मुखातिब हो कर बोला, तेरी बेटी को कोई प्रेतात्मा परेशान कर रही है. अब इसे बचाना बड़ा मुश्किल है. अच्छा होगा कि तू इस मनहूस बच्ची का मोह छोड़ कर फिर से गोद भरने की कोशिश करे.

पुरोहित से ऐसा जवाब सुन कर बसंती दुखी आवाज में बोली, बाबा, अगर मेरी एकलौती बेटी मर गई, तो फिर मैं अपनी सूनी गोद ले कर यह पहाड़ सी जिंदगी कैसे काट पाऊंगी? बसंती की इस कमजोरी से पुरोहित को अपने अंधविश्वास का तीर सही निशाने पर लगने का एहसास हुआ. उस ने सहज ही यह जान लिया कि अब देरसवेर वह उस की झोली  में जरूर आ गिरेगी.

पुरोहित भोला मन ही मन मुसकराते हुए मीठी आवाज में बोला, तेरी मां अपने मन में धनदौलत का मोह लिए ही मर गई, इसलिए उस की आत्मा प्रेतलोक में बेचैन भटक रही है. अब वही बेचैन आत्मा प्रेतलोक से लौट कर इस घर में आ बैठी है, जिस के असर से तेरी गोद और सुमन की जिंदगी दोनों खतरे में है.

तो फिर इस प्रेतात्मा से पीछा छुड़ाने का कोई उपाय बताइए बाबा? बसंती ने सहमते हुए पूछा. तुम फौरन अपनी मां के सारे जेवरात और चांदी के सिक्के अपने हाथ से छू कर किसी ब्राह्मण को दान कर दो. उसी दान की बदौलत सुमन को एक नई जिंदगी मिलेगी और तुम्हें मां बनने का सुनहरा मौका.

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पुरोहित की कही बात पर गंवार बसंती ने पूरी तरह यकीन कर लिया. फिर भी वह अपनी लाचारी जाहिर करते हुए बोली, “लेकिन बाबा, मैं तो बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर पहले से ही अपने सारे जेवर बेच चुकी हूं, अब इस हाल में मां के जेवर भी दान में दे दूंगी, तो फिर वक्त पड़ने पर किस के आगे हाथ पसारने जाऊंगी? कौन सहारा देगा मुझे ’’

बसंती की मजबूरी को सुन कर पुरोहित को अपना खेल बिगड़ता नजर आया. लेकिन तुरंत ही लोभ का दूसरा पासा फेंकते हुए वह बोला, ‘‘क्या तेरे मन में बेटा पाने की तनिक भी लालसा नहीं है?’’ ‘‘लालसा तो कब से लगी है…’’ बसंती झेंपते  हुई बोली, ‘‘सिर्फ एक बेटे की कमी से मेरी पूरी जिंदगी बोझ जैसी बन गई है. एक बेटा पाने के लिए मैं कब से तरस रही हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, कल सुबह तुम अपनी मां के सारे जेवर मुझे दान में दे देना. फिर देखना, मैं तेरे अंधेरे घर में कितनी जल्दी उजाला कर देता हूं,’’ इतना कहते हुए भोला की नजर बसंती की देह से फिसलती हुई वहां जा कर ठहर गई, जहां लोहे की पुरानी संदूकची पड़ी हुई थी.

अब बसंती को पुरोहित की नीयत समझने में जरा भी देर नहीं हुई, पर घर में अकेली और देह से कमजोर बसंती मन मसोस कर रह गई. ‘‘अब क्या सोचने लगी?’’ भोला ने उसे टोका, ‘‘क्या मेरा सुझाव ठीक नहीं लगा?’’ ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ बसंती ने ऊंची आवाज में नफरत से कहा, ‘‘अपनी गोद दोबारा भरने के लिए मां के कीमती जेवर किसी और के हाथ में देने की हिम्मत मुझ में नहीं है.’’

बसंती के इस रूखे बरताव ने पुरोहित के लहलहाते अरमानों पर ओले बरसा दिए. फिर भी पुरोहित ने हार नहीं मानी और धीमी आवाज में बोला, ‘‘जब बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर तुम ने अपने जेवर बेच दिए, तो दोबारा मां बनने की उम्मीद में तुम अपनी मां के पुराने गहने पुरोहित को दान में नहीं दे सकतीं? जानती नहीं, पुरोहित को दिया हुआ दान लोकपरलोक दोनों को सुधारता है?’’

पुरोहित ने एक बार फिर उस संदूकची की ओर देखा, तो बसंती का रोमरोम एक अनजाने खौफ से सिहर उठा. अभी वह खामोश खड़ी थी कि पुरोहित की पत्नी कमला पति को तलाशती हुई वहां आ पहुंची और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्योंजी, यजमानी के इस काम से जो आमदनी होती है, उसे आप शराब और गांजा पीने में उड़ा देते हैं, फिर यह धंधा सिर पर ढोने से क्या फायदा, जब घर में बीवीबच्चे रोटी के लिए तरस रहे हों?’’

‘‘ठीक है, आज का ‘सीधा’ बसंती बहू से ले लो और घर जा कर भोजन बनाओ,’’ पुरोहित ने पत्नी को टालने की नीयत से कहा और जल्दी से पोथीपतरा समेट कर दूसरे यजमान के घर कथा बांचने चला गया.

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भोला के जाते ही ‘सीधा’ लेने के लिए ठहरी कमला बसंती को उदास देख कर संजीदगी से पूछ बैठी, ‘‘इस पूजापाठ के पीछे तेरी क्या मुराद है बहू?’’ ‘‘मासूम बेटी की सलामती, जो अब मुमकिन नहीं लगती.’’ ‘‘ऐसा क्यों?’’ कमला उतावली हो कर पूछ बैठी, ‘‘क्या इस पूजापाठ पर तुझे बिलकुल भरोसा नहीं?’’ ‘‘भरोसा तो है चाची, लेकिन आज के पुरोहित पूजापाठ की ओट में अपने यजमान को उलटा पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए हैं. धर्मकर्म के नाम पर अब ये ढोंगी अपने यजमान का धन और धर्म दोनों लूट लेना चाहते हैं.’’

‘‘यह तुम क्या बकने लगी बहू?’’ कमला हैरत से बोली, ‘‘मैं ने क्या पूछा और तू जवाब क्या देने लगी?’’ ‘‘सच कहती हूं चाची…’’ बसंती का गला भर आया, ‘‘बेटी की लंबी बीमारी ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया है और इसी आफत में पुरोहितजी दोबारा गोद भरने का लालच दे कर मेरा सबकुछ ठग लेना चाहते हैं.’’ बसंती की पीड़ा सुन कर कमला का दिमाग झनझना उठा. उस के हाल पर तरस खा कर वह बोली, ‘‘ठीक है बहू, इस समय मैं खाना बनाने जा रही हूं. लेकिन शाम को इस बारे में तुम से फिर बात करूंगी.’’

शाम को कमला बसंती से मिल कर उस की आपबीती से पूरी तरह वाकिफ हो चुकी थी. दूसरे दिन सुबह पुरोहित जैसे ही कथा बांचने के लिए बसंती के घर पहुंचा, तो उस के पीछेपीछे कमला भी आ गई. पत्नी को इस तरह आया देख पुरोहित अपनी लाल आंखों से उसे घूरते हुए रूखे स्वर में बोला, ‘‘आज सुबह से ही तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो? क्या चाहती हो तुम?’’ ‘‘बस यही कि अब आप यह यजमानी का पेशा छोड़ दीजिए,’’ कमला ने कहा. ‘‘वह क्यों?’’ भोला ने हैरत से पूछा.

‘‘क्योंकि अब यह पेशा शरीफ ब्राह्मणों का सुकर्म नहीं, बल्कि खातेपीते ब्राह्मणों का कुकर्म बन गया है. अब यह पेशा पुरोहित और यजमान के पाक रिश्ते के बीच एक ऐसी दरार पैदा करता जा रहा है, जो आने वाले दिनों में दोनों की शराफत पर एक सवालिया निशान लगा सकता है,’’ कमला ने पति की ओर देख कर संजीदगी से कहा.

पुरोहित ने जोर से चीख कर कमला को एक जबरदस्त धक्का दिया, जिस से वह सामने की दीवार से जा टकराई और उस का सिर लहूलुहान हो गया. चोट बड़ी गंभीर लगी थी. कमला फूटफूट कर रो पड़ी, लेकिन भोला पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह गुस्से में अपनी पत्नी को और भी भलाबुरा कहने लगा.

पति की घुड़की से बेअसर कमला बरसती आंखों से उसे देखती हुई बोली, ‘‘आज मुझे भी पता चल गया है कि पुरोहित कितना नीच और घटिया इनसान होता है, जो अपने यजमान की मजबूरी पर तरस खाने के बजाय उस की दौलत व इज्जत लूटने को तैयार हो जाता है.

‘‘अब मेरे लिए विधवा की जिंदगी जी लेना आसान है, मगर किसी ढोंगी, लोभी, पाखंडी, ठग और धर्मकर्म का पेशा करने वाले पुरोहित की सुहागन बन कर जी लेना आसान नहीं. ऐसा कभी नहीं होगा.’’ इतना कह कर कमला जैसे ही वहां से चलने को हुई कि अचानक पुरोहित के भीतर का इनसान जाग उठा और कमला के सिर पर हाथ रखते हुए वह भरे गले से बोला, ‘‘तेरी कसम, यह पूजापाठ, हवन, जाप, लोकपरलोक, पुरोहित और यजमान सब बनावटी बातें हैं.”

‘‘अब इस गलत काम को मैं कभी नहीं दोहराऊंगा. ऐसे दकियानूसी विचारों में कोरे अंधविश्वास व दिमागी वहम के सिवा कुछ और नहीं है. तुम आखिरी बार मुझे माफ कर दो.’’  फिर कमला बिना पति की ओर देखे बसंती की बीमार बेटी सुमन को गोद में उठा कर तेज कदमों से डाक्टर के पास चल पड़ी. Story

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