News Story: एसआईआर चेतावनी और जानकारी

News Story: देशभर में चल रहा एसआईआर यानी स्पैशल इंटैसिव रिविजन अभियान हर नागरिक के लोकतांत्रिक वजूद से जुड़ा सवाल बन चुका है. इस प्रोसैस को हलके में लेना यादेखा जाएगासोच कर टाल देना आने वाले सालों में भारी पड़ सकता है.
 इस कदम का असली इरादा तो सिर्फ सरकार समर्थक लोगों का नाम लिस्ट में रखने का था, पर विरोधी दलों और खासकर राहुल गांधी ने जोरदार बहस छेड़ दी, जिस से चुनाव आयोग भारतीय जनता पार्टी की मनचाही लिस्टें नहीं बनवा पाया. अब लगता है कि भाजपा ने लिस्टों के जरीए चुनाव जीतने का इरादा छोड़ दिया है, क्योंकि बिहार में वोटर लिस्टों में बड़ी गड़बड़ी नहीं कर पाने के बावजूद वह भारी बहुमत से जीत गई.
देश के दूसरे राज्यों में एसआईआर में किस का नाम बना रहे या नहीं रहे, इस से भारतीय जनता पार्टी को फर्क नहीं पड़ता. सब से पहले यह साफ सम? लें कि वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब क्या है?
अगर आप का नाम वोटर लिस्ट से कट गया, तो इस का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आप वोट नहीं डाल पाएंगे, बल्कि इस के असर बहुत दूरगामी होंगे.
नाम कटने के बाद
होने वाली मुश्किलें
* आप किसी भी चुनाव में वोटिंग नहीं कर पाएंगे.
* दोबारा नाम जुड़वाने का प्रोसैस लंबा और थकाऊ होगा.
* कई बार महीनों या 1-2 साल तक नाम नहीं जुड़ता.
* सरकारी योजनाओं में पहचान कमजोर पड़ती है.
* राजनीतिक या प्रशासनिक लैवल पर आप कीआवाजजीरो हो जाती है.
* कई जगह वोटर आइडैंटिटी कार्ड पहचान दस्तावेज के रूप में मांगा जाता है.
* स्थानीय निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव सब से बाहर हो सकते हैं.
* यही नहीं, यह भी मुमकिन है कि कल को नौकरी, जमीन खरीदने, किसी चीज का लाइसैंस लेने, बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए लिस्ट की कौपी सरकार मांगने लगे.
* सरकारी अफसर रिश्वत लेने का इसे बढि़या तरीका बना सकते हैं.
* भाजपा लिस्ट से बाहर कट्टर हिंदुओं के अलावा सब को विदेशी मान ले. आधारकार्ड के मामले में सरकार ऐसा कर चुकी है.


एसआईआर में सब से खतरनाक गलतफहमी बहुत से लोग यह मान रहे हैं कि मेरा आधारकार्ड है, कुछ नहीं होगा. यह सब से बड़ी भूल है, क्योंकि आधारकार्ड नागरिकता या वोटर होने का सुबूत नहीं है. एसआईआर में आधारकार्ड केवल सहायक दस्तावेज है, निर्णायक नहीं. अगर बीएलओ या सत्यापन अधिकारी पूछे, तो आप को क्या बताना है :
* सब से पहले यह कहें (साफ और शांत शब्दों में), ‘‘मैं इस पते पर नियमित रूप से रह रहा हूं या रह रही
हूं और मेरा नाम वोटिंग लिस्ट में बना रहना चाहिए.’’
अगर पूछा जाए कि क्या आप का नाम साल 2003 की लिस्ट में शामिल है? तो घबराएं नहीं, यह जवाब दें, ‘‘मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन मैं एसआईआर फार्म भर रहा हूं या भर रही हूं और जरूरी दस्तावेज दे रहा हूं या दे रही हूं.’’ याद रखें कि साल 2003 की लिस्ट में नाम होना या होना अकेला आधार नहीं है, लेकिन फार्म भरना सब से बड़ा जोखिम है.


आप को क्याक्या करना जरूरी है
* एसआईआर फार्म भरना ही सब से जरूरी कदम है, चाहे :
* आप का नाम पहले से वोटर लिस्ट में हो.
* आप सालों से वोट डालते रहे हों.
* आप के मातापिता वोटर रहे हों.
* अगर फार्म नहीं भरा, तो नाम कटने का खतरा बना रहता है.
दस्तावेज के बारे में साफ सम?
अगर अधिकारी दस्तावेज मांगे, तो इन में से जो उपलब्ध है, दें :
* जन्म प्रमाणपत्र.
* स्कूल/शैक्षिक प्रमाणपत्र.
* परिवार रजिस्टर की नकल.
* निवास प्रमाणपत्र.
* पासपोर्ट (अगर हो).
* जाति प्रमाणपत्र
* पुराना वोटर आईडी
एकसाथ सब जरूरी नहीं, लेकिन कम से कम एक मजबूत दस्तावेज
जरूर दें.
अगर अधिकारी आप से सवाल करे, तो कैसे बात करें :
* बहस करें.
* ऊंची आवाज में बात करें.
आप मेरा नाम काट रहे होजैसे आरोप लगाएं.
* शांत, तथ्य से भरपूर और लिखित प्रोसैस पर जोर दें.
याद रखें कि आप का बरताव आप की फाइल पर असर डाल सकता है.
सब से खतरनाक गलती जो लोग कर रहे हैं कि अभी नहीं मिला बीएलओ, बाद में देखेंगे. यहबाद मेंही नाम कटने की वजह बनता है.
अगर घर बंद मिला, आप बाहर थे, फार्म वापस नहीं दिया तो रिकौर्ड में लिखा जा सकता है कि नौट ट्रेसेबल (पता नहीं चल रहा) या फिर इनएक्टिव वोटर (निष्क्रिय मतदाता). और यही शब्द नाम कटने का आधार बन जाता है.


अगर नाम कट गया है तो क्या तुरंत ठीक हो जाएगा? नहीं. वजह :
* दावा या एतराज का प्रोसैस लंबा होता है.
* कई बार अधिकारी उपलब्ध नहीं होते.
* बारबार दफ्तर के चक्कर लग सकते हैं.
* अगला चुनाव निकल सकता है, इसलिए इलाज से बेहतर बचाव ही सम?ादारी है.
एक सीधा और कड़वा सच


लोकतंत्र में आप का वजूद तब तक है जब तक आप का नाम वोटिंग लिस्ट में है. अगर नाम कटा तो आप नागरिक तो रहेंगे, लेकिन फैसला लेने के प्रोसैस से बाहर हो जाएंगे. यह सिर्फ फार्म नहीं, बल्कि आप का अधिकार है.
एसआईआर अभियान को हलके में लेना आत्मघाती है, लोकतांत्रिक माने में. सरकार, आयोग, प्रशासन सब अपनी जगह हैं, लेकिन वोटर लिस्ट में आप का नाम होने की जिम्मेदारी आखिरकार आप की है.
आज फार्म भरना, दस्तावेज देना और सही जानकारी देना कल की लंबी लड़ाई से आप को बचा सकता है.
वोटर लिस्ट में आप का नाम होना जरूरी है

चुनाव और लालच : रोग बना महारोग

सुरेश चंद्र रोहरा

चुनाव का सीधा मतलब अब कोई न कोई लालच देना हो गया है. तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियां वोटरों को ललचाने का काम कर रही हैं और यह सीधासीधा फायदा नकद रुपए और दूसरी तरह के संसाधनों का है, जिसे सारा देश देख रहा है और संवैधानिक संस्थाएं तक कुछ नहीं कर पा रही हैं.

क्या हमारे संविधान में कोई ऐसा प्रावधान है कि राजनीतिक दल देश के वोटरों को किसी भी हद तक लुभाने के लिए आजाद हैं और वोटर अपनी समझ गिरवी रख कर के अपने वोट ऐसे नेताओं को बेच देंगे, जो सत्तासीन हो कर 5 साल तक उन्हें भुला बैठते हैं?

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क्या यह उचित है कि चुनाव जीतने के लिए लैपटौप, स्कूटी, मोबाइल, रुपएपैसे दिए जाना जरूरी हो? क्या अब विकास का मुद्दा पीछे रह गया है? क्या देश के दूसरे अहम मसले पीछे रह गए हैं कि हमारे नेताओं को रुपएपैसे का लौलीपौप वोटरों को देना जरूरी हो गया है या फिर यह सब गैरकानूनी है?

अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर ऐक्शन ले लिया है और अब देखना यह है कि आगेआगे होता है क्या? क्या रुपएपैसे के लोभलालच पर अंकुश लग जाएगा या फिर और बढ़ता चला जाएगा? यह सवाल आज हमारे सामने खड़ा है.

25 जनवरी, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त सुविधाएं देने के वादे करना एक गंभीर मद्दा है.’

चीफ जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने इस मामले को ले कर देश में चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था भारतीय चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया है.

चुनाव में ‘माले मुफ्त दिल ए बेरहम’ जैसी हरकतें कर रहे राजनीतिक दलों  की मान्यता रद्द करने की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने यह कदम उठाया. इस के बाद अब यह बहुतकुछ मुमकिन है कि आने वाले समय में कोई ठोस नतीजा सामने आ जाए.

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आप को यह बताते चलें कि सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एनवी रमण ने कहा, ‘अदालत जानना चाहती है कि इसे कानूनी रूप से कैसे नियंत्रित किया जाए? क्या ऐसा इन चुनावों के दौरान किया जा सकता है या इसे अगले चुनाव के लिए किया जाए? निश्चित ही यह एक गंभीर मुद्दा है, क्योंकि मुफ्त बजट तो नियमित बजट से भी तेज है.’

दरअसल, देश की चुनाव व्यवस्था और राजनीतिक दलों की मुफ्त घोषणाओं पर यह सुप्रीम कोर्ट का खास और गंभीर तंज है.

नींद में चुनाव आयोग

लंबे समय से देश में चुनाव आयोग वोटरों को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा की जा रही घोषणाओं पर एक तरह से चुप्पी साध कर बैठा हुआ है. लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव उसे निष्पक्ष तरीके से पूरा कराने की जिम्मेदारी देश के संविधान ने चुनाव आयोग को सौंपी है और यह चुनाव आयोग केंद्र सरकार की मुट्ठी में रहा है.

ऐसे में राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे असंसदीय बरताव और कानून की नजर से गलतसलत बरताव को देखते हुए भी अनदेखा करता रहा है, वरना तकरीबन 40 साल पहले शुरू हुए वोटरों को लुभाने की कोशिशों पर शुरुआत में ही अंकुश लगाया जा सकता था.

दक्षिण भारत के बड़े नेता अन्नादुरई ने बहुत सस्ते में वोटरों को चावल देने की घोषणा के साथ इस चुनावी लालच के सफर की शुरुआत की थी, जिस के बाद एनटी रामाराव ने आंध्र प्रदेश में इस चलन को आगे बढ़ाया.

वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, जो अपने शबाब पर है, अखिलेश यादव ने वोटरों को लुभाने के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी है कि अगर हमारी सरकार आई तो हम यह देंगे, वह देंगे. इसी तरह कांग्रेस की चुनाव कमान संभालने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी उत्तर प्रदेश चुनाव में वोटरों को कांग्रेस की सरकार बनने पर बहुतकुछ फ्री में देने का ऐलान कर दिया है.

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पंजाब में कांग्रेस के नवजोत सिंह सिद्धू ने भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और फ्री में बहुतकुछ देने की योजनाएं जारी कर दी हैं. अब यह रोग देशभर में महारोग बन चुका है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया है.

आप को यह बताते चलें कि चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के साथ एक बैठक कर उन से उन के विचार जानने चाहे थे और फिर यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया था.

सुप्रीम कोर्ट में वोटरों को लालच देने के मुद्दे वाली यह याचिका भारतीय जनता पार्टी के नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है. याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक दलों के चुनाव के समय मुफ्त चीजें देने की घोषणाएं वोटरों को गलत तरीके से प्रभावित करती हैं. इस से चुनाव प्रक्रिया भी प्रभावित होती है और यह निष्पक्ष चुनाव के लिए ठीक नहीं है.

पीठ ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सुब्रह्मण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार मामले के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया. उस में अदालत ने कहा था कि चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 123 के तहत भ्रष्ट आचरण के रूप में नहीं माना जा सकता है.

इस बारे में अदालत ने चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों की सलाह से आदर्श आचार संहिता में शामिल करने की सलाह दी थी.

याचिकाकर्ता की तरफ से एक सीनियर वकील ने दलील दी कि इस मामले में केंद्र सरकार से हलफनामा तलब करना चाहिए. राजनीतिक दल किस के पैसे के बल पर रेवडि़यां बांटने के वादे कर रहे हैं. कैसे राजनीतिक दल मुफ्त उपहार की पेशकश कर रहे हैं. हर पार्टी एक ही काम कर रही है.

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इस पर चीफ जस्टिस एनवी रमण ने उन्हें टोका और पूछा कि अगर हर पार्टी एक ही काम कर रही है, तो आप ने अपने हलफनामे में केवल 2 पार्टियों का ही नाम क्यों लिया है.

जवाब में उन वकील ने कहा कि वे पार्टी का नाम नहीं लेना चाहते. पीठ में शामिल जस्टिस हिमा कोहली ने उन से पूछा कि आप के बयानों में काफीकुछ स्पष्ट है. याचिकाकर्ता के वकील का सुझाव था कि इस तरह की गतिविधि में शामिल पार्टी को मान्यता नहीं देनी चाहिए.

अब देखिए कि आगे क्या होता है. क्या सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से देश में आने वाले चुनाव में वोटरों को ललचाने का खेल बंद होगा या फिर यह बढ़ता ही चला जाएगा?

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