26 जनवरी स्पेशल: छुट्टी-बार्डर पर खड़े एक सैनिक की कहानी

दूर दूर तक जहां तक नजर जा सकती थी, पहाड़ों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी. प्रेमी जोड़ों के लिए यह एक शानदार जगह हो सकती थी, पर सरहद पर इन पहाड़ियों की शांति के पीछे जानलेवा अशांति छिपी हुई थी. पिछले कई महीनों से कोई भी दिन ऐसा नहीं बीता था, जब तोपों के धमाकों और गोलियों की तड़तड़ाहट ने यहां की शांति भंग न की हो.

‘‘साहबजी, आप कौफी पीजिए. ठंड दूर हो जाएगी,’’ हवलदार बलवंत सिंह ने गरम कौफी का बड़ा सा मग मेजर जतिन खन्ना की ओर बढ़ाते हुए कहा.

‘‘ओए बलवंत, लड़ तो हम दिनरात रहे हैं, मगर क्यों  यह तो शायद ऊपर वाला ही जाने. अब तू कहता है, तो ठंड से भी लड़ लेते हैं,’’ मेजर जतिन खन्ना ने हंसते हुए मग थाम लिया.

कौफी का एक लंबा घूंट भरते हुए वे बोले, ‘‘वाह, मजा आ गया. अगर ऐसी कौफी हर घंटे मिल जाया करे, तो वक्त बिताना मुश्किल न होगा.’’

‘‘साहबजी, आप की मुश्किल तो हल हो जाएगी, लेकिन मेरी मुश्किल कब हल होगी ’’ बलवंत सिंह ने भी कौफी का लंबा घूंट भरते हुए कहा.

‘‘कैसी मुश्किल ’’ मेजर जतिन खन्ना ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘साहबजी, अगले हफ्ते मेरी बीवी का आपरेशन है. मेरी छुट्टियों का क्या हुआ ’’ बलवंत सिंह ने पूछा.

‘‘सरहद पर इतना तनाव चल रहा है.  हम लोगों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. ऐसे में छुट्टी मिलना थोड़ा मुश्किल है, पर मैं कोशिश कर रहा हूं,’’ मेजर जतिन खन्ना ने समझाया.

‘‘लेकिन सर, क्या देशभक्ति का सारा ठेका हम फौजियों ने ही ले रखा है ’’ कहते हुए बलवंत सिंह ने मेजर जतिन खन्ना के चेहरे की ओर देखा.

‘‘क्या मतलब… ’’ मेजर जतिन खन्ना ने पूछा.

‘‘यहां जान हथेली पर ले कर डटे रहें हम, वहां देश में हमारी कोई कद्र नहीं. सालभर गांव न जाओ, तो दबंग फसल काट ले जाते हैं. रिश्तेदार जमीन हथिया लेते हैं. ट्रेन में टीटी भी पैसे लिए बिना हमें सीट नहीं देता. पुलिस वाले भी मौका पड़ने पर फौजियों से वसूली करने से नहीं चूकते,’’ बलवंत सिंह के सीने का दर्द बाहर उभर आया.

‘‘सारे जुल्म सह कर भी हम देश पर अपनी जान न्योछावर करने के लिए तैयार हैं, मगर कम से कम हमें इनसान तो समझा जाए.

‘‘घर में कोई त्योहार हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. कोई रिश्तेदार मरने वाला हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. जमीनजायदाद का मुकदमा हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. अब बीवी का आपरेशन है, तो भी छुट्टी नहीं मिलेगी. लानत है ऐसी नौकरी

पर, जहां कोई इज्जत न हो.’’

‘‘ओए बलवंत, आज क्या हो गया है तुझे  कैसी बहकीबहकी बातें कर रहा है  अरे, हम फौजियों की पूरी देश इज्जत करता है. हमें सिरआंखों पर बिठाया जाता है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘हां, इज्जत मिलती है, लेकिन मर जाने के बाद. हमें सिरआंखों पर बिठाया जाता है, मगर शहीद हो जाने के बाद. जिंदा रहते हमें बस और ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी, हमारे बच्चे एकएक पैसे को तरसेंगे, मगर मरते ही हमारी लाश को हवाईजहाज पर लाद कर ले जाया जाएगा. परिवार के दुख को लाखों रुपए की सौगात से खरीद लिया जाएगा. जिस के घर में कभी कोई झांकने भी न आया हो, उसे सलामी देने हुक्मरानों की लाइन लग जाएगी.

‘‘हमारी जिंदगी से तो हमारी मौत लाख गुना अच्छी है. जी करता है कि उसे आज ही गले लगा लूं, कम से कम परिवार वालों को तो सुख मिल सकेगा,’’ कहते हुए बलवंत सिंह का चेहरा तमतमा उठा.

‘‘ओए बलवंत…’’

‘‘ओए मेजर…’’ इतना कह कर बलवंत सिंह चीते की फुरती से मेजर जतिन खन्ना के ऊपर झपट पड़ा और उन्हें दबोचे हुए चट्टान के नीचे आ गिरा. इस से पहले कि वे कुछ समझ पाते, बलवंत सिंह के कंधे पर टंगी स्टेनगन आग उगलने लगी.

गोलियों की ‘तड़…तड़…तड़…’ की आवाज के साथ तेज चीखें गूंजीं और चंद पलों बाद सबकुछ शांत हो गया.

‘‘ओए बलवंत मेरे यार, तू ठीक तो है न ’’ मेजर जतिन खन्ना ने अपने को संभालते हुए पूछा.

‘‘हां, साहबजी, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ बलवंत सिंह हलका सा हंसा, फिर बोला, ‘‘मगर, ये पाकिस्तानी कभी ठीक नहीं होंगे. इन की समझ में क्यों नहीं आता कि जब तक एक भी हिंदुस्तानी फौजी जिंदा है, तब तक वे हमारी चौकी को हाथ भी नहीं लगा सकते,’’ इतना कह कर बलवंत सिंह ने चट्टान के पीछे से झांका. थोड़ी दूरी पर ही 3 पाकिस्तानी सैनिकों की लाशें पड़ी थीं. छिपतेछिपाते वे कब यहां आ गए थे, पता ही नहीं चला था. उन में से एक ने अपनी एके 47 से मेजर जतिन खन्ना के सीने को निशाना लगाया ही था कि उस पर बलवंत सिंह की नजर पड़ गई और वह बिजली की रफ्तार से मेजर साहब को ले कर जमीन पर आ गिरा.

‘‘बलवंत, तेरी बांह से खून बह रहा है,’’ गोलियों की आवाज सुन कर खंदक से निकल आए फौजी निहाल सिंह ने कहा. उस के पीछेपीछे उस चौकी की सिक्योरिटी के लिए तैनात कई और जवान दौडे़ चले आए थे.

‘‘कुछ नहीं, मामूली सी खरोंच है. पाकिस्तानियों की गोली जरा सा छूते हुए निकल गई थी,’’ कह कर बलवंत सिंह मुसकराया.

‘‘बलवंत, तू ने मेरी खातिर अपनी जान दांव पर लगा दी. बता, तू ने ऐसा क्यों किया ’’ कह कर मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘क्योंकि देशभक्ति का ठेका हम फौजियों ने ले रखा है,’’ कह कर बलवंत सिंह फिर मुसकराया.

‘‘तू कैसा इनसान है. अभी तो तू सौ बुराइयां गिना रहा था और अब देशभक्ति का राग अलाप रहा है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने दर्दभरी आवाज में कहा.

‘‘साहबजी, हम फौजी हैं. लड़ना हमारा काम है. हम लड़ेंगे. अपने ऊपर होने वाले जुल्म के खिलाफ लड़ेंगे, मगर जब देश की बात आएगी, तो सबकुछ भूल कर देश के लिए लड़तेलड़ते जान न्योछावर कर देंगे. कुरबानी देने का पहला हक हमारा है. उसे हम से कोई नहीं छीन सकता,’’ कहतेकहते बलवंत सिंह तड़प कर जोर से उछला.

उस के बाद एक तेज धमाका हुआ और फिर सबकुछ शांत हो गया.

बलवंत सिंह की जब आंखें खुलीं, तो वह अस्पताल में था. मेजर जतिन खन्ना उस के सामने ही थे.

‘‘सरजी, मैं यहां कैसे आ गया ’’ बलवंत सिंह के होंठ हिले.

‘‘अपने ठेके के चलते…’’ मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह के सिर पर हाथ फेरा, फिर बोले, ‘‘तू ने कमाल कर दिया. दुश्मन के

3 सैनिक एक तरफ से आए थे, जिन्हें तू ने मार गिराया था. बाकी के सैनिक दूसरी तरफ से आए थे. उन्होंने हमारे ऊपर हथगोला फेंका था, जिसे तू ने उछल कर हवा में ही थाम कर उन की ओर वापस उछाल दिया था. वे सारे के सारे मारे गए और हमारी चौकी बिना किसी नुकसान के बच गई.’’

‘‘तेरे जैसे बहादुरों पर देश को नाज है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने बलवंत सिंह का कंधा थपथपाया, फिर बोले, ‘‘तू भी बिलकुल ठीक है. डाक्टर बता रहे थे कि मामूली जख्म है. एकदो दिन में यहां से छुट्टी मिल जाएगी.

‘‘छुट्टी…’’ बलवंत सिंह के होंठ धीरे से हिले.

‘‘हां, वह भी मंजूर हो गई है. यहां से तू सीधे घर जा सकता है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने बताया, फिर चौंकते हुए बोले, ‘‘एक बात बताना तो मैं भूल ही गया था.’’

‘‘क्या… ’’ बलवंत सिंह ने पूछा.

‘‘तुझे हैलीकौफ्टर से यहां तक लाया गया था.’’

‘‘पर अब हवाईजहाज से घर नहीं भेजेंगे ’’ कह कर बलवंत सिंह मुसकराया.

‘‘कभी नहीं…’’ मेजर जतिन खन्ना भी मुसकराए, फिर बोले, ‘‘ब्रिगेडियर साहब ने सरकार से तुझे इनाम देने की सिफारिश की है.’’

‘‘साहबजी, एक बात बोलूं ’’

‘‘बोलो…’’

‘‘इनाम दिलवाइए या न दिलवाइए, मगर सरकार से इतनी सिफारिश जरूर करा दीजिए कि हम फौजियों की जमीनजायदाद के मुकदमों का फैसला करने के लिए अलग से अदालतें बना दी जाएं, जहां फटाफट इंसाफ हो, वरना हजारों किलोमीटर दूर से हम पैरवी नहीं कर पाते.

‘‘सरहद पर हम भले ही न हारें, मगर अपनों से लड़ाई में जरूर हार जाते हैं,’’ बलवंत सिंह ने उम्मीद भरी आवाज में कहा.

मेजर जतिन खन्ना की निगाहें कहीं आसमान में खो गईं. बलवंत सिंह ने जोकुछ भी कहा था, वह सच था, मगर जो वह कह रहा है, क्या वह कभी मुमकिन हो सकेगा.

15 अगस्त स्पेशल: सैनिक पत्नियां, दहलीज से सरहद तक जद्दोजेहद

कहा जाता है कि शादी के समय अग्नि के सात फेरे लेने के साथ ही एक लड़की की अग्निपरीक्षा शुरू हो जाती है, लेकिन सैनिकों की जीवनसंगिनी की अग्निपरीक्षा तो विवाहसूत्र में बंधने से पहले ही शुरू हो जाती है, क्योंकि उन्हें पहले से ही यह पता होता है कि शायद उन्हें अपनी आधी जिंदगी पति से दूर रह कर गुजारनी पड़े या न मालूम जिंदगी के किस मोड़ पर उन का हमसफर उन्हें तनहा छोड़ दे.

अंजना राजवंशी के पति भारतीय सेना में लैफ्टिनैंट कर्नल हैं. वे कहती हैं कि एक फौजी से शादी करने वाली लड़की पहले से ही ऐसे हालात से रूबरू होने के लिए तैयार रहती है. फिर भी शुरूशुरू में पति से दूर रहना पड़ता था. ऐसे में नए घरसंसार में रचनेबसने में जीवनसाथी के प्रेम और मदद की कमी कुछ हद तक खली.

वे आगे कहती हैं कि खासकर सिविल बैकग्राउंड से ब्याह कर आने वाली लड़कियों के लिए तो यह काफी मुश्किल भरा दौर होता है. लेकिन अंजना दूर रह रहे अपने पति की गैरमौजूदगी में घर की जिम्मेदारी निभा कर देश के प्रति अपने फर्ज को बखूबी निभा रही हैं.

सैनिकों की पत्नियां घर से जुड़े तमाम काम और पारिवारिक जद्दोजेहद का बखूबी सामना करती हैं. घरपरिवार पर आने वाली मुसीबत से निबट कर वे दूर कहीं ड्यूटी दे रहे अपने पिया को बेफिक्र रखती हैं और उन्हें देश की हिफाजत करने का हौसला देती हैं.

पति का बनीं संबल

अनु माथुर एक सेना के अफसर की पत्नी हैं. वे कहती हैं कि चाहे बच्चों का स्कूल में दाखिला कराना हो या खुद को डाक्टर को दिखाना हो, पति की गैरमौजूदगी में हर छोटीबड़ी जिम्मेदारी उन्हें ही निभानी होती है.

वे आगे बताती हैं कि उन का बेटा अर्जुन साढ़े 3 साल की उम्र में गंभीर रूप से घायल हो गया. ऐसे में पति से दिमागी संबल न मिल पाने के चलते वह दौर उन के लिए दोहरे इम्तिहान की तरह रहा.

एक और सेना के अफसर की पत्नी पूनम खंगारोत कहती हैं कि ऐसे उलट हालात को पौजिटिव रूप में लेना सीख लिया है. ऐसे हालात का अकेले मुकाबला करने से उन की फैसला लेने की ताकत और आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई है.

दिलेरी से करती सामना

सरहद पर खतरे की जिंदगी गुजारने वाले सैनिकों के समान ही पत्नियों की जिंदगी भी खतरे से खाली नहीं होती. उन की घर की ड्यूटी सरहद की ड्यूटी के समान जोखिम भरी होती है, क्योंकि वे अपने पति की खैरखबर को ले कर चिंतित रहती हैं. लेकिन वे उन सब का सामना हिम्मत और दिलेरी से करती हैं.

रेखा शर्मा को ही लीजिए. उन के पति 12 साल से भारतीय सेना में सेवारत मेजर हैं. वे कहती हैं कि जब उन की फील्ड पोस्टिंग होती है, तो मानो कलेजा हर घड़ी मुट्ठी में रहता है. जब फोन पर बात नहीं हो पाती है, तो किसी अनहोनी के डर से दिल घबराने लगता है. कुछ इलाके ऐसे भी होते हैं, जहां से बातचीत करना मुश्किल होता है या इमर्जैंसी में वो टूट ही जाती हैं. ऐसे में बस टैलीविजन, अखबार पर ही नजर लगी रहती है.

एक सैनिक की पत्नी अनु बताती हैं कि लड़ाई न चलने पर भी माइंस बिछाना जैसी आर्मी ऐक्सरसाइजेज खतरे से खाली नहीं होतीं. फिर जब मईजून की झुलसाती गरमी में पति रेतीले टीलों या ठिठुरती ठंड में सियाचिन में मुस्तैद हों, तो दिल यों ही रो उठता है. ऐसे में वे खुद को संभालती हैं और अपना हौसला बनाए रखती हैं.

वतन के वास्ते

सैनिक की पत्नी अंजना राजवंशी कहती हैं कि यों तो वे काफी हिम्मत से काम लेती हैं, लेकिन जब उन की तबीयत ज्यादा खराब होती है, तो पति से दो मीठे बोल सुनने को तरस जाती हैं. तब लगता है कि काश, वे भी साथ होते. सुखदुख के मौकों पर दूसरे शादीशुदा जोड़ों को देख कर कभीकभी एक टीस सी उठती है.

मांबाप दोनों, फिर भी…

पूनम बताती हैं कि उन के सिजेरियन बच्चा होने पर भी वे अपने पति से 4 महीने बाद मिल सकी थीं. अपनी शादीशुदा जिंदगी के इन 16 सालों में पूनम को पति की कमी अब सब से ज्यादा खलती है, जब उन का बेटा 10वीं जमात में पढ़ रहा है. उन का कहना है कि उम्र के इस नाजुक दौर में उसे पिता के साथ की सब से ज्यादा जरूरत है.

पूनम आगे कहती हैं कि हालांकि वे बच्चों को मातापिता दोनों का ही प्यार देने की कोशिश करती हैं, लेकिन जब पति साथ होते हैं, तो बच्चों के चेहरे पर खुशी पढ़ कर ऐसा लगता है कि काश, वक्त यहीं थम जाए.

ये हिम्मती औरतें बताती हैं कि ज्यादातर फील्ड पोस्टिंग पर रहने वाले पिताओं की तो उन के छोटे बच्चों के लिए पहचानना भी मुश्किल हो जाता है. लेकिन वे बच्चों को हौसला देती हैं. पिता की कमी वे उन्हें महसूस नहीं होने देतीं.

हौसलाअफजाई जरूरी

सरोज राणावत के पति भी भारतीय सेना में हैं. उन का मानना है कि फौजियों के लिए पौजिटिव नजरिया अपनाना बहुत जरूरी है. अगर वे घर की तरफ से बेफिक्र नहीं रहेंगे, तो देश के प्रति अपना फर्ज कैसे निभा पाएंगे.

एक फौजी की पत्नी के लिए हौसला और हिम्मत होना बहुत जरूरी है. ऐसे सैनिकों की दिलदार और जद्दोजेहद करने वाली पत्नियां अपने हालात को एक छोटी सी समस्या समझती हैं, क्योंकि उन्हें नाज है अपने जीवनसाथी पर, जो दूर कहीं रह कर वतन की हिफाजत में मुस्तैद हैं.

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