पति ने दिया बेवफा पत्नी और उसके लवर को अंजाम

मंगलवार की शाम लगभग 4 बजे का समय था. उसी समय आगरा जिले के थाना मनसुखपुरा में खून से सने हाथ और कपड़ों में एक युवक पहुंचा. पहरे की ड्यूटी पर तैनात सिपाही के पास जा कर वह बोला, ‘‘स…स…साहब, बड़े साहब कहां हैं, मुझे उन से कुछ बात कहनी है.’’

थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह उस समय थाना प्रांगण में धूप में बैठे कामकाज निपटा रहे थे. उन्होंने उस युवक की बात सुन ली थी, नजरें उठा कर उन्होंने उस की ओर देखा और सिपाही से अपने पास लाने को कहा. सिपाही उस शख्स को थानाप्रभारी के पास ले गया. थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह उस से कुछ पूछते, इस से पहले ही वह शख्स बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम ऋषि तोमर है. मैं गांव बड़ापुरा में रहता हूं. मैं अपनी पत्नी और उस के प्रेमी की हत्या कर के आया हूं. दोनों की लाशें मेरे घर में पड़ी हुई हैं.’’

ऋषि तोमर के मुंह से 2 हत्याओं की बात सुन कर ओमप्रकाश सिंह दंग रह गए. युवक की बात सुन कर थानाप्रभारी के पैरों के नीचे से जैसे जमीन ही खिसक गई. वहां मौजूद सभी पुलिसकर्मी ऋषि को हैरानी से देखने लगे.

थानाप्रभारी के इशारे पर एक सिपाही ने उसे हिरासत में ले लिया. ओमप्रकाश सिंह ने टेबल पर रखे कागजों व डायरी को समेटा और ऋषि को अपनी जीप में बैठा कर मौकाएवारदात पर निकल गए.

हत्यारोपी ऋषि तोमर के साथ पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां का मंजर देख होश उड़ गए. कमरे में घुसते ही फर्श पर एक युवती व एक युवक के रक्तरंजित शव पड़े दिखाई दिए. कमरे के अंदर ही चारपाई के पास फावड़ा पड़ा था.

दोनों मृतकों के सिर व गले पर कई घाव थे. लग रहा था कि उन के ऊपर उसी फावडे़ से प्रहार कर उन की हत्या की गई थी. कमरे का फर्श खून से लाल था. थानाप्रभारी ने अपने उच्चाधिकारियों को घटना से अवगत कराया.

डबल मर्डर की जानकारी मिलते ही मौके पर एसपी (पश्चिमी) अखिलेश नारायण सिंह, सीओ (पिनाहट) सत्यम कुमार पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह से घटना की जानकारी ली. वहीं पुलिस द्वारा मृतक युवक दीपक के घर वालों को भी सूचना दी गई.

कुछ ही देर में दीपक के घर वाले रोतेबिलखते घटनास्थल पर आ गए थे. इस बीच मौके पर भीड़ एकत्र हो गई. ग्रामीणों को पुलिस के आने के बाद ही पता चला था कि घर में 2 मर्डर हो गए हैं. इस से गांव में सनसनी फैल गई. जिस ने भी घटना के बारे में सुना, दंग रह गया.

दोहरे हत्याकांड ने लोगों का दिल दहला दिया. पुलिस ने आला कत्ल फावड़ा और दोनों लाशों को कब्जे में लेने के बाद लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं. इस के बाद थानाप्रभारी ने हत्यारोपी ऋषि तोमर से पूछताछ की तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला आगरा के थाना मनसुखपुरा के गांव बड़ापुरा के रहने वाले ऋषि तोमर की शादी लक्ष्मी से हुई थी. लक्ष्मी से शादी कर के ऋषि तो खुश था, लेकिन लक्ष्मी उस से खुश नहीं थी. क्योंकि ऋषि उस की चाहत के अनुरूप नहीं था.

ऋषि मेहनती तो था, लेकिन उस में कमी यह थी कि वह सीधासादा युवक था. वह ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं था. बड़ापुरा में कोई अच्छा काम न मिलने पर वह दिल्ली जा कर नौकरी करने लगा.

करीब 2 साल पहले की बात है. ससुराल में ही लक्ष्मी की मुलाकात यहीं के रहने वाले दीपक से हो गई. दोनों की नजरें मिलीं तो उन्होंने एकदूसरे के दिलों में जगह बना ली.

पहली ही नजर में खूबसूरत लक्ष्मी पर दीपक मर मिटा था तो गबरू जवान दीपक को देख कर लक्ष्मी भी बेचैन हो उठी थी. एकदूसरे को पाने की चाहत में उन के मन में हिलोरें उठने लगीं. पर भीड़ के चलते वे आपस में कोई बात नहीं कर सके थे, लेकिन आंखों में झांक कर वे एकदूसरे के दिल की बातें जरूर जान गए थे.

बाजार में मुलाकातों का सिलसिला चलने लगा. मौका मिलने पर वे बात भी करने लगे. दीपक लक्ष्मी के पति ऋषि से स्मार्ट भी था और तेजतर्रार भी. बलिष्ठ शरीर का दीपक बातें भी मजेदार करता था. भले ही लक्ष्मी के 3 बच्चे हो गए थे, लेकिन शुरू से ही उस के मन में पति के प्रति कोई भावनात्मक लगाव पैदा नहीं हुआ था.

लक्ष्मी दीपक को चाहने लगी थी. दीपक हर हाल में उसे पाना चाहता था. लक्ष्मी ने दीपक को बता दिया था कि उस का पति दिल्ली में नौकरी करता है और वह बड़ापुरा में अपनी बेटी के साथ अकेली रहती है, जबकि उस के 2 बच्चे अपने दादादादी के पास रहते थे.

मौका मिलने पर लक्ष्मी ने एक दिन दीपक को फोन कर अपने गांव बुला लिया. वहां पहुंच कर इधरउधर की बातों और हंसीमजाक के बीच दीपक ने लक्ष्मी का हाथ अपने हाथ में ले लिया. लक्ष्मी ने इस का विरोध नहीं किया.

दीपक के हाथों का स्पर्श कुछ अलग था. लक्ष्मी का हाथ अपने हाथ में ले कर दीपक सुधबुध खो कर एकटक उस के चेहरे पर निगाहें टिकाए रहा. फिर लक्ष्मी भी सीमाएं लांघने लगी. इस के बाद दोनों ने मर्यादा की दीवार तोड़ डाली.

एक बार हसरतें पूरी होने के बाद उन की हिम्मत बढ़ गई. अब दीपक को जब भी मौका मिलता, उस के घर पहुंच जाता था. ऋषि के दिल्ली जाते ही लक्ष्मी उसे बुला लेती फिर दोनों ऐश करते. अवैध संबंधों का यह सिलसिला करीब 2 सालों तक ऐसे ही चलता रहा.

लेकिन उन का यह खेल ज्यादा दिनों तक लोगों की नजरों से छिप नहीं सका. किसी तरह पड़ोसियों को लक्ष्मी और दीपक के अवैध संबंधों की भनक लग गई. ऋषि के परिचितों ने कई बार उसे उस की पत्नी और दीपक के संबंधों की बात बताई.

लेकिन वह इतना सीधासादा था कि उस ने परिचितों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि उसे अपनी पत्नी पर पूरा विश्वास था, जबकि सच्चाई यह थी कि लक्ष्मी पति की आंखों में धूल झोंक कर हसरतें पूरी कर रही थी.

4 फरवरी, 2019 को ऋषि जब दिल्ली से अपने गांव आया तो उस ने अपनी पत्नी और दीपक को ले कर लोगों से तरहतरह की बातें सुनीं. अब ऋषि का धैर्य जवाब देने लगा. अब उस से पत्नी की बेवफाई और बेहयाई बिलकुल बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस ने तय कर लिया कि वह पत्नी की सच्चाई का पता लगा कर रहेगा.

ऋषि के दिल्ली जाने के बाद उस की बड़ी बेटी अपनी मां लक्ष्मी के साथ रहती थी और एक बेटा और एक बेटी दादादादी के पास गांव राजाखेड़ा, जिला धौलपुर, राजस्थान में रहते थे.

ऋषि के दिमाग में पत्नी के चरित्र को ले कर शक पूरी तरह बैठ गया था. वह इस बारे में लक्ष्मी से पूछता तो घर में क्लेश हो जाता था. पत्नी हर बार उस की कसम खा कर यह भरोसा दिला देती थी कि वह गलत नहीं है बल्कि लोग उसे बेवजह बदनाम कर रहे हैं.

घटना से एक दिन पूर्व 4 फरवरी, 2019 को ऋषि दिल्ली से गांव आया था. दूसरे दिन उस ने जरूरी काम से रिश्तेदारी में जाने तथा वहां 2 दिन रुक कर घर लौटने की बात लक्ष्मी से कही थी. बेटी स्कूल गई थी. इत्तफाक से ऋषि अपना मोबाइल घर भूल गया था, लेकिन लक्ष्मी को यह पता नहीं था. करीब 2 घंटे बाद मोबाइल लेने जब घर आया तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था.

उस ने दरवाजा थपथपाया. पत्नी न तो दरवाजा खोलने के लिए आई और न ही उस ने अंदर से कोई जवाब दिया. तो ऋषि को गुस्सा आ गया और उस ने जोर से धक्का दिया तो कुंडी खुल गई.

जब वह कमरे के अंदर पहुंचा तो पत्नी और उस का प्रेमी दीपक आपत्तिजनक स्थिति में थे. यह देख कर उस का खून खौल उठा. पत्नी की बेवफाई पर ऋषि तड़प कर रह गया. वह अपना आपा खो बैठा. अचानक दरवाजा खुलने से प्रेमी दीपक सकपका गया था.

ऋषि ने सोच लिया कि वह आज दोनों को सबक सिखा कर ही रहेगा. गुस्से में आगबबूला हुए ऋषि कमरे से बाहर आया.

वहां रखा फावड़ा उठा कर उस ने दीपक पर ताबड़तोड़ प्रहार किए. पत्नी लक्ष्मी उसे बचाने के लिए आई तो फावड़े से प्रहार कर उस की भी हत्या कर दी. इस के बाद दोनों की लाशें कमरे में बंद कर वह थाने पहुंच गया.

ऋषि ने पुलिस को बताया कि उसे दोनों की हत्या पर कोई पछतावा नहीं है. यह कदम उसे बहुत पहले ही उठा लेना चाहिए था. पत्नी ने उस का भरोसा तोड़ा था. उस ने तो पत्नी पर कई साल भरोसा किया.

उधर दीपक के परिजन इस घटना को साजिश बता रहे थे. उन का आरोप था कि दीपक को फोन कर के ऋषि ने अपने यहां बहाने से बुलाया था. घर में बंधक बना कर उस की हत्या कर दी गई. उन्होंने शक जताया कि इस हत्याकांड में अकेला ऋषि शामिल नहीं है, उस के साथ अन्य लोग भी जरूर शामिल रहे होंगे.

मृतक दीपक के चाचा राजेंद्र ने ऋषि तोमर एवं अज्ञात के खिलाफ तहरीर दे कर हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई.

पुलिस ने हत्यारोपी ऋषि से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया.

उधर पोस्टमार्टम के बाद लक्ष्मी के शव को लेने उस के परिवार के लोग नहीं पहुंचे, जबकि दीपक के शव को उस के घर वाले ले गए.

हालांकि मृतका लक्ष्मी के परिजनों से पुलिस ने संपर्क भी किया, लेकिन उन्होंने अनसुनी कर दी. इस के बाद पुलिस ने लक्ष्मी के शव का अंतिम संस्कार कर दिया. थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह मामले की तफ्तीश कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पहले की पत्नी की हत्या, फिर लगाया आम का पेड़

घरवालों के लाख मना करने के बाद भी दीपा ने गांव के ही दूसरी जाति के युवक समरजीत से शादी कर ली. इस के बाद दीपा ने ऐसा क्या किया कि प्रेमी से पति बने समरजीत ने उस की हत्या कर लाश जमीन में दफना कर उस पर आम का पेड़ लगा दिया. समरजीत करीब एक साल बाद दिल्ली से अपने भाइयों अरविंद और धर्मेंद्र के साथ गांव धनजई लौटा तो मोहल्ले वालों ने उस में कई बदलाव देखे. उस के पहनावे और बातचीत में काफी अंतर चुका था. उस का बातचीत का तरीका गांव वालों से एकदम अलग था. इस से गांव वाले समझ गए कि दिल्ली में उस का काम ठीकठाक चल रहा है. धनजई गांव उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के थाना कूंड़ेभार में पड़ता है.

देखने से ही लग रहा था कि समरजीत की हालत अब पहले से अच्छी हो गई है, लेकिन गांव वाले एक बात नहीं समझ पा रहे थे कि जब वह गांव से गया था तो गांव के ही रहने वाले रामसनेही की बेटी दीपा को भगा कर ले गया था. लेकिन उस के साथ दीपा दिखाई नहीं दे रही थी. दरअसल, दीपा और समरजीत के बीच काफी दिनों से प्रेमसंबंध चल रहा था. जिस के चलते वह और दीपा करीब एक साल पहले गांव से भाग गए थे. बाद में रामसनेही को पता लगा कि समरजीत दीपा के साथ दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रहलादपुर गांव में रह रहा है. गांव के ही लड़के के साथ बेटी के भाग जाने की बदनामी रामसनेही झेल रहा था. उसे जब पता लगा कि समरजीत के साथ दीपा नहीं आई है तो यह बात उसे कुछ अजीब सी लगी. बेटी को भगा कर ले जाने वाला समरजीत उस के लिए एक दुश्मन था.

इस के बावजूद भी बेटी की ममता उस के दिल में जाग उठी. उस ने समरजीत से बेटी के बारे में पूछ ही लिया. तब समरजीत ने बताया, ‘‘वह तो करीब एक महीने पहले नाराज हो कर दिल्ली से गांव चली आई थी. अब तुम्हें ही पता होगा कि वह कहां है?’’ यह सुन कर रामसनेही चौंका. उस ने कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो? वो यहां आई ही नहीं है.’’

‘‘अब मुझे क्या पता वह कहां गई? आप अपनी रिश्तेदारियों वगैरह में देख लीजिए. क्या पता वहीं चली गई हो.’’

समरजीत की बात रामसनेही के गले नहीं उतरी. वह समझ नहीं पा रहा था कि समरजीत जो दीपा को कहीं देखने की बात कह रहा है, वह कहीं दूसरी जगह क्यों जाएगी? फिर भी उस का मन नहीं माना. उस ने अपने रिश्तेदारों के यहां फोन कर के दीपा के बारे में पता किया, लेकिन पता चला कि वह कहीं नहीं है. बात एक महीना पुरानी थी. ऐसे में वह बेटी को कहां ढूंढ़े. बेटी के बारे में सोचसोच कर उस की चिंता बढ़ती जा रही थी. यह बात दिसंबर, 2013 के आखिरी हफ्ते की थी. समरजीत के साथ उस के भाई अरविंद और धर्मेंद्र भी गांव आए थे. रामसनेही ने दोनों भाइयों से भी बेटी के बारे में पूछा. लेकिन उन से भी उसे कोई ठोस जवाब नहीं मिला. 10-11 दिन गांव में रहने के बाद समरजीत दिल्ली लौट गया.

बेटी की कोई खैरखबर मिलने से रामसनेही और उस की पत्नी बहुत परेशान थे. वह जानते थे कि समरजीत दिल्ली के पुल प्रहलादपुर में रहता है. वहीं पर उन के गांव का एक आदमी और रहता था. उस आदमी के साथ जनवरी, 2014 के पहले हफ्ते में रामसनेही भी पुल प्रहलादपुर गयाथोड़ी कोशिश के बाद उसे समरजीत का कमरा मिल गया. उस ने वहां आसपास रहने वालों से बेटी दीपा का फोटो दिखाते हुए पूछा. लोगों ने बताया कि जिस दीपा नाम की लड़की की बात कर रहा है, वह 22 दिसंबर, 2013 तक तो समरजीत के साथ देखी गई थी, इस के बाद वह दिखाई नहीं दी है. समरजीत ने रामसनेही को बताया था दीपा एक महीने पहले यानी नवंबर, 2013 में नाराज हो कर दिल्ली से चली गई थी, जबकि पुल प्रहलादपुर गांव के लोगों से पता चला था कि वह 22 दिसंबर, 2013 तक समरजीत के साथ थी. इस से रामसनेही को शक हुआ कि समरजीत ने उस से जरूर झूठ बोला है. वह दीपा के बारे में जानता है कि वह इस समय कहां है?

रामसनेही के मन में बेटी को ले कर कई तरह के खयाल पैदा होने लगे. उसे इस बात का अंदेशा होने लगा कि कहीं इन लोगों ने बेटी के साथ कोई अनहोनी तो नहीं कर दी. यही सब सोचते हुए वह 6 जनवरी, 2014 को दोपहर के समय थाना पुल प्रहलादपुर पहुंचा और वहां मौजूद थानाप्रभारी धर्मदेव को बेटी के गायब होने की बात बताई. रामसनेही ने थानाप्रभारी को बेटी का हुलिया बताते हुए आरोप लगाया कि समरजीत और उस के भाइयों, अरविंद धर्मेंद्र ने अपने मामा नरेंद्र, राजेंद्र और वीरेंद्र के साथ बेटी को अगवा कर उस के साथ कोई अप्रिय घटना को अंजाम दे दिया है. थानाप्रभारी धर्मदेव ने उसी समय रामसनेही की तहरीर पर भादंवि की धारा 365, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराकर सूचना एसीपी जसवीर सिंह मलिक को दे दी.

मामला जवान लड़की के अपहरण का था, इसलिए एसीपी जसवीर सिंह मलिक ने थानाप्रभारी धर्मदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर आर.एस. नरुका, सबइंसपेक्टर किशोर कुमार, युद्धवीर सिंह, हेडकांस्टेबल श्रवण कुमार, नईम अहमद, राकेश, कांस्टेबल अनुज कुमार तोमर, धर्म सिंह आदि को शामिल किया गया. उधर दिल्ली में रह रहे समरजीत और उस के भाइयों को जब पता चला कि दीपा का बाप रामसनेही पुल प्रहलादपुर आया हुआ है तो तीनों भाई दिल्ली से फरार हो गए. पुलिस टीम जब उन के कमरे पर गई तो वहां उन तीनों में से कोई नहीं मिला. चूंकि तीनों आरोपी रामसनेही के गांव के ही रहने वाले थे, इसलिए पुलिस टीम रामसनेही को ले कर यूपी स्थित उस के गांव धनजई पहुंची. लेकिन घर पर समरजीत और उस के घर वालों में से कोई नहीं मिला.

अब पुलिस को अंदेशा हो गया कि जरूर कोई कोई गड़बड़ है, जिस की वजह से ये लोग फरार हैं. गांव के लोगों से बात कर के पुलिस ने यह पता लगाया कि इन के रिश्तेदार वगैरह कहांकहां रहते हैं, ताकि वहां जा कर आरोपियों को तलाशा जा सके. इस से पुलिस को पता चला कि सुलतानपुर और फैजाबाद के कई गांवों में समरजीत के रिश्तेदार रहते हैं. उन रिश्तेदारों के यहां जा कर दिल्ली पुलिस ने दबिशें दीं, लेकिन वे सब वहां भी नहीं मिले. दिल्ली पुलिस ने समरजीत के सभी रिश्तेदारों पर दबाव बनाया कि आरोपियों को जल्द से जल्द पुलिस के हवाले करें. उधर बेटी की चिंता में रामसनेही का बुरा हाल था. वह पुलिस से बारबार बेटी को जल्द तलाशने की मांग कर रहा था.

समरजीत या उस के भाइयों से पूछताछ करने के बाद ही दीपा के बारे में कोई जानकारी मिल सकती थी. इसलिए दिल्ली पुलिस की टीम अपने स्तर से ही आरोपियों को तलाशती रही9 जनवरी, 2014 को पुलिस को सूचना मिली कि समरजीत सुलतानपुर के ही गांव नगईपुर, सामरी बाजार में रहने वाले अपने मामा के यहां आया हुआ है. खबर मिलते ही पुलिस नगईपुर गांव पहुंच गई. सूचना एकदम सही निकली. वहां पर समरजीत, उस के भाई अरविंद और धर्मेंद्र के अलावा उस का मामा नरेंद्र भी मिल गयाचूंकि दीपा समरजीत के साथ ही रह रही थी, इसलिए पुलिस ने सब से पहले उसी से दीपा के बारे में पूछा. इस पर समरजीत ने बताया, ‘‘सर, नवंबर, 2013 में दीपा उस से लड़झगड़ कर दिल्ली से अपने गांव जाने को कह कर चली आई थी. इस के बाद वह कहां गई, इस की उसे जानकारी नहीं है.’’

‘‘लेकिन पुल प्रहलादपुर में जहां तुम लोग रहते थे, वहां जा कर हम ने जांच की तो जानकारी मिली कि दीपा 23 दिसंबर, 2013 को दिल्ली में ही तुम्हारे साथ थी.’’ थानाप्रभारी धर्मदेव ने कहा तो समरजीत के चेहरे का रंग उड़ गयाथानाप्रभारी उस का हावभाव देख कर समझ गए कि यह झूठ बोल रहा है. उन्होंने रौबदार आवाज में उस से कहा, ‘‘देखो, तुम हम से झूठ बोलने की कोशिश मत करो. दीपा के साथ तुम लोगों ने जो कुछ भी किया है, हमें सब पता चल चुका है. वैसे एक बात बताऊं, सच्चाई उगलवाने के हमारे पास कई तरीके हैं, जिन के बारे में तुम जानते भी होगे. अब गनीमत इसी में है कि तुम सारी बात हमें खुद बता दो, वरना…’’

इतना सुनते ही वह डर गया. वह समझ गया कि अगर सच नहीं बताया कि पुलिस बेरहमी से उस की पिटाई करेगी. इसलिए वह सहम कर बोला, ‘‘सर, हम ने दीपा को मार दिया है.’’

‘‘उस की लाश कहां है?’’ थाना प्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, उस की लाश बाग में दफन कर दी है.’’ समरजीत ने कहा तो पुलिस चारों आरोपियों के साथ उस बाग में पहुंची, जहां उन्होंने दीपा की लाश दफन करने की बात कही थी. समरजीत के मामा नरेंद्र ने पुलिस को आम के बाग में वह जगह बता दी. लेकिन उस जगह तो आम का पेड़ लगा हुआ था. नरेंद्र ने कहा कि लाश इसी पेड़ के नीचे है. उन लोगों की निशानदेही पर पुलिस ने वहां खुदाई कराई तो वास्तव में एक शाल में गठरी के रूप में बंधी एक महिला की लाश निकली. उस समय रामसनेही भी पुलिस के साथ था. लाश देखते ही वह रोते हुए बोला, ‘‘साहब यही मेरी दीपा है. देखो इन्होंने मेरी बेटी का क्या हाल कर दिया. मुझे पहले ही इन लोगों पर शक हो रहा था. इन के खिलाफ आप सख्त से सख्त काररवाई कीजिए, ताकि ये बच सकें.’’

वहां खड़े गांव वालों ने तसल्ली दे कर किसी तरह रामसनेही को चुप कराया. गांव वाले इस बात से हैरान थे कि समरजीत दीपा को बहुत प्यार करता था, जिस के कारण दोनों गांव से भाग गए थे. फिर समरजीत ने उस के साथ ऐसा क्यों किया?

पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो उस के गले पर कुछ निशान पाए गए. इस से अनुमान लगाया कि दीपा की हत्या गला घोंट कर की गई थी. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुलतानपुर के पोस्टमार्टम हाऊस भेज दिया और चारों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के दिल्ली ले आई. थाना पुल प्रहलादपुर में समरजीत, अरविंद, धर्मेंद्र और इन के मामा नरेंद्र से जब पूछताछ की गई तो दीपा और समरजीत के प्रेमप्रसंग से ले कर मौत का तानाबाना बुनने तक की जो कहानी सामने आई, वह बड़ी ही दिलचस्प निकली. उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के थाना कूंड़ेभार में आता है एक गांव धनजई, इसी गांव में सूर्यभान सिंह परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे धर्मेंद्र, अरविंद और समरजीत थे. अरविंद और धर्मेंद्र शादीशुदा थे. दोनों भाई दिल्ली में ड्राइवर की नौकरी करते थे. समरजीत गांव में ही खेतीकिसानी करता था. वह खेतीकिसानी करता जरूर था, लेकिन उसे अच्छे कपड़े पहनने का शौक था.

वह जवान तो था ही. इसलिए उस का मन ऐसा साथी पाने के लिए बेचैन था, जिस से अपने मन की बात कह सके. इसी दौरान उस की नजरें दीपा से दोचार हुईं. दीपा रामसनेही की 20 वर्षीया बेटी थी. दीपा तीखे नयननक्श और गोल चेहरे वाली युवती थी. दीपा उस की बिरादरी की नहीं थी, फिर भी उस का झुकाव उस की तरफ हो गया. फिर दोनों के बीच बातों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि वे दोनों एकदूसरे के करीब आते गएदोनों ही चढ़ती जवानी पर थे, इसलिए जल्दी ही उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए. एकदूसरे को शरीर सौंपने के बाद उन की सोच में इस कदर बदलाव आया कि उन्हें अपने प्यार के अलावा सब कुछ फीका लगने लगा. उन्हें ऐसा लग रहा था, जैसे उन की मंजिल यहीं तक हो. मौका मिलने पर दोनों खेतों में एकदूसरे से मिलते रहे. उन के प्यार को देख कर ऐसा लगता था, जैसे भले ही उन के शरीर अलगअलग हों, लेकिन जान एक हो.

उन्होंने शादी कर के अपनी अलग दुनिया बसाने तक की प्लानिंग कर ली. घर वाले उन की शादी करने के लिए तैयार हो सकेंगे, इस का विश्वास दोनों को नहीं था. इस की वजह साफ थी कि दोनों की जाति अलगअलग थी और दूसरे दोनों एक ही गांव के थे. घर वाले तैयार हों या हों, उन्हें इस बात की फिक्र थी. वे जानते थे कि प्यार के रास्ते में तमाम तरह की बाधाएं आती हैं. सच्चे प्रेमी उन बाधाओं की कभी फिक्र नहीं करते. वे परिवार और समाज के व्यंग्यबाणों और उन के द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को लांघ कर अपने मुकाम तक पहुंचने की कोशिश करते हैं. समरजीत और दीपा भले ही सोच रहे थे कि उन का प्यार जमाने से छिपा हुआ है, लेकिन यह केवल उन का भ्रम था. हकीकत यह थी कि इस तरह के काम कोई चाहे कितना भी चोरीछिपे क्यों करे, लोगों को पता चल ही जाता है. समरजीत और दीपा के मामले में भी ऐसा ही हुआ. मोहल्ले के कुछ लोगों को उन के प्यार की खबर लग गई.

फिर क्या था. मोहल्ले के लोगों से बात उड़तेउड़ते इन दोनों के घरवालों के कानों में भी पहुंच गई. समरजीत के पिता सूर्यभान सिंह ने बेटे को डांटा तो वहीं दूसरी तरफ दीपा के पिता रामसनेही ने भी दीपा पर पाबंदियां लगा दीं. उसे इस बात का डर था कि कहीं कोई ऐसीवैसी बात हो गई तो उस की शादी करने में परेशानी होगी. कहते हैं कि प्यार पर जितनी बंदिशें लगाई जाती हैं, वह और ज्यादा बढ़ता है यानी बंदिशों से प्यार की डोर टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत हो जाती है. बेटी पर बंदिशें लगाने के पीछे रामसनेही की मंशा यही थी कि वह समरजीत को भूल जाएगी. लेकिन उस ने इस बात की तरफ गौर नहीं किया कि घर वालों के सो जाने के बाद दीपा अभी भी समरजीत से फोन पर बात करती है. यानी भले ही उस की अपने प्रेमी से मुलाकात नहीं हो पा रही थी, वह फोन पर दिल की बात उस से कर लेती थी.

एक बार रामसनेही ने उसे रात को फोन पर बात करते देखा तो उस ने उस से पूछा कि किस से बात कर रही है. तब दीपा ने साफ बता दिया कि वह समरजीत से बात कर रही है. इतना सुनते ही रामसनेही को गुस्सा गया और उस ने उस की पिटाई कर दी. रामसनेही ने सोचा कि पिटाई से दीपा के मन में खौफ बैठ जाएगा. लेकिन इस का असर उलटा हुआ. सन 2012 में दीपा समरजीत के साथ भाग गई. समरजीत प्रेमिका को ले कर हरिद्वार में अपने एक परिचित के यहां चला गया. तब रामसनेही ने थाना कूंडे़भार में बेटी के गायब हेने की सूचना दर्ज करा दीचूंकि गांव से समरजीत भी गायब था. इसलिए लोगों को यह बात समझते देर नहीं लगी कि दीपा समरजीत के संग ही भागी है. तब रामसनेही ने गांव में पंचायत बुला कर पंचों की मार्फत समरजीत के पिता सूर्यभान सिंह पर अपनी बेटी को ढूंढ़ने का दबाव बनाया.

आज भी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ गांवों में पंचों की बातों का पालन किया जाता है. सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई मामलों में पंचायतों के फैसले सही भी होते हैं. अपनी मानमर्यादा और सामाजिक दबाव को देखते हुए लोग पंचों की बात का पालन भी करते हैं. पंचायती फैसले के बाद सूर्यभान सिंह ने अपने स्तर से समरजीत और दीपा को तलाशना शुरू किया. बाद में उसे पता लगा कि समरजीत और दीपा हरिद्वार में हैं तो वह उन दोनों को हरिद्वार से गांव ले आया. दोनों के घर वालों ने उन्हें फिर से समझाया. समरजीत और दीपा कुछ दिनों तक तो ठीक रहे, इस के बाद उन्होंने फिर से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. फिर वे दोनों अंबाला भाग गए. वहां पर समरजीत की बड़ी बहन रहती थी. समरजीत दीपा को ले कर बहन के यहां ही गया था. उस ने भी उन दोनों को समझाया. उस ने पिता को इस की सूचना दे दी. सूर्यभान सिंह इस बार भी उन दोनों को गांव ले आए.

बेटी के बारबार भागने पर रामसनेही और उस के परिवार की खासी बदनामी हो रही थी. अब उस के पास एक ही रास्ता था कि उस की शादी कर दी जाए. लिहाजा उस ने उस की फटाफट शादी करने का प्लान बनाया. वह उस के लिए लड़का देखने लगादीपा को जब पता चला कि घर वाले उस की जल्द से जल्द शादी करने की फिराक में हैं तो उस ने आखिर अपनी मां से कह ही दिया कि वह समरजीत के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी. उस की इस जिद पर मां ने उस की पिटाई कर दी. इस के बाद 27 फरवरी, 2013 को दीपा और समरजीत तीसरी बार घर से भाग गए. इस बार समरजीत उसे दिल्ली ले गया. दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रहलादपुर गांव में समरजीत के भाई धर्मेंद्र और अरविंद रहते थे. वह उन्हीं के पास चला गया. बाद में समरजीत और दीपा ने मंदिर में शादी कर ली. फिर उसी इलाके में कमरा ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

पुल प्रहलादपुर में रामसनेही के कुछ परिचित भी रहते थे. उन्हीं के द्वारा उसे पता चला कि दीपा समरजीत के साथ दिल्ली में रह रही है. खबर मिलने के बावजूद भी रामसनेही ने उसे वहां से लाना जरूरी नहीं समझा. वह जानता था कि दीपा घर से 2 बार भागी और दोनों बार उसे घर लाया गया था. जब वह घर रुकना ही नहीं चाहती तो उसे फिर से घर लाने से क्या फायदा. समरजीत के भाई अरविंद और धर्मेंद्र ड्राइवर थे. जबकि समरजीत को फिलहाल कोई काम नहीं मिल रहा था. उस की गृहस्थी का खर्चा दोनों भाई उठा रहे थेसमरजीत भाइयों पर ज्यादा दिनों तक बोझ नहीं बनना चाहता था, इसलिए कुछ दिनों बाद ही एक जानकार की मार्फत ओखला फेज-1 स्थित एक सिक्योरिटी कंपनी में नौकरी कर ली. उस की चिंता थोड़ी कम हो गई.

दोनों की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी. चूंकि समरजीत सिक्योरिटी गार्ड के रूप में काम कर रहा था, इसलिए कभी उस की ड्यूटी नाइट की लगती थी तो कभी दिन की. वह मन लगा कर नौकरी कर रहा था. जिस वजह से वह पत्नी की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहा था. इस का नतीजा यह निकला कि पास में ही रहने वाले एक युवक से दीपा के नाजायज संबंध बन गए. समरजीत दीपा को जीजान से चाहता था, इसलिए उसे पत्नी पर विश्वास था. लेकिन उसे इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उस के विश्वास को धता बता कर वह क्या गुल खिला रही है. कहते हैं कि कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता. एक एक दिन किसी तरीके से वह लोगों के सामने ही जाता है.

दीपा की आशिकमिजाजी भी एक दिन समरजीत के सामने गई. हुआ यह था कि एक बार समरजीत की रात की ड्यूटी लगी थी. वह शाम 7 बजे ही घर से चला गया था. दीपा को पता था कि पति की ड्यूटी रात 8 बजे से सुबह 8 बजे तक की है. जब भी पति की रात की ड्यूटी होती थी, दीपा प्रेमी को रात 10 बजे के करीब अपने कमरे पर बुला लेती थी. मौजमस्ती करने के बाद वह रात में ही चला जाता था. उस दिन भी उस ने अपने प्रेमी को घर बुला लिया.  रात 11 बजे के करीब समरजीत की तबीयत अचानक खराब हो गई. ड्यूटी पर रहते वह आराम नहीं कर सकता था. वह चाहता था कि घर जा कर आराम करे. लेकिन उस समय घर जाने के लिए उसे कोई सवारी नहीं मिल रही थी. इसलिए उस ने अपने एक दोस्त से घर छोड़ने को कहा. तब दोस्त अपनी मोटरसाइकिल से उसे उस के कमरे के बाहर छोड़ आया.

समरजीत ने जब अपने कमरे का दरवाजा खटखटाया तो प्रेमी के साथ गुलछर्रे उड़ा रही दीपा दरवाजे की दस्तक सुन कर घबरा गई. उस के मन में विचार आया कि पता नहीं इतनी रात को कौन गया. प्रेमी को बेड के नीचे छिपने को कह कर उस ने अपने कपड़े संभाले और बेमन से दरवाजे की तरफ बढ़ी. जैसे ही उस ने दरवाजा खोला, सामने पति को देख कर वह चौंक कर बोली, ‘‘तुम, आज इतनी जल्दी कैसे गए?’’

‘‘आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए ड्यूटी बीच में ही छोड़ कर गया.’’ समरजीत कमरे में घुसते हुए बोला. कमरे में बेड के नीचे दीपा का प्रेमी छिपा हुआ था. दीपा इस बात से डर रही थी कि कहीं आज उस की पोल खुल जाए. समरजीत की तो तबीयत खराब थी. वह जैसे ही बेड पर लेटा, उसी समय बेड के नीचे से दीपा का प्रेमी निकल कर भाग खड़ा हुआ. अपने कमरे से किसी आदमी को निकलते देख समरजीत चौंका. वह उस की सूरत नहीं देख पाया था. समरजीत उस भागने वाले आदमी को भले ही नहीं जानता था, लेकिन उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उस की गैरमौजूदगी में यह आदमी कमरे में क्या कर रहा होगावह गुस्से में भर गया. उस ने पत्नी से पूछा, ‘‘यह कौन था और यहां क्यों आया था?’’

‘‘पता नहीं कौन था. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह चोर हो. कोई सामान चुरा कर तो नहीं ले गया.’’ दीपा ने बात घुमाने की कोशिश करते हुए कहा और संदूक का ताला खोल कर अपना कीमती सामान तलाशने लगीतभी समरजीत ने कहा, ‘‘तुम मुझे बेवकूफ समझती हो क्या? मुझे पता है कि वह यहां क्यों आया था. उसे जो चीज चुरानी थी, वह तुम ने उसे खुद ही सौंप दी. अब बेहतर यह है कि जो हुआ उसे भूल जाओ. आइंदा यह व्यक्ति यहां नहीं आना चाहिए. और ही ऐसी बात मुझे सुनने को मिलनी चाहिए.’’

पति की नसीहत से दीपा ने राहत की सांस ली. समरजीत तबीयत खराब होने पर घर आराम करने आया था, लेकिन आराम करना भूल कर वह रात भर इसी बात को सोचता रहा कि जिस दीपा के लिए उस ने अपना गांव छोड़ा, उसे पत्नी बनाया, उसी ने उस के साथ इतना बड़ा विश्वासघात क्यों किया. वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि जब कोई भी महिला एक बार देहरी लांघ जाती है तो उस पर विश्वास करना मूर्खता होती है. अगले दिन जब वह ड्यूटी पर गया तो वहां भी उस का मन नहीं लगा. उस के मन में यही बात घूम रही थी कि दीपा अपने यार के साथ गुलछर्रे उड़ा रही होगी. घर लौटने के बाद उस ने अपने भाइयों अरविंद और धर्मेंद्र से दीपा के बारे में बात की. यह बात उस ने अपने मामा नरेंद्र को भी बताई

उन सभी ने फैसला किया कि ऐसी कुलच्छनी महिला की चौकीदारी कोई हर समय तो कर नहीं सकता. इसलिए उसे खत्म करना ही आखिरी रास्ता है. दीपा को खत्म करने का फैसला तो ले लिया, लेकिन अपना यह काम उसे कहां और कब करना है, इस की उन्होंने योजना बनाई. काफी सोचनेसमझने के बाद उन्होंने तय किया कि दीपा को दिल्ली में मारना ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि लाख कोशिशों के बाद भी वह दिल्ली पुलिस से बच नहीं पाएंगे. अपने जिला क्षेत्र में ले जा कर ठिकाने लगाना उन्हें उचित लगा. समरजीत को पता था कि दीपा सुलतानपुर जाने के लिए आसानी से तैयार नहीं होगी. उसे झांसे में लेने के लिए उस ने एक दिन कहा, ‘‘दीपा, सुलतानपुर के ही नगईपुर में मेरे मामा रहते हैं. उन के कोई बच्चा नहीं है और उन के पास जमीनजायदाद भी काफी है. उन्होंने हम दोनों को अपने यहां रहने के लिए बुलाया है. तुम्हें तो पता ही है कि दिल्ली में हम लोगों का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो रहा है. इसलिए मैं चाहता हूं कि हम लोग कुछ दिन मामा के घर पर रहें.’’

पति की बात सुन कर दीपा ने भी सोचा कि जब उन की कोई औलाद नहीं है तो उन के बाद सारी जायदाद पति की ही हो जाएगी. इसलिए उस ने मामा के यहां रहने की हामी भर दी. 23 दिसंबर, 2013 को समरजीत दीपा को ट्रेन से सुलतानपुर ले गया. उस के साथ दोनों भाई अरविंद और धर्मेंद्र भी थे. जब वे सुलतानपुर स्टेशन पहुंचे, अंधेरा घिर चुका था. नगईपुर सुलतानपुर स्टेशन से दूर था. नगईपुर गांव से पहले ही समरजीत के मामा नरेंद्र का आम का बाग था. प्लान के मुताबिक नरेंद्र उन का उसी बाग में पहले से ही इंतजार कर रहा था. बाग के किनारे पहुंच कर तीनों भाइयों ने दीपा की गला घोंट कर हत्या कर दी और बाग में ही गड्ढा खोद कर लाश को दफना दिया.

जिस गड्ढे में उन्होंने लाश दफन की थी, जल्दबाजी में वह ज्यादा गहरा नहीं खोदा गया था. नरेंद्र को इस बात का अंदेशा हो रहा था कि जंगली जानवर मिट्टी खोद कर लाश खाने लगें. ऐसा होने पर भेद खुलना लाजिमी था इसलिए इस के 2 दिनों बाद नरेंद्र रात में ही अकेला उस बाग में गया और वहां से 20-25 कदम दूर दूसरा गहरा गड्ढा खोदा. फिर पहले गड्ढे से दीपा की लाश निकालने के बाद उस ने उसे उसी की शाल में गठरी की तरह बांध दियाउस गठरी को उस ने दूसरे गहरे गड्ढे में दफना कर उस के ऊपर आम का एक पेड़ लगा दिया ताकि किसी को कोई शक हो. दीपा को ठिकाने लगाने के बाद वे इस बात से निश्चिंत थे कि उन के अपराध की किसी को भनक लगेगी. यह जघन्य अपराध करने के बाद अरविंद और धर्मेंद्र पहले की ही तरह बनठन कर घूम रहे थे. उन को देख कर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि उन्होंने हाल ही में कोई बड़ा अपराध किया है.

गांव के ज्यादातर लोगों को पता था कि दीपा दिल्ली में समरजीत के साथ पत्नी की तरह रह रही है. जब उन्होंने समरजीत को गांव में अकेला देखा तो उन्होंने उस से दीपा के बारे में पूछाजब दीपा के पिता रामसनेही को भी जानकारी मिली कि समरजीत के साथ दीपा गांव नहीं आई है तो उस ने उस से बेटी के बारे में पूछा. तब समरजीत ने उसे झूठी बात बताई कि दीपा एक महीने पहले उस से झगड़ा कर के दिल्ली से गांव जाने की बात कह कर गई थी. समरजीत की यह बात सुन कर रामसनेही घबरा गया था. फिर वह बेटी की छानबीन करने दिल्ली पहुंचा और बाद में दिल्ली के पुल प्रहलादपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के बाद ही पुलिस अभियुक्तों तक पहुंची. पुलिस ने समरजीत, अरविंद, धर्मेंद्र और मामा नरेंद्र को अपहरण कर हत्या और लाश छिपाने के जुर्म में गिरफ्तार कर 9 जनवरी, 2013 को दिल्ली के साकेत न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी पवन कुमार की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

पहले जादू के हुए शिकार, फिर तांत्रिकों ने घेरा दिल्ली का ये परिवार

लोग चाहे कितने भी जागरूक हो गए हों, भले ही डिजिटल क्रांति आ गई हो लेकिन आज भी समाज में अंधविश्वास कायम है. कुछ अंधविश्वासी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए तांत्रिकों के पास पहुंचते हैं. तांत्रिक भी ऐसे लोगों की अंधी आस्था का लाभ उठाने से नहीं चूकते.

अंधविश्वास में डूबे ऐसे लोग आर्थिक शोषण के साथसाथ शारीरिक शोषण भी करा बैठते हैं. ऐसी बात नहीं है कि केवल अनपढ़ और निम्न तबके के लोग ही तांत्रिकों के पास पहुंचते हैं. सच्चाई तो यह है कि उच्च वर्ग के कई लोग भी तांत्रिकों की शरण में जाते हैं, मामूली पढ़ेलिखे नहीं बल्कि उच्चशिक्षित भी.

तथाकथित तांत्रिकों के चक्कर में फंस कर कई परिवार बरबाद हो चुके हैं, क्योंकि अपने स्वार्थ के लिए ये तांत्रिक कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं. दिल्ली के मंदिर मार्ग इलाके में एक तांत्रिक के क्रियाकलाप की ऐसी खौफनाक हकीकत सामने आई कि सुनने वाले का भी कलेजा कांप उठे.

सेंट्रल दिल्ली के थाना मंदिर मार्ग का एक इलाका है कालीबाड़ी, जो प्रसिद्ध बिड़ला मंदिर (लक्ष्मीनारायण मंदिर) के सामने है. वैसे इस इलाके में अधिकांशत: सरकारी फ्लैट बने हुए हैं, जिन में सरकारी कर्मचारी रहते हैं.

यहीं के एक फ्लैट में 44 साल की के.वी. रमा अपने पति डी.वी.एस.एस. शिव शर्मा (45 साल) और 2 बच्चों के साथ रहती थी. के.वी. रमा शर्मा भारत सरकार के एक मंत्रालय में स्टेनोग्राफर के पद पर नौकरी करती थी. जबकि पति शिव शर्मा डीएलएफ कंपनी में फाइनैंस मैनेजर थे. इस दंपति की बेटी 7वीं कक्षा में और बेटा 5वीं कक्षा में पढ़ रहे थे. दोनों मियांबीवी कमा रहे थे, इसलिए घर पर हर महीने सैलरी के रूप में मोटी रकम आती थी. कुल मिला कर यह छोटा सा परिवार हर तरह से खुश और सुखी था.

कहते हैं जब किसी व्यक्ति के पास जरूरत से ज्यादा पैसा आने लगता है तो उस का दिमाग और ज्यादा सक्रिय हो जाता है. वह उस पैसे से और ज्यादा पैसे कमाने के उपाय खोजता है. शिव शर्मा भी अपने पैसे को और ज्यादा करने के उपाय खोजने लगे.

किसी ने उन्हें बताया कि शेयर मार्केट की कुछ कंपनियां ऐसी हैं, जिन में पैसे लगाने पर अच्छाखासा मुनाफा कमाया जा सकता है. यह बात शिव शर्मा को समझ आ गई. उन्हें शेयर मार्केट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, लिहाजा उन्होंने इंटरनेट से अच्छा लाभांश देने वाली कुछ कंपनियों के बारे में जानकारी हासिल कर ली.

इस के बाद उन्होंने उन कंपनियों के शेयर खरीदने शुरू कर दिए. शुरुआत में उन्हें फायदा हुआ तो उन की दिलचस्पी और बढ़ती गई. उन्होंने शेयर मार्केट में और ज्यादा पैसा लगाया. इस में उन्हें मिलाजुला अनुभव मिलने लगा. कुछ शेयरों ने लाभ दिया तो कुछ में उन्हें नुकसान भी हुआ. हो चुके नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने मोटा निवेश किया.

इस का नतीजा यह निकला कि उन्हें इस में भारी नुकसान हुआ. इस से उन की जमापूंजी तो चली ही गई, साथ ही उन पर कई लाख रुपए का कर्ज भी चढ़ गया. औफिस के लोगों से भी उन्होंने काफी पैसे उधार ले लिए थे. जिन लोगों से शिव शर्मा ने पैसे उधार ले रखे थे, उन के पैसे समय पर नहीं लौटाए तो उन्होंने तकादा करना शुरू कर दिया. कुछ लोग पैसे मांगने उन के फ्लैट तक आने लगे.

फलस्वरूप शिव शर्मा तनाव में रहने लगे. पत्नी के.वी. रमा को भी लोगों की तकादा करने वाली बात अच्छी नहीं लगती थी. शिव शर्मा कर्ज निपटाने के लिए पत्नी से पैसे मांगते थे. उन का कर्ज उतारने में पत्नी भी सहयोग कर देती थी. इन सब बातों को ले कर पतिपत्नी में नोंकझोंक होने लगी. शिव शर्मा तनाव की वजह से चिड़चिड़े हो गए थे, इसलिए वह गुस्से में पत्नी की पिटाई कर देते थे.

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घर में शुरू हो गई कलह

नतीजतन जिस घर में पहले सभी लोग शांति से रहते थे, अब वहां कलह ने डेरा डाल लिया था. पत्नी सरकारी कर्मचारी थी, वह अच्छीखासी सैलरी पाती थी, इसलिए वह पति की तनाशाही सहने के बजाय करारा जवाब दे देती तो पति उस पर हाथ छोड़ देता. के.वी. रमा महसूस करने लगी कि पति की वजह से ही वह शारीरिक और मानसिक समस्या से जूझ रही है. उधर शिव शर्मा लोगों के तकादे से परेशान थे. वह पत्नी से और पैसे मांगते तो वह मना कर देती कि अब उसे फूटी कौड़ी नहीं देगी.

एक दिन रमा ने अपने एक जानकार से अपने घर की समस्या के बारे में चर्चा की. उस जानकार ने बताया कि आप के पति पर किसी ऊपरी हवा का चक्कर हो सकता है. ऐसे में अगर किसी तांत्रिक से मिला जाए तो समस्या का समाधान हो सकता है. रमा इस तरह के अंधविश्वास से दूर रहती थी. हालांकि उस ने कई सार्वजनिक स्थानों पर तांत्रिकों के पैंफ्लेट चिपके देखे थे, जिन में हर तरह की समस्या का समाधान कुछ घंटों में करने की बात लिखी होती थी. इस के अलावा लोकल केबल चैनल पर भी ऐसे तांत्रिकों के विज्ञापन देखे थे.

रमा तंत्रमंत्र, टोनेटोटकों आदि को केवल ढकोसला समझती थी. पर अब जब उन के एक जानकार ने घर की समस्या के बारे में तांत्रिक के पास जाने की सलाह दी तो रमा ने भी सोचा कि अगर घर का तनाव किसी तांत्रिक के पास जाने से ठीक हो जाए तो तांत्रिक के पास जाने में कोई बुराई नहीं है. यानी जिस बात को वह अंधविश्वास और ढकोसला बताती थी, अब जरूरत पड़ने पर वह उसी पर विश्वास करने लगी.

करना पड़ा तंत्रमंत्र पर विश्वास

रमा किसी तांत्रिक को नहीं जानती थी, उस के जानकार ने दिल्ली के दक्षिणपुरी इलाके रहने वाले तांत्रिक श्याम सिंह उर्फ भगतजी के बारे में बताया. उस से पता ले कर वह तथाकथित तांत्रिक श्याम सिंह के पास पहुंच गई. तांत्रिक ने सब से पहले बातों बातों में रमा से उस के परिवार की आर्थिक स्थिति को समझा. इस के बाद रमा ने पति के बारे में एकएक बात तांत्रिक को बता दी.

रमा की बात सुनने के बाद तांत्रिक ने अपनी आंखें मूंद लीं और अपनी गद्दी पर बैठेबैठे ही बोला, ‘‘आप के पति के साथ किसी ने कुछ कर दिया है, जिस की वजह से वह घर का एकएक सामान बेच देंगे. यानी वह घर की बरबादी कर के रहेंगे.’’

‘‘भगतजी, इस का उपाय क्या है. मैं चाहती हूं कि वह शेयर बाजार से एकदम दूर हो जाएं. इस शेयर बाजार ने तो हमारे घर की सुखशांति सब छीन ली है.’’ रमा ने कहा.

‘‘देखो, मैं समाधान तो कर दूंगा. वह शेयर में पैसे भी नहीं लगाएंगे, साथ ही बदसलूकी भी नहीं करेंगे. लेकिन इस में करीब एक लाख रुपए का खर्च आएगा.’’ तांत्रिक बोला.

‘‘कोई बात नहीं, हम आप को यह रकम दे देंगे. लेकिन हमें समस्या का समाधान चाहिए.’’ रमा ने कहा.

‘‘आप इस की चिंता न करें. आप हमारे रिसैप्शन पर 30 हजार रुपए जमा करा दीजिए, जिस से हम अपना काम शुरू कर सकें.’’ तांत्रिक ने कहा तो रमा ने पैसे रिसैप्शन पर बैठी लड़की को दे दिए.

वह इस विश्वास से घर चली आईं कि अब समस्या दूर हो जाएगी.

तांत्रिक ने कुछ मंत्र बुदबुदाने के बाद रमा को भभूत देते हुए कहा, ‘‘लो यह भभूत, तुम 7 शनिवार तक पति को शाम के खाने में मिला कर दे देना, सब कुछ ठीक हो जाएगा. ध्यान रखना केवल शनिवार को ही देना. इसे खाने में तब मिलाना जब मिलाते समय कोई टोके नहीं.’’

‘‘ठीक है भगतजी, मैं ऐसा ही करूंगी.’’ कह कर रमा घर चली आई. तांत्रिक के कहे अनुसार रमा ने ऐसा ही किया. वह हर शनिवार को शाम के खाने में पति के खाने में तांत्रिक द्वारा दी गई भभूत मिला कर देने लगी थी. उसे उम्मीद थी कि भभूत अपना असर जरूर दिखाएगी. पर 4-5 सप्ताह बाद भी पति के व्यवहार में कोई फर्क नहीं पड़ा तो रमा ने तांत्रिक को फोन किया. जवाब में तांत्रिक ने कहा कि 7 शनिवार होने दो, पूरा असर होगा. इस बीच रमा तांत्रिक से फोन पर बात करती रहती थी.

किसी तरह शिव शर्मा को इस बात का आभास हो गया था कि उस की पत्नी किसी तांत्रिक के पास जाती है. शिव शर्मा ने पत्नी से इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा. 7 शनिवार पति को भभूत खिलाने के बाद भी पति पर कोई असर नहीं हुआ तो रमा तांत्रिक के पास पहुंची. तांत्रिक ने फिर दूसरी भभूत दी.

इतना ही नहीं, तांत्रिक से उस के फ्लैट पर पूजा, हवन भी कराया. निश्चित दिनों तक भभूत खिलाने के बाद भी पति की आदतों में कोई फर्क नहीं पड़ा तो रमा फिर से तांत्रिक से मिली. चूंकि वह पति से अब ज्यादा ही परेशान हो चुकी थी, इसलिए उस ने तांत्रिक से शीघ्र समाधान करने के लिए कहा.

बना लिया मारने का प्लान

इस पर तांत्रिक ने रमा से कहा कि अब तो इस के लिए आरपार की लड़ाई लड़नी पड़ेगी. रमा ने भी कह दिया कि पति के स्थाई निदान के लिए वह तैयार है. इस के बाद तांत्रिक ने एक बोतल पानी में कुछ घोल कर दे दिया. तांत्रिक श्याम सिंह उर्फ भगतजी मूलरूप से उत्तराखंड का रहने वाला था. वह दक्षिणपुरी में किराए के मकान में पिछले दोढाई साल से अपना धंधा चला रहा था.

वह पहाड़ों से कुछ जड़ी बूटियां लाता रहता था. उन में से ही कोई बूटी उस ने बोतल के पानी में घोल कर रमा को दे दी थी. घर पहुंच कर रमा ने एक गिलास में बोतल का पानी पति को देते हुए कहा, ‘‘लो, यह बाबाजी का दिया हुआ प्रसाद है. इसे पी लो, सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी.’’

पत्नी के विश्वास पर शिव शर्मा ने वह पानी पी लिया. पानी पीने के बाद उन की हालत बिगड़ने लगी. हालत बिगड़ने पर पत्नी उन्हें डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल ले गई. पति को अस्पताल में भरती कराने के बाद रमा ने जब देखा कि पति की हालत गंभीर है तो वह वहां से घर चली आई. अस्पताल में कुछ देर बाद ही शिव शर्मा की मौत हो गई.

शिव शर्मा की मौत के बाद अस्पताल के लोगों ने रमा को ढूंढा पर वह नहीं मिली. इस पर अस्पताल प्रशासन द्वारा पुलिस को खबर दे दी गई. पुलिस ने लाश अस्पताल की मोर्चरी पहुंचवा दी. थाना मंदिर मार्ग के थानाप्रभारी आदित्य रंजन भी वहां पहुंच गए.

पुलिस छानबीन कर रमा के फ्लैट तक पहुंच गई. थाने बुला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि तांत्रिक श्याम सिंह द्वारा दिया गया पानी पीने के बाद ही उन की हालत बिगड़ी थी. रमा की निशानदेही पर पुलिस ने दक्षिणपुरी से तांत्रिक श्याम सिंह को भी हिरासत में ले लिया. उस ने पूछताछ में स्वीकार कर लिया कि उस ने रमा को दिए गए पानी में जहर मिलाया था. पुलिस तांत्रिक को भी थाने ले आई.

उधर शिव शर्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी जहरीले पदार्थ के सेवन से मृत्यु होने की पुष्टि हो गई. तब पुलिस ने आरोपी के.वी. रमा और तांत्रिक श्याम सिंह को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इस तरह एक तांत्रिक के चक्कर में फंस कर रमा ने अपनी गृहस्थी खुद ही उजाड़ ली.

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खजाना मिलने के लालच में गंवाए 17 लाख रुपए

कहते हैं लालच बुरी बला है. ज्यादा लालच हमेशा नुकसानदायक होता है. दिल्ली के मंगोलपुरी के रहने वाले किशनलाल (परिवर्तित नाम) के साथ ऐसा ही हुआ. मंगोलपुरी के वाई ब्लौक में रहने वाले किशनलाल के परिवार में पत्नी के अलावा 5 बच्चे हैं. उन की दवाई की दुकान है. उन का कारोबार अच्छाखासा चल रहा था. करीब 6 साल पहले उन के मकान में जाहिद नाम का एक युवक किराए पर रहता था.

एक दिन जाहिद किशनलाल के घर आया. वह काफी दिनों बाद आया था, इसलिए उन्होंने जाहिद की खूब खातिरतवज्जो की. बातचीत के दौरान जाहिद ने बताया कि वह तांत्रिक है. अपनी तंत्र विद्या से लोगों का भला करता है. उस ने किशनलाल ने कहा, ‘‘आप के इस घर में काला साया है. यह परिवार के लिए अहितकर है. यदि शीघ्र ही इस का समाधान नहीं किया गया तो परिवार में किसी की जान भी जा सकती है.’’

यह सुन कर किशनलाल घबरा गए. वह बोले, ‘‘इस का समाधान कैसे होगा. तुम तो तांत्रिक हो, इसलिए तुम्हीं बताओ.’’

‘‘आप परेशान मत होइए. समाधान हो जाएगा, लेकिन इस की पूजा आदि पर करीब 30 हजार रुपए खर्च होंगे.’’ जाहिद ने बताया.

जाहिद किशनलाल से पूजा के नाम पर 30 हजार रुपए ले गया. करीब 10 दिन बाद जाहिद फिर से किशनलाल के यहां आया. वह बोला, ‘‘10 दिन की पूजा के दौरान मुझे पता चला कि आप के घर में मुगलों की दौलत गड़ी हुई है. यही मुसीबत का साया है. अगर खुदाई कर के दौलत निकाल कर पूजा की जाए तो यह साया दूर हो जाएगा.’’

घर में खजाना गड़ा होने की बात सुन कर किशनलाल खुश हो गए. उन्होंने जाहिद से मकान में खुदाई करने को कहा तो जाहिद ने कहा यह काम बड़ा है. इस काम में 2 तांत्रिकों को और लगाया जाएगा. इस के लिए उस ने किशनलाल से 60 हजार रुपए और ले लिए. जाहिद 2 तांत्रिकों को किशनलाल के घर ले आया.

तांत्रिकों ने किशनलाल के घर में पूजा कर के बताया कि वास्तव में इस घर में भारी मात्रा में खजाना दबा हुआ है. यकीन दिलाने के लिए उन तांत्रिकों ने फर्श की खुदाई शुरू कर दी. थोड़ी खुदाई करने पर सोने का एक सिक्का मिला. सिक्का देख कर किशनलाल खुश हो गए. उन्होंने वह सिक्का एक ज्वैलर को दिखाया. ज्वैलर ने सिक्के की जांच कर के बताया कि सिक्का 100 प्रतिशत सोने का है.

इस के बाद किशनलाल को लालच आ गया. उन्होंने और खुदाई कराने को कहा तो जाहिद ने कहा कि आगे की खुदाई से पहले पूजा करनी होगी, वरना वह साया इस कार्य में व्यवधान डालेगा. जाहिद ने उन से 3 लाख रुपए के अलावा 110 लोगों को खाना खिलाने और उन्हें कपड़े दान दिए जाने का खर्च मांगा. किशनलाल ने वह भी दे दिया.

इस के बाद उन तांत्रिकों ने किशनलाल से पूजा आदि के नाम पर 11 लाख रुपए और ऐंठ लिए. किशनलाल ने भी यह सोच कर रकम दे दी कि जो खजाना निकलेगा, उस के मुकाबले यह रकम मामूली है. इसी लालच में उन्होंने इतनी बड़ी रकम उन तांत्रिकों को दे दी थी. जाहिद और उस के साथी किशनलाल से अब तक 17 लाख रुपए ऐंठ चुके थे. किशनलाल ने लालच में आ कर पैसे ब्याज पर ला कर दिए थे.

अगले दिन जाहिद ने किशनलाल को फोन कर के बताया कि उन्हें अशोक विहार थाना पुलिस ने पकड़ लिया है. पुलिस 6 लाख रुपए मांग रही है. किशनलाल थाना अशोक विहार गए तो पता चला कि पुलिस ने उन्हें नहीं पकड़ा है. तब उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें ठगा जा रहा है. किशनलाल को अपने साथ हुई ठगी का बड़ा अफसोस हुआ. उन्होंने इस की शिकायत पुलिस से की.

तांत्रिकों के चक्कर में पड़ कर कई परिवार बरबाद हो चुके हैं. 7 फरवरी, 2018 को उत्तर पश्चिमी दिल्ली के नेताजी सुभाष पैलेस क्षेत्र में तांत्रिक के बहकावे में आ कर एक व्यक्ति ने अपनी बेटी को ही उस के हवाले कर दिया. पीडि़त लड़की ने पुलिस को बताया कि तांत्रिक बुरी आत्माओं को भगाने के नाम पर पिछले 12 सालों से उस के साथ रेप करता रहा.

18 फरवरी, 2018 को भी एक महिला ने इसलिए खुदकुशी कर ली थी कि बच्चा न होने पर उस के ससुराल वालों ने उसे तांत्रिक के हवाले कर दिया था. पश्चिमी दिल्ली के जखीरा में एक महिला ने बेटे की चाह में अपनी दोनों बेटियों को मार दिया था. तांत्रिक के कहने पर वह महिला अपनी 5 साल और 6 माह की बेटी के ऊपर लेट गई थी, जिस से दोनों बेटियों की मौत हो गई थी.

दिल्ली में ही 22 फरवरी, 2018 को एक दोस्त की इसलिए हत्या कर दी थी क्योंकि तांत्रिक ने आरोपी से कहा था कि तुम्हारी बहन पर दोस्त ने जादू किया था, इसलिए बहन ने आत्महत्या कर ली थी.

आजकल तांत्रिकों ने भी अपने बिजनैस का ट्रेंड बदल दिया है. दिल्ली एनसीआर के तांत्रिकों का बिजनैस फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर पर भी चल रहा है. तांत्रिक इन माध्यमों पर प्रचार कर के अपनी चमत्कारिक शक्तियों से कुछ ही घंटों में किसी भी समस्या का समाधान करने का दावा करते हैं. कई तांत्रिकों ने तो अपना प्रभाव जमाने के लिए आकर्षक वेबसाइट भी बनवा रखी है.

इन वेबसाइटों पर औनलाइन बुकिंग की भी विशेष सुविधा उपलब्ध करा रखी है. पेमेंट भी ये औनलाइन पहले ही जमा करा लेते हैं. अपनी समस्याओं का समाधान कराने के चक्कर में लोग जब तथाकथित तांत्रिकों द्वारा ठगे जाते हैं तो शर्म की वजह से यह बात किसी को बताने में हिचकते हैं. यानी ठगे जाने के बावजूद भी लोग बदनामी की वजह से चुप रहते हैं. यही वजह है कि तांत्रिकों का अंधी आस्था के नाम पर ठगी का यह बिजनैस खूब फलफूल रहा है.

सैक्स के लालच में ठगी का शिकार होते लोग

Crime News in Hindi: आजकल हर उम्र के लोग सैक्स के मजे के लिए इतने ज्यादा उतावले रहते हैं कि लड़कियां उन्हें आसानी से अपने जाल में फंसा लेती हैं. कुछ दिन पहले एक 25 साला खूबसूरत लड़की रागिनी ने आगरा के एक 50 साला कारोबारी रामदास के 3 लाख रुपए लूट लिए थे. कारोबारी रामदास धौलपुर के कुछ दुकानदारों से अपने सामान की उधारी के 3 लाख रुपए की उगाही कर स्कूटर से आगरा जा रहे थे. धौलपुर के बसस्टैंड से कुछ ही दूर पहुंचे थे कि सड़क के किनारे खड़ी एक लड़की ने उन से लिफ्ट मांगी. उस लड़की ने अपना नाम रागिनी बताया. तरस खा कर रामदास ने उसे अपने स्कूटर पर बिठा लिया. रागिनी ने जब उन की कमर को पकड़ा, तो उस के हाथ की छुअन से उन्हें बड़ा मजा आने लगा था.

जब उन्होंने स्कूटर की रफ्तार तेज की, तो रागिनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘जरा आराम से चलिए. आप के साथ चलने में मुझे बड़ा मजा आ रहा है.’’

‘‘वह क्यों?’’ रामदास ने मुसकराते हुए उस से पूछा, तो वह बोली, ‘‘आप अभी भी एकदम जवान लगते हैं.’’

यह सुन कर रामदास खुश हो कर उस से बोले, ‘‘अब भी मुझ में इतनी ताकत है कि आप की उम्र की लड़की से सैक्स करूं, तो उसे भी 1-2 बार में पेट से कर सकता हूं.’’

रागिनी हंसते हुए बोली, ‘‘फिर तो आप काम के आदमी हैं.’’

‘‘कैसे?’’ सुन कर रामदास ने उस से पूछा, तो रागिनी बोली, ‘‘आगरा में मेरी एक सहेली है दीप्ति. 2 साल पहले उस की शादी हुई थी, मगर अभी तक उस के बच्चा नहीं हुआ है. उस का पति दिनरात उस से सैक्स करता है, मगर बच्चा ठहरता ही नहीं. अगर आप उस के साथ सैक्स कर के उसे पेट से कर दें, तो वह और मैं कभी आप का यह एहसान नहीं भूलेंगीं.’’

यह सुन कर कारोबारी रामदास चहकते हुए बोले, ‘‘अगर मैं तुम्हारी सहेली को पेट से कर दूं, तो इनाम में मुझे क्या मिलेगा?’’

‘‘आप को इनाम में क्या चाहिए?’’ रागिनी ने पूछा.

रामदास बोले, ‘‘इनाम में मैं तुम्हारे साथ सैक्स करना चाहता हूं.’’

रागिनी कमर में प्यार से चपत लगाते हुए बोली, ‘‘मैं आप को मजे देने के लिए तैयार हूं.’’

रामदास ने बीच रास्ते में ही स्कूटर रोका और रागिनी को पेड़ों की ओट में ले गए और अपनी बांहों में ले कर उस के गालों को चूम लिया. उस समय वे इतने उतावले हो रहे थे कि वे उसे झाडि़यों की ओर ले जाने लगे, तो वह उन की ओर मुसकरा कर बोली, ‘‘यहां पर कुछ मजा नहीं आएगा. आनेजाने वाले लोगों के डर से ठीक से सैक्स नहीं हो पाएगा. हम आगरा पहुंच कर आज रात किसी होटल में रुक कर पूरी रात सैक्स के मजे लेंगे. मैं अपनी उस सहेली को भी वहां ले आऊंगी.

‘‘पर यह ध्यान रखना कि आप को मेरी सहेली को पेट से करना है, मुझे नहीं. क्योंकि अभी मेरी शादी नहीं हुई है.’’

जब वे आगरा के निकट पहुंचे, तो रागिनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप जरा यहीं पर खड़े रहिए. मेरी सहेली का घर पास में ही है. मैं उसे आप के स्कूटर से 10-15 मिनट में ले कर आती हूं.’’

इतना कह कर रागिनी उन के स्कूटर को ले कर अपनी सहेली के यहां पर चली गई.

शाम तक रामदास वहीं खड़े हो कर रागिनी के आने के इंतजार में परेशान हो गए थे, मगर वह वापस नहीं लौटी थी. कुछ दूरी पर उन्हें अपना स्कूटर तो मिल गया था, मगर उस की डिग्गी में रखे 3 लाख रुपए गायब थे.

यह देख कर रामदास उस खूबसूरत लड़की और उस की सहेली के साथ सैक्स के मजे के लालच पर पछतावे के आंसू बहा रहे थे.

कुछ इसी तरह से कचरा बीनने वाली 2 लड़कियों ने एक अफसर के 20 साला लड़के को लूटा था. दोपहर का समय था. संदीप और उस का दोस्त सुरेश बंगले का गेट खोल मोबाइल फोन पर गाने सुन रहे थे. उन्हें वहां पर कचरा बीनने वाली 2 लड़कियां दिखाई दीं. उन दोनों लड़कियों ने उन से पानी मांगा, तो उन्होंने फ्रिज से बोतल निकाल कर उन्हें पानी पिलाया.

उन में से एक लड़की ने उन की ओर मुसकरा कर देखा, तो संदीप ने उस का हाथ पकड़ लिया.

वह लड़की उस से बोली, ‘‘हाथ पकड़ने से क्या होगा? अगर मजे लेने हैं, तो कुछ खर्चा करना पड़ेगा.’’

यह सुन कर संदीप ने उन दोनों लड़कियों को अंदर आने को कहा.

संदीप ने उन से पूछा, ‘‘मजे देने के लिए तुम्हें क्या चाहिए?’’

एक लड़की बोली, ‘‘हमें सोने का कोई जेवर चाहिए.’’

संदीप कुछ सोचने लगा, तभी उन दोनों लड़कियों ने अपनी कमीज के बटन खोल कर दिखाए, तो संदीप और सुरेश ने जोश में आ कर उन्हें अपनी बांहों में भर लिया.

यह देख कर एक लड़की उस से बोली, ‘‘अगर मजे चाहिए, तो पहले हमें सोने का एकएक जेवर दो. हम आप को ऐसे मजे देंगे, जैसे अब तक किसी ने नहीं दिए होंगे.’’

संदीप ने अलमारी खोल कर उस में से 2 सोने की चेनें निकाल कर उन्हें दीं, तो वे दोनों मजे देने के लिए उन के बैड पर लेट गई थीं. उन दोनों से मजे लेते हुए संदीप और उस का दोस्त सुरेश खुशी से मुसकरा रहे थे.

मजे ले कर जब वे लोग एकदूसरे से अलग हुए, तो संदीप उन से बोला, ‘‘क्या तुम दोनों आज रात यहां आ सकती हो? यहां पर तुम्हें अंगरेजी शराब के साथसाथ खाने में लजीज चिकन व तंदूरी रोटियां मिलेंगी. 2-2 हजार रुपए भी मिलेंगे.’’

यह सुन कर वे दोनों लड़कियां रात में आने की कह कर वहां से चली गईं.

संदीप और उस का दोस्त सुरेश रात होने का इंतजार करने लगे थे. रात को जब वे दोनों लड़कियां वहां आईं, तो लड़कियों ने चुपके से शराब में नशे की गोलियां मिला कर संदीप और सुरेश को बेहोश कर दिया.

दोपहर में जब संदीप ने अलमारी से निकाल कर उन्हें सोने की चेनें दी थीं, तभी उन लड़कियों ने चाबी रखने की जगह देख ली थी, इसलिए उन दोनों को बेहोश करने के बाद उन्होंने अलमारी से सोने के सभी जेवर और रुपए निकाले और वहां से चंपत हो गईं.

संदीप को जब पता चला कि वे लड़कियां उसे लूट चुकी हैं, तो मारे घबराहट के उस ने ट्रेन के आगे छलांग लगा कर खुदकुशी कर ली. कुछ पलों का सुख संदीप के लिए जानलेवा साबित हुआ.

मोबाइल लूटने वाली दिलकश हसीना

पहली अक्तूबर, 2016 की बात है. उस दिन भी शाम के वक्त कालेज बस ने लवलीन को माडलटाउन-1 के बसस्टैंड पर उतारा. वहां से कुछ दूरी पर स्थित परमानंद कालोनी में उस का घर था. बस से उतरने के बाद वह पैदल ही अपने घर जा रही थी. जब वह टैगोर पार्क के नजदीक पहुंची, तभी किसी ने अचानक ठीक उस के पीछे पहुंच कर उस की पीठ पर कोई सख्त चीज सटा कर सख्त लहजे में धमकी दी, ‘‘ऐ लड़की, तेरे पास जो कुछ नकदी और मोबाइल है, उसे फौरन मेरे हवाले कर दे वरना अपनी जान से हाथ धो बैठेगी.’’

वह आवाज किसी युवती की थी. लेकिन उस ने जिस तरह धमकी में उस से बात की थी, उस से लवलीन बुरी तरह सहम गई. उस की इतनी भी हिम्मत नहीं हुई कि वह एक बार पीछे मुड़ कर उस युवती या अपनी पीठ पर सटाई गई कठोर वस्तु को एक नजर देख ले. वह जस की तस खड़ी रह गई. लवलीन के ठिठक कर खड़े होते ही पीछे खड़ी युवती ने झट से उस की जेब में अपना दूसरा हाथ डाल दिया और उस की जेब में रखा एचटीसी का महंगा मोबाइल निकाल लिया.

उसी दौरान एक सफेद रंग की कार तेजी से उस के पास आ कर रुकी, उस की ड्राइविंग सीट पर एक युवक था. जिस युवती ने उस की जेब से मोबाइल फोन निकाला था, वह उसी कार में उस युवक के बराबर में जा कर बैठ गई. उस के सीट पर बैठते ही कार माडलटाउन के प्रिंस रोड की ओर बढ़ गई. उस कार के नजरों से ओझल हो जाने के बाद जैसे लवलीन को होश आया.

महंगा मोबाइल फोन लुट जाने पर लवलीन बहुत परेशान हुई. जिस जगह पर उस के साथ वारदात हुई थी, वहां से थोड़ी ही दूरी पर माडलटाउन पुलिस स्टेशन था. वह सोचने लगी कि जिस तरह उस के साथ वारदात हुई थी, वैसे में तो वे लोग अगर उस का अपहरण भी कर लेते तो वह क्या कर सकती थी.

बहरहाल, इस वारदात की रिपोर्ट लिखवाने के लिए वह माडनटाउन थाने पहुंच गई. ड्यूटी अफसर को उस ने अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी तो ड्यूटी अफसर ने इस बारे में थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल से बात की. उन के निर्देश पर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 382 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई और जांच एसआई देवेंद्र कुमार को सौंप दी गई.

एसआई देवेंद्र कुमार ने लवलीन से बदमाश युवक और युवती के कदकाठी और कार के बारे में पूछा तो लवलीन ने बताया कि उस लड़की की उम्र कोई 25 से 30 साल थी. जो युवक सफेद रंग की होंडा ब्रियो कार से आया था, उस का चेहरा वह ठीक से नहीं देख पाई थी. लेकिन उस कार के पीछे की नंबर प्लेट पर कोई नंबर नहीं लिखा था. लवलीन से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद देवेंद्र कुमार ने उसे अपने घर जाने की इजाजत दे दी.

लवलीन से पुलिस को केवल उस लड़की की उम्र आदि के बारे में ही जानकारी मिली थी. यदि उन की कार का नंबर मिल जाता तो उस के सहारे उन दोनों तक पहुंचा जा सकता था. आगे की कारवाई के संबंध में एसआई देवेंद्र कुमार ने थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल से बात की. थानाप्रभारी ने देवेंद्र कुमार को कुछ जरूरी हिदायतें देने के बाद इस वारदात की सूचना उत्तरपश्चिमी दिल्ली के डीसीपी मिलिंद दुबड़े को दी.

डीसीपी मिलिंद दुबड़े ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ एक मोबाइल फोन के लूटे जाने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यह घटना दिल्ली के बेहद पौश कहे जाने वाले इलाके माडलटाउन थाने के नजदीक घटी थी. वैसे भी यह घटना इस प्रकार की पहली घटना नहीं थी.

माडलटाउन, मुखर्जीनगर, मौरिसनगर और रूपनगर थानाक्षेत्र में इस तरह की अनेक वारदातें सितंबर, 2016 के बाद हो चुकी थीं. सभी वारदातों में युवक और युवती वारदात कर के कार से ही भागे थे. उन वारदातों में युवक और युवती बात करने के बहाने किसी लड़की का फोन लेते थे और बात करते करते कार में बैठ कर फरार हो जाते थे.

जानकारी में यह बात भी सामने आई थी कि युवती फर्राटेदार अंगरेजी बोलती थी. इसलिए डीसीपी ने वारदात करने वाले युवक युवती की तलाश के लिए माडलटाउन के एसीपी रविंद्र कुमार त्यागी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल, अतिरिक्त थानाप्रभारी सुधीर कुमार, एसआई देवेंद्र कुमार, हैडकांस्टेबल जितेंद्र, कांस्टेबल सतीश आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम में शामिल सभी सदस्य अपनेअपने स्तर से युवकयुवती को तलाशने लगे. 22 अक्तूबर की रात 8 बजे माडलटाउन थाने के हैडकांस्टेबल जितेंद्र और कांस्टेबल सतीश मैकडोनाल्ड्स की तरफ जाने वाले रास्ते पर बैरिकेड लगा कर उधर से आनेजाने वाले वाहनों को रोक कर रूटीन चैकिंग कर रहे थे. उन की नजरें खासतौर पर उस सफेद रंग की कार को तलाश रही थीं. उसी दौरान होंडा ब्रियो कार आ कर रुकी. वह भी सफेद रंग की थी. कार की अगली सीट पर एक युवती और युवक बैठे थे. हैडकांस्टेबल जितेंद्र ने कार की नंबर प्लेट की ओर नजर डाली तो वह चौंके, क्योंकि उस कार के आगे कोई नंबर प्लेट नहीं लगी थी.

जब उन से पूछताछ की गई तो वे दोनों पहले इधरउधर की बातें करने लगे. शक होने पर हैडकांस्टेबल जितेंद्र ने एसआई देवेंद्र कुमार को फोन कर के उन्हें इन दोनों के बारे में बताया. कुछ ही देर में देवेंद्र कुमार भी वहां पहुंच गए. उन्होंने उन दोनों से कार के कागजात दिखाने के लिए कहा. युवक ने कार के कागज दिखाए तो आरसी में कार नंबर दर्ज था, जबकि कार के आगेपीछे नंबर प्लेट नहीं लगी थी. कार पर नंबर प्लेट लगी न होने के बारे में उस से पूछा गया तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका.

मामला संदिग्ध देख कर पुलिस ने कार की तलाशी ली तो कार के अंदर से 10 महंगे मोबाइल फोन के अलावा ब्रांडेड लेडीज कपड़े और एक बुर्का मिला. पूछताछ के लिए उन्हें थाने ले जाया गया. दोनों से गाड़ी में मिले मोबाइल फोन और बिना नंबर की होंडा ब्रियो कार के बारे में सघन पूछताछ की गई तो दोनों ने स्वीकार कर लिया कि ये मोबाइल अलगअलग जगहों से लूटे गए हैं. युवती ने अपना नाम सोनम और युवक ने नीरज बताया.

दोनों ही शादीशुदा थे. लेकिन अपनेअपने जीवनसाथी को छोड़ कर दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. इस प्रेमी जोड़े ने मोबाइल लूटने की जो कहानी बताई, वह बड़ी ही दिलचस्प निकली. सोनम के पिता एक पुलिस अधिकारी थे और मजलिस पार्क के एक फ्लैट में रहते थे. मजलिस पार्क में ही नीरज के पिता पत्नी और बड़े बेटे के साथ रहते थे. वह भी पुलिस की नौकरी में थे. एक ही महकमे में कार्यरत होने की वजह से उन के घरों में एकदूसरे का आनाजाना एक सामान्य सी बात थी.

सोनम और नीरज बचपन से ले कर जवानी तक साथसाथ पलेबढ़े. जवानी की दहलीज पर पांव रखते ही सोनम और नीरज की दोस्ती प्यार में बदल गई. कुछ ही दिनों में उन की हरकतों को देख कर उन के घर वाले समझ गए कि वे एकदूसरे से प्यार करते हैं. बात आगे बढ़ी तो नीरज ने कह दिया कि वह सोनम से ही शादी करेगा. लेकिन सोनम के मातापिता उस का हाथ नीरज के हाथ में नहीं देना चाहते थे.

बेटी जवान थी, कहीं वह गुस्से में कोई गलत कदम न उठा बैठे, इसलिए पिता ने सोनम के ग्रैजुएट होते ही उस की शादी शालीमारबाग में रहने वाले विक्रम से कर दी. विक्रम एक खातेपीते घर का लड़का था. वह वजीरपुर  स्थित नेताजी सुभाष पैलेस में किसी निजी कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी करता था. सोनम और विक्रम शादी के बाद कुछ सालों तक एकदूसरे को बेहद प्यार करते रहे. 2 साल हंसीखुशी के साथ गुजारने के बाद सोनम ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म पर विक्रम बेहद खुश हुआ. वह सोनम को पहले से भी ज्यादा प्यार करने लगा, लेकिन सोनम नीरज को अपने दिल से कभी नहीं निकाल सकी और एक बार जब उस का आमनासामना नीरज से हुआ तो नीरज ने बताया कि वैसे तो उस की भी शादी हो चुकी है, लेकिन वह अब भी उसे प्यार करता है.

वह नीरज से किनारा नहीं कर सकी. कुछ सालों के अंतराल के बाद उन का सोया प्यार फिर जाग उठा और वे लोगों की नजरों से बच कर एकदूसरे से फिर मिलने लगे. कुछ समय तक तो विक्रम को सोनम की बेवफाई का कुछ पता नहीं चला, लेकिन सोनम के बारबार घर से गायब रहने से उसे उस पर शक हो गया. तब उस ने सोनम के घर से बाहर जाने पर बंदिश लगा दी. लेकिन इश्क पर आज तक किसी का कोई जोर चला है, जो इन पर चलता. लिहाजा इन का मिलनाजुलना लगातार जारी रहा. नीरज और सोनम एकदूसरे से बदस्तूर प्यार करते रहे.

आखिरकार पत्नी की बेवफाई से तंग आ कर विक्रम अपने से 14 साल छोटी युवती नीरजा को अपना दिल दे बैठा. नीरजा भी उसी के औफिस में काम करती थी. नीरजा बेहद हसीन युवती थी और रंगरूप के मामले में सोनम से कहीं ज्यादा सुंदर थी. विक्रम न केवल नीरजा के साथ ज्यादा वक्त बिताता, बल्कि उसे महंगे तोहफे भी देता. नीरजा से नजदीकी बढ़ने के बाद विक्रम ने सोनम की तरफ ध्यान देना बंद कर दिया. सोनम को जब यह जानकारी मिली तो उस ने सारी बात प्रेमी नीरज को बताई. इस समस्या से निजात दिलाने में नीरज ने उस का हर तरह से सहयोग करने का वायदा किया. लेकिन ऐसा करने में नीरज के साथ एक अहम समस्या आड़े आ रही थी.

नीरज एक बेटी का पिता था. कुछ दिनों बाद नीरज की पत्नी शैफाली को जब पता चला कि नीरज के संबंध सोनम से हैं तो उस ने नीरज से नाराजगी जाहिर करते हुए सोनम से संबंध खत्म करने को कहा. जबकि नीरज को पत्नी शैफाली से ज्यादा सोनम की फिक्र रहती थी, इसलिए उस ने शैफाली की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.

पति की तरफ से हो रही उपेक्षा से आहत हो कर शैफाली ने अपना रास्ता अलग कर लिया और फिर वह भी अपने बौयफ्रैंड के साथ मजलिस पार्क में अलग मकान ले कर रहने लगी. पत्नी के अलग रहने पर नीरज को दुख नहीं हुआ, बल्कि उस ने सोचा कि अच्छा हुआ. क्योंकि अब उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. उस ने आव देखा न ताव, सोनम को अपने साथ रहने के  लिए राजी कर लिया. सोनम भी इस अवसर की ताक में थी. वह अपने बेटे को ले कर नीरज के पास मजलिस पार्क में रहने लगी. नीरज दुकानों में खिलौने वगैरह सप्लाई करने लगा. इस से उसे ठीकठाक आमदनी होने लगी.

उधर विक्रम को जब पता चला कि उस की पत्नी सोनम नीरज के साथ रह रही है तो उसे बड़ा बुरा लगा. वह पहले से ही नीरज को अपना दुश्मन समझता था. वह नीरज को सबक सिखाना चाहता था.

10 अक्तूबर, 2016 को उसे इस का मौका मिल गया. उस ने नीरज को भाडे़ के गुंडों से पिटवा दिया. इस में नीरज को काफी चोटें भी लगीं. काफी दिनों तक सोनम ने उस की सेवा की तब जा कर वह ठीक हुआ. नीरज के ठीक होने के बाद उस ने अपने पति से बदला लेने का निश्चय किया.

उधर विक्रम की प्रेमिका नीरजा ने 8 अक्तूबर, 2016 को नीरज के खिलाफ मारपीट और पीछा करने की रिपोर्ट थाना आदर्शनगर में दर्ज करा दी. महंगे लाइफस्टाइल को अपनाने तथा विक्रम से नीरज का बदला लेने के लिए उसे एक बड़ी रकम की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थी. इसलिए दोनों ने मिल कर मोबाइल लूटने की योजना बनाई. नीरज अपने पिता की होंडा ब्रियो कार का उपयोग करता था. वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने कार की नंबर प्लेटें हटा दीं, जिस से किसी को कार का नंबर पता न चल सके. होंडा ब्रियो कार में सवार हो कर सोनम और नीरज शिकार को तलाशते, इन्हें कोई अकेली युवती सड़क पर चलती मिल जाती तो सोनम फर्राटेदार अंगरेजी बोल कर उस से यह कह कर उस का फोन मांग लेती कि उस के फोन की बैटरी डाउन हो चुकी है और उसे किसी से जरूरी बात करनी है. उस का फोन ले कर बात करतेकरते वह कार में बैठ कर प्रेमी नीरज के साथ फरार हो जाती. अक्तूबर, 2016 से उन्होंने वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया था.

अब तक की तहकीकात के बाद एसआई देवेंद्र कुमार को सोनम और नीरज के खिलाफ दिल्ली में दर्ज 13 मुकदमों की जानकारी मिली है. यह मामले यहां के माडलटाउन, मुखर्जीनगर, मौरिसनगर और रूपनगर थानों में दर्ज हैं.  दोनों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 23 अक्तूबर को रोहिणी कोर्ट के ड्यूटी मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया. जहां से दोनों को एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. देवेंद्र कुमार ने 24 अक्तूबर को दोनों को फिर से मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट सुनील कुमार की अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन से 6 आईफोन तथा एक एचटीसी का फोन बरामद किया. 26 अक्तूबर को दोनों को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. नीरजा परिवर्तित नाम है.

साइबर अपराध के जाल से रहें सावधान

बिहार में साइबर अपराध की तादाद में तेजी से इजाफा होता जा रहा है. इस के लिए नएनए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. बैंकिंग फ्राड की वारदातें सब से ज्यादा बिहार में ही हो रही हैं. औनलाइन शौपिंग साइटों से ले कर औनलाइन सामान बेचने वाली वैबसाइटों पर साइबर फ्राड के मामले बड़ी तेजी में सामने आ रहे हैं. घर बैठे रुपए कमाने का लालच दे कर नोएडा की एक कंपनी ने 6 लाख, 30 हजार लोगों से 37 अरब रुपए ठग लिए. उत्तर बिहार के 7 हजार से ज्यादा लोग भी ठगी का शिकार बने. सोशल ट्रेड डौट बिज नाम की कंपनी ने बिहार से भी 42 करोड़ रुपए ठग लिए थे.

कई सोशल साइटों पर धोखाधड़ी और किसी को बदनाम करने की वारदातें भी बढ़ती जा रही हैं. फेसबुक पर हजारोंलाखों अकाउंट फर्जी नाम और फोटो से बने हुए हैं. इस पर रोक लगाने के लिए फेसबुक वाले भी समयसमय पर एहतियात बरतते रहते हैं, पर फर्जी अकाउंट पर रोक नहीं लग सकी है.

पटना से सटे बिहटा इलाके का रंजय मिश्रा बताता है कि उस ने सुनीता कुमारी के नाम से फेसबुक पर फर्जी अकाउंट बना रखा है और फोटो भी किसी मौडल का लगा दिया है. वह लड़की बन कर तकरीबन 4 लड़कों के साथ चैटिंग करता है और प्यार व सैक्स की बातें करता है.

रंजय मिश्रा ने आगे बताया कि एक दिन एक लड़के से उस से मोबाइल नंबर मांगा और फोन पर बात करने को कहा. रंजय ने चैट बौक्स में लिखा कि उस के मोबाइल में बैलैंस नहीं है. लड़के ने उस का मोबाइल नंबर मांगा और तुरंत ही 2 सौ रुपए का रीचार्ज करा दिया. उस के बाद रंजय लड़की की आवाज बना कर उस से बातें करने लगा.

उस के बाद रंजय ने बाकी तीनों फेसबुक फ्रैंड्स के साथ भी यही नुसखा आजमाया और अपने मोबाइल फोन को रीचार्ज कराया. रंजय बताता है कि उस के मोबाइल फोन में हमेशा हजार 2 रुपए का बैलैंस रहता है. इस तरह के न जाने कितने फर्जी अकाउंट फेसबुक पर होंगे और न जाने कौन किस तरह से उन का बेजा इस्तेमाल कर रहा होगा.

पिछले 5 सालों के दौरान साइबर अपराध में 4 गुना इजाफा हो गया है. साल 2012 में जहां ऐसे मामलों की तादाद 51 थी, वहीं साल 2016 में यह बढ़ कर 225 हो गई और साल 2017 में तो 3 महीने में ही सौ मामले दर्ज हो गए. ऐसे मामलों के बढ़ने से साइबर दारोगा की बहाली की कवायद शुरू की गई है. हर जिले के थाने में एकएक साइबर यूनिट भी बनाई जाएगी.

हाल ही में साइबर ठगी का एक नया ही रूप देखने सामने आया. सैकंडहैंड सामान बेचने वाली एक बड़ी वैबसाइट पर नकली मोबाइल फोन बेचने का मामला सामने आया.

पटना के कुम्हरार महल्ले के रहने वाले एक शख्स ने सैमसंग का एस-7 मौडल मोबाइल फोन खरीदने के लिए और्डर किया. आधी कीमत पर मिल रहे मोबाइल फोन को फुलवारीशरीफ महल्ले का रहने वाला लड़का बेच रहा था. खरीदने के बाद पता चला कि वह मोबाइल फोन नकली है. कंपनी में शिकायत करने पर आईडी ब्लौक कर दी गई.

भागलपुर के चार्टर्ड अकाउंटैंट पल्लव पराशर के पैन नंबर पर साइबर ठगों ने विदेश में 50 अरब रुपए का ट्रांजैक्शन कर लिया. पल्लव पराशर को इस की जरा भी भनक नहीं लगी. पटना से आयकर विभाग ने जब उन्हें नोटिस भेजा, तो वे चौंक गए. उन्होंने 7 जनवरी को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के कोर्ट में केस दर्ज किया.

दिल्ली पुलिस ने लोगों के बैंक खाते से औनलाइन करोड़ों रुपए की ठगी करने वाले एक गिरोह का भंडाफोड़ किया. इस गिरोह ने पिछले 2 सालों में करोड़ों रुपयों की औनलाइन ठगी की थी. ठगों की पहचान 34 साल के सुभाष और 32 साल के रामशरण राय के रूप में हुई है.

सुभाष ने पुलिस को बताया कि वह लोगों को फोन कर के बैंक का मुलाजिम बताता था और कहता था कि यह काल उन के कार्ड की क्रेडिट लिमिट बढ़ाने के लिए की गई है. उस के बाद एटीएम का नंबर और पिन मांगा जाता था.

उस के बाद पलक झपकते ही अकाउंट से लाखों रुपए उड़ा लिए जाते थे. उड़ाए गए रुपयों को पेटीएम और औक्सिजन जैसे अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाता था. बाद में उस रकम को औनलाइन रीचार्जिंग अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाता. फिर अलगअलग जगहों पर रीचार्ज करने वाले दुकानदारों से संपर्क कर मोटा कमीशन देने का लालच दिया जाता था.

मिसाल के तौर पर अगर एयरटेल कंपनी उन्हें रीचार्ज करने पर 2 फीसदी कमीशन देती है, तो साइबर ठग उसे 30 से 35 फीसदी कमीशन दे देते थे. औनलाइन वालेट से रकम खत्म होने पर दुकानदार और ठग आपस में रकम बांट लेते थे. दुकानदार अपना कमीशन काट कर बाकी रकम ठग को दे देते थे.

पिछले साल बिहार के जानेमाने अर्थशास्त्री शैवाल गुप्ता भी साइबर फ्राड के शिकार बन गए थे. उन से 72 हजार, 8 सौ रुपए की ठगी कर ली गई थी. शैवाल गुप्ता के मोबाइल फोन नंबर  पर 07503434669 नंबर से विजय सिंह नाम के आदमी ने काल कर के कहा था कि वह दिल्ली पुलिस का सहायक अवर निरीक्षक है. उस ने शैवाल गुप्ता को बताया कि उन के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किया गया?है.

जब शैवाल गुप्ता ने इस की वजह जाननी चाही, तो कहा गया कि इस मामले में वे सरकारी वकील विनोद अग्रवाल के मोबाइल फोन नंबर 09716801457 पर बात कर लें.

शैवाल गुप्ता ने जब उस नंबर पर बात की, तो बताया गया कि उन के क्रेडिट कार्ड पर 72 हजार, 8 सौ रुपए बकाया हैं. उसी रकम की वसूली के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने केस किया है. उस वकील ने भारतीय स्टेट बैंक का एक अकाउंट नंबर देते हुए कहा कि अगर सैटलमैंट कराना है, तो 72 हजार, 8 सौ रुपए उस में डाल दें.

शैवाल गुप्ता ने 14 अक्तूबर को ऐक्सिस बैंक की बोरिंग रोड शाखा के अपने अकाउंट से भारतीय स्टेट बैंक के बताए अकाउंट में रुपए ट्रांसफर कर दिए. रुपए ट्रांसफर कराने के बाद उन्हें कुछ शक हुआ. जब उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक के अकाउंट के बारे में पता किया तो पता चला कि वह अकाउंट तो बिहार के ही सुपौल जिले की भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा का है.

शैवाल गुप्ता ने इस ठगी की सूचना आर्थिक अपराध शाखा (ईओयू) को दी. ईओयू ने जब पूरे मामले की जांच की, तो इंस्पैक्टर विजय सिंह और वकील विनोद अग्रवाल दोनों फर्जी निकले.

सुपौल की जिस भारतीय स्टेट बैंक की शाखा के अकाउंट में रुपए ट्रांसफर किए गए थे, वह सुपौल के ही जगतपुर गांव के अरविंद कुमार का पाया गया. अरविंद ने कबूल किया कि उस के खाते में 72 हजार, 8 सौ रुपए ट्रांसफर हुए हैं. अरविंद ने पूरी रकम वापस कर दी.

पिछले साल पटना की एक शादीशुदा और 5 महीने के बच्चे की मां फेसबुक के प्यार के चक्कर में फंस कर अपना सबकुछ गंवा बैठी थी. वह एक करोड़ रुपए के गहने और नकदी ले कर अपने आशिक के साथ ससुराल से फुर्र हो गई. इतना ही नहीं, वह अपने साथ 5 महीने के बच्चे को भी ले भागी थी.

पटना के कंकड़बाग इलाके की एक पाइप फैक्टरी के मालिक निखिल कुमार ने कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी कि उन की बीवी स्वाति करोड़ों रुपए के गहने और नकदी ले कर अपने प्रेमी शैलेंद्र के साथ भाग गई है.

स्वाति और निखिल की 5 साल पहले बड़े ही धूमधाम से शादी हुई थी. स्वाति को इंटरनैट से काफी लगाव था और वह अकसर कंप्यूटर पर समय गुजारती थी. इसी दौरान फेसबुक पर चैटिंग के जरीए उस की पहचान आस्ट्रेलिया के एक नौजवान शैलेंद्र शर्मा से हुई. वह वहां एमबीए की पढ़ाई कर रहा था.

शैलेंद्र पंजाब के फिरोजपुर जिले के अबोहर सिटी-2 के अजीमगढ़ गांव का रहने वाला था. चैटिंग के जरीए प्यार की कसमें खाते हुए वे दोनों घर से भाग निकले. स्वाति के मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर सिकंदराबाद में पुलिस ने उसे धर दबोचा था.

पटना के एसएसपी मनु महाराज बताते हैं कि बिहार पुलिस का साइबर सैल अब सीबीआई की तरह जांच पड़ताल करेगा.

याद रखें ये बातें

* कभी भी लैंडलाइन फोन या मोबाइल फोन पर किसी को भी अपने बैंक अकाउंट, क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी न दें.

* अगर कोई फोन पर खुद को बैंक का मुलाजिम बता कर भी कोई जानकारी मांगे तो भी कोई जानकारी न दें. अपने बैंक जा कर मैनेजर से खुद ही इस सिलसिले में पूछताछ कर लें.

* क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या अकाउंट से रुपए निकालने की सीमा कम रखें.

* हर 5-6 दिन पर अपने बैंक अकाउंट की जांच करते रहें और किसी भी तरह की गड़बड़ी की भनक लगने पर बैंक को सूचित करें.

* अपने बैंक अकाउंट का एसएमएस अलर्ट जरूर रखें.

* कोई भी फोन पर आधार कार्ड नंबर मांगे, तो उसे न बताएं.

* लौटरी लगने, डौलर में इनाम मिलने, गिफ्ट मिलने जैसे ईमेल का कोई जवाब न दें.

जब एक बैनर ने पकड़वाया कातिल

पटना गया रेलवे लाइन के पास कई टुकड़ों में मिली लाश की गुत्थी को एक बैनर ने सुलझा दिया. 45 साला गीता की लाश के कुछ टुकड़े सरस्वती पूजा के लिए बने बैनर में लिपटे मिले थे. उस बैनर पर फ्रैंड्स क्लब, कुसुमपुर कालोनी, नत्थू रोड, परसा बाजार लिखा हुआ था. इस गुत्थी को सुलझाने के लिए सदर अनुमंडल पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार मंडल की अगुआई में जक्कनपुर थाना इंचार्ज अमरेंद्र कुमार झा और परसा बाजार थाना इंचार्ज नंदजी प्रसाद व दारोगा रामशंकर की टीम बनाई गई. पूछताछ के बाद पता चला कि उस बैनर को रंजन और मेकैनिक राजेश अपने साथ ले कर गए थे. पुलिस ने तुरंत राजेश को दबोच लिया. राजेश से पूछताछ करने के बाद कत्ल की गुत्थी चुटकियों में हल हो गई.

गीता का कत्ल उस के अपनों ने ही कर डाला था. कत्ल से ज्यादा दिल दहलाने वाला मामला लाश को ठिकाने लगाने के लिए की गई हैवानियत थी. गीता के पति उमेश चौधरी, बेटी पूनम देवी और दामाद रंजन ने मिल कर गीता का कत्ल किया था. रंजन और उस के दोस्त राजेश ने मिल कर लाश को 15 छोटेछोटे टुकड़ों में काटा. उमेश, पूनम और राजेश को पुलिस ने दबोच लिया है, जबकि रंजन फरार है. हत्या में इस्तेमाल किए गए 3 धारदार हथियार भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं.

रंजन और राजेश ने गीता की लाश को चौकी पर रखा और हैक्सा ब्लेड से सब से पहले सिर को धड़ से अलग किया. सिर को काटने के बाद खून का फव्वारा बहने लगा, तो खून को एक प्लास्टिक के टब में जमा कर लिया और टौयलेट के बेसिन में डाल कर फ्लश चला दिया. उस के बाद लाश के दोनों हाथपैरों को काटा गया.

गीता की बोटीबोटी काट कर उसे कई पौलीथिनों में बांध कर दूरदूर अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. धड़ को कुसुमपुर में ही पानी से भरे एक गड्ढे में फेंक दिया गया. सिर को जक्कनपुर थाने के पास गया फेंका गया. वहीं पर हत्या में इस्तेमाल किए गए गड़ांसे और हैक्सा ब्लेड वगैरह को फेंक दिया गया.

हाथपैरों के टुकड़ों को पटनागया पैसेंजर ट्रेन में रख कर रंजन और राजेश पुनपुन रेलवे स्टेशन पर उतर गए. पटना गया पैसेंजर ट्रेन जब गया स्टेशन पहुंची, तो रेलवे पुलिस ने एक डब्बे में लावारिस बैग बरामद किया. उस बैग में हाथपैर के टुकड़े मिलने से गया पुलिस ने 18 अप्रैल को पटना पुलिस को सूचित किया. पटना पुलिस को धड़ और सिर पहले ही मिल चुके थे. शरीर के सभी हिस्सों को जोड़ने के बाद पता चला कि वह एक ही औरत की लाश है.

हत्यारों द्वारा गीता के जिस्म के टुकड़ों को अलगअलग जगहों पर फेंकने की वजह से हत्या के मामले को 3 थानों में दर्ज कराना पड़ा. गया के जीआरपी थाने में हाथपैर मिलने का, परसा बाजार में सिर मिलने का और पटना के जक्कनपुर थाने में धड़ मिलने का मामला दर्ज किया गया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज कहते हैं कि अपराधी चाहे कितनी भी चालाकी कर ले, कोई न कोई सुबूत पुलिस के लिए छोड़ ही जाता है. गीता की हत्या करने वालों ने भी कानून की पकड़ से बचने के लिए पूरा उपाय किया था, पर उस के दामाद ने ऐसा सुबूत छोड़ दिया कि पुलिस आसानी से उन तक पहुंच गई.

कत्ल के 40 घंटे के भीतर पटना सदर पुलिस की टीम ने पूरे मामले का खुलासा कर दिया. 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गीता का कत्ल कर उमेश अपनी बेटी पूनम के साथ मसौढ़ी चला गया था. उस के बाद रंजन ने अपने साथ काम करने वाले दोस्त राजेश को घर पर बुलाया और उस की मदद से लाश को टुकड़ों में काट डाला. इस के बदले में रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था.

17 अप्रैल की रात को पूनम ने अपनी मां गीता को चिकन खाने के लिए घर पर बुलाया था. वहां उमेश और रंजन पहले से मौजूद थे. पूनम ने चिकन में नींद की गोलियां मिला दी थीं. खाना खाने के बाद गीता बेहोश हो गई. तकरीबन 5 घंटे के बाद गीता को होश आया, तो उसे काफी कमजोरी महसूस हो रही थी.

गीता ने कमरे में इधरउधर देखा, तो कोई नजर नहीं आया. किसी तरह से उस ने अपने मोबाइल फोन से तुरंत अपने प्रेमी अरमान को फोन किया और बताया कि उस की तबीयत काफी खराब लग रही है. इसी बीच गीता का दामाद रंजन कमरे में पहुंच गया और उस ने गीता को मोबाइल फोन पर किसी से बात करते हुए सुन लिया. रंजन ने गुस्से में आ कर गीता का गला दबा कर उसे मार डाला.

पुलिस की छानबीन में पता चला है कि गीता का अरमान नाम के शख्स से नाजायज रिश्ता था. इस वजह से पति और बेटी ने मिल कर उस की हत्या कर डाली. गीता हर महीने अपने पति उमेश से रुपए लेने पहुंच जाती थी और उस से उस की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा ले कर अपने प्रेमी अरमान को दे देती थी. पिछले 20 सालों से गीता और अरमान के बीच नाजायज रिश्ता था. गीता का पति उमेश सचिवालय के भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्टमैन था.

55 साल के उमेश की शादी 30 साल पहले मसौढ़ी के तरेगाना डीह की रहने वाली गीता से हुई थी. शादी के बाद गीता ससुराल में रहने लगी और उन के 3 बच्चे भी हुए. कुछ सालों के बाद उमेश लकवे का शिकार हो गया. पति की बीमारी का फायदा उठाते हुए गीता ने अपने पड़ोसी अरमान से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी और उस के बाद जिस्मानी रिश्ते भी बने. वह ज्यादा से ज्यादा समय अरमान के साथ ही गुजारती थी.

गीता की इस हरकत से उमेश और उस की बेटियां गुस्से में रहती थीं. उन्होंने कई दफा गीता को समझाने और परिवार को संभालने की बात की, पर गीता पर उन की बातों का कोई असर नहीं होता था. यही वजह थी कि गीता का इतनी बेरहमी से कत्ल किया गया.

गांव वालों के ताने सुन कर उमेश परेशान रहने लगा था और उस ने अपना पुश्तैनी घर भी छोड़ दिया था. उस के बाद उमेश ने कुसुमपुर वाला घर भी छोड़ दिया. कभीकभी वह मसौढ़ी में अपनी ससुराल वाले घर में रहता था, तो कभी पटना में रहता था.

एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि हत्यारों ने हत्या में इस्तेमाल किए गए गंड़ासे और हैक्सा ब्लेड को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. बैनर पर कुसुमपुर फ्रैंड्स क्लब का पता लिखा हुआ था. उसी पते के सहारे पुलिस कुसुमपुर पहुंची और फ्रैंड्स क्लब का पता कर के हत्यारों तक आसानी से पहुंच गई.

बाप ने बेटी के जिस्म को देखा और फिर हवस में अंधा होकर किया ये काम

अंबाला शहर में परिवार के लोग हरिद्वार गंगा स्‍नान के लिए गए थे और घर में पिता-पुत्री रह गए थे. घर में बेटी को अकेली देख पिता की नीयत खराब हो गई और उसने उसे दुष्‍कर्म का शिकार बना डाला. परिजन लौटकर आए तो बेटी ने मां से पेट दर्द की शिकायत की. इसके बाद उसे डॉक्‍टर को दिखाया गया तो सारा मामला उजागर हो गया. अब अदालत ने दुष्‍कर्मी पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई है.

घर में बेटी को अकेली देख पिता ने उसे अपनी हवस का शिकार बना डाला. आरोप है कि बेटी ने विरोध किया तो उसने जान से मारने की धमकी दी. उसने बेटी को इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताने को कहा. परिवार के लोग हरिद्वार से लौटे तो लड़की को असहज पाया. पूछताछ करने पर लड़की ने मां को पेट में दर्द होने की बात कही.

इसके बाद वह उसे डॉक्टर के पास ले गई तो सारे मामले का खुलासा हो गया और लड़की ने मां को पिता की करतूत के बारे में बताया. इसके बाद मां ने आवाज उठाते हुए शहर के कोतवाली थाने में पति के खिलाफ मामला दर्ज करवाया. केस दर्ज करने के बाद पुलिस ने आरोपी पिता को गिरफ्तार कर लिया. एक साल दो माह चली सुनवाई के दौरान अदालत में 14 लोगों की गवाही हुई.

एडिशनल सेशन जज नरेंद्र सूरा की अदालत ने पिता को उम्रकैद के संग तीन हजार रुपये जुर्माना भी किया है. सुनवाई के दौरान पीड़िता लड़की और मां ने अपने बयान भी बदल लिए, लेकिन दोषी को बचा न सके.

‘लाइक’ के नाम पर 37 अरब की ठगी

दिल्ली के लक्ष्मीनगर के रहने वाले गौरव अरोड़ा नोएडा की एक रियल एस्टेट कंपनी में बढि़या नौकरी करते थे. लेकिन पिछले 2 सालों से वह काफी परेशान थे. इस की वजह यह थी कि जब से केंद्र में भाजपा सरकार आई, तब से रियल एस्टेट के क्षेत्र में मंदी आ गई है. पहले जहां प्रौपर्टी की कीमतें आसमान छू रही थीं, अब वह स्थिर हो चुकी हैं. केंद्र सरकार की नीतियों की वजह से इनवैस्टर भी अब प्रौपर्टी में इनवैस्ट करने से कतरा रहे हैं. इस का सीधा प्रभाव उन लोगों पर पड़ रहा है, जिन की रोजीरोटी रियल एस्टेट के धंधे से चल रही थी. गौरव को हर महीने अपनी कंपनी का कुछ टारगेट पूरा करना होता था. पहले तो वह उस टारगेट को आसानी से पूरा कर लेता था, लेकिन प्रौपर्टी के क्षेत्र में आई गिरावट से अब बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चल रहा था.

बच्चों की पढ़ाई के खर्च के अलावा उसे घर के रोजाना के खर्च पूरे करने में खासी परेशानी हो रही थी. एक दिन बौस ने उसे अपनी केबिन में बुला कर पूछा, ‘‘गौरव, यहां नौकरी के अलावा तुम और कोई काम करते हो?’’

‘‘नहीं सर, समय ही नहीं मिलता.’’ गौरव ने कहा.

‘‘देखो, मैं तुम्हें एक काम बताता हूं, जिसे तुम कहीं भी और दिन में कभी भी कर सकते हो. काम इतना आसान है कि तुम्हारी पत्नी या बच्चे भी घर बैठे कर कर सकते हैं.’’ बौस ने कहा.

‘‘सर, ऐसा क्या काम है, जो कोई भी कर सकता है?’’ गौरव ने पूछा.

‘‘नोएडा की ही एक कंपनी है सोशल ट्रेड. इस कंपनी के अलगअलग पैकेज हैं. आप जो पैकेज लेंगे, कंपनी उसी के अनुसार आप को लाइक करने को देगी. हर लाइक का 5 रुपए मिलता है.’’ बौस ने कहा.

‘‘सर, मैं कुछ समझा नहीं.’’ गौरव ने कहा.

‘‘मैं तुम्हें विस्तार से समझाता हूं.’’ कह कर बौस ने एक खाली पेपर निकाला और उस पर समझाने लगे, ‘‘देखो, कंपनी के 4 तरह के प्लान हैं. पहला है एसटीपी-10, दूसरा है एसटीपी-20, तीसरा है एसटीपी-50 और चौथा है एसटीपी-100.

‘‘एसटीपी-10 का पैकेज 5750 रुपए का है. इस में तुम्हें रोजाना 10 लाइक करनी होंगी. एसटीपी-20 का पैकेज 11500 रुपए का है. इस में तुम को रोजाना 20 लाइक करने को मिलेंगे. एसटीपी-50 के पैकेज में 28,750 रुपए जमा कर के 50 लाइक प्रतिदिन करने को मिलेंगे और एसटीपी-100 के पैकेज में 57,500 रुपए जमा कर के 125 लाइक तुम्हारी आईडी पर करने को आएंगे.

‘‘पैकेज की इस धनराशि में 15 प्रतिशत टैक्स भी शामिल है. यह लाइक शनिवार, रविवार और सरकारी छुट्टियों को छोड़ कर एक साल तक आएंगे. हर लाइक के 5 रुपए मिलेंगे. तुम्हें जो इनकम होगी, उस में से सरकार के नियम के अनुसार टैक्स भी काटा जाएगा.

‘‘तुम्हें फायदे की एक बात बताता हूं. तुम जिस पैकेज में जौइन करोगे, 21 दिनों के अंदर उसी पैकेज में 2 और लोगों को जौइन करा दिया तो तुम्हारी आईडी बूस्टर हो जाएगी. यानी उस आईडी पर दोगुने लाइक आएंगे. अगर और ज्यादा कमाई करनी है तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को जौइन कराओ, इस से डाइरेक्ट इनकम के अलावा बाइनरी इनकम भी मिलेगी.’’

बौस ने आगे बताया, ‘‘कंपनी हंडरेड परसेंट लीगल है. बिना किसी डर के तुम यहां काम कर के अच्छी कमाई कर सकते हो. यकीन न हो तो तुम मेरी बैंक पासबुक देख सकते हो.’’ इतना कह कर बौस ने गौरव को अपनी पासबुक दिखाई.

गौरव ने पासबुक देखी तो सचमुच उस में कंपनी की तरफ से कई हजार रुपए आने की एंट्री थी. उसे यह स्कीम अच्छी लगी. उसे लगा कि यह तो बहुत अच्छा काम है, जो घर पर कोई भी कर सकता है. उस ने बौस से कह दिया कि अभी उस के पास पैसे नहीं हैं. जैसे ही पैसों का जुगाड़ हो जाएगा, वह काम शुरू कर देगा.

घर पहुंचने के बाद गौरव के दिमाग में बौस द्वारा दिखाया गया सोशल ट्रेड कंपनी का प्लान ही घूमता रहा. उस ने सोचा कि अगर वह 57,500 रुपए जमा कर देगा तो 625 रुपए प्रतिदिन मिलेंगे. सब कटनेकटाने के बाद 1,33,594 रुपए मिलेंगे यानी एक साल में उस के पैसे दोगुने से अधिक हो जाएंगे.

गौरव ने इस बारे में पत्नी को बताया तो पत्नी ने कहा कि इस तरह की कई कंपनियां लोगों के पैसे ले कर भाग चुकी हैं. इन के चक्कर में न पड़ा जाए तो बेहतर है. वैसे आप की मरजी. गौरव ने पत्नी की सलाह को अनसुना कर दिया. सोचा कि इसे कंपनी के बारे में जानकारी नहीं है, इसलिए यह ऐसी बातें कर रही है. बहरहाल उस ने ठान लिया कि वह यह काम जरूर करेगा. अगले दिन उस के एक नजदीकी दोस्त ने भी सोशल ट्रेड के प्लान के बारे में बताते हुए कहा कि वह खुद पिछले एक महीने से इस प्लान से अच्छी इनकम हासिल कर रहा है.

दोस्त ने गौरव से भी सोशल ट्रेड जौइन करने को कहा. गौरव को सोशल ट्रेड में काम करना ही था, इसलिए उस ने बौस के बजाय दोस्त के साथ जुड़ कर सोशल ट्रेड में काम करना उचित समझा.

गौरव के पास कुछ पैसे बैंक में थे, कुछ पैसे बैंक से लोन ले कर उस ने 1,15,000 रुपए कंपनी के खाते में जमा करा कर 2 आईडी ले लीं. उस की आईडी के बाईं साइड में उस की एक और आईडी लग चुकी थी. अगर उस के दाईं साइड में 57,500 रुपए की एक आईडी और लग जाती तो उस की मुख्य आईडी पर बूस्टर लग सकता था.

इसलिए गौरव इस फिराक में था कि 57,500 रुपए की एक आईडी किस की लगवाई जाए. उस ने अपने बड़े भाई कपिल अरोड़ा को सोशल ट्रेड के प्लान की इनकम के बारे में बताया. लालच में कपिल भी तैयार हो गया और उस ने भी 25 जनवरी, 2017 को 57,500 रुपए जमा करा दिए.

कपिल अरोड़ा की आईडी लगते ही गौरव की मुख्य आईडी बूस्टर हो गई और उस पर 125 के बजाए 250 लाइक आने लगे, जिस से उसे रोजाना 1250 रुपए की इनकम होने लगी. गौरव ने पेमेंट मोड 15 दिन का रखा था. 23 जनवरी, 2017 को उसे पहला पेआउट 4800 रुपए का मिला. कपिल की आईडी लग जाने के बाद उसे अगला पेआउट इस से डबल आने की उम्मीद थी, पर अगले 15 दिनों बाद उस का पेआउट नहीं आया.

यह बात गौरव ने अपने उस दोस्त से कही, जिस ने उसे जौइन कराया था. दोस्त ने उसे बताया कि कंपनी में अपग्रेडेशन का काम चल रहा है, इसलिए सभी के पेमेंट रुके हुए हैं. चिंता की कोई बात नहीं है, जो भी पेमेंट इकट्ठा होगा, वह सारा मिल जाएगा. यही नहीं, उस ने गौरव से कहा कि वह अपनी टीम बढ़ाए, जिस से इनकम बढ़ सके.

गौरव रोजाना अपनी आईडी पर आने वाले लाइक करता रहा. चूंकि उस का पेआउट नहीं आ रहा था, इसलिए उस ने और किसी को सोशल ट्रेड में जौइन नहीं कराया. उस का भाई कपिल भी अपनी आईडी पर आने वाले 125 लाइक रोजाना करता रहा. गौरव और कपिल कंपनी के एफ-472, सेक्टर-63 नोएडा स्थित औफिस भी गए.

उन की तरह अन्य सैकड़ों लोग वहां अपनी इसी समस्या को ले कर आजा रहे थे. सभी को यही बताया जा रहा था कि आईटी एक्सपर्ट सिस्टम को अपग्रेड करने में लगे हुए हैं. सोशल ट्रेड कंपनी से लाखों लोग जुड़े थे. उन में से अधिकांश के मन में इसी बात का संशय था कि पता नहीं कंपनी उन का रुका हुआ पेआउट देगी या नहीं. बहरहाल बड़े लीडर्स और कंपनी की ओर से परेशानहाल लोगों को आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिल रहा था.

उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर (नोएडा) के सूरजपुर के रहने वाले दिनेश सिंह और पूर्वी दिल्ली के आजादनगर की रहने वाली पूजा गुप्ता ने भी दिसंबर, 2016 में अलगअलग 57,500 रुपए कंपनी के खाते में जमा करा कर आईडी ली थीं. ये भी रोजाना अपनी आईडी पर 125 लाइक करते थे. जौइनिंग के एक महीना बाद भी इन को इन के किए गए लाइक का पैसा नहीं मिला तो इन्हें भी चिंता होने लगी. न तो इन्हें अपने अपलाइन से और न ही कंपनी से कोई संतोषजनक जवाब मिल रहा था.

थकहार कर दिनेश सिंह ने 31 जनवरी, 2017 को गौतमबुद्धनगर के थाना सूरजपुर में कंपनी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस की जांच एसआई मदनलाल को सौंपी गई. पेआउट न मिलने से असंतुष्ट कई लोगों ने पुलिस और जिला प्रशासन से शिकायतें करनी शुरू कर दी थीं. सोशल ट्रेड कंपनी के खिलाफ  ज्यादा शिकायतें मिलने पर पुलिस प्रशासन सतर्क हो गया.

नोएडा पुलिस ने जांच की तो पता चला कि सोशल ट्रेड कंपनी के नोएडा सेक्टर-63 स्थित कंपनी के औफिस में देश के अलगअलग शहरों से सैकड़ों लोग अपने पेमेंट न मिलने की शिकायत करने आ रहे हैं. तमाम लोगों ने कंपनी में मोटी रकम जमा करा रखी है.

पुलिस को मामला बेहद गंभीर लगा, इसलिए नोएडा पुलिस प्रशासन ने पुलिस महानिदेशक को इस मामले से अवगत करा दिया. पुलिस महानिदेशक ने स्पैशल टास्क फोर्स के एसएसपी अमित पाठक को इस मामले में आवश्यक काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसएसपी अमित पाठक ने एसटीएफ के एडिशनल एसपी राजीव नारायण मिश्र के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में एसटीएफ लखनऊ के एडिशनल एसपी त्रिवेणी सिंह, एसटीएफ के सीओ आर.के. मिश्रा, एसआई सौरभ विक्रम, सर्वेश कुमार पाल आदि को शामिल किया गया.

टीम ने करीब 15 दिनों तक इस मामले की जांच कर के रिपोर्ट एसएसपी अमित पाठक को सौंप दी. कंपनी के जिस औफिस पर पहले सोशल ट्रेड का बोर्ड लगा था, उस पर हाल ही में 3 डब्ल्यू का बोर्ड लग गया. एसटीएफ को जांच में यह जानकारी मिल गई थी कि सोशल ट्रेड के जाल में कोई 100-200 नहीं, बल्कि कई लाख लोग फंसे हुए हैं.

इस के बाद उच्चाधिकारियों के निर्देश पर स्पैशल स्टाफ टीम ने सोशल ट्रेड के एफ-472, सेक्टर-63 नोएडा औफिस पर छापा मार कर वहां से कंपनी के डायरेक्टर अनुभव मित्तल, सीओओ श्रीधर प्रसाद और टेक्निकल हैड महेश दयाल से पूछताछ कर के हिरासत में ले लिया. इसी के साथ पुलिस ने उन के औफिस से जरूरी दस्तावेज और अन्य सामान जांच के लिए जब्त कर लिए.

एसटीएफ टीम ने सूरजपुर स्थित अपने औफिस ला कर तीनों से पूछताछ की. इस पूछताछ में सोशल ट्रेड के शुरुआत से ले कर 37 अरब रुपए इकट्ठे करने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

अनुभव मित्तल उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के पिलखुआ कस्बे के रहने वाले सुनील मित्तल का बेटा था. उन की हापुड़ में मित्तल इलैक्ट्रौनिक्स के नाम से दुकान है. अनुभव मित्तल शुरू से ही पढ़ाई में तेज था. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद अनुभव का रुझान कोई नौकरी करने के बजाए अपना खुद का कोई बिजनैस करने का था. उस का रुझान आईटी क्षेत्र में ही कुछ नया करने का था, इसलिए वह नोएडा के ही एक संस्थान से कंप्यूटर साइंस से बीटेक करने लगा.

सन 2011 में उस का बीटेक पूरा होना था. वह समय के महत्त्व को अच्छी तरह समझता था, इसलिए नहीं चाहता था कि बीटेक पूरा होने के बाद वह खाली बैठे. बल्कि कोर्स पूरा होते ही वह अपना काम शुरू करना चाहता था. पढ़ाई के दौरान ही वह इसी बात की प्लानिंग करता रहता था कि बीटेक के बाद कौन सा काम करना ठीक रहेगा.

बीटेक पूरा होने के एक साल पहले ही उस ने अपने एक आइडिया को अंतिम रूप दे दिया. सन 2010 में इंस्टीट्यूट के हौस्टल में बैठ कर उस ने अब्लेज इंफो सौल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी बना ली और इस का रजिस्ट्रेशन 878/8, नई बिल्डिंग, एसपी मुखर्जी मार्ग, चांदनी चौक, नई दिल्ली के पते पर करा लिया. अनुभव ने अपने पिता सुनील मित्तल को इस का डायरेक्टर बनाया.

बीटेक फाइनल करने के बाद उस ने छोटे स्तर पर सौफ्टवेयर डेवलपमेंट का काम शुरू कर दिया. अपनी इस कंपनी से उस ने सन 2015 तक मात्र 3-4 लाख रुपए का बिजनैस किया. जिस गति से उस का यह बिजनैस चल रहा था, उस से वह संतुष्ट नहीं था. इसलिए इसी क्षेत्र में वह कुछ ऐसा करना चाहता था, जिस से उसे अच्छी कमाई हो.

उसी दौरान सन 2015 में उस ने सोशल ट्रेड डौट बिज नाम से एक औनलाइन पोर्टल बनाया और सदस्यों को जोड़ने के लिए 5750 रुपए से 57,500 रुपए का जौइनिंग एमाउंट फिक्स कर दिया. इस में 15 प्रतिशत टैक्स भी शामिल कर लिया. जौइन होने वाले सदस्यों को यह बताया गया कि औनलाइन पोर्टल पर कुछ पेज लाइक करने पड़ेंगे. एक पेज लाइक करने के 5 रुपए देने की बात कही गई.

शुरुआत में अनुभव ने अपने जानपहचान वालों की आईडी लगवाई. धीरेधीरे लोगों ने माउथ टू माउथ पब्लिसिटी करनी शुरू कर दी. जिन लोगों की जौइनिंग होती गई, उन्हें कंपनी से समय पर पैसा भी दिया जाता रहा, जिस से लोगों का विश्वास बढ़ने लगा और कंपनी में लोगों की जौइनिंग बढ़ने लगी.

कंपनी ने सन 2015 में 9 लाख रुपए का बिजनैस किया. लोगों को बिना मेहनत किए पैसा मिल रहा था. उन्हें काम केवल इतना था कि कंपनी का कोई भी पैकेज लेने के बाद अपनी आईडी पर निर्धारित लाइक करने थे. एक लाइक लगभग 30 सैकेंड में पूरी हो जाता था. इस तरह कुछ ही देर में यह काम पूरा कर के एक निर्धारित धनराशि सदस्य के बैंक एकाउंट में आ जाती थी. शुरूशुरू में लोगों ने इस डर से कंपनी में कम पैसे लगाए कि कंपनी भाग न जाए. पर जब जौइन किए हुए सदस्यों के पैसे समय से आने लगे तो अधिकांश लोगों ने अपनी आईडी बड़े पैकेज में अपग्रेड करा लीं.

सन 2016 में ही अनुभव ने श्रीधर प्रसाद को अपनी कंपनी का चीफ औपरेटिंग औफीसर (सीओओ) बनाया. श्रीधर प्रसाद भी एक टेक्निकल आदमी था. उस ने सन 1994 में कौमर्स से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली के एनआईए इंस्टीट्यूट से एमबीए किया था. इस के बाद उस ने 1996 में ऊषा माटेन टेलीकौम कंपनी में सेल्स डिपार्टमेंट में काम किया. मेहनत से काम करने पर सेल्स मैनेजर बन गया.

सन 2001 में उस की नौकरी विजय कंसलटेंसी हैदराबाद में बिजनैस डेवलपर के पद पर लग गई. इस दौरान वह कई बार यूके भी गया. सन 2005 में उस ने आईबीएम कंपनी जौइन कर ली. इस कंपनी में वह सौफ्टवेयर सौल्यूशन कंसल्टैंट के पद पर बंगलुरु में काम करने लगा. यहां पर उसे कंट्री हैड बनाया गया. आईबीएम कंपनी में सन 2009 तक काम करने के बाद उस ने नौकरी छोड़ कर सन 2010 में ओरेकल कंपनी जौइन कर ली.

कंपनी ने उसे बिजनैस डेवलपर के रूप में नाइजीरिया भेज दिया. बिजनैस डेवलपमेंट में उस का विशेष योगदान रहा. सन 2013 में श्रीधर प्रसाद बंगलुरु आ गया. लेकिन सफलता न मिलने पर वह सन 2014 में वापस नाइजीरिया ओरेकल कंपनी में चला गया.

सन 2016 में श्रीधर प्रसाद की पत्नी ने किसी के माध्यम से सोशल ट्रेड डौट बिज में अपनी एंट्री लगाई. पत्नी ने यह बात उसे बताई तो श्रीधर को यह बिजनैस मौडल बहुत अच्छा लगा. बिजनैस मौडल समझने के लिए वह कई बार अभिनव मित्तल से मिला.

बातचीत के दौरान अभिनव श्रीधर प्रसाद की काबिलियत को जान गया. उसे लगा कि यह आदमी उस के काम का है, इसलिए उस ने श्रीधर को अपनी कंपनी में नौकरी करने का औफर दिया. विदेश जाने के बजाय श्रीधर को अच्छे पैकेज की अपने देश में ही नौकरी मिल रही थी, इसलिए वह अनुभव मित्तल की कंपनी में नौकरी करने के लिए तैयार हो गया और सीओओ के रूप में नौकरी जौइन कर ली.

अनुभव मित्तल ने मथुरा के महेश दयाल को कंपनी में टेक्निकल हैड के रूप में नौकरी पर रख लिया. अनुभव के पास टेक्निकल विशेषज्ञों की एक टीम तैयार हो चुकी थी. उन के जरिए वह कंपनी में नएनए प्रयोग करने लगा. लालच ही इंसान को ले डूबता है. जिन लोगों की सोशल टे्रड डौट बिज से अच्छी कमाई हो रही थी, उन्होंने वह कमाई अपने सगेसंबंधियों व अन्य लोगों को दिखानी शुरू की तो उन की देखादेखी उन लोगों ने भी कंपनी में मोटे पैसे जमा करा कर काम शुरू कर दिया.

बड़ेबड़े होटलों में कंपनी के सेमिनार आयोजित होने लगे. फिर तो लोग थोक के भाव से जुड़ने लगे. इस तरह से भेड़चाल शुरू हो गई और सन 2016 तक कंपनी से 4-5 लाख लोग जुड़ गए. जब इतने लोग जुड़े तो जाहिर है कंपनी का टर्नओवर बढ़ना ही था. सन 2016 में कंपनी का कारोबार उछाल मार कर 26 करोड़ हो गया.

कारोबार बढ़ा तो कंपनी ने आगामी योजनाएं बनानी शुरू कीं. पहला कदम ईकौमर्स में रखना था. इस के जरिए वह जरूरत की हर चीज ग्राहकों को उपलब्ध कराना चाहता था. सोशल ट्रेड डौट बिज के बाद उस ने फ्री हब डौटकौम नाम की कंपनी  बनाई. ईकौमर्स के लिए उस ने इनमार्ट डौटकौम नाम की कंपनी बनाई. इस के जरिए खरीदारी करने पर भी उस ने अतिरिक्त इनकम का प्रावधान रखा.

अभिनव जानता था कि भारत में करोड़ों लोग फेसबुक यूज करते हैं, जिस से मोटी कमाई फेसबुक के ओनर को होती है. फेसबुक की ही तरह भारतीय सोशल साइट बनाने का विचार उस के दिमाग में आया. इस बारे में उस ने अपनी आईटी टीम से विचारविमर्श किया. अपनी टीम के साथ मिल कर अनुभव ने इस तरह की सोशल साइट बनाने पर काम शुरू कर दिया, जिस में फेसबुक से ज्यादा फीचर हों. अपनी इस सोशल साइट का नाम उस ने डिजिटल इंडिया डौट नेट रखा. इस में इस तरह की तकनीक डालने की उन की कोशिश थी कि किसी की आवाज या फोटो डालने पर उस व्यक्ति के एकाउंट पर पहुंचा जा सके.

उधर सोशल ट्रेड में भारत से ही नहीं, विदेशों से भी एंट्री लगनी शुरू हो चुकी थीं. इनवेस्टरों ने भी मोटा पैसा यहां इनवेस्ट करना शुरू कर दिया. अब कंपनी को करोड़ों रुपए की कमाई होने लगी. किसी वजह से कंपनी ने लोगों को पेआउट देना बंद कर दिया. लोगों ने अपने सीनियर लीडर्स और कंपनी औफिस जा कर संपर्क किया तो उन्हें यही बताया गया कि कंपनी के सौफ्टवेयर में अपग्रेडिंग का काम चल रहा है. जैसे ही यह काम पूरा हो जाएगा, सारे पेआउट रिलीज कर दिए जाएंगे.

अब तक कंपनी में करीब साढ़े 6 लाख लोगों ने 9 लाख से अधिक आईडी लगा रखी थीं. कंपनी के पास इन्होंने लगभग 3 हजार 726 करोड़ रुपए जमा करा रखे थे. जब उन्हें कंपनी की तरफ से पैसे आने बंद हो गए तो लोगों में बेचैनी बढ़नी स्वाभाविक थी. कुछ लोगों ने मोटी रकम लगाई थी, उन की तो नींद हराम हो गई.

सीनियर लीडर उन्हें यही भरोसा दिलाते रहे कि उन का पैसा कहीं नहीं जाएगा. जो लोग कंपनी से लंबे समय से जुड़े थे, उन्हें विश्वास था कि कंपनी कहीं जाने वाली नहीं है. अपग्रेडेशन का काम पूरा होने के बाद सभी के पैसे खाते में भेज देगी. लेकिन जिन लोगों को जौइनिंग के बाद फूटी कौड़ी भी नहीं मिली थी, उन की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी. आखिर वे भरोसे की गोली कब तक लेते रहते.

लोगों ने नोएडा के जिला और पुलिस प्रशासन से सोशल ट्रेड की शिकायतें करनी शुरू कर दीं. लोगों ने सोशल ट्रेड के औफिस पर जब 3 डब्ल्यू का बोर्ड लगा देखा तो उन्हें शक हो गया कि कंपनी भाग गई है. कंपनी के अंदर ही अंदर बदलाव की क्या प्रक्रिया चल रही है, इस से लोग अनजान थे.

15 दिनों की गोपनीय जांच करने के बाद पुलिस प्रशासन को भी लगा कि अनुभव मित्तल ने सोशल ट्रेड कंपनी के नाम पर लोगों से अरबों रुपए की ठगी की है. तब पुलिस ने 1 फरवरी, 2017 को अनुभव मित्तल और कंपनी के 2 पदाधिकारियों श्रीधर प्रसाद और महेश दयाल को हिरासत में ले लिया.

अनुभव मित्तल से पूछताछ के बाद पता चला कि उस की कंपनी के गाजियाबाद के राजनगर में कोटक महिंद्रा बैंक में एक एकाउंट, यस बैंक में 2 एकाउंट, एक्सिस बैंक में 2 एकाउंट, केनरा बैंक में 3 एकाउंट हैं. जांच में पुलिस को केनरा बैंक में 480 करोड़ रुपए और यस बैंक में 44 करोड़ रुपए मिले. पुलिस ने इन खातों को फ्रीज करा दिया.

जांच में पुलिस को जानकारी मिली है कि कंपनी ने दिसंबर, 2016 के अंत में सोशल ट्रेड डौट बिज से माइग्रेट कर के फ्री हब डौटकौम लांच कर दिया और उस के 10 दिन के अंदर ही फ्री हब डौटकौम से इनमार्ट डौटकौम पर माइग्रेट किया. इस के बाद 27 जनवरी, 2017 को इनमार्ट से फ्रिंजअप डौटकौम पर माइग्रेट कर लिया.

कंपनी में इतनी जल्दीजल्दी बदलाव करने के बाद अनुभव मित्तल ने गिरफ्तारी के 7 दिनों पहले ही दिल्ली की एक नई कंपनी 3 डब्ल्यू खरीद कर उस का बोर्ड भी अपने औफिस के बाहर लगा दिया. इस के अलावा अनुभव मित्तल ने सोशल ट्रेड डौट बिज के डोमेन पर प्राइवेसी प्रोटेक्शन प्लान भी ले लिया था, ताकि कोई भी व्यक्ति या जांच एजेंसी डोमेन की डिटेल के बारे में पता न लगा सके.

पुलिस को पता चला कि वह फेसबुक पेज लाइक करने के नाम पर लोगों को बेवकूफ बना रहा था. कंपनी द्वारा सदस्यों को धोखे में रख कर उन से पैसे लिए जाते थे और जब अपने पेज को लौगइन करते तो विज्ञापन पेजों के या तो गलत यूआरएल होते थे या उन्हीं सदस्यों के यूआरएल को आपस में ही लाइक कराया जा रहा था. कंपनी द्वारा कोई वास्तविक विज्ञापन या कोई लौजिकल या रियल सर्विस नहीं उपलब्ध कराई जा रही थी.

कंपनी के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं था, वह सदस्यों के पैसों को ही इधर से उधर घुमा रही थी, जोकि द प्राइज चिट्स ऐंड मनी सर्कुलेशन स्कीम्स (बैनिंग) एक्ट 1978 की धारा 2(सी)/3 के तहत अवैध है. इस एक्ट की धारा 4 में यह अपराध है.

पुलिस ने अनुभव मित्तल, सीओओ श्रीधर प्रसाद और टेक्निकल हैड महेश दयाल को विस्तार से पूछताछ करने के बाद 2 फरवरी, 2017 को गौतमबुद्धनगर के सीजेएम-3 की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

पुलिस ने लखनऊ की फोरैंसिक साइंस लेबोरैटरी, रिजर्व बैंक औफ इंडिया, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, सेबी, कारपोरेट अफेयर मंत्रालय की फ्रौड इनवेस्टीगेशन टीम को भी जानकारी दे दी है. सभी विभागों के अधिकारी अपनेअपने स्तर से मामले की जांच में लग गए हैं. जांच में पता चला है कि अनुभव मित्तल ने लाइक के जरिए 3700 करोड़ रुपयों की ठगी की है.

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद ने मामले की गहन जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है. आईजी (क्राइम) भगवानस्वरूप के नेतृत्व में बनी इस जांच टीम में मेरठ रेंज के डीआईजी के.एस. इमैनुअल, एडिशनल एसपी (क्राइम) गौतमबुद्धनगर, एसटीएफ के एडिशनल एसपी राजीव नारायण मिश्रा, सीओ राजकुमार मिश्रा, गौतमबुद्धनगर के 2 इंसपेक्टर, एसआई सर्वेश कुमार पाल, सौरभ आदि को शामिल किया गया है.

टीम ने इस ठगी में फंसे लोगों को अपनी शिकायत भेजने के लिए एक ईमेल आईडी सार्वजनिक कर दी है. मीडिया में यह ईमेल जारी हो जाने के बाद देश से ही नहीं, विदेशों से भी भारी संख्या में शिकायतें आनी शुरू हो गई हैं. कथा लिखे जाने तक एसटीएफ के पास करीब साढ़े 6 हजार शिकायतें ईमेल से आ चुकी थीं. इन में से 100 से अधिक नाइजीरिया से मिली है. केन्या और मस्कट से भी पीडि़तों ने ईमेल से शिकायतें भेजी हैं.

पुलिस अब यह जानने की कोशिश कर रही है कि अभिनव ने इतनी मोटी रकम आखिर कहां इनवैस्ट की है. बहरहाल जिन लोगों ने अनुभव मित्तल की कंपनी में पैसा लगाया है, अब उन्हें पछतावा हो रहा होगा.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

शहर में डाले डेरे, बेखौफ हुए चेन लुटेरे

जयपुर में पुलिस की ढिलाई से चेन खींचने वाले गिरोहों की भरमार हो गई है. तकरीबन 15 साल पहले शहर में चेन खींचने की वारदातें करने वाले इंदर सिंधी और विनोद लांबा के 2 गिरोह थे, लेकिन ऐसे लोगों के खिलाफ पुलिस की कड़ी कार्यवाही की कमी के चलते सरेराह चेन खींचने वालों की तादाद लगातार बढ़ती ही गई. इस के चलते शहर में आज 2 दर्जन से ज्यादा चेन खींचने वाले गिरोह बन गए हैं. यही वजह है कि महज पिछले 5 महीनों में ही चेन खींचने वाले 60 से ज्यादा वारदातें कर शहर से तकरीबन 60 लाख रुपए की कीमत की चेन लूट ले गए हैं. चेन खींचने की लगातार बढ़ती वारदातों को देखते हुए पिछले दिनों पुलिस कमिश्नर खुद गश्त पर निकले, लेकिन गश्त ढीली पड़ने के साथ ही चेन खींचने वाले गिरोह फिर से हरकत में आ जाते हैं.

पुलिस सूत्रों ने बताया कि तकरीबन 15 साल पहले शहर में केवल इंदर सिंधी और विनोद लांबा के गिरोह ही इस तरह की वारदातों को अंजाम देते थे. हर वारदात के बाद पुलिस इन दोनों शातिर गिरोह की लोकेशन को ही सब से पहले ट्रेस किया करती थी.

इस के बाद खानाबदोश परिवारों के कुछ नौजवान शहर में चेन तोड़ने लगे, लेकिन पुलिस की ढिलाई और अनदेखी के चलते आज शहर की गलीगली में चेन खींचने वाले गिरोह बन गए हैं और ऐसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं.

  1. लगाते चोरी की धारा

सूत्रों ने बताया कि ऐसे गिरोह खड़े होने के पीछे पुलिस का काम करने का तरीका बड़ी वजह है. पुलिस ने अपना रिकौर्ड अच्छा रखने के चक्कर में चेन खींचने की वारदातों को लूट की धाराओं में दर्ज करने के बजाय चोरी की धाराओं में ही दर्ज करने का सिस्टम बना लिया है.

शिकार लोग फौजदारी धाराओं के इस खेल को इतना समझते नहीं हैं. इस वजह से चेन तोड़ने का अपराध ज्यादा आसान लगने लग गया है. दूसरे अपराधों से जुड़े कई अपराधी भी इस के चलते चेन खींचने वाले अपराधी बन गए हैं.

इस के अलावा आदतन चेन खींचने को चोरी की धारा के चलते जमानत मिलने में आसानी हो गई है. जमानत पर जेल से बाहर आने के साथ ही ये अपराधी फिर से अपने धंधे में जुट जाते हैं.

2. नाकाम रहती है नाकाबंदी

चैन खींचने वाले शातिर हर वारदात से पहले इलाके की रेकी कर के ही इस को अंजाम देते हैं. फिर वे अपने शिकार को टारगेट करते हैं. मसलन, कोई औरत रोज मंदिर जाती है, तो उस के आनेजाने का समय नोट किया जाता है. साथ ही, उस के साथ जाने वाले लोग कहां तक उस के साथ जाते हैं, इसे भी ध्यान में रखा जाता है.

चेन तोड़ने वाले गिरोहों द्वारा वारदात करने से पहले एक रूपरेखा तैयार की जाती है कि चेन किस जगह से तोड़नी है और वहां से निकलने के लिए किस रास्ते से वे आसानी से भागने में कामयाब हो सकते हैं.

यही वजह है कि वारदात के बाद पुलिस नाकाबंदी के दौरान आज तक एक भी चेन खींचने वाला नहीं पकड़ा गया है. इस के पीछे पुलिस की लापरवाही को ही खास वजह माना गया है. पुलिस चेन खींचने वाले की लोकेशन पर निगाह रखने में नाकाम रहती है. इस से चेन चोरों का हौसला बढ़ जाता है.

3. महीनों का चैन

पकड़ में आए कुछ चेन खींचने वालों ने बताया कि जिस चेन को वे तोड़ते हैं, वह कम से कम डेढ़ से 3 तोले के बीच होती है. 3 तोले चेन की कीमत 80 से 90 हजार रुपए बैठती है. ऐसे में वे चेन को बेचने सुनार के पास जाते हैं, तो उन्हें अच्छाखासा पैसा मिल जाता है. महज कुछ पल की मेहनत के बाद उन्हें दोढ़ाई महीने तक काम की चिंता नहीं रहती. पैसा पूरा होने के बाद दूसरे टारगेट पर निशाना साधने निकल जाते हैं.

वकील बीएस चौहान का कहना है कि पुलिस को चेन खींचने के मामलों को लूट की धाराओं में ही दर्ज करना चाहिए. आईपीसी की धारा 309 में 10 साल की सजा का प्रावधान है, वहीं चोरी की आईपीसी की धारा 379 में महज 3 साल की सजा का प्रावधान है.

4. बरामदगी नहीं हो पाती

कई मामलों में पुलिस चेन खींचने वालों को पकड़ लेती है, मगर उन से बरामदगी नहीं कर पाती है. पुलिस का कहना है कि वारदात के बाद चेन खींचने वाले सुनार के पास जा कर उसे गलवा देते हैं.

हालांकि कई सुनारों को भी गिरफ्तार किया है, लेकिन यह भी नाकाफी है. बरामदगी नहीं होने और सुबूत नहीं मिल पाने से चोरों को सजा में राहत मिल जाती है.

5. मुहिम से पकड़ में आएंगे

चेन खींचने की वारदातों ने आम आदमी का चैन छीन लिया है. टोंक फाटक कालोनी की रहने वाली साक्षी शर्मा का कहना है कि चेन खींचने वालों को पकड़ने की मुहिम चलानी चाहिए. इस में एक महिला कांस्टेबल को चेन पहना कर सुबह की सैर पर भेजना चाहिए, ताकि बदमाशों को रंगे हाथों दबोचा जा सके.

महेश नगर इलाके में रहने वाली सोनाली शर्मा का कहना है कि पुलिस सुबह के समय नियमित रूप से गश्त करे, ताकि सुबह की सैर और मंदिर जाते समय चेन तोड़ने की वारदातों पर रोक लगाई जा सके.

6. ऐसे हो सकता है बचाव

चेन खींचने की वारदातों के लिए पुलिस को जन सहयोग से जगहजगह पर सीसीटीवी कैमरे लगाने चाहिए, ताकि किसी तरह का भी अपराध होता है, तो वारदात करने वाले बदमाश उस में तसवीर के रूप में कैद हो जाएं.

जितने भी कैमरे लगाए जाएं, वे नाइटविजन वाले होने चाहिए, ताकि रात में भी अपराधियों का चेहरा पूरी तरह से साफ नजर आए.

साथ ही, कैमरों की मौनीटरिंग रोजाना हो और इस के लिए पुलिस वाले रोजाना अपडेट लेते रहें. संदिग्ध लगने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जाए.

पुलिस के कुछ जवानों को भीड़ भरे बाजार और यातायात के बीच से मोटरसाइकिल चलाने की ट्रेनिंग देनी चाहिए, ताकि वे बदमाशों को पकड़ने का हुनर सीख सकें. इस के लिए किसी गैरसरकारी संस्था की मदद भी ली जा सकती है.

7. औरतें ये सावधानियां बरतें

* साड़ी या सूट इस तरह पहनें कि गले से चेन दिखाई नहीं दे.

* सुबह की सैर व मंदिर जाते समय निगाह रखें कि कोई उन का पीछा तो नहीं कर रहा है.

* वारदात के बाद बदमाशों का गाड़ी नंबर जरूर देखें और उसे याद रखें.

* असली गहने पहनने से अच्छा है कि नकली गहने पहन कर अपना शौक पूरा कर लें.

* किसी अनजान को घर के आसपास घूमता देख तुरंत पुलिस को सूचना दें.

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