गुनाह जो छिप न सका

16 फरवरी, 2017 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के गांव सिरकोई भूड़ निवासी अरविंद  गांव की ही रहने वाली शीतल के घर पहुंचा. प्रौपर्टी डीलर अरविंद शीतल को मुंहबोली बहन मानता था. शीतल एक बुटीक में काम करती थी.

अरविंद ने शीतल के घर जा कर उस की मां अनीता देवी से कहा कि गजरौला में उस की मौसेरी बहन की शादी है, इसलिए वह शीतल को उस के साथ भेज दें. अनीता अरविंद को घर के सदस्य की तरह मानती थी और उस पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने शीतल को उस के साथ गजरौला भेज दिया.

अगले दिन यानी 17 फरवरी, 2017 को अरविंद गजरौला से लौट कर घर आ गया, पर उस के साथ शीतल नहीं आई. अनीता ने अरविंद से शीतल के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘आंटी, शीतल मेरे साथ गई जरूर थी, पर रास्ते में मुझ से 1500 रुपए ले कर लौट आई थी.’’

इस के बाद अरविंद ने शीतल के घर वालों को विश्वास में ले कर कहा, ‘‘देखो, मुझे यह बात कहनी तो नहीं चाहिए, जो आप को बुरी लगे. पर मैं बताना चाहता हूं कि आजकल शीतल पर महेंद्र कुछ ज्यादा ही मेहरबान है. उन दोनों के बीच कुछ चल रहा है. मुझे लगता है कि शीतल महेंद्र के साथ ही गई है.’’

शीतल की मां अनीता तुरंत महेंद्र के घर पहुंच गई. उस ने पूछा कि महेंद्र कहां है तो उस के घर वालों ने बताया कि उस का कल से ही कुछ पता नहीं है. जब भी उसे फोन किया जाता है, उस के फोन की घंटी तो बजती है, लेकिन वह फोन उठाता नहीं है. यही बात अनीता ने भी बताई कि शीतल के फोन की घंटी तो बज रही है, पर वह फोन उठा नहीं रही है.

महेंद्र और शीतल के घर वालों ने यही समझा कि दोनों को अभी दुनियादारी की समझ नहीं है, जल्दी ही वापस आ जाएंगे. लेकिन जब 2 दिन बाद भी दोनों घर नहीं आए तो शीतल और महेंद्र के घर वालों ने मझोला थाने में उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थाना मझोला पुलिस ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया.

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सोचा कि प्रेमप्रसंग का मामला है, इसलिए दोनों के घर वालों से कह दिया कि वे अपनीअपनी रिश्तेदारियों में उन्हें खोजें. जब मिल जाएं तो थाने आ कर खबर कर दें.

जब कहीं से भी शीतल और महेंद्र के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो दोनों के घर वालों ने मुरादाबाद के एसएसपी मनोज तिवारी, जिलाधिकारी सुहैर बिन सगीर, डीआईजी ओमकार सिंह से गुहार लगाई. इस पर भी उन की शिकायत पर कोई कारवाई नहीं हुई.

मजबूरन शीतल के घर वालों ने महिला थाने और एएसपी औफिस के बाहर जाम लगा दिया. महिला थाना और एएसपी औफिस आसपास ही स्थित हैं. एएसपी यशवीर सिंह ने शीतल के घर वालों को समझाबुझा कर भरोसा दिया कि पुलिस जल्द ही शीतल का पता लगाएगी. इस आश्वासन के बाद जाम खुल गया.

28 फरवरी, 2017 को संभल जिले के थाना असमोली के गांव घूंघरपुर का चेतन सिंह सुबह अपने आम के बाग में गया तो उस ने देखा कि कुछ कुत्ते किसी लाश को खा रहे हैं.

चेतन सिंह ने तुरंत इस की सूचना थाना असमोली पुलिस को फोन द्वारा दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी ब्रजेश यादव फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वह शव किसी महिला का था. घुटने के नीचे का हिस्सा छोड़ कर पूरी लाश कुत्ते खा गए थे. कपड़ों से पुलिस ने अनुमान लगाया कि लाश महिला की है. पास ही एक गड्ढा था, जिस से अंदाजा लगाया कि लाश इसी गड्डे में दफनाई गई थी.

एसआई मेघराज सिंह ने मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने उस का डीएनए कराने के लिए सैंपल सुरक्षित कर लिया.

अगले दिन किसी युवती की सड़ीगली लाश मिलने की खबर अखबार में छपी. अनीता के कई रिश्तेदार संभल में रहते थे. उन्हें पता था कि अनीता की बेटी शीतल कई दिनों से लापता है. अखबार में अज्ञात युवती की लाश मिलने की खबर पढ़ कर एक रिश्तेदार ने शीतल के घर वालों को फोन कर दिया.

यह जानकारी मिलने के बाद शीतल के पिता जसपाल सिंह पत्नी अनीता को ले कर थाना असमोली पहुंच गए. पुलिस ने जब बरामद कपड़े आदि उन्हें दिखाए तो दोनों ही फूटफूट कर रोने लगे. वे कपड़े उन की बेटी शीतल के थे. कपड़ों की शिनाख्त से स्पष्ट हो गया कि चेतन सिंह के बाग में जो लाश मिली थी, वह जसपाल की बेटी शीतल की थी.

19 मार्च, 2017 को जिला अमरोहा के थाना सैद नगली के गांव ढक्का निवासी शराफत हुसैन के आम के बाग में भी जमीन में गड़ी एक लाश को कुत्ते नोचनोच कर खा रहे थे. शराफत हुसैन ने थाना सैद नगली पुलिस को यह बात बताई तो थोड़ी देर में पुलिस मौके पर पहुंच गई.

पुलिस ने गड्ढा खोद कर जब लाश बाहर निकाली तो वह किसी पुरुष की थी, पर उस का सिर गायब था. घटनास्थल की तलाशी में वहां से थोड़ी दूरी पर एक मानव सिर मिल गया.

जल्दी ही इस लाश के मिलने की खबर पूरे जिले में फैल गई. थाना मझोला में शीतल और महेंद्र की गुमशुदगी दर्ज थी. शीतल की लाश संभल के थाना असमोली में मिल चुकी थी, जबकि महेंद्र के बारे में अभी तक कुछ नहीं पता चला था.

इसलिए मुरादाबाद के थाना मझोला की पुलिस 20 मार्च, 2017 को महेंद्र के 3 भाइयों कमल, सतपाल और अशोक को साथ ले कर थाना सैद नगली पहुंची. तीनों भाइयों ने उस शव की शिनाख्त अपने भाई महेंद्र के शव के रूप में कर दी. पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव महेंद्र के भाइयों को सौंप दिया.

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20मार्च, 2017 को महेंद्र का शव मुरादाबाद आया तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. सैकड़ों लोग शव को ले कर सम्राटनगर गेट के पास साईं अस्पताल के सामने दिल्ली रोड पर पहुंच गए. राष्ट्रीय राजमार्ग पर महेंद्र की लाश रख कर जाम लगा दिया. गांगन तिराहे से ले कर स्टेशन रोड, हरिद्वार रोड पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया. जाम की सूचना मिलते ही थाना मझोला पुलिस के साथ एएसपी डा. यशवीर सिंह भी पहुंच गए.

भीड़ आक्रोशित थी. वह हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग कर रही थी. माहौल को देखते हुए मुरादाबाद के अन्य थानों की पुलिस बुला ली गई. पुलिस के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी पहुंच गए. उन्होंने भीड़ को आश्वासन दिया कि अभियुक्तों को 5 दिनों के अंदर गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इस आश्वासन के बाद शाम 4 बजे से लगा जाम रात 8 बजे खुला.

जाम स्थल पर ही महेंद्र की अर्थी तैयार की गई और उसे लोको शेड शमशान घाट ले जा कर अंतिम संस्कार कर दिया गया. शीतल की मां अनीता ने बताया था कि 16 फरवरी को अरविंद शीतल को बुला कर ले गया था. उस के बाद वह लौट कर नहीं आई थी और अब तो अरविंद भी अपने घर से गायब था. महेंद्र के घर वालों ने भी प्रौपर्टी डीलर अरविंद पर शक जाहिर किया था.

पुलिस ने अरविंद के घर दबिश दी, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पुलिस ने उस के घर वालों पर दबाव बनाया. इस का नतीजा यह निकला कि अरविंद ने 23 मार्च, 2017 को मुरादाबाद की सीजेएम कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से पुलिस ने उसे 2 दिनों के रिमांड पर ले कर पूछताछ की.

पूछताछ में अरविंद ने स्वीकार कर लिया कि शीतल और महेंद्र की हत्या उसी ने कराई थी. इस के बाद उस ने दोनों हत्याओं की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

अरविंद की बहन दुर्गेश का गांव में ही बुटीक था. शीतल उसी के बुटीक पर काम करती थी. चूंकि वह उस की बहन की सहेली थी, इसलिए अरविंद उसे मुंहबोली बहन मानता था. दुर्गेश का शीतल के यहां आनाजाना था. उसी बीच सिरकोई भूड़ निवासी महेंद्र के अवैध संबंध दुर्गेश से हो गए. महेंद्र प्रौपर्टी डीलर का काम करता था.

घर वालों ने दुर्गेश को बहुत समझाया कि वह महेंद्र से संबंध न रखे, क्योंकि वह उन की बिरादरी का नहीं है. घर वालों के समझाने से दुर्गेश मान गई. इस के बाद घर वालों ने दुर्गेश की आननफानन में शादी कर दी. कुछ दिनों ससुराल में रह कर दुर्गेश मायके आ कर रहने लगी.

जब दुर्गेश के पति को पता चला कि उस की पत्नी के महेंद्र से संबंध थे तो उस ने दुर्गेश को तलाक दे दिया. इसी वजह से अरविंद महेंद्र से रंजिश रखने लगा.

पति से तलाक होने के बाद दुर्गेश का महेंद्र से मिलनाजुलना फिर से शुरू हो गया. घर वालों के समझाने के बाद भी दुर्गेश ने उस से मिलना बंद नहीं किया. इस की वजह से उन की बदनामी हो रही थी. एक दिन अरविंद ने गुस्से में दुर्गेश को गला घोंट कर मार डाला और लाश को सिरकोई भूड़ के पास रेलवे लाइन पर डाल आया.

ट्रेनों के गुजरने से दुर्गेश की लाश कट गई. रेलवे पुलिस और थाना मझोला पुलिस ने इसे आत्महत्या मान कर जांच आगे नहीं बढ़ाई. बहन को ठिकाने लगाने के बाद अरविंद ने ठान लिया कि वह महेंद्र को भी नहीं छोड़ेगा. वह महेंद्र को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगा.

कुछ दिनों पहले की बात है. शीतल का मोहल्ले के ही रवि से प्रेमसंबंध था. उस के घर वालों ने एक दिन उसे रवि के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. घर वालों ने रवि को थाना मझोला पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस ने जब शीतल से पूछताछ की तो घर वालों के दबाव में उस ने रवि के खिलाफ बयान दे दिया. पुलिस ने रवि को जेल भेज दिया. रवि अभी भी मुरादाबाद जेल में बंद है.

बाद में शीतल को अफसोस हुआ कि उसे घर वालों के दबाव में रवि के खिलाफ बयान नहीं देना चाहिए था, क्योंकि वह सचमुच उसे चाहती थी. वह अकसर अपने प्रेमी रवि से मिलने जेल जाती रहती थी. उस ने रवि को भरोसा दिया था कि वह उसे जल्दी ही छुड़ा लेगी.

शीतल किसी भी तरह रवि की जमानत कराना चाहती थी, पर इस के लिए उसे रुपयों की जरूरत थी. चूंकि अरविंद शीतल को बहन मानता था और शीतल भी उस पर भरोसा करती थी, इसलिए एक दिन उस ने अरविंद को कहा कि उस के बयान से रवि जेल चला गया है. पर अब वह उसे हर हालत में जेल से बाहर निकलवाना चाहती हूं.

अरविंद यह सुन कर बहुत खुश हुआ, क्योंकि जिस बात की वह योजना बना रहा था, वह शीतल की मदद से आसानी से पूरा हो सकती थी. उस ने कहा, ‘‘शीतल, तुम मेरी बहन हो. क्या मैं तुम्हारे इतने भी काम नहीं आ सकता. पर शीतल मेरा एक छोटा सा काम है, तुम उसे करा दो.’’

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‘‘बोलो, क्या करना है?’’ शीतल ने कहा.

‘‘देखो, आजकल महेंद्र से तुम्हारी कुछ ज्यादा ही बन रही है. तुम्हें तो पता है कि दुर्गेश की आत्महत्या के बाद से मैं महेंद्र से बात नहीं करता. हम दोनों प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते हैं. कांशीरामनगर के पास एक बड़े प्लौट का सौदा मैं ने कर लिया है. महेंद्र उस में टांग अड़ा रहा है. वह पार्टी को मेरे बारे में उलटासीधा बता कर गुमराह कर रहा है. तुम्हें कुछ नहीं करना. बस तुम पार्टी के पास महेंद्र को ले आना. वहां पर आमनेसामने पार्टी से बात हो जाएगी. इस काम के लिए तुम्हें 50 हजार रुपए और एक प्लौट मिल जाएगा.’’ अरविंद ने कहा.

‘‘इतना सा काम है, यह तो मैं चुटकी बजा कर करा दूंगी.’’ शीतल ने कहा.

16 फरवरी, 2017 की शाम घूमने के बहाने वह महेंद्र को ले गई. दिल्ली रोड स्थित गांगन नदी के तिराहे से सैद नगली के लिए औटो बुक कर के वहां पहुंच गई. वहां अरविंद, सुपारीकिलर गुलाम, अरविंद का भाई राजू और मामा कल्लू मिल गए. सब ने मिल कर पहले शीतल की हत्या की, क्योंकि वह पूरे मामले की राजदार थी. इस के बाद उन्होंने महेंद्र को भी मौत के घाट उतार दिया.

इन लोगों ने महेंद्र की लाश सैद नगली के गांव ढक्का की एक बाग में गड्ढा खोद दबा दिया तो वहां से 2 किलोमीटर दूर संभल के थाना असमोली के गांव घूंघरपुर के एक बाग में शीतल को दफना दिया.

पुलिस ने अरविंद की निशानदेही पर मोबाइल फोन और हत्या में प्रयुक्त फरसा सोनकपुर के जंगल से बरामद कर लिया था. विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने अरविंद को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक अन्य अभियुक्त पुलिस के हाथ नहीं लगे थे. पुलिस सरगरमी से उन की तलाश कर रही थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Story : सोने के व्यापारी को ले डूबी रंगीनमिजाजी

Hindi Story. मई, 2016 को स्पेन में मलागा की अदालत से आने वाले एक चर्चित मामले के फैसले का लोगों को बड़ी बेसब्री से इंतजार था. आरोपी और पीडि़त के परिजनों से ले कर मीडिया के लोगों तक को फैसला सुनने की उत्सुकता थी. यह हाईप्रोफाइल मामला ब्रिटेन के 48 वर्षीय सोने के व्यापारी एंडी बुश की हत्या का था. उन की हत्या 5 अप्रैल, 2014 को स्पेन के शहर मारबेला के कोस्टा डेल सोल नामक मशहूर बीच पर स्थित होटल हौलिडे विला में उन की पूर्व प्रेमिका द्वारा गोली मार कर की गई थी. हत्या का आरोप 26 वर्षीया स्विमवियर मौडल मायका मैरीका कुकुकोवा पर था. अपराध साबित हो जाने के बाद उसे सजा के लिए दोषी करार दिया जा चुका था.

अदालत में बुश की 22 वर्षीया बेटी एल्ली अपनी 44 वर्षीया बुआ रशेल के साथ मौजूद थी. जबकि ज्यूरी के सामने सिर झुकाए चिंतातुर बैठी आरोपी कुकुकोवा अपने चेहरे को हथेली से बारबार ढंकने का प्रयास कर रही थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किसी से खासकर एल्ली और रशेल से नजरें मिलाने से बचना चाह रही हो. हालांकि सुनवाई के दौरान उन तीनों का अदालत में पहले भी कई बार आमनासामना हो चुका था, लेकिन तब वे अपनीअपनी बातों को साबित करने की कोशिश करते हुए इतनी अधिक असहज महसूस नहीं करती थीं, जितना कि उन्हें फैसले की घड़ी के वक्त महसूस हो रहा था.

मायका मैरीका कुकुकोवा अपने बचाव के लिए हर संभव प्रयास कर चुकी थी. लेकिन सबूतों के अभाव में उस की दलीलों को खारिज कर दिया गया था. फिर भी क्यूडेड ला जस्टिका के निर्णायक मंडल द्वारा उसे एक और अंतिम मौका दिया गया था, ताकि वह बचाव संबंधी औपचारिक याचिका दायर कर सके.

कुकुकोवा ने भले ही बचाव के लिए कोई याचिका नहीं दायर की थी, लेकिन इतना जरूर कहा था कि बुश ने उस के ऊपर हमला किया था और उस ने अपनी आत्मरक्षा में उसे गोली मारी थी.

बुश को चोट पहुंचाने का उस का कोई मकसद कभी नहीं था, क्योंकि अपनी उम्र से दोगुनी उम्र का होने के बावजूद वह उस से बेइंतहा मोहब्बत करती थी. उस ने भावुकता के साथ कहा था कि वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी, लेकिन उन के प्रेम में किसी तीसरे के शामिल होने से वह काफी दुखी थी.

निर्णायक मंडल ने फैसला सुनाने के दरम्यान कहा कि घटना के 6 महीने पहले ही कुकुकोवा और बुश के बीच संबंध खराब हो चुके थे. वह ईर्ष्या, द्वेष की भावना से भरी हुई थी.

सरकारी वकीलों को उम्मीद थी कि इस मामले में 26 वर्षीया मौडल कुकुकोवा को 25 साल की जेल की सजा तो सुनाई ही जाएगी, लेकिन जजों के निर्णायक मंडल ने उसे 15 साल की सजा सुनाने के साथ बुश की 21 वर्षीया बेटी को 1,22,000 पाउंड और 44 वर्षीया बहन रशेल को 30,500 पाउंड की राशि जुरमाने के तौर पर देने का आदेश दिया.

इसी के साथ न्यायाधीश ने यह भी कहा कि आरोपी का पूर्व का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं है. उस ने जो भी अपराध किया है, वह भावुकता में किया है. इस लिहाज से उसे अपना पक्ष रखने का एक और मौका दिया जाता है लेकिन बचाव के अंतिम मौके का भी कुकुकोवा को कोई लाभ नहीं मिल पाया.

अदालत ने फैसले से संबंधित 17 पृष्ठों का दस्तावेज बुश के परिजनों को भी दे दिया. इस फैसले पर भले ही एल्ली और उस की बुआ रशेल ने न्याय मिलने का संतोष व्यक्त किया, लेकिन बुश से तलाक ले चुकी एल्ली की मां ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि कुकुकोवा को कम सजा हुई है. उसे कम से कम 20 साल की सजा होनी चाहिए थी. वह अदालत में अपनी बेटी के साथ नहीं थी, लेकिन उस ने खुद उस की भावनाओं को काफी शिद्दत के साथ महसूस करते हुए कई ट्वीट किए थे.

अदालती सुनवाई और जांचपड़ताल की काररवाई में पाया गया था कि बुश को .38 की रिवौल्वर से 3 गोलियां मारी गई थीं. 2 गोलियां उस के सिर में लगी थीं, जबकि एक गोली उस के कंधे में लगी थी. न्यायाधीश ने फैसले में कहा कि बुश का हाथ रिवौल्वर के साथ इस तरह से रखा गया था, ताकि पहली नजर में लगे कि उस ने आत्महत्या की है. हत्या के बाद कुकुकोवा बुश की महंगी हमर गाड़ी से करीब 3012 किलोमीटर दूर स्लोवाकिया स्थित अपने घर चली गई थी, जहां उस का प्रेमी इंतजार कर रहा था.

कुकुकोवा ने न केवल 2 देशों की सीमाएं लांघीं, बल्कि इस लंबी यात्रा को 27 घंटे में पूरा भी किया. हालांकि कुछ दिनों बाद ही उसे स्लोवाकिया स्थित उस के पुश्तैनी गांव नोवा बोसाका से हिरासत में ले लिया गया था. उस की गिरफ्तारी स्पैनिश अधिकारियों के अनुरोध पर यूरोपीय वारंट के आधार पर की गई थी.

मायका मैरीका कुकुकोवा एक जमाने में बहुचर्चित स्विमवियर मौडल रही. सन 1990 में उस का जन्म स्लोवाकिया के एक गांव नोवा बोसाका में हुआ था. ग्रामीण परिवेश के साधारण परिवार में पलीबढ़ी कुकुकोवा जब किशोरावस्था में आई तो उसे अहसास होने लगा कि उस के अंदर खूबसूरती के साथसाथ हीरोइन बनने के भी तमाम गुण मौजूद हैं. जब उस के दोस्तों ने उस की सुंदरता की तारीफ के पुल बांधे तो उस की सपनीली आंखों में मौडलिंग की रंगीन दुनिया तैरने लगी.

कुकुकोवा के मातापिता ने उसे अपनी मनमर्जी से कैरियर चुनने की आजादी दे रखी थी. उस ने मौडलिंग के लिए कोशिश की तो थोड़े प्रयास में ही उसे मौका मिल गया. मौडलिंग की दुनिया में शुरुआत की पहली कोशिश में ही उसे सफलता मिल गई.

आगे भी सफलता की सीढि़यां चढ़ने में उसे ज्यादा वक्त नहीं लगा. ऊंची जगह बनाने के लिए भी उसे अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा. उस की खूबसूरती और पहली ही नजर में किसी को भी आकर्षित कर लेने वाले ग्लैमर की वजह से उस का आगे का रास्ता खुदबखुद बनता चला गया.

जल्दी ही कुकुकोवा एक परफेक्ट मौडल बन गई. चाहे रैंप पर चलना हो या कैमरे के किसी भी एंगल के सामने खुद को प्रदर्शित करना हो, वह बहुत कम समय में सीख गई. फलस्वरूप जल्द ही वह एक पेशेवर मौडल बन गई. उसे कुछ नामीगिरामी मौडलों के साथ रैंप पर चलने का मौका मिला तो वह एक चर्चित मैगजीन के कवर पर भी जगह बनाने में सफल रही.

इस के बाद फोटोग्राफरों ने उसे इंटरनेशनल मौडलिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की सलाह दी. उस ने ऐसा ही किया और स्लोवाकिया के फैशन और मौडलिंग की दुनिया का मक्का माने जाने वाले शहर मिलान की ओर रुख किया. मौडलिंग की बदौलत कुकुकोवा ने अपनी खास पहचान बना ली. ब्रिटिश और अमेरिकन मौडलों से टक्कर लेते हुए उस ने स्विमवियर या बिकिनी के पहनावे के साथ रैंप पर चल कर निर्णायक मंडल का दिल जीत लिया.

फिर क्या था, उस का सितारा बुलंद हो गया. मल्टीनेशनल कंपनियां उसे जहां अपने ब्रांड के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाने को लालायित रहने लगीं, वहीं उसे नौकरी के कुछ औफर भी मिले. लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही वह देर रात तक चलने वाली पार्टियों में भी आनेजाने लगी.

मौडलिंग की दुनिया में इस प्रोफेशन को अपनाने वाली मौडल्स अगर अपनी अदाकारी और शारीरिक सुंदरता बिखेरती हैं तो इस में अमीरजादे प्लेबौय की भी भरमार रहती है. उन की सोच के हिसाब से सुंदरियां मौजमस्ती की सैरगाह में मनोरंजन और रोमांस के साधन की तरह होती हैं. ऐसे ही लोगों में से एक थे इंगलैंड के गोल्ड बिजनेसमैन ‘किंग औफ ब्लिंग’ के नाम से चर्चित एंडी बुश. वह अधेड़ावस्था की दहलीज पर आ चुके थे, लेकिन मौजमस्ती के लिए सुंदरियों के साथ डेटिंग पर जाना उन का खास शौक था.

एंडी ब्रिटेन में सोने के आभूषणों के अरबपति कारोबारी थे. उन की गिनती अमीरजादों में होती थी. 1990 में उन्होंने बीबीसी टीवी प्रजेंटर साम मैसन से शादी की थी. उसी से एक बेटी एल्ली पैदा हुई थी. लेकिन बाद में साम मैसन से उन का तलाक हो गया था. वह एल्ली को बहुत प्यार करते थे और उसे हर तरह से खुश और सुखी रखने की कोशिश करते थे.

एल्ली अपनी मां से ज्यादा बुआ रशेल के करीब रही. दूसरी तरफ बुश की पहचान रंगीनियों में डूबे रहने वाले शख्स की बन गई थी. वह आए दिन लेट नाइट पार्टियों या फैशन शो में जाया करते थे. गर्लफ्रैंड के साथ लौंग ड्राइव या डेटिंग पर जाना उन का खास शौक था.

कुकुकोवा को रैंप पर चलते देख बुश पहली बार में ही उस पर फिदा हो गए थे. बुश को न केवल उस का ग्लैमर भरा सौंदर्य पसंद आया था, बल्कि उस की शारीरिक सुंदरता और अदाएं भी बहुत अच्छी लगी थीं. संयोग से बुश उस फैशन शो वीक के प्रायोजक भी थे, जिस में कुकुकोवा को बतौर मौडल जगह मिली थी. तब दोनों की औपचारिक मुलाकात हुई थी.

पहली मुलाकात में ही कुकुकोवा ने बुश के दिल में इतनी तो जगह बना ही ली थी कि वह कारोबारी व्यस्तता के बावजूद उस से मिलनेजुलने के लिए समय निकालने लगे थे.

इस तरह शुरू हुई मुलाकातों के दौरान कुकुकोवा ने उन से अपने लिए कोई काम तलाशने की इच्छा जताई. इस पर बुश ने उसे ब्रिस्टल स्थित अपने ही सोने के आभूषणों के शोरूम में नौकरी दे दी.

अब बुश के लिए उस से मिलनाजुलना आसान हो गया था. नतीजा यह हुआ कि उन की मुलाकातें प्रगाढ़ संबंध में बदलती चली गईं.

बुश अपनी सुगठित और चुस्तदुरुस्त देह के लिए काफी मेहनत करते थे. यही वजह थी कि वे 48 की उम्र में भी 28-30 के युवा की तरह दिखते थे. उन की सब से बड़ी कमजोरी सुंदरियों के पीछे भागना थी. नईनई प्रेमिकाएं बनाना, उन्हें महंगे उपहार देना और उन के साथ डेटिंग या लौंग ड्राइव पर जाना उन की जीवनशैली का अहम हिस्सा था.

उन के पास महंगी कारों की बड़ी शृंखला थी, जिन में लाल रंग की फेरारी और ग्रे रंग की लेंबोरगिनी के अतिरिक्त हमर रेंज की कई कारें थीं. उन की कई गाडि़यां कानसेलाडा के समुद्र तटीय गांव स्थित स्पैनिश विला में रखी जाती थीं.

अपनी आरामदायक जिंदगी गुजारने के लिए उन्होंने सन 2002 में करीब 3,20,000 पाउंड में 5 बैडरूम का एक मकान खरीदा था, जो केप्सटो के भीड़भाड़ वाले इलाके से काफी दूर ग्रामीण क्षेत्र मानमाउथशिरे में स्थित था. यह भव्य मकान 7 फुट ऊंची चारदीवारी से घिरा था.

इस के बावजूद इस मकान में सुरक्षा के तमाम अत्याधुनिक इंतजाम किए गए थे. उन्होंने सुरक्षा के लिए विख्यात राट्टेवाइलर डौग गार्ड भी वहां तैनात किए थे. आधिकारिक तौर पर बुश के 4 तरह के कारोबार थे, जिस में 3 तो फिलहाल निष्क्रिय थे. सिर्फ ट्रेडिंग कंपनी बिगविग से ही उन्हें मुनाफा होता था.

बुश के दिल में कुकुकोवा के लिए कितनी जगह थी या फिर कुकुकोवा बुश से कितनी मोहब्बत करती थी, यह कहना मुश्किल था, लेकिन इतना जरूर था कि वह उन के तमाम निजी कार्यों में दखलंदाजी करती थी. वह बुश के उसी शोरूम में एक कर्मचारी थी, जिस का कामकाज बुश की बहन रशेल और बेटी एल्ली संभालती थीं.

सन 2012 में बुश की कुकुकोवा के साथ डेटिंग चरम पर थी. इस का फायदा उठाते हुए कुकुकोवा बुश के साथ रशेल और एल्ली पर भी अपना रौब दिखाती थी. हालांकि उन के ‘लिव इन रिलेशन’ की मधुरता में जल्द ही नीरसता आ गई और नवंबर 2013 में तो उन के संबंध पूरी तरह से खत्म हो गए. इस की वजह यह थी कि उसी दौरान बुश की जिंदगी में एक 20 वर्षीया रूसी युवती मारिया कोरोतेवा आ गई थी.

मारिया इंगलैंड के पश्चिमी इलाके में स्थित एक यूनिवर्सिटी में ह्यूमन रिसोर्सेस की छात्रा थी. उस से बुश की मुलाकात ब्रिस्टल के कोस्टा कैफे की एक शाखा में हुई थी. मारिया बुश की बेटी एल्ली से मात्र एक साल बड़ी थी.

नई प्रेमिका का साथ मिलने पर वह कुकुकोवा को समय नहीं दे पा रहे थे. इतना ही नहीं, वह मारिया को अपना जीवनसाथी भी बनाना चाहते थे. कुकुकोवा अपनी उपेक्षा को महसूस कर रही थी. यह सब मारिया की वजह से हुआ था, इसलिए इस का दोषी वह मारिया को मान रही थी.

वह मारिया से ईर्ष्या करने लगी थी. इस की वजह से वह हमेशा तनाव में भी रहने लगी थी. और तो और वह फोन, ईमेल और डेटिंग ऐप के जरिए उस का पीछा भी करती थी. इस की शिकायत मारिया ने बुश से भी की थी. बुश को भी कुकुकोवा की यह हरकत पसंद नहीं आई. नतीजतन उन दोनों के बीच जबतब तकरार होने लगी. कुकुकोवा उन पर अपना एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश करती थी.

एल्ली का कहना था कि कुकुकोवा बहुत जल्द गुस्से में आ जाती थी. दुकान की महंगी चीजों को फर्श पर फेंक देती थी. कई बार तो वह बुश का मोबाइल तक फेंक देती थी, पासपोर्ट छिपा देती थी और उन की गैरमौजूदगी में उन का पर्सनल कंप्यूटर चेक करती थी.

इसी तरह का एक वाकया एल्ली के जन्मदिन के अवसर पर भी हुआ. एल्ली अपने 18वें जन्मदिन के मौके पर पिता और कुकुकोवा के साथ दुबई में थी. एक मौल में महंगी खरीदारी को ले कर कुकुकोवा ने न केवल हंगामा खड़ा कर दिया था, बल्कि गुस्से में उस ने बुश पर अपना बैग फेंक कर हमला भी किया था.

बुश ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की, पर उस ने उसी दिन बुश का लैपटौप भी तोड़ डाला था. उस की वजह से एल्ली के जन्मदिन की खुशियों भरे माहौल में खलल पड़ गया. इंगलैंड वापस लौट कर बुश ने दुबई की घटना को नजरअंदाज करना ही बेहतर समझा.

कुकुकोवा की अजीबोगरीब आदतों को झेलना बहुत ही मुश्किल हो गया था. वह हमेशा तेवर में रहती थी. सितंबर, 2013 में कुकुकोवा बगैर कुछ बताए बुश के यहां से चली गई. वह एक जगह स्थिर नहीं रहती थी. एक शहर से दूसरे शहर घूमती रहती थी. बुश ने उस से संबंध खत्म कर लिए थे, लेकिन कुकुकोवा को लगता था कि बुश उसे फिर से अपना लेगा. इस के लिए वह अपने फेसबुक एकाउंट पर प्रेमसंबंधों का सबूत देने वाले चुंबन और गले लगने के वीडियो अपलोड करती रहती थी.

कुकुकोवा के परिजनों के अनुसार, हत्या की घटना के 2 सप्ताह पहले वह अपना पुश्तैनी घर छोड़ गई थी. उस वक्त उस के पिता बीमार चल रहे थे. बुश की हत्या की खबर जब अखबारों की सुर्खियां बन गईं और उस की पूर्व पत्नी समेत दूसरे परिजनों ने हत्या का आरोप सीधे तौर पर कुकुकोवा पर लगाया.

इस के बाद स्पेन समेत स्लोवाकिया की पुलिस भी सक्रिय हो गई और बुश की हत्या के 2 दिनों बाद ही कुकुकोवा को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे न्यायिक हिरासत में ले कर मलागा के निकट अल्हउरा डेला टोर्रो जेल में डाल दिया गया. उस की गिरफ्तारी से उस की मां लुबोमीर कुकुका (50) और पिता दानक कुकुकोवा (51) को काफी दुख हुआ. उन्हें लगा जैसे उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई है.

कुकुकोवा की वजह से उस के मातापिता की पूरे इलाके में काफी बदनामी हुई. इस के बावजूद वे बेटी को बचाने की कोशिश के लिए स्पेन गए. उन्होंने एक महंगा वकील किया, जिस की फीस जुटाने में उन का पुश्तैनी मकान तक बिक गया.

पुलिस के अनुसार, घटना वाली रात को कुकुकोवा बुश के उसी घर में थी, जिस में बुश ने अपनी नई प्रेमिका मारिया कोरातेवा को बुला रखा था. मारिया किसी वजह से कुछ देर के लिए बाहर चली गई थी. संभवत: वह वापस जाना चाहती थी. थोड़ी देर में ही उस ने गोली चलने की आवाज सुनी. यही गवाही मारिया ने कोर्ट में दी थी.

बुश के स्मार्टफोन पर डेटिंग ऐप के जरिए कुकुकोवा को पता चल चुका था कि बुश और मारिया 5 अप्रैल, 2014 की रात अपनी मुलाकात का पांचवां महीना पूरा होने पर जश्न मनाने वाले हैं. इस के लिए स्पैनिश विला कोस्टा डेल सोल में खास किस्म का रोमांटिक आयोजन किया गया था. इस से पहले ब्रिस्टल हवाई अड्डे पर बुश ने मारिया को 10,000 पाउंड की हीरे की एक अंगूठी भेंट की थी. इस के साथ ही उन्होंने कहा कि वे विला पर उस से एक खास बात पर चर्चा करना चाहते हैं.

घटना के बारे में मारिया ने बताया, ‘‘5 अप्रैल की सुबह जब हम लोग (मैं और बुश) विला पहुंचे, तब सूर्योदय नहीं हुआ था. हम लोगों ने एकदूसरे का हाथ थामे प्रेमी युगल की तरह हंसहंस कर बातें करते हुए विला में प्रवेश किया. विला के कर्मचारियों ने हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया. हम सहज भाव से कमरे में चले गए.’’

मारिया ने आगे बताया, ‘‘बुश ने कमरे की बत्ती जलाई. मुझे कमरे में कुछ अच्छा नहीं लगा. मैं ने दरवाजे के पास एक रैक में ‘ब्रा और किंकर्स’ टंगे देखे. यह देख कर मैं समझ गई कि निश्चित तौर पर यहां पहले से कोई औरतें आती होंगी. मैं बुश से थोड़ा आगे बढ़ी तो कुछ दूरी पर फर्श पर एक अधखुला सूटकेस पड़ा था, जिस में 2 कटार रखे दिखे. उसे देख कर मैं घबरा गई. मैं उलटे पैर मुड़ कर ऊपर की सीढि़यों पर चली गई.

‘‘जब मैं सब से ऊपर पहुंची, तब देखा कि वहां कुकुकोवा बिलकुल शांत, स्थिर एकदम चट्टान की तरह खड़ी थी. वह मुझे ही घूर रही थी. उस ने अपने बाल नीचे किए हुए थे और पाजामा पहन रखा था. ऊपर वह शार्ट्स पहने हुए थी. मैं ने पलभर के लिए उसे देखा और चिल्लाती हुई वहां से भाग कर घर से बाहर आ गई.’’

इसी बीच कुकुकोवा ने बुश पर 3 गोलियां दाग दीं. मारिया ने समझा कि टीवी या सीढि़यों से कोई भारी सामान गिर गया है. कुछ मिनट बाद ही कुकुकोवा बाहर आई तो उस के हाथ में गाड़ी की चाबी थी. उस ने मुझ से कहा, ‘‘कार से दूर हट जाओ.’’

उस वक्त वह बहुत ही शांत थी. मुझे आश्चर्य हुआ कि बुश ने उसे अपनी हमर कार की चाबी कैसे दे दी. इस से मारिया को शक हुआ. जब तक वह घर में जाने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी, तब तक कुकुकोवा कार को तेजी से ड्राइव करते हुए फरार हो गई. मारिया विला के अंदर पहुंची तो बुश की रक्तरंजित लाश देख कर घबरा गई.

मारिया ने तुरंत बुश की बहन रशेल और पुलिस को बुलाया. पुलिस के साथ आई डाक्टरों की टीम ने बुश को मृत घोषित कर दिया.

बुश की हत्या के बाद जहां मारिया के सपने साकार होने से पहले ही चूरचूर हो गए, वहीं कुकुकोवा को पूरी जवानी जेल की सलाखों के पीछे गुजारनी होगी. उस के मातापिता पर तो जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा है. न तो बुढ़ापे का कोई सहारा है और न ही सिर छिपाने को छत बची है. सब कुछ बेटी को जेल जाने से बचाने में खत्म हो गया है. रही बात एल्ली और बहन रशेल की, तो उन को बुश की यादों के सहारे जीना होगा.

Crime Story in Hindi : पंजाब में बहन भाई का खुराफाती कारनामा

Crime Story in Hindi. 28 नवंबर, 2016 की शाम मोहाली के थाना सोहाना के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरसिमरन सिंह बल फील्ड के कामों से फारिग हो कर अपने औफिस पहुंचे थे कि उन का एक खास मुखबिर उन के सामने आ खड़ा हुआ. नमस्कार करने के बाद उस ने कहा, ‘‘सर, बढि़या इनाम तैयार रखिए, ऐसी जबरदस्त खबर लाया हूं कि सुन कर आप उछल पड़ेंगे.’’

यह मुखबिर लंबे समय से हरसिमरन सिंह के लिए मुखबिरी करता आ रहा था. यह उन का निहायत भरोसे का आदमी था, जिस की सूचनाएं अकसर सही निकलती थीं. वह पढ़ालिखा था और मामले की गहराई में जाने के बाद जब उसे पूरा विश्वास हो जाता था कि मामला पूरी तरह से सच है, उस के बाद ही वह उन के पास आता था.

उस दिन भी उस के चेहरे पर ऐसा ही आत्मविश्वास झलक रहा था. हरसिमरन सिंह ने उसे अपने रिटायरिंग रूम में ले जा कर कहा, ‘‘इनाम की चिंता मत करो, सूचना बढि़या होनी चाहिए.’’

‘‘मैं ने कहा न सर, ऐसी जबरदस्त सूचना लाया हूं कि सुन कर उछल पड़ेंगे. सरकार द्वारा जो यह दम भरा जा रहा है कि 2 हजार रुपए के नए नोट की कभी नकल नहीं हो सकेगी यानी जाली नोट नहीं छापे जा सकेंगे, मेरी सूचना उसी के बारे में है.’’ मुखबिर ने उत्साह के साथ कहा.

‘‘मतलब, किसी ने इतनी जल्दी उस की नकल तैयार कर ली यानी 2 हजार रुपए के नकली नोट छाप लिए ’’ हरसिमरन सिंह ने हैरानी से पूछा.

‘‘नकल तैयार ही नहीं कर ली सर, करोड़ों के जाली नोट छाप कर मार्केट में चला भी दिए हैं.’’ ‘‘2 हजार के जाली नोट चला भी दिए ’’ ‘‘जी सर.’’ ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ’’ कहने के साथ उन्होंने पूछा, ‘‘यह अपराध क्या मेरे इलाके में हुआ है ’’

‘‘सर, यह तो पता नहीं, लेकिन मुझे जो जानकारी है, उस के अनुसार लालबत्ती लगी औडी कार पर सवार हो कर 3 लोग, जिन में एक लड़की भी शामिल है, 2 हजार रुपए के जाली नोटों के साथ आप के एरिया में घूम रहे हैं.’’

‘‘उन लोगों के पास इस समय भी 2 हजार रुपए के जाली नोट हैं, अगर हैं तो कितने होंगे ’’

‘‘एकदम सटीक तो नहीं बता सकता सर, लेकिन जो भी है, वे लाखों में हैं. आप तुरंत नाकाबंदी करवाइए. अगर देर हो गई तो वे आप के इलाके से निकल भी सकते हैं. सर, मेरे कहने का मतलब यह है कि अगर इस समय आप ने उन लोगों को पकड़ लिया तो बड़ी मात्रा में 2 हजार रुपए के जाली नोट पकड़ने का यह पहला मामला होगा. अगर ऐसा हो गया तो मैं भी बढि़या इनाम पाने का हकदार हो जाऊंगा.’’ ट्राइसिटी (मोहाली-चंडीगढ़-पंचकूला) के कुछ बैंक वालों ने 2 हजार रुपए के नए नोटों की पुख्ता पहचान के लिए एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिस में बताया गया था कि 2 हजार रुपए के नोट पर सीधी तरफ सी थ्रू रजिस्टर में 2 हजार रुपए लिखा है. महात्मा गांधी के चित्र की दाईं ओर देवनागरी में 2 हजार रुपए लिखा गया है, जिस में रुपए का नया साइन है. महात्मा गांधी का चित्र नोट के ठीक बीच में है. नोट पर बाईं ओर माइक्रालैटर्स में आरबीआई और 2 हजार लिखा है. नोट को थोड़ा टेढ़ा कर के देखने पर थ्रेड का रंग हरे से नीले में बदलता दिखाई देता है. नोट की दाईं ओर गवर्नर के हस्ताक्षर, गारंटी और प्रौमिस क्लाज दिया गया है.

इस में आरबीआई का साइन भी देखा जा सकता है. नोट को लाइट में देखने पर सफेद जगह में महात्मा गांधी का चित्र दिखाई देता है. वहीं इलैक्ट्रोटाइप वाटरमार्क है तो नीचे की तरफ दाईं ओर अशोक स्तंभ है, जिस के ऊपरी भाग पर रैक्टेंगल में 2 हजार रुपए लिखा गया है. बाईं ओर 7 लाइनें भी चिह्नित की गई हैं. नोट में पिछली तरफ स्वच्छ भारत का लोगो दिया गया है. वहीं पर कई भाषाओं में नोट की वैल्यू लिखने के अलावा मंगलयान का चित्र भी दिया गया है.

सरकार पहले ही दिन से दावा कर रही थी कि इस नए 2 हजार रुपए के नोट का जाली नोट तैयार करना कठिन ही नहीं, एकदम असंभव है. बैंक वालों ने 2 हजार रुपए के नोट के बारे में जो आयोजन किया था, उस में हरसिमरन सिंह ने भी भाग लिया था. उन दिनों उन के पास थाना सोहाना के अलावा मोहाली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्थित थाने का भी चार्ज था. उस समय वह वहीं से आए थे, जब उन का वह मुखबिर उन से मिलने आया था.

मुखबिर द्वारा मिली सूचना के बारे में उच्चाधिकारियों को फोन द्वारा बता कर दिशानिर्देश लेने के बाद हरसिमरन सिंह ने एक तहरीर तैयार कर अपराध संख्या 276 पर भादंवि की धाराओं 420, 489ए, 489बी, 489सी, 489डी, 489ई एवं 120बी के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर एक टीम तैयार की, जिस में एसआई चरणजीत सिंह के अलावा हवलदार परमजीत कुमार, इकबाल सिंह, संजय कुमार, बलविंदर सिंह और जगतपाल सिंह, सीनियर सिपाही गुरमुख सिंह, देवेंद्र सिंह, सिपाही बलवीर सिंह व महिला हवलदार गुरविंदर कौर को शामिल किया गया.

अपनी इस पूरी टीम के साथ मुखबिर के बताए अनुसार, जगतपुरा के टी पौइंट पर उन्होंने नाका लगा दिया. यह शाम के करीब साढ़े 7 बजे की बात है. गाडि़यां आतीजाती रहीं और जरूरत के हिसाब से उन्हें रोक कर तलाशी ली जाती रही. जिस गाड़ी का इस पुलिस टीम को इंतजार था, वह अभी तक कहीं दिखाई नहीं दी थी.

आखिर आधी रात को साढ़े 12 बजे के करीब वीआईपी नंबर की लालबत्ती लगी सफेद रंग की औडी कार आती दिखाई दी. शायद इसी गाड़ी के बारे में मुखबिर ने बताया था, इसलिए हरसिमरन सिंह ने अपने एक सिपाही को इशारा कर के उस कार को रोकने को कहा.

सिपाही के इशारे पर गाड़ी चालक ने बड़ी शराफत से गाड़ी एक तरफ ले जा कर रोक दी. उस के बाद खिड़की का शीशा नीचे कर के गरदन बाहर निकाल कर पूछा, ‘‘क्या बात है भई, गाड़ी क्यों रुकवाई  देख नहीं रहे हो कि यह वीआईपी गाड़ी है.’’

तब तक हरसिमरन सिंह गाड़ी के पास पहुंच गए थे. सिपाही के बजाए उन्होंने उस की बात का जवाब दिया, ‘‘गाड़ी इसलिए रुकवाई है, क्योंकि इस की तलाशी लेनी है.’’

‘‘वह किसलिए ’’ ड्राइविंग सीट पर बैठे आदमी ने रुखाई से पूछा.

इस पर हरसिमरन सिंह ने अपनी आवाज में थोड़ी सख्ती लाते हुए कहा, ‘‘गाड़ी में जितने भी लोग हैं, चुपचाप बाहर आ कर खड़े हो जाएं. हमें अपना काम करने दें.’’

‘‘कमाल है सर, वीआईपी नंबर वाली गाड़ी है, जिस पर रैड बीकन भी लगी है, ऐसे में आप को मालूम होना चाहिए…’’

‘‘मुझे यह मालूम करने की जरूरत नहीं है कि तुम लोग किस तरह के वीआईपी हो और अपनी गाड़ी पर लालबत्ती लगाने का अधिकार तुम ने कहां से हासिल किया है. ऊपर से आदेश के अनुसार हमें तुम्हारी गाड़ी की तलाशी लेनी है. बेहतर होगा कि तुम लोग शराफत से बाहर आ कर खड़े हो जाओ वरना हमें सख्ती से काम लेना होगा.’’ हरसिमरन सिंह ने अपनी आवाज को सख्त करते हुए कहा.

इस बीच उन के इशारे पर टीम के अन्य लोगों ने कार को चारों ओर से घेर लिया था. यह सब देख कर ड्राइविंग सीट पर बैठे युवक ने अंदर कोई इशारा किया और दरवाजा खोल कर बाहर आ गया. वह एक स्मार्ट सा युवक था. उस की बगल वाली सीट से एक आकर्षक युवती उतरी तो पिछली सीट से अधेड़ उम्र का एक आदमी बाहर आया. कार से बाहर आ कर ये सभी हरसिमरन सिंह को यह समझाने की कोशिश करने लगे कि वे ऊंचे पदों पर बैठे प्रतिष्ठित परिवार से संबंधित हैं और उन की गाड़ी में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे अनुचित कहा जा सके. अधेड़ शख्स ने कुछेक राजनेताओं के नाम ले कर प्रभावित करने की कोशिश की.

हरसिमरन सिंह ने उन की बातों पर ध्यान न दे कर खुद कार की तलाशी लेने लगे. इस तलाशी में उन के हाथ ऐसे 3 बैग लगे, जिन में 2 हजार रुपए के नोटों की गड्डियां ठसाठस भरी थीं. देखने में वे तमाम नोट एकदम असली लग रहे थे, लेकिन मुखबिर ने उन के पास जाली नोटों के होने के बारे में बताया था. फिर भी नोटबंदी के दौर में इतनी बड़ी मात्रा में नई करेंसी का एक जगह मिलना किसी अपराध से कम नहीं था.

हरसिमरन सिंह तीनों को उन की गाड़ी और करेंसी सहित थाने ले आए, जहां शुरुआती पूछताछ में ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए उगल दिया कि उन से बरामद सारी करेंसी नकली है और वे कुल 42 लाख के नोट हैं. फिर क्या था, तीनों को विधिवत हिरासत में ले कर फिलहाल हवालात में बंद कर दिया गया. अगले दिन सुबह उन्हें अदालत में पेश कर के कस्टडी रिमांड पर ले कर तीनों से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उन्होंने जो कुछ पुलिस को बताया, उस से उच्चशिक्षित एवं अच्छे प्रतिष्ठित परिवारों के लड़केलड़की द्वारा अपना एक गिरोह बना कर आपराधिक राह पर चलने की जो दास्तान सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी—

सरवमित्तर वर्मा हरियाणा सरकार में उच्च अधिकारी थे. उन की पत्नी सैन्य विभाग में लैफ्टिनेंट कर्नल डाक्टर हैं. इस जाली नोटों के साथ पकड़ा गया युवक इन्हीं वर्मा दंपति का 21 साल का बेटा है अभिनव वर्मा. वह पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार था. मूलरूप से ये लोग हरियाणा के जिला फरीदाबाद के कस्बा बल्लभगढ़ के रहने वाले थे.

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए अभिनव चंडीगढ़ चला आया था. यहीं रह कर उस ने चंडीगढ़ से 25 किलोमीटर दूर पंजाब के जिला मोहाली के कस्बा बनूड़ स्थित चितकारा यूनिवर्सिटी से बीटेक किया.

अभिनव ने कई प्रोजैक्टों पर काम करते हुए न केवल अपार सफलताएं अर्जित कीं, बल्कि अपना नाम भी रोशन किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रम ‘मेक इन इंडिया’ का हिस्सा बन कर उस ने अंधे लोगों के लिए एक ऐसा उपकरण बनाया, जिसे किसी अंधे की छड़ी अथवा अंगूठी में आसानी से फिट किया जा सकता है. नेत्रहीन अगर अकेला चला जा रहा है तो किसी भी तरह की बाधा आने पर यह उपकरण सेंसर की तरह काम करते हुए उन्हें चौकन्ना कर देता है. इस उपकरण की न केवल खूब चर्चा हुई बल्कि अभिनव इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतारने की तैयारी करने लगा. इस के लिए ‘लाइव ब्रेल सौल्यूशन’ नाम से अपनी कंपनी बना कर चंडीगढ़ के इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 में उस ने अपना आलीशान औफिस भी खोल लिया. रहने के लिए उस ने जीरकपुर के ढकौली स्थित पाइनहोम अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया. अभिनव घर से काफी संपन्न था. वैसे भी उस की प्रतिभा को निखारने के लिए घर वाले उस का हर तरह से सहयोग कर रहे थे. पिछले साल उस के पिता का अचानक देहांत हो गया तो उस की मां का प्यार उस पर कुछ ज्यादा ही उमड़ने लगा.

अपना व्यापार चलाने के लिए अभिनव अब तक 16 देशों की यात्रा कर चुका है. नेट के जरिए वह विश्व भर की कंपनियों व ग्राहकों से जुड़ता जा रहा था. ऐसे में उसे योग्य स्टाफ की जरूरत थी. कपूरथला की रेलवे कोच फैक्ट्री में इंजीनियर के पद पर काम कर रहे रामरक्खा वर्मा रिश्ते में अभिनव के मामा हैं.

वह फैक्ट्री के सी टाइप वार्ड के अपने सरकारी फ्लैट में पत्नी और बेटी विशाखा के साथ रहते थे. विशाखा ने सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से एमबीए किया था. इन दिनों वह लुधियाना के एक बड़े प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल के यहां नौकरी करती थी. लुधियाना की गगनदीप कालोनी में रहने वाले नागपाल के अनेक राजनेताओं से घनिष्ठ संबंध थे.

एमबीए करने के बाद विशाखा ने अभिनव से कहीं नौकरी दिलाने को कहा था. लेकिन वह उसे कहीं नौकरी नहीं दिला सका था. इस के बाद विशाखा ने लुधियाना में प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल के यहां नौकरी कर ली थी, जबकि वह इस से कहीं बढि़या नौकरी करने में सक्षम थी.

अभिनव को अपना काम जमता नजर आने लगा तो उसे अपने औफिस के लिए विशाखा की जरूरत महसूस हुई. विशाखा उस से भले ही 2 साल बड़ी थी, मगर वह उसे मानती बहुत थी. लिहाजा अभिनव के कहने भर की देर थी कि उस ने प्रौपर्टी डीलर के यहां वाली नौकरी छोड़ दी और अभिनव के औफिस में जौइन कर लिया.

अभिनव को इस क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य नजर आ रहा था. उस का बनाया उपकरण खरीदने के लिए पूरी दुनिया से और्डर आ रहे थे. उस के लिए उन की मांग पूरी कर पाना मुश्किल हो रहा था. ऐसे में उसे अपने पैर जमाने के लिए काफी बड़ी रकम की जरूरत थी, जिसे वह न खुद पूरी कर सकता था और न ही उस के परिवार वाले पूरी कर सकते थे. अचानक नोटबंदी के तहत 500 और 1000 रुपए के नोटों का प्रचलन बंद कर सरकार द्वारा 2 हजार रुपए के नए नोट मार्केट में उतार दिए गए. ऐसे में मार्केट और आम लोगों की परेशानी को देख कर अभिनव के दिमाग में आइडिया आया कि क्यों न 2 हजार रुपए के जाली नोट छाप कर बाजार में चला दिए जाएं.

प्रयोग के तौर पर उस ने नए नोट को स्कैन कर के उस का प्रिंट निकाला. प्रिंट इतना बढि़या निकला कि देखने में किसी भी तरह से असली नोट से कम नहीं लग रहा था. उस ने इस बारे में विशाखा से बात की तो वह भी उस की मदद के लिए तैयार हो गई. फिर तो उन्होंने 2 हजार रुपए के 10 जाली नोट तैयार कर के अपने कर्मचारियों के माध्यम से मार्केट में भिजवाए जो आसानी से चल गए. इस सफलता से उत्साहित हो कर उन्होंने अपने कर्मचारियों का अपना एक गैंग बना लिया. यही नहीं, लुधियाना के प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल को भी लालच दे कर अपने गिरोह में शामिल कर लिया. 54 वर्षीय यह अधेड़ बिना आगेपीछे की सोचे अपराध की राह पर चलने को तैयार हो गया. आगे जो योजना बनी, उस के अनुसार, थोड़ीबहुत नहीं, 2 हजार रुपए के करोड़ों के नकली नोट तैयार कर के इन लोगों ने उन लोगों के हवाले कर दिए, जिन के पास 5 सौ व 1 हजार रुपए के नोटों की शक्ल में ब्लैकमनी भरी पड़ी थी. ऐसे में 30 प्रतिशत कमीशन काट कर नकली नोटों को असली कह कर उन के हवाले कर 70 प्रतिशत असली नोटों की कमाई कर ली जाए. इन पैसों से काम के अनुसार, गिरोह के सदस्यों का कमीशन फिक्स कर दिया गया.

फिर क्या था, पूरे उत्साह के साथ ये सभी इस काम में शिद्दत से लग गए. दिनरात मेहनत कर के कुछ ही समय में इन्होंने 3 करोड़ रुपए के नकली नोट तैयार कर के 2 करोड़ के नोट बाजार में चला भी दिए.

पूछताछ में उन लोगों ने जो बताया, उस के अनुसार, अभिनव ने मोहाली में अपनी एक फैक्ट्री खोल रखी थी, जिस में विशाखा को एचआर की अहम पोस्ट दी गई थी. उसी फैक्ट्री में पैसा लगा कर उसे ऊंचाइयों तक ले जाने का उस ने सपना देखा था. पकड़े गए सारे नोट इसी फैक्ट्री में तैयार किए गए थे. पुलिस ने अभिनव और विशाखा की निशानदेही पर डिजिटल प्रिंटर, पेपर और कटर वगैरह बरामद कर लिया था. पूछताछ में इन लोगों ने बताया था कि अपने इस धंधे में अभिनव ने आधा दर्जन से ज्यादा कर्मचारियों को लगा रखा था. लेकिन उन में हर्ष और प्रमोद की भूमिका अहम थी. पुलिस ने उन की गिरफ्तारी के लिए तमाम जगहों पर छापे मारे, पर वे पकडे़ नहीं जा सके. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में अभिनव ने यह भी स्वीकारा कि 2009 मौडल की वीआईपी नंबर एचआर 70यू 0004 वाली औडी कार उस ने 20 लाख रुपए में जीरकपुर के कार बाजार से खरीदी थी. उस कार को अपने नाम पर ट्रांसफर न करवा कर उस पर अवैध रूप से लालबत्ती लगा कर वह पुलिस और अन्य लोगों की आंखों में धूल झोंक कर नकली नोटों के अपने धंधे को अंजाम देता रहा.

अखबारों में खबरें छपने के बाद कई लोगों ने थाने जा कर अभिनव और उस के साथियों द्वारा ठगे जाने की अपनी शिकायतें दर्ज कराई हैं. मजे की बात यह है कि वे भी अभियुक्तों से मिले 2 हजार रुपए के नकली नोट आसानी से असली के रूप में चला चुके थे. नकली नोटों के बदले लोगों से मिले पुराने असली नोटों को अभिनव न केवल अपने पर्सनल और कंपनी के खातों में जमा कराता था, बल्कि कुछ पैसा उस ने अपने कर्मचारियों के बैंक खातों में भी जमा कराए थे. 14 लाख के पुराने नोट उस के घर से भी बरामद किए गए थे. खुद तैयार किए गए 3 करोड़ के 2 हजार के नोटों में से उस के पास 42 लाख रुपए ही बचे थे, जिन्हें वह विशाखा और सुमन नागपाल के साथ अपनी कथित वीआईपी गाड़ी से एक पार्टी को देने जा रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

अभिनव से बरामद नोटों के बारे में आरबीआई की रिपोर्ट आ चुकी है कि वे सभी नोट जाली हैं और उन की छपाई हलके कागज पर हुई है.

पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर अभिनव, विशाखा और सुमन नागपाल को एक बार फिर अदालत में पेश किया, जहां से उन तीनों को न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया गया. कथा लिखे जाने तक न तो उन की जमानतें हुई थीं और न ही इस मामले के 7 अन्य अभियुक्तों में से कोई पकड़ा जा सका था. Crime Story in Hindi

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story In Hindi: बुआ के दिल ने जब भतीजे को छुआ

Crime Story In Hindi: वेदराम बेहद सीधासादा और मेहनती युवक था. वह उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के एक चूड़ी कारखाने में काम करता था, जबकि उस के बीवीबच्चे कासगंज जिले के नगला लालजीतगंज में रहते थे. यह वेदराम का पैतृक गांव था. वहीं पर उस का भाई मिट्ठूलाल भी परिवार के साथ रहता था.

जिला कासगंज के ही थाना सहावर का एक गांव है बीनपुर कलां. यहीं के रहने वाले आलम सिंह का बेटा नेकसे अकसर नगला लालजीतगंज में अपनी बुआ के घर आताजाता रहता था. उस की बुआ की शादी वेदराम के भाई मिट्ठूलाल के साथ हुई थी.

वेदराम की पत्नी सुनीता पति की गैरमौजूदगी में भी घर की जिम्मेदारी  ठीकठाक निभा रही थी. वह अपनी बड़ी बेटी की शादी कर चुकी थी. जिंदगी ने कब करवट ले ली, वेदराम को पता ही नहीं चला. पिछले कुछ समय से वेदराम जब भी छुट्टी पर घर जाता था, उसे पत्नी सुनीता के मिजाज में बदलाव देखने को मिलता था. उसे अकसर अपने घर में नेकसे भी बैठा मिलता था.

नेकसे हालांकि उस के भाई मिट्ठूलाल की पत्नी का भतीजा था, फिर भी वह यही सोचता था कि आखिर यह उस के घर में क्यों डेरा डाले रहता है. उस ने एकदो बार नेकसे को टोका भी कि बुआ के घर पड़े रहने से अच्छा है वह कोई कामकाज देखे. सुनीता ने भी नेकसे पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन वह जब भी आता था, वह उस की खूब मेहमाननवाजी करती थी. नेकसे के मन में क्या था, यह सुनीता को पता नहीं था. एक दिन नेकसे दोपहर में उस के घर आया और चारपाई पर बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगा. अचानक वह उस के पास आ कर बोला, ‘‘बुआ, तुम जानती हो कि तुम कितनी सुंदर हो?’’

नेकसे की इस बात पर पहले तो सुनीता चौंकी, उस के बाद हंसती हुई बोली, ‘‘मजाक अच्छा कर लेते हो.’’

‘‘नहीं बुआ, ये मजाक नहीं है. तुम मुझे सचमुच बहुत अच्छी लगती हो. तुम्हें देखने को दिल चाहता है, तभी तो मैं तुम्हारे यहां आता हूं.’’ नेकसे ने हंसते हुए कहा.

नेकसे की बातें सुन कर सुनीता के माथे पर बल पड़ गए. उस ने कहा, ‘‘तुम यह क्या कह रहे हो, क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘कुछ नहीं बुआ, तुम बैठो और यह बताओ कि फूफाजी कब आएंगे?’’ उस ने पूछा.

‘‘उन्हें छुट्टी कहां मिलती है. तुम सब कुछ जानते तो हो, फिर भी पूछ रहे हो?’’ सुनीता ने थोड़ा रोष में कहा.

‘‘तुम्हारे ऊपर दया आती है बुआ, फूफाजी को तो तुम्हारी फिक्र ही नहीं है. अगर उन्हें फिक्र होती तो इतने दिनों बाद घर न आते. वह चाहते तो गांव में ही कोई काम कर सकते थे.’’ यह कह कर नेकसे ने जैसे सुनीता की दुखती रग पर हाथ रख दिया था.

इस के बाद सुनीता के करीब आ कर वह उस का हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘बुआ, अब तुम चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा.’’

इतना कह कर नेकसे तो चला गया, लेकिन सुनीता के मन में कई सवाल छोड़ गया. वह सोचने लगी कि आखिर नेकसे का उस के यहां आनेजाने का मकसद क्या है? 28 साल का नेकसे देखने में ठीकठाक था. वह अविवाहित था. और अपने गांव के एक ईंट भट्ठे पर काम करता था. तनख्वाह तो ज्यादा नहीं थी, पर वहां उसे अच्छी कमाई हो जाती थी. बुआ के यहां आतेआते उस का दिल बुआ की देवरानी सुनीता पर आ गया था.

सुनीता पति की दूरी से बहुत परेशान थी. इसी का बहाना बना कर उस ने उस के दिल में जगह बनानी शुरू कर दी थी. रिश्ते की नजदीकियां रास्ते में बाधक थीं. नेकसे को इस बात का भी डर लग रहा था कि अगर सुनीता को बुरा लग गया तो परिवार में तूफान आ जाएगा. उस दिन नेकसे के जाने के बाद सुनीता देर तक उसी के बारे में सोचती रही कि आखिर नेकसे चाहता क्या है. उस रात सुनीता को देर तक नींद नहीं आई. नेकसे की बातचीत का अंदाज मन मोहने वाला था, लेकिन सुनीता उम्र और रिश्ते में नेकसे से बड़ी थी. मन में पति के प्रति गुस्सा भी आया, क्योंकि पति से दूरी के कारण ही उस का मन डगमगा रहा था.

उस ने तय कर लिया कि इस बार जब पति घर आएगा तो वह उस से कहेगी कि या तो वह गांव में रह कर कोई काम करे या फिर उसे भी अपने साथ ले चले.

कुछ दिनों बाद वेदराम छुट्टी पर आया तो सुनीता ने कहा, ‘‘देखो, तुम्हारे बिना मेरा यहां बिलकुल भी मन नहीं लगता. या तो तुम यहीं कोई काम कर लो या फिर मैं भी बच्चों को ले कर फिरोजाबाद चल कर तुम्हारे साथ रहूंगी.’’

पत्नी की बात सुन कर वेदराम बोला, ‘‘लगता है, तुम पगला गई हो. तुम अपनी उम्र तो देखो. बच्चे बड़े हो रहे हैं और तुम्हें रोमांस सूझ रहा है.’’

‘‘तो क्या अब मैं बूढ़ी हो गई हूं?’’ सुनीता ने कहा.

‘‘नहीं…नहीं, ऐसा नहीं है. पर सुनीता यह मेरी मजबूरी है. मेरी तनख्वाह इतनी नहीं कि वहां किराए पर कमरा ले कर तुम्हें साथ रख सकूं. और तुम क्या सोच रही हो कि वहां मैं खुश हूं. नहीं, तुम्हारे बिना मैं भी कम परेशान नहीं हूं.’’

पति के जवाब पर सुनीता कुछ नहीं बोली. वेदराम 3 दिनों तक घर पर रहा, तब तक सुनीता काफी खुश रही. पर पति के जाने के बाद उस के जिस्म की भूख फिर सिर उठाने लगी. वह उदास हो गई. तब उस के दिलोदिमाग में नेकसे घूमने लगा. वह उस से मिलने को उतावली हो उठी. इतना ही नहीं, वह अपनी जेठानी के घर जा कर बोली, ‘‘दीदी, नेकसे आया नहीं क्या?’’

जेठानी ने कहा, ‘‘आया तो था, पर जल्दी में था. क्यों, कोई काम है क्या?’’

‘‘नहीं, मैं ने तो यूं ही पूछ लिया.’’ उदास मन से सुनीता वापस आने को हुई, तभी जेठानी ने कहा, ‘‘शायद वह कल आएगा.’’

जेठानी की बात सुन कर सुनीता का दिल बल्लियों उछलने लगा. उसे लग रहा था कि नेकसे उस से नाराज है, तभी तो वह उस के घर नहीं आया. अगले दिन अचानक उस के दरवाजे पर दस्तक हुई. उस ने दरवाजा खोला, सामने नेकसे खड़ा था.

‘‘तुम?’’ उसे देख कर सुनीता हैरानी से बोली.

‘‘हां, मैं ही हूं बुआ, लेकिन तुम मुझे देख कर इतना हैरान क्यों हो? बड़ी बुआ ने बताया कि तुम मुझे याद कर रही थीं, सो मैं आ गया. अब बताओ, क्या कहना है?’’ नेकसे ने घर में दाखिल होते हुए कहा.

सुनीता ने मुख्यद्वार बंद किया और अंदर आ कर नेकसे से बातें करने लगी. कुछ देर में सुनीता 2 गिलासों में चाय ले कर आई तो नेकसे ने पूछा, ‘‘फूफा आए थे क्या?’’

‘‘हां, आए तो थे, लेकिन 3 दिन रह कर चले गए.’’ सुनीता बेमन से बोली.

नेकसे को लगा कि वह फूफा से खुश नहीं है. उस ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा, ‘‘बुआ, मैं कुछ कहना चाहता हूं, पर डर लगता है कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ.’’

‘‘नहीं, तुम बताओ क्या बात है?’’

‘‘बुआ, सच तो यह है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो और मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’ नेकसे ने एक ही झटके में मन की बात कह दी.

नेकसे की बात पर सुनीता भड़क उठी, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? और हां, प्यार का मतलब जानते हो? अपनी और मेरी उम्र में फर्क देखा है. मैं रिश्ते में तुम्हारी बुआ लगती हूं.’’

‘‘हां, लेकिन इस दिल का क्या करूं, जो तुम पर आ गया है. अब तो दिलोदिमाग पर हमेशा तुम ही छाई रहती हो.’’ नेकसे ने कहा.

‘‘लगता है, तुम पागल हो गए हो. जरा सोचो, अगर घर वालों को यह सब पता चल गया तो मेरा क्या हाल होगा?’’ सुनीता ने कहा.

नेकसे चारपाई से उठा और सुनीता के पास जा कर उस के गले में बांहें डाल दीं. सुनीता ने इस का कोई विरोध नहीं किया. इस से नेकसे की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सुनीता भी खुद को नहीं रोक सकी तो मर्यादा भंग हो गई. जोश उतरने पर जब होश आया तो दोनों में से किसी के भी मन में पछतावा नहीं था.

सुनीता को अपना मोबाइल नंबर दे कर और फिर आने का वादा कर के नेकसे चला गया. उस दिन के बाद सुनीता की तो जैसे दुनिया ही बदल गई. पर कभीकभी उसे डर भी लगता था कि अगर भेद खुल गया तो क्या होगा. अब नेकसे का आनाजाना लगा रहने लगा. इसी बीच एक दिन वेदराम अचानक घर आ गया. उस की तबीयत खराब थी. पर उस समय घर पर नेकसे नहीं था. सुनीता डर गई कि कहीं पति की मौजूदगी में नेकसे न आ जाए, इसलिए उस ने नेकसे को फोन कर के सतर्क कर दिया. हफ्ते भर बाद वेदराम चला तो गया, पर सुनीता के मन में डर सा समा गया.

पड़ोसियों को सुनीता के घर नेकसे का आनाजाना अखरने लगा था. आखिर एक दिन पड़ोसन ने सुनीता को टोक ही दिया, ‘‘जवान लड़के का इस तरह घर आनाजाना ठीक नहीं है. अपनी जवान बेटी का कुछ तो खयाल करो.’’

सुनीता तमक कर बोली, ‘‘अपने घर का खयाल मैं खुद रख लूंगी. तुम हमारी फिक्र मत करो.’’

नेकसे उस के यहां बेखौफ और बिना रोकटोक आताजाता था. पड़ोसियों के मन में भी शक के बीज पड़ चुके थे. एक दिन जब वेदराम घर आया तो एक पड़ोसी ने कहा, ‘‘नेकसे तुम्हारी गैरमौजूदगी में तुम्हारे घर अकसर आता है. तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए.’’

इस बात से वेदराम को लगा कि जरूर कुछ गड़बड़ है. उस ने सुनीता से पूछा, ‘‘यह नेकसे का क्या चक्कर है?’’

पति की बात सुन कर सुनीता की धड़कनें बढ़ गईं, ‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, तुम्हारा रिश्तेदार है. कभीकभी यहां आ जाता है. इस में गलत क्या है?’’

‘‘घर में जवान बच्ची है. तुम उसे यहां आने के लिए मना कर दो.’’ वेदराम ने कहा.

‘‘अपनी बेटी की देखरेख मैं खुद कर सकती हूं, पर कभी सोचा है कि तुम्हारे बिना मैं कैसे रहती हूं.’’

‘‘तुम लोगों के लिए ही तो मैं बाहर रहता हूं. जरा सोचो क्या तुम्हारे बिना मुझे वहां अच्छा लगता है क्या?’’

वेदराम को सुनीता की इस बात से विश्वास होने लगा कि पड़ोसियों ने उसे उस की पत्नी और नेकसे के बारे में जो खबर दी है, वह सही है. वेदराम 2-4 दिन रुक कर अपने काम पर फिरोजाबाद चला गया. पर इस बार उस का काम में मन नहीं लगा. उसे लगता था, जैसे उस की गृहस्थी की नींव हिल रही है.

एक दिन अचानक वह छुट्टी ले कर बिना बताए घर से आ गया. उस ने घर में कदम रखा तो घर में कोई बच्चा दिखाई नहीं दिया. उस ने कमरे का दरवाजा खोला तो सन्न रह गया. उस की पत्नी नेकसे की बांहों में थी. गुस्से में वेदराम ने डंडा उठाया और सुनीता की खूब पिटाई की. जबकि नेकसे भाग गया.

पिटने के बाद भी सुनीता के चेहरे पर डर नहीं था. वह गुर्रा कर बोली, ‘‘इस सब में मेरी नहीं, बल्कि तुम्हारी गलती है. मैं ने कहा था न कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती, पर तुम ने मेरी भावनाओं का खयाल कहां रखा.’’

वेदराम का गुस्सा बढ़ गया. वह हैरान था कि सुनीता ने रिश्तों का भी खयाल नहीं रखा. नेकसे तो उस के बेटे की तरह है. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, अब मैं आ गया हूं, सब संभाल लूंगा.’’

‘‘मैं आ गया हूं, से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘अब मैं नौकरी छोड़ कर हमेशा के लिए आ गया हूं. यहीं खेतीबाड़ी करूंगा. फिर देखूंगा तुझे.’’ वेदराम ने कहा.

पति के नौकरी छोड़ने की बात सुन कर सुनीता परेशान हो उठी. क्योंकि अब उसे नेकसे से मिलने का मौका नहीं मिल सकता था. उस ने नेकसे को सारी बात बता कर सतर्क रहने को कहा. अब वह किसी भी कीमत पर नेकसे को छोड़ने को तैयार नहीं थी. उस के मन में पति के प्रति नफरत पैदा हो गई.

वेदराम को अब इस बात का डर लगा रहता था कि सुनीता नेकसे के साथ भाग न जाए. अगर ऐसा हो गया तो समाज में उस की नाक ही कट जाएगी. लिहाजा उसे अपनी दुराचारी पत्नी से नफरत हो गई. बेटी भी जवान थी पर वह मां की ही तरफ से बोलती थी. उसे इस बात का भी डर था कि कहीं बेटी भी गुमराह न हो जाए.

वेदराम की चौकसी के बावजूद सुनीता और नेकसे मौका पा कर घर से बाहर मिलने लगे. यह बात भी वेदराम से ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. उस ने सुनीता को एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर वह कुछ भी मानने को तैयार नहीं थी. वेदराम समझ गया कि अब कोई बड़ा कदम उठाना ही पड़ेगा, वरना उस की गृहस्थी डूब जाएगी. घर का वातावरण काफी तनावपूर्ण रहने लगा था. नेकसे वेदराम की खुशियों के रास्ते में बाधा बन गया था. काफी सोचनेविचारने के बाद वेदराम को लगा कि इस समस्या का अब एक ही हल है कि रास्ते के कांटे को जड़ से निकाल दिया जाए.

दूसरी ओर रोजरोज पिटने से सुनीता को लगने लगा था कि अब वह पति के साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती. वह खुल कर नेकसे के साथ अपनी दुनिया बसाना चाहती थी.

वेदराम धीरेधीरे अपने इरादे को मजबूत कर रहा था. बेशक यह काम उस के लिए कठिन था. पर एक ओर चरित्रहीन पत्नी थी तो दूसरी ओर बेलगाम भतीजा. दोनों उस केगुस्से को हवा दे रहे थे.

योजना के अनुसार, वेदराम उसी ईंट भट्ठे पर काम करने लगा, जहां नेकसे करता था. वेदराम जानता था कि नेकसे रात में भट्ठे पर ही सोता है. उसे लगा कि वह वहीं पर अपना काम आसानी से कर सकता है. वह भी भट्ठे पर ही सोने लगा और मौके की तलाश में लग गया.

नेकसे अपने फूफा वेदराम के इरादे से बेखबर था. जबकि वेदराम ने तय कर लिया था कि अपनी इज्जत पर हाथ डालने वाले को वह जिंदा नहीं छोड़ेगा. अपनी नौकरी के तीसरे दिन 5 दिसंबर, 2016 को वेदराम को मौका मिल गया. उस ने देखा, नेकसे अकेला सो रहा था. वह अपनी जगह से उठा और फावड़े से नेकसे पर प्रहार कर दिया. चोट नेकसे के कंधे पर लगी तो वह चीख कर उठा और भागने की कोशिश की. लेकिन वेदराम ने उस पर ताबड़तोड़ प्रहार कर दिए, जिस से वह वहीं पर मर गया.

नेकसे की हत्या करने के बाद वेदराम ने राहत की सांस ली, पर उस की दिमागी हालत ठीक नहीं थी. वह फावड़ा ले कर सीधे थाना सहावर पहुंचा और पुलिस को सारी बात बता दी. थानाप्रभारी रफत मजीद वेदराम से पूछताछ कर के उसे उस जगह ले गए, जहां उस ने नेकसे की हत्या की थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

पुलिस ने वेदराम के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. थानाप्रभारी रफत मजीद केस की तफ्तीश कर रहे थे.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित, Crime Story In Hindi

Hindi Story: प्यार ऐसे तो नहीं हासिल होता

Hindi Story: 18 अक्तूबर, 2016 की सुबह साढ़े 5 बजे के करीब पुणे शहर की केतन हाइट्स सोसायटी की इमारत के नीचे एक्टिवा सवार एक महिला और एक आदमी के बीच कहासुनी होते देख उधर से गुजर रहे लोग ठिठक गए थे. औरत से कहासुनी करने वाले आदमी की आवाज धीरेधीरे तेज होती जा रही थी. लोग माजरा समझ पाते अचानक उस आदमी ने जेब से चाकू निकाला और एक्टिवा सवार औरत पर हमला कर दिया. औरत जमीन पर गिर पड़ी और बचाव के लिए चिल्लाने लगी. हमलावर के पास चाकू था, जबकि वहां खड़े लोग निहत्थे थे. फिर भी वहां खड़े लोग उस की ओर बढ़े, लेकिन वे सब उस तक पहुंच पाते, उस के पहले ही वह आदमी महिला पर ताबड़तोड़ चाकू से वार कर के उसी की स्कूटी से भाग निकला था. महिला जमीन पर पड़ी तड़प रही थी. उस की हालत देख कर किसी ने कंट्रोल रूम को फोन कर के घटना की सूचना दे दी थी. चूंकि घटनास्थल थाना अलंकार के अंतर्गत आता था, इसलिए कंट्रोल रूम ने घटना की जानकारी थाना अलंकार पुलिस को दे दी थी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर बी.जी. मिसाल ने घटना की सूचना अपने अधिकारियों को दी और खुद एआई विजय कुमार शिंदे एवं कुछ सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाश और घटनास्थल के निरीक्षण में पुलिस वालों ने देखा कि घायल महिला सलवारसूट पहने थी. उस की उम्र 30-31 साल रही होगी. उस के शरीर पर तमाम गहरे घाव थे, जिन से खून बह रहा था. पुलिस को लगा कि अभी वह जीवित है, इसलिए उसे तत्काल पुलिस वैन में डाल कर इलाज के लिए सेसून अस्पताल ले जाया गया. लेकिन अस्पताल पहुंच कर पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. इंसपेक्टर बी.जी. मिसाल अपने सहायकों के साथ घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि डीएसपी सुधीर हिरेमठ और एएसपी भी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे. फोरैंसिक टीम ने जरूरी साक्ष्य जुटा लिए तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. उस के बाद बी.जी. मिसाल को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. बी.जी. मिसाल ने सहयोगियों की मदद से घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कीं और उस के बाद अस्पताल जा पहुंचे. डाक्टरों से पता चला कि महिला के शरीर पर कुल 21 घाव थे. अधिक खून बहने की वजह से ही उस की मौत हुई थी. उन्होंने काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए रखवा दिया और थाने आ कर अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर इस मामले की जांच इंसपेक्टर (क्राइम) विजय कुमार शिंदे को सौंप दी.

विजय कुमार शिंदे ने मामले की जांच के लिए अपनी एक टीम बनाई और हत्या के इस मामले की जांच शुरू कर दी. घटनास्थल पर पुलिस को मृतका का पर्स और मोबाइल फोन मिला था. मोबाइल फोन के दोनों सिम गायब थे, इसलिए मृतका की शिनाख्त में उस से कोई मदद नहीं मिल सकी. लेकिन पर्स से उस का ड्राइविंग लाइसैंस मिल गया, जिस से उस की शिनाख्त हो गई. मृतका का नाम शुभांगी खटावकर था और वह कर्वेनगर के श्रमिक परिसर की गली नंबर-5 में रहती थी. उस के पति का नाम प्रकाश खटावकर था. इस के बाद विजय कुमार शिंदे ने लाइसैंस में लिखे पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां मृतका का पति प्रकाश खटावकर मिल गया. सिपाही ने उसे पूरी बात बताई तो वह सिपाही के साथ थाने आ गया.

विजय कुमार शिंदे ने अस्पताल ले जा कर उसे लाश दिखाई तो लाश देख कर वह खुद को संभाल नहीं सका और जोरजोर से रोने लगा. विजय कुमार शिंदे ने किसी तरह उसे चुप कराया तो उस ने एकदम से कहा, ‘‘शुभांगी की हत्या किसी और ने नहीं, मेरे ही परिसर में रहने वाले विश्वास कलेकर ने की है. वह उसे एकतरफा प्रेम करता था. वह उसे राह चलते परेशान किया करता था.’  प्रकाश खटावकर के इसी बयान के आधार पर विजय कुमार शिंदे ने विश्वास कलेकर को नामजद कर के उस की तलाश शुरू कर दी. उस के घर में ताला बंद था. आसपड़ोस वालों से पूछताछ में पता चला कि घटना के बाद से ही वह दिखाई नहीं दिया था. पुलिस को प्रकाश खटावकर से उस का नागपुर का जो पता मिला था, जांच करने पर वह फरजी पाया गया था. इस के बाद उस की तलाश के लिए पुलिस की 2 टीमें बनाई गईं. एक टीम नागपुर भेजी गई तो दूसरी टीम वहां जहां वह रहता और काम करता था. पुलिस ने वहां के लोगों से उस के बारे में पूछताछ की.

दूसरी टीम द्वारा पूछताछ में पता चला कि विश्वास नागपुर का नहीं, बल्कि कोल्हापुर का रहने वाला था. वहां के थाना राजारामपुरी में उस के खिलाफ हत्या का एक मुकदमा दर्ज हुआ था, जिस में वह साल भर पहले बरी हो चुका था. बरी होने के बाद ही वह पुणे आ गया था. इंसपेक्टर विजय कुमार शिंदे के लिए यह जानकारी काफी महत्त्वपूर्ण थी. कोल्हापुर जा कर वह थाना राजारामपुरी पुलिस की मदद से विश्वास को गिरफ्तार कर पुणे ले आए और उसे अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया. थाने में अधिकारियों की उपस्थिति में विश्वास कलेकर से शुभांगी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू ही हुई थी कि वह फर्श पर गिर कर छटपटाने लगा. उस के मुंह से झाग भी निकल रहा था. अचानक उस का शरीर अकड़ सा गया. पूछताछ कर रहे सारे पुलिस वाले घबरा गए. उन्हें लगा कि पूछताछ से बचने के लिए विश्वास ने जहर खा लिया है. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया.

डाक्टरों ने उसे चैक कर के बताया कि इस ने जहर नहीं खाया है, बल्कि इसे मिर्गी का दौरा पड़ा है. यह जान कर पुलिस अधिकारियों की जान में जान आई. इलाज के बाद विश्वास को थाने ला कर पूछताछ की जाने लगी तो उस से सख्ती के बजाय मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में एकतरफा प्रेम में शुभांगी की हत्या करने की उस ने जो कहानी बताई, वह कुछ इस प्रकार से थी—

शुभांगी महाराष्ट्र के नागपुर के रहने वाले प्रकाश मधुकर खटावकर की पत्नी थी. जिस समय शुभांगी की शादी प्रकाश से हुई थी, उस समय वह बीकौम कर रहा था. शुभांगी जैसी सुंदर, संस्कारी और समझदार पत्नी पा कर वह बहुत खुश था. पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ दिनों तक वह गांव में पिता मधुकर खटावकर के साथ खेती के कामों में उन की मदद करता रहा. खेती की कमाई से किसी तरह परिवार का खर्च तो चल जाता था, पर भविष्य के लिए कुछ नहीं बच पाता था. ऐसे में जब प्रकाश और शुभांगी को एक बच्चा हो गया तो उस के भविष्य को ले कर उन्हें चिंता हुई. दोनों ने इस बारे में गहराई से विचार किया तो उन्हें लगा कि बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें गांव छोड़ कर शहर जाना चाहिए.

इस के बाद प्रकाश और शुभांगी घर वालों से इजाजत ले कर पहले मुंबई, उस के बाद पुणे जा कर स्थाई रूप से बस गए थे. पुणे के जेल रोड पर किराए का मकान ले कर उन्होंने रोजीरोटी की शुरुआत की. प्रकाश को एक प्राइवेट कोऔपरेटिव बैंक में नौकरी मिल गई थी तो पति की मदद के लिए शुभांगी कुछ घरों में खाना बनाने का काम करने लगी थी. इस काम से शुभांगी को अच्छे पैसे मिल जाते थे. इस के अलावा वह घर से भी टिफिन तैयार कर के सप्लाई करती थी. इस तरह कुछ ही दिनों में उन की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई. शुभांगी के पास पैसा आया तो इस का असर उस के रहनसहन पर तो पड़ा ही, उस के शरीर और बातव्यवहार पर भी पड़ा. अब वह पहले से ज्यादा खूबसूरत लगने लगी थी.

जल्दी ही शुभांगी और प्रकाश ने कर्वेनगर के श्रमिक परिसर की गली नंबर-5 में अपना खुद का मकान खरीद लिया था. बच्चे का भी उन्होंने एक बढि़या अंगरेजी स्कूल में दाखिला करा दिया था. शुभांगी को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी और उस के पास समय कम होता था. उस की भागदौड़ को देखते हुए प्रकाश ने इस के लिए स्कूटी खरीद दी थी. शुभांगी घर और बाहर के सारे काम कुशलता से निपटा रही थी. इस के अलावा वह अपने शरीर का भी पूरा खयाल रखती थी. बनसंवर कर वह स्कूटी से निकलती तो देखने वाले देखते ही रह जाते थे. उस का शरीर सांचे में ढला ऐसा लगता था कि वह कहीं से भी 13 साल के बच्चे की मां नहीं लगती थी. उस की यही खूबसूरती उस के लिए खतरा बन गई.

शुभांगी जिस परिसर में रहती थी, उसी परिसर में 40 साल का विश्वास कलेकर भी एक साल पहले कोल्हापुर से आ कर रहने लगा था. रोजीरोटी के लिए वह वड़ापाव का ठेला लगाता था. एक ही परिसर में रहने की वजह से अकसर उस की नजर शुभांगी पर पड़ जाती थी. खूबसूरत शुभांगी उसे ऐसी भायी कि वह उस का दीवाना बन गया. इस की एक वजह यह थी कि उस की शादी नहीं हुई थी. शायद मिर्गी की बीमारी की वजह से वह कुंवारा ही रह गया था. और जब उसे घर बसाने का मौका मिला तो उस में भी कामयाब नहीं हुआ. जिस लड़की से वह प्यार करता था, उस की हत्या हो गई थी. उस की हत्या का आरोप भी उसी पर लगा था, लेकिन अदालत से वह बरी हो गया था. बरी होने के बाद वह पुणे आ गया था और उसे शुभांगी से प्यार हुआ तो वह हाथ धो कर उस के पीछे पड़ गया. शुभांगी तक पहुंचने के लिए पहले उस ने उस के पति प्रकाश से यह बता कर दोस्ती कर ली कि वह भी उस के गांव के पास का रहने वाला है. इस के बाद जल्दी ही वह शुभांगी के परिवार में घुलमिल गया. शुभांगी के घर आनेजाने में ही उस ने शुभांगी से यह कह कर अपना टिफिन भी लगवा लिया कि दिन भर काम कर के वह इस तरह थक जाता है कि रात को उसे अपना खाना बनाने में काफी तकलीफ होती थी. शुभांगी को भला इस में क्या ऐतराज होता, उस का तो यह धंधा ही था. वह उस का भी टिफिन बना कर पहुंचाने लगी.

समय अपनी गति से सरकता रहा. शुभांगी विश्वास का टिफिन देने आती तो इसी बहाने वह उसे एक नजर देख लेता, साथ ही उसे प्रभावित करने के लिए उस के बनाए खाने की खूब तारीफ भी करता. अपनी तारीफ सुन कर शुभांगी कुछ कहने के बजाय सिर्फ हंस कर रह जाती. इस से विश्वास को लगने लगा कि वह उस के मन की बात जान गई है. शायद इसी का परिणाम था कि एक दिन उस ने अपने मन की बात शुभांगी से कह दी. उस की बातें सुन कर शुभांगी सन्न रह गई. वह संस्कारी और समझदार महिला थी, इसलिए नाराज होने के बजाय उस ने उसे समझाया, ‘‘मैं शादीशुदा ही नहीं, एक बच्चे की मां भी हूं. मेरा अच्छा सा पति है, जिस के साथ मैं खुश हूं. तुम हमारे गांव के पास के हो, इसलिए हम सब तुम्हारी इज्जत करते हैं. तुम अपने मन में कोई ऐसा भ्रम मत पालो, जो आगे चल कर तुम्हें तकलीफ दे.’’ लेकिन शुभांगी के लिए पागल हुए विश्वास पर शुभांगी के समझाने का कोई असर नहीं हुआ. उस ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘शुभांगी, तुम्हारी वजह से मेरी रातों की नींद और दिन का चैन लुट गया है. हर घड़ी तुम मेरी आंखों के सामने रहती हो. मुझे तुम से सचमुच प्यार हो गया है. तुम पति और बच्चे को छोड़ कर मेरे पास आ जाओ. मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा. तुम्हें कोई काम नहीं करने दूंगा.’’

विश्वास कलेकर की इन बातों से शुभांगी का धैर्य जवाब दे गया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें इतना समझाया, फिर भी तुम्हारी समझ में नहीं आया. अगर फिर कभी इस तरह की बातें कीं तो ठीक नहीं होगा. मैं तुम्हारी शिकायत प्रकाश से कर दूंगी. जरूरत पड़ी तो पुलिस से भी कर दूंगी.’’ शुभांगी की इस धमकी से कुछ दिनों तक तो विश्वास शांत रहा. लेकिन एक दिन मौका मिलने पर वह शुभांगी के सामने आ कर खड़ा हो गया और पहले की ही तरह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘शुभांगी, तुम मेरे साथ चलो. मैं तुम्हें जान से भी ज्यादा प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना मैं जिंदा नहीं रह सकता.’’

शुभांगी ने नाराज हो कर उसे खरीखोटी तो सुनाई ही, उस की इस हरकत की शिकायत प्रकाश से भी कर दी. प्रकाश ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो उस की बात को समझने के बजाय वह उलटा उसे ही समझाने लगा. इस के बाद दोनों में कहासुनी हो गई.

परेशानी की बात यह थी कि इस के बाद भी विश्वास अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. अब वह शुभांगी को परेशान करने लगा. जब इस की जानकारी शुभांगी के भाई को हुई तो उस ने विश्वास की पिटाई कर के चेतावनी दी कि अगर उस ने फिर कभी शुभांगी को परेशान किया तो ठीक नहीं होगा.

शुभांगी के भाई द्वारा पिटाई करने से विश्वास इतना आहत हुआ कि उस ने अपनी इस पिटाई और अपमान का बदला लेने के लिए शुभांगी के प्रति एक खतरनाक फैसला ले लिया. उसे शुभांगी के सारे कामों और आनेजाने की पूरी जानकारी थी ही, इसलिए 18 अक्तूबर, 2016 की सुबह 5 बजे जा कर वह केतन हाइट्स सोसायटी के पास खड़े हो कर उस का इंतजार करने लगा. शुभांगी अपने समय पर वहां पहुंची तो उस की स्कूटी के सामने आ कर उस ने उसे रोक लिया. उस की इस हरकत से नाराज हो कर शुभांगी ने कहा, ‘‘यह क्या बदतमीजी है. अभी तुम्हें या हमें चोट लग जाती तो?’’

‘‘कोई बात नहीं, तुम तो जानती ही हो, आशिक मरने से नहीं डरते. अपनी मंजिल पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं.’’ विश्वास ने बेशर्मी से मुसकराते हुए कहा, ‘‘आखिर तुम मेरी बात मान क्यों नहीं लेती?’’

‘‘तुम्हारी बकवास सुनने का मेरे पास समय नहीं है, तुम मेरे सामने से हटो और मुझे काम पर जाने दो.’’

‘‘तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?’’ विश्वास ने कहा.

‘‘मुझे तुम्हारी किसी बात का जवाब नहीं देना.’’ शुभांगी ने गुस्से में कहा.

‘‘तो क्या तुम्हारा यह आखिरी फैसला है?’’ विश्वास ने पूछा.

‘‘हां…हां,’’ शुभांगी ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘हां, यह मेरा आखिरी फैसला है. तुम मुझे इस जन्म में तो क्या, अगले 7 जन्मों तक नहीं पा सकोगे.’’

शुभांगी के चेहरे पर अपने लिए नफरत और दृढ़ता देख कर विश्वास को गुस्सा आ गया. लंबी सांस लेते हुए उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें कितना समझाया कि तुम मेरी हो जाओ, लेकिन तुम ने मेरी बात नहीं मानी. अब मैं तुम्हारा 7 जन्मों तक इंतजार करूंगा.’’

कह कर विश्वास ने जेब से चाकू निकाला और ताबड़तोड़ वार कर के शुभांगी की हत्या कर दी. इस के बाद जल्दी से उस के मोबाइल फोन के दोनों सिम निकाल कर उसी की स्कूटी से भाग निकला. स्कूटी उस ने पुणे के रेलवे स्टेशन पर पार्किंग में खड़ी कर दी और ट्रेन से कोल्हापुर चला गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद विजय कुमार शिंदे ने उस के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस तरह एकतरफा प्यार करने वाला विश्वास अपनी सही जगह पर पहुंच गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शादी का झांसा देकर ठगी

31 मई, 2017 की दोपहर को जब सर्किल इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह एसपी अंशुमान भोमिया से मिलने पहुंचे तो उन के मन में उथलपुथल मची हुई थी. इस की वजह भी वाजिब थी, क्योंकि एसपी साहब आमतौर पर लंच ब्रेक के समय अपने मातहतों को तलब नहीं करते थे. जबकि उन्होंने श्रीचंद सिंह को तत्काल बुलाया था. बहरहाल, इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह सैल्यूट कर के एसपी साहब के सामने जा खड़े हुए.

‘‘तुम्हारे लिए एक खबर है, जो मध्य प्रदेश पुलिस से मिली है.’’ अंशुमान भोमिया ने इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह की ओर देखते हुए कहा, ‘‘उज्जैन और इंदौर में एक गिरोह सक्रिय है, जो शादी कराने के नाम पर लूटखसोट करता है. इस गिरेह ने कोटा में भी पांव पसार लिए हैं.’’

‘‘कोई लीड मिली है सर?’’ श्रीचंद सिंह ने पूछा तो श्री भोमिया ने कहा, ‘‘लीड नहीं, पूरी खबर है. रिद्धिसिद्धिनगर में रहने वाले कारोबारी बसंतीलाल जैन इस गिरोह के हाथों ठगे गए हैं. उन के साथ जबरदस्त धोखा हुआ है, जिस से पूरा परिवार सदमे में है. उन का पैसा भी गया और समाज में खासी बदनामी भी हुई. वे लोग कल तुम से मिलेंगे. इस मामले की जांच मैं तुम्हें सौंपता हूं. अपनी एक विश्वस्त टीम तैयार करो और लग जाओ काम पर.’’

‘‘ठीक है सर, मैं संभाल लूंगा.’’ कह कर श्रीचंद सिंह ने सैल्यूट किया और एसपी साहब के औफिस से बाहर आ गए.

अगले दिन यानी 1 जून को बसंतीलाल जैन अपने बेटों सुशील जैन और मनोज जैन के साथ थाना कुन्हाड़ी आ कर थानाप्रभारी इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह से मिले. इस से पहले कि बसंतीलाल अपना परिचय देते, पहचान लेने के अंदाज में उन्होंने उन्हें बैठने को कहा तो बसंतीलाल ने उन्हें कृतज्ञता की दृष्टि से देखा. बैठते ही उन्होंने श्रीचंद सिंह को अपने बेटों का परिचय दिया. उस के बाद मनोज के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘सर, यह मेरा छोटा बेटा मनोज है. इसी की शादी में हम धोखे का शिकार हुए हैं.’’

श्रीचंद सिंह ने हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘‘आप की पीड़ा मैं समझ रहा हूं. आप सिलसिलेवार सब कुछ बताइए कि आप के साथ कैसे और क्या हुआ? आप इत्मीनान रखिए, हम बदमाशों को पकड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.’’

बसंतीलाल के चेहरे पर राहत के भाव आए और मुरझाए चेहरे पर क्षीण सी मुसकान तैर गई. बसंतीलाल ने एक पल के लिए बड़े बेटे सुशील की तरफ देखा. उस के चेहरे पर सहमति के भाव नजर आए तो उन्होंने आश्वस्त हो कर अपनी नादानी और शादी के बहाने धोखाधड़ी करने वालों के कमीनेपन की कहानी सुनानी शुरू कर दी.

‘‘बड़े खुराफाती लोगों से वास्ता पड़ा आप का तो…’’ करीब एक घंटे तक बसंतीलाल जैन की आपबीती सुनने के बाद इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह ने हैरानी जताते हुए कहा, ‘‘वारदात का पता आप को अप्रैल में चला और आप पुलिस के पास अब पहुंच रहे हैं 2 महीने बाद?’’

‘‘अब क्या कहूं सर? अपनी जिल्लत और अंधविश्वास की गाथा किसी को सुनाने का हौसला नहीं कर पा रहा था.’’ बसंतीलाल ने कहा, ‘‘बदमाशों का असली चेहरा तो अप्रैल में फेसबुक देखने से ही उजागर हुआ. उसी से उन की करतूतों का पता चला. शादी में 5 लाख रुपए नकद और 15 लाख के जेवर हड़पने के बाद अब 30 लाख और वसूलने की फिराक में हैं. हमें धमका रहे हैं कि रुपए नहीं मिले तो घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामले में फंसा देंगे. इस के बाद तो पुलिस का ही सहारा बचा.’’

‘‘ठीक है.’’ श्रीचंद सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘आप सबइंसपेक्टर के पास जा कर एफआईआर दर्ज करवा दीजिए, उस के बाद देखते हैं.’’

कोटा के कुन्हाड़ी स्थित रिद्धिसिद्धि नगर की चंचल विहार कालोनी के रहने वाले पत्थर कारोबारी बसंतीलाल जैन के परिवार में उन की पत्नी के अलावा 2 बेटे सुशील और मनोज थे. दोनों ही बेटे पिता के पारिवारिक कारोबार  में हाथ बंटा रहे थे. बडे़ बेटे सुशील का विवाह हो चुका था. अब उन्हें छोटे बेटे मनोज की शादी की चिंता थी.

वैवाहिक रिश्तों को ले कर बसंतीलाल की भी एक ही सोच थी कि परिवार मानसम्मान वाला हो और लड़की संस्कारी. मनोज की उम्र 32 साल हो चुकी थी. अभी तक ठीकठाक रिश्ता न मिलने से बसंतीलाल काफी चिंतित थे. अच्छे रिश्ते के लिए उन्होंने अपने सभी परिचितों को कह भी रखा था. इसी साल जनवरी की शुरुआत में उन के जयपुर के एक परिचित अशोक जैन ने बसंतीलाल और उन के बेटों के बारे में उज्जैन निवासी पूनमचंद जैन को जानकारी देते हुए कहा कि काफी अच्छे लोग हैं. ऐसे परिवारों का साथ संयोग से ही मिलता है. उन्होंने उन्हें उन के बारे में बता दिया है, जल्दी ही वे लोग उन से संपर्क करेंगे.

पूनमचंद जैन और बसंतीलाल की मुलाकात इंदौर में रहने वाले संजय जैन के माध्यम से हुई थी. संजय जैन का पता अशोक जैन ने यह कहते हुए दिया था कि रिश्ते की बात वह संजय जैन के माध्यम चलाएं तो ज्यादा बेहतर रहेगा. संजय जैन पूनमचंद जैन को ले कर कोटा पहुंचे. बातचीत में अपने परिवार का ब्यौरा देते हुए पूनमचंद ने बताया कि 4 भाईबहनों में नेहा सब से बड़ी है. 2 भाई हैं पारस और महावीर तथा एक छोटी बहन है नीहारिका.’’

मनोज से नेहा के रिश्ते की बात चलाते हुए जहां पूनमचंद ने उस के रूपगुणों का भरपूर बखान किया, वहीं बसंतीलाल ने भी अपने बेटे मनोज को समझदार और सुशील स्वभाव का बताया.

पूनमचंद ने बातचीत में नेहा को देखने का भी प्रस्ताव रखा, पर बसंतीलाल फोटो देख कर ही आश्वस्त हो गए. पूनमचंद ने बातचीत में जिस तरह से जैन समाज के नियम, कर्म और समाज के विशिष्ट शख्सियतों की चर्चा की, उस से बसंतीलाल काफी प्रभावित हुए. दोनों परिवार एकमत थे, इसलिए शुभ काम में देरी का कोई मतलब नहीं था.

फलस्वरूप नेहा और मनोज की सगाई 15 जनवरी, 2017 को कर दी गई. सगाई समारोह का आयोजन कुन्हाड़ी स्थित होटल कान्हा पैलेस में किया गया. बसंतीलाल मूलरूप से खानपुर के चांदखेड़ी कस्बे के रहने वाले थे. इसलिए शादी पूरी धूमधाम के साथ बसंतीलाल के पैतृक गांव चांदखेड़ी से हुई.

शादी में कन्या पक्ष के काफी रिश्तेदर आए थे. शादी का पूरा खर्च बसंतीलाल के परिवार ने ही वहन किया, यहां तक कि उन के रहने और आवाजाही के लिए गाडि़यां भी वर पक्ष ने ही उपलब्ध कराई थीं. मनोज और नेहा के परिणय सूत्र में बंध जाने के बाद नेहा दुलहन बन कर चंचल विहार, कोटा स्थित अपनी ससुराल आ गई.

मनोज थोड़ा संकोची स्वभाव का था, जबकि नेहा दबंग किस्म की मौडर्न लड़की थी. अभी बसंतीलाल के घर वाले हंसीठिठोली के साथ मनोज को शादी की बधाइयां ही दे रहे थे कि सजीसंवरी दुलहन ने यह कह कर मनोज के होश उड़ा दिए कि उस ने व्रत ले रखा है, इसलिए जब तक वह पूरा नहीं हो जाता, तब तक वह न तो सुहाग कक्ष में आ सकता है और न उसे छू सकता है.

उस ने यह भी कहा कि यह व्रत एक विशिष्ट पूजा के साथ उज्जैन लौटने पर ही टूटेगा. शुरू में लोगों ने दुलहन के इस हठ को यह सोच कर हल्के में लिया कि वह समझानेबुझाने से मान जाएगी. लेकिन नेहा को न मानना था और न मानी. मनोज नहीं चाहता था कि शादी की शुरुआत में ही मतभेद बढ़ें और बात घर के बाहर जाए.

नतीजतन मनोज को उस की मनमानी के आगे झुकना पड़ा. बाद में नेहा उज्जैन गई तो एक महीने तक न तो उस ने अपनी कोई खैरखबर दी और न ही लौटने की मंशा जताई. मनोज की काफी मानमनुहार के आगे झुक कर वह कोटा आई भी तो केवल 2 दिनों के लिए. वह यह कह कर वापस चली गई कि उस के भाई की शादी है. इन 2 दिनों में भी नेहा ने मनोज को अपने पास नहीं फटकने दिया था.

मनोज तो नेहा की मनमानी से दुखी था ही, बसंतीलाल को भी उस का व्यवहार अटपटा लग रहा था. उन्होंने मनोज से पूछा भी कि यह कैसा समधियाना है कि बहू के भाई की शादी है और हमें खबर तक नहीं. उत्सुकतावश उन्होंने नेहा के पिता पूनमचंद से बात करने के लिए फोन किया तो उन का फोन स्विच्ड औफ मिला.

नेहा के व्यवहार से असमंजस में डूबा जैन परिवार अब क्या किया जाए, इसी उधेड़बुन में था कि तभी अचानक नेहा लौट आई तो सब ने राहत की सांस ली. लेकिन यह खुशी भी 2 दिनों से ज्यादा नहीं टिकी. उस ने यह कहते हुए सीकर जाने की रट लगा दी कि उसे वहां बहन की शादी में जाना है.

इस अजबगजब की स्थिति में उलझे बसंतीलाल के सब्र का पैमाना छलक गया. आखिर उन्होने नेहा से पूछा, ‘‘बहू, यह कैसी रिश्तेदारी है कि तुम्हारे भाई की शादी हुई, हमें बुलाना तो दूर औपचारिक खबर तक नहीं दी गई? अब तुम कह रही हो कि तुम्हारी बहन की शादी है? लेकिन तुम्हारे पिता की तरफ से हमें कोई खबर नहीं दी गई हैं. उन का फोन भी औफ आ रहा है.’’

इस सवाल का जवाब नेहा ने 2 टूक लहजे में दिया, ‘‘इतने बड़े व्यापारी हैं पापा, नहीं होगा उन के पास बात करने का समय. क्या शादी के वक्त ऐसा कोई वादा किया गया था कि पापा हर खबर आप को देंगे? मुझे सीकर जाना है तो बस जाना है.’’

बहू के इस जवाब से बुरी तरह आहत और अपमानित बसंतीलाल सिर थाम कर बैठ गए. बड़ा बेटा सुशील भी हतप्रभ रह गया. लेकिन मनोज बुरी तरह सुलग उठा. पर नेहा की गुस्से से भरी आंखों को देख वह भी विवश हो कर रह गया. नेहा सीकर जाने की जिद पूरी कर के ही मानी. उस के जाने के बाद हतप्रभ बेटे को बसंतीलाल ने यह कह कर दिलासा दी कि इस उम्र में लड़कियों का मातापिता से ज्यादा लगाव होता है. इसलिए इस बात को दिल से न लगाए, आहिस्ताआहिस्ता सब ठीक हो जाएगा.

जैसी उम्मीद थी कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा, लेकिन वैसा नहीं हुआ. अलबत्ता बसंतीलाल की उलझनें और बढ़ गईं. दरअसल, महीना भर बीतने के बाद भी जब नेहा नहीं लौटी और न ही उस ने कोई खबर दी तो आशंकित परिवार  ने उज्जैन जाना ठीक समझा. पर उज्जैन पहुंच कर उन्हें आघात तब लगा, जब पूनमचंद परिवार सहित अपने बताए पते पर नहीं मिला.

आशंकाओं में डूबतेउतराते बसंतीलाल ने जब फोन पर उन से संपर्क किया तो उन का कहना था कि वे फिलहाल अपने रिश्तेदारों के यहां आए हुए हैं. नेहा भी उन्हीं के साथ है. पूनमचंद ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि वह नेहा को ले कर जल्दी ही पहुंचेंगे.

हैरान परेशान बसंतीलाल के परिवार ने राहत की सांस ली. कुछ ही दिनों बाद नेहा कोटा पहुंच गई. लेकिन बसंतीलाल परिवार की खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रही सकी. एक पखवाड़े बाद ही नेहा ने यह कहते हुए उज्जैन जाने की रट लगा दी कि वह यहां के माहौल में ऊब गई है और कुछ दिनों के लिए चेंज चाहती है.

बसंतीलाल अच्छे कारोबारी थे तो दुनियादार भी थे. अंदेशों से घिरे बसंतीलाल ने नेहा की जिद पर यह सोच कर घुटने टेक दिए कि मनमानी पर उतारू लड़की ने कोई उलझन खड़ी कर दी तो बेमतलब की परेशानी खड़ी हो जाएगी. लेकिन पिछले 3 महीनों में नेहा की हरकतों ने उन के मन मे अंदेशों के हजार फन खड़े कर दिए थे. अपने बेटे सुशील और परिवार के शुभचिंतकों से अपनी शंका साझा करते हुए उन्होंने मशविरा मांगा कि अब उन्हें क्या करना चाहिए?

उन का शंकित होना स्वाभाविक था. सामने सवाल ही सवाल थे. टूट कर चाहने वाला शील स्वभाव पति, छोटी बहू होने के नाते परिवार का भरापूरा लाड़प्यार और मानसम्मान. इस के बावजूद नेहा ससुराल से बारबार क्यों भाग रही है? क्यों वह अपने पति को पास फटकने नहीं दे रही है? समधियाने में शादीब्याह हो रहे हैं, लेकिन उन्हें बुलाना तो दरकिनार, कोई खबर तक नहीं दी जा रही है.

रिश्ते की बात के समय स्नेह भाव उडे़लने वाले पूनमचंद जैन से सीधे मुंह बात तक करना मुश्किल हो रहा था. रिश्ते का जरिया बने अशोक जैन और संजय जैन भी बातचीत से कन्नी काट रहे थे. अशोक जैन का यह कहना उन्हें बुरी तरह आहत कर गया कि ‘भाई साहब, रिश्ता बताना मेरा काम था, ऊंचनीच और भलाबुरा आप को देखना चाहिए था. इस में मैं क्या कर सकता हूं?’

जिस समय बसंतीलाल का परिवार ऊहापोह में डूबा हुआ था, उसी समय एक विस्फोटक घटना ने उन की रहीसही उम्मीद छीन ली. बसंतीलाल जिस बहू के आने की उम्मीद गंवा चुके थे, वह एकाएक लौटी तो जरूर, लेकिन उस के चेहरे पर स्त्री सुलभ मुसकान के बजाय आक्रामक तेवर थे. अपने पिता पूनमचंद के साथ कोटा पहुंची नेहा ने जो कहा, उस ने पहले से ही हताश बंसतीलाल परिवार पर वज्रपात का काम किया.

नेहा ने गुस्से में कहा, ‘‘अब तुम सीधेसीधे 50 लाख रुपए देने की तैयारी कर लो, वरना घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना में फंसा कर तुम सभी को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दूंगी.’’

यह सुन कर मनोज तो वहीं गश खा कर गिर पड़ा. नेहा और पूनमचंद जिस अफरातफरी के साथ आए थे, वैसे ही वापस लौट गए.

बदहवास और बेहाल करने वाली इन घटनाओं के बीच सदमे में डूबे जैन परिवार के लिए उम्मीदों का सूरज भी उगा. यह इत्तफाक ही था कि 25 मई को बसंतीलाल के बड़े बेटे सुशील की पत्नी शालिनी (परिवर्तित नाम) जब नेहा के कमरे की सफाई कर रही थी तो उसे बैड के नीचे एक मोबाइल फोन पड़ा मिला. वह मोबाइल फोन नेहा का था. उस ने मोबाइल अपने पति सुशील को दे दिया. उत्सुकतावश सुशील ने उस की काल डिटेल्स खंगाली तो उस में एक ऐसा नंबर पकड़ में आया, जिस पर रोजाना सब से ज्यादा फोन किए गए थे. सुशील ने जब यह बात अपने पिता बसंतीलाल और भाई मनोज को बताईं तो उन्होंने जिज्ञासावश मैमोरी कार्ड को खंगालना शुरू किया.

फिर तो हकीकत जान कर उन की आंखें फटी रह गईं. मैमोरी कार्ड से पता चला कि नेहा का असली नाम माया उर्फ सोना ठाकुर था और किसी संजय से उस के अनैतिक संबंध थे. यह बात पता चलने के बाद जैन परिवार ने उस के नाम की फेसबुक खोजनी शुरू कर दी.

उन की मेहनत रंग लाई और नेहा उर्फ सोना ठाकुर की फेसबुक मिल गई. फेसबुक पर उस के अलगअलग लोगों के साथ उत्तेजक भावभंगिमाओं और अश्लील मुद्राओं वाले फोटोग्राफ्स थे. इस से यह पुष्टि हो गई कि नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर कालगर्ल थी और उस का पूरा गिरोह देहव्यापार में डूबा था. संजय जैन इस गिरोह का सरगना था. इस जानकारी के बाद ही बसंतीलाल एसपी अंशुमान भोमिया से मिले थे.

जांच आगे बढ़ाने और किसी भी ठोस नतीजे पर पहुंचने के लिए नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर के कोटा और उस के आसपास के संबंधों की जानकारी जरूरी थी. यह सूचना बसंतीलाल के परिवार अथवा उन के परिचितों से ही मिल सकती थी. श्रीचंद सिंह की इस थ्यौरी की ठोस वजह थी कि जो गिरोह देहव्यापार से जुड़ा है और शादी कर के लोगों को फंसाने का काम भी करता है, उस का कहीं न कहीं स्थानीय संपर्क जरूर होगा.

श्रीचंद सिंह के जेहन में एक ऐसी ही घटना और भी थी, जो नजदीकी कस्बे रामगंजमंडी में घटी थी. इस घटना में लुटेरी दुलहन ने पति की हत्या कर के उस की लाश को जमीन में गाड़ दिया था. इस वारदात को अंजाम देने में भी मध्य प्रदेश के ही किसी गिरोह का हाथ था.

रामगंजमंडी की वारदात को जेहन में रखने की वजह यह थी कि बसंतीलाल जैन ने अपने बयान में इस बात का जिक्र किया था कि रिश्ते की बातचीत के दौरान पूनमचंद ने नेहा का जो आधार कार्ड दिखाया था, वह रामगंजमंडी से बनवाया गया था.

रामगंजमंडी में श्रीचंद सिंह और उन की टीम को इस से ज्यादा कोई जानकारी नहीं मिली कि नेहा का आधार कार्ड बनवाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया था. कार्ड बनवाने वाले कौन थे, काफी कोशिश के बाद भी उन का कुछ पता नहीं चला. पुलिस टीम ने सूत्र हाथ लगने की उम्मीद में करीबी शहर बारां में भी खोजखबर ली. वहां भी कुछ  समय पहले ऐसी ही वारदात हुई थी.

इस घटना में कोतवाली पुलिस ने एक मैरिज ब्यूरो संचालक तथा 2 युवतियों समेत 4 लोगों को गिरफ्तार किया था. लेकिन इस से भी श्रीचंद सिंह को नेहा के स्थानीय संपर्क सूत्रों की कोई जानकारी नहीं मिली. 5 दिनों तक आसपास के इलाकों की जांच में पुलिस को इस से ज्यादा कुछ नहीं मिला.

अपनी अब तक की जांच का ब्यौरा श्रीचंद सिंह ने एसपी अंशुमान भोमिया को दिया. उन्होंने अपनी जांच की सभी जानकारियां भी उन से साझा कीं. उन्होंने मामले की गहन जांच के लिए मध्य प्रदेश के उज्जैन और इंदौर जाने के निर्देश दिए.

अगले दिन 6 जून को श्रीचंद सिंह अपनी टीम के साथ उज्जैन के लिए रवाना हो गए. इस बीच एसपी अंशुमान भोमिया ने इंदौर क्राइम ब्रांच के एएसपी अमरेंद्र सिंह को भी अपनी रणनीति से अवगत कराया.

उधर श्रीचंद सिंह अपनी टीम के साथ इंदौरउज्जैन के कस्बाई इलाकों में डेरा डाले हुए वहां की पुलिस की मदद से ऐसे गिरोहों की जानकारी जुटाने में लगे थे. 7 दिनों की अथक भागदौड़ के बाद आखिर नतीजा सामने आ गया. राजस्थान और मध्य प्रदेश का यह साझा औपरेशन कामयाब रहा.

8 जून को लुटेरी दुलहन नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर पुलिस की गिरफ्त में आ गई. इंदौर क्राइम ब्रांच के एएसपी अमरेंद्र सिंह के अनुसार, कोटा पुलिस से मिली सूचना के बाद नेहा को गिरफ्तार कर लिया गया. कोटा पुलिस के सीआई श्रीचंद सिंह ने इंदौर क्राइम ब्रांच के एएसपी को नेहा के उज्जैन स्थित लीला का बागीचा में छिपे होने की इत्तला दी थी.

नेहा के गिरफ्त में आते ही श्रीचंद सिंह ने एसपी भोमिया को टीम की कामयाबी की जानकारी दी. एमपी पुलिस ने आवश्यक काररवाई के बाद नेहा को कोटा पुलिस के हवाले कर दिया. उसी दिन नेहा को गिरफ्तार कर के श्रीचंद सिंह अपनी टीम के साथ कोटा आ गए.

कुन्हाड़ी थाना पुलिस ने नेहा को शनिवार 9 जून को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान पुलिस पूछताछ में नेहा ने कई चौंकाने वाले रहस्य उजागर किए. उस ने स्वीकार किया कि 11 साल पहले उस की शादी इंदौर में गोमा की फैल निवासी मुकेश ठाकुर से हुई थी. उस की एक बेटी भी थी.

लेकिन पति से झगड़े के बाद वह अलग रहने लगी. संजय ने उसे दौलत कमाने के लिए फर्जी शादी का रास्ता बताया. वह उस के साथ इस धंधे से जुड़ गई. उस ने बताया कि संजय ने उसे जैन समाज की बेटी बता कर मनोज जैन के परिवार को उस का फोटो भेजा था.

फोटो पसंद करने और रिश्ता पक्का करने के लिए वह भी पूनमचंद जैन के साथ कोटा आया था. नेहा के नाम से आधार कार्ड भी उसी ने बनवाया था, ताकि राजस्थान का परिवार उस पर विश्वास कर सके.

फर्जी मातापिता रिश्तेदार और घराती भी संजय ने तैयार किए थे. उसी ने ही फर्जी शादी की पूरी प्लानिंग की थी, साथ ही उन लोगों ने एक माह तक मनोज और उस के घर वालों की रेकी की थी. नेहा उर्फ माया उर्फ सोना ठाकुर फिलहाल न्यायिक अभिरक्षा में है.

पुलिस की एक टीम अभी भी इंदौर में पड़ाव डाले हुए है, ताकि गिरोह के सरगना संजय और उन के साथियों को गिरफ्तार किया जा सके. पुलिस ने नेहा और उस के गिरोह के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 406 के तहत मुकदमा दर्ज किया है.

बसंतीलाल जैन और उन के घर वालों का कहना है कि हमारे लाखों रुपए चले गए और मनोज का घर भी नहीं बस पाया. पूरा परिवार सदमे में है. लेकिन उन का एक ही मकसद है कि ऐसे लोग बेनकाब हों, ताकि समाज के दूसरे लोग सतर्क हो सकें.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पिता बन गया दुश्मन, ओनर किलिंग का खौफनाक किस्सा

उत्तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ की कोतवाली पट्टी का एक गांव है असुढ़ी. इसी गांव के रहने वाले भास्कर पांडेय का बेटा सौरभ प्रतापगढ़ शहर में रह कर बीकौम कर रहा था. वह जिस कालेज में पढ़ता था, उसी कालेज में गांव धनगढ़ सराय छिवलहां के रहने वाले राकेश कुमार सिंह की बेटी संजू सिंह भी बीएड कर रही थी. सौरभ और संजू आसपास के गांवों के रहने वाले थे, इसलिए दोनों में जानपहचान हो गई. दोनों की यह जानपहचान जल्दी ही दोस्ती में बदली तो दोनों अकसर मिलनेजुलने लगे. लगातार मिलने से दोनों में प्यार हो गया. धीरेधीरे उन का प्यार बढ़ता गया. फिर तो यह हाल हो गया कि जब तक दोनों एकदूसरे को देख न लेते, बातचीत न कर लेते, उन्हें चैन न मिलता.

सौरभ और संजू का यह प्यार परवान चढ़ा तो उन्होंने साथसाथ जीनेमरने की कसमें ही नहीं खाईं, बल्कि निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो, लोग कितना भी विरोध करें, वे शादी जरूर करेंगे. लेकिन यह इतना आसान नहीं था. इस की वजह यह थी कि दोनों की जाति अलगअलग थी.

सच है, प्यार न तो जाति देखता है और न ही धर्म. संजू और सौरभ के साथ भी यही हुआ था. उन के प्यार को जमाने की नजर न लगे, उन्हें किसी तरह जुदा न कर दिया जाए, यह सोच कर उन्होंने शादी करने का फैसला ही नहीं किया, बल्कि पड़ोसी जिला इलाहाबाद जा कर पानदरीबा स्थित आर्यसमाज मंदिर में वहां की रीतिरिवाज के अनुसार विवाह कर लिया. यह 1 जुलाई, 2016 की बात है.

विवाह करने के बाद संजू अपने घर आ गई थी. उस के विवाह की भनक घर के किसी भी आदमी को नहीं लग पाई थी. शादी के बाद सौरभ आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ चला गया. वहां वह पढ़ाई के साथसाथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहा था.

सौरभ के लखनऊ चले जाने के बाद संजू की उस से मोबाइल पर बातें जरूर हो रही थीं, लेकिन वह खुद को अकेली महसूस कर रही थी. उसे सौरभ की दूरी बहुत परेशान कर रही थी. संजू भी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, इसलिए सौरभ ने आगे की पढ़ाई के लिए कानपुर में उस का एमएड में रजिस्ट्रेशन करा दिया.

कानपुर आने के बाद संजू सौरभ के साथ रहने की जिद करने लगी और 18 सितंबर, 2016 को वह लखनऊ आ गई. सौरभ लखनऊ के आशियाना में रहता था. संजू उसी के साथ उस के कमरे पर रहने लगी.

आगे चल कर कोई परेशानी न हो, इस के लिए 20 सितंबर, 2016 को सौरभ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में संजू के साथ कोर्टमैरिज कर ली. इस के बाद संजू के घर वालों को सौरभ के साथ उस की शादी का पता चल गया. चूंकि सौरभ उन की जाति का नहीं था, इसलिए पूरा परिवार आगबबूला हो उठा. बेटी द्वारा लिया गया यह निर्णय किसी को स्वीकार नहीं था. खास कर संजू के पिता राकेश कुमार सिंह को.

बेटी की इस हरकत से वह काफी नाराज थे. जबकि सौरभ के घर वाले बेटे के इस प्यार के बारे में जानते तो थे ही, उन्हें संजू बहू के रूप में स्वीकार भी थी. संजू के पिता राकेश सिंह जनता इंटर कालेज उड़ैयाडीह के प्रधानाचार्य थे. ऐसे में अपनी इज्जत को ले कर वह काफी परेशान थे. किसी भी कीमत पर वह इस शादी के लिए तैयार नहीं थे.

बेटी की इस हरकत से वह काफी तनाव में रहने लगे थे. वैसे भी वह काफी उग्र स्वभाव के थे. यही कारण था कि उन के घर के अन्य लोग संजू का प्रेम विवाह चाह कर भी स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे.

संजू के लखनऊ आने के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह रहते हुए अपनी आगे की पढ़ाई कर रहे थे और भविष्य के सपनों में खोए रहते थे. उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि एक ऐसा तूफान आने वाला है, जो उन की जिंदगी को झकझोर कर रख देगा.

सौरभ और संजू के दिन अच्छी तरह से कट रहे थे. लेकिन 10 अक्तूबर, 2016 को संजू के पिता राकेश कुमार सिंह अचानक सौरभ के कमरे पर आ धमके तो उन्हें देख कर पहले तो दोनों डरे, लेकिन जब उन्होंने कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, उन्होंने उन्हें माफ कर दिया है तो दोनों को थोड़ी राहत मिली.

राकेश कुमार सिंह ने कहा, ‘‘बच्चो, तुम्हारी शादी से हमें कोई परेशानी नहीं है. जो होना था, वह हो गया है. अब हम चाहते हैं कि समाज के जो रीतिरिवाज हैं, उन का पालन किया जाए.’’

इस के बाद संजू और सौरभ को विश्वास में ले कर गांव में धूमधाम से दोनों की शादी की बात कह कर राकेश कुमार सिंह संजू को अपने साथ ले कर गांव लौट आए.

सौरभ भी खुश था कि चलो देर ही सही, उस के ससुरजी ने नाराजगी त्याग कर बेटी को और उसे अपना लिया है. लेकिन संजू के गांव जाने के बाद जब उस ने उस से बात करने की कोशिश की तो बात नहीं हो सकी. क्योंकि संजू को उस से बात नहीं करने दी जा रही थी.

संजू पर तमाम पाबंदियां लगा दी गई थीं. एक तरह से उसे बंधक बना लिया गया था. 10 अक्तूबर, से 31 अक्तूबर, 2016 तक जब संजू से बात न हो पाई तो सौरभ अपनी ससुराल जा पहुंचा. लेकिन संजू से मिलने की कौन कहे, उसे घर पर रुकने तक नहीं दिया गया. उसे दुत्कार कर भगा दिया गया.

ऐसा कई बार हुआ तो सौरभ ने पत्नी को पाने के लिए हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से गुहार लगाई. इस का नतीजा यह निकला कि 3 नवंबर, 2016 को हाईकोर्ट ने संजू को उसे सौंपने का आदेश तो दे दिया, साथ ही हाईकोर्ट में भी पेश करने को कहा. लेकिन निर्धारित तारीख पर संजू को हाईकोर्ट में पेश नहीं किया गया.

इस के बाद पट्टी कोतवाली पुलिस ने राकेश कुमार सिंह को संजू के साथ थाने बुलाया, जहां हुई पंचायत में संजू अपने पिता के साथ जाने को तैयार नहीं थी. वह बारबार अपने पति सौरभ के साथ जाने की बात कर रही थी. उस का कहना था कि उस ने सौरभ को ही अपना सब कुछ मान लिया है, अब वह मरेगी तो उसी के साथ और जिएगी भी तो उसी के साथ.

थाने में हुई पंचायत में संजू के फैसले एवं हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद राकेश कुमार सिंह पुलिस पर दबाव डलवा कर संजू को अपने साथ घर ले आए. जबकि सौरभ ने पुलिस को हाईकोर्ट का आदेश दिखाने के साथ कोर्टमैरिज का प्रमाणपत्र भी दिखाया था. लेकिन पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी थी.

30 अक्तूबर को दीपावली का त्यौहार था, जिस की वजह से कुछ नहीं हो सका. अगले दिन 31 अक्तूबर को पट्टी कोतवाली में सौरभ ने अपनी पत्नी संजू की जान का खतरा बताते हुए उस के पिता राकेश कुमार सिंह समेत 3 लोगों के खिलाफ नामजद तहरीर देते हुए न्याय की गुहार लगाई.

इस के अलावा सौरभ एसपी माधवप्रसाद वर्मा से मिला और उन्हें भी तहरीर दे कर पत्नी की जान बचाने की गुहार लगाई. एसपी ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल संजू को सौरभ के सुपुर्द कराने के निर्देश दिए, बल्कि सौरभ की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर काररवाई करने का भी आदेश दिया.

उन के आदेश का यह असर हुआ कि पट्टी कोतवाली पुलिस ने 2 नवंबर, 2016 को सौरभ की तहरीर पर राकेश कुमार सिंह, उस के छोटे भाई धीरेंद्र सिंह और छोटे बेटे शुभम के खिलाफ अपराध संख्या 376/2016 पर भादंवि की धारा 368 के तहत मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन तुरंत कोई काररवाई नहीं की.

2 नवंबर को गांव धनगढ़ के लोगों से पट्टी पुलिस को पता चला कि संजू की मौत हो गई है तो पुलिस के हाथपांव फूल गए. पुलिस तुरंत गांव पहुंची और आननफानन संजू की लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया, साथ ही अपहरण के मुकदमे में हत्या की धारा 302 जोड़ कर नामजद लोगों की तलाश शुरू कर दी.

3 नवंबर, 2016 की सुबह संजू के पिता राकेश कुमार सिंह को उड़ैयाडीह मोड़ से गिरफ्तार कर लिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला था कि संजू की मौत जहर से हुई थी. थाने ला कर राकेश कुमार सिंह से पूछताछ की गई तो उन्होंने कहा कि संजू ने उन की इज्जत से खिलवाड़ किया था, जिस की सजा जहर दे कर उस की हत्या कर के दी गई.

पूछताछ के बाद पटटी कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर राजकिशोर ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस के बाद वह संजू के चाचा धीरेंद्र सिंह तथा भाई शुभम की तलाश में लगे थे. कथा लिखे जाने तक दोनों पकड़े नहीं जा सके थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

काले इल्म का काला कारोबार, कितना खतरनाक

Crime News in Hindi: भोपाल, मध्य प्रदेश के पिपलानी इलाके में रहने वाली ममता बाई (बदला नाम) की शादी को 10 साल हो चुके थे. उस के कोई औलाद नहीं थी. एक दिन वह अखबार में छपे गारंटी व मनचाही औलाद देने का दावा करने वाले एक तांत्रिक के पास गई और उसे अपनी समस्या बताई. अगले दिन ही तांत्रिक उस के घर आया और पूजापाठ, तंत्रमंत्र का पाखंड कर के ममता से बोला, ‘‘घर में रखे जेवरों में खराबी आ गई है. उन में खतरनाक ब्रह्म राक्षस का वास हो गया है. उन्हें शुद्ध करना पड़ेगा.’’

तांत्रिक के कहने पर ममता घर में रखे सारे जेवर ले आई. जेवर देख कर तांत्रिक ने कहा, ‘‘घर में और भी जेवर रखे हैं, उन्हें भी ले आओ.’’

ममता ने बताया, ‘‘वे जेवर तो मेरी सास के हैं.’’ लेकिन तांत्रिक ने उन जेवरों को भी लाने के लिए कहा.

ममता ने सास के जेवरों का बौक्स ला कर तांत्रिक के सामने रख दिया. तांत्रिक ने जेवरों की पूजा की, जिस से कमरे में धुआं हो गया.

पूजा करने के बाद तांत्रिक ने जेवरों का बौक्स लौटाते हुए कहा, ‘‘3 दिन बाद तुम इस डब्बे को खोलना.’’

3 दिन बाद जब ममता ने जेवरों का बौक्स खोला, तो देखा कि उस में जेवर नहीं थे. वह तांत्रिक 6 लाख रुपए के जेवर ले कर चलता बना था.

मुंबई के एक तांत्रिक ने खुद को काले इल्म का जानकार बताया और एक तलाकशुदा औरत की परेशानी दूर करने के बहाने उस से रुपए ऐंठता रहा. इस के साथ ही वह उस का जिस्मानी शोषण भी करता रहा.

यही नहीं, उस तांत्रिक ने उस औरत की 2 बेटियों को भी नहीं छोड़ा. जब वे नाबालिग बेटियां पेट से हो गईं, तो वह वहां से फरार हो गया.

पुलिस ने जब उसे पकड़ा, तो पता चला कि वह करोड़ों रुपयों का मालिक है. मुंबई, सूरत और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में उस की आलीशान कोठियां हैं, जिन की कीमत करोड़ों रुपए में है.

आज के जमाने में भी लोगों का  वशीकरण व काला जादू जैसी बातों पर यकीन है. इस के चलते काले इल्म का कारोबार काफी बढ़ रहा है.

भारत के छोटेबड़े शहरों से निकलने वाले अखबारों, पत्रिकाओं और टैलीविजन में टोनाटोटका करने वाले बाबाओं के इश्तिहार सब से ज्यादा छपते हैं.

ऐसे इश्तिहारों में सौ फीसदी गारंटी, तुरंत असर, काम न होने पर पैसा वापस करने जैसी बातें कही जाती हैं. इन बातों को पढ़ कर लोग तांत्रिकों के पास दौड़ेदौड़े पहुंच जाते हैं. एक बार जो इन के पास पहुंच गया, तो समझो वह बरबाद हो गया.

बाबा समस्या दूर करने के बजाय उस की जिंदगी में नई समस्या पैदा कर देते हैं. वे पूजापाठ के नाम पर लोगों से पैसा वसूलते हैं.

समस्या का समाधान न होने पर बड़ी समस्या बता कर बड़ी पूजा यानी बड़ा खर्च बताते हैं. पूजा न करवाने पर उलटा लोगों पर असर होने का डर दिखा कर पैसा ऐंठते हैं.

ये तथाकथित बाबा अपने नाम के आगे मुल्ला, फकीर, तांत्रिक, पंडित, भक्त, उपासक, सूफी, काले इल्म के माहिर, आलिमों के आलिम, सच्चा फकीर, पहुंचे हुए तांत्रिक, खानदानी मियां जैसी बातें लिखते हैं.

इस के अलावा मुठमारन विशेषज्ञ, काली शक्ति के उपासक, बाबा सम्राट जैसी बातें लिखी होती हैं. इन्हें पढ़ कर लगता है, जैसे ये उन की डिगरियां हैं.

अब तो ये बाबा 100 परसैंट की गारंटी नहीं, बल्कि 5000-11000 परसैंट की गारंटी देते हैं. मेरे से पहले जो काम कर के दिखाएगा, उसे

51 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा. और तो और एक तांत्रिक ने तो 54 टाइम गोल्ड मैडल विजेता लिख रखा था. पता नहीं, इन्हें कौन गोल्ड मैडल बांट रहा है.

एक बाबा ने दावा किया है कि अब तक वह 76,586 केस हल कर चुका है. उस की बात पर यकीन करें, तो कह सकते हैं कि उस के पास इतने बेवकूफ पहुंच चुके हैं.

इन बाबाओं के चेले शहर या महल्ले में घूमघूम कर प्रचार करते हैं. पान की गुमटी, चाय की दुकान वगैरह जगहों पर इन बाबाओं की झठी खूबियों का बखान कर के वे लोगों को अपनी ओर करते हैं.

इन बाबाओं का टारगेट ज्यादातर ऐसे लोग होते हैं, जिन के पास खूब पैसा होता है, पर परेशान रहते हैं. जो  पति से परेशान हैं, प्यार में नाकाम हैं,  जिस लड़की की शादी नहीं हो रही है,  उन्हें अपनी बातों में ले कर वे बाबाओं तक पहुंचा देते हैं.

बाबा धीरेधीरे उसे अपने असर में लेने लगता है. इन बाबाओं की बातों के जाल में फंसा शख्स अगर इन्हें छोड़ने की कोशिश भी करता है, तो वे इतना डरा देते हैं कि उन से अलग होने की वह सोच भी नहीं सकता है.

ऐसे बाबाओं की नजर उस शख्स की जमीनजायदाद और औरतों के जिस्म पर भी होती है. अनेक बाबा तो मांबेटी के जिस्म लूटते पाए गए हैं.

काले इल्म की काट व पलट के बेताज बादशाह, बुखरी खानदान की खिदमत में 163 साल, बुजुर्गों के ताबे (काबू) में लिए हुए जिन्नात (जिन) के जरीए एक खास अमल (सिद्ध क्रिया) करता है, जिस में जीत के तमाम रास्ते खुल जाते हैं.

मेरी अमल से संगदिल से संगदिल महबूब बेपनाह मुहब्बत करने वाला बन जाएगा. आलिमों के आलिम, जिन्नात द्वारा मनचाहा काम करवाने की बात लिखी होती है. उन का दावा है कि किसी की आवाज, हाथ से लिखा परचा, पहना हुआ कपड़ा, शरीर के किसी भी हिस्से के बाल या नाखून, फोटो होने पर उस के ऊपर कोई भी काम किया जा सकता है.

कहा जाता है, बेवकूफ बनने के लिए लोग तैयार बैठे हैं. बस, उन्हें बेवकूफ बनाने वाला चाहिए. इस की वजह से काले इल्म वाले बाबाओं की काली दुकानदारी जम कर चल रही है.

शादी जो मौत बन कर आई, कौन लाया यह तबाही

Crime News in Hindi: किसी परिवार में विवाह की तैयारियां चल रही हों तो खुशियां देखते ही बनती है. लियाकत का परिवार भी ऐसी ही खुशियों से सराबोर था. क्योंकि उस ने अपने बेटे आदिल का रिश्ता न सिर्फ पक्का कर दिया था, बल्कि चंद रोज बाद वह बारात ले कर भी जाने वाला था. लियाकत उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के सहारनपुर जिले के कस्बा मिर्जापुर (Mirzapur) में परिवार के साथ रहता था. उस के पास गुजारे लायक खेती की जमीन थी. बेटे आदिल की शादी उत्तराखंड (Uttrakhand) के देहरादून (Dehradun) के थाना विकासनगर (Vikas Nagar) के गांव कुंजाग्रांट की हिना से तय हुई थी.

14 मार्च, 2017 को उन के निकाह की तारीख भी तय कर दी गई थी. 19 फरवरी को हिना के लिए शादी का जोड़ा भी जाना था. इन खुशियों से हर कोई खुश था, लेकिन खुशियां किसी की मोहताज नहीं होतीं. वक्त कब कौन सी करवट ले ले, इस बात को कोई नहीं जानता. दुलहन के जोड़ा खुलने की रश्म पूरी हो पाती उस से पहले ही लियाकत का परिवार एक नाउम्मीद मुसीबत में फंस गया.

18 फरवरी की शाम आदिल अचानक लापता हो गया. वह शाम को घर से कुछ देर में आने की बात कह कर गया था, लेकिन वापस नहीं आ सका. उस का मोबाइल फोन भी स्विच औफ आ रहा था. वह इस तरह अचानक कहां लापता हो गया, यह बात किसी की समझ में नहीं आ रहा थी.

घर वालों ने अपने स्तर से उसे बहुत खोजा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. थकहार कर उन्होंने इस की सूचना थाना मिर्जापुर को दे दी. थानाप्रभारी पंकज त्यागी ने उस के बारे में पूरी जानकारी ले कर पूछा, ‘‘किसी से कोई झगड़ा या रंजिश तो नहीं थी?’’

‘‘नहीं साहब, हम सीधेसादे लोग हैं. आदिल का स्वभाव भी ऐसा नहीं था.’’ जवाब में लियाकत ने कहा.

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस लड़की से तुम आदिल की शादी कर रहे हो, वह लड़की उसे पसंद न हो.’’ थानाप्रभारी ने अगला सवाल किया.

‘‘बिलकुल नहीं साहब. उस ने ऐसा कभी जाहिर नहीं किया. वह तो बहुत खुश था. वह खुद भी शादी का जोड़ा खुलने की रस्म की तैयारियों में लगा था.’’ लियाकत ने कहा.

‘‘फिर तुम लोगों को क्या लगता है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, लगता है, हमारे बेटे का अपहरण किया गया है.’’ लियाकत ने आशंका जताई.

‘‘यह अंदाजा किस बात से लगाया?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, हमें कुछ लोगों ने बताया है कि आदिल को 2 लोगों के साथ मोटरसाइकिल पर जाते देखा गया है.’’

‘‘कौन थे वे लोग?’’

‘‘यह पता नहीं साहब.’’ लियाकत ने कहा.

आदिल के दोस्तों आदि के बारे में जानकारी ले कर थानाप्रभारी ने लियाकत को जरूरी काररवाई का आश्वासन दे कर घर भेज दिया.

लियाकत की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए आदिल का अपहरण करता. जांच में पता चला कि आदिल जिस मोटरसाइकिल पर गया था, उस पर स्पोर्ट्स लिखा था. गांव वालों से पूछा गया तो लोगों ने बताया कि पूरे गांव में किसी के पास ऐसी मोटरसाइकिल नहीं है.

आदिल के लापता होने से लोगों में आक्रोश बढ़ने लगा था. एसएसपी लव कुमार को इस की जानकारी हुई तो उन्होंने केस के खुलासे के लिए अपराध शाखा की टीम को भी थाना पुलिस के साथ लगा दिया.

पुलिस ने आदिल के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन हासिल कर ली थी. उस की अंतिम लोकेशन नजदीकी गांव सोफीपुर की पाई गई थी. इस के बाद उस का मोबाइल औन नहीं हुआ था.

आदिल की काल डिटेल्स में कोई संदिग्ध नंबर नहीं मिला था. पुलिस अभी माथापच्ची कर ही रही थी कि सी ने बताया कि स्पोर्ट्स लिखी मोटरसाइकिल गांव के एक व्यक्ति के रिश्तेदार अफरोज की थी, जो देहरादून के पास स्थित गांव कुंजाग्रांट में रहता था. वह गांव आताजाता भी रहता था. कुंजाग्रांट की ही हिना से आदिल की शादी होने वाली थी.

अब पुलिस को यह मामला प्रेमप्रसंग से जुड़ा लगने लगा. पुलिस ने किसी तरह अफरोज का मोबाइल नंबर हासिल कर के काल डिटेल्स निकलवा ली. जिस दिन आदिल लापता हुआ था, उस दिन अफरोज की 2 नंबरों पर बातें हुई थीं. खास बात यह थी कि वे दोनों नंबर अफरोज के ही गांव के शाकिर और मारुफ के थे. इतना ही नहीं, उन की लोकेशन भी उस शाम मिर्जापुर गांव की पाई गई.

सुराग और सबूत पुख्ता होते ही अगले दिन यानी 20 फरवरी, 2017 को एक पुलिस टीम कुंजा ग्रांट के लिए रवाना हो गई और अफरोज, शाकिर तथा मारुफ को शक के आधार पर हिरासत में ले कर थाने आ गई. उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि 18 फरवरी को वे मिर्जापुर आए ही नहीं थे.

पुलिस के पास उन के फोन नंबरों की लोकेशन और डिटेल्स थी. इस से साफ था कि वे झूठ बोल रहे थे. पुलिस ने सख्त रुख अख्तियार किया तो अफरोज टूट गया. उस ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिस हैरान रह गई. क्योंकि वे तीनों आदिल के खून से अपने हाथ रंग चुके थे.

तीनों ने आदिल की हत्या कर के उस के शव को सफीपुरा गांव के जंगल के एक गड्ढे में छिपा दिया था. पुलिस ने उन की निशानदेही पर आदिल का शव बरामद कर लिया. उस के सिर व चेहरे पर घावों के निशान थे. शव के नजदीक ही खून से सने पत्थर पड़े थे. पुलिस ने बतौर सबूत उन्हें कब्जे में ले लिया.

आदिल की मौत की खबर से उस के घर में कोहराम मच गया. पुलिस ने उस के शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया, साथ ही तीनों आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302, 201 व 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस ने हत्यारोपियों से विस्तार से पूछताछ की तो एक ऐसे प्रेमी की कहानी निकल कर सामने आई, जो नहीं चाहता था कि उस की प्रेमिका किसी और के नाम का शादी का जोड़ा पहने. उस की प्रेमिका भी मौत के इस षडयंत्र में शामिल थी.

करीब 2 साल पहले अफरोज और हिना की आंखें चार हुईं तो दोनों एकदूसरे के दिल में उतर गए. दोनों ने प्यार के खुशनुमा सफर की शुरुआत कर दी और किसी को खबर भी नहीं लगी. जब कोई इंसान किसी को प्यार करे तो उस के लिए ढेरों सुनहरे ख्वाब सजाता है. उन्होंने भी ख्वाबों का एक महल बना लिया था.

जवानी के जोश में दोनों ने मर्यादा की दीवार भी गिरा दी और हमेशा एक होने का फैसला भी कर लिया. दोनों ही अक्सर एकदूसरे का हमसफर होने की कसमें खाते थे. एक दिन दोनों मिले तो अफरोज ने हिना से पूछा, ‘‘हिना यह बताओ कि तुम कभी मेरा सथ तो नहीं छोड़ दोगी?’’

‘‘कैसी बात करते हो अफरोज, तुम तो मेरी सांसों में बसे हो. मैं कभी बुरे ख्वाबों में भी ऐसा नहीं सोच सकती. एक दिन मुझे पूरी तरह तुम्हारी होना है.’’ हिना ने कहा.

‘‘लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे डर लगता है कि वक्त आने पर तुम बदल न जाओ.’’ अफरोज ने कहा.

‘‘ऐसा कभी नहीं होगा. मैं तुम से सच्चा प्यार करती हूं.’’ हिना ने उस की आंखों में हसरतों से देखते हुए जवाब दिया तो अफरोज बेहद खुश हुआ.

जनवरी, 2017 में हिना का रिश्ता सहारनपुर के कस्बा मिर्जापुर के आदिल के साथ तय हो गया. घर वालों से वह इस रिश्ते का विरोध करने का साहस नहीं कर सकी. उस की मरजी के खिलाफ रिश्ता तो पक्का हो गया, पर वह दिल से इस रिश्ते के लिए खुश नहीं थी.

रिश्ता तय होने पर हिना और अफरोज दोनों ही परेशान थे. अब अफरोज को अपने ख्वाब टूटते नजर आने लगे. वह परेशान रहने लगा. हिना के घर वालों के सामने हकीकत बयां करने की हिम्मत उस में भी नहीं थी. बावजूद इस के वह किसी भी सूरत में हिना को खोना नहीं चाहता था. इस मुद्दे पर एक दिन उस ने हिना से बात की, ‘‘यह सब क्या हो गया हिना? हम दोनों ने तो साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं.’’

‘‘मैं खुद भी परेशान हूं अफरोज. समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं?’’ हिना बोली, ‘‘कुछ तो करना ही पड़ेगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे दिल में अपने मंगेतर के लिए जगह बन गई हो?’’ अफरोज ने मायूसी के साथ कहा.

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो, क्या तुम मेरे प्यार का इम्तिहान ले रहे हो?’’ हिना ने नाराजगी जाहिर की.

उधर रिश्ता तय हो जाने पर आदिल हिना के ख्वाब देखने लगा था. वह बेहद खुश था और अक्सर हिना से फोन पर बातें किया करता था. हिना के दिल में अफरोज की तसवीर थी. वह नाखुशी से आदिल से बात करती थी. उस ने आदिल को जरा भी शक नहीं होने दिया था कि वह उस के बजाय किसी और से प्यार करती है.

जैसे जैसे समय बीत रहा था, अफरोज और हिना की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. अफरोज के कई दिन इसी उधेड़बुन में बीत गए कि वह इस रिश्ते को कैसे तुड़वाए. उसे सीधा कोई रास्ता नजर नहीं आया तो मन ही मन उस ने खतरनाक निर्णय ले लिया.

एक दिन उस ने अपने दिल की बात हिना से भी जाहिर कर दी, ‘‘हिना मैं ने सोच लिया है कि अब क्या करना है?’’

‘‘क्या?’’ वह चौंकी.

‘‘मैं आदिल को रास्ते से हटा दूंगा.’’

‘‘इस में खतरा हो सकता है?’’ हिना ने आशंका जाहिर की.

‘‘ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं काम पूरी प्लानिंग से करूंगा.’’ अफरोज ने आत्मविश्वास से कहा.

हिना इस कदर बहक चुकी थी कि उसे अंदाजा भी नहीं था कि किस खतरनाक षडयंत्र का हिस्सा बन रही है और बाद में उसे इस की क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है. शायद इसी वजह से एक दिन उस ने अफरोज से कहा, ‘‘अफरोज, मुझे नहीं लगता कि अब हम कभी एक हो पाएंगे.’’

‘‘क्यों?’’ अफरोज ने पूछा.

‘‘देखो, चंद दिनों बाद 20 तारीख को मेरी  शादी का जोड़ा खुलने की रश्म होने जा रही है.’’ हिना मायूस हो कर बोली.

यह सुन कर अफरोज आगबबूला हो गया. उस ने तिलमिला कर कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं जल्दी ही कुछ करता हूं. मेरा तुम से वादा है कि मैं तुम्हें किसी और के नाम का शादी का जोड़ा नहीं पहनने दूंगा.’’

अफरोज आदिल को रास्ते से हटाने का फैसला तो कर चुका था, लेकिन यह काम उस के अकेले के वश का नहीं था. गांव में ही उस के रिश्ते का मामा शाकिर और दोस्त मारुफ रहते थे. उस ने उन दोनों को अपना इरादा बता कर उन से आदिल को रास्ते से हटाने में मदद मांगी. वे उस का साथ देने को तैयार हो गए.

अफरोज की आदिल के गांव में रिश्तेदारी थी. वह वहां अपनी मोटरसाइकिल से आताजाता रहता था. इस नाते उस की आदिल से भी अच्छी जानपहचान थी. कई बार ऐसा भी हुआ था कि दोनों ने साथ बैठ कर शराब भी पी थी. फरवरी के दूसरे सप्ताह में वह मिर्जापुर गया तो रास्ते में उस की मुलाकात आदिल से हो गई. वह उस से काफी खुशमिजाज अंदाज में मिला, ‘‘मुबारक हो आदिल भाई, तुम्हारा निकाह हमारे ही गांव में होने जा रहा है.’’

‘‘शुक्रिया भाईजान.’’ आदिल मुसकरा दिया.

‘‘चलो अच्छा है इस बहाने मुलाकात होती रहेगी. किसी दिन फुरसत में आऊंगा तो साथ बैठ कर दावत करेंगे.’’ अफरोज ने कहा तो वह खुश हो गया.

यह अफरोज की योजना का एक हिस्सा था. वह नहीं चाहता था कि अचानक साथ बैठने में आदिल उस पर शक करे. योजना के मुताबिक 18 फरवरी की शाम ढले अफरोज शाकिर और मारुफ अलगअलग मोटरसाइकिलों से मिर्जापुर पहुंच गए. इत्तेफाक से उन्हें सड़क पर ही आदिल मिल गया. शराब की दावत के बहाने उन्होंने उसे अपने साथ ले लिया.

आदिल आसानी से उन के झांसे में आ गया. ठेके से उन्होंने शराब तथा दुकान से सोडे की बोतल आदि सामान लिया और सफीपुर गांव के जंगल में पहुंच गए. वहां सभी ने बैठ कर शराब पी. उन्होंने जानबूझ कर आदिल को ज्यादा शराब पिलाई थी. उसे पता नहीं था कि जिन्हें वह अपना दोस्त समझ रहा है, वास्तव में वे उस के दुश्मन हैं.

अधिक शराब पीने से वह नशे में हो गया. अफरोज बहाने से उठा और एक पत्थर उठा कर आदिल के सिर पर पीछे से दे मारा. अचानक हुए हमले से आदिल चीख कर  लुढ़क गया. इस के बाद बाकी ने भी उस के सिर व मुंह पर पत्थरों से प्रहार किए.

आदिल लहूलुहान हो गया. वह जिंदा न बच सके, इस के लिए उन्होंने उस का गला भी दबा दिया. कुछ ही देर में आदिल की सांसों की डोर टूट गई. जब उन्हें विश्वास हो गया कि उस की मौत हो चुकी है तो उन्होंने उस के शव को गड्डे में ठिकाने लगा दिया. उस का मोबाइल भी स्विच औफ कर के फेंक दिया.

इस के बाद तीनों देहरादून चले गए. अफरोज ने सोचा था कि उस की राह का कांटा आदिल हमेशा के लिए हट गया. मामला शांत होने के बाद वह मौका देख कर हिना के परिवार वालों से अपने रिश्ते की बात कर के अपने प्यार की दुनिया आबाद करेगा. उस की सोच थी कि वह कभी पकड़ा नहीं जाएगा.

लेकिन पुलिस के पहुंचते ही उस की यह गलतफहमी दूर हो गई. पुलिस ने पूछताछ के बाद उस की प्रेमिका हिना को भी गिरफ्तार कर लिया. अपने प्यार को पाने की गरज में अफरोज का कदम सरासर गलत था. प्यार को पाने का यह कोई तरीका नहीं था. जबकि आदिल तो हर हकीकत से पूरी तरह अंजान था. न उस का कोई गुनाह था न कोई अफरोज से सीधी रंजिश.

अफरोज के गलत निर्णय से न सिर्फ एक घर का चिराग हमेशा के लिए बुझ गया, बल्कि खुद उस का और हिना का भविष्य भी खराब हो गया. दोनों भविष्य में एक हो भी जाएं तो भी यह कसक दिलों से कहां जाएगी कि उन के हाथ किसी निर्दोष के खून से रंगे हैं.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हो सकी थी. आदिल के परिवार वाले उन्हें सख्त सजा दिलाए जाने की मांग कर रहे थे.

हिजड़ों की गुंडागीरी, हो जाएं सावधान

हिजड़ा समाज सभी जगह अपनी मनमानी करने के लिए बहुत बदनाम है. अंधश्रद्धा में डूबा हमारा समाज भी न जाने क्यों इन से इतना डरता है कि जानेअनजाने में ही इन की हर बात चुपचाप सहन कर लेता है. शायद लोगों को डर रहता है कि कहीं इन का दिया हुआ शाप लग गया, तो जिंदगी ही बरबाद हो जाएगी. यही वजह है कि हिजड़े भी इसी बात का भरपूर फायदा उठाने लगे हैं.

ये हर जगह दादागीरी करते दिखाई देते हैं. ये कभी सिगनल पर पैसा मांगते खड़े मिल जाते हैं, कभी बसों में, तो कभी ट्रेन में. कभीकभी तो ये घरों में घुस कर तीजत्योहार पर पैसा मांगने चले आते हैं.

अगर इन को न कह दिया जाए, तो ये गालीगलौज पर उतर आते हैं. रास्ते में ये उलटीसीधी व बेहूदा हरकतें करने लगते हैं और लोग डर के मारे इन की बात मान कर खिसकने में ही अपनी भलाई समझते हैं.

जवानी में तो हर तरह की दादागीरी से हर हिजड़े का काम हो जाता है, लेकिन ढलती उम्र में जिंदगी दोजख सी हो जाती है. अपने गुजारे के लिए तो इन्हें भीख मांगने तक की नौबत आ जाती है. अपने ही समाज से ये दुत्कार दिए जाते हैं. इन्हें नौजवान हिजड़ों की दया पर जीना पड़ता है.

इस के नतीजे में इन के द्वारा सैक्स, चोरी, लूटपाट, अपहरण जैसे किस्से ज्यादा बढ़ने लगे हैं.

हाल ही में भावनगर के तलाजा तालुका के सोसिया और कठवा गांव में हिजड़ों ने 2 नौजवानों को बहलाफुसला कर उन का अपहरण कर लिया. बाद में उन्हें भुज ले जा कर प्राइवेट अस्पताल में हिजड़ा बना दिया.

पूरे भावनगर इलाके में चर्चा का मुद्दा बनी इस वारदात में सोसिया गांव के 18 साला लालजी बाबूभाई वेगड और कठवा गांव के 18 साला मुकेश भगवानभाई सरवैया को रामदेवपीर व्याख्यान मंडल के सदस्य जतीन चीथरभाई गोहिल ने रामदेवपीर के आख्यान के बहाने भुज चलने को कहा. साथ में भावनगर से फिरोज और कड़ला नाम के 2 और हिजड़ों को भी ले लिया.

भुज ले जा कर उन्हें कैद में रखा. वहां से सानिया नाम के एक दूसरे हिजड़े की मदद से किसी प्राइवेट अस्पताल में डाक्टर से उन को हिजड़ा बनवा दिया. बाद में जोरजबरदस्ती से सौ रुपए के स्टांप पेपर पर उन दोनों से लिखवा लिया कि वे खुद अपनी मरजी से हिजड़े बने हैं.

15 दिनों तक उन की कैद में बंद दोनों नौजवान जैसेतैसे इन के चंगुल से भाग कर भावनगर लौट आए. परिवार के लोग इन दोनों को इलाज के लिए भावनगर के सर टी. अस्पताल ले कर गए, तब जा कर बात का भांड़ा फूटा.

भावनगर की पुलिस गुनाहगारों को पकड़ने में नाकाम रही, तब जा कर केस भुज ट्रांसफर किया गया.

भुज पुलिस ने सानिया हिजड़े को गिरफ्तार कर लिया है. इस मामले की तहकीकात अभी चल रही है. पुलिस को इस मामले में और लोगों के भी शामिल होने का शक है. पुलिस जानना चाहती है कि इन लोगों के अंगों को कहां रखा गया है? अस्पताल और डाक्टर के बारे में भी पता लगाना बाकी है.

यह समाज में किसी भी शख्स का दिल दहला देने वाली घटना है. पुलिस की लापरवाही और ढीली कार्यवाही से ही ऐसे असामाजिक लोगों को खुली छूट मिलती है.

गुजरात में चोरी, बलात्कार, अपहरण, हत्या, गुंडागीरी के किस्से रोजाना बढ़ते जा रहे हैं. केंद्र सरकार को आड़े हाथ लेने वाले मुख्यमंत्री अपने राज्य की तरफ कब देखेंगे?

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