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Gen Z Story : जेनजी वीरा

Gen Z Story. ‘‘अरे, मैं जेनजी हूं और अपने मम्मीपापा को दिखा दूंगी कि जेनजी  जो ठान लेते हैं, वह कर के ही दम लेते हैं,’’ बुदबुदा उठी थी वीरा और सिर झुका कर अपने मोबाइल में कुछ सर्च करने लगी थी, पर इंटरनैट धीमी रफ्तार से चल रहा था, इसलिए वीरा को बारबार कोफ्त हो रही थी.

झुंझुलाते हुए वीरा ने मोबाइल अपनी जींस की पौकेट में रख लिया. अभी वह कुछ सोच ही रही थी कि उसे अपने पीछे किसी का हाथ छुता हुआ सा महसूस हुआ. तेजी से पलट पड़ी थी वीरा. उस ने देखा कि पीछे खड़ा आदमी सफेद बालों वाला अधेड़ सा था जो वीरा के पलटते ही थोड़ा सा डर गया और वहां से तेज कदमों से चल कर भागने की कोशिश करने लगा.

वीरा की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे और इस बुड्ढे की बदतमीजी पर क्या कहे? वैसे भी पिछले कुछ दिनों से वह मानासिक रूप से परेशान थी.

18 साल की वीरा लगातार अपने मांबाप से 500 रुपए हर महीने पौकेटमनी के तौर पर मांग रही थी, पर उस के मांबाप अपने टाइट बजट का हवाला दिए जा रहे थे और उसे पौकेटमनी देने से साफ मना कर रहे थे.

वीरा का कहना था कि उस के साथ पढ़ने वाली सभी लड़कियों को तो उन के मांबाप पौकेटमनी देते हैं और बदले में उन पैसों का कोई हिसाबकिताब भी नही मांगते और यही बात जब वीरा ने अपने मम्मीपापा के सामने ऊंची आवाज में कह दी तो पापा ने भी गुस्से में कह दिया कि उन के पास पैसे नहीं हैं और अगर तुम्हें ज्यादा ही पैसों की जरूरत है तो जा कर कमा लो.

बस इतनी सी बात हुई थी कि अपनेआप को जेनजी कहने वाली वीरा ने आव देखा न ताव और पैसे कमाने की बात मन में ठान ली. उस ने अपने कमरे में जा कर एक छोटे से बैग में एक जोड़ी कपड़े डाले, अपनी बचत के रखे हुए 400 रुपए अपने पर्स में डाले और घर से बाहर निकल ली.

बाहर जाते समय वीरा ने अपने मम्मीपापा को बताया भी नहीं कि वह घर छोड़ कर कहीं जा रही है और अब वह तभी लौटेगी जब ढेर सारे पैसे कमा लेगी.

वीरा ने आज अपना फेवरेट पीले रंग का टौप और डार्क ब्लू जींस पहनी थी. जब वह बाहर निकली तो उस ने एक अलग तरह की आजादी महसूस की. उस के चेहरे को हवा के एक हलके झोंके ने छुआ तो वीरा रोमांचित हो उठी.

आज इतनी कम उम्र में ही वीरा ने घर छोड़ कर पैसे कमाने का बीड़ा उठा लिया था और पैसे कमाने के लिए उस ने इंटरनैट पर नौकरी ढूंढ़नी भी शुरू कर दी थी, इसीलिए वह गोमतीनगर  की तरफ जाने वाले आटोरिकशा में बैठ गई थी, क्योंकि लखनऊ के इस हिस्से में कई औफिस और काल सैंटर थे, इसलिए इस इलाके में नौकरी मिल जाने के चांज ज्यादा थे.

स्टारटैक नाम था इस काल सैंटर का. वीरा ने पहले ही सुन रखा था कि नौजवानों को काल सैंटर में आसानी से नौकरी मिल जाती है. वह आत्मविश्वास से भरी हुई काल सैंटर के अंदर चली गई. गेट पर तैनात गार्ड ने उसे देखा जरूर पर रोका नहीं.

अंदर एक बड़ा सा हाल था जिस में कई केबिन बने हुए थे और नौजवान लड़केलड़कियां फोन पर कस्टमर्स से बातें करने में बिजी थे.

वीरा को ज्यादा कुछ समझ  नहीं आया. उस ने कुछ दूरी पर खड़ी एक मौडर्न टाइप लड़की से पूछा, ‘‘जी, मुझे  जौब चाहिए.’’

वीरा के इस सवाल के जवाब में उस लड़की ने वीरा को ऊपर से नीचे देखा और पूछा, ‘‘आप कितना पढ़ीलिखी हैं?’’

इस सवाल के जवाब में वीरा ने उसे बताया कि वह इंटरमीडिएट कर रही है. इस के बाद उस लड़की ने फिर पूछा कि क्या वह ब्रिटिश इंगलिश या अमेरिकन इंगलिश बोलना जानती है? हां सुनने पर वह दोबारा बोली, ‘‘तो अपना रिज्यूम इस आईडी पर मेल कर दीजिए,’’ और एक ईमेल आईडी बताया.

वीरा अपने होंठों को तोड़मरोड़ कर थोड़ाबहुत इंगलिश तो बोल लेती थी पर लगातार इंगलिश बोल पाना उस के बस की बात नहीं थी, इसलिए वह चुपचाप बाहर निकल आई थी. वह समझ गई थी कि काल सैंटर की नौकरी उस के बस की बात नहीं है.

वीरा सड़क के किनारे खड़ी थी और आतीजाती गाडि़यों को देख रही थी. उस के मन में कई विचार आजा रहे थे. कुछ देर बाद उसे याद आया कि उस की एक सहेली के पापा एक प्रैस में काम करते हैं. उस ने अपनी सहेली को फोन लगा कर उस के पापा के अंडर में कोई जौब दिलाने की बात कही, तो सहेली ने बताया कि प्रिंट मीडिया में कोई भी जौब यों ही नहीं मिल जाती, बल्कि उस के लिए तो बहुत पढ़ाई करनी होती है और एक खास तरह की डिगरी या डिप्लोमा भी चाहिए.

सहेली की बात सुन कर वीरा मन मसोस कर रह गई थी. उस के पास अभी तो कोई डिप्लोमा भी नहीं था और उसे अब धीरेधीरे समझ में आने गया था कि किसी भी अच्छी जौब के लिए अच्छी पढ़ाईलिखाई होनी चाहिए तभी वह पैसे कमा पाएगी.

‘‘पर उस से क्या हुआ? बड़ी नहीं तो छोटी जौब तो मिल ही सकती है मुझे, आखिर मैं एक जेनजी हूं, इतनी आसानी से हार नहीं मानूंगी,’’ अपने आप को जोश हुए वीरा बुदबुदा रही थी.

इस बीच वीरा के मोबाइल पर उस की मम्मी और पापा के कई फोन आ चुके थे, पर उस ने किसी का भी जवाब नहीं दिया था.

वीरा अब नौकरी की तलाश में ‘टेस्टी पिज्जा’ के बाहर जा पहुंची थी. वीरा का आत्मविश्वास अब भी चरम पर था. उस ने काउंटर पर बैठे मैनेजर से जौब के बारे में बात की तो उस मैनेजर ने बताया कि उन्हें पिज्जा डिलीवरी करने वाले लड़के और लड़कियों की जरूरत तो हमेशा रहती है, पर उन के पास एक मोटरसाइकिल और ड्राइविंग लाइसैंस जरूर होना चाहिए.

वीरा स्कूटी चलाना तो जानती थी, पर गियर वाली मोटरसाइकिल चलाना उसे नहीं आता था. मन मसोस कर रह गई थी वीरा. पिज्जा डिलीवरी का काम भी उसे नहीं मिल पा रहा था.

दोपहर के 2 बजे चुके थे और व्हाट्सऐप पर मां के बहुत सारे मैसेज आ रहे थे, जिन में वे वीरा की लोकेशन पूछ रही थीं, उस से घर वापस आने को कहा जा रहा था, पर वीरा तो मन में ठान चुकी थी कि उसे पैसे कमाने के लिए जौब तो हर हाल में ढूंढ़नी ही होगी, इसलिए वह ‘टेस्टी पिज्जा’ से बाहर निकल गई और सड़क के किनारे थकी हालत में टहलने लगी थी.

वीरा को प्यास लगने लगी थी, इसलिए अपने पास के पैसों से 20 रुपए की एक सौफ्ट ड्रिंक बोतल खरीदी और किनारे खड़े हो कर पीने लगी. चेहरे पर थोड़ी ताजगी सी आई.

वीरा का दिमाग और निगाहें लगातार जौब की तलाश में थे. वह चलतेचलते एक पंजाबी ढाबे के पास पहुंची. यह एक शाकाहारी ढाबा था. चारों तरफ खाने की खुशबू फैली हुई थी.

वीरा को भूख भी लग आई थी, पर उस ने भूख को सहते हुए सोचा कि यहां नौकरी पाना थोड़ा आसान हो सकता है.

वीरा ने नौकरी के लिए ढाबे के मालिक सरदारजी से बात की तो उन्होंने वीरा को ऊपर से नीचे तक घूरा और कहा, ‘‘सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक काम करने के रोजाना 100 रुपए मिलेंगे. वैसे तो हम छोटे बच्चों को नौकरी देते भी नहीं हैं, पर तुम थोड़ी अच्छी दिखती हो इसलिए 100 रुपए दे देंगे. काम करना हो तो कल से काम पर आ जाना.’’

यह पहली दफा था जब वीरा को एहसास हुआ था कि इस देश में कोई जौब कर के पैसे कमाना बहुत बहते है, पर फिर भी उस ने पूरी तरह से हिम्मत नहीं हारी थी.

मन ही मन में कुछ विचार करते हुए वीरा ने मौडलिंग वाले जौब के लिए दिए गए एक मोबाइल नंबर पर डायल किया और पता पूछ कर उन के औफिस पहुंच गई थी.

अभी तक वीरा के पास से 200 रुपए इधरउधर आनेजाने और खानेपीने में खर्च हो गए थे, पर फिर भी वीरा यह सोच कर निश्चिंत थी कि एक बार नौकरी मिल जाए, तब तो खूब सारे पैसे कमा ही लेगी.

हजरतगंज चौराहे से चिडि़याघर की तरफ चलने पर रोहतास कौम्प्लैक्स था जिस के बेसमैंट में वीरा को जाना था. इस मौडलिंग एजेंसी के औफिस में बहुत ज्यादा चहलपहल नहीं थी और थोड़ा माहौल भी अजीब सा लग रहा था.

यहां ज्यादातर लोग 40 की उम्र से ज्यादा के लग रहे थे. कुछ औरतें भी थीं जो मोटे शरीर की थीं और वीरा को अजीब नजरों से घूर रही थीं. वीरा को एक कमरे में बिठाया गया और एक महिला उस से मिलने के लिए आई और कुछ औपचारिक बातें की, मसलन उस के मांबाप और घरबार के बारे में पूछा. वीरा की पढ़ाईलिखाई के बारे में उस ने कुछ नहीं पूछा.

वीरा को लगा कि मौडलिंग में तो अच्छा कैरियर बन सकता है तो पेमेंट भी अच्छा होगा.

‘‘जी हां, 8 घंटे के हम 1,000 रुपए देते हैं, उस महिला ने बताया तो वीरा को अच्छा लगा. उस ने उत्सुकता से काम के बारे में पूछा तो महिला मुसकरा उठी और बगल वाले कमरे में चली गई.

वह महिला थोड़ी देर बाद लौटी तो उस के हाथ में लड़कियों के अंदरूनी कपड़े थे. वीरा उन्हें देख कर चौंक गई थी.

उस महिला ने वीरा को अब सबकुछ साफसाफ बता दिया था, ‘‘इन कपड़ों को पहन कर बिस्तर पर शूटिंग करनी होती है और कभीकभी इन कपड़ों के बिना भी शूट करना होता है. बिस्तर वही रहता है, बस पार्टनर बदले रहते हैं.’’

उस महिला ने जब अपने होंठों को मादक अंदाज में चबाते हुए कहा तो वीरा का दिल दहल गया था. वह समझ  गई थी कि बहुत गलत जगह आ गई थी. मौडलिंग के नाम पर तो यहां उलटेसीधे काम कराए जाते हैं.

वीरा अंदर से डर भी गई थी कि कहीं ये लोग उसे बंधक न बना लें, पर उस ने चेहरे पर आत्मविश्वास बनाए रखा.

वह महिला वहीं सामने खड़ी थी और वीरा के जवाब का इंतजार कर रही थी.

इस समय तो वीरा को भी कुछ समझ  में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस का दिल तेजी से धड़क ही रहा था कि तभी उस के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से फोन आ गया जो कि एक स्पैम काल था.

वीरा ने तुरंत ही मोबाइल पर आई कौल को अपने कान से लगा लिया और बनावटी लहजे में बात करने लगी और बात करतेकरते ही वह अपनी जगह से उठी और धीरेधीरे कदमों से बाहर की ओर जाने लगी.

वीरा ने पीछे हलका सा देखा तो पाया कि वह महिला अब भी उसे घूर रही है. वीरा के कदम अब तेजी से बाहर की तरफ बढ़ चले थे और कुछ देर बाद वीरा की जान में जान आई जब वह रोहतास कौम्प्लैक्स के बाहर निकल आई थी.

अब तक वीरा को बहुतकुछ समझ  में आ गया था, जैसे कि पैसे कमाना कोई आसान काम नहीं. हमारे देश में पार्टटाइम जौब या 20 साल से कम वाले लड़केलड़कियों के लिए जौब की गुंजाइश तो बिलकुल भी नहीं है और फिर लड़कियों के लिए कम उम्र में बाहर निकल कर पैसे कमाना तो और भी मुश्किल हो जाता है. बेहतर तो यह है कि पहले अच्छी तरह से पढ़ाई की जाए और उस के बाद किसी प्रतियोगी परीक्षा को पास कर के ही अच्छी नौकरी मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है.

वीरा की समझ  में अब तक ये सारी बातें आ चुकी थीं. वीरा के मोबाइल में मम्मी और पापा की कई मिस काल्स थीं.

वीरा ने कांपते हाथों से पापा का नंबर मिला दिया. उधर से पापा ने तुरंत ही फोन उठा लिया.

‘‘कहां हो वीरा?’’ पापा के स्वर में चिंता थी.

‘‘भटक गई थी पापा, अब सही रास्ता मिल गया है. थोड़ी देर में घर पहुंच जाऊंगी,’’ वीरा ने भरे गले से जवाब दिया.

शाम ढल चुकी थी. वीरा घर के दरवाजे के सामने पहुंची और दरवाजे की घंटी बजाई. दरवाजा पापा ने खोला. उन की नजर वीरा पर थी.

वीरा का मन किया कि वह पापा से जा कर लिपट जाए, पर झिझक क के मारे वह ऐसा नहीं कर सकी.

पापा ने भी कुछ नहीं कहा. वे एक ओर हट गए थे. पीछे मां खड़ी थीं. उन्होंने वीरा को गले लगा लिया. कोई किसी से कुछ कह नहीं पा रहा था. घर में केवल कुछ सिसकियों के अलावा कोई आवाज नहीं थी.

अगली सुबह पापा औफिस के लिए तैयार हो रहे थे तो वीरा ने उन्हें ‘सौरी’ बोला.

‘‘नहीं वीरा, सौरी फील करने की कोई जरूरत नही है. तुम भी अब बड़ी हो गई हो. तुम्हारे भी तो कुछ खर्चे हैं, इसलिए हम लोगों ने सोचा है कि हम हर महीने तुम्हें 500 रुपए पौकेटमनी  के तौर पर देंगे,’’ पापा ने वीरा के सिर पर हाथ फेरा.

पर वीरा ने पापा से कहा, ‘‘मुझे पौकेटमनी के नाम पर पैसे नहीं चाहिए, क्योंकि पैसे खर्च करना तो आसान है पर पैसे कमाना बहुत मुश्किल है, इसलिए मैं अब पैसे सिर्फ जरूरत पड़ने पर खर्च करूंगी और खर्च से ज्यादा पैसों का हिसाब भी  रखूंगी. आखिर मैं जेनजी हूं और जेनजी हर काम को और लोगों से बेहतर ढंग से कर सकते हैं.’’

वीरा अब मन लगा कर आगे पढ़ाई कर रही है. वह पैसे खर्च भी करती है और संभाल कर भी रखती है. अब उसे पैसे कमाने की जल्दी भी नहीं है. उस की पढ़ाई की मेज पर बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है ‘पहले अच्छी पढ़ाई और फिर कमाई’.Gen Z Story

Youth Guidance : सच्ची सलाह – शिक्षा और रोजगार से जुड़े आपके सवाल

Youth Guidance: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 25 साल की हूं और उत्तर प्रदेश के एक गांव में रहती हूं. मुझे अभी शादी नहीं करनी है, क्योंकि मैं कोई बड़ा कैरियरकर के अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं, पर मेरे परिवार वाले खासकर मेरी मां नहीं चाहती हैं कि मैं कोई काम करूं. उन के मन में यह बात घुसी हुई है कि लड़की अगर घर से बाहर जाएगी तो बिगड़ जाएगी. वे मेरी हर उस बात को काट देती हैं, जिस में मेरे कमाने का कोई प्लान होता है.

मेरा छोटा भाई मेरे हक में रहता है और चाहता है कि मैं काम करूं, पर घर में सब से छोटा होने की वजह से उस की कोई नहीं सुनता है. इस बात से मुझे तनाव रहने लगा है. मैं क्या करूं?

जवाब : दरअसल, आप की परेशानी अपनी जिंदगी के बारे में अपनी मरजी और भविष्य के लिहाज से सख्ती से फैसला न ले पाना है. यह परेशानी हर दूसरे घर की है कि लड़कियों को धार्मिक बंदिशों में रखने की कोशिश की जाती है.

लेकिन अब जमाना बदल रहा है. हर लड़की का अपने पैरों पर खड़े होना समय की मांग है, इसलिए आप अपने प्लान के मुताबिक काम करें, दुनिया जहान की परवाह न करें. रही बात बननेबिगड़ने की तो उस के कोई माने नहीं.

हर बालिग को अपने मुताबिक फैसले लेने का हक है. ये बातें कभी प्यार से तो कभी सख्ती से मां को समझाएं. छोटे भाई के सपोर्ट का फायदा उठाएं, जो एक समझदारी की बात कर रहा है.

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सवाल –

मैं 18 साल की लड़की हूं और मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में रहती हूं. मैं डिजिटल मीडिया में अपना कैरियर बनाना चाहती हूं पर मुझे इस की ज्यादा जानकारी नहीं है. मुझे  क्या करना चाहिए?

जवाब : डिजिटल मीडिया का भविष्य मुश्किल डगर हो सकता है, क्योंकि इस में होड़ इतनी है कि अपनी जगह बना पाना मुश्किल है. ज्यादा जानकारी के लिए आप भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता महाविद्यालय या जागरण लेक सिटी यूनिवर्सिटी में संपर्क करें. लेकिन हमारा मशवरा यह है कि पहले लिखनापढ़ना जारी रखें, अच्छी पत्रिकाएं और अखबार पढ़ें. इस के बाद कंप्यूटर और इंटरनैट में डिगरी या डिप्लोमा कोर्स करें.

अगर आप का मकसद या इच्छा फालतू की रील बना कर कैरियर बनाने की है तो वह बेकार का काम है. लाखों नौजवान इस में समय, पैसा और जिंदगी बरबाद कर रहे हैं.

सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें. मोबाइल नंबर : 08826099608

Social Issue : करोड़ों के लिए कौडि़यों की लड़ाई

Social Issue. अभी मीडिया बनाम कोचिंग विवाद थमा ही नहीं था कि कोचिंग का आपसी झगड़ा सामने आ गया. वह भी खास पटना में, जो कोचिंग का हब माना जाता है.

एक समय था, जब यहां इंजीनियरिंग और मैडिकल का भी कोचिंग हब था. पर जब नामांकन और डिगरियां आसानी से मिलने लगीं, लोगों का मोह भंग हुआ, तो वे इस से किनारा करने लगे. एक कारण यह भी था कि कोटा और दिल्ली कोचिंग हब बनने लगे थे, तो एक पढ़नेपढ़ाने वालों का एक बड़ा तबका उधर शिफ्ट हो गया था.

मगर बिहार में छोटे पद वालों, जैसे क्लर्क की, टीचर की, सिपाही आदि की नौकरियां तो थीं ही. हाल ही में थोक में बहाली भी हुई, तो अभ्यार्थियों के झुंड के झुंड इधर आने लगे. और अब बारी थी इन के कोचिंग की. कोचिंग वालों ने इधर संभावनाएं देखीं और अपनी सारी ऊर्जा इधर ही लगा दी. और कहना नहीं होगा कि उन्हें अपार सफलता भी मिली है.

मगर इस कोचिंग के चक्कर में हुआ यह है कि कहीं भी गांवदेहात में किसी भी बेनामी स्कूलकालेज में नामांकन ले कर अभ्यर्थी इस कोचिंग के नाम पर हजारोंलाखों की संख्या में पटना में रह रहे हैं. पढ़ाई के नाम पर मूल किताब किसी को पढ़ना नहीं है. कौन उस के पीछे लगे. सभी के हाथ में ग्लौसी पेपर में छपी गाइड, कुंजियां आदि हैं.

हाल यह है कि 50 रुपए की मूल किताब उन्हें महंगी लगती है, मगर 500 की गाइड, कुंजी आदि सस्ती दिखती है. सो, प्रकाशकों की भी बन गई है.

कौन कितना पढ़ रहा है या कौन कितना पढ़ा रहा है, यह बाद की बात है. फिलहाल ध्यान सफलता की तरफ है. और यह सफलता नतीजे से जानी जाती है.

यह सफलता तब दिखती है, जब थोक में बहालियां होती हैं. और तब कोचिंग सैंटर अपना दावा ठोंकने लगते हैं कि अमुक थोक बहाली में उन के इतने स्टूडैंट सफल हुए. उन लोगों की लिस्ट में जिन सफल अभ्यर्थियों के नाम होते हैं, वे सभी में होते हैं. और विवाद यहीं उठ खड़ा होता है कि सही सूची कौन सी है.

लोभी गांव में ठग भूखों नहीं मरते. अभ्यर्थी भी होशियार है. वह यहां भी माल काटना चाहता है, वहां भी गिफ्ट बटोरना चाहता है. वह यह भी देखता है कि कहां कितना बढि़या माल या गिफ्ट हाथ लगने वाला है.

साल 2019 के आगेपीछे यही काम इंजीनियरिंग कोचिंग वाले करते थे. जिन अभ्यर्थियों का नामांकन आईआईटी, एनआईटी आदि में हो जाता था, उसे महंगे मोबाइल फोन से ले कर लैपटौप तक के किट्स उपलब्ध कराए जाने लगे, तो मारामारी मच गई.

उन अभ्यर्थियों को लगने लगा कि बस अब तो हम मैदान मार ही लिया, जबकि उन्हें अभी 5 साल की पढ़ाई के पीछे लाखों रुपए खर्च करने थे. फिर नौकरियों के लिए लाइन में लगना था.

और इस विवाद में कोचिंग वालों की कलई खुलने लगी. अभ्यर्थियों का मोह भंग हुआ, तो कोटा, दिल्ली, पुणे आदि का रुख करने लगे. फिलहाल इंजीनियरिंग कोचिंग का बाजार पटना में मंदा है.

लेकिन छोटी नौकरियों का तो है ही, जो मैट्रिक और इंटर लैवल पर होते हैं. आमतौर पर कहीं भी किसी स्कूलकालेज में एडमिशन करा ये अभ्यर्थी अपने भावअभाव के साथ शहरों में चले आते हैं कोचिंग करने. अभिभावक अपना पेट काट कर उन्हें इन कोचिंगों में पढ़ने के लिए भेजते हैं.

पटना में रहनेपढ़ने का औसतन खर्च प्रति छात्र 10,000 का है. इस का सर्वे दिल्ली प्रैस के कहने पर मैं ने किया था. अंदाज करें कि लाखों छात्रों के पीछे पटना में कितना पैसा आता होगा. अब तो लड़कियां भी इस पढ़ाई के मैदान में ताल ठोंक कर आ रही हैं. सो, पटना में कुकुरमुत्तों की तरह गर्ल्स होस्टल हर गलीमहल्लों में हैं. लड़कों के लौज, होस्टल आदि का कहना ही क्या. सालोंसाल ये पढ़ते ही रहते हैं.

इन लाखों अभ्यर्थियों के पीछे पैसा पानी की तरह बह रहा है, जिस से एक नई अर्थव्यवस्था उपजी है. और इसी अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से को अपने नाम करने के लिए वर्चस्व की लड़ाई है.

‘समय मंथन’ के संपादक सेराज अनवर का सवाल है कि ‘यूट्यूब पर पढ़ाने वाले टीचर्स, जो न्यूज एंकर अंजना ओम कश्यप की एक भद्दी टिप्पणी से तिलमिलाए हुए हैं. ‘गोदी’ मीडिया को आज सत्ता के दलाल, चाटुकार, लोकतंत्र के दुश्मन और न जाने ग़ुस्सा में क्याक्या बता रहे हैं. क्या आप ने अपने बच्चों को लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में कभी पढ़ाया है? धर्मनिरपेक्षता की खूबियां बताई हैं? संविधान पर क्या खतरा है समझाया है? हिंदूमुसलिम एकता क्यों जरूरी है बताया? बेशक, आप ने दारोगा बनाया, एसपीडीएसपी भी बनाया होगा, हजारोंलाखों को नौकरी दिलाई होगी, लेकिन एक सभ्य नागरिक भी उसे बनाया?

‘आप सब के करोड़ोंअरबों फौलोअर्स हैं, तो समाज में नफरत का बीज कौन बो रहा है? उस में आप के लोग भी हैं क्योंकि आपने शिक्षा को रोजगार से, नौकरी से जोड़ दिया. इनसान बनने के बुनियादी टिप्स नहीं दिए वरना समाज इतना जहरीला नहीं होता. एजूकेशन को जब तक सिविलाइजेशन से नहीं जोड़ा जाएगा समाज में दो कौड़ी के लोग ही पैदा होंगे.

‘आप जब पढ़ाते हैं मुसलमान पंचर बनाता है, तो क्लासरूम में बैठा हिंदू दोस्त मुसलिम छात्र को घृणा वाली नजर से देखता है. आप जब मौब लिंचिग पर चुप रहते हैं, तो आप के छात्र की मानसिकता में उथलपुथल चलती है और आगे चल कर उसे जायज समझने लगता है.

आप जब बुलडोजर राज पर एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक के बतौर चुप रहते हैं तो आप के पढ़ाए पुलिस अधिकारी, नौकरशाह और नेता को बल मिलता है. आप जब वोट के अधिकार, गलत और सही का चुनाव करने के गुलाम मानसिकता को नहीं भेद पाते तो सत्ता के दलाल मीडिया को कुछ भी बकने का सेफ पैसेज देते हैं.

‘यह समाज आप का ही बनाया हुआ है मास्टर साहब, जो अब्दुल को टाइट करने को अपना धर्म मानते हैं. यदि आप ने लोकतंत्र, सैकुलरिज्म, संविधान की ताकत को समझायापढ़ाया होता तो किसी अंजना ओम कश्यप को ओछी टिप्पणी करने की जुर्रत नहीं होती.

‘यदि आप ने भारत की साँझा विरासत पढ़ाई होती तो समाज नहीं बंटता. यदि आप गंगाजमुनी संस्कृति की धारा को सकारात्मक रुख देते तो हिंदूमुसलिम में इतना मतभेद नहीं होता. यदि आप एक नौकरीपेशा के साथ छात्रों को एक अच्छा इनसान भी बनाए होते तो देश चमन होता. क्या आप ने यह सब सब्जैक्ट पढ़ाया?

‘आप को भी दरअसल नफरती समाज चाहिए. नफरत बढ़ाने में भी आप यूट्यूब के स्टार टीचरों का योगदान उतना ही है. छात्रों को रट्टूमल बना दिया, लेकिन इनसान नहीं बनाया तो भुगतेगा कौन?’

यहीं पर एक सवाल यह भी कि क्या यह मौजूदा समय में अंजना ओम कश्यप और कोचिंग संस्थानों के बीच जो शीतयुद्ध जैसा माहौल है, वह दरअसल पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षा में फैली घटनाओं से ध्यान भटकाने के लिए एक सोचीसमझ  रणनीति तो नहीं है? दोनों एकदूसरे के सहयोगी और चर्चा में बने रहने के लिए इस तरह के स्टंट करते रहते हैं.

मूल सवाल यह है कि शिक्षा की गिरती साख को ले कर व्यापक प्रतिरोध कैसे खड़ा हो? शिक्षा मंत्रालय के दफ्तर में लगी आग क्या मात्र एक आपदा है या कुछ और? इस पर विचार करने की जरूरत है.

Social Issueआईआईटी एडवांस में पहली रैंक लाने वाले शुभम कुमार को बधाई देते हुए फेसबुक पर वाहवाही लूटने वाले नेताओं से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि मैट्रिक पास करने के बाद वह गयाजी से कोटा पढ़ाई करने क्यों गया? क्या यह बिहार के शिक्षण व्यवस्था की नाकामयाबी का सुबूत नहीं है? उस के रिजल्ट को ले कर मैंटर्स ने जो दावा किया, वह झूठ अब सामने आ रहा है. कोचिंग संस्थानों द्वारा रिजल्ट को बढ़ाचढ़ा कर पेश करते हुए विज्ञापन करना और उस की आड़ में बहुत सारे बच्चों को अपने कोचिंग संस्थानों में नामांकन कराने की पेशकश करना दुर्भाग्यपूर्ण है.

हाल ही में खान सर कोचिंग में हुए हमले पर सारा विवाद सतह पर सामने आ गया. साफ दिखा कि कोचिंग की आपसी होड़ में शिक्षा व्यवस्था की क्या दुर्गति हो रही है. खान कोचिंग ‘ग्लोबल स्टडीज कोचिंग सैंटर’ की ‘ज्ञान बिंदु’ कोचिंग से पुरानी प्रतिस्पर्धा है. मजे की बात यह कि यह दोनों कोचिंग सैंटर पटना के सर्वाधिक सघन इलाके मुसल्लहपुर हाट में अगलबगल ही हैं.

यह प्रतिस्पर्धा जब रंजिश में बदलती है, तो हमले होते हैं. यह हमला किस ने और कैसे किया, यह सब युद्ध स्तर पर पुलिस छानबीन कर ही रही है. सीसीटीवी के फुटेज तलाशे जा रहे हैं, बयान लिए जा रहे हैं. सो, सहीगलत का फैसला सामने आ ही जाएगा.

मगर इस चक्कर में कोचिंग उद्योग का सच सामने आ रहा है. 2 जून को अफवाह फैली कि गोलियां चली हैं, इस से सनसनी फैल गई. खुद खान सर ने आगे बढ़ कर यह दावा किया. हालांकि वे अगले दिन इस बयान से मुकर गए.

खान सर ने जो बयान दिया था उस के मुताबिक, रात के 10 बज रहे थे और औनलाइन बैच चल रहे थे. उन्होंने कहा था कि सिक्योरिटी गार्ड को इतना मारा गया कि उस का सिर फोड़ दिया. हमलावर बोल रहे थे कि 2 दिन के अंदर कोचिंग सैंटर को उड़ा देंगे. उन का कहना था कि वह यहां बच्चों को पढ़ाते हैं और अच्छे रिजल्ट देते हैं.

ऐसा हमला करना बचकाना हरकत है. गार्ड बोल रहा था कि दूसरी कोचिंग वाले लोग ही हमला करने आए थे. सीसीटीवी में सभी का चेहरा नजर आया है और नामजद एफआईआर दर्ज कराई गई है.

उन्होंने यह भी दावा किया था कि कोचिंग सैंटर में बम भी चलाया गया है. जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी होगी. उन्होंने अन्य कोचिंग सैंटर्स के संचालकों पर हमला बोलते हुए कहा था कि शिक्षक के भेष में यहां व्यापारी घुसे रहते हैं.

हालांकि, बाद में पटना पुलिस के बड़े अधिकारियों के पहुंचने के बाद खान सर ने गोलीबारी वाला बयान बदल दिया था. उन्होंने कहा था कि उस समय ऐसा माहौल हो गया था कि कुछ समझ  में नहीं आया. पुलिस से अनुरोध है कि सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए.

खान सर ने बताया कि गार्ड को घसीट कर ले जा कर मारा गया. पता नहीं टारगेट कौन था, बीच में गार्ड मिला तो उसे मार दिया. गार्ड को इतनी चोट लगी है कि वह अभी कुछ बताने कि हालत में नहीं है. अभी हमारी प्राथमिकता यह है कि गार्ड ठीक हो जाए.

‘क्या सैंटर पर गोली चली थी?’ पत्रकारों के इस सवाल पर खान सर नाराज हो कर बोले, ‘‘हम लोग यहां लड़ाई झगड़ा के लिए नहीं बैठते. पुलिस जांच कर रही है. हमारे गार्ड को घसीट कर बहुत मारा गया है. जब वह सही होगा, तो बताएगा. कोचिंग सैंटर पर हमला कर बच्चों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की गई है, लेकिन कोई ऐसा नहीं कर पाएगा.

‘‘कोई भी कोचिंग वाला ऐसा करता है, क्या कोई सोच सकता है? पर हम लोग कम पैसे में ही पढ़ाएंगे. क्या शिक्षा का हक केवल अमीर का है?’’

खान सर का कहना था कि हमारी कोशिश यही रहती है कि गरीब से गरीब बच्चे को पढ़ाया जाए और इस में कुछ लोग बाधा बनते हैं. लेकिन हमें प्रशासन पर पूरा भरोसा है. यहां पुलिस प्रशासन ने सजगता दिखाई है. सभी अधिकारी यहां देर रात तक मौजूद थे. पुलिस जल्द

से जल्द कार्रवाई करे और दोषियों को सजा दी जाए. किसी को भी आपसी द्वेष नहीं रखना चाहिए. यहां सुरक्षा मुहैया कराई जाए.

लड़ाई का मुख्य बिंदु क्या था, इस पर प्रकाश डालना उचित होगा. दरअसल, 19,000 सिपाहियों की बहाली हुई थी. सफल प्रतिभागियों को सम्मानित करने के लिए दोनों कोचिंग संस्थानों ने अलगअलग सम्मान समारोह का आयोजन किया था. इस सम्मान समारोह में सम्मानितों की जो सूची थी, उस में बड़ी संख्या में नाम दोनों ही सूची में थे. और इस बात पर दोनो ही समूह आमनेसामने थे.

शाम में ‘ज्ञान बिंदु’ के संचालकों ने पाया कि उन के बैनरहोर्डिंग्स पर खान कोचिंग के बैनरहोर्डिंग्स आदि लगाए हुए हैं. यहीं से उन का गुस्सा फूटा और बैनर हटाओ या फाड़ो अभियान चल गया. हालांकि, 10 बजे रात तक तक तो कार्यक्रम संपन्न हो ही चुके थे. मगर गरमी का दिन, लोग आमतौर पर जल्दी सोते नहीं.

छात्रों का कहना ही क्या, वे झुंड  में उपस्थित थे ही. लोगों को अंदाजा नहीं था कि मामला इतना संगीन हो जाएगा. गुस्से से उफन रहे कुछ लोग बैनरहोर्डिंग्स हटानेफाड़ने के क्रम में ढेलेबाजी भी करने लगे. खान कोचिंग के एक गार्ड ने विरोध किया, तो उस को पकड़ कर जम कर धुनाई कर दी.

वरिष्ठ पत्रकार अनूप सिंह बताते हैं, ‘‘पटना में कोचिंग संस्थानों के बीच वर्चस्व की लड़ाई कोई नई बात नहीं है. हाल की घटनाओं ने एक बार फिर उस दुनिया की तरफ लोगों का ध्यान खींचा है, जहां शिक्षा, प्रतिस्पर्धा, कारोबार, ब्रांडिंग और लोकप्रियता का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है.

‘‘एक समय था जब देश में इंजीनियरिंग और मैडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए पटना सब से बड़े केंद्रों में गिना जाता था. अनिल परमार, बीके सिंह, भूपेश कुमार जैसे शिक्षकों की कक्षाओं में जगह मिलना ही छात्रों के लिए उपलब्धि मानी जाती थी. इसी दौर में ‘सुपर 30’ का उदय हुआ.

‘‘गरीब छात्रों को आईआईटी तक पहुंचाने के अभियान ने आनंद कुमार को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. बाद में ‘सुपर 30’ और उस से जुड़े अन्य संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा, सफलता का श्रेय लेने की होड़ और प्रचारप्रसार को ले कर कई विवाद भी सामने आए.

‘‘समय बदला और देश का कोचिंग नक्शा भी बदला. कोटा राष्ट्रीय स्तर पर सब से बड़ा कोचिंग हब बन गया, लेकिन पटना की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई. यहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले शिक्षकों की नई पीढ़ी सामने आई. डाक्टर एम. रहमान जैसे शिक्षकों ने लाखों छात्रों के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाई.

‘‘फिर आया कोरोना काल. लौकडाउन ने शिक्षा जगत की दिशा ही बदल दी. पहली बार ऐसा हुआ कि कक्षा से ज्यादा महत्व मोबाइल स्क्रीन और इंटरनैट को मिलने लगा. जो शिक्षक डिजिटल प्लेटफार्म को समझ  गए, वे रातोंरात राष्ट्रीय स्तर के ब्रांड बन गए. यूट्यूब, फेसबुक, टैलीग्राम और अन्य सोशल मीडिया मंच नए क्लासरूम बन गए.

‘‘इसी दौर में खान सर जैसे शिक्षक देशभर में चर्चित हुए. लाखों छात्र घर बैठे पढ़ाई करने लगे. शिक्षा सस्ती हुई, पहुंच बढ़ी और कोचिंग संस्थानों की भौगोलिक सीमाएं समाप्त हो गईं. बिहार का शिक्षक राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और यहां तक कि विदेशों में बैठे छात्रों तक पहुंचने लगा. औनलाइन शिक्षा ने शिक्षकों के लिए आय के नए स्रोत भी खोले. फीस के अलावा यूट्यूब विज्ञापन, डिजिटल सदस्यता, ब्रांड सहयोग और सोशल मीडिया की लोकप्रियता भी आय का जरीया बन गई.

‘‘धीरेधीरे कोचिंग संस्थान शिक्षा संस्थान से आगे बढ़ कर ब्रांड में बदलने लगे. बड़े टीवी चैनलों पर शिक्षकों को बुलाया जाने लगा. सोशल मीडिया पर उन की फैन फौलोइंग बनने लगी. कुछ शिक्षक सैलिब्रिटी की तरह पहचाने जाने लगे. शिक्षा और मनोरंजन के बीच की दूरी कम होने लगी. आज पटना का कोचिंग बाजार केवल एक या 2 नामों तक सीमित नहीं है.

‘‘ज्ञान बिंदु, एस मिश्रा, औफिसर्स अकादमी सहित कई संस्थान औनलाइन और औफलाइन दोनों माध्यमों में सक्रिय हैं. दूसरी ओर अनअकैडमी जैसे राष्ट्रीय प्लेटफार्म ने पूरे देश के शिक्षकों और छात्रों को एक मंच पर ला कर प्रतिस्पर्धा को और तीखा बना दिया है.

‘‘इस प्रतिस्पर्धा का एक दूसरा पहलू भी है. रिजल्ट के प्रचार की लड़ाई अब पहले से कहीं अधिक आक्रामक हो चुकी है. किसी परीक्षा में जितनी रिक्तियां होती हैं, उस से कई गुना अधिक सफल छात्रों पर दावा करने के आरोप समयसमय पर लगते रहे हैं. सफल छात्रों को बाइक, बुलेट या अन्य उपहार दे कर सम्मानित किया जाता है. उन की कहानियां वीडियो के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं. सोशल मीडिया पर व्यापक प्रचार किया जाता है ताकि नए छात्रों को आकर्षित किया जा सके.

‘‘वास्तविकता यह है कि कोचिंग उद्योग अब केवल शिक्षा का क्षेत्र नहीं रह गया है. यह एक बड़ा आर्थिक तंत्र बन चुका है, जहां लोकप्रियता, डिजिटल पहुंच, मार्केटिंग और ब्रांड वैल्यू भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है, जितनी पढ़ाई.

‘‘दिलचस्प बात यह है कि जो शिक्षक कभी मुख्यधारा मीडिया और टीवी एंकरों से वैचारिक बहस करते दिखाई देते थे, आज उन्हीं के बीच प्रतिस्पर्धा और टकराव की खबरें सामने आने लगी हैं. इस का कारण केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ता हुआ वह बाजार भी है, जिस में लाखों छात्र और करोड़ों रुपए दांव पर लगे हैं.

‘‘पटना का कोचिंग जगत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां शिक्षा, तकनीक और व्यापार तीनों का संगम दिखाई देता है. यह बदलाव अवसर भी ले कर आया है और चुनौतियां भी. अंतत: छात्रों और अभिभावकों के लिए सब से महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि चमकदार प्रचार, वायरल वीडियो और बड़ेबड़े

दावों के बीच वास्तविक गुणवत्ता और परिणाम को कैसे पहचाना जाए, क्योंकि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की असली सफलता यूट्यूब के व्यूज, सोशल मीडिया फौलोअर्स या प्रचार अभियानों से नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य से तय होती है.’’

इस कोचिंग सैंटर विवाद में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, साक्ष्यों तथा बयानों के आधार पर ‘ज्ञान बिंदु’ के संचालक रोशन आनंद के साथ उन के सहयोगी अभिषेक तथा गौरव को गिरफ्तार कर लिया है. जो भी हो, कुछ दिन सनसनी रहेगी. कोचिंग संस्थान बंद रहेंगे. लेकिन अभिभावक ही नहीं, छात्र भी कुछ सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि क्या ऐसा ही चलता रहेगा? पढ़ाई के नाम पर पटना में मौजमस्ती और गाइडों का सहारा ले कर सफलता कितनी हाथ लगेगी?

शिक्षक, सिपाही, स्टाफ सेलेक्शन कमीशन आदि की परीक्षाएं गांवों और छोटे शहरों के स्कूलकालेज में पढ़ कर भी पास की जा सकती है. अच्छी पढ़ाई घर पर रह कर भी की जा सकती है, यह उन्हें समझना होगा. वह गाइड, कुंजी के बजाय मूल पुस्तकों की ओर बढ़ेंपढ़ें, तो वहां भी सफलता की इबारत लिखी जा सकती है.

Career Problem: मेरे पिताजी जिद पर अड़े हुए हैं कि मैं सरकारी नौकरी ही करूं

Career Problem: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 24 साल की लड़की हूं और हरियाणा के एक गांव में रहती हूं. मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में हैं और वे चाहते हैं कि मैं भी सरकारी नौकरी में ही जाऊं. यह मेरे पिताजी की इच्छा नहीं, बल्कि जिद है. उन की सोच है कि प्राइवेट नौकरी तो गुलामी है और वहां जा कर लड़कियां बिगड़ जाती हैं. ऐसा नहीं है कि मुझे सरकारी नौकरी पसंद नहीं है, पर पिताजी की जिद के चक्कर में मुझ में एक तरह का डर बैठ गया है कि अगर मेरी सरकारी नौकरी नहीं लगी, तो क्या होगा? मैं ने कई बार अपने पिताजी को प्राइवेट नौकरी करने की बात कही है, पर वे एकदम आगबबूला हो जाते हैं. आप ही बताइए कि मैं अपने पिताजी को कैसे समझाऊं?

जवाब –

आप ने पिताजी को नहीं, बल्कि खुद को समझाना है कि भयंकर बेरोजगारी और गलाकाटू कंपीटिशन के इस दौर में जो भी नौकरी मिल जाए, वही अच्छी है. वैसे, सरकारी और प्राइवेट नौकरियों की अपनी अलगअलग खूबियां और खामियां होती हैं.

एक पिता होने के नाते आप के पिताजी की जिद अपनी जगह ठीक है, जो अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित देखना चाहते हैं. चूंकि वे खुद सरकारी नौकरी के एशोआराम और सुख भोग रहे हैं, इसलिए वे आप को ले कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं. लेकिन आखिरी फैसला खुद आप को करना है.

सरकारी नौकरी मिलना अब पहले की तरह आसान नहीं रह गया है, इसलिए वह न मिले तो आप के सामने एकलौता रास्ता प्राइवेट नौकरी का ही रह जाएगा. अब यह आप की पढ़ाईलिखाई, मेहनत, हुनर और स्मार्टनैस पर निर्भर है कि आप को 15,000 वाली नौकरी मिलती है या डेढ़दो लाख वाली मिलती है. जो भी हो तैयारी करती रहें. कहीं ऐसा न हो कि पिताजी को समझाने के चक्कर में कोई भी न मिले.

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