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Social Satire Story : सावित्री

Social Satire Story. शाद्घदी के बाद गौने के लिए मायके आई सावित्री चहकते हुए घर में घुसी और पिता श्याम चरण से बोली, ‘‘बापू, कर दिया न तुम ने सब का नुकसान. सुना है, इस साल हाईस्कूल पास करने वाली लड़कियों को बीपीएल कार्ड होने पर कुछ रुपए और एक साइकिल मिल रही है.’’

आंगनबाड़ी में काम करने वाली बहिनजी अनीता सावित्री को देख कर रुक गईं और बोलीं, ‘‘अरे सावित्री, तू कब आई? कैसी है तेरी ससुराल? कितने दिनों के लिए मायके आई है?’’

सावित्री ने हंसते हुए कहा, ‘‘बहिनजी, मैं आज ही आई हूं. मेरी ससुराल बहुत अच्छी है. सभी लोग मुझे  बहुत प्यार करते हैं. मैं यहां एक महीने के लिए आई हूं.’’

आंगनबाड़ी की बहिनजी और सावित्री की बातें खत्म होने पर श्याम चरण ने बहिनजी से पूछा, ‘‘बहिनजी, यह बीपीएल क्या होता है? सुना है कि उस से कुछ रुपए भी मिलते हैं.’’

सावित्री ने वहां बिछी खाट पर बहिनजी को बैठने का इशारा किया. उन्होंने खाट पर बैठ कर बताया, ‘‘गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले यानी सब से ज्यादा गरीबों की पहचान होता है बीपीएल कार्ड. यह सफेद रंग का होता है. इस से सरकार से सस्ते दाम पर आटा, चावल, दाल वगैरह सामान खरीदने की सुविधाएं भी मिलती हैं.’’

कुछ देर से सोच में डूबी सावित्री अब चुप न रह सकी और बोली, ‘‘बहिनजी, वहां तो मेरी ननद सरिता को अगले हफ्ते एक साइकिल और कुछ रुपए मिलने वाले हैं. अभी पिछले साल ही तो उस ने मेरे साथ हाईस्कूल का इम्तिहान पास किया था.’’

आंगनबाड़ी की बहिनजी ने हंस कर कहा, ‘‘अब सम?ा, तुम लोग क्यों पूछ रहे हो बीपीएल…’’

बात पूरी होने से पहले ही सावित्री का छोटा भाई वहां आ कर बोला, ‘‘अरे दीदी, इतना भी नहीं पता, जो तुम इन बहिनजी को परेशान कर रही हो.’’

वह आगे बोला, ‘‘बीपीएल मतलब टैलीविजन. अरे, अभी पिछले महीने ही तो आया है चिंटू के घर बीपीएल टैलीविजन,’’ वह सब को बीपीएल का मतलब बता कर खुश हो रहा था, लेकिन सावित्री ने सिर पकड़ लिया और बोली, ‘‘कुछ दूसरों की भी सुनेगा या खुद ही बोलता रहेगा…’’

अब बहिनजी ने सम?ाते हुए कहा, ‘‘अरे पगली, कुछ दिन पहले ही हमारे मुख्यमंत्री ने प्रदेश में 11वीं जमात में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए एक योजना बनाई है, जिस में गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल कार्ड वाले परिवार की छात्राओं को 15 हजार रुपए और एक साइकिल देने की तैयारी की है.

‘‘अब तू बता, तू ने कहीं 11वीं में दाखिला लिया या नहीं?’’

‘‘नहीं. मैं ने बापू से बहुत कहा था कि आगे पढ़ूंगी. इंटर पास करने के बाद कई लड़कियों को 20-20 हजार रुपए मिले थे, पर बापू माने ही नहीं और बोले कि तेरे पढ़ाने में जो रुपए खर्च करूंगा, उन से तेरी शादी करना बेहतर है. और उन्होंने मेरी शादी कर दी.’’

सावित्री की बात पूरी होने के बाद श्याम चरण बोल उठा, ‘‘सुना बहिनजी, मैं ने बेटी के हाथ पीले कर दिए, यह क्या कम है? आगे पढ़ाने को पैसा चाहिए था, जो मेरे पास नहीं था.’’

लेकिन अब श्याम चरण के दिमाग में बेटी की शादी, साइकिल और 15 हजार रुपए घूम रहे थे. उसे लगा कि सावित्री की शादी जल्दी कर के उस ने नुकसान कर लिया है.

बहिनजी ने कहा, ‘‘भाई साहब, अब मैं चलती हूं,’’ इतना कह कर वे अपने आंगनबाड़ी केंद्र की ओर चल दीं.

अब श्याम चरण भी वहां रुक न सका. उसे पैसों का लालच था. उसे अचानक हर मुसीबत में काम आने वाले नेताजी याद आए. वह उन के पास जा पहुंचा.

पूरी बात बताने के बाद श्याम चरण हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘बाबूजी, चाहे कुछ भी करना पड़े, मेरी सावित्री को साइकिल और रुपए मिल जाएं.’’

कुछ देर सोचने के बाद नेताजी ने जो मंत्र बताया, उस से श्याम चरण की आंखें चमक उठीं. उसे उम्मीद की एक किरण दिखाई दी.

नेताजी के यहां से वापस आ कर श्याम चरण ने सावित्री से कहा, ‘‘सावित्री, तुरंत मेरे साथ चलो. तुम्हारा पासपोर्ट साइज का फोटो खिंचवाना है.’’

फोटो खिंचवा कर कुछ दूर के एक इंटर कालेज में सावित्री का 11वीं जमात में दाखिला करा दिया और प्रधान व पंचायत सैके्रटरी से मिल कर बीपीएल कार्ड बनवा लिया.

अब सावित्री से ज्यादा श्याम चरण को गुरुवार का इंतजार था, जब उसे ब्लौक के जिला दफ्तर से साइकिल और 15 हजार रुपए लेने जाना था. बुधवार की रात तो उसे नींद ही नहीं आई.

गुरुवार को वे दोनों घर से तैयार हो कर ब्लौक दफ्तर पहुंचे. लेकिन यह क्या, वहां सन्नाटा फैला हुआ था. कुछ लड़कियां नई चमचमाती साइकिलें चलाती जा रही थीं, जिन्हें मंत्रीजी की लाल बत्ती वाली गाड़ी को रास्ता देने के लिए धक्के भी खाने पड़े.

वहां जा कर सावित्री ने एक लड़की से पूछा, ‘‘बहिन, क्या हमें भी साइकिल और रुपए मिल जाएंगे?’’

‘‘क्यों नहीं बहिन, अगर तुम्हारे सब कागजात पूरे हैं, तो जरूर मिलेंगे. लेकिन…’’ वह सावित्री के पैरों की तरफ देखते हुए बोली, ‘‘क्या तुम्हारी शादी हो चुकी है? तुम दफ्तर में जाने से पहले बिछिया उतार कर रख लो, वरना तुम्हें साइकिल और रुपए नहीं मिलेंगे.’’

बिछिया उतार कर सावित्री कागजात ले कर दफ्तर में घुसी. वहां 4 लोग बैठे थे. उन लोगों ने उसे इशारे से कागजात दिखाने को कहा.

कागजात दिखा कर सावित्री बोली, ‘‘सर, हमें भी साइकिल और रुपए दिलवा दो.’’

उन में से एक मुलाजिम उसे सिर से पैर तक देख कर बोला, ‘‘अरे, तुम तो शादीशुदा हो. तुम्हारी मांग में तो सिंदूर लगा है. तुम्हारे ये सब कागजात फर्जी लगते हैं.’’

वह बोली, ‘‘शादी होेने से क्या हुआ? मैं कालेज में पढ़ती हूं. ये सर्टिफिकेट इस बात के सुबूत हैं. आप पता लगा सकते हैं.’’

वह आदमी बोला, ‘‘तुम कमरे से बाहर जाओ. तुम्हें साइकिल और रुपए नहीं मिलेंगे, क्योंकि तुम्हारे सब कागजात फर्जी हैं.’’

यह सुन कर मानो सावित्री पर घड़ों पानी पड़ गया. श्याम चरण को तो पसीना आ गया, क्योंकि उस ने पैसा खिला कर 11वीं जमात में दाखिला कराया था और बीपीएल कार्ड भी बनवाया था.

सावित्री से अपने पिता का यह हाल न देखा गया. उस ने दफ्तर से बाहर आ कर सोचा कि अब वह क्या करे? तब वह वहां एक पेड़ की छाया में बैठ कर चूडि़यां भी उतारने लगी. उस के मन में अपने पति का चेहरा घूम रहा था.

वह सोच रही थी, ‘अपने पिता की मदद करने के लिए मु?ो कुछ न कुछ तो करना ही होगा.’

सावित्री ने चूडि़यां उतारने के बाद अपनी मांग का सिंदूर भी पोंछ दिया. वह दोबारा दफ्तर जा कर उस आदमी से बोली, ‘‘प्लीज सर, अब कर दो न हमारा काम. हम गरीबों का नुकसान कर के आप को क्या मिलेगा?’’ और वह फूटफूट कर रोने लगी.

उस की हालत देख कर बाबू को तरस आ गया और वह बोला, ‘‘ठीक है, अगर ऐसी बात है, तो निकाल 3 हजार रुपए, तेरा काम हो जाएगा.’’

सावित्री ने 2 हजार रुपए देते हुए कहा, ‘‘सर, मेरे पास तो ये ही हैं,’’ और उस बाबू के पैर पकड़ लिए.

उस बाबू ने रुपए ले कर साइकिल और 15 हजार रुपए का चैक सावित्री को तुरंत दे दिया.

जब सावित्री साइकिल ले कर बाहर निकली, तो एक लड़की ने उस से पूछा, ‘‘बहिन, तुम्हें वहां दोबारा जाने पर साइकिल कैसे मिल गई? हमें तो वहां से भगा दिया गया था.’’

सावित्री बोली, ‘‘बहिनो, तुम नहीं जानती हो. यह कलियुग है. इस में बातों से काम नहीं होता. इस में तो यही कहावत सच है कि ‘बाप बड़ा न भइया, सब से बड़ा रुपैया.’ तुम सब भी ऐसा करो, काम हो जाएगा.’’  Social Satire Story

Hindi Story : पानी

Hindi Story. पटवारी गंगाराम प्रसाद की मोटरसाइकिल जब गांव के छोर पर बने उन के दोमंजिला मकान के सामने रुकी, तब शाम का अंधेरा गहरा चुका था. उन्होंने मोटरसाइकिल बरामदे में खड़ी की ही थी कि उन की बीवी सुशीला देवी हमेशा की तरह गिलास में पानी ले कर बाहर निकल आई.

गंगाराम ने मोटरसाइकिल की डिक्की से एक छोटा सा बैग निकाला. पानी भरा गिलास एक हाथ से थामते हुए, दूसरे हाथ में पकड़ा बैग बीवी के आगे बढ़ाते हुए वे बोले, ‘‘लो, इस को अपनी अलमारी में संभाल कर रख दो.’’

सुशीला बैग के वजन को हाथों पर ही तौलते हुए बोली, ‘‘लगता है, आज का दिन काफी अच्छा रहा है.’’

गंगाराम कुल्ला करने लगे थे, इसलिए जल्दी से कोई जवाब न दे सके. पलट कर रूमाल से होंठों को पोंछते हुए वे बोले, ‘‘वाकई आज का दिन बहुत अच्छा रहा. जाने कब से लटकते आ रहे 2 केस आज निबट गए और मुझे भी उम्मीद से ज्यादा मिला है.’’ ‘‘आओ,’’ सुशीला ने घर के अंदर जाने के लिए मुड़ते हुए कहा, ‘‘चाय तैयार है.’’

कुछ देर बाद गंगाराम एक आराम कुरसी पर बैठे हुए चाय पी रहे थे और अपने पास खड़ी सुशीला से कह रहे थे, ‘‘पूरे 25 हजार दिए हैं एक ने और दूसरे ने 18 हजार. दोनों का इस रकम से 4-5 गुना कीमत का फायदा जो कराया है मैं ने.’’

‘‘अब तो रमन के लिए दुकान पक्की हो जाएगी न?’’ सुशीला देवी की बात सुन कर गंगाराम के चौड़े माथे पर शिकन पड़ गई. वे बोले, ‘‘अभी नहीं. तुम रमन के पीछे क्यों पड़ी हो? दुकान तो शहर की नई बाजार में पहले से ही ले ली है, पर अभी उसे चालू नहीं करवाऊंगा. वह दुकान कपड़े का धंधा करने के लिए बड़े मौके की है. और तुम्हारे बेटे को तो मैडिकल स्टोर खोलने की सनक सवार है. तुम ने उसे इतना सिर चढ़ा रखा है कि मेरी बात उस के पल्ले ही नहीं पड़ती.’’

सुशीला से एकाएक ही कुछ कहा न गया. गंगाराम ही बोले, ‘‘कहां गए हैं तुम्हारे साहबजादे?’’ ‘‘शहर गया है. कह रहा था कि किसी दोस्त के घर दावत है.’’

सुशीला के इतना कहते ही गंगाराम ने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, ‘‘अब क्या आधी रात के पहले लौट कर आएगा? अपना आगापीछा कुछ सोचता ही नहीं. बस पैसे उड़ाना जानता है, पैसे कमाना नहीं.’’

‘‘इन सब बातों से क्या फायदा है?’’ सुशीला बोली, ‘‘जब वह कहता है, तो आप उसे दुकान क्यों नहीं खुलवा देते?’’ ‘‘वह अपने अंदर दुकान की जिम्मेदारी संभालने लायक हुनर भी तो पैदा करे.’’

कुछ देर की चुप्पी के बाद सुशीला ने अचानक कहा, ‘‘आप जो रकम घर ले आए हैं, उसे बैंक में जमा नहीं करेंगे क्या?’’ ‘‘नहीं,’’ गंगाराम ने कहा, ‘‘बल्कि कल बैंक से और पैसे निकालूंगा और ईंटसीमेंट वगैरह सारा सामान मंगवाने की सोच रहा हूं कि मंदिर बनवाने का काम शुरू करवा दूं.

‘‘हां सुशीला, मां की आत्मा की शांति के लिए यह जरूरी है. मैं ने मां को वचन दिया था कि उन के नाम से मैं अपने गांव में एक बढि़या सा मंदिर जरूर बनवाऊंगा. ‘‘तुम तो जानती ही हो कि बचपन में मैं ने बड़े ही कष्ट के दिन देखे हैं. मैं ने तुम को पहले भी बताया है कि मां ने सूत कातकात कर मुझे पढ़ायालिखाया और पालापोसा. यह उन का ही आशीर्वाद है कि मैं इस नौकरी के लायक हो सका.

‘‘लेकिन, सुख के दिन आने से पहले ही मां गुजर गईं. मैं जीतेजी तो उन को कोई सुख न दे सका, पर उन की अंतिम इच्छा जरूर पूरी करूंगा.’’ तभी बाहर रमन की मोपेड की आवाज सुनाई दी. गंगाराम के चेहरे पर तनाव आ गया.

सुशीला ने जल्दी से कहा, ‘‘अब आप उस पर बिगड़ना मत. मैं उसे समझा दूंगी,’’ इतना कह कर सुशीला कमरे से बाहर निकल गई.

सुबह की गुलाबी धूप में गंगाराम का चेहरा चमक रहा था. वे सुशीला पर गरज रहे थे, ‘‘मैं कहता हूं कि उस ने जब 3 सौ रुपए मांगे थे, तो तुम ने बगैर मुझ  से पूछे हामी भरी ही क्यों? मैं क्या मर गया था? पैसे देने ही थे, तो उस के सामने अलमारी खोली ही क्यों?’’

‘‘मैं क्या जानती थी कि वह इतनी बड़ी रकम को ही उड़ा ले जाएगा? मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि वह इतनी बड़ी रकम का करेगा क्या?’’ ‘‘क्या करेगा? अरे, जिसे पैसे बरबाद करने की लत पड़ चुकी हो, उस के लिए लाखोंकरोड़ों की रकम भी कम पड़ जाएगी,’’ गंगाराम ने कहा और दोनों हाथों में अपना सिर थाम लिया.

गंगाराम ने थोड़ी देर बाद अपना चेहरा ऊपर उठाया. सुशीला देवी रोंआसी हो उठी थी. गंगाराम ने दांत किटकिटा कर कहा, ‘‘आने दो उसे घर वापस. जाएगा कहां? मैं उस की अच्छी खबर लूंगा.’’

‘‘उसे कुछ भी कहना, पर एक बात ध्यान रखना कि वह अब बच्चा नहीं है. जवान खून में उबाल जल्दी आता है. कहीं कोई बात लग गई और उस ने कुछ करकरा लिया, तो हम तो कहीं मुंह दिखाने लायक न रहेंगे.’’

‘‘कुछ नहीं करेगा वह,’’ गंगाराम ने कड़क आवाज में कहा. उसी शाम जब गंगाराम घर लौटे, तो सुशीला देवी ने पानी से भरा गिलास पकड़ाते हुए पहला सवाल यही किया, ‘‘रमन का कुछ पता चला?’’ ‘‘भाड़ में जाए वह,’’ गंगाराम गुस्से में बोले.

सुशीला ने आगे कुछ न पूछा. गंगाराम ने बरामदे में ही पड़ी आराम कुरसी पर पसरते हुए शरीर को ढीला छोड़ कर आंखें बंद कर लीं.

अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि रमन लाल रंग की मोटरसाइकिल खड़ी कर के नीचे उतरा और अपनी ओर घूरते गंगाराम व सुशीला की ओर उड़ती नजरों से देखते हुए वह घर की ओर बढ़ा.

गंगाराम ने कहा, ‘‘ठहरो.’’ रमन खड़ा हो गया. अपनी आंखों से फैंसी चश्मा उतार कर कमीज की जेब में रखते हुए वह बोला, ‘‘कहिए?’’ ‘‘तुम अलमारी से पैसे ले गए थे?’’ गंगाराम के बोलने से पहले ही सुशीला ने पूछा.

रमन ने उसी सपाट लहजे में कह दिया, ‘‘और कौन ले जा सकता था? मुझे यह मोटरसाइकिल खरीदने के लिए पैसों की जरूरत थी, सो ले गया. उस खटारा मोपेड से मैं तंग आ चुका था. पहले भी कहा था कि मैं उसे बेच कर एक ठीकठाक गाड़ी लेना चाहता हूं.’’

‘‘तुम…?’’ गंगाराम गुस्से में न जाने क्याक्या बकते चले गए. रमन चुपचाप खड़ा सबकुछ सुनता रहा.

सुशीला ने गंगाराम को शांत करने के लिए कुछ कहना चाहा, पर गंगाराम ने उस को भी डपट दिया. हांफते हुए गंगाराम की जबान लड़खड़ाने लगी, तो वे चुप हो गए और जल्दीजल्दी सांसें लेने लगे.

रमन ने शांतिपूर्वक कहा, ‘‘पैसे मैं ने ही तो खर्च किए हैं. कोई डकैती तो हो नहीं गई, जो आप इतना परेशान हुए जा रहे हैं?’’ गंगाराम भड़क उठे, ‘‘तुम अपने बाप को सिखा रहे हो? जब कमाओगे, तब पता चलेगा…’’

‘‘ओह, तो इसे भी आप अपनी कमाई मानते हैं,’’ रमन कुटिल हंसी हंसते हुए बोला, ‘‘काश, हिंदुस्तान का हर आदमी ऐसे ही कमाई करने लायक हो जाए, तो इस देश से गरीबी मिट जाए.

‘‘और फिर आप के बारे में तो मशहूर है कि आप 2 पक्षों में से जो पक्ष कमजोर होता है, उस की जायदाद को हड़पने में मालदार और ताकतवर की मदद कर उन से एक मोटी रकम वसूल लेते हैं.

‘‘बोलिए, ऐसा होता? है या नहीं? इस हराम की दौलत को अपनी कमाई कहने में शर्म नहीं आती आप को?’’

सुशीला हैरान रह गई, जब गंगाराम रमन की इतनी सारी कड़वी बातें सुन कर भी भड़के नहीं, बल्कि धीरे से कहा, ‘‘तुम को पता है कि तुम्हारी दादी की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए मैं ने वह रकम…’’

रमन बोला, ‘‘कैसा है आप का वह भगवान, जिसे आप हराम की कमाई से मंदिर बनवा कर देंगे?

‘‘आप का कहना है कि आप की मां ने सूत कातकात कर आप को पढ़ायालिखाया, उसी मां की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए आप गरीबों की गरदनें काटकाट कर पुण्य कमा रहे हैं?’’

गंगाराम के मुंह से इस के आगे एक बोल न फूटा.  Hindi Story

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