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Political Story: 2025 धुरंधर साल की मजाकिया पड़ताल

Political Story: साल 2025 को भारतीय इतिहास में उस ब्लौकबस्टर फिल्म की तरह दर्ज किया जाएगा, जिस में डायरैक्टर बदलते रहे, पटकथा रोज लिखी गई, कलाकार खुद ही डायलौग बोलते रहे और दर्शक बेचारे टिकट ले कर भी सिनेमाघरों से बाहर नहीं निकल पाए.
इस में कहानी थी, सस्पैंस था, रोमांस था, वादविवाद था, संवाद था, एक्शन था, थ्रिलर था, बस नहीं था तो इंटरवल और न ही चैनल बदलने का औप्शन, क्योंकि पूरा देश ही सिनेमाघर और देशवासी दर्शक बने हुए थे.


भक्ति, भीड़ और व्यूअरशिप का त्रिवेणी संगम फिल्म की ओपनिंग भव्य रही. प्रयागराज महाकुंभ में तकरीबन 65 करोड़ श्रद्धालुओं ने पाप धोने के लिए आस्था की डुबकी लगाई. कुछ श्रद्धालु ऐसे भी थे, जिन्होंने मनका विक्रेता मोनालिसा की आंखों में डुबकी लगा कर वैतरणी पार करने का शौर्टकट रास्ता खोज लिया. भक्ति, भावुकता और व्यूअरशिप, तीनों का त्रिवेणी संगम हुआ. कैमरे भी श्रद्धा में लीन थे, बस लाइक और शेयर बाकी रह गया था.


एक्शन सीन : भगदड़ से ब्लास्ट तक
जैसे फिल्म में हर मसाला होता है, वैसे ही शांत भक्ति के बाद भारतीय पटल पर एक्शन सीन भी देखने को मिले. महाकुंभ, दिल्ली रेलवे स्टेशन और रथ यात्रा की भगदड़. एयर इंडिया का प्लेन क्रैश, पहलगाम आतंकी हमला, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल की हिंसा, दिल्ली ब्लास्ट, गोवा नाइट क्लब आगजनी और रोहित शेट्टी की फिल्म की तरह कोहरे में यमुना एक्सप्रैसवे पर गाडि़यों की टक्कर, इन सब ने साल को पूरी तरह ‘धमाकेदार’ बना दिया.

इन घटनाओं से देश कुछ देर के लिए जरूर थमा, लेकिन इन हालात में भी माननीयों के चुनावी दौरे और विदेशी यात्राएं बदस्तूर जारी रहीं. दर्शक कन्फ्यूज हो गए कि यह ब्रेकिंग न्यूज है या अगली वैब सीरीज का ट्रेलर या फिर अविराम जीवन का परम सत्य. गौसिप, गलतफहमियां और टीआरपी की दुलहन
पिछले साल के ‘बंटोगे तो कटोगे’ के बाद इस साल ‘आई लव मोहम्मद’ और ‘आई लव महादेव’ जैसे नारे राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज हुए. एसआईआर, शरबत जिहाद, बीएलओ, टैरिफ, जीएसटी और जेनजी जैसे शब्द चर्चा में रहे. बाबाओं और नेताओं का बड़बोलापन, अक्षय का ठुमकना, माननीय द्वारा हिजाब हटाने की घटना, सब ने सुर्खियां बटोरीं.


इधर मोस्ट बैचलर राहुल गांधी और सलमान खान को इस साल भी दुलहन नहीं मिली, उधर वक्फ संशोधन विधेयक और एसआईआर प्रक्रिया, सब ने मिल कर गौसिप चैनलों की टीआरपी को दुलहन बना दिया.
इंटरनैशनल कूटनीति का मल्टीस्टारर सीन इंटरनैशनल फ्रेम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ‘ग्लोबल फूफा’ का रोल निभाते हुए नोबेल अवार्ड की तलाश में भटकते रहे, लेकिन भारतीय कूटनीति और नार्वेजियन नोबेल कमेटी ने मोगेंबो को ‘खुश’ होने का मौका ही नहीं दिया. टैरिफ की आड़ में ट्रंप भारत के पीछे ऐसे पड़े रहे, जैसे कुत्तों के पीछे दिल्ली कोर्ट.


आपरेशन सिंदूर और एशिया कप के दौरान पाकिस्तान को कूटा गया. कूटनीति का यह मल्टीस्टारर सीन था, जिस में संवाद कम और संदेश ज्यादा था. रोमांस, क्राइम और नीला ड्रम रोमांस और थ्रिलर ने भी दर्शकों को निराश नहीं किया. समधीसमधन, चाचीभतीजा और सासदामाद की भागमभाग प्रेमकथाएं ट्रैंड में रहीं. शादीशुदा मर्दों की जिंदगी में राहुकेतु साथसाथ गोचर करते दिखे. ‘वो’ के चक्कर में नीला ड्रम, हौरर हनीमून और हसीन दिलरुबा टाइप घटनाओं ने सस्पैंस को हद पर पहुंचा दिया. मीडिया और सोशल मीडिया सनसनी तैमूर के घर उस के अब्बाजान छोटे नवाब पर चाकू से हमला किया गया. मीडिया ने ‘सब से तेज’ बनने की होड़ में वीरू पाजी को असली देहांत से पहले ही श्रद्धांजलि दे दी.


सोशल मीडिया पर भारतीय ‘धुरंधर’ से ज्यादा पाकिस्तानी डकैत ने लोकप्रियता हासिल की. अपने सैयारा के लिए नौजवान सिनेमाघरों में सिसकियां लेते दिखे. कपिल शर्मा के शो में हंसी की बौछार कम और उस के कैफे पर गोलियों की बौछार ज्यादा चर्चा में रही. खेल, चुनाव और क्षेत्रीय संगीत आईपीएल में बैंगलुरु की जीत के जश्न में फैंस ने कुरबानी तक दे डाली. एसआईआर के बाद बिहार चुनाव में प्लसमाइनस का खेला देखने को मिला. पुराने उम्मीदवारों का टिकट और पुराने अवैध वोटर का नाम कटा, तो नए उम्मीदवार को टिकट और वोटर लिस्ट में नए वोटर का नाम जुड़ा.


फाइनली सुशासन की रीलौंचिंग हुई, हालांकि इस दौरान मछलीपालन नौटंकी, टिकटकटवा ड्रामा, जूतमपैजार और गालीगलौज के चुनावी मैटेरियल ने वोटरों का भरपूर मनोरंजन किया. आखिरी सीन : गो इंडिया से इंड ‘गो’ क्राइसिस हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा का सपना भले ही पूरा न हुआ हो, लेकिन इंडिगो क्राइसिस ने टाई पहनने वालों को भी हलकान कर दिया. इस साल के आखिर में इंडिगो ने यात्रियों के ‘गो’ पर ‘इंड’ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. साल 2025 में भी नाम बदलो, भाग्य बदलो अभियान जारी रहा. राजभवन से लोक भवन, पीएमओ से सेवा तीर्थ, मनरेगा से ‘जी राम जी’… नाम बदलते रहे. डौलर के मुकाबले रुपया भी नेताओं के चारित्रिक असर का अनुसरण करता दिखा और गिरने में मौद्रिक महारत हासिल की.


बाढ़, चुनाव और अपराध का सीजन समय पर आया. दिवालिया साल में दीवाली को यूनैस्को की विश्व धरोहर में जगह मिली. भारत में पाकिस्तानी ‘रहमान डकैत’ का डांस और हिजाब मामले के चलते पाकिस्तान में भारतीय ‘सुशासन बाबू’ सुर्खियों में बने रहे. कुलमिला कर, साल 2025 ने साबित कर दिया कि भारत में मनोरंजन के लिए सिनेमाघर की जरूरत नहीं, बल्कि खबरें ही काफी हैं. धुरंधर साल 2025 के इस मजाकिया पोस्टमार्टम का यहीं द एंड किया जाता है, क्योंकि नए साल 2026 का लाइव टैलीकास्ट शुरू हो चुका है.      Political Story   

Bihar Elections 2025: दलितमुसलिम बनाम पुराणवादी व्यवस्था का चुनाव

Bihar Elections 2025: साल 2014 में जब बिहार की राजनीति भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अहम फैसला लेते हुए भाजपा के सहयोग से महादलित मुसहर समुदाय से आने वाले नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था.

यह कोई उदारता नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार की मजबूरी हो गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 40 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी.

अपने खिलाफ पनप रहे चौतरफा असंतोष और विरोध को काबू करने के लिए उन का यह टोटका तात्कालिक तौर पर कामयाब रहा था, लेकिन दिक्कत उस वक्त खड़ी हो गई, जब जीतनराम मां झी अपने वादे से मुकर गए और यह तक कहने लगे थे कि मैं कोई रबर स्टांप सीएम नहीं हूं.

जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बन जाने से हुआ क्या, दलितों के लिहाज से इस के कोई खास माने नहीं, क्योंकि उन्होंने भी दलितों के भले के लिए कुछ नहीं किया. 9 महीने के अपने कार्यकाल में जीतनराम मां झी ने जो बड़ी गलतियां की थीं, उन में से एक थी मंदिर जाना.

यों किसी भी मुख्यमंत्री का मंदिर जाना कोई हैरत की बात नहीं होती, लेकिन उन का जाना जरूर हैरत की बात थी, क्योंकि वे वक्तवक्त पर खुद को न केवल नास्तिक कहते रहे हैं, बल्कि मनुवाद सहित हिंदू धर्मग्रंथों की भी आलोचना करते रहे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी ने साल 2015 में कहा था, ‘‘मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि अगर भगवान होते तो दलितों पर इतना अत्याचार क्यों होता? मंदिरों में अब भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है, इसलिए मु झे मंदिरों में कोई आस्था नहीं.’’

21 सितंबर को जीतनराम मांझी ने रामायण की कहानी को काल्पनिक बताया और 2 महीने बाद ही 19 दिसंबर को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मैं राम में विश्वास नहीं करता. राम कोई व्यक्ति नहीं था.’’

अंबेडकर जयंती के मौके पर बोलते हुए जीतनराम मांझी ने दलितों को धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने का मशवरा भी दिया था. 17 मार्च, 2023 को उन का एक बयान था, ‘‘रामायण एक काल्पनिक कृति है. रावण राम से अधिक मेहनती और कर्मकांड में निपुण था.’’

इस पर जब हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें घेरा तो उन का बयान था कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले धर्म के ठेकेदारों को भी आलोचना का सामना करना चाहिए.

जीतनराम मांझी अगर अपनी बातों और बयानों पर टिके रहते तो तय है कि बड़े राष्ट्रीय नेता होते, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा ने उन की इतनी दुर्गति कर दी है कि मौजूदा चुनाव में वे अपने मनमुताबिक सौदेबाजी भी नहीं कर पाए. उन का और उन की हम पार्टी का क्या हुआ, यह तो नतीजे बताएंगे, पर अकसर भाजपा को दलितों की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते रहने वाले जीतनराम मां झी और उन के जैसे दलित नेता भी इस गुनाह के कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपनी खुदगर्जी के लिए जब चाहे रामनामी चादर ओढ़ लेते हैं. इन्हीं तथाकथित ‘नास्तिक’ जीतनराम मां झी की मुख्यमंत्री रहते ही एक मंदिर में जो बेइज्जती हुई थी, तो वे तिलमिला उठे थे.

बेआबरू होते दलित नेता

मामला अगस्त, 2014 का है जब जीतनराम मां झी औररंगाबाद के देव मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए चले गए थे. यह सूर्य मंदिर है जहां छठ के दिन बेतहाशा भीड़ उमड़ती है. पूजन और दर्शन की उन की मंशा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि मंदिर के पुजारियों और स्थानीय ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंदिर में दाखिल होने से रोक दिया था कि भले ही वे मुख्यमंत्री हों लेकिन चूंकि दलित हैं, इसलिए सीधे मंदिर में जा कर पूजा नहीं कर सकते.

बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर मंदिर से दलित होने का ‘प्रसाद’ आम दलितों की तरह ले कर जीतनराम मां झी भुनभुना और तिलमिला कर यह कहते रह गए कि जो लोग बाहर मेरे पांव पड़ते हैं वही आज मु झे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं, लेकिन इस अपमान का बदला वे नहीं ले पाए, न ही ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों और पुराणवादियों को कोई सबक या नसीहत दे पाए, उलटे मंदिर के बाहर से ही उन्होंने पूजापाठ किया था और तरस खाने वाली एक बात यह भी थी कि उन के जाने के बाद इस मंदिर को धो कर पवित्र किया गया था.

आज उसी ब्राह्मण और बनियावादी भगवा खेमे के साथ मिल कर जीतनराम मां झी चुनाव लड़ रहे हैं, जो सदियों से दलितों को प्रताडि़त करता रहा है, भेदभाव करता रहा है और आज भी उन का शोषण बदस्तूर कर रहा है.

अब भला कौन जीतनराम मां झी और उन जैसे दोहरे चरित्र वाले दलितों से पूछे और किस को वे बताएं कि इस देश में दलित होने के माने क्या होते हैं और क्यों दलित मंदिर जा कर पूजाअर्चना करने की ख्वाहिश और जिद पर अड़े रहते हैं, जबकि शोषण, भेदभाव और जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थल यही मंदिर हैं, जहां राज कानून संविधान या उस के आर्टिकल 17 का नहीं, बल्कि पुराणवादियों का चलता है. इस से वे कोई सम झौता किसी भी शर्त पर नहीं करते. हां, तगड़ी दक्षिणा मिले तो दलितों को भी सवर्णों की तरह पूजापाठ करने की इजाजत दे देते हैं, वह भी अहसान की शक्ल में.

प्रसंगवश यह जान लेना जरूरी है कि यही जिद कभी राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद ने भी की थी. लेकिन इन पुराणवादियों ने बख्शा उन्हें भी नहीं था.

मामला 18 अक्तूबर, 2018 का है, जब वे अपनी पत्नी सविता कोविंद सहित पुरी के जगन्नाथ मंदिर गए थे. चूंकि मामला राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का था, लेकिन उस पर बैठा व्यक्ति कोरी यानी दलित समुदाय का था, इसलिए हल्ला कम मचा, क्योंकि मामले पर लीपापोती कर दी गई थी, पर उन्हें भी प्रवेश से रोकने की कोशिश की गई थी, उन के साथ लगभग धक्कामुक्की की गई थी. सच जो भी हो लेकिन मंदिर के अंदर जाने की इजाजत उन्हें मिल गई थी.

ठीक उसी दिन यह खबर भी सुर्खियों में रही थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान दिया. मुमकिन है कि यह सौदा रहा हो.

ऐसी सौदेबाजियां समाज में अब बेहद आम हैं, जिन के तहत पंडेपुजारी पैसे वाले दलितों के घर मनमुताबिक दक्षिणा मिल जाने पर पूजापाठ करने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उन का सब से बड़ा भगवान यही पैसा होता है जिस के लिए सारे धार्मिक छलप्रपंच रचे गए हैं. ये वे शिक्षित और संपन्न हो गए दलित हैं जो अपना मसीहा तो भीमराव अंबेडकर को मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने कई बार बहुत साफतौर पर नसीहत दलितों को दे रखी थी कि पुराणवादियों के अत्याचारों से छुटकारा चाहिए तो स्कूलकालेजों को मंदिर सम झो और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानो.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मंत्र यही दिया था कि मंदिर और धर्मग्रंथ छोड़ो और सीधेसीधे मनुवादियों से राजनातिक स्तर पर भिड़ो, तो जीत भी सकते हो.

ऐसा होता दिखने भी लगा था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने कैसे भाजपा के सामने हथियार डालते हुए घुटने भी टेक दिए, यह हर किसी ने देखा. यह ठीक है कि मायावती कभी मंदिर नहीं गईं लेकिन इस से उन के गुनाह पर परदा नहीं डल जाता.

बिहार में यही काम जीतनराम मांझी के बाद चिराग पासवान कर रहे हैं जिन के लिए उन के पिता रामविलास पासवान विरासत में अच्छीखासी सियासी पूंजी छोड़ गए हैं.

फिल्मों और क्रिकेट में नाकाम रहे चिराग पासवान ने अपने पिता के उसूलों को तोड़तेमरोड़ते भाजपा का हाथ थामने के लिए खुद को धार्मिक और कर्मकांडी साबित करते हुए पिता की तेरहवीं धूमधाम से की थी, अपना सिर मुंडाया था, गंगा पूजन किया, मृत्युभोज दिया और ब्राह्मण पूजन भी किया था, जबकि रामविलास पासवान का मानना था कि दलितों के पिछड़ेपन और शोषण की बड़ी वजह यही ढोंग और पाखंड हैं, इसलिए वे कभी इन चक्करों में नहीं पड़े और अपनी शर्तों पर भाजपा से सम झौता करते रहे.

लेकिन अब उलटा हो रहा है. चिराग पासवान इतने बेबस हो गए हैं कि भाजपा के इशारे पर नाचते रहने के सिवा उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा.

बिहार के ये दोनों ही नेता भाजपा की गोद में बैठ कर मायावती की तरह वोट शिफ्टिंग वाला खेल खेलते हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीधेसीधे पुराणवादियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

90 के दशक के लालू राज में दलितपिछड़े साथसाथ थे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना रोल मौडल मानते थे. लालू प्रसाद यादव जानतेसम झते थे कि न केवल दलित पिछड़ों, बल्कि मुसलिमों की भी सब से बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा ही है. लिहाजा, उन्होंने खुलेआम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के मनुवाद के चिथड़े उड़ाते हुए इन दोनों समुदायों को साध लिया था.

मुसलिम भी कम परेशान नहीं

19 फीसदी मुसलिम आबादी वाले बिहार में मुसलिमों की हालत भी दलितों सरीखी ही है. वे भी मुख्यधारा से दूर हैं और पुराणवादियों के धार्मिक तिरस्कार, प्रताड़ना और अनदेखी के शिकार हैं.

इन का भी दलितों की तरह कोई सियासी बड़ा नेता नहीं है. आजादी के बाद यह वर्ग कांग्रेस को अपना हितैषी सम झ कर उसे वोट करता रहा, लेकिन लालू युग की शुरुआत से ही राजद का हो लिया.

लालू प्रसाद यादव की तो राजनीति ही यादवों के साथसाथ मुसलिमों के कंधों पर टिकी थी जिसे पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘एमवाय’ का नारा दिया था.

साल 2024 में बिहार में 7 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिन में कोई दर्जनभर मुसलिम मारे गए थे. हिंदू तीजत्योहारों पर तो मुसलिमों की शामत सी आ जाती है. मुसलिम बहुल इलाकों से जब हिंदुओं के जुलूस वगैरह निकलते हैं, तो मुसलिम दुआ मांगने लगते हैं कि सब कुछ ठीकठाक निबट जाए, नहीं तो खैर नहीं.

नीतीश राज से उन्हें कोई एतराज या परेशानी नहीं होती, लेकिन जब भी नीतीश राम भक्तों की पार्टी के पहलू में जा बैठते हैं तो मुसलिम खुद को पहले से ज्यादा असुरक्षित और असहज महसूस करने लगते हैं.

मोदी राज में बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर बिहार में मुसलिमों को निशाने पर अकसर लिया जाता रहा है. पूर्वी सीमांचल के जिलों कटिहार और किशनगंज में तो यह आएदिन की बात हो गई है जहां के मुसलिम खुद को पराया सम झने लगे हैं.

90 फीसदी मुसलिम रोज कमानेखाने वाले हैं, जो छोटेमोटे काम कर के जैसेतैसे गुजारा करते हैं. एसआईआर में दलितों के साथ मुसलिमों के नाम सब से ज्यादा कटे हैं, जिस पर कांग्रेस और राजद ने जम कर बबाल काटा था.

चुनाव आतेआते यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, लेकिन मुसलिम तबका मन बना चुका है कि अब भाजपा से चार हाथ दूर ही रहना है और जनता दल (यू) से भी परहेज करना है.

न केवल धर्म बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलिम और दलित एकदूसरे को नजदीक महसूस करते रहे हैं. 90 के दशक में दोनों ने दिल से लालू प्रसाद यादव को वोट किया था. इस के बाद नीतीश कुमार पर भी उन्होंने भरोसा जताया और पिछले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के साथ यह सोचते हो गए थे कि शायद वे हमे सुरक्षा दे पाएं. पर जल्द ही साफ हो गया कि ओवैसी बिहार में मुसलिम वोटों की फसल काटने आए थे, जिन की कोई जमीनी पकड़ या संगठन नहीं है. सभी से मोह भंग होने के बाद इस बार फिर यह तबका महागठबंधन की तरफ झुक रहा है, क्योंकि ज्यादातर दलित भी अब जद (यू) पर भरोसा नहीं कर रहे.

साथ होंगे दलितमुसलिम

मंडल कमीशन के बाद कमंडल की राजनीति बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह परवान नहीं चढ़ पाई थी, तो लालू प्रसाद यादव इस की एक बड़ी वजह थे. उन की हरमुमकिन कोशिश भाजपा को रोकने की रही, क्योंकि इस के खतरे और नुकसान उन्हें सम झ आ रहे थे कि अगर कभी धोखे से भी भाजपा अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज हो पाई तो बिहार में भी पूरी तरह ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा.

साल 2020 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि न केवल दलित बल्कि मुसलिम वोट भी बंटे थे. इस चुनाव में राजग को 125 सीटें मिली थीं जिन में से भाजपा को 74 और 43 जनता दल (यू) के खातें में गई थीं. हम और वीआईपी के खाते में 4-4 सीट आई थीं.

महागठबंधन में राजद को 75 और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं, तो वामपंथी दल 16 सीटें ले जाने में कामयाब रहे थे. लोजपा को गिरते पड़ते एक सीट जमुई की मिल पाई थी, लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम को उम्मीद से ज्यादा 5 सीटें मिली थीं. हालांकि, बाद में उस के 4 विधायक राजद में चले गए थे. हैरत की बात महागठबंधन का वोट शेयर 37.5 फीसदी राजग के 37.3 फीसदी से 0.2 फीसदी ज्यादा होना रहा था.

इस चुनाव में चिराग पासवान की मंशा राजद के वोट काटने की ज्यादा थी, जिस में वे कामयाब भी रहे थे. कोई 15 सीटों पर लोजपा ने राजद के वोट काटे थे, जिन में दलितमुसलिम वोट ज्यादा थे. हालांकि, राजद से कहीं ज्यादा नुकसान जद (यू) को उठाना पड़ा था, लेकिन उस की भरपाई भाजपा ने कर दी थी.

महागठबंधन को दूसरा बड़ा नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था, क्योंकि मुसलिम बहुल सीटें जो राजद और कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थीं, उन्हें ओवैसी की पार्टी झटक ले गई थी.

इस जीत ने साफ कर दिया था कि एआईएमआईएम को मुसलिमों के साथ साथ दलित वोट भी मिले हैं. हालांकि, 4 विधायकों के पाला बदल लेने से एआईएमआईएम की साख पर बट्टा ही लगा था. मुसलिमों को सम झ आ गया था कि इस पार्टी से उन के भले की उम्मीद करना बेकार की बात है.

बिहार में मुसलिम वोट तकरीबन 18 फीसदी और दलित वोट 19 फीसदी हैं, जो निर्णायक है और महागठबंधन के पाले में जाना तय हैं, जिस की दावेदारी 14 फीसदी यादव वोटरों की भी है. इस तरह 51 फीसदी वोट अगर महागठबंधन को मिलते हैं, तो उसकी राह में कोई रोड़ा है नहीं.

लेकिन यही अंदाजा पिछले चुनाव में भी सियासी पंडितों का था जो पूरी तरह गलत नहीं निकला था, क्योंकि मामूली ही सही पर महागठबंधन का वोट फीसदी राजग से ज्यादा था. एआईएमआईएम ने 1.25 फीसदी मुसलिम वोटों और 5 सीटों को हथियाया था तो हम और लोजपा ने कोई 7 फीसदी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

इस बार इन वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी कर रही है. लेकिन दलितमुसलिम दोनों ही दूध के जले हैं, लिहाजा छाछ होंठों तक ले जाने की हिम्मत जुटा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा.

शुरू में ऐसा लग रहा था कि भूमिहार होने के चलते पीके केवल 15 फीसदी सवर्ण वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही उन का दखल दलितमुसलिम बहुल बस्तियों और सीटों में बढ़ा तो साफ हो गया कि उन की असल मंशा क्या है.

वैसे भी बिहार में अनिश्चितता का माहौल है खासतौर से दलितमुसलिम ज्यादा सहमे हुए हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर लुभाने की कोशिश कर तो रहे हैं, लेकिन उन के पास कोई ठोस आधार नहीं है सिवा बातों, वादों और आश्वासनों के. ऐसे में वे खुद को बिहार का अरविंद केजरीवाल साबित कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उन के पीछे न कोई अन्ना हजारे है और न ही बड़ा कोई आंदोलन है, जो लोगों का मन बदल सके.

बिहार में बहुतकुछ साफ भी है कि पुराणवादियों का दबदबा खत्म होना चाहिए और इस के लिए दलितमुसलिम एकजुट हो गए तो राजग को झटका भी लग सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार अब सिर्फ 3 फीसदी कुर्मियों के नेता रह गए हैं और सेहत भी उन का साथ नही दे रही. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संविधान का हवाला और वास्ता दे कर आगाज तो अच्छा कर दिया है. Bihar Elections 2025

Bihar Elections 2025: नई मतदाता सूची पर उठे सवाल

Bihar Elections 2025: बिहार के चुनावों के लिए तैयार की गई मतदाता सूची में काफी नाम जोड़े गए हैं, काफी हटाए गए हैं. पर लगता है कि अब जो सूची तैयार हुई है वह बहुत गलत नहीं है. अब तो मतदान के दिन पता चलेगा, जब लोग वोट डालने जाएंगे और उन्हें अपना नाम नहीं मिलेगा.

नीतीश कुमार और केंद्र सरकार ने काफी कोशिश की थी कि मतदाता सूचियों में ऐसे बदलाव किए जाएं कि मतदान का फैसला उलटा हो सके. सरकार को मालूम है कि बिहार के लोग अपने हकों के लिए लड़ने वाले नहीं हैं. वे ज्यादातर जमींदारों की गुलामी के आदी रहे हैं और अंगरेजों के आने से पहले भी कभी खड़े नहीं हुए, इसीलिए 1700 के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पैर कोलकाता के सैंटर से उस समय सिर्फ ट्रेड करनेके लिए फैलाने शुरू किए, उन्होंने बिहारी मजदूर और बिहारी सैनिक रखे.

1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद अंगरेजों की फौज में 70 फीसदी बिहारी राजपूत और ब्राह्मण हुआ करते थे जिन के बल पर उन्होंने धीरेधीरे पूरे भारत पर कब्जा किया. 1857 के बाद जरूर उन्होंने बिहारी ब्राह्मणों को सेना में रखना कम कर दिया था पर दूसरे गोरे व्यापारी बिहारियों को ही उन की सहने की आदत की वजह से रखते थे.

मौरीशस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम में एग्रीमैंट कर के गए भारतीयों में से ज्यादातर यहीं के लोग थे, जिन्हें गिरमिटिया मजदूर कहा जाता था. जब मुंबई, अहमदाबाद में मिलें लगनी शुरू हुईं तो ढेरों बिहारी गए, क्योंकि वे हुक्म मानने वाले हुआ करते थे.

नीतीश कुमार जो तकरीबन 20 वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री हैं, इसीलिए सत्ता में हैं क्योंकि एक आम बिहारी की तरह वे जो मालिक है उस के साथ हो जाते रहे हैं. लालू प्रसाद यादव ने बिहारियों को हक दिलाने की कोशिश की पर फिर ऊंची जात वालों ने ऐसे फंदे फेंके कि उन्हें अपनी जिंदगी कचहरियों और जेलों में बितानी पड़ी.

मतदाता सूची में से लाखों नाम कट जाते तो वे चूं नहीं करते और इसीलिए ज्ञानेश कुमार जैसे अफसर को चुनाव आयुक्त की तरह लगाया गया जो पूरी तरह सरकार के साथ था.

यह तो राहुल गांधी की न्याय यात्रा और वोट चोरी का इलजाम था कि जो मतदाता सूची अब तैयार हुई है उस पर मोटेतौर पर कोई हंगामा नहीं मच रहा. 14 नवंबर को फैसला चाहे जो भी आए, यह तो दिखता है कि आम बिहारी का वोट का हक पक्का रहेगा. राहुल गांधी ने पूरे देश में वोट की कीमत भी बता दी है और चुनाव आयोग अब कानून की आड़ में खड़ा हो कर कहीं भी वोटों की काटाछांटी नहीं कर सकेगा.

संविधान की खैरियत इसी में है कि लोगों का वोटों का हक जान के जैसा रहे. सरकारें इसे छीनेंगी क्योंकि वे अब नहीं चाहतीं कि डैमोक्रेसी के नाम पर उन पर बंदिशें लगें. अब जो जीतता है वह डोनाल्ड ट्रंप की तरह महामहिम बनना चाहता है जो हर सुबह नए तुगलकी फरमान जारी कर सके. अमेरिका में न सही भारत में लगता है वोट का हक अब छीनना आसान नहीं रह गया है.

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खेलों में हारजीत चलती रहती है पर जिस तरह से भारतपाकिस्तान के 3 मैच एशिया कप में लगभग बराबरी पर खत्म हुए उस से साफ है कि इस मामले में दोनों टीमें एकदूसरे के खिलाफ नहीं, एकदूसरे के साथ लाखों जुआ और सट्टा लगाने वालों के लिए खेल रही थीं. 14 सितंबर को हुए मैच में तो भारत की टीम ढंग से खेली पर 21 सितंबर को केवल डेढ़ ओवर आगे रह कर, फाइनल में केवल 3 बौल आगे रह कर दोनों टीमों ने सट्टेबाजों को करोड़ों नहीं, अरबों का फायदा दिलाया था.

भारत और पाकिस्तान अब सिर्फ क्रिकेट खेलते हैं. वह भी 22 लोगों को खिलाते हैं और बाकी तो जुआ खेलते हैं. इस जुए में कि भारत जीतेगा कि पाकिस्तान जीतेगा, इस बौल में कैच आउट होगा या चौका लगेगा, इस बैट्समैन के 10 रन बनेंगे या 50 पर जबरदस्त शर्तें लगती हैं. लाखों को किक मिलती है जो अच्छे से अच्छे खेल में नहीं मिलती.

टीवी पर मैच देखना भारतीय जनता का सब से बड़ा खेल है. मोबाइल पर रील्स देखने के बाद भारत और पाकिस्तान के युवा कुछ करते हैं तो भारतपाकिस्तान का मैच देखते हैं जो कुंभ की तरह कभीकभार ही होते हैं. एशिया कप के आयोजकों ने सम झ लिया था इसीलिए उन्होंने दोनों को 3-3 बार खिलवाया जो साफ है कि एक स्कीम के हिसाब से हुआ.

सट्टेबाजी हर जगह होती है पर यहां अब खेलों के नाम पर सिर्फ सट्टेबाजी बची है. एथलैटिक्स और कुश्ती में जहां भारतीय खिलाड़ी मैडल ले आते हैं, न दर्शक होते हैं, न मैच फिक्सिंग होती है. सट्टेबाजी का तो सवाल ही नहीं उठता.

इस सट्टेबाजी में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लगे हुए थे क्योंकि भारत की टीम के जीतने पर उन्होंने उसे ‘आपरेशन सिंदूर’ से जोड़ते हुए बधाई दे दी. इंटरनैशनल क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड असल में वैसे ही भारत सरकार की एक यूनिट है और सारे फैसले भारत को देख कर लिए जाते हैं क्योंकि क्रिकेट में पैसा तो भारत के दर्शक ही देते हैं. टीवी राइट्स अरबों में बिकते हैं क्योंकि विज्ञापन करने वालों को पता है कि भारतीय बदहाल युवा कामधाम छोड़ कर इन्हें जरूर देखेंगे और वहां वे अपना पानमसाला जबरदस्त तरीके से बेचते हैं.

एशिया कप हो, वर्ल्ड कप हो, टी 20 हो, वनडे हो यह तमाशा चलता रहता है क्योंकि यह एक जगह है जहां से पाकिस्तान के बहाने हिंदुस्तान के मुसलमानों को कहने का मौका मिलता है कि दिखा दिया न, तुम्हारी औकात क्या है.

फुटबाल, टैनिस, फील्ड गेम्स, तैराकी, जिमनास्टिक जैसे बीसियों खेलों में भारत व पाकिस्तान की टीमें कहीं नजर नहीं आएंगी. पहले जिस हौकी पर ब्रिटिश इंडिया के समय से कब्जा था वह खेल भी 20-25 साल पहले हाथ से निकल गया क्योंकि वहां फिक्सिंग नहीं होती, सट्टा नहीं लगता. एशिया कप में भारत और पाकिस्तान दोनों की क्रिकेट टीमें जीती हैं, दोनों के खिलाडि़यों ने न जाने कहांकहां कमाया होगा. Bihar Elections 2025

Bihar Elections 2025: एससी, एसटी, मुसलिम को नेता नहीं मसीहा चाहिए – पर कैसा?

Bihar Elections 2025, लेखक – शकील प्रेम

बिहार के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों एससी, एसटी और मुसलिम वोटों को जमा करने के लिए हाथपैर मार रही हैं. पर ये समाज जानते हैं कि वे सताए हुए हैं, उन से जम कर भेदभाव होता है, उन्हें कदमकदम पर बेइज्जत किया जाता है, उन के पढ़ने, साथ बैठ कर खाने के हक, रोटीबेटी के संबंध बनाने में हजारों रुकावटें हैं, फिर भी तकरीबन बहुमत में होते हुए भी वे बेबस हैं, बेचारे हैं, गरीब हैं, गंदे घरों में मैला पानी पीते हैं. सिर्फ वोटों के समय उन की पूछ होती है.

एससी व मुसलिम समाज में नेताओं और बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है. नेता तो थोक के भाव में हैं. खुद को मसीहा कहने वाले भी हैं और साहित्य का भी अंबार लगा है, फिर भी यह समाज दलित, गरीब, कमजोर और लाचार बना हुआ है. क्यों?

एससी, एसटी और मुसलिम वर्ग का अगर कोई किसी बड़ी पोस्ट पर पहुंच भी जाए तो उसे या तो मोहरा बन कर रहना होगा वरना उसे बुरी तरह बेइज्जत कर के अलगथलग कर दिया जाएगा.

क्या है असली वजह

दलित समाज, जिसे संवैधानिक तौर पर शैड्यूल कास्ट यानी एससी (अनुसूचित जाति) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, की आबादी तकरीबन 17 फीसदी है. एससी वर्ग को राष्ट्रीय स्तर पर 15 फीसदी संवैधानिक आरक्षण मिला हुआ है. तकरीबन पूरा एससी समाज ही आरक्षण के दायरे में है और यह आरक्षण राजनीति, पढ़ाईलिखाई और सरकारी नौकरियों के लिए दिया गया है. सरकारी शिक्षण संस्थानों जैसे आईआईटी, आईआईएम में एससी वर्ग के लिए 15 फीसदी सीटें आरक्षित हैं.

इस के अलावा स्कौलरशिप, फीस छूट और छात्रावास की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं. नौकरियों की बात करें तो केंद्रीय और राज्य सरकार की नौकरियों में 15 फीसदी पद आरक्षित हैं. आर्टिकल 16(4ए) के तहत इन्हें प्रमोशन में भी आरक्षण मिलता है और यह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भी लागू है.

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित होती हैं. इस आरक्षण के तहत तकरीबन 84 लोकसभा सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं. इन सीटों पर उम्मीदवार एससी वर्ग का होता है, लेकिन वोट सभी मतदाता दे सकते हैं. कुछ और जनरल सीटों पर भी एससी, एसटी, मुसलिम वर्ग के लोग जीत कर आ जाते हैं.

पंचायत स्तर के चुनाव हों या नगरनिगम के चुनाव यहां भी एससी वर्ग के लिए सीटें आरक्षित होती हैं.

ग्रामीण और शहरी विकास योजनाओं में भी आरक्षण के तहत एससी वर्ग को प्राथमिकता दी जाती है.

शिक्षा, राजनीति और नौकरियों में आरक्षण की बदौलत एससी वर्ग के माली और सामाजिक हालात में सुधार हुआ है, लेकिन जातिगत भेदभाव, गरीबी और उत्पीड़न के चलते एससी वर्ग अभी भी हाशिए पर ही है.

पढ़ाईलिखाई, नौकरी और राजनीति में आरक्षण के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में 80 फीसदी से ज्यादा दलित व मुसलिम रहते हैं, जहां वे आज भी भूमिहीन और मजदूर हैं. सन 1991 के उदारीकरण के बाद देश के कुछ दलितों के हालात बेहतर हुए हैं, लेकिन ज्यादातर अभी भी गरीबी रेखा से नीचे ही हैं.

गरीबी सूचकांक 2021 के अनुसार एससी वर्ग में एकतिहाई लोग आज भी गरीबी रेखा से नीचे हैं, वहीं 2023 में हुए बिहार सर्वे में एससी परिवारों में से 43 फीसदी परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं.

कुलमिला कर एससी वर्ग में गरीबी राष्ट्रीय औसत (21 फीसदी) से दोगुनी है. अगर ओबीसी को भी उन के साथ जोड़ लिया जाए, जिन के साथ पुराणों में ब्राह्मणों ने व्यवस्था वहीं कर रखी है जो अब एससीएसटी के साथ होती है, तो गरीब 75-80 फीसदी हो जाएंगे. वर्ण व्यवस्था में उन्हें शूद्र कहा गया है.

राष्ट्रीय साक्षरता दर 80.9 फीसदी है, लेकिन एससी में यह सिर्फ 70 फीसदी के आसपास ही है. एससी लड़कियों में साक्षरता दर मात्र 24.4 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 42.8 फीसदी है. आज भी पैसे की कमी और भेदभाव के चलते प्राइमरी लैवल पर ही 50 फीसदी दलित और मुसलिम बच्चे स्कूल छोड़
देते हैं.

एससी वर्ग के लिए गहरे सवाल

सवाल यह है कि तमाम तरह के संवैधानिक हकों और सरकारी सुविधाओं, अवसरों और प्राथमिकताओं के बावजूद एससी वर्ग मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाया है, तो कमी किस की है? इस में कोई दो राय नहीं है कि एससी वर्ग के लिए ऊंचे समाज की सोच में सुधार नहीं हुआ है. हर स्तर पर नाइंसाफी, बेईमानी और भेदभाव जारी है, जिस के चलते आज भी इस वर्ग में गरीबी बनी हुई है. लेकिन इस के लिए दूसरों को दोष कब तक दिया जाएगा?

दुनिया के इतिहास में हर जगह कमजोरों को दबाया गया है और आज भी पूरी दुनिया में कमजोरों के साथ अनेक तरह के भेदभाव होते हैं. कहीं कोई मसीहा नहीं आता, बल्कि कमजोरों को खुद से अपनी कमजोरियों को सम झना और उन से जू झ कर निकलना होता है.

मसीहा सिर्फ धर्म के किस्सों में आते हैं. यूरोप के यहूदियों ने सन 150 से ले कर सन 1945 तक हजारों साल तक यूरोप में दमन और उत्पीड़न को झेला, लेकिन उन्होंने दूसरों पर दोष मढ़ने की बजाय खुद की तरक्की के रास्ते तलाशे और आज वे इजरायल में दुनिया की सब से ताकतवर कौम बन कर उभरे हैं.

एससीएसटी के साथ इतिहास में हिंदू राजाओं और बाद में दूसरों के हाथों भी बहुत नाइंसाफी हुई है, जिस की वजह से वे संसाधनों से वंचित रहे, लेकिन सन 1950 में संविधान ने उन्हें मौका दिया. बराबरी का दर्जा दिया, जिस की वजह से इस समाज में मुट्ठीभर नेता पैदा हुए. कुछ बड़े अफसर भी बने. कहींकहीं उद्योगपति भी उभरे, फिर भी ज्यादातर समाज वहीं का वहीं रहा.

आजादी के बाद से देश की संसद में एससी वर्ग के कम से कम 84 सांसद बैठे होते हैं. दलितों की आबादी के अनुपात के हिसाब से संसद में बराबर की नुमाइंदगी होते हुए भी कैसा रोना? राजनीतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद एससी वर्ग कमजोर क्यों है? इस सवाल पर इस वर्ग को सोचविचार जरूर करना चाहिए.

पढ़ाईलिखाई पाने के मौके में इस पूरी आबादी को रिजर्वेशन मिला है. उन के दरवाजे हर सरकारी स्कूल के लिए खुले हैं. इस के बावजूद यह समाज सब से ज्यादा अंगूठाछाप क्यों है? इस समाज के पढ़ेलिखे लोग क्या कर रहे हैं? क्या पढ़ेलिखे और अमीर लोगों की अपने समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? जो आगे बढ़ चुके हैं, वे दूसरों के लिए सीढि़यां क्यों नहीं बना रहे हैं और उन्हें गहरे गड्ढे से निकाल क्यों नहीं रहे हैं? वे क्यों नहीं भेदभाव की खाई पाट पा रहे हैं?

विचार जरूरी है

विचारों से दुनिया बदलती है. विचारों की ताकत से हालात बदले जा सकते हैं, लेकिन एससी वर्ग ने विचारों को अहमियत ही नहीं दी. विचारों का मतलब तक जानने की कोशिश नहीं की. वे व्यक्तिपूजा में लग गए. उन्हें लगा कि ऊंची जातियों की तरह वे भी किसी बुत को पूज कर अपना भाग्य सुधार लेंगे.

विचारों से ही तरक्की होती है, लेकिन तरक्की के विचार जिस समाज में पैदा ही न हों, उस समाज में कितने ही मसीहा जन्म लें, तरक्की नहीं हो सकती.

एससी समाज में डाक्टर भीमराव अंबेडकर पैदा हुए, जिन के नाम पर हजारों संगठन बने. इन संगठनों से निकल कर हजारों नेता पैदा हुए जिन्होंने डाक्टर अंबेडकर की पूजा करवानी शुरू कर दी, लेकिन इन नेताओं ने समाज को स्कूली पढ़ाईलिखाई भी पाने का फायदा नहीं सम झाया. पढ़ाईलिखाई से अच्छी समझ पैदा होती है. सम झ सही हो तो समाज यकीनन तरक्की करता है.

इस वर्ग के कुछ लोग पढ़ेलिखे जरूर, लेकिन वे समाज से कट गए. जो नेता बने उन्होंने अपने फायदे की खातिर समाज का फायदा उठाया और जमीन से इतने ऊपर उठ गए कि समाज से ही गायब हो गए. बाकी का समाज किसी मसीहा के इंतजार में वहीं का वहीं पड़ा है. उलटे वह जुल्म करने वाले ऊंचों की चाटुकारिता ज्यादा जोर से कर रहा है.

कैसा मसीहा चाहिए

मसीहा कोई एक इनसान नहीं होता, बल्कि मसीहा हर वह इनसान होता है जो हालात को बदल देता है. अगर कोई अनपढ़ है, लेकिन उस ने अपने बच्चों को केवल पढ़ायालिखाया ही नहीं, बल्कि सम झदार और होशियार भी बना दिया है, तो वह अपने बच्चों के लिए मसीहा ही है. अगर कोई गरीब है और अपनी मेहनत से संसाधन जुटा लेता है तो वह अपने परिवार के लिए मसीहा ही है. अगर कोई पढ़ालिखा इनसान अपने समाज के बच्चों को पढ़ाता है, हुनरमंद बनाता है तो वह उस समाज के लिए मसीहा ही है.

जिस इनसान को अपने समाज के दर्द से मतलब नहीं, वह पढ़ालिखा होते हुए भी गंवार ही होता है. और जो अनपढ़ होते हुए भी अपने समाज की चिंता करे वही सम झदार कहलाता है. एससी वर्ग में कितने तथाकथित मसीहा आए और गए, लेकिन समाज वहीं का वहीं रहा.

यहूदियों में कोई मसीहा नहीं पैदा हुआ फिर भी वे आज सब से ताकतवर कौम बन कर उभरे हैं. इस की वजह यह है कि यहूदियों ने किसी मसीहा का इंतजार नहीं किया, बल्कि हर यहूदी अपनेआप में मसीहा बना. यहूदियों ने पढ़ाईलिखाई की अहमियत को सम झा और बुरे हालात में भी इस से सम झौता नहीं किया.

ब्राह्मण समाज आज सब से अमीर है. क्या ऐसा करने में उस के किसी मसीहा का नाम मालूम है? किसी नेता का क्या योगदान रहा है उन के आज हर जगह सत्ता में रहने का? पारसियों के बीच कितने मसीहा पैदा हुए?

पारसियों को कभी किसी मसीहा की जरूरत ही नहीं पड़ी. हर पारसी अपनेआप में मसीहा है, क्योंकि वह पढ़ालिखा है. जो गरीब है, कमजोर है, उसे ही मसीहा की जरूरत होती है. लेकिन ऐसा कोई मसीहा जो आप के हालात बदल दे, कभी आता ही नहीं.

पढ़ाई से बदलेंगे हालात

डाक्टर भीमराव अंबेडकर बहुत महान थे, इस बात से आज के अनपढ़ एससी को क्या फायदा मिल सकता है? लेकिन डाक्टर अंबेडकर ने किन विकट हालात से जू झ कर पढ़ाईलिखाई हासिल की इस बात को सम झने से एससी वर्ग के हालात बदल सकते हैं. डाक्टर अंबेडकर ने तब मेहनत की जब एससी वर्ग का कोई संघ या पार्टी नहीं थी, कोई रिजर्वेशन भी नहीं था.

पढ़ाईलिखाई अपनेआप में एक बहुत बड़ी ताकत है. जिस समाज ने इस की अहमियत को सम झा वह समाज कभी भी कमजोर नहीं रहा. एससी वर्ग की बदहाली की वजह पढ़ाईलिखाई से उस की दूरी है.

सामाजिक भेदभाव एक समस्या है, रुकावट नहीं. यह बहाना कब तक ढोया जाएगा?

एससी समाज के पढ़ेलिखे लोगों को अपनी जिम्मेदारियां तय करनी होंगी. उन्हें समाज के लिए मसीहा बनना होगा. समाज का एक टीचर चाहे तो अपने समाज से हजारों टीचर पैदा कर सकता है. एक पढ़ालिखा इनसान हजारों अफसर पैदा कर सकता है, लेकिन एससी वर्ग के पढ़ेलिखे लोग कहां सोए हुए हैं?

ऐजूकेशन ही कामयाबी की कुंजी है. एससी वर्ग के प्रति समाज की सोच कैसी भी हो, यह आप को पढ़नेलिखने से नहीं रोक सकती. तमाम विरोधाभासों के बावजूद एससी वर्ग के लिए हायर ऐजूकेशन तक के रास्ते खुले हुए हैं, फिर बहानेबाजी क्यों?

संस्थागत भेदभाव का शिकार हुए रोहित वेमुला हायर ऐजूकेशन में सताए जाने का उदाहरण हैं, तो जज, वैज्ञानिक और तमाम आईएएसआईपीएस के भी उदाहरण हैं, जो दलित समाज से निकले हैं.

याद रखिए कि जो जितना कमजोर होता है, उस के लिए जद्दोजेहद उतनी ही बड़ी होता है. अगर वंचित समाज को अपनी कमजोरियों से बाहर निकलना है, तो उसे अपनी जद्दोजेहद तेज करनी होगी.

पढ़ाईलिखाई का मतलब सिर्फ स्कूलकालेज में पढ़ना नहीं है, बल्कि इस का मतलब है दूसरों की कही या लिखी बात जिंदगीभर पढ़ते रहना, लगातार लिखते रहना है. अपने मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए हर समय जूझना है. एससी, एसटी और मुसलिम धर्म के चक्करों में डाल दिए गए हैं और वे उन्हीं बातों के लिए दूसरों के सिर फोड़ रहे हैं, जिन से उन्हें जंजीरें पहनाई जाती हैं.

अपनी पहचान बनाने के लिए कोई देखादेखी खास रंग का गमछापट्टा पहन रहा है, कोई टोपी लगा रहा है. उन के नेता यही सम झा रहे हैं और खुद अपनी रोटी, मकान, गाड़ी और रुतबे का इंतजाम कर रहे हैं.

मसीहा कोई हाड़मांस का जना नहीं हो सकता. आज तक कभी कोई ऐसा जना नहीं हुआ, जिस ने देश और समाज को बदल डाला हो. गांधी, अंबेडकर, नेहरू मसीहा नहीं थे. तिलक, गोखले, गोलवलकर भी ऊंचों के मसीहा नहीं थे. ऊंचों ने पिछले 50 साल में साइंस का फायदा उठा कर बिना मसीहा के पढ़ कर, समझ कर फायदा उठाया है.

आज बिहार में नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रशांत कुमार एससी, एसटी और मुसलिम वर्ग को जीत कर भी कुछ नहीं दे पाएंगे, क्योंकि इन वर्गों को पानी का गिलास भर कर खुद ही पीना होगा.

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि बुरी दशा से निकलने के लिए समाज बदलो, सरकार का ढांचा बदलो और उस के लिए वर्ग संघर्ष करो. मार्क्सवादी नजरिया मसीहा की जरूरत को सिरे से नकारता है.

कार्ल मार्क्स के मुताबिक, सामाजिक बदलाव किसी एक जने की इच्छा से नहीं, बल्कि प्रोडक्शन के साधनों, उन की मिल्कियत में बदलाव और वर्ग संघर्ष जैसी जमीनी व धन के रखने के तरीकों से होता है.

किसी राहुल गांधी, तेजस्वी यादव या प्रशांत किशोर के कहने या किसी मां के मंदिर के बनाने से जो गरीब है, कुचला है, वंचित है, बीमार है, भूखा है, अपनी हालत सुधार नहीं सकता, उसे तो पढ़ कर, सम झ कर संघर्ष कर के बढ़ना होगा. समाज की तरक्की के लिए, ‘मसीहा’ की नहीं, बल्कि एक बड़े वर्ग में जागरूकता और क्रांतिकारी सामूहिक कार्रवाई की जरूरत होती है, जो कांवड़ यात्रा में नाचने या बैनर लगाने से नहीं आती.

बिहार चुनाव में वोट देते समय खयाल रहे कि कौन पढ़ने का मौका देगा और कौन हकों और मौकों पर डाका डालने के लिए बैठा है. एससी, एसटी और मुसलिम के लिए मसीहा किताबें हैं, पत्रिकाएं हैं, वे टीवी चैनल हैं जो न तो बिकाऊ हैं और न ही मदारी का खेल खिला रहे हैं. आगे बढ़ना है तो ऐसे अखबार खरीदें जो आप को बेचे नहीं, बल्कि बनाएं.

पश्चिम के एक विचारक हेनरी वार्ड बीचर ने कहा, ‘‘एक अच्छा अखबार या पत्रिका लोगों के लिए अनगिनत लाखों सोने से भी बड़ा खजाना है. आप इस खजाने को लुटने न दें.’’

अमेरिका के शुरुआती सालों में तब के राष्ट्रपति थौमस जैफरसन ने कहा था, ‘‘अगर मु झे यह तय करना होता कि हमें बिना अखबारों, पत्रिकाओं और किताबों के सरकार चाहिए या बिना सरकार के अखबार, पत्रिकाएं, किताबें तो मैं बाद वालों को चुनने में एक पल का भी संकोच नहीं करता.’’

क्या दलित अखबार, पत्रिकाएं पढ़ रहे हैं? आप रील देखने में लगे हैं, पौराणिक कथाओं को दोहराने वाले अखबारों और चैनलों को देखने में लगे हैं या अपनी सम झ का दायरा बढ़ाने वाली बात जानने, सुनने, पढ़ने में, इस का फैसला आप को करना है.

एससी, एसटी और मुसलिम का मसीहा नवंबर में वोटिंग मशीन से नहीं निकलने वाला, बल्कि उस के बारे में तो अंगरेजी लेखक चार्ल्स डिकेंस 150 साल पहले कह गया है कि अखबारों और किताबों को पढ़ने की आदत से एक कौशल का विकास होता है. अखबार, पत्रिकाएं और किताबें पढ़ने की आदत आप को भाषा, लेखन और ताजा जलते मुद्दों पर पूरी गहराई से सही सम झ देती है, जो सरकार को सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करने के लिए जरूरी है और व्यावसायिक तरक्की में मददगार है.

याद रहे कि मसीहा सफेद चोगा पहने गलीगली नहीं घूमते, बल्कि वे आपके दिमाग में, मन में, दिल में पैदा होते हैं.

नहीं निकले काबिल नेता

डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद भारतीय राजनीति में दलित समाज से कई नेता उभरे लेकिन वे दलितों के फायदे के लिए कोई क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए. आजादी के बाद दलित समाज से जो भी नेता हुए वे आगे चल कर अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर रह गए. ज्यादातर दलित नेताओं ने दलितों के उत्थान के नाम पर दलित वोटों को बेचने का ही काम किया.

यही हाल मुसलिमों का भी रहा. मुसलिम समाज के बीच से नेता तो कई उभरे लेकिन वे किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के दलाल की भूमिका में ही रहे. मुसलिम नेताओं से मुसलिम समाज को कोई फायदा नहीं हुआ. मुसलिमों के फायदे की राजनीति करने की आड़ में इन मुसलिम नेताओं ने अपना और अपनी पार्टी का ही भला किया.

यही वजह है कि आज की राजनीति में दलितों और मुसलिमों का कोई सर्वमान्य नेता नजर नहीं आता. आज की राजनीति में दलितों के बड़े नेताओं में मायावती, चंद्रशेखर रावण, रामदास अठावले, चिराग पासवान, जीतनराम मां झी जैसे लोग ही नजर आते हैं, जिन के लिए विचारधारा की कोई कीमत नहीं रह गई है.

मायावती सिर्फ जाटवों की नेता बन कर रह गई हैं. चिराग पासवान दुसाध जाति के नेता हैं. चंद्रशेखर रावण भी दलितों की कुछ जातियों के नेता हैं और जीतनराम मां झी मुसहर समाज के नेता हैं. इस से ज्यादा इन नेताओं की कोई पहचान नहीं रह गई है.

मेनस्ट्रीम मीडिया के बंद दरवाजे

मीडिया में नुमाइंदगी नहीं होने के चलते दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की असली समस्याएं कभी हाईलाइट ही नहीं हो पातीं. गरीबी, बेरोजगारी का दंश झेलते इन तीनों समाजों का जम कर शोषण होता है, अत्याचार होते हैं, लेकिन इन की यह त्रासदी कभी भी मेनस्ट्रीम मीडिया तक नहीं पहुंच पाती.

मुख्यधारा की मीडिया में दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की भागीदारी बिलकुल जीरो है. ये तीनों वर्ग न्यूजरूम, कवरेज, एंकरिंग और नेतृत्व वाले पदों से कोसों दूर खड़े हैं.

औक्सफैम इंडिया और न्यूजलौन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया में केवल ऊंची जातियों का ऐसा दबदबा है कि ये तकरीबन 86-90 फीसदी पदों पर काबिज हैं. इन तीनों वर्गों का लेखन, रिपोर्टिंग, एंकरिंग में भागीदारी जीरो है. एक भी दलित, मुसलिम या आदिवासी मेन स्ट्रीम के किसी भी मीडिया ग्रुप का हैड नहीं है.

यही वजह है कि इन तबकों से जुड़े मुद्दों को ले कर अंगरेजी अखबारों में 5 फीसदी से कम लेख छपते हैं, तो हिंदी अखबारों में महज 10 फीसदी ही छपते हैं.

मीडिया के 121 प्रमुख पदों में से 106 पदों पर ऊंची जाति के लोग बैठे हैं और यहां एससी, एसटी, ओबीसी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है.

एनडीटीवी, आजतक, जी न्यूज आदि में एससी, एसटी एंकर एक भी नहीं है. 972 प्रमुख पत्रिकाओं में से केवल 10 पत्रिकाओं की कवर स्टोरी ही दलित और आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित होती हैं.

यह एससी, एसटी और मुसलिम की अपनी जिम्मेदारी है कि वे इन चैनलों, अखबारों, पत्रिकाओं का त्याग करें और अपने मतलब के मीडिया को सपोर्ट करें.

यह देखने की बात है कि अंगरेजी की किताबें बेचने वाली दुकानें तो खुली हुई हैं, पर हिंदी में जहां एससी, एसटी और मुसलिम के मतलब की किताबें हो सकती हैं, बंद हो चुकी हैं, क्योंकि अत्याचारों का रोना रोने वाले ये वर्ग अपने मुद्दों के बारे में भी जानने की कोशिश नहीं कर रहे.

बिना नायक की वंचित आबादी

भारत में दलितों की आबादी तकरीबन 24 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 17 फीसदी है. आदिवासी समाज कुल आबादी का 9 फीसदी हैं यानी तकरीबन 11 करोड़. वहीं मुसलिमों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी यानी 20 करोड़ के आसपास है.

दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की हालत तकरीबन एकजैसी ही है. अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को सच मानें तो ज्यादातर मुसलिमों के हालात दलितों से भी बदतर हैं. दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की कुल आबादी को जोड़ दिया जाए तो देश की आबादी में इन तीनों समाजों का अनुपात तकरीबन 40 फीसदी हो जाता है. इस में ईसाई, सिख, बौद्ध और दूसरे अल्पसंख्यक समाजों को भी जोड़ लिया जाए तो यह फीसद 50 के पार पहुंच जाएगा लेकिन विडंबना यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में देश की यह आधी आबादी पूरी तरह सत्ता विहीन नजर आती है.

40 फीसदी आबादी होने के बावजूद मुसलिम, दलित और आदिवासी तो पूरी तरह हाशिए पर हैं. नेता नहीं, मीडिया नहीं, उद्योगपति नहीं, लेखक नहीं और कोई नायक नहीं.

बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय की बातें करने वाले नेताओं का लंबा इतिहास रहा है. बाबू जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर, बाबू जगदेव प्रसाद और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई.

आज की राजनीति की बात करें तो सामाजिक न्याय की बातें तो नीतीश कुमार भी करते हैं, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन के बाद नीतीश कुमार के लिए सामाजिक न्याय पीछे छूट गया है. 2023 के बिहार जाति सर्वे के अनुसार बिहार की कुल आबादी में दलितों की आबादी 20 फीसदी है और पासवान जाति की कुल आबादी बिहार की कुल आबादी का 5.3 फीसदी है. इस तरह अकेले पासवान समाज ही दलितों का तकरीबन 27 फीसदी हैं और बिहार में पासवान वोटों का बड़ा हिस्सा चिराग पासवान को जाता है.

लोजपा के राजग में होने के चलते इस का फायदा सीधे भाजपा को मिलता है. यही वजह है कि पासवान जाति से इतर की तमाम दलित जातियों पर हर नेता की नजर है और वे दलितों को आकर्षित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते, पर उन के साथ हो रही सामाजिक या सरकारी बेईमानी, बेइज्जती, लूट के बारे में सब चुप हैं. यह कोई नेता नहीं करेगा. यह तो इन एससी, एसटी और मुसलिम वर्गों को अपने बलबूते पर, अपनी जागरूकता से कराना होगा. पर क्या पितापुत्र पासवानों ने एससी के इस वर्ग को हाथ पकड़ कर ऊपर खींचने के लिए कुछ किया? वे तो सत्ता में मजे लेने में लगे रहे. Bihar Elections 2025

Bihar Elections: बिहार में वोट का हक छीनने की जुर्रत

Bihar Elections: चुनाव आयोग ने कहा है कि वोटर लिस्ट में कोई गैर भारतीय नहीं रहेगा. वोटर लिस्ट की जांच का जो मौडल बिहार विधानसभा में लागू किया गया है, वह दूसरे राज्यों में भी लागू होगा. जैसेजैसे वहां पर विधानसभा चुनाव होंगे, वैसेवैसे उस राज्य में वोटर लिस्ट की जांच होगी.

इस तरह से समझें तो अगला नंबर असम और पश्चिम बंगाल का है. इस के बाद उत्तर प्रदेश की भी बारी है. साल 2026 में जिन राज्यों में चुनाव होंगे, वहां यह जांच होगी, जिस में केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी भी शामिल होंगे.

दरअसल, यह एक पौराणिक साजिश है, जिस के तहत बड़ी जनसंख्या को नागरिकता ही न देने का काम किया जा रहा है. जिस हिंदू राष्ट्र की बात हो रही है, वह पौराणिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है, जिस के अनुसार सिर्फ सवर्णों को ही पूजापाठ, धन, मकान, सत्ता का हक है. बाकी सब तो दस्यु या पशु हैं.

रामरावण युद्ध में दिखाया गया है कि जब युद्ध खत्म हो गया तो राम तो राजा बन गए, जबकि उन के साथ युद्ध करने वालों को वापस जंगलों और पहाड़ों पर भेज दिया गया.

बिहार में वोटर लिस्ट में सुधार के नाम पर पौराणिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नागरिकता को वर्ण व्यवस्था से जोड़ने की साजिश की जा रही है.

देश में संविधान लागू होने से पहले किस तरह से चुनाव होते थे, किन को वोट देने का हक था, अगर इस को देखें तो साफ पता चलता है कि वोट देने का हक सब को नहीं था. साल 1857 के बाद अंगरेजों ने लोकल सैल्फ गवर्नमैंट पौलिसी कानून बनाया था, जो साल 1884 में पूरी तरह से लागू हो गया था.

साल 1909 में इलैक्शन ऐक्ट पास हुआ. उस के बाद इलैक्शन शुरू हुआ. उस समय वोटर लिस्ट में केवल
50 लोगों के नाम होते थे. ये वही लोग थे जो इलाके के मुखिया, जमींदार, बड़े साहूकार, बड़े काश्तकार यानी कि उस वक्त जो टैक्स के रूप में लगान जमा करते थे वही लोग चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने के हकदार थे. वही लोग वोटर हुआ करते थे और उन्हीं लोगों में से चुनाव लड़ने वाले होते थे. उन्हीं में से लोग चुनाव जीत कर इलाके की तरक्की का काम करते थे.

50 लोगों की वोटर लिस्ट में से केवल 4 लोगों को चुनाव लड़ाते थे. ये वे लोग होते थे जो उस समय 100 रुपए से ज्यादा का आयकर या मालगुजारी भरते थे. मुश्किल से गांव के मुताबिक 4 या 5 वोट ही होते थे. 4 उम्मीदवार होते थे और 46 वोटर और इन्हीं लोगों में से एक जीत कर लोकल बोर्ड का मुखिया बनता था. वे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के मैंबर जो राजधानी लखनऊ में बैठा करते थे या फिर दिल्ली जाते थे.

जब देश आजाद हुआ तो यह तय किया गया कि भारत में लोकतंत्र की स्थापना के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को वोट डालने का अधिकार दिया जाएगा. इस से पहले भारत में ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी अमीरों को ही वोट देने का हक था. भारत के संविधान ने यह तय किया कि जो भी बालिग लोग हैं, वे वोट देंगे. उम्र के अलावा कोई बंधन नहीं रखा गया था.

भारत में हुए पहले आम चुनाव में करीब 17 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया था, जिस में 85 फीसदी लोग न तो पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे. कुलमिला कर तकरीबन 4500 सीटों के लिए चुनाव हुआ था, जिस में 499 सीटें लोकसभा की थीं.

संविधान को दरकिनार करने की साजिश

बिहार में वोटर लिस्ट के बहाने इस तरह की व्यवस्था को बनाने का काम हो रहा है जहां वोटर लिस्ट में वही लोग होंगे जो पौराणिक व्यवस्था को मानेंगे. जो इस को चुनौती देने वाले होंगे उन के वोट देने के हक को ही खत्म कर दिया जाएगा.

देश को संविधान लागू होने से पहले के कालखंड में ले जाया जा रहा है. नागरिकता को वर्ण व्यवस्था से जोड़ने की साजिश की जा रही है. यह काम केवल बिहार तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में होगा.

बिहार विधानसभा चुनाव में वोटर लिस्ट विवाद के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि वोटर लिस्ट में जांच का काम देश के हर राज्य में किया जाएगा. इस में घरघर जा कर मतदाताओं की पुष्टि की जाएगी. इस के जरीए चुनाव आयोग यह चाहता है कि कोई गैरभारतीय वोटर लिस्ट में न रहे. साल 2029 में लोकसभा चुनाव से पहले सभी राज्यों की वोटर लिस्ट की स्क्रीनिंग पूरी करने की योजना है.

इस को दक्षिणापंथी लोगों की उस मांग से जोड़ कर देखा जा सकता है, जो भारतीय न हो उस को वोट देने का अधिकार न हो. यही मकसद एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का भी था. जनगणना में भी केंद्र सरकार इसी तरह का कोई हेरफेर कर सकती है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव कहते हैं, ‘जातीय जनगणना के आंकड़ों और वोटर लिस्ट के मामले में भाजपा सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.’

बिहार वोटर लिस्ट में जिस तरह से चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, उस के पहले महाराष्ट्र के चुनाव में वोटर लिस्ट की गड़बड़ी हो चुकी है, जिस से यह साफ दिखने लगा है कि हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए कुछ भी मुमकिन है.

इस को देख कर यह कहा जा सकता है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा को 400 से ज्यादा सांसद मिल गए होते तो वह कानून बना कर इस तरह के काम करती, जिन्हें अब पिछले दरवाजे से लाने की कोशिश हो रही है.

क्या है वोटर लिस्ट विवाद

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट को अपडेट करने का काम शुरू किया, जिस में नए मतदाताओं के नाम जोड़े जा रहे हैं और जो वोटर नहीं हैं, उन के नाम हटाए जा रहे हैं. इस में सभी मतदाताओं को सत्यापन का एक फोर्म भरना पड़ रहा है, जिस में अपने बारे में कुछ जरूरी जानकारी देनी है.

चुनाव आयोग जो जानकारी मांग रहा है, उस में 2 प्रावधान किए गए हैं, जैसे साल 2003 या उस के बाद पैदा हुए मतदाताओं को अपना जन्म प्रमाणपत्र या मातापिता के वोटर आईडी का एपिक नंबर देना होगा, जबकि साल 2003 से पहले पैदा हुए लोगों को कोई दस्तावेज नहीं देना है.

विवाद की वजह यह है कि आयोग ने सत्यापन के दस्तावेजों में राशनकार्ड और आधारकार्ड को मान्यता नहीं दी है. विपक्ष इस बात से नाराज है. उस का कहना है कि यह गरीब मतदाताओं को मताधिकार से दूर करने की कोशिश है. यह एक तरह से नागरिकता का सत्यापन हो रहा है. नागरिकता के सत्यापन से उस को डर है कि बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हो जाएंगे.

मुसलिम मतदाता विपक्ष का सब से बड़ा हथियार है. इस के जरीए हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारी है. विपक्ष की सब से बड़ी चिंता यह है कि बिहार मौडल पूरे देश में ले जाया जाएगा. घुसपैठियों को भले ही देश से न निकाला जा सकता हो पर उन को वोट देने के हक से दूर रखा जा सकता है.

विपक्ष ने पूरी ताकत से इस लड़ाई को लड़ने का फैसला किया. उसे यह डर था कि महाराष्ट्र जैसी वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का फायदा बिहार में भी भारतीय जनता पार्टी उठा सकती है, जिस के चलते पटना में कांग्रेस और दूसरे प्रमुख दलों ने रैली की. सड़क के साथसाथ विपक्ष ने कोर्ट में भी लड़ने का काम किया.

सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव से ठीक पहले प्रदेश के 7.9 करोड़ मतदाताओं को यह कहना कि वे अपनी पात्रता को सत्यापित करें, यह एक तरह से हजारों वोटरों को मतदान से रोकने की कोशिश है. आधारकार्ड को स्वीकार न करना पूरी तरह से नागरिकता जांच की कवायद है.

आधारकार्ड 12 अंकों की एक पहचान संख्या है, जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा जारी किया
जाता है. यह हर भारतीय की पहचान और उस के निवासस्थान का प्रमाण है. आधारकार्ड की मान्यता बैंकिंग, स्कूल एडमिशन, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से ले कर अस्पतालों में इलाज तक सभी जगहों पर है. वोट देने के समय भी यह पहचानपत्र के रूप में मान्य था.

सवाल उठता है कि जब आधारकार्ड पहचानपत्र के रूप में वोट डालने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, तो वोटर लिस्ट की जांच में इस को क्यों माना नहीं जा रहा है? चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट अपडेशन में आधारकार्ड को प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है.

कोर्ट और आयोग आमनेसामने

बिहार में वोटर लिस्ट संशोधन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कई सवाल पूछे. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि आयोग ने मतदाता सूची में संशोधन का जो समय चुना है, वह चिंताजनक है. आधारकार्ड जैसे अहम दस्तावेज को संशोधन प्रक्रिया के सत्यापन से बाहर रखना बहुत ही चिंताजनक है. अगर विशेष सूचना रिपोर्ट का उद्देश्य नागरिकता सत्यापित करना है, तो यह प्रक्रिया इतनी देर से शुरू क्यों हुई? इस को चुनाव से जोड़ कर क्यों देखा जा रहा है?

चुनाव आयोग की ओर से सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत संवैधानिक रूप से अनिवार्य है. अनुच्छेद 326 में यह कहा गया है कि केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदाता के रूप में नामांकित किया जा सकता है. इसी वजह से मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए और सभी योग्य नागरिकों को वोट का अधिकार दिलाने के लिए नागरिकता की पुष्टि हो रही है.

चुनाव आयोग ने कहा कि इस से पहले 2003 में यह प्रक्रिया की गई थी. चुनाव आयोग के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिस का मतदाताओं से सीधा संबंध है और अगर मतदाता ही नहीं होंगे, तो हमारा वजूद ही नहीं होगा.

आयोग किसी को भी मतदाता सूची से बाहर करने का न तो इरादा रखता है और न ही कर सकता है, जब तक कि आयोग को कानून के प्रावधानों द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य न किया जाए. हम धर्म, जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था गैर नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर करना केंद्रीय गृह मंत्रालय का विशेषाधिकार है, चुनाव आयोग का नहीं. आयोग क्यों इस मसले पर ध्यान दे रहा है, जबकि यह उस का काम नहीं है.

चुनाव आयोग ने सूची के सत्यापन के लिए जो समय चुना है, वह सही नहीं है. सब से बड़ी चिंता यह है कि आधारकार्ड को सत्यापन के लिए जरूरी दस्तावेजों में शामिल न करना है.

समस्या यह है कि पहले कोर्ट ने ही आधारकार्ड को नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं माना था. जस्टिस एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कहा था कि आधारकार्ड एक खास पहचानपत्र है, लेकिन यह भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है.

सरकार की ओर से भी यह साफ कहा गया था कि आधारकार्ड को नागरिकता और जन्मतिथि का प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता है. यह सिर्फ और सिर्फ एक शख्स का पहचानपत्र है और उस के निवासस्थान की जानकारी देता है. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अनुसार अगर कोई विदेशी नागरिक 182 दिन तक भारत में लगातार रहता है, तो उस का आधारकार्ड बन सकता है, लेकिन यह सिर्फ पहचानपत्र है, उस की नागरिकता का सुबूत नहीं.

यह बात अब साफ होती नजर आ रही है कि आधारकार्ड नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता. इस का फायदा उठा कर हिंदू राष्ट्र बनाने वाले उन लोगों को वोट देने के हक से दूर कर रहे हैं, जो गरीब हैं, जिन की कोई सुनने वाला नहीं है. इस से केवल वही लोग वोट दे सकें जो वोटर लिस्ट में दर्ज हैं. जिन लोगों से विरोध का डर है, उन को इस बहाने वोटर लिस्ट से बाहर किया जा सकता है. Bihar Elections

Political News In Hindi: राजनीति में तनाव है, बिहार में चुनाव है

Political News In Hindi, लेखक – शकील प्रेम

बिहार में भाजपा पूरे बहुमत से सरकार बनाए, अमित शाह की कोशिश तो यही है, लेकिन बिहार में भाजपा के पास अपना कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं है, जिसे वह मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर सके.

इ स साल के आखिर तक बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं. बिहार में राजनीतिक हलचलें तेज हो चुकी हैं. नीतीश कुमार भले ही केंद्र की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की बैसाखी बने हैं, लेकिन बिहार की राजनीति में वे खुद भाजपा के रहमोकरम पर टिके हैं.

साल 2010 के चुनाव में भाजपा को 91 सीटों की बढ़त से बिहार का राजनीतिक समीकरण बदल गया. साल 2010 से ले कर साल 2020 के बीच भाजपा ने बिहार में लगातार अपनी पोजीशन को मजबूत किया है.

6 अप्रैल, 1980 को भाजपा ने पहली बार बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा और इस चुनाव में उस के 21 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की. साल 1985 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 16 सीटों पर जीत हासिल की. इसी तरह साल 1990 में 39 और साल 1995 में वह 41सीटों पर जीती.

साल 2000 के चुनाव में भाजपा ने समता पार्टी से गठबंधन किया और 67 सीटों पर जीत हासिल की. फरवरी, 2005 के चुनाव में 37 और नवंबर, 2005 में भाजपा को 55 सीटों पर कामयाबी मिली. साल 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 91 और साल 2015 में 53 सीटों पर जीत दर्ज की, तो साल 2020 में भाजपा के 74 विधायक जीते.

साल 2020 के चुनाव के बाद विकासशील इनसान पार्टी के 4 विधायक भाजपा में शामिल हो गए, जिस से वह 78 सीटों पर पहुंच गई और उपचुनाव में तरारी और रामगढ़ में जीत के साथ उस के विधायकों की तादाद बढ़ कर 80 हो गई.

इस तरह भाजपा बिहार की राजनीति में दूसरी सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी. यही वजह है कि नीतीश सरकार में भाजपा के सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा उपमुख्यमंत्री हैं.

आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा पूरी तैयारी में है. इस पार्टी के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी तरह चुनावी मूड में आ गए हैं. बिहार में भाषणों का सिलसिला शुरू हो चुका है.

इसी बीच लोकजनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान ने विधानसभा चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की है. केंद्र सरकार में मंत्री चिराग पासवान के विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा को अमित शाह की तथाकथित ‘चाणक्य नीति’ के तहत देखा जा रहा है.

नीतीश कुमार के इतिहास को देखते हुए भाजपा उन पर भरोसा नहीं कर सकती. भले ही केंद्र में भाजपा सरकार को नीतीश कुमार का समर्थन हासिल है, लेकिन बिहार की राजनीति में वह अपने हिसाब से खेल के मोहरे तय करने के मूड में है.

बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार की पार्टी लगातार अपना वोट बैंक खोती जा रही है. साल 2015 में 71 सीटें जीतने वाली जद (यू) साल 2020 में 43 सीटों पर आ गई. इस से भाजपा के लिए नीतीश कुमार की अहमियत पहले जैसी नहीं रही.

बिहार में भाजपा के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा सम्राट चौधरी हैं, जो वर्तमान सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं, लेकिन सम्राट चौधरी की अपनी लोकप्रियता कुछ खास नहीं है.

राजनीतिक खात्मे की ओर नीतीश कुमार

एक समय ऐसा भी था जब बिहार की पूरी राजनीति 3 लोगों के इर्दगिर्द घूमती थी. नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान. आज लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव ने लालू की राजनीतिक विरासत की कमान संभाल ली है, तो रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी अपने पिता के राजनीतिक संस्कारों को बखूबी पूरा कर रहे हैं.

लेकिन तेजस्वी यादव और चिराग पासवान की तरह नीतीश कुमार का फिलहाल कोई राजनीतिक वारिस नहीं है और न ही नीतीश कुमार की पार्टी में ऐसा कोई नेता है, जो उन की राजनीतिक विरासत को आगे ले जा सके.

पिछले 2 विधानसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार ने भाजपा को मजबूत ही किया है, जिस से उन के कोर वोटर भाजपा में चले गए, जिस का नतीजा यह हुआ कि पिछले विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर पर पहुंच गई.

राजग में शामिल होने की वजह से नीतीश कुमार को विवादास्पद वक्फ संशोधन कानून का समर्थन करना पड़ा, जिस के तुरंत बाद 5 मुसलिम नेताओं ने जद (यू) से इस्तीफा दे दिया.

भाजपा के साथ नीतीश कुमार के सियासी गठबंधन के बावजूद लंबे समय तक जद (यू) को मुसलिमों का समर्थन हासिल था, लेकिन इस मामले के बाद नीतीश कुमार के लिए मुसलिमों का भरोसा जीतना मुश्किल होगा.

नीतीश कुमार के पास कुर्मी पटेल के अलावा महिलाओं का समर्थन हासिल है. शराबबंदी और पंचायतों में महिलाओं के लिए सीट आरक्षण और स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल देने जैसे कल्याणकारी योजनाओं की बदौलत बिहार की महिलाएं मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार को ही देखना चाहती हैं.

इधर के कुछ सालों में जद (यू) ने गैरयादव और अतिपिछड़े वर्गों और महादलितों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है, लेकिन ये सारी कोशिशें राजद और भाजपा जैसी मजबूत जनाधार वाली पार्टियों के सामने जद (यू) को बहुमत दिलाने के लिए काफी नहीं हैं, इसलिए बिना किसी गठबंधन के बिहार में जद (यू) का सूपड़ा साफ होने की पूरी गुंजाइश है.

वोट बैंक के मामले में तेजस्वी यादव और भाजपा बेहद मजबूत हालत में हैं. भाजपा के साथ बिहार का अपर कास्ट तबका है, तो हिंदुत्व के नाम पर ओबीसी का एक बड़ा हिस्सा भाजपा का कोर वोटर बन गया है.

चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, जीतनराम मांझ का हिंदुस्तानी आवाम मोरचा और मुकेश साहनी की विकासशील इनसान पार्टी जैसे छोटे खिलाड़ी भाजपा को ही मजबूत कर रहे हैं.

साल 2005 और साल 2010 के विधानसभा चुनावों में जद (यू) ने भाजपा से गठबंधन किया. तब जद (यू) को 20 फीसदी और 22 फीसदी से ज्यादा वोट मिले. साल 2015 में जब जद (यू) राजद के साथ गठबंधन में थी, तो वोट फीसदी घट कर 17 फीसदी रह गया और साल 2020 में भाजपा के साथ गठबंधन में जद (यू) को सिर्फ 15.7 फीसदी वोट मिले.

वोट शेयर में गिरावट का सीधा असर जद (यू) की सीटों पर पड़ा. साल 2010 में 115 सीटें जीतने वाली जद (यू) साल 2015 में 71 सीटों पर आ गई और साल 2020 में 43 सीटों पर पहुंच गई. हालांकि, साल 2024 लोकसभा में जद (यू) का प्रदर्शन अच्छा रहा.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में राजद ने 22.14 फीसदी के साथ सभी दलों में सब से ज्यादा वोट फीसदी हासिल किया, लेकिन यह भाजपा के साथ गठबंधन के समीकरण की वजह से मुमकिन हुआ. साल 2019 के लोकसभा में महज 2 सीटें जीतने वाली जद (यू) को भाजपा ने 16 सीटें दीं, जिन में से वह 12 सीटें जीत गई.

पिछले चुनावों के नतीजे के आधार पर देखें, तो बिहार में जद (यू) को 15 फीसदी वोट हासिल हुए हैं और भाजपा की पकड़ 20 फीसदी वोटों पर है. इस तरह राजग में कुल वोट फीसदी 35 फीसदी पर पहुंच जाएगा, जो तेजस्वी यादव के गठबंधन को मिले 30 फीसदी से कहीं ज्यादा है.

अगर इस बार जद (यू) के प्रदर्शन में सुधार होता है, तो नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बने रहने की उम्मीद बनी रहेगी, वरना चिराग पासवान के रूप में भाजपा के पास औप्शन तो है.

नीतीश कुमार की लगातार बिगड़ती सेहत और जद (यू) में दूसरी श्रेणी के नेताओं की कमी के चलते साल 2025 का यह विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के राजनीतिक खात्मे की शुरुआत भी साबित हो सकता है.

भाजपा का प्लान बी

रामविलास पासवान की राह पर चलते हुए चिराग पासवान ने सत्ता में बैठ कर मलाई खाते रहने की कला सीख ली है. बिहार में भाजपा पूरे बहुमत से सरकार बनाए, अमित शाह की कोशिश तो यही है, लेकिन बिहार में भाजपा के पास अपना कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं है, जिसे वह मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर सके.

बिहार में भाजपा के सम्राट चौधरी टाइप नेताओं की अपनी लोकप्रियता कुछ नहीं है, इसलिए भाजपा को मजबूरन चिराग पासवान का सहारा लेना पड़ रहा है.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में चिराग पासवान की लोजपा ने अपने दम पर चुनाव लड़ा और कुल 137 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन मात्र एक सीट ही जीत पाए. चिराग पासवान के राजग से अलग चुनाव लड़ने से जद (यू) को खासा नुकसान हुआ.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद चिराग पासवान को मंत्रिमंडल में जगह मिल गई, जिस से भाजपा से उन की सारी नाराजगी दूर हो गई. नीतीश कुमार की जगह अमित शाह को चिराग पासवान जैसे निष्ठावान और आज्ञाकारी की ही जरूरत है.

चिराग पासवान की पार्टी लोजपा का इतिहास देखें तो कभी लोजपा का वोट शेयर 12.6 फीसदी था. साल 2005 तक उस का वोट शेयर 11 फीसदी था, जो साल 2010 में घट कर 7 फीसदी पर आ गया और साल 2020 तक आतेआते 6 फीसदी के आसापास रह गया.

लोजपा की सीटें भी साल 2005 में 29 से घट कर साल 2010 में 3 और फिर साल 2020 के विधानसभा चुनाव में वह महज एक सीट तक सिमट कर रह गई. साल 2020 में लोजपा की इस शर्मनाक हार से सबक लेते हुए चिराग पासवान राजग गठबंधन से अलग हो कर चुनाव लड़ने की बात सोच भी नहीं सकते.

‘मोदी का हनुमान’ बनना चिराग की मजबूरी भी है.

चिराग पासवान का दलितों से कोई मोह है, यह अब तक पता नहीं चला, क्योंकि वे भी तो अपने पिता की तरह दलित वोटों की बिक्री ही करते हैं. आजकल भाजपा उन की बड़ी खरीदार है.

क्या तेजस्वी यादव बन पाएंगे मुख्यमंत्री

लालू प्रसाद यादव का नाम भ्रष्टाचार के कई मामलों से जुड़ा है, लेकिन बिहार में सैकुलर राजनीति का सूत्रधार लालू प्रसाद यादव को ही माना जाता है. उन्होंने इस मामले में कभी समझौता नहीं किया, इसलिए बिहार के मुसलिम राजद के कोर वोटर माने जाते हैं.

लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने पिता के उसूलों को कायम रखते हुए सैकुलर राजनीति को आगे बढ़ाया और वे भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभरे हैं.

तेजस्वी यादव अभी बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं. उन को राजनीति में 15 साल से ज्यादा का समय हो गया है. इस बीच वे 2 बार बिहार के उपमुख्यमंत्री भी बने. पहली बार साल 2015 में और दूसरी बार अगस्त, 2022 में.

अपने पिता लालू यादव के ‘माय’ (मुसलिमयादव) फैक्टर को तेजस्वी यादव ने और मजबूती दी है. वक्फ कानून का खुला विरोध कर उन्होंने मुसलिम वोट बैंक को मजबूत किया है, तो संविधान बचाने और दलितों के मुद्दों पर भी तेजस्वी यादव ने अपना अहम रोल निभाया है, जिस से बिहार के महादलितों का रुझान भी तेजस्वी यादव की ओर बढ़ा है.

यही वजह है कि हाल में हुए सर्वे में मुख्यमंत्री पद के सब से पसंदीदा चेहरे के रूप में तेजस्वी यादव सामने आए हैं. इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वे के मुताबिक, तेजस्वी यादव काफी समय से मुख्यमंत्री पद के लिए बिहार के लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं. इस मामले में तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार को काफी पीछे छोड़ दिया है.

तेजस्वी यादव भले ही नीतीश कुमार से लोकप्रियता में आगे चल रहे हों, लेकिन नीतीश कुमार के पीछे राजग का मजबूत गठबंधन है. तेजस्वी यादव के पास कोई मजबूत गठबंधन नहीं है.

इंडिया गठबंधन की उपयोगिता लोकसभा चुनावों तक ही थी. बिहार के विधानसभा चुनावों में इंडिया गठबंधन का कोई खास मतलब नहीं है.

राहुल गांधी क्या गुल खिलाएंगे

साल 2014 और साल 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की लगातार हार और राजद के साथ गठबंधन के बावजूद बिहार के पिछले चुनाव में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट बेहद खराब होने की वजह से बिहार में कांग्रेस का अपना कैडर तकरीबन खत्म हो चुका था, लेकिन साल 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन से बिहार कांग्रेस में जान सी आ गई है.

बिहार में कांग्रेस के पिछले ट्रैक रिकौर्ड की बात करें तो साल 2015 के बिहार चुनाव में कांग्रेस 6.8 फीसदी वोट शेयर के साथ 27 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही. वहीं, साल 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 9.6 फीसदी जा पहुंचा, लेकिन सीटें घट कर 19 रह गईं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बिहार में केवल एक सीट पर जीत मिली. तब उसे 7.70 फीसदी वोट मिले थे. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 9.20 फीसदी वोट शेयर के साथ 3 सीटों पर जीती और एक सीट से पार्टी के बागी पप्पू यादव बतौर निर्दलीय जीते.

प्रशांत किशोर की नई पार्टी

बिहार में 3,000 किलोमीटर की पद यात्रा के जरीए बिहार की जनता में ‘सुराज’ की चेतना जगाने के बाद प्रशांत किशोर ने पटना में अपनी नई जन सुराज पार्टी लौंच कर दी. जन सुराज पार्टी के पहले कार्यकारी अध्यक्ष मनोज भारती बनाए गए हैं.

प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार रहे हैं और उन्हें राजनीति की अच्छीखासी समझ है, लेकिन बिहार में भीड़ जमा करना और भीड़ को वोटों में बदलना दोनों बातें अलग हैं.

बिहार की राजनीति में जाति और धर्म का फैक्टर ज्यादा अहमियत रखता है और प्रशांत किशोर इन दोनों समीकरणों से अलग ‘भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन’ का राग अलापते हैं. बिहार का कायाकल्प करने की बात करते हैं. पढ़ाईलिखाई से समाज में क्रांति लाने का शिगूफा छोड़ते हैं. ऐसे तथाकथित ‘युगपुरुषों’ को बिहार की जनता बखूबी समझती है.

राजनीतिक रणनीतिकार होने के नाते प्रशांत किशोर का दावा है कि वे बिहार में राजद और भाजपा से अलग एक वैकल्पिक राजनीति की शुरुआत करना चाहते हैं. इस के लिए उन्होंने बिहार की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की योजना बनाई है.

प्रशांत किशोर की राजनीति कितनी कारगर साबित होती है, यह तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इतना तो तय है कि प्रशांत किशोर कुछ लोगों का खेल जरूर बिगड़ेंगे. बिहार का कल सुधारने की न इच्छा प्रशांत किशोर में है और न ही हुनर. वे तो लच्छेदार बातें बना कर नेताओं को चुनाव जीतने के नुसखे बेचने वाली सड़कछाप ताकत की दवाएं बेचने वाले हैं.

क्या होगी बीमार राज्य की तबीयत ठीक

कोई भी समाज, देश या राज्य तभी तरक्की करता है, जब वहां के नेताओं के पास समाज को आगे ले जाने की ईमानदार इच्छाशक्ति और सूझबूझ हो, लेकिन शायद बिहार में ईमानदार और सूझबूझ वाले नेता पैदा ही नहीं हो पाते. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु जैसे दक्षिण के कई राज्य इस वक्त देश की जीडीपी को संभालने की ताकत रखते हैं, वहीं बिहार इन में कहीं भी नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से जारी ग्लोबल मल्टी डाईमैंशनल पौवर्टी इंडैक्स-एमपीआई के मुताबिक, बिहार भारत का सब से गरीब राज्य है. यहां के 38 जिलों में से 11 जिलों में हर 10 में से 6 लोग गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं.

अररिया और मधेपुरा जिले में यह आंकड़ा 7 तक पहुंच जाता है. तेंदुलकर कमेटी की साल 2011-12 की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 33.17 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजारते हैं.

बिहार बीमार राज्य है, क्योंकि बिहार में करप्शन है, जातिवाद है, गरीबी है. बिहार की बदहाली के लिए इन में से जितने भी कारण गिनाए जा सकते हैं वे सभी कारण देश के दूसरे राज्यों में भी मौजूद हैं, लेकिन दूसरे राज्यों ने अपनी समस्याओं को खुद दूर किया या कर रहे हैं.

झारखंड के साथ खनिज संपदा के चले जाने के बाद भी बिहार के पास युवाओं की बड़ी ताकत थी. पंजाब की तरह उपजाऊ प्रदेश होने के बावजूद कृषि के क्षेत्र में भी बिहार का कोई योगदान नहीं है.

साल 2000 के बाद की सरकारों ने भी बिहार को बदहाली से बचाने के लिए कुछ नहीं किया और नीतीश सरकार ने भी अपने 15 साल के शासन में बिहार की बदहाली को दूर करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

साल 2025 का विधानसभा चुनाव सामने है, लेकिन इस चुनाव में भी बिहार के बुनियादी मुद्दों पर बात नहीं हो रही. पलायन, रोजगार, अशिक्षा और चिकित्सा जैसे मुद्दों पर जाति और धर्म की राजनीति हावी नजर आ रही है. इस चुनाव में भी जाति का फैक्टर मजबूत है और धर्म की राजनीति उभार पर है.

ऐसे में चुनाव के बाद जो भी सरकार बनेगी, उस से यह उम्मीद करना तो बेकार ही है कि वह बिहार में बहार ले आएगी. Political News In Hindi

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