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Emotional Story in Hindi : लड़का

Emotional Story in Hindi-

‘‘कैसा लगा लड़का तुम्हें?’’ नंदराम ने अपनी बीवी प्रभावती से पूछा.

‘‘और तो सब ठीक है, पर…’’ प्रभावती हिचक गईं.

‘‘तो अपनी संगीता ही कहां की…’’ यह कहते हुए नंदराम भी हिचके. प्रभावती कुछ सोचती हुई सी चुप ही रहीं.

नंदराम प्रभावती के साथ सुबह पैसेंजर रेलगाड़ी से ही गए थे और लड़का देख कर शाम तक वापस इसलिए आ जाना चाहते थे कि वे लड़की को घर पर अकेली नहीं छोड़ना चाहते थे.

एक बार वे दोनों गलती कर चुके थे. बात तब की है, जब उन्होंने मकान के बाहर की बैठक इंटर कालेज में नए आए अंगरेजी के टीचर कीर्ति बाबू को किराए पर दे दी थी. संगीता प्राइवेट बीए कर रही थी. अंगरेजी पूछने वह उस एमए पास टीचर कीर्ति से बैठक में जाने लगी थी.

एक दिन प्रभावती ने संगीता और उस टीचर के बीच बैठक के एकांत में कुछ ऐसावैसा देख लिया था.

नंदराम को सावधान करती हुई वे बोली थीं, ‘मास्टर कीर्ति की आदतें अच्छी नहीं हैं. लालच छोड़ो और उसे किराए की बैठक से निकाल बाहर करो.’

प्रभावती की बात को नंदराम समझ गए. लिहाजा, दूसरे दिन ही उन्होंने उस टीचर को निकाल बाहर किया.

बुरा यह हुआ कि नंदराम के पुश्तैनी दुश्मन जयकिशन बाबू, जिन का घर गली में ठीक नंदराम के घर के सामने था, ने अपना बाहर का कमरा उस टीचर को किराए पर दे दिया.

किराए पर देते हुए जयकिशन बाबू ने टीचर कीर्ति बाबू से कहा, ‘हमारा होनहार लड़का हाईस्कूल में है. कसबे के सभी लड़कों की तरह वह भी अंगरेजी में कमजोर है. उसे अपनी तरह फर्राटेदार अंगरेजी सिखा दें.’’

एक दिन प्रभावती ने पति नंदराम को बताया, ‘कीर्ति बाबू पड़ोसी के चबूतरे पर लगे हैंडपंप से जब पानी भरते हैं, तो संगीता ऊपर छत पर चढ़ कर मुंडेर से उन्हें देखने के लिए झांकती है.’

यह सुनते ही नंदराम परेशान हो गए. नातेरिश्तेदारों के यहां उस के रिश्ते के लिए दौड़ लगाने लगे. जल्दीजल्दी में जो भी लड़का जहां भी मिले, वे संगीता को ब्याह कर कसबे से बाहर कर बदनामी से बचने की कोशिश में जुट गए.

वे मन ही मन सोचा करते, ‘आदमी किसी से नहीं हारता, पर अपनी औलाद से हार जाता है.’

एक दिन संगीता को प्रभावती के सामने नंदराम ने समझाने और जिंदगी की ऊंचनीच बताने की कोशिश की, तो संगीता समझ गई कि पापा यह सब उस से क्यों कह रहे हैं.

पिता से तो उस ने कुछ नहीं कहा, पर बाद में वह मां से बोली, ‘किसी से तो करेंगे हमारी शादी. कीर्ति बाबू क्या बुरे हैं? नौकरी से लगे हैं, देखनेसुनने में भी अच्छे हैं. फर्राटेदार अंगरेजी बोलते हैं.

‘बड़े घर के लड़के हैं. पिता की खासी जमीनजायदाद है. घर पर मोटरसाइकिल है. खुद के पास मोबाइल फोन रहता है. वे होनहार हैं. जल्दी अच्छी जगह पहुंच जाएंगे.’

‘पर वे तो पहले से ही शादीशुदा हैं. सुना है, बीवी बहुत पढ़ीलिखी और किसी अच्छी नौकरी से लगी है. कीर्ति बाबू से ज्यादा कमाती है, पर कीर्ति बाबू के साथ रह कर वह अपनी नौकरी नहीं कर सकती थी और वह नौकरी छोड़ने को राजी नहीं है.

‘कीर्ति बाबू को ससुराल में घरजंवाई बन कर रहना पसंद नहीं, इसलिए नौकरी पर यहां चले आए. लाख अच्छे हों वे, पर हैं तो शादीशुदा…’ प्रभावती बोलीं.

‘क्या फर्क पड़ता है इस से?’ संगीता ने मुंहफट हो कर कहा, ‘बीवी बहुत नकचढ़ी है. अपनी नौकरी और बाप के पैसे का घमंड है उसे. सीधेसच्चे कीर्ति बाबू उस से ब्याह कर के बुरे फंस गए हैं. आजकल शहरों में ऐसे तमाम लोग हैं, जो नौकरी की जगह अलग औरत रखते हैं और शहर में दूसरी औरत…’

‘पागल हुई है क्या? दिमाग खराब है तेरा?’ मां ने फटकारा, ‘ऐसी ऊलजलूल बातें कहीं सोची जाती हैं? कल को बीवी के बच्चे होंगे, तब तू क्या करेगी? बीवी दबंग हुई, तो जूतमपैजार करेगी तुझ से. पुलिस में जा धमकेगी. इतनी बात तू नहीं समझ पा रही?’

अब जब लौट कर वे दोनों स्टेशन पर उतरे, तो नंदराम ने बीवी से फिर बात छेड़ी, ‘‘संगीता जरूर पूछेगी. क्या कहोगी?’’

‘‘कुछ भी कहें, पर संगीता इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होगी,’’ प्रभावती बोलीं, ‘‘लड़का ज्यादा पढ़ालिखा नहीं है. शहर में बरतनों की दुकान करता है.’’

‘‘पर कमाता ठीकठाक है. संगीता को सारे सुख मिलेंगे,’’ नंदराम बोले.

प्रभावती बोलीं, ‘‘ऐसे लड़के को वह कभी भी पसंद नहीं करेगी.’’

‘‘जिस लड़के को देखा था, वह 2 भाई थे. बड़े भाई को बदमाशों ने पैसे के लालच में अपहरण कर लिया था. यह लड़का पुलिस में रिपोर्ट कर आया. बदमाशों ने पैसे की मांग रखी. पुलिस भी बदमाशों से मिली हुई थी. इस लड़के के मन में लालच आ गया. पैसा नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि उन्होंने बड़े भाई की हत्या कर दी. अब पूरी दुकान और मकान का खुद मालिक है.’’

‘‘जो भाई अपने सगे भाई को दगा दे सकता है, वह तुम्हारी संगीता को दगा नहीं देगा, इस बात का क्या भरोसा है?’’ प्रभावती ने शक जाहिर किया.

‘‘तो क्या हम उसे कीर्ति बाबू को सौंप दें?’’ नंदराम बुरी तरह झल्लाए, ‘‘उस की पहले से बीवी है. कल को मार कर भगा देगी वह, फिर खिलाना बेटी को अपने घर बैठा कर जिंदगीभर.’’

‘‘और भी 2-4 लड़के सुने हैं हम लोगों ने. उन्हें क्यों न देखा जाए?’’ प्रभावती ने कहा.

‘‘और तब तक अपनी संगीता के पैर डगमगा गए तो? वह कीर्ति बाबू के साथ ज्यादा उलझ गई तो? कुछ ऊंचनीच हो गई, तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. कसबे को तो देख ही रही हो. बात फैलते देर नहीं लगेगी,’’ कुछ सोच कर वे बोले, ‘‘हम तो कहते हैं, लंगड़ा है तो क्या हुआ, बरतनों की चलती दुकान है. खासा कमा लेता है. अब सारी जायदाद का अकेला मालिक है.

‘‘शक्लोसूरत और पहननाओढ़ना क्या मतलब रखता है आजकल? संगीता को इस शादी के लिए तैयार करना ही चाहिए.’’

हालांकि वे खुद समझ रहे थे, संगीता कैसे भी राजी नहीं होगी इस संबंध के लिए. कहीं कुछ उलटासीधा कर बैठी, तो लड़की से भी हाथ धो बैठेंगे.

वही हुआ. प्रभावती ने संगीता को हंसते हुए सबकुछ सामान्य ढंग से बताया. देखे हुए लड़के की तमाम खूबियां गिनाईं, पर कमियों को भी छिपाया नहीं. आखिर रिश्ते का सवाल था. लड़की बरात आने पर बिदक गई, तो कसबे में बड़ी बदनामी होगी. 2-3 बरातें ऐसे अनमेल संबंधों के चलते लड़कियां दरवाजे से लौटा चुकी हैं. संगीता ने भी ऐसा किया, तो क्या होगा?

संगीता सहेली के घर जाने के बहाने कसबे के कालेज में चली गई और कीर्ति बाबू को जा कर सबकुछ बता दिया.

यह सुन कर कीर्ति बाबू मुसकराए और बोले, ‘‘जिंदगी में चलतेचलते तमाम सवाल हमें ऐसे ही घेर कर खड़े हो जाते हैं संगीता… और अकसर हम परेशानी में पड़ जाते हैं, हम यह तय नहीं कर पाते कि क्या करें, क्या न करें.’’

‘‘लेकिन, हमें जवाब तो तलाशने पड़ेंगे सर… आप बताइए कि हम क्या करें?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘यह तुम्हारी जिंदगी है. इस का फैसला तुम्हें करना चाहिए. जिस फैसले पर पहुंचो, उस पर तुम्हें मजबूत रहना चाहिए. तुम क्या सोच रही हो?’’ वे संगीता की आंखों में ताक रहे थे.

संगीता ने सिर झुका लिया और बोली, ‘‘मैं तो आप के अलावा किसी के बारे में कुछ नहीं सोच पा रही.’’

‘‘लेकिन मेरे बारे में तुम्हें सब पता है. तुम मुझे अच्छी लगती हो, इस में शक नहीं. लेकिन हर चीज जो हमें अच्छी लगे, जरूरी नहीं है, वह हासिल भी हो जाए. हासिल करने की हिम्मत भी मुझ में नहीं है… मेरी बीवी झगड़ालू है, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वह मेरी और तुम्हारी जिंदगी नरक बना देगी, इस का एहसास मुझे है.’’

‘‘तब? तब क्या मैं आप को पाने के सपने न देखूं?’’ संगीता ने सवाल पूछा.

कीर्ति बाबू काफी देर तक चुप रहे, फिर बोले, ‘‘मांबाप से कहो कि तुम्हारे लिए कोई और अच्छा लड़का देखें, जो तुम्हारे लायक हो… तुम उस के साथ खुश रह सको,’’ मन मार कर कीर्ति बाबू ने संगीता को सलाह दी.

‘‘गांव में आप को ले कर मेरी बदनामी शुरू हो गई है. बात कल को बढ़ जाएगी,’’ संगीता बोली, ‘‘लड़का मिलना आसान तो नहीं है. समय लग सकता है और मैं आप से मिले बिना रह नहीं सकती… ऐसे में क्या होगा?’’

‘‘पिताजी से कहो, तुम्हें पढ़ने के लिए शहर भेज दें,’’ कीर्ति बाबू बोले, ‘‘वहां मन लगा कर पढ़ो. कंप्यूटर सीखो. हुनर बढ़ाओ और जब रिश्ता ठीक सा मिल जाए, ब्याह कर लेना.

‘‘मैं भी नहीं चाहता कि यह नौकरी तुम्हारी वजह से खो बैठूं. नौकरी न रही, तो बीवी मुझ पर और दबाव डालेगी कि उस के साथ रहूं, जो मैं नहीं चाहता.’’

उम्मीद नहीं थी कि कीर्ति बाबू उसे इस तरह टरका देंगे. वह उन्हें साहसी मान रही थी. उन के साथ बिना शादी के ही रहने को तैयार हो रही थी, पर अब तो हालात ही बदल गए थे.

संगीता ने घर आ कर मां से कहा, ‘‘जहां आप लोग लड़का देख आए हैं, उसी से रिश्ता तय कर दीजिए…’’

नंदराम ने सुना, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, पर वे बहुत खुश हो गए और शहर चले गए.  Emotional Story in Hindi

Hindi Story : दामाद

Hindi Story.साधारण परिवार के अमित की सरकारी नौकरी क्या लगी, उस के लिए अमीर व्यापारी की बेटी का रिश्ता आ गया. शादी के बाद अमित को कुछ ऐसा पता चला कि उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

जि  ला बदायूं के एक छोटे से गांव में, जहां सड़कें धूल भरी और घर मिट्टी के थे, वहां अमित कुमार का जन्म हुआ था. उस के पिता, रामनिवास, एक साधारण किसान थे, जिन के पास 5 बीघे की जोत थी और मां, सुमित्रा देवी, घर की चारदीवारी में सिमटी एक मजबूत औरत.

अमित बचपन से ही होशियार था और गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी वह जिले में टौप करता रहा. उस की मेहनत ने उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया और वहां से एक सरकारी नौकरी तक का सफर पूरा हुआ.

नौकरी लगते ही गांव में अमित की इज्जत बढ़ गई. रिश्तों की बाढ़ आ गई. हर कोई अपनी बेटी इस होनहार नौजवान से ब्याहना चाहता था, लेकिन अमित की इच्छा साधारण थी. एक ऐसी पत्नी, जो उस के बूढ़े मातापिता की सेवा कर सके, जो उस की साधारण बैकग्राउंड को समझे.

गांव के पंडित हरिनारायण शर्मा, जो अमित के पिता के विश्वासपात्र थे, ने एक दिन रामनिवासजी को बुलाया, ‘‘रामनिवासजी, मैं ने आप के लिए सोना ढूंढ़ निकाला है…’’ उन्होंने राज भरे अंदाज में कहा, ‘‘शहर के एक बड़े व्यापारी मोहनलाल अग्रवाल की बेटी आशा. परिवार बहुत अमीर है, दहेज में आप को जो चाहिए वह मिलेगा.’’

रामनिवास ने कहा, ‘‘पर पंडितजी, हमारे और उन के बीच तो सामाजिक और पैसे की बहुत बड़ी खाई है.’’

पंडितजी ने सम?ाया, ‘‘आजकल जमाना बदल गया है. अमीर परिवार पढ़ालिखा और सरकारी नौकरी वाला दामाद चाहते हैं. आप अमित की शादी इस लड़की से करवा दीजिए, पूरे गांव में आप की इज्जत बढ़ेगी.’’

अमित ने जब इस रिश्ते के बारे में सुना तो वह सहमत नहीं था. उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं उस लड़की को देखे बिना, उस से बात किए बिना शादी नहीं कर सकता.’’

लेकिन रामनिवास पर पंडितजी की बातों का जादू चल चुका था. उन्होंने अमित को डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शादी के बाद खूब देखने का मौका मिलेगा. अभी तुम्हारा काम पढ़ाई और नौकरी करना है.’’

सुमित्रा देवी ने बीच में पड़ कर कहा, ‘‘कम से कम अमित को लड़की से एक बार मिल लेने दो.’’

लेकिन रामनिवास अड़े रहे, ‘‘नहीं, शादी तय हो चुकी है. अग्रवाल परिवार जल्दी शादी चाहता है.’’

शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. अग्रवाल परिवार ने शानदार इंतजाम किया… बरात पांचसितारा होटल में ठहरी, भोजन विदेशी व्यंजनों से सजा था. दहेज में अमित के लिए एक नई कार भी थी, जिसे उस ने साफ शब्दों में लेने से मना कर दिया, ‘‘मैं दहेज के खिलाफ हूं,’’ पर पिता के दबाव में उसे दूसरे सामान स्वीकार करने पड़े.

सुहागरात पर अमित को एक ?ाटका लगा. आशा, उस की पत्नी, ने न केवल उस से दूरी बनाई, बल्कि उस के मातापिता के प्रति भी उदासीनता दिखाई. अगले 2 दिन तक वह किसी से ठीक से बात नहीं करती रही, घर के कामों से भी दूर रही.

अमित ने एकांत में आशा से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी शादी मु?ा से जबरदस्ती हुई है? क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?’’ आशा ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल खिड़की से बाहर देखती रही.

तीसरे दिन, गांव की परंपरा के मुताबिक, अमित आशा को उस के मायके छोड़ने गया. ट्रेन से यात्रा के दौरान भी आशा चुप रही. स्टेशन से पैदल चलते हुए, अचानक आशा ने चलने की रफ्तार बढ़ा दी और अमित से आगे निकल गई.

तभी एक मोटरबाइक पर 2 नौजवान आते दिखे. आशा को देखते ही वे रुक गए. अमित ने पहली बार आशा के चेहरे पर मुसकान देखी. उन दोनों ने आशा से कुछ कहा और वह और भी खुश हो गई.

अमित के पास पहुंचने तक वे दोनों नौजवान चले गए थे. आशा ने इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया और अमित ने भी नहीं पूछा, पर उस के मन में सवालों की लहर उठने लगी.

अग्रवाल परिवार का घर भव्य था. तिमंजिला हवेली, बगीचा, गाडि़यां, पर अमित का स्वागत ठंडा था. आशा की मां उसे उसे तुरंत अंदर ले गईं, जबकि अमित को बरामदे में छोड़ दिया गया.

शाम को अमित को पहली मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया. थकान के मारे वह सो गया. रात के 9 बजे, नीचे से आती हंसी की आवाज से उस की नींद खुली.

झांक  कर देखा तो मोहनलाल अग्रवाल और 2 दोस्त शराब पी रहे थे. मोहनलाल नशे में चूर थे, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल…’’ वे चिल्लाए, ‘‘सब कहते थे मेरी बिगड़ी बेटी से कौन शादी करेगा? मैं ने एक गरीब लड़के से करवा दी.’’

दोस्तों में से एक ने हंसते हुए कहा, ‘‘सचमुच मोहनलाल, तुम तो जैकपौट हिट कर गए.’’

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई. तभी आशा की मां आईं और मोहनलाल के कान में कुछ कहा. वे तुरंत अंदर चले गए.

अमित चुपचाप नीचे उतरा और अंदर के कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. वहां का सीन उस के लिए चौंकाने वाला था.

आशा एक कोने में बैठी थी. उस के सामने मोहनलाल खड़े थे. ‘‘बता, किस के साथ मुंह काला करवाया है?’’ मोहनलाल चिल्ला रहे थे, ‘‘मैं ने तेरी हर गलती माफ की, तेरी शादी करवाई, और तू…’’

तभी आशा की मां ने उस के बाल पकड़े और उसे पीटना शुरू कर दिया. आशा विरोध नहीं कर रही थी, मानो यह सजा उसे स्वीकार थी.

अमित खुद को रोक नहीं पाया. वह कमरे में घुसा और आशा की मां का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बस करिए…’’ उस की आवाज में गुस्सा था. मोहनलाल और उन की पत्नी घबरा गए. मोहनलाल की नशा उतर चुका था. उन्हें एहसास हो गया कि अमित ने सबकुछ सुन लिया है.

मोहनलाल रोने लगे, ‘‘अमित, माफ कर दो. आशा… आशा ने एक गलती की थी. हम ने सोचा था कि शादी करवा देंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’ आशा की मां ने रोते हुए कहा, ‘‘यह पेट से है अमित. उस लड़के ने इसे छोड़ दिया. हमें लगा कि तुम्हारी इस से शादी करवा दें तो…’’

मोहनलाल अचानक उठे और कमरे से एक दोनाली बंदूक ले आए, ‘‘मैं इस की हर गलती माफ करता रहा…’’ वे आशा की तरफ बंदूक तानते हुए बोले, ‘‘लेकिन अब नहीं. यह हमारे कुल का नाम डुबो चुकी है.’’

अमित ने तेजी से आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी, ‘‘बस…’’ उस की आवाज में मजबूती थी, ‘‘आशा, चलो मेरे साथ. हम अपने घर चलते हैं.’’ सब चौंक गए. आशा ने पहली बार अमित की तरफ देखा.

‘‘अमित…’’ मोहनलाल ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘तुम… तुम इसे अपने साथ ले जाना चाहते हो? इस की इस हालत के बावजूद?’’

अमित ने गहरी सांस ली और तेज आवाज में कहा, ‘‘जी, गलती आशा की नहीं, आप की है. आप ने उसे वह प्यार नहीं दिया, वह संस्कार नहीं दिए जो एक बच्चे को चाहिए. आप ने पैसे और इज्जत को परिवार से ऊपर रखा…’’

अमित थोड़ा रुका, फिर बोला, ‘‘और आशा की सजा यही है कि इसे अब मेरे साथ, एक साधारण परिवार में, मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा. इसे सीखना पड़ेगा कि प्यार क्या होता है, इज्जत क्या होती है.’’

मोहनलाल अमित के पैरों पर गिर पड़े, ‘‘तुम महान हो अमित.’’  अमित ने उन्हें उठाया, ‘‘नहीं, मैं केवल एक इनसान हूं जो समझता है कि हर गलती के पीछे एक कहानी होती है.’’

अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकल गया. आशा उस के पीछेपीछे चल रही थी, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे… शायद पहली बार राहत के आंसू.

स्टेशन जाते समय, वही 2 नौजवान फिर मिले. उन में से एक, जो शायद आशा का प्रेमी था, मुसकराते हुए बोला, ‘‘आओ आशा डार्लिंग, चलो हम तुम्हारे पेट के बच्चे को गिरवा देते हैं, फिर मजे करेंगे…’’ इतना कह कर उस ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की.

तभी अमित ने उसे जोरदार घूंसा मारा. दूसरा लड़का आगे बढ़ा तो आशा ने खुद आगे बढ़ कर उसके बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. ‘‘तुम लोगों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी…’’ आशा ने पहली बार तेज आवाज में कहा, ‘‘लेकिन अब खत्म. जाओ, और कभी मेरे सामने मत आना.’’

वे दोनों नौजवान भाग खड़े हुए. अमित ने आशा को गले लगाया, ‘‘शाबाश, तुम में लड़ने की ताकत है.’’

अमित ने अपने मातापिता को कुछ नहीं बताया. आशा ने धीरेधीरे घर संभालना शुरू किया. वह सुमित्रा देवी की मदद करती, रामनिवासजी की सेवा करती. उस का बरताव पूरी तरह बदल गया था।

एक दिन आशा ने अमित से कहा, ‘‘मैं… मैं इस बच्चे को गिरवाना चाहती हूं. यह तुम्हारा नहीं है.’’ अमित ने आशा की ओर देखा, ‘‘पर इस में इस मासूम की क्या गलती है आशा? यह तो बेकुसूर है.’’

आशा अमित के पैरों पर गिर पड़ी, ‘‘तुम… तुम इसे अपनाओगे? मेरी इस गलती को?’’ अमित ने आशा को उठाया, आंखों में देखा, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू… यही तो तुम्हारी पवित्रता है..हम इस बच्चे को पालेंगे, अपने बच्चे की तरह.’’

एक साल बीत गया. आशा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रेहान  रखा गया. अमित ने उसे अपनी गोद में लिया और कहा, ‘‘यह मेरा बेटा है आशा. हमारा बेटा.’’

आशा ने फिर से रोना शुरू कर दिया, पर इस बार खुशी के आंसू थे. अमित के मातापिता ने बच्चे को अपना पोता मान लिया. गांव में कोई नहीं जानता था कि यह बच्चा अमित का नहीं है.

एक शाम, आशा ने अमित से पूछा, ‘‘तुम ने मुझे क्यों स्वीकार किया? मैं तो…’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं ने तुम में वह आशा देखी जो तुम्हारे नाम का मतलब है. प्यार का मतलब ही है स्वीकार करना.’’

बाहर, शाम का सूरज डूब रहा था, नई सुबह के इंतजार में. एक ऐसी सुबह जो नए विश्वास, नए प्यार और नई जिंदगी की कहानी ले कर आएगी.  Hindi Story

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