Hindi Story. किसी ने धीरे से दरवाजे की कुंडी खटखटाई. मैं ने दरवाजा खोला, तो देखा कि सामने एक औरत खड़ी थी. पैबंद लगे हुए बदरंग बुरके से मैं ने पहचान तो लिया कि वही कल वाली औरत थी, लेकिन हैरानी हो रही थी कि इतनी रात गए यह मेरे पास क्यों आई?

उसी ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘बाबूजी, आप ने मुझे पहचाना नहीं…’’ ‘‘मैं ने तो कल ही आप को पहचान लिया, मगर ताज्जुब है कि आप ने मुझे कैसे पहचान लिया और इस समय यहां तक आने की तकलीफ कैसे की?’’

‘‘मैं तो कल ही आप की शराफत की कायल हो गई थी और तभी से आप से मिलना चाहती थी.’’

मैं तो चाहता था कि यह औरत फौरन यहां से चली जाए, लेकिन समस्या यह थी कि इस बला से छुटकारा कैसे पाया जाए.

इतनी ही देर में वह कुछ और बेतकल्लुफ हो गई. उस ने चेहरे से बुरका हटा दिया था. मैं ने देखा कि वह बहुत खूबसूरत नहीं तो बदसूरत भी नहीं थी. मैं चाह कर भी यह नहीं कह पाया कि वह चली जाए.

रात के 9 बज चुके थे. केवल एक घंटे बाद चौकीदार और मेरी ड्यूटी संभालने वाला आने वाला था. मैं सोच रहा था कि अगर तब तक यह नहीं गई, तो वे दोनों मेरे बारे में न जाने क्याक्या सोचेंगे? दूसरे दिन ही जब यह बात नमकमिर्च लगा कर मेरी बीवी को बता दी जाएगी, तब घर पर मेरी हालत क्या होगी? आखिर इस औरत ने मुझे समझ क्या रखा है, जो इतनी रात गए मेरे पास आई? कल उन लोगों ने इस के साथ जो बरताव किया था, उस में इस का भी कुसूर था. क्या यह उस का बदला मुझ से लेने आई है?

मैं ने जेब से 10 रुपए का एक नोट निकाल कर उस की ओर बढ़ाया, ‘‘लो, इसे रख लो और फिर कभी मुझ से मिलने की कोशिश मत करना, वरना तुम्हारा तो कुछ नहीं होगा, पर मैं बालबच्चेदार आदमी मुफ्त में बदनाम हो जाऊंगा.’’

जब उस ने नोट नहीं लिया, तो मुझे हैरानी हुई. अभी कल ही तो 2 आदमियों ने इसे केवल 12 रुपए दिए थे. तब तो मुझे ऐसा लगा था कि केवल पैसे के लिए ही यह ऐसा काम करती है.

‘‘बाबूजी, आप ने मुझे गलत समझा. मैं आप के पास पैसे के लिए नहीं आई. यह बात और है कि पैसे के लिए अकसर मुझे अपना जिस्म बेचना पड़ा है. यहां मेरे आने का मकसद दूसरा ही है.’’

‘‘जल्दी बताओ, तुम्हारा क्या मकसद है?’’

उस ने यह भी परवाह नहीं की कि मुझे उस की आपबीती सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है. बोलना शुरू किया, तो बोलती ही चली गई. उस के बाप ने दूसरी शादी कर ली थी. सौतेली मां ने बहुत बुरा सुलूक किया. सभी काम उस को करने पड़ते और ऊपर से डांटफटकार भी सुननी पड़ती.

समय के साथ वह बड़ी होती गई. पड़ोस में रहने वाली एक मास्टरनी ने काफी हमदर्दी दिखाई. अपने स्कूल से किताबें ला कर दीं और प्राइवेट इम्तिहान दिला कर किसी तरह इंटर पास करा दिया. उस की इच्छा थी कि पढ़लिख कर कोई नौकरी कर लेगी और अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी, लेकिन सौतेली मां ने अपने नालायक भतीजे से उस की शादी करा दी.

ससुराल में वैसे भी खानेपहनने की तंगी थी. ऊपर से पति के जुल्म भी बढ़ते गए. हद तो तब हो गई, जब पति ने उसे जिस्मफरोशी करने के लिए मजबूर किया. वह रोतीगिड़गिड़ाती रही, लेकिन उस की सुनने वाला कोई नहीं था.

एक दिन शराब के नशे में पति ने 3 बार ‘तलाक’ कह कर उसे घर से निकाल दिया. पिता के घर गई, तो सौतेली मां ने उसे वहां न रुकने दिया. 2 दिन तक इधरउधर मारीमारी फिरती रही.

नशा उतरने पर पति ने उसे घर ले जाना चाहा, वह उस घर में वापस नहीं जाना चाहती थी. पति अपना सा मुंह ले कर चला गया.

फिर वह इस बड़े शहर में आ गई. यहां पर वह बहुतों के आगे अपना दुखड़ा रोई, लेकिन सब ने उस के साथ बुरा सुलूक किया. उसे कहीं कोई नौकरी नहीं मिली. पेट की भूख शांत करने के लिए उसे अपना जिस्म बेचना पड़ा.

उस की आपबीती सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ. मैं सोचने लगा कि इस के लिए क्या किया जा सकता है? पर कुछ समझ में नहीं आ रहा था. थोड़ी ही देर बाद ड्यूटी खत्म कर के मैं घर की तरफ चल पड़ा. मेरे पास साइकिल थी, पर मैं पैदल ही चल रहा था. मैं ने उस से कुछ नहीं कहा था, फिर भी वह पता नहीं क्यों मेरे पीछेपीछे चलने लगी.

‘‘क्या मेरे घर चलने का इरादा है?’’ मैं ने पूछा. ‘‘आप की बीवी क्या मुझे धक्के मार कर बाहर नहीं निकाल देगी?’’

‘‘तब तो तुम मेरे घर ही चलो, नहीं तो कल जब चौकीदार घर जा कर मेरी बीवी को तुम्हारे बारे में उलटीसीधी बातें बताएगा, तो मेरी फजीहत हो जाएगी.’’

वह तो जैसे इस के लिए पहले से ही तैयार थी. चल पड़ी मेरे साथ. मैं ने उसे साइकिल पर पीछे बैठा लिया था. घर पहुंच कर मैं ने अपनी बीवी कमला को उस के बारे में सबकुछ बताया. उसे खाना दिया गया और बरामदे में एक छोटी सी चारपाई सोने के लिए निकाल दी गई.

रात में काफी देर तक कमला उस औरत के बारे में ही बात करती रही कि मैं उसे घर क्यों ले आया? अगर वह यहां काफी दिनों तक रुक गई, तो लोग क्या कहेंगे? उस के बारे में जब पूछेंगे, तो क्या जवाब दिया जाएगा?

कमला ने सुबह उठ कर दरवाजा खोला, तो देखा कि वह चारपाई पर गुमसुम बैठी थी. पूछने पर उस ने अपना नाम सलमा बताया.

सलमा के पास फटे हुए गंदे कपड़ों को छिपाने के लिए उस पैबंद लगे हुए बुरके के सिवा और कुछ नहीं था. कमला ने उसे अपने कपड़े दिए. नहाधो कर तैयार हुई, तो वह एक सलीकेदार औरत लगी. जल्दी से हम तीनों सलमा की नौकरी के सिलसिले में हैदर साहब से मिलने चल पड़े.

हैदर साहब मुझे देखते ही मुसकराए और पूछा, ‘‘कहो बरखुरदार, आज इस बुड्ढे की याद कैसे आ गई?’’

फिर कमला की तरफ देख कर कहा, ‘‘बहू, तुम जा कर अपनी चाची से मिल लो.’’ कमला अंदर चली गई. सलमा भी उस के साथ गई.

हैदर साहब ने इरफान को आवाज दी. वह आया तो उसे नाश्ता लाने को कहा. वह गमगीन हो गए और बोले, ‘‘बेचारा इरफान, जब से इस की मां की मौत हुई है, तभी से यह कितना अकेला हो गया है. घर की रौनक ही चली गई. असलम भी बुझाबुझा सा रहता है.

‘‘कई बार चाहा कि उस की दूसरी शादी कर दें, मगर वह इनकार कर देता है. उस का सोचना भी अपनी जगह पर सही है कि कोई भी औरत सौतेले बच्चे के साथ अपना अच्छा सुलूक नहीं कर सकती.’’

मैं ने कहा, ‘‘चचाजान, मैं एक बहुत जरूरी काम से आप के पास आया हूं.’’

‘‘अरे बेटा, मैं तो पूछना ही भूल गया कि सवेरेसवेरे कैसे चले आए? साथ में बहू को भी ले आए हो… और वह लड़की कौन है?’’

मैं ने सलमा की कहानी उन्हें बता दी और कहा कि वह पढ़ीलिखी है. उसे अपने स्कूल में कोई काम दे दें, तो ठीक रहेगा.

हैदर साहब ने कुछ देर सोचने के बाद कहा, ‘‘स्कूल में तो नौकरी मिलना मुमकिन नहीं है. अगर तुम कहो, तो कारखाने में इसे कुछ लिखापढ़ी का काम दिला दिया जाए? रहने के लिए यहीं एक कोठरी दे देंगे.

‘‘सुबहशाम इरफान को पढ़ा दिया करेगी और उसे स्कूल जाने के लिए तैयार कर दिया करेगी. खानेपीने का इंतजाम घर की तरह रहेगा. इस के अलावा जो वाजिब होगी, तनख्वाह दे दी जाएगी.’’

मैं बहुत खुश हुआ. फौरन उठ कर चाची से मिलने भीतर चला गया. मैं ने बताया कि चचाजान ने सलमा के लिए क्या इंतजाम किया है.

नाश्ता करने के बाद मैं कमला के साथ वापस चला आया. सलमा वहीं रह गई थी.

सलमा की खोजखबर लेने मैं हफ्ते में 1-2 बार हैदर साहब के यहां जाने लगा. एक दिन उन्होंने बताया कि सलमा अपनी तनख्वाह लेने से इनकार कर रही है. उस का कहना है कि जब उस की सब जरूरतें पूरी हो रही हैं, तो वह तनख्वाह ले कर क्या करेगी?

मैं ने कहा कि अगर वह तनख्वाह नहीं लेती, तो किसी बैंक में उस के नाम पैसे जमा कर दिए जाएं. बात वाजिब थी और सभी ने इसे मान लिया.

दिन बीतते गए. हैदर साहब के घर में सलमा बड़े आराम से रह रही थी. मैं उस तरफ से बेफिक्र हो गया था.

एक दिन बड़े सवेरे ही हैदर साहब ने अपने नौकर को भेज कर मुझे बुलवाया और हिदायत दी कि बहू को भी साथ ले कर आऊं.

वहां पहुंचते ही वह बोले, ‘‘आओ बरखुरदार, तुम से एक बहुत ही अहम मसले पर मशवरा करना है. इतने दिनों से तुम देख रहे हो कि सलमा इस घर में बिलकुल अपने घर की तरह रह रही है. इरफान उस से इतना हिलमिल गया है कि वे दोनों एकदूसरे को मांबेटे की तरह चाहने लगे हैं.

‘‘इधर कुछ दिनों से असलम भी हर काम में दिलचस्पी लेने लगा है. वह दूसरी शादी सिर्फ इरफान की वजह से नहीं करना चाहता था. उसे डर था कि आने वाली बीवी सौतेले बच्चे की जिंदगी बरबाद कर देगी.

‘‘मेरा खयाल है कि असलम बड़ी खुशी से सलमा को अपनाएगा और इरफान को भी मां मिल जाएगी. मैं ने सोचा कि तुम से मशवरा कर लिया जाए… उस के बाद ही यह बात असलम और सलमा को बताई जाए. तुम बहू को ले कर अंदर जाओ और अपनी चाची से बात करो. सलमा भी वहीं होगी.’’

चाची ने सलमा को चाय बनाने के लिए कहा और खुद अंदर जा कर एक संदूक उठा लाईं, जो सोने और चांदी के जेवरों से भरा था. उन्होंने अपनी होने वाली बहू के लिए सारा सामान पहले से ही संभाल कर रख लिया था.

सलमा चाय ले कर आई, तो संदूक की तरफ हैरानी से देखने लगी.

कमला ने कहा, ‘‘क्या घूरघूर कर देख रही हो… चचीजान ने यह सब तुम्हारे लिए ही बनवाया है.’’

‘‘मेरे लिए? इतने जेवरों का मैं क्या करूंगी? मुझे इस की जरूरत ही क्या है?’’ सलमा कुछ भी समझ नहीं पा रही थी.

‘‘चचीजान तुम्हें अपनी बहू बनाना चाहती हैं. अब जरा सोचो, इतने बड़े घर की एकलौती बहू के लिए क्या इतने जेवर बहुत हैं?’’ कमला ने सलमा को खींच कर अपने पास बैठा लिया.

मैं ने देखा, सलमा की आंखों में आंसू छलक आए थे. मेरी तरफ देख कर उस ने कहा, ‘‘भाईजान, लगता है आप ने मेरे बारे में इन लोगों को सबकुछ नहीं बताया है, लेकिन अब बता दीजिए. मुझे इस घर में जितना प्यार और इज्जत मिली है, वही काफी है… उस से ज्यादा पाने की ख्वाहिश नहीं है.

‘‘मैं इतने बड़े घर की बहू बनने लायक नहीं हूं. मुझे कनीज ही बनी रहने दीजिए.’’

‘‘हमें तुम्हारे बारे में सबकुछ पता चल गया है. आज तुम्हें भी इस बात का पता चल गया, जिसे हम कई दिनों से छिपा रहे थे. आज से तुम हमारी बहू हो,’’ यह कह कर चाची ने एक कीमती हार उस के गले में डाल दिया.

बड़ी धूमधाम से शादी हुई. सलमा बाकायदा हैदर साहब के खानदान की बहू बन गई.

कुछ दिन और बीत गए. एक सुबह हलकी बूंदाबांदी हो रही थी. 8 बजे होंगे कि दरवाजे पर स्कूटर के रुकने की आवाज सुनाई पड़ी. बाहर निकल कर देखा, तो असलम, सलमा और इरफान खड़े थे. मैं ने उन्हें अंदर बैठाया.

सलमा ने मेज पर मिठाई का डब्बा रख कर खोला. उस में से मिठाई का एक टुकड़ा उठा कर मेरे मुंह में डाल दिया और अपने पर्स से एक चमकती हुई राखी निकाली. वह बोली, ‘‘भाईजान, हाथ इधर बढ़ाइए. आप यह भी भूल गए कि आज रक्षाबंधन है.’’

इतना कह कर उस ने मेरे हाथ पर राखी बांध दी और बोली, ‘‘अब मुझे अपना मायका भी चाहिए.’’

मैं सोचने लगा कि औरत को ससुराल की चाहत तो होती है, पर मायके की चाहत भी उस के मन में उतनी ही होती है. सलमा को उस के बरताव से अच्छी ससुराल मिल ही गई थी, अब उसे मायका भी मिल गया.

चायनाश्ता खत्म हुआ, तो असलम जाने के लिए उठ कर खड़ा हुआ. मैं ने कहा, ‘‘सलमा आज यहीं रहेगी. हमारे साथ अपने मायके में रक्षाबंधन का त्योहार मनाएगी. इरफान भी यहीं रहेगा. कल मैं खुद इन्हें पहुंचाने आ जाऊंगा.’’

‘‘आप का हुक्म सिरआंखों पर साले साहब,’’ असलम मुसकराते हुए स्कूटर स्टार्ट करने लगा. Hindi Story.

-नरसिंहनारायण

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