Story. आनी ने कहा, ‘‘आ जाइए साहब. आजकल आप के फोन के अलावा किसी का इंतजार नहीं रहता है,’’ न चाहते हुए आनी ने कहा और मोबाइल फोन काट दिया.

आनी को अविनाश से नफरत सी हो गई थी. वैसे वह किसी मर्द से कभी प्यार नहीं कर पाई थी. प्यार होता क्या है, यह उस ने कभी समझा ही नहीं था.

आनी के मातापिता गरीब थे. स्कूल की फीस तक नहीं दे पाते थे. पड़ोस में मीरा रहती थी. सब कहते थे कि वह अच्छी औरत नहीं है, मगर आनी को वह अच्छी लगती थी. मीरा रोज उसे कोई न कोई चीज देती थी. कभी अच्छा सा पैन, कभी कुछ और. आनी सहज ही ले लेती थी.

मां पूछतीं, ‘आनी, यह पैन कहां से लाई है?’ आनी कह देती, ‘मां, यह मेरी सहेली का पैन है. उस से लिखने के लिए ले लिया है. कल दे दूंगी,’ मगर वह कल कभी नहीं आया.

मीरा आनी को अच्छी लगती थी, पर क्यों? यह आनी को कभी समझ नहीं आया.

मीरा हमेशा बनीसंवरी रहती. उस के पास पैसे की कमी नहीं थी. आनी भी चाहती थी कि वह मीरा की तरह ऐशमौज से रहे, मगर कैसे? वह इस बात को कभी समझ नहीं पाई.

आनी को अच्छी तरह याद है कि उसे घूमने जाना था. उस ने मां से पैसे मांगे, तो मां ने मना कर दिया था. वे बोलीं, ‘आनी, हम तुम्हें घूमने नहीं भेज सकते. हमारे पास 2 सौ रुपए हैं. वे भैया की फीस में जाएंगे.’

‘मां, ये रुपए मुझे दे दो…’ आनी ने जिद की, ‘‘भैया की फीस बाद में दे देना.’’

इस पर मां का जवाब था, ‘आनी, भैया की फीस जमा नहीं की, तो वह इम्तिहान नहीं दे पाएगा. फिर तेरे पापा की इतनी आमदनी नहीं है कि हम सभी के शौक पूरे कर पाएं.’

यह बात मीरा ने सुन ली थी. उस ने आनी को अपने पास बुला कर पैसे दे दिए और कहा, ‘आनी, ये लो पैसे. मां से कह देना कि मेरी सहेली रीना ने पैसे दिए हैं. वह अकेली घूमने नहीं जाना चाहती थी, इसलिए उस ने मुझे साथ ले जाने के लिए मेरे पैसे भर दिए.’

आनी को क्या चाहिए था. उस की इच्छा पूरी हो रही थी, इसलिए वह मीरा का सिखाया हुआ झूठ बोल गई.

मां को यकीन नहीं हुआ. तब रीना को बुलवाना पड़ा. रीना होशियार थी. उस ने भी आनी का सिखाया हुआ झूठ बोल दिया. तब मां ने आनी को घूमने के लिए जाने की इजाजत दे दी.

मीरा अकसर आनी की जरूरतों को पूरा कर दिया करती थी. आनी को उत्सुकता होती थी कि मीरा आंटी ऐसा क्या करती हैं कि उन्हें बहुत ज्यादा पैसे मिलते हैं.

इस बारे में उस ने मीरा आंटी से पूछ डाला, ‘मीरा आंटी, आप से एक बात पूछनी थी…’ मीरा को इसी बात का इंतजार था. उस ने झट से कहा, ‘अरे बेटी पूछो, क्या पूछना है?’

‘आप कहीं नौकरी पर नहीं जाती हैं, कुछ कमाती नहीं हैं, फिर इतना पैसा कहां से लाती हैं?’ आनी ने अपना मासूम सा सवाल किया था.

‘बस, इतनी सी बात…’ मीरा आंटी ने जवाब दिया था, ‘मैं ने बहुत सा पैसा जमा कर रखा है. जब भी जरूरत होती है, निकाल लाती हूं.’

‘मगर वह पैसा कहां से आया?’ ‘मैं एक खेल खेलती हूं. यह पैसा उसी से आता है?’ मीरा ने उस दिन इतना ही कहा था.

आनी के दिमाग में मीरा का खेल समझ में नहीं आ रहा था. वह बारबार उस को समझने की कोशिश कर रही थी, मगर समझ नहीं पा रही थी.

एक बार मीरा ने उसे अपनी सहेलियों के साथ होटल ‘ताज’ में बुलाया था. वह उन्हें पार्टी देना चाहती थी.

आनी अपनी सहेलियों के साथ ताज पहुंची. वहां उस ने अपनी सहेलियों को मीरा का परिचय ‘आंटी’ कह कर करवाया.

मीरा ने वहां दिल खोल कर खर्च किया. आनी की सभी सहेलियां बड़ी खुश हुईं. उन्हें मीरा आंटी बहुत पसंद आई थीं. मगर आनी को अभी भी मीरा का वह खेल समझ में नहीं आया.

एक दिन आनी से रहा नहीं गया और उस ने मीरा आंटी से पूछ ही लिया, ‘आंटी, वह खेल बताओ न, जिसे खेल कर आप इतने सारे पैसे कमाती हो?’

मीरा ने बताया, ‘यह खेल आसान है…’ कहते हुए मीरा ने आनी का सूट उठाया और कहा, ‘बस, इस तरह दूध पिलाओ और 10 रुपए लो.’

‘अच्छा…’ आनी चहकते हुए बोली, ‘केवल दूध पिलाने के 10 रुपए.’ ‘हां,’ मीरा ने कहा.

इस पर आनी चहक कर बोली, ‘यह खेल तो मैं भी खेल सकती हूं.’ ‘तो आओ, मुझे दूध पिलाओ और 10 रुपए ले जाओ,’ मीरा ने कहा. आनी झट तैयार हो गई.

अब तो जब भी जरूरत होती, आनी यह खेल खेलती और रुपए ले लेती. मगर कब इस खेल में मीरा की जगह एक खूबसूरत नौजवान शामिल हो गया, उसे पता ही नहीं चला. वह नौजवान उसे 5 सौ रुपए दे कर चलता बना.

यह मीरा की ही चाल थी. यह बात आनी को बाद में मालूम हुई. यह खेल कब दूध पिलाने से ले कर अंग चलाने तक पहुंच गया, आनी को पता नहीं चला. उसे तो इस खेल में मजा आ रहा था, इसलिए रोज की नईनई लीलाएं उस में उत्सुकता जगा रही थीं. मगर जब उस की मां ने यह सब देख लिया, तो उसे बहुत दुत्कारा.

मीरा का पड़ोस से घर खाली करवा दिया, मगर वह बहुत चालाक थी. उस ने आनी के बेहूदा फोटो उस के पिता को दिखा दिए. बदनामी के डर से पिता ने आनी को बहुत मारा.

इधर मीरा ने आनी को धमकी दी. वह उस के पास आए और उस के दिए रुपए उतार दे, नहीं तो वह उसे समाज में बदनाम कर देगी. इस तरह मीरा ने उसे मजबूरन देह धंधे से लगा दिया. फिर कब घर छूट गया, पता ही नहीं चला.

तभी इन अविनाश साहब से आनी की मुलाकात हो गई. वे अपनी बीवी को छोड़ने हवाईअड्डे पर आए थे. वह हवाईजहाज से कहीं बाहर जा रही थी.

आनी तजरबेकार थी. उस ने अविनाश को चक्कर में फंसा लिया, मगर उसे अविनाश पर बड़ा गुस्सा आया. वह सोचती थी कि औरतें खराब होती हैं, मगर यहां तो आदमी औरत को धोखा दे रहा था.

आनी सोचने लगी कि अविनाश की खूबसूरत और सुशील बीवी है, फिर भी वह उस के चक्कर में पड़ रहा है. यह तो सरासर धोखेबाजी है, मगर आनी के लिए यह आम बात थी. उस का धंधा ऐसे ही चलता था. वह आज भी मीरा आंटी के साथ रह रही थी, मगर उसे मीरा आंटी से नफरत थी.

अभी आनी खयालों में खोई हुई थी कि किसी की आवाज से चौंकी, ‘‘कौन? अविनाश बाबू,’’ उस ने चौंकते हुए कहा और कार का दरवाजा खोल कर बैठ गई.

‘‘कहां खोई हुई थीं?’’ अविनाश ने कार ड्राइव करते हुए पूछा.

आनी धंधे के गुर सीख गई थी. वह बोली, ‘‘बस, आप के खयालों में खोई हुई थी. आप ही ऐसे आदमी हैं, जिन्होंने मेरी नींद खराब कर दी है. मुझे आप के सिवाय कुछ सुझाई नहीं देता है.’’

अविनाश को आनी से इस बात की उम्मीद नहीं थी. वह कई लड़कियों से मिला था, पर जो बात आनी में थी, वह किसी और में नहीं थी.

अविनाश को लगा कि कहीं आनी उसे सचमुच प्यार तो नहीं करने लगी, इसलिए पूछ बैठा, ‘‘तुम कहीं मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रही हो?’’

‘‘आप की कसम अविनाश बाबू, आप के बिना मुझे नींद नहीं आती है. अकेलापन काटने को दौड़ता है.’’

‘‘अच्छा…’’ अविनाश ने कहा और कार एक होटल के सामने रोक दी. होटल के एक कमरे में आ कर अविनाश आनी से लिपट गया. बोला, ‘‘वाकई, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो,’’ कहने के साथ अविनाश ने शराब की बोतल खोल ली.

आनी व अविनाश प्यार के सागर में गोता खाने लगे. नशा, जोश,  छेड़खानी, चुहलबाजी, गरमागरम बातें और आनी की बलखाती अदाएं गजब ढा रही थीं. अविनाश कब क्या बोले जा रहा था, उसे पता ही नहीं चला.

सुबह वह उठा, तो बहुत खुश था. वह आनी को ढूंढ़ने लगा, मगर वह कहीं नहीं मिली. उस के बैड के पास की छोटी टेबल पर एक कागज दबा पड़ा था. उस में लिखा था :

अविनाश का रुपयों से भरा बैग वहां नहीं था. उस में 5 लाख रुपए रखे थे.

यह देख कर अविनाश ने माथा पीट लिया. हां, अविनाश का मोबाइल वहां रखा था, जिस पर किसी का फोन आ रहा था.

अविनाश ने मोबाइल देखा. आनी का फोन था. उस ने तुरंत फोन उठाया, ‘‘आनी, तुम कहां हो?’’

इस पर आनी ने कहा, ‘‘हां अविनाश बाबू, मैं आप के रुपए ले कर जा रही हूं. मैं नहीं चाहती कि अंजलि मेरी वजह से दुखी हो.

‘‘और हां, मुझे इसी तरह प्यार करते रहना. हो सकता है कि कभी किसी मोड़ पर हमारी मुलाकात हो जाए,’’ कहने के साथ आनी ने फोन काट दिया.

अविनाश चिल्लाता रहा, मगर उधर बात सुनने वाला कोई नहीं था. उस ने फोन लगाने के लिए मोबाइल उठाया, मगर स्क्रीन पर ब्लूटूथ द्वारा डाली गई एक फाइल नजर आई.

वह फाइल आनी की थी. उस ने झट से फाइल खोली और सुनने लगा. उस रात उस की और आनी के बीच हुई बातचीत थी. इस में वह कह रहा था, ‘आनी, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. यह रुपयापैसा सब तुम्हारा है. तुम चाहो जैसे इस का इस्तेमाल कर सकती हो…’

और भी न जाने क्याक्या बातें थीं, जिस में उस की पोल बंद थी. इस का मतलब लगा कर आनी रुपए ले गई थी.

अविनाश को लगा कि उस ने रात को जज्बातों के तूफान में बह कर अपना सबकुछ लुटा दिया. आनी तो वही ले कर गई, जो उस ने ले जाने के लिए कहा था, इसलिए वह खामोश हो कर घर की ओर चल दिया.

आनी भी अपनी नई राह की ओर चली जा रही थी.  Story

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