Short Story. गहरी काली रात थी. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. जमुनिया ने जैसे ही किवाड़ बंद करना चाहा, किसी की दस्तक हुई.

‘‘कौन?’’ उस ने जोर से पुकारा. ‘‘मैं हूं जमुनिया… मैं प्रधान,’’ आवाज आई.

उस ने दरवाजा खोल दिया. प्रधान देवीशंकर सामने थे. बोले, ‘‘कल ब्लाक पर मीटिंग है. इंदिरा आवास के जरूरतमंदों की सूची देनी है, इसलिए चला आया. तेरी भी छानीछप्पर है. सोचा, तुझे भी इंदिरा आवास की जरूरत होगी.’’

‘‘आइए… बैठिए,’’ जमुनिया ने बेमन से चारपाई झाड़ते हुए कहा. उस का दिल धकधक कर रहा था. सोच रही थी, ‘इतनी रात गए इस ने कुछ ऐसावैसा किया, तो मैं अकेली क्या करूंगी?’

उस के मन में कबूतरी की कहानी कौंध गई, जिसे विधवा पेंशन दिलाने के नाम पर इस ने चूस डाला था. उस ने तय किया कि घर आई इस बला को किसी तरह मीठीमीठी बातों से टरका देने में ही भलाई है.

वह जमीन पर बैठने को हुई, तो देवीशंकर ने चारपाई पर अपने बगल में बैठने को कहा, ‘‘यहां बैठ जमुनिया, यहां… जमीन पर क्या…’’

वह जमीन पर ही बैठ गई. बोली, ‘‘हां, चारपाई पर कैसे बैठूं. अब क्या काकादादा के बराबर ही बैठना रह गया है.’’

‘‘ओहो जमुनिया,’’ देवीशंकर मुसकराते हुए बोले, ‘‘ये सब पुराने जमाने की घिसीपिटी बातें हैं. तू तो नए जमाने की है. आ बैठ यहां… आ… आ.’’

‘‘नहीं प्रधानजी, मैं यहीं ठीक हूं,’’ कहते हुए वह जमीन पर ही बैठ गई.

देवीशंकर के चेहरे पर अचानक हमदर्दी के रंग तैर उठे, ‘‘जमुनिया, जब भी तुझे देखता हूं, तो तरस आता है. इतनी कम उम्र में तेरा पति मर गया. अच्छा जमुनिया, यह बता, तेरा घर गांव के बिलकुल किनारे है. तुझे अकेले रहते डर तो लगता होगा?’’

‘‘किस का डर?’’ जमुनिया ने पूछा.

‘‘दुनिया बहुत खराब है जमुनिया. अकेली औरत के लिए तो और खराब. लफंगों की भरमार है. न जाने कब, कौन अपनी हवस मिटाने यहां…’’ देवीशंकर कहतेकहते रुक गए.

जमुनिया पहले तो कुछ सकपकाई, फिर हिम्मत कर के बोली, ‘‘मैं चीर कर खा नहीं जाऊंगी उसे. किस की हिम्मत है, जो मेरे घर में घुसे.’’

यह सुन कर देवीशंकर बुरी तरह हिल उठे, मानो कहने के लिए कुछ सूझ ही नहीं रहा था. देर तक चुप्पी छाई रही.

यह चुप्पी जमुनिया ने ही तोड़ी, ‘‘तो प्रधानजी, इंदिरा आवास योजना से मेरा मकान बनवा दो.’’

‘‘हां,’’ वह ऐसे चौंके, जैसे किसी गहरी सोच से बाहर आए हों, ‘‘बिलकुल, बिलकुल, लेकिन…’’

‘‘लेकिन, क्या प्रधानजी?’’ ‘‘मेरा मतलब है…’’ कहतेकहते फिर अटक से गए देवीशंकर.

‘‘तू बुरा मान जाएगी,’’ वह बुदबुदाए. वह बोली, ‘‘कहो प्रधानजी, दिल खोल कर कहो. जमुनिया से क्यों हिचकते हो? मैं गैर हूं क्या?’’

‘‘तो कहूं.’ ‘‘हां, शौक से कहो. मैं आखिर आप की बेटी जैसी हूं,’’ उस ने कहा.

देवीशंकर का मन एकदम से कसैला हो गया. बोला, ‘‘ठीक है जमुनिया, तुम मेरी बेटी की उम्र की हो. पर भई, मेरा मतलब है, पूरी दुनिया को बेटी बनाने से काम कैसे चलेगा?’’

‘‘मैं समझी नहीं,’’ वह घबरा उठी.

देवीशंकर ने समझाया, ‘‘जमुनिया, तू तो जानती ही है, तेरी चाची सूखे आम की गुठली हो गई हैं, बिलकुल बदमजा, बदरंग और रसहीन. समझ, मेरी जिंदगी ही बदमजा हो गई. बहुत दुखी रहता हूं, तू चाहे तो…’’

‘‘मतलब?’’ जमुनिया ने पूछा. ‘‘तू मुझे उबार ले जमुनिया,’’ देवीशंकर के चेहरे पर गुजारिश थी.

जमुनिया हंसी, तो हंसती ही गई. देवीशंकर ने उठ कर उस के कंधे पर हाथ रखा, ‘‘क्या बात है जमुनिया?’’

वह किसी तरह अपनी हंसी पर काबू पाते हुए बोली, ‘‘मैं तो समझती थी कि मेरी जिंदगी उजाड़ हो गई. मैं बहुत खुश हूं प्रधानजी. सच मानो, मैं पति की मौत के बाद बहुत तरसी हूं. मेरी किस्मत है कि आप मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं.

‘‘मैं आप को खुश करने के लिए तैयार हूं, पर एक मुश्किल है.’’ ‘‘क्या?’’ वह जमीन पर उस की बगल में बैठ कर धीरेधीरे उस की पीठ पर हाथ फेरने लगे.

जमुनिया इठलाती हुई बोली, ‘‘तुम भी बिलकुल बुद्धू हो प्रधानजी. पति है नहीं, कोई बात न बनी, तो नाहक बदनामी होगी. तुम अभी सड़क वाले तिराहे पर चले जाओ. मेडिकल स्टोर अभी खुला होगा. कंडोम ले आओ.’’

देवीशंकर के पैरों में पंख लग गए. वह तेजी से निकल कर तिराहे की ओर मेडिकल स्टोर भागे.

कुछ ही देर में वह लौट आए. दरवाजा ठेल कर भीतर घुसे, तो घुप्प अंधेरा था. वह टटोलते हुए आंगन में पहुंचे और धीरे से पुकारा, ‘‘जमुनिया… जमुनिया.’’

उन्हें लगा, आंगन के एक कोने से चूडि़यों के खनकने की आवाज आई है. वह उसी ओर तेजी से बढ़े. फुसफुसाते हुए वह बोले, ‘‘मैं कंडोम ले आया जमुनिया, यह है… यह.’’

‘तड़ाक’ एक जोरदार तमाचा उन के गाल पर आ पड़ा. फिर एक कड़क आवाज गूंजी, ‘‘तो कंडोम लाए हो तुम. इस बुढ़ापे में यही करते हो. आज देखो, तुम्हारा क्या हाल करती हूं.’’

देवीशंकर को काटो तो खून नहीं. यह तो उन की बीवी देवकी थी. देवकी की चीख सुन कर पासपड़ोस के तमाम लोग जमा हो गए.

जमुनिया कोने में खड़ी देवीशंकर की बदनीयती पर बड़बड़ा रही थी. हर कोई देवीशंकर को कोस रहा था.

देवकी ने पीटतेपीटते देवीशंकर को निढाल कर दिया. वह लहरा कर जमीन पर गिरे, फिर बेहोश हो गए. वहीं खड़े मास्टरजी बोले, ‘‘अरे, कोई इस के मुंह पर पानी छिड़के.’’

देवकी भभक उठी, ‘‘इस पापी को मर जाने दो मास्टर चाचा. ऐसे मरद के होने से तो विधवा होना अच्छा.’’

जमुनिया गुस्से में बोली, ‘‘मैं थूक देती हूं इस के मुंह पर. होश में आ जाएगा.’’ उस ने सचमुच देवीशंकर के मुंह पर थूक दिया.

-मुन्नू लाल

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