Society. जब पाकिस्तान के उन परिवारों की बात होती है जिन की जड़ें उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार या भारत के दूसरे हिस्सों में थीं और जो 1947 के बाद पाकिस्तान चले गए, ऐसे लोगों और उन के वंशजों के लिए ‘मुहाजिर’ शब्द प्रचलित हुआ. लेकिन यह सम झना जरूरी है कि ‘मुहाजिर’ कोई साधारण जनगणना श्रेणी नहीं है.
पाकिस्तान की साल 2023 की जनगणना में ‘मुहाजिर’ नाम से अलग कोई आधिकारिक आबादी नहीं गिनी गई. वहां मातृभाषा के आधार पर आंकड़े मिलते हैं.
उदाहरण के लिए, देश में उर्दू को मातृभाषा बताने वाली आबादी 2.22 करोड़ से अधिक दर्ज हुई, जो कुल आबादी का तकरीबन 9.25 फीसदी है. यह संख्या मुहाजिरों की संख्या नहीं है, लेकिन इस से पाकिस्तान में उर्दूभाषी सामाजिक आधार का अंदाजा जरूर मिलता है.
उपलब्ध उदाहरणों को साथ रख कर देखें तो एक खास तसवीर सामने आती है. बंटवारे ने भूगोल बदला, लेकिन कुछ परिवारों की सामाजिक यादें और रिश्तेदारी के नैटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं किए. शादी कई मामलों में उन्हीं बचे हुए नैटवर्कों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का जरीया बना.
‘मुहाजिर’ की कहानी सिर्फ पलायन की कहानी नहीं
1947 के बंटवारे को अकसर आंकड़ों, दंगों, विस्थापन और राजनीतिक फैसलों के जरीए सम झाया जाता है. लेकिन बंटवारे का एक दूसरा चेहरा परिवारों की निजी यादों में बचा रहा.
किसी परिवार का एक हिस्सा लाहौर, कराची, रावलपिंडी या फैसलाबाद चला गया और दूसरा हिस्सा कानपुर, लखनऊ, इटावा, अलीगढ़, आगरा या दिल्ली में रह गया. कुछ परिवारों ने मेलजोल खो दिया, लेकिन कुछ परिवारों में रिश्तेदारी, दोस्ती और सामाजिक मेलजोल किसी न किसी रूप में चलता रहा.
यही वजह है कि भारतपाकिस्तान के बीच होने वाली कुछ शादियों को केवल ‘प्रेम विवाह’ या ‘सीमा पार विवाह’ कह देना पूरी कहानी नहीं बताता. कई मामलों में उस के पीछे दशकों पुराना पारिवारिक परिचय, रिश्तेदारी या बंटवारे से पहले के सामाजिक संबंध मौजूद रहे हैं.
जहीर अब्बास और रीटा लूथरा
इस का सब से साफ उदाहरण पाकिस्तान के महान क्रिकेटर जहीर अब्बास और कानपुर की रीटा लूथरा, जिन्हें बाद में समीना अब्बास के नाम से जाना गया, का है.
साल 2005 में ‘टाइम्स औफ इंडिया’ अखबार ने उन की कानपुर यात्रा के दौरान इस रिश्ते की बैकग्राउंड छापी थी. रिपोर्ट के मुताबिक, रीटा लूथरा कानपुर के स्वरूप नगर में रहती थीं. दोनों की मुलाकात 1980 के दशक में इंगलैंड में हुई, जब जहीर अब्बास काउंटी क्रिकेट खेल रहे थे और रीटा इंटीरियर डिजाइनिंग की पढ़ाई कर रही थीं.
लेकिन इस रिश्ते की जड़ें केवल उस मुलाकात तक सीमित नहीं थीं. लूथरा परिवार का संबंध विभाजन से पहले फैसलाबाद से था और रीटा के पिता केसी लूथरा, जहीर अब्बास के पिता शब्बीर अब्बास के दोस्त थे.
यह सिर्फ एक भारतीय लड़की और पाकिस्तानी क्रिकेटर की शादी नहीं थी. इस के पीछे बंटवारे से पहले पारिवारिक परिचय का एक सामाजिक पुल मौजूद था. एक तरफ कानपुर था, दूसरी तरफ पाकिस्तान. बीच में क्रिकेट और निजी परिचय आया, लेकिन परिवारों की पुरानी पहचान ने इस रिश्ते को सामाजिक जमीन भी दी.
और कहानी यहीं खत्म नहीं होती. जहीर और समीना की बेटी सोनल की शादी दिल्ली के एक कारोबारी से हुई. रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि वीजा प्रतिबंधों के चलते परिवार के सदस्यों के लिए एकदूसरे से मिलना आसान नहीं था यानी एक शादी ने सिर्फ 2 लोगों को नहीं जोड़ा, बल्कि बंटवारे से बिखरे एक पुराने सामाजिक नैटवर्क को अगली पीढ़ी तक भी पहुंचाया.
परिवार 2 देशों में, रिश्ता एक
पाकिस्तानी क्रिकेट कप्तान रहे सरफराज अहमद की पारिवारिक कहानी इस बात को और मजबूत करती है.
साल 2017 में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ अखबार ने इटावा के रहने वाले मेहबूब हसन की कहानी छापी थी. हसन सरफराज अहमद के मामा थे. सरफराज की मां अकीला बानो, हसन की बहन थीं और शादी के बाद कराची चली गई थीं यानी एक ही परिवार की एक शाखा उत्तर प्रदेश के इटावा में रही और दूसरी कराची में बस गई. दिलचस्प बात यह है कि दूरी के बावजूद रिश्ता खत्म नहीं हुआ.
रिपोर्ट के मुताबिक, सरफराज बचपन में अपनी मां के साथ इटावा आए थे. बाद में मेहबूब हसन सरफराज की शादी में कराची गए. दोनों परिवारों के बीच मेलजोल बना रहा, लेकिन वीजा प्रतिबंधों के चलते आमनेसामने मुलाकातें बहुत कम रहीं.
यहां शादी खुद केंद्रीय घटना नहीं है, बल्कि शादी पारिवारिक नैटवर्क को फिर से दिखाई देने वाला बना देती है.
सरफराज की शादी में इटावा से उन का मामा पहुंचता है यानी जिस परिवार को 1947 के बाद राष्ट्रीय सीमाओं ने अलग कर दिया था, उसी परिवार के रिश्ते शादी जैसे सामाजिक मौकों पर फिर एकसाथ दिखाई देते हैं.
रिजवान और सिदरा
अगर जहीर अब्बास और सरफराज अहमद की कहानियां बंटवारे से पैदा हुए पुराने पारिवारिक नैटवर्क को दिखाती हैं, तो उत्तर प्रदेश के मोहम्मद रिजवान और पाकिस्तान की सिदरा का मामला बताता है कि ऐसे नैटवर्क अगली पीढि़यों में भी शादी की बन सकते हैं.
नवंबर, 2023 में उत्तर प्रदेश के रहने वाले मोहम्मद रिजवान ने अपनी पाकिस्तानी रिश्तेदार सिदरा से शादी की थी. रिपोर्ट के मुताबिक यह शादी परिवार की रजामंदी से हुई और इसे रिजवान की दादी ने तय कराया था. सिदरा की मां भी साल 1996 में एक पाकिस्तानी आदमी से शादी कर के पाकिस्तान गई थीं. यह बता बेहद खास है.
यहां सीमा पार शादी अचानक पैदा हुई किसी नई प्रेम कहानी की तरह सामने नहीं आती. इस के पीछे पहले से मौजूद पारिवारिक मेलजोल की कई परतें दिखाई देती हैं. एक पीढ़ी में बेटी की शादी पाकिस्तान में होती है और अगली पीढ़ी में उसी पारिवारिक नैटवर्क के भीतर शादी फिर सीमा पार चली जाती है यानी शादी यहां केवल 2 लोगों का निजी फैसला नहीं है, वह परिवारों के बीच पुराने मेलजोल को जिंदा रखने वाली सामाजिक संस्था बन जाता है.
सरहद लाई बरात को स्क्रीन के सामने
अक्तूबर, 2024 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में हुआ मोहम्मद अब्बास हैदर और लाहौर की अंदलीप जहरा का औनलाइन निकाह इस बदलती हकीकत का शायद सब से मौडर्न उदाहरण है.
अब्बास हैदर की शादी लाहौर की रहने वाली अंदलीप जहरा से तय हुई थी, लेकिन राजनीतिक तनाव के चलते उन्हें पाकिस्तान जाने का वीजा नहीं मिला. आखिरकार दोनों परिवारों ने औनलाइन निकाह कराया. दूल्हे का परिवार उत्तर प्रदेश में मौजूद था और दुलहन का परिवार लाहौर से समारोह में शामिल हुआ.
इस मामले की एक और अहम बात थी. यह शादी किसी अनजान औनलाइन परिचय का नतीजा नहीं थी. रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों परिवारों में रिश्तेदारी थी और शादी परिवार ने तय की थी. अब इस घटना को जहीर अब्बास और रिजवान की कहानी के साथ रखिए.
पहले परिवार सीमा पार जा कर शादी में शामिल होते थे. फिर वीजा और राजनीतिक हालात ने आनाजाना मुश्किल किया. और आखिरकार तकनीक ने शादी की रस्म को सीमा के आरपार स्क्रीन पर पहुंचा दिया यानी रिश्ता खत्म नहीं हुआ. रिश्ते को निभाने का तरीका बदल गया. यही इस पूरी कहानी का सब से मजबूत नतीजा है.
सीमा हैदर का चैप्टर
भारतपाकिस्तान के बीच शादी और निजी संबंधों की चर्चा में सीमा हैदर का मामला भी सामने आता है. लेकिन इसे ‘मुहाजिरों’ की उत्तर प्रदेश से चली आ रही पारिवारिक रिश्तेदारी का उदाहरण मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं माना जाएगा.
सीमा हैदर का मामला अलग मिजाज का है. यह एक मौडर्न निजी संबंध, सीमा पार आनाजाना, आव्रजन, नागरिकता और सुरक्षा से जुड़े सवालों का मामला है, इसलिए इसे इस लेख में केंद्रीय प्रमाण नहीं, बल्कि एक अलग मामले के रूप में देखना चाहिए. यही फर्क खास है.
जहीर अब्बास, सरफराज अहमद या रिजवान व सिदरा जैसे उदाहरणों में परिवार और पुरानी रिश्तेदारी का रोल भूमिका दिखाई देता है. जौनपुर का औनलाइन निकाह दिखाता है कि रिश्तेदारी मौजूद होने के बावजूद वीजा और राजनीतिक तनाव शादी के प्रोसैस को बदल सकते हैं, जबकि सीमा हैदर का मामला दिखाता है कि नए दौर में निजी संबंध भी अंतर्राष्ट्रीय सीमा को चुनौती देने वाले हालात पैदा कर सकते हैं.
इन तीनों को एक ही श्रेणी में रख देना आसान है, लेकिन पत्रकारिता के लिए यह सही नहीं होगा. समानता सिर्फ इतनी है कि तीनों मामलों में निजी रिश्ते और राष्ट्रीय सीमा आमनेसामने आते हैं. उन के ऐतिहासिक कारण अलग हैं.
तो क्या ‘मुहाजिर’ बड़ी तादाद में उत्तर प्रदेश में शादी करते हैं? यहां सावधानी सब से ज्यादा जरूरी है. ऐसा कोई विश्वसनीय आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जिस से यह नतीजा निकाला जा सके कि पाकिस्तान के ‘मुहाजिर’ समुदाय के लोग बड़े पैमाने पर उत्तर प्रदेश में शादी कर रहे हैं.
पाकिस्तान की जनगणना भी ‘मुहाजिर’ को स्वतंत्र जनसांख्यिकीय श्रेणी के रूप में नहीं गिनती, इसलिए कुछ चर्चित उदाहरणों की बुनियाद पर यह कहना कि ‘मुहाजिर लगातार उत्तर प्रदेश में शादी कर रहे हैं’ अतिशयोक्ति होगी. लेकिन दूसरी तरफ इन उदाहरणों को सिर्फ संयोग कह कर खारिज करना भी उचित नहीं होगा.
जहीर अब्बास का कानपुर से पारिवारिक रिश्ता, सरफराज अहमद का इटावा से संबंध, रिजवान और सिदरा की पारिवारिक शादी और जौनपुर का रिश्तेदारी वाला औनलाइन निकाह… ये घटनाएं अलगअलग समय की हैं, लेकिन इन में एक सा झा पैटर्न दिखाई देता है.
उत्तर प्रदेश ही क्यों दिखाई देता है?
उत्तर प्रदेश की अहमियत केवल इसलिए नहीं है कि वह भारत का सब से ज्यादा आबादी वाला राज्य है. बंटवारे से पहले उत्तर भारत के अनेक शहरों और कसबों से बड़ी तादाद में लोग व्यापार, पढ़ाईलिखाई, नौकरी और प्रशासनिक कारणों से जुड़े हुए थे.
आगरा, कानपुर, लखनऊ, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, बरेली, इलाहाबाद और दिल्ली समेत उत्तर भारत के अनेक हिस्सों का सामाजिक व सांस्कृतिक संपर्क अविभाजित भारत के बड़े भूगोल का हिस्सा था, इसलिए पाकिस्तान में बसे परिवारों की ‘पुश्तैनी मिट्टी’ किसी एक शहर तक सीमित नहीं हो सकती. किसी के लिए वह आगरा हो सकती है, किसी के लिए कानपुर, किसी के लिए इटावा और किसी के लिए लखनऊ.
6 नवंबर, 2004 को नई दिल्ली के मौर्या शैरटन होटल में आयोजित ‘हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट’ में भारतपाकिस्तान संबंधों पर चर्चा के लिए दोनों देशों की कई चर्चित हस्तियां जुटी थीं. पाकिस्तान के मुत्तहिदा कौमी मूवमैंट (एमक्यूएम) के नेता अल्ताफ हुसैन भी इस सम्मेलन के प्रमुख वक्ताओं में शामिल थे.
उस समय लंदन में रह रहे अल्ताफ हुसैन ने पाकिस्तान के ‘मुहाजिर’ समुदाय के राजनीतिक और सामाजिक हालात के साथसाथ भारतपाकिस्तान के बीच आम लोगों की आवाजाही आसान बनाने की जरूरत पर जोर दिया था. उन की कही गई बातों में बंटवारे से बिछड़े परिवारों और रिश्तेदारियों को फिर जोड़ने की चिंता भी दिखाई देती थी.
अल्ताफ हुसैन के सार्वजनिक बयानों और बाद में आगरा की उन की यात्रा से जुड़ी रिपोर्टों में अपने पुश्तैनी शहर और उत्तर प्रदेश के प्रति उन का भावनात्मक लगाव सामने आया. आगरा की राजा की मंडी से उन के परिवार का पुराना रिश्ता था और बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले जाने के बावजूद उस अतीत की यादें बनी रहीं. यह प्रसंग केवल एक राजनीतिक नेता की निजी भावुकता नहीं है, बल्कि इस के पीछे बंटवारे से बनी वह पेचीदा सामाजिक विरासत है, जिस में पाकिस्तान जा कर बसे अनेक परिवार आज भी भारत के उन शहरों और परिवारों से सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध महसूस करते हैं, जहां से उन के पुरखे 1947 में अलग हुए थे.
वीजा : रिश्ते और राष्ट्र के बीच सब से बड़ी दीवार
इन कहानियों का सब से स्थायी पात्र शायद कोई इनसान नहीं, बल्कि वीजा है. जहीर अब्बास के परिवार की कहानी में वीजा के कारण रिश्तेदारों की आवाजाही प्रभावित हुई.
सरफराज अहमद के मामाभांजे के रिश्ते में मुलाकातें सीमित रहीं. रिजवान व सिदरा की शादी के बाद भारत लौटने का रास्ता वीजा से हो कर गुजरने लगा. जौनपुर में तो वीजा न मिलने के कारण निकाह ही औनलाइन हो गया, इसलिए इन शादियों की कहानी को केवल प्रेम, रिश्तेदारी या सांस्कृतिक समानता की कहानी कहना अधूरा होगा, बल्कि यह रिश्ते बनाम राज्य व्यवस्था की कहानी भी है.
शादी निजी फैसला हो सकता है, लेकिन जब पतिपत्नी अलगअलग देशों के नागरिक हों तो शादी के बाद का जीवन पासपोर्ट, वीजा, नागरिकता, सुरक्षा जांच और प्रशासनिक अनुमति से जुड़ जाता है. यही कारण है कि भारतपाकिस्तान के बीच शादी का रोमांस अकसर प्रशासनिक हकीकत से टकराता है.
2025 के बाद हालात और मुश्किल हुए
भारतपाकिस्तान संबंधों में अप्रैल, 2025 के बाद आई सख्ती ने इस पूरे सवाल को और खास बना दिया. भारत सरकार ने 24 अप्रैल, 2025 को पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा सेवाएं तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का निर्णय घोषित किया था. कुछ विशेष श्रेणियों को छोड़ कर मौजूदा वैध वीजा भी 27 अप्रैल से निरस्त किए जाने की घोषणा हुई.
इस का सीधा मतलब यह है कि सीमा पार शादी का सवाल अब केवल सामाजिक या पारिवारिक नहीं रह गया है. इस के साथ सुरक्षा और विदेश नीति के हालात भी जुड़ गए हैं, इसलिए आज अगर कोई भारतीय परिवार पाकिस्तान में रिश्तेदारी के कारण शादी करना चाहता है या पाकिस्तानी परिवार भारत में शादी के संबंध बनाना चाहता है, तो उस के सामने 8 दशक पुराने पारिवारिक संबंधों के अलावा वर्तमान कूटनीतिक हकीकत भी खड़ी है.
संस्कृति कितना बड़ा रोल निभाती है?
भारत के उत्तर प्रदेश और पाकिस्तान के कई हिस्सों के बीच भाषा, खानपान, पारिवारिक संबोधन, शादी के संस्कार, संगीत और सामाजिक बरताव में अनेक समानताएं मिलती हैं, लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि समान संस्कृति अपनेआप शादी करा देती है. शादी के लिए परिवार, विश्वास, माली हालात, सामाजिक रजामंदी और प्रशासनिक सुविधा सभी जरूरी होते हैं.
जहीर अब्बास की कहानी में निजी परिचय और पारिवारिक दोस्ती थी. सरफराज के मामले में खून का रिश्ता था. रिजवान व सिदरा के मामले में रिश्तेदारी और परिवार की मध्यस्थता थी. जौनपुर के मामले में पारिवारिक संबंध के बावजूद राजनीतिक हालात ने शादी को औनलाइन कर दिया, इसलिए इन सभी घटनाओं को जोड़ने वाली सब से मजबूत कड़ी सिर्फ संस्कृति नहीं, बल्कि सामाजिक नैटवर्क है.
पुश्तैनी मिट्टी आखिर इतनी ताकतवर क्यों?
किसी इनसान की पहचान केवल उसके वर्तमान पते से नहीं बनती. उस की पहचान में दादा का शहर, नाना का गांव, पुराना घर, परिवार की बोली, रिश्तेदारों की कहानियां और बचपन में सुने गए किस्से भी शामिल होते हैं.
बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाने वाले परिवारों की अगली पीढि़यों के लिए भारत एक राजनीतिक रूप से दूसरा देश था, लेकिन पारिवारिक यादों में वह अकसर ‘वहां का घर’ बना रहा, इसीलिए जब शादी उस पुराने नैटवर्क से जुड़ती है तो वह केवल नया रिश्ता नहीं बनाती, वह पुराने रिश्ते को भी दोबारा जिंदा कर देती है.
जहीर अब्बास का कानपुर, सरफराज अहमद का इटावा और रिजवान ब व सिदरा की पारिवारिक कहानी इसी सामाजिक यादों की अलगअलग परतें हैं.
जौनपुर का औनलाइन निकाह इस कहानी में एक नया चैप्टर जोड़ता है. पुश्तैनी रिश्ता अब भी कायम हो सकता है, लेकिन उसे निभाने के लिए तकनीक को सरहद का औप्शन बनना पड़ सकता है.
सरहद से बड़ी होती है पुश्तैनी मिट्टी?
इस सवाल का जवाब भावनात्मक रूप से ‘हां’ हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता में जवाब थोड़ा ज्यादा सावधान होना चाहिए.
पुश्तैनी मिट्टी सरहद से बड़ी है. यह एक सुंदर मानवीय विचार है, लेकिन हर परिवार की कहानी एकजैसी नहीं होती. बंटवारे ने बहुत से परिवारों के रिश्ते हमेशा के लिए तोड़े भी. कई परिवारों ने नई राष्ट्रीय पहचान को पूरी तरह अपना लिया. कई पुराने रिश्तों की यादें समय के साथ खत्म हो गईं,
इसलिए यह कहना उचित होगा कि कुछ परिवारों के लिए पुश्तैनी मिट्टी की याद आज भी राष्ट्रीय सीमा से ज्यादा भावनात्मक अहमियत रखती है. शादी उन परिवारों में इस याद को जिंदा रखने का एक जरीया बन सकती है.
लेकिन इस के सामने राज्य की अपनी सीमाएं हैं. वीजा, नागरिकता, सुरक्षा और विदेश नीति. यही विरोधाभास इस पूरी कहानी को खास बनाता है. एक तरफ परिवार कहता है, ‘वह हमारा अपना है’, दूसरी तरफ पासपोर्ट कहता है, ‘वह दूसरे देश का नागरिक है’.
एक तरफ दादी सालों पुरानी रिश्तेदारी याद कर के शादी तय करती है. दूसरी तरफ वीजा अधिकारी पूछता है, ‘यात्रा का मकसद क्या है?’
और कभीकभी जब वीजा नहीं मिलता, तो बरात सीमा पार नहीं जाती. दूल्हा स्क्रीन के सामने बैठ कर निकाह करता है.
रिश्ते बचे हैं, रास्ते मुश्किल हैं
भारतपाकिस्तान के बीच शादी की कहानियों को केवल प्रेम की कहानियां मानना उतना ही अधूरा है जितना उन्हें केवल राजनीति की कहानियां मानना. इन के भीतर इतिहास है, परिवार है, बिछड़ना है, याद है, संस्कृति है और बदलती हुई कूटनीति भी है.
जहीर अब्बास और कानपुर का रिश्ता बताता है कि बंटवारे से पहले के पारिवारिक परिचय शादी के बाद भी रिश्तों को जोड़ सकते हैं. सरफराज अहमद और इटावा का संबंध दिखाता है कि एक परिवार 2 देशों में बंट जाने के बाद भी भावनात्मक रूप से एक रह सकता है.
रिजवान और सिदरा की शादी बताती है कि पारिवारिक नैटवर्क अगली पीढि़यों में भी सीमा पार शादी की बुनियाद बन सकते हैं. और जौनपुर का औनलाइन निकाह दिखाता है कि जब राजनीति रास्ता रोकती है तो तकनीक रिश्ते की रस्म को आगे बढ़ाने का नया जरीया बन सकती है.
इन उदाहरणों से कोई बड़ा सांख्यिकीय नतीजा निकालना मुमकिन नहीं है. लेकिन वे एक ऐतिहासिक हकीकत की ओर जरूर संकेत करते हैं.
बंटवारे ने घरों को 2 देशों में बांटा था, पर उस ने हर परिवार की यादों को 2 हिस्सों में नहीं बांटा. शायद इसी वजह से कुछ रिश्ते आज भी पुराने शहरों के नाम सुन कर जाग जाते हैं.




