Hindi Love Story. ‘‘सुनिए जरा…’’ पीछे से आई किसी औरत की आवाज से रुक कर, उस ने पलट कर देखा. पहचाना सा चेहरा देख हलकी सी मुसकान होंठों पर खुद ब खुद खिल गई. ‘‘जी, कहिए?’’

‘‘कुछ देर कहीं बैठ कर आप से बात कर सकती हूं… अगर आप के पास वक्त हो तो?’’ वह थोड़ा नजदीक आ कर बोली. ‘‘यह कहने में आप ने कुछ ज्यादा वक्त नहीं ले लिया क्या?’’

‘‘हां, ले तो लिया है. लेकिन इस बात की तसल्ली है कि आप को अभी तक याद हूं मैं.’’ ‘‘आप भी कहां भूली हैं…’’

‘‘दरअसल, आप की निगाहों ने भूलने नहीं दिया.’’ ‘‘आइए, कुछ ही आगे इंडियन कौफी हाउस है. वक्त गुजारने की बेहतरीन जगह है, आप चाहें तो वहां बैठ कर अपनी बात कह सकती हैं. वैसे, आप इधर कैसे? मतलब… आप जमनापार रहती थीं, बस इसलिए…’’

‘‘25 साल बाद भी आप को याद है?’’ ‘‘नहीं, 26 साल. एक साल तुम्हें और तुम्हारा घर तलाशने में. सौरी… मैं बहुत जल्द आप से तुम पर आ गया. चाहो तो तुम भी तुम पर आ सकती हो. कहासुनी में आसानी रहेगी,’’ वह हलके से हंसते हुए बोला.

‘‘तुम अभी भी पठान हो?’’ उस के कुरसी पर बैठते ही उस ने पूछा. ‘‘ताना मार रहे हो? मर्द ताना देते अच्छे नहीं लगते हैं. पठान तो मैं उस रोज भी नहीं थी, जिस दिन तुम मु झे मांगने आए थे… मेरे मांबाप से.’’

‘‘तो यह उसी रोज बोलना था.’’  ‘‘बोलने का रिवाज नहीं था हमारे यहां और सिखाया भी यही गया था. मुसलमान तो हो गए थे मगर इसलाम भुला बैठे थे. नबी की बफात के दिन से जो बिगाड़ शुरू हुआ अभी तक जारी है.

‘‘यही मुनाकफियत इसलाम पर भारी है. फिरकों के जूतों में बिरयानी बंट रही है और माशरा शौक से खा भी रहा है. आज जिंदगी को मुड़ कर देखती हूं तो सोचती हूं कि काश उस दिन यह जालिम रिवाज तोड़ पाती, तो तुम्हारी याद के साथ नहीं तुम्हारे साथ रह पाती. तुम्हारे बच्चों की मां बन पाती. वैसे, कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

‘‘यहां का डोसा बहुत उम्दा होता है… खाना चाहोगी?’’ ‘‘तुम अपना दिल रखना जानते हो…’’ उस ने कहा.

‘‘तुम्हारा दिल रखने को ही एक साल तुम्हारी तलाश में खाक छानी थी मैं ने.’’ ‘‘उस दिन के बाद तुम पलट कर नहीं आए? मैं इंतजार में ही रही.’’

‘‘खमिरियों को सम झाना बहुत मुश्किल होता है, जबकि वह मजहब के नाम पर फिरकों की तवज्जुह में उल झे रहते हों. फिर मैं तो उन के ही तौरतरीके से आया था पैगाम ले कर, लेकिन जब उन्होंने अटानपठान शुरू किया तो फिर कुछ कहने और सहने की गुंजाइश ही नहीं रही.’’

‘‘तुम्हारे पास इतना टाइम है कि यह सब निकाल कर बैठ गए? ‘‘सौरी. बट, अपनी बात कहना चाहता हूं. उस वक्त तुम्हारे पेरेंट्स ने नहीं सुनी और अब तुम ने भी. खैर, यह सब छोड़ो. तुम कहो खुश तो हो?’’

‘‘तुम्हें क्या लगता है जज साहब,’’ वह मुसकराती हुई बोली. ‘‘यही कि तुम सुखी नहीं हो. और मैं जज नही करता सिर्फ सम झने और सम झाने की कोशिश भर करता हूं.’’

‘‘फिर मु झे सम झने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ ‘‘तुम उस पिंजरे की कैद में थीं, जिस में परिंदें उड़ना नहीं सीख पाते. अब किस कैद में हो? मेरा मतलब शादी से है… लेकिन ठहरो, तुम ने शादी क्यों नहीं की? यह सही सवाल है.’’

‘‘अब मु झ से शादी करोगे? उस के सीधेसीधे सवाल से वह चौंकता हुआ संभल कर बैठ गया. और फिर रुक कर धीरे से कहा, ‘‘…यह कब हुआ?’’

‘‘अब्बू 22 साल पहले और अम्मी की आज पहली बरसी है. ‘‘फिर 22 साल पहले क्यों नहीं?’’ उस ने पूछा.

‘‘पिंजरा अम्मी का था और उस की कैदी वे खुद भी थीं. उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकती थी. यहीं कमला नगर आर्चीज गैलरी में काम करती हूं. तुम आज नजर आए तो, तुम्हारा पीछा किया. डोसा नहीं खिलाओगे?’’

‘‘तुम्हें नहीं लगता कि जो उम्र शादी की होती है, उस का कुछ मकसद तो होता होगा? और वह हम दोनों ही पीछे छोड़ आए हैं.’’

‘‘तुम्हारे हिसाब से शादी की सही उम्र क्या होती है? और फिर क्या पीछे छूट गए सही काम को छूटा ही छोड़ देना चाहिए? जैसे इल्म किसी भी उम्र में सीखा जा सकता है, शादी भी किसी भी उम्र में क्यों नहीं की जा सकती है?

‘‘मैं इतनी आलिम नहीं हूं. वैसे भी सभी तुम्हारे मयार के तो नहीं हो सकते हैं न. मैं सिर्फ इतना मानती हूं कि जितना भी वक्त तुम्हारे साथ गुजारूंगी खुश रहूंगी और सुखी भी. अभी तुम ने ही कहा है कि मैं सुखी नहीं हूं. तो फिर कर दो सुखी.’’

‘‘तुम कुछ ज्यादा तेजी में नहीं हो? जबकि यह उम्र ठहर कर चलने की होती है.’’ ‘‘तमाम उम्र तो ठहरेठहरे ही गुजार दी. शौहर को राजी रखने की उम्र रब को राजी करने में गुजार दी. और कितनी सजा में रखना चाहते हो?’’

‘‘तुम सोचती हो कि मैं अभी भी तुम्हारे इंतजार में हूं?’’ हौले से हंस कर बोला. ‘‘मर्द जात इतनी पाकीजा नहीं होती जितना किताब में लिखा है. हर मोड़ पर मुड़ने की फितरत ही उसे मर्द बनाए रखती है. एक आंसू में पिघल जाना, एक आह में बंध जाना उस की कमजोरी होती है. और फिर अपनी अना को जिंदा रखना उस की मजबूरी भी.

‘‘औरत होने से कहीं ज्यादा मुश्किल होता है मर्द होना. बाहरी मुलम्मा सख्त और खुरदरा जरूर दिखाई देता है, लेकिन भीतर पिघलता मोम लिए भटकता है. सब से आसान होता है मर्द को पत्थर कह देना. कब कौन उस पत्थर को भगवान मान ले उसे खुद ही पता नहीं चलता. हमें हमारा दिखावा अंदर से मार डालता है. तुम सरल हो और सहज भी, मगर तुम्हारे जैसा नहीं हूं मैं.’’

‘‘मु झे तुम्हारी फिलौसफी भरी बातें सम झ नहीं आ रही हैं, लेकिन इतना जरूर सम झती हूं कि मर्दजात अपने फर्ज से मुंह नहीं मोड़ती बेशक उसे अपने ख्वाबों से मुंह मोड़ना पड़े. आखिर कहना क्या चाह रहे हो? मु झे आज से पहले का कोई हिसाब नहीं चाहिए.

‘‘हां, आज के बाद तुम्हारी सारी जिंदगी मेरी. तुम्हारे जैसी ज्ञानीध्यानी नहीं हूं. मैं ने अपने लिए तरसते हुए देखा है तुम्हारी आंखों को. उन निगाहों की बेबसी ने मु झे सोने नहीं दिया और किसी का होने भी नहीं दिया.

‘‘मु झे सिर्फ उतना ही मालूम है जितना कि किताब में लिखा है. उस से ज्यादा सोचनेसम झने की सलाहियत नहीं है मु झ में. इनकार तुम्हारा हक है और मेरी बदनसीबी.’’

‘‘न जाने क्यों हम दोनों अचानक सफाईसफाई खेलने लगे, जबकि हम दोनों यह जानते हैं कि पलट कर देखने का कोई मतलब नहीं रहा है. वहां वीराने के सिवा कुछ और नहीं है.’’

‘‘आओ फिर आगे बढ़ कर गुलशन खिला लेते हैं. इतना वक्त अकेले गुजार कर ऊबे नहीं हो? सच में यहां का डोसा दूसरी जगह से कुछ अलग है. और तुम्हारी निगाहें पिछले आधे घंटे से मु झ से हटी नहीं हैं. यहीं आसपास ही कहीं रहते हो?’’

‘‘मेरे बारे में तुम कुछ नहीं जानती हो. एकचौथाई सदी कम नहीं होती जिंदगी बदलने को. और फिर ठहरे हुए पानी में कीड़े पड़ जाते हैं, पानी सड़ भी जाता है. और मु झे कुछ जानना भी नहीं है, इतना जरूर जानती हूं कि पानी आखिर तक पानी ही रहता है. निथारने से पीने लायक हो जाता है.’’

‘‘तुम्हारी उंगलियां छू कर देखना चाहती हूं कि इस आदमी के जिस्म में खून की जगह शराफत बह रही है या पत्थरदिल गोश्त का मुलम्मा चढ़ाए बैठा है?’’

उस ने धीरे से उस के हाथों पर अपना हाथ रखते हुए कहा, ‘‘इस गोश्त के जिस्म में लहू की धाराएं भी बहती हैं. लेकिन बांध बांधना जरूरी है. हम उन्हें खुला भी तो नहीं छोड़ सकते. तुम्हारी उंगलियां कंपकंपा रही हैं.’’

‘‘पहली बार किसी मर्द को अपनेपन से छुआ है तो मचल गई हैं बेचारी,’’ फीकी सी मुसकान इस के होंठों पर आ गई, ‘‘अपने घर ले जा सकते हो अभी?’’

‘‘हां, आओ चलो. एक दोस्त के जैसे,’’ उस ने उठते हुए कहा. वह एकदम कुरसी से उठी और लरज कर उस की बांहों में  झूल गई. कौफी हाउस एकाएक खामोशी से गूंज उठा.

प्यालों से उठती भाप, प्लेटों की टकराती आवाज और वेटरों के जूतों की थाप, सब थमे रुके सुन्न से जैसे कि शून्य को भरती हवा, न जमीं न आसमां… सिर्फ खला, आदम और ईव का अधर मिलन, जैसे धरती को वसुंधरा का वचन.

ताली की आवाज से सम्मोहन टूटा तो चारों ओर मुसकराते चेहरे नजर आए. हया से उस की नजर और सिर हलका सा  झुक गया, लेकिन होंठों की मुसकराहट बढ़ गई और फिर वह फिर से उस में सिमट गई. धीरे से कान में फुससफुसाई, ‘‘सब्र का बांध टूट रहा है. घर ले चलो.’’

मन तो उस का भी मचल उठा है लेकिन एकाकीपन ने उसे संयमित रहना सिखाया है और मर्यादित रहना भी. समय के साथसाथ वह मैच्योर होता गया है और फिर शरीर का क्या है रोज नईनई फरमाइशें करता है, तो खुद को बहलाना उसे आता है और सम झाना भी.

‘‘कुछ देर रुको. अभी ठहर कर चलते हैं. अपनी सांसें दुरुस्त कर लो,’’ कहते हुए उसे धीरे से कुरसी पर बैठा कर खुद भी बैठ गया और मुसकराते हुए बोला, ‘‘लगता नहीं कि उम्र ने तुम पर कुछ ज्यादा असर छोड़ा है.’’

‘‘मेरे हिस्से का भी सब्र तुम जो लिए बैठे हो,’’ उस की आंखों में  झांकते हुए वह बोली, ‘‘तुम बहुत अच्छे हो.’’ ‘‘और तुम बहुत सच्ची. एक साल से नौकरी कर रही हो?’’

‘‘खुद को जिंदा रखने का बस यही एक रास्ता बचा था. तुम मु झ से बेहतर जानते हो कि मुसलिम कल के लिए ज्यादा नहीं सोचते, तो सेविंग भी नहीं करते हैं. पैसे से ज्यादा भरोसा रब पर रखते हैं. अब्बू के जाने के बाद भी अम्मी ने बाहर का कोई काम नहीं करने दिया.

‘‘घर अपना था तो जैसेतैसे गुजारा चला लिया. अब अम्मी नहीं रहीं और पैसा भी, तो घर से बाहर निकल कर काम करना पड़ा. नहीं तो कौन औरत बाहर निकल कर काम करना चाहती है? हमें अपना घर सजानासंवारना अच्छा लगता है और अपने बच्चों को अपनी नजरों के सामने बढ़ा होते देखना भी.

‘‘तुम मु झे दकियानूसी कह सकते हो, लेकिन मेरा सच तो यही है. दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले, लेकिन औरत की सच्ची खुशी उसे अपने बच्चे पालने में ही मिलती है.’’ ‘‘लेकिन बच्चे तो अभी हैं नहीं,’’ उस ने हंसते हुए कहा.

‘‘तब तक हम दोनों एकदूसरे के लिए बच्चे बने रहते हैं. मु झे यकीन है तुम मेरा ख्याल रखोगे. पिछले एक बरस से कहने को तरस रही थी. अब तुम मिले हो तो सबकुछ कह देना चाहती हूं. तुम सुनोगे न?

‘‘हां, तुम सुनोगे. जरूर सुनोगे. सब्र है तुम में, लेकिन तुम्हें देख कर मेरा सब्र जाता रहा. मैं बेसब्री हूं क्या?’’

‘‘हां, थोड़ी सी तो हो, लेकिन जायज भी है और तुम पर फब भी रही है,’’ वह मुसकराते हुए बोला. ‘‘फिर इतना टाइम क्यों लगा रहे हो? चलो, घर चलते हैं. तुम्हारे पास घर तो है न?’’ उस ने सवालिया निगाहों से देखते हुए पूछा.

‘‘तुम्हें क्या लगता है कि मैं रैन बसेरे में रहता हूं?’’ ‘‘रहते भी हो तो ‘मेरे ठेंगे से’…’’ हंस कर बोली. रैन बसेरे में कपल को रहने तो देते होंगे न?’’ दोनों के ठहाके कौफी हाउस में गूंज गए.

‘‘तुम सच में अभी तक अकेले हो,’’ कहते हुए उस की आंखों में नमी आ गई. गलती तो मेरे पेरेंट्स की थी और सजा तुम ने पाई. उन्हें माफ कर सकते हो?’’

‘‘दरअसल, गलती उन की भी नहीं थी. जो उन्होंने सीखा, वही किया. बस, इतनी सी बात है. लेकिन अच्छी बात यह रही कि तुम ने सही किताब को पढ़ कर ठीक से सम झा भी. तुम थोड़ा सा और सोच लो, सम झ लो. कोई बड़ा है तुम्हारा? उन से सलाह कर लो और जिक्र भी.

‘‘हां, है न बड़ा?’’ ‘‘कौन है वह?’’ ‘‘तुम… तुम से सलाह भी कर ली और  जिक्र भी. तुम्हारा कहना पूरा हुआ.’’

‘‘तब फिर आओ चलो… तुम्हारे अब्बूअम्मी को सलाम कर आते हैं.’’ Hindi Love Story

-मुख्तार अहमद

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