Editorial: गहरी पैठ

कौकरोच जनता पार्टी के पढ़ाई के मुद्दों के साथ वोटों की चोरी के मुद्दे को ले लेना और दोनों पर युवाओं की पूरे देश में भारी भीड़ जमा होना, आरएसएस के लिए बड़ी खतरे की घंटी है. पौराणिक कहानियां सुनासुना कर जो सत्ता आरएसएस ने बड़ी मुश्किल से 2014 में पाई थी वह भारत के उस इतिहास में शायद ही कभी ही हुई थी जिस के बारे में पता है या सुबूत हैं.

कहने को हम विश्वगुरु हमेशा रहे हैं और कहने को सारा ज्ञान हमारे यहां ही सब से पहले आया है पर असलियत में हमारे मंत्र, पूजा, मंदिर, देवीदेवता न भक्तों को कभी बचा सके हैं न खुद को. हां, उन्होंने गांवगांव, शहरशहर, गलीगली में पंडेपुजारियों से मुफ्त के खाने का इंतजाम जातिवाद के सहारे कर रखा था.

आरएसएस का मकसद इस जातिवाद को पूजापाठ के सहारे बना कर रखना है और इस में वह काफी हद तक कामयाब भी है. आज हर जाति ने अपनेअपने देवीदेवता बना लिए हैं और नीची जातियों को अगर ऊंची जातियों के देवीदेवताओं को पूजने नहीं दिया जा रहा तो उन के अपने पंडे तैयार कर दिए हैं जो उसी तरह जाति का पूरा ताम?ाम बनाए रख रहे हैं जो पौराणिक ग्रंथों मनुस्मृति, रामचरितमानस में दिखता है.

कौकरोच आंदोलन बिना ‘जय श्रीराम’, बिना ‘भारत माता की जय’ के नारों से शुरू हो रहा है, एक ही मंच पर हर जाति के लोग हैं. ऊंची जाति के जवान लड़केलड़कियां यह सम?ा चुके हैं कि जातिवाद और धर्म का ढोल पीटने से कुछ नहीं मिलेगा, पुलिस के डंडे खाने को बारबार, जगहजगह आ रहे हैं और सोशल मीडिया इन युवाओं की पोस्टों से भर गया है.

आरएसएस ने ऊंची जातियों के 18 युवाओं को ले कर इस मुसीबत से निबटने के लिए अंगरेजी में एक किताब भी लिखवाई है हंड्रैड ईयर्स यंग : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. इस में संघ के महान कामों का बखान किया गया है. ठीक वैसे ही पौराणिक ग्रंथों में राम, कृष्ण के महान कामों का वर्णन होता है. जनता के लिए इन दोनों देवताओं ने क्या किया यह पौराणिक ग्रंथों में कहीं नहीं है. इस किताब में भी नहीं है.

देश की दिक्कत मुसलिम नहीं, अंगरेजों का राज नहीं है, नास्तिकता नहीं है. देश को दिक्कत है गरीबी से. देश को दिक्कत है बेरोजगारी से. देश को दिक्कत है भूख से. देश को दिक्कत है इलाज की कमी से. देश को पाकिस्तान और चीन से खतरा नहीं है उसे उन अपने अमीरों से है जो पूजापाठ की आड़ में जाति वाला भेदभाव, अमीरीगरीबी के भेदभाव को बढ़ाने में लगे हैं.

इस किताब में, जो आज ऊंची जातियों की बोली अंगरेजी में लिखी गई है, गरीबों की बुरी हालत का जिक्र्र नहीं है. देश में मेहनती लोगों की कमी नहीं है और यह वे 3 करोड़ युवा बताते हैं जो विदेशों में काम कर के डौलर देश को भेज रहे हैं. संघ को इन की नहीं, सिर्फ पूजापाठ, संस्कृति, संस्कार, दानदक्षिणा, जाति की चिंता है.  Editorial

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