Story in Hindi. 2 बच्चों के बाप आशुतोष का दिल अपने बैंक में काम करने वाली मोना पर आ गया. वह उसे घर ले आया. आगे क्या हुआ?

यह बात है आज से 10 साल पहले की. कुरुक्षेत्र के एक सब्जी आढ़ती की बेटी संध्या का ब्याह करनाल में बैंक मैनेजर आशुतोष के साथ हुआ.

संध्या बीए पास थी, इसलिए वह केवल घरेलू औरत ही रही. वैसे भी आशुतोष की पुश्तैनी जमीनजायदाद बहुत ज्यादा थी. बैंक में तो वह केवल शौकिया नौकरी करता था. परिवार में भी और कोई नहीं था, इसलिए केवल आशुतोष और संध्या यही छोटी सी फैमिली थी.

शादी के 2 साल बाद संध्या ने एक बेटी को जन्म दिया. बहुत ही प्यारी और सुंदर परियों जैसी बेटी थी. आशुतोष बेटी को पा कर बहुत खुश था. उस ने बेटी का नामकरण बड़े ही धूमधाम से किया. बेटी 2 साल की थी तो एक बेटा पैदा हुआ. दोनों बच्चे बहुत ही प्यारे और सुंदर थे.

आशुतोष बच्चों को बहुत प्यार करता था. जाहिर सी बात है कि हर मातापिता अपने बच्चों को प्यार करते हैं. कभीकभी तो संध्या इस बात पर आशुतोष से नाराज हो जाती थी और कहती थी, ‘‘इतना लाड़ मत दो बच्चों को. बिगाड़ रहे हो.’’

इस पर आशुतोष कहता, ‘‘बच्चे ही तो हैं, बिगड़ेंगे नहीं तो क्या हमारी तरह सम झदार होंगे? जब वे बड़े हो जाएंगे खुद ही सम झ आ जाएगी. जो करते हैं करने दो.’’

आशुतोष और संध्या का बेटा रौनक पहली क्लास में और बेटी शनाया 5वीं क्लास में करनाल के सब से बड़े आदर्श निकेतन पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे.

संध्या अपने बच्चों और घर में ज्यादा बिजी रहने लगी, जिस के कारण जब आशुतोष घर आता तो वह उस को समय कम ही दे पाती थी. लिहाजा, आशुतोष कभी तो बच्चों के साथ खेलने में बिजी हो जाता और अगर बच्चे पढ़ाई में बिजी होते तो वह दोस्तों के साथ घूमने निकल जाता. इस तरह वह धीरेधीरे अपने दोस्तों के साथ ज्यादा समय बिताने लगा.

एक दिन आशुतोष रात को जब घर आया तो एक खूबसूरत जवान लगभग 25 साल की लड़की मोना को साथ लाया और पत्नी से मिलवाया व बोला, ‘‘संध्या, यह मोना है. और मोना यह संध्या है. संध्या, आज से मोना कुछ दिनों के लिए हमारे साथ रहेगी. तुम इस के लिए ऊपर का कमरा तैयार कर दो.’’

‘‘ठीक है, संध्या ने कहा.’’ ‘‘संध्या, तुम जब तक इस का कमरा तैयार करो, हम ड्राइंगरूम में इंतजार करते हैं,’’ यह कह कर आशु मोना को ड्राइंगरूम में ले गया.

संध्या के मन में खलबली मची थी कि आशु ने मोना के बारे में कुछ नहीं बताया. मोना कौन है? क्या वह आशुतोष की कजिन है या कोई दोस्त है? वह कुछ सम झ नहीं पा रही थी, लेकिन उस ने  झट से ऊपर का कमरा मोना के लिए तैयार कर दिया और ड्राइंगरूम में उन्हें बुलाने चली गई, ‘‘आशु, मैं ने मोनाजी के लिए कमरा तैयार कर दिया है.’’

‘‘आइए मोनाजी, मैं आप को अपने कमरे में छोड़ दूं,’’ संध्या बोली. ‘‘अरे संध्या, तुम क्यों तकलीफ करती हो. तुम भी थक गई होगी और रौनक भी अकेला सोया हुआ है. तुम उस के पास जा कर लेटो, मैं मोना को छोड़ कर आता हूं. आओ मोना, तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखा दूं,’’ और आशुतोष मोना को ले कर ऊपर चला गया.

लगभग 15-20 मिनट के बाद आशुतोष नीचे आया. ‘‘आशु, बहुत देर लगा दी तुम ने ऊपर?’’ ‘‘हां, वह बस मोना से कुछ बातचीत करने लग गया था, चलो अच्छा मैं थक गया हूं, सो जाता हूं. तुम भी सो जाओ. शनाया सो गई क्या?’’

‘‘हां, आज तुम्हें बहुत याद कर रही थी. कह रही थी, बहुत दिनों से पापा कहीं घुमाने नहीं ले गए.’’ ‘‘हां, मैं भी यही सोच रहा था. चलो, इस वीकैंड पर कहीं बाहर घूमने का प्रोग्राम बनाते हैं.’’ ‘‘हां, यह ठीक रहेगा.’’

‘‘अच्छा, मैं एक मिनट शनाया को देख कर आता हूं,’’ यह कह कर आशुतोष बगल वाले कमरे में बेटी को देखने चला गया और थोड़ी देर बाद वापस कमरे में आ कर हंसने लगा.

‘‘क्या हुआ आशु?’’ ‘‘लगता है शनाया को कोई बात याद आ रही है. सोए हुए ऐसे हंस रही थी जैसे कोई चुटकुला सुन लिया हो,’’ और इस तरह हंसतेहंसते आशुतोष लेट गया.

‘‘आशु, तुम ने बताया नहीं यह मोना कौन है? क्या आप की कोई कजिन है या दोस्त है और इस वक्त यहां कैसे? कहीं बाहर से आई है क्या?’’ संध्या ने पूछा.

‘‘अरे हां, मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गया. दरअसल संध्या, यह मोना सिंह है यानी सरदार है और मेरा एक दोस्त है अजय शर्मा. शर्मा यानी पंडित. ये दोनों प्यार करते हैं लेकिन इन दोनों के मातापिता इन की शादी नहीं कराना चाहते इसलिए यह अपने घर से भाग आई है.

‘‘अजय कहीं दूसरी जगह अपना इंतजाम कर के कोर्ट मैरिज कर के इसे ले जाएगा. अभी वह ट्रांसफर के लिए कोशिश कर रहा है. उम्मीद है जल्दी ही उस का ट्रांसफर हो जाएगा यहां से. जैसे ही उस का ट्रांसफर किसी दूसरे शहर में होगा वह इसे यहां से कोर्ट मैरिज कर के ले जाएगा.’’

‘‘लेकिन मोना के मातापिता ढूंढ़ते हुए अगर यहां तक आ गए तो हम बिना वजह फंस जाएंगे.’’ ‘‘वे नहीं आएंगे. मोना ने घर में चिट्ठी लिख छोड़ी है और कह दिया है कि ‘मैं अजय के बिना नहीं जी सकती. मैं अजय से शादी कर के अपना घर बसाने जा रही हूं. मु झे ढूंढ़ा न जाए. मैं आप के लिए मर चुकी हूं’. मोना के मातापिता उसे नहीं ढूंढ़ेंगे, क्योंकि मोना के पिता बहुत जिद्दी हैं.’’

‘‘लेकिन आशु, मु झे यह सब ठीक नहीं लग रहा. आप इस के लिए कहीं और रहने का इंतजाम करवा लो और शनाया भी कोई छोटी बच्ची नहीं है. वह पूछेगी कि यह कौन है तो क्या कहेंगे हम उसे? और आज पड़ोस वाले भी पूछेंगे तो क्या कहेंगे हम उन लोगों को कि यह कौन है?’’

‘‘अरे संध्या, तुम भी बात को कहां से कहां ले जाती हो. किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं, बस कह देना कि तुम्हारी कजिन है. यहां मेरे औफिस में इस का ट्रांसफर हुआ है. वह अकेले कहीं और रहे यह अच्छा नहीं लगता इसलिए मैं ने उसे अपने घर में रखा है.’’

‘‘लेकिन यह कितने दिन यहां रहेगी?’’ ‘‘बस 10-15 दिन, तब तक अजय का ट्रांसफर हो जाएगा तो वह इसे ले जाएगा.’’ ‘‘10-15 दिन…’’ संध्या बोली.

‘‘अरे संध्या….  तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे 10-15 साल रहना हो. चलो, छोड़ो इन बातों को. मैं थक गया हूं अब मु झे सोने दो,’’ ऐसा कह कर मुंह फेर कर आशुतोष सो गया.

इस तरह मोना आशुतोष के घर में रहने लगी. रोज सुबह वह आशुतोष के साथ ही बैंक चली जाती और शाम को उस के साथ ही आती. आसपड़ोस वालों के पूछने पर संध्या ने बताया कि मोना उस की कजिन है, उस का ट्रांसफर आशु के बैंक में हुआ है, इसलिए वह उन्हीं के घर में रहती है और इसलिए आशु के साथ ही बैंक आतीजाती है.

लेकिन इधर आशुतोष और मोना कुछ अलग ही खेल रच रहे थे. दरअसल, वह अब संध्या से ऊब चुका था और उस के बैंक में दिल्ली से एक नई मुलाजिम आई थी मोना, जिसे देखते ही आशु अपना दिल दे बैठा और वह लड़की यानी मोना भी आशु को चाहने लगी. चाहत जब हद से बढ़ गई तो मोना ने आशु के सामने शादी का प्रस्ताव रखा.

लेकिन आशु ने उसे शादी के लिए मना करते हुए कहा, ‘‘मोना, मैं तुम से कुछ छिपाना नहीं चाहता. मैं शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता हूं, लेकिन मैं अपनी गृहस्थी से बहुत परेशान हूं. अगर तुम मेरी जिंदगी में न आती तो मैं अब तक आत्महत्या कर चुका होता. अब तुम आ गई हो मु झे तुम्हारा सहारा मिल गया है. अब मैं अपनी पत्नी को तलाक दे कर तुम से शादी करूंगा. बस तुम मु झे छोड़ कर मत जाना वरना मैं मर जाऊंगा. मु झे थोड़ा वक्त दो.’’

इस तरह से आशु ने आंसू बहा कर मोना को इमोशनली ब्लैकमेल किया और मोना भी उस की बातों में आ गई. ‘‘आशु, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूंगी, और खबरदार जो आज के बाद मरने की बातें की तो. तुम जितना वक्त चाहे ले सकते हो लेकिन मु झे बीच राह में छोड़ कर कभी मत जाना,’’ मोना ने कहा. ‘‘नहीं मोना, तुम्हारे बिना तो मैं जीने की सोच भी नहीं सकता. मैं अपनी पत्नी से बहुत परेशान हूं.’’

इस तरह से मोना को पाने के लिए आशु ने न जाने कितने  झूठ बोले. मोना एक किराए के फ्लैट में अकेली रहती थी, इसलिए आशु के लिए रास्ता खुला था. दोनों जब भी शारीरिक संबंध बनाना चाहते तो बैंक के बाद मोना के फ्लैट पर चले जाते.

लेकिन अब ज्यादा दूरी दोनों को बरदाश्त न होती, इसलिए मोना और आशु ने मिल कर एकसाथ रहने के लिए यह प्लान बनाया. मोना के आने के बाद आशु संध्या से कुछ ज्यादा ही कटाकटा रहने लगा. अव्वल तो दोनों घर पर देर से ही आते और यदि समय पर आ जाते तो ज्यादातर आशु मोना के कमरे में ही ऊपर रहता.

संध्या और बच्चों को ऊपर जाने की मनाही थी, क्योंकि आशु उन्हें यह कह कर रोक देता कि वे दोनों बैंक का कुछ जरूरी काम कर रहे हैं, इसलिए उन्हें डिस्टर्ब न किया जाए.

लेकिन मोना के आने के बाद आशु में एक बदलाव आ गया था. जो आशु बिस्तर पर लेटने के बाद संध्या से दूध मांगता था वही आशु अब रोज रात को खुद अपने हाथों से सब के लिए दूध के गिलास तैयार करता, क्योंकि उस के दिमाग में एक खतरनाक प्लान चल रहा था.

आशु अब रोज ही संध्या के दूध में नींद की दवा डाल देता जिस से संध्या पूरी रात गहरी नींद में सोती और आशु पूरी रात मोना के कमरे में बिताता और संध्या को इस की कानोंकान खबर भी न हुई.

इस तरह से एक महीना बीत गया. अभी तक न तो आशु ने मोना के रहने के लिए किसी और जगह का इंतजाम किया और न ही कोई आशु का दोस्त कभी आया. इस पर एक दिन संध्या और आशु के बीच में कहासुनी भी हो गई.

‘‘आशु, कहां है तुम्हारा दोस्त? एक दिन भी मोना से मिलने नहीं आया और यह कब तक यहां रहेगी? मु झे मोना का यहां रहना ठीक नहीं लगता,’’ संध्या चिल्लाई.

संध्या को चुप कराने के लिए एक दिन आशु एक लड़के को साथ ले आया और उस का नाम अजय बताया. वह थोड़ी ही देर उन के घर रुका और चला गया. ‘‘लो, आज तुम्हें अच्छे से मिला दिया… अब तो तसल्ली हो गई या कुछ और भी बाकी है?’’

‘‘मैं यह सब नहीं जानती. बस इतना जानती हूं कि मोना का अब और यहां रहना ठीक नहीं, मु झ से अब और नहीं होता,’’ न जाने क्यों संध्या के मन में इन दोनों के लिए कुछ शक पलने लगा.

‘‘अरे संध्या, तुम्हें तो मैं ने कितनी बार कहा है कि तुम्हें जरूरत ही क्या है काम करने की. बाकी सब काम के लिए तो तुम ने कामवाली बाई रखी है, अगर तुम्हें चाहिए तो तुम खाना बनाने वाले को भी रख लो. क्यों अपने शरीर को कष्ट देती हो?’’

‘‘मु झे अपने बच्चों और अपने पति के लिए खाना बनाने में कोई कष्ट नहीं होता, लेकिन दूसरों के लिए मैं रोजरोज नहीं बना सकती.’’

‘‘संध्या, तुम भी न क्या यार… ठीक है कुछ दिन और बरदाश्त कर लो फिर मैं जल्दी मोना का कहीं इंतजाम कर दूंगा. और तुम कल से ही खाना बनाने वाली बाई को बुला लो. बस अब मैं ने कह दिया तो कह दिया. अब मैं तुम्हारी एक नहीं सुनूंगा, कल से तुम खाना बनाने वाली बाई रख लो…’’ यह कहते हुए संध्या के दोनों हाथ पकड़ कर आशु बोला, ‘‘देखो तो कैसे हो गए हैं तुम्हारे हाथ. कितने कोमल हुआ करते थे और अब कितने सख्त हो गए हैं. कल से तुम्हें कोई काम करने की जरूरत नहीं है. बस केवल अपना और बच्चों का ध्यान रखो.’’

अगले ही दिन खाना बनाने वाली बाई रख ली गई.

मोना और आशु आखिर कब तक यों छिपछिप कर अपने तन की प्यास बु झाते. एक दिन उन्होंने एक ठोस फैसला लिया. आशु संध्या को रोज नींद की दवा तो देता ही था, एक दिन उस ने उस को हमेशा की नींद सुलाने का फैसला कर लिया. आधी रात के समय मोना और आशु दोनों ने संध्या के मुंह पर तकिया रख कर दबा दिया और उसे हमेशा के लिए सुला दिया.

लेकिन अब सवाल था कि लाश को ठिकाने कैसे लगाया जाए? यह सोचतेसोचते उन्हें पूरी रात बीत गई. अगले दिन सुबह संध्या के न उठने पर बच्चे परेशान थे. उन्हें स्कूल के लिए कौन तैयार करेगा?

आशु ने बच्चों को यह कह कर स्कूल भेज दिया कि आज मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है उसे सोने दो. और आशु और मोना दोनों ने बैंक से छुट्टी ले ली.

मोना को एक आइडिया आया. आशु ने संध्या को गोद में उठा कर गाड़ी की पिछली सीट पर लिटा दिया और मोना आगे की सीट पर आशु के साथ बैठ कर जब जाने लगे तो घर की नौकरानी आ गई. आशु ने उसे यह कहा कि संध्या की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए हम दवा लेने जा रहे हैं और उसे छुट्टी दे दी गई.

तब एक पहाड़ी की तरफ गाड़ी ले जा कर मोना और आशु गाड़ी से उतर गए और संध्या को ड्राइविंग सीट पर बैठा दिया, बैल्ट लगा दी और गाड़ी को पहाड़ी से नीचे की ओर धकेल दिया.

जब बच्चे स्कूल से घर आए तो उन्हें यह कहा गया कि संध्या कुरुक्षेत्र अपनी मम्मी के घर गई है.

‘‘लेकिन पापा, सुबह तो मम्मी की तबीयत ठीक नहीं थी.’’ ‘‘हां…. पर बाद में मम्मी अब ठीक हो गई थीं. दरअसल, तुम्हारी नानी की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए मम्मी कुरुक्षेत्र गई हैं.’’ ‘‘लेकिन मम्मी अकेले क्यों गई हैं? हमें ले कर क्यों नहीं गई हैं? हमें भी नानी से मिलना था.’’

‘‘तुम्हारे एग्जाम आने वाले हैं न, तुम्हारी पढ़ाई का नुकसान न हो इसलिए मम्मी तुम्हें साथ ले कर नहीं गईं.’’

लेकिन साथ ही आशु के मन में एक डर भी बैठ गया कि किसी दिन संध्या की मौत का राज खुला तो क्या होगा, इसलिए उस ने 2 दिन के बाद संध्या के अकाउंट से एटीएम कार्ड द्वारा बैंक से कुछ रकम निकाली और संध्या के मोबाइल से कुछ सामान भी और्डर कर के मंगवाया, ताकि संध्या जिंदा साबित हो और तकरीबन एक हफ्ते बाद उस ने अपनी ससुराल फोन किया तो फोन उस के साले आकाश ने उठाया.

‘‘हैलो आकाश, कैसे हो? मम्मीजी की तबीयत कैसी है अब?’’ ‘‘जीजू, मम्मी तो ठीक हैं. क्या हुआ मम्मी  को?’’ ‘‘अरे, संध्या बता रही थी कि मम्मीजी की तबीयत ठीक नहीं, इसलिए एक हफ्ते से वह तुम्हारे यहां आई हुई है.’’

‘‘संध्या यहां आई है? नहीं जीजू, संध्या यहां नहीं आई.’’ ‘‘नहीं आकाश, संध्या एक हफ्ते पहले तुम्हारे यहां आई थी. कह रही थी कि मां की तबीयत ठीक नहीं इसलिए मैं कुछ दिनों के लिए मां के पास जा रही हूं.’’

‘‘मैं काम में बहुत ज्यादा बिजी था और बच्चों की जिम्मेदारी भी मु झ पर थी इसलिए मु झे फोन करने का समय ही नहीं मिला. सोचा कि आज संध्या से भी बात कर लूं और मम्मीजी का हालचाल भी पूछ लूं और संध्या से पूछूं कि कब वापस आना है. चाहता तो मैं भी था कि मम्मीजी को मिलने आऊं, लेकिन बैंक का काम इतना ज्यादा है कि मैं आ नहीं सका.’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं जीजू, संध्या यहां नहीं आई है.’’ ‘‘क्या? संध्या वहां नहीं आई तो वह गई कहां? ऐसा कैसे हो सकता है? एक हफ्ते पहले तो संध्या कुरुक्षेत्र का कह कर यहां से गई थी. मैं ने खुद उसे बस में बैठाया था. मैं ने कहा भी था कि ड्राइवर ले जाओ.

‘‘दरअसल, एक गाड़ी खराब थी और दूसरी गाड़ी वह मेरे लिए छोड़ गई ताकि मु झे बैंक आनेजाने में परेशानी न हो, इसलिए बस में चली गई.’’

आकाश ने जब घर में सब को यह बताया कि संध्या एक हफ्ते से लापता है और घर से यह कह कर निकली है कि वह हमारे यहां आ रही है तो संध्या के मातापिता और आकाश उसी समय सब करनाल के लिए चल पड़े. उन लोगों के आते ही आशुतोष ने उन सब के साथ पुलिस स्टेशन जा कर संध्या के लापता होने की रिपोर्ट लिखवाई.

लगभग 15 दिन तक कोई सुराग न मिला लेकिन इसी बीच संध्या के एटीएम कार्ड से फिर से पैसे निकाले गए.

आशु ने कहा, ‘‘यह देखो आकाश, आज फिर संध्या ने अपने अकाउंट से पैसे निकाले हैं. ऐसा पहले भी एक बार हो चुका है. मैं ने आप लोगों को नहीं बताया कि कहीं आप लोग यह न सोचें कि मु झे संध्या की नहीं पैसों की फिक्र है. कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है. संध्या अपना फोन भी घर पर छोड़ गई है. न तो हम उसे फोन मिला सकते हैं, न कुछ उस के बारे में जान सकते हैं. ऐसा क्यों किया संध्या ने? मु झे कुछ समझ नहीं आ रहा कि संध्या कहां गई और क्यों गई?’’

‘‘जीजू, यही तो मैं भी सोच रहा हूं कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि संध्या बिना किसी को बताए कहीं चली गई.’’

कुछ दिनों के बाद एक दिन आशुतोष बच्चों को अपने साथ अपनी ससुराल ले कर गया. इस पूरे समय में मोना भी आशुतोष और उस के परिवार के साथ रही, क्योंकि आशुतोष ने अपनी ससुराल वालों को यह बताया था कि मोना उस की कजिन है और दिल्ली से आशु के बैंक में ट्रांसफर हो कर आई है और संध्या के ही कहने पर मोना उन के घर में रह रही है.

जब आशु अपनी ससुराल में सब के साथ बैठा हुआ था तो उस के मोबाइल पर अनजान नंबर से एक फोन आया. आशु ने जानबू झ कर फोन को स्पीकर पर लगाया और बात करने लगा. उधर से इस तरह से बात की गई कि जिस से यह साबित हो कि संध्या अपनी मरजी से घर छोड़ कर गई है.

‘‘मैं वैभव बोल रहा हूं. मैं और संध्या एकदूसरे से प्यार करते हैं और हम ने शादी कर ली है. अब संध्या का किसी से कोई नाता नहीं है,’’ इतना कहते ही फोन कट गया किसी को बात करने का मौका नहीं मिला.

जब दोबारा उस नंबर पर फोन मिलाया गया तो फोन स्विच औफ बता रहा था. यह सब सुन कर सब के सब सकते में आ गए, लेकिन संध्या की मम्मी यह मानने को तैयार नहीं थीं कि संध्या ऐसा कर सकती है.

आशुतोष और आकाश ने यह सब सुन कर पुलिस केस वापस ले लिया और इस मामले को यहीं खत्म कर दिया, लेकिन संध्या की मम्मी को यह बात हजम नहीं हो रही थी. उन्होंने निजी तौर पर पुलिस से संपर्क बनाए रखा और उन्हें संध्या को ढूंढ़ने के लिए बारबार कहती रहीं.

इधर आशुतोष ने अपनी बेचारगी और बच्चों की मजबूरी दिखा कर मोना से शादी कर ली. इस बात को 3 महीने बीत गए.

एक दिन पहाड़ी के नीचे कबाड़ चुनने वाले एक शख्स को एक टूटीफूटी गाड़ी नजर आई और वह गाड़ी की तरफ चल पड़ा. उसे लगा कि गाड़ी में से कुछ न कुछ सामान निकाल कर कुछ पैसा मिल जाएगा. लेकिन जैसे ही वह गाड़ी के पास पहुंचा उसे गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर एक मानव कंकाल नजर आया. उस ने पुलिस स्टेशन जा कर यह बात बताई.

पुलिस ने आ कर तफतीश की और संध्या की मां को गाड़ी और कंकाल की तसवीर भेज दी.

गाड़ी का नंबर देखते ही संध्या की मां का माथा ठनका. वे  झट से पुलिस स्टेशन गईं और उन्होंने बताया कि यह गाड़ी तो आशुतोष की है. कंकाल को लैब में टैस्टिंग के लिए भेजा गया और पता चला कि वह संध्या का ही कंकाल था.

अब संध्या की मम्मी ने घर पर सारी बात बता कर आकाश और अपने पति को ले कर पुलिस स्टेशन में आशुतोष के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई और पुलिस आशुतोष को गिरफ्तार करने पहुंच गईं.

आशुतोष को गिरफ्तार कर लिया गया. जब आशुतोष से उस की गाड़ी के बारे में पूछा गया तो उस ने गाड़ी चोरी होने की बात कही.

‘‘अगर गाड़ी चोरी हो गई थी तो आप ने रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई?’’ ‘‘दरअसल मम्मीजी, जिस दिन संध्या आप के यहां आई थी उस के लगभग एक हफ्ते बाद मेरी गाड़ी चोरी हो गई थी. तब तक हमें पता चल चुका था कि संध्या लापता है. मु झे लगा शायद संध्या ने ही गाड़ी उठवाई हो, इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया.’’

‘‘लेकिन संध्या को गाड़ी चलानी आती नहीं तो वह गाड़ी कैसे ले जा सकती है?’’ ‘‘हो सकता है कि उस का वह आशिक वैभव ले गया हो.’’

इतनी बात सुनते ही संध्या की मम्मी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्होंने आशुतोष के मुंह पर जोर से एक थप्पड़ जड़ दिया, ‘‘खबरदार जो मेरी बेटी के बारे में कुछ उलटासीधा कहा तो. मेरी बेटी ऐसी नहीं थी, तुम ने मेरी बेटी की हत्या की है, तुम मेरी बेटी के हत्यारे हो.’’

‘‘मैं आप की बेटी को क्यों मारूंगा, मैं तो उस से बहुत प्यार करता था.’’ ‘‘क्या यही प्यार है? उसे गए अभी 3-4 महीने भी नहीं हुए और तुम ने दूसरी शादी कर ली और शादी भी उस से, जिसे तुम अपनी कजिन कहते हो. शर्म आनी चाहिए तुम्हें.’’

‘‘यह मेरी कोई सगी कजिन नहीं, जिस से मैं शादी न कर सकूं. मुंहबोली कजिन है, मुंहबोली बूआ की बेटी है. मैं ने जो किया केवल बच्चों के लिए किया और फिर यह बच्चों को अच्छी तरह संभाल भी रही है.

‘‘मैं किसी और से शादी करता तो न जाने वह बच्चों के साथ कैसा बरताव करती. मोना संध्या की तरह ही बच्चों का और घर का खयाल रखती है.’’

आशुतोष को गिरफ्तार कर लिया गया. आज टीवी के हर एक चैनल पर यही सनसनीखेज खबर चल रही है कि किस तरह एक कूड़ा बीनने वाले की वजह से हत्या का सुराग मिला. Story in Hindi.

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