CJP Movement. 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ मनाया जाता है. किसी भी देश के किसी भी समाज के उस वंचित, दलित तबके का दिन, जो अपने कसरती बदन से समाज, देश यहां तक कि दुनिया को बनाता है. साल 2026 के इसी मई महीने से पहले अभिजीत दीपके नाम के नौजवान को कोई नहीं जानता था, पर 6 जून, 2026 को 30 साल का वही अभिजीत दीपके अमेरिका के बोस्टन से दिल्ली लौटा तो सरकार तक में हलचल मच गई थी.
वजह, कौकरोच जनता पार्टी नाम से सोशल मीडिया पेज बनाने वाले अभिजीत दीपके ने जब भारत आ कर देश के भ्रष्ट एग्जाम सिस्टम, खासकर नीट एग्जाम में होने वाली गड़बड़ी को ले कर सीधे देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने की बात कही तो सब के मन में एक शक था कि आगे क्या होगा.
पर अभिजीत दीपके ने दिल्ली के जंतरमंतर पर प्रदर्शन शुरू किया, जहां शुरुआती दौर में भीड़ कम थी. पर अभिजीत दीपके और उस के जैसे बहुत से नौजवानों की बदौलत कौकरोच जनता पार्टी के बैनर तले नीट पेपर लीक के खिलाफ 37 दिन तक आंदोलन चलाया गया, जिस के बाद 25 जुलाई, 2026 को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ. इसे इस ग्रुप की पहली बड़ी कामयाबी माना गया.
यह आंदोलन सिर्फ दिल्ली में ही नहीं हुआ था, बल्कि देश के कई हिस्सों में नौजवान सड़कों पर उतर आए थे. बिहार की राजधानी पटना में तो जेनजी ने पुलिस और दूसरे सुरक्षाबलों से सीधे लोहा लिया था. इस छात्र आंदोलन की सब से बड़ी खासीयत यह रही कि इस में हर तबके के लड़केलड़की ने हिस्सा लिया.
बड़े शहर के कूल जेनजी से ले कर गांवदेहात के पैरों में चप्पल पहने, कंधे पर पुराना सा बैग टांगे दिल्ली पहुंच गए थे. न खाने के जेब में पैसे, न रहने का ठिकाना, पर जिद थी सरकार को झुकाने की. ज्यादातर दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग के बच्चे, जो समझ रहे थे कि देश तानाशाही से नहीं बल्कि भारत के संविधान से चलेगा.
स्कूल ठीक करो मुहिम
इस मुहिम को 15 अगस्त, 2026 को अभिजीत दीपके ने अपने गांव हिंगोली, महाराष्ट्र से शुरू किया था. इस का आइडिया था कि वालंटियर अपने गांव के सरकारी स्कूल में जा कर टौयलेट, पीने का पानी, बिजली, फर्नीचर, बिल्डिंग और मिडडे मील का वीडियो आडिट करें.
महाराष्ट्र के हिंगोली में जो सामने आया उस में एक्सपायर्ड खाने से मिडडे मील बनना, पीने का पानी न होना और टौयलेट नहीं की पोल खुली. तब अभिजीत दीपके ने ताना मारते हुए कहा था, “मंत्री के कुत्तों को बच्चों से बेहतर सुविधा मिलती है.”
इसी तरह सीजेएपी टीम ने आरोप लगाया था कि राजस्थान एक सरकारी स्कूल सालों से भैंस के बाड़े से चल रहा है. इस के बाद राजस्थान सरकार के आंकड़े सामने आए… राजस्थान में ही 611 सरकारी स्कूल बिना बिल्डिंग के चल रहे हैं, 64,484 स्कूलों में से 2,047 में टौयलेट नहीं, 1,049 में पीने का पानी नहीं. बाद में बगरू गांव का जर्जर स्कूल तोड़ा गया और सरकार ने 18 लाख रुपए का नया बजट दिया.
नौजवानों की इस मुहिम से डरी राजस्थान सरकार ने 17 अगस्त, 2026 को आदेश निकाला कि बिना इजाजत स्कूल में बाहरी लोगों का प्रवेश और फोटोवीडियो बैन. इसी तरह लातूर, महाराष्ट्र में अभिजीत दीपके पर एफआईआर हुई. उन पर बिना इजाजत स्कूल में घुसने, सरकारी काम में बाधा डालने और टीचरों को धमकाने का आरोप लगा.
इतना ही नहीं, जयपुर के कंवरपुरा में सीजेपी टीम पर हमला हुआ था. गाड़ी के शीशे तोड़े जाने का आरोप लगाया गया, जिसे भाजपा ने ‘स्कूल को राजनीतिक अखाड़ा बनाना’ कहा.
इस का असर क्या हुआ
इस मुहिम पर सीजेपी ने दावा किया कि औनलाइन एक्सपोजर के डर से सरकार की तरफ से कई जगह रातोंरात मरम्मत हुई और हरियाणा जैसे राज्यों ने इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड के लिए बजट अनाउंस किया.
याद रहे कि भारत के गांवदेहात और शहरी दोनों क्षेत्रों में, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चे आज भी मुख्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं. इस के उलट, अन्य जाति समूहों के छात्र अपनी स्कूली पढ़ाई पर होने वाले खर्च से दोगुने से भी ज्यादा पैसा ट्यूशन पर खर्च करते हैं.
एसआईआर पर साधा निशाना
इस के बाद सीजेपी आंदोलन का फोकस एसआईआर यानी स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन पर आ गया. इस ‘दबाव समूह’ का आरोप है कि इस प्रोसैस में 13 करोड़ से ज्यादा नाम वोटिंग लिस्ट हटाए गए हैं और यह चुनाव आयोग के मुख्य आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में हो रहा है.
इस सिलसिले में 2 अक्तूबर ‘गांधी जयंती’ से सीजेपी ने मुंबई के शिवाजी पार्क से देशव्यापी आंदोलन और जेल भरो आंदोलन का ऐलान किया, जिस में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग थी.
इतना ही नहीं, 10 अक्तूबर और 16 अक्तूबर को दिल्ली में जंतरमंतर और कनाट प्लेस के सैंट्रल पार्क में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का ऐलान किया गया, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी और अभिजीत दीपके समेत सौरभ दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और ‘आइसा’ अध्यक्ष नेहा बोरा को हिरासत में लिया गया.
बदलाव की लहर
कौकरोच जनता पार्टी के समर्थक इसे जेनजी के नेतृत्व वाला स्वतंत्र प्रैशर ग्रुप मानते हैं जो विपक्षी दलों के साथ तकरीबन एकजैसे मुद्दे पर लड़ रहा है, पर किसी पार्टी में विलय नहीं चाहता जबकि आलोचक इसे सोशल मीडिया से निकला क्षणिक आंदोलन मानते हैं जो कानूनी पाबंदियों के सामने टिक नहीं पा रहा.
पर कोई कुछ भी कहे यह युवा आंदोलन का एक ऐसा शानदार उदाहरण है जो मीम से शुरू हो कर सड़क तक पहुंचता है और इस पर सरकार की प्रतिक्रिया (जैसे धारा 144, जंतरमंतर को डिनोटिफाई करना पीस बौन्ड भरवाना) यह दिखाती है कि प्रशासन ऐसे आंदोलनों को कैसे हैंडल करता है.
लेकिन सरकार जीत गई है, वह इस भरम में न रहे, क्योंकि ज्यादातर गरीब, वंचित और मजदूर परिवारों से ताल्लुक रखने वाले ये जेनजी समझ गए हैं कि संविधान में दी गई ताकत उन्हें किसी अपनी आवाज उठाने का हक देती है, फिर चाहे सामने ताकतवर सरकार ही क्यों न हो. CJP Movement




